আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8559 - حدَّثَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا محمد بن يعقوب.وقد حدَّثَناه أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث وابن لَهِيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سِنَان ابن سعد، عن أنس بن مالك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "بينَ يَدَي الساعةِ فتنٌ كَقِطَع الليل المُظلم، يصبحُ الرجلُ فيها مؤمنًا ويُمسي كافرًا، ويُمسي مؤمنًا ويصبح كافرًا، يبيعُ أقوامٌ دينَهم بعَرَضٍ من الدنيا" [1].
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামতের আগে এমন সব ফিতনা আসবে যা গভীর অন্ধকারের মতো হবে। তাতে মানুষ সকালে মুমিন থাকবে এবং সন্ধ্যায় কাফির হয়ে যাবে, আবার সন্ধ্যায় মুমিন থাকবে এবং সকালে কাফির হয়ে যাবে। কিছু লোক তাদের দ্বীনকে দুনিয়ার সামান্য স্বার্থের বিনিময়ে বিক্রি করে দেবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل سنان بن سعد، فإنه يصلح للاعتبار.وأخرجه الترمذي (2197) من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، بهذا الإسناد.وقال: حديث غريب من هذا الوجه.وانظر شواهده في الذي قبله.
8560 - أخبرنا أبو العباس السَّيَّاري بمَرُو، أخبرنا أبو المُوجّه، أخبرنا عَبْدان [1]، أخبرنا عبد الله، أخبرنا سعيد بن إياس الجُرَيري، عن أبي نضرة، عن أبي فراس قال: قال عمر بن الخطاب: ألا أيُّها الناس إنا كنا نَعرِفُكُم إِذْ فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم وَإِذْ يَنزِلُ الوحيُ وإذْ يُنبئنا من أخباركم، ألا وإن النبي صلى الله عليه وسلم قد انطَلق ورُفِع الوحيُ، وإنما نعرفُكم بما أقولُ لكم، ألا ومن يُظهِرُ منكم خيرًا ظننا به خيرًا وأحببناه عليه، ومن يُظهِرُ منكم شرًّا ظننا به شرًا وأبغضناه عليه، سرائركم فيما بينكم وبين ربِّكم، ألا وقد أتى عليَّ زمانٌ وأنا أحسَبُ مَن قرأَ القرآن يريد به الله وما عنده، ولقد خُيِّل إليَّ بأَخَرةٍ أنَّ قومًا يقرؤونه يريدون ما عند الناس، ألا فأريدوا ما عند الله بقراءتِكم وبعملِكم، ألا وإنِّي -والله- ما أبعثُ عُمّالي ليَضرِبوا أبشارَكم ويأخذوا أموالَكم، ولكنّي أبعثُهم ليعلِّموكم دينكم وسُننكم، ويعدلوا بينكم ويَقسِموا فيكم فَيْئَكم، ألا من فُعِلَ به شيءٌ من ذلك فليَرفَعه إليَّ، والذي نفسُ عمرَ بيده لأقصَّنَّه منه. فَوَثَبَ عمرُو بن العاص فقال: يا أمير المؤمنين، أرأيت لو أنَّ رجلًا من المسلمين كان على رَعِيَّة، فأدَّب بعض رعيَّتِه، إنك لمُقتصُّه منه؟ قال: أنَّى لا أقتصُّه وقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يَقُصُّ من نفسه؛ ألا لا تضربوهم فتُذِلُّوهم، ولا تمنعوهم حقَّهم فتُكفِّروهم، ولا تُجبِروهم [2] فتَفتِنُوهم، ولا تُنزلوهم الغِياضَ فتُضيِّعوهم [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে লোকসকল! আমরা তোমাদেরকে চিনতাম যখন আমাদের মাঝে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উপস্থিত ছিলেন, যখন ওহী নাযিল হতো এবং যখন তিনি তোমাদের সংবাদ সম্পর্কে আমাদের জানাতেন। সাবধান! এখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় নিয়েছেন এবং ওহী উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে। আমরা তোমাদেরকে কেবল সেভাবেই চিনব যেভাবে আমি তোমাদেরকে বলছি। সাবধান! তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি ভালো কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে ভালো মনে করব এবং এর জন্য তাকে ভালোবাসব। আর যে ব্যক্তি তোমাদের মধ্যে খারাপ কিছু প্রকাশ করবে, আমরা তাকে খারাপ মনে করব এবং এর জন্য তাকে ঘৃণা করব। তোমাদের গোপন বিষয় তোমাদের ও তোমাদের রবের মাঝে থাকবে। সাবধান! আমার জীবনে এমন একটি সময় ছিল যখন আমি ধারণা করতাম যে যারা কুরআন তিলাওয়াত করে তারা এর মাধ্যমে আল্লাহ এবং তাঁর কাছে যা আছে তাই কামনা করে। কিন্তু পরবর্তীতে আমার মনে হয়েছে যে, কিছু লোক এটি তিলাওয়াত করে মানুষের কাছে যা আছে তা পাওয়ার জন্য। সুতরাং, সাবধান! তোমরা তোমাদের তিলাওয়াত ও তোমাদের আমলের মাধ্যমে আল্লাহর কাছে যা আছে তাই কামনা করো। সাবধান! আল্লাহর কসম, আমি আমার কর্মচারীদের এই জন্য পাঠাই না যে তারা তোমাদের চামড়ায় আঘাত করুক বা তোমাদের সম্পদ ছিনিয়ে নিক। বরং আমি তাদের পাঠাই যেন তারা তোমাদেরকে তোমাদের দীন ও সুন্নাত শিক্ষা দেয়, তোমাদের মাঝে ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠা করে এবং তোমাদের মধ্যে তোমাদের ফাই (গণীমতের অংশ) বণ্টন করে। সাবধান! যদি তোমাদের কারো উপর এমন কিছু করা হয়, তাহলে সে যেন তা আমার কাছে উত্থাপন করে। যার হাতে উমরের জীবন, তার কসম! আমি অবশ্যই তার কাছ থেকে এর প্রতিশোধ নেব (কিসাস নেব)।
তখন আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়িয়ে বললেন, হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি কি মনে করেন যে, যদি কোনো মুসলিম ব্যক্তি কোনো রঈয়ত (জনগোষ্ঠীর দায়িত্বে) থাকে এবং সে তার রঈয়তের কাউকে আদব শেখানোর জন্য শাস্তি দেয়, তবুও কি আপনি তার থেকে কিসাস নেবেন? তিনি (উমর) বললেন: আমি কেন কিসাস নেব না, অথচ আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি যে তিনি নিজের থেকে কিসাস নিতে দিয়েছেন? সাবধান! তোমরা তাদের প্রহার করো না যে তোমরা তাদের অপমানিত করবে, তাদের প্রাপ্য অধিকার থেকে বঞ্চিত করো না যে তোমরা তাদের কুফরীর দিকে ঠেলে দেবে, তাদের জোরপূর্বক বাধ্য করো না যে তোমরা তাদের ফিতনার মধ্যে ফেলবে, আর তোমরা তাদের ঝোপ-ঝাড়ে বা গভীর জঙ্গলে বসবাস করতে দিও না যে তোমরা তাদের হারিয়ে ফেলবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الرزاق، وهذه سلسلة إسناد مشهورة في هذا الكتاب.وأبو العباس السياري: هو القاسم بن القاسم، وأبو الموجِّه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك.
[2] كذا في نسخنا الخطية، وعند غير المصنف: ولا تجمِّروهم، بالميم، وتجمير الجيش: جمعُهم في الثغور وحبسهم عن العَوْد إلى أهليهم. وأخرجه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (53) من طريق محمد بن عبد العزيز بن أبي رزمة، عن النضر بن شميل بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (382).
8560 [3] - إسناده محتمل للتحسين إن شاء الله، أبو فراس - وهو النهدي - لم يرو عنه غير أبي نضرة المنذر بن مالك، ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، وقال أبو زرعة الرازي: لا أعرفه. قلنا: وقد روي كثير من كلام عمر هذا بنحوه مقطعًا من غير وجه عنه مما يقوِّي رواية أبي فراس هذه.وأخرجه أحمد 1 / (286)، والنسائي (6953) من طريق إسماعيل بن إبراهيم - وهو ابن عُليّة - عن سعيد بن إياس الجريري، بهذا الإسناد. ورواية النسائي مختصرة بقصة قصاص رسول الله صلى الله عليه وسلم من نفسه.وأخرجه مختصرًا أبو داود (4537) من طريق أبي إسحاق الفزاري، عن الجريري، به. وقال فيه: خطبنا عمر فقال: إني لم أبعث عمالي ليضربوا أبشاركم … وذكر قصة القصاص.وأخرج منه بنحوه البخاري في "صحيحه" (2641) من طريق عبد الله بن عتبة عن عمر قصة السرائر، وإسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (2118) من طريق عطاء بن أبي رباح عن عمر قصة القِصاص، وابن أبي عاصم في "الديات" ص 29 - 30 من طريق أسلم مولى عمر عنه قصة القصاص أيضًا، وأبو بكر الخلال في "السنة" (60) من طريق القاسم بن عبد الرحمن عن عمر أمْرَه عمّاله بأن لا يضربوا المسلمين … إلخ.والغِياض: جمع غَيْضة، وهو الشجر الكثير الملتفّ. قيل: نهيُه عن إنزالهم الغياض، لأنهم إذا نزلوها تفرَّقوا فيها، فتمكّن منهم العدوُّ. وأخرجه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (53) من طريق محمد بن عبد العزيز بن أبي رزمة، عن النضر بن شميل بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (382).
8561 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبوبيُّ بمَرُو، حدثنا الفَضْل بن عبد الجبار، حدثنا النَّضر بن شُميل، أخبرنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ويلٌ للعرب من شرٍّ قد اقترب، موتوا إن استطعتُم" [1]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আরবদের জন্য দুর্ভোগ এমন অনিষ্ট থেকে যা নিকটবর্তী হয়েছে। যদি তোমরা পারো, তবে মরে যাও।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو: وهو ابن علقمة. أبو سلمة: هو ابن عبد الرحمن بن عوف. وأخرجه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (53) من طريق محمد بن عبد العزيز بن أبي رزمة، عن النضر بن شميل بهذا الإسناد.وانظر ما سلف برقم (382).
8562 - أخبرني محمد بن علي الصنعاني بمكة حَرَسها الله، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين قال: ثارت الفتنةُ وأصحابُ رسول الله صلى الله عليه وسلم عَشَرَةُ آلاف لم يَخِفَّ فيها منهم أربعون رجلًا، وقف مع عليٍّ [1] مئتان وبضعة وأربعون رجلًا من أهل بدر، فيهم أبو أيوب وسهل بن حنيف وعمار بن ياسر [2].
ইবনু সীরীন থেকে বর্ণিত। যখন ফিতনা শুরু হয়েছিল, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের সংখ্যা ছিল দশ হাজার। কিন্তু তাদের মধ্যে চল্লিশজন লোকও এতে সামান্য অংশগ্রহণ করেননি (বা এতে লিপ্ত হননি)। আর আলীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী (আহলুল বদর) সাহাবীগণের মধ্য থেকে দু’শো চল্লিশের কিছু বেশি লোক দাঁড়িয়েছিলেন। তাঁদের মধ্যে ছিলেন আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আম্মার ইবনু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] كذا وقع في النسخ الخطية، وهو خطأ، وقد وقع هنا في الكلام سقط، ففي "جامع معمر" (20735): لم يخف منهم أربعون رجلًا، قال معمر: وقال غيره (أي: غير ابن سيرين): خفَّ معه -يعني عليًا- مئتان … إلخ. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7757)، وفي مسند الشاميين (1941) عن بكر بن سهل الدمياطي، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301 - 302 من طريق محمد بن إسحاق الصغاني، كلاهما عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد - إلّا أنَّ بكرًا قال فيه: معاوية بن صالح عن كثير بن الحارث، والصغاني قال فيه: معاوية عن يحيى بن الحارث. وهؤلاء الثلاثة: العلاء بن الحارث وكثير بن الحارث ويحيى بن الحارث، قد روى عنهم معاوية بن صالح، وهذا الخلاف في تسمية راوي هذا الخبر من اضطراب عبد الله بن صالح فيه، فقد كان في حفظه سوء.والمحفوظ فيه هو العلاء بن الحارث، كما وقع في رواية الشعراني عند المصنف، فهكذا رواه أيضًا معن بن عيسى القزاز - أحد الثقات الأثبات - عن معاوية بن صالح عند ابن عدي في "الكامل" 6/ 405 - 406، والقضاعي في "مسند الشهاب" (901)، والإسناد إليه صحيح، والعلاء بن الحارث ثقة، وكذا معاوية والقاسم، فصح الإسناد، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7894) من طريق أبي عبد الملك، عن القاسم، به. وأبو عبد الملك هذا: هو علي بن يزيد الألهاني، وهو ضعيف.ويشهد له حديث أنس بن مالك، سيأتي برقم (8567)، وإسناده ضعيف.وآخر من حديث معاوية بن أبي سفيان عند الطبراني في "الكبير" 19/ (835)، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301، ورجاله ثقات.وثالث من حديث عمران بن حصين عند أبي نعيم في "الحلية" 7/ 262، وفيه من لم نعرفه.ولقوله: "لا تقوم الساعة إلّا على شرار الخلق" شواهد بلفظه وبمعناه، أشهرها حديث عبد الله بن مسعود عند مسلم برقم (2949) بلفظ: "لا تقوم الساعة إلا على شرار الناس".
[2] إسناده صحيح. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن عبّاد الدَّبَري راوية "المصنف" عن عبد الرزاق، وأيوب: هو ابن أبي تميمة السختياني.والخبر في جامع معمر برقم (20735).وأخرجه بنحوه أحمد في "العلل" (4787)، ومن طريقه أبو بكر الخلال في "السنة" (728) عن إسماعيل ابن عليّة، عن أيوب، به.وانظر ما سلف برقم (4609). وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7757)، وفي مسند الشاميين (1941) عن بكر بن سهل الدمياطي، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301 - 302 من طريق محمد بن إسحاق الصغاني، كلاهما عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد - إلّا أنَّ بكرًا قال فيه: معاوية بن صالح عن كثير بن الحارث، والصغاني قال فيه: معاوية عن يحيى بن الحارث. وهؤلاء الثلاثة: العلاء بن الحارث وكثير بن الحارث ويحيى بن الحارث، قد روى عنهم معاوية بن صالح، وهذا الخلاف في تسمية راوي هذا الخبر من اضطراب عبد الله بن صالح فيه، فقد كان في حفظه سوء.والمحفوظ فيه هو العلاء بن الحارث، كما وقع في رواية الشعراني عند المصنف، فهكذا رواه أيضًا معن بن عيسى القزاز - أحد الثقات الأثبات - عن معاوية بن صالح عند ابن عدي في "الكامل" 6/ 405 - 406، والقضاعي في "مسند الشهاب" (901)، والإسناد إليه صحيح، والعلاء بن الحارث ثقة، وكذا معاوية والقاسم، فصح الإسناد، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7894) من طريق أبي عبد الملك، عن القاسم، به. وأبو عبد الملك هذا: هو علي بن يزيد الألهاني، وهو ضعيف.ويشهد له حديث أنس بن مالك، سيأتي برقم (8567)، وإسناده ضعيف.وآخر من حديث معاوية بن أبي سفيان عند الطبراني في "الكبير" 19/ (835)، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301، ورجاله ثقات.وثالث من حديث عمران بن حصين عند أبي نعيم في "الحلية" 7/ 262، وفيه من لم نعرفه.ولقوله: "لا تقوم الساعة إلّا على شرار الخلق" شواهد بلفظه وبمعناه، أشهرها حديث عبد الله بن مسعود عند مسلم برقم (2949) بلفظ: "لا تقوم الساعة إلا على شرار الناس".
8563 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعْراني، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني معاوية بن صالح، عن العلاء بن الحارث الدِّمشقي، عن القاسم، عن أبي أمامة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يزداد الأمر إلَّا شدةً، ولا المالُ إلَّا إفاضةً، ولا تقومُ الساعةُ إِلَّا على شرارٍ من خلقه" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সময় কেবল কঠোরতা ছাড়া বৃদ্ধি পাবে না, আর সম্পদ কেবল প্রাচুর্য ছাড়া বৃদ্ধি পাবে না, এবং কিয়ামত তাঁর সৃষ্টির মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্টদের উপর ছাড়া সংঘটিত হবে না।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل عبد الله بن صالح - وهو المصري كاتب الليث - وقد توبع. القاسم: هو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن الدمشقي.أبو أمامة: هو صُدي بن عجلان الباهلي. وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7757)، وفي مسند الشاميين (1941) عن بكر بن سهل الدمياطي، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301 - 302 من طريق محمد بن إسحاق الصغاني، كلاهما عن أبي صالح عبد الله بن صالح، بهذا الإسناد - إلّا أنَّ بكرًا قال فيه: معاوية بن صالح عن كثير بن الحارث، والصغاني قال فيه: معاوية عن يحيى بن الحارث. وهؤلاء الثلاثة: العلاء بن الحارث وكثير بن الحارث ويحيى بن الحارث، قد روى عنهم معاوية بن صالح، وهذا الخلاف في تسمية راوي هذا الخبر من اضطراب عبد الله بن صالح فيه، فقد كان في حفظه سوء.والمحفوظ فيه هو العلاء بن الحارث، كما وقع في رواية الشعراني عند المصنف، فهكذا رواه أيضًا معن بن عيسى القزاز - أحد الثقات الأثبات - عن معاوية بن صالح عند ابن عدي في "الكامل" 6/ 405 - 406، والقضاعي في "مسند الشهاب" (901)، والإسناد إليه صحيح، والعلاء بن الحارث ثقة، وكذا معاوية والقاسم، فصح الإسناد، والله تعالى أعلم.وأخرجه الطبراني في "الكبير" (7894) من طريق أبي عبد الملك، عن القاسم، به. وأبو عبد الملك هذا: هو علي بن يزيد الألهاني، وهو ضعيف.ويشهد له حديث أنس بن مالك، سيأتي برقم (8567)، وإسناده ضعيف.وآخر من حديث معاوية بن أبي سفيان عند الطبراني في "الكبير" 19/ (835)، والبيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 301، ورجاله ثقات.وثالث من حديث عمران بن حصين عند أبي نعيم في "الحلية" 7/ 262، وفيه من لم نعرفه.ولقوله: "لا تقوم الساعة إلّا على شرار الخلق" شواهد بلفظه وبمعناه، أشهرها حديث عبد الله بن مسعود عند مسلم برقم (2949) بلفظ: "لا تقوم الساعة إلا على شرار الناس".
8564 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا أبو داود سليمان بن الأشعث السِّجِسْتاني، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا عبد الواحد بن زياد، حدثنا عاصم الأحول، عن أبي كبشة قال: سمعت أبا موسى الأشعري يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إن بين أيديكم فِتنًا كقطع الليل المظلم، يصبحُ الرجل فيها مؤمنًا ويمسي كافرًا، ويمسي مؤمنًا ويصبحُ كافرًا، القاعدُ فيها خَيرٌ من القائم، والقائم فيها خيرٌ من الماشي، والماشي فيها خيرٌ من الساعي" قالوا: فما تأمرنا؟ قال: "كونوا أخلاس بيوتكم" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وهكذا رواه أبو بكرة الأنصاري وسعدُ بن مالك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.أما حديث أبي بكرة الأنصاري:
আবূ মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের সামনে অন্ধকার রাতের অংশের মতো বহু ফিতনা (বিশৃঙ্খলা) আসবে। সে সময় লোকেরা সকালে মুমিন হিসেবে থাকবে কিন্তু সন্ধ্যায় কাফের হয়ে যাবে, এবং সন্ধ্যায় মুমিন থাকবে কিন্তু সকালে কাফের হয়ে যাবে। তাতে উপবিষ্ট ব্যক্তি দাঁড়ানো ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে, দাঁড়ানো ব্যক্তি হেঁটে যাওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে, এবং হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি দ্রুত ধাবমান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে।" সাহাবাগণ বললেন: "আপনি আমাদের কী আদেশ করেন?" তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের গৃহের কম্বলস্বরূপ (অর্থাৎ, ঘরের মধ্যে আবদ্ধ) হয়ে থেকো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح بطرقه وشواهده، وهذا إسناد فيه لِين من جهة أنَّ أبا كبشة هذا وهو السَّدوسي البصري - لا يُعرَف، فإنه لم يرو عنه غير عاصم الأحول، ولم يؤثر توثيقه عن أحد، وقد اختلف في رفعه ووقفه على ما هو مبين عند أحمد 32/ (19662)، وأبي داود (4262)؛ حيث روياه من طريق عفان بن مسلم، عن عبد الواحد بن زياد بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه بإسناد حسن أحمد (19663) و (19730)، وأبو داود (4259)، وابن ماجه (3961)، والترمذي (2204)، وابن حبان (5962) من طريق هزيل بن شرحبيل، عن أبي موسى مرفوعًا. وبعضهم يختصره، وقال الترمذي: حديث حسن.وانظر شواهده في "مسند أحمد" (19662). وانظر ما بعده.وقوله: "أحلاس بيوتكم" أي: ملازمين لها ملازمة الفِراش.
8565 - فأخبرناه أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا أبو داود السجستاني، حدثنا سليمان بن حَرْب، حدثنا حماد بن زيد.وأخبرنا أحمد بن سلمان [1]، حدثنا أبو داود، حدثنا سهل بن بكار، حدثنا حماد بن سَلَمة؛ جميعًا عن عثمان الشَّحَّام [2]، عن مُسلم بن أبي بَكْرة قال: سمعت أبا بكرة يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "ألا إنها ستكون فتنٌ، ألا ثم تكون فتنةٌ القاعدُ فيها خير من القائم، والقائم فيها خيرٌ من الماشي، والماشي فيها خير من الساعي إليها، فإذا نَزَلَت أَلَا مَن كان له إبلٌ فليلحق بإبله، ومن كان له غنمٌ فليلحق بغنيه، ومن كانت له أرضٌ فليلحق بأرضه" فقال له رجل: يا رسول الله، أرأيت إن لم يكن له إبل ولا غنم ولا أرضٌ؟ قال: "فليأخُذُ حجرًا فليدقَّ به على حدِّ سيفه، ثم لينج إن استطاع النَّجاةَ" ثم قال: "اللهم هل بلغتُ؟ " ثلاثًا، فقال رجل: يا رسول الله، أرأيتَ إِن أُكرِهتُ حتى ينطلق بي إلى أحد الصَّفّين - أو إلى أحد الفِئَتين - فيرميني رجل بسهم أو يضربني بسيف فيقتلني؟ قال: "يُبوء بإثمه وإثمِك فيكون من أصحاب النار" قالها ثلاثًا [3].أما حديث سعد بن مالك:
আবূ বাকরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সাবধান! শীঘ্রই ফিতনা বা বিপর্যয় আসবে। সাবধান! এরপর এমন ফিতনা হবে যেখানে উপবিষ্ট ব্যক্তি দাঁড়ানো ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, দাঁড়ানো ব্যক্তি হেঁটে যাওয়া ব্যক্তির চেয়ে উত্তম, এবং হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি তার দিকে ধাবমান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম। যখন তা (ফিতনা) সংঘটিত হবে, তখন সাবধান! যার উট আছে সে যেন তার উটের কাছে চলে যায়। যার ছাগল আছে সে যেন তার ছাগলের কাছে চলে যায়। আর যার জমি আছে সে যেন তার জমিতে চলে যায়।" তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যদি কারো উট, ছাগল বা জমি কিছুই না থাকে?’ তিনি বললেন: "তবে সে যেন একটি পাথর নেয় এবং তা দিয়ে তার তরবারির ধার ভোঁতা করে দেয়। এরপর সে যদি মুক্তি পেতে সক্ষম হয়, তবে যেন মুক্তি লাভ করে।" অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিলাম?" (এ কথা) তিনবার বললেন। এরপর এক ব্যক্তি বলল, ‘হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যদি আমাকে জোর করে ধরে নিয়ে দুই দলের—অথবা দুই পক্ষের—এক পক্ষে নিয়ে যাওয়া হয়, আর আমাকে একজন লোক তীর নিক্ষেপ করে অথবা তরবারি দিয়ে আঘাত করে আমাকে হত্যা করে ফেলে (তবে কী হবে)?’ তিনি বললেন: "সে তার গুনাহ এবং তোমার গুনাহের বোঝা বহন করবে এবং জাহান্নামীদের অন্তর্ভুক্ত হবে।" (এ কথা তিনি) তিনবার বললেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: سليمان وأحمد بن سلمان: هذا هو أبو بكر الفقيه الحنبلي المعروف بالنجّاد، وهو خاتمة أصحاب أبي داود سليمان بن الأشعث السجستاني صاحب "السنن"، انظر ترجمة النجاد هذا في "سير أعلام النبلاء" 15/ 502.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عثمان السجل.
8565 [3] - إسناده قوي من أجل عثمان الشحام وشيخه مسلم بن أبي بكرة.وأخرجه مسلم (2887) عن أبي كامل الجحدري، عن حماد بن زيد بإسناده. وأخرجه بنحوه أحمد 34/ (20412) و (20490)، ومسلم (2887)، وأبو داود السجستاني (4256)، وابن حبان (5965) من طرق عن عثمان الشحام، به.
8566 - فأخبرناه أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا أبو داود، حدثنا عمرو بن عون، حدثنا هُشَيم، عن داود بن أبي هند، عن أبي عثمان النهدي، عن سعد مالك قال: قال بن رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنها ستكون فتنة القاعدُ فيها خيرٌ من القائم، والقائم فيها خير من الماشي، والماشي خيرٌ من الساعي، والساعي خيرٌ من الراكب، والراكب خيرٌ من الموضع" [1].وهذا الحديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.قد صار هذا بابًا كبيرًا ولم يخرجاه، وإنما خرجه أبو داود السجستاني رحمه الله في "السنن" الذي هو صحيح على شرطه، وأبو داود [2] أحد أئمة هذا العلم.
সা'দ মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই ফিতনা দেখা দেবে। তাতে উপবেশনকারী দণ্ডায়মান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে। আর দণ্ডায়মান ব্যক্তি হেঁটে চলমান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে। হেঁটে চলমান ব্যক্তি দ্রুত ধাবমান ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে। দ্রুত ধাবমান ব্যক্তি আরোহীর চেয়ে উত্তম হবে। আর আরোহী ঘটনাস্থলে পৌঁছানো ব্যক্তির চেয়ে উত্তম হবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عثمان النهدي: هو عبد الرحمن بن ملّ.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 7، والدورقي في "مسند سعد" (115)، والبزار (1223) و (1224)، وأبو يعلى (789)، وأبو طاهر في "المخلصيات" (743)، والضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 3/ (1009)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 27/ 22 من طرق عن داود بن أبي هند، بهذا الإسناد - وبعضهم وقفه على سعد، والرفع أصح وهو المحفوظ.وأخرجه بنحوه أحمد 3/ (1446) من طريق حسين بن عبد الرحمن، وأحمد أيضًا (1609)، والترمذي (2194) من طريق بسر بن سعيد، كلاهما عن سعد بن أبي وقاص مرفوعًا.الساعي: المسرع ماشيًا، والموضع: المسرع راكبًا.
[2] طرق أبي داود هذه التي ساقها المصنف عنه غير موجودة في "سننه" من جهة الروايات التي بين أيدينا.
8567 - حدثنا عيسى بن زيد بن عيسى بن عبد الله بن مسلم بن عبد الله بن محمد بن عقيل بن أبي طالب، حدثنا يونس بن عبد الأعلى الصَّدَفي، حدثنا محمد بن إدريس الشافعي، أخبرنا محمد بن خالد الجندي، عن أبان بن صالح، عن الحسن، عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يزداد الأمرُ إلَّا شِدّة، ولا الدِّينُ إلَّا إدبارًا، ولا الناسُ إِلَّا شُحًّا، ولا تقومُ الساعةُ إلَّا على شرار الناس، ولا مهدي إلَّا عيسى ابن مريم" [1].هذا حديث يُعَدُّ في أفراد الشافعي رضي الله عنه، وليس كذلك، فقد حدَّث به غَيرُه:
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বিষয়টি (সময় বা দুনিয়ার অবস্থা) কেবল কঠিন থেকে কঠিনতর হবে, দ্বীন কেবল পিছু হটতে থাকবে, আর মানুষ কেবল কৃপণতা বৃদ্ধি করবে, আর কিয়ামত কেবল নিকৃষ্টতম লোকদের উপর প্রতিষ্ঠিত হবে, আর মারইয়ামের পুত্র ঈসা ব্যতীত কোনো মাহদি নেই।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] صحيح لغيره دون قوله: "ولا مهديَّ إلا عيسى ابن مريم" فمنكر، وهذا إسناد ضعيف لضعف محمد بن خالد الجندي، وقد حكم الذهبي في ترجمة الجندي هذا من كتابه "ميزان الاعتدال" على قوله: "ولا مهدي … إلخ" بالنكارة.وأخرجه ابن ماجه (4039) عن يونس بن عبد الأعلى، بهذا الإسناد.ويشهد له دون قوله: "ولا مهدي … إلخ" حديث أبي أمامة السالف برقم (8563). وأخرجه البيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 299 - 300 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
8568 - حدثني أبو أحمد عبد الرحمن بن عبد الله بن يَزْدادَ الرازي المذكِّر ببُخارى من أصل كتابه العتيق، حدثنا أبو محمد عبد الرحمن بن أحمد بن محمد بن الحجاج بن رِشْدِين بن سعد المَهْري بمصر، حدثني أبو سعيد المفضَّل بن محمد الجندي، حدثنا صامت بن معاذ، حدثنا يحيى بن السكن، حدثنا محمد بن خالد الجندي، عن أبان بن صالح، عن الحسن، عن أنس، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "لا يزدادُ الأمرُ إلَّا شدّةً، ولا الناسُ إلّا شُحًّا، ولا تقوم الساعة إلا على شرار الناس، ولا مهديَّ إلّا عيسى ابن مريم [1] " [2]. قال صامت بن معاذ: عَدَلتُ إلى الجَنَد مسيرة يومين من صنعاء، فدخلتُ على مُحدِّث لهم فطلبت هذا الحديث، فوجدتُه عنده عن محمد بن خالد الجندي، عن أبان بن أبي عياش عن الحسن، عن النبي صلى الله عليه وسلم مثله [3].وقد رُوِيَ بعضُ هذا المتن عن عبد العزيز بن صُهَيب، عن أنس بن مالك، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.قال: أما حديث عبد العزيز عن أنس بن مالك:
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “বিষয়টি কঠোরতা ছাড়া আর বৃদ্ধি পাবে না, আর মানুষ কৃপণতা ছাড়া আর বৃদ্ধি পাবে না, এবং কিয়ামত নিকৃষ্টতম লোকদের উপর ছাড়া সংঘটিত হবে না, আর মারইয়ামের পুত্র ঈসা (আঃ) ছাড়া অন্য কোনো মাহদী নেই।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] من قوله: "هذا حديث يعدُّ في أفراد الشافعي" إلى هنا سقط من (ز) و (ب)، واستدركناه من (ك) و (م) و "تلخيص الذهبي" و "إتحاف المهرة" لابن حجر (797). وأخرجه البيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 299 - 300 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
[2] صحيح لغيره كسابقه، وهذا إسناد ضعيف لضعف يحيى بن السكن ومحمد بن خالد الجندي، وصامت بن معاذ ذكره ابن حبان في "الثقات" وقال: يَهِمُ ويُغرِب. وأخرجه البيهقي في "بيان خطأ من أخطأ على الشافعي" ص 299 - 300 عن أبي عبد الله الحاكم، بهذا الإسناد.
8568 [3] - إن كان صامت بن معاذ حفظ هذا الإسناد ولم يَهِم فيه، فيكون محمد بن خالد الجندي قد خلط فيه، وأبان بن أبي عياش متروك الحديث.
8569 - فحدّثناه الحُسين [1] بن علي التميمي رحمه الله، حدثنا محمد بن إسحاق الإمام، حدثنا علي بن الحسين الدرهمي، حدثنا مُبَارك أبو سُحَيم، حدثنا عبد العزيز بن صهيب، عن أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "لن يزداد الزمانُ إلَّا شدّة، ولا يزداد الناسُ إِلَّا شُحًا، ولا تقومُ الساعةُ إلَّا على شرار الناس" [2].فذكرتُ ما انتهى إليَّ من عِلَّة هذا الحديث تعجُّبًا لا محتجًا به في المستدرك على الشيخين رضي الله عنهما، فإنّ أولى من هذا الحديث ذكره في هذا الموضع، حديث سفيان الثَّوْري وشُعبة وزائدة وغيرهم من أئمة المسلمين، عن عاصم بن بهدلة، عن زِرِّ بن حُبَيش، عن عبد الله بن مسعود، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: "لا تذهب الأيام والليالي حتى يملك رجلٌ من أهل بيتي، يُواطئ اسمه اسمي واسم أبيه اسم أبي، فيملأُ الأرضَ قِسْطًا وعَدْلًا كما ملئت جَوْرًا وظُلمًا" [3].
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সময় কেবল কঠোরতাই বৃদ্ধি করতে থাকবে, আর মানুষ কেবল কৃপণতাই বৃদ্ধি করতে থাকবে, এবং কিয়ামত শুধু নিকৃষ্টতম লোকদের উপরেই প্রতিষ্ঠিত হবে।"
আমি এই হাদীসের ত্রুটি বিস্ময় প্রকাশস্বরূপ উল্লেখ করলাম, শাইখাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শর্তানুযায়ী এটিকে মুস্তাদরাকে দলীল হিসেবে পেশ করার জন্য নয়। কেননা এই স্থানে এই হাদীসটির চেয়ে অধিক উপযুক্ত হলো সুফইয়ান সাওরী, শু'বা, যায়েদা এবং অন্যান্য মুসলিম ইমামগণ কর্তৃক বর্ণিত হাদীস, যা আসিম ইবনে বাহদালা, তিনি যির ইবনে হুবাইশ, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দিন ও রাত শেষ হবে না (অর্থাৎ দুনিয়া ধ্বংস হবে না) যতক্ষণ না আমার আহলে বাইতের (পরিবারের) এক ব্যক্তি শাসন ক্ষমতা গ্রহণ করে। তার নাম হবে আমার নামের অনুরূপ এবং তার পিতার নাম হবে আমার পিতার নামের অনুরূপ। সে পৃথিবীকে ন্যায় ও ইনসাফ দ্বারা পূর্ণ করে দেবে, যেমন তা যুলুম ও অন্যায় দ্বারা পূর্ণ ছিল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحَسَن. وقد جاء على الصواب في بضعة وعشرين موضعًا من هذا الكتاب، والحسين هذا: هو الحافظ المعروف بحُسينَك.
[2] إسناده ضعيف جدًّا من أجل مبارك بن سحيم أبي سحيم، فإنه متروك منكر الحديث، وقد تفرد به عن عبد العزيز بن صهيب.وأخرجه الطبراني في "المعجم الصغير" (485)، وأبو طاهر في "المخلصيات" (2425) و (3120) - ومن طريقه الذهبي في "السير" 20/ 400، وابن رجب الحنبلي في "ذيل طبقات الحنابلة" 2/ 183 - 184 - من طريقين عن مبارك بن سحيم، بهذا الإسناد. وانظر ما قبله.
8569 [3] - أخرجه من هذه الطرق وغيرها عن عاصم بن بهدلة: أحمد 6/ (3571 - 3573)، وأبو داود (4282)، والترمذي (2230) و (2231)، وابن حبان (5954) و (6824) و (6825)، وبعضهم يزيد فيه على بعض. وعاصم صدوق حسن الحديث.
8570 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُورمة، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن خَيْثمة، عن عبد الله بن عمرو [1] قال: يأتي على الناس زمانٌ يجتمعون في المساجد ليس فيهم مؤمنٌ [2].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, মানুষের উপর এমন একটি সময় আসবে যখন তারা মসজিদে একত্রিত হবে, অথচ তাদের মধ্যে কোনো মুমিন থাকবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله بن عُمر، بإسقاط الواو، والتصويب من "إتحاف المهرة" (11659) ومصادر التخريج.
[2] خبر صحيح، محمد بن إبراهيم - وإن كان مجهولًا - لم ينفرد به، ومن فوقه ثقات في الجملة. سفيان: هو الثّوري، وخيثمة: هو ابن عبد الرحمن الجعفي.ورواه عن سفيان الثوري وكيع في "الزهد" (271)، ومن طريقه الخلال في "السنة" (1308)، والآجري في "الشريعة" (236). وهذا إسناد صحيح. وزاد فيه الخلال ما سيأتي عند المصنف برقم (8619).ورواه عن سفيان أيضًا خالد بن عبد الرحمن الخراساني - وهو صدوق حسن الحديث - عند الطحاوي في "مشكل الآثار" 2/ 172.وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 11/ 23 و 15/ 176، وجعفر الفريابي في "صفة النفاق" (106 - 108)، والآجري (237) و (238) من طريقين آخرين عن الأعمش، به.وقد روي نحوه في المرفوع، فقد أخرج أبو نعيم في "صفة النفاق" (109) من حديث حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يوشك أن يصلّوا في آخر الزمان في مساجدهم، فلا يكون فيهم مؤمن" قلت: يا رسول الله، ويكون فيهم منافقون؟ قال: "نعم، أظهرُ من اليوم فيكم". لكن إسناده ضعيف.
8571 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي العامري، حدثنا أبو أسامة، حدثني زائدة قال: سمعتُ الأعمش يحدِّث عن عمرو بن مُرَّة، عن عبد الله بن الحارث، عن حبيب بن حِمَاز [1]، عن أبي ذر قال: كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفرٍ، فلما رجعنا تَعجَّل ناسٌ فدخلوا المدينة، فسأل عنهم النبي صلى الله عليه وسلم فَأَخبر أنهم تعجَّلوا إلى المدينة، فقال: "يُوشِكُ أن يَدَعُوها أحسن ما كانت، لَيْتَ شِعْري، متى تخرج نارٌ من جبل الوِرَاق، تُضِيءُ لها أعناقُ البُخْتِ بالبصرَى بُروكًا كضَوْءِ النهار" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.وشاهده حديث رافع السُّلَمي الذي:
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম। যখন আমরা ফিরলাম, তখন কিছু লোক তাড়াতাড়ি করে মদীনায় প্রবেশ করল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। অতঃপর তাঁকে জানানো হলো যে তারা মদীনায় দ্রুত চলে গেছে। তখন তিনি বললেন: "খুব শীঘ্রই তারা একে (মদীনাকে) এর পূর্বাবস্থার চেয়েও উত্তম অবস্থায় ছেড়ে যাবে। আমার জানতে ইচ্ছা হয়, কবে আল-ওয়ারাক পর্বত থেকে এমন আগুন বের হবে যা বসরা শহরের বুখত উটগুলোর ঘাড়কে দিনের আলোর মতো আলোকিত করবে, যখন সেগুলো সেখানে বসে থাকবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في (ز) و (ك) و (ب) إلى: عن حبيب عمار، وفي (م) إلى: عن أبي حبيب عمار.
[2] إسناده محتمل للتحسين من أجل حبيب بن حماز، فهو تابعي روى عنه اثنان ووثقه العجلي وابن حبان. أبو أسامة: هو حماد بن أسامة، وزائدة: هو ابن قدامة، وعبد الله بن الحارث: هو الزبيدي النجراني الكوفي.وأخرجه أحمد 35/ (21290) عن معاوية بن عمرو، عن زائدة، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد (21289)، وابن حبان (6841) من طريق جرير بن حازم، عن الأعمش، به.وفي حديثه: "نار من اليمن من جبل الوراق".وذكر هذه النار التي تضيء لها أعناق الإبل ببُصرى وأنها من اليمن، ممّا وهمَ فيه الراوي واشتبه عليه كما قال ابن كثير في "البداية والنهاية" 19/ 27، فإنَّ النار التي تخرج من قعر عدن من اليمن هي التي تسوق الناس الموجودين في آخر الزمان إلى المحشر كما وقع في حديث حذيفة بن أسيد عند مسلم (2901) وغيره، وأما النار التي تضيء لها أعناق الإبل ببصرى فتلك تخرج من أرض الحجاز كما وقع في حديث أبي هريرة عند البخاري (7118) ومسلم (2902)، وسيأتي عند المصنف برقم (8574).ولقوله: "يوشك أن يَدَعوها أحسن ما كانت" انظر ما سلف برقم (8516).
8572 - أخبرناه أحمد بن كامل القاضي، حدثنا محمد بن سعد بن الحسن العوفي، حدثنا عثمان بن عمر بن فارس، أخبرنا عبد الحميد بن جعفر، عن أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين، عن رافع بن بشر السُّلمي، عن أبيه، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "تخرجُ نارٌ من حِبْسِ سَيَلٍ تسير بسير بطيئةٍ [1]، تكمُنُ بالليل وتسير بالنهار، تَغدُو وتَرُوح، يقال: غَدَتِ النار أيها الناس فاغدُوا، قالتِ النار أيها الناس فقِيلُوا، راحتِ النارُ أيها الناس فرُوحُوا، مَن أدرَكَتْه أَكَلَتْه" [2].وقد رَوَى عن النبي صلى الله عليه وسلم، في ذكر أشراط الساعة خروج النار من أرض الحجاز: عاصم بن عديٍّ الأنصاري، وأبو هريرة، وأبو ذر الغفاري وقد تقدَّم ذكره [3].أما حديث عاصم بن عَدِيّ:
রাফি' ইবনু বিশর আস-সুলামী থেকে বর্ণিত, তাঁর পিতা থেকে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: একটি আগুন ‘হিবসে সাইল’ নামক স্থান থেকে বের হবে। তা ধীর গতিতে চলতে থাকবে। এটি রাতে লুকিয়ে থাকবে এবং দিনের বেলায় চলতে থাকবে। এটি সকালে যাত্রা শুরু করবে এবং বিকালে ফিরে আসবে। বলা হবে: হে লোকসকল, আগুন সকালে বের হয়েছে, তোমরাও সকালে বেরিয়ে পড়ো। আগুন মধ্যাহ্নে থামলে বলা হবে: হে লোকসকল, তোমরা কাইলুলা (দুপুরের বিশ্রাম) করো। আগুন বিকালে ফিরে গেলে বলা হবে: হে লোকসকল, তোমরাও ফিরে এসো। যাকে সে ধরে ফেলবে, তাকে গ্রাস করে নেবে।
আর হিজাযের ভূমি থেকে আগুন বের হওয়াকে কিয়ামতের অন্যতম নিদর্শন হিসেবে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন: আসিম ইবনু আদি আল-আনসারী, আবূ হুরায়রা এবং আবূ যার আল-গিফারী (যাদের আলোচনা পূর্বে হয়েছে)। আর আসিম ইবনু আদীর হাদীস হলো:
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] عند غير المصنف: سير بطيئة الإبل.
[2] إسناده ضعيف، محمد بن سعد العوفي ليس بذاك القوي، لكنه متابع، وعبد الحميد بن جعفر - وهو الأنصاري المدني - من جملة الثقات إلّا أنه ربما أخطأ كما قال ابن حبان في "ثقاته"، وقد اضطرب في إسناد هذا الحديث، فرواه عنه عثمان بن عمر كما عند المصنف وعند أحمد في "المسند" 24/ (15658) وابن حبان (6840) وغيرهم، فجعله من حديثه عن أبي جعفر محمد بن علي بن الحسين، وهو ثقة، ورواه عنه أبو عاصم النبيل عند البخاري في "التاريخ الكبير" 2/ 131 - 132 والطبراني في "الكبير" (1229)، فجعله من حديثه عن عيسى بن علي الأنصاري عن رافع عن أبيه، وعيسى هذا لا يُعرَف، وأبو عاصم - وهو الضحاك بن مخلد - أوثق وأتقن من عثمان بن عمر، فروايته هي المحفوظة، ورافع السلمي هذا جهله الذهبي في "التلخيص"، وتساهل الهيثمي في "مجمع الزوائد" 8/ 12 فوثقه!وانظر حديث عبد الله بن عمرو الآتي برقم (8620) و (8861).
8572 [3] - وهو الحديث السابق برقم (8571).
8573 - فحدَّثَناه الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا العباس بن الفضل الأسفاطي، حدثنا إسماعيل بن أبي أويس، حدثنا عَباية بن بكر بن أبي ليلى المُزَني، عن إبراهيم بن إسماعيل بن مُجمِّع، عن عبد الله بن أبي بكر بن عمرو بن حزم، عن أبيه قال: حدثني أبو البَدَّاح بن عاصم الأنصاري، عن أبيه أنه قال: سألنا رسول الله صلى الله عليه وسلم حِدْثانَ ما قَدِمَ، فقال: "أين حِبْسُ سَيَل؟ " قلنا: لا ندري، فمرَّ بي رجلٌ من بني سُلَيم، فقلتُ: من أين جئتَ؟ فقال: من حِبْس سَيَل، فدعوتُ بنعلي، فانحدرت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إِنَّكَ سألتنا عن حِبْس سَيَل، وإنَّه لم يكن لنا به عِلمٌ، وإنه مرَّ بي هذا الرجل فسألته، فزَعَمَ أنَّ به أهله، فسأله رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: "أين أهلك؟ " قال: بحبس سيل، فقال: "أخِّرْ أهلك، فإنه يُوشِكُ أن تخرج منه نار تضيء أعناق الإبل ببصرى" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.وأما حديث أبي هريرة:
আসিম আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (মদীনায়) এলেন, তখন তিনি আমাদের জিজ্ঞাসা করলেন: "হিবসে সায়িল কোথায়?" আমরা বললাম: আমরা জানি না। এরপর বনূ সুলাইম গোত্রের একজন লোক আমার পাশ দিয়ে অতিক্রম করল। আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম: তুমি কোত্থেকে আসছো? সে বলল: হিবসে সায়িল থেকে। আমি আমার জুতো চাইলাম এবং দ্রুত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গেলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাদের কাছে হিবসে সায়িল সম্পর্কে জানতে চেয়েছিলেন, কিন্তু আমাদের সে সম্পর্কে কোনো ধারণা ছিল না। এই লোকটি আমার পাশ দিয়ে গেল, আমি তাকে জিজ্ঞেস করলাম, সে জানালো যে তার পরিবার সেখানেই আছে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার পরিবার কোথায়?" সে বলল: হিবসে সায়িলে। তিনি বললেন: "তোমার পরিবারকে সেখান থেকে সরিয়ে নাও। কারণ শীঘ্রই সেখান থেকে এমন একটি আগুন বের হবে, যা বুসরার উটগুলোর গলা আলোকিত করে দেবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف إبراهيم بن إسماعيل بن مجمع وجهالة عباية بن بكر، وقال الذهبي في "التلخيص": منكر وإبراهيم ضعيف وإسماعيل متكلم فيه.وأخرجه ابن قانع في "معجم الصحابة" 2/ 295 - 296، والطبراني في "الكبير" 17/ (458)، والمستغفري في "دلائل النبوة" (323) من طريقين عن إسماعيل بن أبي أويس، بهذا الإسناد. ووقع في المطبوع من الطبراني سقط في الإسناد يستدرك من هنا.
8574 - فأخبرناه أبو جعفر محمد بن محمد البغدادي، حدثنا أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين، حدثني أبي، عن أبيه، عن جده، عن عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، أن سعيد بن المسيب أخبره، أنَّ أبا هريرة أخبره، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تقومُ الساعةُ حتى تخرج نارٌ بأرض الحجاز، تضيء منها أعناق الإبل ببُصرَى" [1].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না হিজাজের ভূমি থেকে একটি আগুন নির্গত হয়, যার আলোয় বুসরা অঞ্চলের উটগুলোর ঘাড় আলোকিত হবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف لضعف أحمد بن محمد بن الحجاج بن رشدين وأهل بيته، وقد روي الحديث من غير هذا الوجه.فقد أخرجه مسلم (2902) من طريق شعيب بن الليث بن سعد، عن أبيه الليث، عن عقيل بن خالد بهذا الإسناد.وأخرجه البخاري (7118) من طريق شعيب بن أبي حمزة، ومسلم (2902)، وابن حبان (6839) من طريق يونس بن يزيد، كلاهما عن ابن شهاب الزهري، به.
8575 - أخبرني محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عَبَّاد، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين قال: قيل لسعد بن أبي وقاص: ألا تقاتل، فإنك من أهل الشُّورى، وأنت أحقُّ بهذا الأمر من غيرك؟ فقال: لا أقاتلُ حتى تأتوني بسيف له عَينانِ ولسانٌ وشَفَتانِ يعرف الكافر من المؤمن، قد جاهدتُ وأنا أعرفُ الجهاد، ولا أبخَعُ بنفسي إن كان رجلٌ خيرًا [1] منِّي [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি যুদ্ধ করবেন না? আপনি তো শুরা (পরামর্শদাতা) পরিষদের সদস্য, আর এই বিষয়ে আপনি অন্যদের তুলনায় অধিক হকদার। তিনি বললেন: আমি যুদ্ধ করব না, যতক্ষণ না তোমরা আমার কাছে এমন তলোয়ার নিয়ে আসবে যার আছে দুটি চোখ, একটি জিহ্বা এবং দুটি ঠোঁট, যা কাফির ও মুমিনকে চিনতে পারে। আমি তো জিহাদ করেছি যখন আমি জিহাদ সম্পর্কে জানতাম (অর্থাৎ এর উদ্দেশ্য জানতাম), আর যদি কোনো ব্যক্তি আমার চেয়ে উত্তম হয়, তবে আমি নিজেকে (নিজের জীবনকে) ধ্বংস করব না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: إن كان رجلًا خير، والجادة ما أثبتنا، وهو كذلك في "جامع معمر".
[2] رجاله في الجملة ثقات، وابن سيرين لم يلق سعدًا، وهو يقول في رواية إسماعيل ابن علية لهذا الخبر - كما عند ابن سعد في "الطبقات" 3/ 133، ونعيم بن حماد في "الفتن" (432)، وابن الأعرابي في "معجمه" (538)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 20/ 355 - : نُبِّئتُ أنّ سعدًا كان يقول ....والخبر في "جامع معمر" (20736)، ومن طريقه أخرجه الطبراني في "الكبير" (322)، وعنه أبو نعيم في "الحلية" 1/ 94.وأخرجه بنحوه نعيم بن حماد (419) عن هشيم، عن يونس بن عبيد، عن حميد بن هلال قال: قيل لسعد … فذكره. ورجاله ثقات، وحميد لا نظنّه لقي سعدًا أيضًا.وانظر حديث عمر بن سعد عن أبيه عند أحمد 3/ (1529).
8576 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، أخبرنا محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن زَبَّان [1] بن فائد، عن سهل بن معاذ بن أنس، عن أبيه، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا تزال الأمة على شريعة ما لم تَظهَرْ فيهم ثلاث: ما لم يُقبَضُ فيهم العلم، ويَكثُرُ فيهم وَلَدُ الخَبَثْ، ويَظْهَرْ فيهم السَّقَّارون" قالوا: وما السَّقَّارون يا رسول الله؟ قال: "بَشَرٌ يكونون في آخر الزمان، تكون تحيَّتهم بينهم إذا تَلاقَوُا التَّلاعُنَ" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
মুআয ইবনে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “এই উম্মত ততক্ষণ পর্যন্ত (সঠিক) শরীয়তের উপর প্রতিষ্ঠিত থাকবে, যতক্ষণ না তাদের মধ্যে তিনটি বিষয় প্রকাশ পাবে: যতক্ষণ না তাদের থেকে ইলম (জ্ঞান) তুলে নেওয়া হবে, এবং তাদের মধ্যে 'ওয়ালাদুল খবাস' (দুশ্চরিত্র সন্তান) বৃদ্ধি পাবে, এবং তাদের মধ্যে 'আস-সাক্কারূন' প্রকাশ পাবে।” তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'আস-সাক্কারূন' কারা? তিনি বললেন: “তারা হলো শেষ যামানার এক প্রকার মানুষ, যখন তারা একে অপরের সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখন তাদের পারস্পরিক অভিবাদন হবে অভিসম্পাত (বা একে অপরের প্রতি অভিশাপ দেওয়া)।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: زياد.
[2] إسناده ضعيف لضعف زَبّان بن فائد، وقال الذهبي في "تلخيصه": منكر.وأخرجه أحمد 24/ (15628) من طريق عبد الله بن لَهيعة، عن زبان، بهذا الإسناد.والسَّقّارون، بالسين والصاد.
8577 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه ببغداد، حدثنا الحسن بن مُكرَم، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي، عن سعيد بن أبي بردة، عن أبيه، عن أبي موسى قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أمتي أمةٌ مرحومةٌ، لا عذابَ عليها في الآخرة، جَعَلَ الله عذابها في الدنيا القتلَ والزلازلَ والفتنَ" [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আবূ মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মত হলো রহমতপ্রাপ্ত উম্মত। তাদের ওপর আখেরাতে কোনো শাস্তি নেই। আল্লাহ তাদের শাস্তি দুনিয়াতে রেখেছেন হত্যা, ভূমিকম্প এবং ফিতনাসমূহের মাধ্যমে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث ضعيف لاضطرابه كما تقدم بيانه برقم (157).وأخرجه أحمد 32/ (19678) عن يزيد بن هارون بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد أيضًا (19678) عن هاشم بن القاسم، وأبو داود (4278) من طريق كثير بن هشام، كلاهما عن المسعودي، به.
8578 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل ومحمد بن أحمد بن بالويه قالا: حدثنا موسى بن الحسن بن عبّاد، حدثنا محمد بن مصعب القرقَساني، حدثنا عُمارة المعولي، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تَكثُرُ الصَّواعق عند اقتراب الساعة، فيصبحُ القومُ فيقولون: من صُعِقَ البارحة؟ فيقولون: صُعِقَ فلان وفلان" [1].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কিয়ামতের নিকটবর্তী সময়ে বজ্রপাত অত্যন্ত বৃদ্ধি পাবে। অতঃপর লোকেরা সকালে উঠে বলবে: গত রাতে কে বজ্রাহত হয়ে মারা গেল? তখন তারা বলবে: অমুক এবং অমুক বজ্রাহত হয়েছে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين في المتابعات والشواهد من أجل محمد بن مصعب، وقد توبع. عمارة المعولي: هو عمارة بن مهران، وأبو نضرة: هو المنذر بن مالك بن قطعة.وأخرجه أحمد 18/ (11620) عن محمد بن مصعب بن مصعب بهذا الإسناد.وأخرجه أبو الشيخ في "العظمة" (787) من طريق إبراهيم بن سعيد الجوهري، عن محمد بن مصعب وقرة بن حبيب، عن عمارة، به. وقرة بن حبيب: هو التستري، وهو ثقة، فصح الإسناد من جهته.