আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8619 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم الأصبهاني، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان، عن الأعمش، عن خَيْثَمة، عن عبد الله بن عمرو قال: يأتي على الناس زمانٌ لا يبقى فيه مؤمن إلَّا لَحِقَ بالشام [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষের উপর এমন এক সময় আসবে, যখন কোনো মুমিন অবশিষ্ট থাকবে না, সে অবশ্যই শামদেশে (সিরিয়া, লেভান্ট অঞ্চল) আশ্রয় নেবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح محمد بن إبراهيم الأصبهاني مجهول كما سبق مرارًا لكنه لم ينفرد به.سفيان: هو الثوري، وخيثمة: هو ابن عبد الرحمن الجُعفي.وأخرجه ابن المبارك في "الجهاد" (193)، ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 315 عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 5/ 324، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 304، وأبو بكر الخلّال في "السنة" (1308)، وابن عساكر 1/ 315 من طرق عن سفيان، به. وزاد فيه الخلال ما سلف عند المصنف برقم (8570).وأخرجه معمر في "جامعه" (20778) عن الأعمش، به.
8620 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا هشام بن علي السِّيرافي، حدثنا عبد الله بن رجاء الغُدَاني [1]، حدثنا همَّام، عن قَتَادة، عن المهلَّب بن أبي صُفرة، عن عبد الله بن عمرو قال: تُبعَثُ نارٌ تسوقُ الناسَ من مشارق الأرض إلى مغاربها كما يُساقُ الجمل الكَسير، لها ما تَخلَّفَ منهم، إذا قالُوا قالت، وإذا باتُوا باتَتْ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবদুল্লাহ্ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একটি আগুন প্রেরিত হবে, যা পৃথিবীর পূর্ব প্রান্ত থেকে পশ্চিম প্রান্ত পর্যন্ত মানুষদের তাড়িয়ে নিয়ে যাবে, যেমনভাবে দুর্বল উটকে তাড়িয়ে নিয়ে যাওয়া হয়। যারা তাদের (দল) থেকে পিছিয়ে পড়বে, তা তাদের ধরে নেবে। যখন তারা বিরতি নেবে, তখন সেটিও বিরতি নেবে; আর যখন তারা ঘুমাবে, তখন সেটিও ঘুমিয়ে যাবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّفت في النسخ الخطية بالعين المهملة والراء.
[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه، فإنَّ قتادة لم يسمع المهلب، بينهما فيه عمر ابن سيف كما وقع في "مشيخة إبراهيم بن طهمان" (61)، وسيأتي بيانه عند الحديث رقم (8861)، وعمر بن سيف هذا تفرَّد قتادة بالرواية عنه، فهو مجهول، وذكره ابن حبان في "ثقاته"!ورواه بنحوه معمر عن قتادة - فيما سيأتي برقم (8707) عن شهر بن حوشب عن عبد الله بن عمرو، فرفعه. وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه هناك.ويشهد له في المرفوع حديث أبي هريرة عند البخاري (6522) ومسلم (2861)، وفيه: "ويحشر بقيتَهم (أي: الناسَ) النارُ، تَقِيل معهم حيث قالوا، وتَبيت معهم حيث باتوا، وتُصبح معهم حيث أصبحوا، وتُمسي معهم حيث أمسوا".وحديث أبي سريحة حذيفة بن أَسيد عند أحمد (26/ (16143) وغيره، وفيه: "ونار تخرج من قعر عَدَن ترحّل الناس، تنزل معهم حيث نزلوا، وتقيل معهم حيث قالوا"، ومعناه في "صحيح مسلم" (2901).
8621 - أخبرنا عَبْدانُ [1] بن يزيد الدَّقّاق بهَمَذان، حدثنا إبراهيم بن الحسين، حدثنا آدم بن أبي إياس، حدثنا ابن أبي ذِئب، عن قارِظ بن شَيْبة، عن أبي غَطَفان قال: سمعتُ عبد الله بن عمرو يقول: تَخرُج معادنُ مختلفةٌ، مَعدِنٌ منها قريبٌ من الحجاز يأتيه شِرارُ الناس، يقال له: فِرعون، فبينما هم يعملون فيه إذْ حَسَرَ عن الذَّهب، فأعجبهم مُعتملُه، إذ خُسِفَ به وبهم [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বিভিন্ন প্রকারের খনি আবির্ভূত হবে। সেগুলোর মধ্যে একটি খনি হেজাজের নিকটবর্তী হবে, যেখানে নিকৃষ্ট লোকেরা আসবে। সেটিকে ফির‘আউন বলা হবে। যখন তারা তাতে কাজ করতে থাকবে, তখন তা সোনাকে উন্মোচিত করবে (বা সোনা বের করে দেবে)। তাদের সেই কর্মতৎপরতা তাদেরকে মুগ্ধ করবে। ঠিক তখনই সে খনিসহ তাদেরকে ভূমিতে ধ্বসিয়ে দেওয়া হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية هنا إلى: غيلان، وقد جاء على الصواب عند المصنف في بضعة عشر موضعًا من هذا الكتاب.
[2] إسناده حسن من أجل قارظ بن شيبة. ابن أبي ذئب: هو محمد بن عبد الرحمن.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1694) عن عبد الله بن وهب، عن ابن أبي ذئب، بهذا الإسناد.
8622 - أخبرني الحسن بن حَليم [1] المروَزي، حدثنا أبو نَصر أحمد بن إبراهيم السَّدَوَّري، حدثنا سعيد بن هُبيرة، حدثنا حماد بن زيد، أخبرنا أبو التَّيّاح قال: صلَّينا الجمُعة فانضمَّ الناسُ بعضُهم إلى بعض حتى كانوا كالرَّجُل [2] حول أبي رجاءٍ العُطَارِدي، فسألوه عن الفتنة، فقال: جاء رجلان إلى مجلس عُبادة بن الصامت فقالا: يا ابن الصامت، تعيدُ الحديث الذي حدَّثتَناه؟ فقال: نعم، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "يوشكُ أن يكونَ خيرُ المالِ شاءً بين مكة ومَدينة [3] تَرعَى فوق رؤوس الظِّرَاب، تأكل من ورق القَتَادِ والبَشَام، ويأكل أهلُه من لُحمانِه ويشربون من ألبانه، وجَراثيم العرب تَرتَهِشُ فيها الفتنُ" يقولها ثلاثًا، ثم قال: "والذي نفسي بيده، لأن يكونَ لأحدكم ثلاثُ مئة شاةٍ يأكلُ من لُحمانِها ويشرب من ألبانها، أحبُّ إليه من سَوَاريِّكم هذه ذهبًا وفضةٌ" [4]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه.
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁকে ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: হ্যাঁ, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "খুব শীঘ্রই এমন সময় আসবে যখন শ্রেষ্ঠ সম্পদ হবে মক্কা ও মদীনার মধ্যবর্তী স্থানে বিচরণকারী ছাগল। যা পাহাড়ের চূড়ায় বিচরণ করবে, 'কাতাদ' (কাঁটাযুক্ত গাছ) ও 'বাশাম' গাছের পাতা খাবে। আর এর মালিকেরা এর গোশত ভক্ষণ করবে এবং এর দুধ পান করবে। আর আরবের মূল ভূখণ্ডে ফিতনা (বিপর্যয়) ছড়িয়ে পড়বে।" তিনি এ কথাটি তিনবার বললেন, অতঃপর বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! তোমাদের কারো যদি তিনশ ছাগল থাকে, যার গোশত সে খাবে এবং যার দুধ সে পান করবে—এটি তার কাছে তোমাদের এই স্বর্ণ ও রৌপ্যের খুঁটি (ধনভান্ডার) থেকেও অধিক প্রিয় হবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: حكيم، وقد سبق مرارًا التنبيه عليه.
[2] هكذا في النسخ الخطية، والمعنى: أنهم تضامُّوا حتى صاروا كأنهم رجل واحد، وفي "تلخيص الذهبي": كالرَّحا والمعنى: أنهم صاروا حوله كالرحا المستديرة.
8622 [3] - هكذا في "إتحاف المهرة" (6767)، وهو أقرب شيء إلى الصواب، وفي النسخ الخطية: شاتين مكية مدنية!
8622 [4] - إسناده ضعيف سعيد بن هبيرة ليس بالقوي كما قال أبو حاتم الرازي، وهو صاحب غرائب، واتهمه ابن حبان في "المجروحين" بالوضع. أبو التياح: هو يزيد بن حميد الضُّبعي، وأبو رجاء العطاردي: هو عمران بن ملحان.ويغني عنه حديث أبي سعيد الخدري عند البخاري (19) وغيره قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يوشك أن يكون خير مال المسلم غنمٌ يتبع بها شَعَفَ الجبال (أي: رؤوسها) ومواقع القطر، يفرُّ بدينه من الفتن".الظِّراب: الجبال الصِّغار، والقَتَاد: شجر له شوك، والبشام: شجر طيِّب الريح يُستاك به، وجراثيم العرب أصولها، والجرثومة: الأصل.وقوله: "ترتهش فيها الفتن" - ويروى بالسين المهملة - أي: تضطرب فيهم الفتنة ويقاتل بعضهم بعضًا.
8623 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُورمة، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان، عن جَبَلة بن سُحَيم، عن عامر بن مَطَر قال: سمعت حذيفة يقول: كيف أنتم إذا انفرجتُم عن دينكم انفراج المرأة عن قُبُلها؟ [1]
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা কেমন হবে যখন তোমরা তোমাদের দ্বীন থেকে এমনভাবে দূরে সরে যাবে, যেভাবে কোনো মহিলা তার লজ্জাস্থান উন্মুক্ত করে দেয়?
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن محمد بن إبراهيم بن أورمة - وإن كان مجهولًا - لم ينفرد به، ومن فوقه لا بأس بهم في الجملة، وعامر بن مطر روى عنه غير واحد وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد توبع في الذي بعده. سفيان: هو الثوري.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 119 عن معاوية بن هشام، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد. ومعاوية صدوق حسن الحديث.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (55) و (363) و (387) عن يحيى بن عبد الملك بن أبي غنيّة، عن أبيه، عن جبلة، به.
8624 - وأخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن الصَّلت بن بَهرامَ، عن مُنذر بن هَوْدَة، عن خَرَشة بن الحُرِّ قال: قال حذيفة: كيف أنتم إذا انفرجتُم عن دينكم انفراج المرأة عن قُبُلها، لا تمنعُ من يأتيها؟ قال: فقال رجل: قبَّح الله العاجز، قال: بل قُبِّحت أنت [1].هذان الحديثان صحيحا الإسنادين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: তোমাদের কী অবস্থা হবে যখন তোমরা তোমাদের দ্বীন থেকে এমনভাবে সরে যাবে যেমন কোনো নারী তার লজ্জাস্থান উন্মোচন করে দেয়, আর যে তার কাছে আসে তাকে বাধা দেয় না? তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: তখন এক ব্যক্তি বলল: আল্লাহ অপারগ ব্যক্তিকে লাঞ্ছিত করুন। তিনি (হুযাইফা) বললেন: বরং তুমিই লাঞ্ছিত হও।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حسن بما قبله، ومنذر بن هوذة لم يرو عنه سوى الصلت بن بهرام، فهو في عداد المجهولين، ذلك فقد ذكره ابن حبان في "ثقاته".وأخرجه ابن وضاح في "البدع والنهي عنها" (218) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 18 عن عبد الله بن نمير، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (241) من طريق مروان بن معاوية الفزاري كلاهما عن الصلت بن بهرام، به.
8625 - أخبرنا حمزة بن العباس العَقَبي، حدثنا العباس بن محمد الدُّوري، حدثنا عثمان بن عمر: وأخبرنا ابن جُرَيج، عن ابن أبي مُلَيكة قال: غَدَوتُ على ابن عباس ذات يوم، فقال: ما نمتُ البارحة حتى أصبحتُ، قلت: لِمَ؟ قال: قالوا: طَلَعَ الكوكبُ ذو الذَّنَب، فخَشِيتُ أن يكون الدُّخَانُ قد طَرَقَ [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه، غير أنه على خلاف عبد الله بن مسعود: أنَّ آية الدُّخَان قد مَضَى [2].
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (ইবনু আবী মুলাইকা বলেন) আমি একদিন সকালে তাঁর নিকট গেলাম। তিনি বললেন, গত রাতে আমি সকাল পর্যন্ত ঘুমাইনি। আমি বললাম, কেন? তিনি বললেন, লোকেরা বলেছে, লেজবিশিষ্ট তারকা (ধূমকেতু) উদিত হয়েছে, তাই আমি আশঙ্কা করছিলাম যে, ধূম্র (দুখান) এসে পড়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح، وابن جريج - وهو عبد الملك بن عبد العزيز - صرّح بسماعه من ابن أبي مليكة عند غير المصنف. عثمان بن عمر: هو ابن فارس العبدي، وابن أبي مليكة: هو عبد الله بن عبيد الله بن أبي مليكة.وأخرجه عبد الرزاق في تفسيره 2/ 206 عن ابن جريج قال: أخبرني ابن أبي مليكة أو سمعته يقول ....وأخرجه الطبري في "تفسيره" 25/ 113 - ومن طريقه الثعلبي في "تفسيره" 8/ 351 - من طريق إسماعيل ابن عُليَّة، عن ابن جريج، به.وأخرجه أبو عروبة الحرّاني كما في "المنتقى من كتابه الطبقات" ص 66، وأبو موسى المديني في "اللطائف من دقائق المعارف" (32) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبيد الله بن أبي يزيد، عن ابن أبي مليكة، به. وقنسرين: مدينة بالشام قريبة من حلب، فتحها أبو عبيدة بن الجراح سنة 17 هـ.
[2] روي هذا عنه عند البخاري (1007) و (4820) ومسلم (2798) من طريق مسروق عنه. وقنسرين: مدينة بالشام قريبة من حلب، فتحها أبو عبيدة بن الجراح سنة 17 هـ.
8626 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا الفضل بن محمد الشَّعراني، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثنا الليث بن سعد، عن أبي قبيل، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: للدَّجّال آياتٌ معلومات: إذا غارتِ العُيون، ونَزَفَت الأنهار، واصفرَّ الرَّيحان، وانتقَلَت مَدْحِجُ وهَمْدانُ من العراق فنزلت قنَّسرين، فانتظروا الدَّجال غاديًا أو رائحًا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: দাজ্জালের কিছু পরিচিত নিদর্শন রয়েছে: যখন ঝর্ণাগুলো শুকিয়ে যাবে, নদীগুলো পানি শূন্য হয়ে যাবে, সুগন্ধি গুল্মরাজি হলুদ হয়ে যাবে, এবং মাযহিজ ও হামদান গোত্র ইরাক থেকে স্থানান্তরিত হয়ে কিন্নাসরীন-এ অবতরণ করবে, তখন তোমরা দাজ্জালের আগমনের অপেক্ষা করো—সকালে অথবা সন্ধ্যায়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لاضطرابه، فعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وقد خالفه رشدين بن سعد وهو مثله سيئ الحفظ، فرواه عند نعيم بن حماد في "الفتن" (1473) عن عبد الله بن لهيعة، عن أبي قبيل - وهو حي بن هانئ المعافري - عن تُبيع ابن امرأة كعب الأحبار من قوله. وابن لهيعة أيضًا سيئ الحفظ.وعلّق نعيم في "الفتن" أيضًا (1420) عن الوليد بن مسلم قال: وقال ابن لهيعة، عن أبي قبيل، عن عبد الله بن عمرو قال: ستنتقل مذحج وهمدان من العراق حتى ينزلوا قنسرين. وقنسرين: مدينة بالشام قريبة من حلب، فتحها أبو عبيدة بن الجراح سنة 17 هـ.
8627 - أخبرنا الشيخ أبو بكر بن إسحاق، أخبرنا عُبيد بن شَريك البزّار، حدثنا أبو الجُماهر، حدثنا سعيد بن بَشير، عن قَتَادة، عن عُقبة بن عمرو بن أوس السَّدُوسي قال: أَتينا عبد الله بن عمرو بن العاص وعليه بُرْدانِ قِطْريَّانِ وعليه عمامةٌ، وليس عليه سِرْبال - يعني القميص - فقلنا له: إنك قد رَوَيتَ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ورَوَيتَ الكتب، فقال: ممَّن أنتم؟ قال: فقلنا: من أهل العراق، فقال: إنكم يا أهل العراق تكذبون وتُكذِّبون وتَسخَرون، قال: فقلت: لا والله لا نُكذِّبُك ولا نكذبُ عليك ولا نسخرُ منك، قال: فإنَّ بني قنطُوراء وكركرى [1] لا يخرجون حتى يربطوا خيولهم بنخل الأُبُلّة، كم بينها وبين البصرة؟ قال: فقلنا: أربعةُ فراسخ، قال: فيبعثون أن خلُّوا بيننا وبينها، قال: فيَلحَقُ ثلثٌ بهم، وثلثٌ بالكوفة، وثلثٌ بالأعراب، ثم يبعثون إلى أهل الكوفة: أن خلُّوا بيننا وبينها، فيلحقُ بهم ثلثٌ، وثلثٌ بالأعراب، وثلثٌ بالشام، قال: فقلنا: ما أَمَارَةُ ذلك؟ قال: إِذا طَبَّقَتِ الأرضَ إمارةُ الصِّبيان [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন তাঁর পরনে দু'টি ক্বিত্রিয়াহ চাদর এবং মাথায় পাগড়ি ছিল, কিন্তু তাঁর গায়ে কোনো সিরবাল (অর্থাৎ জামা) ছিল না। আমরা তাঁকে বললাম: আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন এবং কিতাবসমূহ বর্ণনা করেছেন। তিনি বললেন: তোমরা কোথাকার লোক? আমরা বললাম: আমরা ইরাকের অধিবাসী। তিনি বললেন: হে ইরাকবাসী, তোমরা মিথ্যা বলো, (অন্যকে) মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করো এবং ঠাট্টা-বিদ্রূপ করো। বর্ণনাকারী (উকবাহ) বলেন: আমি বললাম: আল্লাহর শপথ! আমরা আপনাকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করি না, আপনার উপর মিথ্যা আরোপ করি না এবং আপনাকে নিয়ে ঠাট্টা-বিদ্রূপও করি না। তিনি বললেন: নিশ্চয়ই বনী ক্বানতুরা এবং কারকারী তখন পর্যন্ত বের হবে না, যতক্ষণ না তারা তাদের ঘোড়াগুলোকে আল-উবুল্লাহর খেজুর গাছের সাথে বাঁধবে। এর এবং বসরার মধ্যে দূরত্ব কত? আমরা বললাম: চার ফারসাখ। তিনি বললেন: এরপর তারা দূত পাঠাবে এই বলে যে, আমাদের জন্য এর (বসরার) পথ ছেড়ে দাও। তখন (বসরার অধিবাসীদের) এক তৃতীয়াংশ তাদের (শত্রুদের) সাথে যোগ দেবে, এক তৃতীয়াংশ কুফাতে চলে যাবে এবং এক তৃতীয়াংশ গ্রাম্য আরবদের কাছে আশ্রয় নেবে। এরপর তারা কুফাবাসীর কাছে দূত পাঠাবে এই বলে যে, আমাদের জন্য এর পথ ছেড়ে দাও। তখন তাদের এক তৃতীয়াংশ শত্রুদের সাথে যোগ দেবে, এক তৃতীয়াংশ গ্রাম্য আরবদের কাছে যাবে এবং এক তৃতীয়াংশ শামের দিকে চলে যাবে। বর্ণনাকারী বলেন: আমরা বললাম: এর আলামত কী? তিনি বললেন: যখন গোটা ভূখণ্ডে বালকদের (অজ্ঞান বা অপরিণত বয়স্কদের) শাসন প্রতিষ্ঠা হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] كذا وقع هنا، وسيأتي عند المصنف (8675) و (8742) و (8832): قنطوراء بن كركري، وبنو قنطوراء المراد بهم: التُّرك. 4/ 12: لا يعرف سماع قتادة من ابن بريدة ولا ابن بريدة من سليمان.كذا قال البخاري، وسيأتي عند المصنف (8832) بإسناد قوي عن حسين بن ذكوان عن عبد الله بن بريدة تصريحه بسماعه هذا الخبر من سليمان بن الربيع في قصة طويلة فيها نحو حديث سعيد بن بشير عن قتادة.وقد روى معنى هذا الخبر محمد بن سيرين عن عبد الرحمن بن أبي بكرة عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: أوشك بنو قنطوراء أن يخرجوكم من أرض العراق، قال عبد الرحمن: قلت: ثم يعودون؟ قال: وذاك أحب إليك، ثم يعودون ويكون لهم بها سلوة من عيش. وإسناده صحيح، ورواه عن ابن سيرين قتادة وأيوب فيما سيأتي عند المصنف برقم (8675) و (8676).
[2] صحيح عن عبد الله بن عمرو بن العاص، وهذا إسناد ضعيف لضعف سعيد بن بشير، وقد خولف فيه عن قتادة، حيث جعله من روايته عن عقبة بن عمرو بن أوس، وكذا وقع مسمّى هنا في رواية أبي الجماهر - وهو محمد بن عثمان التَّنوخي - عن سعيد بن بشير، ورواه الوليد بن مسلم عن سعيد عند نعيم بن حماد في "الفتن" (1896) والمستغفري في "دلائل النبوة" (253)، فسمَّاه عقبة بن أوس، وهو الصواب، وعقبة هذا لا بأس به.رجعنا إلى الخلاف على قتادة، فالمحفوظ من رواية الثقات عنه روايته للخبر عن عبد الله بن بريدة عن سليمان بن الربيع عن عبد الله بن عمرو، هكذا رواه عنه نافع وسعيد بن أبي عروبة عند نعيم (1906)، وهمام بن يحيى عند ابن سعد في "الطبقات" 5/ 88، وهشام الدستوائي فيما سيأتي عند المصنف برقم (8742). ووقع عند بعضهم: سليمان بن ربيعة، والصواب: سليمان بن الربيع، وهذا لم يرو عنه غير عبد الله بن بريدة، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقال البخاري في "تاريخه" 4/ 12: لا يعرف سماع قتادة من ابن بريدة ولا ابن بريدة من سليمان.كذا قال البخاري، وسيأتي عند المصنف (8832) بإسناد قوي عن حسين بن ذكوان عن عبد الله بن بريدة تصريحه بسماعه هذا الخبر من سليمان بن الربيع في قصة طويلة فيها نحو حديث سعيد بن بشير عن قتادة.وقد روى معنى هذا الخبر محمد بن سيرين عن عبد الرحمن بن أبي بكرة عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: أوشك بنو قنطوراء أن يخرجوكم من أرض العراق، قال عبد الرحمن: قلت: ثم يعودون؟ قال: وذاك أحب إليك، ثم يعودون ويكون لهم بها سلوة من عيش. وإسناده صحيح، ورواه عن ابن سيرين قتادة وأيوب فيما سيأتي عند المصنف برقم (8675) و (8676).
8628 - أخبرني محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة حرسها الله، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عبّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزُّهري، عن أبي إدريس الخَولاني، قال: أدركتُ أبا الدرداء ووَعَيتُ عنه، وأدركتُ عُبادة بن الصامت ووَعَيتُ عنه، وفاتني معاذُ بن جبل، فأخبرني يزيدُ بن عَمِيرة: أنه كان يقول في كل مجلس يجلسُه: اللهُ حَكَمٌ قِسط تبارك اسمُه، هَلَكَ المُرتابون، إنَّ من ورائكم فتنًا يَكثُر فيها المال، ويُفتح فيها القرآنُ حتى يأخذه الرجلُ والمرأة، والحرُّ والعبد، والصغيرُ والكبير، فيوشكُ الرجل أن يقرأ القرآن [فيقول: قد قرأتُ القرآن، فما للناس لا يتَّبعوني وقد قرأتُ القرآن؟!] [1] ثم يقول: ما هم مُتَّبِعيَّ حتى أبتدع لهم غيره، فإياكم وما ابتدعتُم، فإنَّ ما ابتدعَ ضلالةٌ.اتقوا زَلَّةَ الحكيم، فإنَّ الشيطان يُلقي على فمِ الحَكيم الضلالةَ، ويُلقي للمنافق كلمةَ الحق، قال: قلنا: وما يدريك - يرحمُك الله - أنَّ المنافق يُلقَّى كلمة الحق، وأنَّ الشيطان يُلقي على فم الحكيم كلمة الضلالة؟ قال: اجتنبوا من كلام الحكيم كلَّ متشابهٍ، الذي إذا سمعته قلت: ما هذا؟ ولا يُثنيك [ذلك] عنه، فإنه لعله أن يراجع ويُلقَّى الحقَّ، فاسمعه فإنه على الحق نورٌ [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (বর্ণনাকারী আবূ ইদরীস আল-খাওলানী) বলেন: আমি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ পেয়েছি ও তাঁদের নিকট থেকে শিক্ষা লাভ করেছি, কিন্তু মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ আমার হয়নি। ফলে ইয়াযিদ ইবনু 'আমীরাহ আমাকে জানান যে, তিনি (মু'আয) প্রতিটি মজলিসে বসলেই বলতেন: আল্লাহ তা'আলা ন্যায়পরায়ণ বিচারক, তাঁর নাম বরকতময়। সন্দেহকারীরা ধ্বংস হয়েছে।
নিশ্চয়ই তোমাদের সামনে এমন ফিতনা আসছে, যখন সম্পদ বৃদ্ধি পাবে এবং কুরআনের প্রচলন এমনভাবে বেড়ে যাবে যে পুরুষ ও নারী, স্বাধীন ও গোলাম, ছোট ও বড় সকলেই তা গ্রহণ করবে। তখন হয়তো এমন লোকও হবে যে কুরআন তেলাওয়াত করে বলবে: আমি তো কুরআন পড়েছি, তবে কেন লোকেরা আমাকে অনুসরণ করে না, অথচ আমি কুরআন পড়েছি?! অতঃপর সে বলবে: আমি তাদের জন্য এর বাইরে নতুন কিছু উদ্ভাবন না করা পর্যন্ত তারা আমাকে অনুসরণ করবে না। অতএব, তোমরা নব উদ্ভাবিত বিষয়াদি থেকে সতর্ক থেকো, কারণ যা কিছু নতুন উদ্ভাবিত হয়, তাই ভ্রষ্টতা।
তোমরা জ্ঞানীর ভুল থেকে বেঁচে থেকো। কেননা শয়তান জ্ঞানীর মুখে ভ্রষ্টতা ঢুকিয়ে দেয়, আর মুনাফিকের মুখে সত্য কথা ঢুকিয়ে দেয়।
তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: আমরা বললাম: আল্লাহ আপনাকে রহম করুন! আপনি কী করে জানলেন যে মুনাফিকের মুখে সত্য কথা আসবে, আর শয়তান জ্ঞানীর মুখে ভ্রষ্টতার কথা ঢুকিয়ে দেবে?
তিনি বললেন: জ্ঞানীর কথা থেকে তোমরা সেইসব অস্পষ্ট (মুতাশাবিহ) বিষয়গুলো বর্জন করো, যা শুনে তোমরা বলবে: এটা কী? কিন্তু তা যেন তোমাদের তাকে প্রত্যাখ্যান করা থেকে বিরত না রাখে, কেননা হয়তো সে ফিরে আসবে এবং তার নিকট সত্য প্রকাশিত হবে। সুতরাং তা শুনে নাও, কারণ সত্যের ওপর তা হলো আলো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين ليس في (ك) و (م) و (ب)، وأثبتناه من "تلخيص الذهبي" موافقةً لما في "جامع معمر" (20750).
[2] إسناده صحيح.وأخرجه أبو داود (4611) من طريق الليث بن سعد، عن عُقيل بن خالد، عن ابن شهاب الزهري، بهذا الإسناد.وسيأتي بأطول ممّا هنا برقم (8646) من طريق أبي قلابة عن يزيد بن عميرة.
8629 - أخبرنا أبو منصور محمد بن القاسم بن عبد الرحمن العتكي، حدثنا أبو سهل بشر بن سهل اللَّبّاد، حدثنا عبد الله بن صالح، حدثني الليث بن سعد، حدثني أبو قَبيل، عن عبد الله بن عمرو بن العاص: أنَّ رجلًا من أعداء المسلمين بالأندلس يقال له: ذو العرف، يَجمَع من قبائل الشِّرك جمعًا عظيمًا يعرف مَن بالأندلس أن لا طاقة لهم، فيهرب أهلُ القوَّة من المسلمين في السفن، فيُجيزون إلى طنجة [1]، ويبقى ضَعَفةُ الناس وجماعتُهم ليس لهم سفنٌ يُجيزون عليها، فيبعثُ الله عز وجل وَعِلًا ويُيبِّس [2] لهم في البحر، فيُجيز الوَعِلُ لا يغطِّي الماء أظلافه، فيراه الناس فيقولون: الوعل الوعلَ اتَّبعوه، فيُجِيزُ الناسُ على إثره كلُّهم، ثم يصير البحرُ على ما كان عليه، ويُجيز العدوُّ في المراكب، فإذا حسَّهم أهل إفريقيَّة هربوا كلُّهم حتى يدخلوا الفُسطاط، ويُقبلُ ذلك العدوُّ حتى ينزلوا فيما بين ترنوط إلى الأهرام مسيرة خمسة بُرُد، فيملؤون ما هنالك شرًّا، فتخرج إليهم رايةُ المسلمين على الجسر، فينصرهم الله عليهم، فيهزمونهم ويقتلونهم إلى لُوبِيَّةَ مسيرةَ عشر ليال، ويستوقدُ أهل الفُسطاط لعِجْلهم وأداتهم سبع سنين، ويَنفلتُ ذو العرف من القتل ومعه كتابٌ لا ينظرُ فيه إلَّا وهو منهزمٌ، فيَجِدُ فيه ذِكرَ الإسلام، وأنه يُؤمَر فيه بالدخول في السِّلْم، فيسأل الأمان على نفسه وعلى من أجابه إلى الإسلام من أصحابه الذين أقبلوا معه، فيُسلمُ فيصير من المسلمين، ثم يأتي العام الثاني رجلٌ من الحبشة يقال له: اسبس، وقد جمع جمعًا عظيمًا، فيهرب المسلمون منهم من أُسوان حتى لا يبقى بها ولا فيما دونَها أحدٌ من المسلمين إلا دخل الفُسطاط، فينزل اسبس بجيشه مَنْفَ، وهو على رأس بَريدٍ الفُسطاط، فتخرج إليهم رايةُ المسلمين على الجسر، فينصرُهم الله عليهم، فيقتلونهم ويأسرونهم، حتى يُباع الأسوَدُ بعباءةٍ [3].هذا حديث صحيح موقوف الإسناد على شرط الشيخين [4]، وهو أصل في معرفة وقوع الفتن بمصر، ولم يُخرجاه.ومَنْفُ: هو الذي يقول منصورٌ الفقيه رحمه الله فيه: سألتُ أمس قُصورًا … بعَينِ شمسٍ ومَنْفِعن أهلها أين حَلُّوا … فلم تُجِبْني بحَرفِ
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আন্দালুসের (স্পেন) মুসলিমদের শত্রুদের মধ্যে যুল-আরফ নামে এক ব্যক্তি ছিল, সে মুশরিক গোত্রসমূহ থেকে বিরাট এক দল জড়ো করে। আন্দালুসের লোকেরা জানত যে তাদের সাথে লড়াই করার শক্তি তাদের নেই। ফলে মুসলিমদের মধ্যে যারা শক্তিশালী ছিল, তারা জাহাজযোগে টাঙ্গিয়ারের দিকে পালিয়ে যায়। কিন্তু দুর্বল এবং সাধারণ মানুষেরা রয়ে যায়, যাদের পার হওয়ার মতো কোনো জাহাজ ছিল না। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল একটি বন্য ছাগল প্রেরণ করেন এবং তাদের জন্য সমুদ্রে শুষ্ক পথ করে দেন। ছাগলটি পার হয়ে যায় এবং পানি তার ক্ষুরকে ভেজাতে পারে না। লোকেরা তাকে দেখতে পেয়ে বলতে থাকে: "ঐ যে ছাগল, ঐ ছাগল! তাকে অনুসরণ করো।" ফলে সবাই তার পথ ধরে পার হয়ে যায়। এরপর সমুদ্র আবার আগের মতো হয়ে যায়। আর শত্রু বাহিনী নৌযান যোগে পার হয়। যখন আফ্রিকাবাসীরা তাদের উপস্থিতি টের পায়, তখন তারা সবাই পালিয়ে ফুঁসতাতের (মিশরের পুরাতন রাজধানী) দিকে আশ্রয় নেয়। সেই শত্রু বাহিনী এগিয়ে এসে তারনূত এবং পিরামিডের মধ্যবর্তী স্থানে শিবির স্থাপন করে, যা প্রায় পাঁচ বুরুদ (ডাক) এর পথ। তারা ওই স্থানটিকে অনিষ্টে পরিপূর্ণ করে তোলে। তখন মুসলিমদের পতাকা (সেনাবাহিনী) সেতুর উপর দিয়ে তাদের দিকে অগ্রসর হয়। অতঃপর আল্লাহ তাদের বিরুদ্ধে মুসলিমদের সাহায্য করেন। মুসলিমরা তাদের পরাজিত করে এবং দশ রাতের দূরত্বে অবস্থিত লুবিয়া পর্যন্ত তাদের হত্যা করতে করতে ধাওয়া করে। আর ফুঁসতাতের লোকেরা তাদের (শত্রুদের) গরু এবং সরঞ্জামাদি সাত বছর ধরে জ্বালানি হিসেবে ব্যবহার করবে। যুল-আরফ এই হত্যাযজ্ঞ থেকে পালিয়ে যায়। তার সাথে একটি কিতাব থাকে, যা সে কেবল পালিয়ে যাওয়ার সময় দেখছিল। সেখানে সে ইসলামের কথা খুঁজে পায় এবং তাকে শান্তিতে (ইসলামে) প্রবেশ করার নির্দেশ দেওয়া হয়। অতঃপর সে নিজের জন্য এবং তার সঙ্গীদের মধ্যে যারা তার সাথে এসেছিল এবং ইসলাম গ্রহণে সাড়া দিয়েছিল, তাদের জন্য নিরাপত্তা চায়। ফলে সে ইসলাম গ্রহণ করে এবং মুসলিমদের অন্তর্ভুক্ত হয়। এরপর দ্বিতীয় বছর হাবশার (আবিসিনিয়ার) একজন লোক আসবে, যার নাম আসবাস। সে বিশাল এক দল জড়ো করবে। মুসলিমরা তাদের ভয়ে আসওয়ান থেকে পালিয়ে যাবে, এমনকি সেখানে বা তার নিচের এলাকায় কোনো মুসলিম থাকবে না—সবাই ফুঁসতাতে প্রবেশ করবে। আসবাস তার বাহিনী নিয়ে মানফ-এ (মেমফিস) নামবে, যা ফুঁসতাত থেকে এক বুরুদ (ডাকের) দূরত্বে অবস্থিত। তখন মুসলিমদের পতাকা (সেনাবাহিনী) সেতুর উপর দিয়ে তাদের দিকে অগ্রসর হবে। অতঃপর আল্লাহ তাদের বিরুদ্ধে মুসলিমদের সাহায্য করবেন। মুসলিমরা তাদের হত্যা ও বন্দী করবে, এমনকি একজন কালো ক্রীতদাসকে একটি সাধারণ চাদরের বিনিময়ে বিক্রি করা হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: لجة أو بجة، والتصويب من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج. وطنجة: مدينة على ساحل المغرب على مضيق جبل طارق مقابل الجزيرة الخضراء من الأندلس.
[2] تحرَّفت في النسخ الخطية إلى: وينشر والتصويب من "الفتن" لأبي عمرو الداني (484)، وتيبيس الشيء: تجفيفه، ومنه قوله تعالى في قصة موسى عليه السلام: {فَاضْرِبْ لَهُمْ طَرِيقًا فِي الْبَحْرِ يَبَسًا} [طه: 77]
8629 [3] - متنه منكر غريب وذكر عبد الله بن عمرو فيه مستنكر، فإنَّ الأندلس إنما عُرفت ودخلها المسلمون بعد وفاته رضي الله عنه بسنوات، إذ كان فتح تلك البلاد على يد طارق بن زياد رحمه الله ابتداءً من سنة 92 هـ.وهذا الخبر قد تفرد به أبو قبيل - وهو حيي بن هانئ المعافري - وهو مختلف فيه، وهو إلى التوثيق أقرب إلّا أنَّ له مناكير؛ ذلك لأنه كان يكثر النقل عن الكتب القديمة كما قال الحافظ ابن حجر في ترجمة عبيد بن أبي قرة من "تعجيل المنفعة" 1/ 853.وبشر بن سهل اللباد وإن كان مجهول الحال كما سلف في ترجمته عند الحديث (261)، وعبد الله بن صالح وإن كان سيئ الحفظ، إلا أنهما لم ينفردا به.فقد روى نحوه رشدين بن سعد، عن عبد الله بن لهيعة، عن أبي قبيل، عن عبد الله بن عمرو.أخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1331)، ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (484)، ورشدين ضعيف.والفُسطاط وترنوط ولوبيّة وأُسوان ومنف كلها بلدان مصرية ذكرها ياقوت في "معجم البلدان".
8629 [4] - تعقَّبه الذهبي في "تلخيصه" بقوله: ليس على شرطهما، فإنهما لم يخرجا لأبي قبيل، ولا روى مسلم لعبد الله بن صالح شيئًا لضعفه، والبخاري لم يكد يفصح به.
8630 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم الأصبهاني، حدثنا الحسين بن حفص، عن سفيان، عن أبي حصين، عن عبد الرحمن بن بِشْر [1] الأنصاري قال: أتى رجلٌ بادِي [2] ابن مسعود، فأكبَّ عليه، فقال: يا أبا عبد الرحمن، متي أَضِلُّ وأنا أعلم؟ قال: إذا كان عليك أمراء إذا أطعتهم أدخلوك النار، وإذا عصيتهم قتلوك [3].وهذا موقوفٌ صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.قال الحاكم رحمه الله: هذه أحاديث ذكرها عبد الله بن وَهْب في الملاحم، وعَلَوتُ فيها فأخرجتها، وإن كانت غير مسانيد:
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এসে তাঁর দিকে ঝুঁকে পড়ল এবং বলল, "হে আবূ আব্দুর রহমান, কখন আমি জেনে-শুনেও পথভ্রষ্ট হব?" তিনি বললেন, "যখন তোমাদের উপর এমন শাসক থাকবে যে, যদি তুমি তাদের আনুগত্য করো, তাহলে তারা তোমাকে জাহান্নামে প্রবেশ করাবে; আর যদি তুমি তাদের অবাধ্য হও, তবে তারা তোমাকে হত্যা করবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بشير، بزيادة ياء فيه، وعبد الرحمن بن بشر هذا: هو عبد الرحمن بن بشر بن مسعود الأنصاري، أبو بشر المدني.
[2] أي: من أهل البادية.
8630 [3] - خبر حسن، ومحمد بن إبراهيم الأصبهاني - وهو ابن أورمة - وإن كان مجهولًا كما سبق مرارًا، إلا أنه لم ينفرد به.فقد رواه وكيع عند ابن أبي شيبة في "المصنف" 15/ 49 عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.وهو إسناد حسن من أجل عبد الرحمن بن بشر، فقد روى عنه جمع وذكره ابن حبان في "الثقات".وأبو حصين: هو عثمان بن عاصم الأسدي.
8631 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا بَحْر بن نَصْر، حدثنا عبد الله بن وهب أخبرني معاوية بن صالح، عن عبد الرحمن بن جُبَير، عن أبيه، عن أبي ثَعلبة الخُشَني، قال: إذا رأيت الشام مائدة رجلٍ [1] واحد وأهل بيته، فعند ذلك فتحُ القُسطَنطينيّة [2].
আবু ছা'লাবাহ আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন তুমি দেখবে যে শাম (সিরিয়া অঞ্চল) একজন ব্যক্তি ও তার পরিবারের খাবারের টেবিলে (সীমাবদ্ধ) হয়ে গেছে, তখন কন্সটান্টিনোপল বিজয় সংঘটিত হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: إذا رأيت بيدة بيد رجل، وهو تحريف والصواب: إذا رأيت الشام مائدة رجل … كما في مصادر التخريج.
[2] رجاله ثقات.وأخرجه أحمد (29/ (17734) من طريق ليث بن سعد، عن معاوية بن صالح، بهذا الإسناد.وزاد في أوله ما سلف عند المصنف برقم (8511). عذابًا من عذاب الله؛ القُرّ. ورجاله ثقات إلّا أنه منقطع، حسان بن عطية لم يدرك أبا الدرداء.والقُرُّ: البرد الشديد، وقد تحرَّف في الطبعة الهندية "من مصنف ابن أبي شيبة" إلى: القبر.
8632 - حدثنا محمد، حدثنا بحر، حدثنا ابن وهب، أخبرني معاوية، عن الحسن بن جابر وأبي الزاهرية، عن كعب قال: إِنَّ المَعاقِلَ ثلاثةٌ: فَمَعقِلُ الناس يومَ المَلاحم بدمشق، ومَعقِلُ الناس يومَ الدَّجال نهرُ أبي فُطْرُس - يَمرُقُ من الناس من يقول: بيت المقدِس - ومَعقِلُهم يومَ يأجوج ومأجوجَ بِطُورِ سَيْنا [1].
কা'ব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আশ্রয়স্থল তিনটি: মালহামা বা মহাযুদ্ধের দিনে মানুষের আশ্রয়স্থল হলো দামেশক; আর দাজ্জালের দিনে মানুষের আশ্রয়স্থল হলো আবু ফুতরুসের নদী—যদিও কিছু লোক এর থেকে বেরিয়ে গিয়ে বলবে: বায়তুল মুকাদ্দাস; আর ইয়াজুজ ও মাজুজের দিনে তাদের আশ্রয়স্থল হলো তূর সিনা।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح عن كعب: وهو كعب الأحبار، كان يهوديًا فأسلم في خلافة أبي بكر، وكان يحدثهم عن الكتب الإسرائيلية ويحفظ عجائب كما قال الذهبي في "سير أعلام النبلاء" 3/ 489، وأعلَّ هذا الخبر في "تلخيصه" بالانقطاع؛ يعني بين الحسن بن جابر وأبي الزاهرية وهو حُدير بن كريب - وقد توبعا.وأخرجه مختصرًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1648) عن ابن وهب، بهذا الإسناد.وأخرجه أيضًا (713) و (1627)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 244 من طريق صفوان بن عمرو السكسكي، عن أبي الزاهرية وحده، به.وأخرجه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (501) و (672)، والربعي في "فضائل الشام ودمشق" (118)، وابن عساكر 1/ 244 من طريق محمد بن الوليد الزبيدي، عن الفضيل بن فضالة، عن كعب بن عجرة.ونهر أبي فطرس: في فلسطين، يعرف اليوم بنهر العوجا وبنهر يافا أيضًا؛ لأنه يصبّ في البحر شمالها. عذابًا من عذاب الله؛ القُرّ. ورجاله ثقات إلّا أنه منقطع، حسان بن عطية لم يدرك أبا الدرداء.والقُرُّ: البرد الشديد، وقد تحرَّف في الطبعة الهندية "من مصنف ابن أبي شيبة" إلى: القبر.
8633 - حدثنا محمد، حدثنا بحر، حدثنا ابن وهب، أخبرني معاوية بن صالح، عن أبي الزاهرية، عن جُبير بن نُفَير، عن أبي الدرداء قال: إذا خُيِّرتُم بين الأَرَضِينَ فلا تختاروا إرمينية، فإنَّ فيها قطعةً من عذاب الله [1].
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তোমাদেরকে বিভিন্ন ভূখণ্ডের মাঝে পছন্দের সুযোগ দেওয়া হয়, তখন তোমরা আরমিনিয়াকে (Armenia) পছন্দ করো না, কেননা তার মধ্যে আল্লাহর আযাবের একটি অংশ রয়েছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرجه مبيَّنًا ابن أبي شيبة 5/ 326 (19798 - عوامة) عن عيسى بن يونس، عن الأوزاعي، عن حسان بن عطية، عن أبي الدرداء قال: إذا عُرض عليكم الغزو فلا تختاروا إرمينية، فإنّ بها عذابًا من عذاب الله؛ القُرّ. ورجاله ثقات إلّا أنه منقطع، حسان بن عطية لم يدرك أبا الدرداء.والقُرُّ: البرد الشديد، وقد تحرَّف في الطبعة الهندية "من مصنف ابن أبي شيبة" إلى: القبر.
8634 - حدثنا محمد، حدثنا بَحْر، حدثنا ابن وهب قال: وأخبرني معاوية، عن صفوان بن عمرو، عن عبد الرحمن بن جُبَير بن نُفير، عن كعب قال: الجزيرةٌ آمنةٌ من الخراب حتى تَخرَبَ إرمينِيَةُ، ومصر آمنةٌ من الخراب حتى تَخرَبَ الجزيرةُ، والكوفةُ آمنةٌ من الخراب حتى تَخرَبَ مصرُ، ولا تكون المَلحَمةُ حتى تَخرَبَ الكوفةُ، ولا تُفتَحُ مدينةُ الكُفر حتى تكونَ المَلحمةُ، ولا يخرج الدجالُ حتى تُفتَحَ مدينةُ الكفر [1].
কা'ব থেকে বর্ণিত, আল-জাজীরা (মেসোপটেমিয়া) ধ্বংস হওয়া থেকে নিরাপদ থাকবে যতক্ষণ না আরমেনিয়া ধ্বংস হয়। আর মিশর ধ্বংস হওয়া থেকে নিরাপদ থাকবে যতক্ষণ না আল-জাজীরা ধ্বংস হয়। আর কুফা ধ্বংস হওয়া থেকে নিরাপদ থাকবে যতক্ষণ না মিশর ধ্বংস হয়। আর মহাযুদ্ধ (আল-মালহামা) সংঘটিত হবে না যতক্ষণ না কুফা ধ্বংস হয়। আর কুফরের শহর বিজিত হবে না যতক্ষণ না মহাযুদ্ধ হয়। এবং দাজ্জাল বের হবে না যতক্ষণ না কুফরের শহর বিজিত হয়।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه عبد الرحمن بن جبير لم يدرك كعب الأحبار، وكعب كان يأتي بالعجائب كما سبق قريبًا. وقال الذهبي في "تلخيصه": منقطع واهٍ.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (892) مختصرًا، والمستغفري في "دلائل النبوة" (309) من طرق عن صفوان بن عمرو السكسكي، بهذا الإسناد.وأخرجه بنحوه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (454) من طريق إسماعيل بن عياش، عن بعض أصحابه قال: وجدت في كتاب خالد بن معدان: قال عبد الله عن كعب الحَبْر … وذكره.
8635 - حدثنا أبو العباس، حدثنا بحر، حدثنا ابن وهب، حدثنا معاوية بن صالح، عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيّب أنه كان يقول: ولدُ نوحٍ ثلاثةٌ: سامٌ وحامٌ ويافِتُ، فوَلَدَ سامٌ: العرب وفارس والروم، وفي كلِّ هؤلاء خيرٌ، وولد حامٌ: السُّودان والبرير والقبط، وولد يافثُ: التُّركَ والصَّقالبة ويأجوج ومأجوج [1].
সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: নূহ (আঃ)-এর সন্তান ছিলেন তিনজন: সাম, হাম ও ইয়াফিত। সামের বংশধর হলো: আরব, পারস্য (ফারিস) ও রোম। এদের সকলের মধ্যেই কল্যাণ রয়েছে। হামের বংশধর হলো: সুদানি, বার্বার ও কিবতী (কপ্ট)। এবং ইয়াফিতের বংশধর হলো: তুর্কি, সাকা-লিবা (স্লাভ) ও ইয়াজুজ-মাজুজ।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات. وهو في "جامع ابن وهب" (25 - أبو الخير).وروي في المرفوع من حديث الحسن البصري عن عمران بن حصين وسمرة بن جندب: "ولد نوح ثلاثة: سام وحام ويافث أبو الروم"، وقد سلف عند المصنف برقم (4050). وفي بعض رواياته كما عند أحمد 33/ (20099) وغيره: "سام أبو العرب، وحام أبو الحبش، ويافث أبو الروم".
8636 - حدثنا محمد، حدثنا بَحْر بن نصر، حدثنا ابن وهب، حدثنا معاوية بن صالح، عن أبي الزاهريَّة، عن كعب قال: لا تكون الملاحمُ إلَّا على يدي رجلٍ من آل هِرَقلَ، الرابعِ أو الخامسِ يقال له: طبارة [1].
কা'ব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, মহাযুদ্ধসমূহ (মালাহিম) সংঘটিত হবে না, তবে হিরাক্লিয়াসের বংশের চতুর্থ অথবা পঞ্চম এমন এক ব্যক্তির হাতে, যাকে তবারা (Tabārah) বলা হবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لانقطاعه بين أبي الزاهرية - وهو حدير بن كريب - وبين كعب الأحبار.وأخرج نعيم بن حماد في "الفتن" (1390) بإسناد فيه ضعف أيضًا من طريق يزيد بن خمير، عن كعب قال .... والملاحم على يدي رجل من آل هرقل.
8637 - حدثنا محمد، حدثنا بحر، حدثنا ابن وهب، أخبرنا معاوية بن صالح، عن صفوان بن عمرو، أنه سمع أبا مريم مولى أبي هريرة يقول: مرَّ أبو هريرة بمروان وهو يَبْني داره التي وَسَط المدينة، قال: فجلستُ إليه والعمال يعملون، قال: ابنُوا شديدًا، وأَمِّلوا بعيدًا، وموتوا قريبًا، فقال مروان: إنَّ أبا هريرة ليُحِدِّثُ العمّال، فماذا تقول لهم يا أبا هريرة؟ قال: قلت: ابنوا شديدًا، وأمِّلوا بعيدًا، وموتوا قريبًا، يا معشر قريش - ثلاث مرّات. اذكروا كيف كنتم أمس وكيف أصبحتم اليومَ تُخدمون، أرقَّاؤكم فارسُ والرّومُ، كلوا خبزَ السَّمِيذ، واللحمَ السَّمين، لا يأكُل بعضُكم بعضًا، ولا تَكادَمُوا تكادُمَ البراذين، وكونوا اليومَ صغارًا تكونوا غدًا كبارًا، والله لا يرتفعُ منكم رجلٌ درجةً إِلَّا وَضَعَه الله يوم القيامة [1].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মারওয়ানের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে মদীনার মধ্যস্থলে তার বাড়ি নির্মাণ করছিল। তিনি (আবু হুরায়রা) বলেন: আমি তার কাছে বসলাম, আর শ্রমিকরা কাজ করছিল। আমি বললাম: মজবুতভাবে নির্মাণ করো, সুদূরপ্রসারী আশা রাখো এবং শীঘ্রই মৃত্যুবরণ করো। তখন মারওয়ান বললেন: আবু হুরায়রা তো শ্রমিকদেরকে উপদেশ দিচ্ছেন! হে আবু হুরায়রা, আপনি তাদের কী বলছেন? তিনি (আবু হুরায়রা) বললেন: আমি বললাম, মজবুতভাবে নির্মাণ করো, সুদূরপ্রসারী আশা রাখো এবং শীঘ্রই মৃত্যুবরণ করো। হে কুরাইশ সম্প্রদায়—তিনি এই কথাটি তিনবার বললেন। তোমরা স্মরণ করো, গতকাল তোমরা কেমন ছিলে আর আজ তোমরা কেমন হয়েছো যে তোমাদের খেদমত করা হয়, তোমাদের দাস হলো পারস্য ও রোম। তোমরা ময়দার রুটি ও মোটা মাংস খাও। তোমাদের কেউ যেন কাউকে না খায়, আর খচ্চরের মতো একে অপরের সাথে কামড়াকামড়ি করো না। আজ তোমরা বিনয়ী থাকো (ছোট হয়ে থাকো), তাহলে আগামীতে তোমরা মহান হবে (বড় হবে)। আল্লাহর শপথ, তোমাদের মধ্যে যেই ব্যক্তি এক ধাপ উপরে উঠবে, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তাকে নিচে নামিয়ে দেবেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح.وأخرج ابن أبي الدنيا في "قصر الأمل" (259) من طريق عوف الأعرابي، عن أبي السَّليل ضريب بن نُقير قال: وقف أبو هريرة على مروان وهو يبني بيتًا له، فقال: السلام عليك يا أبا عبد القُدُّوس، ابنوا شديدًا، وأمِّلوا بعيدًا، واحيوا قليلًا، وأَخضموا فسيُقضَم، والموعدُ الله. وإسناده منقطع، أبو السليل لم يسمع من أبي هريرة. وأخضِموا، أي: أكثروا ووسِّعوا.وتكادُم البراذين: عضُّ بعضها بعضًا، والبِرذَون من الخيل: ما ليس بعرابيٍّ.
8638 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُوزمة، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن خالد الحذاء، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يَقتتِلُ [1] عند كَنزكم ثلاثةٌ كلُّهم ابن خليفة، ثم لا يصيرُ إلى واحدٍ منهم، ثم تَطلُعُ الراياتُ السُّودُ من قِبَل المشرق، فيقاتلونكم قتالًا لم يُقاتِله قومٌ" ثم ذكر شيئًا فقال: "إذا رأيتُموه فبايِعُوه، ولو حَبوًا على الثّلج، فإنه خليفةُ الله المَهْدِيُّ" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين.
ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমাদের ধন-ভান্ডারের (কাছে) তিনজন যুদ্ধ করবে, তাদের প্রত্যেকেই হবে খলীফার পুত্র। অতঃপর তা (সেই ক্ষমতা বা ধন-ভান্ডার) তাদের একজনেরও অধিকারে আসবে না। এরপর পূর্ব দিক থেকে কালো পতাকাগুলো বের হবে। তারা তোমাদের সাথে এমন ঘোরতর যুদ্ধ করবে যা ইতিপূর্বে আর কোনো জাতি করেনি।" এরপর তিনি কিছু বিষয় উল্লেখ করে বললেন: "তোমরা যখন তাকে দেখবে, তখন তার হাতে বাইআত (আনুগত্যের শপথ) করবে, যদিও বরফের ওপর দিয়ে হামাগুড়ি দিয়ে যেতে হয়, কারণ তিনিই হলেন আল্লাহর খলীফা মাহদী।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (م) و (ب): يقتل، بتاء واحدة والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الموافق لما في مصادر التخريج.
[2] ضعيف مضطرب، مداره على خالد بن مهران الحذّاء، فالحديث يعرف به كما يفهم من كلام تلميذه الإمام الحُجة إسماعيل ابن عُليَّة فيما قال أحمد بن حنبل عنه في "العلل" برواية ابنه عبد الله (2443)، والجمهور على توثيق خالد، إلّا أنَّ ابن عُليَّة قال: كان خالد يرويه فلم نلتفت إليه، ثم ضعف ابن عليَّة أمرَه؛ يعني حديث خالد هذا في الرايات. قلنا: ولعلَّه أُدخل عليه، فإنَّ تلميذه الآخر الحُجّة حماد بن زيد أشار إلى أنه تغيَّر حفظه بأخرة، فقد روى العقيلي في "الضعفاء" 1/ 565 عن يحيى بن آدم قال: قلت لحماد بن زيد: ما لخالدٍ الحذاء في حديثه؟! قال: قدم علينا قدمةً من الشام فكأنّا أنكرنا حفظه. قلنا: وقد وقع خلاف في لفظه وفي رفعه ووقفه كما سيأتي.وأما رواية شريك بن عبد الله النخعي له عن علي بن زيد بن جُدعان عن أبي قلابة عند أحمد 37/ (22387) وغيره، فالغالب أنه من تخليط شريك، فإنه كان سيئ الحفظ، وقد ذكره الذهبي في ترجمة علي بن زيد من "الميزان" وقال: أراه منكرًا. انتهى، وعلي بن زيد ضعيف وله عجائب ومناكير.أما حديث سفيان - وهو الثوري - عن خالد الحذّاء، فقد أخرجه ابن ماجه (4084)، والبزار في "مسنده" (4163)، والروياني في "مسنده" (637)، والمستغفري في "دلائل النبوة" (54)، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (548)، والبيهقي في "الدلائل" 6/ 515 من طرق عن عبد الرزاق، عن سفيان الثوري بهذا الإسناد بمثل رواية المصنف التي ظاهرها المفارقة بين الرايات السود وبين المهدي، فإنَّ في الكلام بينهما انقطاعًا يفهم من قوله: "ثم ذكر شيئًا"، وعند غير المصنف ثم ذكر شيئًا لا أحفظه، غير رواية أحمد بن منصور الرمادي عن عبد الرزاق عند الداني فبلفظ: " … ثم لا يصير الملك إلى أحد منهم، ثم تُقبل الرايات السُّود من قبل خُراسان، فائتوها ولو حبوًا على الركب، فإنَّ فيها خليفة الله المهدي"، فجعل المهدي من أصحاب الرايات السود.وهكذا رواه عبدُ الوهاب بن عطاء الخفّاف عن خالد الحذاء كما سيأتي عند المصنف برقم (8741)، إلّا أنه وقفه على ثوبان من قوله بلفظ: إذا رأيتم الرايات السود خرجت من قبل خراسان، فائتوها ولو حبوًا، فإنَّ فيها خليفة الله المهدي. فهذا عبد الوهاب الخفاف قد خالف سفيان في إسناده ولفظه، وعبد الوهاب لا بأس به إلّا أنه ليس بمرتبة سفيان في الثقة.وقد صحَّح إسناد حديث سفيان الثوري: البزارُ في "مسنده" والقرطبي في "التذكرة" ص 1201 وابن كثير في "البداية والنهاية" 19/ 62!وذُكرت هذه الرايات السُّود أيضًا في حديث عن أبي هريرة مرفوع عند أحمد 14/ (8775) والترمذي (2269)، وسنده ضعيف جدًّا.وفي حديث آخر عن ابن مسعود عند ابن ماجه (4082)، وسنده ضعيف لا يصح. وسيأتي نحوه عند المصنف برقم (8640). ولا يصح في هذا الباب شيء، والله تعالى أعلم.