আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম
8639 - أخبرنا أبو حفص أحمد بن أحيد [1] الفقيه ببُخارى، أخبرنا أبو هارون سهل بن شاذان، حدثنا يحيى بن جعفر، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن عبد الله بن طاووس، عن أبيه، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خيرُ الناس في الفتن رجلٌ آخذٌ بعِنَان - أو قال: برَسَن - فرسِه خلف أعداء الله، يُخيفُهم ويُخيفونَه، أو رجلٌ معتزل في باديته يؤدِّي حق الله عليه" [2].هذا حديث على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "ফিতনার সময় সর্বোত্তম মানুষ হলো সেই ব্যক্তি, যে আল্লাহর শত্রুদের পিছনে তার ঘোড়ার লাগাম—অথবা তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: রশি—ধরে রেখেছে, সে তাদের আতঙ্কিত করে এবং তারাও তাকে আতঙ্কিত করে। অথবা সেই ব্যক্তি যে তার মরু অঞ্চলে নির্জনতা অবলম্বন করেছে এবং তার উপর আল্লাহর যে হক রয়েছে তা সে আদায় করে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أحمد بن حنبل، والتصويب من أسانيد المصنف في بضعة مواضع أخرى من هذا الكتاب.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد لا بأس برجاله، وقد سلف الكلام عليه برقم (8585).
8640 - أخبرني أبو بكر بن أبي دارِم الحافظ بالكوفة، حدثنا محمد عثمان بن سعيد القرشي، حدثنا يزيد بن محمد الثَّقفي، حدثنا حنان بن سَدِير، عن عمرو بن قيس، عن الحَكَم، عن إبراهيم، عن علقمة بن قيس وعبيدة السَّلماني، عن عبد الله بن مسعود قال: أتينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فخرج إلينا مستبشرًا يُعرَفُ السُّرورُ في وجهه، فما سألناه عن شيء إلَّا أخبرنا به، ولا سَكتنا إلَّا ابتدأَنا، حتى مرَّت فتيةٌ من بني هاشم فيهم الحسن والحسين، فلما رآهم خَثَرَ لمَمَرَّهم وانهملَت عيناه، فقلنا: يا رسول الله، ما نزال نرى في وجهك شيئًا نَكرَهُه، فقال: "إِنَّا أهلُ بيتٍ اختار الله لنا الآخرة على الدنيا، وإنه سيَلقَى أهلُ بيتي من بعدي تطريدًا وتشريدًا في البلاد، حتى تُرفَعَ رايات سودٌ من المشرق، فيسألون الحقَّ فلا يُعطونه، ثم يسألونه فلا يُعطونه، فيُقاتلون فيُنصرون، فمن أدركه منكم أو من أعقابكم فليأتِ إمامَ أهل بيتي ولو حَبوًا على الثَّلج، فإنها راياتُ هدى يدفعونها إلى رجل من أهل بيتي يواطئُ اسمُه اسمي، واسمُ أبيه اسمَ أبي، فيَملِكُ الأرضَ فيملؤُها قسطًا وعَدْلًا كما مُلِئَت جَوْرًا وظُلمًا" [1].
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এলাম। তিনি হাসিখুশিভাবে আমাদের দিকে বেরিয়ে আসলেন, তাঁর চেহারাতে আনন্দের ছাপ দেখা যাচ্ছিল। আমরা তাঁকে কোনো বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলে তিনি উত্তর দিতেন, আবার আমরা চুপ থাকলে তিনি নিজেই (কথা) শুরু করতেন। এমন সময় বনু হাশিমের কিছু যুবক পাশ দিয়ে গেল, যাদের মধ্যে হাসান ও হুসাইনও ছিলেন। যখন তিনি তাঁদের দেখলেন, তাঁদের যাওয়ার পথে (চিন্তাগ্রস্ত হয়ে) থেমে গেলেন এবং তাঁর চোখ অশ্রুসিক্ত হয়ে গেল।
আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমরা আপনার চেহারায় এমন কিছু দেখছি যা আমাদের খারাপ লাগছে।
তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমরা এমন এক আহলে বাইত (পরিবার), যাদের জন্য আল্লাহ্ দুনিয়ার চেয়ে আখিরাতকে বেছে নিয়েছেন। আমার পরে আমার আহলে বাইতের সদস্যরা দেশে দেশে বিতাড়ন ও দেশান্তরের সম্মুখীন হবে। যতক্ষণ না পূর্ব দিক থেকে কালো পতাকা উত্তোলন করা হবে। তারা হক (ন্যায্য অধিকার) চাইবে, কিন্তু তা তাদের দেওয়া হবে না। এরপর তারা আবার চাইবে, কিন্তু তাও দেওয়া হবে না। তখন তারা যুদ্ধ করবে এবং বিজয়ী হবে। তোমাদের মধ্যে যারা অথবা তোমাদের বংশধরদের মধ্যে যারা সেই সময় পাবে, তারা যেন আমার আহলে বাইতের ইমামের কাছে আসে, এমনকি বরফের উপর হামাগুড়ি দিয়ে হলেও। কেননা, এগুলি হলো হিদায়েতের ঝাণ্ডা। তারা এগুলো আমার আহলে বাইতের এমন এক ব্যক্তির হাতে তুলে দেবে, যার নাম হবে আমার নামের অনুরূপ এবং তার পিতার নাম হবে আমার পিতার নামের অনুরূপ। সে সমগ্র পৃথিবীর শাসক হবে এবং পৃথিবীকে ন্যায় ও ইনসাফে পরিপূর্ণ করে দেবে, যেমন তা যুলুম ও অত্যাচারে ভরে গিয়েছিল।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث منكر، وقال الذهبي في "تلخيصه": هذا موضوع. قلنا: وعلّته شيخ المصنف أبو بكر بن أبي دارم، فإنَّ الحاكم نفسه قد تكلّم فيه فقال - فيما نقله الذهبي في "ميزان الاعتدال" -: رافضي غير ثقة. وقد تفرَّد بهذا الإسناد والسياق.وإنما يعرف هذا الحديث - كما قال البزار في "مسنده" (1491) - من حديث يزيد بن أبي زياد الهاشمي مولاهم عن إبراهيم: وهو ابن يزيد النخعي. هكذا رواه جماعة عنه منهم علي بن صالح الهمداني عند ابن ماجه (4082)، وانظر تتمة تخريجه والكلام عليه هناك.خَثَرَ، أي: انزعج وتكدَّر خاطره. والنَّشَف، كما قال ابن الأثير في "النهاية": حجارة سود كأنها أُحرقت بالنار، وإذا تُركت على رأس الماء طَفَت ولم تغص فيه … ومنه حديث حذيفة؛ وذكر نحوه، ثم قال: يعني أن الأولى من الفتن لا تؤثر في أديان الناس لخفّتها، والتي بعدها كهيئة حجارة قد أُحميت بالنار فكانت رضفًا، فهي أبلغ في أديانهم، وأثلم لأبدانهم.وأخرجه بشطريه ضمن قصة طويلة في زمن فتنة مقتل عثمان رضي الله عنه: ابن عساكر في "تاريخ دمشق" - 39/ 478 - 479 من طريق جرير بن حازم، عن الصلت بن بهرام، عن زيد بن وهب، وذكر القصة. وإسناده صحيح. وسيأتي نحوه برقم (8833) من طريق عمران الخياط عن زيد بن وهب.
8641 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُورمة، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن زيد بن وَهْب، عن حُذيفة قال: أتتكم الفتنةُ تَرمي بالرَّضْف [1]، أتتكم الفتنةُ السوداءُ المُظلمة، إنَّ للفتنة وَقَفَاتٍ وبَعَثاتٍ، فمن استطاع منكم أن يموتَ في وَقَفاتها فليفعل [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: ফিতনা তোমাদের কাছে এসে পড়েছে, যা (যেন) গরম পাথর নিক্ষেপ করছে, তোমাদের কাছে কালো, অন্ধকার ফিতনা এসে পড়েছে। নিশ্চয়ই ফিতনার রয়েছে বিরতিকাল এবং পুনরুত্থানকাল। অতএব, তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এই বিরতিকালগুলোতে মৃত্যুবরণ করতে সক্ষম হবে, সে যেন তাই করে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بالرشف، والتصويب من "تلخيص الذهبي". والرَّضْف: الحجارة المحماة على النار، واحدتها رَضْفة، قال ابن الأثير في "النهاية" وذكر حديث حذيفة هذا: أي: هي في شدّتها وحرّها كأنها ترمي بالرضف. والنَّشَف، كما قال ابن الأثير في "النهاية": حجارة سود كأنها أُحرقت بالنار، وإذا تُركت على رأس الماء طَفَت ولم تغص فيه … ومنه حديث حذيفة؛ وذكر نحوه، ثم قال: يعني أن الأولى من الفتن لا تؤثر في أديان الناس لخفّتها، والتي بعدها كهيئة حجارة قد أُحميت بالنار فكانت رضفًا، فهي أبلغ في أديانهم، وأثلم لأبدانهم.وأخرجه بشطريه ضمن قصة طويلة في زمن فتنة مقتل عثمان رضي الله عنه: ابن عساكر في "تاريخ دمشق" - 39/ 478 - 479 من طريق جرير بن حازم، عن الصلت بن بهرام، عن زيد بن وهب، وذكر القصة. وإسناده صحيح. وسيأتي نحوه برقم (8833) من طريق عمران الخياط عن زيد بن وهب.
[2] خبر صحيح، محمد بن إبراهيم بن أورمة - وإن كان لا يُعرف - لم ينفرد به، وقد سلف الشطر الثاني بهذا الإسناد عند المصنف برقم (8538).وأخرج أوله أبو نعيم في الحلية 1/ 273 من طريق قتيبة بن سعيد، عن جرير بن عبد الحميد، عن الأعمش، بهذا الإسناد عن حذيفة بلفظ: أتتكم الفتن ترمي بالنَّشف، ثم أتتكم ترمي بالرضف، ثم أتتكم سوداء مظلمة. وإسناده صحيح. والنَّشَف، كما قال ابن الأثير في "النهاية": حجارة سود كأنها أُحرقت بالنار، وإذا تُركت على رأس الماء طَفَت ولم تغص فيه … ومنه حديث حذيفة؛ وذكر نحوه، ثم قال: يعني أن الأولى من الفتن لا تؤثر في أديان الناس لخفّتها، والتي بعدها كهيئة حجارة قد أُحميت بالنار فكانت رضفًا، فهي أبلغ في أديانهم، وأثلم لأبدانهم.وأخرجه بشطريه ضمن قصة طويلة في زمن فتنة مقتل عثمان رضي الله عنه: ابن عساكر في "تاريخ دمشق" - 39/ 478 - 479 من طريق جرير بن حازم، عن الصلت بن بهرام، عن زيد بن وهب، وذكر القصة. وإسناده صحيح. وسيأتي نحوه برقم (8833) من طريق عمران الخياط عن زيد بن وهب.
8642 - أخبرنا أحمد بن سلمان الفقيه، حدثنا هلال بن العلاء الرَّقِّي، حدثنا عمرو بن عثمان الكلابي، حدثنا عبيد الله [1] بن عمرو، حدثنا مَعمَر، عن الزُّهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تكون فتنةٌ يقتتلون عليها على دعوى جاهليةٍ، قتلاها في النار" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “এমন এক ফিতনা দেখা দেবে, যেখানে তারা জাহিলী (মূর্খতা যুগের) দাবির ভিত্তিতে পরস্পরের সাথে যুদ্ধ করবে। তাদের (সেই যুদ্ধের) নিহতরা জাহান্নামে যাবে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، مكبَّرًا. وعبيد الله بن عمرو هذا: هو الرقِّي.
[2] إسناده ضعيف بمرّةٍ من أجل عمرو بن عثمان الكلابي، ولم نقف على هذا الحديث عند غير المصنف.
8643 - أخبرني محمد بن علي الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن خُثَيم، عن نافع بن سَرجِس، عن أبي هريرة قال: أيها الناسُ، أظلَّتكُم فتنةٌ كقِطَع الليل المظلم، أنجى [1] الناس فيها - أو قال: منها - صاحب شاءٍ يأكل من رسل غنيه، أو رجلٌ وراءَ الدَّرْب آخذٌ بعنان فرسه يأكلُ من سيفه [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: হে লোকসকল! অন্ধকার রাতের টুকরোগুলির মতো এক ফিতনা তোমাদের ঢেকে ফেলেছে। এই ফিতনায় সবচেয়ে বেশি নিরাপদ থাকবে—অথবা তিনি বললেন: তা থেকে সবচেয়ে বেশি নিরাপদ থাকবে—ঐ ছাগলের মালিক, যে তার ছাগল পালের দুধের ফলন খাবে, অথবা এমন ব্যক্তি, যে লোকালয় থেকে দূরে তার ঘোড়ার লাগাম ধরে থাকবে এবং স্বাবলম্বী হয়ে জীবন যাপন করবে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: إنما، وهو تحريف.
[2] حديث صحيح، وهذا إسناد حسن. وهو مكرر (8536).
8644 - أخبرني الحسين بن علي بن محمد بن يحيى التَّميمي، أخبرنا أبو محمد الحسن بن إبراهيم بن حَيدَر الحِميَري [1] بالكوفة، حدثنا القاسم بن خليفة، حدثنا أبو يحيى عبد الحميد بن عبد الرحمن الحِماني، حدثنا عمر بن عبيد الله العَدَوي، عن معاوية بن قُرَّة، عن أبي الصِّدِّيق الناجي، عن أبي سعيد الخُدري قال: قال نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم: "يَنزِل بأُمَّتي في آخر الزمان بلاءٌ شديدٌ من سلطانهم، لم يُسمَعْ بلاءُ أَشدُّ منه، حتى تضيقَ عنهم الأرضُ الرَّحْبةُ، وحتى تُملأ الأرضُ جَوْرًا وظلمًا، لا يجدُ المؤمنُ مَلجأً يلتجئ إليه من الظُّلم، فيَبعَثُ الله عز وجل رجلًا من عِترتي، فيملأُ الأرضَ قِسطًا وعَدلًا كما مُلتَت ظُلمًا، وجورًا، يرضى عنه ساكنُ السماء وساكنُ الأرض، لا تَدَّخِرُ الأرضُ من بَدْرِها شيئًا إلَّا أخرجته، ولا السماء من قَطرِها شيئًا إلَّا صبَّه الله عليهم مدرارًا، يعيش فيهم سبعَ سنين أو ثمان أو تِسعَ، تتمنَّى الأحياءُ الأمواتَ مما صَنَعَ اللهُ عز وجل بأهل الأرض من خيره" [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আখেরি যমানায় আমার উম্মতের ওপর তাদের শাসকদের পক্ষ থেকে কঠোর বিপদ আপতিত হবে, এমন কঠিন বিপদ যার চেয়ে কঠিন কোনো বিপদ শোনা যায়নি। এমনকি প্রশস্ত পৃথিবীও তাদের জন্য সংকীর্ণ হয়ে আসবে এবং পৃথিবী ভরে যাবে যুলুম ও অত্যাচারে। মুমিন ব্যক্তি যুলুম থেকে বাঁচার জন্য কোনো আশ্রয়স্থল খুঁজে পাবে না। তখন আল্লাহ্ তা‘আলা আমার বংশধরদের মধ্য থেকে একজন ব্যক্তিকে পাঠাবেন। অতঃপর তিনি পৃথিবীকে ন্যায় ও ইনসাফ দ্বারা পূর্ণ করে দেবেন, যেমন তা যুলুম ও অত্যাচারে পূর্ণ হয়েছিল। আসমান ও যমিনের অধিবাসীরা তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট থাকবে। যমীন তার ভেতরের কোনো সম্পদ লুকিয়ে রাখবে না, বরং সব বের করে দেবে। আর আসমান তার বর্ষণের কোনো কিছু ধরে রাখবে না, বরং আল্লাহ্ তাদের ওপর মুষলধারে বৃষ্টি বর্ষণ করবেন। তিনি তাদের মাঝে সাত বছর, অথবা আট বছর, অথবা নয় বছর অবস্থান করবেন। আল্লাহ্ তা‘আলা পৃথিবীর অধিবাসীদের যে কল্যাণ দান করবেন, তার কারণে জীবিতরা মৃতদের জীবন কামনা করবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (م): إبراهيم بن عبد الحميدي.
[2] إسناده مظلم كما قال الذهبي في "تلخيصه"، الحسن بن إبراهيم الحميري لم نقف له على ترجمة، والقاسم بن خليفة ذكره ابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" 7/ 109 ونقل عن الحافظ علي بن الحسين بن الجنيد أنه قال: كتبت عنه وكان شيعيًّا. وعمر بن عبد الله العدوي وهو عمر بن عبيد الله بن عبد الله بن عمر - روى عنه غير واحد ولم يؤثر توثيقه عن غير ابن حبان، فهو والقاسم بن خليفة في حالهما جهالة.وهذا الحديث بهذا الإسناد لم نقف عليه عند غير المصنف، وهو مشتهر بهذا السياق من رواية أبي هارون العبدي عن معاوية بن قرّة، رواه عنه معمر في "جامعه" برواية عبد الرزاق (20770)، ومن طريقه أخرجه العقيلي في "الضعفاء" (1811)، وأبو الطيب الحوراني في "جزئه" (41)، وأبو أحمد الحاكم في "فوائده" (82)، وأبو محمد البغوي في "شرح السنة" (4280). وأبو هارون العبدي: هو عُمارة بن جُوَين، وهو متروك الحديث، وكذَّبه بعضهم.وستأتي قطع منه عند المصنف من غير وجه عن أبي الصديق الناجي - واسمه بكر بن عمرو - بالأرقام (8882) و (8886) و (8887) و (8888)، وانظر (8883).
8645 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرُو، حدثنا سعيد بن مسعود، أخبرنا يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الملك بن قُدامة الجُمحي، عن إسحاق بن بكر أبي [1] الفُرَات، عن سعيد بن أبي سعيد المقبُري، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تأتي على الناس سنواتٌ خدَّاعاتٌ [2]، يُصدَّق فيها الكاذبُ ويُكذَّبُ فيها الصادقُ، ويُؤتَمَنُ فيها الخائنُ ويُخوَّنُ فيها الأمين، ويَنطِقُ فيهم الرُّوَيْبِضةُ" قيل: يا رسول الله، وما الرُّويبضة؟ قال: "الرجلُ التافه يتكلَّم في أمرِ العامَّة" [3].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষের উপর এমন প্রতারণামূলক বছরসমূহ আসবে, যখন মিথ্যাবাদীকে বিশ্বাস করা হবে আর সত্যবাদীকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করা হবে, আর খিয়ানতকারীকে আমানতদার মনে করা হবে আর আমানতদারকে খিয়ানতকারী মনে করা হবে, এবং তাদের মাঝে 'রুওয়াইবিদাহ' কথা বলবে।" জিজ্ঞাসা করা হলো, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! 'রুওয়াইবিদাহ' কী?" তিনি বললেন: "সাধারণ বিষয়ে তুচ্ছ ও নগণ্য ব্যক্তি কথা বলবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف لفظ "أبي" في النسخ الخطية إلى: بن، فبكرٌ هو أبو الفرات كما وقع في ترجمة إسحاق من "تهذيب الكمال" وفروعه.
[2] تحرّف في النسخ الخطية إلى: جدعان، والتصويب من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج.
8645 [3] - حديث حسن، وهذا إسناد ضعيف لضعف عبد الملك بن قدامة وجهالة إسحاق بن أبي الفرات.وأخرجه أحمد 13/ (7912) عن يزيد بن هارون بهذا الإسناد.وأخرجه ابن ماجه (4036) عن أبي بكر بن أبي شيبة، عن يزيد بن هارون به - إلا أنه قال فيه: إسحاق بن أبي الفرات عن المقبري عن أبي هريرة، فأسقط أحد المقبريَّين منه ..وسيأتي عند المصنف برقم (8776) من طريق حجاج بن محمد عن عبد الملك بن قدامة.وأخرجه أحمد 14 / (8459) من طريق فليح بن سليمان، عن سعيد بن عبيد بن السباق، عن أبي هريرة. وفليح حسن الحديث في المتابعات والشواهد.ويشهد له حديث أنس بن مالك عند أحمد 21 / (13289) و (13299). وهو حديث حسن.وآخر من حديث عوف بن مالك الأشجعي عند البزار (2740)، والطحاوي في "مشكل الآثار" (464)، والطبراني في "الكبير" 18/ (123 - 125) و"مسند الشاميين" (47). وإسناده محتمل للتحسين.
8646 - أخبرنا الحسن بن حَليم [1] المروزي، حدثنا أبو نصر أحمد بن إبراهيم السَّدَوَّري، حدثنا سعيد بن هُبيرة، حدثنا حمّاد بن سَلَمة، أخبرنا أيوب، عن أبي قِلابة، عن يزيد بن عَمِيرة، عن معاذ بن جبل قال: تكون فتنةٌ يكثرُ فيها المالُ، ويُفتَح فيها القرآنُ حتى يقرأَه المؤمن والمنافق، والصغيرُ والكبير، والمرأةُ، يقرؤُه الرجلُ سرًا فلا يُتَّبَعُ عليها، فيقول: والله لأقرأَنَّه علانيَةً، ثم يقرؤُه علانيةً فلا يُتَّبَعُ عليها، فيتَّخِذُ مسجدًا ويبتدعُ كلامًا ليس في كتاب الله ولا من سنّة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإيَّاكم وإيَّاه، فإِنَّ كُلَّ مَا ابْتَدَعَ ضلالةٌ قالَها.قال: ولما مَرِضَ معاذُ بن جبل مَرَضَه الذي قُبِضَ فيه، كان يُغشَى عليه أحيانًا ويُفيق أحيانًا، حتى غُشِيَ عليه غَشْيةً ظننَّا أنه قد قُبِضَ، ثم أفاق وأنا مُقابله أبكي، فقال: ما يبكيك؟ قلت: والله لا أبكي على دنيا كنت أنالُها منك، ولا على نسبٍ بيني وبينك، ولكن أبكي على العِلْم والحِلْم الذي أسمعُ منك يذهبُ، قال: فلا تبكِ، فإنَّ العلم والإيمان مكانَهما، من ابتغاهما وَجَدَهما، فابتَغِهِ حيث ابتغاهُ إبراهيم عليه السلام، فإنه سأل الله وهو لا يعلمُ - وتلا: {إِنِّي ذَاهِبٌ إِلَى رَبِّي سَيَهْدِينِ} [الصافات: 99]- وابْتَغِهِ بعدي عند أربعة نفرٍ، وإن لم تَجِده عند واحدٍ منهم فسائرُ الناس أَعْيا به؛ عبدُ الله بن مسعود وعبدُ الله بن سَلَام وسلمانُ وعُويمرٌ أبو الدرداء.وإيّاكَ وزَيْغةَ الحكيم وحُكم المنافق، قال: قلت: وكيف لي أن أعلم زيغةَ الحكيم وحُكمَ المنافق؟ قال: كلمةُ ضلالةٍ يُلقيها الشيطانُ على لسان الرجل، فلا تَحْمِلْها ولا تَتَأمَّل منه، فإنَّ المنافق قد يقول الحقَّ، فخُذِ العِلمَ أَنَّى جَاءَك، فإنَّ على الحقِّ نورًا، وإيّاكَ ومُعضلاتِ الأمور [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
এমন এক ফিতনা দেখা দেবে যখন সম্পদ প্রাচুর্য লাভ করবে। আর কুরআন ব্যাপকভাবে উন্মুক্ত হবে, ফলে মু'মিন, মুনাফিক, ছোট, বড় এবং নারী—সবাই তা পাঠ করবে। একজন লোক গোপনে কুরআন তেলাওয়াত করবে, কিন্তু তাতে কেউ তাকে অনুসরণ করবে না। তখন সে বলবে: আল্লাহর কসম! আমি প্রকাশ্যেই তা তেলাওয়াত করব। এরপর সে প্রকাশ্যে তেলাওয়াত করবে, তবুও তাতে কেউ তাকে অনুসরণ করবে না। অতঃপর সে একটি মসজিদ তৈরি করবে এবং এমন নতুন কথা উদ্ভাবন করবে যা আল্লাহর কিতাবে বা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাতের অন্তর্ভুক্ত নয়। সুতরাং তোমরা তাকে এবং তার (উদ্ভাবিত বিষয়) থেকে সাবধান থেকো। কারণ তার উদ্ভাবিত প্রতিটি বিষয়ই হলো ভ্রষ্টতা।
[বর্ণনাকারী] বলেন: মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁর মৃত্যুশয্যায় শায়িত, তখন মাঝে মাঝে তিনি জ্ঞান হারাতেন এবং মাঝে মাঝে জ্ঞান ফিরে পেতেন। একসময় তিনি এমনভাবে জ্ঞান হারালেন যে আমরা মনে করলাম তিনি মারা গেছেন। এরপর তিনি জ্ঞান ফিরে পেলেন। আমি তার সামনে বসে কাঁদছিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কাঁদছ কেন? আমি বললাম: আল্লাহর শপথ! আমি আপনার কাছ থেকে প্রাপ্ত দুনিয়াবী কোনো কিছুর জন্য কাঁদছি না, অথবা আমাদের মাঝে থাকা আত্মীয়তার কারণেও কাঁদছি না। বরং আমি কাঁদছি আপনার কাছ থেকে শোনা জ্ঞান ও ধৈর্যের জন্য, যা চলে যাচ্ছে। তিনি বললেন: কেঁদো না। জ্ঞান ও ঈমান স্বস্থানেই থাকবে। যে ব্যক্তি এ দুটি অন্বেষণ করবে, সে তা খুঁজে পাবে। তুমি সেই জ্ঞান অন্বেষণ করো যেখানে ইবরাহীম (আঃ) অন্বেষণ করেছিলেন। কেননা তিনি আল্লাহর কাছে চেয়েছিলেন যখন তিনি জানতেন না। এরপর তিনি তেলাওয়াত করলেন: "নিশ্চয়ই আমি আমার রবের দিকে যাচ্ছি, তিনিই আমাকে পথ দেখাবেন।" (সূরা সাফফাত: ৯৯)।
আমার পরে তুমি চারজনের কাছে তা অন্বেষণ করো। যদি তাদের একজনের কাছেও তা না পাও, তবে অন্যান্য লোকেরা তো তা থেকে বঞ্চিতই থাকবে। তারা হলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উওয়াইমির আবুল দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তুমি জ্ঞানী ব্যক্তির পদস্খলন এবং মুনাফিকের সিদ্ধান্ত থেকে সাবধান থেকো। [বর্ণনাকারী] বলেন: আমি বললাম: আমি কীভাবে জ্ঞানী ব্যক্তির পদস্খলন এবং মুনাফিকের সিদ্ধান্ত সম্পর্কে জানব? তিনি বললেন: শয়তান একজন ব্যক্তির জিহ্বায় যে ভ্রান্তিমূলক কথা ফেলে দেয়, তুমি তা গ্রহণ করো না এবং তার (মানুষটির) ওপর মনোযোগ দিও না। কেননা মুনাফিকও সত্য কথা বলতে পারে। তাই তোমার কাছে জ্ঞান যেখান থেকেই আসুক, তুমি তা গ্রহণ করো, কেননা সত্যের ওপর জ্যোতি রয়েছে। আর তুমি কঠিন বিষয়াবলী (মু'দিলত) থেকে দূরে থেকো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: حكيم.
[2] خبر صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل سعيد بن هبيرة، فقد قال فيه أبو حاتم الرازي: ليس بالقوي، واتهمه ابن حبان في "المجروحين"، لكن لم ينفرد به.فقد تابعه أسد بن موسى عند ابن وضاح في "البدع والنهي عنها" (63)، وأحمد بن يحيى بن حميد الطويل عند الطبراني في "الكبير" 20/ (227)، كلاهما عن حماد بن سلمة، بهذا الإسناد.وكلاهما رواه مختصرًا دون قصة مرض معاذ. وقد سلف بطوله بنحوه عند المصنف برقم (8628) من حديث الزهري عن أبي إدريس الخولاني عن يزيد بن عميرة، وإسناده صحيح. لكن ليس فيه قصة وصاة معاذ بالأربعة النفر المذكورين، وقد سلفت هذه القصة عنده برقم (338) و (5264) من حديث ربيعة بن يزيد عن أبي إدريس عن يزيد بن عميرة، وإسنادها صحيح أيضًا.
8647 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أبو جعفر محمد بن عوف [1] ابن سفيان الطائي بحِمص، حدثنا أبو المغيرة عبد القُدُّوس بن الحجَّاج، حدثنا عبد الله بن سالم الحمصي، عن العلاء بن عُتْبة اليَحصُبي، عن عُمير بن هانئ العنسي قال: سمعت عبد الله بن عمر يقول: كنّا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الفتن وأكثرَ في ذكرها، حتى ذكر فتنة الأحلاس، فقال قائل: وما فتنةُ الأحلاس؟ قال: "هي فتنةُ هَرَبٍ وحَرَبٍ، ثم فتنةُ السَّرَّى - أو السَّرَّاء - ثم يصطلحُ الناسُ على رجلٍ كوَرِكٍ على ضِلَع، ثم فتنةُ الدَّهماء، لا تدعُ [أحدًا] من هذه الأُمَّة إِلَّا لَطَمَتْه لَطْمَةً، فإذا قيل: انقطعت تمادَتْ، يصبحُ الرجلُ فيها مؤمنًا ويُمسي كافرًا، حتى يصير الناسُ إلى فُسطاطين: فُسطاطٍ إيمان لا نفاق فيه، وفُسطاط نفاقٍ لا إيمانَ فيه، فإذا كان ذاكم فانتظروا الدَّجّال من اليوم أو غدٍ" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম। তিনি ফিতনাসমূহের আলোচনা করলেন এবং এর আলোচনায় দীর্ঘ সময় ব্যয় করলেন, এমনকি তিনি 'ফিতনাতুল আহলাস' (জীর্ণবস্ত্রের ফিতনা)-এর কথা উল্লেখ করলেন। তখন একজন জিজ্ঞেস করল: 'ফিতনাতুল আহলাস' কী? তিনি বললেন: "এটি হলো পলায়ন ও যুদ্ধ-বিগ্রহের ফিতনা। এরপর 'ফিতনাতুস সাররা'—অথবা তিনি 'আস-সাররা' (স্বচ্ছলতার ফিতনা) বললেন—, তারপর লোকেরা এক ব্যক্তির ওপর ঐকমত্যে পৌঁছাবে, যে এমন হবে যেমন পাঁজরের ওপর নিতম্ব (অর্থাৎ দুর্বল ও অসামঞ্জস্যপূর্ণ নেতৃত্ব)। তারপর 'ফিতনাতুদ দাহমা' (অন্ধকারের ফিতনা) আসবে। এই উম্মতের এমন কোনো ব্যক্তিকে সে ছাড়বে না, যাকে সে চপেটাঘাত করবে না। যখন বলা হবে যে এটি শেষ হয়েছে, তখন তা আরও দীর্ঘায়িত হতে থাকবে। এতে লোকেরা সকালবেলা মুমিন অবস্থায় থাকবে এবং সন্ধ্যাবেলা কাফির হয়ে যাবে। অবশেষে লোকেরা দু'টি শিবিরে বিভক্ত হবে: একটি হলো ঈমানের শিবির, যাতে কোনো মুনাফিকি নেই; এবং আরেকটি হলো মুনাফিকির শিবির, যাতে কোনো ঈমান নেই। যখন এমন হবে, তখন আজ বা কালকের মধ্যে তোমরা দাজ্জালের অপেক্ষা করো।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عون. لدوامها وطول لُبثها، يقال للرجل إذا كان يلزم بيته لا يبرح منه: هو حِلْس بيته، لأنَّ الحِلس يُفتَرش فيبقى على المكان ما دام لا يُرفع. وقد يحتمل أن تكون هذه الفتنة إنما شبهت بالأحلاس لسواد لونها وظلمتها.والحَرَب: ذهاب المال والأهل، يقال: حُرِب الرجل فهو حَريب، إذا سُلب أهله وماله.وقوله: "كوَرِك على ضِلَع" مَثَل، ومعناه: الأمر الذي لا يثبت ولا يستقيم، وذلك أنَّ الضلع لا يقوم بالورك ولا يحمله … يريد: أنَّ هذا الرجل غير خليق للمُلْك ولا مستقلٍّ، به انتهى.والمراد بالهَرَب - كما في "مرقاة المفاتيح" - أن يفرَّ بعضهم من بعض لما بينهم من العداوة والمحاربة.وفتنة السَّرَّاء، المراد بالسرّاء: النَّعماء التي تسرُّ الناس من الصحة والرخاء والعافية من البلاء والوباء، وأُضيفت الفتنة إلى السراء لأنَّ السبب في وقوعها ارتكاب المعاصي بسبب كثرة التنعّم.وفتنة الدهماء: الفتنة العظماء والطامَّة العمياء.
[2] رجاله ثقات غير العلاء بن عتبة، فهو صالح الحديث، وقد خولف في وصل هذا الحديث كما سيأتي.وأخرجه أحمد 10/ (6168)، وأبو داود (4242) من طريق أبي المغيرة عبد القدوس بن الحجاج، بهذا الإسناد.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (93) عن الوليد بن مسلم، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن عمير بن هانئ، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرسلًا. وابن جابر هذا من حفاظ الشام وثقاتهم.وقال أبو حاتم الرازي كما في "علل الحديث" لابنه: (2757): والحديث عندي فليس بصحيح كأنه موضوع!قال الخطابي في "معالم السنن" 4/ 337: قوله: "فتنة الأحلاس" إنما أُضيفت الفتنة إلى الأحلاس لدوامها وطول لُبثها، يقال للرجل إذا كان يلزم بيته لا يبرح منه: هو حِلْس بيته، لأنَّ الحِلس يُفتَرش فيبقى على المكان ما دام لا يُرفع. وقد يحتمل أن تكون هذه الفتنة إنما شبهت بالأحلاس لسواد لونها وظلمتها.والحَرَب: ذهاب المال والأهل، يقال: حُرِب الرجل فهو حَريب، إذا سُلب أهله وماله.وقوله: "كوَرِك على ضِلَع" مَثَل، ومعناه: الأمر الذي لا يثبت ولا يستقيم، وذلك أنَّ الضلع لا يقوم بالورك ولا يحمله … يريد: أنَّ هذا الرجل غير خليق للمُلْك ولا مستقلٍّ، به انتهى.والمراد بالهَرَب - كما في "مرقاة المفاتيح" - أن يفرَّ بعضهم من بعض لما بينهم من العداوة والمحاربة.وفتنة السَّرَّاء، المراد بالسرّاء: النَّعماء التي تسرُّ الناس من الصحة والرخاء والعافية من البلاء والوباء، وأُضيفت الفتنة إلى السراء لأنَّ السبب في وقوعها ارتكاب المعاصي بسبب كثرة التنعّم.وفتنة الدهماء: الفتنة العظماء والطامَّة العمياء.
8648 - أخبرنا أحمد بن جعفر [1] القطيعي، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا وكيع، حدثنا القاسم بن الفضل الحُدَّاني، عن أبي نَضْرة العَبْدي، عن أبي سعيد الخُدْري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "والذي نفسي بيده، لا تقومُ الساعةُ حتى تكلِّمَ السِّباعُ الإنسان، وحتى تكلِّمَ الرجلَ عَذَبةٌ سَوطِه وشِرَاكُ نعله، وتخبرَه بما أحدَثَ أهلُه من بعده" [2]. هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার জীবন, ততক্ষণ পর্যন্ত কিয়ামত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না হিংস্র জন্তুরা মানুষের সাথে কথা বলবে, এবং যতক্ষণ না মানুষের সাথে কথা বলবে তার চাবুকের অগ্রভাগ ও তার জুতোর ফিতা, আর তার অনুপস্থিতিতে তার পরিবার-পরিজন কী ঘটিয়েছে, সে সম্পর্কে তাকে অবহিত করবে।”
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في (ك) و (م) إلى: حفص. سعيد الخدري. وشهر فيه مقال إلّا أنه قد توبع في هذا الحديث، ومن دونه ثقات.وقد اشتبه شعبة في رواية القاسم بن الفضل هذا الحديث وأنه من روايته عن شهر بن حوشب، فقد روى العقيلي في "الضعفاء" (1479) بإسناده عن مسلم بن إبراهيم الفراهيدي قال: كنت عند القاسم بن الفضل، فأتاه شعبة فسأله عن حديث أبي نضرة عن أبي سعيد عن النبي صلى الله عليه وسلم: "بينا راعٍ يسوق غنمه إذ عدا الذئب على شاة"، فحدّثه، قال: فقال له شعبة: لعلك سمعته من شهر بن حوشب؟ قال: لا، حدثناه أبو نضرة عن أبي سعيد قال: لا، لعلك سمعته من شهر بن حوشب؟ قال: لا، حدثناه أبو نضرة عن أبي سعيد، قال: فما سكت حتى سكت شعبة. قلنا: إصرار القاسم - وهو صدوق من ثقات الناس - على ما حدَّث، دليل على ثبوت هذا الحديث لأبي نضرة عن أبي سعيد، والله تعالى أعلم.وقد روى شهر هذا الحديث بشطريه مرة أخرى عن أبي هريرة فيما أخرجه أحمد 13 / (8063) وغيره، وهذا من اضطراب شهر وسوء حفظه.
[2] إسناده صحيح. أبو نضرة العبدي: هو المنذر بن مالك بن قطعة.وأخرجه الترمذي (2181) عن سفيان بن وكيع، عن أبيه، بهذا الإسناد. وقال: حديث حسن صحيح.وأخرجه أحمد 18 / (11792) عن يزيد بن هارون، وابن حبان (6494) من طريق هُدبة بن خالد، كلاهما عن القاسم بن الفضل، به - وزاد فيه هدبة بين القاسم وأبي نضرة سعيدًا الجريريَّ، وهي زيادة شاذَّة. وفي هذين المصدرين في أول الحديث قصة الراعي والذئب الآتية عند المصنف برقم (8650) من طريق وكيع أيضًا.وأخرجهما أحمد (11841) من طريق عبد الله بن أبي حسين، عن شهر بن حوشب، عن أبي سعيد الخدري. وشهر فيه مقال إلّا أنه قد توبع في هذا الحديث، ومن دونه ثقات.وقد اشتبه شعبة في رواية القاسم بن الفضل هذا الحديث وأنه من روايته عن شهر بن حوشب، فقد روى العقيلي في "الضعفاء" (1479) بإسناده عن مسلم بن إبراهيم الفراهيدي قال: كنت عند القاسم بن الفضل، فأتاه شعبة فسأله عن حديث أبي نضرة عن أبي سعيد عن النبي صلى الله عليه وسلم: "بينا راعٍ يسوق غنمه إذ عدا الذئب على شاة"، فحدّثه، قال: فقال له شعبة: لعلك سمعته من شهر بن حوشب؟ قال: لا، حدثناه أبو نضرة عن أبي سعيد قال: لا، لعلك سمعته من شهر بن حوشب؟ قال: لا، حدثناه أبو نضرة عن أبي سعيد، قال: فما سكت حتى سكت شعبة. قلنا: إصرار القاسم - وهو صدوق من ثقات الناس - على ما حدَّث، دليل على ثبوت هذا الحديث لأبي نضرة عن أبي سعيد، والله تعالى أعلم.وقد روى شهر هذا الحديث بشطريه مرة أخرى عن أبي هريرة فيما أخرجه أحمد 13 / (8063) وغيره، وهذا من اضطراب شهر وسوء حفظه.
8649 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُوزمة [1]، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن الأعمش، عن عُمارة بن عُمَير، عن أبي عمّار، عن حُذيفة قال: إذا أحبَّ أحدُكم أن يعلم أصابَته الفتنةُ أم لا، فلينظر، فإن كان رأى حلالًا [كان] [2] يراه حرامًا، فقد أصابته الفتنةُ، وإن كان يرى حرامًا كان يراه حلالًا، فقد أصابته [3].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের কেউ যদি জানতে চায় যে তাকে ফিতনা পেয়ে বসেছে কি না, তবে সে যেন লক্ষ্য করে দেখে। যদি সে এমন কোনো হালালকে হারাম মনে করে যা সে (পূর্বে) হালাল জ্ঞান করত, তবে নিশ্চয়ই তাকে ফিতনা পেয়ে বসেছে। আর যদি সে এমন কোনো হারামকে হালাল মনে করে যা সে (পূর্বে) হারাম জ্ঞান করত, তবে তাকেও ফিতনা পেয়ে বসেছে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ك): أرومة، والمثبت من (م) و (ب). وانظر التعليق عليه فيما سلف برقم (8499).
[2] زيادة من "تلخيص الذهبي".
8649 [3] - خبر صحيح، محمد بن إبراهيم بن أورمة - وإن كان لا يعرف - لم ينفرد به، ومن فوقه من الرواة لا بأس بهم. سفيان هو الثوري، وأبو عمار: هو عريب بن حميد الهمداني.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 88، ونعيم بن حماد في "الفتن" (130)، وأبو نعيم الأصبهاني في "الحلية" 1/ 272 - 273، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (26) من طرق عن الأعمش، بهذا الإسناد.
8650 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا وكيع، حدثنا القاسم بن الفَضل، حدثنا أبو نَضرة، عن أبي سعيد الخُدْري قال: بَيْنا راعٍ يرعى بالحَرَّة إِذ عَدَا الذئبُ على شاةٍ من الشِّياه، فحالَ [1] الراعي بين الذئب وبين الشاة، فأَقعَى الذئبُ على ذنبه فقال: يا عبد الله، تحول بيني وبينَ رزق ساقه الله إليَّ! فقال الرجل: يا عَجَباه، ذئبٌ يكلِّمُني بكلام الإنسان! فقال الذئب: ألا أخبرُك بأعجب مني؟ رسولُ الله بين الحَرَّتَين [2] يخبر الناس بأنباء ما قد سَبَقَ، فزَوَى الراعي شياهه إلى زاويةٍ من زوايا المدينة، ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الناس، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "صَدَقَ والذي نفسي بيده" [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাখাল হাররাহ (নামক প্রান্তরে) তার মেষ চরাচ্ছিল। এমন সময় একটি নেকড়ে মেষপাল থেকে একটি মেষের উপর আক্রমণ করল। তখন রাখাল নেকড়ে ও মেষটির মাঝে বাধা হয়ে দাঁড়ালো। নেকড়েটি তার লেজের উপর ভর করে বসে বলল: হে আল্লাহর বান্দা, তুমি আমার ও আমার সেই রিযিকের মাঝে বাধা দিচ্ছ, যা আল্লাহ আমার দিকে পাঠিয়েছেন! লোকটি বলল: কী আশ্চর্য! একটি নেকড়ে মানুষের ভাষায় আমার সাথে কথা বলছে! তখন নেকড়েটি বলল: আমি কি তোমাকে আমার চেয়েও আশ্চর্য জিনিসের খবর দেব না? আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাররাতাইন (দুই কালো পাথরের এলাকা) এর মধ্যখানে অবস্থান করছেন এবং তিনি মানুষকে অতীত ঘটনার সংবাদ দিচ্ছেন। অতঃপর রাখালটি তার মেষগুলোকে মদীনার এক কোণে নিয়ে গেল, এরপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে ঘটনাটি জানাল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকজনের কাছে বেরিয়ে আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে (নেকড়েটি) সত্য বলেছে। যার হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ!"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: فجاء، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو أوجه. وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 113 من طريق عوف بن أبي جميلة، عن محمد بن سيرين، به.
[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلي: الحرمين، والتصويب من "التلخيص". والحَرَّة: أرض ذات حجارة سُود كأنها أُحرقت بالنار، والمراد هنا بما بين الحرتين: المدينة، وهي مشهورة بحرارها، وأشهرها حرَّة واقم وحرَّة وَبَرة، وهما المقصودتان هنا. وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 113 من طريق عوف بن أبي جميلة، عن محمد بن سيرين، به.
8650 [3] - إسناده صحيح. وقد سلف تخريجه عند الحديث المتقدِّم برقم (8648).قوله: "فأقعى الذئب" أي: جلس على أليتيه وذنبه ونصب يديه. وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 113 من طريق عوف بن أبي جميلة، عن محمد بن سيرين، به.
8651 - أخبرني أبو عبد الله محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة حَرَسَها الله، حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن عَبَّاد، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين، عن عُقبة بن أَوْس، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: تقتتل فئتانِ على دَعْوى جاهلية عند خروج أميرٍ أو قبيلةٍ، فتظهر الطائفةُ التي تَظهَرُ وهي ذليلة، فيَرغَبُ فيها مَن يليها من عدوِّها، فتتقحَّمُ في النار [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন কোনো নেতা বা গোত্রের উত্থান ঘটবে, তখন দুটি দল জাহিলিয়াতের দাবির ভিত্তিতে পরস্পর লড়াই করবে। এরপর যে দলটি বিজয়ী হবে, তারা হবে লাঞ্ছিত ও দুর্বল। তখন তাদের শত্রুদের মধ্য থেকে যারা তাদের কাছাকাছি থাকবে, তারা তাদের (দুর্বলতার) প্রতি আকাঙ্ক্ষা করবে। ফলে তারা জাহান্নামের আগুনে ঝাঁপিয়ে পড়বে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أيوب: هو السَّختياني، وابن سيرين: هو محمد.وهو في "جامع معمر" برواية عبد الرزاق برقم (20766).وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1274)، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (491) من طريقين عن أيوب، بهذا الإسناد. وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 113 من طريق عوف بن أبي جميلة، عن محمد بن سيرين، به.
8652 - أخبرنا أبو بكر بن أبي نَصْر المذكِّر بمَرو، حدثنا أحمد بن محمد بن عيسى القاضي، حدثنا أبو نُعيم وأبو حُذيفة قالا: حدثنا سفيان، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن نُبيط بن شَريط، عن حُذيفة قال: تُعرَضُ فتنةٌ على القلوب، فأيُّ قلب أنكرَها، نُكِتَت في قلبه نُكتةٌ بيضاءُ، وأيُّ قلب لم يُنكرها، نُكِتَت في قلبه نكتةٌ سوداء، ثم تُعرَض فتنةٌ أخرى على القلوب، فإن أنكرها القلبُ الذي أنكرها في المرة الأولى، نُكِتَت نكتةٌ بيضاءُ، وإن لم يُنكرها، نُكِتَت نكتةٌ سوداءُ، ثم تُعرَض فتنةٌ أخرى على القلوب، فإن أنكرَها الذي أنكرها في المرتين الأُوليين، اشتدَّ وابيضَّ وصَفَا، ولم تضرَّه فتنة أبدًا، وإن لم يُنكرها في المرتين الأوليين [1]، اسودَّ واربَدَّ ونَكَسَ، فلا يعرفُ حقًّا، ولا يُنكر مُنكَرًا [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ফিতনাসমূহ অন্তরগুলোর সামনে পেশ করা হবে। যে অন্তর তা অস্বীকার (প্রত্যাখ্যান) করবে, তার মধ্যে একটি সাদা দাগ (বা চিহ্ন) গেঁথে দেওয়া হবে। আর যে অন্তর তা অস্বীকার করবে না, তার মধ্যে একটি কালো দাগ গেঁথে দেওয়া হবে। এরপর অন্য একটি ফিতনা অন্তরগুলোর সামনে পেশ করা হবে। যদি সেই অন্তর, যা প্রথমবারে তা অস্বীকার করেছিল, এবারও অস্বীকার করে, তবে আরেকটি সাদা দাগ গেঁথে দেওয়া হবে। আর যদি তা অস্বীকার না করে, তবে আরেকটি কালো দাগ গেঁথে দেওয়া হবে। এরপর তৃতীয় আরেকটি ফিতনা অন্তরগুলোর সামনে পেশ করা হবে। যদি সে, যে প্রথম দুইবারে তা অস্বীকার করেছিল, এবারও অস্বীকার করে, তবে তা দৃঢ়, সাদা ও স্বচ্ছ হয়ে যাবে এবং কোনো ফিতনা কখনো তার ক্ষতি করতে পারবে না। আর যদি সে প্রথম দুইবারে তা অস্বীকার না করে, তবে তা কালো, ধূসর এবং উল্টে যাওয়া অবস্থায় থাকবে। ফলে সে কোনো হক্বকে (সত্যকে) চিনতে পারবে না এবং কোনো মুনকারকে (অন্যায়কে) অস্বীকার করতে পারবে না।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] من قوله: "اشتدَّ وابيضَّ" إلى هنا سقط من (ك) و (م).
[2] حديث صحيح مرفوعًا، وهذا إسناد رجاله في الجملة ثقات إلّا أنَّ قوله فيه: "عن نبيط بن شريط" ذهول من بعض رواته، وقد يكون من المصنف نفسه، فإنَّ نبيط بن شريط صحابي صغير، ولا يعرف لسالم رواية عنه، إنما يروي عن آخرَ اسمه نبيط غير منسوب، ومهما يكن من أمر فإنَّ هذا الحديث محفوظ من حديث حذيفة مرفوعًا من غير هذا الوجه، وطريق سالم عن نبيط هذه لم نقف عليها عند غير المصنف.وأخرجه بنحوه أحمد 38 / (23280) و (23440)، ومسلم (144) من طريق رِبعي بن حراش، عن حذيفة مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم.اربدَّ: أي تغيّر إلى الرُّبْدة، وهي لون بين السواد والغُبرة، قال ابن الأثير في "النهاية": يريد اربدادَ القلب من حيث المعنى لا الصورة، فإنَّ لون القلب إلى السواد ما هو.
8653 - أخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد بن المسيَّب، حدثنا نُعيم بن حمّاد، حدثنا يحيى بن سعيد، حدثنا الوليد بن عيّاش أخو أبي بكر بن عيّاش، عن إبراهيم، عن عَلقمة قال: قال ابن مسعود: قال لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أحذِّرُكم سبع فتنٍ تكون بعدي: فتنةً تُقبِلُ من المدينة، وفتنةً بمكَّة، وفتنةً تُقبل من اليمن، وفتنةً تُقبل من الشام، وفتنةً تُقبل من المشرق، وفتنةً تُقبل من المغرب، وفتنةً من بطن الشام؛ وهي السُّفْياني". قال: فقال ابن مسعود: منكم مَن يُدرِك أولها، ومن هذه الأمَّة من يُدرِك آخرَها.قال الوليد بن عيَّاش: فكانت فتنةُ المدينة من قبل طلحة والزُّبير، وفتنةُ مكة فتنةُ عبد الله بن الزبير، وفتنةُ الشام من قِبَل بني أُميَّة، وفتنةُ المشرقِ من قِبَل هؤلاء [1].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের বললেন: “আমার পরে সাতটি ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে আমি তোমাদের সতর্ক করছি: এক ফিতনা আসবে মদীনা থেকে, এক ফিতনা মক্কায় হবে, এক ফিতনা ইয়েমেন থেকে আসবে, এক ফিতনা সিরিয়া (শাম) থেকে আসবে, এক ফিতনা পূর্ব দিক (মাশরিক) থেকে আসবে, এক ফিতনা পশ্চিম দিক (মাগরিব) থেকে আসবে এবং এক ফিতনা সিরিয়ার গভীর অভ্যন্তর থেকে আসবে, আর তা হলো সুফিয়ানী।” ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমাদের মধ্যে এমন লোকও থাকবে যারা এর প্রথমগুলো পাবে, আর এই উম্মতের মধ্যে এমন লোকও থাকবে যারা এর শেষগুলো পাবে। আল-ওয়ালীদ ইবনে আইয়াশ বলেন: মদীনার ফিতনা ছিল তালহা ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিক থেকে, মক্কার ফিতনা ছিল আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফিতনা, সিরিয়ার ফিতনা ছিল বনু উমাইয়ার পক্ষ থেকে, আর পূর্ব দিকের ফিতনা ছিল এদের পক্ষ থেকে।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث واهٍ، وهو من أوابد نُعيم كما قال الذهبي في "التلخيص". يحيى بن سعيد: هو العطار، وهو ضعيف، وشيخه الوليد بن عياش لم نقف له على ترجمة فنتبيَّن حاله، إبراهيم: هو ابن يزيد النخعي، وعلقمة: هو ابن قيس النخعي.وإسناد المصنف فيه وهمٌ ممَّن دون نعيم بن حماد، فالحديث في كتابه "الفتن" (87) عن يحيى بن سعيد العطار قال: حدثنا حجاج، رجلٌ منّا، عن الوليد بن عياش قال: قال عبد الله بن مسعود … فذكره. فبان بذلك علّته، فحجّاج هذا لا يعرف كالوليد بن عياش، وبين الوليد وابن مسعود إعضال، فالسند ساقط.
8654 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل، حدثني أبي، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا عِكْرمة بن عمَّار، عن حميد أبي عبد الله الفلسطيني، حدثني عبد العزيز ابن أَخي حُذيفة، عن حُذيفة قال: أولُ ما تَفقِدُون من دينكم الخشوعُ، وآخرُ ما تَفقِدون من دينكم الصلاةُ، ولَتُنقَضَنَّ عُرَى الإسلام عُروةً عُروةً، وليُصلِّيَنَّ النساء وهنَّ حُيَّض، ولتَسلُكُنَّ طريق من كان قبلكم حَذْوَ القُذَّة بالقُذَّة، وحذوَ النَّعل بالنَّعل، لا تُخطؤون [1] طريقهم ولا يُخطأُ بكم، حتى تبقى فرقتان من فرقٍ كثيرة، تقول إحداهما: ما بالُ الصلوات الخمس! لقد ضلَّ من كان قبلنا، إنما قال الله تبارك وتعالى: {وَأَقِمِ الصَّلَاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ اللَّيْلِ} [هود: 114]، لا يصلُّون إلَّا ثلاثًا، وتقول الأخرى: إنّا المؤمنون بالله كإيمان الملائكة، ما فينا كافرٌ ولا منافقٌ، حقٌّ على الله أن يَحشُرَهما مع الدَّجال [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের দ্বীন থেকে সর্বপ্রথম যা বিলুপ্ত হবে তা হলো খুশু (বিনয় ও একাগ্রতা), আর তোমাদের দ্বীন থেকে সবশেষে যা বিলুপ্ত হবে তা হলো সালাত (নামাজ)। আর ইসলামের বন্ধন একে একে ছিন্ন হতে থাকবে। আর মহিলারা ঋতুস্রাবকালীন অবস্থাতেও সালাত আদায় করবে। তোমরা তোমাদের পূর্ববর্তীদের পথ অবলম্বন করবে—যেমন একটি তীরের পালকের সাথে অন্য একটি পালক মাপমতো লাগানো হয়, এবং যেমন এক জুতার সাথে অন্য জুতার মাপ সমান হয়। তোমরা তাদের পথ থেকে ভুল করবে না এবং তোমাদেরও ভুল করানো হবে না। অবশেষে অসংখ্য দলের মধ্য থেকে দুটি দল অবশিষ্ট থাকবে। তাদের একটি দল বলবে: পাঁচ ওয়াক্ত সালাতের কী প্রয়োজন? আমাদের পূর্ববর্তীরা পথভ্রষ্ট হয়েছে। আল্লাহ তাআলা তো শুধু বলেছেন: "আর দিনের দুই প্রান্তে এবং রাতের কিছু অংশে সালাত প্রতিষ্ঠা করো।" (সূরা হুদ: ১১৪)। তারা মাত্র তিন ওয়াক্ত সালাত আদায় করবে। আর অপর দলটি বলবে: আমরা আল্লাহর প্রতি ফেরেশতাদের ঈমানের মতোই ঈমান রাখি। আমাদের মধ্যে কোনো কাফির বা মুনাফিক নেই। আল্লাহ্র জন্য আবশ্যক যে, তিনি এই দুটি দলকেই দাজ্জালের সাথে একত্রিত করবেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: لا تخطؤوا، على النهي، وهو خطأ.
[2] إسناده ضعيف لجهالة حميد أبي عبد الله الفلسطيني، وسمّى ابن حبان في "ثقاته" 6/ 191 راوي هذا الخبر عن عبد العزيز: حميد بن زياد اليمامي! وكذا عبد العزيز ابن أخي حذيفة - وبعضهم يقول: أخو حذيفة - لم يرو عنه غير اثنين مجهولين، وقال الذهبي في "الميزان": لا يعرف.وأخرجه ابن وضاح في "البدع والنهي عنها" (155)، والطبري في مسند ابن عباس من "تهذيب الآثار" 2/ 672، والدولابي في "الكنى والأسماء" (1420)، وابن بطة في "الإبانة" 2/ 109 من طرق عن عبد الرحمن بن مهدي، بهذا الإسناد - وهو عند بعضهم مختصر، ووقع في "الكنى" للدولابي تسمية أبي عبد الله الفلسطيني هذا بجُنيد.وأخرجه أبو بكر الخلال في "السنة" (1292)، وابن بطة 1/ 174 - 175 و 2/ 571 - 572 من طريق عبد الملك بن عمرو - وهو أبو عامر العقدي - عن عكرمة بن عمار، به.وأخرج أوله في أول وآخر ما تفقده هذه الأمة: ابن أبي شيبة 13/ 381، وأحمد في "الزهد" (1003)، وأبو نعيم في "الحلية" 1/ 281 من طريق وكيع عن عكرمة بن عمار، به. وانظر خبر ابن مسعود الآتي عند المصنف برقم (8749).وأخرجه بطوله أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (271) من طريق ليث بن أبي سليم، عن ابن حصين، عن أبي عبد الله الفلسطيني، قال: سمعت حذيفة بن اليمان يقول … وهذا إسناد ضعيف، ليث ضعيف سيئ الحفظ، وابن حصين هذا لم نعرفه.وأخرجه بنحوه الآجري في "الشريعة" (35) - ومن طريقه الداني (225) و (274) - من طريق هشام بن عمار، عن عبد الحميد بن حبيب، عن الأوزاعي، عن يونس بن يزيد، عن الزهري، عن الصُّنابحي، عن حذيفة. وظاهر هذا الإسناد الحُسْن، إلا أنه معلول، فقد رواه الداني (273) بإسناد قوي إلى موسى بن أعين عن الأوزاعي عن رجل من أهل الحجاز عن الصنابحي عن حذيفة ببعضه، وموسى بن أعين أوثق وأتقن من عبد الحميد بن حبيب، وقد بيّن في روايته أنَّ الواسطة بين الأوزاعي والصنابحي مبهمة لا تعرف.وانظر في انتقاض عرى الإسلام حديث أبي أمامة السالف برقم (7198).وانظر حديث أبي هريرة السالف برقم (107) في اتباع طريق الأمم السابقة. القُدَّة: واحدة القُذَذ، وهي ريش السَّهم.
8655 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا محمد بن غالب، حدثنا موسى بن إسماعيل، حدثنا هشام بن أبي عبد الله، عن قتادة، عن أبي الطُّفيل قال: انطلقتُ أنا وعمرُو بن صُلَيع إلى حذيفة بن اليَمَان وعنده سِماطانِ من الناس، فقلنا: يا حذيفةُ، أدركت ما لم نُدرك، وعَلِمتَ ما لم نعلم، وسمعت ما لم نسمع، فحدِّثنا بشيءٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، فقال: لو حدَّثتُكم بكل ما سمعتُ، ما انتظرتم بي الليل القريب، قال: قلنا: ليس عن هذا نسألك، ولكن حدِّثنا بأمرٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، قال: لو حدَّثتكم أنَّ أمَّ أحدكم تغزو في كتيبةٍ حتى تضرِبَ بالسيف ما صدَّقتموني، قلنا: ليس عن هذا نسألك، ولكن حدثنا بشيءٍ لعلَّ الله أن ينفعنا به، فقال حذيفة: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ هذا الحيَّ من مُضَرَ لا يزالُ بكلِّ عبدٍ صالح يقتلُه ويُهلكه ويُفنيه، حتى يُدرِكَهم الله بجنودٍ من عنده فتقتلهم، حتى لا يمنعَ ذَنَبَ تَلْعة".قال عمرو بن صُلَيع: واثُكلَ أُمِّه! ألهوت الناسَ إلَّا عن مضر، قال: ألستَ من مُحارِبِ خَصَفةَ؟ قال: بلى، قال: فإذا رأيت قيسًا قد توالتِ الشام، فخُذْ حذرك [1]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আবুত তুফাইল বলেন, আমি এবং আমর ইবনু সুলাই' হুযাইফা ইবনুল ইয়ামানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিকট গেলাম। তাঁর কাছে মানুষের দুটি সারি (বা দল) ছিল। আমরা বললাম: হে হুযাইফা! আপনি এমন বিষয়গুলো উপলব্ধি করেছেন যা আমরা করিনি, এমন জ্ঞান অর্জন করেছেন যা আমরা করিনি এবং এমন কিছু শুনেছেন যা আমরা শুনিনি। তাই আপনি আমাদের এমন কিছু বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তিনি (হুযাইফা) বললেন: আমি যদি তোমাদেরকে আমার শোনা সব কথা বলতাম, তবে তোমরা সামান্য রাত হওয়া পর্যন্তও আমার জন্য অপেক্ষা করতে না। আমরা বললাম: আমরা আপনাকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করছি না, বরং আপনি আমাদেরকে এমন একটি বিষয় বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তিনি বললেন: আমি যদি তোমাদেরকে বলি যে, তোমাদের কারও মা একটি সৈন্যদলের সাথে যুদ্ধ করবে এবং তরবারি চালাবে, তবুও তোমরা আমাকে বিশ্বাস করবে না। আমরা বললাম: আমরা আপনাকে এই বিষয়ে জিজ্ঞাসা করছি না, বরং আপনি আমাদের এমন কিছু বলুন যার দ্বারা আল্লাহ হয়তো আমাদের উপকৃত করবেন। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "মুদার গোত্রের এই দলটি প্রত্যেক নেককার বান্দাকে হত্যা, ধ্বংস ও বিনাশ করতে থাকবে, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁর পক্ষ থেকে একদল সৈন্যদল দ্বারা তাদের পাকড়াও করবেন। এরপর সেই সৈন্যদল তাদের এমনভাবে হত্যা করবে যে, উপত্যকার শেষ প্রান্তের লেজও আর সুরক্ষিত থাকবে না।" আমর ইবনু সুলাই' বললেন: হায়, তার মায়ের কী দুর্ভাগ্য! তিনি (হুযাইফা) কি মুদার ব্যতীত অন্য লোকদের ভুলে গেলেন? তিনি (হুযাইফা) বললেন: তুমি কি মুহারিব খাসাফাহ গোত্রের নও? তিনি বললেন: হ্যাঁ, অবশ্যই। তখন (হুযাইফা) বললেন: যখন তুমি দেখবে কায়েস গোত্র সিরিয়ার (শাসকীয়) দায়িত্বভার গ্রহণ করেছে, তখন সতর্ক হয়ে যেয়ো।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو الطفيل: هو عامر بن واثلة، وهو وعمرو بن صليع معدودان في صغار الصحابة.وأخرجه بنحوه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 26/ 85 - 86 من طريق محمد بن أبي عدي، عن هشام - وهو الدستوائي - بهذا الإسناد.وأخرج المرفوع منه أحمد 38 (23316) عن أبي داود الطيالسي، عن هشام، به.وأخرجه أحمد أيضًا (23435) من طريق هزيل بن شرحبيل، عن حذيفة.وسيأتي عند المصنف قريبًا برقم (8657) من طريق عمرو بن حنظلة عن حذيفة.السِّماطان من الناس: الجانبان.والمراد بالحي من مضر: قريش. وذَنَب التَّلعة: المراد به أسفل مَسِيل الماء. وهذا - كما قال السندي في حاشيته على "مسند أحمد" - وصفٌ لهم بالذل والضعف وقلّة المنعة، كأنه قال: حتى لا يملكوا أسفل وادٍ، فضلًا عن البلاد والحكم بين العباد.وقوله: "ألهوت الناس إلّا عن مضر" لم نتبين معناه.
8656 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُورمة، حدثنا الحسين بن حفص، حدثنا سفيان، عن سماك بن حَرْب، عن مالك بن ظالم قال: سمعت أبا هريرة يقول لمروان بن الحَكَم: أخبرني حِبِّي أبو القاسم الصادقُ المصدوقُ قال: "إِنَّ فسادَ أَمَّتي على يَدَي غِلْمَةٍ سفهاء من قُريش" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد [2]، ولم يُخرجاه.وقد شَهِدَ حذيفة بن اليمَان بصحَّة هذا الحديث:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মারওয়ান ইবনুল হাকামকে বলেন: আমার প্রিয়, আবুল কাসিম (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), যিনি সত্যবাদী এবং যার কথা সত্য বলে নিশ্চিত, তিনি আমাকে অবহিত করেছেন যে, "নিশ্চয়ই আমার উম্মতের বিপর্যয় (বা ক্ষতি) কুরাইশের কিছু নির্বোধ যুবকের হাতে ঘটবে।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين من أجل مالك بن ظالم، فهو - وإن لم يرو عنه غير سماك بن حرب - تابعي ذكره البخاري في "تاريخه" وابن أبي حاتم في "الجرح والتعديل" ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان في "الثقات" وخرج له في "صحيحه" هذا الحديث، وقد توبع عليه. وأما ابن أورمة فهو - وإن كان لا يعرف - لم ينفرد به من حديث سفيان الثوري.فقد أخرجه أحمد 13/ (7871) عن زيد بن الحباب، و (8033) عن عبد الرحمن بن مهدي، وابن حبان (6713) من طريق عصام بن يزيد، ثلاثتهم عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد - إلّا أنَّ عبد الرحمن بن مهدي سمَّى راويه عن أبي هريرة عبد الله بن ظالم، وهو وهمٌ.وسيأتي عند المصنف برقم (8819) من طريق يحيى بن سعيد القطان وعبد الرحمن بن مهدي عن سفيان.وسيأتي عنده أيضًا برقم (8818) من طريق شعبة عن سماك بن حرب.وأخرجه النسائي في الفتن من "السنن الكبرى" كما في "النكت الظراف على الأطراف" لابن حجر (14340)، وابن حبان في "ثقاته" 5/ 387 - 388 من طريق أبي عوانة اليشكري، عن سماك بن حرب، بهوأخرجه أحمد 14/ (8304)، والبخاري (3605) و (7058) من طريق سعيد بن عمرو بن سعيد بن العاص الأموي، وأحمد 16 / (10737) و (10927) من طريق يزيد بن شريك، وابن حبان (6712) من طريق أبي صالح السَّمّان، ثلاثتهم عن أبي هريرة. وسيأتي عند المصنف برقم (8686) من طريق عمار بن أبي عمار عن أبي هريرة.
[2] إلى هنا انتهى سقط الأوراق في نسخة (ز) الذي ابتدأ من الحديث رقم (8585).
8657 - حدَّثَناه أحمد بن كامل القاضي، حدثنا أبو قلابة الرَّقَاشي، حدثنا يحيى بن حمّاد، حدثنا أبو عوانة، عن الأعمش، عن عبد الرحمن بن ثَرْوانَ، عن عمرو بن حنظلة قال: لما قُتِلَ عثمانُ دخلنا على حُذيفة، فإذا القومُ عنده، فقال: والله لا تدعُ ظَلَمةُ مُضَرَ عبدًا الله مؤمنًا إلَّا قتلوه أو فتنوه، حتى يضربهم الله والمؤمنون حتى لا يمنعوا ذَنَبَ تَلْعةٍ، فقال رجل: أتقول هذا وأنت رجلٌ من مُضَر؟! قال: لا أقولُ إِلَّا ما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমর ইবনু হানযালা বলেন: যখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শহীদ করা হলো, তখন আমরা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। তাঁর কাছে তখন অনেক লোক ছিল। তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! মুদারের যালেম লোকেরা আল্লাহর কোনো মু'মিন বান্দাকে রেহাই দেবে না—তাদেরকে হত্যা করবে অথবা ফিতনায় (বিপথগামীতায়) ফেলে দেবে। যতক্ষণ না আল্লাহ এবং মু'মিনরা তাদেরকে এমনভাবে আঘাত করবে যে, তারা উপত্যকার শেষ প্রান্তেরও প্রতিরোধ করতে সক্ষম হবে না। তখন এক ব্যক্তি বলল: আপনি মুদার গোত্রের লোক হয়েও কি একথা বলছেন? তিনি (হুযাইফা) বললেন: আমি তো কেবল সেটাই বলছি যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন।
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد محتمل للتحسين، عمرو بن حنظلة تابعي لم يرو عنه غير عبد الرحمن بن ثروان، وذكره ابن حبان في "ثقاته"، وقد توبع فيما تقدَّم عند المصنف برقم (8655).أبو قلابة: هو عبد الملك بن محمد وأبو عوانة: هو الوضاح بن عبد الله اليشكري.وأخرجه أحمد 38/ (23349) عن عبد الله بن نمير، عن الأعمش، بهذا الإسناد.
8658 - أخبرني الحسن بن حليم [1] المروزي، حدثنا أبو المُوجِّه، أخبرنا عَبْدان، أخبرنا عبد الله، أخبرنا عوفٌ، عن أبي المنهال، عن أبي بَرْزَةَ الأسلمي قال: إِنَّ ذلك الذي بالشام - يعني مروان - واللهِ إِنْ يُقاتِلُ إلَّا على الدنيا، وإنَّ ذلك الذي بمكة - يعني ابن الزُّبير - واللهِ إِنْ يُقاتِلُ إِلَّا على الدنيا، وإنَّ الذين تَدْعُونَهم [2] قُراءَكم، واللهِ إِنْ يقاتلون إلَّا على الدنيا، فقال له أبى [3]: فما تأمرنا إذًا؟ قال: لا أرى خيرَ الناس إِلَّا عِصابةً مُلبِدةً - وقال بيده - خِماصَ البُطُونِ من أموال الناس، خِفافَ الظُّهور من دمائهم [4].
আবূ বারযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: "আল্লাহর কসম, শামের ওই ব্যক্তি—অর্থাৎ মারওয়ান—সে কেবল দুনিয়ার জন্যই যুদ্ধ করছে। আর মক্কার ওই ব্যক্তি—অর্থাৎ ইবনুয যুবাইর—আল্লাহর কসম, সেও কেবল দুনিয়ার জন্যই যুদ্ধ করছে। আর যাদের তোমরা তোমাদের কারী (জ্ঞানী/আলেম) বলে ডাকো, আল্লাহর কসম, তারাও কেবল দুনিয়ার জন্যই যুদ্ধ করছে।" তখন আমার পিতা তাঁকে বললেন: "তাহলে আপনি আমাদের কী করতে আদেশ করেন?" তিনি বললেন: "আমি তো সর্বোত্তম মানুষ হিসেবে এমন এক দলকে ছাড়া আর কাউকে দেখি না, যারা চুল এলোমেলো ও ধূলিধূসরিত করে রেখেছে — এবং তিনি (বর্ণনাকারী) নিজ হাত দ্বারা ইশারা করলেন— যারা মানুষের সম্পদ থেকে নিজেদের পেট খালি রেখেছে (অর্থাৎ অবৈধ সম্পদ গ্রহণ করেনি), এবং মানুষের রক্তপাত থেকে নিজেদের পিঠ হালকা রেখেছে (অর্থাৎ রক্তপাতের দায়মুক্ত রয়েছে)।"
تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في النسخ الخطية إلى: حكيم.
[2] في النسخ الخطية: وإنَّ الذي تدعونه، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الجادّة.
8658 [3] - هكذا في "التلخيص"، وهو الصواب كما وقع في رواية يعقوب بن سفيان عن عبدان عند البيهقي في "السنن" 8/ 193، وتحرَّف في النسخ الخطية إلى: ابن وزاد بعده في (ك): عمر!
8658 [4] - إسناده صحيح. أبو الموجه: هو محمد بن عمرو الفزاري، وعبدان: هو عبد الله بن عثمان المروزي، وعبد الله: هو ابن المبارك، وعوف: هو ابن أبي جميلة الأعرابي، وأبو المنهال: هو سيّار بن سلامة الرياحي.وأخرجه بزيادة في أوله البخاري (7112) من طريق أبي شهاب عبد ربه بن نافع الحنّاط، عن عوف الأعرابي، بهذا الإسناد دون قوله في آخره: فقال له أبي … إلخ.وأخرجه بنحوه أحمد 33 / (19805) من طريق سُكَين بن عبد العزيز، عن أبي المنهال، به.والعصابة الملبِدة، المراد: أنهم لصقوا بالأرض وأخملوا أنفسهم.وخماص البطون: أي فارغيها، وهي كناية عن عدم أكل أموال المسلمين بالباطل.