হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8699)


8699 - أخبرني محمد بن علي بن عبد الحميد الصَّنعاني بمكة حَرَسها الله تعالى، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن إسماعيل بن أُميَّة، عن سعيد، عن أبي هريرة، يَروِيه قال: "ويلٌ للعرب من شرٍّ قد اقتَرَب، على رأس السِّتين تصيرُ الأمانةُ غَنيمةً، والصدقةُ غَرامةً، والشهادةُ بالمعرِفة، والحُكْمُ بالهَوَى" [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه الزِّيادات.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ধ্বংস আরবদের জন্য সেই অনিষ্টের কারণে যা নিকটবর্তী হয়েছে। ষাট বছর পার হলে আমানত গণ্য হবে গনীমত হিসেবে, সাদকা হবে জরিমানা, সাক্ষ্য প্রদান করা হবে পরিচিতির ভিত্তিতে এবং বিচারকার্য হবে খেয়াল-খুশির ভিত্তিতে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] روي مرفوعًا وموقوفًا، والموقوف أشبه. إسحاق بن إبراهيم: هو ابن عبّاد الدَّبَري، وسعيد: هو ابن أبي سعيد المقبري.وهو في "جامع معمر" برواية إسحاق الدبري عن عبد الرزاق برقم (20777)، هكذا بلفظ "يرويه"، وهي من ألفاظ الرفع إلى النبي صلى الله عليه وسلم. وجعله من رواية رجل مبهم عن أبي هريرة، إلّا أنَّ معمرًا قال فيه: أراه سعيدًا.ورواه عن عبد الرزاق نعيمُ بنُ حماد في "الفتن" (1981)، فقال فيه: عن رجل عن أبي هريرة.ووقفه عليه ولم يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم.ورواه - كما في "علل الدارقطني" (2059) - محمد بن مصعب القرقساني وجعفر بن الحارث أبو الأشهب، عن إسماعيل بن أمية عن سعيد المقبري عن أبي هريرة؛ رفعه القرقساني ووقفه أبو الأشهب، قال الدارقطني: وهو - أي: الموقوف - أشبه بالصواب. قلنا: والقرقساني وأبو الأشهب كلاهما فيه مقال وفيهما لين.وأوله - وهو قوله: "ويل للعرب من شر قد اقترب". قد جاء عن أبي هريرة في غير هذا الحديث، انظر ما سلف عند المصنف برقم (372).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8700)


8700 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفّان العامري، حدثنا عمرو بن محمد العَنقَزي، حدثنا طلحة بن عمرو الحَضْرمي، عن عبد الله بن عُبيد بن عُمير اللَّيثي، عن أبي الطُّفيل، عن أبي سَرِيحة الأنصاري، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "يكون للدابَّةِ ثلاثُ خَرَجاتٍ من الدَّهر، تخرج أوّلَ خَرْجةٍ بأقصى اليمن، فيَفشُو ذِكرُها بالبادية، ولا يدخلُ ذِكرُها القرية - يعني مكة - ثم بَيْنا الناسُ في أعظمِ المساجد حُرْمةً وأحبِّها إلى الله وأكرمِها على الله تعالى؛ المسجدِ الحرامِ، لم يَرُعْهم إلَّا وهي في ناحية المسجد تَدنُو - أو تَربُو - بينَ الرُّكنِ الأسود وبين باب بني مخزومٍ عن يمين الخارج في وَسَطٍ من ذلك، فيَرفَضُّ الناسُ عنها شتَّى ومعًا، ويَثبُت لها عِصابةٌ من المسلمين عَرَفوا أنهم لم يُعجِزوا الله، فَخَرَجَت عليهم تَنفُضُ عن رأسها الترابَ، فبدت بهم فجَلَت عن وجوههم حتى تَرَكَتها كأنها الكواكبُ الدُّرِّيّة، ثم وَلَّت في الأرض لا يُدرِكُها طالبٌ ولا يُعجِزُها هارب، حتى إِنَّ الرجل ليتعوَّذُ منها بالصلاة، فتأتيهِ من خلفِه فتقول: أي فلانُ، الآنَ تصلِّي؟! فيَلتفِتُ إليها فتَسِمُه في وجهه ثم تذهب، فيتجاوَرُ الناسُ في ديارهم، ويَصطَحِبون في أسفارهم، ويَشتَركون في الأموال، يعرفُ المؤمنُ الكافرَ، حتى إنَّ الكافر يقول: يا مؤمنُ، اقضِني حقِّي، ويقول المؤمن: يا كافرُ، اقضني حقِّي" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، وهو أبيَنُ حديثٍ في ذكر دابّة الأرض، ولم يُخرجاه.




আবু সারীহা আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই দুনিয়াতে ভূ-প্রাণীর (দাব্বা) আবির্ভাব তিনবার হবে। এর প্রথম আবির্ভাব হবে ইয়েমেনের দূরতম প্রান্তে। এরপর গ্রাম্য এলাকায় এর আলোচনা ছড়িয়ে পড়বে, কিন্তু শহর বা নগরে এর আলোচনা প্রবেশ করবে না—অর্থাৎ মক্কাতে। এরপর যখন লোকেরা সর্বোচ্চ মর্যাদাপূর্ণ, আল্লাহর নিকট সর্বাধিক প্রিয় এবং আল্লাহর কাছে সবচেয়ে সম্মানিত মসজিদ—অর্থাৎ মসজিদে হারামের মধ্যে থাকবে, তখন হঠাৎ তারা দেখবে যে প্রাণীটি মসজিদের এক কোণে, কালো হাজরে আসওয়াদ ও বানু মাখজুমের দরজার মাঝখানে, বের হওয়া ব্যক্তির ডান পাশে মাঝ বরাবর অবস্থান করছে (বা কাছাকাছি আসছে)। তখন লোকেরা এর থেকে দূরে সরে গিয়ে বিক্ষিপ্ত হয়ে যাবে, তবে মুসলমানদের একটি দল দৃঢ় থাকবে, যারা জানে যে তারা আল্লাহকে পরাস্ত করতে পারবে না। এরপর সেই প্রাণীটি তাদের সামনে বের হবে এবং মাথা থেকে ধুলা ঝেড়ে ফেলবে। সে তাদের কাছে গিয়ে তাদের চেহারায় এক ধরনের জ্যোতি ছড়িয়ে দেবে, যতক্ষণ না তাদের চেহারাগুলো যেন উজ্জ্বল তারকার মতো হয়ে যাবে। এরপর সেটি পৃথিবীর দিকে মুখ করে চলে যাবে। কোনো অনুসরণকারীই তাকে ধরতে পারবে না এবং কোনো পলায়নকারীই তাকে অতিক্রম করে পালাতে পারবে না। এমনকি কোনো ব্যক্তি যখন সালাতের মাধ্যমে তা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করবে, তখন সেটি তার পিছন থেকে এসে বলবে: 'ওহে অমুক! এখন সালাত আদায় করছ?' লোকটি সেটির দিকে তাকালে প্রাণীটি তার চেহারায় একটি দাগ দিয়ে দেবে এবং চলে যাবে। এরপর লোকেরা তাদের বসতবাড়িতে প্রতিবেশীর মতো থাকবে, সফরে একে অপরের সঙ্গী হবে এবং সম্পদে অংশীদার হবে। (তখন) মুমিন কাফেরকে চিনতে পারবে। এমনকি কাফের বলবে: 'হে মুমিন! আমার হক (অধিকার) পরিশোধ করো,' এবং মুমিন বলবে: 'হে কাফের! আমার হক পরিশোধ করো'।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًّا، طلحة بن عمرو الحضرمي متروك الحديث، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه"، وقد تفرَّد طلحة هذا برفعه وبألفاظ فيه. أبو الطقيل: هو عامر بن واثلة، وأبو سريحة: هو حذيفة بن أَسِيد.وأخرجه أبو إسحاق الثعلبي في "تفسيره" 7/ 223 - ومن طريقه أبو محمد البغوي في "تفسيره" أيضًا 6/ 178 - من طريق عمرو بن محمد العنقزي، بهذا الإسناد.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1851) - ومن طريقه الفاكهي في "أخبار مكة" (2345) والطبراني في "الأحاديث الطوال" (34) - عن عبد الله بن وهب، والطبراني في "المعجم الكبير" (3035) من طريق الفضل بن العلاء، كلاهما عن طلحة بن عمرو، به.وأخرجه الطيالسي (1165) - ومن طريقه ابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 2923 - عن طلحة بن عمرو، به.وأخرجه الطيالسي أيضًا عن جرير بن حازم، عن عبد الله بن عمير، عن رجل من آل عبد الله بن مسعود. ولم يتجاوزه، وعليه فهو إسناد مرسل وراويه مبهم، فلا يصحُّ.وأخرجه عبد الملك بن حبيب الأندلسي في كتاب "أشراط الساعة" (23) عن الأُويسي - وهو عن عبد العزيز بن عبد الله - عن عبد الله بن عبيد، عن أبيه، عن أبي الطفيل، عن حذيفة بن اليمان موقوفًا … وذكره بطوله، ثم قال: وحدثني أسد بن موسى عن جرير بن حازم عن قيس بن سعد عن أبي الطفيل عن حذيفة، مثل ذلك. وابن حبيب هذا قال ابن حجر في "التقريب": صدوق ضعيف الحديث كثير الغلط.وأخرج الطبراني في "الأوسط" (1635) من طريق سفيان بن عيينة، عن ابن جريج، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبي الطفيل، عن حذيفة بن أَسيد - أُراه رفعه قال: تخرج الدابة من أعظم المساجد حرمة، فبينا هم قعود إذ رنَّت الأرض، فبينا هم كذلك إذ تصدعت. وهذا إسناد رجاله ثقات إلّا أنَّ فيه عنعنة ابن جريج وكان مدلسًا، وشكَّ الراوي في رفعه. وانظر الحديث التالي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8701)


8701 - حدثنا أبو زكريا يحيى بن محمد العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا عبد الأعلى بن عبد الأعلى، عن هشام بن حسَّان، عن قيس بن سعد، عن أبي الطُّفيل، قال: كنا جلوسًا عند حُذيفة، فذُكِرَت الدابةُ، فقال حذيفة: إنها تخرجُ خَرَجاتٍ في بعض البوادي ثم تتكمَّن [1]، ثم تخرجُ في بعض القُرى حتى يُذعَروا [2] حتى تُهريقَ فيها الأمراءُ الدماءَ، ثم تتكمَّن، قال: فبَيْنا الناسُ عند أعظمِ المساجدِ وأفضلِها وأشرفِها - حتى قلنا المسجد الحرام، وما سمَّاه - إذ ارتفَعَت الأرضُ، فترتفع الأرضُ ويهربُ الناس ويبقى عَامّةٌ من المسلمين تقول: إنه ليس يُنجينا من أمر الله شيءٌ، فَتَخرُجُ فتَجلُو وجوهَهم حتى تجعلَها كالكواكب الدُّرِّيّة، وتتَّبِع الناسَ [3]، جيرانٌ في الرِّباع، شركاءُ في الأموال، وأصحابٌ في الأسفار [4]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুত তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমরা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসেছিলাম, তখন দাব্বাতুল আরদ (জমিনের জন্তু)-এর আলোচনা হলো। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি কিছু মরুভূমি অঞ্চলে কিছুক্ষণের জন্য বের হবে এবং তারপর লুকিয়ে যাবে। এরপর এটি কিছু গ্রামে বের হবে, ফলে লোকেরা ভীত হয়ে পড়বে, এমনকি শাসকরা সেখানে রক্তপাত ঘটাবে। এরপর এটি আবার লুকিয়ে যাবে। তিনি বললেন: যখন লোকেরা সবচেয়ে বড়, সবচেয়ে উত্তম ও সবচেয়ে সম্মানিত মসজিদের কাছে থাকবে—আমরা (উপস্থিতরা) বললাম: মসজিদুল হারাম, কিন্তু তিনি এর নাম উল্লেখ করেননি—তখন যমীন উঁচু হয়ে উঠবে। যমীন উঁচু হয়ে উঠলে লোকেরা পালাতে থাকবে। কিন্তু একদল সাধারণ মুসলিম থেকে যাবে, যারা বলবে: আল্লাহর ফয়সালা থেকে আমাদের বাঁচানোর মতো কিছুই নেই। অতঃপর সেই জন্তুটি বের হবে এবং তাদের (অবশিষ্ট মুসলমানদের) চেহারাসমূহকে এমনভাবে উজ্জ্বল করে দেবে যেন তা জ্বলন্ত তারকার মতো হয়। আর সেটি লোকদের (মুনাফিকদের) অনুসরণ করবে—যারা ঘরে প্রতিবেশী, সম্পদে অংশীদার এবং সফরে সঙ্গী।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: تتمكن، والتصويب من "تلخيص المستدرك". ومعنى "تتكمَّن" تختفي عن الأنظار. والخبر رجال إسناده ثقات إلّا أنه لا يعرف لقيس بن سعد - وهو المكي - سماع من أبي الطفيل، وذكره علي بن المديني - كما في "جامع التحصيل" - فيمن لم يلق أحدًا من الصحابة، وأبو الطفيل عامر بن واثلة من صغار الصحابة.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 84، ونعيم بن حماد في "الفتن" (1868) من طريق معمر، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 391 - 392 من طريق عبيد الله بن عدي الكندي، والفاكهي في "أخبار مكة" (2344) من طريق فضيل بن عياض، والمستغفري في "دلائل النبوة" (404) من طريق قرة بن سليمان، أربعتهم عن هشام بن حسان، بهذا الإسناد. إلَّا أنَّ معمرًا في رواية ابن المبارك ومحمد بن ثور عنه عند نعيم في "الفتن" لم يسمِّ شيخه، وفي رواية عبد الرزاق عنه سمّاه، والبخاري في "تاريخه" ذكر أوله فقط، وتحرَّف في مطبوعه قيس بن سعد إلى: عامر بن سعد.ورواه أبو سفيان المعمري عن معمر عند الطبري في "تفسيره" 20/ 14، فأسقط هشام بن حسان!وأخرجه الطبري أيضًا من طريق فرات القزاز وواصل مولى أبي عيينة، كلاهما عن أبي الطفيل، به. وفي كلا الطريقين ضعف، وطريق فرات أحسنهما.



[2] في النسخ الخطية: يذعروه، والصواب ما أثبتنا. والخبر رجال إسناده ثقات إلّا أنه لا يعرف لقيس بن سعد - وهو المكي - سماع من أبي الطفيل، وذكره علي بن المديني - كما في "جامع التحصيل" - فيمن لم يلق أحدًا من الصحابة، وأبو الطفيل عامر بن واثلة من صغار الصحابة.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 84، ونعيم بن حماد في "الفتن" (1868) من طريق معمر، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 391 - 392 من طريق عبيد الله بن عدي الكندي، والفاكهي في "أخبار مكة" (2344) من طريق فضيل بن عياض، والمستغفري في "دلائل النبوة" (404) من طريق قرة بن سليمان، أربعتهم عن هشام بن حسان، بهذا الإسناد. إلَّا أنَّ معمرًا في رواية ابن المبارك ومحمد بن ثور عنه عند نعيم في "الفتن" لم يسمِّ شيخه، وفي رواية عبد الرزاق عنه سمّاه، والبخاري في "تاريخه" ذكر أوله فقط، وتحرَّف في مطبوعه قيس بن سعد إلى: عامر بن سعد.ورواه أبو سفيان المعمري عن معمر عند الطبري في "تفسيره" 20/ 14، فأسقط هشام بن حسان!وأخرجه الطبري أيضًا من طريق فرات القزاز وواصل مولى أبي عيينة، كلاهما عن أبي الطفيل، به. وفي كلا الطريقين ضعف، وطريق فرات أحسنهما.



8701 [3] - الظاهر أنَّ هنا سقطًا في نسخنا الخطية، ففي مصادر التخريج - وأقربها لفظًا لرواية المصنف رواية الفاكهي (2344) - ثم تتبع الناس فتخطم الكافر وتجلو وجه المؤمن، ثم لا ينجو منها هارب ولا يدركها طالب، قالوا: وما الناس يومئذ يا حذيفة؟ قال: جيران … .. إلخ. والخبر رجال إسناده ثقات إلّا أنه لا يعرف لقيس بن سعد - وهو المكي - سماع من أبي الطفيل، وذكره علي بن المديني - كما في "جامع التحصيل" - فيمن لم يلق أحدًا من الصحابة، وأبو الطفيل عامر بن واثلة من صغار الصحابة.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 84، ونعيم بن حماد في "الفتن" (1868) من طريق معمر، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 391 - 392 من طريق عبيد الله بن عدي الكندي، والفاكهي في "أخبار مكة" (2344) من طريق فضيل بن عياض، والمستغفري في "دلائل النبوة" (404) من طريق قرة بن سليمان، أربعتهم عن هشام بن حسان، بهذا الإسناد. إلَّا أنَّ معمرًا في رواية ابن المبارك ومحمد بن ثور عنه عند نعيم في "الفتن" لم يسمِّ شيخه، وفي رواية عبد الرزاق عنه سمّاه، والبخاري في "تاريخه" ذكر أوله فقط، وتحرَّف في مطبوعه قيس بن سعد إلى: عامر بن سعد.ورواه أبو سفيان المعمري عن معمر عند الطبري في "تفسيره" 20/ 14، فأسقط هشام بن حسان!وأخرجه الطبري أيضًا من طريق فرات القزاز وواصل مولى أبي عيينة، كلاهما عن أبي الطفيل، به. وفي كلا الطريقين ضعف، وطريق فرات أحسنهما.



8701 [4] - تحرَّف في النسخ الخطية إلى: في الإسلام، والتصويب من كافة مصادر التخريج. والخبر رجال إسناده ثقات إلّا أنه لا يعرف لقيس بن سعد - وهو المكي - سماع من أبي الطفيل، وذكره علي بن المديني - كما في "جامع التحصيل" - فيمن لم يلق أحدًا من الصحابة، وأبو الطفيل عامر بن واثلة من صغار الصحابة.وأخرجه عبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 84، ونعيم بن حماد في "الفتن" (1868) من طريق معمر، والبخاري في "التاريخ الكبير" 5/ 391 - 392 من طريق عبيد الله بن عدي الكندي، والفاكهي في "أخبار مكة" (2344) من طريق فضيل بن عياض، والمستغفري في "دلائل النبوة" (404) من طريق قرة بن سليمان، أربعتهم عن هشام بن حسان، بهذا الإسناد. إلَّا أنَّ معمرًا في رواية ابن المبارك ومحمد بن ثور عنه عند نعيم في "الفتن" لم يسمِّ شيخه، وفي رواية عبد الرزاق عنه سمّاه، والبخاري في "تاريخه" ذكر أوله فقط، وتحرَّف في مطبوعه قيس بن سعد إلى: عامر بن سعد.ورواه أبو سفيان المعمري عن معمر عند الطبري في "تفسيره" 20/ 14، فأسقط هشام بن حسان!وأخرجه الطبري أيضًا من طريق فرات القزاز وواصل مولى أبي عيينة، كلاهما عن أبي الطفيل، به. وفي كلا الطريقين ضعف، وطريق فرات أحسنهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8702)


8702 - حدثنا أبو زكريا العَنبَري، حدثنا محمد بن عبد السلام، حدثنا يحيى بن يحيى، أخبرنا محمد بن فُضَيل، حدثنا الوليد بن جُمَيع، عن عبد الملك بن المغيرة، عن عبد الرحمن بن البَيلَماني، عن ابن عُمر قال: يَبِيتُ الناس يَسْرُون إلى جَمْع، وتَبِيتُ دابَّةُ الأرض تَسْري إليهم، فيُصبِحون وقد جعلتهم بين رأسِها وذنبِها، فما من مؤمنٍ إلَّا تَمسَحُه، ولا منافقٍ ولا كافرٍ إِلَّا تَخطِمُه، وإنَّ التوبةَ لمفتوحةٌ، ثم يخرج الدُّخَانُ فيأخذُ المؤمنَ منه كهيئة الزَّكْمة، ويدخلُ في مَسامع الكافر والمنافق حتى يكونَ كالشيءِ الحَنِيذ، وإن التوبةَ لمفتوحة، ثم تَطلُعُ الشمسُ من مغربها [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা রাত্রি যাপন করবে, তারা (কোনো এক স্থানে) সমবেত হবে, আর যমিনের প্রাণী (দাব্বাতুল আরদ) তাদের দিকে এগিয়ে যেতে রাত কাটাবে। অতঃপর যখন সকাল হবে, তখন সে (দাব্বাতুল আরদ) তাদেরকে তার মাথা ও লেজের মাঝে নিয়ে আসবে। সুতরাং এমন কোনো মু'মিন থাকবে না যাকে সে স্পর্শ করবে না এবং এমন কোনো মুনাফিক বা কাফির থাকবে না যাকে সে (দাব্বা) আঘাত করবে না (বা নাকদিয়ে চিহ্নিত করবে)। আর নিশ্চয়ই তওবার দরজা উন্মুক্ত থাকবে। অতঃপর ধোঁয়া বের হবে। তা মু'মিনকে সর্দির মতো করে ধরবে এবং কাফির ও মুনাফিকের কানের ছিদ্রপথে প্রবেশ করবে, এমনকি তারা যেন আগুনে ঝলসানো জিনিসের মতো হয়ে যাবে। আর নিশ্চয়ই তওবার দরজা উন্মুক্ত থাকবে। অতঃপর সূর্য তার পশ্চিম দিক থেকে উদিত হবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف ابن البيلماني، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه" وبالوليد بن جميع - وهو الوليد بن عبد الله بن جميع - إلّا أنَّ الوليد أقوى منه وأحسن حالًا.وأخرجه الطبري في "تفسيره" 20/ 15 عن أبي السائب - وهو سلم بن جنادة الكوفي - عن محمد بن فضيل، بهذا الإسناد. وأخرجه بنحوه يحيى بن سلام في "تفسيره" 2/ 567، ونعيم بن حماد في "الفتن" (1865)، وابن أبي شيبة في "مصنفه" 15/ 180، وابن أبي حاتم في "تفسيره" 9/ 2923 من طريقين عن الوليد بن جميع به.تخطمه: أي: تَسِمُه على أنفه.والحَنيذ: المشوي.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8703)


8703 - حدثنا أبو إسحاق إبراهيم بن محمد بن يحيى، حدثنا عبد الرحمن بن أبي حاتم، حدثنا أبو سعيد الأشجُّ، حدثنا أبو أسامة، عن إدريس بن يزيد الأَوْدي، عن عطيَّة، عن ابن عُمر، في قوله عز وجل: {وَإِذَا وَقَعَ الْقَوْلُ عَلَيْهِمْ أَخْرَجْنَا لَهُمْ دَابَّةً مِنَ الْأَرْضِ} [النمل: 82]، قال: إذا لم يَأمُروا بالمعروف، ولم يَنهَوْا عن المنكَر [1].




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌ তা‘আলার বাণী: "যখন তাদের উপর আদেশ কার্যকর হবে, তখন আমি তাদের জন্য মাটি থেকে এক জীব (দাব্বাতুল আরদ) বের করব।" (সূরা আন-নামল: ৮২), এ প্রসঙ্গে তিনি বলেন: (এই সময় আসবে) যখন তারা সৎকাজের আদেশ করবে না এবং অসৎকাজ থেকে নিষেধ করবে না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف لضعف عطية: وهو ابن سعد العَوْفي. أبو سعيد الأشج: هو عبد الله بن سعيد الكندي، وأبو أسامة: هو حماد بن أسامة.وأخرجه ابن أبي شيبة 13/ 328 عن أبي أسامة، بهذا الإسناد.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1854) من طريق عبيد الله بن الوليد الوصّافي، عن عطية، به.وسيأتي عند المصنف برقم (8856) من طريق عمرو بن قيس عن عطية. وأخرجه أحمد أيضًا 13 / (7937) و 16 / (10361)، وابن ماجه (4066)، والترمذي (3187) من طرق عن حماد بن سلمة به.قوله: "تجلو وجه المؤمن" أي تنوّره، و"تخطم أنف الكافر" أي: تَسِمُه وتكويه، والخِوان: هو ما يوضع عليه الطعام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8704)


8704 - أخبرنا أبو بكر الشافعي، حدثنا محمد بن مَسلَمة الواسطي، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا حمَّاد، عن [1] عليِّ بن زيد، عن أَوس بن خالد، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "تخرجُ الدابةُ ومعها عصا موسى وخاتَمُ سليمان، فتَجلُو وجهَ المؤمن بالعصا، وتَخطِمُ أنفَ الكافر بالخاتَم، حتى إنَّ أهل الخِوَانِ يجتمعون، فيقول هذا: يا مؤمنُ، وهذا: يا كافرُ" [2].




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দা’ব্বাতুল আরদ (ভূগর্ভস্থ প্রাণী) বের হবে এবং তার সাথে থাকবে মূসা (আঃ)-এর লাঠি এবং সুলাইমান (আঃ)-এর আংটি। অতঃপর সে লাঠি দ্বারা মু’মিনের চেহারা উজ্জ্বল করবে এবং আংটি দ্বারা কাফিরের নাকে সীলমোহর মেরে দেবে। এমনকি যখন দস্তরখানায় (খাবার খেতে) লোকেরা একত্রিত হবে, তখন তাদের একজন বলবে: হে মু’মিন! আর অপরজন বলবে: হে কাফির!”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: بن. وأخرجه أحمد أيضًا 13 / (7937) و 16 / (10361)، وابن ماجه (4066)، والترمذي (3187) من طرق عن حماد بن سلمة به.قوله: "تجلو وجه المؤمن" أي تنوّره، و"تخطم أنف الكافر" أي: تَسِمُه وتكويه، والخِوان: هو ما يوضع عليه الطعام.



[2] إسناده ضعيف لضعف علي بن زيد - وهو ابن جُدْعان - وجهالة شيخه أوس بن خالد، ومحمد بن مسلمة ليِّن الحديث إلَّا أنه متابع.فقد أخرجه أحمد في "مسنده" 13/ (7937) عن يزيد بن هارون، بهذا الإسناد. وأخرجه أحمد أيضًا 13 / (7937) و 16 / (10361)، وابن ماجه (4066)، والترمذي (3187) من طرق عن حماد بن سلمة به.قوله: "تجلو وجه المؤمن" أي تنوّره، و"تخطم أنف الكافر" أي: تَسِمُه وتكويه، والخِوان: هو ما يوضع عليه الطعام.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8705)


8705 - أخبرنا أبو عبد الله الصَّفّار، حدثنا محمد بن إبراهيم بن أُورْمَة، حدثنا الحسين بن حفص [1]، حدثنا سفيان [عن سَلَمة بن كُهيل] [2] عن أبي الزَّعْراء، عن ابن مسعود قال: يأتي على الناس زمانٌ يُغبَطُ فيه الرجلُ بخِفَّة حالِه كما يُغبَطُ [اليومَ] [3] الرجلُ بالمال والولد، قال: فقال له رجل: أيُّ المال يومئذٍ خيرٌ؟ قال: سلاحٌ صالح، وفرسٌ صالح، يزول عنه أينَما زال [4]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষের উপর এমন এক সময় আসবে, যখন একজন লোককে তার হালকা অবস্থার (কম সম্পদের) জন্য ঈর্ষা করা হবে, যেমনটি আজ একজন লোককে সম্পদ ও সন্তানের জন্য ঈর্ষা করা হয়। বর্ণনাকারী বলেন: তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: সেই সময়ে সর্বোত্তম সম্পদ কী হবে? তিনি বললেন: একটি উত্তম অস্ত্র এবং একটি উত্তম ঘোড়া, যা সে যেখানেই যায়, তার সাথে সাথেই চলে যায়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الحسن بن الوليد، وليس في هذه الطبقة من الرواة عن سفيان الثوري من يسمَّى هكذا، والتصويب من "إتحاف المهرة" (13321)، وقد تكررت هذه السلسلة عند المصنف على الصواب في بضعة عشر موضعًا. وروي مثله عن ابن مسعود مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم بإسناد ضعيف جدًّا عند البزار (1461) والطبراني (9777) وغيرهما.



[2] سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من "الإتحاف" ومن مصادر التخريج حيث رووه من طريق سفيان، إلّا أنه زاد في "الإتحاف" بين سفيان وسلمة الأعمشَ، وسفيان قد روى عنهما جميعًا. وروي مثله عن ابن مسعود مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم بإسناد ضعيف جدًّا عند البزار (1461) والطبراني (9777) وغيرهما.



8705 [3] - زيادة من "تلخيص الذهبي". وروي مثله عن ابن مسعود مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم بإسناد ضعيف جدًّا عند البزار (1461) والطبراني (9777) وغيرهما.



8705 [4] - خبر جيد، وهذا إسناد محتمل للتحسين في المتابعات والشواهد إن شاء الله من أجل أبي الزعراء - وهو عبد الله بن هانئ الكندي خال سلمة بن كهيل - فقد انفرد بالرواية عنه سلمة بن أخته، وقد توبع، ومحمد بن إبراهيم بن أورمة - وإن كان مجهولًا - لم ينفرد به.فقد رواه المعافى بن عمران في كتابه "الزهد" (14) عن سفيان الثوري، بهذا الإسناد.ورواه عن سفيان أيضًا وكيعٌ عند ابن أبي شيبة في "المصنف" 5/ 320، وإبراهيم الحربي في "غريب الحديث" 3/ 1186، وعبدُ الله بنُ وهب عند نعيم بن حماد في "الفتن" (216). إلّا أنَّ وكيعًا قرن بسفيان مالكَ بنَ مِغوَل، واقتصر ابن وهب على الشطر الثاني من الخبر.وأخرج الشطر الأول منه المعافى (13) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (181) - عن شريك النخعي، عن عبد الله بن يزيد الصُّهباني، عن كُميل بن زياد، عن ابن مسعود.وشريك حسن في المتابعات والشواهد، ومن فوقه ثقات. وروي مثله عن ابن مسعود مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم بإسناد ضعيف جدًّا عند البزار (1461) والطبراني (9777) وغيرهما.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8706)


8706 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا محمد بن وَهْب الدمشقي، حدثنا صَدَقة بن عبد الله، حدثني خالد بن دِهْقانَ قال: سمعت زيدَ بن أَرْطَاةَ الفَزَاري يقول: إنه سمع جُبيرَ بن نُفَير الحَضْرمي يقول: سمعت أبا الدَّرداء يقول: إنه سمع رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول: "يومُ المَلحَمةِ الكبرى فُسْطاطُ المسلمين بأرضٍ يقال لها: الغُوطَةُ، فيها مدينة يقال لها: دِمشقُ، خيرُ منازلِ المسلمين يومئذٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: মহাযুদ্ধের (আল-মালহামাহ আল-কুবরা) দিনে মুসলিমদের ঘাঁটি এমন এক ভূখণ্ডে হবে, যার নাম গুত্বাহ। তাতে একটি শহর আছে যার নাম দামেশক। সেই দিন মুসলিমদের জন্য সেটিই হবে সর্বোত্তম আবাসস্থল।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] حديث صحيح، وهذا إسناد ضعيف من أجل محمد بن وهب الدمشقي: وهو محمد بن وهب بن مسلم القرشي الدمشقي، فهو الذي يروي عنه صدقة بن خالد كما في "تاريخ دمشق" لابن عساكر 56/ 207، وما وقع هنا في نسخ "المستدرك" من تسمية شيخه صدقة بن عبد الله، فغريب، وأغلب الظن أنه خطأ، فإنَّ هذا الحديث لا يعرف إلّا من رواية صدقة خالد عن خالد بن دهقان كما سيأتي، وصدقة بن خالد ثقة، أما صدقة بن عبد الله فضعيف، وكلاهما دمشقي وهما متقاربا الطبقة، ومهما يكن من أمر فقد روي الحديث من غير هذا الوجه عن زيد بن أرطاة، فصحَّ الحديث.وأخرجه الطبراني في "مسند الشاميين" (1313) - ومن طريقه ابن عساكر 1/ 231 - من طريق أبي مُسهِر عبد الأعلى بن مسهر وهشام بن عمار الدمشقيين، والرَّبعي في "فضائل الشام ودمشق" (51) من طريق هشام بن عمار، كلاهما (عبد الأعلى وهشام) قال: حدثنا صدقة بن خالد، عن خالد بن دهقان، بهذا الإسناد.ورواه أبو مسهر مرة أخرى عن صدقة بن خالد عند ابن عساكر 1/ 231 عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن زيد بن أرطاة، به.وأخرجه كذلك أحمد 36/ (21725)، وأبو داود (4298) من طريق يحيى بن حمزة، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن زيد بن أرطاة، به. وهذا إسناد صحيح، وليس فيه عند أحمد قوله: "خير منازل المسلمين يومئذ"، ولفظه عند أبي داود: "من خير مدائن الشام".ورواه عبد الرحمن بن جبير بن نفير عن أبيه عن عوف بن مالك الأشجعي في آخر حديث مطوَّل عن النبي صلى الله عليه وسلم، أخرجه أحمد 39/ (23985). والفُسطاط: الموضع الذي فيه مجتمَع الناس.والغوطة: اسم البساتين والمياه التي حول دمشق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8707)


8707 - أخبرني أبو عبد الله الصَّنعاني بمكة، حدثنا إسحاق بن إبراهيم، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن قَتَادة، عن شَهْر بن حَوشَب قال: لما جاءت بَيعةُ يزيد بن معاوية قلتُ: لو خرجتُ إلى الشام فتنحَّيتُ من شرِّ هذه البَيْعة، فخرجتُ حتى قدمتُ الشام، فأُخبِرتُ بمَقامٍ يقومُه نَوْفٌ، فجئته، فإذا رجلٌ فاسدُ العينين عليه خَمِيصة، وإذا هو عبدُ الله بن عَمرو بن العاص، فلما رآه نوفٌ أمسكَ عن الحديث، فقال له عبد الله: حدِّثْ بما كنتَ تحدِّثُ به، قال: أنت أحقُّ بالحديث مني،، أنت صاحبُ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: إِنَّ هؤلاء قد مَنَعُونا عن الحديث؛ يعني الأمراء، قال: أَعزِمُ عليك إلَّا ما حدَّثتَنا حديثًا سمعتَه من رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: سمعتُه يقول: "إنها ستكونُ هجرةٌ بعد هجرةٍ، يحتازُ الناسُ إلى مُهاجَرِ إبراهيم، لا يبقى في الأرض إِلَّا شِرارُ أهلِها، تَلفِظُهم أرضُهم وتَقذَرُهم [1] أنفسُهم، والله يَحشُرُهم إلى النار مع القِرَدة والخنازير، تَبِيتُ معهم إذا باتوا، وتَقِيلُ معهم إذا قالُوا، وتأكلُ مَن تَخلَّفَ".قال: وسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "سيخرجُ أُناسٌ من أمَّتي من قِبَل المَشرق، يَقرؤُون القرآنَ لا يجاوزُ تَراقِيَهم، كلَّما خرج منهم قَرْنٌ قُطِعَ، حتى يخرج الدَّجالُ في بقيَّتِهم" [2]. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .




আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, শাহর ইবনে হাওশাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যখন ইয়াযীদ ইবনু মু'আবিয়ার বাইআত (খেলাফতের শপথ) এলো, তখন আমি (মনে মনে) বললাম: আমি যদি সিরিয়ার দিকে চলে যাই এবং এই বাইআতের ফিতনা থেকে দূরে থাকতে পারি! অতঃপর আমি রওনা হলাম এবং সিরিয়ায় পৌঁছলাম। সেখানে আমাকে জানানো হলো যে, নাওফ একটি স্থানে অবস্থান করছেন। আমি তাঁর কাছে এলাম এবং দেখলাম, সেখানে এক ব্যক্তি আছেন, যাঁর উভয় চোখ অসুস্থ (বা অন্ধ), তিনি একটি কালো ডোরাকাটা চাদর পরিহিত। আর তিনি হলেন আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। নাওফ তাঁকে দেখে হাদিস বলা বন্ধ করে দিলেন। তখন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: তুমি যা বর্ণনা করছিলে, তা বলতে থাকো। নাওফ বললেন: আপনি আমার চেয়ে হাদিস বলার বেশি উপযুক্ত, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী। আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই লোকেরা (শাসকেরা) আমাদের হাদিস বলা থেকে বিরত রেখেছে। (শাহর ইবনে হাওশাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন,) তিনি (আবদুল্লাহ) বললেন: আমি তোমাকে কসম দিচ্ছি যে, তুমি আমাদেরকে অবশ্যই একটি হাদিস শোনাবে যা তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছ।

তিনি (আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেন: আমি তাঁকে (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে) বলতে শুনেছি: "অবশ্যই হিজরতের পর হিজরত হবে। লোকেরা ইবরাহীম (আঃ)-এর হিজরতের স্থানে (মক্কা বা শামে) একত্রিত হবে। পৃথিবীতে তাদের নিকৃষ্টতমরা ছাড়া কেউ অবশিষ্ট থাকবে না। তাদের ভূমি তাদের নিক্ষেপ করে দেবে এবং তাদের অন্তরগুলো তাদের ঘৃণা করবে। আল্লাহ তাদের বানর ও শূকরদের সাথে একত্রিত করে জাহান্নামে সমবেত করবেন। তারা যখন রাত কাটায়, তখন এগুলি (বানর ও শূকর) তাদের সাথে রাত কাটায়, যখন তারা বিশ্রাম নেয়, তখন এগুলি তাদের সাথে বিশ্রাম নেয় এবং যারা পেছনে থেকে যায়, তাদের খেয়ে ফেলে।"

তিনি (আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আরো বলতে শুনেছি: "শীঘ্রই আমার উম্মতের মধ্য থেকে প্রাচ্যের দিক থেকে এমন কিছু লোক বের হবে, যারা কুরআন পাঠ করবে কিন্তু তা তাদের কণ্ঠনালী (কণ্ঠাস্থি) অতিক্রম করবে না। যখনই তাদের মধ্য থেকে কোনো দল বের হবে, তাকে দমন করা হবে, যতক্ষণ না তাদের অবশিষ্টদের মধ্যে দাজ্জাল আত্মপ্রকাশ করবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: وتقذفهم، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو أقرب إلى الصواب، والأصوب في العبارة كلها أن تكون - كما في "جامع معمر" وغيره -: تلفظهم أرضهم وتَقذَرهم نفس الله، تحشرهم النار مع القردة … إلخ. والحديث في "جامع معمر" برواية عبد الرزاق برقم (20790)، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه أيضًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1765)، وأحمد في "المسند" 11/ (6871)، والبغوي في "شرح السنة" (4008)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 161. واقتصر نعيم على الشطر الأول منه دون القصة مع نوف: وهو البِكالي.وأخرجه أبو داود الطيالسي (2407) ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 6/ 53 - 54، وابن عساكر 1/ 160 - 161 - وأحمد (6952)، وأبو داود السجستاني (2482) - ومن طريقه البيهقي في "الأسماء والصفات" (970) - ثلاثتهم (الطيالسي وأحمد وأبو داود) من طريق هشام الدستوائي، عن قتادة، به. واقتصر أبو داود السجستاني على الشطر الأول منه مختصرًا.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الأوسط" (6791) و"مسند الشاميين" (2761) من طريق الوليد بن الوليد، عن سعيد بن بشير، عن قتادة، عن شهر، عن نوف البكالي، عن عبد الله بن عمرو. والوليد وسعيد ضعيفان، والوليد أشدهما ضعفًا، وشهر إنما رواه عن ابن عمرو بلا واسطة.ورواه عن شهر عن عبد الله بن عمرو أيضًا ليثُ بنُ أبي سليم عند نعيم بن حماد (1767)، والطبراني في "الكبير" (14542)، وأبي نعيم في "الحلية" 6/ 66، ومطرٌ الوراق عند نعيم (1748)، ومَيّاحٌ أبو العلاء عنده أيضًا (1758)، واقتصروا جميعهم على الشطر الأول منه غير الطبراني فساقه بشطريه، إلّا أنَّ مطرًا الوراق لم يرفعه ووقفه على عبد الله بن عمرو، وبيَّن ميّاح أبو العلاء أنَّ شهرًا إنما سمعه من عبد الله بن عمرو في مجلس نوف ببيت المقدس، وميّاح مجهول.وخالف يحيى بن أبي حيّة عند أحمد 9/ (5562/ 2 - 3) - ومن طريقه ابن عساكر 1/ 161 - فرواه عن شهر بن حوشب عن عبد الله بن عُمر. جعله من مسند ابن عُمر، ويحيى هذا: هو أبو جناب الكلبي، وهو ضعيف، ويبدو أنَّه وهمَ في تسمية الصحابي، على أنه قد روي عن عبد الله ابن عُمر من وجه آخر غير شهر بن حوشب كما سيأتي.وسيأتي الحديث بنحوه بشطريه عند المصنف برقم (8770) من طريق عبد الله بن صالح، عن موسى بن عُلي بن رباح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص. ورجاله لا بأس بهم غير عبد الله بن صالح - وهو المصري كاتب الليث - ففيه لِين، لكن يعتبر بحديثه في المتابعات والشواهد فيتحسّن حديثه كما هو الحال هنا.وله شاهد من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب، أخرجه المستغفري في "دلائل النبوة" (413)، وابن عساكر 1/ 163 من طريقين عن هشام بن عمار، عن يحيى بن حمزة، عن الأوزاعي، عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهشام بن عمار صدوق حسن الحديث، ومن فوقه ثقات.وأخرج الشطر الأول منه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 304، ومن طريقه البيهقي في "الأسماء والصفات" (971)، وابن عساكر 1/ 162 عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم بن يزيد وهشام بن عمار، عن يحيى بن حمزة، به - إلّا أنَّ أبا النضر قال في حديثه: عن الأوزاعي عمَّن حدَّثه عن نافع، فأدخل واسطةً مبهمة بين الأوزاعي ونافع فأفسده، وأبو النضر لا بأس به، وهو أحسن حالًا من هشام بن عمار، وأخرج الشطر الثاني منه مختصرًا ابن ماجه (174) عن هشام بن عمار بإسناده إلى ابن عمر.وقال ابن كثير في "تفسيره" 6/ 284: غريب من حديث نافع، والظاهر أنَّ الأوزاعي قد رواه عن شيخ له من الضعفاء، والله أعلم، وروايته من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص أقرب إلى الحفظ، انتهى.وقصة حشر النار للناس سلفت عند المصنف برقم (8620) عن عبد الله بن عمرو موقوفة عليه من وجه آخر. وانظر شواهدها هناك.والشطر الثاني في قصة خروج أناس من المشرق حتى يخرج آخرهم مع الدجال، يشهد له حديث أبي بزرة الأسلمي عند أحمد 33/ (19783) و (19808)، والنسائي (3552)، وسلف عند المصنف برقم (2679)، وإسناده محتمل للتحسين، وأصله في "الصحيحين" من غير حديث أبي برزة كما تقدَّم بيانه هناك.



[2] إسناده حسن إن شاء الله من أجل شهر بن حوشب، فهو حسن الحديث في المتابعات والشواهد، وقد توبع فيما سيأتي عند المصنف برقم (8623) بإسناد يعتبر به في المتابعات والشواهد أيضًا، وله شواهد تقوّيه. والحديث في "جامع معمر" برواية عبد الرزاق برقم (20790)، ومن طريق عبد الرزاق أخرجه أيضًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1765)، وأحمد في "المسند" 11/ (6871)، والبغوي في "شرح السنة" (4008)، وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 161. واقتصر نعيم على الشطر الأول منه دون القصة مع نوف: وهو البِكالي.وأخرجه أبو داود الطيالسي (2407) ومن طريقه أبو نعيم في "الحلية" 6/ 53 - 54، وابن عساكر 1/ 160 - 161 - وأحمد (6952)، وأبو داود السجستاني (2482) - ومن طريقه البيهقي في "الأسماء والصفات" (970) - ثلاثتهم (الطيالسي وأحمد وأبو داود) من طريق هشام الدستوائي، عن قتادة، به. واقتصر أبو داود السجستاني على الشطر الأول منه مختصرًا.وأخرجه بنحوه الطبراني في "الأوسط" (6791) و"مسند الشاميين" (2761) من طريق الوليد بن الوليد، عن سعيد بن بشير، عن قتادة، عن شهر، عن نوف البكالي، عن عبد الله بن عمرو. والوليد وسعيد ضعيفان، والوليد أشدهما ضعفًا، وشهر إنما رواه عن ابن عمرو بلا واسطة.ورواه عن شهر عن عبد الله بن عمرو أيضًا ليثُ بنُ أبي سليم عند نعيم بن حماد (1767)، والطبراني في "الكبير" (14542)، وأبي نعيم في "الحلية" 6/ 66، ومطرٌ الوراق عند نعيم (1748)، ومَيّاحٌ أبو العلاء عنده أيضًا (1758)، واقتصروا جميعهم على الشطر الأول منه غير الطبراني فساقه بشطريه، إلّا أنَّ مطرًا الوراق لم يرفعه ووقفه على عبد الله بن عمرو، وبيَّن ميّاح أبو العلاء أنَّ شهرًا إنما سمعه من عبد الله بن عمرو في مجلس نوف ببيت المقدس، وميّاح مجهول.وخالف يحيى بن أبي حيّة عند أحمد 9/ (5562/ 2 - 3) - ومن طريقه ابن عساكر 1/ 161 - فرواه عن شهر بن حوشب عن عبد الله بن عُمر. جعله من مسند ابن عُمر، ويحيى هذا: هو أبو جناب الكلبي، وهو ضعيف، ويبدو أنَّه وهمَ في تسمية الصحابي، على أنه قد روي عن عبد الله ابن عُمر من وجه آخر غير شهر بن حوشب كما سيأتي.وسيأتي الحديث بنحوه بشطريه عند المصنف برقم (8770) من طريق عبد الله بن صالح، عن موسى بن عُلي بن رباح، عن أبيه، عن أبي هريرة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص. ورجاله لا بأس بهم غير عبد الله بن صالح - وهو المصري كاتب الليث - ففيه لِين، لكن يعتبر بحديثه في المتابعات والشواهد فيتحسّن حديثه كما هو الحال هنا.وله شاهد من حديث عبد الله بن عمر بن الخطاب، أخرجه المستغفري في "دلائل النبوة" (413)، وابن عساكر 1/ 163 من طريقين عن هشام بن عمار، عن يحيى بن حمزة، عن الأوزاعي، عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وهشام بن عمار صدوق حسن الحديث، ومن فوقه ثقات.وأخرج الشطر الأول منه يعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 2/ 304، ومن طريقه البيهقي في "الأسماء والصفات" (971)، وابن عساكر 1/ 162 عن أبي النضر إسحاق بن إبراهيم بن يزيد وهشام بن عمار، عن يحيى بن حمزة، به - إلّا أنَّ أبا النضر قال في حديثه: عن الأوزاعي عمَّن حدَّثه عن نافع، فأدخل واسطةً مبهمة بين الأوزاعي ونافع فأفسده، وأبو النضر لا بأس به، وهو أحسن حالًا من هشام بن عمار، وأخرج الشطر الثاني منه مختصرًا ابن ماجه (174) عن هشام بن عمار بإسناده إلى ابن عمر.وقال ابن كثير في "تفسيره" 6/ 284: غريب من حديث نافع، والظاهر أنَّ الأوزاعي قد رواه عن شيخ له من الضعفاء، والله أعلم، وروايته من حديث عبد الله بن عمرو بن العاص أقرب إلى الحفظ، انتهى.وقصة حشر النار للناس سلفت عند المصنف برقم (8620) عن عبد الله بن عمرو موقوفة عليه من وجه آخر. وانظر شواهدها هناك.والشطر الثاني في قصة خروج أناس من المشرق حتى يخرج آخرهم مع الدجال، يشهد له حديث أبي بزرة الأسلمي عند أحمد 33/ (19783) و (19808)، والنسائي (3552)، وسلف عند المصنف برقم (2679)، وإسناده محتمل للتحسين، وأصله في "الصحيحين" من غير حديث أبي برزة كما تقدَّم بيانه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8708)


8708 - حدثنا أبو جعفر محمد بن خُزَيمة الكَشَّي بنَيسابورَ من كتابه، حدثنا عَبْد بن حُميد الكَشِّي، حدثنا أبو عاصم النَّبيل، حدثنا عَزْرة بن ثابت، حدثنا عَلْباءُ بن أحمرَ، حدثنا أبو زيد الأنصاري قال: صلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم الصبحَ، فَخَطَبَنا إلى الظُّهر، ثم نَزَلَ فصلَّى الظهر، ثم خَطَبَنا إلى العصر، فنَزَلَ فصلَّى العصر، ثم صَعِدَ فخَطَبَنا إلى المغرب، وحدَّثَنا بما هو كائنٌ، فأعلمُنا أحفظُنا [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه!




আবু যায়দ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে ফজরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি যোহর পর্যন্ত আমাদের উদ্দেশে খুতবা দিলেন। এরপর তিনি নেমে এসে যোহরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি আবার আসর পর্যন্ত আমাদের উদ্দেশে খুতবা দিলেন। এরপর তিনি নেমে এসে আসরের সালাতের নেতৃত্ব দিলেন। এরপর তিনি (মিম্বরে) আরোহণ করলেন এবং মাগরিব পর্যন্ত আমাদের উদ্দেশে খুতবা দিলেন এবং ভবিষ্যতে যা কিছু ঘটবে সে সম্পর্কে আমাদের জানালেন। সুতরাং আমাদের মধ্যে যে সর্বাধিক মুখস্থকারী ছিল, সেই (ঘটনাগুলো) সম্পর্কে সর্বাধিক জ্ঞান রাখে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو عاصم النبيل: هو الضحاك بن مخلد، وأبو زيد الأنصاري: اسمه عمرو بن أخطب.وأخرجه أحمد 37/ (22888)، ومسلم (2892)، وابن حبان (6638) من طريق أبي عاصم، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8709)


8709 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي بمَرْو، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا عبد الله [1] بن موسى، أخبرنا شَيْبان، عن الأعمش، عن شَقِيق، عن حُذيفة قال: قام فينا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فما تَرَكَ شيئًا يكونُ في مَقامِه ذلك إلى قيام الساعة إلَّا حدَّثَنا به، حَفِظَه من حَفِظَه، ونَسِيَه من نَسِيَه، قد عَلِمَه أصحابي هؤلاء، فإنه سيكون منه [2] الشيءُ قد نَسِيتُه فأَراه فأذكرُه، كما يعرف الرجلُ وجهَ الرجل غابَ عنه [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه بهذه السِّياقة!




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে দাঁড়ালেন, এবং তিনি তাঁর সেই দাঁড়ানো অবস্থায় কিয়ামত পর্যন্ত যা যা ঘটবে তার কিছুই বাদ দিলেন না; বরং সবকিছুই আমাদের বলে দিলেন। যারা মুখস্থ করার তারা মুখস্থ করে রাখল, আর যারা ভুলে যাওয়ার তারা ভুলে গেল। আমার এই সহচরগণ তা অবগত আছেন। এমন কোনো বিষয় যা আমি ভুলে গিয়েছিলাম, তা সংঘটিত হওয়ার সময় আমি তা দেখতে পাই এবং তা আমার মনে পড়ে যায়, যেমন কোনো লোক তার অনুপস্থিত বন্ধুর চেহারা চিনতে পারে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، مكبَّرًا. وهو في "الفتن" لنعيم بن حماد (319) بإسقاط أبي نضرة. ولفظه فيه: "وبنو المغيرة من بني مخزوم".



[2] في النسخ الخطية: فيه، والمثبت من "تلخيص الذهبي". وهو في "الفتن" لنعيم بن حماد (319) بإسقاط أبي نضرة. ولفظه فيه: "وبنو المغيرة من بني مخزوم".



8709 [3] - إسناده صحيح. شيبان: هو ابن عبد الرحمن النحوي، والأعمش: هو سليمان بن مهران، وشقيق: هو ابن سلمة أبو وائل، وحذيفة: هو ابن اليمان.وأخرجه أحمد 38/ (23274) و (23309) و (23405)، والبخاري (6604)، ومسلم (2891) (23)، وأبو داود (4240)، وابن حبان (6636) من طريقين عن الأعمش، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرج معناه أحمد (23281)، ومسلم (2891) (24) من طريق عبد الله بن يزيد الخطمي، وأبو داود (4243) من طريق قبيصة بن ذؤيب، كلاهما عن حذيفة بن اليمان.وقد سلف نحوه أيضًا عند المصنف برقم (8661) من طريق أبي إدريس الخولاني، و (8664) من طريق زر بن حبيش، كلاهما عن حذيفة. وهو في "الفتن" لنعيم بن حماد (319) بإسقاط أبي نضرة. ولفظه فيه: "وبنو المغيرة من بني مخزوم".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8710)


8710 - أخبرني محمد بن المؤمَّل بن الحسن، حدثنا الفضل بن محمد، حدثنا نُعيم بن حمّاد، حدثنا الوليد بن مُسلِم، عن أبي رافع إسماعيل بن رافع، عن أبي نَضْرة قال: قال أبو سعيد الخُدْري: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إِنَّ أهلَ بيتي سَيَلْقَوْنَ من بعدي من أُمَّتي قتلًا وتشريدًا، وإنَّ أشدَّ قومِنا لنا بُغضًا بنو أُمَيَّةَ، وبنو المُغيرةِ، وبنو مخزومٍ" [1]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমার পরে আমার উম্মতের পক্ষ থেকে আমার আহলে বাইত (পরিবারের সদস্যরা) হত্যা ও বাস্তুচ্যুত হওয়ার শিকার হবে। আর বনু উমাইয়া, বনু মুগীরাহ ও বনু মাখযুম—এরাই হলো আমাদের প্রতি বিদ্বেষের দিক থেকে আমাদের সবচেয়ে কঠোর গোষ্ঠী।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف بمرَّة من أجل إسماعيل بن رافع، وبه أعلّه الذهبي في "تلخيصه" وقال: متروك. أبو نضرة: هو المنذر بن مالك بن قِطعة. وهو في "الفتن" لنعيم بن حماد (319) بإسقاط أبي نضرة. ولفظه فيه: "وبنو المغيرة من بني مخزوم".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8711)


8711 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا يحيى بن محمد الذُّهْلي، حدثنا، أبو الوليد الطَّيَالسي، حدثنا أبو عَوَانة، عن قَتَادة، عن أبي رافع، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم في السَّدِّ، قال: "يَحفِرونَه كلَّ يوم، حتى إذا كادوا يَخرِقُونه قال الذي عليهم: ارجِعوا فستَخرِقونه غدًا، قال: فيعيدُه الله عز وجل كأشدِّ ما كان، حتى إذا بَلَغُوا مُدَّتَهم وأراد الله، قال الذي عليهم: ارجِعوا فستَخرِقونه غدًا إن شاءَ الله، واستَثْنى؛ قال: فيَرجِعون وهو كهَيئتِه حين تركوه، فيَخرِقونه ويَخرُجون على الناس، فيَستَقُون [1] المياهَ ويَفِرُّ الناسُ منهم، فيَرمُون سِهامَهم في السماء، فتَرجِعُ مُخضَبَةً بالدماء فيقولون: قَهَرْنا أهلَ الأرض وغَلَبْنا مَن في السماء، قسوةً وعُلّوًا؛ قال: فيَبعَثُ الله عز وجل عليهم نَغَفًا في أقْفائهم؛ قال: فيُهلِكُهم؛ قال: فوالَّذي نفسُ محمدٍ بيدِه، إنَّ دوابَّ الأرضِ لَتَسْمَنُ وتَبطَرُ وتَشكَرُ شَكَرًا -أو تَسكَر سَكَرًا- من لحومِهم" [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রাচীরটি সম্পর্কে বললেন: "তারা প্রতিদিন তা খনন করতে থাকে। এমনকি যখন তারা এটিকে প্রায় ভেদ করে ফেলার উপক্রম হয়, তখন তাদের নেতা বলে: 'ফিরে যাও, আগামীকাল তোমরা এটিকে ভেদ করতে পারবে।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা এটিকে আগের চেয়েও আরও শক্ত করে দেন। অবশেষে যখন তাদের সময় পূর্ণ হবে এবং আল্লাহ্ তা চাইবেন, তখন তাদের নেতা বলবে: 'ফিরে যাও, ইনশাআল্লাহ্ (যদি আল্লাহ্ চান) আগামীকাল তোমরা এটিকে ভেদ করতে পারবে।' সে তখন আল্লাহর সাথে যোগসূত্র স্থাপন করবে (ইনশাআল্লাহ্ বলবে)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তখন তারা ফিরে যাবে এবং প্রাচীরটি ঠিক সেই অবস্থায় থাকবে যেমন তারা ছেড়ে গিয়েছিল। এরপর তারা সেটিকে ভেদ করে মানুষের উপর বেরিয়ে আসবে। তারা পানি পান করবে এবং মানুষ তাদের কাছ থেকে পালাতে থাকবে। তারা আকাশের দিকে তাদের তীর নিক্ষেপ করবে। অতঃপর সেই তীর রক্তে রঞ্জিত হয়ে তাদের কাছে ফিরে আসবে। তখন তারা বলবে: 'আমরা পৃথিবীর অধিবাসীদের পরাভূত করেছি এবং আকাশের সকলকেও অহংকার ও ঔদ্ধত্যের কারণে পরাজিত করেছি।' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: অতঃপর আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লা তাদের ঘাড়ের উপর এক প্রকার পোকা প্রেরণ করবেন। তিনি বললেন: তখন তা তাদেরকে ধ্বংস করে দেবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ঐ সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ! নিশ্চয়ই পৃথিবীর জীবজন্তু তাদের (মৃত) মাংস খেয়ে মোটা হবে, তাজা হবে এবং শুকরিয়া জ্ঞাপন করবে (বা, নেশাগ্রস্ত হবে—বর্ণনাকারীর সন্দেহ: শুকরিয়া জ্ঞাপন করবে নাকি নেশাগ্রস্ত হবে)।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: فيسقون، والمثبت من المطبوع، وهو أوجهُ.



[2] رجاله عن آخرهم ثقات، إلّا أن الحافظ ابن كثير استنكر رفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم كما في "تفسيره" 5/ 194، ومال إلى أنه من رواية أبي هريرة عن كعب الأحبار! فالله تعالى أعلم.أبو الوليد الطيالسي: هو هشام بن عبد الملك، وأبو عوانة: هو وضّاح اليَشكُري، وأبو رافع: هو نفيع الصائغ، تابعي مخضرم.وأخرجه الترمذي (3153) عن محمد بن بشار وغير واحد، عن هشام بن عبد الملك، بهذا الإسناد. وحسَّنه.وأخرجه أحمد 16 / (10632) و (10633)، وابن ماجه (4080)، وابن حبان (6829) من طرق عن قتادة، به.النَّغَف: دود يكون في أنوف الإبل والغنم.تَشكَر: أي: تسمن وتمتلئ شحمًا.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8712)


8712 - أخبرنا أبو العباس محمد بن أحمد المحبُوبي، حدثنا سعيد بن مسعود، حدثنا يزيد بن هارون، أخبرنا العوَّام بن حَوشَب، حدثني جَبَلَةُ بن سُحَيم، عن مُؤْثِر بن عَفَارْةَ، عن عبد الله بن مسعود قال: لما كان ليلةُ أُسرِيَ برسول الله صلى الله عليه وسلم، لقيَ إبراهيمَ وموسى وعيسى عليهم السلام، فتذاكروا الساعةَ متى هي، فبَدَؤوا بإبراهيم فسألوه عنها، فلم يكن عنده منها عِلمٌ، فسألوا موسى، فلم يكن عنده منها عِلمٌ، فردُّوا الحديث إلى عيسى، فقال: عَهِدَ اللهُ إليَّ فيها دون وَجْبتِها، فلا يعلمُها إِلَّا الله عز وجل، فذَكَر خروجَ الدجال [وقال]: فأهبِطُ فأقتلُه، ثم يَرجِعُ الناسُ إلى بلادهم، فيَستقبِلُهم يَأجوجُ ومَأجوجُ وهم مِن كل حَدَبٍ يَنسِلُون، لا يمرُّون بماءٍ إِلا شَرِبوه، ولا بشيءٍ إِلَّا أَفَسَدوه، يَجأَرون إليَّ فَأَدعُو الله فيُمِيتُهم، فتَجْوَى [1] الأرضُ من ريحهم، فيَجأَرون إليَّ، فأدعُو الله فيُرسِلُ السماءَ بالماء، فيَحمِلُهم فيَقذِفُ بأجسامِهم في البحر، ثم تُنسَفُ الجبالُ وتُمَدُّ الأرضُ مدَّ الأَدِيم، فعَهدُ الله إليَّ أنه إذا كان ذلك، أنَّ الساعةَ من الناس كالحاملِ المُتِمُّ، لا يدري أهلُها متى تَفجَؤُهم بوِلادتها ليلًا أو نهارًا.قال العوّامُ: فوجدتُ تصديقَ ذلك في كتاب الله عز وجل، ثم قرأ: {حَتَّى إِذَا فُتِحَتْ يَأْجُوجُ وَمَأْجُوجُ وَهُمْ مِنْ كُلِّ حَدَبٍ يَنْسِلُونَ (96) وَاقْتَرَبَ الْوَعْدُ الْحَقُّ} [الأنبياء: 96 - 97] [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে মি'রাজের রাতে নিয়ে যাওয়া হচ্ছিল, তখন তিনি ইব্রাহীম, মূসা এবং ঈসা আলাইহিমুস সালাম-এর সাথে সাক্ষাত করলেন। অতঃপর তাঁরা কিয়ামত কবে হবে— সে বিষয়ে আলোচনা করলেন। তাঁরা ইব্রাহীম (আঃ)-কে দিয়ে শুরু করলেন এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। কিন্তু তাঁর কাছে এ বিষয়ে কোনো জ্ঞান ছিল না। তারপর তাঁরা মূসা (আঃ)-কে জিজ্ঞাসা করলেন। তাঁর কাছেও এ বিষয়ে কোনো জ্ঞান ছিল না। এরপর তাঁরা আলোচনাটি ঈসা (আঃ)-এর দিকে ফিরিয়ে দিলেন। তিনি বললেন: আল্লাহ তা'আলা এর নির্দিষ্ট সময়ের পূর্বে এর কিছু নিদর্শন সম্পর্কে আমার নিকট প্রতিশ্রুতি নিয়েছেন। আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা ছাড়া আর কেউ তা জানে না। তিনি দাজ্জালের বের হওয়ার কথা উল্লেখ করে বললেন: অতঃপর আমি (পৃথিবীতে) অবতরণ করে তাকে হত্যা করব। এরপর লোকেরা তাদের নিজ নিজ দেশে ফিরে আসবে। তখন তাদের সামনে ইয়া'জূজ ও মা'জূজ বের হয়ে আসবে, আর তারা প্রতিটি উচ্চ স্থান থেকে দ্রুত ছুটে আসবে। তারা কোনো পানির স্থানের পাশ দিয়ে গেলে তা পান করে নিঃশেষ করে ফেলবে এবং কোনো বস্তুর উপর দিয়ে গেলে তাতে কেবলই বিপর্যয় সৃষ্টি করবে। তারা আমার কাছে ফরিয়াদ করবে। তখন আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করব। ফলে আল্লাহ তাদের মেরে ফেলবেন। তখন তাদের গন্ধে পৃথিবী দুর্গন্ধযুক্ত হয়ে যাবে। তারা পুনরায় আমার কাছে ফরিয়াদ করবে। তখন আমি আল্লাহর কাছে দু'আ করব। ফলে আল্লাহ আসমান থেকে পানি বর্ষণ করবেন। সেই পানি তাদের দেহসমূহ বহন করে সমুদ্রে নিক্ষেপ করবে। এরপর পর্বতসমূহ চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দেওয়া হবে এবং চামড়াকে সম্প্রসারিত করার মতো করে যমীনকে প্রসারিত করে দেওয়া হবে। এ বিষয়ে আল্লাহ আমার নিকট অঙ্গীকার নিয়েছেন যে, যখন এমনটি হবে, তখন কিয়ামতের বিষয়টি মানুষের কাছে এমন গর্ভবতী নারীর মতো হবে, যার পূর্ণ মেয়াদ হয়ে গেছে। এর অধিবাসীরা জানে না যে কখন তা রাত বা দিনে প্রসবের মাধ্যমে তাদেরকে বিস্মিত করে দেবে।

আল-আওয়াম (রাবী) বলেন: আমি আল্লাহর কিতাবে এর সমর্থন পেয়েছি। অতঃপর তিনি পাঠ করলেন: "অবশেষে যখন ইয়া'জূজ ও মা'জূজকে মুক্ত করে দেওয়া হবে এবং তারা প্রতিটি উচ্চ ভূমি থেকে ছুটে আসবে। এবং প্রতিশ্রুত সত্য কিয়ামত নিকটবর্তী হবে।" (সূরা আল-আম্বিয়া: ৯৬-৯৭)




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: فتجفوا، وهو تحريف، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، ومعناه: تُنتِن الأرض من ريحهم.



[2] إسناده ضعيف كما سلف بيانه برقم (3489).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8713)


8713 - أخبرني محمد بن علي الصَّنعاني بمكة حَرَسَها الله، حدثنا إسحاق بن إبراهيم الدَّبَري، أخبرنا عبد الرزاق، أخبرنا مَعمَر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر [1]، عن عيَّاش بن أبي رَبيِعة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تجيءُ الريحُ بين يَدَيِ الساعة فتَقبِضُ روحَ كلِّ مؤمن" [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আইয়াশ ইবনে আবী রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “কিয়ামতের প্রাক্কালে একটি বাতাস আসবে, যা প্রত্যেক মুমিনের রূহ (আত্মা) কব্জা করে নেবে।”




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] كذا وقع هنا في النسخ الخطية وفي "تلخيص الذهبي": نافع عن ابن عمر، وهو خطأ، ووقع في المطبوع: نافع مولى ابن عمر، فصار من رواية نافع عن عياش، وهو المحفوظ، وقد سلف الحديث بهذا الإسناد عند المصنف برقم (8611) بإسقاط ابن عمر على الصواب.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه بين نافع وعياش. وهو مكرر (8611).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8714)


8714 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا أحمد بن عبد الجبار، حدثنا يونسُ بن بُكَير، عن محمد بن إسحاق، حدثني عاصم بن عمر بن قَتادة الأنصاري ثم الظَّفَري، عن محمود بن لَبِيد - أخو بني عبدِ الأشهل - عن أبي سعيد الخُدْري قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "تُفتَحُ يأجوجُ ومأجوجُ يَخرُجون على الناس كما قال الله تعالى: {مِنْ كُلِّ حَدَبٍ يَنْسِلُونَ} [الأنبياء: 96]، فيَعِيثُون في الأرض، ويَنحازُ المسلمون إلى مَدائنِهم وحُصونِهم، ويَضُمُّون إليهم مواشيَهم، ويشربون مياهَ الأرض، حتى إنَّ بعضهم لَيَمرُّ بالنهر فيشربون ما فيه حتى يتركوه يابسًا، حتى إن مَن بعدَهم لَيَمُرُّ بذلك النهر فيقول: لقد كان هاهنا ماءٌ مرّةً، حتى إذا لم يَبْقَ من الناس أحدٌ إِلَّا أَخَذ في حصن أو مدينةٍ قال قائلهم: هؤلاءِ أهلُ الأرض قد فَرَغْنا منهم، بقيَ أهلُ السماء، قال: ثم يَهُزُّ أحدُهم حَرْبتَه ثم يَرمي بها إلى السماء، فتَرجِعُ مُخضَّبةً دمًا للبلاءِ والفِتنة، فبينما هم على ذلك بَعَثَ الله عليهم دُودًا في أعناقهم كالنَّغَفِ، فيخرجُ في أعناقهم، فيُصبِحون موتى لا يُسْمَعُ لهم حِسٌّ، فيقول المسلمون: ألا رجلٌ يَشْري لنا بنفسه فينظرُ ما فعل هذا العدوُّ، قال: ثم يتجرَّدُ رجلٌ منهم لذلك مُحتسِبًا بنفسه، فرابَطَها [1] على أنه مقتول، فيَنزِلُ فيَجدُهم موتى بعضُهم على بعض، فينادي: يا معشرَ المسلمين، أَبشِروا، فإنَّ الله قد كَفَاكم عدوَّكم، فيخرجون من مدائنِهم وحصونِهم، ويُسرِّحُون مواشيَهم، فما يكون لها رِعْيٌ إلَّا لحومُهم، فتَشكَرُ عنه كأحسنِ ما شَكِرَت عن شيءٍ من النَّبات أصابَتْه قطُّ" [2].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: "ইয়াজুজ ও মাজুজের জন্য পথ খুলে দেওয়া হবে। তারা দ্রুত মানুষের দিকে বের হয়ে আসবে, যেমন আল্লাহ তাআলা বলেছেন: ‘{তারা প্রতিটি উচ্চভূমি থেকে ছুটে আসবে।}’ [সূরা আম্বিয়া: ৯৬] অতঃপর তারা পৃথিবীতে বিপর্যয় সৃষ্টি করবে। মুসলিমরা তখন তাদের শহর ও দুর্গে আশ্রয় নেবে এবং তাদের গবাদিপশুগুলোকে নিজেদের কাছে গুটিয়ে নেবে। তারা পৃথিবীর সব পানি পান করে ফেলবে। এমনকি তাদের কেউ কেউ নদীর পাশ দিয়ে অতিক্রম করবে এবং তাতে থাকা সমস্ত পানি পান করে নদীটিকে শুকিয়ে দেবে। ফলে তাদের পরে যারা সেই নদী অতিক্রম করবে, তারা বলবে: ‘এখানে একসময় পানি ছিল!’ অবশেষে যখন দুর্গে বা শহরে আশ্রয় নেওয়া ব্যতীত আর কোনো মানুষ অবশিষ্ট থাকবে না, তখন তাদের (ইয়াজুজ-মাজুজের) একজন বলবে: ‘এরা তো হলো পৃথিবীর অধিবাসী, আমরা তাদের কাজ শেষ করে ফেলেছি। বাকি রইল আকাশের অধিবাসীগণ।’ অতঃপর তাদের একজন তার বর্শা নাড়িয়ে আকাশের দিকে নিক্ষেপ করবে। ফিতনা ও পরীক্ষার জন্য তা রক্তে রঞ্জিত হয়ে তাদের কাছে ফিরে আসবে। তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, তখন আল্লাহ তাদের ঘাড়ে ‘নাগাফ’ (এক প্রকার কীট) এর মতো কীট সৃষ্টি করবেন। সেই কীটগুলো তাদের ঘাড়ের ভেতরে বের হবে, ফলে তারা এমন মৃত অবস্থায় সকালে পৌঁছাবে যে, তাদের কোনো সাড়াশব্দও শোনা যাবে না। মুসলিমরা তখন বলবে: ‘এমন কেউ কি নেই যে আমাদের জন্য নিজের জীবন উৎসর্গ করে দেখবে শত্রুরা কী করেছে?’ অতঃপর মুসলিমদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি এই কাজের জন্য নিজেকে প্রস্তুত করবে এবং মনকে স্থির করবে যে সে নিশ্চিত নিহত হবে। সে নিচে নামবে এবং দেখবে যে তারা (ইয়াজুজ ও মাজুজ) একজন আরেকজনের ওপর মৃত অবস্থায় পড়ে আছে। তখন সে ডেকে বলবে: ‘হে মুসলিম সম্প্রদায়, সুসংবাদ গ্রহণ করো! নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের শত্রুর বিরুদ্ধে তোমাদের জন্য যথেষ্ট হয়েছেন।’ অতঃপর তারা তাদের শহর ও দুর্গ থেকে বেরিয়ে আসবে এবং তাদের গবাদিপশুগুলোকে ছেড়ে দেবে। আর তাদের (গবাদিপশুর) খাদ্য হবে শুধু তাদের (ইয়াজুজ-মাজুজের) গোশত। আর এই গোশত খেয়ে পশুগুলো এত ভালো ও উত্তমভাবে স্বাস্থ্য লাভ করবে, যেমনটা তারা কখনও কোনো উদ্ভিদ খেয়েও লাভ করেনি।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] هكذا في النسخ الخطية، وفي "تلخيص الذهبي": وطّنها، وفي "مسند أحمد": قد أطَّنها. وقوله: فرابَطَها، بمعنى: جاهد نفسه وغالبها على أنه مقتول، وهو بمعنى وطّنها وأطّنها.



[2] إسناده حسن.وأخرجه ابن ماجه (4079) عن أبي كريب، عن يونس بن بكير، بهذا الإسناد.وأخرجه أحمد 18/ (11731)، وابن حبان (6830) من طريق إبراهيم بن سعد الزهري، عن محمد بن إسحاق، به. أيضًا 17/ 88 من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم (المغيرة ومعمر وسفيان) عن أبي إسحاق، به موقوفًا. ووقع عند الطبراني في "الكبير" من طريق الطيالسي مرفوعًا، وهو وهمٌ من بعض رواته. وسيأتي عند المصنف في آخر خبر مطوَّل برقم (8736) من طريق معمر عن أبي إسحاق موقوفًا.وخالف زيادُ بن خيثمة عند الطبراني في "الأوسط" (8598)، فرواه عن أبي إسحاق عن وهب ابن جابر عن عبد الله بن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم، فرفعه، وروايته شاذَّة، وشيخ الطبراني فيه - واسمه منتصر بن محمد - في حاله جهالة.وخالف أيضًا زيدُ بن أبي أُنيسة عند ابن حبان (6828)، فرواه عن أبي إسحاق عن عمرو بن ميمون عن عبد الله بن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم. وروايته هذه شاذَّة أيضًا، وقد روى أصل حديث ابن مسعود غيرُ واحد عن أبي إسحاق لم يذكروا فيه يأجوج ومأجوج والأمم الثلاث، كما هو مبيَّن في عملنا على "صحيح ابن حبان".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8715)


8715 - حدثني محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا المسيَّب بن زُهير، حدثنا عاصم بن علي، حدثنا شُعْبة، عن أبي إسحاق قال: سمعت وهبَ بن جابر يحدِّث عن عبد الله بن عمرو قال: يأجوجُ ومأجوجُ يَمُرُّ أولُهم بنهرٍ مثل دِجْلةَ ويمرُّ آخرُهم فيقول: قد كان في هذا النهر مرَّةً ماءٌ، ولا يموتُ رجلٌ إِلَّا تركَ ألفًا من ذرِّيته فصاعدًا، ومِن بعدِهم ثلاثةُ أُمم: تاديس، وتاويل، وتاسك أو متسك [1]؛ شكَّ شعبةُ [2]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াজুজ ও মাজুজের প্রথম দলটি দজলার মতো একটি নদীর পাশ দিয়ে অতিক্রম করবে। আর যখন তাদের শেষ দলটি অতিক্রম করবে, তখন তারা বলবে: 'একসময় এই নদীতে পানি ছিল।' তাদের কোনো লোক মৃত্যুবরণ করে না, তবে সে তার পিছনে এক হাজার বা তারও বেশি বংশধর রেখে যায়। আর তাদের পর তিনটি জাতি রয়েছে: তাদিস, তা'ওয়ীল, এবং তাসিক অথবা মুতাসিক। (শু'বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) এই বর্ণনাকারী শব্দটির ব্যাপারে সন্দেহ প্রকাশ করেছেন)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] قوله: "وتاسك أو متسك" من "تلخيص الذهبي"، ومكانه في النسخ الخطية: وتلتل، والأقرب إلى الصواب ما أثبتناه من "التلخيص"، وهو الموافق لما في بعض مصادر التخريج من طريق شعبة، وفيها: ناسك أو منسك، بالنون فيهما. أيضًا 17/ 88 من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم (المغيرة ومعمر وسفيان) عن أبي إسحاق، به موقوفًا. ووقع عند الطبراني في "الكبير" من طريق الطيالسي مرفوعًا، وهو وهمٌ من بعض رواته. وسيأتي عند المصنف في آخر خبر مطوَّل برقم (8736) من طريق معمر عن أبي إسحاق موقوفًا.وخالف زيادُ بن خيثمة عند الطبراني في "الأوسط" (8598)، فرواه عن أبي إسحاق عن وهب ابن جابر عن عبد الله بن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم، فرفعه، وروايته شاذَّة، وشيخ الطبراني فيه - واسمه منتصر بن محمد - في حاله جهالة.وخالف أيضًا زيدُ بن أبي أُنيسة عند ابن حبان (6828)، فرواه عن أبي إسحاق عن عمرو بن ميمون عن عبد الله بن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم. وروايته هذه شاذَّة أيضًا، وقد روى أصل حديث ابن مسعود غيرُ واحد عن أبي إسحاق لم يذكروا فيه يأجوج ومأجوج والأمم الثلاث، كما هو مبيَّن في عملنا على "صحيح ابن حبان".



[2] إسناده حسن إن شاء الله، ووهب بن جابر وإن لم يرو عنه غير أبي إسحاق - وهو عمرو بن عبد الله السَّبيعي - قد وثقه العجلي ويحيى بن معين وابن حبان.وأخرجه نعيم بن حماد في "الفتن" (1656)، والطبري 17/ 88 من طريق محمد بن جعفر، وأبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (680) من طريق عاصم بن حكيم، كلاهما عن شعبة، بهذا الإسناد. ورواية عاصم مختصرة.وأخرج قصة الذرية منه والأمم الثلاث الطيالسي (2396) - ومن طريقه الطبراني في "الكبير" (14456) - عن المغيرة بن مسلم القسملي، وعبد الرزاق في "تفسيره" 2/ 29، ونعيم بن حماد (1642)، والطبري 17/ 89 من طريق معمر - وهو في "جامعه" برقم (20810) - والطبري أيضًا 17/ 88 من طريق سفيان الثوري، ثلاثتهم (المغيرة ومعمر وسفيان) عن أبي إسحاق، به موقوفًا. ووقع عند الطبراني في "الكبير" من طريق الطيالسي مرفوعًا، وهو وهمٌ من بعض رواته. وسيأتي عند المصنف في آخر خبر مطوَّل برقم (8736) من طريق معمر عن أبي إسحاق موقوفًا.وخالف زيادُ بن خيثمة عند الطبراني في "الأوسط" (8598)، فرواه عن أبي إسحاق عن وهب ابن جابر عن عبد الله بن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم، فرفعه، وروايته شاذَّة، وشيخ الطبراني فيه - واسمه منتصر بن محمد - في حاله جهالة.وخالف أيضًا زيدُ بن أبي أُنيسة عند ابن حبان (6828)، فرواه عن أبي إسحاق عن عمرو بن ميمون عن عبد الله بن مسعود عن النبي صلى الله عليه وسلم. وروايته هذه شاذَّة أيضًا، وقد روى أصل حديث ابن مسعود غيرُ واحد عن أبي إسحاق لم يذكروا فيه يأجوج ومأجوج والأمم الثلاث، كما هو مبيَّن في عملنا على "صحيح ابن حبان".









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8716)


8716 - حدثنا علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا معاذ بن المثنَّى العَنبَري، حدثنا عمرو بن مرزوق، حدثنا عِمران القَطَّان، عن قَتَادة، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن مَعْدان بن طَلْحة، عن عمرو البِكَالي، عن عبد الله بن عمرو قال: إِنَّ الله عز وجل جزَّأَ الخلقَ عَشَرةَ أجزاءٍ، فجعل تسعةَ أجزاءٍ الملائكةَ وجزءًا سائرَ الخلق، وجزَّأَ الملائكةَ عشرةَ أجزاءٍ، فجعل تسعةَ أجزاءٍ يُسبِّحون الليلَ والنهارَ لا يَفتُرُون، وجزءًا لرسالتِه، وجزَّأَ الخلقَ عشرةَ أجزاءٍ [1]، فجعل تسعةَ أجزاءٍ يأجوجَ ومأجوجَ وجزءًا سائرَ الخلق.{وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْحُبُكِ} [الذاريات: 7] قال: السماءُ السابعة، والحَرَمُ بحِيالِهِ العَرْشُ [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তা‘আলা সৃষ্টিজগতকে দশ ভাগে বিভক্ত করেছেন। অতঃপর তিনি নয় ভাগ করেছেন ফিরিশতাদের এবং এক ভাগ করেছেন অন্যান্য সৃষ্টিকুল। তিনি ফিরিশতাদেরকে আবার দশ ভাগে বিভক্ত করেছেন। অতঃপর তিনি নয় ভাগ করেছেন তাদের জন্য, যারা দিন-রাত আল্লাহর তাসবীহ পাঠ করে এবং কখনো ক্লান্ত হয় না। আর এক ভাগ করেছেন তাঁর রিসালাতের (বাণী পৌঁছানোর) জন্য। তিনি (সাধারণ) সৃষ্টিকুলকে আবার দশ ভাগে বিভক্ত করেছেন। অতঃপর তিনি নয় ভাগ করেছেন ইয়াজুজ ও মাজুজের জন্য এবং এক ভাগ করেছেন অন্যান্য সৃষ্টিকুল। তিনি বলেন, "আর শপথ কক্ষপথবিশিষ্ট আকাশের" (সূরা যারিয়াত, আয়াত ৭)—এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো সপ্তম আকাশ। আর হারামের (কাবা শরীফের) বরাবরই হচ্ছে আরশ।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] زاد هنا في "تلخيص الذهبي" وليس في شيء من نسخنا الخطية: فجعل تسعة أجزاءٍ الجنَّ وجزءًا بني آدم، وجزّأ بني آدم عشرة أجزاء. وهذا الحرف ثابت عند غير المصنف ممَّن خرَّج هذا الخبر. كلاهما عن عمران القطان، بهذا الإسناد. وفيه عند المروذي: السماء السادسة، بدل السابعة ولم يرد هذا الحرف عند الطبري.وأخرجه يحيى بن سلام في "تفسيره" 1/ 344 عن سعيد بن أبي عروبة، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (531) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 462 - من طريق شيبان النحوي، كلاهما عن قتادة به. ولم يذكرا آية الذاريات.



[2] إسناده حسن من أجل عمران بن داور القطان، وهو متابع.وأخرجه أبو بكر المرُّوذي في "أخبار الشيوخ وأخلاقهم" (313) من طريق عبد الرحمن بن مهدي، والطبري في "تفسيره" 17/ 13 من طريق عبد الرحمن بن مهدي وأبي داود الطيالسي، كلاهما عن عمران القطان، بهذا الإسناد. وفيه عند المروذي: السماء السادسة، بدل السابعة ولم يرد هذا الحرف عند الطبري.وأخرجه يحيى بن سلام في "تفسيره" 1/ 344 عن سعيد بن أبي عروبة، وأبو القاسم بن بشران في "أماليه" (531) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 462 - من طريق شيبان النحوي، كلاهما عن قتادة به. ولم يذكرا آية الذاريات.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8717)


8717 - حدثني أبو بكر محمد أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن شاذانَ الجَوهَري، حدثنا سعيد بن سليمان الواسطي، حدثنا خَلَف بن خَليفة الأشجعي، حدثنا أبو مالك الأشجعي، عن أبي حازم الأشجعي، عن رِبْعيِّ بن حِرَاش، عن حُذيفة بن اليَمَان قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنا أعلمُ بما مع الدَّجّال منه، معه نهرانِ أحدُهما نارٌ تَأجَّجُ في عينِ مَن رآه، والآخَرُ ماءٌ أبيضُ، فإن أدرَكَه منكم [أحدٌ] فليُغمِضْ وليَشْرَبْ من الذي يراه نارًا، فإنه ماءٌ بارد، وإياكم والآخَرَ فإنه الفِتنةُ، واعلموا أنه مكتوبٌ بين عينيهِ كافرٌ، يقرؤُه من يكتبُ ومن لا يكتب، وإنَّ إحدى عَينيهِ ممسوحةٌ عليها ظَفَرةٌ، إنه إنه يَطلُعُ من آخر أَمَدِه على بَطْن الأُردنِّ على ثَنِيَّة أَفِيقَ، وكلُّ أحدٍ يؤمنُ بالله واليوم الآخر ببَطْن الأُردنّ، وإنه يَقتُل من المسلمين ثُلثًا، ويَهزِمُ ثلثًا، ويُبقِي ثلثًا [1]، وَيَجُنُّ عليهم الليلُ فيقول بعضُ المؤمنين لبعض: ما تَنتظِرون أن تَلحَقوا بإخوانكم في مَرْضاةِ ربِّكم؟ مَن كان عنده فَضْلُ طعامٍ فليَعُدْ به على أخيه، وصَلُّوا حين ينفجرُ الفجرُ، وعجِّلوا الصلاةَ، ثم أَقبِلوا على عدوِّكم.فلما قاموا يصلُّون نَزَلَ عيسى ابن مريمَ صلوات الله عليه أَمامَهم، فصلَّى بهم، فلما انصرف قال هكذا: أَفرِجُوا بيني وبينَ عدوِّ الله - قال أبو حازم [2]: قال أبو هريرة: فيذوبُ كما تذوبُ الإِهالةُ في الشمس، وقال عبد الله بن عمرو: كما يذوبُ المِلحُ في الماء - وسَلَّطَ الله عليهم المسلمين فيَقتُلونهم، حتى إنَّ الشجرةَ والحجرَ ليُنادي: يا عبدَ الله، يا عبدَ الرحمن، يا مسلمُ، هذا يهوديٌّ فاقتُلْه، فيُفنِيهم الله، ويَظْهَرُ المسلمون فيَكِسرون الصَّليب، ويقتلون الخِنزير، ويَضَعُون الجِزْية.فبينما هم كذلك، أَخرَجَ اللهُ أهلَ يأجوجَ ومأجوجَ، فيشربُ أوَّلُهم البُحَيرةَ، ويجيءُ آخرهم وقد انتَشَفُوه فما يَدَعُون فيه قَطْرةً، فيقولون: ظَهَرْنا على أعدائنا، قد كان هاهنا أثرُ ماءٍ، فيجئُ نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم وأصحابُه وراءَه حتى يدخلوا مدينةً من مدائن فلسطين يقال لها: لُدٌّ، فيقولون: ظَهَرْنا على مَن في الأرض، فتعالَوْا نُقاتِلُ مَن في السماء، فيَدْعُو الله نبيُّه صلى الله عليه وسلم عند ذلك، فيَبعَثُ اللهُ عليهم قَرْحةً في حُلوقهم، فلا يبقى منهم بشرٌ، فتُؤْذي رِيحُهم المسلمين، فيَدعُو عيسى صلوات الله عليه عليهم، 4/ 492 فيُرسِلُ الله عليهم ريحًا فتَقذِفُهم في البحر أَجمعين" [3].هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দাজ্জালের কাছে কী থাকবে, সে সম্পর্কে আমি তার চেয়ে বেশি জানি। তার সাথে দুটি নদী থাকবে। এর মধ্যে একটি হবে প্রজ্জ্বলিত আগুন যা যে কেউ দেখবে তার চোখকে ঝলসে দেবে, আর অপরটি হবে শুভ্র পানি। তোমাদের মধ্যে যে কেউ তাকে পেলে সে যেন চোখ বন্ধ করে নেয় এবং যেটিকে সে আগুন দেখবে, সেটি থেকে পান করে। কারণ সেটি শীতল পানি। আর তোমরা অন্যটি (শুভ্র পানি) থেকে সতর্ক থেকো, কারণ সেটিই হলো ফিতনা। তোমরা জেনে রেখো যে, তার দুই চোখের মাঝখানে ‘কাফির’ (অবিশ্বাসী) শব্দটি লেখা থাকবে। যে লিখতে জানে এবং যে জানে না, উভয়ই তা পড়তে পারবে। আর তার একটি চোখ হবে বিলীন (মাসহ), তার ওপর একটি নখর বা মাংসপিণ্ড থাকবে।

সে (দাজ্জাল) তার শেষ সময়ে জর্ডানের সমতল ভূমিতে আফীক গিরিপথের কাছে আবির্ভূত হবে। আল্লাহর প্রতি ও আখেরাতের দিনের প্রতি ঈমানদার প্রতিটি ব্যক্তি জর্ডানের সমতল ভূমিতে থাকবে। সে মুসলমানদের এক-তৃতীয়াংশকে হত্যা করবে, এক-তৃতীয়াংশকে পরাজিত করবে এবং এক-তৃতীয়াংশকে অবশিষ্ট রাখবে। তাদের ওপর যখন রাত নেমে আসবে, তখন কিছু মুমিন অপর কিছু মুমিনকে বলবে: তোমরা তোমাদের ভাইদের সাথে তোমাদের রবের সন্তুষ্টি অর্জনের জন্য মিলিত হতে আর কীসের অপেক্ষা করছো? যার কাছে অতিরিক্ত খাবার আছে, সে যেন তার ভাইকে তা দেয়। আর ফজরের উদয়ের সময় তোমরা সালাত আদায় করো এবং সালাত তাড়াতাড়ি শেষ করো, অতঃপর তোমাদের শত্রুর দিকে অগ্রসর হও।”

যখন তারা সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়াবে, তখন মরিয়ম পুত্র ঈসা (আঃ) তাদের সামনে অবতরণ করবেন এবং তিনি তাদের নিয়ে সালাত আদায় করবেন। সালাত শেষে তিনি এভাবে বলবেন: আমার ও আল্লাহর শত্রুর (দাজ্জালের) মাঝখান থেকে সরে যাও। (আবু হাযিম বলেন: আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: তখন সে (দাজ্জাল) সূর্যের তাপে চর্বি গলে যাওয়ার মতো গলে যাবে। আর আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: সে পানিতে লবণ গলে যাওয়ার মতো গলে যাবে।) আল্লাহ মুসলমানদেরকে তাদের (দাজ্জালের অনুসারীদের) ওপর ক্ষমতাবান করবেন, ফলে তারা তাদের হত্যা করবে। এমনকি বৃক্ষ ও পাথর পর্যন্ত ডেকে বলবে: হে আল্লাহর বান্দা! হে আব্দুর রহমান! হে মুসলিম! এই যে এক ইহুদী, তাকে হত্যা করো! ফলে আল্লাহ তাদেরকে (ইহুদীদের) সম্পূর্ণ ধ্বংস করে দেবেন এবং মুসলিমরা বিজয়ী হবে। তারা ক্রুশ ভেঙে ফেলবে, শূকর হত্যা করবে এবং জিযিয়া বন্ধ করে দেবে।

তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, তখন আল্লাহ ইয়াজুজ ও মাজুজের জাতিকে বের করে দেবেন। তাদের প্রথম দলটি একটি হ্রদের সব পানি পান করে ফেলবে। আর তাদের শেষ দলটি এসে দেখবে যে তারা তা শুকিয়ে ফেলেছে এবং এক ফোঁটাও অবশিষ্ট রাখেনি। তখন তারা বলবে: আমরা আমাদের শত্রুদের ওপর জয়ী হয়েছি। এখানে পানির চিহ্ন ছিল। তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ পেছনে চলে যাবেন, এমনকি তারা ফিলিস্তিনের একটি শহর, যার নাম লুদ, সেখানে প্রবেশ করবেন। (ইয়াজুজ ও মাজুজ তখন বলবে:) আমরা পৃথিবীতে যারা আছে তাদের ওপর বিজয়ী হয়েছি, এবার এসো, আমরা আকাশবাসীদের সাথে লড়াই করি! তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহ্‌র কাছে দু’আ করবেন। আল্লাহ তখন তাদের গলায় এক ধরনের ফোঁড়া বা ঘা সৃষ্টি করবেন, ফলে তাদের কেউই জীবিত থাকবে না। তাদের দুর্গন্ধ মুসলিমদের কষ্ট দেবে। তখন ঈসা (আঃ) তাদের বিরুদ্ধে দু’আ করবেন। ফলে আল্লাহ তাদের ওপর একটি বাতাস প্রেরণ করবেন যা তাদের সকলকে সমুদ্রে নিক্ষেপ করবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في "تلخيص الذهبي": ويبقى ثلث، وهو أوجه، وكانت كذلك في (ب) ثم أُلحق بها ألف فصارت: ثلثًا.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: أبو حارمة، والتصويب من "تلخيص الذهبي".



8717 [3] - إسناده حسن من أجل خلف بن خليفة، لكن قال الحافظ ابن كثير في "البداية والنهاية" 19/ 216: فيه سياق غريب وأشياء منكرة، والله أعلم.أبو مالك الأشجعي: هو سعد بن طارق، وأبو حازم الأشجعي: هو سلمان.وأخرجه ابن منده في "الإيمان" (1033) من طريق أحمد بن مهدي، عن سعيد بن سليمان الواسطي، بهذا الإسناد. إلّا أنه أسقط منه أبا حازم، ورواية أبي مالك الأشجعي عن ربعي بن حراش معروفة مشهورة.وأخرج أوله إلى قوله: "عليها ظفرة": أحمد 38/ (23279)، ومسلم (2934) (105) من طريق يزيد بن هارون، عن أبي مالك الأشجعي، عن ربعي، عن حذيفة. ولم يذكر فيه أبا حازم.وأخرج منه قصة النهرين النار والماء البارد: أحمد (23338)، وأبو داود (4315) من طريق منصور بن المعتمر، وأحمد (23353)، والبخاري (3450)، ومسلم (2934) (106) و (107) من طريق عبد الملك بن عمير، ومسلم (2934) (108)، وابن حبان (6799) من طريق نعيم بن أبي هند ثلاثتهم عن ربعي بن حراش، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8718)


8718 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، إملاءً في الجامع قبلَ بناء الدار للشيخ الإمام، في شعبان سنةَ ثلاثين وثلاث مئة، حدثنا أبو محمد الرَّبيعُ بن سليمان بن كامل المُرادي سنةَ ستٍّ وستين، حدثنا بِشْر بن بكر التِّنِّيسي، حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، أخبرني يحيى بن جابر الحِمْصي، حدثنا عبد الرحمن بن جُبير بن نُفير الحَضْرمي، حدثني أَبي، أنه سمع النَّوّاس بن سِمْعان الكِلَابي يقول: ذكرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الدَّجّالَ ذاتَ غَدَاةٍ، فخفَّض فيه ورفَّع، حتى ظننَّاه في طائفة النَّخل، فلما رُحْنا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، عَرَفَ ذلك فينا وقال: "ما شَأْنُكم؟ " فقلنا: يا رسول الله، ذكرتَ الدجالَ الغداةَ فخفَّضتَ ورفَّعتَ، حتى ظننَّاه في طائفة من النخل، قال: "إنْ يَخرُجْ، فأنا حَجيجُه دونَكم، وإن يَخرُجْ ولستُ فيكم، فامْرُؤٌ حَجيجُ نفسِه، واللهُ خَليفتي على كلِّ مسلم.إنه شابٌّ قَطَطٌ، لحيتُه قائمة، كأنه شَبيهٌ بعبد العُزَّى بن قَطَن، فمن رآه منكم فليقرأْ فواتحَ سورةِ أصحابِ الكهف" ثم قال: "أُراه يخرجُ ما بينَ الشام والعراق، فعاثَ يمينًا وعاثَ شِمالًا، يا عبادَ الله اثبُتوا" قلنا: يا رسول الله، وما لَبْثُه في الأرض؟ قال: "أربعين يومًا، يومٌ كسَنةٍ، ويومٌ كشهرٍ، ويومٌ كجُمُعةٍ، وسائرُ أيامِه كأيامكم" قال: قلنا: يا رسول الله، فذلك الذي كسَنةٍ، يَكْفينا فيه صلاةُ يوم؟ قال: "لا، اقدُرُوا له قَدْرَه"، قلنا: يا رسول الله، فما إسراعُه في الأرض؟ قال: "كالغَيثِ استَدبَرَتُه الريحُ".قال: "فيأتي على القوم فيَدْعُوهم، فيُؤمِنون به ويَستجيبون له، فيأمرُ السماءَ فتُمطِرُ، ويأمرُ الأرضَ فتُنبِت، وتَرُوحُ عليهم سارِحَتُهم أطولَ ما كانت ذُرًا [1]، وأَسبَغَه ضُروعًا، وأمَدَّه خواصرَ، ثم يأتي القومَ فيَدْعوهم فيَرُدُّون عليه قولَه، فينصرِفُ [2] عنهم فتَتبَعُه أموالُهم ويُصبِحون مُمحِلين ما بأيديهم شيءٌ، ثم يمرُّ بالخَرِبةِ فيقول لها: أَخرجي كنوزَك، فينطلقُ وتَتبعُه كنوزُها كيَعاسِيبِ النَّحل، ثم يدعو رجلًا مسلمًا شابًّا فيضربُه بالسيف فيَقطَعُه جَزْلتَينِ، قَطْعَ رَمْيةِ الغَرَض، ثم يدعوه فيُقبِلُ يتهلَّلُ وجهُه يضحكُ".قال: "فبَيْنا هو كذلك، إذْ بَعَثَ اللهُ تعالى عيسى ابنَ مريم، فيَنزِلُ عند المَنارةِ البيضاءِ شرقيَّ دمشقَ في مَهرودَتَينِ واضعًا كَفَّيهِ على أجنحةِ مَلَكَين، إذا طأْطَأ رأسَه قَطَرَ، وإذا رفعه تَحدَّرَ منه جُمَانٌ كاللُّؤلؤ، ولا يَحِلُّ لكافرٍ يَجِدُ ريحَ نَفَسِه إلَّا مات، يَنتَهي حيث يَنتَهي طَرْفُه، فيَطلُبُه حتى يُدرِكَه عند بابِ لُدٍّ، فيقتلُه اللهُ، ثم يأتي عيسى ابن مريم عليه السلام نبيُّ الله قومًا قد عَصَمَهم الله منه، فيَمسَحُ عن وجوهِهم [3]، ويحدِّثُهم عن درجاتهم في الجنة.فبينما هم كذلك إذْ أوحى الله إليه: يا عيسى، إني قد أخرجتُ عبادًا لي لا يدَ [4] لأحدٍ بقتالِهم، حَوِّزْ عبادي إلى الطُّور. ويَبعَثُ الله يأجوجَ ومأجوجَ وهم من كلِّ حَدَبٍ يَنسِلُون، ويمرُّ أوائلُهم على بُحَيرةِ الطَّبَريَّة، فيشربون ما فيها، ثم يمرُّ آخرُهم فيقولون: لقد كان في هذا ماءٌ مرةً، فيُحصَرُ نبيُّ الله عيسى وأصحابُه حتى يكونَ رأسُ الثَّور لأحدهم يومئذٍ خيرًا من مئةِ دينار لأحدكم اليومَ، فيَرغَبُ نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم وأصحابُه إلى الله عز وجل، فيُرسِلُ الله عليهم النَّغَفَ في رقابهم، فيصبحون فَرْسَى كموتِ نفسٍ واحدة، فيَهبِطُ نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم وأصحابُه لا يَجِدُون موضعَ شبرٍ إلَّا وقد ملأَه اللهُ زَهَمَهم ونَتْنَهم ودماءَهم، ويرغبُ نبيُّ الله عيسى وأصحابه إلى الله، فيُرسِلُ الله طيرًا كأعناقِ البُخْت، فتَحمِلُهم وتَطرَحُهم حيث شاء الله، ثم يرسلُ الله مطرًا لا يَكُنُّ منه بيتُ مَدَرٍ ولا وَبَرٍ، فيَغسِلُ الأرضَ حتى يتركَها كالزَّلَقَة، ثم قال للأرض: أَنبِتي ثمرَك، ورُدِّي بَركتَك، فيومئذٍ تأكل العِصابةُ من الرُّمّانة ويستظلُّون بقِحْفِها، ويُبارَكُ في الرِّسْل، حتى إنَّ اللِّقْحةَ من الإبل لَتَكفي الفِئامَ من الناس، واللِّقْحةَ من البقر تكفي القبيلةَ، واللِّقْحةَ من الغنم تكفي الفَخِذَ، فبينما هم كذلك، إذْ بعثَ الله ريحًا طيِّبةً تأخذُ تحت آباطِهم، وتَقبِضُ روحَ كلِّ مسلم، ويبقى سائرُ الناس يَتهارَجُون كما تَهارَجُ الحُمُرُ، فعليهم تقوم الساعةُ" [5]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




নাওয়াস ইবনু সামআন আল-কিলাবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একদিন সকালে দাজ্জাল সম্পর্কে আলোচনা করলেন। তিনি কখনও তার ব্যাপারকে খাটো করে দেখালেন, আবার কখনও গুরুত্ব দিলেন। এমনকি আমরা ধারণা করলাম যে, দাজ্জাল বুঝি খেজুরের বাগানের ভেতরেই (লুকিয়ে) আছে। যখন আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে ফিরে এলাম, তিনি আমাদের মনের অবস্থা বুঝতে পারলেন এবং বললেন: "তোমাদের কী হয়েছে?" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি সকালে দাজ্জালের কথা আলোচনা করলেন, কখনও তার ব্যাপারকে খাটো করলেন আবার কখনও গুরুত্ব দিলেন, ফলে আমরা ধারণা করলাম যে, সে বুঝি খেজুরের বাগানের মধ্যেই রয়েছে।

তিনি বললেন: "যদি সে এমন সময় বের হয় যখন আমি তোমাদের মাঝে আছি, তবে তোমাদের পরিবর্তে আমিই তার মোকাবিলা করব (তাকে পরাজিত করব)। আর যদি সে এমন সময় বের হয় যখন আমি তোমাদের মাঝে নেই, তবে প্রত্যেক ব্যক্তি নিজেই নিজের প্রতিপক্ষ হবে (নিজেই তাকে প্রতিহত করবে), আর আল্লাহ্ প্রত্যেক মুসলিমের অভিভাবক। নিশ্চয়ই সে একজন কোঁকড়ানো চুলবিশিষ্ট যুবক, তার দাড়ি উঁচু হয়ে আছে, সে যেন আব্দুল উযযা ইবনু কাতানের মতো দেখতে। তোমাদের মধ্যে যে তাকে দেখবে, সে যেন সূরাতুল কাহফ-এর প্রথম দিকের আয়াতগুলো পাঠ করে।"

অতঃপর তিনি বললেন: "আমি মনে করি সে সিরিয়া ও ইরাকের মধ্যবর্তী স্থান থেকে বের হবে। সে ডানে-বামে সর্বস্থানে বিপর্যয় ঘটাবে। হে আল্লাহর বান্দারা! তোমরা অবিচল থেকো।"

আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে কতদিন পৃথিবীতে অবস্থান করবে? তিনি বললেন: "চল্লিশ দিন। এর মধ্যে একটি দিন হবে এক বছরের মতো, একটি দিন হবে এক মাসের মতো, একটি দিন হবে এক সপ্তাহের মতো, আর বাকি দিনগুলো হবে তোমাদের সাধারণ দিনগুলোর মতো।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! যে দিনটি এক বছরের মতো হবে, তাতে কি আমাদের একদিনের সালাতই যথেষ্ট হবে? তিনি বললেন: "না। তোমরা সে দিনের জন্য (সময়ের) আন্দাজ করে কদর নির্ধারণ করে নেবে।" আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! পৃথিবীতে তার চলাচলের গতি কেমন হবে? তিনি বললেন: "যেমন বৃষ্টি, যাকে বাতাস পিছন দিক থেকে তাড়িত করে নিয়ে যায়।"

তিনি বললেন: "সে একটি কাওমের কাছে এসে তাদের (নিজের দিকে) আহ্বান করবে। তারা তার প্রতি ঈমান আনবে এবং তার আহ্বানে সাড়া দেবে। ফলে সে আকাশকে নির্দেশ দিলে আকাশ বৃষ্টি বর্ষণ করবে এবং জমিনকে নির্দেশ দিলে জমিন ফসল উৎপাদন করবে। তাদের পশুপাল যখন সন্ধ্যায় তাদের কাছে ফিরবে, তখন সেগুলোর কুঁজ সবচেয়ে লম্বা হবে, ওলান দুধে ভরে থাকবে এবং পার্শ্বদেশগুলো প্রসারিত হবে। অতঃপর সে আরেক কাওমের কাছে এসে তাদের আহ্বান জানাবে। কিন্তু তারা তার কথা প্রত্যাখ্যান করবে। সে তাদের কাছ থেকে চলে যাবে, ফলে তাদের সমস্ত ধন-সম্পদ তাকে অনুসরণ করবে (বা তাদের ধন-সম্পদ ধ্বংস হয়ে যাবে)। তারা দুর্ভিক্ষপীড়িত অবস্থায় ভোরে উপনীত হবে, তাদের হাতে কিছুই থাকবে না। অতঃপর সে এক ধ্বংসপ্রাপ্ত স্থানের পাশ দিয়ে অতিক্রম করবে এবং তাকে বলবে: 'তোমার ভেতরে লুকানো ধন-ভান্ডার বের করে দাও।' তখন সেই স্থানটি রওনা হবে এবং তার ধন-ভান্ডার মৌমাছির ঝাঁকের মতো তাকে অনুসরণ করতে থাকবে। এরপর সে এক যুবক মুসলিমকে ডাকবে এবং তাকে তলোয়ার দিয়ে এমনভাবে আঘাত করবে যে, তার দেহ দু'টুকরা হয়ে যাবে, যেমন তীর নিক্ষেপের স্থানে লক্ষ্যবস্তু ছিন্ন হয়ে যায়। এরপর সে তাকে আবার ডাকবে, আর সেই যুবক হাসতে হাসতে ঝলমলে চেহারা নিয়ে তার দিকে এগিয়ে আসবে।"

তিনি বললেন: "দাজ্জাল যখন এই অবস্থায় থাকবে, ঠিক সেই মুহূর্তে মহান আল্লাহ ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-কে পাঠাবেন। তিনি দামেস্কের পূর্ব দিকে অবস্থিত সাদা মিনারের কাছে হালকা হলুদ রঙের দু'টি কাপড় পরিহিত অবস্থায় অবতরণ করবেন। তিনি দু'জন ফেরেশতার ডানার ওপর তার দু'হাত রেখে দেবেন। তিনি যখন মাথা নিচু করবেন, তখন তা থেকে ফোঁটা ফোঁটা পানি ঝরবে, আর যখন মাথা উঁচু করবেন, তখন মুক্তার দানার মতো ঝুম্মান ঝরে পড়বে। কোনো কাফিরের জন্য তার নিঃশ্বাসের গন্ধ পাওয়া মাত্রই জীবিত থাকা বৈধ হবে না—সে মারা যাবে। তার (ঈসা (আঃ)-এর) দৃষ্টি যতদূর যাবে, তার নিঃশ্বাসও ততদূর পৌঁছবে। তিনি দাজ্জালকে খুঁজে বেড়াবেন, অবশেষে লুদ (লুদ্দ)-এর ফটকের কাছে তাকে ধরে ফেলবেন এবং আল্লাহ তাকে হত্যা করবেন।

এরপর আল্লাহর নবী ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ) এমন এক কাওমের নিকট আসবেন, যাদেরকে আল্লাহ দাজ্জালের অনিষ্ট থেকে রক্ষা করেছেন। তিনি তাদের চেহারা মুছে দেবেন এবং জান্নাতে তাদের মর্যাদা সম্পর্কে জানাবেন।

তারা যখন এই অবস্থায় থাকবেন, তখন আল্লাহ তা'আলা ঈসা (আঃ)-এর কাছে ওহী পাঠাবেন: 'হে ঈসা! আমি আমার এমন কিছু বান্দাকে বের করেছি যাদের সঙ্গে যুদ্ধ করার ক্ষমতা কারো নেই। অতএব তুমি আমার বান্দাদেরকে নিয়ে তূর (পাহাড়)-এর দিকে আশ্রয় গ্রহণ করো।' এরপর আল্লাহ তা'আলা ইয়া'জূজ ও মা'জূজকে বের করে দেবেন। তারা প্রতিটি উঁচু স্থান থেকে দ্রুত নেমে আসবে। তাদের প্রথম দলটি তাবারিয়া (Tiberias) হ্রদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় তার সমস্ত পানি পান করে শেষ করে ফেলবে। অতঃপর তাদের শেষ দলটি যখন সেখান দিয়ে যাবে, তখন তারা বলবে: 'এখানে একসময় পানি ছিল।' আল্লাহর নবী ঈসা (আঃ) এবং তাঁর সাথীরা (তূর পাহাড়ে) অবরুদ্ধ হয়ে পড়বেন। সে সময় তাদের কাছে একটি গরুর মাথা তোমাদের আজকের দিনের একশ' দীনারের চেয়ে উত্তম হবে।

তখন আল্লাহর নবী (আঃ) এবং তাঁর সাথীরা মহান আল্লাহর কাছে কাকুতি-মিনতি করবেন। তখন আল্লাহ তাদের ঘাড়ের ওপর ‘নাগাফ’ (এক প্রকার কীট) পাঠিয়ে দেবেন। ফলে তারা এক ব্যক্তির মৃত্যুর ন্যায় (একযোগে) ধ্বংস হয়ে যাবে। এরপর আল্লাহর নবী (আঃ) এবং তাঁর সাথীরা (পাহাড় থেকে) অবতরণ করবেন। তারা এক বিঘত পরিমাণ জায়গাও এমন পাবেন না যা তাদের (ইয়া'জূজ ও মা'জূজের) চর্বি, দুর্গন্ধ ও রক্ত দ্বারা ভরে যায়নি। তখন আল্লাহর নবী ঈসা (আঃ) এবং তাঁর সাথীরা আল্লাহর কাছে প্রার্থনা করবেন। তখন আল্লাহ বুখত (লম্বা গলাবিশিষ্ট উট)-এর ঘাড়ের মতো লম্বা গলাবিশিষ্ট পাখি পাঠাবেন। সেই পাখিগুলো তাদের (মৃতদেহ) বহন করে আল্লাহর ইচ্ছানুযায়ী স্থানে নিক্ষেপ করবে।

অতঃপর আল্লাহ এমন বৃষ্টি বর্ষণ করবেন যা কোনো মাটির বা পশমের তৈরি ঘরকে আড়াল করবে না (অর্থাৎ সর্বব্যাপী হবে)। সেই বৃষ্টি পৃথিবীকে ধুয়ে পরিষ্কার করে দেবে, এমনকি পৃথিবী চকচকে আয়নার মতো হয়ে যাবে। এরপর যমীনকে বলা হবে: 'তোমার ফল-ফসল উদগত করো এবং তোমার বরকত ফিরিয়ে দাও।' সেই দিন একটি দল একটিমাত্র ডালিম খেয়ে পরিতৃপ্ত হবে এবং তারা তার খোসা দিয়ে ছায়া গ্রহণ করবে। দুধে বরকত দেওয়া হবে। এমনকি একটি উটনী এত দুধ দেবে যা মানুষের একটি বিশাল দলের জন্য যথেষ্ট হবে, একটি গাভী এত দুধ দেবে যা একটি গোত্রের জন্য যথেষ্ট হবে এবং একটি বকরী এত দুধ দেবে যা পরিবারের ছোট এক অংশের জন্য যথেষ্ট হবে।

তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, ঠিক সেই সময় আল্লাহ একটি সুগন্ধি বাতাস পাঠাবেন। তা তাদের বগলের নিচ দিয়ে প্রবাহিত হবে এবং প্রত্যেক মুসলিমের রূহ কব্জা করে নেবে। আর বাকি থাকবে নিকৃষ্ট লোকেরা, যারা গাধার মতো প্রকাশ্যে ব্যভিচারে লিপ্ত হবে। তাদের ওপরই কিয়ামত অনুষ্ঠিত হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: دارا، والتصويب من "تلخيص الذهبي" ومصادر التخريج.



[2] في النسخ الخطية: فيصرف، والمثبت من "التلخيص" ومصادر التخريج.



8718 [3] - في النسخ: عن وجهه، والمثبت من مصادر التخريج.



8718 [4] - في النسخ: لا يدي، والمثبت من "التلخيص"، وفي بعض مصادر التخريج: لا يدان.



8718 [5] - إسناده صحيح.وأخرجه أحمد 29/ (17629)، ومسلم (2937)، وأبو داود (4321)، وابن ماجه (4075)، والترمذي (2240)، والنسائي (7970) و (10717)، وابن حبان (6815) من طرق عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، بهذا الإسناد - وبعضهم اختصره. وهو عند مسلم بطوله، فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه. وسقط من إسناد ابن ماجه يحيى بن جابر!والفِقرتان الأوليان منه ستأتيان برقم (8828) من طريق معاوية بن صالح عن عبد الرحمن بن جبير عن أبيه عن جده نفير. وهذا وهم من معاوية، وقال الحافظ ابن حجر في ترجمة نفير من "الإصابة" بعد أن ساق الروايتين: إن كان محفوظًا فيكون عند جبير بن نفير عن شيخين.وفي قصة الدجال أيضًا انظر حديث أبي أمامة الباهلي الآتي عند المصنف برقم (8834).قَطَط، بفتحتين: أي: شديد جعودة الشعر.فعاثَ: من العَيث، وهو أشد الفساد.سارِحتُهم: ماشيتُهم.ذُرًا: جمع ذُِروة، وهو أعلى سَنام البعير.يَعاسِيبِ النحل: جمع يَعسوب، وهو أمير النحل، أي: تظهر له وتجتمع عنده كما تجتمع النحل على يعاسيبها.جَزْلتَينِ: قِطعتين.قطعَ رَمْيةِ الغَرَض: أراد أن بُعدَ ما بين القطعتين يكون بقدر رمية السهم إلى الهدف.مَهرودتَينِ: هما حُلّتان شبيهتان بالمصبوغ بالهُرْد، وهو نبتٌ كالكُركُم.الحَدَب: المرتفع من الأرض. يَنسِلُون: يسرعون.النَّغَف: دودٌ يكون في أنوف الإبل والغنم.فَرْسَى: كقَتلى وزنًا ومعنى، جمع فَرِيس.زَهَمهم: دسمهم.البُخْت: الإبل الخُراسانية.الزَّلَقَة: روي بالقاف والفاء، وهو السطح الأملس كالزجاج تنزلق الأشياء عليه انزلاقًا.بقِحْفِها: أي: بقِشرها. الرِّسْل: اللَّبَن.اللِّقْحة: الناقة القريبة العهد بالنِّتاج.الفِئام: الجماعة الكثيرة.يَتهارَجون: يتناكحون.