হাদীস বিএন


আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম





আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8859)


8859 - حدثنا أبو الفضل الحسن بن يعقوب بن يوسف العَدْل، حدثنا محمد بن عبد الوهاب بن حَبيب العَبْدي، حدثنا جعفر بن عَوْن العَمْري، أخبرنا أبو حيَّان التَّيْمي، عن أبي زُرْعة بن عمرو بن جَرِير قال: جلس إلى مروانَ ثلاثةُ نَفَرٍ بالمدينة، فسمعوه يحدِّثُ عن الآيات: أوّلُها خروجُ الدجال، فقام النَّفَرُ من عند مروان فجلسوا إلى عبد الله بن عمرو، فحدَّثوه بما قال مروان، فقال عبد الله: لم يقل مروانُ شيئًا، سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إنَّ أول الآيات خُروجًا طلوع الشمس من مَغرِبها والدابَّةُ، أيُّها كانت فالأُخرى على أَثرِها قريبًا".ثم أنشأَ يحدِّث، قال: "وذلك أنَّ الشمس إذا غَرَبَت أتَت تحت العَرْشِ فَسَجَدَت، واستأذَنَت في الرجوع، فيُؤذَن لها، حتى إذا أراد الله أن تَطلُعَ من مغربها أتت تحت العرش فسجدت، واستأذَنَت في الرجوع، فلم يُرَدَّ عليها شيءٌ، قال: ثم تعودُ تستأذنُ في الرجوع، فلم يُرَدَّ عليها شيءٌ، قال: ثم تعودُ تستأذنُ في الرجوع، فلا يُرَدُّ عليها، وعَلِمَت أَنْ لو أُذِنَ لها لم تُدرِكِ الشرقَ، قالت: يا ربِّ، ما أبعدَ المَشْرِقَ! مَن لي بالناس؟ حتى إذا كان الليلُ أنت فاستأذَنَت، فقال لها: اطلُعِي من مكانِك".قال: وكان عبد الله يقرأ الكتبَ، فقرأ وذلك يومَ {لَا يَنْفَعُ نَفْسًا إِيمَانُهَا لَمْ تَكُنْ آمَنَتْ مِنْ قَبْلُ أَوْ كَسَبَتْ فِي إِيمَانِهَا خَيْرًا} [الأنعام: 158] [1].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি বলেন, মদীনায় মারওয়ানের কাছে তিনজন লোক বসেছিলেন। তারা তাকে (মারওয়ানকে) কিয়ামত বা নিদর্শনাবলী সম্পর্কে আলোচনা করতে শুনলেন। মারওয়ান বলেন, প্রথম নিদর্শন হলো দাজ্জালের আবির্ভাব। এরপর সেই তিনজন লোক মারওয়ানের কাছ থেকে উঠে আব্দুল্লাহ ইবনে আমরের কাছে গিয়ে বসলেন এবং মারওয়ান যা বলেছিলেন, তা তাকে জানালেন। আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: মারওয়ান কিছুই বলেননি। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “নিশ্চয়ই নিদর্শনসমূহের মধ্যে প্রথম যা প্রকাশ পাবে তা হলো পশ্চিম দিক থেকে সূর্যের উদয় এবং (পৃথিবীর) প্রাণী (দাব্বাতুল আরদ)। এ দুটির মধ্যে যেটাই আগে আসুক না কেন, অপরটি তার পরপরই অতি নিকটে প্রকাশ পাবে।"

এরপর তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বলতে শুরু করলেন: "তা এভাবে হবে যে, সূর্য যখন অস্ত যায়, তখন সে আরশের নিচে আসে এবং সিজদা করে। সে ফিরে আসার অনুমতি চায় এবং তাকে অনুমতি দেওয়া হয়। অবশেষে যখন আল্লাহ চান যে সূর্য পশ্চিম দিক থেকে উদিত হোক, তখন সে আরশের নিচে এসে সিজদা করে এবং ফিরে আসার অনুমতি চায়, কিন্তু তার কোনো উত্তর দেওয়া হয় না। তিনি বলেন, এরপর সে আবার ফিরে আসার অনুমতি চায়, কিন্তু তার কোনো উত্তর দেওয়া হয় না। তিনি বলেন, এরপর সে আবার ফিরে আসার অনুমতি চায়, কিন্তু তাকে কোনো উত্তর দেওয়া হয় না। আর সে বুঝতে পারে যে, যদি তাকে অনুমতি দেওয়া হয়, তবে সে আর পূর্ব দিকে পৌঁছাতে পারবে না। সে বলে: হে আমার প্রতিপালক! পূর্ব দিক কত দূরে! আমি কীভাবে মানুষের কাছে পৌঁছাব? অবশেষে যখন রাত শেষ হয়, তখন সে অনুমতি চায়। তখন তাকে বলা হয়: তুমি তোমার স্থান থেকেই উদিত হও।"

তিনি বলেন, আব্দুল্লাহ (ইবনে আমর) কিতাবসমূহ পড়তেন। তিনি এই বলে কিতাব পাঠ করেন যে, আর এটি সেই দিন যখন: {যে ব্যক্তি পূর্বে ঈমান আনেনি অথবা ঈমান আনার পর কোনো সৎকর্ম করেনি, তার ঈমান সে দিন তার কোনো উপকারে আসবে না} (সূরা আন'আম: ১৫৮)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده صحيح. أبو حيان التيمي: هو يحيى بن سعيد بن حيان، ومروان هو ابن الحكم.وأخرجه أحمد 11/ (6531) و (6881)، ومسلم (2941)، وأبو داود (4310)، وابن ماجه (4069) من طرق عن أبي حيان التيمي، به. وهو عندهم - غير أحمد. مختصر.وانظر للشطر الثاني منه ما سلف برقم (8736) من طريق وهب بن جابر عن عبد الله بن عمرو. به، ففي أفراده مناكير، وقد انفرد بهذا الحديث.وأخرجه ابن ماجه (4090) وغيره من طريق الوليد بن مسلم، عن عثمان، بهذا الإسناد. وسقط من رواية ابن ماجه وحده ذكر دمشق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8860)


8860 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا محمد بن إسحاق الصَّغَاني، حدثنا عبد الله بن يوسف التِّنِّيسي، حدثنا أبو حفصٍ القاصُّ عثمانُ بن أبي العاتكة، حدثنا سليمان بن حَبيب المُحارِبي، عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "إذا وَقَعَت الملاحمُ، خرج بَعْثٌ من المَوالي من دمشقَ، هم أكرمُ العرب فَرَسًا، وأجودُه سلاحًا، يؤيِّد اللهُ بهم الدِّين" [1]. هذا حديث صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন মহাযুদ্ধগুলো (মালাহিম) শুরু হবে, তখন দামেশক থেকে মাওয়ালী (অনারব বা মুক্ত দাস) দের একটি দল বের হবে, তারা হবে আরবের মধ্যে ঘোড়ার দিক থেকে সবচেয়ে সম্মানিত এবং অস্ত্রের দিক থেকে সবচেয়ে উন্নত, আল্লাহ তাদের মাধ্যমে দ্বীনকে সাহায্য করবেন।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف من أجل عثمان بن أبي العاتكة، فقد اختُلف فيه والراجح ضعفه فيما انفرد به، ففي أفراده مناكير، وقد انفرد بهذا الحديث.وأخرجه ابن ماجه (4090) وغيره من طريق الوليد بن مسلم، عن عثمان، بهذا الإسناد. وسقط من رواية ابن ماجه وحده ذكر دمشق.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8861)


8861 - أخبرني [علي بن] [1] الفضل بن محمد بن عَقِيل بن خُوَيلد الخُزَاعي، حدثنا أَبي، عن أبيه، أخبرنا حفص بن عبد الله، حدثني إبراهيم بن طَهْمان، عن الحجَّاج بن الحجَّاج، عن قَتَادة، عن المهلَّب بن أبي صُفْرة، عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تُبعَثُ نارٌ على أهل المشرق فتَحشرُهم إلى المغرب، تبِيتُ معهم حيث باتُوا، وتَقِيلُ معهم حيث قالُوا، يكون لها ما سَقَطَ منهم وتَخلَّف، تَسوقُهم سَوْقَ الجملِ الكَسِير" [2]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "পূর্বাঞ্চলের অধিবাসীদের উপর একটি আগুন প্রেরিত হবে এবং তা তাদেরকে পশ্চিম দিকে হাঁকিয়ে নিয়ে যাবে। তারা যেখানে রাত যাপন করবে, আগুনও তাদের সাথে রাত যাপন করবে; আর তারা যেখানে বিশ্রাম নেবে, আগুনও তাদের সাথে সেখানে বিশ্রাম নেবে। তাদের কাছ থেকে যা কিছু পড়ে যাবে বা পিছনে থেকে যাবে, তা সেই আগুনের অংশ হয়ে যাবে। সেটি তাদেরকে পঙ্গু উটকে হাঁকিয়ে নিয়ে যাওয়ার মতো করে হাঁকিয়ে নিয়ে যাবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين سقط من نسخ المستدرك التي بين أيدينا، وإثباته لا بدَّ منه، فإنَّ عليًّا هذا هو شيخ المصنف، أما أبوه الفضل فقد توفي سنة 309 هـ كما في "تاريخ بغداد" 14/ 351، أي: قبل أن يولد الحاكم باثنتي عشرة سنة.ثم إنَّ الراوي عن حفص بن عبد الله هو محمد بن عقيل بن خويلد، وبذلك يتأكد ثبوت عليٍّ في السند لقوله بعدُ: حدثنا أبي عن أبيه، وعليه فإنَّ تصرف ابن حجر في "إتحاف المهرة" (12092) بإسقاط أحد لفظي الأب مشيًا منه على ظاهر إسناد نسخته من "المستدرك" بعدم وجود عليٍّ في اسم شيخ المصنف، ذهولٌ منه رحمه الله.



[2] صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف، فإنَّ المحفوظ فيه: قتادة عن عمر بن سيف عن المهلَّب، هكذا وقع في "مشيخة ابن طهمان" (61) برواية أحمد بن حفص بن عبد الله السَّلمي عن أبيه. وعمر بن سيف هذا تفرَّد قتادة بالرواية عنه، فهو مجهول.وأخرجه من طريق أحمد بن حفص عن أبيه بذكر عمر بن سيف كما في "المشيخة": الطبراني في "الكبير" (14513) و "الأوسط" (8092).وأخرجه كذلك الدارقطني في "الأفراد" (14) - ومن طريقه الخطيب البغدادي في "تالي تلخيص المتشابه" (127) - من طريق قطن بن إبراهيم عن حفص بن عبد الله، بهذا الإسناد.وقد سلف برقم (8620) من طريق همام عن قتادة عن المهلب بإسقاط عمر بن سيف من إسناده،ثم إنه وقفه على عبد الله بن عمرو. وانظر تتمة الكلام عليه هناك.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8862)


8862 - أخبرنا أبو بكر محمد بن عبد الله بن أحمد بن عَتَّابِ العَبْدي [1]، حدثنا يحيى بن جعفر بن أبي طالب، حدثنا علي بن عاصم، عن داود بن أبي هِند، عن أبي حَرْب بن أبي الأسود، حدثني طَلْحة النَّصْري [2]، قال: كان الرجلُ منا إذا قَدِمَ المدينة فكان له بها عَريفٌ نزل على عريفه، وإن لم يكن له بها عريفٌ نزل الصُّفّةَ، فقدمتُ المدينةَ ولم يكن لي بها عريفٌ، فنزلتُ الصُّفّةَ، وكان يجيءُ علينا من رسول الله صلى الله عليه وسلم كلَّ يومٍ مُدٌّ من تمرٍ بين اثنين، ويَكسُونا الخُنُفَ، فصلَّى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم بعضَ صلوات النهار، فلما سلَّم ناداه أهلُ الصفة يمينًا وشِمالًا: يا رسولَ الله، أحرَقَ بطونَنا التمرُ، وتخرَّقَت عنا الخُنُفُ، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى منبره فصَعِدَ فَحَمِدَ الله وأثنى عليه، ثم ذكر شدَّةَ ما لقي من قومه، حتى قال: "ولقد أَتى عليَّ وعلى صاحبِي بضعَ عشرةَ ما لي وله طعامٌ إلَّا البَرِيرُ" - قال: فقلت لأبي حربٍ: وأيُّ شيءٍ البريرُ؟ قال: طعامُ سَوءٍ؛ ثمرُ الأَراك - فقَدِمْنا على إخواننا هؤلاءِ من الأنصار وعظيمُ طعامِهم التمرُ، فواسَوْنا فيه، ووالله لو أَجِدُ لكم الخبزَ واللحمَ لأَشبعتُكم منه، ولكن عسى أن تُدرِكوا زمانًا - أو من أدركه منكم - يُغدَى ويُراحُ عليكم بالجِفَان، وتَلبَسون مثلَ أستار الكعبة".قال داود قال لي أبو حَرْب: يا داود، وهل تدري ما كان أستارُ الكعبة يومئذٍ؟ قلت: لا، قال: ثيابٌ بِيضٌ كان يُؤتَى بها من اليمن. قال: داود: فحدَّثتُ بهذا الحديث الحسنَ بن [أبي] [3] الحسن، فقال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "أنتم اليومَ خيرٌ منكم يومئذٍ، أنتم اليومَ إخوانٌ بنِعْمة الله، وأنتم يومئذٍ أعداءٌ يضربُ بعضُكم رقابَ بعض" [4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




তালহা আন-নাসরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের মধ্যে কোনো ব্যক্তি যখন মদিনায় আসত এবং সেখানে তার কোনো তত্ত্বাবধায়ক (আরিফ) থাকত, সে তার তত্ত্বাবধায়কের কাছে থাকত। আর যদি তার সেখানে কোনো তত্ত্বাবধায়ক না থাকত, তবে সে সুফ্ফায় (মসজিদে নববীর বারান্দায়) থাকত। আমি মদিনায় আগমন করলাম, তখন আমার কোনো তত্ত্বাবধায়ক ছিল না, তাই আমি সুফ্ফায় উঠলাম।

প্রতিদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পক্ষ থেকে আমাদের জন্য দুইজনের মাঝে এক মুদ্দ পরিমাণ খেজুর আসত এবং তিনি আমাদের মোটা চট বা কাপড়ের পোশাক (খুনুফ) দিতেন।

একদা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দিনের কোনো এক সালাত আমাদের নিয়ে আদায় করলেন। যখন তিনি সালাম ফিরালেন, তখন সুফ্ফাবাসীরা ডান ও বাম দিক থেকে তাঁকে ডাকলেন: "হে আল্লাহর রাসূল! খেজুর আমাদের পেট জ্বালিয়ে দিয়েছে (ক্ষুধার তীব্রতায়) এবং আমাদের এই চটের পোশাকগুলো ছিঁড়ে গেছে।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মিম্বরের দিকে দাঁড়ালেন এবং তাতে আরোহণ করলেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও গুণগান করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর কওমের পক্ষ থেকে যে কঠিন দুঃখ-কষ্ট ভোগ করেছিলেন, তা উল্লেখ করে বললেন: "আমার ও আমার সঙ্গীর উপর বেশ কয়েক দিন এমন কেটেছে যখন আমার ও তার জন্য ‘বারীর’ ছাড়া অন্য কোনো খাবার ছিল না।" (রাবী) বলেন, আমি আবূ হারবকে জিজ্ঞেস করলাম, ‘বারীর’ কী? তিনি বললেন, এটা খারাপ খাবার; আরাক গাছের ফল। (অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন) "এরপর আমরা আমাদের এই আনসার ভাইদের কাছে আসলাম, যাদের প্রধান খাবার ছিল খেজুর। তারা আমাদের এতে সান্ত্বনা দিয়েছেন। আল্লাহর শপথ! যদি আমি তোমাদের জন্য রুটি ও মাংসের ব্যবস্থা করতে পারতাম, তবে অবশ্যই তোমাদের তা দ্বারা পরিতৃপ্ত করতাম। কিন্তু সম্ভবত তোমরা এমন যুগ পাবে—অথবা তোমাদের মধ্যে যে তা পাবে—যখন সকাল-সন্ধ্যায় বড় বড় থালায় তোমাদের খাবার পরিবেশন করা হবে এবং তোমরা কা’বার পর্দার মতো পোশাক পরিধান করবে।"

দাঊদ বলেন, আবূ হারব আমাকে বললেন, হে দাঊদ! তুমি কি জানো সেই সময় কা’বার পর্দা কেমন ছিল? আমি বললাম, না। তিনি বললেন, ইয়েমেন থেকে আনা সাদা কাপড়।

দাঊদ বলেন, আমি এই হাদীসটি হাসান ইবন আল-হাসানকে শোনালাম। তিনি বললেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছিলেন: "তোমরা আজ তোমাদের সেই দিনের চেয়ে উত্তম হবে। তোমরা আজ আল্লাহর অনুগ্রহে ভাই ভাই। আর তোমরা সেই দিন ছিলে শত্রু, তোমরা একে অপরের গর্দান মারতে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في (ز) و (ب): المكي، والمثبت من (ك) و (م)، وهو الصواب الموافق لما في ترجمته من "تاريخ بغداد" 3/ 476 وغيره، فهذا الرجل بغداديّ لا مكيّ.



[2] بالنون والصاد المهملة، هكذا ضبطه ابن ماكولا في "الإكمال" 1/ 390، نسبة إلى نصر بن معاوية من هوازن، وفي نسخنا الخطية: البصري، بالباء فالصاد، وهو صحيح أيضًا، فقد ذكر ابن حبان في "الثقات" 3/ 204 أنه سكن البصرة، إلّا أنَّ النسبة إلى القبيلة في المتقدمين عادةً أشهر من النسبة إلى البلدان.



8862 [3] - زيادة لا بد منها ليست في نسخنا الخطية، فالحسن بن أبي الحسن هذا: هو الحسن البصري، واسم أبيه أبي الحسن: يسار. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.



8862 [4] - حديث صحيح، وهذا إسناد حسن في المتابعات والشواهد من أجل علي بن عاصم، ففيه ضعف إلّا أنه يعتبر به. وقد سلف الحديث من طريقه وطريق غيره برقم (4336)، فانظر تمام تخريجه والكلام عليه هناك. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8863)


8863 - أخبرنا أبو الحسين محمد بن أحمد بن تَمِيم الأصمّ بقَنطَرَةِ بَرَدَان [1]، حدثنا أبو قِلَابة، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثنا سُوَيد بن العلاء.وإنما هو الأسود بن العلاء؛ قد أخرج مسلمٌ عن الأسود بن العلاء.حدَّثَنيهِ محمدُ بن عبد الله الفقيه رحمه الله، حدثنا أبو حامد بن الشَّرْقي، حدثنا محمد بن يحيى، حدثنا أبو عاصم، حدثنا عبد الحميد بن جعفر [2]، حدثنا الأسود بن العلاء، عن أبي سَلَمة، فذكره بنحوه.وقد حدَّثَناه أبو عبد الله محمد بن يعقوب الشَّيْباني، حدثنا إبراهيم بن عبد الله السَّعْدي، حدثنا أبو عاصم الضَّحّاك بن مخلَد، حدثنا عبد الحميد بن جعفر، حدثنا الأسود بن العلاء، عن أبي سَلَمة بن عبد الرحمن بن عَوْف، عن عائشة قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا يذهبُ الليلُ والنهارُ حتى تُعبَدَ اللَّاتُ والعُزَّى، ويبعثَ الله ريحًا طيِّبًا [3]، فيَتوفَّى مَن كان في قلبِه مثقالُ حبّةٍ من خَردَلٍ من خيرٍ، فيبقى مَن لا خيرَ فيه، فيرجعون إلى دين آبائهم" [4].هذا حديث صحيح الإسناد على شرط مسلم، ولم يُخرجاه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "দিন ও রাতের সমাপ্তি ঘটবে না (বা, দিনরাত অতিবাহিত হতে থাকবে) যতক্ষণ না লাত এবং উযযার ইবাদত করা হয়। আর আল্লাহ একটি পবিত্র বাতাস প্রেরণ করবেন, ফলে যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণও কল্যাণ (ঈমান) থাকবে, তাকে তিনি মৃত্যু দান করবেন। অতঃপর কেবল তারাই অবশিষ্ট থাকবে যাদের মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই। তখন তারা তাদের পূর্বপুরুষদের ধর্মে ফিরে যাবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّفت في (ز) و (ك) إلى: بودان، وفي (ب) إلى بوذان، والتصويب من (م). وقنطرة بَرَدان، بالتحريك: محلّة ببغداد. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.



[2] تحرَّف في النسخ الخطية هنا إلى: حفص. فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.



8863 [3] - هكذا في النسخ، وجمهور أهل اللغة على أنَّ الريح مؤنثة، فالجادّة أن توصف بالتأنيث فيقال: ريح طيبة، لكن قال الفيومي في "المصباح المنير" ص:203: الريح مؤنثة على الأكثر فيقال: هي الرِّيح، وقد تذكَّر على معنى الهواء فيقال: هو الريح، وهبَّ الريح، نقله أبو زيد.



8863 [4] - إسناده قوي. وقد سلف برقم (8586).









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8864)


8864 - حدثنا أبو بكر أحمد بن سلمان بن الحسن الفقيه ببغداد، حدثنا أحمد بن حيَّان بن مُلاعِب، حدثنا علي بن عاصم، حدثنا الجُرَيري، عن أبي نَضْرة قال: حدَّث عثمانُ بن عفان مَثَلًا للفتنة، فقال: إنما مثلُ الفتنةِ مثلُ رَهْطٍ ثلاثةٍ اصطَحَبوا [1] في سفرٍ، فساروا ليلًا، فاجتمعوا إلى مَفرِقِ ثلاثةٍ، فقال أحدهم: يَمْنةً، فأخذ يمنةً فضَلَّ الطريق، وقال الآخر: يَسْرةً، فأخذ يسرةً فضلَّ الطريق، وقال الثالث: الليلَ، أَلزَمُ مكاني حتى أُصبِحَ فآخُذَ الطريقَ [2].8864 م - قال علي بن عاصم: وحدثني عوفٌ، عن أبي المِنْهال، عن أبي العاليَةِ قال: كنا نُحدَّثُ أنه سيأتي على الناس زمانٌ، خيرُ أهلِه من يرى الحقَّ قريبًا فيجانبُ الفتنَ [3].




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ফিতনা সম্পর্কে একটি উপমা পেশ করলেন। তিনি বললেন: ফিতনার উপমা হলো তিন ব্যক্তির মতো, যারা এক সফরে সঙ্গী হয়েছিল। তারা রাতে পথ চলছিল এবং তিন রাস্তার মোড়ে এসে একত্রিত হলো। তাদের একজন বলল: ডানে যাব। সে ডানে গেল এবং পথভ্রষ্ট হলো। আরেকজন বলল: বামে যাব। সে বামে গেল এবং পথভ্রষ্ট হলো। আর তৃতীয়জন বলল: রাত হয়েছে, আমি আমার স্থানেই থাকব যতক্ষণ না সকাল হয়, তারপর আমি পথ ধরব।

আলি ইবনে আসিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমাকে আওফ বর্ণনা করেছেন, আবুল মিনহাল সূত্রে আবুল আলিয়াহ বলেছেন: আমরা আলোচনা করতাম যে, মানুষের উপর এমন এক সময় আসবে যখন সেই ব্যক্তিই তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হবে যে সত্যকে নিকটে দেখবে এবং ফিতনা থেকে দূরে থাকবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: أصبحوا، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الصواب.



[2] إسناده فيه لين من جهة علي بن عاصم - وهو الواسطي - ففيه ضعف.الجريري: هو سعيد بن إياس، وأبو نضرة هو المنذر بن مالك بن قِطعة، وروايته عن عثمان مرسلة، لم يدركه.



8864 [3] - خبر صحيح عن أبي العالية: وهو رفيع بن مِهران الرِّياحي، فعليّ بن عاصم متابَع. عوف: هو ابن أبي جميلة الأعرابي.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 122 عن أبي أسامة حماد بن أسامة، والبيهقي في "الزهد" (136) من طريق إسحاق الأزرق، كلاهما عن عوف، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8865)


8865 - أخبرنا علي بن محمد بن عُقْبة الشَّيباني بالكوفة، حدثنا إبراهيم بن إسحاق الزُّهْري، حدثنا يعلى بن عُبيد، حدثنا مِسعَر، عن عُبيد أبي الحسن، عن ابن عبد الله بن مُغفَّل قال: أراد ابنٌ لعبد الله بن سَلَام يخرجُ نحو الشام، فاطَّلَع عليه عبدُ الله من فوق بيتٍ فقال: يا بنيَّ، لا تَفجَعْني بنفسِك، فليَأْتِيَنَّ من الشام صَريحُ كلِّ مسلم [1].




আব্দুল্লাহ ইবনু সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর এক পুত্র শামের (সিরিয়া) দিকে যাওয়ার ইচ্ছা পোষণ করলে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরের উপর থেকে তাকে দেখলেন এবং বললেন: হে আমার বৎস, তোমার কারণে আমাকে শোকাভিভূত করো না। কারণ প্রত্যেক খাঁটি মুসলমানই শামের দিকে চলে আসবে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رجاله ثقات معروفون غير ابن عبد الله بن مغفل عبيد أبو الحسن هو عبيد بن الحسن المزني. وأخرجه ابن أبي شيبة في "مصنفه" 5/ 323 عن وكيع عن مسعر، عن عبيد بن الحسن، عن ابن مَعقِل قال: أراد … فذكره. وابن معقل هذا - إن كان ما في "المصنف" صحيحًا غير مصحف - هو عبد الرحمن بن معقل المزني، ولعبيدٍ عنه رواية في "سنن أبي داود"، وهو موثَّق.وأخرجه بنحوه نعيم بن حماد في "الفتن" (1760) عن سفيان بن عيينة، عن عبيد بن الحسن، عن عبد الله بن مغفل. كذا وقع فيه بإسقاط لفظ "ابن"، وعبيد لم يدرك عبدَ الله بن مغفل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8866)


8866 - أخبرني أبو نصر أحمد بن سهل الفقيه ببُخارَى، أخبرنا صالح بن محمد بن حَبيب الحافظ، حدثنا عُبيد الله [1] بن عمر بن مَيسَرة، حدثنا معاذ بن هشام، حدثني أَبي، عن قَتَادة، عن أبي الأسود الدِّيلِيّ، قال: انطلقتُ أنا وزُرْعةُ بن ضَمْرة [مع] [2] الأشعريِّ إلى عمر بن الخطَّاب فلَقِينا عبدَ الله بنَ عمرو، فقال: يوشكُ أن لا يبقى في أرض العَجَم من العرب إلَّا قتيلٌ أو أسيرٌ يُحكَمُ في دمه، فقال زرعةُ: أيظهرُ المشركون على الإسلام؟ فقال: ممَّن أنت؟ قال: من بني عامر بن صَعصَعة، فقال: لا تقومُ الساعةُ حتى تَدَافِعَ نساءُ بني عامر على ذي الخَلَصةِ؛ وَثَنٌ كان يُسمَّى في الجاهلية. قال: فذكرنا ذلك لعمر بن الخطَّاب؛ قولَ عبد الله بن عمرو، فقال عمرُ ثلاثَ مِرار: عبدُ الله بن عمرو أعلمُ بما يقول.فخَطَبَ عمرُ بن الخطّاب يومَ الجمعة فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "لا تزالُ طائفةٌ من أمَّتي على الحقِّ منصورين [3] حتى يأتيَ أمرُ الله". قال: فذكرْنا قولَ عمر لعبد الله بن عمرو، فقال: صَدَقَ نبيُّ الله صلى الله عليه وسلم، إذا كان ذلك، كان الذي [4] قلتُ [5]. هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আবু আল-আসওয়াদ আদ-দিলি থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এবং যুরআ ইবনু দমরা আল-আশআরীর সাথে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন আমরা আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাত করলাম। তিনি বললেন: অচিরেই অনারব ভূমিতে এমন সময় আসবে যখন কোনো আরব অবশিষ্ট থাকবে না, হয় সে হবে নিহত না হয় এমন বন্দী যার রক্ত সম্পর্কে (শত্রুদের পক্ষ থেকে) সিদ্ধান্ত নেওয়া হবে। তখন যুরআ বললেন: মুশরিকরা কি ইসলামের উপর জয়ী হবে? তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু আমর) বললেন: তুমি কোন গোত্রের? তিনি বললেন: আমি বানূ আমির ইবনু সা‘সা‘আহ গোত্রের। তিনি (আবদুল্লাহ ইবনু আমর) বললেন: কিয়ামত সংঘটিত হবে না যতক্ষণ না বানূ আমির গোত্রের নারীরা ‘যু আল-খালাসাহ’ নামক মূর্তির ওপর (উপাসনার জন্য) ঝাঁপাঝাঁপি করবে; যা জাহিলী যুগে একটি মূর্তির নাম ছিল। তিনি (আবু আল-আসওয়াদ) বলেন: অতঃপর আমরা আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই উক্তি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তিনবার বললেন: আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছেন, সে সম্পর্কে তিনিই অধিক অবগত। এরপর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জুমু‘আর দিন খুতবা দিলেন এবং বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "আমার উম্মাতের মধ্যে সব সময় একটি দল হক-এর (সত্যের) ওপর বিজয়ী থাকবে, যতক্ষণ না আল্লাহর নির্দেশ এসে যায়।" তিনি (আবু আল-আসওয়াদ) বলেন: অতঃপর আমরা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই কথা আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করলাম। তিনি বললেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সত্য বলেছেন। যখন তা (কিয়ামতের নিকটবর্তী হওয়া) হবে, তখন তাই ঘটবে যা আমি বলেছিলাম।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: عبد الله، مكبَّرًا. وعبيد الله هذا هو القَواريري.



[2] سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج وممّا سلف برقم (8674). والأشعري هذا: هو عبد الله بن قيس أبو موسى الأشعري رضي الله عنه.



8866 [3] - في النسخ الخطية: منصورون، والجادّة ما أثبتنا.



8866 [4] - في النسخ الخطية: إذا كان ذلك كالذي، والكلام غير مستقيم، والصواب ما أثبتنا، وهو الموافق لما في مصادر التخريج. نساء دَوْس حول ذي الخَلَصة"، وكانت صنمًا تعبدها دوس في الجاهلية بتَبَالة. أخرجه البخاري (7116) ومسلم (2906).وفي حديث جرير بن عبد الله البَجَلي حيث أرسله النبي صلى الله عليه وسلم لهدم ذي الخلصة فقال له: "ألا تريحني من ذي الخلصة؟ "، وكان بيتًا في خثعم يسمى كعبة اليمانية: أخرجه البخاري (3020) ومسلم (2476). وبلاد خثعم هي تبالة وما حولها، جنوب الجزيرة العربية قريبة من بِيشة.قال ابن الكلبي في "كتاب الأصنام" ص 35 في كلامه عن ذي الخلصة: كانت تعظّمها وتهدي لها خثعم وبَجيلة وأزد السَّراة ومَن قاربهم من بطون العرب من هوازن، ومن كان ببلادهم من العرب بتبالة.قلنا: وبنو عامر بن صعصعة المذكورون في الخبر، من هوازن.



8866 [5] - المرفوع منه في الطائفة المنصورة صحيح لغيره، وهذا إسناد ضعيف لانقطاعه بين قتادة وأبي الأسود فيما قاله الحافظ ابن حجر في "المطالب العالية" (4352).وأخرجه الضياء المقدسي في "الأحاديث المختارة" 1/ (142) من طريق أبي يعلى الموصلي، عن عبيد الله بن عمر، بهذا الإسناد. وقال فيه: يوشك أن لا يبقى في أرض العرب من العجم!وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (4352) عن معاذ بن هشام الدستوائي، به.وأخرجه الطبري في مسند عمر من "تهذيب الآثار" 2/ 814 عن محمد بن بشار وقتادة بن سعد بن قتادة، عن معاذ بن هشام، به. وصحَّح إسناده.وسلف عند المصنف برقم (8674) دون الشطر الثاني منه، من طريق عبد الرحمن بن محمد الحارثي عن معاذ بن هشام.ورواه إسماعيل بن عياش عند الطبري 2/ 817 و 818 مرة عن سعيد بن أبي عروبة، وأخرى عن نافع بن عمر وسعيد بن بشير ثلاثتهم عن قتادة قال: حدثنا عبد الله بن أبي الأسود قال: انطلقنا … إلخ. وفيه عنده: أنهم جلسوا إلى عبد الله بن عُمر، وقالوا لعمر: حدثنَا ابنك عبد الله بكذا؛ لكن إسماعيل بن عياش فيه مقال وهو ليس بذاك الحافظ، وقد اختُلف عليه فيه كما ترى، ونافع بن عمر هذا لا يعرف، وسعيد بن بشير ضعيف، ثم إنَّ عبد الله بن أبي الأسود هذا لا يعرف ولم نقف له على ترجمة، ولا يعرف لأبي الأسود الدؤلي ولد اسمه عبد الله.وأخرجه مختصرًا بقصة الطائفة المنصورة فقط: ابن عبد البر في "بيان العلم وفضله" (2246)، والضياء (141) من طريق أبي خيثمة زهير بن حرب، عن معاذ بن هشام، به.وهذا القسم منه صحيح بشواهده، وقد سلف عند المصنف برقم (8594) من طريق سليمان بن الربيع عن عمر.ويشهد له حديث أبي هريرة عند أحمد 14/ (8274)، وانظر الإشارة إلى تتمة شواهده هناك.وأما ذو الخَلَصة فقد ذكر في حديث أبي هريرة مرفوعًا: "لا تقوم الساعة حتى تضطرب أليات نساء دَوْس حول ذي الخَلَصة"، وكانت صنمًا تعبدها دوس في الجاهلية بتَبَالة. أخرجه البخاري (7116) ومسلم (2906).وفي حديث جرير بن عبد الله البَجَلي حيث أرسله النبي صلى الله عليه وسلم لهدم ذي الخلصة فقال له: "ألا تريحني من ذي الخلصة؟ "، وكان بيتًا في خثعم يسمى كعبة اليمانية: أخرجه البخاري (3020) ومسلم (2476). وبلاد خثعم هي تبالة وما حولها، جنوب الجزيرة العربية قريبة من بِيشة.قال ابن الكلبي في "كتاب الأصنام" ص 35 في كلامه عن ذي الخلصة: كانت تعظّمها وتهدي لها خثعم وبَجيلة وأزد السَّراة ومَن قاربهم من بطون العرب من هوازن، ومن كان ببلادهم من العرب بتبالة.قلنا: وبنو عامر بن صعصعة المذكورون في الخبر، من هوازن.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8867)


8867 - أخبرني أبو زكريا يحيى بن محمد العنبري، حدثنا إبراهيم بن أبي طالب، حدثنا محمد بن المثنَّى ومحمد بن بشّار قالا: حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شُعْبة، عن النُّعمان بن سالم قال: سمعت يعقوبَ بن عاصم بن مسعود قال: سمعت رجلًا قال لعبد الله بن عمرو: إنك تقول: إنَّ الساعة تقومُ إلى كذا وكذا، فقال: لقد هَمَمتُ أن لا أحدِّثَكم بشيءٍ، إنما قلتُ لكم: تَرَونَ بعد قليلٍ أمرًا عظيمًا، فكان تحريقُ البيت - قال شعبة: [هذا أو نحوه] [1] - قال عبد الله بن عمرو: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يخرجُ الدَّجالُ في أمّتى فيمكُثُ فيهم أربعين" - لا أدري يومًا، أو أربعين عامًا، أو أربعين ليلةً، أو أربعين شهرًا - "فيبعثُ الله عيسى ابن مريمَ عليه السلام كأنه عُرُوةُ بن مسعودٍ الثَّقفي، فيطلبه فيُهلِكُه، ثم يَمكُثُ أناسٌ بعدَه سنينَ ليس بين اثنين عداوةٌ، ثم يرسلُ الله ريحًا من قِبَلِ الشام، فلا يبقى أحدٌ في قلبِه مِثقالُ ذَرَّةٍ من إيمان إلَّا قَبَضَته، حتى لو كان أحدُكم في كَبِدِ جبلٍ لدَخَلَت عليه - قال عبد الله: سمعتُها من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيبقى شِرارُ الناسِ في خِفَّةِ الطير وأحلامِ السِّباع، لا يَعرِفون معروفًا ولا يُنكِرون مُنكرًا، فيتمثَّلُ لهم الشيطانُ فيقول: ألا تستجيبون؟! ويأمرُهم بالأوثان فيَعبُدونها، وهم في ذلك دارَّةٌ أرزاقُهم، حسنٌ عيَشُهم، ويُنفَخُ في الصُّور فلا يسمعُه أحدٌ إِلَّا أَصغى، وأولُ من يسمعُه رجلٌ يَلُوطُ حوضه فيَصعَقُ، ثم لا يبقى أحدٌ إِلَّا صَعِقَ، ثم يُرسِلُ الله - أو يُنزل الله - مطرًا كأنه الطَّلُّ - أو الظِّلُ، النعمانُ الشاكُّ - فتَنبُت أجسادُهم، ثم يُنفَخُ فيه أخرى فإذا هم قيامٌ يَنظُرون، ثم قال: هَلُمُّوا إلى ربكم وقِفُوهم إنهم مسؤولون، ثم يقال: أَخرِجوا بَعْثَ النارِ، فيقال: كم؟ فيقال: من كلٍّ ألفٍ تسعَ مئةٍ وتسعةَ وتسعين، فيومئذٍ يُبعَثُ الولدان شيبًا، ويومئذٍ يُكشَفُ عن ساقٍ" [2].قال محمد بن جعفر: حدَّثَني بهذا الحديث شعبةُ مرّاتٍ وعَرَضتُه عليه مراتٍ.هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه!




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: (ইয়াকূব ইবনু আসিম বলেন) আমি এক ব্যক্তিকে আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনলাম যে, আপনি কি বলেন যে, কিয়ামত এই এই সময়ে সংঘটিত হবে? তিনি বললেন: আমি তো তোমাদের কাছে কোনো কিছু বর্ণনা না করার ইচ্ছা করেছিলাম। আমি কেবল তোমাদের বলেছিলাম: তোমরা অল্প দিনের মধ্যেই এক বিরাট বিষয় দেখতে পাবে। আর তা ছিল বায়তুল্লাহ (কাবা)-র অগ্নিদগ্ধ হওয়া। (শু'বা বলেন: এই অথবা এর কাছাকাছি কথা)। আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"আমার উম্মতের মাঝে দাজ্জাল আগমন করবে এবং সে তাদের মাঝে চল্লিশ অবস্থান করবে।" (রাবী সন্দেহ পোষণ করে বলেন: চল্লিশ দিন, অথবা চল্লিশ বছর, অথবা চল্লিশ রাত, অথবা চল্লিশ মাস – আমি জানি না)।

"অতঃপর আল্লাহ ঈসা ইবনু মারইয়াম (আঃ)-কে পাঠাবেন। তিনি দেখতে উরওয়া ইবনু মাসউদ আস-সাকাফীর মতো হবেন। তিনি দাজ্জালকে খুঁজে বের করবেন এবং তাকে ধ্বংস করে দেবেন। তারপর তার (ঈসা (আঃ)-এর) পরে লোকেরা বহু বছর অবস্থান করবে, যখন দু'জনের মাঝে কোনো শত্রুতা থাকবে না। এরপর আল্লাহ সিরিয়ার দিক থেকে একটি বাতাস প্রেরণ করবেন। ফলে যার অন্তরে এক অণু পরিমাণও ঈমান থাকবে, তাকে ব্যতীত আর কাউকেই সে বাতাস রেখে দেবে না, বরং তার রুহ কবজ করে নেবে। এমনকি তোমাদের কেউ যদি পাহাড়ের অভ্যন্তরেও থাকে, তবুও সে বাতাস তার কাছে পৌঁছে যাবে।"

(আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি এই অংশ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শুনেছি।)

"তখন নিকৃষ্ট লোকেরা বাকি থাকবে, যারা পাখির মতো হালকা-চঞ্চল এবং হিংস্র পশুর স্বভাবের হবে। তারা ভালো কাজকে ভালো জানবে না এবং মন্দ কাজকে মন্দ মনে করে প্রত্যাখ্যান করবে না। তখন শয়তান তাদের সামনে মূর্ত হয়ে বলবে: তোমরা কি সাড়া দেবে না?! সে তাদের মূর্তিপূজার নির্দেশ দেবে এবং তারা তার পূজা করবে। এমন অবস্থায়ও তাদের জীবিকা পর্যাপ্ত থাকবে এবং তাদের জীবনযাত্রা ভালো থাকবে। আর শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে। যে-ই তা শুনবে, সে-ই মনোযোগ দিয়ে কান লাগাবে। আর সর্বপ্রথম যে ব্যক্তি তা শুনবে, সে হবে সেই ব্যক্তি, যে তার হাউজ লেপে ঠিক করছে। সে তখনই বেহুঁশ হয়ে পড়ে যাবে। এরপর আর কেউ বাকি থাকবে না, যে বেহুঁশ হয়ে পড়ে যাবে না। অতঃপর আল্লাহ বৃষ্টি পাঠাবেন – অথবা নাযিল করবেন – যা শিশিরের মতো হবে, অথবা ছায়ার মতো হবে (বর্ণনাকারী নু'মান সন্দেহ পোষণ করেছেন)। ফলে তাদের দেহ আবার গজিয়ে উঠবে। এরপর আবার তাতে ফুঁক দেওয়া হবে। তখন তারা দাঁড়িয়ে দেখতে থাকবে। অতঃপর বলা হবে: তোমাদের রবের দিকে এসো এবং তাদের দাঁড় করাও, কারণ তাদের অবশ্যই জিজ্ঞাসাবাদ করা হবে। এরপর বলা হবে: জাহান্নামের অংশ বের করে আনো। জিজ্ঞেস করা হবে: কত? বলা হবে: প্রত্যেক হাজার থেকে নয়শত নিরানব্বই জনকে। সেই দিনই শিশুরা বৃদ্ধ হয়ে যাবে, আর সেই দিনই ‘সাক’ (পায়ের গোছা) উন্মোচিত হবে।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] ما بين المعقوفين سقط من النسخ الخطية، واستدركناه من مصادر التخريج.



[2] إسناده صحيح.وأخرجه مسلم (2940) (117)، والنسائي (11565)، وابن حبان (7353) من طريق محمد بن بشار وحده، بهذا الإسناد. فاستدراك الحاكم له ذهولٌ منه.وأخرجه أحمد 11/ (6555) عن محمد بن جعفر، به.وأخرجه مسلم (2940) (116) من طريق معاذ بن معاذ العنبري، عن شعبة، به.وقد سلف برقم (8846) من طريق عثمان بن جبلة المروزي عن شعبة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8868)


8868 - أخبرني أحمد بن محمد بن إسماعيل بن مِهرانَ، حدثني أَبي، حدثنا أبو الطاهر وأبو الرَّبيع المِصْريّان قالا: حدثنا عبد الله بن وَهْب، أخبرني عبد الرحمن بن شُرَيح، عن رَبيعة بن سيف [1] المَعافِري، عن إسحاق بن عبد الله: أنَّ عوف بن مالك الأشجعيَّ أتى رسولَ الله صلى الله عليه وسلم في فتح له فَسَلَّم عليه، ثم قال: هنيئًا لك يا رسولَ الله، قد أعزَّ اللهُ نصرَك، وأظهرَ دينَك، ووَضَعَت الحربُ أوزارَها بجرَانِها، قال: ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم في قُبَّةٍ من أَدَمٍ، فقال: "ادخُلْ يا عوفُ" فقال: أدخلُ كُلِّي أو بَعْضي؟ فقال: "ادخُلْ كلُّك" فقال: "إنَّ الحرب لن تضعَ أوزارَها حتى تكونَ ستٌّ، أَوّلُهنَّ موتي" فبكى عوفٌ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "قُلْ: إحدى، والثانيةُ فتحُ بيتِ المَقدِس، والثالثةُ فتنةٌ تكون في الناس كعُقَاصِ [2] الغنم، والرابعةُ فتنةٌ تكون في الناس لا يبقى أهلُ بيتٍ إِلَّا دَخَل عليهم نَصيبُهم منها، والخامسةُ يولدُ في بني الأصفر غلامٌ من أولاد الملوك، يَشِبُّ في اليوم كما يَشِبُّ الصبيُّ في الجمعة، ويَشِبُّ في الجمعة كما يَشِبُّ الصبيُّ في الشهر، ويَشِبُّ في الشهر كما يَشِبُّ الصبيُّ في السنة، فما بلغ اثنتي عشرةَ سنةً ملَّكوه عليهم، فقام بين أظهُرِهم فقال: إلى متى يَغلِبُنا هؤلاءِ القومُ على مكارمِ أرضنا؟! إني رأيت أن أسيرَ إليهم حتى أُخرِجَهم منها، فقام الخطباءُ فحسَّنوا له رأيَه [3]، فبَعَثَ في الجزائر والبرِّيّة بصَنْعةِ السُّفن، ثم حَمَل فيها المقاتِلةَ حتى ينزلَ بين أنطاكيَةَ والعَريش".قال ابن شُرَيح: فسمعت من يقول: إنهم اثنا عشرَ غَيَايةً [4]، تحت كل غَيَايَةٍ اثنا عشر ألفًا، فيجتمع المسلمون إلى صاحبِهم ببيت المَقدِس، وأَجمَعوا في رأيهم أن يسيروا إلى مدينة الرسول صلى الله عليه وسلم حتى تكون مسالحُهم بالسَّرْح وخيبرَ.قال ابن أبي جعفر [5]: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "يُخرِجوا أمّتي من مَنابتِ الشِّيح".قال: وقال الحارث بن يزيد: إنهم سيُقيمون [6] فيما هنالك، فيَفِرُّ منهم الثُّلثُ، ويُقتَل منهم الثلثُ، فيَهزِمُهم الله عز وجل بالثلث الصابر. وقال خالد بن يزيد: يومئذٍ يَضْرِبُ والله بسيفه، ويَطعُنُ برمحِه، ويَتبَعُه المسلمون حتى يَبلُغوا المَضِيقَ الذي عند القُسطنطِينيَّة، فيجدونه قد يَبسَ ماؤُه فيُجِيزون إلى المدينة حتى يَنزِلوا بها، فيَهِدمُ الله جُدرانَهم بالتكبير ثم يَدخُلونها عليهم، فيَقسِمون أموالَهم بالأترِسَة.وقال أبو قَبِيل المَعافِري: فبينما هم على ذلك، إذْ جاءهم راكبٌ فقال: أنتم هاهنا والدَّجالُ قد خالَفَكم في أهلِيكم؛ وإنما كانت كَذِبةً، فمن سَمِعَ العلماءَ في ذلك أقام على ما أصابه، وأمّا غيرُهم فانفَضُّوا، ويكون المسلمون يَبنُون المساجدَ في القُسطنطِينيّة ويَغزُون وراءَ ذلك حتى يخرجَ الدجالُ، السادسةُ [-4].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আওফ ইবনে মালিক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি কোনো এক বিজয়ের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করে তাঁকে সালাম জানালেন। অতঃপর বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনাকে অভিনন্দন! আল্লাহ আপনার সাহায্যকে শক্তিশালী করেছেন, আপনার দ্বীনকে বিজয়ী করেছেন এবং যুদ্ধ তার ভার (অর্থাৎ অস্ত্রশস্ত্র) তার গর্দানে (সম্পূর্ণরূপে) নামিয়ে দিয়েছে। বর্ণনাকারী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চামড়ার একটি তাঁবুর ভেতরে ছিলেন। তিনি বললেন: "হে আওফ! ভেতরে এসো।" আওফ বললেন: আমি কি সম্পূর্ণরূপে ভেতরে প্রবেশ করব, নাকি আংশিকভাবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সম্পূর্ণভাবে প্রবেশ করো।"

অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় যুদ্ধ তার ভার নামাবে না, যতক্ষণ না ছয়টি বিষয় ঘটবে। সেগুলোর প্রথমটি হলো আমার মৃত্যু।" একথা শুনে আওফ কেঁদে ফেললেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "বলো: (ছয়টির মধ্যে) এটি এক (প্রথম)। আর দ্বিতীয়টি হলো বায়তুল মুকাদ্দাস বিজয়। তৃতীয়টি হলো এমন ফিতনা (বিশৃঙ্খলা) যা মানুষের মধ্যে মেষের পালের পেঁচানো দড়ির মতো হবে (অর্থাৎ সহজে থামবে না)। চতুর্থটি হলো মানুষের মধ্যে এমন ফিতনা যা কোনো গৃহস্থ পরিবারকে অবশিষ্ট রাখবে না, তাদের উপর তার অংশ প্রবেশ না করে। আর পঞ্চমটি হলো, বানুল আসফার (রোমকদের) মধ্যে রাজবংশের এমন এক বালক জন্মগ্রহণ করবে, যে একদিনে এমনভাবে বড় হবে যেমন একজন শিশু এক সপ্তাহে বড় হয়; আর সে এক সপ্তাহে এমনভাবে বড় হবে যেমন একজন শিশু এক মাসে বড় হয়; এবং সে এক মাসে এমনভাবে বড় হবে যেমন একজন শিশু এক বছরে বড় হয়। যখন সে বারো বছরে পৌঁছবে, তখন তারা তাকে তাদের শাসক বানাবে। সে তাদের মাঝে দাঁড়িয়ে বলবে: এই কওম (মুসলিমরা) কতদিন ধরে আমাদের উত্তম ভূমিগুলোকে কব্জা করে রাখবে?! আমি সিদ্ধান্ত নিয়েছি যে আমি তাদের দিকে যাত্রা করব, যেন আমি তাদের সেখান থেকে বিতাড়িত করতে পারি। তখন বক্তারা দাঁড়িয়ে তার মতকে উৎসাহিত করবে। অতঃপর সে দ্বীপপুঞ্জ এবং স্থলভাগে যুদ্ধ জাহাজ তৈরির জন্য লোক পাঠাবে। এরপর সে সেগুলোর মধ্যে যোদ্ধাদের বোঝাই করে আন্তাকিয়া (Antioch) এবং আরীশ-এর মধ্যবর্তী স্থানে অবতরণ করবে।"

ইবনু শুরাইহ বলেন: আমি এমন ব্যক্তির কথা শুনেছি যিনি বলেন: তারা হবে বারোটি পতাকার নিচে (বা বারোটি দল), প্রত্যেক পতাকার নিচে বারো হাজার সৈন্য থাকবে। মুসলিমগণ বায়তুল মুকাদ্দাসে তাদের সেনাপতির কাছে সমবেত হবে এবং তারা সর্বসম্মতভাবে সিদ্ধান্ত নেবে যে তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শহরের দিকে (অর্থাৎ মদীনার দিকে) অগ্রসর হবে, যেন তাদের সীমান্তরক্ষী দলগুলো সার্হ ও খাইবারে অবস্থান নিতে পারে।

ইবনু আবী জা'ফর বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তারা (বানুল আসফার) আমার উম্মতকে শিহ নামক গুল্মের জন্মস্থান থেকেও বের করে দেবে।"

বর্ণনাকারী বলেন: আর হারিস ইবনু ইয়াযীদ বলেছেন: নিশ্চয় তারা (মুসলিমরা) সেখানে অবস্থান করবে। তাদের এক-তৃতীয়াংশ পালিয়ে যাবে, এক-তৃতীয়াংশ নিহত হবে। অতঃপর আল্লাহ তা'আলা ধৈর্যশীল এক-তৃতীয়াংশের মাধ্যমে তাদের (শত্রুদের) পরাজিত করবেন। আর খালিদ ইবনু ইয়াযীদ বলেছেন: সেদিন আল্লাহর শপথ! সে (মুসলিম সেনাপতি) তার তরবারি দ্বারা আঘাত করবে এবং বর্শা দ্বারা আঘাত করবে। মুসলিমগণ তাকে অনুসরণ করবে, এমনকি তারা কনস্ট্যান্টিনোপলের নিকটবর্তী সেই গিরিসংকটে পৌঁছবে, যেখানে তারা দেখবে এর পানি শুকিয়ে গেছে। অতঃপর তারা শহরে প্রবেশ করবে এবং তাতে অবতরণ করবে। আল্লাহ তা'আলা তাকবীরের মাধ্যমে তার প্রাচীরগুলো ধ্বংস করে দেবেন। অতঃপর তারা তাদের (শত্রুদের) উপর শহরে প্রবেশ করবে এবং ঢালের মাধ্যমে তাদের সম্পদ বণ্টন করবে।

আবূ ক্বাবিল আল-মাআফরী বলেন: তারা যখন এই অবস্থায় থাকবে, হঠাৎ একজন আরোহী এসে বলবে: তোমরা এখানে, অথচ দাজ্জাল তোমাদের পরিবারের মধ্যে এসে তোমাদের বিরোধিতা করছে। এটি ছিল কেবল একটি মিথ্যা। যারা এ বিষয়ে আলিমদের (জ্ঞানীদের) কথা শুনবে, তারা যে অবস্থায় ছিল, সে অবস্থায়ই দৃঢ় থাকবে। আর যারা তাদের (আলিমদের) কথা শুনবে না, তারা ছত্রভঙ্গ হয়ে যাবে। মুসলিমগণ কনস্ট্যান্টিনোপলে মসজিদ নির্মাণ করবে এবং এরপরও যুদ্ধাভিযান চালাতে থাকবে, যতক্ষণ না দাজ্জাল বের হয়। (এটি) ষষ্ঠ (বিষয়)।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ إلى: يوسف.



[2] تحرَّف في (م) و (ب) إلى: كعقاص، بتقديم العين المهملة. والقعاص: داء يصيب الدوابّ فيسيل من أنوفها شيء فتموت فجأة.



8868 [3] - قوله: "له رأيه" تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الدراية، والتصويب من "تلخيص الذهبي".



8868 [4] - هكذا في النسخ الخطية بياءين، وقد سلف التعليق على هذا الحرف عند الرواية السالفة برقم (8508).



8868 [5] - ابن أبي جعفر هذا: هو عبيد الله بن أبي جعفر المصري الفقيه، وهو من شيوخ عبد الرحمن بن شريح، وكذا من شيوخه الثلاثةُ المذكورون لاحقًا: الحارث بن يزيد وخالد بن يزيد وأبو قبيل المعافري، وثلاثتهم من ثقات المصريّين، وأبو قبيل: اسمه حيّ بن هانئ.



8868 [6] - في النسخ الخطية: سيقيموا، بحذف النون، والجادة ما أثبتنا.



8868 [-4] - ضعيف بهذا السياق، وأعله الذهبي في "تلخيصه" بالانقطاع، ولعله أراد بين إسحاق بن عبد الله وعوف بن مالك، وإسحاق هذا لم نتبيَّنه، ففي هذه الطبقة بهذا الاسم ممَّن ترجم له المزّي وغيره بضعة رجال، والراوي عنه - وهو ربيعة بن سيف - ضعيف عنده مناكير، ثم إنَّ عبد الرحمن بن شريح قد روى عن شيوخه المشار إليهم في التعليق السابق أحرفًا مقاطيع لم يسندها.وهذا الحديث بهذا السياق انفرد به المصنف، ويغني عنه ما سلف من غير وجه عن عوف بن مالك برقم (6460) و (8500) و (8508)، وهو صحيح.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8869)


8869 - أخبرنا أحمد بن محمد بن إسماعيل، حدثنا أبي، حدثنا أبو الطاهر وأبو الرَّبيع قالا: حدثنا ابن وهب، أخبرني عبد الرحمن بن شُرَيح، عن بكر بن عمرو [1] المَعافِري، عن بُكَير بن عبد الله بن الأشجِّ، عن كُرَيب مولى ابن عباس: أنه كان مع ابن عبّاس ومعه ابن الزُّبير في نَفَرٍ، فدخل عليهم أبو هريرة فقال: مُوتُوا فقال ابن الزُّبير: يا أبا هريرة، الدِّينُ قائم، والجهادُ قائم، والصلاةُ والزكاةُ والحجُّ وصيامُ رمضان، قال أبو هريرة: أنْ تموتَ قبل أن تُدرِكَ [2] ما لا يستطيع المحسنُ أن يزيدَ إحسانًا، ولا يستطيع المسيءُ أن يَنزِعَ عن إساءَتِه [3].




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। কুরাইব (তাঁর আযাদকৃত গোলাম) বলেন, তিনি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে একদল লোকের মধ্যে ছিলেন। তখন তাঁদের নিকট আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করে বললেন: তোমরা মরে যাও! ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবূ হুরায়রা! দীন তো প্রতিষ্ঠিত, জিহাদ প্রতিষ্ঠিত, আর সালাত, যাকাত, হজ এবং রমযানের সিয়ামও (সবই প্রতিষ্ঠিত)। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা এমন সময় আসার আগেই যেন মারা যাও, যখন কোনো সৎকর্মশীল ব্যক্তি তার সৎকাজে আর কোনো বৃদ্ধি ঘটাতে পারবে না, আর কোনো মন্দ কর্মশীল ব্যক্তিও তার মন্দ কাজ থেকে নিবৃত্ত হতে পারবে না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرّف في (ز) و (ب) إلى عوف.



[2] هكذا في "تلخيص الذهبي"، وهو الصحيح، وفي نسخنا الخطية قبل أن لا تدرك، بزيادة "لا"، وما في نسخة الذهبي أصح إلّا إن قيل: زيدت "لا" لتأكيد الكلام لا لنفيه.



8869 [3] - إسناده حسن من أجل بكر بن عمرو المعافري. أبو الطاهر: هو أحمد بن عمرو بن عبد الله بن السَّرْح، وأبو الربيع: هو سليمان بن داود بن حماد المهري.وهذا الخبر لم نقف عليه عند غير المصنف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8870)


8870 - حدثنا أبو بكر أحمد بن كامل القاضي - وذِكرُه بمِلْءِ الفَم - حدثنا أبو قِلابةَ، حدثنا يحيى بن حمّاد، حدثنا الوضَّاح [1]، عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجَعْد، عن طَرَفة المُسْليّ قال: سمعت عليًّا يقول: إنها لم تكن دولةُ حقٍّ قطُّ إلَّا أُدِيلَ آدمُ على إبليس، ولا دولةُ باطلٍ قطُّ إِلَّا أُدِيلَ إبليسُ على آدم، وأُمر إبليسُ بالسجود فعصى فأُديل عليه آدمُ، حتى قتل الرجلانِ أحدُهما صاحبَه فأُديل عليه إبليس، وإنها ستكون فتنٌ [2]: فتنةٌ خاصّةٌ، وفتنةٌ عامّةٌ، وفتنةُ خاصّةٍ، وفتنةُ عامّةٍ، فقيل: يا أمير المؤمنين، ما الفتنةُ الخاصّةُ والفتنةُ العامّةُ؟ وفتنة الخاصّةِ وفتنةُ العامّةِ؟ قال: فقال: يكون الإمامانِ؛ إمامُ حقٍّ وإمامُ باطلٍ، فيَفئُ من الحقِّ إلى الباطل، ومن الباطلِ إلى الحقّ، فهذه فتنةُ الخاصة، ويكون الإمامانِ؛ إمامُ حقٍّ وإمامُ باطلٍ، فَيفيءُ من الحقِّ إلى الباطلِ، ومن الباطلِ إلى الحق، فهذه فتنةُ العامَّة [3].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، فإنَّ الوضَّاح هذا هو أبو عَوَانة، ولم يخرجاه للسَّند لا للإسناد.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কখনো কোনো সত্যের শাসন (বা কর্তৃত্ব) প্রতিষ্ঠিত হয়নি, যখন শয়তানের উপর আদমকে বিজয়ী করা হয়নি; আর কখনো কোনো মিথ্যার শাসন প্রতিষ্ঠিত হয়নি, যখন আদমের উপর শয়তানকে বিজয়ী করা হয়নি। ইবলিসকে সিজদা করার আদেশ দেওয়া হয়েছিল, কিন্তু সে অবাধ্যতা করল, ফলে তার উপর আদম বিজয়ী হলেন। অবশেষে যখন দুই ব্যক্তি (আদমের দুই পুত্র) একে অপরের সাথে যুদ্ধ করে একজন তার সাথীকে হত্যা করল, তখন শয়তান তাদের উপর বিজয়ী হলো। নিশ্চয়ই অনেকগুলো ফিতনা সংঘটিত হবে: একটি বিশেষ (খাস) ফিতনা, একটি সাধারণ (আম) ফিতনা, তারপর আবার একটি বিশেষ ফিতনা এবং একটি সাধারণ ফিতনা। তখন বলা হলো, হে আমীরুল মু'মিনীন, বিশেষ ফিতনা ও সাধারণ ফিতনা কী? এবং (আবার) বিশেষ ফিতনা ও সাধারণ ফিতনা কী? তিনি বললেন: দুইজন নেতা থাকবেন—একজন সত্যের ইমাম এবং একজন মিথ্যার ইমাম। তখন মানুষ সত্য (ইমাম) থেকে মিথ্যার দিকে এবং মিথ্যা (ইমাম) থেকে সত্যের দিকে ফিরে আসবে। এটাই হলো বিশেষ ফিতনা। এবং (আবার) দুইজন নেতা থাকবেন—একজন সত্যের ইমাম এবং একজন মিথ্যার ইমাম। তখন মানুষ সত্য (ইমাম) থেকে মিথ্যার দিকে এবং মিথ্যা (ইমাম) থেকে সত্যের দিকে ফিরে আসবে। এটাই হলো সাধারণ ফিতনা।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: أبو الوضاح وهو خطأ. والوضاح هذا هو الوضاح بن عبد الله أبو عوانة اليشكري، وهو حمو يحيى بن حماد.



[2] في (ز) و (ك) و (ب): فتنة، ولم ترد في (م) و "تلخيص الذهبي"، والصواب ما أثبتنا موافقة لما في موضعيه السابقين برقم (8554) و (8751).



8870 [3] - إسناده محتمل للتحسين من أجل طرفة المُسلي، فهو تابعي كبير انفرد بالرواية عنه سالم بن أبي الجعد، وذكره البخاري وابن أبي حاتم ولم يأثرا فيه جرحًا أو تعديلًا، وذكره ابن حبان في "الثقات"، وقد توبع على أصل الخبر في قصة الفتن كما سلف برقم (8554) من طريق عاصم بن ضمرة عن علي.وآخر الخبر هنا هكذا جاء في نسخنا الخطية، وفيه تكرار!ولم نقف عليه من طريق طرفة المسلي عند غير المصنف.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8871)


8871 - أخبرني أحمد بن محمد بن سَلَمة العَنَزي، حدثنا عثمان بن سعيد الدارِمي، حدثنا سعيد بن أبي مريم، أخبرنا نافع بن يزيد، حدثني عيّاش بن عبّاس، أنَّ الحارث بن يزيد حدَّثه، أنه سمع عبدَ الله بن زُرَير [1] الغافقي يقول: سمعت عليَّ بن أبي طالب يقول: ستكون فتنةٌ يُحصَّلُ الناسُ منها كما يُحصَّلُ الذهبُ في المَعِدِن، فلا تسبُّوا أهلَ الشام وسبُّوا ظَلَمتَهم، فإنَّ فيهم الأبدالَ، وسيرسل الله إليهم سَيِّبًا [2] من السماء فيُغرِقُهم، حتى لو قاتلهم الثعالبُ غَلَبتْهم، ثم يبعثُ الله عند ذلك رجلًا من عِتْرة الرسول صلى الله عليه وسلم في اثني عشر ألفًا إن قَلُّوا، وخمسةَ [3] عشرَ ألفًا إن كَثُروا، أمَارتُهم - أو علامتَهم -: أَمِتْ أَمِتْ، على ثلاث راياتٍ، يقاتلهم أهلُ سبعِ راياتٍ، ليس من صاحب رايةٍ إِلَّا وهو يَطْمَعُ بالمُلْك، فيُقتَلون ويُهزَمون، ثم يَظهرُ الهاشميُّ، فيَردُّ اللهُ إلى الناس أُلفتَهَم ونِعمتَهم، وإناضَتهم وبَرِيرَهم [4]، فيكونون على ذلك حتى يخرج الدجالُ [5]. هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: শীঘ্রই এমন একটি ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে, যা থেকে লোকেরা স্বর্ণ খনি থেকে যেমন পরিশোধিত হয়, তেমনিভাবে পরিশোধিত হবে। অতএব, তোমরা শামের (সিরিয়ার) অধিবাসীদের গালমন্দ করো না, বরং তাদের জালিমদের গালমন্দ করো। কেননা, তাদের মধ্যে ‘আবদাল’ (আল্লাহর বিশেষ বন্ধুগণ) রয়েছেন। আর শীঘ্রই আল্লাহ আকাশ থেকে তাদের (জালিমদের) উপর একটি প্রচণ্ড প্লাবন পাঠাবেন, যা তাদের ডুবিয়ে দেবে। এমনকি যদি তাদের সাথে শৃগালরাও লড়াই করে, তবেও তারা জয়লাভ করবে। এরপর আল্লাহ তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বংশধরদের থেকে একজন ব্যক্তিকে পাঠাবেন, যিনি বারো হাজার লোক নিয়ে বের হবেন, যদি কম হয়; অথবা পনেরো হাজার, যদি বেশি হয়। তাদের নেতৃত্ব—অথবা তিনি বলেছেন: তাদের চিহ্ন—হবে ‘আমিত, আমিত’ (মৃত্যু দাও, মৃত্যু দাও)। তারা তিনটি পতাকার অধীনে থাকবেন। সাতটি পতাকাবাহী দল তাদের সাথে লড়াই করবে। প্রতিটি পতাকাবাহীর লক্ষ্য থাকবে রাজত্ব লাভ করা। অতঃপর তারা (সাত পতাকাবাহীরা) নিহত হবে এবং পরাজিত হবে। এরপর সেই হাশেমি (বংশধর) প্রকাশ পাবে। তখন আল্লাহ লোকদের মধ্যে তাদের ঐক্য ও নিয়ামত ফিরিয়ে দেবেন, আর তাদের সজীবতা ও উত্তমতা দান করবেন। তারা এই অবস্থায় থাকবে যতক্ষণ না দাজ্জাল বেরিয়ে আসে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] رسمت في نسخنا الخطية على رسم رزين وهو تحريف، وفي "تلخيص الذهبي" على الصواب. وأخرجه ابن عساكر 1/ 334 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زُرير، عن عليٍّ به، ورفع منه أوله في قصة تحصيل الناس كما يحصَّل الذهب.وأخرج هذه القصة منه مرفوعة أيضًا الطبراني في "الأوسط" (291) عن أحمد بن رشدين، عن محمد بن سفيان الحضرمي، عن ابن لهيعة عن عياش بن عباس وعبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي وابن رشدين شيخ الطبراني ضعيف، وشيخه محمد بن سفيان لا يُعرف.وأخرجه مختصرًا موقوفًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1005) عن عبد الله بن وهب، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي، مختصرًا من قوله: يبعث الله رجلًا، إلى آخره بنحوه.وأخرجه كذلك (1006) عن رشدين بن سعد، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زرير، عن علي. ورشدين ضعيف.وأخرجه مختصرًا في النهي عن سبِّ أهل الشام وأنَّ فيهم الأبدال: ابن عساكر 1/ 335 من طريق عبد الله بن صالح، عن أبي شريح عبد الرحمن بن شريح، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي. وعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وفي الطريق إليه جهالة.



[2] السيِّب لغة في الصيِّب، وبالصاد أجود: وهو نزول المطر. انظر "غريب الحديث" للخطابي 1/ 492. وأخرجه ابن عساكر 1/ 334 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زُرير، عن عليٍّ به، ورفع منه أوله في قصة تحصيل الناس كما يحصَّل الذهب.وأخرج هذه القصة منه مرفوعة أيضًا الطبراني في "الأوسط" (291) عن أحمد بن رشدين، عن محمد بن سفيان الحضرمي، عن ابن لهيعة عن عياش بن عباس وعبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي وابن رشدين شيخ الطبراني ضعيف، وشيخه محمد بن سفيان لا يُعرف.وأخرجه مختصرًا موقوفًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1005) عن عبد الله بن وهب، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي، مختصرًا من قوله: يبعث الله رجلًا، إلى آخره بنحوه.وأخرجه كذلك (1006) عن رشدين بن سعد، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زرير، عن علي. ورشدين ضعيف.وأخرجه مختصرًا في النهي عن سبِّ أهل الشام وأنَّ فيهم الأبدال: ابن عساكر 1/ 335 من طريق عبد الله بن صالح، عن أبي شريح عبد الرحمن بن شريح، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي. وعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وفي الطريق إليه جهالة.



8871 [3] - في نسخنا الخطية وخمس، والمثبت من "التلخيص"، وهو الجادّة. وأخرجه ابن عساكر 1/ 334 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زُرير، عن عليٍّ به، ورفع منه أوله في قصة تحصيل الناس كما يحصَّل الذهب.وأخرج هذه القصة منه مرفوعة أيضًا الطبراني في "الأوسط" (291) عن أحمد بن رشدين، عن محمد بن سفيان الحضرمي، عن ابن لهيعة عن عياش بن عباس وعبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي وابن رشدين شيخ الطبراني ضعيف، وشيخه محمد بن سفيان لا يُعرف.وأخرجه مختصرًا موقوفًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1005) عن عبد الله بن وهب، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي، مختصرًا من قوله: يبعث الله رجلًا، إلى آخره بنحوه.وأخرجه كذلك (1006) عن رشدين بن سعد، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زرير، عن علي. ورشدين ضعيف.وأخرجه مختصرًا في النهي عن سبِّ أهل الشام وأنَّ فيهم الأبدال: ابن عساكر 1/ 335 من طريق عبد الله بن صالح، عن أبي شريح عبد الرحمن بن شريح، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي. وعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وفي الطريق إليه جهالة.



8871 [4] - هكذا في نسخنا الخطبة، و "بريرهم" ليس في (م). والإناض: حمل النخل النضيج، والبَرير: ثمر الأراك. وعند نعيم في "الفتن" (1005): وفاضتهم وبزارتهم … قلنا: وما الفاضة والبزارة؟ قال: يفيض الأمر حتى يتكلم الرجل بما شاء، لا يخشى شيئًا. وأخرجه ابن عساكر 1/ 334 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زُرير، عن عليٍّ به، ورفع منه أوله في قصة تحصيل الناس كما يحصَّل الذهب.وأخرج هذه القصة منه مرفوعة أيضًا الطبراني في "الأوسط" (291) عن أحمد بن رشدين، عن محمد بن سفيان الحضرمي، عن ابن لهيعة عن عياش بن عباس وعبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي وابن رشدين شيخ الطبراني ضعيف، وشيخه محمد بن سفيان لا يُعرف.وأخرجه مختصرًا موقوفًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1005) عن عبد الله بن وهب، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي، مختصرًا من قوله: يبعث الله رجلًا، إلى آخره بنحوه.وأخرجه كذلك (1006) عن رشدين بن سعد، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زرير، عن علي. ورشدين ضعيف.وأخرجه مختصرًا في النهي عن سبِّ أهل الشام وأنَّ فيهم الأبدال: ابن عساكر 1/ 335 من طريق عبد الله بن صالح، عن أبي شريح عبد الرحمن بن شريح، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي. وعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وفي الطريق إليه جهالة.



8871 [5] - رجاله لا بأس بهم، ومتنه غريب جدًّا.وأخرجه الطبراني في "الأوسط" (3905) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 1/ 334 - 335 من طريق علي بن الحسين الخواص، عن زيد بن أبي الزرقاء، عن ابن لهيعة، عن عياش بن عباس، عن عبد الله بن زرير عن علي مرفوعًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم. وابن لهيعة ضعيف لسوء حفظه، وفي الطريق إليه علي بن الحسين الخواص، وهو مجهول وإن ذكره ابن حبان في "ثقاته" 8/ 474. وأخرجه ابن عساكر 1/ 334 من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زُرير، عن عليٍّ به، ورفع منه أوله في قصة تحصيل الناس كما يحصَّل الذهب.وأخرج هذه القصة منه مرفوعة أيضًا الطبراني في "الأوسط" (291) عن أحمد بن رشدين، عن محمد بن سفيان الحضرمي، عن ابن لهيعة عن عياش بن عباس وعبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي وابن رشدين شيخ الطبراني ضعيف، وشيخه محمد بن سفيان لا يُعرف.وأخرجه مختصرًا موقوفًا نعيم بن حماد في "الفتن" (1005) عن عبد الله بن وهب، عن ابن لهيعة، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي، مختصرًا من قوله: يبعث الله رجلًا، إلى آخره بنحوه.وأخرجه كذلك (1006) عن رشدين بن سعد، عن ابن لهيعة، عن عياش، عن ابن زرير، عن علي. ورشدين ضعيف.وأخرجه مختصرًا في النهي عن سبِّ أهل الشام وأنَّ فيهم الأبدال: ابن عساكر 1/ 335 من طريق عبد الله بن صالح، عن أبي شريح عبد الرحمن بن شريح، عن الحارث بن يزيد، عن ابن زرير، عن علي. وعبد الله بن صالح سيئ الحفظ، وفي الطريق إليه جهالة.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8872)


8872 - حدثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، حدثنا الحسن بن علي بن عفَّان العامِري، حدثنا عمرو بن محمد العَنقَزي، حدثنا يونس بن أبي إسحاق، أخبرني عمّار الدُّهْني، عن أبي الطُّفَيل، عن محمد ابن الحنفيّة قال: كنا عند عليٍّ فسأله رجلٌ عن المَهْدي، فقال علي: هَيْهاتَ، ثم عَقَدَ بيده سبعًا، فقال: ذاك يخرجُ في آخر الزمان؛ إذا قال الرجل: اللهُ اللهُ، قُتِلَ، فَيَجمَعُ الله تعالى له قومًا قَزَعًا [1] كَفَزَعِ السَّحاب، يؤلِّفُ الله بين قلوبهم، لا يَستوحِشون إلى أحدٍ ولا يفرَحون بأحدٍ يدخل فيهم، على عِدَّة أصحاب بَدْر، لم يَسبِقْهم الأوَّلون ولا يُدرِكُهم الآخِرون، وعلى عَدَد أصحابِ طالوتَ الذين جازُوا معه النهرَ.قال أبو الطُّفيل: قال ابن الحنفيَّة: أتريدُه؟ قلت: نعم، قال: إنه يخرج من بين هذين الخَشَبتين [2]، قلت: لا جَرَمَ واللهِ لا أَرِيمُهما [3] حتى أموتَ، فمات بها. يعني مكة، حَرسها الله [4].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা তাঁর কাছে ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে মাহদী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সুদূর পরাহত! অতঃপর তিনি তাঁর হাতে সাতটি (আঙ্গুল) গণনা করলেন। তারপর বললেন: তিনি (মাহদী) শেষ যামানায় আগমন করবেন; যখন কোনো লোক 'আল্লাহ! আল্লাহ!' বলবে, তখন তাকে হত্যা করা হবে। তখন আল্লাহ তা'আলা তাঁর জন্য এমন এক সম্প্রদায়কে একত্রিত করবেন, যারা হবে মেঘের খণ্ড খণ্ড অংশের (ন্যায় বিক্ষিপ্ত) জনসমষ্টি। আল্লাহ তাদের অন্তরগুলোকে জুড়ে দেবেন। তারা কারো সাথে ঘনিষ্ঠ হবে না এবং তাদের মধ্যে কেউ প্রবেশ করলে তারা আনন্দিত হবে না। তাদের সংখ্যা হবে বদরের যোদ্ধাদের সমান। পূর্ববর্তীরা তাদের ছাড়িয়ে যেতে পারেনি এবং পরবর্তীরাও তাদের কাছে পৌঁছাতে পারবে না। আর তাদের সংখ্যা হবে তালুতের সেই সাথীদের সমান, যারা তাঁর সাথে নদী পার হয়েছিলেন।
আবুত তুফাইল (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনুল হানাফিয়্যাহ আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি তাঁকে (মাহদীকে) চাও? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তিনি এই দুই কাঠখণ্ডের মধ্য থেকে বের হবেন। আমি বললাম: আল্লাহর কসম, আমি অবশ্যই মৃত্যু পর্যন্ত এই স্থান ত্যাগ করব না। অতঃপর তিনি সেখানেই (মক্কায়) ইন্তেকাল করেন।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: قزع، والجادّة ما أثبتنا. والقَزَع: القطع المتفرقة من السحاب.



[2] في النسخ الخطية: هذه الخشبتين مع الاختلاف في إعجام الخشبتين، والمثبت من "تلخيص الذهبي"، وهو الأصوب والمراد بالخشبتين: الأخشبان؛ وهما الجبلان المحيطان بمكة، أحدهما: أبو قُبيس، والآخر: قُعيقعان. الطيب المروزي - عند الهروي في "ذم الكلام وأهله" (589).ورواه موقوفًا عن عمرو بن قيس: الأوزاعيُّ كما سيأتي لاحقًا عند المصنف، ومحمدُ بن حِميَر عند نعيم بن حماد في "الفتن" (691) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (403) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 367، وإسماعيلُ بن عياش عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 71، و "غريب الحديث" 4/ 281، والداني (400)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4834)، ومعاويةُ بن صالح عند ابن أبي شيبة 15/ 165، والحارثُ بن يزيد الحمصي عند الدارمي (493) - ومن طريقه ابن عساكر 49/ 367 - 368 - وثور بن يزيد الكلاعي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (482)، وابن عساكر 14/ 424. وبعضهم يزيد فيه على بعض. ورواية محمد بن حمير سلف أولها عند المصنف برقم (6375).زاد فيه بعضهم: أن عبد الله بن عمرو سئل عما جاء من أحاديث رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما جاءكم عمَّن تأمنونه على نفسه ودينه، فخذوا به، وعليكم بالقرآن فإنه عنه تُسألون، وبه تُجزَون، وكفى به واعظًا لمن عَقَل.



8872 [3] - تحرَّف في (ز) و (ب) إلى: أرميهما، والمثبت من (م) و "التلخيص"، وفي (ك): أريمها.ومعنى "لا أَريمهما": لا أبرحهما ولا أزول عنهما. الطيب المروزي - عند الهروي في "ذم الكلام وأهله" (589).ورواه موقوفًا عن عمرو بن قيس: الأوزاعيُّ كما سيأتي لاحقًا عند المصنف، ومحمدُ بن حِميَر عند نعيم بن حماد في "الفتن" (691) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (403) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 367، وإسماعيلُ بن عياش عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 71، و "غريب الحديث" 4/ 281، والداني (400)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4834)، ومعاويةُ بن صالح عند ابن أبي شيبة 15/ 165، والحارثُ بن يزيد الحمصي عند الدارمي (493) - ومن طريقه ابن عساكر 49/ 367 - 368 - وثور بن يزيد الكلاعي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (482)، وابن عساكر 14/ 424. وبعضهم يزيد فيه على بعض. ورواية محمد بن حمير سلف أولها عند المصنف برقم (6375).زاد فيه بعضهم: أن عبد الله بن عمرو سئل عما جاء من أحاديث رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما جاءكم عمَّن تأمنونه على نفسه ودينه، فخذوا به، وعليكم بالقرآن فإنه عنه تُسألون، وبه تُجزَون، وكفى به واعظًا لمن عَقَل.



8872 [4] - إسناده حسن من أجل يونس بن أبي أسحاق، فإنه صدوق يَهِمُ. أبو الطفيل: هو عامر بن واثلة.ولم نقف على هذا الخبر عند غير المصنف. الطيب المروزي - عند الهروي في "ذم الكلام وأهله" (589).ورواه موقوفًا عن عمرو بن قيس: الأوزاعيُّ كما سيأتي لاحقًا عند المصنف، ومحمدُ بن حِميَر عند نعيم بن حماد في "الفتن" (691) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (403) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 367، وإسماعيلُ بن عياش عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 71، و "غريب الحديث" 4/ 281، والداني (400)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4834)، ومعاويةُ بن صالح عند ابن أبي شيبة 15/ 165، والحارثُ بن يزيد الحمصي عند الدارمي (493) - ومن طريقه ابن عساكر 49/ 367 - 368 - وثور بن يزيد الكلاعي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (482)، وابن عساكر 14/ 424. وبعضهم يزيد فيه على بعض. ورواية محمد بن حمير سلف أولها عند المصنف برقم (6375).زاد فيه بعضهم: أن عبد الله بن عمرو سئل عما جاء من أحاديث رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما جاءكم عمَّن تأمنونه على نفسه ودينه، فخذوا به، وعليكم بالقرآن فإنه عنه تُسألون، وبه تُجزَون، وكفى به واعظًا لمن عَقَل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8873)


8873 - حدثنا أبو عبد الله محمد بن أحمد بن موسى الخازنُ رحمه الله ببُخارَى، حدثنا إبراهيم بن يوسف الهِسِنْجاني، حدثنا هشام بن عمّار، حدثنا يحيى بن حمزة، حدثني عمرو بن قيس الكِنْدي قال: كنت مع أبي بحُوَّارينَ [1] وأنا غلامٌ شابٌّ، فرأيت الناسَ مجتمعين على رجلٍ، قلت: مَن هذا؟ قالوا: عبدُ الله بن عمرو بن العاص، فسمعته يحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال: "مِن اقترابِ الساعة أن تُرفَعَ الأشرارُ وتُوضَعَ الأخيارُ، ويُفتَحَ القولُ ويُخزَنَ العملُ، ويُقرأَ بالقوم المَثْناةُ ليس فيهم أحدٌ يُنكِرُها".قيل: وما المَثْناةُ؟ قال: ما اكتَتبتَ سوى كتابِ الله عز وجل [2]. وقد رواه الأوزاعيُّ عن عمرو بن قيس السَّكُوني:




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “কেয়ামত নিকটবর্তী হওয়ার আলামতগুলোর মধ্যে হলো—অসৎ লোকদেরকে উঁচুতে স্থান দেওয়া হবে এবং সৎ লোকদেরকে নিচে নামিয়ে দেওয়া হবে, কথা বলার দুয়ার খুলে দেওয়া হবে কিন্তু আমল (কাজ) জমা করে রাখা হবে, এবং মানুষের মাঝে ‘আল-মাসনাহ’ পাঠ করা হবে, কিন্তু তাদের মধ্যে এমন কেউ থাকবে না যে তা প্রত্যাখ্যান করবে।” বলা হলো: ‘আল-মাসনাহ’ কী? তিনি বললেন: আল্লাহ তাআলার কিতাব ব্যতীত যা কিছু লেখা হয়েছে।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في المطبوع إلى: مع أبي الفوارس! وحُوّارين: بالضم وتشديد الواو، والراء تفتح وتكسر: قرية من قرى حمص إلى الجنوب الشرقي منها على مسافة 80 كم، وبها مات يزيد بن معاوية سنة 64 هـ. الطيب المروزي - عند الهروي في "ذم الكلام وأهله" (589).ورواه موقوفًا عن عمرو بن قيس: الأوزاعيُّ كما سيأتي لاحقًا عند المصنف، ومحمدُ بن حِميَر عند نعيم بن حماد في "الفتن" (691) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (403) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 367، وإسماعيلُ بن عياش عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 71، و "غريب الحديث" 4/ 281، والداني (400)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4834)، ومعاويةُ بن صالح عند ابن أبي شيبة 15/ 165، والحارثُ بن يزيد الحمصي عند الدارمي (493) - ومن طريقه ابن عساكر 49/ 367 - 368 - وثور بن يزيد الكلاعي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (482)، وابن عساكر 14/ 424. وبعضهم يزيد فيه على بعض. ورواية محمد بن حمير سلف أولها عند المصنف برقم (6375).زاد فيه بعضهم: أن عبد الله بن عمرو سئل عما جاء من أحاديث رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما جاءكم عمَّن تأمنونه على نفسه ودينه، فخذوا به، وعليكم بالقرآن فإنه عنه تُسألون، وبه تُجزَون، وكفى به واعظًا لمن عَقَل.



[2] صحيح موقوفًا على عبد الله بن عمرو، انفرد برفعه يحيى بن حمزة، وخالفه جمهور أصحاب عمرو بن قيس كما سيأتي فوقفوه، فرواية يحيى هذه شاذة والإسناد إليه قوي، وقد تابع هشامًا عن يحيى الحكم بن موسى عند الطبراني في "الكبير" (14559)، وأحمد بن سليمان - وهو ابن أبي الطيب المروزي - عند الهروي في "ذم الكلام وأهله" (589).ورواه موقوفًا عن عمرو بن قيس: الأوزاعيُّ كما سيأتي لاحقًا عند المصنف، ومحمدُ بن حِميَر عند نعيم بن حماد في "الفتن" (691) - ومن طريقه أبو عمرو الداني في "السنن الواردة في الفتن" (403) - وابن عساكر في "تاريخ دمشق" 49/ 367، وإسماعيلُ بن عياش عند أبي عبيد في "فضائل القرآن" ص 71، و "غريب الحديث" 4/ 281، والداني (400)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (4834)، ومعاويةُ بن صالح عند ابن أبي شيبة 15/ 165، والحارثُ بن يزيد الحمصي عند الدارمي (493) - ومن طريقه ابن عساكر 49/ 367 - 368 - وثور بن يزيد الكلاعي عند الطبراني في "مسند الشاميين" (482)، وابن عساكر 14/ 424. وبعضهم يزيد فيه على بعض. ورواية محمد بن حمير سلف أولها عند المصنف برقم (6375).زاد فيه بعضهم: أن عبد الله بن عمرو سئل عما جاء من أحاديث رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: ما جاءكم عمَّن تأمنونه على نفسه ودينه، فخذوا به، وعليكم بالقرآن فإنه عنه تُسألون، وبه تُجزَون، وكفى به واعظًا لمن عَقَل.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8874)


8874 - حدَّثَناهُ علي بن حَمْشَاذَ العَدْل، حدثنا موسى بن الحسن بن عبّاد، حدثنا أبو يوسف محمد بن كَثير الصَّنعاني، حدثنا الأوزاعي، عن عمرو بن قيس السَّكُوني قال: خرجتُ مع أَبي في الوَفْد إلى معاوية، فسمعت رجلًا يحدِّث الناسَ يقول: إنَّ من أشراطِ الساعة أن تُرفعَ الأشرارُ وتُوضَعَ الأخيار، وأن يُخزَنَ الفعلُ والعملُ ويَظهرَ القولُ، وأن يُقرأَ بالمَثنْاةِ في القوم ليس فيهم من يغيِّرها أو يُنكِرها. فقيل: ما المثَنْاة؟ قال: ما اكتَتبتَ سوى كتابِ الله.قال: فحدَّثت بهذا الحديث قومًا وفيهم إسماعيل بن عُبيد الله، فقال: أنا معك في ذلك المجلس، تَدْري مَن الرجلُ؟ قلت: لا، قال: عبدُ الله بنُ عَمرو [1]. هذا حديث صحيح الإسنادين جميعًا، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: নিশ্চয়ই কিয়ামতের অন্যতম নিদর্শন হলো, খারাপ লোকদেরকে উন্নত করা হবে এবং ভালো লোকদেরকে নামিয়ে দেওয়া হবে। কর্ম ও আমলকে গোপন করে রাখা হবে আর কেবল কথা প্রকাশ করা হবে। আর লোকেদের মাঝে এমনভাবে মাসনাহ পাঠ করা হবে যে, সেখানে কেউ তা পরিবর্তন করার বা অস্বীকার করার থাকবে না। জিজ্ঞেস করা হলো: মাসনাহ কী? তিনি বললেন: যা তুমি আল্লাহর কিতাব (কুরআন) ছাড়া অন্য কিছু লিখে রেখেছ।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] خبر صحيح موقوفًا كما سبق بيانه، وهذا إسناد فيه ضعف من جهة محمد بن كثير الصنعاني، وهو على ضعفه يعتبر به إلّا أنه كان كثير الخطأ، وممّا أخطأ فيه في هذا الخبر ذكرُ معاوية، والمحفوظ أنه ابنه يزيد بن معاوية، وهكذا رواه على الصواب بشر بن بكر التنيسي - وهو وهو ثقة - عن الأوزاعي عند ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 46/ 313. وسقط الأوزاعي من مطبوعه. وأخرج ابن عساكر أيضًا 46/ 313 حديث محمد بن كثير من طريق أحمد بن عبد الواحد عنه، بهذا الإسناد.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8875)


8875 - حدثنا محمد بن صالح بن هانئ، حدثنا محمد بن إسماعيل، حدثنا أبو الطاهر، حدثنا ابن وَهْب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن أبي قَبِيل المَعافِري قال: كنَّا عندَ عبد الله بن عمرو بن العاص فسُئِل: أيُّ المدينتين تُفتَحُ أولًا: القُسطنطِينيَّةُ أو الرُّومِيَةُ؟ قال: فدعا بصُندوقٍ ظَهُمٍ - والظُّهْم: الخَلَقُ - فأخرج منها كتابًا فنَظَر فيه، ثم قال: كنَّا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم نكتبُ ما قال؛ نعم ولا، فسُئِلَ [1] أيُّ المدينتين تُفتَح أولًا: القُسطنطِينيَّةُ أو الرُّومِيَةُ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "مدينةُ هِرَقلَ تُفتَحُ أَوَّلًا"؛ يعني القُسطنطِينيّة [2].هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يُخرجاه.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা তাঁর নিকট উপস্থিত ছিলাম। তাঁকে প্রশ্ন করা হলো: দুটি শহরের মধ্যে কোনটি আগে বিজিত হবে—কুসতুনতিনিয়া নাকি রুমিয়্যা? তিনি বললেন: এরপর তিনি একটি পুরোনো সিন্দুক ডাকলেন (আর 'জুহুম' শব্দের অর্থ হলো জীর্ণ বা পুরোনো)। তিনি সেখান থেকে একটি কিতাব বের করে দেখলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম এবং তিনি যা বলতেন, তা হ্যাঁ হোক বা না, আমরা লিখে রাখতাম। (তখন) তাঁকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে, দুটি শহরের মধ্যে কোনটি আগে বিজিত হবে—কুসতুনতিনিয়া নাকি রুমিয়্যা? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হেরাক্লিয়াসের শহরই আগে বিজিত হবে।” অর্থাৎ কুসতুনতিনিয়া।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: يسأل، والتصويب من "التلخيص".



[2] إسناده ليِّن كما سبق بيانه عند الرواية السالفة برقم (8706). أبو الطاهر: هو أحمد بن عمرو بن السَّرْح الأُموي.وقد سلف برقم (8761) من طريق نعيم بن حماد عن عبد الله بن وهب.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8876)


8876 - حدثني أبو بكر محمد بن أحمد بن بالَوَيهِ، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضْر، حدثني جدِّي معاويةُ بن عمرو، حدثنا زائدة، حدثنا أبو حَصِين، عن عامر، عن ثابت بن قُطْبة، عن عبد الله بن مسعود قال: بن مسعود قال: الْزَمُوا هذه الطاعةَ والجماعة، فإنه حبلُ الله الذي أَمَرَ به، وإنَّ ما تكرهون في الجماعةِ خيرٌ من الذي [1] تحبُّون في الفُرْقة، وإنَّ الله تعالى لم يَخلُقْ شيئًا قطُّ إلَّا جعل له مُنتهًى، وإنَّ هذا الدِّين قد تمَّ، وإنه صائرٌ إلى نُقْصان، وإنَّ أمارةَ ذلك أن تُقطَعَ الأرحامُ، ويُؤخذَ المالُ بغير حقِّه، وتُسفَكَ الدماءُ، ويشتكيَ ذو القَرابةِ قرابتَه، لا يعودُ عليه بشيءٍ، ويطوفَ السائلُ بين الجُمُعتين لا يُوضَعُ في يده شيءٌ، بينما هم كذلك إذ خارَتْ خُوَارَ البقر، يَحسَبُ كلُّ الناس أَنَّما خارت من قِبَلِهم، فبَيْنا الناسُ كذلك إذ قَذَفَت الأرضُ بأفلاذ كَبِدِها من الذهب والفضة، لا يَنفعُ بعد ذلك شيءٌ من الذهب والفضة [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين ولم يُخرجاه.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা এই আনুগত্য এবং জামা'আতকে আঁকড়ে ধরো। কেননা এটিই আল্লাহর রশি, যার আদেশ তিনি দিয়েছেন। আর জামা'আতের মধ্যে যা তোমরা অপছন্দ করো, তা বিচ্ছিন্নতার (ফুরকাহ) মধ্যে তোমরা যা পছন্দ করো তার চেয়েও উত্তম। আর আল্লাহ তাআলা এমন কোনো জিনিস সৃষ্টি করেননি, যার জন্য কোনো শেষ বা সমাপ্তি তিনি নির্ধারণ করেননি। নিশ্চয়ই এই দ্বীন পরিপূর্ণ হয়ে গেছে, কিন্তু এটি এখন ঘাটতির দিকে ধাবমান হবে। আর তার নিদর্শন হলো— আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করা হবে, অন্যায়ভাবে সম্পদ গ্রহণ করা হবে এবং রক্তপাত ঘটানো হবে। আর আত্মীয় তার আত্মীয়ের বিরুদ্ধে অভিযোগ করবে যে, সে তার জন্য কিছুই করেনি। আর ভিক্ষুক দুই জুমআর মধ্যবর্তী সময়ে ঘুরতে থাকবে, কিন্তু তার হাতে কিছুই দেওয়া হবে না। তারা যখন এমন অবস্থায় থাকবে, তখন গরু যেমন আওয়াজ করে, তেমন বিকট আওয়াজ হবে। তখন প্রত্যেকে মনে করবে যে, আওয়াজটি তাদের দিক থেকেই আসছে। যখন মানুষ এ অবস্থায় থাকবে, তখন জমিন তার কলিজার টুকরা— সোনা ও রুপা বের করে দেবে। কিন্তু এরপর সোনা ও রুপার কোনো কিছুই আর উপকারে আসবে না।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] تحرَّف في النسخ الخطية إلى: الذين، ووقع في "التلخيص": خير ممّا، وهو صواب.



[2] إسناده حسن من أجل ثابت بن قطبة، فقد روى عنه غير واحد كما في "التاريخ الكبير" للبخاري و"الجرح والتعديل" لابن أبي حاتم، ووثقه ابن سعد في "الطبقات" والعجلي، وذكره ابن حبان في "الثقات". معاوية بن عمرو: هو الأزدي المَعْني، وزائدة هو ابن قدامة، وأبو حصين: هو عثمان بن عاصم، وعامر: هو ابن شَراحيل الشَّعبي.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 86، والطبراني في "الكبير" (8973) من طريقين عن زائدة بن قدامة، بهذا الإسناد.وأخرجه اللالكائي في "أصول الاعتقاد" (158) من طريق أبي بكر بن عياش، عن أبي حصين، به - مختصرًا بأوله.وأخرجه مختصرًا ومطولًا الطبري في "تفسيره" 4/ 32، وابن أبي حاتم في "تفسيره" أيضًا 3/ 723، وابن بطة في "الإبانة الكبرى" 1/ 297 - 298، واللالكائي (159)، وأبو نعيم في "الحلية" 9/ 249 من طريق إسماعيل بن أبي خالد، والطبري 4/ 32، والآجري في "الشريعة" (17)، والطبراني في "الكبير" (8971) و (8972)، وابن بطة 1/ 327 من طريق مجالد بن سعيد، كلاهما عن عامر الشعبي، به.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8877)


8877 - حدثني أبو بكر بن بالويه، حدثنا محمد بن أحمد بن النَّضر، حدثنا معاوية بن عمرو، حدثنا زائدة، حدثنا أبو إسحاق الشَّيباني، أخبرنا يُسَير بن عمرو: أنه قال لأبي مسعود: إنه كان لي صاحبانِ كان مَفزَعي إليهما: حَذَيفةُ وأبو موسى، وإني أَنشُدُك الله إن كنتَ سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم شيئًا في الفتن إلَّا حدَّثتَني، وإلَّا اجتهدتَ لي رأيَك [1]، قال: فحَمِدَ الله أبو مسعود وأثنى عليه، ثم قال: عليك بعُظْم أُمّةِ محمدٍ صلى الله عليه وسلم، قال: إنَّ الله لم يجمع أمَّةَ محمدٍ صلى الله عليه وسلم على ضلالةٍ أبدًا، واصبِرْ حتى يستريحَ بَرٌّ، أو يُستراحَ من فاجر [2].هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يُخرجاه.وقد كتبناه بإسنادٍ عجيبٍ عالٍ:




আবু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইউসাইর ইবনে আমর তাঁকে বলেন: আমার দুইজন সঙ্গী ছিলেন, আমি বিপদের সময় যাদের আশ্রয় নিতাম: হুযাইফা ও আবু মুসা। আমি আপনাকে আল্লাহর নামে কসম দিয়ে বলছি, আপনি যদি ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে কিছু শুনে থাকেন, তাহলে তা আমাকে বলুন। আর যদি না শুনে থাকেন, তবে আপনার নিজস্ব মত (ইজতিহাদ) প্রদান করুন। তিনি (আবু মাসউদ) বললেন: অতঃপর আবু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও তাঁর গুণকীর্তন করলেন, তারপর বললেন: তুমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের সংখ্যাগরিষ্ঠ অংশের সাথে থাকবে। নিশ্চয়ই আল্লাহ কখনোই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতকে পথভ্রষ্টতার উপর একত্রিত করবেন না। আর তুমি ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না কোনো সৎ লোক মুক্তি লাভ করে, অথবা কোনো পাপিষ্ঠ ব্যক্তি থেকে মুক্তি পাওয়া যায়।




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] في النسخ الخطية: وإلّا اجتهدت إلى ربك، وهو تحريف، والتصويب من "تلخيص الذهبي" و"مسند إسحاق بن راهويه" و "المعرفة والتاريخ".



[2] إسناده صحيح. أبو إسحاق الشيباني: هو سليمان بن أبي سليمان، وأبو مسعود: هو عقبة بن عمرو الأنصاري رضي الله عنه.وأخرجه إسحاق بن راهويه في "مسنده" كما في "المطالب العالية" (1/ 4340)، ويعقوب بن سفيان في "المعرفة والتاريخ" 3/ 244 و 244 - 245، وابن أبي الدنيا في "الصبر والثواب" (10)، والطبراني في "الكبير" 17 / (666)، والخطيب البغدادي في "الفقيه والمتفقه" (447) من طرق عن أبي إسحاق الشيباني، بهذا الإسناد. وبعضهم يختصره.وأخرجه ابن أبي شيبة 15/ 35، وابن أبي عاصم في "السنة" (85)، واللالكائي في "أصول الاعتقاد" (162)، والبيهقي في "شعب الإيمان" (7111) - ومن طريقه ابن عساكر في "تاريخ دمشق" 40/ 524 - 525 - من طريق المسيب بن رافع وابن راهويه في كما في "المطالب" (4340/ 2)، الطبراني 17/ (665) من طريق قيس بن يسير بن عمرو، ويعقوب في "المعرفة" 3/ 245، والطبراني 17/ (667) من طريق عريف الشيباني، ثلاثتهم عن يسير بن عمرو، به - وعريف هذا لا يعرف، وروايته بنحو رواية أبي إسحاق الشيباني، ورواية الآخرين مختصرة، وزاد البيهقي في روايته بين المسيب ويسير بن عمرو ذرًّا، وهو خطأ.وسلف نحوه برقم (8756) من طريق أبي الشعثاء عن أبي مسعود.









আল-মুস্তাদরাক আলাস-সহীহাইন লিল হাকিম (8878)


8878 - حدَّثَناه أبو جعفر محمد بن أحمد بن سعيدٍ الواعظ، حدثنا الحسين بن داود بن معاذ، حدثنا مَكِّيُّ بن إبراهيم، حدثنا أيمن بن نابلٍ، عن قُدَامة بن بن عبد الله بن عمّار الكِلَابي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "عليكم باتِّقاءِ الله وهذه الجماعةِ، فإنَّ الله تعالى لا يجمعُ أمَّةَ محمدٍ على ضلالةٍ أبدًا، وعليكم بالصَّبر حتى يستريحَ بَرٌّ أو يُستراحَ من فاجر" [1].هذا حديثٌ لم نَكتُبْه من حديث أيمن بن نابِلٍ المكّي إلَّا بهذا الإسناد، والحسينُ بن داود ليس من شرطِ هذا الكتاب.




কুদামা ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আম্মার আল-কিলাবি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "তোমরা আল্লাহকে ভয় করে চলো এবং এই জামাআতকে (মুসলিমদের মূল সম্প্রদায়কে) আঁকড়ে ধরো। কেননা আল্লাহ তাআলা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতকে কখনওই ভ্রষ্টতার ওপর একত্রিত করবেন না। আর তোমরা ধৈর্য ধারণ করো যতক্ষণ না কোনো পুণ্যবান ব্যক্তি বিশ্রাম (মৃত্যু) লাভ করে অথবা কোনো পাপাচারী ব্যক্তি থেকে আরাম পাওয়া যায়।"




تحقيق الشيخ عادل مرشد:
[1] إسناده ضعيف جدًّا. وهو مكرر (8757).