সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
1767 - ` الإمام ضامن، فإن أحسن فله ولهم وإن أساء - يعني - فعليه ولهم `.
أخرجه ابن ماجة (981) عن عبد الحميد بن سليمان أخي فليح حدثنا أبو حازم قال:
` كان سهل بن سعد الساعدي يقدم فتيان قومه يصلون بهم، فقيل له: تفعل ولك
من القدم مالك؟ قال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: ورجاله ثقات غير عبد الحميد بن سليمان، فهو ضعيف. لكن الحديث صحيح،
فإن قوله: ` الإمام ضامن ` قد جاء من حديث أبي هريرة وعائشة وهما مخرجان في
` صحيح أبي داود ` (
সাহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
ইমাম হলেন দায়িত্বশীল (যামিন)। যদি তিনি উত্তমরূপে (নামাজ সম্পন্ন) করেন, তবে এর সাওয়াব তাঁর জন্য এবং মুক্তাদিদের জন্যও থাকবে। আর যদি তিনি মন্দভাবে (নামাজ আদায়) করেন, তবে এর পরিণতি তাঁরই ওপর বর্তাবে, কিন্তু মুক্তাদিদের (নামাজ শুদ্ধ হবে)।
1768 - ` الأنصار شعار والناس دثار ولو أن الناس استقبلوا واديا أو شعبا واستقبلت
الأنصار واديا لسلكت وادي الأنصار ولولا الهجرة لكنت امرأ من الأنصار `.
أخرجه ابن ماجة (164) عن عبد المهيمن بن عباس بن سهل بن سعد عن أبيه عن
جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. قال البوصيري في
` الزوائد ` (12 / 1) : ` هذا إسناد ضعيف، والآفة فيه من عبد المهيمن بن
عباس، وباقي رجال الإسناد ثقات. رواه الترمذي في ` الجامع ` من حديث أبي بن
كعب إلا أنه لم يقل: ` الأنصار شعار والناس دثار ` وقال: ` لو سلك ` بدل
` استقبلوا ` والباقي نحوه، وقال: ` حديث حسن `.
قلت: هذا الحديث صحيح جدا، ولقد قصر البوصيري في حقه حين لم يستشهد له إلا
بحديث الترمذي، فأوهم أنه لا شاهد له سواه، وليس كذلك، وأسوأ منه عملا
السيوطي، فإنه أورده في ` الزيادة على الجامع الصغير ` (ق 69 / 1) من رواية
ابن ماجة فقط عن سهل، وكان الواجب أن يذكر له بعض الشواهد التي تدل على أنه
صحيح لغيره، ولو اختلفت بعض ألفاظه كما هي غالب عادته، ولذلك رأيت من
الواجب ذكر
بعض الشواهد ليكون الواقف عليها على بينة من صحة الحديث، والموفق
الله تعالى. وقد جاء الحديث عن عبد الله بن زيد بن عاصم وأنس بن مالك وأبي
هريرة وأبي قتادة وأبي بن كعب.
সাহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
আনসারগণ হলো (আমার) ভিতরের পোশাক (‘শি‘আর’), আর অন্য লোকেরা হলো বাইরের পোশাক (‘দিসার’)। লোকেরা যদি কোনো উপত্যকা বা গিরিপথে প্রবেশ করে এবং আনসারগণ ভিন্ন কোনো উপত্যকায় প্রবেশ করে, তবে আমি অবশ্যই আনসারদের উপত্যকাই অনুসরণ করব। আর হিজরত (মক্কা থেকে মদিনায় আগমন) যদি না ঘটত, তবে আমি অবশ্যই আনসারদের একজন মানুষ হতাম।
1769 - ` الإيمان بضع وسبعون بابا، فأدناه إماطة الأذى عن الطريق، وأرفعها قول:
لا إله إلا الله `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (598) والترمذي (3 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
ঈমানের সত্তরোর্ধ্ব শাখা রয়েছে। এর মধ্যে সর্বনিম্ন হলো রাস্তা থেকে কষ্টদায়ক বস্তু অপসারণ করা, আর এর সর্বোচ্চ বা শ্রেষ্ঠতম হলো ’লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ বলা।
1770 - ` الإيمان يمان والكفر من قبل المشرق وإن السكينة في أهل الغنم وإن الرياء
والفخر في أهل الفدادين: أهل الوبر وأهل الخيل، ويأتي المسيح من قبل المشرق
وهمته المدينة، حتى إذا جاء دبر أحد تلقته الملائكة فضربت وجهه قبل الشام،
هنالك يهلك، هنالك يهلك `.
` أخرجه الترمذي (3 /
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ঈমান হল ইয়ামানী (ইয়ামন অঞ্চলের)। আর কুফর হল পূর্ব দিক থেকে। আর নিশ্চয়ই প্রশান্তি (সাকীনা) রয়েছে মেষপালকদের মধ্যে (যারা ছাগল-ভেড়া পালন করে)। আর অহংকার ও প্রদর্শনেচ্ছা (রিয়া ও ফখর) রয়েছে ফাদা’দীন তথা ঐসব লোকদের মধ্যে, যারা উটের পশমের তাঁবুতে থাকে (মরুচারী বেদুঈন) এবং যারা ঘোড়ার মালিক। আর মাসীহ (দাজ্জাল) পূর্ব দিক থেকে আসবে এবং তার লক্ষ্য হবে মদীনা। অবশেষে যখন সে উহুদ পাহাড়ের পিছনের দিকে আসবে, তখন ফেরেশতারা তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করবে এবং তার চেহারা শামের (সিরিয়ার) দিকে তাড়িয়ে দেবে। সেখানেই সে ধ্বংস হবে, সেখানেই সে ধ্বংস হবে।
1771 - ` الأيمن فالأيمن ـ وفي طريق: الأيمنون الأيمنون ـ ألا فيمنوا `.
ورد من حديث أنس بن مالك وسهل بن سعد.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
প্রথমে ডান দিকের জন, তারপর ডান দিকের জন। (অন্য এক সূত্রে বর্ণিত: ডান দিকের লোকেরা, ডান দিকের লোকেরা)। সাবধান! তোমরা ডান দিক থেকে (কাজ) শুরু করবে।
1772 - ` لقلب ابن آدم أشد انقلابا من القدر إذا اجتمعت غليانا `.
أخرجه أحمد (4 / 4) : حدثنا هاشم بن القاسم حدثنا الفرج حدثنا سليمان بن سليم
قال: قال المقداد بن الأسود: ` لا أقول في رجل خيرا ولا شرا، حتى أنظر
ما يختم له - يعني - بعد شيء سمعته من النبي صلى الله عليه وسلم، قيل: وما
سمعت؟ قال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد منقطع، ورجاله ثقات غير الفرج وهو ابن فضالة، فإنه ضعيف
لكنه قد توبع كما يأتي، وقد رواه عنه بقية فزاد في إسناده فقال: حدثنا الفرج
ابن فضالة حدثني سليمان بن سليم عن يحيى بن جابر عن المقداد بن الأسود به.
أخرجه المحاملي في الرابع من ` الآمالي ` (50 / 2) وأبو محمد الطامذي في `
الفوائد ` (
মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি কোনো ব্যক্তি সম্পর্কে ভালো বা মন্দ কিছুই বলি না, যতক্ষণ না আমি দেখতে পাই তার পরিণতি কী হয়— (কারণ) আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট একটি বিষয় শুনেছি। জিজ্ঞাসা করা হলো: আপনি কী শুনেছেন? তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “আদম সন্তানের অন্তর সেই হাঁড়ির চেয়েও বেশি দ্রুত ওলট-পালট হয়, যখন তার ভেতরে তীব্রভাবে ফুটন একত্রিত হয় (অর্থাৎ যখন সেটি তীব্রভাবে ফুটতে থাকে)।”
1773 - ` بكروا بالإفطار وأخروا السحور `.
قال السيوطي في ` الجامع الكبير `: ` رواه ابن عدي والديلمي عن أنس `.
قلت: ولم أقف على إسناده الآن، وإنما كان يغلب على الظن أنه ضعيف. ثم
رأيته عند الديلمي (2 / 1 / 3) ، وفيه المبارك بن سحيم، وهو متروك. وعنه
ابن عدي (ق 381 / 1) . لكن له شواهد كثيرة يتقوى بها، منها حديث أم حكيم بنت
وداع مرفوعا بلفظ: ` عجلوا بالإفطار، وأخروا السحور `. قال الهيثمي في `
المجمع ` (3 / 155) : ` رواه الطبراني في ` الكبير ` من طريق حبابة بنت عجلان
عن أمها عن صفية بنت جرير، وهؤلاء النسوة روى لهن ابن ماجة، ولم يجرحهن أحد
ولم يوثقهن `.
وعزاه الحافظ في ` الإصابة ` لأبي يعلى وابن منده. ومنها
حديث ابن عباس مرفوعا: ` إنا معشر الأنبياء أمرنا أن نعجل إفطارنا ونؤخر
سحورنا ونضع أيماننا على شمائلنا في الصلاة `. أخرجه الطيالسي وغيره وصححه
ابن حبان، وهو مخرج في غير ما مؤلف من مؤلفاتي، فانظر ` صحيح الجامع الصغير
وزيادته ` (رقم 2282) . وفي الحض على تعجيل الإفطار وتأخير السحور أحاديث
أخرى تراجع في كتب الحديث الجامعة.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমরা তাড়াতাড়ি ইফতার করো এবং সাহরি বিলম্বিত করো।
1774 - ` بعثت إلى أهل البقيع أصلي عليهم `.
أخرجه أحمد (6 / 92) عن عبد العزيز بن محمد عن علقمة بن أبي علقمة عن أمه عن
عائشة أنها قالت: ` خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فأرسلت
بريرة في أثره لتنظر أين ذهب، قالت: فسلك نحو بقيع الغرقد، فوقف في أدنى
البقيع، ثم رفع يديه، ثم انصرف، فرجعت إلي بريرة، فأخبرتني، فلما أصبحت
سألته؟ فقلت: يا رسول الله أين خرجت الليلة؟ قال: فذكره. وتابعه مالك في
` الموطأ ` (1 / 242 / 55) وعنه النسائي (1 / 287) .
قلت: وهذا إسناد لا بأس به في الشواهد، فإن أم علقمة واسمها مرجانة قد روى
عنها أيضا غير ابنها، بكير بن الأشج، وقال العجلي في ` الثقات ` (68 / 2
مصورة المكتب) : ` مدنية تابعية ثقة `. وقد تابعها على أصل القصة محمد بن
قيس بن مخرمة بن المطلب عن عائشة به
مطولا، مع اختلاف في بعض الأحرف، وفيه
أن جبريل عليه السلام قال له صلى الله عليه وسلم: ` إن ربك يأمرك أن تأتي أهل
البقيع فتستغفر لهم `. أخرجه مسلم (3 /
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
এক রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (ঘর থেকে) বের হলেন। আমি তাঁর পেছনে বারিরাকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাঠালাম, যেন সে দেখে তিনি কোথায় যান। (বারিবা ফিরে এসে) বলেন: তখন তিনি বাকীউল গারকাদ (কবরস্থান)-এর দিকে গেলেন এবং বাকী’-এর এক প্রান্তে এসে দাঁড়ালেন, এরপর হাত উত্তোলন করলেন (দোয়া করলেন), অতঃপর ফিরে আসলেন। বারিরা আমার কাছে ফিরে এসে আমাকে সে খবর জানালো।
যখন সকাল হলো, আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: "ইয়া রাসূলুল্লাহ! গত রাতে আপনি কোথায় বেরিয়েছিলেন?"
তিনি তখন কারণটি উল্লেখ করে বললেন: "**আমি বাকী’বাসীদের জন্য সালাত (দোয়া) আদায়ের জন্য আদিষ্ট হয়েছিলাম।**"
1775 - ` أهل اليمن أرق قلوبا وألين أفئدة وأنجع طاعة `.
أخرجه الإمام أحمد في ` المسند ` (4 / 154) من طريق مشرح بن هاعان أنه سمع
عقبة بن عامر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، ورجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير مشرح هذا، وقد
وثقه ابن معين، وكذا ابن حبان. ثم تناقض فأورده في ` الضعفاء `! والحديث
قال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (10 / 55) : ` رواه أحمد والطبراني - وقال
: وأسمع طاعة - وإسناده حسن `. (أنجع) أي أنفع.
উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
“ইয়েমেনের অধিবাসীরা হলো অধিক কোমল হৃদয়ের অধিকারী, অধিক নরম অন্তরবিশিষ্ট এবং আনুগত্যের ক্ষেত্রে অধিক ফলপ্রসূ।”
1776 - ` بيت لا تمر فيه، كالبيت لا طعام فيه `.
أخرجه ابن ماجة (3327) من طريق هشام بن سعد عن عبيد الله بن أبي رافع عن جدته
سلمى أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، ورجاله ثقات رجال مسلم على ضعف في هشام غير عبيد الله
وهو ابن علي بن أبي رافع، نسب لجده، قال ابن معين: ` لا بأس به `. وقال
أبو حاتم:
` لا بأس بحديثه `. وذكره ابن حبان في ` الثقات `. ويشهد له
حديث عائشة مرفوعا: ` بيت لا تمر فيه جياع أهله `. أخرجه مسلم (6 / 123)
وغيره.
সালমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন): “যে ঘরে খেজুর নেই, সে ঘর যেন খাদ্যবিহীন ঘরের মতো।”
1777 - ` بلوا أرحامكم ولو بالسلام `.
أخرجه وكيع في ` الزهد ` (2 / 74 / 2) : حدثنا مجمع بن يحيى الأنصاري عن
سويد بن عامر الأنصاري مرفوعا به. وأخرجه ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 75
) والقضاعي في ` مسند الشهاب ` (ق 55 / 1) وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (
16 / 132 / 2) من طرق أخرى عن مجمع به.
قلت: وهذا إسناد صحيح، ولكنه مرسل، أورده ابن حبان في ترجمة سويد هذا
وقال: ` سويد بن عامر بن يزيد (الأصل: زيد) بن جارية الأنصاري من أهل
المدينة، يروي المراسيل، وقد سمع الشموس بنت النعمان، ولها صحبة `.
وأخرجه عبد الرحمن بن عمر الدمشقي في ` الفوائد ` (1 / 223 / 1) والقضاعي
أيضا من طريق عيسى بن يونس عن مجمع بن يحيى قال: حدثني رجل من الأنصار.
وأخرجه أبو عبيد في ` غريب الحديث ` (ق 62 / 1) من طريق الفزاري مروان بن
معاوية عن مجمع بن يحيى الأنصاري عمن حدثه يرفعه.
قلت: وبالجملة فالإسناد صحيح مرسلا، إلا أن بعضهم لم يسم مرسله. وسماه
الآخرون، وبه يتبين أنه ثقة.
وقد روى موصولا من حديث ابن عباس وأبي الطفيل
وأنس بن مالك وسويد بن عمرو.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"তোমরা তোমাদের আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখো (বা সিক্ত করো), যদিও তা শুধু সালাম (শুভেচ্ছা) বিনিময়ের মাধ্যমেই হয়।"
1778 - ` البركة مع أكابركم `.
أخرجه ابن حبان (1912) وأبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (97 /
তোমাদের প্রবীণদের মাঝে বরকত নিহিত রয়েছে।
(অথবা: বরকত তোমাদের বয়োজ্যেষ্ঠদের সাথে রয়েছে।)
1779 - ` تؤخذ صدقات المسلمين على مياههم `. يعني مواشيهم.
¬_________
(¬1) مضى تخريجه برقم (1771) . اهـ.
أخرجه أحمد (2 / 184) : حدثنا عبد الصمد عن عبد الله بن المبارك حدثنا أسامة
ابن زيد عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم قال: فذكره. وأخرجه الطيالسي (2264) : حدثنا ابن المبارك
به إلا أنه شك فقال: ` أو عند أفنيتهم `. وأخرجه البيهقي (4 / 110) من
طريقه وقال: ` شك أبو داود ` وخالفهما في إسناده محمد بن الفضل فقال: حدثنا
ابن المبارك عن أسامة بن زيد عن أبيه عن ابن عمر مرفوعا به. أخرجه ابن ماجة (
1806) .
قلت: ومحمد بن الفضل هو السدوسي الملقب بـ ` عارم `، وهو ثقة، ولكنه كان
اختلط، فلا يعتد بمخالفته للثقتين المتقدمين: عبد الصمد وهو ابن عبد الوارث
والطيالسي. وإسنادهما حسن، رجاله ثقات، وفي أسامة بن زيد وهو أبو زيد
الليثي خلاف، وهو حسن الحديث. وأما قول البوصيري في ` الزوائد ` (133 / 2
) : ` وإسناده ضعيف لضعف أسامة `.
فأقول: لعله أراد أنه أسامة بن زيد العدوي، فإنه ضعيف والأقرب ما ذكرنا أنه
الليثي، فإنه هو الذي ذكر في الرواة عن عمرو بن شعيب دون العدوي. وكلاهما من
شيوخ ابن المبارك. والله أعلم. وللحديث شاهد يرويه عبد الملك بن محمد بن
عمرو بن حزم عن عبد الله بن أبي بكر عن عمرو عن عائشة مرفوعا نحوه. أخرجه
البيهقي. وعبد الملك هذا لم أعرفه.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"মুসলমানদের সাদকা (যাকাত) তাদের পানির উৎসের নিকট গ্রহণ করা হবে।" (অর্থাৎ, তাদের গবাদি পশুর যাকাত।)
1780 - ` تجيء ريح بين يدي الساعة، تقبض فيها أرواح كل مؤمن `.
أخرجه أحمد (3 / 420) : حدثنا عبد الرزاق قال أنبأنا معمر عن أيوب عن نافع
عن عياش بن أبي ربيعة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وأخرجه الحاكم (4 / 489) من طريق الدبري: أنبأ عبد الرزاق ... وقال:
` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا. وله شواهد من
حديث النواس بن سمعان في آخر حديثه الطويل في الدجال ونزول عيسى عليه السلام
بلفظ: ` فبينما هم كذلك إذ بعث الله ريحا طيبة، فتأخذهم تحت آباطهم، فتقبض
روح كل مؤمن وكل مسلم ... `. أخرجه مسلم (8 /
আইয়াশ ইবনে আবি রাবী’আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:) কিয়ামতের পূর্বে একটি বাতাস প্রবাহিত হবে, যার মাধ্যমে প্রত্যেক মুমিনের রূহ (আত্মা) কব্জা করে নেওয়া হবে।
1781 - ` تذهبون الخير فالخير، حتى لا يبقى منكم إلا مثل هذا - وأشار إلى نواة -
وما لا خير فيه `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (2 / 1 / 309) وابن حبان (1832) والحاكم
(4 / 434) والطبراني (4492) عن بكر بن سوادة الجذامي أن سحيما حدثه عن
رويفع بن ثابت الأنصاري رضي الله عنه. ` أنه قرب لرسول الله صلى الله عليه
وسلم تمر أو رطب، فأكلوا منه حتى لم يبقوا شيئا إلا نواة وما لا خير فيه،
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` تدرون ما هذا؟ تذهبون ... ` الحديث.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `! ووافقه الذهبي! كذا قالا، وسحيم هذا
أورده ابن أبي حاتم (2 / 1 / 303) من رواية بكر هذا فقط عنه، ولم يذكر فيه
جرحا ولا تعديلا، وأما ابن حبان فذكره في ` الثقات ` (1 / 81) من هذه
الرواية أيضا! وذكر فيه أيضا ` سحيم مولى بني زهرة القرشي، يروي عن أبي
هريرة. روى عنه الزهري `.
قلت: ويحتمل عندي أن يكون هذا هو الأول. والله أعلم. نعم الحديث ثابت،
فإن له شاهدا من حديث أبي هريرة مرفوعا بلفظ: ` لتنتقين كما ينتقى التمر من
الجفنة، فليذهبن خياركم وليبقين شراركم، فموتوا إن استطعتم `. أخرجه
البخاري في ` التاريخ ` (كنى - 25) وابن ماجة (4038) والحاكم (4 / 316
و334) من طريق يونس بن يزيد عن ابن شهاب عن أبي حميد مولى مسافع قال: سمعت أبا
هريرة رضي الله عنه يحدث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره، وقال
الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: أبو حميد هذا مجهول وقيل هو عبد الرحمن بن سعد المقعد، وثقه النسائي،
والله أعلم. ورواه ابن أبي العشرين عن الأوزاعي عن الزهري عن سعيد بن المسيب
عن أبي هريرة به مختصرا بلفظ: ` تنقون كما ينقى التمر من حثالته `.
أخرجه ابن حبان (1833) .
قلت: وابن أبي العشرين اسمه عبد الحميد بن حبيب، قال الحافظ: ` صدوق ربما
أخطأ `. قلت: فأخشى أن يكون خطأه في إسناده حين قال: سعيد بن المسيب، مكان
أبي حميد كما في رواية يونس بن يزيد وهو ثقة. والله أعلم. وبالجملة فحديث
الترجمة حسن بحديث أبي هريرة، ولا عكس لأن الشاهد فيه ما ليس في المشهود له،
فتأمل.
রুয়াইফা’ বিন সাবিত আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"তোমরা কল্যাণের পর কল্যাণ নিয়ে বিদায় নেবে (অর্থাৎ, ভালো মানুষগুলো একে একে চলে যাবে), শেষ পর্যন্ত তোমাদের মধ্যে শুধু এর মতো (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি বিচির দিকে ইশারা করলেন) এবং যার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই, তা-ই অবশিষ্ট থাকবে।"
1782 - ` تزوجوا فإني مكاثر بكم الأمم يوم القيامة، ولا تكونوا كرهبانية النصارى `.
أخرجه البيهقي في ` السنن الكبرى ` (7 / 78) من طريق ابن عدي، وهذا في
` الكامل ` (ق 329 / 1) عن محمد بن ثابت البصري عن أبي غالب عن أبي أمامة
مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد حسن في الشواهد، فإن محمد بن ثابت البصري وهو العبدي قال
الحافظ: ` صدوق لين الحديث `.
وسائر رجاله موثوقون غير أحمد بن عبد الرحيم
الثقفي البصري شيخ ابن عدي فيه، أورده الخطيب في ` تاريخه ` (4 / 269)
وكناه بأبي عمرو وقال: ` روى عنه عبد الله بن عدي الجرجاني في ` معجمه `
وذكر أنه سمع منه ببغداد `. ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا، وقد تابعه
الروياني الحافظ الثقة، فقال في ` مسنده ` (30 / 216 / 1) : أخبرنا أبو حفص
عمرو بن علي قال: سمعت شيخا سنة ثمان وسبعين ومائة يقول: أخبرنا أبو غالب
به إلا أنه قال: ` النبيين ` مكان ` الأمم ` وزاد: قال أبو حفص: وصفت هذا
الشيخ، فقالوا: هذا محمد بن ثابت العصري:
قلت: هو العبدي نفسه كما في ` التهذيب `. وللحديث شواهد يتقوى بها، أما
الشطر الأول منه، فقد ورد عند أبي داود وغيره من حديث معقل بن يسار، وصححه
ابن حبان (1229) . وعنده من حديث أنس أيضا (1228) وهو مخرج في ` آداب
الزفاف ` (ص 16) و ` الإرواء ` (1811) . وأما الشطر الثاني فيشهد له ما
روى ابن سعد في ` الطبقات ` (3 / 395) عن معاوية بن (أبي) عياش الجرمي عن
أبي قلابة: أن عثمان بن مظعون اتخذ بيتا فقعد يتعبد فيه، فبلغ ذلك النبي صلى
الله عليه وسلم، فأتاه فأخذ بعضادتي باب البيت الذي هو فيه، فقال: ` يا
عثمان إن الله لم يبعثني بالرهبانية، (مرتين أو ثلاثا) وإن خير الدين عند
الله الحنيفية السمحة `.
قلت: وهذا إسناد مرسل لا بأس به في الشواهد، ورجاله ثقات رجل الشيخين غير
الجرمي هذا، فقد ترجمه ابن أبي حاتم في كتابه (4 / 1 / 380) ولم يذكر فيه
جرحا ولا تعديلا، وقد روى عنه ثلاث من الثقات. وما روى الدارمي (2 / 133) من طريق ابن إسحاق حدثني الزهري عن سعيد بن المسيب عن سعد بن أبي وقاص قال:
` لما كان من أمر عثمان بن مظعون الذي كان من ترك النساء، بعث إليه رسول الله
صلى الله عليه وسلم فقال: يا عثمان إني لم أومر بالرهبانية، أرغبت عن سنتي.
` الحديث.
قلت: وسنده حسن. وما روى أحمد (6 / 226) من طريق عروة قال: ` دخلت امرأة
عثمان بن مظعون - أحسب اسمها خولة بنت حكيم - على عائشة وهي باذة الهيئة ... (
الحديث وفيه) فلقي رسول الله صلى الله عليه وسلم عثمان فقال: يا عثمان إن
الرهبانية لم تكتب علينا، أفما لك في أسوة؟ فوالله إني أخشاكم لله وأحفظكم
لحدوده `.
قلت: وإسناده صحيح رجاله رجال الشيخين، وهو وإن كان ظاهره الإرسال، فإن
الغالب أن عروة تلقاه من خالته عائشة وكأنه لذلك وقع مثله لعروة عند البخاري.
والله أعلم. وروى أبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2 / 245) من طريق محمد بن
حميد حدثنا جرير عن الأعمش عن أبي حازم عن أبي هريرة مرفوعا بلفظ: ` إني لم
أبعث بالرهبانية.. ` الحديث. وفيه قصة. لكن محمد بن حميد وهو الرازي قال
الحافظ: ` حافظ ضعيف، وكان ابن معين حسن الرأي فيه `. وما روى ابن قتيبة
في ` غريب الحديث ` (1 / 102 / 1) من طريق ابن جريج عن الحسن بن مسلم عن
طاووس مرفوعا بلفظ: ` لا زمام ولا خزام ولا رهبانية ولا تبتل ولا سياحة في
الإسلام `. وهذا إسناد رجاله ثقات، وهو مرسل. وقد عزاه في ` الجامع
الصغير ` لعبد الرزاق عن طاووس مرسلا. وغالب الظن أنه عنده من طريق ابن جريج
به.
و ` مصنف عبد الرزاق ` يطبع الآن في ` دار القلم ` في بيروت، وقد تم حتى
الآن طبع المجلد الأول والثاني منه، وربما الثالث أيضا. ثم تم طبعه بتمامه
، ولكن لا تطوله يدي الآن. ثم تيسر لي الرجوع إليه، فوجدته عنده (8 / 448 /
15860) من طريق معمر عن ابن طاووس وعن ليث عن طاووس به دون (الرهبانية
والتبتل) وقال: زاد ابن جريج: ` ولا تبتل، ولا ترهب في الإسلام `.
وسنده مرسل صحيح. وبالجملة فالحديث بهذه الشواهد صحيح عندي. والله أعلم.
আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তোমরা বিবাহ করো। কেননা আমি কিয়ামতের দিন তোমাদের সংখ্যাধিক্য দ্বারা অন্যান্য উম্মতের উপর ফখর করব। আর তোমরা খ্রিস্টানদের বৈরাগ্য অবলম্বনকারীদের মতো হয়ো না।
1783 - ` تسليم الرجل بإصبع واحدة يشير بها فعل اليهود `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (109 / 1) والعقيلي (294) والطبراني في `
الأوسط ` (4598) عن سليمان بن حبان عن ثور بن يزيد عن أبي الزبير عن جابر
مرفوعا. وقال الطبراني: ` لا يروى عن رسول الله صلى الله عليه وسلم إلا بهذا
الإسناد `.
قلت: رجاله ثقات رجال مسلم لولا عنعنة أبي الزبير، فإنه مدلس. وفي ` المجمع
` (8 / 38) : ` رواه أبو يعلى والطبراني في ` الأوسط ` ورجال أبي يعلى رجال
الصحيح `. وقال الحافظ في ` الفتح ` (11 / 12) : ` أخرجه النسائي بسند جيد
`. وكأنه يعني ` السنن الكبرى ` أو ` عمل اليوم والليلة ` للنسائي.
وللحديث شاهد من رواية عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده، أوردته في حجاب المرأة
(ص 87 طبع المكتب الإسلامي في بيروت) . ثم رأيت الحديث بلفظ آخر أتم منه وهو
: ` لا تسلموا تسليم اليهود والنصارى، فإن تسليمهم بالأكف والرءوس والإشارة
`. أخرجه الديلمي (4 / 150) من طريق الحسن بن علي المعمري حدثني أبو همام
الصلت بن محمد الحارثي حدثنا إبراهيم بن حميد عن ثور حدث أبو الزبير عن جابر
رفعه. وبهذا اللفظ أورده المزي في ` التحفة ` (2 / 290) من رواية النسائي
في ` اليوم والليلة ` من طريق إبراهيم بن المستمر العروقي عن الصلت بن محمد به
. وأخرجه البيهقي في ` الشعب ` من حديث عثمان بن عبد الرحمن عن طلحة بن زيد عن
ثور بن يزيد بهذا اللفظ والتمام إلا أنه قال: ` والحواجب ` بدل قوله:
والرؤس والإشارة `. هكذا أورده السيوطي في ` الجامع ` وتعقبه المناوي بقوله
: ` وقضية كلام المصنف أن البيهقي خرجه وأقره وليس كذلك وإنما رواه مقرونا
ببيان رجاله، فقال عقبة: هذا إسناد ضعيف بمرة، فإن طلحة بن زيد الرقي متروك
الحديث، متهم بالوضع. وعثمان ضعيف `.
قلت: والمستنكر منه ذكر الحواجب، وسائره ثابت بمجموع الطريقين السابقين عن
ثور بن يزيد مع الشاهد. والله أعلم.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কোনো ব্যক্তির এক আঙুল দিয়ে ইশারা করে সালাম দেওয়া ইহুদিদের কাজ।
1784 - ` تسمعون ويسمع منكم، ويسمع ممن سمع منكم `.
رواه أبو داود في ` العلم ` (3659) وابن حبان (77) وأحمد (1 / 321) عن
عبد الله بن عبد الله عن سعيد بن جبير عن ابن عباس مرفوعا. والحاكم (1 /
95) وقال: ` صحيح على شرط الشيخين، ليس له علة `. ووافقه الذهبي.
قلت: عبد الله بن عبد الله وهو أبو جعفر الرازي قاضي الري لم يخرج له الشيخان
، وإن كان ثقة. وقال العلائي في ` جامع التحصيل في أحكام المراسيل ` (14 /
1) : ` وعبد الله بن عبد الله هذا قال فيه النسائي: ليس به بأس ووثقه ابن
حبان، ولم يضعفه أحد، والحديث حسن، وفي كلام إسحاق بن راهويه الإمام ما
يقتضي تصحيحه أيضا `. وذكر المناوي أن للحديث تتمة، وليس عند المذكورين،
ولعله يشير إلى الزيادة الآتية في الشاهد. وله شاهد يرويه ابن أبي ليلى عن
عيسى عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن ثابت بن قيس بن شماس به وزاد: ` ثم يكون
بعد ذلك قوم يشهدون قبل أن يستشهدوا `. رواه البزار في ` مسنده ` (رقم - 146
) وقال: ` عبد الرحمن لم يسمع من ثابت `.
قلت: ومن هذا الوجه أخرجه الطبراني (1321) دون الزيادة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তোমরা (আমার কথা) শুনবে, তোমাদের কাছ থেকে (অন্যরা) শুনবে, এবং যারা তোমাদের কাছ থেকে শুনেছে, তাদের কাছ থেকেও (পরবর্তী প্রজন্ম) শুনবে।
1785 - ` ثلاثة لا يقبل الله منهم صرفا ولا عدلا: عاق ومنان ومكذب بالقدر `.
رواه ابن أبي عاصم في ` السنة ` برقم (
তিন ব্যক্তি এমন, যাদের কোনো ফরয বা নফল আমল আল্লাহ তা‘আলা কবুল করেন না: (১) পিতা-মাতার অবাধ্য সন্তান, (২) দান করে খোটা প্রদানকারী এবং (৩) তাকদীরকে অস্বীকারকারী।
1786 - ` هي الرؤيا الصالحة يراها العبد أو ترى له. يعني (البشرى في الحياة الدنيا)
`.
أخرجه الطبري في تفسيره (11 / 95) من طريق عاصم بن بهدلة عن أبي صالح قال:
سمعت أبا الدرداء - وسئل عن * (الذين آمنوا وكانوا يتقون. لهم البشرى في
الحياة
الدنيا) *؟ - قال: ما سألني أحد قبلك منذ سألت رسول الله صلى الله
عليه وسلم عنها، فقال: ما سألني عنها أحد قبلك هي.. فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات رجال الشيخين، غير أنهما إنما أخرجا لعاصم
متابعة، لكن قد تابعه الأعمش عن أبي صالح، إلا أنهم اختلفوا عليه في إسناده.
أخرجه أحمد (6 / 445 و 452) والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (3 / 47) وكذا
ابن جرير وأطال في ذكر الطرق إليه بذلك. وأخرج له هو وأحمد (5 / 315)
وابن الجوزي في ` جامع المسانيد ` (ق 79 / 2) شاهدا من حديث عبادة بن الصامت
مثله. ورجاله ثقات رجال الشيخين، لولا أن في بعض روايته عند ابن جرير ما
يشعر بأنه منقطع بين أبي سلمة بن عبد الرحمن وعبادة، لكن له عنده طريق أخرى
عن عبادة، فالحديث بمجموع هذه الطرق صحيح. وله عند ابن جرير (11 / 94)
شاهد آخر من حديث أبي هريرة مرفوعا بلفظ: ` الرؤيا الحسنة هي البشرى، يراها
المؤمن، أو ترى له `. وإسناده جيد، وهو عند مسلم (7 / 52، 53) مفرقا من
طريقين عنه أحدهما طريق ابن جرير.
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তাঁকে (আল্লাহ তাআলার বাণী): "যারা ঈমান এনেছে এবং আল্লাহকে ভয় করে, তাদের জন্যেই ইহজীবনে সুসংবাদ" – এই আয়াতের ব্যাখ্যা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল।
তিনি বললেন: আমি যখন এই আয়াত সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞেস করেছিলাম, তখন থেকে আপনার আগে আর কেউ আমাকে এই বিষয়ে জিজ্ঞেস করেনি। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছিলেন: "তোমার আগে আর কেউ আমাকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করেনি। এই সুসংবাদ হলো নেক (বা সৎ) স্বপ্ন, যা বান্দা নিজে দেখে অথবা তাকে দেখানো হয়।"