হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (187)


187 - ` تعلم كتاب اليهود، فإني لا آمنهم على كتابنا `.
رواه أبو داود (3645) والترمذي (2 / 119) والحاكم (1 / 75) وصححه
وأحمد (5 / 186) والفاكهي في ` حديثه ` (1 / 14 / 2) واللفظ له، كلهم
عن عبد الرحمن بن أبي الزناد عن أبيه عن خارجه بن زيد عن أبيه قال:
` لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، أتي بي إليه، فقرأت عليه،
فقال لي.. ` فذكره، قال: فما مر بي خمس عشرة حتى تعلمته، فكنت أكتب للنبي
صلى الله عليه وسلم، وأقرأ كتبهم إليه `.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
قلت: وإسناده حسن، وإنما صححه الترمذي لأن له طريقا أخرى، وقد قال
الترمذي عقب ذلك:
` وقد روي من غير هذا الوجه عن زيد بن ثابت، رواه الأعمش، عن ثابت بن عبيد
الأنصاري عن زيد بن ثابت قال:
(أمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أتعلم السريانية) `.
قلت: وصله أحمد (5 / 182) والحاكم (3 / 422) عن جرير عن الأعمش به بلفظ:
قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` أتحسن السريانية؟ فقلت: لا، قال: فتعلمها فإنه يأتينا كتب، فتعلمها في
سبعة عشر يوما `.
زاد الحاكم:
` قال الأعمش: كانت تأتيه كتب لا يشتهي أن يطلع عليها إلا من يثق به `.
وقال:
` صحيح إن كان ثابت بن عبيد سمعه من زيد بن ثابت `.
قلت: لا أدري الذي حمل الحاكم على التردد في سماع ثابت إياه من زيد وهو مولاه
ولم يتهم بتدليس! قال ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 6) :
` ثابت بن عبيد الأنصاري، كوفي يروي عن عمر وزيد بن ثابت، روى عن ابن سيرين
والأعمش، وهو مولى زيد بن ثابت `:
وقد قيل إن ثابت بن عبيد الأنصاري هو غير ثابت بن عبيد مولى زيد، فرق بينهما
أبو حاتم في ` الجرح والتعديل ` (1 / 1 / 454) ، وعزى الحافظ في ` التهذيب
` هذا التفريق إلى ابن حبان أيضا وهو وهم، بل ما نقلته عن ابن حبان آنفا يدل
عن عدم التفريق وهو الذي اعتمده الحافظ في ` التقريب ` وسواء كان هذا أو ذاك
فكلاهما ثقة، فالسند صحيح.
والحديث علقه البخاري في صحيحه فقال: ` وقال خارجة بن زيد ابن ثابت عن زيد
بن ثابت أن النبي صلى الله عليه وسلم أمره أن يتعلم كتاب اليهود `.
قال الحافظ ابن حجر في شرحه (13 / 161) :
` وقد وصله مطولا في (كتاب التاريخ) `.
ثم ذكر ابن حجر الطريق الأخرى التي علقها الترمذي ثم قال:
` وهذا الطريق وقعت لي بعلو في ` فوائد هلال الحفار `.
وأخرجه أحمد وإسحاق في ` مسنديهما `، وأبو بكر بن أبي داود في
` كتاب المصاحف ` وأبو يعلى، وعنده: إني أكتب إلى قوم فأخاف أن يزيدوا علي
وينقصوا فتعلم السريانية. فذكره.
وله طريق أخرى أخرجها ابن سعد. وفي كل ذلك رد على من زعم أن عبد الرحمن
بن أبي الزناد تفرد به. نعم لم يروه عن أبيه عن خارجة إلا عبد الرحمن.
فهو تفرد نسبي. وقصة ثابت يمكن أن تتحد مع قصة خارجة، فإن من لازم تعلم
كتابة اليهود تعلم لسانهم، ولسانهم السريانية، لكن المعروف أن لسانهم
العبرانية، فيحتمل أن زيدا تعلم اللسانين لاحتياجه إلى ذلك `.
قلت: وهذا الحديث في معنى الحديث المتداول على الألسنة: ` من تعلم لسان قوم
أمن من مكرهم ` لكن لا أعلم له أصلا بهذا اللفظ، ولا ذكره أحد ممن ألف في
الأحاديث المشتهرة على الألسنة، فكأنه إنما اشتهر في الأزمنة المتأخرة.




যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় আগমন করলেন, আমাকে তাঁর কাছে আনা হলো। আমি তাঁকে ক্বিরাআত (কুরআন) পড়ে শোনালাম। তখন তিনি আমাকে বললেন:

**"তুমি ইহুদিদের কিতাব (লিপি) শিখে নাও, কারণ আমি তাদের ওপর আমাদের কিতাবের (লেখার) বিষয়ে নিরাপদ মনে করি না।"**

তিনি (যায়েদ) বলেন: পনেরো দিনও পেরোয়নি, এর মধ্যে আমি তা শিখে ফেললাম। এরপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের জন্য লিখতাম এবং তাদের (ইহুদিদের) পক্ষ থেকে আসা চিঠিগুলো তাঁকে পড়ে শোনাতাম।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে সুরইয়ানী (Syriac) ভাষা শিখতে নির্দেশ দিয়েছিলেন।

অপর এক বর্ণনায় যায়েদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে বললেন, "তুমি কি সুরইয়ানী (ভাষা) ভালো জানো?" আমি বললাম, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে তা শিখে নাও, কারণ আমাদের কাছে (বিদেশি) চিঠি আসে।" এরপর আমি সতেরো দিনের মধ্যে তা শিখে নিলাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (188)


188 - ` انقضي شعرك واغتسلي. أي في الحيض `.
رواه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (1 / 26 / 1) : أنبأنا وكيع عن هشام عن أبيه
عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها في الحيض: فذكره.
وأخرجه ابن ماجه (641) من طريق ابن أبي شيبة وعلي بن محمد قالا: حدثنا
وكيع به.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط الشيخين. وهو عندهما في أثناء حديث عائشة في
قصة حيضها في حجة الوداع وأن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها:
` انقضي رأسك وامتشطي وأمسكي عن عمرتك.. الحديث وليس فيه ` واغتسلي ` وهي
زيادة صحيحة بهذا السند الصحيح، وسياق الشيخين، يقتضيها ضمنا، وإن لم يصرح
بها لفظا. ولعل هذا هو وجه استدراك السندي على البوصيري قوله في ` الزوائد `
: ` وهذا إسناد رجاله ثقات `
فقال السندي ` قلت: ليس الحديث من الزوائد،
بل هو في الصحيحين وغيرهما `.
وأقول: ولكل وجهة، فالسندي راعى المعنى الذي يقتضيه السياق كما أشرت إليه.
والبوصيري راعى اللفظ، ولا شك أنه بهذه الزيادة ` واغتسلي ` إنما هو من
الزوائد على الشيخين، ولذلك أورده البوصيري، وتكلم في إسناده ووثقه.
وكان عليه أن يصرح بصحته كما فعل المجد ابن تيمية في ` المنتقى ` والله
الموفق.
ولا تعارض بين الحديث وبين ما رواه أبو الزبير عن عبيد بن عمير قال:
` بلغ عائشة أن عبد الله بن عمرو يأمر النساء إذا اغتسلن أن ينقضن رؤوسهن،
فقالت: يا عجبا لابن عمرو هذا، يأمر النساء إذا اغتسلن أن ينقضن رؤوسهن!
أفلا يأمرهن أن يحلقن رؤوسهن؟ ! لقد كنت أغتسل أنا ورسول الله صلى الله عليه
وسلم من إناء واحد، ولا أزيد على أن أفرغ على رأسي ثلاث إفراغات `.
أخرجه مسلم (1 / 179) وابن أبي شيبة (1 / 24 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (মাসিকের পর) বললেন:

"তুমি তোমার চুল খুলে দাও এবং গোসল করো।"

[এই ঘটনার বিপরীতে, গোসলের সাধারণ নিয়ম সম্পর্কে অন্য বর্ণনায় এসেছে:]

উবাইদ ইবনে উমাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে খবর পৌঁছাল যে, আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মহিলাদেরকে নির্দেশ দেন যে তারা যখন (অপবিত্রতার) গোসল করবে, তখন যেন চুল খুলে দেয় (বা বিনুনি খুলে ফেলে)।

তখন তিনি (আয়েশা) বললেন: এই ইবনে আমরের জন্য আশ্চর্য! তিনি নারীদের নির্দেশ দেন যেন তারা গোসলের সময় তাদের চুল খুলে ফেলে! তিনি কি তবে তাদের মাথা কামিয়ে ফেলার নির্দেশ দেবেন না?!

আমি এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একই পাত্র থেকে গোসল করতাম, আর আমি আমার মাথায় তিনবার পানি ঢালার বেশি করতাম না (অর্থাৎ চুল না খুলেই গোসল করতাম)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (189)


189 - ` لا إنما يكفيك إن تحثي على رأسك ثلاث حثيات ثم تفيضين عليك فتطهرين `.
رواه مسلم (رقم 178) وأصحاب السنن الأربعة وأبو علي الحسين ابن محمد
اللحياني في ` حديثه ` (ق 123 / 1) وابن أبي شيبة والبيهقي (1 / 181)
وأحمد (6 / 289 و




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন,) “না, এর বেশি নয়। বরং তোমার জন্য এটাই যথেষ্ট যে, তুমি তোমার মাথায় তিনবার পানি ঢেলে দেবে, অতঃপর তোমার সারা শরীরে পানি প্রবাহিত করবে। এর দ্বারাই তুমি পবিত্রতা অর্জন করবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (190)


190 - ` لا خير فيها، هي من أهل النار. يعني امرأة تؤذي جيرانها بلسانها `.
رواه البخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 119) وابن حبان (2054) والحاكم
(4 / 166) وأحمد (2 / 440) وأبو بكر محمد ابن أحمد المعدل في ` الأمالي `
(6 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

“তার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই; সে জাহান্নামবাসী হবে।” (অর্থাৎ এমন মহিলা যে তার প্রতিবেশীদেরকে নিজের জিহ্বা (কটূ কথা) দ্বারা কষ্ট দেয়।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (191)


191 - ` كان يصوم في السفر ويفطر، ويصلي ركعتين لا يدعهما، يقول: لا يزيد عليهما
. يعني الفريضة `.
أخرجه الطحاوي (1 / 333) وأحمد (1 / 402 و 407) من طريق حماد عن إبراهيم
عن علقمة عن ابن مسعود مرفوعا.
قلت: وهذا سند جيد، وهو على شرط مسلم وحماد هو ابن أبي سليمان الفقيه
وفيه كلام لا يضر، والحديث صحيح قطعا بشقيه، أما قصر الصلاة ففيه أحاديث
كثيرة مشهورة عن جماعة من الصحابة فلا نطيل الكلام بذكرها. وأما الصوم في
السفر، فقد بدرت من الصنعاني في ` سبل السلام ` كلمة نفى فيها أن يكون النبي
صلى الله عليه وسلم صام في السفر فرضا فقال (2 / 34) :
ثبت عنه صلى الله عليه وسلم أنه لم يتم رباعية في سفر، ولا صام فيه فرضا `!
ولهذا توجهت الهمة إلى ذكر بعض الأحاديث التي تدل على خطأ النفي المذكور،
فأقول:
ورد صومه صلى الله عليه وسلم في السفر عن جماعة من الصحابة منهم عبد الله
بن مسعود. وعبد الله بن عباس وأنس بن مالك، وأبو الدرداء.




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফরে সাওম (রোযা) পালন করতেন এবং (কখনও) সাওম ভঙ্গও করতেন। আর তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, যা তিনি কখনও ছাড়তেন না। তিনি বলতেন: তিনি এই দুই রাকাতের উপর বাড়াতেন না। এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো ফরয সালাত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (192)


192 - ` هي رخصة ـ يعني الفطر في السفر ـ من الله، فمن أخذ بها فحسن، ومن أحب أن
يصوم، فلا جناح عليه `.
رواه مسلم (3 / 145) والنسائي (1 / 317) والبيهقي (4 / 243) من طريق
أبي مراوح عن حمزة بن عمرو الأسلمي رضي الله عنه أنه قال:
` يا رسول الله! أجد بي قوة على الصيام في السفر، فهل علي جناح؟ فقال رسول
الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
قال مجد الدين بن تيمية في ` المنتقى `:
` وهو قوي الدلالة على فضيلة الفطر `.
قلت: ووجه الدلالة قوله في الصائم ` فلا جناح عليه `، أي: لا إثم عليه،
فإنه يشعر بمرجوحية الصيام كما هو ظاهر، لاسيما مع مقابلته بقوله في الفطر
` فحسن `، لكن هذا الظاهر غير مراد عندي، والله أعلم، وذلك لأن رفع الجناح
في نص ما عن أمر ما، لا يدل إلا على أنه يجوز فعله وأنه لا حرج على فاعله،
وأما هل هذا الفعل مما يثاب عليه فاعله أو لا، فشيء آخر لا يمكن أخذه من النص
ذاته بل من نصوص أخرى خارجة عنه، وهذا شيء معروف عند من تتبع الأمور التي ورد
رفع الجناح عن فاعلها وهي على قسمين:
أ - قسم منها يراد بها رفع الحرج فقط مع استواء الفعل والترك، وهذا هو
الغالب، ومن أمثلته قوله صلى الله عليه وسلم:
` خمس من الدواب ليس على المحرم في قتلهن جناح: الغراب، والحدأة، والفأرة
والعقرب، والكلب العقور `.




হামযা ইবনে আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

"হে আল্লাহর রাসূল! আমি সফরে রোযা রাখার শক্তি অনুভব করি। তাহলে আমার ওপর কি কোনো দোষ হবে?"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:

"এটা (অর্থাৎ সফরে রোযা ভঙ্গ করা) আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে একটি ছাড় (সুযোগ)। অতএব, যে ব্যক্তি এই ছাড় গ্রহণ করে, তবে তা উত্তম। আর যে ব্যক্তি রোযা রাখতে পছন্দ করে, তার ওপর কোনো দোষ নেই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (193)


193 - ` خمس من الدواب ليس على المحرم في قتلهن جناح: الغراب، والحدأة، والفأرة
والعقرب، والكلب العقور `.
أخرجه الشيخان ومالك وأصحاب السنن الأربعة إلا الترمذي والدارمي (2 / 36)
والبيهقي وأحمد (2 / 8، 32، 37، 48، 52، 54، 65، 82، 138)
من طرق
عن ابن عمر مرفوعا به.
ومن الواضح أن المراد من رفع الجناح في هذا الحديث هو تجويز القتل، ولا يفهم
منه أن القتل مستحب أو واجب أو تركه أولى.
ب - وقسم يراد به رفع الحرج عن الفعل، مع كونه في نفسه مشروعا له فضيلة، بل
قد يكون واجبا، وإنما يأتي النص برفع الحرج في هذا القسم دفعا لوهم أو زعم من
قد يظن الحرج في فعله، ومن أمثلة هذا ما روى الزهري عن عروة قال:
` سألت عائشة رضي الله عنها؟ فقلت لها: أرأيت قول الله تعالى (إن الصفا
والمروة من شعائر الله، فمن حج البيت أو اعتمر فلا جناح عليه أن يطوف بهما)
فوالله ما على أحد جناح أن لا يطوف بالصفا والمروة! قالت: بئس ما قلت يا ابن
أختي، إن هذه لو كانت كما أولتها عليه كانت ` لا جناح عليه أن لا يطوف بهما `
! ولكنها أنزلت في الأنصار، كانوا قبل أن يسلموا يهلون لمناة الطاغية التي
كانوا يعبدونها عند المشلل، فكان من أهل يتحرج أن يطوف بالصفا والمروة، فلما
أسلموا سألوا رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ذلك، قالوا: يا رسول الله إنا
كنا نتحرج أن نطوف بالصفا والمروة، فأنزل الله: (إن الصفا والمروة من
شعائر الله فمن حج البيت أو اعتمر فلا جناح عليه أن يطوف بهما) ، قالت عائشة
رضي الله عنها: وقد سن رسول الله صلى الله عليه وسلم الطواف بينهما، فليس
لأحد أن يترك الطواف بينهما `.
أخرجه البخاري (1 / 414) وأحمد (6 / 144، 227) .
إذا تبين هذا فقوله صلى الله عليه وسلم في الحديث ` ومن أحب أن يصوم فلا جناح
عليه `، لا يدل إلا على رفع الإثم عن الصائم، وليس فيه ما يدل على ترجيح
الإفطار على الصيام،
ولكن إذا كان من المعلوم أن صوم رمضان في السفر عبادة
بدليل صيامه صلى الله عليه وسلم فيه، فمن البدهي حينئذ أنه أمر مشروع حسن،
وإذا كان كذلك فإن وصف الإفطار في الحديث بأنه حسن، لا يدل على أنه أحسن من
الصيام، لأن الصيام أيضا حسن كما عرفت، وحينئذ فالحديث لا يدل على أفضلية
الفطر المدعاة، بل على أنه والصيام متماثلان.
ويؤكد ذلك حديث حمزة بن عمرو من رواية عائشة رضي الله عنها: أن حمزة بن عمرو
الأسلمي سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله إني رجل أسرد
الصوم، فأصوم في السفر؟ قال:
` صم إن شئت، وأفطر إن شئت `.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

পাঁচ প্রকারের প্রাণী রয়েছে, যাদেরকে হত্যা করলে ইহরামকারী ব্যক্তির কোনো পাপ হয় না: কাক, চিল, ইঁদুর, বিচ্ছু এবং হিংস্র কুকুর।

[টীকা:] এই হাদীসে ‘পাপ নেই’ (رفع الجناح) বলার উদ্দেশ্য স্পষ্টতই হলো—হত্যা করা বৈধ। এর দ্বারা এটা বোঝা যায় না যে হত্যা করা মুস্তাহাব বা ওয়াজিব, কিংবা হত্যা না করা উত্তম।

খ) [দ্বিতীয় প্রকারের] একটি অংশ হচ্ছে, যার দ্বারা কোনো কাজ করার উপর থেকে দ্বিধা বা সঙ্কোচ দূর করা হয়, যদিও কাজটি নিজ গুণে শরীয়তসম্মত ও উত্তম, এমনকি কখনো কখনো তা ওয়াজিবও হতে পারে। এই ধরনের ক্ষেত্রে দ্বিধা বা সঙ্কোচের ধারণা দূর করার জন্যই নসে (কুরআন-হাদীসের বক্তব্যে) পাপ না হওয়ার কথা আসে। এর একটি উদাহরণ হলো—যূহরী (রাহিমাহুল্লাহ) উরওয়া (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন:

আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, আমি কি আল্লাহ তাআলার এই বাণী সম্পর্কে আপনার মতামত জানতে পারি: "(নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা’বা গৃহের হজ বা ওমরাহ করে, তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ করাতে কোনো পাপ নেই।)" (সূরা বাকারা: ১৫৮)। [উরওয়া বললেন,] আল্লাহর কসম! আমার কাছে মনে হয়, যদি কেউ সাফা ও মারওয়া তাওয়াফ না করে, তবে তার কোনো পাপ হবে না! (কারণ আল্লাহ বলেছেন ’পাপ নেই’ তাওয়াফ করলে।)

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আমার ভাগ্নে! তুমি কতই না খারাপ কথা বললে! যদি এর অর্থ সেটাই হতো যা তুমি ব্যাখ্যা করলে, তবে অবশ্যই আয়াতে বলা হতো: "তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ ’না’ করাতে কোনো পাপ নেই!" বরং এই আয়াতটি আনসারদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল। তারা ইসলাম গ্রহণের আগে মুশাল্লালের নিকটবর্তী তাগূত ’মানাআত’-এর জন্য ইহরাম বাঁধত, যার তারা ইবাদত করত। যারা এর জন্য ইহরাম বাঁধত, তারা সাফা ও মারওয়া প্রদক্ষিণ করতে দ্বিধা বা সঙ্কোচবোধ করত। যখন তারা ইসলাম গ্রহণ করল, তখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করল। তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা তো সাফা ও মারওয়া তাওয়াফ করতে দ্বিধাবোধ করতাম। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "(নিশ্চয়ই সাফা ও মারওয়া আল্লাহর নিদর্শনসমূহের অন্তর্ভুক্ত। অতএব যে ব্যক্তি কা’বা গৃহের হজ বা ওমরাহ করে, তার জন্য এই দু’টির প্রদক্ষিণ করাতে কোনো পাপ নেই।)" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তো এই দু’টির মধ্যে প্রদক্ষিণ করাকে সুন্নাত হিসেবে প্রতিষ্ঠিত করে দিয়েছেন। সুতরাং, কারো জন্যই তাওয়াফ (সা’ঈ) ছেড়ে দেওয়া উচিত নয়।

যখন এটা স্পষ্ট হলো, তখন হাদীসে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই বাণী: “আর যে রোযা রাখতে পছন্দ করে, তার কোনো পাপ নেই”—এটা কেবল রোযাদার ব্যক্তির উপর থেকে গুনাহ তুলে নেওয়ার প্রমাণ দেয়। এর দ্বারা সিয়াম (রোযা) এর উপর ইফطارকে (রোযা ভাঙাকে) প্রাধান্য দেওয়া হয়—এমন কিছু প্রমাণিত হয় না। তবে যখন এটা জানা যে, সফর অবস্থায় রমযানের রোযা রাখা একটি ইবাদত (যেমনটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজেও সফরে রোযা রেখেছেন), তখন এটা স্পষ্ট যে রোযা রাখা একটি শরীয়তসম্মত ও উত্তম কাজ। যদি তাই হয়, তবে হাদীসে ইফطارকে ’উত্তম’ বলে আখ্যায়িত করা হলেও, এর দ্বারা সিয়াম থেকে তা অধিক উত্তম প্রমাণিত হয় না। কেননা, সিয়ামও উত্তম, যেমনটি আপনি জানতে পারলেন। অতএব, এই হাদীসটি দাবিকৃতভাবে ইফতারের শ্রেষ্ঠত্বের প্রমাণ দেয় না, বরং তা (রোযা রাখা এবং রোযা ভাঙা) উভয়ই সমতুল্য।

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এই বিষয়টি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক বর্ণিত হামযাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারাও সমর্থিত হয়। হামযাহ ইবনে আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞেস করলেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি এমন একজন লোক যে ধারাবাহিকভাবে রোযা রাখে, আমি কি সফরেও রোযা রাখব?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তুমি চাইলে রোযা রাখো, আর চাইলে রোযা ভেঙ্গে দাও।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (194)


194 - ` صم إن شئت، وأفطر إن شئت `.
أخرجه الشيخان وغيرهما من أصحاب الستة وابن أبي شيبة (2 / 150 / 1) وعنه
أبو حفص الكناني في ` الأمالي ` (17 / 1) .
قلت: فخيره صلى الله عليه وسلم بين الأمرين، ولم يفضل له أحدهما على الآخر،
والقصة واحدة، فدل على أن الحديث ليس فيه الأفضلية المذكورة.
ويقابل هذه الدعوى قول الشيخ علي القاري في ` المرقاة ` أن الحديث دليل على
أفضلية الصوم. ثم تكلف في توجيه ذلك.
والحق أن الحديث يفيد التخيير لا التفضيل، على ما ذكرناه من التفصيل.
نعم يمكن الاستدلال لتفضيل الإفطار على الصيام بالأحاديث التي تقول:
` إن الله يحب أن تؤتى رخصه كما يكره أن تؤتى معصيته. (وفي رواية) : كما
يحب أن تؤتى عزائمه `.
وهذا لا مناص من القول به، لكن يمكن أن يقيد ذلك بمن لا يتحرج بالقضاء،
وليس عليه حرج في الأداء، وإلا عادت الرخصة عليه بخلاف المقصود. فتأمل.
وأما حديث ` من أفطر (يعني في السفر) فرخصة، ومن صام فالصوم أفضل `.
فهو حديث شاذ لا يصح. والصواب أنه موقوف على أنس كما بينته في ` الأحاديث
الضعيفة ` (رقم 936) ، ولو صح لكان نصا في محل النزاع، لا يقبل الخلاف،
وهيهات، فلابد حينئذ من الاجتهاد والاستنباط، وهو يقتضى خلاف ما أطلقه
هذا الحديث الموقوف، وهو التفصيل الذي ذكرته. والله الموفق.




(এই আলোচনাটি একটি ফিকহী পর্যালোচনা যেখানে একটি হাদীস ও তৎসম্পর্কিত মতামতসমূহ বিশ্লেষণ করা হয়েছে। মূল হাদীসের পাঠটি হলো:)

**(হাদীসের মূল পাঠ: তুমি চাইলে রোযা রাখো, আর চাইলে রোযা ভেঙ্গে দাও।)**

এই হাদিসটি শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) সহ অন্যান্য সিহাহ সিত্তার সংকলকগণ এবং ইবনে আবি শাইবাহ (২/১৫০/১) বর্ণনা করেছেন। তাঁর (ইবনে আবি শাইবাহ) সূত্রে এটি আবু হাফস আল-কিনানী তাঁর ‘আল-আমালী’ (১৭/১) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।

আমি (পর্যালোচক) বলি: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এই দুটি বিষয়ের মধ্যে (রোযা রাখা ও না রাখার) এখতিয়ার দিয়েছেন, কিন্তু একটিকে অন্যটির উপর প্রাধান্য দেননি। যেহেতু ঘটনাটি একই, তাই এই হাদিসে উল্লেখিত কোনো শ্রেষ্ঠত্ব বা অগ্রাধিকার প্রমাণিত হয় না।

এই দাবির বিপরীতে রয়েছে শায়খ আলী আল-কারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-মিরকাত’ গ্রন্থে প্রদত্ত বক্তব্য যে, এই হাদিসটি সিয়ামের শ্রেষ্ঠত্বের প্রমাণ দেয়। এরপর তিনি এর সমর্থনে কঠিন ব্যাখ্যা প্রদান করেছেন।

তবে সত্য হলো, আমরা যে বিস্তারিত আলোচনা করেছি, সেই অনুযায়ী হাদিসটি প্রাধান্য নয়, বরং এখতিয়ার প্রদান করে।

হ্যাঁ, ওইসব হাদিস দ্বারা সিয়ামের উপর ইফতারকে (রোযা ভাঙাকে) অগ্রাধিকার দেওয়ার পক্ষে যুক্তি দেওয়া যেতে পারে, যেখানে বলা হয়েছে: "আল্লাহ তাআলা যেমন তাঁর নির্ধারিত গুনাহের কাজ করাকে অপছন্দ করেন, তেমনি তাঁর প্রদত্ত ছাড় (রুখসত) গ্রহণ করাকে ভালোবাসেন।" (অন্য বর্ণনায় এসেছে): "যেমন তিনি তাঁর দৃঢ় বিধান (আযাইম) পালন করাকে ভালোবাসেন।"

এ কথা অস্বীকার করার উপায় নেই, তবে এটিকে ওই ব্যক্তির সাথে সীমাবদ্ধ করা যেতে পারে, যার জন্য পরে কাযা আদায় করতে কোনো অসুবিধা হবে না এবং বর্তমানে রোযা রাখতেও কোনো কষ্ট হবে না। অন্যথায়, তার জন্য রুখসত (ছাড়) গ্রহণ উদ্দেশ্য থেকে ভিন্ন ফল নিয়ে আসবে। সুতরাং, (বিষয়টি) গভীরভাবে চিন্তা করো।

আর এই হাদিসটি: "যে ব্যক্তি ইফতার করলো (অর্থাৎ সফরে রোযা ভাঙলো) তা তার জন্য একটি ছাড় (রুখসত), আর যে রোযা রাখলো, সেই রোযা রাখাটিই উত্তম।" এটি একটি শায (বিরল) হাদিস, যা সহীহ নয়। সঠিক কথা হলো, এটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব বক্তব্য (মাওকুফ)। যেমনটি আমি ‘আহাদীস আদ-দাঈফাহ’ (দুর্বল হাদিসসমূহ, ক্রমিক ৯৩৬) গ্রন্থে বর্ণনা করেছি। যদি এটি সহীহ হতো, তাহলে এটি বিতর্কের স্থানে স্পষ্ট দলীল হতো এবং কোনো মতপার্থক্য গ্রহণযোগ্য হতো না। কিন্তু আফসোস! (যেহেতু তা নয়) তাই এই ক্ষেত্রে ইজতিহাদ ও ইসতিনবাত (গভীর গবেষণা ও সিদ্ধান্ত গ্রহণ) অপরিহার্য। আর এই মাওকুফ হাদিসটি সাধারণভাবে যা নির্দেশ করে, তার বিপরীতেই আমার পূর্বে উল্লিখিত বিস্তারিত ব্যাখ্যা প্রয়োজন। আল্লাহই তাওফীকদাতা।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (195)


195 - ` إن الله يبغض كل جعظرى جواظ، سخاب في الأسواق، جيفة بالليل، حمار بالنهار
عالم بأمر الدنيا، جاهل بأمر الآخرة `.
رواه بن حبان في ` صحيحه ` (




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা এমন প্রতিটি ব্যক্তিকে ঘৃণা করেন (বা অপছন্দ করেন) যে অহংকারী ও দাম্ভিক, যে বাজারে উচ্চস্বরে চেঁচামেচি করে বেড়ায়, যে রাতে মৃত লাশের মতো (বেহুঁশ হয়ে ঘুমিয়ে থাকে) এবং দিনে গাধার মতো (কেবল পার্থিব শ্রমে) ব্যস্ত থাকে; যে দুনিয়ার বিষয়ে খুবই বিজ্ঞ, কিন্তু আখিরাতের বিষয়ে সম্পূর্ণ অজ্ঞ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (196)


196 - ` كان يقول في دبر كل صلاة مكتوبة ` حين يسلم `: لا إله إلا الله وحده لا شريك
له، له الملك وله الحمد ` يحيي ويميت، وهو حي لا يموت بيده الخير `، وهو
على كل
شيء قدير ` ثلاث مرات `، اللهم لا مانع لما أعطيت، ولا معطي لما منعت
ولا ينفع ذا الجد منك الجد `.
رواه البخاري (2 /




মুগীরাহ ইবনু শু‘বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) প্রত্যেক ফরয সালাতের শেষে সালাম ফিরানোর সময় বলতেন:

"আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। তিনি এক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং সকল প্রশংসা তাঁরই প্রাপ্য। তিনি জীবন দান করেন ও মৃত্যু দেন। আর তিনি চিরঞ্জীব, তাঁর মৃত্যু নেই। তাঁর হাতেই সকল কল্যাণ। আর তিনি সকল কিছুর উপর ক্ষমতাবান।" (এটি তিনি তিনবার বলতেন)।

"হে আল্লাহ্, আপনি যা দান করেন, তা রোধ করার ক্ষমতা কারো নেই। আর আপনি যা রোধ করেন, তা দেওয়ার ক্ষমতা কারো নেই। আর আপনার সামনে ধন-সম্পদশালীর ধন-সম্পদ কোনো কাজে আসবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (197)


197 - ` إذا رأيتني على مثل هذه الحالة فلا تسلم علي، فإنك إذا فعلت ذلك لم أرد
عليك `.
رواه بن ماجه (1 / 145 / 146) وابن أبي حاتم في ` العلل ` (1 / 34) عن
عيسى بن يونس عن هاشم بن البريد عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر بن عبد
الله ` أن رجلا مر على النبي صلى الله عليه وسلم وهو يبول فسلم عليه، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` الحديث.
وقال ابن أبي حاتم عن أبيه:
` لا أعلم روى هذا الحديث أحد غير هاشم بن البريد `.
قلت: وهو ثقة، ولا يضره أنه رمي بالتشيع، ولهذا قال البوصيري في
` الزوائد ` (ق 27 / 2) :
` هذا إسناد حسن `.
قلت: وظاهر الحديث أنه صلى الله عليه وسلم قال ذلك وهو يبول، ففيه دليل على
جواز الكلام على الخلاء، والحديث الوارد في أن الله يمقت على ذلك مع أنه لا
يصح من قبل إسناده، فهو غير صريح فيه فإنه بلفظ:
` لا يتناجى اثنان على غائطهما، ينظر كل منهما إلى عورة صاحبه، فإن الله يمقت
على ذلك `.
فهذا النص إنما يدل على تحريم هذه الحالة وهي التحدث مع النظر إلى العورة،
وليس فيه أن التحدث وحده - وإن كان في نفسه مستهجنا - مما يمقته الله تبارك
وتعالى، بل هذا لابد له من دليل يقتضي تحريمه وهو شيء لم نجده، بخلاف
تحريم النظر إلى العورة، فإن تحريمه ثابت في غير ما حديث.
ثم رأيت للحديث شاهدا من حديث ابن عمر بهذا اللفظ نحوه.
أخرجه ابن الجارود في ` المنتقى ` (




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় তাঁকে সালাম দেয়, যখন তিনি পেশাব করছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:

"যখন তুমি আমাকে এই ধরনের অবস্থায় দেখবে, তখন আমাকে সালাম দেবে না। কারণ, যদি তুমি তা করো, তাহলে আমি তোমার সালামের উত্তর দেব না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (198)


198 - ` من نسي أن يذكر الله في أول طعامه فليقل حين يذكر: بسم الله في أوله وآخره
فإنه يستقبل طعاما جديدا، ويمنع الخبيث ما كان يصيب منه `.
رواه ابن حبان في ` صحيحه ` (




হাদিসে বর্ণিত আছে যে, যে ব্যক্তি তার খাবারের শুরুতে আল্লাহ্‌র নাম (বিসমিল্লাহ) নিতে ভুলে যায়, সে যখন স্মরণ করে, তখন যেন বলে: **’বিসমিল্লাহি ফি আওওয়ালিহি ওয়া আখিরিহি’** (আল্লাহ্‌র নামে, এর শুরুতে এবং এর শেষে)। কারণ এর দ্বারা সে নতুনভাবে খাবার শুরু করে এবং এর ফলে শয়তান যা কিছু অংশ লাভ করছিল, তা থেকে তাকে বিরত রাখা হয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (199)


199 - ` ما أصاب أحدا قط هم ولا حزن، فقال: اللهم إني عبدك وابن عبدك وابن أمتك
ناصيتي بيدك ماض في حكمك عدل في قضاؤك، أسألك بكل اسم هو لك سميت به نفسك،
أو علمته أحدا من خلقك، أو أنزلته في كتابك، أو استأثرت به في علم الغيب عندك
أن تجعل القرآن ربيع قلبي ونور صدري وجلاء حزني وذهاب همي. إلا أذهب الله
همه وحزنه وأبدله مكانه فرجا. قال: فقيل: يا رسول الله ألا نتعلمها؟ فقال
بلى ينبغي لمن سمعها أن يتعلمها `.
رواه أحمد (3712) والحارث بن أبي أسامة في مسنده (ص 251 من زوائده)
وأبو يعلى (ق 156 / 1) والطبراني في ` الكبير ` (3 / 74 / 1) وابن حبان
في ` صحيحه ` (2372) والحاكم (1 / 509) من طريق فضيل بن مرزوق حدثنا
أبو سلمة الجهني عن القاسم بن عبد الرحمن عن أبيه عن عبد الله قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وقال الحاكم:
` حديث صحيح على شرط مسلم، إن سلم من إرسال عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه،
فإنه مختلف في سماعه من أبيه `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` قلت: وأبو سلمة لا يدري من هو ولا رواية له في الكتب الستة `.
قلت: وأبو سلمة الجهني ترجمه الحافظ في ` التعجيل ` وقال:
` مجهول. قاله الحسيني. وقال مرة: لا يدري من هو. وهو كلام الذهبي في
` الميزان `، وقد ذكره ابن حبان في ` الثقات `، وأخرج حديثه في ` صحيحه `،
وقرأت بخط الحافظ بن عبد الهادي: يحتمل أن يكون خالد بن سلمة.
قلت: وهو بعيد لأن خالدا مخزومي وهذا جهني `.
قلت: وما استبعده الحافظ هو الصواب، لما سيأتي، ووافقه على ذلك الشيخ أحمد
شاكر رحمه الله تعالى في تعليقه على المسند (5 / 267) وأضاف إلى ذلك قوله:
` وأقرب منه عندي أن يكون هو ` موسى بن عبد الله أو ابن عبد الجهني ويكنى أبا
سلمة، فإنه من هذه الطبقة `.
قلت: وما استقر به الشيخ هو الذي أجزم به بدليل ما ذكره، مع ضميمة شيء آخر
وهو أن موسى الجهني قد روى حديثا آخر عن القاسم بن عبد الرحمن به، وهو
الحديث الذي قبله فإذا ضمت إحدى الروايتين إلى الأخرى ينتج أن الراوي عن القاسم
هو موسى أبو سلمة الجهني، وليس في الرواة من اسمه موسى الجهني إلا موسى بن
عبد الله الجهني وهو الذي يكنى بأبي سلمة وهو ثقة من رجال مسلم، وكأن
الحاكم رحمه الله أشار إلى هذه الحقيقة حين قال في الحديث ` صحيح على شرط مسلم
... ` فإن معنى ذلك أن رجاله رجال مسلم ومنهم أبو سلمة الجهني ولا يمكن أن
يكون كذلك إلا إذا كان هو موسى بن عبد الله الجهني. فاغتنم هذا التحقيق فإنك
لا تراه في غير هذا الموضع. والحمد لله على توفيقه.
بقي الكلام على الانقطاع الذي أشار إليه الحاكم، وأقره الذهبي عليه، وهو
قوله:
` إن سلم من إرسال عبد الرحمن بن عبد الله عن أبيه ... `.
قلت: هو سالم منه، فقد ثبت سماعه منه بشهادة جماعة من الأئمة، منهم سفيان
الثوري وشريك القاضي وابن معين والبخاري وأبو حاتم، وروى البخاري في
` التاريخ الصغير ` بإسناد لا بأس به عن القاسم بن عبد الرحمن بن عبد الله
بن مسعود عن أبيه قال:
` لما حضر عبد الله الوفاة، قال له ابنه عبد الرحمن: يا أبت أوصني، قال:
ابك من خطيئتك `.
فلا عبرة بعد ذلك بقول من نفى سماعه منه، لأنه لا حجة لديه على ذلك إلا عدم
العلم بالسماع، ومن علم حجة على من يعلم.
والحديث قال الهيثمي في ` المجمع ` (10 / 136) :
` رواه أحمد وأبو يعلى والبزار والطبراني ورجال أحمد رجال الصحيح غير
أبي سلمة الجهني وقد وثقه ابن حبان `!
قلت: وقد عرفت مما سبق من التحقيق أنه ثقة من رجال مسلم وأن اسمه موسى
بن عبد الله. ولم ينفرد بهذا الحديث بل تابعه عبد الرحمن بن إسحاق عن القاسم
بن عبد الله بن مسعود به، لم يذكر عن أبيه.
أخرجه محمد بن الفضل بن غزوان الضبي في ` كتاب الدعاء ` (ق 2 /




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

যখনই কোনো বান্দাকে কোনো দুশ্চিন্তা বা মনোকষ্ট স্পর্শ করে, আর সে বলে:

**"আল্লাহুম্মা ইন্নি আবদুক, ওয়াবনু আবদিক, ওয়াবনু আমাতিক। নাসিয়াতী বিয়াদিক, মা-দ্বিন ফিয়্যা হুকমুক, আ’দলুন ফী কাযা-উক। আসআলুকা বিকুল্লি ইসমিন হুয়া লাকা সাম্মাইতা বিহী নাফসাক, আও আল্লামতাহু আহাদান মিন খালকিক, আও আন্যালতাহু ফী কিতাবিক, আও ইসতা’ছারতা বিহী ফী ইলমিল গাইবি ইন্দাক; আন তাজ‘আলাল কুরআনা রাবী‘আ ক্বালবী, ওয়া নূরা সাদরী, ওয়া জালা-আ হুযনী, ওয়া যাহাবা হাম্মী।"**

(অর্থ: "হে আল্লাহ! আমি আপনার বান্দা, আপনার বানস্যের সন্তান এবং আপনার দাসীর সন্তান। আমার ভাগ্য আপনার হাতে। আমার উপর আপনার বিধান কার্যকর, আপনার বিচার ন্যায়সঙ্গত। আমি আপনার কাছে আপনার সেই সকল নামের মাধ্যমে প্রার্থনা করি, যা দ্বারা আপনি নিজেকে নামকরণ করেছেন, অথবা আপনার সৃষ্টির কাউকে তা শিখিয়েছেন, অথবা আপনার কিতাবে তা নাযিল করেছেন, অথবা আপনার নিকট গায়বের জ্ঞানে গোপন করে রেখেছেন—যেন আপনি কুরআনকে আমার হৃদয়ের বসন্ত, আমার বক্ষের জ্যোতি, আমার দুঃখ দূরকারী এবং আমার দুশ্চিন্তা বিদূরণকারী বানিয়ে দেন।")

তবে আল্লাহ অবশ্যই তার দুশ্চিন্তা ও মনোকষ্ট দূর করে দেন এবং তার স্থলে প্রশান্তি দান করেন।

রাবী বলেন, অতঃপর (সাহাবীরা) জিজ্ঞেস করলেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা কি এই (দোয়াটি) শিখবো না?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ, যে-ই এটি শুনবে, তার উচিত এটি শিখে নেওয়া।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (200)


200 - ` نهى عن الصلاة بعد العصر إلا والشمس مرتفعة `.
رواه أبو داود (1 / 200) والنسائي (1 / 97) وعنه ابن حزم في ` المحلى `
(3 / 31) وأبو يعلى في ` مسنده ` (1 / 119) وابن حبان في ` صحيحه `
(621،
622) وابن الجارود في ` المنتقى ` (281) والبيهقي (2 / 458)
والطيالسي (1 /




মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আসরের পর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন, তবে যখন সূর্য উঁচু (ও উজ্জ্বল) অবস্থায় থাকে (তখন ব্যতিক্রম)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (201)


201 - ` من حدثكم أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يبول قائما فلا تصدقوه، ما كان
يبول إلا قاعدا `.
أخرجه النسائي (1 / 11) والترمذي (1 / 17) وابن ماجه (1 / 130)
والطيالسي (1 / 45 من ترتيبه) كلهم عن شريك بن المقدام عن شريح عن أبيه عن
عائشة قالت ... فذكره.
وقال الترمذي:
` حديث عائشة أحسن شيء في الباب وأصح `.
قلت ... وهذا ليس معناه تحسين الحديث بله تصحيحه كما هو معروف في علم المصطلح
وكأن ذلك لضعف شريك القاضي، ولكنه لم ينفرد به. بل تابعه سفيان الثوري عن
المقدام بن شريح به.
أخرجه أبو عوانة في ` صحيحه ` (1 / 198) والحاكم (1 / 181) والبيهقي
(1 / 101) وأحمد (1 / 136، 192، 213) من طرق عن سفيان به.
وقال الحاكم:
` صحيح على شرط الشيخين `، ووافقه الذهبي، وفيه نظر، فإن المقدام ابن شريح
وأبوه لم يحتج بهما البخاري فهو على شرط مسلم وحده.
وقال الذهبي في ` المهذب ` (1 / 22 / 2) : ` سنده صحيح `.
فتبين مما سبق أن الحديث صحيح بهذه المتابعة، وقد خفيت على الترمذي
فلم يصحح
الحديث، وليس ذلك غريبا، ولكن الغريب أن يخفى ذلك على غير واحد من الحفاظ
المتأخرين، أمثال العراقي والسيوطي وغيرهما، فأعلا الحديث بشريك، وردا
على الحاكم تصحيحه إياه متوهمين أنه عنده من طريقه، وليس كذلك كما عرفت،
وكنت اغتررت بكلامهم هذا لما وضعت التعليق على ` مشكاة المصابيح `، وكان
تعليقا سريعا اقتضته ظروف خاصة، لم تساعدنا على استقصاء طرق الحديث كما هي
عادتنا، فقلت في التعليق على هذا الحديث من ` المشكاة ` (365) .
` وإسناده ضعيف فيه شريك، وهو ابن عبد الله القاضي وهو سيء الحفظ `.
والآن أجزم بصحة الحديث للمتابعة المذكورة. ونسأل الله تعالى أن لا يؤاخذنا
بتقصيرنا.
قلت آنفا: اغتررنا بكلام العراقي والسيوطي، وذلك أن الأخير قال في ` حاشيته
على النسائي ` (1 / 12) .
` قال الشيخ ولي الدين (هو العراقي) : هذا الحديث فيه لين، لأن فيه شريكا
القاضي وهو متكلم فيه بسوء الحفظ، وما قال الترمذي: إنه أصح شيء في هذا
الباب لا يدل على صحته، ولذلك قال ابن القطان: إنه لا يقال فيه: صحيح،
وتساهل الحاكم في التصحيح معروف، وكيف يكون على شرط الشيخين مع أن البخاري
لم يخرج لشريك بالكلية، ومسلم خرج له استشهادا، لا احتجاجا `.
نقله السيوطي وأقره! ثم تتابع العلماء على تقليدهما كالسندي في حاشيته على
النسائي، ثم الشيخ عبد الله الرحماني المباركفوري في ` مرقاة المفاتيح شرح
مشكاة المصابيح ` (1 / 253) ، وغيرهم، ولم أجد حتى الآن من نبه على أوهام
هؤلاء العلماء، ولا على هذه المتابعة، إلا أن الحافظ رحمه الله كأنه أشار
إليها في ` الفتح ` (1 / 382) حين ذكر الحديث:
وقال:
` رواه أبو عوانة في ` صحيحه ` و ` الحاكم `.
فاقتصر في العزو عليهما لأنه ليس في طريقهما شريك، بخلاف أصحاب ` السنن `
ولذلك لم يعزه إليهم، والحمد لله الذي هدانا لهذا وما كنا لنهتدي لولا أن
هدانا الله.
واعلم أن قول عائشة إنما هو باعتبار علمها، وإلا فقد ثبت في ` الصحيحين `
وغيرهما من حديث حذيفة رضي الله عنه قال:
` أتى النبي صلى الله عليه وسلم سباطة قوم فبال قائما `.
ولذلك فالصواب جواز البول قاعدا وقائما، والمهم أمن الرشاش، فبأيهما حصل
وجب.
وأما النهي عن البول قائما فلم يصح فيه حديث، مثل حديث ` لا تبل قائما ` وقد
تكلمت عليه في ` الأحاديث الضعيفة ` رقم (938) .




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যে ব্যক্তি তোমাদেরকে বলবে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দাঁড়িয়ে পেশাব করতেন, তোমরা তাকে বিশ্বাস করো না। তিনি কেবল বসেই পেশাব করতেন।

হাদীসটি নাসাঈ (১/১১), তিরমিযী (১/১৭) এবং ইবনু মাজাহ (১/১৩০) সহ আত-ত্বায়ালিসী (১/৪৫, তার তারতীব অনুযায়ী)-ও সকলে শারিক ইবনুল মিকদাম, তিনি শুরাইহ, তিনি তার পিতা, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম তিরমিযী বলেন: ‘এই অধ্যায়ের মধ্যে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটিই সর্বোত্তম ও সর্বাধিক সহীহ।’

আমি (আলবানী) বলি: ...এই উক্তিটির অর্থ হাদীসটিকে সহীহ সাব্যস্ত করা নয়, বরং তা হাসানে পরিণত করা, যেমনটি মুস্তালাহুল হাদীসের (হাদীসশাস্ত্রের পরিভাষার) জ্ঞানে পরিচিত। সম্ভবত এর কারণ হলো বিচারক শারিক দুর্বল ছিলেন, কিন্তু তিনি এটি এককভাবে বর্ণনা করেননি। বরং সুফিয়ান আস-সাওরী মিকদাম ইবনু শুরাইহ-এর সূত্রে তার সমর্থন করেছেন।

হাদীসটি আবূ আ‘ওয়ানা তার ‘সহীহ’ গ্রন্থে (১/১৯৮), হাকিম (১/১৮১), বাইহাকী (১/১০১) এবং আহমাদ (১/১৩৬, ১৯২, ২১৩) বিভিন্ন সূত্রে সুফিয়ানের মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম হাকিম বলেন: ‘হাদীসটি শাইখাইনের (বুখারী ও মুসলিমের) শর্তানুসারে সহীহ।’ ইমাম যাহাবীও তার সাথে একমত পোষণ করেছেন। তবে এই মতামতের ব্যাপারে কিছুটা সংশয় রয়েছে। কারণ মিকদাম ইবনু শুরাইহ এবং তার পিতা উভয়ের বর্ণিত হাদীস দ্বারা ইমাম বুখারী দলীল গ্রহণ করেননি। অতএব, এটি কেবল ইমাম মুসলিমের শর্তানুসারে সহীহ।

ইমাম যাহাবী ‘আল-মুহাযযাব’ গ্রন্থে (১/২২/২) বলেছেন: ‘এর সনদ সহীহ।’

সুতরাং পূর্বের আলোচনা থেকে প্রতীয়মান হয় যে, এই متابعة বা সমর্থনমূলক বর্ণনার কারণে হাদীসটি সহীহ। এই متابعة-এর বিষয়টি ইমাম তিরমিযীর অজানা ছিল, যে কারণে তিনি হাদীসটিকে সহীহ বলেননি। এটি অস্বাভাবিক নয়। তবে বিস্ময়কর হলো, এই বিষয়টি ইরাকী, সুয়ূতী প্রমুখ বহু পরবর্তী হাফিযদের কাছেও গোপন ছিল। তারা শারিক-এর কারণে হাদীসটিকে দুর্বল সাব্যস্ত করেছেন এবং তারা ইমাম হাকিমের تصحيح বা সহীহ বলার বিষয়টি প্রত্যাখ্যান করেছেন এই ধারণায় যে, হাকিমের নিকটও এটি শারিকের সূত্রেই রয়েছে। অথচ বাস্তবে তা নয়, যেমন আপনি জানতে পারলেন।

আমি নিজেও একসময় তাদের (ইরাকী ও সুয়ূতীর) কথায় বিভ্রান্ত হয়েছিলাম, যখন আমি ‘মিশকাতুল মাসাবীহ’-এর টীকা লিখছিলাম। সেই টীকাটি বিশেষ পরিস্থিতিতে দ্রুত লেখা হয়েছিল, ফলে আমাদের স্বভাবগত রীতি অনুযায়ী হাদীসের সূত্রগুলো সম্পূর্ণরূপে যাচাই করার সুযোগ হয়নি। তাই আমি ‘মিশকাত’-এর টীকা প্রসঙ্গে এই হাদীসটি সম্পর্কে (৩৬৫ নং) বলেছিলাম:

‘এর সনদ দুর্বল, এতে শারিক (ইবনু আব্দুল্লাহ আল-কাযী) আছেন, যিনি দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী।’

আর এখন আমি উল্লেখিত متابعة (সমর্থনমূলক বর্ণনা) এর কারণে হাদীসটির বিশুদ্ধতার ব্যাপারে নিশ্চিত। আল্লাহ্‌ তা‘আলার নিকট আমাদের ত্রুটির জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করি।

আমি আগেই বলেছিলাম: আমরা ইরাকী ও সুয়ূতীর কথায় বিভ্রান্ত হয়েছিলাম। কারণ শেষোক্ত জন (সুয়ূতী) তার ‘নাসাঈ’-এর টীকায় (১/১২) বলেন:

‘শাইখ ওয়ালী উদ্দীন (তিনি ইরাকী) বলেছেন: এই হাদীসটিতে কিছুটা দুর্বলতা আছে, কারণ এতে বিচারক শারিক আছেন, যার দুর্বল স্মৃতিশক্তির কারণে তার ব্যাপারে আলোচনা রয়েছে। আর ইমাম তিরমিযী যে বলেছেন, ‘এই অধ্যায়ের মধ্যে এটিই সর্বাধিক সহীহ’—এটি তার বিশুদ্ধতা প্রমাণ করে না। এই কারণেই ইবনুল কাত্তান বলেছেন: একে সহীহ বলা যাবে না। আর ইমাম হাকিমের تساهل বা সহজতা সর্বজনবিদিত। বুখারী তো শারিক থেকে একেবারেই কোনো হাদীস বর্ণনা করেননি, আর মুসলিম তার হাদীসগুলো শুধু সমর্থনমূলক সাক্ষ্য হিসেবে বর্ণনা করেছেন, দলীল হিসেবে নয়—তাহলে এটি শাইখাইনের শর্তে সহীহ হয় কীভাবে?’

সুয়ূতী এই বক্তব্য উদ্ধৃত করেছেন এবং তা সমর্থন করেছেন! এরপর অন্যান্য উলামা তাদের (ইরাকী ও সুয়ূতীর) অন্ধ অনুকরণ করতে থাকেন, যেমন সানদী তার ‘নাসাঈ’-এর টীকায় এবং শাইখ আব্দুল্লাহ আর-রাহমানী আল-মুবারকফুরী তার ‘মিরকাতুল মাফাতীহ শারহু মিশকাতিল মাসাবীহ’ (১/২৫৩) গ্রন্থে। আমি এখন পর্যন্ত এমন কাউকে পাইনি যিনি এই উলামাদের ভুলগুলো ধরিয়ে দিয়েছেন বা এই متابعة-এর প্রতি দৃষ্টি আকর্ষণ করেছেন। তবে হাফিয ইবনু হাজার (রহ.) সম্ভবত ‘ফাতহুল বারী’তে (১/৩৮২) হাদীসটি উল্লেখ করার সময় সেদিকে ইঙ্গিত করেছেন:

তিনি বলেন: ‘এটি আবূ আ‘ওয়ানা তার ‘সহীহ’ গ্রন্থে এবং হাকিম বর্ণনা করেছেন।’

তিনি শুধু এই দু’জনের দিকেই হাদীসটির সূত্র উল্লেখ সীমাবদ্ধ রাখেন, কারণ তাদের সূত্রে শারিক নেই, যা সুনান গ্রন্থকারদের সূত্রে রয়েছে। এ কারণেই তিনি সুনান গ্রন্থকারদের দিকে হাদীসটি সম্পৃক্ত করেননি। আল্লাহ তা‘আলারই প্রশংসা, যিনি আমাদের এই পথ দেখিয়েছেন। যদি আল্লাহ আমাদের পথ না দেখাতেন, তবে আমরা হেদায়েত পেতাম না।

আপনি জেনে রাখুন, আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই উক্তিটি তার জ্ঞানের ভিত্তিতে ছিল। অন্যথায়, হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারা সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম)-সহ অন্যান্য গ্রন্থে প্রমাণিত হয়েছে যে:

‘নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এক কওমের আবর্জনার স্তূপের কাছে গিয়ে দাঁড়িয়ে পেশাব করেছিলেন।’

অতএব, সঠিক মত হলো—বসে এবং দাঁড়িয়ে উভয় অবস্থাতেই পেশাব করা জায়েয, তবে মূল বিষয়টি হলো পেশাবের ছিটা থেকে নিরাপদ থাকা। যেভাবেই তা নিশ্চিত করা যায়, সেভাবেই পেশাব করা ওয়াজিব। আর দাঁড়িয়ে পেশাব করতে নিষেধ করা সংক্রান্ত কোনো হাদীস সহীহ নয়, যেমন ‘তোমরা দাঁড়িয়ে পেশাব করো না’–এই হাদীসটি। এই হাদীসটি সম্পর্কে আমি ‘আহাদীসুদ দাঈফা’ গ্রন্থে (৯৩৮ নং) আলোচনা করেছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (202)


202 - ` إن الشمس لم تحبس على بشر إلا ليوشع ليالي سار إلى بيت المقدس ` وفي رواية `
غزا نبي من الأنبياء، فقال لقومه: لا يتبعني رجل قد ملك بضع امرأة، وهو
يريد أن يبني بها، ولما يبن ` بها `، ولا آخر قد بنى بنيانا، ولما يرفع
سقفها، ولا آخر قد اشترى غنما أو خلفات، وهو منتظر ولادها، قال: فغزا،
فأدنى للقرية حين صلاة العصر، أو قريبا من ذلك، ` وفي رواية: فلقي العدو
عند غيبوبة الشمس `، فقال للشمس: أنت مأمورة، وأنا مأمور، اللهم احبسها
علي شيئا، فحبست عليه، حتى فتح الله عليه، ` فغنموا الغنائم `، قال:
فجمعوا ما غنموا، فأقبلت النار لتأكله، فأبت أن تطعمه ` وكانوا إذا غنموا
الغنمية بعث الله تعالى عليها النار فأكلتها ` فقال: فيكم غلول، فليبايعني من
كل قبيلة رجل، فبايعوه، فلصقت يد رجل بيده، فقال: فيكم الغلول، فلتبايعني
قبيلتك، فبايعته، قال: فلصقت بيد رجلين أو ثلاثة ` يده `، فقال: فيكم
الغلول، أنتم غللتم، ` قال: أجل قد غللنا صورة وجه بقرة من ذهب `، قال:
فأخرجوه له مثل رأس بقرة من ذهب، قال: فوضعوه في المال، وهو بالصعيد،
فأقبلت النار فأكلته، فلم تحل الغنائم لأحد من قبلنا، ذلك بأن الله تبارك
وتعالى رأى ضعفنا وعجزنا فطيبها لنا، ` وفي رواية ` فقال رسول الله صلى
الله عليه وسلم عند ذلك: إن الله أطعمنا الغنائم رحمة بنا وتخفيفا، لما علم
من ضعفنا `.
هذا حديث صحيح جليل، مما حفظه لنا أبو هريرة رضي الله عنه وله عنه أربع طرق:
الأولى: قال الإمام أحمد (2 / 325) . حدثنا أسود بن عامر، حدثنا أبو بكر عن
هشام عن ابن سيرين عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم
.... فذكر الرواية الأولى.
وهكذا أخرجه الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (2 / 10) من طريقين آخرين عن الأسود
بن عامر به.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات من رجال الشيخين عدا أبا بكر وهو
ابن عياش، فإنه من رجال البخاري وحده، وفيه كلام، لا ينزل به حديثه عن
رتبة الحسن، وأحسن ما قرأت فيه قول ابن حبان في ترجمته من ` الثقات `
(2 / 324) :
` كان أبو بكر من الحفاظ المتقنين، وكان يحيى القطان، وابن المديني يسيئان
الرأي فيه، وذلك أنه لما كبر سنه، ساء حفظه، فكان يهم إذا روى، والخطأ
والوهم شيئان لا ينفك عنهما البشر، فلو كثر الخطأ حتى كان غالبا على صوابه
لاستحق مجانبة رواياته، فأما عند الوهم يهم، أو الخطأ يخطىء، لا يستحق ترك
حديثه بعد تقدم عدالته وصحة سماعه `. ثم قال:
` والصواب في أمره مجانبة ما علم أنه أخطأ فيه، والاحتجاج بما يرويه، سواء
وافق الثقات ` أولا `، لأنه داخل في جملة أهل العدالة، ومن صحت عدالته لم
يستحق القدح ولا الجرح، إلا بعد زوال العدالة عنه بأحد أسباب الجرح.
وهذا حكم كل محدث ثقة صحت عدالته، وتيقن خطؤه `.
قلت: ولهذا صرح الحافظ ابن حجر في ` الفتح ` بصحة هذا السند، ثم قال
(6 / 154) :
` فإن رجال إسناده محتج بهم في الصحيح `.
وسبقه إلى نحوه الحافظ ابن كثير كما سيأتي، وكذا الذهبي كما في ` تنزيه
الشريعة ` (1 / 379) .
الطريق الثانية: قال الإمام أحمد أيضا (2 / 318) :
` حدثنا عبد الرزاق بن همام حدثنا معمر عن همام عن أبي هريرة قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.... فذكر أحاديث كثيرة فوق المائة بهذا
الإسناد، هذا الحديث أحدها، وهي جميعها في ` صحيفة همام بن منبه ` التي
رواها أبو الحسن أحمد ابن يوسف السلمي عن عبد الرزاق به، وهذا الحديث فيها
برقم (123) .
وقد أخرجه مسلم في ` صحيحه ` (5 / 145) من طريق محمد بن رافع:
حدثنا عبد الرزاق به بالرواية الثانية، واللفظ لمسلم.
ثم أخرجه هو والبخاري في ` صحيحه ` (6 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"নিশ্চয় সূর্যালোক ইউশা’ (আঃ) ব্যতীত অন্য কোনো মানুষের জন্য আটকে রাখা হয়নি, যখন তিনি বায়তুল মুকাদ্দাসের দিকে যাত্রা করেছিলেন।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, একজন নবী জিহাদের জন্য বের হলেন। তিনি তাঁর কওমকে বললেন: "আমার সাথে এমন কেউ যেন না যায়, যে কোনো নারীকে বিবাহ করেছে, অথচ সে এখনও তার সাথে মিলিত হওয়ার ইচ্ছা রাখে কিন্তু এখনও মিলিত হয়নি। আর এমন কেউ যেন না যায় যে ঘর তৈরি করেছে কিন্তু এখনও ছাদ তোলেনি। আর এমন কেউ যেন না যায় যে বকরী বা গর্ভবতী উট কিনেছে এবং সেগুলোর বাচ্চা প্রসবের অপেক্ষায় আছে।"

বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি জিহাদে গেলেন। যখন তিনি গ্রামটির কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন ছিল আসরের সালাতের সময় বা তার কাছাকাছি। অন্য বর্ণনায় আছে: তিনি সূর্যাস্তের সময় শত্রুর মুখোমুখি হলেন।

তিনি সূর্যের দিকে তাকিয়ে বললেন: "তুমিও আদিষ্ট, আমিও আদিষ্ট। হে আল্লাহ, আমার জন্য এটিকে (সূর্যকে) কিছুটা সময় আটকে দাও।" অতঃপর সূর্য তার জন্য আটকে রাখা হলো, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁকে বিজয় দান করলেন।

তারা গনিমত (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) লাভ করলেন। তিনি গনিমতগুলো একত্র করলেন। আগুন এসে সেগুলোকে গ্রাস করার জন্য এগিয়ে এলো, কিন্তু তা গ্রহণ করতে অস্বীকৃতি জানালো। (পূর্বে নিয়ম ছিল, যখন তারা গনিমত লাভ করত, আল্লাহ তা‘আলা তার উপর আগুন প্রেরণ করতেন, যা তা খেয়ে ফেলত।)

তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে খেয়ানত (গনিমতের সম্পদ চুরি) করা হয়েছে। প্রতিটি গোত্র থেকে একজন লোক এসে আমার হাতে বাইয়াত গ্রহণ করুক।" তারা তাঁর হাতে বাইয়াত গ্রহণ করলো। তখন এক ব্যক্তির হাত তাঁর হাতের সাথে আটকে গেল। তিনি বললেন: "খেয়ানত তোমাদের গোত্রের মধ্যে আছে। এবার তোমার গোত্র এসে আমার হাতে বাইয়াত গ্রহণ করুক।" তাঁর গোত্রের লোকেরা বাইয়াত গ্রহণ করলো। অতঃপর দুই বা তিনজন লোকের হাত তাঁর হাতের সাথে আটকে গেল। তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে খেয়ানতকারী আছে, তোমরাই খেয়ানত করেছ।"

তারা স্বীকার করল: "হাঁ, আমরা স্বর্ণের গরুর মাথার আকৃতির একটি বস্তুতে খেয়ানত করেছি।" তিনি বললেন: "তোমরা গরুর মাথার মতো দেখতে সেই স্বর্ণের বস্তুটি বের করে আনো।" তারা তা বের করে আনলো এবং উন্মুক্ত স্থানে রাখা গনিমতের সম্পদের মধ্যে রাখল। অতঃপর আগুন এলো এবং তা খেয়ে ফেলল।

আমাদের পূর্ববর্তী কোনো উম্মতের জন্য গনিমত হালাল ছিল না। এটা (আমাদের জন্য হালাল হওয়া) এ কারণে যে, আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা আমাদের দুর্বলতা ও অক্ষমতা দেখলেন, তাই তিনি এটিকে আমাদের জন্য পবিত্র (হালাল) করে দিলেন।

অন্য এক বর্ণনায় আছে, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ আমাদের প্রতি দয়া ও সহজ করার জন্য গনিমত ভক্ষণ করার অনুমতি দিয়েছেন, কেননা তিনি আমাদের দুর্বলতা সম্পর্কে অবগত আছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (203)


203 - ` افترقت اليهود على إحدى أو اثنتين وسبعين فرقة، وتفرقت النصارى على إحدى
أو اثنتين وسبعين فرقة، وتفترق أمتي على ثلاث وسبعين فرقة `.
أخرجه أبو داود (2 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ইহুদিরা একাত্তর বা বাহাত্তর ফেরকায় বিভক্ত হয়েছিল। আর খ্রিস্টানরাও একাত্তর বা বাহাত্তর ফেরকায় বিভক্ত হয়েছিল। আর আমার উম্মত তিয়াত্তর ফেরকায় বিভক্ত হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (204)


204 - ` ألا إن من قبلكم من أهل الكتاب افترقوا على ثنتين وسبعين ملة، وإن هذه
الملة ستفترق على ثلاث وسبعين، ثنتان وسبعون في النار، وواحدة في الجنة،
وهي الجماعة `.
أخرجه أبو داود (2 /




মুয়াবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

জেনে রেখো! তোমাদের পূর্বের আহলে কিতাবগণ (কিতাবধারীরা) বাহাত্তরটি দলে বিভক্ত হয়েছিল। আর নিশ্চয়ই এই উম্মত (ইসলামী মিল্লাত) তিহাত্তরটি দলে বিভক্ত হবে। তন্মধ্যে বাহাত্তরটি দল হবে জাহান্নামী, আর মাত্র একটি দল হবে জান্নাতী। আর সেই দলটি হলো ‘আল-জামাআহ’ (বৃহত্তর সঠিক জনগোষ্ঠী)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (205)


205 - ` إذا رأيت الناس قد مرجت عهودهم، وخفت أماناتهم وكانوا هكذا: وشبك بين
أصابعه، قال (الراوي) : فقمت إليه فقلت له: كيف أفعل عند ذلك جعلني الله
فداك؟ قال: الزم بيتك، واملك عليك لسانك، وخذ ما تعرف، ودع ما تنكر،
وعليك بأمر خاصة نفسك، ودع عنك أمر العامة `.
أخرجه أبو داود (2 / 438) والحاكم (4 / 525) وأحمد (2 / 212) واللفظ
له عن هلال بن خباب أبي العلاء قال: حدثني عبد الله بن عمرو قال:
` بينما نحن حول رسول الله صلى الله عليه وسلم، إذ ذكروا الفتنة، أو ذكرت
عنده، قال ` فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
وقال المنذري والعراقي:
` سنده حسن `.
نقله المناوي في ` الفيض ` وأقرهما وهو كما قالا، فإن هلالا هذا فيه كلام
يسير لا ينزل حديثه عن رتبة الحسن إلا إذا خولف، وقد توبع على أصل الحديث كما
يأتي.
والحديث عزاه السيوطي للحاكم وحده بهذا اللفظ. وفيه مؤاخذتان:
الأولى: إيهامه أنه لم يخرجه أحد من أصحاب السنن ولا من هو أعلى طبقة من
الحاكم، وليس كذلك كما هو بين.
الثانية: إيهامه أيضا أن اللفظ للحاكم وهو لأحمد:
وللحديث عن ابن عمرو ثلاث طرق أخر:
الأول: عن أبي حازم عن عمارة بن عمرو بن حزم عن عبد الله بن عمرو بلفظ:
` كيف بكم وبزمان، أو يوشك أن يأتي زمان يغربل الناس فيه غربلة، تبقى حثالة
من الناس قد مرجت عهودهم وأماناتهم واختلفوا فكانوا هكذا: وشبك بين أصابعه
.... ` الحديث مثله دون قوله ` الزم بيتك واملك عليك لسانك `.
أخرجه أبو داود (2 /




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যখন তুমি দেখবে মানুষের অঙ্গীকারগুলি (প্রতিশ্রুতিগুলো) এলোমেলো হয়ে গেছে, তাদের আমানত (বিশ্বাসযোগ্যতা) কমে গেছে, আর তারা এমন হয়ে গেছে— এই বলে তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো একটার সাথে আরেকটা মিলিয়ে ধরলেন।"

(বর্ণনাকারী) বলেন: "আমি তখন তাঁর (রাসূলুল্লাহ ﷺ এর) কাছে গেলাম এবং বললাম: আল্লাহ আমাকে আপনার জন্য উৎসর্গ করুন! এমন অবস্থায় আমি কী করব?"

তিনি বললেন: "তুমি তোমার ঘরে অবস্থান করো, তোমার জিহবাকে নিয়ন্ত্রণে রাখো, যা তুমি ভালো বলে জানো তা গ্রহণ করো, আর যা তুমি মন্দ বলে মনে করো তা বর্জন করো। তুমি তোমার ব্যক্তিগত (নিজস্ব) বিষয়ের প্রতি যত্নশীল হও এবং সাধারণ মানুষের বিষয়গুলো থেকে বিরত থাকো।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (206)


206 - ` كيف بك يا عبد الله بن عمرو إذا بقيت في حثالة من الناس مرجت عهودهم
وأماناتهم، واختلفوا فصاروا هكذا: وشبك بين أصابعه قال: قلت:
يا رسول الله ما تأمرني؟ قال: عليك بخاصتك، ودع عنك عوامهم `.
أخرجه الدولابي في ` الكنى ` (2 / 35) وابن حبان في ` صحيحه ` (1849)
وأبو عمرو الداني في ` السنن الواردة في الفتن ` (ق 16 / 2) وابن السماك
في ` الأول من الرابع من حديثه ` (108) من طريقين عن العلاء بن عبد الرحمن عن
أبيه عن أبي
هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط مسلم.
وعلقه البخاري في صحيحه (1 / 548) من طريق عاصم بن محمد عن أخيه واقد وهو
ابن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب عن أبيه قال:
سمعت أبي وهو يقول: وقال عبد الله: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` يا عبد الله بن عمرو كيف بك إذا بقيت في حثالة من الناس `.
ووصله إبراهيم الحربي في ` غريب الحديث `، وحنبل بن إسحاق فى ` كتاب الفتن `
وأبو يعلى (ق 267 / 2) من هذا الوجه عن ابن عمر به، مثل حديث أبي هريرة
سواء كما في ` الفتح ` (13 / 32) . فهو شاهد قوي لحديث أبي هريرة.
وله شاهد آخر من حديث سهل بن سعد الساعدي قال: قال رسول الله صلى الله عليه
وسلم يوما لعبد الله بن عمرو بن العاص: فذكره.
أخرجه ابن أبي الدنيا في ` الأمر بالمعروف ` (ق 55 / 1) وابن شاهين في
` جزء من حديثه ` (ق 210 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"হে আব্দুল্লাহ ইবনে আমর, তোমার কেমন অবস্থা হবে যখন তুমি এমন একদল নিকৃষ্ট মানুষের মধ্যে থেকে যাবে— যাদের ওয়াদা (প্রতিশ্রুতি) ও আমানত বিশৃঙ্খল হয়ে পড়বে (বা নষ্ট হয়ে যাবে), আর তারা মতভেদ করে এমন হয়ে যাবে— এই বলে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর আঙ্গুলগুলো একটার সাথে আরেকটা জড়িয়ে ধরলেন।

(আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বললেন, আমি জিজ্ঞেস করলাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আপনি আমাকে কী আদেশ করেন?

তিনি বললেন: তুমি তোমার আপনজনদের (বা নিজ সম্প্রদায়ের বিশেষ মানুষদের) দিকে মনোনিবেশ করো এবং তাদের সাধারণ মানুষদের ছেড়ে দাও (তাদের থেকে দূরে থাকো)।"