হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1927)


1927 - ` الظلم ثلاثة، فظلم لا يتركه الله وظلم يغفر وظلم لا يغفر، فأما الظلم
الذي لا يغفر، فالشرك لا يغفره الله، وأما الظلم الذي يغفر، فظلم العبد
فيما بينه وبين ربه، وأما الظلم الذي لا يترك، فظلم العباد، فيقتص الله
بعضهم من بعض `.
أخرجه أبو داود الطيالسي في ` مسنده ` (2 /




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যুলম বা অন্যায় তিন প্রকার: এক প্রকার যুলম যা আল্লাহ বিনা শাস্তিতে ছেড়ে দেন না, এক প্রকার যুলম যা তিনি ক্ষমা করেন, এবং আরেক প্রকার যুলম যা তিনি ক্ষমা করেন না।

যে যুলম আল্লাহ ক্ষমা করেন না, তা হলো শিরক (আল্লাহর সাথে শরীক স্থাপন করা); আল্লাহ এটিকে ক্ষমা করেন না।

আর যে যুলম আল্লাহ ক্ষমা করেন, তা হলো বান্দা কর্তৃক তার রব এবং তার নিজের মধ্যকার বিষয়ে কৃত যুলম বা পাপ।

আর যে যুলম আল্লাহ বিনা শাস্তিতে ছেড়ে দেন না, তা হলো বান্দাদের (পরস্পরের) উপর কৃত যুলম। আল্লাহ (বিচার দিবসে) একে অপরের নিকট থেকে এর প্রতিশোধ গ্রহণ করবেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1928)


1928 - ` الطاعون شهادة لأمتي، وخز أعدائكم من الجن، غدة كغدة الإبل، تخرج بالآباط
والمراق، من مات فيه مات شهيدا ومن أقام فيه (كان) كالمرابط في سبيل الله
ومن فر منه كان كالفار من الزحف `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (رقم - 5661) وأبو بكر بن خلاد في ` الفوائد `
(ق 36 / 1) والسياق له عن يوسف بن ميمون عن عطاء عن ابن عمر عن عائشة
مرفوعا. وليس عند الطبراني: ` من مات فيه مات شهيدا `، وقال بدل قوله: `
ومن أقام فيه كان كالمرابط في سبيل الله `. ` والصابر عليه كالمجاهد في سبيل
الله `. وقال: ` تفرد به يوسف `.
قلت: وهو المخزومي مولاهم الكوفي الصباغ وهو ضعيف كما قال الحافظ في `
التقريب `. وقد وجدت لزيادة ابن خلاد طريقا أخرى عند أبي يعلى في ` مسنده `
(3 / 1146) من طريق ليث عن صاحب له عن عطاء قال: قالت عائشة: ذكر الطاعون،
فذكرت أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: ` وخزة يصيب أمتي من أعدائهم من الجن
، غدة كغدة الإبل، من أقام عليه كان مرابطا ومن أصيب به كان شهيدا ومن فر
منه كالفار من الزحف `. وليث هو ابن أبي سليم ضعيف لاختلاطه. ولسائر الحديث
شواهد كثيرة في ` الصحيحين ` وغيرهما دون ذكر الآباط والمراق،
وقد جاء ذكر
المراق في حديث معاذ عن أحمد (5 / 241) فلعله من أجل هذه الطرق حسن المنذري
في ` الترغيب ` (4 / 204) إسناد هذا الحديث، وتبعه الهيثمي (2 / 315) ،
وأشار الحافظ ابن حجر في ` بذل الماعون ` (69 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

মহামারি বা প্লেগ হলো আমার উম্মতের জন্য শাহাদাত (শহীদ)। এটি তোমাদের শত্রু জিন্নদের খোঁচা (আঘাত)। এটি হলো উটের গলদেশের স্ফীতি বা ফোঁড়ার মতো এক ধরনের ফোঁড়া, যা বগলের নিচে এবং কুঁচকিতে (পেটের নরম অংশে) দেখা দেয়। যে এতে মৃত্যুবরণ করে, সে শহীদ হিসেবে মৃত্যুবরণ করে। আর যে তাতে (ধৈর্য সহকারে) অবস্থান করে, সে আল্লাহর পথে জিহাদের জন্য প্রস্তুত যোদ্ধার (মুরাবিত) মতো। আর যে তা থেকে পালিয়ে যায়, সে যেন যুদ্ধক্ষেত্র থেকে পলায়নকারীর মতো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1929)


1929 - ` عائد المريض في مخرفة الجنة، فإذا جلس عنده غمرته الرحمة `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (رقم - 774) عن صالح بن موسى عن عبد العزيز بن
رفيع عن أبي سلمة بن عبد الرحمن عن أبيه مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، صالح بن موسى وهو التيمي الكوفي قال الحافظ في `
التقريب `: ` متروك `. لكن له شاهد من حديث جابر مرفوعا بلفظ: ` من عاد
مريضا لم يزل يخوض في الرحمة حتى يرجع، فإذا جلس اغتمس فيها `. أخرجه ابن
حبان (711) والحاكم (1 / 350) وأحمد (3 / 304) من طريق هشيم حدثنا عبد
الحميد بن جعفر عن عمر بن الحكم بن ثوبان عن جابر بن عبد الله مرفوعا. وقال
الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا لولا أن
هشيما قد خولف في إسناده، فأخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (522) عن خالد
ابن الحارث قال حدثنا عبد الحميد بن جعفر قال: أخبرني أبي أن أبا بكر بن حزم
ومحمد بن المنكدر
في ناس من أهل المسجد عادوا عمر بن الحكم بن رافع الأنصاري
قالوا: يا أبا حفص حدثنا، قال: سمعت جابر بن عبد الله به. ووجه المخالفة
أن خالد بن الحارث أدخل بين عبد الحميد وعمر بن الحكم والد عبد الحميد وهو
جعفر بن عبد الله بن الحكم وهو ابن أخي عمر بن الحكم وهشيم أسقطه من بينهما.
ثم إن خالدا سمى جد عمر بن الحكم رافعا، بينما هشيم سماه ثوبان، ولعله من
أجل هذا الاختلاف قيل إنهما واحد، وسواء كان هذا أو ذاك فكلاهما ثقة، فلا
يضر ذلك في صحة الحديث. ولعل الأصح رواية خالد بن الحارث التي زاد فيها ذكر
جعفر بن عبد الله بن الحكم، فإن زيادة الثقة مقبولة. وجعفر ثقة أيضا من رجال
مسلم، فالحديث صحيح على كل حال. ثم وجدت لهشيم متابعا، وهو عبد الله بن
حمران الثقة، إلا أنه لم يسم جد عمر بن الحكم. أخرجه البزار (775) .
ورواه أبو معشر عن عبد الرحمن بن عبد الله الأنصاري قال:. ` دخل أبو بكر بن
محمد بن عمرو بن حزم على عمر بن الحكم بن ثوبان فقال: يا أبا حفص! حدثنا
حديثا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليس فيه اختلاف، قال: حدثني كعب ابن
مالك مرفوعا بلفظ: ` من عاد مريضا خاض في الرحمة، فإذا جلس عنده استنقع فيها
`. وزاد: ` وقد استنقعتم إن شاء الله في الرحمة `.
أخرجه أحمد (3 / 460)
. لكن أبو معشر هذا واسمه نجيح بن عبد الرحمن السندي ضعيف من قبل حفظه فلا
يلتفت إلى مخالفته. وللحديث شاهد آخر من حديث علي رضي الله عنه مضى برقم
(1367) . وأما الحديث الذي أورده السيوطي في ` الجامع ` من رواية أحمد
والطبراني عن أبي أمامة مرفوعا بلفظ: ` عائد المريض يخوض في الرحمة، فإذا
جلس عنده غمرته الرحمة، ومن تمام عيادة المريض أن يضع أحدكم يده على وجهه أو
على يده، فيسأله كيف هو؟ وتمام تحيتكم بينكم المصافحة `.
قلت: فهو عند أحمد في ` مسنده ` مفرقا في موضعين (5 / 260 و 268) من طريق
عبيد الله بن زحر عن علي بن يزيد عن القاسم عنه.
قلت: وهذا إسناد واه جدا، عبيد الله بن زحر عن علي بن يزيد وهو الألهاني
متروك. والحديث أخرج الترمذي منه ` تمام عيادة المريض ... ` وقال (2 / 122
) : ` ليس إسناده بذاك `. وأخرجه الطبراني في ` الكبير ` (7854) من الطريق
المذكور بتمامه. (المخرفة) : سكة بين صفين من نخل يخترق من أيها شاء، أي
يجتني. وقيل: المخرفة: الطريق. أي أنه على طريق تؤديه إلى طريق الجنة. `
نهاية `.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, যে ব্যক্তি কোনো রোগীকে দেখতে যায়, সে ফিরে না আসা পর্যন্ত সর্বদা রহমতের মধ্যে বিচরণ করতে থাকে। আর যখন সে রোগীর পাশে বসে, তখন সে সেই রহমতের মধ্যে সম্পূর্ণরূপে নিমজ্জিত হয়ে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1930)


1930 - ` لا شؤم، وقد يكون اليمن في ثلاثة: في المرأة والفرس والدار `.
أخرجه ابن ماجة (1 / 614) والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1 / 341) : حدثنا
هشام بن عمار حدثنا إسماعيل بن عياش حدثني سليمان بن سليم الكتاني عن يحيى بن
جابر عن حكيم بن معاوية عن عمه مخمر بن معاوية قال: سمعت رسول الله صلى
الله عليه وسلم يقول: فذكره. وأخرجه الترمذي (2 / 135) : حدثنا علي بن حجر
حدثنا إسماعيل بن عياش به إلا أنه قال: عن عمه حكيم بن معاوية. فاختلفا في
اسم صاحبيه. وذلك غير ضائر إن شاء الله تعالى. وهذا إسناد صحيح، ورجاله
ثقات كما في ` الزوائد `.
قلت: وإسماعيل بن عياش حجة في روايته عن الشاميين، وهذه منها. وأما قول
الحافظ في ` الفتح ` (6 / 46) بعد أن عزاه للترمذي: ` في إسناده ضعف `، فهو
مما لا وجه له بعد أن بينا أنه إسناد شامي والخلاف المذكور في اسم صاحبيه لا
يضر وذلك لأن الصحابة كلهم عدول. على أن علي بن حجر أوثق وأحفظ من هشام بن
عمار، فروايته أرجح وأصح. ثم رأيت ابن أبي حاتم قد ذكر في ` العلل ` (2 /
299) عن أبيه أنه جزم بهذا الذي رجحته. فالحمد لله على توفيقه، وأسأله
المزيد من فضله. والحديث صريح في نفي الشؤم، فهو شاهد قوي للأحاديث التي
جاءت بلفظ: ` إن كان الشؤم في شيء.. ` ونحوه خلافا للفظ الآخر: ` الشؤم في
ثلاث ... `. فهو بهذا اللفظ شاذ مرجوح كما سبق بيانه تحت الحديث (393) .




মাখমার ইবনে মু’আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো অশুভ লক্ষণ বা কুলক্ষণ নেই। তবে শুভত্ব বা কল্যাণ থাকতে পারে তিনটি জিনিসের মধ্যে: নারী, ঘোড়া এবং বাড়ির মধ্যে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1931)


1931 - ` عالجيها بكتاب الله `.
أخرجه ابن حبان (1419) من طريق عمرة بنت عبد الرحمن عن عائشة: ` أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها وامرأة تعالجها أو ترقيها، فقال: ` فذكره
. قلت: وإسناده صحيح. وفي الحديث مشروعية الترقية بكتاب الله تعالى ونحوه
مما ثبت عن النبي صلى الله عليه وسلم من الرقى كما تقدم في الحديث (178) عن
الشفاء قالت: دخل علينا النبي صلى الله عليه وسلم وأنا عند حفصة فقال لي: `
ألا تعلمين هذه رقية النملة كما علمتيها الكتابة؟ `. وأما غير ذلك من الرقى
فلا تشرع، لاسيما ما كان منها مكتوبا بالحروف المقطعة والرموز المغلقة التي
ليس لها معنى سليم ظاهر، كما ترى أنواعا كثيرة منها في الكتاب المسمى بـ ` شمس
المعارف الكبرى ` ونحوه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

একবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর (আয়িশার) নিকট প্রবেশ করলেন, যখন একজন মহিলা তাঁকে চিকিৎসা করছিলেন অথবা রুকইয়াহ (ঝাড়ফুঁক) করছিলেন। তখন তিনি বললেন: "তুমি তাকে আল্লাহর কিতাব দিয়ে রুকইয়াহ করো।"

(আমি [শায়খ নাসিরুদ্দীন আলবানী] বলি: এর সনদ সহীহ। এই হাদীসে আল্লাহর কিতাব দ্বারা রুকইয়াহ করার বৈধতা প্রমাণিত হয়। অনুরূপভাবে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে প্রমাণিত অন্যান্য রুকইয়াহও বৈধ, যেমনটি ইতিপূর্বে ১৭৮ নং হাদীসে শিফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এসেছে। তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিকট আসলেন, আর আমি হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে ছিলাম। তখন তিনি আমাকে বললেন: "তুমি কি এই (হাফসা) মেয়েটিকে ’নমলহর রুকইয়াহ’ (ফোড়া বা ক্ষতের ঝাড়ফুঁক) শেখাবে না, যেভাবে তুমি তাকে লেখা শিখিয়েছিলে?")

আর এ ছাড়া অন্যান্য রুকইয়াহ বৈধ নয়। বিশেষ করে সেগুলো, যা বিচ্ছিন্ন অক্ষর বা দুর্বোধ্য সাংকেতিক চিহ্ন দ্বারা লেখা হয়, যার কোনো সুস্পষ্ট বিশুদ্ধ অর্থ নেই। যেমন এর বহু প্রকার তুমি ’শামস আল-মাআরিফ আল-কুবরা’ নামক কিতাবে এবং এর অনুরূপ বইগুলোতে দেখতে পাও।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1932)


1932 - ` من قال: (لا إله إلا الله) أنجته يوما من دهره، أصابه قبل ذلك ما أصابه `.
أخرجه أبو سعيد بن الأعرابي في ` معجمه ` (ق 88 / 2) وابن حيويه في ` حديثه
` (3 / 2 / 2) وابن ثرثال في ` سداسياته ` (227 / 2) وأبو نعيم في `
الحلية ` (5 / 46) والخطيب في ` الموضح ` (2 / 205) والبيهقي في ` الشعب
` (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই) বলবে, তার জীবনের কোনো এক দিনে তা তাকে অবশ্যই মুক্তি দেবে, যদিও এর পূর্বে সে যা কিছুর সম্মুখীন হয়েছে (অর্থাৎ শাস্তি বা ভোগান্তি) তা তার উপর আপতিত হোক না কেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1933)


1933 - ` عرضت علي الأيام، فعرض علي فيها يوم الجمعة، فإذا هي كمرآة بيضاء، وإذا
في وسطها نكتة سوداء، فقلت: ما هذه؟ قيل: الساعة `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 48 / 2) عن أبي سفيان الحميري:
حدثنا الضحاك بن حمرة عن يزيد بن حميد عن أنس بن مالك مرفوعا وقال: ` لم
يروه عن يزيد إلا الضحاك، تفرد به أبو سفيان `.
قلت: هو صدوق وسط كما في ` التقريب `، واسمه سعيد بن يحيى الحميري. ونحوه
الضحاك بن حمرة، فقد اختلفوا فيه ما بين موثق ومضعف، وحسن الترمذي حديثه،
فالإسناد حسن إن شاء الله تعالى. وقال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (2 / 164
) : ` رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله رجال الصحيح خلا شيخ الطبراني
وهو ثقة `. كذا قال، والضحاك بن حمرة لم يخرج له الشيخان شيئا. وأورده هو
والمنذري (1 / 248) عن أنس به نحوه بأتم منه، وقال الهيثمي: ` رواه
الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله ثقات `. وقال المنذري: ` ... بإسناد جيد `
.
وقال في مكان آخر (4 /




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার সামনে দিনগুলিকে পেশ করা হলো। অতঃপর তার মধ্যে জুমু’আর দিনটিকে আমার সামনে পেশ করা হলো। তখন তা ছিল যেন একটি সাদা আয়নার মতো। আর হঠাৎ দেখা গেল, তার মাঝখানে একটি কালো বিন্দু রয়েছে। আমি জিজ্ঞেস করলাম: ’এটি কী?’ বলা হলো: ’এটি হলো কিয়ামত (মহাপ্রলয়)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1934)


1934 - ` عصابتان من أمتي أحرزهما الله من النار: عصابة تغزو الهند وعصابة تكون مع
عيسى بن مريم عليه السلام `.
أخرجه النسائي (2 / 64) وأحمد (5 / 278) وأبو عروبة الحراني في ` حديثه `
(102 / 2) عن بقية بن الوليد حدثنا عبد الله بن سالم وأبو بكر بن الوليد
الزبيدي عن محمد بن الوليد الزبيدي عن لقمان بن عامر الوصابي عن عبد الأعلى بن
عدي البهراني عن ثوبان مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن النبي صلى
الله عليه وسلم.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات غير أبي بكر الزبيدي فهو مجهول الحال لكنه
مقرون هنا مع عبد الله بن سالم وهو الأشعري الحمصي، ثقة من رجال البخاري.
وبقية بن الوليد مدلس ولكنه قد صرح بالتحديث، فأمنا به شر تدليسه. على أنه
قد توبع، فقال هشام بن عمار: حدثنا الجراح بن مليح البهراني حدثنا محمد بن
الوليد الزبيدي به. أخرج ابن عدي (58 / 2) وابن عساكر (15 / 100 / 1) .
وهذا إسناد لا بأس به في المتابعات، الجراح بن مليح وهو الحمصي صدوق.
وهشام بن عمار من شيوخ البخاري وكان يتلقن، لكن تبعه سليمان وهو ابن عبد
الرحمن بن بنت شرحبيل. أخرجه البخاري في ` التاريخ الكبير ` (3 / 2 / 72)
عنه حدثنا الجراح بن مليح به.
قلت: وهذا إسناد قوي، فصح الحديث والحمد لله.




সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমার উম্মতের মধ্যে এমন দুটি দল রয়েছে যাদেরকে আল্লাহ তা’আলা জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করবেন: এক দল যারা ভারত আক্রমণ করবে, এবং অন্য এক দল যারা ঈসা ইবনে মারইয়াম (আলাইহিস সালাম)-এর সঙ্গে থাকবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1935)


1935 - ` عقر دار المؤمنين بالشام `.
أخرجه النسائي (2 /




ইবনু হাওয়ালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: মুমিনদের আবাসের মূল কেন্দ্রস্থল (বা স্থায়ী আশ্রয়স্থল) হলো শাম (সিরিয়া অঞ্চল)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1936)


1936 - ` عليك بالخيل فارتبطها، الخيل معقود في نواصيها الخير `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (2 / 2 / 184) : حدثنا معلى أخبرنا محمد بن
حمران أخبرنا سلم الجرمي عن سوادة بن الربيع قال: ` أتيت النبي صلى الله
عليه وسلم، وأمر لي بذود، قال لي: مر بنيك أن يقصوا أظافرهم عن ضروع إبلهم
ومواشيهم، وقل لهم: فليحتلبوا عليها سخالها، لا تدركها السنة وهي عجاف،
قال: هل لك من مال؟ قلت: نعم، لي مال وخيل ورقيق قال: ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد أورد البخاري في ترجمة سوادة هذا، وقال: ` الجرمي،
له صحبة، يعد في البصريين `. وبهذا ترجم له في ` الإصابة ` وخفي حاله على
المناوي فقال: ` لم أر ذلك في الصحابة المشاهير `! وسلم هو ابن عبد الرحمن
الجرمي، وهو صدوق، ومثله محمد بن حمران كما في ` التقريب `. ومعلى هو ابن
أسد العمي ثقة ثبت من رجال الشيخين. والحديث أورده الهيثمي في ` المجمع ` (5
/ 259) مع القصة مختصرا، وقال: ` رواه البزار، ورجاله ثقات `.
قلت: وكذلك أخرجه أحمد (3 / 484) من طريق المرجي بن رجاء اليشكري قال:
حدثني سلم بن عبد الرحمن به دون قوله ` وقل لهم `. وأورده السيوطي في `
الجامع ` بلفظ:
` عليك بالخيل، فإن الخيل معقود في نواصيها الخير إلى يوم
القيامة `. وقال: ` رواه الطبراني والضياء عن سوادة بن الربيع `.
قلت: هو عند الطبراني في ` الكبير ` (6480) من طريق معلى شيخ البخاري، لكن
وقع فيه ابن راشد العمي، وهو محرف من (أسد) . ثم روى (6482) من طريق أخرى
عن المرجي بن رجاء عن سلم (ووقع فيه: مسلم!) بإسناده ومتنه دون حديث
الترجمة، ودون قوله: ` وقل لهم ... `. ونحو ذلك عند البزار (1688) .




সুওয়াদা ইবনু আর-রাবী‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট আসলাম। তিনি আমাকে কয়েকটি উট দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। তিনি আমাকে বললেন: তোমার সন্তানদেরকে আদেশ দাও যেন তারা তাদের উট এবং অন্যান্য গৃহপালিত পশুর ওলান থেকে তাদের নখ কেটে ফেলে (অর্থাৎ নখ না লাগায়)। আর তাদের বলো: তারা যেন সেগুলোর সাথে তাদের বাচ্চাদের (দুধপানের জন্য) দোহন করতে দেয়, যেন বছর শেষ হওয়ার আগেই পশুগুলো দুর্বল হয়ে না যায়। তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কি কোনো সম্পদ আছে? আমি বললাম: হ্যাঁ, আমার সম্পদ, ঘোড়া ও দাস রয়েছে। তখন তিনি বললেন: **তুমি ঘোড়া পালন করো এবং তাকে বেঁধে রাখো (অর্থাৎ তার যত্ন নাও), কারণ ঘোড়ার কপালে (শুভ্র কেশগুচ্ছে) কল্যাণ বাঁধা রয়েছে।**









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1937)


1937 - ` عليك بالهجرة فإنه لا مثل لها، ... ، عليك بالصوم فإنه لا مثل له، عليك
بالسجود، فإنك لا تسجد لله سجدة إلا رفعك الله بها درجة وحط عنك بها خطيئة `.
رواه الطبراني في ` الكبير ` كما في ` الجامع الصغير ` و ` الكبير ` للسيوطي،
من حديث أبي فاطمة ولم أقف على إسناده، ولا على من تكلم عليه بتصحيح أو
تضعيف، وقد استطعت الوقوف على الحديث كله إلا فقرة الجهاد، مفرقا في عدة
مصادر إلا الفقرة المحذوفة والمشار إليها بالنقط ولفظها: ` عليك بالجهاد
فإنه لا مثل له `. وإليك البيان:




আবু ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি বলেন):

"তোমরা হিজরতকে অপরিহার্য করে নাও, কেননা এর সমতুল্য কিছু নেই। ... তোমরা সিয়ামকে (রোযা) অপরিহার্য করে নাও, কেননা এর সমতুল্য কিছু নেই। তোমরা সিজদাকে অপরিহার্য করে নাও। কারণ, তোমরা আল্লাহ তাআলার জন্য যখনই একটি সিজদা করবে, তিনি এর বিনিময়ে তোমাদের একটি মর্যাদা বৃদ্ধি করবেন এবং এর মাধ্যমে তোমাদের একটি গুনাহ মোচন (ক্ষমা) করে দেবেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1938)


1938 - ` عليك بحسن الخلق وطول الصمت، فوالذي نفسي بيده ما عمل الخلائق بمثلهما `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (2 / 834) : حدثنا إبراهيم بن الحجاج السامي
أخبرنا بشار بن الحكم أخبرنا ثابت البناني عن أنس قال: ` لقي رسول الله
صلى الله عليه وسلم أبا ذر فقال: يا أبا ذر ألا أدلك على خصلتين هما أخف على
الظهر، وأثقل (في الميزان) من غيرهما؟ قال: بلى يا رسول الله، قال: `
فذكره. ومن هذا الوجه أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (7245) والبيهقي في
` شعب الإيمان ` (1 / 65 / 1) من طريقين آخرين حدثنا إبراهيم بن الحجاج
السامي به. وتابعه معلى بن أسد حدثنا بشار بن الحكم أبو بدر الضبي به. أخرجه
ابن أبي الدنيا في ` الصمت ` (4 / 32 / 2) والبزار (ص




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে সাক্ষাৎ করলেন এবং বললেন, "হে আবু যর! আমি কি তোমাকে এমন দুটি গুণের কথা বলে দেব না, যা (পালন করা) পিঠের জন্য সবচেয়ে হালকা এবং (কিয়ামতের) দাঁড়িপাল্লায় অন্য সব আমলের চেয়ে অধিক ভারী?"

তিনি বললেন, "অবশ্যই, ইয়া রাসূলাল্লাহ!"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা অবশ্যই উত্তম চরিত্র এবং দীর্ঘ নীরবতা (কম কথা বলা) অবলম্বন করো। কেননা, যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ! সৃষ্টিকুল এই দুটির মতো (গুরুত্বপূর্ণ) কোনো আমল করেনি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1939)


1939 - ` عليك بحسن الكلام، وبذل الطعام `.
أخرجه البخاري في ` خلق أفعال العباد ` (ص 79) وابن أبي الدنيا في ` الصمت `
(2 / 9 / 1) والحاكم (1 / 23) والخطيب في ` الموضح ` (2 / 4) عن يزيد
ابن المقدام بن شريح بن هاني عن المقدام عن أبيه عن هاني ` أنه لم وفد على
رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: يا رسول أي شيء يوجب الجنة؟ قال: ` فذكره
، وقال الحاكم: ` حديث مستقيم، وليس له علة قادحة `. ووافقه الذهبي وهو
كما قال ولذلك أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (1937 و 1938) وفي رواية له: `
عليك بطيب الكلام وبذل السلام وإطعام الطعام `. وهي شاذة لمخالفتها لما
قبلها، وعليها جمع من الثقات بخلاف الشاذة هذه، فقد تفرد بها أحدهم.




হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আগমন করলেন, তখন জিজ্ঞাসা করলেন, “হে আল্লাহর রাসূল, কোন জিনিসটি জান্নাতকে আবশ্যক করে?”

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন, **"তোমার জন্য আবশ্যক হলো উত্তম কথা বলা এবং খাদ্য দান করা।"**









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1940)


1940 - ` سيوقد المسلمون من قسي يأجوج ومأجوج ونشابهم وأترستهم سبع سنين `.
أخرجه ابن ماجة (4076) : حدثنا هشام بن عمار حدثنا يحيى بن حمزة حدثنا ابن
جابر عن يحيى بن جابر الطائي: حدثني عبد الرحمن بن جبير بن نفير عن أبيه أنه
سمع النواس بن سمعان يقول: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم غير هشام بن عمار، فإنه على شرط البخاري
إلا أنه قد تكلم فيه لأنه كان يتلقن. لكنه قد توبع، فقال الترمذي (2 /




নওয়াস ইবনে সামআন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

মুসলমানগণ ইয়াজুজ ও মাজুজের ধনুকসমূহ, তাদের তীর ও তাদের ঢালসমূহ সাত বছর ধরে জ্বালানি হিসেবে ব্যবহার করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1941)


1941 - ` عليكم بالجهاد في سبيل الله تبارك وتعالى، فإنه باب من أبواب الجنة، يذهب
الله به الهم والغم `.
رواه الهيثم بن كليب في ` مسنده ` (137 / 1) والحاكم (2 /




তোমাদের উচিত আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার পথে জিহাদ করা, কারণ তা জান্নাতের দরজাসমূহের মধ্যে একটি দরজা, যার মাধ্যমে আল্লাহ দুশ্চিন্তা ও পেরেশানি দূর করে দেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1942)


1942 - ` كان يأخذ الوبر من جنب البعير من المغنم ثم يقول: مالي فيه إلا مثل ما
لأحدكم. ثم يقول: إياكم والغلول، فإن الغلول خزي على صاحبه يوم القيامة،
فأدوا الخيط والمخيط وما فوق ذلك، وجاهدا في الله القريب والبعيد، في
الحضر والسفر، فإن الجهاد باب من الجنة، إنه ينجي صاحبه من الهم والغم.
وأقيموا حدود الله في القريب والبعيد، ولا تأخذكم في الله لومة لائم `.
أخرجه عبد الله بن أحمد (5 / 330) والضياء في ` المختارة ` (67 / 1) عن
عبد الله بن سالم المفلوج حدثنا عبيدة بن الأسود عن القاسم بن الوليد عن أبي
صادق عن ربيعة بن ناجذ عن عبادة بن الصامت مرفوعا. ولابن ماجة (2540)
الفقرة الأخيرة منه التي فيها إقامة الحدود.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله ثقات غير ربيعة هذا فقد وثقه الحافظ فقط تبعا
لابن حبان. لكن رواه أحمد (5 / 316 و 326) وابن عساكر (8 / 428 / 1) من
طريق المقدام بن معدي كرب أنبأنا عبادة بن الصامت به. وستأتي طريق المقدام
هذه ولفظها برقم (1972) .




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তিনি (নবী ﷺ) গনীমতের উটের পিঠ থেকে সামান্য পশম নিতেন, অতঃপর বলতেন: এতে (অর্থাৎ গনীমতের মালে) আমার প্রাপ্য তোমাদের প্রত্যেকের প্রাপ্যর মতোই সামান্য। অতঃপর তিনি বলতেন: তোমরা গনীমতের মালে আত্মসাৎ করা (খেয়ানত) থেকে বেঁচে থাকো। কারণ, কিয়ামতের দিন আত্মসাৎ তার মালিকের জন্য লাঞ্ছনা। অতএব, তোমরা সুতা ও সুঁচ পর্যন্ত এবং তার চেয়েও যা সামান্য, তা পর্যন্ত (যথাযথ কর্তৃপক্ষের কাছে) অর্পণ করো। আর তোমরা নিকটাত্মীয় ও দূরবর্তী ব্যক্তি—উভয়ের বিরুদ্ধে আল্লাহর পথে জিহাদ করো, তা গৃহে অবস্থানকালেই হোক বা সফরেই হোক। কেননা, জিহাদ হলো জান্নাতের একটি দরজা। এটি এর পালনকারীকে দুশ্চিন্তা ও মনঃকষ্ট থেকে মুক্তি দেয়। আর তোমরা নিকটাত্মীয় ও দূরবর্তী—উভয়ের ক্ষেত্রে আল্লাহর নির্ধারিত শাস্তি (হুদুদ) প্রতিষ্ঠা করো। আর আল্লাহর ব্যাপারে যেন কোনো নিন্দুকের নিন্দা তোমাদের প্রভাবিত করতে না পারে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1943)


1943 - ` عليكم بألبان البقر، فإنها ترم من كل شجر، وهو شفاء من كل داء `.
أخرجه الحاكم (4 / 403) من طريق إسرائيل عن الركين بن الربيع عن قيس بن مسلم
عن طارق بن شهاب عن عبد الله بن مسعود مرفوعا به. وقال الحاكم: ` صحيح
الإسناد `. ووافقه الذهبي.
وقد تابعه شعبة عن الركين لكن في الطريق إليه من
في حفظه ضعف وهو الرقاشي كما سبق في ` ما أنزل الله من داء ` (رقم - 518) .
وبالجملة فالحديث صحيح بهذين الطريقين عن ركين. وله طريق أخرى عن ابن مسعود
بزيادة فيه بلفظ: ` عليكم بألبان البقر وسمنانها وإياكم ولحومها، فإن
ألبانها وسمنانها دواء وشفاء ولحومها داء `. أخرجه الحاكم (4 / 404) من
طريق سيف بن مسكين حدثنا عبد الرحمن بن عبد الله المسعودي عن الحسن بن سعد عن
عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود عن أبيه مرفوعا به. وقال الحاكم: ` صحيح
الإسناد `. وتعقبه الذهبي في ` التلخيص ` بقوله: ` قلت: سيف وهاه ابن حبان
` وقال في ` الميزان `: ` شيخ يأتي بالمقلوبات والأشياء الموضوعة، قاله ابن
حبان `.
قلت: وله علتان أخريان: اختلاط المسعودي، ومظنة الانقطاع بين عبد الرحمن
ابن عبد الله بن مسعود وأبيه. قال يعقوب بن شيبة: ثقة مقل، تكلموا في
روايته عن أبيه لصغره. وقال ابن معين: سمع من أبيه، وقال مرة: لم يسمع
منه `. كذا في ` الميزان `. وفي ` التقريب `: ثقة من صغار الثانية، وقد
سمع من أبيه لكن شيئا يسيرا `. فالحديث بهذه الزيادة ضعيف الإسناد. لكن يأتي
ما يقويه قريبا. وأخرجه الطبراني في ` الكبير ` (3 / 27 / 1) من طريق عبد
الرزاق عن الثوري
ومن طريق المسعودي عن قيس بن مسلم عن طارق بن شهاب عن ابن
مسعود موقوفا عليه باللفظ الأول دون ذكر الشفاء. وأخرجه الفاكهي في ` حديثه `
(27 / 10) عن المسعودي به لكن رفعه. وكذلك أخرجه أبو إسحاق الحربي في `
غريب الحديث ` (5 / 15 / 1) . وكذلك أخرجه البغوي في ` حديث علي بن الجعد `
(9 / 79 / 1) والهيثم بن كليب في ` مسنده ` (84 / 2) وابن عساكر في `
تاريخ دمشق ` (8 / 242 / 2) من طرق عن قيس بن مسلم مرفوعا به. ثم أخرجه
البغوي وابن عساكر وكذا عبد بن حميد في ` المنتخب من المسند ` (65 / 2) من
طريق أخرى عن قيس بن مسلم عن طارق بن شهاب مرفوعا مرسلا لم يذكر ابن مسعود،
قال ابن عساكر: ` المحفوظ الموصول `.
قلت: وهذا ما كنت رجحته فيما تقدم تحت هذا الحديث بلفظ آخر (رقم - 518) .
ومن هذا التخريج يتبين أن الحديث مرفوعا صحيح الإسناد، لاتفاق جماعة من
الثقات على روايته عن قيس بن مسلم عن طارق عن ابن مسعود مرفوعا باللفظ الأول.
وهذا سند صحيح على شرط الشيخين. وأما الزيادة فهي وإن كانت ضعيفة الإسناد،
فقد مضى لها شاهد من حديث مليكة بنت عمرو مرفوعا نحوه، فراجعه برقم (1533) .
ولها شاهد آخر دون ذكر اللحم ولفظه: ` عليكم بألبان البقر فإنه شفاء وسمنها
دواء `. رواه أبو نعيم في ` الطب ` كما في ` الجزء المنتقى منه ` (




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তোমরা গরুর দুধ ব্যবহার করো, কারণ তা (গরু) সকল প্রকার গাছ-গাছালি থেকে ভক্ষণ করে (খাদ্য গ্রহণ করে), আর গরুর দুধ হলো সকল রোগের আরোগ্য।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1944)


1944 - ` فضل الله قريشا بسبع خصال: فضلهم بأنهم عبدوا الله عشر سنين لا يعبده إلا
قرشي، وفضلهم بأنه نصرهم يوم الفيل وهم مشركون، وفضلهم بأنه نزلت فيهم
سورة من القرآن لم يدخل فيهم غيرهم: * (لإيلاف قريش) *، وفضلهم بأن فيهم
النبوة، والخلافة، والحجابة، والسقاية `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ الكبير ` (1 / 1 / 341) ، فقال: في ترجمة
إبراهيم بن محمد بن ثابت بن شرحبيل من بني عبد الدار بن قصي المدني: قال لي
أبو مصعب حدثنا إبراهيم عن عثمان بن عبد الله بن أبي عتيق عن سعيد بن عمرو بن
جعدة عن أبيه عن جدته أم هانىء مرفوعا به. ومن هذا الوجه أخرجه ابن عدي
في ` الكامل ` (ق 5 / 1) والطبراني والبيهقي في ` مناقب الشافعي ` (1 / 34
) ، وقال الحافظ العراقي في ` محجة القرب في محبة العرب ` (ق 25 / 1) بعدما
ساقه من طريق الطبراني بنحوه: ` هذا حديث حسن ورجاله كلهم ثقات معروفون إلا
عمرو بن جعدة بن هبيرة، فلم أجد فيه تعديلا ولا تجريحا، وهو ابن أخت علي
ابن أبي طالب، وهو أخو يحيى بن جعدة بن هبيرة، أحد الثقات `.
قلت: في هذا الكلام نظر من وجوه:
الأول: أنه مع جهالة عمرو بن جعدة التي أشار إليها العراقي، فإن ابنه سعيدا
حاله قريب من حال أبيه، فإنه لم يوثقه غير ابن حبان لكن قد روى عنه جمع.
والثاني: أن عثمان بن عبد الله بن أبي عتيق أورده ابن أبي حاتم في ` الجرح
والتعديل ` (3 / 1 / 156) من رواية إبراهيم هذا وسليمان بن بلال عنه، ولم
يذكر فيه جرحا ولا تعديلا، ولعله في ` ثقات ابن حبان `.
الثالث: وهو الأهم أن علة الحديث إبراهيم المذكور، فإنه مختلف فيه، فقد
وثقه ابن حبان، وقال ابن أبي حاتم (1 / 1 / 125) عن أبيه: ` صدوق `.
وقال ابن عدي: ` روى عنه عمرو بن أبي سلمة وغيره مناكير `. وكذا قال
الذهبي، واستنكر له هذا الحديث كما يأتي.
لكن ختم ابن عدي ترجمته بقوله:
` وأحاديثه صالحة محتملة، ولعله أتي ممن قد رواه عنه `.
قلت: كيف يصح هذا الاحتمال وممن روى عنه المناكير عمرو بن أبي سلمة كما سبق
عن ابن عدي نفسه، وعمرو ثقة حافظ؟ ! وروى عنه هذا الحديث ذاته أبو مصعب كما
رأيت، وهو أحمد بن أبي بكر الزهري المدني الفقيه، وهو ثقة أيضا من رجال
الشيخين. وبالجملة، فإبراهيم هذا لا يخلوا من ضعف ما دام أن الثقات رووا عنه
المناكير ومما يؤيد ذلك أنه خولف في إسناده، فقال الإمام البخاري عقبه:
` وقال لي الأويسي: حدثني سليمان عن عثمان بن عبد الله بن أبي عتيق عن ابن
جعدة المخزومي عن ابن شهاب عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه `.
قلت: فأرسله أو أعضله ورجحه البخاري فقال عقبه: ` بإرسال أشبه `. وسليمان
الذي أرسله هو ابن بلال المدني ثقة من رجال الشيخين أيضا، فمخالفة إبراهيم
إياه في وصل الحديث مردودة كما لا يخفى على من كان عنده أدنى معرفة بقواعد هذا
العلم الشريف. ثم إنه قد رواه جمع غير أبي مصعب، منهم يعقوب بن محمد الزهري:
حدثنا إبراهيم بن محمد بن ثابت به. أخرجه الحاكم (2 / 536) ، وقال: ` صحيح
الإسناد `! وتعقبه الذهبي، فقال: ` قلت: يعقوب ضعيف، وإبراهيم صاحب
مناكير، هذا أنكرها `.
قلت: لا دخل ليعقوب في هذا الحديث فإنه متابع كما تقدم بل أخرجه الحاكم (4 /
54) أيضا من طريقين آخرين عن إبراهيم، فسلم يعقوب من عهدته، وانحصرت العلة
في إبراهيم. لكن ذكر العراقي له شاهد من رواية الطبراني في ` المعجم الأوسط `
أخرجه في ترجمة مصعب بن إبراهيم بن حمزة بن محمد بن حمزة بن مصعب بن الزبير بن
العوام برقم (9327) فقال: حدثنا مصعب حدثني أبي حدثنا عبد الله بن مصعب بن
ثابت بن عبد الله بن الزبير عن هشام بن عروة عن أبيه عن الزبير مرفوعا به،
وسياق الحديث له قال: ` لا يروى عن الزبير إلا بهذا الإسناد `. وقال
العراقي: ` هذا حديث يصلح أن يخرج للاعتبار به والاستشهاد، فإن عبد الله بن
مصعب بن ثابت ذكره ابن حبان في ` الثقات `، وضعفه ابن معين `.
قلت: هو صالح للاستشهاد كما يشير إليه كلامه، فقد روى عنه جمع من الثقات،
وقال ابن أبي حاتم (2 / 2 / 178) عن أبيه: ` هو شيخ، بابة عبد الرحمن بن
أبي الزناد `. يعني أنه نحوه في الرواية، والمتقرر فيه أنه حسن الحديث،
فابن مصعب عنده مثله أو قريب منه، فهو على الأقل صالح للاعتضاد به والاستشهاد
بحديثه. وسائر رجاله ثقات غير شيخ الطبراني مصعب فإني لم أجد له ترجمة كما
كانت ذكرت في تخريج حديث آخر في ` المعجم الصغير ` (رقم -




উম্মে হানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

আল্লাহ তাআলা কুরাইশদেরকে সাতটি বৈশিষ্ট্যের মাধ্যমে (অন্যান্যদের উপর) শ্রেষ্ঠত্ব দান করেছেন:

(১) তিনি তাদেরকে এই কারণে শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন যে, তারা দশ বছর যাবত আল্লাহর ইবাদত করেছিল, যখন কুরাইশী ছাড়া অন্য কেউ (প্রকাশ্যে) ইবাদত করত না।

(২) তিনি তাদেরকে এই কারণেও শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন যে, তারা মুশরিক হওয়া সত্ত্বেও ‘আসহাবুল ফীল’ (হস্তীবাহিনী)-এর দিনে তিনি তাদেরকে সাহায্য করেছিলেন।

(৩) তিনি তাদেরকে এ কারণেও মর্যাদা দিয়েছেন যে, তাদের প্রসঙ্গে কুরআনের এমন একটি সূরা অবতীর্ণ হয়েছে, যাতে তারা ছাড়া আর কেউ অন্তর্ভুক্ত হয়নি: **(তা হলো) সূরা কুরাইশ (لِإِيلَافِ قُرَيْشٍ)**।

(৪, ৫, ৬, ৭) আর তিনি তাদের মধ্যে নবুয়ত, খিলাফত, হাজাবা (কাবা ঘরের রক্ষণাবেক্ষণের দায়িত্ব) এবং সিকায়া (হাজীদের পানি পান করানোর দায়িত্ব) স্থাপন করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1945)


1945 - ` عجبت لصبر أخي يوسف وكرمه - والله يغفر له - حيث أرسل إليه ليستفتي في
الرؤية، ولو كنت أنا لم أفعل حتى أخرج، وعجبت لصبره وكرمه - والله يغفر
له - أتى ليخرج فلم يخرج حتى أخبرهم بعذره، ولو كنت أنا لبادرت الباب `.
أخرجه الطبراني (رقم 11640) عن إبراهيم بن يزيد عمرو بن دينار عن عكرمة عن
ابن عباس مرفوعا به، وزاد: ` ولولا الكلمة لما لبث في السجن حيث يبتغي
الفرج من عند غير الله، قوله: * (اذكرني عند ربك) * `. ومن هذا الوجه رواه
ابن جرير وغيره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، إبراهيم هذا هو الخوزي متروك الحديث كما في
` مجمع الزوائد ` (7 / 40) و ` التقريب `. ولذلك قال ابن كثير: ` هذا
الحديث ضعيف جدا `. وقد عزاه لعبد الرزاق: أخبرنا ابن عيينة عن عمرو بن
دينار عن عكرمة به مرسلا لم يذكر ابن عباس في إسناده، ولا قوله: ` ولولا
الكلمة ... ` في آخره. وهو الصحيح. وإنما صح هذا بلفظ آخر.
فقال أبو بكر
الكلاباذي في ` مفتاح المعاني ` (50 / 1 رقم الحديث 52) قال: قرىء على أبي
نصر محمد بن حمدويه بن سهل المطوعي - في المحرم سنة ثمان وعشرين وثلاثمائة في
دار بكار وهو ينظر في كتابه - قيل: حدثكم محمود بن آدم قال: حدثنا سفيان بن
عيينة عن عمرو بن دينار به إلا أنه قال: ` حين سئل عن البقرات العجاف كيف أخبر
حتى يخرجوه `. وهذه متابعة قوية، وإسناد جيد، فإن ابن عيينة ثقة حافظ.
ومحمود بن آدم وهو المروزي ثقة. قال ابن أبي حاتم (4 / 1 /




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ ﷺ বলেছেন:]

"আমার ভাই ইউসুফের ধৈর্য ও উদারতায় আমি বিস্মিত হয়েছি – আল্লাহ যেন তাকে ক্ষমা করেন। যখন তার কাছে স্বপ্নের ব্যাখ্যা চাওয়ার জন্য লোক পাঠানো হয়েছিল (তখনও তিনি ব্যাখ্যা দিলেন)। যদি আমি হতাম, তবে মুক্তি না পাওয়া পর্যন্ত আমি তা করতাম না।

আর আমি তার ধৈর্য ও উদারতায় আরও বিস্মিত হয়েছি – আল্লাহ যেন তাকে ক্ষমা করেন। যখন তাকে বের করে আনার জন্য লোক আসল, তখন তিনি বের হলেন না, যতক্ষণ না তিনি তাদের কাছে তাঁর নির্দোষিতার কারণ জানালেন। যদি আমি হতাম, তবে আমি দ্রুত দরজার দিকে ছুটে যেতাম।

আর যদি সেই (অনুরোধের) বাক্যটি না থাকত, তবে তিনি কারাগারে অবস্থান করতেন না। কারণ তিনি আল্লাহর কাছ ছাড়া অন্যের কাছে মুক্তি চেয়েছিলেন। (অর্থাৎ) তাঁর এই কথাটি: ’আপনার রবের কাছে আমার কথা উল্লেখ করবেন।’ (সূরা ইউসুফ, ১২:৪২)"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (1946)


1946 - ` صومي عن أختك `.
أخرجه الطيالسي في ` مسنده ` (2630) : حدثنا شعبة عن الأعمش قال: سمعت مسلم
البطين يحدث عن سعيد بن جبير عن ابن عباس: ` أن امرأة أتت النبي صلى الله
عليه وسلم فذكرت له أن أختها نذرت أن تصوم شهرا وأنها ركبت البحر فماتت ولم
تصم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
وأخرجه أحمد (1 / 338
) : حدثنا محمد بن جعفر حدثنا شعبة به.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرجاه من طرق أخرى عن الأعمش
به نحوه بلفظ: ` أمك `. لكن علقه البخاري فقال: ` ويذكر عن أبي خالد هو
` الأحمر `: حدثنا الأعمش عن الحكم ومسلم البطين وسلمة بن كهيل عن سعيد بن
جبير وعطاء ومجاهد عن ابن عباس: قالت امرأة للنبي صلى الله عليه وسلم: إن
أختي ماتت `. وو صله مسلم (3 / 156) ولكنه لم يسق لفظه، وغيره كالنسائي
في ` الكبرى ` (4 / 42 / 2) من هذا الوجه، وقال الترمذي (1 /




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এসে তাঁকে জানালেন যে তাঁর বোন এক মাস রোজা রাখার মানত (নযর) করেছিল। কিন্তু সে সমুদ্রপথে (সফরে) গিয়েছিল এবং রোজা না রেখেই মারা যায়। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:

"তুমি তোমার বোনের পক্ষ থেকে রোজা রাখো।"