সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
221 - ` كان يباشر وهو صائم، ثم يجعل بينه وبينها ثوبا. يعني الفرج `.
أخرجه الإمام أحمد (6 / 59) : حدثنا ابن نمير عن طلحة بن يحيى قال: حدثتني
عائشة بنت طلحة عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ... وأخرجه
ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 201 / 2) .
قلت: وهذا سند جيد، رجاله كلهم ثقات رجال مسلم، ولولا أن طلحة هذا فيه
كلام يسير من قبل حفظه، لقلت: إنه صحيح الإسناد، ولكن تكلم فيه بعضهم،
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق يخطىء `.
قلت: وفي هذا الحديث فائدة هامة وهو تفسير المباشرة بأنه مس المرأة فيما
دون الفرج، فهو يؤيد التفسير الذي سبق نقله عن القاري، وإن كان حكاه بصيغة
التمريض (قيل) : فهذا الحديث يدل على أنه قول معتمد، وليس في أدلة الشريعة
ما ينافيه، بل قد وجدنا في أقوال السلف ما يزيده قوة، فمنهم راوية الحديث
عائشة نفسها رضي الله عنها، فروى الطحاوي (1 / 347) بسند صحيح عن حكيم
بن عقال أنه قال: سألت عائشة: ما يحرم علي من امرأتي وأنا صائم؟ قالت:
فرجها وحكيم هذا وثقه ابن حبان وقال العجيلي: ` بصري تابعي ثقة `.
وقد علقه البخاري (4 / 120 بصيغة الجزم: ` باب المباشرة للصائم، وقالت
عائشة رضي الله عنها: يحرم عليه فرجها `.
وقال الحافظ:
` وصله الطحاوي من طريق أبي مرة مولى عقيل عن حكيم بن عقال.... وإسناده إلى
حكيم صحيح، ويؤدي معناه أيضا ما رواه عبد الرزاق بإسناد صحيح عن مسروق: سألت
عائشة: ما يحل للرجل من امرأته صائما؟ قالت. كل شيء إلا الجماع `.
قلت: وذكره ابن حزم (6 / 211) محتجا به على من كره المباشرة للصائم، ثم
تيسر لي الرجوع إلى نسخة ` الثقات ` في المكتبة الظاهرية، فرأيته يقول فيه
(1 / 25) :
` يروي عن ابن عمر، روى عنه قتادة، وقد سمع حكيم من عثمان بن عفان `.
ووجدت بعض المحدثين قد كتب على هامشه:
` العجلي: هو بصري تابعي ثقة `.
ثم ذكر ابن حزم عن سعيد بن جبير أن رجلا قال لابن عباس: إني تزوجت ابنة عم لي
جميلة، فبني بي في رمضان، فهل لي - بأبي أنت وأمي - إلى قبلتها من سبيل؟
فقال له ابن عباس: هل تملك نفسك؟ قال: نعم، قال: قبل، قال: فبأبي أنت
وأمي هل إلى مباشرتها من سبيل؟ ! قال: هل تملك نفسك؟ قال: نعم، قال:
فباشرها، قال: فهل لي أن أضرب بيدي على فرجها من سبيل؟ قال: وهل تملك نفسك
؟ قال: نعم، قال: اضرب.
قال ابن حزم: ` وهذه أصح طريق عن ابن عباس `.
قال: ` ومن طريق صحاح عن سعد بن أبي وقاص أنه سئل أتقبل وأنت صائم؟
قال: نعم، وأقبض على متاعها، وعن عمرو بن شرحبيل أن ابن مسعود كان يباشر
امرأته نصف النهار وهو صائم. وهذه أصح طريق عن ابن مسعود `.
قلت: أثر ابن مسعود هذا أخرجه ابن أبي شيبة (2 / 167 / 2) بسند صحيح على
شرطهما، وأثر سعد هو عنده بلفظ ` قال: نعم وآخذ بجهازها `
وسنده صحيح على
شرط مسلم، وأثر ابن عباس عنده أيضا ولكنه مختصر بلفظ:
` فرخص له في القبلة والمباشرة ووضع اليد ما لم يعده إلى غيره `.
وسنده صحيح على شرط البخاري.
وروى ابن أبي شيبة (2 / 170 / 1) عن عمرو بن هرم قال:
سئل جابر بن زيد عن رجل نظر إلى امرأته في رمضان فأمنى من شهوتها هل يفطر؟
قال: لا، ويتم صومه `.
وترجم ابن خزيمة للحديث بقوله:
` باب الرخصة في المباشرة التي هي دون الجماع للصائم، والدليل على أن اسم
الواحد قد يقع على فعلين أحدهما مباح، والآخر محظور `.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রোযা অবস্থায় তাঁর স্ত্রীর সাথে মুবাশারা (আলিঙ্গন/স্পর্শ) করতেন, অতঃপর তিনি তাঁর ও স্ত্রীর মাঝে একটি কাপড় রাখতেন। অর্থাৎ (লজ্জাস্থানকে স্পর্শ করা থেকে বিরত থাকতেন)।
222 - ` من تفل تجاه القبلة جاء يوم القيامة وتفلته بين عينيه `.
أخرجه أبو داود (3 /
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে ব্যক্তি কিবলার দিকে থুথু ফেলে, সে কিয়ামতের দিন এমন অবস্থায় উপস্থিত হবে যে, তার সেই থুথু তার দুই চোখের মাঝখানে থাকবে।
223 - ` يجيء صاحب النخامة في القبلة يوم القيامة وهي في وجهه `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (333) : أخبرنا عبد الرحمن بن زياد الكناني
- بالأبلة - حدثنا الحسن بن محمد بن الصباح: حدثنا شبابة حدثنا عاصم ابن محمد
عن محمد بن سوقة عن نافع عن ابن عمر مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات معروفون من رجال البخاري غير الكناني هذا،
فلم أجد له الآن ترجمة، لكنه لم يتفرد به، فقد عزاه المنذري في ` الترغيب `
(1 / 122) للبزار وابن خزيمة وابن حبان في ` صحيحيهما، وابن خزيمة من
طبقة الكناني المذكور فالغالب أنه رواه من غير طريقه، إما عن ابن الصباح
مباشرة أو عن غيره، وأما البزار فطريقه غير طريق الكناني قطعا، فإن في
إسناده عاصم بن عمر كما ذكر الهيثمي (2 / 19) ، وقال: ` ضعفه البخاري
وجماعة، وذكره ابن حبان في ` الثقات `.
قلت: وفي ` التقريب `: ضعيف.
قلت: ولكنه إن لم يفد في تقوية الحديث كشاهد أو متابع، فهو على الأقل لا يضر
والحديث صحيح على كل حال.
وفي الحديث دلالة على تحريم البصاق إلى القبلة مطلقا، سواء ذلك في المسجد
أو في غيره، وعلى المصلي وغيره، كما قال الصنعاني في ` سبل السلام `
(1 / 230) . قال:
` وقد جزم النووي بالمنع في كل حالة داخل الصلاة وخارجها وفي المسجد
أو غيره `.
قلت: وهو الصواب، والأحاديث الواردة في النهي عن البصق في الصلاة تجاه
القبلة كثيرة مشهورة في الصحيحين وغيرها، وإنما آثرت هذا دون غيره، لعزته
وقلة من أحاط علمه
به. ولأن فيه أدبا رفيعا مع الكعبة المشرفة، طالما غفل
عنه كثير من الخاصة، فضلا عن العامة، فكم رأيت في أئمة المساجد من يبصق إلى
القبلة من نافذة المسجد!
وفي الحديث أيضا فائدة هامة وهي الإشارة إلى أن النهي عن استقبال القبلة ببول
أو غائط إنما هو مطلق يشمل الصحراء والبنيان، لأنه إذا أفاد الحديث أن البصق
تجاه القبلة لا يجوز مطلقا، فالبول والغائط مستقبلا لها لا يجوز بالأولى،
فمن العجائب إطلاق النووي النهي في البصق، وتخصيصه في البول والغائط!
(إن في ذلك لذكري لمن كان له قلب أو ألقى السمع وهو شهيد) .
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ক্বিবলার দিকে থুথু বা শ্লেষ্মা নিক্ষেপকারী ব্যক্তি ক্বিয়ামতের দিন এমন অবস্থায় আসবে যে সেই শ্লেষ্মা তার চেহারায় লেগে থাকবে।
224 - ` الصوم يوم تصومون، والفطر يوم تفطرون، والأضحى يوم تضحون `.
أخرجه الترمذي (2 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"সওম (রোজা) হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা রোজা রাখো। আর ঈদুল ফিতর হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা ইফতার (ঈদ) উদযাপন করো। আর ঈদুল আযহা হলো সেই দিন, যেদিন তোমরা কুরবানি করো।"
225 - ` إذا ولج الرجل في بيته فليقل: اللهم إني أسألك خير المولج، وخير المخرج،
بسم الله ولجنا، وبسم الله خرجنا، وعلى الله ربنا توكلنا، ثم ليسلم على
أهله `.
أخرجه أبو داود في ` سننه ` (رقم 5096) عن إسماعيل: حدثني ضمضم عن شريح عن
أبي مالك الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات، وإسماعيل هو ابن عياش، وهو صحيح
الحديث عن الشاميين، وهذا منها، فإن ضمضم وهو ابن زرعة بن ثوب شامي حمصي.
وشريح هو ابن عبيد الحضرمي الحمصي ثقة، فالسند كله شامي حمصي.
(تنبيه) الحديث كما ترى من أوراد دخول البيت، وبذلك ترجم له أبو داود،
فأورده في ` باب ما جاء فيمن دخل بيت ما يقول ` وفي مثله أورده النووي وصديق
خان وغيرهما. وقد وهم شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله حيث جعل الحديث من
أوراد الدخول إلى المسجد، فإنه قال في ` الرد على الأخنائي ` (ص 95) :
` وعن محمد بن سيرين: كان الناس يقولون إذا دخلوا المسجد: صلى الله
وملائكته على محمد، السلام عليك أيها النبي ورحمة الله وبركاته، بسم الله
دخلنا، وبسم الله خرجنا، وعلى الله توكلنا، وكانوا يقولون إذا خرجوا مثل
ذلك `.
قلت: فقال ابن تيمية بعد أن ذكر هذا:
` قلت: هذا فيه حديث مرفوع في ` سنن أبي داود ` وغيره أنه يقال عند دخول
المسجد: اللهم إني أسألك خير المولج ... `.
وعزاه مخرجه فضيلة الشيخ اليماني لسنن أبي داود ولم يتنبه لهذا الذي نبهنا
عليه.
আবু মালিক আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
যখন কোনো ব্যক্তি তার নিজ ঘরে প্রবেশ করে, তখন সে যেন বলে: "আল্লাহুম্মা ইন্নি আসআলুকা খাইরাল মাওলাজি ওয়া খাইরাল মাখরাজ। বিসমিল্লাহি ওয়ালাজনা, ওয়া বিসমিল্লাহি খারাজনা, ওয়া আলাল্লাহি রাব্বিনা তাওয়াক্কালনা।"
(অর্থ: হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে উত্তম প্রবেশ এবং উত্তম প্রস্থানের প্রার্থনা করি। আল্লাহর নামে আমরা প্রবেশ করলাম, এবং আল্লাহর নামে আমরা বের হলাম, আর আমাদের রব আল্লাহর ওপর আমরা ভরসা করলাম।)
অতঃপর সে যেন তার পরিবারবর্গকে সালাম দেয়।
226 - ` لأن يطعن في رأس رجل بمخيط من حديد خير من أن يمس امرأة لا تحل له `.
رواه الروياني في ` مسنده ` (227 / 2) : أنبأنا نصر بن علي: أنبأنا، أبي،
أنبأنا شداد ابن سعيد عن أبي العلاء قال: حدثنى معقل بن يسار مرفوعا.
قلت: وهذا سند جيد، رجاله كلهم ثقات من رجال الشيخين غير شداد بن سعيد، فمن
رجال مسلم وحده، وفيه كلام يسير لا ينزل به حديثه عن رتبة الحسن، ولذلك فإن
مسلما إنما أخرج له في الشواهد وقال الذهبي في ` الميزان `: ` صالح الحديث `
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق يخطىء `.
وأبو العلاء هو يزيد بن عبد الله بن الشخير.
والحديث قال المنذري في ` الترغيب ` (3 / 66) :
` رواه الطبراني، والبيهقي، ورجال الطبراني ثقات رجال الصحيح `.
وقد روي مرسلا من حديث عبد الله بن أبي زكريا الخزاعي. قال: قال رسول الله
صلى الله عليه وسلم:
` لأن يقرع الرجل قرعا يخلص إلى عظم رأسه خير له من أن تضع امرأة يدها على رأسه
لا تحل له، ولأن يبرص الرجل برصا حتى يخلص البرص إلى عظم ساعده خير له من أن
تضع امرأة يدها على ساعده لا تحل له `.
أخرجه أبو نعيم في ` الطب ` (2 /
মা‘কিল ইবনু ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যদি কোনো পুরুষের মাথায় লোহার সূঁচ দ্বারা আঘাত করা হয়, তবে তা তার জন্য উত্তম, এমন নারীকে স্পর্শ করা থেকে যে তার জন্য হালাল নয়।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরও বলেছেন: কোনো পুরুষের মাথায় এমন ক্ষত হওয়া, যা তার মাথার হাড়ে পৌঁছে যায়, তা তার জন্য উত্তম, এমন নারীর হাত তার মাথার ওপর রাখা থেকে যে তার জন্য হালাল নয়। আর পুরুষের কুষ্ঠরোগে আক্রান্ত হওয়া, যতক্ষণ না সেই রোগ তার বাহুর হাড়ে পৌঁছে যায়, তা তার জন্য উত্তম, এমন নারীর হাত তার বাহুর ওপর রাখা থেকে যে তার জন্য হালাল নয়।
227 - ` ما يمنعك أن تسمعي ما أوصيك (به) ؟ (أن) تقولي إذا أصبحت وإذا أمسيت:
يا حي يا قيوم برحمتك أستغيث، وأصلح لي شأني كله، ولا تكلني إلى نفسي طرفة
عين أبدا `.
رواه ابن السني في ` عمل اليوم والليلة ` (رقم 46) والبيهقي في ` الأسماء `
(112) من طريق زيد بن الحباب: حدثنا عثمان بن موهب (في الأصل: وهب وهو
تصحيف) مولى بني هاشم قال: سمعت أنس بن مالك رضي الله عنه يقول: قال
رسول الله صلى الله عليه وسلم لفاطمة رضي الله عنها: فذكره.
قلت: وهذا سند حسن، رجاله كلهم ثقات غير عثمان بن موهب وهو غير عثمان
بن عبد الله بن موهب قال ابن أبي حاتم (3 / 169) عن أبيه: ` صالح الحديث `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` مقبول `.
والحديث رواه النسائي أيضا في ` الكبرى ` له والبزار كما في ` الترغيب `
(1 / 232) وقال: ` بإسناد صحيح `.
ورواه الحاكم أيضا وصححه على شرط الشيخين ووافقه الذهبي لوهم وقع لهما بينته
في ` التعليق الرغيب `.
وقال الهيثمي (10 / 117) :
` رواه البزار ورجاله رجال الصحيح غير عثمان بن موهب وهو ثقة `.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “কী তোমাকে নিষেধ করছে যে তুমি আমার উপদেশ শুনবে না? (আমি তোমাকে উপদেশ দিচ্ছি যে) তুমি যেন সকাল হলে ও সন্ধ্যা হলে এই দু’আ পাঠ করো:
**‘ইয়া হাইয়্যু ইয়া ক্বাইয়্যুমু বিরাহমাতিকা আস্তাগীসু, ওয়া আসলিহ্ লী শা’নী কুল্লাহু, ওয়া লা তাকিলনী ইলা নাফসী তারফাতা ‘আইনিন আবাদা’**
(অর্থ): হে চিরঞ্জীব, হে সর্বসত্তার ধারক, আমি তোমার দয়ার মাধ্যমে সাহায্য প্রার্থনা করছি। আর আমার সকল বিষয়কে শুধরে দাও এবং আমাকে এক মুহূর্তের জন্যও আমার নিজের ওপর ছেড়ে দিও না।”
228 - ` لا يقوم الرجل للرجل من مجلسه، ولكن افسحوا يفسح الله لكم `.
أخرجه الإمام أحمد في ` مسنده ` (2 / 483) : حدثنا سريج حدثنا فليح عن أيوب
بن عبد الرحمن بن صعصعة الأنصاري عن يعقوب بن أبي يعقوب عن أبي هريرة
مرفوعا.
قلت: وهذا سند حسن، رجاله موثقون.
أما يعقوب بن أبي يعقوب، فقال في ` التهذيب `:
` قال أبو حاتم: صدوق، وذكره ابن حبان في الثقات `.
قلت: وقد ترجمه ابن أبي حاتم في ` الجرح والتعديل `، لكن لم يذكر قول أبيه
` صدوق `.
وأما ابن صعصعة، فقد ذكره ابن حبان في ` الثقات ` وروى عنه جماعة، وقال
الخزرجي في ` الخلاصة ` والحافظ في ` التقريب `: ` صدوق `.
وأما بقية الرجال فمن رجال الشيخين.
وللحديث شاهدان ذكرهما الحافظ في ` الفتح ` (11 / 53) وفاته هذا الحديث
المشهود له! فقال تعليقا على قول البخاري:
` وكان ابن عمر يكره أن يقوم الرجل من مجلسه، ثم يجلس مكانه ` قال:
` أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` بلفظ: وكان ابن عمر إذا قام له رجل من
مجلسه لم يجلس فيه. وكذا أخرجه مسلم. وقد ورد ذلك عن ابن عمر مرفوعا.
أخرجه أبو داود من طريق أبي الخصيب واسمه زياد بن عبد الرحمن عن ابن عمر: جاء
رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقام له رجل من مجلسه فذهب ليجلس، فنهاه
رسول الله صلى الله عليه وسلم. وله أيضا من طريق سعيد بن أبي الحسن: جاءنا
أبو بكرة فقام له رجل من مجلسه، فأبى أن يجلس فيه وقال: إن النبي صلى الله
عليه وسلم نهى عن ذا. وأخرجه الحاكم وصححه من هذا الوجه `.
قلت: ما عزاه للأدب المفرد هو عنده (رقم 1153) بسند صحيح على شرط الشيخين
وهو عقب حديثه المرفوع بلفظ:
(نهى النبي صلى الله عليه وسلم أن يقيم الرجل من المجلس ثم يجلس فيه) .
وهو عند مسلم أيضا.
وما عزاه لأبي داود من حديث ابن عمر هو عنده (4 / 406) بإسناد رجاله كلهم
ثقات غير أبي الخصيب قال أبو داود عقبه كما قال الحافظ:
` اسمه زياد بن عبد الرحمن `.
قلت: وقد أورده ابن أبي حاتم (1 / 2 / 538) ولم يذكر جرحا ولا تعديلا،
وذكره ابن حبان في ` الثقات ` وفي ` التقريب `: ` مقبول `.
والحديث سكت عليه المنذري في ` مختصر السنن ` (7 / 184) ، فهو في
الشواهد لا
بأس به إن شاء الله تعالى. وصححه أحمد شاكر في تعليقه على ` المسند `!
وأما حديث أبي بكرة، فرجاله ثقات أيضا من رجال الشيخين غير أبي عبد الله مولى
لآل أبي بردة فحاله كحال أبي الخصيب، أورده ابن أبي حاتم أيضا (4 / 2 / 401)
ولم يذكر فيه جرحا، وقال الحافظ: ` مقبول `. وفي ` الفتح ` (11 / 53) :
` بصري لا يعرف `.
ومن هذا الوجه أخرجه الحاكم (4 / 272) لكن لفظه مثل لفظ ابن عمر الذي في
الصحيح: ` لا يقيم الرجل الرجل من مجلسه ثم يقعد فيه `.
وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: ومداره على شعبة عن عبد ربه بن سعيد عن أبي عبد الله مولى آل أبي بردة
عن سعيد بن أبي الحسن.
وقد اختلف عليه مسلم بن إبراهيم عند أبي داود، وعمرو بن مرزوق عند الحاكم،
فقال الأول عنه بلفظ نحو لفظ ابن عمر عند أبي داود كما تقدم، وقال عمرو
بن مرزوق مثل لفظ ابن عمر في ` الصحيح `، وإذا اختلف هذا مع مسلم بن إبراهيم
فمسلم أرجح رواية من عمرو، لأن مسلما ثقة مأمون، وأما عمرو فثقة له أوهام
كما في التقريب، فروايته مرجوحة. والله أعلم.
وجملة القول: إن حديث أبي هريرة صحيح بشاهديه المذكورين.
وهو ظاهر الدلالة على أنه ليس من الآداب الإسلامية أن يقوم الرجل عن مجلسه
ليجلس فيه غيره، يفعل ذلك احتراما له، بل عليه أن يفسح له في المجلس وأن
يتزحزح له إذا كان الجلوس على الأرض بخلاف ما إذا كان على الكرسي، فذلك غير
ممكن، فالقيام والحالة هذه مخالف لهذا التوجيه النبوي الكريم. ولذلك كان
ابن عمر يكره أن يقوم الرجل من مجلسه، ثم يجلس هو فيه كما تقدم عن البخاري،
والكراهة هو أقل ما يدل عليه قوله ` لا يقوم الرجل للرجل ... ` فإنه نفي بمعنى
النهي، والأصل فيه التحريم لا الكراهة. والله أعلم.
ثم إنه لا منافاة بين هذا الحديث وبين حديث ابن عمر المتقدم في ` الصحيح `،
لأن فيه زيادة حكم عليه، والأصل أنه يؤخذ بالزائد فالزائد من الأحكام،
وحديث ابن عمر إنما فيه النهي عن الإقامة، وليس فيه نهي الرجل عن القيام،
بخلاف هذا الحديث ففيه هذا النهي وليس فيه النهي الأول إلا ضمنا، فإنه إذا
كان قد نهي عن القيام فلأن ينهى عن الإقامة من باب أولى. وهذا بين لا يخفى إن
شاء الله تعالى، وعليه يدل حديث ابن عمر فإنه مع أنه روى النهي عن الإقامة
كان يكره الجلوس في مجلس من قام عنه له، وإن كان هو لم يقمه، ولعل ذلك سدا
للذريعة وخشية أن يوحي إلى الجالس بالقيام ولو لم يقمه مباشرة والله أعلم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:]
"কোনো ব্যক্তি যেন অপর ব্যক্তির জন্য তার আসন থেকে উঠে না যায়, বরং তোমরা (অন্যের জন্য) জায়গা প্রশস্ত করে দাও, আল্লাহ তোমাদের জন্য (সবকিছু) প্রশস্ত করে দেবেন।"
229 - ` إذا دخل أحدكم المسجد والناس ركوع، فليركع، حين يدخل ثم يدب راكعا حتى
يدخل في الصف، فإن ذلك السنة `.
رواه الطبراني في ` الأوسط ` (1 / 33 / 1 من ` زوائد المعجمين `: الأوسط
والصغير) :
حدثنا محمد بن نصر حدثنا حرملة بن يحيى حدثنا ابن وهب أخبرني ابن جريج عن عطاء
أنه سمع ابن الزبير على المنبر يقول: فذكره موقوفا.
قال عطاء: وقد رأيته يصنع ذلك، قال ابن جريج وقد رأيت عطاء يصنع ذلك.
قال الطبراني:
` لا يروى عن ابن الزبير إلا بهذا الإسناد تفرد به حرملة `.
قلت: وهو ثقة من رجال مسلم، ومن فوقه ثقات من رجال الشيخين، ومحمد بن نصر
هو ابن حميد الوازع البزار، وسماه غير الطبراني أحمد كما ذكر الخطيب
(ج 3 ترجمته 1411، وج 5 ترجمته 2625) وقال: وكان ثقة.
والحديث قال الهيثمي (2 / 96) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` ورجاله رجال الصحيح `.
قلت: فالسند صحيح إن كان ابن جريج سمعه من عطاء فقد كان مدلسا وقد عنعنه،
ولكن قوله في آخر الحديث: ` وقد رأيت عطاء يصنع ذلك ` مما يشعر أنه تلقى ذلك
عنه مباشرة، لأنه يبعد جدا أن يكون سمعه عنه بالواسطة ثم يراه يعمل بما حدث به
عنه، ثم لا يسأله عن الحديث ولا يعلو به. هذا بعيد جدا، فالصواب أن الإسناد
صحيح.
والحديث أخرجه الحاكم (1 / 214) وعنه البيهقي (3 / 106) من طريق سعيد
بن الحكم بن أبي مريم أخبرني عبد الله بن وهب به.
وقال الحاكم:
` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
ومما يشهد لصحته عمل الصحابة به من بعد النبي صلى الله عليه وسلم، منهم
أبو بكر الصديق، وزيد بن ثابت، وعبد الله بن مسعود.
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তোমাদের কেউ মসজিদে প্রবেশ করে আর লোকেরা রুকূ অবস্থায় থাকে, তখন সে যেন প্রবেশ করা মাত্রই রুকূ করে নেয়, এরপর সে রুকূ অবস্থায় কাতার পর্যন্ত হেঁটে যায়। কারণ এটাই হলো সুন্নাত।
Null
অনুবাদের জন্য কোনো আরবি হাদিস টেক্সট প্রদান করা হয়নি।
231 - 232) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 32 /
1) والبيهقي في ` سننه ` (2 /
২৩১ - ২৩২) এবং (এটি) আত-তাবারানীর ’আল-মু’জাম আল-কাবীর’ গ্রন্থে (৩/৩২/১) এবং আল-বাইহাকীর তাঁর ’সুনান’ গ্রন্থে (২/-) (রয়েছে)।
232 - ` ما من صلاة مفروضة إلا وبين يديها ركعتان `.
أخرجه عباس الترقفي في ` حديثه ` (ق 41 / 1) وابن نصر في ` قيام الليل `
(ص 26) والروياني في ` مسنده ` (ق 238 / 1) وابن حبان في ` صحيحه `
(رقم 615) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (ج 69 / 210 / 2) وابن عدي في
` الكامل ` (ق 46 / 2) والدارقطني في ` سننه ` (ص 99) من طريقين عن ثابت
بن عجلان عن سليم بن عامر عن عبد الله بن الزبير مرفوعا.
وقال ابن عدي: ` ثابت بن عجلان ليس حديثه بالكثير `.
قلت: هو ثقة كما قال الإمام أحمد وابن معين. وقال دحيم والنسائي: ` ليس
به بأس ` ولذلك أشار الذهبي في ترجمته إلى أنه صحيح الحديث.
وقال الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق ` وأشار في ` التهذيب ` إلى أنه ثقة
وقال: ` مثل هذا لا يضره إلا مخالفته الثقات لا غير، فيكون حديثه حينئذ شاذا
`.
قلت: فحديثه هذا صحيح، لأنه لم يخالف فيه الثقات، بل وافق فيه حديث عبد الله
بن مغفل مرفوعا بلفظ:
(بين كل أذانين صلاة. قال في الثالثة: لمن شاء) .
أخرجه الستة وابن نصر.
وقد استدل بالحديث بعض المتأخرين على مشروعية صلاة سنة الجمعة القبلية،
وهو استدلال باطل، لأنه قد ثبت في البخاري وغيره أنه لم يكن في عهد النبي
صلى الله عليه وسلم يوم الجمعة سوى الأذان الأول والإقامة، وبينهما الخطبة
كما فصلته في رسالتي ` الأجوبة النافعة `. ولذلك قال البوصيري في ` الزوائد `
وقد ذكر حديث عبد الله هذا (ق 72 / 1) وأنه أحسن ما يستدل به لسنة الجمعة
المزعومة! قال:
` وهذا متعذر في صلاته صلى الله عليه وسلم، لأنه كان بين الأذان والإقامة
الخطبة، فلا صلاة حينئذ بينهما `.
وكل ما ورد من الأحاديث في صلاته صلى الله عليه وسلم سنة الجمعة القبلية،
لا يصح منها شيء البتة، وبعضها أشد ضعفا من بعض كما بينه الزيلعي في
` نصب الراية ` ` 2 /
আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন]:
“এমন কোনো ফরয সালাত নেই যার পূর্বে দু’রাকাত (নফল সালাত) নেই।”
[এই হাদীসটি আব্দুল্লাহ ইবনু মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিম্নোক্ত হাদীসের সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ, যেখানে তিনি মারফূ’ সূত্রে বর্ণনা করেন]:
“(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:) প্রত্যেক দুই আযানের (আযান ও ইকামতের) মধ্যবর্তী সময়ে সালাত রয়েছে।”
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) তৃতীয়বারে বললেন:
“যে ব্যক্তি ইচ্ছা করে, তার জন্য (সালাত রয়েছে)।”
233 - ` صلوا قبل المغرب ركعتين. ثم قال في الثالثة: لمن شاء، خاف أن يحسبها الناس
سنة `.
أخرجه ابن نصر في ` قيام الليل ` (28) :
حدثني عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث بن سعيد حدثني أبي حدثنا حسين عن
ابن بريدة أن عبد الله المزني رضي الله عنه حدثه به، وقال مختصره العلامة
المقريزي أحمد بن علي:
` هذا إسناد صحيح على شرط مسلم، فإن عبد الوارث بن عبد الصمد احتج به مسلم،
والباقون احتج بهم الجماعة، وقد صح في ` ابن حبان ` حديث آخر أن النبي
صلى الله عليه وسلم صلى ركعتين قبل المغرب `.
قلت: وهو صحيح كما قال، إلا أن جعله ما في ابن حبان حديثا آخر، فيه نظر،
ظاهر ذلك لأنه عنده من هذا الوجه بهذا المتن تماما، فكيف يكون حديثا آخر،
والأعجب من ذلك أن المقريزي قد ساقه من طريق ابن حبان هكذا:
` قال ابن حبان: أخبرني محمد بن خزيمة حدثنا عبد الوارث بن عبد الصمد ابن عبد
الوارث حدثني أبي حدثنا حسين المعلم عن عبد الله بن بريدة أن عبد الله المزني
رضي الله عنه حدثه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى قبل المغرب ركعتين `!
والحديث في ` موارد الظمآن إلى زوائد ابن حبان ` برقم (617) ، وقال عقبه:
` قلت: فذكر الحديث `.
فهذا يشير إلى أن الحديث عند ابن حبان ليس بهذا القدر الذي نقله المقريزي،
بل له تتمة، ومن الظاهر أنها قوله ` ثم قال: صلوا ... ` وعليه فالحديث يمكن
أن يقال في تخريجه.
` رواه ابن نصر وابن حبان في صحيحه `.
وهو عند البخاري وغيره من ` الستة ` من طرق أخره عن عبد الوارث بن سعيد جد
عبد الوارث بن عبد الصمد بن عبد الوارث بن سعيد عن حسين المعلم به دون قوله في
أوله: ` صلى قبل المغرب ركعتين `.
(فائدة) : وفي الحديث دليل على أن أمر النبي صلى الله عليه وسلم على الوجوب
حتى يقوم دليل الإباحة، وكذلك نهيه على التحريم إلا ما يعرف إباحته. كذا في
` شرح السنة ` (1 /
আব্দুল্লাহ আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "তোমরা মাগরিবের (ফরয সালাতের) পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করো।" এরপর তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) তৃতীয়বার বললেন, "যে ব্যক্তি ইচ্ছা করে (সে যেন আদায় করে)।" (তিনি এমনটি বললেন,) এই আশঙ্কায় যে, লোকেরা যেন এটিকে সুন্নাত (বা বাধ্যতামূলক) হিসেবে গণ্য না করে।
234 - ` كان المؤذن يؤذن على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم لصلاة المغرب، فيبتدر
لباب أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم السواري، يصلون الركعتين قبل المغرب
حتى يخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم وهم يصلون، فيجيء الغريب فيحسب أن
الصلاة قد صليت من كثرة من يصليهما وكان بين الأذان والإقامة يسير `.
أخرجه البخاري (2 / 85) وابن نصر (ص 26) وأحمد (3 / 280) من طرق عن
شعبة عن عمرو بن عامر قال: سمعت أنس بن مالك يقول: فذكره.
والسياق لابن نصر، والزيادة الثانية للبخاري وأحمد، ورواية لابن نصر
واللفظ له.
وأخرجه مسلم (2 / 212) وأبو عوانة في ` صحيحه ` (2 / 265) والبيهقي
(2 / 475) من طريق عبد العزيز بن صهيب عن أنس به نحوه، وفيه الزيادة الأولى
وله عند ابن نصر ` والمسند ` (3 / 129، 199، 282) طرق أخرى عن أنس نحوه.
وفي هذا الحديث نص صريح على مشروعية الركعتين قبل صلاة المغرب، لتسابق كبار
الصحابة عليهما، وإقرار النبي صلى الله عليه وسلم لهم على ذلك. ويؤيده عموم
الحديثين قبله. وإلى استحبابهما ذهب الإمام أحمد وإسحاق وأصحاب الحديث.
ومن خالفهم كالحنفية وغيرهم لا حجة لديهم تستحق النظر فيها سوى ما روى شعبة
عن أبي شعيب عن طاووس قال:
` سئل ابن عمر عن الركعتين قبل المغرب؟ فقال: ما رأيت أحدا على عهد رسول الله
صلى الله عليه وسلم يصليهما `.
أخرجه أبو داود (1 / 202) وعنه البيهقي (2 /
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে যখন মুয়াজ্জিন মাগরিবের সালাতের জন্য আযান দিতেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ দ্রুত খুঁটিগুলোর (আড়াল) দিকে ছুটে যেতেন এবং মাগরিবের (ফরযের) পূর্বে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। এমনকি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (ঘর থেকে) বের হতেন তখনও তাঁরা সালাত আদায়রত থাকতেন। যারা সেই সালাত আদায় করতেন তাদের আধিক্যের কারণে কোনো অপরিচিত ব্যক্তি (মসজিদে) প্রবেশ করলে সে মনে করত যে (ফরয) সালাত আদায় হয়ে গেছে। আর আযান ও ইকামতের মাঝে সামান্য বিরতি দেওয়া হতো।
235 - ` مرت بي فلانة، فوقع في قلبي شهوة النساء، فأتيت بعض أزواجي فأصبتها، فكذلك
فافعلوا، فإنه من أماثل أعمالكم إتيان الحلال `.
رواه أحمد (4 / 231) والطبراني في ` الأوسط ` (1 / 168 /
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার পাশ দিয়ে একজন মহিলা যাচ্ছিল, ফলে আমার অন্তরে নারীর প্রতি কামভাব সৃষ্টি হলো। তখন আমি আমার স্ত্রীদের একজনের কাছে গেলাম এবং তার সাথে মিলিত হলাম। সুতরাং তোমরাও অনুরূপ কাজ করো। কেননা হালাল পন্থায় (স্ত্রীর সাথে) মিলিত হওয়া তোমাদের সর্বোত্তম আমলসমূহের অন্যতম।"
236 - ` طهروا أفنيتكم فإن اليهود لا تطهر أفنيتها `.
رواه الطبراني في ` الأوسط ` (11 / 2 من ` الجمع بين زوائد المعجمين `) :
حدثنا علي بن سعيد حدثنا زيد بن أخزم حدثنا أبو داود الطيالسي حدثنا إبراهيم
بن سعد عن الزهري عن عامر بن سعد عن أبيه مرفوعا، وقال:
` لم يروه عن الزهري إلا إبراهيم ولا عنه إلا الطيالسي تفرد به زيد `.
قلت: وهو ثقة حافظ وبقية رجاله ثقات رجال مسلم غير علي بن سعيد وهو الرازي
قال الذهبي: ` حافظ رحال جوال `.
قال الدارقطني ليس بذاك، تفرد بأشياء. قال ابن يونس: كان يفهم ويحفظ `
وزاد الحافظ في ` اللسان `:
` وقال مسلمة بن قاسم: وكان ثقة عالما بالحديث `.
وقال المناوي: ` قال الهيثمي: رجاله رجال الصحيح خلا شيخ الطبراني `.
قلت: كأن الهيثمي توقف فيه فسكت عنه، وهو مختلف فيه. ومثله حسن الحديث إذا
لم يخالف، لاسيما إذا لم يتفرد بما روى، وهذا الحديث كذلك.
فقد أخرجه الترمذي (2 / 131) من طريق خالد بن إلياس - ويقال ابن إياس - عن
صالح بن أبي حسان قال: سمعت سعيد بن المسيب عن صالح بن أبي حسان قال: سمعت
سعيد بن المسيب يقول: إن الله طيب يحب الطيب، نظيف يحب النظافة، كريم يحب
الكرم، جواد يحب الجود، فنظفوا - أراه قال - أفنيتكم، ولا تشبهوا باليهود،
قال. فذكرت ذلك لمهاجر بن مسمار فقال: حدثنيه عامر ابن سعد عن أبيه عن النبي
صلى الله عليه وسلم مثله، إلا أنه قال: نظفوا أفنيتكم `.
وقال الترمذي: ` هذا حديث غريب، وخالد بن إلياس يضعف `.
قلت: وفي التقريب: ` متروك الحديث `.
والحديث أورده ابن القيم في ` زاد المعاد ` (3 / 208) فقال:
` وفي مسند البزار عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: إن الله طيب ...
الحديث فنظفوا أفناءكم وساحاتكم، ولا تشبهوا باليهود، يجمعون الأكباء في
دورهم `.
فلا أدري إذا كان عند البزار من طريق خالد هذا أم من طريق أخرى.
فقد وجدت له طريقا آخر، ولكنه مما لا يفرح به، أخرجه الدولابي في ` الكنى `
(2 / 16) عن أبي الطيب هارون بن محمد قال: حدثنا بكير بن مسمار عن عامر ابن
سعد به. ورجاله كلهم ثقات غير أبي الطيب هذا فليس بطيب! قال ابن معين: كان
كذابا.
ووجدت للحديث شاهدا بلفظ ` نظفوا أفنيتكم فإن اليهود أنتن الناس `.
رواه وكيع في ` الزهد ` (2 / 65 / 1) : حدثنا إبراهيم المكي عن عمرو ابن
دينار عن أبي جعفر مرفوعا.
وهذا سند ضعيف، إبراهيم المكي هو ابن يزيد الخوزي متروك الحديث كما في
` التقريب `. وأبو جعفر لم أعرفه. والظاهر أنه تابعي فهو مرسل.
وبالجملة، فطرق هذا الحديث واهية، إلا الأولى، فهي حسنة، فعليها العمدة،
ويستثنى من ذلك طريق البزار لما سبق. والله أعلم.
(الأفنية) جمع (فناء) وهو الساحة أمام البيت.
সাদ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
“তোমরা তোমাদের আঙিনা (ঘরের চারপাশের স্থান) পরিষ্কার-পরিচ্ছন্ন রাখো। কেননা, ইহুদিরা তাদের আঙিনা পরিচ্ছন্ন রাখে না।”
237 - ` كان إذا صلى الفجر أمهل، حتى إذا كانت الشمس من ههنا - يعني من قبل المشرق -
مقدارها من صلاة العصر من ههنا - من قبل المغرب - قام فصلى ركعتين ثم يمهل،
حتى إذا كانت الشمس من ههنا يعني من قبل المشرق، مقدارها من صلاة الظهر
من
ههنا - يعني من قبل المغرب - قام فصلى أربعا، وأربعا قبل الظهر إذا زالت
الشمس، وركعتين بعدها، وأربعا قبل العصر، يفصل بين كل ركعتين بالتسليم على
الملائكة المقربين، والنبيين، ومن تبعهم من المسلمين، ` يجعل التسليم في
آخره `.
أخرجه أحمد (رقم 650 / 1375) وابنه (1202) والترمذي (2 / 294،
আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি যখন ফজরের সালাত আদায় করতেন, তখন বিরতি নিতেন। এমনকি যখন সূর্য এদিক থেকে—অর্থাৎ পূর্ব দিক থেকে—এতটুকু উপরে উঠত যে, তা পশ্চিম দিক থেকে আসরের সালাতের সূর্যের অবস্থানের সমপরিমাণ হতো, তখন তিনি দাঁড়িয়ে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। অতঃপর তিনি আবার বিরতি নিতেন।
এমনকি যখন সূর্য এদিক থেকে—অর্থাৎ পূর্ব দিক থেকে—এতটুকু উপরে উঠত যে, তা পশ্চিম দিক থেকে যুহরের সালাতের সূর্যের অবস্থানের সমপরিমাণ হতো, তখন তিনি দাঁড়িয়ে চার রাকাত সালাত আদায় করতেন।
আর যখন সূর্য হেলে পড়ত (অর্থাৎ যুহরের সময় শুরু হতো), তখন তিনি যুহরের পূর্বে চার রাকাত এবং পরে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন। আর আসরের পূর্বে চার রাকাত (সালাত আদায় করতেন)। তিনি প্রতি দুই রাকাতের মাঝে নৈকট্যশীল ফেরেশতাগণ, নবীগণ এবং তাঁদের অনুগামী মুসলিমদের প্রতি সালাম প্রদানের মাধ্যমে বিরতি দিতেন। তিনি সালামকে এর (দুই রাকাতের) শেষে রাখতেন।
238 - ` قضى أن على أهل الحوائط حفظها في النهار، وأن ما أفسدت المواشي بالليل ضامن
على أهلها `.
أخرجه مالك في ` الموطأ ` (3 / 220) عن ابن شهاب عن حرام بن سعد ابن محيصة
أن ناقة للبراء بن عازب دخلت حائط رجل فأفسدت فيه، فقضى رسول الله صلى الله
عليه وسلم ... فذكره.
قلت: وهذا سند مرسل صحيح، وقد أخرجه الطحاوي (2 / 116) والبيهقي
(8 / 341) وأحمد (5 / 435) من طريق مالك به.
وتابعه الليث بن سعد عن ابن شهاب به مرسلا.
أخرجه ابن ماجه (2 /
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই ফায়সালা দিয়েছেন যে, বাগানের মালিকদের উপর দায়িত্ব হলো দিনের বেলা সেগুলো পাহারা দেওয়া। আর রাতের বেলা গৃহপালিত পশুরা (বাগানে) যা ক্ষতি করবে, তার ক্ষতিপূরণের দায়ভার পশুর মালিকদের উপর বর্তাবে।
239 - ` إذا رميتم الجمرة فقد حل لكم كل شيء إلا النساء `.
أخرجه أحمد (1 / 234) : حدثنا وكيع حدثنا سفيان عن سلمة عن الحسن العرني
عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره، ثم قال
(1 / 344) : حدثنا وكيع وعبد الرحمن قالا: حدثنا سفيان به. إلا أنه لم
يقل: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وزاد في آخره في الموضعين:
` فقال رجل: والطيب (يا أبا العباس) ، فقال ابن عباس: أما أنا فقد رأيت
رسول الله صلى الله عليه وسلم يضمخ رأسه بالمسك، أفطيب ذاك أم لا؟ `.
ثم أخرجه (1 / 369) : حدثنا يزيد أنبأنا سفيان به موقوفا أيضا قال:
` سئل ابن عباس عن الرجل إذا رمى الجمرة أيتطيب؟ فقال: أما أنا.... ` الحديث
وأخرجه النسائي (2 / 52) وابن ماجه (2 / 245) من طريق يحيى بن سعيد
وابن ماجه أيضا عن وكيع وهو وأبو يعلى في ` مسنده ` (ق 143 / 1) عن
عبد الرحمن، والبيهقي (5 / 133) عن ابن وهب و (5 / 204) عن أبي داود
الحفري كلهم عن سفيان به مثل رواية عبد الرحمن عند أحمد الموقوفة مع الزيادة
وقد رواه الطحاوي (1 / 419) من طريق أبي عاصم عن سفيان به.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، لكنه منقطع بين الحسن العرني
وهو ابن عبد الله وبين ابن عباس فإنه لم يسمع منه كما قال أحمد، بل قال
أبو حاتم: لم يدركه. ثم إن أكثر الرواة عن سفيان أوقفوه على ابن عباس، ولم
يرفعه إلا وكيع في الرواية الأولى، وأما في روايته المقرونة مع عبد الرحمن
فهي موقوفة أيضا، وكذلك هي عند ابن ماجه. فالصواب أن الحديث مع انقطاعه
موقوف.
لكن له شاهد من حديث عائشة رضي الله عنها قالت:
` طيبت رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي بذريرة لحجة الوداع للحل والإحرام،
حين أحرم، وحين رمى جمرة العقبة يوم النحر، قبل أن يطوف بالبيت `.
أخرجه أحمد (6 / 244) عن عمر بن عبد الله بن عروة أنه سمع عروة والقاسم
يخبران عن عائشة به.
قلت: وهذا سند صحيح على شرط الشيخين، وأصله عندهما.
وقد تابعه الزهري عن عروة وحده به نحوه.
أخرجه النسائي (2 /
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"যখন তোমরা জামরাহ (আকাবাহ) তে পাথর নিক্ষেপ করবে, তখন তোমাদের জন্য মহিলাদের (অর্থাৎ স্ত্রী সহবাস) ব্যতীত সবকিছু হালাল হয়ে যাবে।"
(হাদীসের শেষে উল্লেখ আছে যে) একজন লোক (ইবনু আব্বাসকে) জিজ্ঞেস করল: "(রমি করার পর) সুগন্ধি সম্পর্কে কী বিধান, হে আবুল আব্বাস?"
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উত্তর দিলেন: "আমি তো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি যে তিনি তাঁর মাথায় মিশক (কস্তুরী) মাখছিলেন। এটা কি সুগন্ধি ছিল, নাকি ছিল না?"
(এই বিষয়ে আরও সমর্থনে) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: "আমি আমার নিজ হাতে বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ইহরামের জন্য হালাল হওয়া এবং ইহরাম বাঁধার সময় ’যারীরা’ (এক প্রকার সুগন্ধি) মাখিয়েছিলাম—যখন তিনি ইহরাম বেঁধেছিলেন, এবং কুরবানীর দিন যখন তিনি জামরাতুল আকাবায় পাথর নিক্ষেপ করেছিলেন, বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করার আগে (অর্থাৎ হালাল হওয়ার সময়ও আমি সুগন্ধি মাখিয়েছিলাম)।”
240 - ` أيما رجل ظلم شبرا من الأرض كلفه الله عز وجل أن يحفره حتى يبلغ آخر سبع
أرضين، ثم يطوقه إلى يوم القيامة حتى يقضى بين الناس `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (1167) وأحمد (4 / 173) وكذا ابنه عن زائدة
عن الربيع بن عبد الله عن أيمن بن نابل - قال ابن حبان: ابن ثابت - عن
يعلى بن مرة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: وهذا سند جيد، رجاله ثقات معروفون غير أيمن، فإن كان هو ابن نابل كما
في ` المسند ` فإنه مشهور وثقه جماعة وروى له البخاري متابعة. وإن كان هو
ابن ثابت كما في ابن حبان فقال أبو داود: لا بأس به، وذكره ابن حبان في
` الثقات `. ويرجح هذا عندي شيئان:
الأول: أن ابن أبي حاتم قد قال في ترجمته (1 / 1 / 319) :
` روى عن ابن عباس ويعلى بن مرة، وعنه أبو يعفور عبد الرحمن بن عبيد بن
نسطاس والربيع بن عبد الله `.
ثم ترجم لأيمن بن نابل وذكر أنه روى عن قدامة بن عبد الله الكلابي وطاووس
وغيره من التابعين. فلم يذكر هو ولا غيره أنه روى عن يعلى بن مرة، ولا ذكر
في الرواة عنه الربيع بن عبد الله.
الثاني: أن رواية أبي يعفور عنه في ` المسند ` (4 / 172 / 173) ، لكنه وقع
فيه ` أبو يعقوب ` وهو تصحيف، وكذلك تصحف في نسختين من ` الجرح والتعديل `
كما نبه عليه محققه العلامة عبد الرحمن المعلمي في ترجمة ابن ثابت
هذا.
وقد يعكر على هذا الترجيح، أن الطبراني أخرجه في ` المعجم الصغير ` (ص 219)
من طريق أخرى عن إسماعيل بن أبي خالد عن الشعبي عن أيمن ابن نابل عن يعلى
بن مرة به نحوه، فهذا يرجح أنه ابن نابل. لكني أظن أنه محرف أيضا عن
` ابن ثابت `، فإن الشعبي إنما ذكروه في الرواة عن هذا لا عن ابن نابل.
والله أعلم.
والحديث قال الهيثمي في ` المجمع ` (4 / 175) :
` رواه أحمد والطبراني في الكبير والصغير بنحوه بأسانيد، ورجال بعضها رجال
الصحيح `.
ইয়ালা ইবনে মুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো ব্যক্তি (কারো) এক বিঘত পরিমাণ জমিও যুলুম করে দখল করবে, মহান আল্লাহ্ তাঁকে নির্দেশ দেবেন যেন সে তা খনন করে, যতক্ষণ না সে সাত জমিনের শেষ প্রান্ত পর্যন্ত পৌঁছায়। এরপর কিয়ামতের দিন তা তার গলায় বেড়ি বানিয়ে পরিয়ে দেওয়া হবে, যতক্ষণ না মানুষের মাঝে বিচার ফয়সালা শেষ হয়।”