হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2381)


2381 - ` النار جبار `.
أخرجه أبو داود (4594) والنسائي في ` العارية والوديعة ` من ` السنن الكبرى
` (10 / 1) وابن ماجة (2676) من طرق ثلاث عن عبد الرزاق عن معمر عن همام بن
منبه عن أبي هريرة مرفوعا. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وأخرجه أيضا أبو الحسن أحمد بن يوسف السلمي في ` صحيفة همام بن منبه ` (رقم 137
) : حدثنا عبد الرزاق به. وخالفهم محمد بن شبويه - وهو ابن إسحاق السجزي -
فقال: أخبرنا عبد الرزاق عن معمر عن الزهري عن أنس به. وقال: أخرجه ابن عدي
(374 / 2) ، وقال: ` ابن شبويه ضعيف يقلب الأحاديث ويسرقها `. ولم يتفرد
عبد الرزاق به، فقد قال أبو داود: حدثنا محمد بن المتوكل العسقلاني حدثنا عبد
الرزاق، ح، حدثنا جعفر بن مسافر التنيسي حدثنا زيد بن المبارك حدثنا عبد
الملك الصنعاني كلاهما عن معمر به. وهذا الإسناد الثاني رجاله صدوقون، غير
عبد الملك - وهو ابن محمد الصنعاني - فإنه لين الحديث. وأما محمد بن المتوكل
العسقلاني في الإسناد الأول، فهو ضعيف، ولكن ضعفه لا يضر الحديث لأنه متابع
من السلمي وغيره ممن أشرنا إليه آنفا. إذا عرفت هذا، فقول المناوي مضعفا
للحديث بعدما عزاه أصله لأبي داود وابن ماجة: ` وفيه محمد بن المتوكل
العسقلاني، أورده الذهبي في ` الضعفاء `، وقال: قال أبو حاتم: لين `.
فأقول فيه أوهام عديدة: الأول: أن العسقلاني هذا في إسناد ابن ماجة أيضا،
وليس كذلك، فإنه قال:
حدثنا أحمد بن الأزهر حدثنا عبد الرزاق ...
الثاني: أن أبا داود لم يروه إلا من طريق العسقلاني، الواقع خلافه كما سبق.
الثالث: أن العسقلاني تفرد به، وإلا لما سكت على ضعفه، والواقع أيضا أنه
متابع من جمع ثقات كما تقدم. والله أعلم. وأما قول ابن عدي: ` ليس هذا
الحديث في كتب عبد الرزاق، يعني: عن معمر عن همام عن أبي هريرة `. فلا يظهر
لي أنه علة قادحة، بعد ثبوته من عدة طرق عن عبد الرزاق، فليتأمل.
(جبار) : أي: هدر. قال المناوي: ` المراد بـ (النار) الحريق، فمن
أوقدها في ملكه لغرض، فطيرتها الريح فشعلتها في مال غيره، ولا يملك ردها،
فلا يضمنه `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আগুন (বা আগুনের অনিচ্ছাকৃত ক্ষতি) হলো জাবার।”

(এখানে ‘জাবার’ অর্থ হলো: যার ক্ষতিপূরণের দায় নেই বা ক্ষতিপূরণ হদর। ইমাম মানাভী (রাহিমাহুল্লাহ) এই শব্দটির ব্যাখ্যায় বলেছেন: এখানে আগুন দ্বারা উদ্দেশ্য হলো অগ্নিকাণ্ড। যদি কোনো ব্যক্তি কোনো বৈধ উদ্দেশ্যে তার নিজের মালিকানাধীন স্থানে আগুন জ্বালায়, অতঃপর বাতাস তা উড়িয়ে নিয়ে অন্যের সম্পত্তিতে লাগিয়ে দেয়, এবং ওই আগুন প্রতিরোধ করা বা নিভিয়ে দেওয়া যদি তার ক্ষমতার বাইরে থাকে, তবে সে ওই ক্ষতির জন্য দায়ী হবে না।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2382)


2382 - ` النصر مع الصبر والفرج مع الكرب وإن مع العسر يسرا وإن مع العسر يسرا `.
أخرجه الخطيب في ` التاريخ ` (10 / 287) والديلمي (4 /




বিজয় (আল্লাহর পক্ষ থেকে) ধৈর্যের সাথে আসে এবং কঠিন সংকটের সাথে আসে মুক্তি। আর নিশ্চয়ই কষ্টের সাথে স্বস্তি রয়েছে, নিশ্চয়ই কষ্টের সাথে স্বস্তি রয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2383)


2383 - ` النكاح من سنتي، فمن لم يعمل بسنتي فليس مني وتزوجوا، فإني مكاثر بكم
الأمم ومن كان ذا طول فلينكح ومن لم يجد فعليه بالصيام، فإن الصوم له وجاء `.
أخرجه ابن ماجة (1846) عن عيسى بن ميمون عن القاسم عن عائشة قالت: قال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. قلت: وإسناده ضعيف، رجاله ثقات،
غير عيسى بن ميمون - وهو المدني مولى القاسم بن محمد - وهو ضعيف كما في `
التقريب `. قلت: لكن الحديث صحيح، فقد جاء مفرقا في أحاديث:




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "বিবাহ (নিকাহ) আমার সুন্নাহর অংশ। সুতরাং, যে ব্যক্তি আমার সুন্নাহ অনুযায়ী আমল করে না, সে আমার দলভুক্ত নয়। তোমরা বিবাহ করো। কারণ আমি তোমাদের সংখ্যাধিক্যের কারণে অন্যান্য উম্মতদের উপর গর্ব করব। আর তোমাদের মধ্যে যার সামর্থ্য আছে, সে যেন বিবাহ করে। আর যে (বিবাহের) সামর্থ্য রাখে না, সে যেন রোজা পালন করে, কেননা রোজা তার জন্য ঢালস্বরূপ (কামনা নিবারক) হবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2384)


2384 - ` نهى أن تستر الجدر `.
أخرجه البيهقي (7 / 272) عن حكيم بن جبير عن علي بن حسين مرسلا.
قلت: وحكيم بن جبير ضعيف، كما في ` التقريب `، فهو مرسل ضعيف الإسناد.
قلت: لكن قد ثبت من غير وجه إنكار الرسول الله صلى الله عليه وسلم ستر الجدر
لغير حاجة، من ذلك حديث عائشة في قصة النمط، وقوله صلى الله عليه وسلم لها:
` أتسترين الجدار؟ ! إن الله لم يأمرنا فيما رزقنا أن نكسو الحجارة والطين `
. أخرجه مسلم وغيره، يزيد بعضهم على بعض، كما تراه مخرجا مبينا في ` آداب
الزفاف ` (ص




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
(তিনি যখন একটি নকশা করা পর্দা দিয়ে দেয়াল ঢেকেছিলেন,) তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি দেয়াল ঢেকে দিচ্ছো?! আল্লাহ্‌ আমাদেরকে যা রিযিক হিসেবে দিয়েছেন, তা দিয়ে আমরা যেন পাথর ও মাটিকে আবৃত করি, এর জন্য তিনি আমাদের নির্দেশ দেননি।"

(দ্রষ্টব্য: এই হাদিসটি অপ্রয়োজনীয়ভাবে সৌন্দর্য প্রদর্শনের উদ্দেশ্যে দেয়াল আবৃত করার ক্ষেত্রে প্রযোজ্য।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2385)


2385 - ` نهى أن يجلس الرجل بين الرجلين إلا بإذنهما `.
رواه أبو الحسن السكري الحربي في الثاني من ` الفوائد ` (159 / 2) والبيهقي
في ` السنن ` (3 / 232) عن عامر الأحول عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده
مرفوعا. وكذا رواه أبو عبد الله بن منده في ` الأمالي ` (40 / 1) وأبو
القاسم الحلبي السراج في ` حديث ابن السقاء ` (7 / 82 / 1) . قلت: وهذا
إسناد حسن على الخلاف المعروف في عمرو بن شعيب، وكذا في عامر، وهو ابن عبد
الواحد الأحول البصري، وقد احتج به مسلم وحسنه المناوي، وقال: ` فيكره
الجلوس دون إذنهما تنزيها، وتشتد الكراهية بين نحو والد وولده، وأخ وأخيه
، وصديق وصديقه `.




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কোনো ব্যক্তি যেন দুইজনের মাঝে তাদের অনুমতি ব্যতীত না বসে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2386)


2386 - ` نهى أن يصلي الرجل وهو عاقص شعره `.
أخرجه ابن ماجة (1 / 323) وأحمد (6 / 8 و 391) والدارمي (1 / 320) نحوه
عن مخول قال: سمعت أبا سعد - رجلا من أهل المدينة - يقول:
` رأيت أبا رافع
مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى الحسن وهو يصلي وقد عقص شعره، فأطلقه
، أو نهى عنه، وقال: ... ` فذكره. قلت: ورجاله ثقات رجال الشيخين، غير
أبي سعد المدني، قال الحافظ: ` قيل: هو شرحبيل بن سعد `. قلت: وليس ذلك
ببعيد، فإنه قد روى عن أبي رافع، وعنه مخول بن راشد ويكنى بأبي سعد، وهو
صدوق اختلط بآخره. وللحديث طريق أخرى، يرويه عمران بن موسى عن سعيد بن أبي
سعيد المقبري عن أبيه أنه رأى أبا رافع ... الحديث نحوه، وفيه أنه سمع رسول
الله صلى الله عليه وسلم يقول: ` ذلك كفل الشيطان: يعني مقعد الشيطان، يعني
مغرز ضفره `. وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (653) . وللحديث شاهد من حديث
أم سلمة: ` أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يصلي الرجل ورأسه معقوص `.
قال الهيثمي (2 / 86) : ` رواه الطبراني في ` الكبير `، ورجاله رجال (
الصحيح) `. قلت: وهو كما قال، باستثناء شيخ الطبراني (23 / 252) علي بن
عبد العزيز، وهو ثقة حافظ، فالسند صحيح. وروى أحمد (1 / 146) من طريق
أبي إسحاق عن الحارث عن علي مرفوعا في حديث: ` ولا تصل وأنت عاقص شعرك،
فإنه كفل الشيطان `. والحارث ضعيف، وفيما تقدم كفاية. قوله: ` معقوص
الشعر `: أي: مجموع بعضه إلى بعض كالمضفور وهذا
- بالطبع - لمن كان له شعر
طويل على عادة العرب قديما، وفي بعض البلاد حديثا، فنهى عن ذلك، وأمر
بنشره، ليكون سجوده أتم، كما يستفاد من ` النهاية ` وغيره. وانظر ` صفة
الصلاة ` (ص




আবু রাফে’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কোনো পুরুষকে এমন অবস্থায় সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন যখন তার চুল খোঁপা করা বা বাঁধা থাকে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: "এটা (চুলের খোঁপা বা বাঁধা অংশ) হলো শয়তানের আসন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2387)


2387 - ` كان إذا عطس حمد الله، فيقال له: يرحمك الله، فيقول: يهديكم الله ويصلح
بالكم `.
أخرجه أحمد (1 / 204) عن ابن لهيعة عن أبي الأسود قال: سمعت عبيد بن أم كلاب
عن عبد الله بن جعفر ذي الجناحين مرفوعا. قلت: وهذا إسناد ضعيف، عبيد
بن أم كلاب لا يدرى من هو؟ كما في ` تعجيل المنفعة `. وابن لهيعة سيء الحفظ
. والحديث قال الهيثمي (8 / 56) : ` رواه أحمد والطبراني، وفيه ابن لهيعة
، وهو حسن الحديث على ضعف فيه، وبقية رجاله ثقات `. كذا قال. لكن الحديث
قد صح من تعليمه صلى الله عليه وسلم لأمته من حديث أبي هريرة وغيره، فانظر `
الإرواء ` (772) . ثم وجدت له شاهدا من رواية إسرائيل عن أسباط بن عزرة عن
جعفر بن أبي وحشية عن مجاهد عن ابن عمر قال: ` كنا جلوسا عند النبي صلى الله
عليه وسلم فعطس، فحمد الله، فقالوا: يرحمك الله، فقال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: يهديكم الله ويصلح بالكم `.
أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (3 /
204 / 1) وقال الهيثمي (8 / 57) : ` وأسباط بن عزرة لم أعرفه، وبقية
رجاله رجال الصحيح `. قلت: وفي ` الجرح والتعديل ` لابن أبي حاتم (1 / 1 /
332) : ` أسباط بن زرعة. روى عن مجاهد. روى عن إسرائيل `. ولم يزد.
قلت: فالظاهر أنه هذا، لكن تحرف اسم أبيه في أحد الكتابين: ` المعجم ` أو `
الجرح `، والأقرب الأول، فإنه في ` التاريخ الكبير ` (1 / 2 / 53) وفق `
الجرح `. وأيهما كان فهو مجهول.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন হাঁচি দিতেন, তখন তিনি আল্লাহর প্রশংসা করতেন (অর্থাৎ, আলহামদুলিল্লাহ বলতেন)। তখন তাঁকে বলা হতো: ‘ইয়ারহামুকাল্লাহ’ (আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন)। তখন তিনি বলতেন: ‘ইয়াহদিকুমুল্লাহু ওয়া ইউসলিহু বালাকুম’ (আল্লাহ তোমাদের হেদায়েত দান করুন এবং তোমাদের সকল বিষয়/অবস্থা সংশোধন করে দিন)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2388)


2388 - ` نهى أن يمنع نقع البئر. يعني: فضل الماء `.
أخرجه أحمد (6 / 268) : حدثنا يعقوب قال: حدثنا أبي عن ابن إسحاق قال:
حدثني أبو الرجال محمد بن عبد الرحمن عن أمه عمرة بنت عبد الرحمن عن عائشة
زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره. وأخرجه أحمد أيضا (6 / 139) وابن حبان (1141) من طرق أخرى عن
محمد بن إسحاق به. ثم أخرجه أحمد (6 / 112 و 252) والحاكم (2 / 61) وابن
عدي (121 / 1) من طرق أخرى عن أبي الرجال بلفظ: ` لا يمنع نقع ماء في بئر `
، وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. قلت: وهو بهذه الطرق إلى أبي الرجال على
شرط الشيخين، وتابعه ابنه حارثة بن
أبي الرجال عن عمرة به. وزاد في أوله:
` لا منع فضل الماء، و ... `. وحارثة هذا ضعيف. لكن هذه الزيادة صحيحة
ثابتة من حديث أبي هريرة في ` الصحيحين ` وغيرهما، وهو مخرج بألفاظ عديدة في
` أحاديث البيوع `.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কূয়ার অতিরিক্ত পানি (অন্যকে ব্যবহার করতে) নিষেধ করতে বারণ করেছেন। অর্থাৎ, উদ্বৃত্ত পানি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2389)


2389 - ` نهى عن الثوم والبصل والكراث `.
أخرجه الطيالسي (2171) : حدثنا حماد بن سلمة قال: حدثنا بشر بن حرب الندبي
عن أبي سعيد مرفوعا. قلنا: يا أبا سعيد أحرام هو؟ قال: لا.
قلت: وهذا إسناد حسن، بشر بن حرب صدوق فيه لين كما في ` التقريب `. ويشهد
له حديث جابر قال: ` نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أكل البصل والكراث
`. أخرجه مسلم (2 / 80) . وفي رواية له: ` من أكل البصل والثوم والكراث
فلا يقربن مسجدنا ... ` الحديث. وأخرج ابن ماجة (3367) من طريق عثمان بن
نعيم عن المغيرة بن نهيك عن دخين الحجري أنه سمع عقبة بن عامر الجهني مرفوعا
بلفظه: ` لا تأكلوا البصل `. ثم قال كلمة خفية: ` النيىء `.
قلت: وعثمان والمغيرة مجهولان.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রসুন, পেঁয়াজ এবং কুররাছ (এক প্রকার লিক বা পিয়াজজাতীয় সবজি) খেতে নিষেধ করেছেন। আমরা (উপস্থিত সাহাবীরা) জিজ্ঞেস করলাম: হে আবু সাঈদ, এটি কি সম্পূর্ণ হারাম? তিনি বললেন: না।

[এই বিষয়ে জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে যে, "যে ব্যক্তি পেঁয়াজ, রসুন ও কুররাছ খাবে, সে যেন আমাদের মসজিদের ধারে না আসে..."]









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2390)


2390 - ` نهى عن أكل الضب `.
أخرجه أبو داود (2 / 143) والحافظ الفسوي في ` التاريخ ` (2 / 318)
والطبري في ` تهذيب الآثار ` (1 / 191 / 311) والبيهقي (9 / 326) وابن
عساكر (9 / 486 / 1) عن إسماعيل بن عياش عن ضمضم بن زرعة عن شريح بن عبيد عن
أبي راشد الحبراني عن عبد الرحمن بن شبل مرفوعا. وقال الطبري: ` لا يثبت
` وبين ذلك البيهقي بقوله: ` ينفرد به إسماعيل بن عياش وليس بحجة، وما مضى
في إباحته أصح منه `. يعني حديث ابن عمران وابن عباس في ` الصحيحين `
وغيرهما في قصة خالد بن الوليد وأكله الضب. وامتناعه صلى الله عليه وسلم منه
وقوله: ` كلوا، فإنه ليس بحرام ولا بأس به ولكنه ليس من طعام قومي `.
رواه الشيخان وغيرهما، وهو مخرج في ` إرواء الغليل ` (2498) . ولا شك أن
هذا أصح من حديث الترجمة، ولكن ذلك لا يستلزم تضعيفه إذا كان لا علة فيه سوى
إسماعيل بن عياش، ذلك لأنه في نفسه ثقة، وقد ضعفوه في روايته عن غير
الشاميين، ووثقوه في روايته عنهم، وهذا الحديث رواته كلهم شاميون، قال
الحافظ: ` صدوق في روايته عن أهل بلده، مخلط في غيرهم `. وعلى هذا التفريق
جرى كبار أئمة الحديث كأحمد والبخاري وابن معين ويعقوب بن شيبة وابن عدي
وغيرهم، وهم عمدة الحافظ ابن حجر فيما قال فيه. ونحوه في ` المغني ` للذهبي
.
فالعجب من البيهقي كيف تغافل عن هذا التفصيل، فأطلق القول فيه بأنه ليس بحجة
؟ ونحوه قول المنذري في ` مختصر أبي داود `. وأعجب منه إقرار الزيلعي في `
نصب الراية ` (4 / 195) إياهما، وسكوت ابن التركماني في ` الجوهر النقي `
على تغافل البيهقي، مع أن الحديث حجة الحنفية على تحريم الضب، فكان عليهما أن
يبينا ما في ذلك من الحيد عن الصواب دفاعا عن الحق، لا تعصبا للمذهب، وهو
الموقف الذي وقفه الحافظ ابن حجر رحمه الله، مع أن الحديث بظاهره مخالف لمذهبه
! فقال رحمه الله تعالى في ` الفتح ` (9 / 547) : ` أخرجه أبو داود بسند حسن
... وحديث ابن عياش عن الشاميين قوي، وهؤلاء شاميون ثقات، ولا يغتر بقول
الخطابي، ليس إسناده بذاك. وقول ابن حزم: فيه ضعفاء ومجهولون. وقول
البيهقي: تفرد به إسماعيل بن عياش وليس بحجة. وقول ابن الجوزي: لا يصح.
ففي كل ذلك تساهل لا يخفى. فإن رواية إسماعيل عن الشاميين قوية عند البخاري،
وقد صحح الترمذي بعضها ... والأحاديث الماضية، وإن دلت على الحل تصريحا
وتلويحا، نصا وتقريرا، فالجمع بينها وبين هذا يحمل النهي فيه على أول الحال
عند تجويز أن يكون الضب مما مسخ، وحينئذ أمر بإكفاء القدور، ثم توقف فلم
يأمر به ولم ينه عنه، وحمل الإذن فيه على ثاني الحال لما علم أن الممسوخ لا
نسل له، ثم بعد ذلك كان يستقذره فلا يأكله ولا يحرمه، وأكل على مائدته فدل
على الإباحة، وتكون الكراهة للتنزيه في حق من يتقذره، وتحمل أحاديث الإباحة
على من لا يتقذره، ولا يلزم من ذلك أنه يكره مطلقا `. قلت: وبالجملة،
فالحديث ثابت، وكونه معارضا لما هو أصح منه لا يستلزم ضعفه، فهو من قسم
المقبول، فيجب التوفيق بينه وبين ما هو أصح منه، على النحو الذي عرفته في
كلام الحافظ، وخلاصته أنه محمول على الكراهة لا على التحريم، وفي حق من
يتقذره، وعلى ذلك حمله الطبراني أيضا. والله أعلم.
وقد خالف الطحاوي
الحنفية في هذه المسألة، فقد عقد فيها بابا خاصا في كتابه ` شرح المعاني ` (2
/




আব্দুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) ’দ্বাব’ (ضب - এক প্রকার বন্য গুই) খেতে নিষেধ করেছেন।

এটি আবু দাউদ (২/১৪৩), হাফেয ফাসাবী ’আত-তারীখ’ (২/৩১৮), তাবারী ’তাহযীবুল আসার’ (১/১৯১/৩১১), বায়হাকী (৯/৩২৬) এবং ইবনে আসাকির (৯/৪৮৬/১) ইসমাঈল ইবনে আইয়্যাশ থেকে, তিনি দমদম ইবনে যুরআহ থেকে, তিনি শুরাইহ ইবনে উবাইদ থেকে, তিনি আবু রাশিদ আল-হিবরানি থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনে শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফু’ সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

ইমাম তাবারী বলেন: ‘এটি প্রমাণিত নয়।’ ইমাম বায়হাকী এর কারণ ব্যাখ্যা করে বলেন: ‘এটি কেবল ইসমাঈল ইবনে আইয়্যাশ এককভাবে বর্ণনা করেছেন, আর তিনি দলীল হিসেবে গ্রহণযোগ্য নন। এর বৈধতা সংক্রান্ত যে হাদীস পূর্বে বর্ণিত হয়েছে, সেটি অধিক সহীহ।’ অর্থাৎ সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্য কিতাবে ইবনে উমর ও ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত খালিদ বিন ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনা, যেখানে তিনি (খালিদ) ’দ্বাব’ খেয়েছিলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা খেতে অস্বীকার করেছিলেন, কিন্তু বলেছিলেন: "তোমরা খাও, কারণ এটি হারাম নয় বা এতে কোনো সমস্যা নেই। তবে এটি আমার কওমের খাবার নয়।"

এই হাদীসটি শায়খান (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন এবং এটি ’ইরওয়াউল গালীল’ (২৪৯৮)-এও এসেছে। এতে কোনো সন্দেহ নেই যে এই হাদীসটি আলোচ্য হাদীসটির (নিষেধের হাদীসের) চেয়ে অধিক সহীহ। তবে এর অর্থ এই নয় যে আলোচ্য হাদীসটিকে দুর্বল সাব্যস্ত করতে হবে, যদি ইসমাঈল ইবনে আইয়্যাশ ছাড়া অন্য কোনো ত্রুটি না থাকে। কারণ তিনি নিজে নির্ভরযোগ্য, কিন্তু শামবাসী (সিরীয়) নন এমন বর্ণনাকারীদের কাছ থেকে তাঁর বর্ণনাকে দুর্বল হিসেবে গণ্য করা হয়েছে, আর শামবাসীদের কাছ থেকে তাঁর বর্ণনাকে নির্ভরযোগ্য বলা হয়েছে। এই হাদীসের সকল বর্ণনাকারীই শামবাসী ছিলেন।

হাফেয ইবনে হাজার (রহ.) বলেন: ‘তিনি তাঁর নিজ এলাকার (শামবাসী) বর্ণনাকারীদের ক্ষেত্রে সত্যবাদী, তবে অন্যদের ক্ষেত্রে মিশ্রণকারী।’ আহমদ, বুখারী, ইবনে মাঈন, ইয়া’কুব ইবনে শাইবা, ইবনে আদী এবং অন্যান্য প্রধান হাদীস বিশেষজ্ঞগণ এই পার্থক্যের নীতি গ্রহণ করেছেন, আর হাফেয ইবনে হাজার তাঁর মন্তব্যে এদের উপরই নির্ভর করেছেন। ইমাম যাহাবীও তাঁর ’আল-মুগনি’ গ্রন্থে একই কথা বলেছেন।

আশ্চর্যের বিষয় হলো, ইমাম বায়হাকী কীভাবে এই বিস্তারিত ব্যাখ্যা উপেক্ষা করলেন এবং এটিকে দলীল হিসেবে অগ্রহণযোগ্য বলে ঘোষণা করলেন? ’মুখতাসার আবি দাউদ’-এ মুনযিরীর বক্তব্যও অনুরূপ। আরও আশ্চর্যের বিষয় হলো, যাইলায়ী তাঁর ’নাসবুর রায়াহ’ (৪/১৯৫)-এ তাদের উভয়েরই বক্তব্যকে সমর্থন করেছেন, এবং ইবনুত্ তুর্কুমানী ’আল-জাওহারুন নাকী’-তে বায়হাকীর এই উপেক্ষা নিয়ে নীরব থেকেছেন। অথচ এই হাদীসটি হানাফী মাযহাবের জন্য ’দ্বাব’ হারাম হওয়ার পক্ষে প্রমাণ হিসেবে ব্যবহৃত হয়। তাদের উচিত ছিল সত্যের পক্ষে অবস্থান নিয়ে, মাযহাবের অন্ধ অনুকরণের কারণে নয়— সঠিক পথ থেকে বিচ্যুতি কোথায় তা স্পষ্টভাবে তুলে ধরা। এই অবস্থানটিই হাফেয ইবনে হাজার (রহ.) নিয়েছিলেন, যদিও হাদীসের বাহ্যিক অর্থ তাঁর মাযহাবের (শাফিঈ) বিপরীত ছিল!

হাফেয ইবনে হাজার (রহ.) ’আল-ফাতহ’-এ (৯/৫৪৬) বলেন: ‘আবু দাউদ এটি হাসান সনদ সহকারে বর্ণনা করেছেন... ইবনে আইয়্যাশের শামী বর্ণনাকারীদের মাধ্যমে বর্ণনা শক্তিশালী। আর এরা সবাই নির্ভরযোগ্য শামী বর্ণনাকারী। অতএব, খাত্তাবীর কথা: ‘এর সনদ তেমন জোরালো নয়,’ কিংবা ইবনে হাযমের কথা: ‘এতে দুর্বল ও অজ্ঞাত বর্ণনাকারী রয়েছে,’ অথবা বায়হাকীর কথা: ‘ইসমাঈল ইবনে আইয়্যাশ এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি দলীল নন,’ কিংবা ইবনুল জাওযীর কথা: ‘এটি সহীহ নয়’— এগুলো দ্বারা বিভ্রান্ত হওয়া উচিত নয়। কারণ এগুলোতে এমন শিথিলতা রয়েছে যা গোপনীয় নয়। বুখারীর নিকটও ইসমাঈলের শামী বর্ণনা শক্তিশালী। তিরমিযীও এর কিছুকে সহীহ বলেছেন... যদিও পূর্ববর্তী হাদীসগুলো সুস্পষ্টভাবে এবং ইঙ্গিত দ্বারা, নস (স্পষ্ট পাঠ) ও তাকরীর (নবীর মৌন সম্মতি)-এর মাধ্যমে বৈধতার প্রমাণ দেয়, তথাপি উভয় হাদীসের মধ্যে সামঞ্জস্য বিধান করতে গেলে, এই (নিষেধের) হাদীসটিকে প্রাথমিক অবস্থার উপর প্রযোজ্য ধরা হবে, যখন ধারণা করা হয়েছিল যে ’দ্বাব’ হয়ত মাসখ (বিকৃত) প্রাণী। তখন পাত্র উল্টে ফেলার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল। এরপর তিনি বিরত থাকেন এবং এর নির্দেশও দেননি বা নিষেধও করেননি। আর এর অনুমতির হাদীসকে দ্বিতীয় অবস্থার উপর প্রযোজ্য ধরা হবে, যখন জানা গেল যে মাসখ প্রাণীর কোনো বংশধর হয় না। এরপরও তিনি এটিকে অপছন্দ করতেন, তাই খেতেন না কিন্তু হারামও করেননি। তাঁর দস্তরখানে তা খাওয়া হয়েছিল, যা এর ইবাহা (বৈধতা)-এর প্রমাণ। আর অপছন্দকারী ব্যক্তির জন্য এটি মাকরুহ তানযীহ (অপছন্দনীয়)। আর বৈধতার হাদীসগুলো তাদের জন্য প্রযোজ্য হবে যারা এটিকে অপছন্দ করেন না। এর অর্থ এই নয় যে এটি সাধারণভাবে মাকরুহ।’

আমি (আলবানী) বলি: সংক্ষেপে, হাদীসটি ثابت (সাবিত/প্রমাণিত)। এটি এর চেয়ে সহীহ হাদীসের সাথে সাংঘর্ষিক হলেও তা একে দুর্বল করে না। এটি মাকবূল (গ্রহণযোগ্য) শ্রেণির অন্তর্ভুক্ত। সুতরাং, হাফেয ইবনে হাজার (রহ.)-এর বক্তব্য থেকে আপনারা যে সামঞ্জস্যের উপায় জেনেছেন, সেভাবে এটির এবং এর চেয়ে সহীহ হাদীসের মধ্যে সমন্বয় সাধন করা আবশ্যক। এর সারসংক্ষেপ হলো— এটি হারাম নয়, বরং মাকরুহ-এর উপর প্রযোজ্য, এবং কেবল তাদের ক্ষেত্রে, যারা এটিকে অপছন্দ করেন। তাবারানীও এটিকে একই অর্থে গ্রহণ করেছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

এই মাসআলায় ইমাম ত্বহাবী হানাফী মাযহাবের বিরোধিতা করেছেন। তিনি তাঁর গ্রন্থ ’শারহুল মা’আনী’-তে এ বিষয়ে একটি বিশেষ অধ্যায় বরাদ্দ করেছেন... [মূল আরবি পাঠ এখানে সমাপ্ত হয়েছে]









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2391)


2391 - ` نهى عن أكل المجثمة، وهي التي تصبر بالنبل `.
أخرجه الترمذي (1473) عن أبي أيوب الإفريقي عن صفوان بن سليم عن سعيد بن
المسيب عن أبي الدرداء مرفوعا. وقال الترمذي: ` حديث غريب `. وقال ابن
أبي حاتم في ` العلل ` (2 / 20) عن أبيه: ` سعيد بن المسيب عن أبي الدرداء
لا يستوي `. قلت: ورجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير أبي أيوب الإفريقي،
واسمه عبد الله بن علي بن الأزرق، قال الحافظ: ` صدوق يخطىء `. قلت: فحديثه
يحتمل التحسين، بل هو حسن، فقد وجدت له طريق أخرى، قال الإمام أحمد (6 /
445) : حدثنا علي بن عاصم حدثنا سهيل بن أبي صالح عن عبد الله بن يزيد السعدي
قال: ` أمرني ناس من قومي أن أسأل سعيد بن المسيب عن سنان يحددونه ويركزونه
في الأرض، فيصبح وقد قتل الضبع، أتراه ذكاته؟ قال: فجلست إلى سعيد بن
المسيب، فإذا عنده شيخ أبيض الرأس واللحية من أهل الشام، فسألت عن ذلك؟
فقال لي: وإنك لتأكل الضبع؟ قال: قلت: ما أكلتها قط، وإن ناسا من قومي
ليأكلونها، قال: فقال: إن أكلها لا يحل. قال: فقال الشيخ: يا عبد الله!
ألا أحدثك بحديث سمعته من أبي الدرداء يرويه عن النبي صلى الله عليه وسلم؟ قال
: قلت: بلى، قال: فإني سمعت أبا الدرداء يقول: ` نهى رسول الله صلى الله
عليه وسلم عن كل ذي خطفة وعن كل ذي نهبة وعن كل ذي ناب من السباع `. قال:
فقال سعيد بن المسيب: صدق `.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات - على ضعف في علي
بن عاصم - غير عبد الله بن يزيد السعدي، فلا يعرف إلا بهذه الرواية، وقد
وثقه ابن حبان (7 / 13) . والحديث صحيح، فإن له شواهد كثيرة عن جمع من
الصحابة:




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) ‘মুজাছছামা’ (Mujaththamah) খেতে নিষেধ করেছেন। আর মুজাছছামা হলো সেই প্রাণী, যাকে বেঁধে লক্ষ্যবস্তু বানানো হয় এবং তীর নিক্ষেপ করে মেরে ফেলা হয়।

(অন্য এক বর্ণনায় আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন যে) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সকল প্রকার ছিনিয়ে নেওয়া বস্তু (খাতফাহ), লুট করা বস্তু (নুবাহ) এবং সকল দাঁতবিশিষ্ট হিংস্র প্রাণী (খাওয়া) থেকে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2392)


2392 - ` نهانا عن التكلف (للضيف) `.
أخرجه الحاكم (4 / 123) وابن عدي (ق




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে মেহমানের জন্য অতিরিক্ত বাড়াবাড়ি (বা কষ্ট স্বীকার) করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2393)


2393 - ` نهى عن الجداد بالليل والحصاد بالليل. قال جعفر بن محمد: أراه من أجل
المساكين `.
أخرجه ابن الأعرابي في ` معجمه ` (ق 203 / 2) والبيهقي (4 / 133) والخطيب
في ` التاريخ ` (12 / 372) من طرق عن جعفر بن محمد عن أبيه عن جده - يعني
الحسين - مرفوعا. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم. وقصر السيوطي في
تخريجه، فلم يعزه إلا للبيهقي! ورمز لحسنه فقط كما قال المناوي، ثم قلده في
` التيسير `، فقال: ` وإسناده حسن `!
و (الجداد) بفتح الجيم والكسر: صرام النخل، وهو قطع ثمرتها.




হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাতে ফল পাড়া (জুদাদ্) এবং রাতে শস্য কাটা (হাসাদ্) থেকে নিষেধ করেছেন।
জাফর ইবনে মুহাম্মাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন, "আমার ধারণা, এটি (নিষেধ করা হয়েছে) গরিব-দুঃখীদের (মিসকীনদের) কারণে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2394)


2394 - ` نهى عن مطعمين: عن الجلوس على مائدة يشرب عليها الخمر وأن يأكل الرجل وهو
منبطح على بطنه `.
أخرجه أبو داود (3774) والحاكم (4 / 129) وابن ماجة (3370) بالشطر
الثاني منه عن جعفر بن برقان عن الزهري عن سالم عن أبيه قال: فذكره.
وقال الحاكم:
` صحيح على شرط مسلم! ووافقه الذهبي! وأعله أبو داود بقوله
عقبه: ` هذا الحديث لم يسمعه جعفر من الزهري، وهو منكر `. ثم ساق بإسناده
الصحيح عن جعفر أنه بلغه عن الزهري بهذا الحديث. قلت: وجعفر ثقة من رجال
مسلم، لكنهم ضعفوا حديثه عن الزهري خاصة، ولذلك قال الحافظ: ` صدوق، يهم
في حديث الزهري `. وذكر الحافظ في ` التهذيب ` أن هذا الحديث مما أنكره
العقيلي أيضا من حديثه عن الزهري. قلت: لكن الحديث ثابت، فشطره الأول له
شواهد من حديث جابر وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` رقم (1949 و 1982) و `
تخريج الحلال `. والشطر الثاني، له شاهد من حديث علي، قال: ` نهاني رسول
الله صلى الله عليه وسلم عن صلاتين وقراءتين وأكلتين ولبستين، نهاني أن
أصلي بعد الصبح حتى ترتفع الشمس وبعد العصر حتى تغرب الشمس، وأن آكل وأنا
منبطح على بطني، ونهاني أن ألبس الصماء وأحتبي في ثوب واحد ليس بين فرجي
وبين السماء ساتر `. أخرجه الحاكم (4 / 119) عن أبي أحمد الزبيري حدثنا عمر
بن عبد الرحمن عن زيد بن أسلم عن أبيه عنه. وقال: ` صحيح الإسناد `،
وتعقبه الذهبي بقوله: ` قلت: عمر واه `. قلت: لم ينكشف لي من هو؟ بعد مزيد
البحث عنه، على أنه وقع في ` تلخيص
الذهبي `: ` عمرو ` بالواو. فالله أعلم.
ووجدت له شاهدا آخر بلفظ: ` لا تأكل منكبا ولا تخطى رقاب الناس يوم الجمعة `
. رواه الطبراني في ` الأوسط ` (52 /




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দুই ধরনের খাবার গ্রহণ থেকে বারণ করেছেন: এক. এমন দস্তরখানে (খাবার টেবিলে) বসা, যেখানে মদ পান করা হয়; এবং দুই. কোনো ব্যক্তির উপুড় হয়ে পেটের ওপর ভর দিয়ে শুয়ে খাবার খাওয়া।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2395)


2395 - ` نهى عن المفدم `.
أخرجه ابن ماجة (2 / 377) عن يزيد بن أبي زياد عن الحسن بن سهيل عن ابن عمر
مرفوعا. قال يزيد: ` قلت للحسن: ما المفدم؟ قال: المشبع بالعصفر `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، والحسن بن سهيل قال الذهبي: ` ما علمت روى عنه غير
يزيد بن أبي زياد الكوفي، ولكن ذكره ابن حبان في (الثقات) `. قلت:
وتوثيقه غير معتد به والحالة هذه لما عرف من توثيقه المجهولين، حتى الذين يقول
هو فيهم: ` لا أعرفه ولا أعرف أباه `. ويزيد بن أبي زياد - وهو الهاشمي
مولاهم - ضعيف. لكن للحديث شاهد من حديث علي رضي الله عنه قال: ` نهاني حبي
صلى الله عليه وسلم عن ثلاث - لا أقول: نهى الناس - نهاني عن تختم الذهب وعن
لبس القسي وعن العصفر المفدم `. أخرجه النسائي (1 / 168 و 2 / 287) عن داود
بن قيس عن إبراهيم بن عبد الله بن حنين عن أبيه عن ابن عباس عنه.
قلت: وهذا
إسناد صحيح على شرط مسلم. وتابعه الضحاك بن عثمان عن إبراهيم بن حنين به إلا
أنه قال: ` وعن لبس المفدم والمعصفر `. أخرجه النسائي أيضا (1 / 160 و 2 /
287) ، وزاد: ` وعن القراءة في الركوع `. وإسناده صحيح على شرط مسلم أيضا
، وقد أخرجه في ` صحيحه ` (6 / 144) من طرق أخرى عن إبراهيم بن عبد الله به
، دون قوله: ` المفدم `. وهو رواية لابن ماجة. وأخرجه أحمد (1 / 71) من
طريق أخرى عن عبيد الله - يعني ابن عبد الله بن موهب - : أخبرني عمي عبيد الله
بن عبد الرحمن بن موهب عن أبي هريرة عنه به مختصرا، وفيه قصة. وهذا إسناد
ضعيف لضعف عبيد الله بن عبد الرحمن بن موهب، ولم يذكروا له رواية عن أبي
هريرة، والظاهر أنه لم يسمع منه. والراوي عنه هو عبيد الله بن عبد الرحمن
بن عبد الله بن موهب التميمي ضعيف أيضا.
(تنبيه) : قال البوصيري في ` زوائد ابن ماجة ` تعليقا على حديث الترجمة (218
/ 1) : ` هذا إسناد صحيح، وله شاهد من حديث علي بن أبي طالب، رواه مسلم
وأصحاب ` السنن ` الأربعة، ورواه أبو بكر بن أبي شيبة في ` مسنده ` بهذا
الإسناد، وبزيادة في أوله `! وفيه أمور لا تخفى على القارىء اللبيب، أهمها
أن لفظ: ` المفدم ` عن علي ليس إلا عند النسائي.
هذا ولعل النهي أن لبس
الثوب المشبع حمرة لأنه تشبه بالكفار لحديث: ` إن هذه من ثياب الكفار، فلا
تلبسها `. رواه مسلم، وتقدم تخريجه برقم (1704) . أو لأنه من لباس النساء
كما يشعر به حديث آخر عنده (6 / 144) عن عبد الله بن عمرو قال: ` رأى النبي
صلى الله عليه وسلم علي ثوبين معصفرين، فقال: أأمك أمرتك بهذا؟ ! قلت:
أغسلهما؟ قال: بل أحرقهما `. والله أعلم.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘মুফাদ্দাম’ (যা কুসুম বা জাফরান রং দ্বারা গাঢ়ভাবে রঞ্জিত) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2396)


2396 - ` نهى عن ميثرة الأرجوان `.
أخرجه الترمذي (2789) عن الحسن عن عمران بن حصين مرفوعا، وقال: ` حديث
حسن غريب `. قلت: ورجاله ثقات، لكن الحسن مدلس، وقد عنعنه. وله شاهد من
حديث علي قال: ` نهى عن ميثار الأرجوان `. أخرجه أبو داود (2 / 175)
والنسائي (2 / 288) عن هشام عن محمد عن عبيدة عنه. قلت: وهذا إسناد صحيح.
وأخرجه أبو داود أيضا والنسائي (2 / 287) وابن ماجة (3654) عن أبي إسحاق
عن هبيرة عن علي قال: ` نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن خاتم الذهب وعن
لبس القسي والميثرة الحمراء `.
قلت: وإسناده جيد. وله عند النسائي (2 /
287 و 302) طريقان آخران عن علي. وطريق آخر عند أحمد (1 / 147) . وله
شاهد من حديث البراء بن عازب عند البخاري وغيره وهو مخرج في ` المشكاة ` (




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরজুয়ান (রক্তবর্ণ বা গাঢ় বেগুনি) রঙের ‘মায়ছারা’ (আরোহী পশুর পিঠে ব্যবহৃত নরম আসন বা গদি) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2397)


2397 - ` نهى عن سب الأموات `.
أخرجه الحاكم (1 / 385) عن شعبة عن مسعر عن زياد بن علاقة عن عمه: ` أن
المغيرة بن شعبة سب علي بن أبي طالب، فقام إليه زيد بن أرقم فقال: يا
مغيرة! ألم تعلم أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن سب الأموات؟ فلم تسب
عليا وقد مات؟ ! `، وقال: ` صحيح على شرط مسلم `، ووافقه الذهبي.
قلت: وهو كما قالا، وعم زياد بن علاقة اسمه قطبة بن مالك، وقد اختلف في
إسناده على مسعر، فرواه شعبة عنه هكذا، وخالفه محمد بن بشر فقال: حدثنا
مسعر عن الحجاج مولى بني ثعلبة عن قطبة بن مالك عم زياد بن علاقة قال: ` نال
المغيرة بن شعبة من علي، فقال زيد بن أرقم ... ` الحديث. أخرجه أحمد (4 /
369) وأبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2 / 153) . وتابعه وكيع: حدثنا مسعر
عن أبي أيوب مولى بني ثعلبة عن قطبة بن مالك به.
أخرجه أحمد (4 / 371) .
وأبو أيوب هذا هو الحجاج الذي في الطريق التي قبلها، واسم أبيه أيوب كما في `
تعجيل المنفعة `، وأفاد أنه مجهول الحال. وخالفهم سفيان الثوري فقال: عن
زياد بن علاقة عن المغيرة بن شعبة قال: فذكر الحديث مرفوعا، وجعله من مسند
المغيرة! أخرجه أحمد (4 / 252) والترمذي (1983) وابن حبان (1987) .
وفي رواية لأحمد من طريق عبد الرحمن: حدثنا سفيان عن زياد بن علاقة قال:
سمعت رجلا عند المغيرة بن شعبة قال: فذكره مرفوعا بلفظ: ` لا تسبوا الأموات،
فتؤذوا الأحياء `. فهذا اختلاف شديد على زياد بن علاقة، يتلخص في الوجوه
التالية:




যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃতদের গালি দিতে নিষেধ করেছেন।

[ঘটনা প্রসঙ্গে] মুগীরাহ ইবনু শু’বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে গালি দিলে, যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং তাঁকে বললেন: "হে মুগীরাহ! আপনি কি জানেন না যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃতদের গালি দিতে নিষেধ করেছেন? তাহলে আপনি আলীকে কেন গালি দিচ্ছেন যখন তিনি ইন্তেকাল করেছেন?!"

অন্য এক বর্ণনায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা মৃতদের গালি দিও না, কারণ (তা করলে) তোমরা জীবিতদের কষ্ট দেবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2398)


2398 - ` نهى عن صوم ستة أيام من السنة: ثلاثة أيام التشريق ويوم الفطر ويوم الأضحى
ويوم الجمعة مختصة من الأيام `.
أخرجه الطيالسي في ` مسنده ` (1 / 191) : حدثنا الربيع عن يزيد الرقاشي عن
أنس مرفوعا. قلت: وهذا إسناد ضعيف، الرقاشي ضعيف. والربيع - وهو ابن
صبيح - صدوق سيء الحفظ. ومن طريقه أخرجه الطحاوي في ` شرح المعاني ` (1 /
429 و 430) لكنه لم يذكر يوم الجمعة والفطر. وكذلك أخرجه هو وأبو يعلى (3
/ 1016) من طريق الربيع أيضا، ومرزوق أبي عبد الله الشامي قالا: حدثنا يزيد
الرقاشي به. ومرزوق هذا قال ابن معين: ` ليس به بأس `. وذكره ابن حبان في
` الثقات `. وللحديث شواهد، فروى عبد الله بن سعيد عن أبيه (وقيل: عن جده
) عن أبي هريرة مرفوعا به نحوه، إلا أنه ذكر: ` آخر يوم من شعبان يوصل برمضان
`، بدل: ` يوم الجمعة `. أخرجه البزار (ص




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বছরের ছয়টি দিনে রোযা রাখতে নিষেধ করেছেন: আইয়ামে তাশরীকের তিন দিন, ঈদুল ফিতরের দিন, ঈদুল আযহার দিন এবং (অন্য দিনগুলো থেকে) বিশেষভাবে শুধু জুমার দিন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2399)


2399 - ` نهى عن محاشي النساء `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 196 /




রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মহিলাদের পশ্চাৎদ্বার (পায়ুপথ) ব্যবহার করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2400)


2400 - ` هذا القرع - هو الدباء - نكثر به طعامنا `.
أخرجه الترمذي في ` الشمائل ` (ص 104) وابن ماجة (2 / 311) وأحمد (4 /
352) والطبراني في ` الكبير ` (2080 و 2085) وأبو الشيخ في ` أخلاق النبي
صلى الله عليه وسلم ` (ص 214) عن إسماعيل بن أبي خالد عن حكيم بن جابر عن
أبيه قال: ` دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم في بيته، وعنده هذه الدباء
، فقلت: أي شيء هذا؟ قال: ` فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات،
رجال الشيخين غير حكيم بن جابر، وهو ثقة. وأبوه جابر قال الترمذي: ` هو
جابر بن طارق، ويقال: ابن أبي طارق، وهو رجل من أصحاب رسول الله صلى الله
عليه وسلم، ولا نعرف له إلا هذا الحديث الواحد `.




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের ঘরে প্রবেশ করলাম। তখন তাঁর নিকট এই দুব্বা (লাউ বা কুমড়া) ছিল। আমি জিজ্ঞাসা করলাম, এটা কী জিনিস? তিনি (উত্তরে) বললেন:

"এই ’কার’ (লাউ বা কুমড়া)—যা দুব্বা নামে পরিচিত—আমরা এটি দিয়ে আমাদের খাবারকে প্রাচুর্যময় করে থাকি (বা খাবারে এটি বেশি পরিমাণে ব্যবহার করি)।"