হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2427)


2427 - ` لا تغزى هذه (يعني: مكة) بعد اليوم إلى يوم القيامة `.
أخرجه الترمذي (1611) والحاكم (3 / 627) وأحمد (3 / 412 و 4 / 343)
وكذا الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (2 /




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আজকের দিনের পর থেকে কিয়ামত পর্যন্ত এটি (অর্থাৎ মক্কা) আর কখনও আক্রান্ত হবে না (বা এর বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা হবে না)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2428)


2428 - ` لا تقتلوا الجراد، فإنه جند من جنود الله الأعظم `.
أخرجه أبو محمد المخلدي في ` الفوائد ` (ق 289 / 2) وأبو عبد الله بن منده
في ` معرفة الصحابة ` (37 / 201 / 1) عن سعيد بن عمرو الحضرمي، والطبراني
في ` الأوسط ` (1 / 128 / 2) عن محمد بن إسماعيل بن عياش، وابن منده أيضا
(2 / 243 / 1) عن عبد الوهاب بن الضحاك، ثلاثتهم عن إسماعيل بن عياش عن ضمضم
ابن زرعة عن شريح بن عبيد عن أبي زهير النميري مرفوعا. وقال الطبراني: `
لا يروى عن أبي زهير إلا بهذا الإسناد، تفرد به إسماعيل `.
قلت: وهو ثقة في روايته عن الشاميين، وهذه منها، ومن فوقه ثقات أيضا،
فالإسناد جيد. وأما إعلال الهيثمي إياه بقوله في ` مجمع الزوائد ` (4 / 39)
: ` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، وفيه محمد بن إسماعيل بن عياش
، وهو
ضعيف `. فهو إعلال قائم على النظر في إسناد الطبراني خاصة، وإلا فقد
تابعه سعيد بن عمرو الحضرمي كما رأيت، وهو الحمصي، وهو شيخ كما قال أبو
حاتم، فالحديث بهذه المتابعة قوي. وأما متابعة عبد الوهاب بن الضحاك، فإنها
مما لا يفرح به لأنه كذاب. وفي قول الطبراني المتقدم: ` تفرد به إسماعيل `،
ما يشير إلى أنه لم يتفرد به ابنه عنه. فتأمل. وإذا عرفت هذا، فإن المناوي
لم يحسن صنعا حين نقل قول الهيثمي السابق، ثم أقره عليه، ولاسيما أن السيوطي
قد عزاه إلى البيهقي أيضا في ` الشعب `، وهو - أعني المناوي - لم يتعرض لبيان
ما إذا كان الحديث عنده من طريق محمد بن إسماعيل أم لا؟




আবু যুহাইর আন-নুমাইরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমরা পঙ্গপালকে হত্যা করো না। কেননা, তা আল্লাহ তাআলার মহান বাহিনীগুলোর মধ্যে অন্যতম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2429)


2429 - ` لا تقوم الساعة حتى تقاتلوا قوما صغار الأعين عراض الوجوه كأن أعينهم حدق
الجراد، كأن وجوههم المجان المطرقة، ينتعلون الشعر ويتخذون الدرق، حتى
يربطوا خيولهم بالنخل `.
أخرجه أحمد (3 / 31) : حدثنا عمار بن محمد بن أخت سفيان الثوري عن الأعمش عن
أبي صالح عن أبي سعيد الخدري مرفوعا. وأخرجه ابن ماجة (4099) : حدثنا
الحسن بن عرفة حدثنا عمار بن محمد به. قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله ثقات
رجال الشيخين غير عمار بن محمد، فهو من رجال مسلم فقط، ولكنه صدوق يخطىء.
إلا أنه لم يتفرد به، فقد أخرجه ابن حبان (1872) عن محمد بن أبي عبيدة بن (الأصل: ` عن `، وهو خطأ) معن عن أبيه عن الأعمش به. قلت: وهذا إسناد
صحيح على شرط مسلم. واسم أبي عبيدة عبد الملك بن معن بن عبد الرحمن بن عبد
الله بن مسعود الكوفي.




আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামত ততক্ষণ পর্যন্ত সংঘটিত হবে না, যতক্ষণ না তোমরা এমন এক জাতির সাথে যুদ্ধ করবে, যাদের চোখ ছোট এবং চেহারা চওড়া (প্রশস্ত)। যেন তাদের চোখ হলো পঙ্গপালের অক্ষিগোলকের মতো, আর তাদের চেহারা হলো চামড়া আবৃত ঢালের মতো। তারা পশমের (বা চুল/লোমের) জুতা পরিধান করবে এবং চামড়ার ঢাল ব্যবহার করবে। (তাদের বিজয় এতদূর গড়াবে যে) এমনকি তারা তাদের ঘোড়া খেজুর গাছের সাথে বাঁধবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2430)


2430 - ` لا تقوم الساعة حتى لا يحج البيت `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (65 / 2) : حدثنا أبو خيثمة حدثنا يحيى عن شعبة
حدثني قتادة عن عبد الله بن أبي عتبة عن أبي سعيد الخدري مرفوعا. ومن
طريق أبي يعلى أخرجه ابن حبان (1884) والحاكم (4 / 453) من طريقين آخرين
عن شعبة. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين كما قال الحاكم، ووافقه
الذهبي. وعبد الله بن أبي عتبة هو الأنصاري البصري مولى أنس. وأبو خيثمة
اسمه زهير بن حرب. وشعبة هو ابن الحجاج. وقد خالفه الحجاج بن الحجاج، فقال
: عن قتادة به. إلا أنه قال في متنه: ` ليحجن البيت، وليعتمرن بعد خروج
يأجوج ومأجوج `. أخرجه البخاري (1 / 403) ، وقال: ` تابعه أبان وعمران
عن قتادة. وقال عبد الرحمن عن شعبة: ` لا تقوم الساعة حتى لا يحج البيت `.
والأول أكثر `.
قلت: ومتابعة أبان، عند أحمد (3 / 27 و 48 و 64)
والحاكم. ومتابعة عمران - وهو ابن داور القطان - عنده أيضا (3 / 28) وكذا
أبي يعلى (1 /




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিয়ামত ততক্ষণ পর্যন্ত প্রতিষ্ঠিত হবে না, যতক্ষণ না বাইতুল্লাহর (কা’বার) হজ্জ করা বন্ধ হয়ে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2431)


2431 - ` لا تمثلوا بالبهائم `.
رواه النسائي (2 / 210) وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (16 / 383 / 2) عن
محمد بن زنبور أخبرنا ابن أبي حازم عن يزيد بن الهاد عن معاوية - يعني ابن
عبد الله بن جعفر - عن أبيه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: ` مر النبي
صلى الله عليه وسلم على ناس يرمون كبشا بالنبل، فكره ذلك، وقال: ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات، وفي ابن زنبور كلام يسير. وللحديث
شاهد من حديث ابن عمر:
` أنه مر على قوم وقد نصبوا دجاجة حية يرمونها، فقال
: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لعن من مثل بالبهائم `. أخرجه أحمد (2 /
13) وسنده صحيح.




আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

একবার রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা একটি ভেড়াকে তীর-ধনুক দিয়ে নিশানা করছিল। তিনি তা অপছন্দ করলেন এবং বললেন: "তোমরা প্রাণীদের বিকৃত করবে না (বা অঙ্গহানি করবে না, অথবা লক্ষ্যবস্তু বানিয়ে নির্যাতন করবে না)।"

এই বিষয়ে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি হাদীসে আরও উল্লেখ রয়েছে: তিনি একবার এমন কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যারা একটি জীবিত মুরগিকে বেঁধে নিশানা করার জন্য প্রস্তুত করেছিল এবং সেটিকে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করছিল। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই ব্যক্তিকে অভিশাপ করেছেন, যে প্রাণীদের বিকৃত করে (বা লক্ষ্যবস্তু বানিয়ে কষ্ট দেয়)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2432)


2432 - ` لا تنتهي البعوث عن غزو هذا البيت، حتى يخسف بجيش منهم `.
أخرجه النسائي (2 / 32) والحاكم (4 / 430) عن محمد بن إدريس أبي حاتم
الرازي قال: حدثنا عمر بن حفص بن غياث قال: حدثنا أبي عن مسعر قال: أخبرني
طلحة ابن مصرف عن أبي مسلم الأغر عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم
. وقال الحاكم: ` حديث غريب صحيح لا أعلم أحدا حدث به غير عمر بن حفص بن غياث
، يرويه عنه الإمام أبو حاتم `، ووافقه الذهبي. قلت: وهو صحيح على شرط
مسلم غير أبي حاتم وهو الإمام الحافظ النقاد. وأخرجه أبو نعيم في ` الحلية `
(7 / 244) من طريق أخرى عن عمر بن حفص به. وتابعه سحيم أنه سمع أبا هريرة
به نحوه. أخرجه النسائي بسند رجاله ثقات معروفون غير سحيم، وقد وثقه ابن
عمار وابن حبان. وله شاهد من حديث حفصة بنت عمر رضي الله عنهما مرفوعا نحوه
أتم منه. أخرجه مسلم (8 / 167) والنسائي وأحمد (6 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"এই ঘরের (বায়তুল্লাহর) উপর আক্রমণ করার জন্য সেনাবাহিনী প্রেরণ বন্ধ হবে না, যতক্ষণ না তাদের মধ্য থেকে একটি বাহিনীকে ভূগর্ভে ধ্বসিয়ে দেওয়া হয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2433)


2433 - ` لا تنزلوا على جواد الطرق، ولا تقضوا عليها الحاجات `.
رواه أبو بكر بن أبي شيبة في ` الأدب ` (1 / 150 / 1) : حدثنا يزيد حدثنا
هشام عن الحسن عن جابر مرفوعا. ومن طريق أبي بكر أخرجه ابن ماجة (3772)
. وأخرجه أحمد (3 / 305) من طريق أخرى عن هشام به أتم منه وكذلك أخرجه أبو
يعلى (2 / 594) من طريق أخرى عن يزيد، وهو ابن هارون. ورجاله ثقات رجال
الشيخين إلا أنه منقطع بين الحسن - وهو البصري - وجابر، فإنه لم يسمع منه
كما بينته في الكتاب الأخر (1140) . نعم، أخرجه ابن ماجة (329) من طريق
زهير قال: قال سالم: سمعت الحسن يقول: حدثنا جابر بن عبد الله: فذكره بلفظ
: ` إياكم والتعريس على جواد الطريق والصلاة عليها، فإنها مأوى الحيات
والسباع، وقضاء الحاجة عليها، فإنها من الملاعن `. قلت: فقد صرح الحسن
بالتحديث والسماع من جابر. لكن السند بذلك إليه لا يصح، فإن سالما هذا -
وهو ابن عبد الله الخياط البصري - ضعفه جماعة، وقال الحافظ: ` صدوق، سيء
الحفظ `. وزهير الراوي عنه، هو ابن محمد التميمي الخراساني، وهو ضعيف أيضا
. لكن حديث الترجمة صحيح، فقد جاء مفرقا في أحاديث. أما الشطر الأول، فهو في
حديث أبي هريرة مرفوعا بلفظ:
` إذا سافرتم ... وإذا عرستم بالليل فاجتنبوا
الطريق، فإنها مأوى الهوام في الليل `. أخرجه مسلم (6 / 54) وغيره. انظر
الرقم المتقدم (1357) . وأما الشطر الآخر، فله شواهد كثيرة من حديث أبي
هريرة وغيره، فراجع ` الترغيب ` (1 /




জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমরা মূল রাস্তাগুলোর উপর অবস্থান করো না এবং সেগুলোর উপর প্রাকৃতিক প্রয়োজন (মল-মূত্র) পূরণ করো না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2434)


2434 - ` لا خير فيمن لا يضيف `.
أخرجه أحمد (4 / 155) : حدثنا حجاج وحسن بن موسى قالا: حدثنا ابن لهيعة عن
يزيد بن أبي حبيب عن أبي الخير عن عقبة بن عامر مرفوعا. قلت: وهذا إسناد
رجاله ثقات رجال الشيخين غير ابن لهيعة وهو ضعيف لسوء حفظه وبه أعله الهيثمي
، وأقره المناوي. وأقول: لكن أخرجه الروياني في ` مسنده ` (ق 42 / 2) من
طريق ابن وهب عن ابن لهيعة به. وحديث ابن لهيعة من رواية عبد الله بن وهب
صحيح، لأنه روى عنه قبل أن يسوء حفظه كما حققه بعض الأئمة، على ما هو مشروح
في ترجمته، فصح الحديث بهذه الرواية، والحمد لله.




উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"যে ব্যক্তি মেহমানদারি করে না, তার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2435)


2435 - ` لا سمر إلا لمصل أو مسافر `.
أخرجه الطيالسي (1 / 73 / 294) : حدثنا شعبة قال: أخبرني منصور قال: سمعت
خيثمة بن عبد الرحمن يحدث عن عبد الله مرفوعا.
وأخرجه أحمد (1 / 412
و463) ومحمد بن مخلد العطار في ` المنتقى من حديثه ` (2 / 4 / 2) والحارث
في ` مسنده ` (ق




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: সালাত আদায়কারী অথবা মুসাফির ব্যতীত (ইশার পর) রাত জেগে গল্পগুজব করা উচিত নয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2436)


2436 - ` لا عقر في الإسلام `.
أخرجه أبو داود (2 / 71) وأحمد (3 / 197) والرامهرمزي في ` المحدث الفاصل
` (ص 46) عن عبد الرزاق أخبرنا معمر عن ثابت عن أنس قال: قال رسول الله
صلى الله عليه وسلم: فذكره. قال عبد الرزاق: ` كانوا يعقرون عند القبر بقرة
أو شاة `. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين. وقد وجدت له طريقا أخرى
ولكنها واهية يرويه سفيان عن أبان عن أنس به. أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (
7 / 118) والقضاعي في ` مسند الشهاب ` (ق 71 / 2) . وأبان - هو ابن أبي
عياش - متروك.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "ইসলামে ’আক্বর’ (কবরের নিকট পশু যবেহ করার প্রথা) নেই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2437)


2437 - ` لا يقطع الأبطح إلا شدا `.
أخرجه ابن ماجة (2987) وأحمد (6 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
আবত্বাহ উপত্যকা দ্রুতগতিতে (সামান্য দৌড়িয়ে) ছাড়া অতিক্রম করা যায় না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2438)


2438 - ` لا يأتي رجلا مولاه يسأله فضلا عنده فيمنعه إياه، إلا دعي له يوم القيامة
شجاعا يتلمظ فضله الذي منع `.
رواه أبو داود (5139) والنسائي في ` الكبرى ` (10 / 2) وأحمد (5 / 3 و 5
) عن بهز بن حكيم عن أبيه عن جده مرفوعا. قلت: وسنده حسن. وليس عند
أبي داود ` يتلمظ `. وفي ` القاموس `: (لمظ) : تتبع بلسانه (اللماظة)
بالضم، لبقية الطعام في الفم، وأخرج لسانه، فمسح شفتيه، أو تتبع الطعام
وتذوقه، كـ (تلمظ) في الكل `.




মুআবিয়া ইবনে হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

যখন কোনো ব্যক্তি তার মাওলার (মনিবের বা যার কাছে অতিরিক্ত সম্পদ আছে) কাছে আসে এবং তার কাছে থাকা অতিরিক্ত কোনো সম্পদ বা জিনিস চায়, আর সে তাকে তা দিতে অস্বীকার করে (বা বঞ্চিত করে), তখন কিয়ামতের দিন তার জন্য একটি বিষধর সাপকে ডাকা হবে, যা তার সেই অতিরিক্ত সম্পদকে জিহ্বা দিয়ে চেটে খাবে, যা সে (দান করতে) অস্বীকার করেছিল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2439)


2439 - ` لا يؤمن عبد حتى يؤمن بالقدر خيره وشره، حتى يعلم أن ما أصابه لم يكن
ليخطئه، وأن ما أخطأه لم يكن ليصيبه `.
أخرجه الترمذي (2 / 21) وابن عدي في ` الكامل ` (217 / 1) عن عبد الله بن
ميمون عن جعفر بن محمد عن أبيه عن جابر بن عبد الله مرفوعا. وقال الترمذي
: ` حديث غريب، لا نعرفه إلا من حديث عبد الله بن ميمون، وهو منكر الحديث `
. قلت: لكن الحديث صحيح، فإنه جاء مفرقا في أحاديث: الأول: عن عمرو بن شعيب
عن أبيه عن جده مرفوعا إلى قوله: ` خيره وشره `. أخرجه الآجري في ` الشريعة
` (ص 188) وأبو الحسن القزويني في ` مجلس من الأمالي ` (198 / 1)
واللالكائي في ` السنة ` (1 / 141 / 2) وأبو سعد الجنزروذي في ` العاشر ` من
` أحاديث هشام بن عمار ` (5 / 2) من طرق عنه. قلت: وهذا إسناد حسن.
الثاني: عن عكرمة بن عمار عن شداد عن ابن عمر مرفوعا به نحوه. أخرجه
اللالكائي. الثالث: عن إسماعيل بن أبي الحكم الثقفي قال: حدثني ابن أبي حازم
عن أبيه عن سهل بن سعد الساعدي مرفوعا به. أخرجه اللالكائي أيضا، والطبراني
في ` الكبير ` (6 / 212 / 5900) . وقال الهيثمي (7 / 206) :
` وإسماعيل
بن أبي الحكم الثقفي لم أعرفه، وبقية رجاله ثقات `. وتعقبه الشيخ حمدي
السلفي بأنه - أعني الهيثمي - قد قال في الثقفي هذا في حديث آخر (4 / 80) : `
وثقه أبو حاتم، ولم يتكلم فيه أحد `. وأقول: لم يوثقه أبو حاتم، فقد قال
ابنه في ` الجرح ` (1 / 1 / 165) : ` روى عنه أبو زرعة، سئل أبي عنه؟ فقال
: شيخ `. وهذه اللفظة: ` شيخ `، لا تعني أنه ثقة، وإنما يستشهد به كما نص
ابنه في كتابه (1 / 37) . نعم، رواية أبي زرعة عنه توثيق له كما هو معلوم.
فالإسناد حسن إن شاء الله تعالى.
الرابع: من طريقين عن أنس بن مالك مرفوعا به. أخرجه ابن عساكر في ` التاريخ `
(2 / 60 / 2 و 11 / 38 / 1) . الخامس: عن الوليد بن عبادة عن أبيه عبادة بن
الصامت في حديث: ` ولن تؤمن بالله حتى تؤمن بالقدر خيره وشره، وتعلم أن ما
أصابك لم يكن ليخطئك وما أخطأك لم يكن ليصيبك، سمعت رسول الله صلى الله عليه
وسلم يقول: القدر على هذا من مات على غير هذا دخل النار `. أخرجه الآجري
وكذا أحمد وابن أبي عاصم وهو حديث صحيح كما حققته في ` تخريج السنة لابن أبي
عاصم ` (رقم 111) .
السادس والسابع والثامن والتاسع: عن أبي بن كعب وعبد الله بن مسعود
وحذيفة بن اليمان وزيد بن ثابت مرفوعا في حديث لهم في القدر: ` ولو أنفقت مثل
أحد ذهبا في سبيل الله ما قبله الله منك حتى تؤمن بالقدر، وتعلم
أن ما أصابك
... ` الحديث، وفيه: ` ولو مت على غير هذا لدخلت النار `. وإسناده صحيح،
أخرجه جماعة من أصحاب السنن والمسانيد وغيرهم، وهو مخرج في ` المشكاة ` (
115) ، و ` تخريج السنة ` (245) . العاشر: عن أنس مرفوعا: ` لا يجد عبد
حلاوة الإيمان حتى يعلم أن ما أصابه ... ` الحديث. أخرجه ابن أبي عاصم (247)
بإسناد حسن عنه.




জাবের ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

কোনো বান্দা ততক্ষণ পর্যন্ত মুমিন হতে পারে না, যতক্ষণ না সে তাকদীরের ভালো ও মন্দ—উভয়টির ওপর ঈমান আনে। এবং যতক্ষণ না সে এই জ্ঞান লাভ করে যে, যা তাকে আঘাত করেছে, তা কখনোই তাকে এড়িয়ে যেত না; আর যা তাকে এড়িয়ে গেছে, তা কখনোই তাকে আঘাত করত না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2440)


2440 - ` لا يتكلفن أحد لضيفه ما لا يقدر عليه `.
أخرجه أبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (1 / 56) والخطيب في ` التاريخ ` (10 /
205) والديلمي (4 / 2 / 197) عن ابن لال كلاهما من طريق محمد بن الفرج
حدثنا يونس بن محمد المؤدب حدثنا حسين بن الرماس قال: سمعت عبد الرحمن بن
مسعود وسليم بن رباح وزكريا بن إسحاق يحدثون عن سلمان عن النبي صلى الله
عليه وسلم: فذكره، والسياق للخطيب، وقال: ` كذا قال: سليم بن رباح
وزكريا بن إسحاق عن سلمان `. قلت: ولم يذكرهما ابن لال في الإسناد. وكذلك
رواه الحاكم (4 / 123) من طريق الحسين بن محمد وهو المروذي عن الحسين بن
الرماس به نحوه. قلت: وهو إسناد ضعيف مجهول، عبد الرحمن بن مسعود، لم
أعرفه، ووقع في ` المستدرك ` أنه العبدي، فلم أجد من ترجمه هكذا، ويحتمل
أنه عبد الرحمن بن مسعود
بن نيار الأنصاري سمع سهل بن أبي حثمة. سمع منه خبيب
بن عبد الرحمن، ولم يوثقه غير ابن حبان. فهو مجهول أيضا. والمقرونان معهما
سليم بن رباح وزكريا بن إسحاق لم أعرفهما أيضا، والثاني منهما يحتمل أن يكون
زكريا بن إسحاق المكي الذي يروي عن عمرو بن دينار وطبقته وهو ثقة ولكنه لم
يسمع من الصحابة، فهو منقطع. والحسين بن الرماس قال ابن أبي حاتم (1 / 2 /
52) : ` روى عن عبد الرحمن بن مسعود. روى عنه الحسين بن محمد المروذي ` (¬1) .
ولم يذكر فيه غير ذلك، فهو مجهول، ولذلك قال الذهبي في ` التلخيص `: ` قلت
: سنده لين `. لكن له عند الحاكم طريق أخرى عن سليمان بن قرم عن الأعمش عن
شقيق قال: ` دخلت أنا وصاحب لي على سلمان رضي الله عنه، فقرب إلينا خبزا
وملحا، فقال: لولا أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهانا عن التكلف لتكلفت
لكم، فقال صاحبي: لو كان في ملحنا سعتر، فبعث بمطهرته إلى البقال فرهنها،
فجاء بسعتر فألقاه فيه، فلما أكلنا قال صاحبي: الحمد لله الذي قنعنا بما
رزقنا! فقال سلمان: لو قنعت بما رزقت لم تكن مطهرتي مرهونة عند البقال! `،
وقال: ` صحيح الإسناد `، ووافقه الذهبي. وأقول: فيه نظر، فإن سليمان بن
قرم، وإن كانوا قد رمزوا له بأنه من رجال الشيخين، فقد ضعفه جمع، وقال
الحافظ في ` التقريب `: ` سيء الحفظ `.
¬_________
(¬1) الأصل: ` المروزي `، وهو تصحيف لأن المروذى يروي عنه العباس بن محمد
الدوري وهو الراوي عنه هذا الحديث في ` المستدرك `، فتنبه. اهـ.
ولكنه لم يتفرد به، فقد تابعه قيس
بن الربيع حدثنا عثمان بن شابور، رجل من بني أسد - عن شقيق - أو نحوه شك قيس
أن سلمان دخل عليه رجل فدعا له بما كان عنده، فقال: لولا أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم نهانا، أو لولا أنا نهينا أن يتكلف أحدنا لصاحبه لتكلفنا لك.
أخرجه أحمد (5 / 441) . قلت: وإسناده ضعيف، عثمان بن شابور لم أجد له
ترجمة، ولا أورده الحافظ في ` تعجيل المنفعة `، وهو على شرطه. وقيس بن
الربيع سيء الحفظ أيضا. لكن الحديث قوي بمجموع هذه الطرق، ولاسيما ويشهد له
عموم حديث عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: ` نهينا عن التكلف `. أخرجه
البخاري في أول ` الاعتصام `. (تنبيه) : تقدم تخريج هذا الحديث برقم (2392
) فمعذرة، وإن كان هنا لا يخلو من زيادة فائدة.




সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কেউ যেন তার মেহমানের জন্য এমন কিছুর কষ্ট স্বীকার না করে, যা সে বহন করতে সক্ষম নয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2441)


2441 - ` لا يذهب الليل والنهار، حتى يملك رجل من الموالي يقال له: جهجاه `.
أخرجه مسلم (8 / 184) والترمذي (2229) وأحمد (2 / 329) والثقفي في `
مشيخة النيسابوريين ` (ق 192 / 1) عن عبد الكبير بن عبد المجيد أبي بكر
الحنفي حدثنا عبد الحميد بن جعفر قال: سمعت عمر بن الحكم يحدث عن أبي هريرة
مرفوعا. وقال الترمذي: ` حديث حسن غريب `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: রাত ও দিনের আবর্তন ততক্ষণ পর্যন্ত চলতে থাকবে, যতক্ষণ না মাওয়ালীদের (মুক্ত দাস বা চুক্তিবদ্ধ গোষ্ঠী) মধ্য থেকে ‘জাহজাহ’ নামক এক ব্যক্তি শাসন ক্ষমতা গ্রহণ করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2442)


2442 - ` لا يزال الله يغرس في هذا الدين غرسا يستعملهم في طاعته `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ - الكنى ` (ص 61) وابن ماجة (1 /




আল্লাহ তাআলা সর্বদা এই দ্বীনের মধ্যে একদল চারা রোপণ করেন (অর্থাৎ, একদল লোক সৃষ্টি করেন), যাদেরকে তিনি তাঁর আনুগত্যের কাজে নিযুক্ত করেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2443)


2443 - ` لا يعضه بعضكم بعضا `.
أخرجه الطيالسي (2 / 66 / 2216) وأحمد (5 / 313 / 320) ومسلم (5 / 127)
من طريق أبي قلابة عن أبي الأشعث عن عبادة بن الصامت مرفوعا به. وهو
طرف حديث المبايعة عند أحمد ومسلم.
وهذا القدر منه عزاه السيوطي للطيالسي
فقط فقصر، ولقد وهم المناوي في إعلاله وهما فاحشا، فقال: ` رمز لحسنه،
وفيه أبو الأشعث، أورده الذهبي في ` الضعفاء `، وقال: هو جعفر بن الحارث،
كوفي نزل واسطا، ضعفوه `! وليس كما توهم المناوي، فإن أبا الأشعث هذا،
إنما هو الصنعاني كما وقع مصرحا به في رواية مسلم، وكما يعلم ذلك من رواية
أبي قلابة عنه، ومن غير ذلك، واسمه شراحيل بن آدة. ثم إن المناوي تناسى
في ` التيسير ` تعقبه لتحسين السيوطي، فجزم فيه بأن إسناده حسن! !
(لا يعضه) : أي لا يرميه بـ (العضيهة) ، وهو البهتان والكذب.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন):

"তোমাদের কেউ যেন কাউকে মিথ্যা অপবাদ বা বদনাম না দেয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2444)


2444 - ` لا ينكح الزاني المجلود إلا مثله `.
أخرجه أبو داود (1 / 321) والحاكم (2 / 166 و 193) وأحمد (2 / 324) عن
عمرو بن شعيب عن سعيد المقبري عن أبي هريرة مرفوعا. وفي رواية للحاكم من
طريق حبيب المعلم، قال: جاء رجل من أهل الكوفة إلى عمرو بن شعيب، فقال: ألا
تعجب أن الحسن يقول: الزاني المجلود لا ينكح إلا مجلودة مثله؟ فقال عمرو:
وما يعجبك؟ حدثناه سعيد المقبري عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم
وكان عبد الله بن عمرو ينادي بهذا `. وقال: ` صحيح الإسناد ` ووافقه الذهبي
وهو كما قالا. قوله: ` المجلود ` قال الشوكاني (6 / 124) : هذا الوصف خرج
مخرج الغالب، باعتبار من ظهر منه الزنى. وفيه دليل على أنه لا يحل للمرأة أن
تتزوج من ظهر منه الزنى وكذلك لا يحل للرجل أن يتزوج بمن ظهر
منها الزنى ويدل
على ذلك قوله تعالى: * (والزانية لا ينكحها إلا زان أو مشرك) * (¬1) `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: বেত্রাঘাতপ্রাপ্ত যেনাকারী তার সমতুল্য ছাড়া অন্য কাউকে বিবাহ করবে না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2445)


2445 - ` لا يقتل بعضكم بعضا [ولا يصب بعضكم (بعضا) ] ، وإذا رميتم الجمرة فارموا
بمثل حصا الخذف `.
أخرجه أبو داود (1966) والطيالسي (1660) وأحمد (3 / 503 و 6 / 376 و 379
) عن يزيد بن أبي زياد أخبرنا سليمان بن عمرو بن الأحوص عن أمه قالت: `
رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يرمي الجمرة في بطن الوادي وهو راكب يكبر
مع كل حصاة ورجل خلفه يستره، فسألت عن الرجل؟ فقالوا: الفضل بن العباس
وازدحم الناس، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: ... ` فذكره. والزيادة لأحمد
وسقط منه ما بين الهلالين واستدركته من: ` الزيادة على الجامع الصغير `.
وقد عزاه بالزيادة لأبي داود أيضا وابن ماجة! قلت: وهذا إسناد ضعيف، سليمان
بن عمرو هذا مجهول الحال، لم يوثقه غير ابن حبان ولم يرو عنه غير يزيد هذا
وشبيب بن غرقدة. ويزيد بن أبي زياد - وهو الهاشمي مولاهم - فيه ضعف من قبل
حفظه. لكن الحديث حسن، فإن له في ` المسند ` طريقين آخرين: الأولى: عن
الحجاج بن أرطأة عن أبي يزيد مولى عبد الله بن الحارث عن أم جندب الأزدية نحوه
دون الزيادة. وأبو يزيد هذا غير معروف، أورده الحافظ في ` التعجيل ` لهذه
الرواية ولم يزد! والأخرى: عن ليث عن عبد الله بن شداد عنها مرفوعا بلفظ:
` يا أيها الناس! عليكم السكينة والوقار، وعليكم بمثل حصى الخذف `.
¬_________
(¬1) النور: الآية: 3. اهـ.
قلت: ورجاله ثقات رجال الشيخين، إلا أن ليثا - وهو ابن سعد المصري - ولد
بعد وفاة عبد الله بن شداد - وهو ابن الهاد الليثي المدني - بأكثر من عشر سنين.




সুলাইমান ইবনু আমর ইবনুল আহওয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জননী থেকে বর্ণিত:
"তোমাদের কেউ যেন কাউকে হত্যা না করে [এবং তোমাদের কেউ যেন কাউকে আঘাত না করে]। আর যখন তোমরা জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ করবে, তখন তোমরা ’খাযফ’-এর কঙ্করের অনুরূপ (ছোট) কঙ্কর নিক্ষেপ করো।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2446)


2446 - ` يا بني بياضة! أنكحوا أبا هند، وانحكوا إليه. وكان حجاما `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (1 / 1 / 268 / 861) وأبو داود (2102) وابن
حبان (1249) والحاكم (2 / 164) وابن عدي (77 / 2) وابن الأعرابي في `
معجمه ` (214 / 1) من طريق حماد بن سلمة: حدثنا محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن
أبي هريرة: ` أن أبا هند حجم النبي صلى الله عليه وسلم في اليافوخ، فقال
النبي صلى الله عليه وسلم: ... ` فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن وصححه الحاكم
وفيه نظر بينته في أماكن مضت، منها الحديث (760) . قوله: (أنكحوا أبا هند
) : أي: زوجوه بناتكم. (وانكحوا إليه) : أي: اخطبوا إليه بناته، ولا
تخرجوه منكم للحجامة. كذا في ` عون المعبود `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"হে বানূ বায়াযা! তোমরা আবূ হিন্দের সাথে (তোমাদের কন্যাদের) বিবাহ দাও, এবং তোমরা তার নিকট (অর্থাৎ তার কন্যাদেরকে) বিবাহ করো। আর তিনি ছিলেন একজন সিঙ্গা প্রয়োগকারী (হাজ্জাম)।"