হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2547)


2547 - ` إن الله إذا استودع شيئا حفظه `.
أخرجه النسائي في ` عمل اليوم ` (509) وابن حبان (




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

নিশ্চয় আল্লাহ তাআলার কাছে যখন কোনো জিনিস আমানত রাখা হয়, তখন তিনি সেটিকে সংরক্ষণ করেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2548)


2548 - ` ما من ذي رحم يأتي رحمه فيسأله فضلا أعطاه الله إياه فيبخل عليه إلا أخرج له
يوم القيامة من جهنم حية يقال لها: شجاع، يتلمظ، فيطوق به `.
أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (1 / 235 /




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"এমন কোনো রক্তসম্পর্কীয় আত্মীয় নেই, যে তার অপর আত্মীয়ের কাছে এসে আল্লাহ প্রদত্ত অতিরিক্ত সম্পদ (বা অনুগ্রহ) চায়, আর সে (দাতা) তার প্রতি কৃপণতা করে—তবে অবশ্যই কিয়ামতের দিন জাহান্নাম থেকে তার জন্য এমন একটি সাপ বের করা হবে, যার নাম হলো ‘শুজা’ (ভয়ঙ্কর সাপ)। সেটি জিহ্বা বের করে চাটতে থাকবে এবং তাকে (কৃপণ ব্যক্তিকে) পেঁচিয়ে ধরবে (গলায় বেষ্টন করে নেবে)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2549)


2549 - ` أحسن ابن الخطاب `.
أخرجه أحمد (5 / 368) : حدثنا محمد بن جعفر حدثنا شعبة عن الأزرق بن قيس عن
عبد الله بن رباح عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم: أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم صلى العصر، فقام رجل يصلي، فرآه عمر، فقال له: اجلس، فإنما
هلك أهل الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصل. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال البخاري، وجهالة الصحابي لا
تضر، وهو أبو رمثة كما في رواية أبي داود (1007) من طريق المنهال بن خليفة
عن الأزرق بن قيس به نحوه. والمنهال ضعيف. وللحديث شاهد من حديث معاوية رضي
الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم أمر أن لا توصل صلاة بصلاة حتى يتكلم أو
يخرج. رواه مسلم وغيره، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (1034) . والحديث
نص صريح في تحريم المبادرة إلى صلاة السنة بعد الفريضة دون تكلم أو خروج، كما
يفعله كثير من الأعاجم وبخاصة منهم الأتراك، فإننا نراهم في الحرمين الشريفين
لا يكاد الإمام يسلم من الفريضة إلا بادر هؤلاء من هنا وهناك قياما إلى السنة
! وفي الحديث فائدة أخرى هامة، وهي جواز الصلاة بعد العصر، لأنه لو كان غير
جائز، لأنكر ذلك على الرجل أيضا كما هو ظاهر، وهو مطابق لما ثبت عن النبي
صلى الله عليه وسلم أنه كان يصلي بعد العصر ركعتين، ويدل على أن ذلك ليس من
خصوصياته صلى الله عليه وسلم، وما صح عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال: ` لا
صلاة بعد العصر حتى تغرب الشمس ` محمول على ما إذا كانت الشمس مصفرة، لأحاديث
صحت مقيدة
بذلك. وقد سبق تخريج بعضها مع الكلام عليها من الناحية الفقهية تحت
الحديث (200 و 314) .




জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে শুরু করল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখে বললেন, "বসো! কিতাবধারীরা (পূর্ববর্তী ধর্মাবলম্বীরা) তো কেবল এ কারণেই ধ্বংস হয়েছিল যে, তাদের এক সালাত থেকে আরেক সালাতের মধ্যে কোনো বিরতি (ব্যবধান) ছিল না।" তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও অনুরূপ কথা বললেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2550)


2550 - ` يا أيها الناس! لا ترفعوني فوق قدري، فإن الله اتخذني عبدا قبل أن يتخذني
نبيا `.
أخرجه الحاكم (3 / 179) من طريق علي بن قادم: حدثنا عبد السلام بن حرب عن
يحيى ابن سعيد قال: كنا عند علي بن الحسين فجاء قوم من الكوفيين، فقال
علي: يا أهل العراق أحبونا حب الإسلام، سمعت أبي يقول: قال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: فذكره. فذكرته لسعيد بن المسيب، فقال: وبعدما اتخذه نبيا
. وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي. قلت: وهو كما قالا.




হুসাইন ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "হে লোক সকল! আমাকে আমার মর্যাদার চেয়ে বেশি বাড়িয়ে দিও না। কারণ আল্লাহ আমাকে নবী হিসেবে গ্রহণ করার পূর্বে বান্দা হিসেবেই গ্রহণ করেছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2551)


2551 - ` ما من يوم أكثر من أن يعتق الله فيه عبدا من النار من يوم عرفة وإنه ليدنو،
ثم يباهي بهم الملائكة، فيقول: ما أراد هؤلاء؟ `.
أخرجه مسلم (4 / 107) والنسائي (2 / 44) وفي ` الكبرى ` أيضا (ق 83 / 1
) وابن ماجه (3014) والدارقطني في ` سننه ` (ص 289) وكذا البيهقي (5 /
118) وابن عساكر في جزء ` فضل عرفة ` (ق 2 / 2) كلهم من طريق مخرمة بن بكير
عن أبيه قال: سمعت يونس بن يوسف يحدث عن سعيد بن المسيب عن عائشة أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
(تنبيه) : قد وقع لبعض العلماء بعض
الأوهام في متن الحديث، فوجب بيانها ليكون القراء على حذر منها: أولا: قال
المنذري في ` الترغيب ` (2 / 129) بعدما عزاه لمسلم والنسائي وابن ماجه: `
وزاد رزين في ` جامعه ` فيه: اشهدوا ملائكتي! أني قد غفرت لهم `. فأقول:
هذه الزيادة لا أصل لها في شيء من روايات الحديث التى وقفت عليها، وقد ذكرت
آنفا مخرجيها، وإنما رويت هذه الزيادة من حديث جابر رضي الله عنه، لكن فيه
عنعنة أبي الزبير، مع الاختلاف عليه في لفظه، ولذلك أوردته في الكتاب الآخر
(679) وهو شاهد قوي لحديث الترجمة، دون قوله: ` فيقول: ما أراد هؤلاء؟ `
، وفيه: ` ينزل الله إلى السماء الدنيا `، بدل قوله: ` وإنه ليدنو `.
وإنا لنعهد من رزين أنه كثيرا ما يخلط بين حديث وحديث يختلفان في المخرج،
فيسوق أحدهما ثم يضم إليه زيادة من حديث آخر، دون أن يشير إلى ذلك، وقد تكون
زيادة لا أصل لها في شيء من طرق الحديث. والله أعلم. ثانيا: أورد السيوطي
حديث الترجمة في ` الجامع الكبير ` من رواية مسلم والنسائي وابن ماجه أيضا
بلفظ: ` عبدا أو أمة `. فهذه الزيادة ` أو أمة ` لا أصل لها أيضا عندهم،
ولا عند غيرهم ممن أخرج الحديث. وانطلى أمرها على صاحب ` الفتح الكبير في ضم
الزيادة إلى الجامع الصغير `، وعلي أيضا حينما جعلت ` الفتح ` قسمين: ` صحيح
الجامع الصغير وزيادته ` و ` ضعيف الجامع الصغير وزيادته `، فأوردت الحديث
في القسم الأول برقم (5672) ، فمن كان عنده فليعلق عليه بما يدل على أن هذه
الزيادة لا أصل لها.
ثالثا: جاء الحديث في ` الترغيب ` (2 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

আরাফাতের দিনের চেয়ে এমন কোনো দিন নেই, যেদিন আল্লাহ তাআলা এত বেশি বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ) নিকটবর্তী হন, অতঃপর তিনি (হাজিদের) নিয়ে ফেরেশতাদের কাছে গর্ব করেন (বাহা করেন)। তিনি জিজ্ঞেস করেন: এরা কী চেয়েছে?









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2552)


2552 - ` إن الله عز وجل أنزل: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم الكافرون) *
و* (أولئك هم الظالمون) * و * (أولئك هم الفاسقون) *. قال ابن عباس: أنزلها
الله في الطائفتين من اليهود، وكانت إحداهما قد قهرت الأخرى في الجاهلية حتى
ارتضوا واصطلحوا على أن كل قتيل قتله (العزيزة) من (الذليلة) فديته خمسون
وسقا، وكل قتيل قتله (الذليلة) من (العزيزة) فديته مائة وسق، فكانوا على
ذلك، حتى قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة، فذلت الطائفتان كلتاهما
لمقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم، ويؤمئذ لم يظهر ولم يوطئهما عليه (¬1)
وهو في الصلح، فقتلت الذليلة من العزيزة قتيلا، فأرسلت (العزيزة) إلى (
الذليلة) أن ابعثوا إلينا بمائة وسق، فقالت (الذليلة) : وهل كان هذا في
حيين قط دينهما واحد، ونسبهما واحد، وبلدهما واحد، دية بعضهم نصف دية بعض
؟ ! إنا إنما أعطيناكم هذا ضيما
¬_________
(¬1) لفظ الطبراني: ` ورسول الله صلى الله عليه وسلم يؤمئذ لم يظهر عليهم ولم
يوطئهما، وهو الصلح `. اهـ.
منكم لنا، وفرقا منكم، فأما إذ قدم محمد فلا
نعطيكم ذلك، فكادت الحرب تهيج بينهما، ثم ارتضوا على أن يجعلوا رسول الله
صلى الله عليه وسلم بينهما، ثم ذكرت (العزيزة) فقالت: والله ما محمد
بمعطيكم منهم ضعف ما يعطيهم منكم، ولقد صدقوا، ما أعطونا هذا إلا ضيما منا
وقهرا لهم، فدسوا إلى محمد من يخبر لكم رأيه، إن أعطاكم ما تريدون حكمتموه
وإن لم يعطكم حذرتم فلم تحكموه. فدسوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ناسا
من المنافقين ليخبروا لهم رأي رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما جاء رسول
الله صلى الله عليه وسلم أخبر الله رسوله بأمرهم كله وما أرادوا، فأنزل الله
عز وجل: * (يا أيها الرسول لا يحزنك الذين يسارعون في الكفر من الذين قالوا:
آمنا) * إلى قوله: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم الفاسقون) *، ثم
قال: فيهما والله نزلت، وإياهما عنى الله عز وجل `.
أخرجه أحمد (1 / 246) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 95 / 1) من
طريق عبد الرحمن بن أبي الزناد عن أبيه عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن
مسعود عن ابن عباس قال: فذكره. وعزاه السيوطي في ` الدر المنثور ` (2 /
281) لأبي داود أيضا وابن جرير وابن المنذر وأبي الشيخ وابن مردويه عن ابن
عباس، وهو عند ابن جرير في ` التفسير ` (12037 ج 10 / 352) من هذا الوجه،
لكنه لم يذكر في إسناده ابن عباس. وعند أبي داود (3576) نزول الآيات الثلاث
في اليهود خاصة في قريظة والنضير. فقط خلافا لما يوهمه قول ابن كثير في `
التفسير ` (6 / 160) بعد ما ساق رواية أحمد هذه المطولة: ` ورواه أبو داود
من حديث ابن أبي الزناد عن أبيه نحوه `!
وقد نقل عنه صاحب ` الروض الباسم في
الذب عن سنة أبي القاسم ` أنه حسن إسناده. ولم أر هذا في كتابه: ` التفسير `
، فلعله في بعض كتبه الأخرى. وتحسين هذا الإسناد هو الذي تقتضيه قواعد هذا
العلم الشريف، فإن مداره على عبد الرحمن بن أبي الزناد، وهو كما قال الحافظ
: ` صدوق، تغير حفظه لما قدم بغداد، وكان فقيها `. فقول الهيثمي (7 / 16)
: ` رواه أحمد والطبراني بنحوه، وفيه عبد الرحمن بن أبي الزناد، وهو ضعيف
، وقد وثق، وبقية رجال أحمد ثقات `. قلت: فقوله فيه: ` ضعيف، وقد وثق `
ليس بجيد لأنه يرجح قول من ضعفه على قول من وثقه، والحق أنه وسط حسن الحديث،
إلا أن يخالف وهذا مما لا يستفاد من قوله المذكور فيه. والله أعلم. (فائدة
هامة) : إذا علمت أن الآيات الثلاث: * (ومن لم يحكم بما أنزل الله فأولئك هم
الكافرون) *، * (فأولئك هم الظالمون) *، * (فأولئك هم الفاسقون) * نزلت في
اليهود وقولهم في حكمه صلى الله عليه وسلم: ` إن أعطاكم ما تريدون حكمتموه،
وإن لم يعطكم حذرتم فلم تحكموه `، وقد أشار القرآن إلى قولهم هذا قبل هذه
الآيات فقال: * (يقولون إن أوتيتم هذا فخذوه، وإن لم تؤتوه فاحذروا) *، إذا
عرفت هذا، فلا يجوز حمل هذه الآيات على بعض الحكام المسلمين وقضاتهم الذين
يحكمون بغير ما أنزل الله من القوانين الأرضية، أقول: لا يجوز تكفيرهم بذلك،
وإخراجهم من الملة إذا كانوا مؤمنين بالله ورسوله، وإن كانوا مجرمين بحكمهم
بغير ما أنزل الله، لا يجوز ذلك، لأنهم وإن كانوا كاليهود من جهة حكمهم
المذكور، فهم مخالفون لهم من جهة
أخرى، ألا وهي إيمانهم وتصديقهم بما أنزل
الله، بخلاف اليهود الكفار، فإنهم كانوا جاحدين له كما يدل عليه قولهم
المتقدم: ` ... وإن لم يعطكم حذرتموه فلم تحكموه `، بالإضافة إلى أنهم ليسوا
مسلمين أصلا، وسر هذا أن الكفر قسمان: اعتقادي وعملي. فالاعتقادي مقره
القلب. والعملي محله الجوارح. فمن كان عمله كفرا لمخالفته للشرع، وكان
مطابقا لما وقر في قلبه من الكفر به، فهو الكفر الاعتقادي، وهو الكفر الذي
لا يغفره الله، ويخلد صاحبه في النار أبدا. وأما إذا كان مخالفا لما وقر في
قلبه، فهو مؤمن بحكم ربه، ولكنه يخالفه بعمله، فكفره كفر عملي فقط، وليس
كفرا اعتقاديا، فهو تحت مشيئة الله تعالى إن شاء عذبه، وإن شاء غفر له،
وعلى هذا النوع من الكفر تحمل الأحاديث التي فيها إطلاق الكفر على من فعل شيئا
من المعاصي من المسلمين، ولا بأس من ذكر بعضها:




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল নাযিল করেছেন: "আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন তদনুসারে বিচার করে না, তারা কাফির" (সূরা মায়েদা ৫:৪৪), "তারা যালিম" (সূরা মায়েদা ৫:৪৫), এবং "তারা ফাসিক" (সূরা মায়েদা ৫:৪৭)।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহ তাআলা এই আয়াতগুলো ইয়াহুদিদের দুটি দলের ব্যাপারে নাযিল করেছেন। জাহেলিয়াতের যুগে তাদের এক দল অন্য দলের উপর আধিপত্য বিস্তার করেছিল। এক পর্যায়ে তারা এই মর্মে সমঝোতা ও সন্ধি করেছিল যে, ক্ষমতাবান দলটি (আল-‘আযীযা) দুর্বল দলের (আয-যালীলা) কোনো লোককে হত্যা করলে তার দিয়াত হবে পঞ্চাশ ওয়াসাক (খেজুর), আর দুর্বল দলটি ক্ষমতাবান দলের কোনো লোককে হত্যা করলে তার দিয়াত হবে একশ’ ওয়াসাক। তারা এই চুক্তিতেই ছিল, যতক্ষণ না নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মদীনায় আগমন করলেন।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর আগমনের কারণে উভয় দলই (সাময়িকভাবে) দুর্বল হয়ে পড়ল। তখনো তিনি তাদের ওপর (পুরোপুরি) কর্তৃত্ব প্রতিষ্ঠা করেননি এবং সেই চুক্তির ওপর তাদের স্থিতিশীলও রাখেননি। এমন সময় দুর্বল দলটি ক্ষমতাবান দলের একজনকে হত্যা করল। তখন ক্ষমতাবান দলটি দুর্বল দলের কাছে বার্তা পাঠাল যে, তোমরা আমাদের একশ’ ওয়াসাক (খেজুর) পাঠিয়ে দাও। দুর্বল দলটি বলল: একই ধর্ম, একই বংশ এবং একই দেশের দুটি দলের মধ্যে কি কখনো এমন হয়েছে যে, তাদের কারো দিয়াত অন্যের দিয়াতের অর্ধেক হবে?! আমরা তো তোমাদেরকে এই চুক্তি দিয়েছিলাম তোমাদের পক্ষ থেকে আমাদের প্রতি জুলুমের কারণে এবং তোমাদের ভয়ে। এখন যখন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগমন করেছেন, তখন আমরা তোমাদেরকে তা আর দেব না। এতে তাদের মাঝে যুদ্ধ বেঁধে যাওয়ার উপক্রম হলো।

এরপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে বিচারক মানতে রাজি হলো। তখন ক্ষমতাবান দলটি নিজেদের মধ্যে আলোচনা করে বলল: আল্লাহর কসম, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদের কাছ থেকে তাদের দ্বিগুণ দিয়াত আদায় করে দেবেন না, যা তারা তোমাদের থেকে আদায় করে। তারা (দুর্বল দলটি) সত্যই বলেছে, তারা তো আমাদেরকে এই চুক্তি দিয়েছিল আমাদের পক্ষ থেকে তাদের প্রতি জুলুম ও তাদের ওপর আমাদের কর্তৃত্বের কারণে। অতএব, তোমরা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এমন লোক পাঠাও যারা তোমাদের জন্য তাঁর সিদ্ধান্ত জানতে পারবে। যদি তিনি তোমাদের চাওয়ামতো ফয়সালা দেন, তবে তোমরা তাঁকে বিচারক হিসেবে মেনে নেবে। আর যদি তা না দেন, তবে সতর্ক থাকবে এবং তাঁকে বিচারক হিসেবে মানবে না। অতঃপর তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে তাঁর সিদ্ধান্ত জানার জন্য কিছু মুনাফিক লোককে পাঠাল।

যখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এলো, তখন আল্লাহ তাআলা রাসূলকে তাদের পুরো ব্যাপার এবং তাদের উদ্দেশ্য সম্পর্কে জানিয়ে দিলেন। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল নাযিল করলেন: "হে রাসূল! যারা কুফরের দিকে দ্রুত ধাবিত হয় তাদের জন্য আপনি চিন্তিত হবেন না— যারা মুখে বলেছে, ‘আমরা ঈমান এনেছি’..." থেকে শুরু করে তাঁর বাণী: "...আর যারা আল্লাহ যা নাযিল করেছেন তদনুসারে বিচার করে না, তারা ফাসিক" পর্যন্ত।

(ইবনে আব্বাস) এরপর বললেন: আল্লাহর কসম! এই আয়াতগুলো তাদের দুজনের ব্যাপারেই নাযিল হয়েছে এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল তাদের উদ্দেশ্যেই (এগুলো) বলেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2553)


2553 - ` من خرج حاجا فمات كتب الله له أجر الحاج إلى يوم القيامة، ومن خرج معتمرا
فمات كتب الله له أجر المعتمر إلى يوم القيامة، ومن خرج غازيا في سبيل الله
فمات كتب الله له أجر الغازي إلى يوم القيامة `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (4 / 1505) : حدثنا إبراهيم بن زياد - سبلان - :
أخبرنا أبو معاوية أخبرنا محمد بن إسحاق عن جميل بن أبي ميمونة عن عطاء بن يزيد
الليثي عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وتابع أبا يعلى، الحافظ الطبراني في ` الأوسط ` (2 / 24 / 2 / 5454) : حدثنا
محمد ابن السري قال: أخبرنا إبراهيم بن زياد - سبلان - به. وقال: ` تفرد به
أبو معاوية `. ومن طريقه أخرجه ابن أبي حاتم في ` العلل ` (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যে ব্যক্তি হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত হাজ্জের সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন। আর যে ব্যক্তি উমরার উদ্দেশ্যে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত উমরার সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন। আর যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় (জিহাদের উদ্দেশ্যে) গাজি হিসেবে বের হয় এবং পথেই মৃত্যুবরণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য কিয়ামত দিবস পর্যন্ত গাজীর সাওয়াব লিপিবদ্ধ করে দেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2554)


2554 - ` ما خالط قلب امرئ مسلم رهج (¬1) في سبيل الله إلا حرم الله عليه النار `.
¬_________
(¬1) أي: الغبار. اهـ.
أخرجه أحمد (6 / 85) : حدثنا أبو اليمان قال: حدثنا إسماعيل بن عياش عن
الأوزاعي عن عبد الرحمن بن القاسم عن أبيه عن عائشة: أن مكاتبا لها دخل
عليها ببقية مكاتبته، فقالت له: أنت غير داخل علي غير مرتك هذه، فعليك
بالجهاد في سبيل الله، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير إسماعيل بن عياش
وهو ثقة في روايته عن الشاميين، وهذه منها. وقال المنذري (2 / 168) وتبعه
الهيثمي (5 / 276) : ` رواه أحمد، ورواته ثقات `. قلت: وأخرجه ابن أبي
عاصم (ق 84 / 2) من طريق سويد بن عبد العزيز: حدثنا الأوزاعي به. قلت:
وقد وجدت له طريقا أخرى قد يعتضد به ويقوى، فقال الطبراني في ` الأوسط ` (2 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কোনো মুসলিম ব্যক্তির হৃদয়ে আল্লাহর পথের (জিহাদের) ধূলি বা ধূলিকণা প্রবেশ করলে, আল্লাহ অবশ্যই তার জন্য জাহান্নামের আগুন হারাম করে দেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2555)


2555 - ` من رمى بسهم في سبيل الله كان له نورا يوم القيامة `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (ص




যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে একটি তীর নিক্ষেপ করবে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য নূরে (আলো) পরিণত হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2556)


2556 - ` من جرح جرحا في سبيل الله جاء يوم القيامة ريحه ريح المسك ولونه لون
الزعفران عليه طابع الشهداء ومن سأل الله الشهادة مخلصا أعطاه الله أجر شهيد
وإن مات على فراشه `.
أخرجه ابن حبان (




হাদীসে বর্ণিত হয়েছে:

যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে কোনো আঘাতপ্রাপ্ত হয়, কিয়ামতের দিন সে এমন অবস্থায় আসবে যে তার ক্ষতস্থানের ঘ্রাণ হবে কস্তুরীর ঘ্রাণের ন্যায় এবং তার রঙ হবে জাফরানের রঙের ন্যায়। তার উপর শহীদদের সীলমোহর থাকবে। আর যে ব্যক্তি আন্তরিকতার সাথে আল্লাহর কাছে শাহাদাত (মৃত্যু) কামনা করে, আল্লাহ তাকে শহীদের সওয়াব দান করেন, যদিও সে নিজ বিছানায় মৃত্যুবরণ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2557)


2557 - ` ما من قوم اجتمعوا في مجلس، فتفرقوا ولم يذكروا الله إلا كان ذلك المجلس
حسرة عليهم يوم القيامة `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (مصورة الجامعة الإسلامية 4 / 434) والبيهقي
في ` الشعب ` (1 / 400 / 533) من طريق شداد بن سعيد الراسبي: حدثنا جابر بن
عمرو الراسبي عن عبد الله بن مغفل قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم
: فذكره، وقال: ` لا يروى عن عبد الله بن مغفل إلا بهذا الإسناد `.
قلت:
وهو حسن في الشواهد والمتابعات، فإن جابر بن عمرو، وشداد بن سعيد، وإن
كانا من رجال مسلم ففيهما ضعف من قبل حفظهما، وقال المنذري في ` الترغيب ` (
2 / 236) : ` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، والبيهقي، ورواة
الطبراني محتج بهم في (الصحيح) `. وقال الهيثمي (10 / 80) : ` رواه
الطبراني في ` الأوسط ` و ` الكبير `، ورجالهما رجال (الصحيح) `. قلت:
وقد تقدمت بعض شواهده من حديث أبي هريرة وغيره، فراجع الأرقام (




আব্দুল্লাহ ইবনে মুগাফ্ফাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

এমন কোনো সম্প্রদায় নেই যারা কোনো মজলিসে একত্রিত হলো, অতঃপর আল্লাহ্‌র যিকির (স্মরণ) না করেই সেখান থেকে বিদায় নিলো, কিন্তু কিয়ামতের দিন সেই মজলিসটি তাদের জন্য অবশ্যই আফসোস ও অনুতাপের কারণ হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2558)


2558 - ` أفضل الجهاد عند الله يوم القيامة الذين يلقون في الصف الأول فلا يلفتون
وجوههم حتى يقتلوا، أولئك يتلبطون في الغرف العلى من الجنة ينظر إليهم ربك،
إن ربك إذا ضحك إلى قوم فلا حساب عليهم `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (2 /




মু’আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আল্লাহ্‌র নিকট ক্বিয়ামতের দিন শ্রেষ্ঠতম জিহাদ হচ্ছে তাদের জন্য, যারা প্রথম সারিতে শত্রুর মোকাবিলা করে এবং শহীদ হওয়া পর্যন্ত মুখমণ্ডল ফিরিয়ে নেয় না (পিঠ দেখায় না)। তারাই জান্নাতের সুউচ্চ কক্ষসমূহে (গুরফাহ্) আরামদায়ক জীবন যাপন করবে; আপনার রব তাদের প্রতি দৃষ্টিপাত করবেন। নিশ্চয় আপনার রব যখন কোনো দলের প্রতি হাসেন (সন্তুষ্ট হন), তখন তাদের কোনো হিসাব-নিকাশ থাকবে না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2559)


2559 - ` أول ثلة (¬1) يدخلون الجنة الفقراء المهاجرون الذين تتقى بهم المكاره، إذا
أمروا سمعوا وأطاعوا وإن كانت للرجل منهم حاجة إلى السلطان لم تقض له حتى
يموت وهي في صدره، وإن الله عز وجل ليدعو يوم القيامة الجنة فتأتي بزخرفها
وزينتها فيقول: أين عبادي الذين قاتلوا في سبيلي وقوتلوا وأوذوا في سبيلي
وجاهدوا في سبيلي، ادخلوا الجنة، فيدخلونها بغير حساب. وتأتي الملائكة
فيسجدون، فيقولون: ربنا نحن نسبح بحمدك الليل والنهار ونقدس لك، من هؤلاء
الذين آثرتهم علينا؟ فيقول الرب عز وجل: هؤلاء عبادي الذين قاتلوا في سبيلي
وأوذوا في سبيلي، فتدخل عليهم الملائكة من كل باب * (سلام عليكم بما صبرتم فنعم
عقبى الدار) * [الرعد: 24] `.
أخرجه الأصفهاني في ` الترغيب والترهيب ` (ص




জান্নাতে প্রবেশকারী প্রথম দল হবে দরিদ্র মুহাজিরগণ, যাদের মাধ্যমে বিপদ-আপদ দূরীভূত হয়। যখন তাদের কোনো নির্দেশ দেওয়া হয়, তখন তারা তা মনোযোগ দিয়ে শোনে এবং পুরোপুরি মেনে নেয়। যদি তাদের কারো শাসকের কাছে কোনো প্রয়োজন থাকে, তবে তার মৃত্যু হওয়ার পূর্ব পর্যন্ত সেই প্রয়োজন পূরণ হয় না এবং তা তার হৃদয়েই থেকে যায়।

আর কিয়ামতের দিন আল্লাহ তা‘আলা জান্নাতকে আহ্বান করবেন। তখন তা তার সব জমকালো সাজসজ্জা ও অলঙ্কারাদি নিয়ে হাজির হবে। অতঃপর আল্লাহ বলবেন: আমার সেই বান্দারা কোথায়, যারা আমার পথে যুদ্ধ করেছে, যাদেরকে আমার পথে হত্যা করা হয়েছে, আমার পথে কষ্ট দেওয়া হয়েছে এবং আমার পথে জিহাদ করেছে? তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করো। তখন তারা বিনা হিসাবে জান্নাতে প্রবেশ করবে।

অতঃপর ফেরেশতারা এসে সিজদায় লুটিয়ে পড়বে এবং বলবে: হে আমাদের রব! আমরা তো দিন-রাত আপনার প্রশংসার সাথে তাসবিহ করি এবং আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করি। এরা কারা, যাদের আপনি আমাদের উপর প্রাধান্য দিলেন?

তখন পরাক্রমশালী রব বলবেন: এরাই হলো আমার সেই বান্বারা, যারা আমার পথে যুদ্ধ করেছে এবং আমার পথে কষ্ট ভোগ করেছে।

অতঃপর ফেরেশতারা তাদের কাছে প্রতিটি দরজা দিয়ে প্রবেশ করবে [এবং বলবে]: "তোমাদের প্রতি শান্তি; তোমরা ধৈর্য ধারণ করেছিলে। আর এই (আখিরাতের) আবাস কতই না উত্তম!" (সূরা আর-রাদ: ২৪)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2560)


2560 - ` أين ذهبتم؟! إنما هي يا أيها الذين آمنوا لا يضركم من ضل - من الكفار - إذا
اهتديتم `.
أخرجه أحمد (4 / 129 و




তোমরা কোথায় চলে গেলে?! (বিষয়টি তো এই) যে, "হে মুমিনগণ! যারা পথভ্রষ্ট হয়েছে, (তারা তোমাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না)—(এই পথভ্রষ্টরা হলো) কাফিরদের মধ্য থেকে—যদি তোমরা নিজেরা সৎপথে (হিদায়াতের উপর) থাকো।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2561)


2561 - ` من لم يغز أو يجهز غازيا أو يخلف غازيا في أهله بخير أصابه الله سبحانه
بقارعة قبل يوم القيامة `.
أخرجه أبو داود (2503) وعنه البيهقي (9 / 48) والدارمي (2 / 209) وابن
ماجه (2762) وابن أبي عاصم في ` الجهاد ` (83 / 1) والطبراني في ` مسند
الشاميين ` (ص 176) وفي ` المعجم الكبير ` (8 / 211 / 7747) وأبو العباس
المقدسي في ` فضل الجهاد ` (ق 120 / 2) من طرق عن الوليد بن مسلم: حدثنا
يحيى ابن الحارث الذماري عن القاسم عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه
وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن إن شاء الله تعالى، رجاله ثقات،
على خلاف في القاسم وهو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة،
والمتقرر فيه أنه حسن الحديث، والوليد بن مسلم، وإن كان يخشى منه تدليس
التسوية، فالقاسم مشهور الرواية عن أبي أمامة، وكذا الذماري عنه. وفي `
مسند الروياني ` (30 / 217 / 2) ومن طريقه ابن عساكر في ` الأربعين في الحث
على الجهاد ` (ص 84) التصريح بالتحديث مكان (عن) في سائر المواضع.
وتابعه
مسلمة بن علي الخشني عن الذماري به. أخرجه الطبراني في ` الشاميين ` (ص 175)
. وله شاهد من حديث واثلة بن الأسقع مرفوعا به. قال الهيثمي (5 / 284) : `
رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه سويد بن عبد العزيز، وهو ضعيف `. وروى
نجدة بن نفيع عن ابن عباس رضي الله عنهما أن رسول الله صلى الله عليه وسلم
استنفر حيا من العرب، فتثاقلوا، فنزلت: * (إلا تنفروا يعذبكم عذابا أليما) *
، قال: كان عذابهم: حبس المطر عنهم. أخرجه البيهقي، ونجدة مجهول كما في `
التقريب `. ثم رأيت الحديث في ` مسند الشاميين ` للطبراني، أخرجه (ص 53) من
طريق علي بن بحر: حدثنا الوليد بن مسلم عن سعيد بن عبد العزيز عن مكحول عن أبي
هريرة مرفوعا به. قلت: وهذا إسناد آخر للوليد بن مسلم مخالف للطريق الأولى
التي تقدمت من رواية الطرق، وراويه عنه علي بن بحر ثقة، فإن كان حفظه فيكون
للوليد بن مسلم إسنادان. وقد تابعه عمر بن سعيد الدمشقي قال: حدثنا سعيد بن
عبد العزيز التنوخي. أخرجه عبد بن حميد في ` المنتخب ` (1432) . ويؤيده أنه
رواه أبو حلبس عن عبد الملك بن مروان عن أبي هريرة به. أخرجه في ` مسند
الشاميين ` (ص 157) .
وأبو حلبس مجهول، وانظر (ص 159) . ثم وقفت على
الشاهد عند الطبراني في ` الأوسط ` (4 / 226 / 8497) ، فإذا هو يرويه من طريق
عمرو بن الحصين العقيلي: حدثنا محمد بن عبد الله بن علاثة حدثنا سويد بن عبد
العزيز عن مكحول عن واثلة به. وقال: ` لم يروه عن سعيد (!) بن عبد العزيز
إلا ابن علاثة، تفرد به عمرو بن الحصين `. قلت: هو متروك متهم كما تقدم
مرارا. فلا قيمة حينئذ لحديثه كشاهد. وقريب منه سويد بن عبد العزيز، لكني
أخشى أن يكون تحرف اسم (سويد) في السند من ` سعيد `، فإنه هكذا وقع في تذييل
الطبراني عليه، وهو الراجح عندي لأنه هو المعروف بالرواية عن مكحول بخلاف
سويد، وسعيد ثقة، لكنه كان اختلط.




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি নিজে জিহাদে অংশগ্রহণ করল না, অথবা কোনো যুদ্ধকারীর (গাজী) জন্য রসদপত্র প্রস্তুত করে দিল না, অথবা যুদ্ধকারীর অনুপস্থিতিতে তার পরিবারের কল্যাণমূলক দায়িত্ব নিল না, কিয়ামতের আগে আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা তাকে কোনো না কোনো মহাবিপদ (বা বিপর্যয়) দ্বারা আঘাত করবেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2562)


2562 - ` إذا مررتم برياض الجنة فارتعوا. قال: وما رياض الجنة؟ قال: حلق الذكر `.
أخرجه الترمذي (2 / 265) والبيهقي في ` شعب الإيمان ` (1 / 322) عن محمد
بن ثابت البناني قال: حدثني أبي عن أنس بن مالك رضي الله عنه أن رسول الله
صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. وقال الترمذي: ` حديث حسن غريب من هذا
الوجه `. وأقول: هذا من تساهل الترمذي رحمه الله، فإن محمد بن ثابت هذا
متفق على تضعيفه، وإن كان بعضهم أشار إلى أنه صدوق في نفسه، والضعف من قبل
حفظه، وقد أخرج حديثه هذا ابن عدي في ` الكامل ` (ق 290 / 1) في جملة
أحاديث ساقها له، ثم قال:
` وهذه الأحاديث مع غيرها مما لم أذكره عامتها مما
لا يتابع محمد بن ثابت عليه `. نعم لو أن الترمذي قال: ` حديث حسن ` لأصاب،
فقد وجدت له متابعا وشاهدا. أما المتابع، فهو زائدة بن أبي الرقاد قال:
حدثنا زياد النميري عن أنس به. أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (6 / 268) .
وزياد وزائدة ضعيفان وثقا، وقد حسن لهما الهيثمي (10 / 77) حديثا آخر لهما
عن أنس، فقال: ` وإسناده حسن `. أقول: فلا أقل من أن يستشهد بهما. وأما
الشاهد، فيرويه محمد بن عبد الله بن عامر: حدثنا قتيبة بن سعيد حدثنا مالك عن
نافع عن سالم عن ابن عمر مرفوعا به. أخرجه أبو نعيم (6 / 354) وقال: `
غريب من حديث مالك، لم نكتبه إلا من حديث محمد بن عبد الله بن عامر `. قلت:
ولم أعرفه، ويحتمل أن (عامر) محرف (نمير) ، فإن كان كذلك فهو ثقة. ثم
رأيت ما يرجح أنه هو، فقد ذكره المزي في الرواة عن قتيبة، ومن فوقه ثقات من
رجال الشيخين، فالإسناد صحيح، إن كان شيخ أبي نعيم (أبو الحسن علي ابن أحمد
بن عبد الله المقدسي) ثقة، أو متابعا، فإني لم أجد له ترجمة ولا في ` تاريخ
ابن عساكر `، على أن أبا نعيم في استغرابه المتقدم قد أشار إلى أنه قد توبع.
والله أعلم. وروى زيد بن الحباب أن حميدا المكي مولى ابن علقمة حدثه أن عطاء
بن أبي رباح حدثه عن أبي هريرة مرفوعا به، إلا أنه قال بدل ` حلق الذكر `:
`
المساجد `. قلت: وما الرتع يا رسول الله! قال: ` سبحان الله، والحمد لله
، ولا إله إلا الله، والله أكبر `. أخرجه الترمذي أيضا، وقال: ` حديث
حسن غريب `. قلت: حميد المكي مجهول كما قال الحافظ، فالإسناد ضعيف، فقول
الحافظ المنذري (2 / 251) : ` رواه الترمذي وقال: ` حديث غريب `، وقال
الحافظ: وهو مع غرابته حسن الإسناد `. قلت: فهذا من تساهل المنذري. كيف لا
، وحميد هذا لم يوثقه أحد، ولا روى عنه غير زيد بن الحباب، وقال البخاري
في حديثه هذا: ` لا يتابع عليه `. ثم إن هناك تغايرا بين ما نقلته عن الترمذي
، وما نقله المنذري عنه، والأليق بحال الإسناد وحسن الظن بالترمذي - على
تساهله - ما نقله هو عنه: ` حديث غريب `، دون قوله: ` حسن `. والله أعلم.
وله شاهد آخر من حديث جابر مرفوعا نحوه في حديث له. أخرجه الحاكم (1 /




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমরা জান্নাতের বাগানসমূহের পাশ দিয়ে যাও, তখন তোমরা তার মধ্যে বিচরণ করো (বা উপকৃত হও)।"
সাহাবী জিজ্ঞেস করলেন: "জান্নাতের বাগানসমূহ কী?"
তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন: "(সেগুলো হলো) যিকিরের মজলিস (বা আল্লাহর স্মরণের আলোচনা সভা)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2563)


2563 - ` من قال حين يصبح: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد
يحيي ويميت وهو على كل شيء قدير - عشر مرات، كتب الله له بكل واحدة قالها
عشر حسنات وحط عنه بها عشر سيئات ورفعه الله بها عشر درجات وكن له كعشر رقاب
وكن له مسلحة من أول النهار إلى آخره، ولم يعمل يؤمئذ عملا يقهرهن، فإن
قالها حين يمسي، فكذلك `.
أخرجه أحمد (5 / 420) والطبراني (4 / 151 / 3883) عن إسماعيل بن عياش عن
صفوان بن عمرو عن خالد بن معدان عن أبي رهم السمعي عن أبي أيوب الأنصاري عن
النبي صلى الله عليه وسلم به. قلت: وهذا إسناد صحيح شامي رجاله كلهم ثقات،
وأبو رهم اسمه أحزاب، وقد قيل بصحبته. ورواه ابن لهيعة: حدثني الحارث بن
يزيد عن ربيعة بن مطير عن أبي رهم به. أخرجه الطبراني رقم (3884) . وربيعة
بن مطير لم أعرفه، وعلى الهامش: ` ابن قيصر، صح `، ولم أعرفه أيضا. وفي
الرواة عن أبي رهم (واسمه أحزاب) ربيعة بن قيصر، ويقال: ابن مصبر الحضرمي
المصري كما في ` تهذيب المزي `، وفي ` ثقات ابن حبان ` (4 / 230) : ` ربيعة
بن يورا المصري `، وهو مجهول. انظر ` تيسير الانتفاع `.
وقد وجدت له طرقا
أخرى، فرواه أبو الورد عن أبي محمد الحضرمي عن أبي أيوب مرفوعا به. أخرجه
أحمد (5 /




আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি সকালে এই দু’আটি দশবার পাঠ করে: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারিকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু, ইয়ুহয়ী ওয়া ইয়ুমিতু, ওয়া হুওয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর’ (অর্থাৎ: আল্লাহ ব্যতীত কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই, সমস্ত প্রশংসা তাঁরই। তিনিই জীবন দেন এবং তিনিই মৃত্যু দেন। আর তিনি সবকিছুর ওপর ক্ষমতাবান), আল্লাহ তাআলা তার জন্য এর প্রত্যেকটির বিনিময়ে দশটি করে নেকি লিখে দেন, তার থেকে দশটি গুনাহ মুছে দেন এবং তাকে দশটি মর্যাদা উন্নীত করেন। আর তা তার জন্য দশজন গোলাম আজাদ করার সমতুল্য হয়। এবং তা দিনের শুরু থেকে শেষ পর্যন্ত তার জন্য (শয়তানের আক্রমণ থেকে) একটি রক্ষাকবচ হিসেবে থাকে। সেদিন সে এমন কোনো কাজ করে না যা এই আমলগুলোকে পরাস্ত করতে পারে (অর্থাৎ এর চেয়ে উত্তম কোনো আমল করতে পারে না)। আর যদি সে ব্যক্তি সন্ধ্যায় এটি পাঠ করে, তবে অনুরূপ ফল লাভ করে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2564)


2564 - ` إن أولادكم هبة الله لكم * (يهب لمن يشاء إناثا ويهب لمن يشاء الذكور) * (¬1)
، فهم وأموالهم لكم إذا احتجتم إليها `.
أخرجه الحاكم (2 / 284) وعنه البيهقي (7 / 480) من طريق محمد بن علي بن
الحسن بن شقيق قال: سمعت أبي يقول: أنبأ أبو حمزة عن إبراهيم الصائغ عن حماد
عن إبراهيم عن الأسود عن عائشة رضي الله عنها قالت: قال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: فذكره، وقال: ` صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه هكذا،
وإنما اتفقا على حديث عائشة: أطيب ما أكل الرجل من كسبه، وولده من كسبه `.
¬_________
(¬1) الشورى: 49. اهـ.
قلت: وفيه وهمان. الأول: قوله: صحيح على شرط الشيخين، وإن وافقه الذهبي
، فإن إبراهيم الصائغ - هو ابن ميمون - ومحمد بن علي بن الحسن بن شقيق لم يخرج
لهما الشيخان شيئا. وحماد - وهو ابن أبي سليمان - لم يخرج له البخاري في `
صحيحه ` أصلا، وإنما في ` الأدب المفرد `، فهو صحيح فقط. والآخر: أن
الشيخين لم يخرجا أصلا حديث عائشة الآخر: ` أطيب ما أكل الرجل ... ` الحديث،
وإنما أخرجه بعض أصحاب السنن، وقد خرجته في ` إرواء الغليل ` (رقم 830
و1626) . وفي الحديث فائدة فقهية هامة قد لا تجدها في غيره، وهي أنه يبين أن
الحديث المشهور: ` أنت ومالك لأبيك ` (الإرواء 838) ليس على إطلاقه، بحيث
أن الأب يأخذ من مال ابنه ما يشاء، كلا، وإنما يأخذ ما هو بحاجة إليه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"নিঃসন্দেহে তোমাদের সন্তানরা তোমাদের জন্য আল্লাহর পক্ষ থেকে উপহার। (যেমন আল্লাহ বলেছেন:) ’তিনি যাকে ইচ্ছা কন্যা দান করেন এবং যাকে ইচ্ছা পুত্র দান করেন।’ [সূরা আশ-শুরা: ৪৯]

সুতরাং, তোমরা যখন তাদের বা তাদের সম্পদের মুখাপেক্ষী হবে, তখন তারা এবং তাদের সম্পদ তোমাদেরই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2565)


2565 - ` من صام يوما في سبيل الله باعد الله منه جهنم مسيرة مائة عام `.
أخرجه النسائي (2 / 314) وابن أبي عاصم في ` الجهاد ` (رقم 1 / 88 / 2)
والطبراني في ` الكبير ` (17 / 335 رقم 927) عن يحيى بن الحارث عن القاسم عن
عقبة بن عامر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا
إسناد جيد، رجاله ثقات، وفي القاسم - وهو ابن عبد الرحمن صاحب أبي أمامة -
كلام لا ينزل به حديثه عن مرتبة الحسن. وللحديث شاهد من رواية زبان عن فائد
عن سهل بن معاذ عن أبيه مرفوعا به، وزاد:
` سير المضمر المجتهد `. أخرجه
أبو يعلى في ` مسنده ` (1486) . قلت: وزبان فيه ضعف. وشاهد آخر من حديث
عمرو بن عبسة مرفوعا به نحوه دون الزيادة. قال المنذري (2 / 62) : ` رواه
الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط ` بإسناد لا بأس به `. وقال الهيثمي (3 /
194) : ` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، ورجاله موثقون `. أقول
: لكن رواه البخاري في ` التاريخ ` (1 / 2 / 234) وابن أبي عاصم (ق 89 / 1
) من طريق جنادة بن أبي خالد عن أبي شيبة عن عمرو بن عبسة بلفظ: ` سبعين خريفا
`. وأبو شيبة هذا - وهو المهري - ترجمه ابن أبي حاتم (4 / 2 / 390) برواية
بليح أيضا عنه، ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا، وذكره ابن حبان في ` الثقات
`. وجنادة ترجمه ابن أبي حاتم أيضا (1 / 1 / 515) برواية زيد بن أبي أنيسة
، وهو الراوي عنه لهذا الحديث، وفي ترجمته ذكره البخاري، ولم يذكر فيه
جرحا ولا تعديلا، وهو في ` ثقات ابن حبان ` (6 / 150) وصرح الذهبي في `
الميزان (1 / 424) بجهالته.




উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (বা সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে) একদিন রোযা রাখে, আল্লাহ তার থেকে জাহান্নামকে একশত বছরের পথের দূরত্ব পরিমাণ দূরে সরিয়ে দেন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2566)


2566 - ` من سمع الناس بعمله سمع الله به مسامع خلقه يوم القيامة وحقره وصغره `.
أخرجه ابن المبارك في ` الزهد ` (رقم 141) وأحمد في ` مسنده ` (رقم 6509
و6986 و 7085) والطبراني في ` الأوسط ` (4 /




জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি মানুষকে তার আমল শুনিয়ে বেড়ায় (অর্থাৎ লোক দেখানোর জন্য কাজ করে), কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাকে তাঁর সমস্ত সৃষ্টির সামনে প্রকাশ করে দেবেন এবং তাকে হেয় ও লাঞ্ছিত করবেন।”