হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2667)


2667 - ` حسبك إذا ذكرت أخاك بما فيه `.
أخرجه أبو الشيخ في ` التوبيخ ` (188) والأصبهاني في ` الترغيب ` (580)
والبيهقي في ` الشعب ` (2 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তোমার ভাইয়ের মধ্যে যা বিদ্যমান, তা উল্লেখ করাই তোমার জন্য যথেষ্ট [গীবত হিসেবে প্রমাণিত হওয়ার জন্য]।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2668)


2668 - ` كان آدم نبيا مكلما، كان بينه وبين نوح عشرة قرون، وكانت الرسل ثلاثمائة
وخمسة عشر `.
أخرجه أبو جعفر الرزاز في ` مجلس من الأمالي ` (ق 178 / 1) : حدثنا
عبد
الكريم ابن الهيثم الديرعاقولي: حدثنا أبو توبة - يعني الربيع بن نافع - :
حدثنا معاوية بن سلام عن زيد بن سلام أنه سمع أبا سلام يقول: حدثني أبو
أمامة: ` أن رجلا قال: يا رسول الله! أنبيا كان آدم؟ قال: نعم، مكلم.
قال: كم كان بينه وبين نوح؟ قال: عشرة قرون. قال: يا رسول الله! كم كانت
الرسل؟ قال: ثلاثمائة وخمسة عشر `. قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم
ثقات رجال مسلم غير الديرعاقولي، وهو ثقة ثبت كما قال الخطيب في ` تاريخه ` (
11 / 78) وكذلك قال ابن حبان في ` الثقات ` (8 / 423) واعتمده السمعاني في
` الأنساب `، والذهبي في ` السير ` (13 /




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

এক ব্যক্তি আরজ করলো, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আদম (আঃ) কি নবী ছিলেন?”

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “হ্যাঁ, (তিনি ছিলেন) মুকাল্লাম (যার সাথে আল্লাহ সরাসরি কথা বলেছেন)।”

সে জিজ্ঞাসা করলো, “তাঁর এবং নূহ (আঃ)-এর মধ্যে কত বছরের ব্যবধান ছিল?”

তিনি বললেন, “দশ কুরুণ (দশ প্রজন্ম বা শতক)।”

লোকটি আবার জিজ্ঞাসা করলো, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! রাসূলগণের সংখ্যা কত ছিল?”

তিনি বললেন, “তিনশত পনের জন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2669)


2669 - ` ما من مسلم يفعل خصلة من هؤلاء إلا أخذت بيده حتى تدخله الجنة `.
أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (1 / 82 / 2) : حدثنا حفص بن عمر بن الصباح
الرقي أخبرنا أبو حذيفة موسى بن مسعود أخبرنا عكرمة بن عمار عن أبي زميل عن
مالك بن مرثد عن أبيه قال: ` قال أبو ذر: قلت: يا رسول الله! ماذا ينجي
العبد من النار؟ قال: الإيمان بالله. قلت: يا نبي الله! إن مع الإيمان عمل
؟ قال: يرضح مما رزقه الله، قلت: يا رسول الله! أرأيت إن كان فقيرا لا يجد
ما يرضح به؟ قال: يأمر بالمعروف وينهى
عن المنكر. قلت: يا رسول الله!
أرأيت إن كان عييا لا يستطيع أن يأمر بمعروف ولا ينهى عن منكر؟ قال: يصنع
لأخرق. قلت: أرأيت إن كان أخرق لا يستطيع أن يصنع شيئا؟ قال: يعين مغلوبا.
قلت: أرأيت إن كان ضعيفا لا يستطيع أن يعين مظلوما؟! فقال: ما تريد أن تترك
في صاحبك من خير؟! تمسك الأذى عن الناس. فقلت: يا رسول الله إذا فعل ذلك دخل
الجنة؟! قال: فذكره.. `. قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم موثقون، وقال
الهيثمي (3 / 135) : ` رواه الطبراني في ` الكبير `، ورجاله ثقات `. قلت:
وفيه تساهل ظاهر، فإن مرثدا والد مالك وهو ابن عبد الله الزماني لم يوثقه
غير ابن حبان والعجلي، ولم يرو عنه غير ابنه، ولذلك قال الحافظ فيه: `
مقبول `. وحفص بن عمر الرقي، قال أبو أحمد الحاكم: ` حدث بغير حديث لم
يتابع عليه `. وذكره ابن حبان في ` الثقات `، وقال: ` ربما أخطأ `. وقد
تابعه أبو الوليد الطيالسي: أخبرنا عكرمة بن عمار.. عند البيهقي في ` الشعب `
(3 / 204) . لكن للحديث طريق أخرى يتقوى بها، قال الأوزاعي: حدثني أبو كثير
السحيمي عن أبيه قال: سألت أبا ذر، قلت: دلني على عمل إذا عمل العبد به دخل
الجنة؟ قال: سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره بنحوه.
أخرجه
ابن حبان (863) والحاكم (1 / 63) وعنه البيهقي في ` الشعب ` (3 / 203)
، وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم، فقد احتج في كتابه بأبي كثير الزبيدي،
واسمه يزيد بن عبد الرحمن بن أذينة، وهو تابعي معروف، يقال له: أبو كثير
الأعمى `. ووافقه الذهبي. وتقدم من طريق آخر عن أبي ذر مختصرا (575) .
قلت: وقيل في اسمه: يزيد بن عبد الله بن أذينة، وقيل: ابن غفيلة. وظاهر
كلام الحاكم أن أباه من رجال مسلم، ولم أره في ` التهذيب ` لا في عبد الله بن
أذينة، ولا في عبد الرحمن بن أذينة. نعم، أورد فيه عبد الرحمن بن أذينة بن
سلمة العبدي الكوفي قاضي البصرة، روى عن أبيه وأبي هريرة وعنه أبو إسحاق
السبيعي وو ... ولم يذكر ابنه فيهم، فهو غير المترجم. والله أعلم.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! কোন জিনিস বান্দাকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেবে?"
তিনি বললেন: "আল্লাহর প্রতি ঈমান।"
আমি বললাম: "হে আল্লাহর নবী! ঈমানের সাথে কি আমলও প্রয়োজন?"
তিনি বললেন: "আল্লাহ তাকে যা রিযিক দিয়েছেন, তা থেকে সে কিছু দান করবে।"
আমি বললাম: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি মনে করেন, যদি সে দরিদ্র হয় এবং তার কাছে দান করার মতো কিছু না থাকে?"
তিনি বললেন: "সে সৎকাজের আদেশ করবে এবং অসৎকাজ থেকে নিষেধ করবে।"
আমি বললাম: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি মনে করেন, যদি সে এমন অক্ষম হয় যে সৎকাজের আদেশ বা অসৎকাজের নিষেধ করতে সক্ষম না হয়?"
তিনি বললেন: "সে দুর্বল ব্যক্তিকে সাহায্য করবে।"
আমি বললাম: "আপনি কি মনে করেন, যদি সে নিজেও দুর্বল হয় এবং কিছু করতে সক্ষম না হয়?"
তিনি বললেন: "সে পরাজিত বা নির্যাতিত ব্যক্তিকে সাহায্য করবে।"
আমি বললাম: "আপনি কি মনে করেন, যদি সে এতই দুর্বল হয় যে নির্যাতিত ব্যক্তিকে সাহায্য করতেও সক্ষম না হয়?"
তিনি তখন বললেন: "তুমি তোমার সাথীর (মুসলিম ভাইয়ের) মধ্যে আর কী ভালো গুণ বাকি রাখতে চাও? (তাহলে সে যেন) মানুষের কাছ থেকে কষ্টদায়ক জিনিস সরিয়ে রাখে।"
আমি বললাম: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! যখন সে এটি করবে, তখন কি সে জান্নাতে প্রবেশ করবে?"
তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো মুসলিম এই গুণাবলিগুলোর মধ্য থেকে কোনো একটি কাজ করলে, আমি তার হাত ধরে তাকে জান্নাতে প্রবেশ না করানো পর্যন্ত ছাড়ব না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2670)


2670 - ` كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم بمكة، فخرجنا في بعض نواحيها، فما استقبله
جبل ولا شجر إلا وهو يقول: السلام عليك يا رسول الله `.
أخرجه الترمذي (3630) والدارمي (1 / 12) وأبو نعيم في ` الدلائل ` (ص
138) والحاكم (2 / 620) عن الوليد بن أبي ثور عن السدي عن عباد بن أبي يزيد
عن علي بن أبي طالب قال: فذكره. وقال الترمذي: ` حديث [حسن] غريب `.
قلت: إسناده ضعيف، عباد هذا قال الذهبي: ` لا يدرى من هو ` والوليد بن أبي
ثور ضعيف، فلعل تحسين الترمذي إياه - وهو مما وقع في بعض النسخ ونقله
المنذري (2 / 146) عنه - إنما هو لأن له طريقا أخرى وشواهد يتقوى
بها،
وكذلك صححه الحاكم، ووافقه الذهبي. أما الطريق الأخرى، فهو ما أخرجه
الطبراني في ` الأوسط ` (3 /




আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মক্কায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম। অতঃপর আমরা মক্কার কোনো এক দিকে বের হলাম। (আমরা দেখলাম যে,) তাঁর সামনে দিয়ে যখনই কোনো পাহাড় বা বৃক্ষ অতিক্রম করত, তা তাঁকে সালাম না দিয়ে যেতো না। (প্রত্যেকটি পাহাড় ও বৃক্ষ) বলত: "আসসালামু আলাইকা, ইয়া রাসূলুল্লাহ" (আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক, হে আল্লাহর রাসূল)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2671)


2671 - ` من أخاف أهل المدينة أخافه الله `.
أخرجه ابن حبان (1039) من طريق عبد الرحمن بن عطاء عن محمد بن جابر بن عبد
الله عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. قلت: وهذا
إسناد جيد في المتابعات والشواهد، ورجاله ثقات إلا أن ابن
عطاء هذا فيه لين
كما قال الحافظ في ` التقريب `، وقد صح بإسناد آخر عن جابر بلفظ: ` ... فقد
أخاف ما بين جنبي `. أخرجه أحمد (3 / 354 و 393) مطولا ومختصرا. لكني وجدت
للفظ الترجمة شاهدا قويا من حديث السائب بن خلاد مرفوعا به وزاد: ` وعليه
لعنة الله والملائكة والناس أجمعين، لا يقبل منه صرف ولا عدل `. أخرجه
النسائي في ` الكبرى ` (89 / 2) وأحمد (3 / 55 و 56) والطبراني في `
المعجم الكبير ` (7 / 169 / 6631) من طريق يحيى بن سعيد عن مسلم بن أبي مريم
عن عطاء بن يسار عنه. وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين. ثم أخرجوه هم،
وأبو نعيم في ` الحلية ` (1 / 372) من طريق يزيد بن خصيفة عن عبد الرحمن بن
عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي صعصعة أن عطاء بن يسار أخبره به، وزاد: `
ظالما لهم `. وإسناده صحيح أيضا على شرط الشيخين، ويزيد هو ابن عبد الله بن
خصيفة المدني. والحديث أورده المنذري (2 / 147) برواية النسائي والطبراني
عن السائب بن خلاد مرفوعا بلفظ: ` اللهم من ظلم أهل المدينة، وأخافهم فأخفه
، وعليه لعنة الله ... ` إلخ. قلت: وهذا اللفظ للطبراني (6636) فقط،
فإنه ليس عند النسائي إلا باللفظ
المتقدم، وهو حسن بما قبله، ورجاله ثقات
غير عائشة بنت المنذر، والصواب (بنت الزبير) كما في ترجمة الراوي عنها (
معاوية بن عبد الله الزبيري) في كتاب ابن أبي حاتم وغيره، وقد وثقها ابن
حبان (7 / 307) .




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি মদীনার অধিবাসীদেরকে ভয় দেখাবে, আল্লাহ তাকে ভয় দেখাবেন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2672)


2672 - ` إن السيوف مفاتيح الجنة `.
أخرجه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (7 / 145 / 2) : حدثنا زيد بن حباب عن جعفر
بن سليمان الضبعي أخبرنا أبو عمران الجوني عن أبي بكر بن أبي موسى الأشعري
قال: سمعت أبي تجاه العدو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
فقال له رجل رث الهيئة: أنت سمعت هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال:
نعم، فسل سيفه، وكسر غمده والتفت إلى أصحابه وقال: أقرأ عليكم السلام،
ثم تقدم إلى العدو فقاتل حتى قتل. قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات
رجال الشيخين غير زيد بن الحباب وشيخه الضبعي، فهما من رجال مسلم وحده،
وفيهما كلام لا يضر. وله شاهد من رواية يزيد بن أبي زياد - وهو الهاشمي
مولاهم - عن مجاهد عن يزيد بن شجرة في خطبة له قال في آخرها: ` نبئت أن السيوف
مفاتيح الجنة `. رواه الطبراني من طريقين إحداهما جيدة صحيحة كما قال المنذري
(2 / 195) . وقال الهيثمي (5 / 294) : ` رجالها رجال الصحيح `. قلت:
أخرجه في ` الكبير ` (22 /




আবু মুসা আল-আশ’আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (শত্রুর সম্মুখীন অবস্থায়) বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি:

**“নিশ্চয়ই তলোয়ারসমূহ (জিহাদের) জান্নাতের চাবিসমূহ।”**

বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর দুর্বল বেশভূষার এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞেস করল, ‘আপনি কি এই কথা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে শুনেছেন?’ তিনি বললেন, ‘হ্যাঁ।’ তখন লোকটি তার তলোয়ার বের করল এবং তার খাপ ভেঙে ফেলল। এরপর তার সঙ্গীদের দিকে ফিরে বলল, ‘আপনাদের উপর আমার সালাম (আমি বিদায় জানালাম)।’ অতঃপর সে শত্রুর দিকে অগ্রসর হলো এবং যুদ্ধ করতে করতে শহীদ হয়ে গেল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2673)


2673 - ` ثلاثة لا ترى أعينهم النار يوم القيامة: عين بكت من خشية الله وعين حرست في
سبيل الله وعين غضت عن محارم الله `.
روي من حديث معاوية بن حيدة وعبد الله بن عباس وأبي ريحانة وأبي هريرة
وأنس بن مالك.




মুআবিয়া ইবনে হাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

তিন প্রকার চোখ রয়েছে, যাদেরকে কিয়ামতের দিন জাহান্নামের আগুন স্পর্শ করবে না: (১) এক চোখ যা আল্লাহর ভয়ে ক্রন্দন করেছে; (২) আর এক চোখ যা আল্লাহর পথে (নিরাপত্তা বা পাহারায়) নিয়োজিত ছিল; এবং (৩) এক চোখ যা আল্লাহর নিষিদ্ধ বস্তুসমূহ (হারাম) দেখা থেকে দৃষ্টিকে অবনত করেছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2674)


2674 - ` رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يعجن في الصلاة. يعني: يعتمد `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 239 /




[নাম উল্লেখ নেই] (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে সালাতের মধ্যে ‘আজন’ করতে দেখেছি। অর্থাৎ, তিনি (হাতের উপর) ভর দিচ্ছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2675)


2675 - ` من السنة النزول بـ (الأبطح) عشية النفر `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 198 /




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

প্রত্যাবর্তনের (নাফর) দিন সন্ধ্যাবেলায় আল-আবতাহ উপত্যকায় (কিছুক্ষণ) অবস্থান করা সুন্নাতের অন্তর্ভুক্ত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2676)


2676 - ` تلك سنة أبي القاسم صلى الله عليه وسلم. يعني إتمام المسافر إذا اقتدى
بالمقيم، وإلا فالقصر `.
هذه السنة الصحيحة يرويها قتادة عن موسى بن سلمة الهذلي عن ابن عباس رضي
الله عنه. ويرويه عن قتادة جمع: الأول: أيوب عنه عن موسى قال: كنا مع ابن
عباس بمكة، فقلت: إنا إذا كنا معكم صلينا أربعا، وإذا رجعنا إلى رحالنا
صلينا ركعتين؟ قال: فذكره. أخرجه أحمد (1 / 216) والسراج في ` مسنده ` (
ق 120 / 1) والطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 278 /




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মূসা ইবনে সালামাহ আল-হুযালী বলেন, আমরা মক্কায় ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। আমি বললাম: "আমরা যখন আপনাদের সাথে থাকি, তখন চার রাকাত সালাত আদায় করি, আর যখন আমরা আমাদের ডেরায় ফিরে যাই, তখন দুই রাকাত সালাত আদায় করি?"

তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন:
"এটা হলো আবুল কাসিম (রাসূলুল্লাহ) সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সুন্নাহ। এর অর্থ হলো: মুসাফির যদি মুকিমের (স্থায়ী বাসিন্দার) পেছনে ইক্তিদা করে (নামাজ পড়ে), তবে সে পরিপূর্ণ (চার রাকাত) আদায় করবে। অন্যথায় সে কসর (সংক্ষিপ্ত) করবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2677)


2677 - ` أولئك خيار عباد الله عند الله يوم القيامة: الموفون المطيبون `.
أخرجه أحمد (6 / 268) والبزار (1309) عن ابن إسحاق: حدثني هشام بن عروة
عن أبيه عن عائشة قالت: ابتاع رسول الله صلى الله عليه وسلم من رجل من
الأعراب جزورا - أو جزائر - بوسق من تمر الذخرة (وتمر الذخرة: العجوة) ،
فرجع به رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى بيته والتمس له التمر فلم يجده،
فخرج إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال له: ` يا عبد الله! إنا قد
ابتعنا منك جزورا - أو جزائر - بوسق من تمر الذخرة،
فالتمسناه فلم نجده ` قال
: فقال الأعرابي: واغدراه! قالت: فهم الناس وقالوا: قاتلك الله، أيغدر
رسول الله صلى الله عليه وسلم؟! قالت: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: `
دعوه، فإن لصاحب الحق مقالا `. ثم عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: `
يا عبد الله! إنا ابتعنا منك جزائر ونحن نظن أن عندنا ما سمينا لك،
فالتمسناه فلم نجده `، فقال الأعرابي: واغدراه! فنهمه الناس وقالوا: قاتلك
الله، أيغدر رسول الله صلى الله عليه وسلم؟! فقال رسول الله صلى الله عليه
وسلم: ` دعوه، فإن لصاحب الحق مقالا `، فردد رسول الله صلى الله عليه وسلم
ذلك مرتين أو ثلاثا، فلما رآه لا يفقه عنه قال لرجل من أصحابه: اذهب إلى خولة
بنت حكيم بن أمية فقل لها: رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لك: إن كان
عندك وسق من تمر الذخرة فأسلفيناه حتى نؤديه إليك إن شاء الله، فذهب إليه
الرجل، ثم رجع فقال: قالت: نعم، هو عندي يا رسول الله! فابعث من يقبضه،
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم للرجل: اذهب به فأوفه الذي له. قال: فذهب
به فأوفاه الذي له. قالت: فمر الأعرابي برسول الله صلى الله عليه وسلم وهو
جالس في أصحابه. فقال: جزاك الله خيرا، فقد أوفيت وأطيبت. قالت: فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن رجاله كلهم ثقات
رجال الشيخين غير ابن إسحاق - وهو محمد بن إسحاق بن يسار صاحب السيرة - وهو
حسن الحديث إذا صرح بالتحديث، فقد فعل كما ترى، فثبت الحديث والحمد لله.
وقال الهيثمي (4 / 140) : ` رواه أحمد والبزار، وإسناد أحمد صحيح `!
ونقله عنه الشيخ الأعظمي في تعليقه على ` الكشف ` وأقره! وذلك مما يدل
القارئ
على ضآلة علمه، وقلة معرفته بهذا الفن، وضيق باعه فيه، فإنه لم يبين سبب
التصحيح لسند أحمد دون سند البزار، ألا وهو التحديث وعدمه، وسكت عن
التصحيح، وإنما حقه التحسين كما فعلنا للخلاف المعروف في ابن إسحاق، وجل
تعليقاته من هذا النوع، لا تحقيق فيها ولا علم، وإنما هو مجرد النقل مما لا
يعجز عنه المبتدئون في هذا العلم كأمثاله من متعصبة الحنفية وغيرهم، ومع ذلك
لم يخجل بعضهم من السعي حثيثا لترشيحه لنيل جائزة السنة لهذه السنة (1400) من
الدولة السعودية تعصبا منه له، وصدق من قال: ` إن الطيور على أشكالها تقع `
! وإنما حظي بها الأعظمي الآخر، ولعلها وجدت محلها. ولله في خلقه شؤون.
ثم إن قوله صلى الله عليه وسلم: ` دعوه فإن لصاحب الحق مقالا `. قد جاء في
قصة أخرى مختصرا من حديث أبي هريرة عند الشيخين وغيرهما، وهو مخرج في `
أحاديث البيوع `. قوله: (الذخرة) : بمعنى الذخيرة، في ` اللسان `: `
والذخيرة: واحدة الذخائر، وهي ما ادخر، وكذلك (الذخر) والجمع: أذخار `
. ولم يعرفها الأعظمي فعلق عليها بقوله: ` كذا في الأصل مضبوطا بالقلم، وفي
` النهاية `: الذخيرة نوع من التمر معروف `! قلت: وهي مفسرة في رواية أحمد
بـ (العجوة) كما رأيت. (الموفون المطيبون) أي الذين يؤدون ما عليهم من
الحق بطيب نفس.
(نهمه) أي زجره. ثم وجدت له طريقا أخرى، فقال البزار (
1310) : حدثنا معمر بن سهل حدثنا خالد بن مخلد حدثنا يحيى بن عمير عن هشام به
، قال البزار نحوه. ثم قال: ` لا نعلم أحدا رواه عن هشام إلا يحيى `. قلت:
قال أبو حاتم: صالح الحديث. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (7 / 601) وقال
الذهبي: ` صدوق `. وهذا هو المعتمد، فقول الحافظ: ` مقبول `، غير مقبول.
وقد روى عنه أربعة من الثقات. وسائر الرجال ثقات، فالإسناد جيد، والحديث
به صحيح.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একজন বেদুঈনের কাছ থেকে একটি বা কয়েকটি উট খরিদ করলেন ’তামারুয যাখিরাহ’ (যা হলো আজওয়া খেজুর) এক ওয়াসাক (পরিমাণ) খেজুরের বিনিময়ে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উট নিয়ে তাঁর ঘরে ফিরে এলেন এবং সেই খেজুরের সন্ধান করলেন, কিন্তু তা পেলেন না।

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই বেদুঈনের কাছে এলেন এবং বললেন: "হে আব্দুল্লাহ! আমরা তোমার কাছ থেকে এক ওয়াসাক ’তামারুয যাখিরাহ’ খেজুরের বিনিময়ে একটি বা কয়েকটি উট ক্রয় করেছিলাম, কিন্তু আমরা তা খুঁজে পাচ্ছি না।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন সেই বেদুঈন বলে উঠলো: "হায় প্রতারণা!" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন লোকেরা ক্রুদ্ধ হলো এবং বললো: "আল্লাহ্‌ তোমাকে ধ্বংস করুন! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি প্রতারণা করেন?!"

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও। কারণ, যার প্রাপ্য হক আছে, তার কথা বলার অধিকার আছে।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পুনরায় ফিরে এসে বললেন: "হে আব্দুল্লাহ! আমরা তোমার কাছ থেকে উট ক্রয় করেছিলাম এবং আমরা ধারণা করেছিলাম যে আমাদের কাছে তোমার জন্য নির্ধারিত খেজুর রয়েছে, কিন্তু আমরা তা খুঁজে পেলাম না।"

বেদুঈন আবার বললো: "হায় প্রতারণা!" লোকেরা তাকে ধমক দিলো এবং বললো: "আল্লাহ্‌ তোমাকে ধ্বংস করুন! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি প্রতারণা করেন?!" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তাকে ছেড়ে দাও। কারণ, যার প্রাপ্য হক আছে, তার কথা বলার অধিকার আছে।"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এইভাবে দু’বার বা তিনবার বিষয়টি পুনরাবৃত্তি করলেন। যখন তিনি দেখলেন যে বেদুঈন সহজে বিষয়টি বুঝতে পারছে না, তখন তিনি তাঁর একজন সাহাবীকে বললেন: "তুমি যাও এবং খাওলা বিনতে হাকীম ইবনে উমাইয়্যার কাছে গিয়ে বলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তোমাকে বলছেন: যদি তোমার কাছে এক ওয়াসাক ’তামারুয যাখিরাহ’ খেজুর থাকে, তবে তা আমাদেরকে ঋণ হিসেবে দাও, যাতে আমরা আল্লাহ্‌ চাহেত তা তোমাকে পরিশোধ করতে পারি।"

লোকটি তাঁর কাছে গেলেন এবং ফিরে এসে বললেন: "তিনি বলেছেন: হ্যাঁ, হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আমার কাছে আছে। আপনি কাউকে পাঠিয়ে তা নিয়ে যাওয়ার ব্যবস্থা করুন।"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই সাহাবীকে বললেন: "যাও, সেটি নিয়ে তাকে তার প্রাপ্য পরিশোধ করে দাও।" সাহাবী গেলেন এবং তার প্রাপ্য তাকে পুরোপুরি পরিশোধ করে দিলেন।

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর সেই বেদুঈন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল, যখন তিনি তাঁর সাহাবীদের সাথে বসেছিলেন। সে তখন বললো: "আল্লাহ্‌ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন! আপনি তো পুরোপুরি পরিশোধ করেছেন এবং উত্তমরূপে (খোশমেজাজে) তা সম্পন্ন করেছেন।"

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:

"কিয়ামতের দিন আল্লাহ্‌র কাছে তারাই আল্লাহ্‌র বান্দাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হবে—যারা [কারো কাছে ঋণ বা ওয়াদা থাকলে] তা পূর্ণ করে এবং উত্তমরূপে (স্বেচ্ছায়/খোশমেজাজে) পরিশোধ করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2678)


2678 - ` ألا عسى أحدكم أن يضرب امرأته ضرب الأمة! ألا خيركم خيركم لأهله `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (رقم




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
সাবধান! তোমাদের কেউ কি তার স্ত্রীকে দাসীর মতো প্রহার করে? শোনো! তোমাদের মধ্যে সেই ব্যক্তিই সর্বোত্তম, যে তার পরিবারের (স্ত্রীর) কাছে সর্বোত্তম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2679)


2679 - ` من كن له ثلاث بنات يؤويهن ويرحمهن ويكفلهن وجبت له الجنة البتة. قيل: يا
رسول الله! فإن كانت اثنتين؟ قال: وإن كانت اثنتين. قال: فرأى بعض القوم
أن لو قالوا له: واحدة؟ لقال: واحدة `.
أخرجه الإمام أحمد (3 / 303) : حدثنا هشيم أنبأنا علي بن زيد عن محمد بن
المنكدر قال: حدثني جابر - يعني ابن عبد الله - قال: قال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن في المتابعات، ورجاله ثقات
رجال الشيخين غير علي بن زيد وهو ابن جدعان، وفيه ضعف من قبل حفظه، لكنه لم
يتفرد به كما يأتي. والحديث قال المنذري (3 /




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"যার তিনটি কন্যা সন্তান থাকে, আর সে তাদেরকে আশ্রয় দেয়, তাদের প্রতি দয়া করে এবং তাদের লালন-পালনের ভার নেয়, তার জন্য জান্নাত নিশ্চিতভাবে ওয়াজিব হয়ে যায়।"

জিজ্ঞেস করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! যদি দু’জন থাকে?"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি দু’জনও থাকে।"

(বর্ণনাকারী) বলেন: উপস্থিত কিছু লোক তখন মনে করল যে, যদি তারা তাঁকে বলতো: ’যদি একজন থাকে?’ তবে তিনি অবশ্যই বলতেন: ’যদি একজনও থাকে।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2680)


2680 - ` ما من امرأة تقدم ثلاثا من الولد تحتسبهن إلا دخلت الجنة. فقالت امرأة منهن
: أو اثنان؟ قال: أو اثنان `.
أخرجه الإمام أحمد (2 / 246) : حدثنا سفيان حدثنا سهيل بن أبي صالح عن أبيه
عن أبي هريرة:
جاء نسوة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلن: يا رسول
الله! ما نقدر عليك في مجلسك من الرجال، فواعدنا منك يوما نأتيك فيه. قال:
` موعدكن بيت فلان `. وأتاهن في ذلك اليوم، ولذلك الموعد. قال: فكان مما
قال لهن، يعني: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، و (سفيان)
هو ابن عيينة، وقد أخرجه في ` صحيحه ` (8 / 39) من طريق أخرى عن سهيل به
مختصرا، ولفظه: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال لنسوة من الأنصار: `
لا يموت لإحداكن ثلاثة من الولد فتحتسبه إلا دخلت الجنة `. فقالت امرأة منهن:
أو اثنين يا رسول الله؟ قال: ` أو اثنين `. وهو رواية لأحمد (2 / 378) .
والحديث في ` الصحيحين ` من حديث أبي سعيد نحوه، وهو في كتابي ` مختصر صحيح
البخاري ` (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"এমন কোনো নারী নেই, যার তিনজন সন্তান মারা যায় এবং সে এর বিনিময়ে আল্লাহর নিকট সওয়াব লাভের আশায় ধৈর্য ধারণ করে, কিন্তু সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।"

তখন তাদের মধ্য থেকে একজন নারী জিজ্ঞেস করলেন, "অথবা দুইজন (মারা গেলে)?"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "অথবা দুইজন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2681)


2681 - `




আরবী হাদিসের মূল পাঠ (MATAN) অনুপস্থিত। অনুগ্রহ করে সম্পূর্ণ আরবি পাঠ প্রদান করুন যাতে নিয়মাবলী অনুসরণ করে অনুবাদ করা যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2682)


2682 - ` يا عمرو! إن الله عز وجل قد أحسن كل شيء خلقه. يا عمرو! - وضرب رسول الله
صلى الله عليه وسلم بأربع أصابع من كفه اليمنى تحت ركبة عمرو فقال: - هذا موضع
الإزار، ثم رفعها، [ثم ضرب بأربع أصابع تحت الأربع الأولى ثم قال: يا عمرو
! هذا موضع الإزار] ، ثم رفعها، ثم وضعها تحت الثانية، فقال: يا عمرو! هذا
موضع الإزار `.
أخرجه أحمد (4 / 200) : حدثنا الوليد بن مسلم حدثنا الوليد بن سليمان أن
القاسم بن عبد الرحمن حدثهم عن عمرو بن فلان الأنصاري قال: بينا هو يمشي
قد أسبل إزاره، إذ لحقه رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد أخذ بناصية نفسه
، وهو يقول: ` اللهم عبدك ابن عبدك ابن أمتك `. قال عمرو: فقلت: يا رسول
الله! إني رجل حمش الساقين. فقال: فذكره. وأخرجه الطبراني في ` المعجم
الكبير ` (8 / 277 / 7909) . قلت: وهذا إسناد حسن رجاله ثقات، وفي القاسم
بن عبد الرحمن - وهو صاحب أبي أمامة - كلام لا يضر، ولهذا قال الهيثمي في `
مجمع الزوائد ` (5 / 141) : ` رواه أحمد، ورجاله ثقات `. قلت: وله شاهد
من حديث أبي أمامة قال: بينما نحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ لحقنا
عمرو بن زرارة الأنصاري في حلة،
إزار ورداء، قد أسبل، فجعل رسول الله صلى
الله عليه وسلم يأخذ بناحية ثوبه، ويتواضع لله، ويقول: ` اللهم عبدك وابن
عبدك وابن أمتك `. حتى سمعها عمرو بن زرارة.. الحديث نحوه، وزاد: ` يا
عمرو بن زرارة إن الله لا يحب المسبل `. قال الهيثمي: ` رواه الطبراني
بأسانيد، ورجال أحدها ثقات `. وللزيادة شاهد في ` شعب الإيمان ` (2 / 222
/ 2) وآخر سيأتي أول المجلد التاسع برقم (4004) وله شاهد ثالث يرويه عمرو
بن الشريد يحدث عن أبيه: ` أن النبي صلى الله عليه وسلم تبع رجلا من ثقيف حتى
هرول في أثره، حتى أخذ بثوبه فقال: ` ارفع إزارك `. فكشف الرجل عن ركبتيه.
فقال: يا رسول الله! إني أحنف، وتصطك ركبتاي، فقال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: ` كل خلق الله عز وجل حسن `. قال: ولم ير ذلك الرجل إلا وإزاره
إلى أنصاف ساقيه حتى مات `. قلت: وإسناده صحيح على شرط الشيخين، وقد مضى
برقم (1441) . ويشهد لبعضه حديث حذيفة قال: قال رسول الله صلى الله عليه
وسلم: ` موضع الإزار إلى أنصاف الساقين والعضلة، فإن أبيت فأسفل، فإن أبيت
فمن وراء الساق، ولا حق للكعبين في الإزار `. أخرجه النسائي (2 / 299) من
طريق الأعمش، والسياق له، والترمذي
(1 / 329) وابن ماجه (3572) من
طريق أبي الأحوص، وابن حبان (1447) وأحمد (5 / 382 و




আমর ইবনু ফূলান আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি যখন তাঁর পরিধেয় বস্ত্র (ইযার) ঝুলিয়ে হাঁটছিলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কাছে এসে পৌঁছলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) নিজের কপালের অগ্রভাগ ধরে বলছিলেন: "হে আল্লাহ! (আমি) আপনার বান্দা, আপনার বান্দার পুত্র এবং আপনার বান্দির পুত্র।"
আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পা দু’টি চিকন (হালকা গোশত বিশিষ্ট)। তখন তিনি বললেন: "হে আমর! আল্লাহ তাআলা প্রতিটি জিনিসকে যা সৃষ্টি করেছেন, উত্তম করে সৃষ্টি করেছেন।"

(বর্ণনাকারী বলেন) এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর ডান হাতের চারটি আঙুল দিয়ে আমরের হাঁটুর নিচে আঘাত করে বললেন: "এটি হলো ইযারের (পরিধেয় বস্ত্রের) স্থান।" এরপর তিনি হাতটি উপরে তুলে নিলেন।
[তারপর প্রথম স্থানের নিচে আবার চারটি আঙুল দিয়ে আঘাত করে বললেন: "হে আমর! এটি হলো ইযারের স্থান।"]
এরপর তিনি হাতটি উপরে তুলে নিলেন, তারপর দ্বিতীয় স্থানের নিচে আবার হাতটি রেখে বললেন: "হে আমর! এটি হলো ইযারের স্থান।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2683)


2683 - ` سيكون في آخر أمتي رجال يركبون على سروج كأشباه الرحال، ينزلون على أبواب
المساجد، نساؤهم كاسيات عاريات على رءوسهن كأسنمة البخت العجاف، العنوهن
فإنهن ملعونات، لو كانت وراءكم أمة من الأمم لخدمهن نساؤكم كما خدمكم نساء
الأمم قبلكم `.
أخرجه أحمد (2 / 223) والمخلص في ` بعض الجزء الخامس من الفوائد والغرائب
المنتقاة ` (ق 264 / 1) والسياق له، وابن حبان في ` صحيحه ` (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মতের শেষ যুগে এমন কিছু লোক হবে, যারা হাওদার (উট বা ঘোড়ার পিঠের পালকির) মতো দেখতে জিনপোশের (আসন বা স্যাডল) উপর আরোহণ করবে। তারা মসজিদের দরজায় এসে অবতরণ করবে। তাদের নারীরা হবে কাপড় পরিধানকারিণী অথচ নগ্ন (উত্তেজক)। তাদের মাথার উপর দুর্বল উটের কুঁজের মতো (খোঁপা বা চুলের স্টাইল) থাকবে। তোমরা তাদের অভিশাপ দাও, কারণ তারা অভিশাপপ্রাপ্তা। তোমাদের পরে যদি অন্য কোনো জাতি থাকত, তবে তোমাদের নারীরা তাদের (সেই জাতির নারীদের) সেবায় নিয়োজিত থাকত, যেমন তোমাদের পূর্বের জাতিগুলোর নারীরা তোমাদের সেবায় নিয়োজিত ছিল।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2684)


2684 - ` طوق من نار يوم القيامة. قاله لمن رأى عليه جبة مجيبة بحرير `.
أخرجه البزار (ص




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এমন এক ব্যক্তিকে লক্ষ্য করে এই কথাটি বলেছিলেন, যার গায়ে রেশম দিয়ে আস্তর দেওয়া জুব্বা ছিল: "কিয়ামতের দিন (তার গলায়) আগুনের বেড়ি পরানো হবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2685)


2685 - ` كنا نسميها شباعة (يعني: زمزم) وكنا نجدها نعم العون على العيال `.
أخرجه عبد الرزاق في ` المصنف ` (5 / 117) وعنه الطبراني في ` الكبير `
(3
/ 90 / 2) عن الثوري عن ابن خثيم أو عن العلاء - شك أبو بكر - عن أبي الطفيل
عن ابن عباس قال: سمعته يقول: فذكره. قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات
رجال مسلم، لولا الشك في شيخ الثوري، هل هو ابن خثيم - واسمه عبد الله بن
عثمان المكي، وهو صدوق من رجال الإمام مسلم - أم هو العلاء؟ فنظرنا فوجدنا
الأزرقي قد أخرجه في ` أخبار مكة ` (ص 391) من طريق أخرى فقال: حدثني محمد
بن يحيى عن سليم بن مسلم عن سفيان الثوري عن العلاء بن أبي العباس عن أبي
الطفيل به. فهذا يرجح أن الشيخ هو العلاء بن أبي العباس، وهو ثقة ثقة كما
قال ابن معين فيما رواه ابن أبي حاتم (3 / 1 / 356) ، لكن سليم بن مسلم -
وهو الخشاب - متروك الحديث كما قال النسائي. وقال أحمد: ` لا يساوي حديثه
شيئا `. قلت: فمثله مما لا يرجح به، فيبقى الشك على حاله، ولكنه لا يلقي
على الإسناد ضعفا، لأن الشك دار بين ثقتين، غاية ما في الأمر أنه يحول بيننا
وبين إطلاق القول بأن رجاله رجال ` الصحيح `، ولذلك قال الهيثمي (3 / 286)
: ` رواه الطبراني في ` الكبير `، ورجاله ثقات `. فإن هذا يصدق سواء كان
الشيخ هو ابن خثيم، أو العلاء، وقال المنذري في ` الترغيب ` (2 / 133) : `
رواه الطبراني في ` الكبير `، وهو موقوف صحيح الإسناد `. (فائدة) أبو بكر
الذي شك في إسناد الحديث هو عبد الرزاق نفسه صاحب ` المصنف `. وغالبه من
رواية أبي يعقوب إسحاق بن إبراهيم الدبري عنه، وذلك أني رأيت بعض كتبه من
رواية غير الدبري عنه، فمثلا كتاب ` أهل الكتاب ` هو
من رواية محمد بن علي
النجار عنه، وهو في المجلد السادس (




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমরা এটিকে ’শাবা’আহ’ (অর্থাৎ: যমযম) বলে ডাকতাম। আর আমরা এটিকে পরিবারের (জীবিকা নির্বাহের) জন্য উত্তম সহায়ক হিসেবে পেতাম।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2686)


2686 - ` من قال إذا أصبح: ` رضيت بالله ربا وبالإسلام دينا وبمحمد نبيا `، فأنا
الزعيم لآخذن بيده حتى أدخله الجنة `.
أورده المنذري في ` الترغيب ` (1 / 229) من حديث المنيذر صاحب رسول الله
صلى الله عليه وسلم، وكان يكون بـ (أفريقية) قال: سمعت رسول الله صلى الله
عليه وسلم يقول: فذكره. وقال: ` رواه الطبراني بإسناد حسن `. وكذا قال
الهيثمي في ` المجمع ` (10 / 116) . فتعقبه الحافظ ابن حجر فيما علقه عليه،
فقال: ` قلت: فيه رشدين، وهو ضعيف `. قلت: وكنت اتبعته على هذا في `
التعليق الرغيب `، وعليه أوردته في ` ضعيف الترغيب `، ثم تبين لي أن رشدين
لم يتفرد به، فإنه رواه عن حيي بن
عبد الله عن أبي عبد الرحمن الحبلي عن
المنيذر به. فقال الحافظ في ترجمة المنيذر من ` الإصابة `: ` وصله الطبراني
إلى رشدين. وتابعه ابن وهب عن حيي، لكنه لم يسمه، قال: عن رجل من أصحاب
النبي صلى الله عليه وسلم، وأخرجه ابن منده `. قلت: ولا يخفى أن الصحابة
كلهم عدول، فعدم تسمية ابن وهب إياه لا يضر، فبهذه المتابعة ثبت الحديث
والحمد لله. ثم إن الحديث عند الطبراني في ` المعجم الكبير ` (20 / 355 / 838
) بسند صحيح عن رشدين به. وكذلك رواه ابن قانع في ` معجم الصحابة ` من طريق
أخرى عنه، لكنه لم يذكر فيه ` إذا أصبح `. وهي ثابتة في رواية الطبراني،
وكذا في رواية ابن وهب كما يدل عليه صنيع الحافظ في ` الإصابة `، وزاد أنه قال
: ` وأخرجه ابن منده `. ولهذه الزيادة شاهد من حديث رجل من أصحاب النبي صلى
الله عليه وسلم مرفوعا بلفظ آخر، وزيادة أخرى، وفي إسناده اضطراب وجهالة،
ولذلك أخرجته في الكتاب الآخر برقم (5020) ، وفيه زيادة أخرى: ` ثلاث مرات
`. ولأصل الحديث شاهد جيد من رواية أبي سعيد الخدري مرفوعا نحوه، وقد مضى
برقم (334) دون ذكر الصباح والمساء. ثم رأيت الحديث في ` المعرفة ` لأبي
نعيم (2 / 188 / 2) من طريق الطبراني. ثم علقه على ابن وهب.




মুনিযির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"যে ব্যক্তি সকালে (এই দু’আ) বলে: ‘আমি আল্লাহকে রব (প্রতিপালক) হিসাবে পেয়ে সন্তুষ্ট, ইসলামকে দীন (জীবনব্যবস্থা) হিসাবে পেয়ে সন্তুষ্ট, এবং মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নবী হিসাবে পেয়ে সন্তুষ্ট’, তাহলে আমি তার জন্য জামিন হচ্ছি যে, আমি অবশ্যই তার হাত ধরে তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাব।"