হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2867)


2867 - ` إنه ليهون علي الموت أن أريتك زوجتي في الجنة. يعني عائشة `.
رواه الحسين المروزي في ` زوائد الزهد ` (207 / 2) : حدثنا أبو معاوية حدثنا
أبو حنيفة عن حماد عن إبراهيم عن الأسود عن عائشة قالت: قال لي رسول الله
صلى الله عليه وسلم: فذكره. ومن هذا الوجه رواه الخلعي في ` الفوائد ` (2 /
59 / 1) ، ثم من طريق سعيد بن عنبسة قال: حدثنا أبو معاوية عن مسعر عن حماد
به. قلت: وهذا إسناد ضعيف رجاله ثقات رجال مسلم غير سعيد بن عنبسة، وأظنه
أبا عثمان الخراز الرازي، فقد ذكر ابن أبي حاتم (2 / 1 / 52) أنه روى عن جمع
سماهم من هذه الطبقة، منهم أبو معاوية الضرير، وقال: ` سمع منه أبي، ولم
يحدث عنه، وقال: فيه نظر، وقال مرة: كان لا يصدق `
ومن هذه الطبقة ما
أورده ابن حبان في الطبقة الرابعة من ` الثقات ` (8 / 268) : ` سعيد بن عنبسة
، يروي عن ابن إدريس والكوفيين، روى عنه محمد بن إبراهيم البوشنجي، ربما
خالف `. قلت: فيحتمل أن يكون هو الرازي، ويحتمل أن يكون غيره، وهو ظاهر
صنيع الحافظ في ` اللسان `، فإذا كان غيره فالسند حسن. والله أعلم. ويقويه
أن له طريقا أخرى، فقال أحمد (6 / 138) : حدثنا وكيع عن إسماعيل عن مصعب بن
إسحاق بن طلحة عن عائشة به مختصرا بلفظ: ` إنه ليهون علي أني رأيت بياض كف
عائشة في الجنة `. وهذا إسناد جيد لولا جهالة في مصعب هذا، فقد ذكره ابن أبي
حاتم، وابن حبان في ` الثقات ` في (التابعين) (5 / 412) و (أتباع
التابعين) (7 / 478) من رواية إسماعيل هذا فقط عنه، وهو إسماعيل بن أبي
خالد، وكذلك أورده الحافظ في ` التعجيل `، وزاد في الحديث بعد أن عزاه لـ `
المسند `: ` يعني الموت `، تفسيرا منه لقوله: ` ليهون علي `. ويحتمل أن
يكون ذلك في نسخته من ` المسند ` وهو بعيد، لأنه ليس في ` جامع المسانيد ` (
37 / 104 / 3004) . والله أعلم. والحديث أورده ابن أبي حاتم في ` العلل ` (
2 / 375) من طريق المعلى بن عبد الرحمن بإسناده عن عائشة بلفظ الترجمة، وقال
: ` موضوع بهذا الإسناد، والمعلى متروك الحديث `. وقوله: ` بهذا الإسناد `
كأنه يشير إلى الأسانيد المتقدمة، وأنا أرى أن الحديث حسن بمجموع إسنادي أبي
حنيفة وأحمد، والله أعلم.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বলেছেন, "নিশ্চয়ই এটি আমার জন্য মৃত্যুকে সহজ করে দেয় যে, আমি তোমাকে—আমার স্ত্রীকে—জান্নাতে দেখেছি।" (অর্থাৎ, আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ইঙ্গিত করা হয়েছে)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2868)


2868 - ` إنه ليس عليك بأس إنما هو أبوك وغلامك `.
رواه الضياء في ` المختارة (41 / 1) من طريق أبي داود صاحب ` السنن `، وهذا
في ` اللباس ` منه (4106) عن أبي جميع سالم بن دينار عن ثابت عن أنس: أن
النبي صلى الله عليه وسلم أتى فاطمة بعبد كان قد وهبه لها، قال: وعلى فاطمة
رضي الله عنها ثوب إذا قنعت به رأسها لم يبلغ رجليها، وإذا غطت به رجليها لم
يبلغ رأسها، فلما رأى النبي صلى الله عليه وسلم ما تلقى، قال: فذكره. قلت:
وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات، وفي سالم بن دينار كلام لين لا يضر،
وقد وثقه ابن معين وابن حبان (6 / 411) وغيرهما. وفي الحديث دليل واضح على
جواز كشف البنت عن رأسها ورجليها أمام أبيها، بل وغلامها أيضا، ففيه رد
صريح على الأستاذ أبي الأعلى المودودي - رحمه الله - حيث صرح في كتابه ` الحجاب
` (ص




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

একদা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এমন একজন গোলাম নিয়ে আসলেন, যাকে তিনি ফাতিমাকে দান করেছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন: ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পরিধানে এমন একটি কাপড় ছিল যে, তিনি যদি তা দিয়ে তাঁর মাথা ঢাকতেন, তবে তা তাঁর পা পর্যন্ত পৌঁছাত না; আর যদি তিনি পা ঢাকতেন, তবে তা তাঁর মাথা পর্যন্ত পৌঁছাত না।

নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন তাঁর (ফাতিমার) এই অবস্থা দেখলেন, তখন তিনি বললেন: "এতে তোমার কোনো অসুবিধা নেই। কেননা সে তো তোমার পিতা এবং তোমার গোলাম মাত্র।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2869)


2869 - ` أهل الجنة أمشاطهم الذهب ومجامرهم الألوة `.
رواه الحميدي في ` مسنده ` (180 / 1) : حدثنا سفيان قال: حدثنا أبو الزناد
عن الأعرج عن أبي هريرة مرفوعا. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين،
وهو قطعة من حديث لأبي هريرة رضي الله عنه، أخرجه البخاري (3246) من طريق
أخرى عن أبي الزناد به. وتابعه همام بن منبه عن أبي هريرة به. أخرجه البخاري
(3245) ومسلم (8 / 147) والترمذي (2540) وابن حبان (7393) وأحمد (
2 / 312) وقال الترمذي: ` حديث صحيح `. وأنكر هذه الرواية المتعالم المعلق
على الطبعة الثانية من ` رياض الصالحين ` (643 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

জান্নাতবাসীদের চিরুনি হবে স্বর্ণের এবং তাদের ধুনুচি (সুগন্ধি দানি) হবে উদ বা আগর কাঠের।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2870)


2870 - ` أوتيت الكتاب وما يعدله (يعني: ومثله) ، يوشك شبعان على أريكته يقول:
بيننا وبينكم هذا الكتاب، فما كان فيه من حلال أحللناه وما كان [فيه] من
حرام حرمناه، ألا وإنه ليس كذلك. ألا لا يحل ذو ناب من السباع ولا الحمار
الأهلي، ولا اللقطة من مال معاهد إلا أن يستغني عنها، وأيما رجل أضاف قوما
فلم يقروه فإن له أن يعقبهم بمثل قراه `.
رواه عباس الترقفي في ` حديثه ` (46 / 1) : حدثنا محمد بن المبارك قال:
حدثني يحيى بن حمزة قال: حدثني محمد بن الوليد الزبيدي عن مروان بن رؤبة أنه
حدثه عن عبد الرحمن بن أبي عوف الجرشي عن المقدام بن معدي كرب الكندي
مرفوعا.
وتابعه هشام بن عمار عند الطبراني في ` المعجم الكبير ` (20 / 283 /
669) وأبو مسهر عند الطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 / 321) كلاهما عن يحيى
بن حمزة به، ولم يذكر الطحاوي: ` ولا اللقطة.. ` إلخ. وتابع يحيى بن
حمزة محمد بن حرب عن الزبيدي بشطره الثاني: ` ألا لا يحل ذو ناب.. `. أخرجه
أبو داود (3804) . قلت: وهذا إسناد حسن بما بعده، رجاله ثقات، إلا أن
مروان بن رؤبة لم يوثقه غير ابن حبان (5 / 425) ، فقال: ` كنيته أبو الحصين
، يروي عن واثلة بن الأسقع، عداده في أهل الشام، روى عنه أهلها `. ذكره في (
الطبقة الثانية) يعني التابعين، وأنا في شك كبير في كونه تابعيا، والراجح
أنه من أتباعهم كما حققته في ` تيسير الانتفاع ` يسر الله لي إتمامه بمنه
وكرمه. وقد تابعه حريز بن عثمان عن عبد الرحمن بن أبي عوف به. أخرجه أبو داود
(4604) وأحمد (4 / 130) والطبراني (20 / 283 / 270) . قلت: وحريز ثقة
ثبت من رجال البخاري، فالسند صحيح. وللنصف الأول منه طريق آخر من رواية
الحسن بن جابر قال: سمعت المقدام بن معدي كرب يقول: حرم رسول الله صلى الله
عليه وسلم يوم خيبر أشياء ثم قال:
` يوشك أحدكم أن يكذبني وهو متكئ على
أريكته.. ` الحديث نحوه. أخرجه أحمد (4 / 132) . وإسناده حسن في المتابعات
. وللشطر الثاني شاهد من حديث خالد بن الوليد دون جملة الضيافة. أخرجه أبو
داود (3806) وغيره، وفيه لفظ ` البغال `، وهو منكر، ولذلك خرجته في `
الضعيفة ` (1149) .




মিকদাম ইবনে মা’দিকারিব আল-কিন্দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

“আমাকে কিতাব (কুরআন) এবং তার সমতুল্য (অর্থাৎ সুন্নাহ) প্রদান করা হয়েছে। শীঘ্রই এমন পেট ভরা লোক তার আসনে হেলান দিয়ে বসে বলবে, ‘আমাদের এবং তোমাদের মাঝে এই কিতাব (কুরআন) রয়েছে। অতএব, এর মধ্যে যা কিছু হালাল পাওয়া যায়, আমরা সেটিকে হালাল গণ্য করব, আর এর মধ্যে যা কিছু হারাম পাওয়া যায়, আমরা সেটিকে হারাম গণ্য করব।’ সাবধান! নিশ্চয় বিষয়টি এমন নয়।

সাবধান! শ্বাপদ জন্তুর মধ্যে দাঁতওয়ালা কোনো জন্তু হালাল নয় এবং গৃহপালিত গাধাও (হালাল) নয়। আর চুক্তিবদ্ধ অমুসলিম (মু’আহাদ)-এর সম্পদ থেকে প্রাপ্ত লুকাটা (পড়ে পাওয়া বস্তু) হালাল নয়, যদি না সে (মু’আহাদ ব্যক্তি) তা থেকে অমুখাপেক্ষী হয়ে যায় (অর্থাৎ তা গ্রহণ করতে না চায়)।

আর যে কোনো ব্যক্তি কোনো সম্প্রদায়ের মেহমান হয় এবং তারা তাকে আতিথেয়তা না করে, তবে (যে পরিমাণ আতিথেয়তা পাওয়ার কথা ছিল) তার সমপরিমাণ সম্পদ তাদের থেকে গ্রহণ করার অধিকার তার রয়েছে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2871)


2871 - ` إن الله يوصيكم بالنساء خيرا، إن الله يوصيكم بالنساء خيرا فإنهن أمهاتكم
وبناتكم وخالاتكم، إن الرجل من أهل الكتاب يتزوج المرأة وما يعلق يداها الخيط
فما يرغب واحد منهما عن صاحبه [حتى يموتا هرما] `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (20 / 374 / 648) من طريقين عن محمد بن
حرب عن سليمان بن سليم عن يحيى بن جابر عن المقدام بن معدي كرب: أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم قام في الناس فحمد الله وأثنى عليه، ثم قال: فذكر
الحديث. وهكذا رواه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (18 / 45 /




মিকদাদ ইবন মা’দী কারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা তোমাদেরকে নারীদের ব্যাপারে উত্তম আচরণের (কল্যাণের) উপদেশ দিচ্ছেন। নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা তোমাদেরকে নারীদের ব্যাপারে উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছেন। কারণ তারা তোমাদের মাতা, তোমাদের কন্যা এবং তোমাদের খালা।

আহলে কিতাবের (ইহুদি বা খ্রিস্টানদের) কোনো ব্যক্তি এমন নারীকে বিবাহ করে যার হাতে একটি সুতাও ঝুলানো থাকে না (অর্থাৎ সে নিতান্তই দরিদ্র বা অপ্রস্তুত)। এরপরও তাদের কেউই একে অপরের প্রতি (বিচ্ছিন্ন হতে) মুখ ফিরিয়ে নেয় না, যতক্ষণ না তারা বার্ধক্যে উপনীত হয়ে মৃত্যুবরণ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2872)


2872 - ` أوف بنذرك فإنه لا وفاء لنذر في معصية الله ولا في قطيعة رحم ولا فيما لا
يملك ابن آدم ` (¬1) .
رواه أبو داود (3313) والطبراني (1 / 134 / 1) عن يحيى بن أبي كثير قال:
حدثني أبو قلابة قال: حدثني ثابت بن الضحاك قال: نذر رجل على عهد النبي
صلى الله عليه وسلم أن ينحر بـ ` بوانة `، فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم
فقال: إني نذرت أن أنحر بـ ` بوانة `، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: `
هل كان فيها وثن من أوثان الجاهلية يعبد؟ `، قال: لا، قال: ` فهل كان فيها
عيد من أعيادهم؟ `، قال: لا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
¬_________
(¬1) من أجل الجملة الأخيرة انظر الحديث المتقدم برقم (2184) والآتي برقم (
3309) ، و ` الضعيفة ` الحديث رقم (6549) . اهـ.
قلت: وإسناده صحيح رجاله رجال الشيخين، وقال شيخ الإسلام ابن تيمية في `
اقتضاء الصراط المستقيم مخالفة أصحاب الجحيم ` (ص 186) : ` أصل هذا الحديث في
` الصحيحين `، وإسناده كلهم ثقات مشاهير، وهو متصل بلا عنعنة `. وفي `
الصحيحين ` الجملة الأخيرة منه، بزيادات أخرى هامة، وهو مخرج في ` الإرواء `
(2575) . ولقصة (بوانة) شاهد من حديث ميمونة بنت كردم بن سفيان عن أبيها
نحوه. أخرجه أبو داود (3315) وابن ماجه (2131) وأحمد (3 / 419) ولم
يذكر ابن ماجه أباها. وإسناده حسن في الشواهد، والحديث صحيح بلا ريب.
وفيه من الفقه تحريم الوفاء بنذر المعصية، وأن من ذلك الوفاء بنذر الطاعة في
مكان كان يشرك فيه بالله، أو كان عيدا للكفار، فضلا عن مكان يتعاطى الناس
الشرك فيه، أو المعاصي، وقد فصل شيخ الإسلام ابن تيمية القول فيه تفصيلا
رائعا لا تجده عند غيره، فراجعه في ` الاقتضاء `، فإنه هام جدا.




সাবেত ইবনু আদ-দাহহাক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে এক ব্যক্তি ‘বুওয়ানা’ নামক স্থানে পশু যবেহ করার মানত করেছিল। অতঃপর সে আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে বলল, "আমি ‘বুওয়ানা’ নামক স্থানে পশু যবেহ করার মানত করেছি।"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "সেখানে কি জাহিলী যুগের কোনো মূর্তি ছিল, যার পূজা করা হতো?" লোকটি বলল, "না।"

তিনি বললেন, "সেখানে কি তাদের (কাফিরদের) কোনো ঈদ বা উৎসব পালিত হতো?" লোকটি বলল, "না।"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, "তোমার মানত পূর্ণ করো। কেননা, আল্লাহর অবাধ্যতামূলক কোনো বিষয়ে, আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্ন করার বিষয়ে, অথবা এমন কোনো বিষয়ে যার মালিকানা আদম সন্তানের নেই—সেই মানত পূর্ণ করার কোনো প্রয়োজন নেই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2873)


2873 - ` ألا تدعو له طبيبا `.
رواه ابن الحمامي الصوفي في ` منتخب من مسموعاته ` (35 / 1) عن حسان بن
إبراهيم الكرماني عن عمرو بن دينار عن جابر بن عبد الله أن رسول الله عاد
مريضا فقال: ` ألا تدعو له طبيبا؟ `. قالوا: يا رسول الله وأنت تأمرنا
بهذا؟ قال: فقال:
` إن الله عز وجل لم ينزل داء إلا أنزل معه دواء `. قلت:
وهذا إسناد جيد، رجاله رجال الشيخين، على ضعف يسير في الكرماني أشار إليه
الحافظ بقوله في ` التقريب `: ` صدوق يخطىء `. ولذلك أورده الذهبي في `
معرفة الثقات المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد ` (ص 88) . وللحديث طريق أخرى،
فقال أحمد (5 / 371) : حدثنا إسحاق بن يوسف حدثنا سفيان عن منصور عن هلال بن
يساف عن ذكوان عن رجل من الأنصار قال: عاد رسول الله صلى الله عليه وسلم رجلا
به جرح، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` ادعوا له طبيب بني فلان `.
قال: فدعوه، فجاء، فقال: يا رسول الله! ويغني الدواء شيئا؟ فقال: `
سبحان الله! وهل أنزل الله من داء في الأرض إلا جعل له شفاء؟ `. قلت:
وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير الرجل الأنصاري، فلم يسم، لكن
الظاهر أنه صحابي، ولذلك أورد أحمد الحديث تحت عنوان ` أحاديث رجال من أصحاب
النبي صلى الله عليه وسلم `، والصحابة كلهم عدول عندنا، ولا أستبعد أن يكون
هو جابر بن عبد الله الذي في الإسناد الأول، فإنه من الأنصار. والله أعلم.
والحديث قال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 84) : ` رواه أحمد، ورجاله رجال
الصحيح `.
ورواه أبو نعيم في ` الطب ` (ق 10 / 2) من طريق أخرى عن سفيان به
، لكنه أرسله. وروى له في الباب شاهدا من طريقين عن سهيل بن أبي صالح عن أبيه
عن أبي هريرة به نحوه. وإسناده صحيح.




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার এক অসুস্থ ব্যক্তিকে দেখতে গেলেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমরা কি তার জন্য কোনো চিকিৎসক ডাকবে না?"

তাঁরা বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি আমাদের এমনটি করার আদেশ দিচ্ছেন?"

তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা’আলা এমন কোনো রোগ অবতীর্ণ করেননি, যার সাথে তিনি তার প্রতিষেধক (দাওয়া) অবতীর্ণ করেননি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2874)


2874 - ` ألا تسألوني مما ضحكت؟ قلنا: يا رسول الله مما ضحكت؟ قال: رأيت ناسا من
أمتي يساقون إلى الجنة في السلاسل، ما أكرهها (¬1) إليهم! قلنا: من هم؟ قال
: قوم من العجم يسبيهم المهاجرون فيدخلونهم في الإسلام `.
رواه أبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2 / 298) قال: حدثنا أبو بكر محمد بن
أحمد ابن الفضل: حدثنا عبد الرحمن بن أبي حاتم: حدثنا يزيد بن سنان بمصر
وعباد بن الوليد قالا: حدثنا حبان بن هلال حدثنا مبارك بن فضالة: حدثني كثير
أبو محمد: حدثني أبو الطفيل قال: ضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى
استغرق (¬2) ضحكا ثم قال: (الحديث) . قلت: وهذا إسناد حسن إن شاء الله
تعالى، إما لذاته، وإما لغيره لما يأتي له من المتابعة والشواهد، فإن
رجاله ثقات مترجمون في ` التهذيب ` على جهالة في كثير أبي محمد، فقد وثقه ابن
حبان (5 / 332) . وأما عبد الرحمن بن أبي حاتم فثقة حافظ، وهو مؤلف الكتاب
العظيم: ` الجرح والتعديل `.
¬_________
(¬1) الأصل (يكرهها) ، ولعل الصواب ما أثبته. اهـ.
(¬2) الأصل: ` استغرب `. اهـ.
وأما أبو بكر محمد بن أحمد بن الفضل، شيخ أبي
نعيم، وقال فيه: ` توفي سنة سبع وثمانين ` يعني بعد الثلاثمائة. ولم يذكر
فيه جرحا ولا تعديلا. ولكنه لم يتفرد به كما يأتي. والحديث أخرجه البزار
في ` مسنده ` (2 / 289 / 1730) : حدثنا بشر بن سهل حدثنا حبان بن هلال به.
وقال في ` المجمع ` (5 / 333) : ` رواه البزار والطبراني، وفيه بشر بن سهل
كتب عنه أبو حاتم، ثم ضرب على حديثه، وبقية رجاله وثقوا `. وله شاهد من
حديث أبي غالب عن أبي أمامة: استضحك النبي صلى الله عليه وسلم [يوما فقيل له
: يا رسول الله! ما أضحكك؟] قال: ` عجبت لأقوام يساقون إلى الجنة في
السلاسل وهم كارهون `. أخرجه أحمد (5 / 249 و 256) والزيادة له، وليس
عنده: ` وهم كارهون `. والسياق للطبراني، وقال الهيثمي: ` رواه أحمد
والطبراني وأحد إسنادي أحمد رجاله رجال الصحيح `. كذا قال، وأبو غالب ليس من
رجال الصحيح، وهو صاحب أبي أمامة، وهو صدوق يخطىء، وقد سقط من إسناد أحمد
الآخر، كما لم يسم الراوي عنه، فإسناده الأول حسن. شاهد آخر: يرويه الفضيل
بن سليمان: حدثنا محمد بن أبي يحيى عن العباس بن سهل ابن سعد الساعدي عن أبيه
قال:
كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم بالخندق، فأخذ الكرزين فحفر به، فصادف
حجرا، فضحك، قيل: ما يضحكك يا رسول الله؟ قال: ` ضحكت من ناس يؤتى بهم من
قبل المشرق في النكول يساقون إلى الجنة `. أخرجه أحمد (5 / 338) والسياق له
، والطبراني في ` الكبير ` (6 / 157 / 5733) وزاد: ` وهم كارهون `.
وقال الهيثمي: ` رواه أحمد والطبراني، إلا أنه قال: ` يؤتى بهم إلى الجنة في
كبول الحديد `، وفي رواية: ` يساقون إلى الجنة وهم كارهون `، ورجاله رجال
(الصحيح) غير محمد بن [أبي] يحيى الأسلمي، وهو ثقة `. قلت: وفيه شيئان
: الأول: أن الفضيل بن سليمان وإن كان من رجال الشيخين، صدوقا، فله خطأ
كثير كما في ` التقريب `. والآخر: أن رواية ` الكبول ` عند الطبراني ليس
فيها الأسلمي الثقة، فإنها عنده (6 / 232 / 5955) من طريق أخرى عن الفضيل بن
سليمان عن أبي حازم عن سهل بن سعد به نحوه. فأسقط الفضيل من الإسناد محمد بن
أبي يحيى عن العباس بن سهل، وأحل محلهما ` أبي حازم `، ولعل ذلك مما يدل
على خطئه وقلة ضبطه، وقوله: ` يؤتى بهم من قبل المشرق `، زيادة منكرة لم
تأت في الأحاديث الأخرى، ولذلك خرجتها في ` الضعيفة ` (4034) .
شاهد ثالث:
يرويه عبد الحميد بن صالح: حدثنا أبو بكر بن عياش عن الأعمش عن أبي صالح عن
أبي هريرة قال: استضحك النبي صلى الله عليه وسلم، فقال: ` عجبت لأقوام
يقادون إلى الجنة في السلاسل وهم كارهون `. أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (8
/ 307) . قلت: وإسناده جيد. وتابعه كامل أبو العلاء قال: سمعت أبا صالح
به مختصرا بلفظ: ` عجب ربنا عز وجل من قوم يقادون إلى الجنة في السلاسل `.
أخرجه أحمد (2 / 448) . وتابعه محمد بن زياد عن أبي هريرة به. أخرجه
البخاري وغيره، وهو مخرج في ` ظلال الجنة ` (573) و ` صحيح أبي داود ` (
2401) . وأخرجه البخاري (4557) من طريق أبي حازم عن أبي هريرة رضي الله عنه
: * (كنتم خير أمة أخرجت للناس) * قال: ` خير الناس للناس، تأتون بهم في
السلاسل في أعناقهم حتى يدخلوا في الإسلام `. قلت: وهذا موقوف في حكم
المرفوع، كما يشهد بذلك الطرق السابقة. (تنبيه) : علق الأخ حمدي السلفي على
حديث الفضيل بن سليمان الذي فيه بلفظ الطبراني:
` يأتونكم من قبل المشرق `.
فقال: ` ورواه أحمد بدون ذكر ` كارهون `، وقد أورده شيخنا محمد ناصر الدين
الألباني في ` ضعيف الجامع الصغير وزيادته ` (3588) لهذه الزيادة، وقال:
هو صحيح بغير هذا اللفظ `. قلت: وإنما أوردته في ` الضعيف ` لزيادة جملة `
المشرق `، وليس لزيادة ` وهم كارهون `، بل هذه زيادة صحيحة كما يتبين من
الطرق المتقدمة، وقد نبهت على ذلك في ` الضعيفة ` (4034) ، وهو المصدر
الذي أحلت عليه في بيان الضعف المذكور في تعليقي على ` ضعيف الجامع `، لكن
عبارتي فيه كانت موهمة لما قال السلفي، ولذلك عدلتها تعديلا يبين الذي ذكرته
آنفا. على أن الحديث بلفظ: ` وهم كارهون ` مذكور في ` صحيح الجامع ` برقم (
3878) بمرتبة (حسن) ، وبعد هذا التخريج عدلته إلى (صحيح) كما هو ظاهر من
مجموع طرقه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাহাবাদের উদ্দেশ্যে) বললেন: “তোমরা কি আমাকে জিজ্ঞাসা করবে না যে আমি কেন হাসলাম?”

আমরা বললাম, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কেন হাসলেন?”

তিনি বললেন, “আমি আমার উম্মতের এমন কিছু লোককে দেখলাম, যাদেরকে শৃঙ্খলিত অবস্থায় (শিকল পরিয়ে) জান্নাতের দিকে টেনে নিয়ে যাওয়া হচ্ছে—অথচ তাদের কাছে সেই শিকলগুলো কতই না অপছন্দনীয়!”

আমরা বললাম, “তারা কারা?”

তিনি বললেন, “তারা হলো অনারব (আ’জাম) জাতি, যাদেরকে মুহাজিরগণ যুদ্ধবন্দী হিসেবে ধরে আনবেন এবং তাদেরকে ইসলামের অন্তর্ভুক্ত করবেন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2875)


2875 - ` إذا أنت بايعت فقل: لا خلابة، ثم أنت في كل سلعة ابتعتها بالخيار ثلاث ليال
فإن رضيت فأمسك وإن سخطت فارددها على صاحبها `.
أخرجه ابن ماجه (2355) : حدثنا أبو بكر بن أبي شيبة: حدثنا عبد الأعلى عن
محمد بن إسحاق عن محمد بن يحيى بن حبان قال: هو جدي منقذ بن عمرو، وكان رجلا
قد أصابته آفة في رأسه فكسرت لسانه، وكان لا يدع على ذلك التجارة، وكان لا
يزال يغبن، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فقال له: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله ثقات على الخلاف المعروف في ابن إسحاق،
والراجح
أنه حسن الحديث إذا صرح بالتحديث، وقد ثبت تصريحه به كما يأتي في غير ما
رواية عنه. ومحمد بن يحيى بن حبان تابعي ثقة من رجال الشيخين، وظاهره أنه
أرسله، لكنه قد ثبت موصولا، بذكر ابن عمر فيه، فقد أخرجه ابن أبي شيبة في `
المصنف ` (14 / 228 / 18177) : حدثنا عباد بن العوام عن محمد بن إسحاق عن
محمد بن يحيى بن حبان قال: إنما جعل ابن الزبير عهدة الرفيق ثلاثة، لقول رسول
الله صلى الله عليه وسلم لمنقذ بن عمرو: ` لا خلابة، إذا بعت بيعا فأنت
بالخيار ثلاثا `. وأخرجه الدارقطني في ` سننه ` (3 / 55 / 220) من طريق
محمد بن عمرو بن العباس الباهلي أخبرنا عبد الأعلى عن محمد بن إسحاق أخبرنا
نافع أن عبد الله بن عمر حدثه: ` أن رجلا من الأنصار كان بلسانه لوثة، وكان
لا يزال يغبن في البيع، فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فقال
: ` إذا بعت فقل: لا خلابة (مرتين) `. قال محمد: وحدثني محمد بن يحيى بن
حبان قال: هو جدي.. `. قلت: فذكره مثل رواية ابن ماجه، وزاد: ` وقد كان
عمر عمرا طويلا، عاش ثلاثين ومائة سنة، وكان في زمن عثمان رضي الله عنه حين
فشا الناس وكثروا، يتبايع البيع في السوق، ويرجع به إلى أهله وقد غبن غبنا
قبيحا، فيلومونه، ويقولون: لم تبتاع؟! فيقول: أنا بالخيار إن رضيت أخذت،
وإن سخطت ترددت، قد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم جعلني بالخيار ثلاثا،
فيرد السلعة على صاحبها من الغد، وبعد الغد، فيقول (¬1) : والله لا أقبلها،
قد أخذت سلعتي وأعطيتني دراهم، قال: يقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم
قد جعلني بالخيار ثلاثا،
¬_________
(¬1) أي: صاحب السلعة. اهـ.
فكان يمر الرجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه
وسلم فيقول للتاجر: ويحك إنه قد صدق، إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان
جعله بالخيار ثلاثا. قال: وأخبرنا محمد بن إسحاق أخبرنا محمد بن يحيى بن
حبان قال: ما علمت ابن الزبير ... `. قلت: فذكر الحديث كما تقدم نقلي إياه
عن ` المصنف `. وأخرجه البيهقي في ` سننه ` (5 / 273) من طريق يونس: حدثنا
محمد بن إسحاق: حدثني نافع عن ابن عمر قال: سمعت رجلا من الأنصار كانت بلسانه
لوثة.. الحديث مثل رواية الدارقطني دون ما في آخرها من الرواية عن ابن الزبير
، لكن فيه ما في حديث الترجمة من التخيير ثلاث ليال، وفيه: ` فيرجع إلى بيعه
فيقول: خذ سلعتك ورد دراهمي، فيقول: لا أفعل، قد رضيت فذهبت به، حتى يمر
به الرجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ... `. ورواه سفيان: حدثني
ابن إسحاق عن نافع عن ابن عمر به مختصرا دون الزيادة، وفيه قول ابن عمر: `
فكنت أسمعه يقول: لا خذابة لا خذابة! وكان يشتري الشيء فيجيء به أهله
فيقولون: هذا غال، فيقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم خيرني في بيعي `
أخرجه الدارقطني، والحاكم (2 / 22) والبيهقي، وابن الجارود (567) .
وقال أحمد (2 / 129) : حدثنا يعقوب حدثنا أبي عن ابن إسحاق حدثني نافع به دون
قوله: ` وكان يشتري الشيء.. `. وبالجملة، فالحديث حسن لتصريح ابن إسحاق
بالتحديث في كثير من هذه
الروايات الثابتة عنه. وإعلال البوصيري إياه بعنعنة
ابن إسحاق، إنما كان منه وقوفا عند رواية ابن ماجه، مع كونها مرسلة، وقد
أورده السيوطي في ` الزيادة ` من رواية ابن ماجه والبيهقي مرسلا. وقد انجبر
الإرسال بمجيئه موصولا من طريق نافع عن ابن عمر كما تقدم. والله أعلم.
وللحديث شاهدان مختصران: أحدهما من حديث ابن عمر، عند الشيخين وغيرهما.
والآخر: من حديث أنس. رواه أصحاب السنن وغيرهم، وصححه ابن حبان (5027
و




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"যখন তুমি কোনো কিছু ক্রয় করবে, তখন বলো: ’কোনো ধোঁকা বা প্রতারণা নেই’ (অর্থাৎ, আমি এই শর্তে কিনছি যে, প্রতারণা হলে ফেরত দেব)। এরপর তুমি ক্রয়কৃত প্রতিটি পণ্যের ব্যাপারে তিন রাত পর্যন্ত ইখতিয়ার (পছন্দ বা ফেরত দেওয়ার সুযোগ) পাবে। যদি তুমি সন্তুষ্ট হও, তবে তা রেখে দাও, আর যদি অসন্তুষ্ট হও, তবে তা তার মালিকের কাছে ফেরত দাও।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2876)


2876 - ` في كل ركعتين تشهد وتسليم على المرسلين وعلى من تبعهم من عباد الله
الصالحين `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (23 / 367 / 869) من طريق أبي همام
الخاركي: حدثني عدي بن أبي عدي عن علي بن زيد عن الحسن عن أمه عن أم سلمة
أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا حديث حسن، رجاله ثقات
على ضعف في علي بن زيد، وهو
ابن جدعان، وقال الهيثمي في ` المجمع ` (2 /
139) : ` واختلف في الاحتجاج به، وقد وثق `. قلت: فمثله يستشهد بحديثه،
ولذلك حسنت حديثه هذا لأن له شاهدا من حديث علي رضي الله عنه، سبق تخريجه
برقم (237) . وأم الحسن - وهو البصري - اسمها (خيرة) ، وهي ثقة كما في `
ثقات ابن حبان ` (4 / 216) وقول الحافظ فيها: ` مقبولة ` تقصير منه غير
مقبول، فقد روى عنها جمع من الثقات، مع كونها تابعية. وعدي بن أبي عدي هو
الكندي. قال ابن حبان في ` ثقات التابعين ` (5 / 270) : ` واسم أبي عدي:
فروة، يروي عن أبيه، ويقال: إن له صحبة. روى عنه عيسى ابن عاصم. مات سنة
ست وعشرين ومائة `. وهو مترجم في ` التهذيب `. وأبو همام الخاركي (الأصل
: الخارجي، وهو تصحيف) اسمه الصلت بن محمد، وهو ثقة من رجال البخاري،
وقد صرح بسماعه من عدي، فلا أدري إذا كان ذلك محفوظا أم لا، فإن صنيعهم في
ترجمته يشعر بأنه متأخر عن هذه الطبقة، فأورده ابن حبان (8 / 324) فيمن روى
عن (أتباع التابعين) وليس في (أتباعهم) ! والله أعلم.




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"প্রত্যেক দুই রাকাতে তাশাহহুদ (পড়ার বিধান) রয়েছে এবং (রয়েছে) প্রেরিত পুরুষগণের (রাসূলগণের) প্রতি এবং আল্লাহর নেককার বান্দাদের মধ্য থেকে যারা তাঁদের অনুসরণ করেছে, তাদের প্রতি সালাম (শান্তি ও দরূদ)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2877)


2877 - ` كن مع صاحب البلاء تواضعا لربك وإيمانا `.
أخرجه الطحاوي في ` شرح معاني الآثار ` (2 / 379) : حدثنا علي بن زيد قال:
حدثنا موسى بن داود قال: حدثنا يعقوب بن إبراهيم عن يحيى بن سعيد عن أبي
مسلم
الخولاني عن أبي ذر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. قلت
: وهذا إسناد جيد، رجاله ثقات رجال مسلم غير علي بن زيد، وهو ابن عبد الله
أبو الحسن الفرائضي، قال الخطيب في ` تاريخ بغداد ` (11 / 427) : ` من أهل (
طرسوس) ، قدم (سر من رأى) وحدث بها عن موسى بن داود الضبي و.. و.. قال
ابن يونس المصري: تكلموا فيه `. وكذا في ` اللسان `، إلا أنه وقع فيه: `
قدم مصر.. `، وزاد: ` وقال مسلمة بن قاسم: ثقة. توفي سنة ثلاث وستين
ومائتين `. (تنبيه) : كذا وقع الحديث في ` الشرح ` (كن) ، ووقع في `
الجامع الصغير ` و ` الكبير ` أيضا (16760) : (كل) ، فلا أدري أيهما الصواب
، والثاني في المعنى أخص من الأول، وقد روي ذلك في حديث آخر من مسند جابر
بلفظ: ` كل باسم الله، ثقة بالله، وتوكلا على الله `. وإسناده ضعيف كما
كنت بينته في ` الضعيفة ` (1144) ، فإن صح حديث الترجمة باللفظ الثاني، فهو
شاهد قوي لحديث جابر، فينقل حينئذ إلى ` سلسلة الأحاديث الصحيحة ` من جهة،
وإلى ` صحيح الجامع ` من جهة أخرى، فإنه حتى الآن في ` ضعيف الجامع ` (4200)
، كما كنت أوردت فيه (4203) حديث أبي ذر باللفظ الثاني لعدم وقوفي يومئذ على
إسناده حسب الشرط الذي كنت ذكرته في المقدمة، فإن صح نقل أيضا إلى ` الصحيح `
في الطبعة القادمة منه إن شاء الله تعالى. (تنبيه آخر) : لم يتكلم المناوي
على إسناد هذا الحديث بشيء، والظاهر أنه لم يقف عليه، ويؤيده أنه فسر عزو
السيوطي إياه لـ (الطحاوي) بقوله: ` في
مسنده `، وقلدته اللجنة القائمة
على نشر ` الجامع الكبير ` كما هي عادتهم، وكل ذلك خطأ، لأن الطحاوي رحمه
الله ليس له كتاب يعرف بهذا الاسم ` المسند `. والله أعلم.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"বিপদগ্রস্ত (বালা-মুসিবতগ্রস্ত) ব্যক্তির সাথে আপনি আপনার রবের প্রতি বিনয় ও ঈমানের প্রকাশ স্বরূপ সদাচরণ করুন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2878)


2878 - ` سموه بأحب الأسماء إلي حمزة بن عبد المطلب `.
أخرجه الحاكم (3 / 196) من طريق يعقوب بن حميد بن كاسب: حدثنا سفيان بن
عيينة عن عمرو بن دينار عن جابر بن عبد الله قال: ولد لرجل منا غلام،
فقالوا: ما نسميه؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال: ` صحيح
الإسناد `. ورده الذهبي بقوله: ` قلت: يعقوب ضعيف `. كذا قال، والرجل
مختلف فيه كما تراه في ` تهذيب التهذيب `، ولخص ذلك في ` التقريب `، فقال:
` صدوق ربما وهم `. وحكى الذهبي نفسه في ` الكاشف ` شيئا من ذلك الاختلاف،
وقال: ` وقال البخاري: لم نر إلا خيرا (وفي ` التهذيب `: لم يزل خيرا) ،
هو في الأصل صدوق `. ولذلك أورده الذهبي في كتابه: ` معرفة الرواة المتكلم
فيهم بما لا يوجب الرد ` (ص 191) ورمز له فيه بـ (م) ، وأظنه خطأ مطبعيا
لمخالفته لجميع المصادر التي ترجمت له، ومنها ` الكاشف `، فإنه لم يرمز له
فيها إلا بـ (عخ، ق) . ثم إنه قد توبع، فأخرجه الحاكم أيضا من طريق يوسف بن
سلمان المازني: حدثنا سفيان بن عيينة عن عمرو بن دينار، سمع رجلا بالمدينة
يقول:
جاء جدي بأبي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: هذا ولدي فما
أسميه؟ قال: ` سمه بأحب الناس إلي حمزة بن عبد المطلب `. وأعله الحاكم
بقوله: ` قد قصر هذا الراوي المجهول برواية الحديث عن ابن عيينة، والقول فيه
قول يعقوب بن حميد، وقد كان أبو أحمد الحافظ يناظرني: أن البخاري قد روى عنه
في ` الجامع الصحيح `، وكنت آبى عليه `. قلت: قد ذكر الحافظ في ` التهذيب `
منشأ الخلاف الذي أشار إليه الحاكم، ومال إلى موافقة أبي أحمد الحافظ (وهو
الحاكم صاحب كتاب الكنى) وسبقه إلى ذلك الذهبي في ` الكاشف `. وسواء صح هذا
أو ذاك فالرجل وسط، يحتج بحديثه. لكن يبقى النظر في يوسف بن سلمان الذي خالفه
في إسناده ومتنه. أما السند فهو أنه قال مكان (جابر) : `.. رجلا.. جاء
جدي بأبي `، وأما المتن فقوله: (الناس) مكان (الأسماء) . ولعل هذا هو
الأرجح، لأنه جاء في ` الصحيحين `: ` أحب الناس إلي عائشة، ومن الرجال
أبوها `، وما خالفه من الأحاديث فيه ضعف كما بينته في ` الضعيفة ` (1844
و1843) . ويوسف هذا قد روى عنه جماعة من الحفاظ كالترمذي والنسائي وابن
خزيمة وغيرهم، ووثقه ابن حبان ومسلمة، وقال النسائي: لا بأس به، فلا
وجه لتجهيل الحاكم إياه، ولاسيما وهو يوثق من دونه شهرة بكثير! هذا،
وقوله: ` بأحب الأسماء إلي ` كان قبل أن يوحى إليه بحديث ` أحب الأسماء إلى
الله عبد الله، وعبد الرحمن `. وتقدم (904 و 1040) و ` الإرواء ` (1176) .




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাদের এক ব্যক্তির ঘরে একটি পুত্র সন্তান জন্ম নিলে লোকেরা জিজ্ঞাসা করল, ‘আমরা তার কী নাম রাখব?’ তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: **“আমার কাছে সর্বাধিক প্রিয় নাম হলো ‘হামযা ইবনে আব্দুল মুত্তালিব’, তাই তোমরা তার এই নাম রাখো।”**









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2879)


2879 - ` من أنفق زوجين في سبيل الله نودي في الجنة: يا عبد الله! هذا خير، فمن كان
من أهل الصلاة دعي من باب الصلاة ومن كان من أهل الجهاد دعي من باب الجهاد
ومن كان من أهل الصدقة دعي من باب الصدقة ومن كان من أهل الصيام دعي من باب
الريان. قال أبو بكر الصديق: يا رسول الله! ما على أحد يدعى من تلك الأبواب
من ضرورة، فهل يدعى أحد من تلك الأبواب كلها؟ قال: نعم، وأرجو أن تكون
منهم `.
أخرجه البخاري (1897 و 2841 و 3216 و 3666) ومسلم (3 / 91) والترمذي (
3675) وصححه، والنسائي (1 / 312 و




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

“যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে জোড়ায় জোড়ায় (দুটি জিনিস) ব্যয় করবে, তাকে জান্নাতে ডেকে বলা হবে: হে আল্লাহর বান্দা! এটা উত্তম। সুতরাং যে ব্যক্তি সালাত আদায়কারীদের অন্তর্ভুক্ত হবে, তাকে ’সালাতের দরজা’ থেকে ডাকা হবে। আর যে ব্যক্তি জিহাদকারীদের অন্তর্ভুক্ত হবে, তাকে ’জিহাদের দরজা’ থেকে ডাকা হবে। আর যে ব্যক্তি সাদকা প্রদানকারীদের অন্তর্ভুক্ত হবে, তাকে ’সাদকার দরজা’ থেকে ডাকা হবে। আর যে ব্যক্তি সিয়াম পালনকারীদের অন্তর্ভুক্ত হবে, তাকে ’রাইয়ান’ নামক দরজা থেকে ডাকা হবে।”

আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “ইয়া রাসূলাল্লাহ! যার কোনো দরজা থেকে ডাকা হবে, তার তো কোনো প্রয়োজন নেই (বা, তার জন্য তো যথেষ্ট)। তবে কি এমন কেউ থাকবে যাকে ঐ দরজাগুলো সবক’টি থেকে ডাকা হবে?”

তিনি (নবীজি) বললেন, “হ্যাঁ। আর আমি আশা করি যে, তুমি হবে তাদেরই একজন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2880)


2880 - ` من قال: سبحان الله والحمد لله ولا إله إلا الله والله أكبر غرس الله بكل
واحدة منهن شجرة في الجنة `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (2 / 235 / 1 / 8640) وفي ` الدعاء ` (3 /
1558 / 1676) من طريق علي بن عثمان اللاحقي قال: حدثنا عمران بن عبيد الله
مولى عبيد الصيد قال: سمعت الحكم بن أبان يحدث عن عكرمة عن ابن عباس قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال: ` تفرد به علي بن عثمان `
. قلت: وهو ثقة كما في ` اللسان `، والعلة من شيخه عمران، ضعفه ابن معين
والبخاري كما يأتي، ووثقه ابن حبان (8 / 497) ولذا قال الهيثمي (10 / 91)
: ` رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله وثقوا `. يشير بقوله: ` وثقوا `
إلى ضعف توثيق أحد رجاله، وهو عمران هذا، وكذلك فعل المنذري، فإنه قال في
` الترغيب ` (2 / 245) :
` رواه الطبراني، وإسناده حسن لا بأس به في
المتابعات `. وهو كما قال أو أعلى، فإن له شواهد حسن أحدها المنذري، وصححه
الحاكم، ووافقه الذهبي، كما في تعليقي على ` الترغيب ` (2 / 244) وهو عن
أبي هريرة والحديث رواه إسحاق بن أبي إسرائيل أيضا عن عمران، علقه البخاري في
` التاريخ ` (3 / 2 / 427) في ترجمة عمران بن عبيد الله هذا، وقال: ` فيه
نظر `. ثم إن للحديث شاهدا آخر من حديث جابر مختصرا، وقد سبق تخريجه برقم (
64) . ولحديث أبي هريرة طريق آخر، رواه البزار (




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি ‘সুবহানাল্লাহ, ওয়ালহামদুলিল্লাহ, ওয়া লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়াল্লাহু আকবার’ বলবে, আল্লাহ তাআলা এর প্রত্যেকটির বিনিময়ে তার জন্য জান্নাতে একটি করে গাছ রোপণ করবেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2881)


2881 - ` من تداوى بحرام لم يجعل الله له فيه شفاء `.
أخرجه أبو نعيم في ` الطب ` (ق 14 / 2) عن إبراهيم بن أيوب عن النعمان عن عبد
الحكم قال: سمعت ابن سيرين عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم:.. فذكره. قلت: وهذا إسناد ضعيف، إبراهيم بن أيوب هو الفرساني
الأصبهاني، قال ابن أبي حاتم عن أبيه: ` لا أعرفه `. وذكره أبو العرب في `
الضعفاء ` كما في ` الميزان `. والنعمان هو ابن عبد السلام الأصبهاني، وهو
ثقة فقيه. لكن شيخه عبد الحكم لم أعرفه. لكن ذكر له أبو نعيم شاهدا من رواية
يونس بن محمد: حدثنا الهياج أو الصباح بن عبد الله حدثنا غالب القطان عن ابن
سيرين عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ` من أصابه شيء من
الأدواء فلا يفزعن إلى شيء مما حرم الله، فإن الله لم يجعل في شيء مما حرم
شفاء `. وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين غير الهياج - هكذا ظهر لي من
النسخة المصورة ولم أعرفه، أما إن كان: الصباح بن عبد الله، فالظاهر أنه
العبدي المترجم في ` التهذيب ` برواية موسى بن إسماعيل التبوذكي عنه. قال ابن
معين: ثقة. وقال أبو حاتم: مجهول. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` - لكن من
دونه أحمد بن إسحاق شيخ أبي نعيم لم أعرفه، واثنان فوقه لم أعرفهما لغموض
صورة أسمائهما.
وله شاهد ثان من حديث أم سلمة مرفوعا، ثالث موقوف على ابن
مسعود سبق تخريجهما تحت الحديث (1633) ، والموقوف صحيح الإسناد، والذي
قبله يحتمل التحسين، فإنه ليس في رجاله إلا ثقة، إلا أن حسان بن مخارق لم
يوثقه غير ابن حبان (4 / 163 و 6 / 223) وقد روى عنه ثقتان مع تابعيته، على
ما ترجح عندي في ` تيسير الانتفاع `. ولما تقدم فقد ترجح لدي أن الحديث
بمجموع هذه الطرق حسن على أقل تقدير، ولاسيما وقد ثبت النهي عن التداوي
بالحرام والدواء الخبيث كما بينته في المكان المشار إليه آنفا. والله أعلم.
(تنبيه) حديث ابن سيرين عن أبي هريرة المتقدم من رواية أبي نعيم، قد عزاه
إليه السيوطي في ` الجامع الكبير ` عن ابن سيرين مرسلا لم يذكر أبا هريرة، فلا
أدري إذا كان وصله عنه سقط من نسخة ` الطب ` التي نقل عنها السيوطي، أم هو
زيادة من بعض النساخ في نسختنا. والله أعلم.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

যে ব্যক্তি হারাম বা অবৈধ বস্তু দ্বারা চিকিৎসা গ্রহণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য তাতে কোনো আরোগ্য রাখেননি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2882)


2882 - ` من ضم يتيما له أو لغيره حتى يغنيه الله عنه وجبت له الجنة `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (2 / 26 / 1 / 5477) : حدثنا محمد بن أحمد بن
أبي خيثمة قال: حدثنا القاسم بن سعيد عن المسيب بن شريك قال: حدثنا الهيثم
أبو (الأصل: ابن) سعيد قال: حدثنا عبد الله بن تميم بن طرفة عن أبيه عن
عدي بن حاتم مرفوعا. وقال: ` لم يسند عبد الله بن تميم بن طرفة حديثا غير
هذا، ولا يروى عن عدي إلا بهذا الإسناد، تفرد به القاسم بن سعيد عن المسيب
بن شريك `.
قلت: وهذا متروك، وبه أعله الهيثمي (8 / 162) . والراوي عنه
القاسم بن سعيد لم أجد له ترجمة، ومثله عبد الله بن تميم، وقد ذكره المزي
في الرواة عن أبيه مصغرا: ` عبيد الله `، وأشار إلى عدم صحة السند بذلك إليه
بقوله: ` إن كان محفوظا `. وأما الهيثم أبو سعيد فقد ذكره البخاري وابن أبي
حاتم في كتابيهما بروايته عن غالب القطان، ولم يذكرا عنه راويا، وأفادا أنه
بصري. فالإسناد مع ذاك المتروك مجهول. وقد روى طرفه الأول سفيان عن أبي
الحويرث عن رجل من جهينة مرفوعا به، وتمامه: ` فاتقى الله فيه وأصلح كان
كالمجاهد في سبيل الله القائم ليله لا يرقد، والصائم نهاره لا يفطر `. أخرجه
ابن منده في ` المعرفة ` (2 / 278 / 2) . قلت: وأبو الحويرث هذا اسمه عبد
الرحمن بن معاوية بن الحويرث الأنصاري، وهو ضعيف لسوء حفظه. وأخرج ابن
المبارك في ` الزهد ` (185 /




আদি ইবনে হাতেম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যে ব্যক্তি নিজের অথবা অন্যের কোনো এতীমকে ততক্ষণ পর্যন্ত নিজের কাছে স্থান দেয় যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা তাকে (এতীমকে) অন্যের থেকে অমুখাপেক্ষী করে দেন (স্বাবলম্বী করে দেন), তার জন্য জান্নাত অবশ্যম্ভাবী হয়ে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2883)


2883 - ` ألا عدلت بينهما. يعني ابنه وبنته في تقبيلهما `.
أخرجه البزار في ` مسنده ` (2 / 378 / 1893) عن عبد الله بن موسى، وابن
الأعرابي في ` معجمه ` (ق 182 / 1) وأبو القاسم الهمداني في ` الفوائد ` (1
/ 3 / 2) كلاهما من طريق عبد الله بن معاذ الصنعاني عن معمر عن الزهري عن
أنس قال: كان رجل جالس مع النبي صلى الله عليه وسلم، فجاءه ابن له فأخذه
فقبله ثم أجلسه في حجره، وجاءت ابنة له، فأخذها إلى جنبه، فقال النبي صلى
الله عليه وسلم: فذكره. وقال البزار: ` لا نعلم رواه عن معمر إلا عبد الله
، وكان صنعانيا تحول إلى مكة `. قلت: وقع في ` كشف الأستار ` (عبد الله بن
موسى) ، وأنا أظن أن (موسى) محرف (معاذ) ، وهذا هو الصواب، كما وقع في
المصدرين الآخرين، وهو ثقة، ومن فوقه ثقات كذلك، فالسند صحيح. وقال
الهيثمي في ` المجمع ` (8 / 156) : ` رواه البزار فقال: حدثنا بعض أصحابنا -
ولم يسمه - وبقية رجاله ثقات `. قلت: هو متابع في المصدرين الآخرين من
راويين اثنين:
أحدهما: محمد بن عباد المكي، وهو صدوق يهم من رجال الشيخين،
بل من شيوخهما والآخر: سويد بن سكين، ولم أعرفه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে বসে ছিলেন। এমন সময় তার এক পুত্র সন্তান এলো। লোকটি তাকে ধরে চুম্বন করলেন এবং নিজের কোলে বসালেন। এরপর তার এক কন্যা সন্তান এলো। লোকটি তাকে নিজের পাশে বসালেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তুমি তাদের দুজনের মাঝে সমতা রক্ষা করলে না কেন?” (অর্থাৎ, পুত্র ও কন্যার মাঝে চুম্বন দেওয়ার ক্ষেত্রে।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2884)


2884 - ` أي ذلك عليك أيسر فافعل. يعني إفطار رمضان أو صيامه في السفر `.
أخرجه تمام في ` الفوائد ` (ق 161 / 1) : أخبرنا أبو علي أحمد بن محمد بن
فضالة ابن غيلان بن الحسين السوسي الحمصي الصفار: حدثنا أبو عبد الله بحر بن
نصر حدثنا ابن وهب حدثنا ابن لهيعة عن يزيد بن أبي حبيب أن عمران ابن أبي أنس
حدثه عن أبي سلمة بن عبد الرحمن عن حمزة بن عمرو: أنه سأل رسول الله صلى
الله عليه وسلم عن الصيام في السفر؟ فقال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح
رجاله ثقات من رجال ` التهذيب ` غير السوسي هذا، ترجمه ابن عساكر في ` تاريخ
دمشق ` (2 / 213) برواية جمع عنه، وروى عن أبي سعيد بن يونس أنه قال فيه:
` توفي سنة (339) وكان ثقة، وكانت كتبه جيادا `. وابن لهيعة في حفظه ضعف
إلا في رواية العبادلة عنه، فإنها صحيحة، وهذه منها كما ترى. وللحديث طرق
أخرى عن حمزة بن عمرو رضي الله عنه بألفاظ أخرى. أحدها في ` صحيح مسلم ` وهي
مخرجة في ` الإرواء ` (926) . وإنما آثرت تخريج هذا اللفظ هنا لعزة مصدره
أولا، ولتضمنه سبب ترخيصه صلى الله عليه وسلم وتخييره للمسافر بالصوم أو
الإفطار ثانيا، وهو التيسير، والناس يختلفون في
ذلك كل الاختلاف كما هو
مشاهد ومعلوم من تباين قدراتهم وطبائعهم، فبعضهم الأيسر له أن يصوم مع الناس
، ولا يقضي حين يكونون مفطرين، وبعضهم لا يهمه ذلك فيفطر ترخصا ثم يقضي،
فصلى الله على النبي الأمي الذي أنزل عليه: * (يريد الله بكم اليسر ولا يريد
بكم العسر) *.




হামযাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমার জন্য দু’টির মধ্যে যা সহজ, তুমি তাই করো।
(অর্থাৎ, সফরকালে রমযানের রোযা ভঙ্গ করা কিংবা রোযা রাখা।)

[এই বর্ণনার অতিরিক্ত ব্যাখ্যায় পণ্ডিতগণ বলেন:] আমি এই শব্দটি এখানে উদ্ধৃত করার কারণ হলো—প্রথমত, এর উৎস বিরল এবং দ্বিতীয়ত, এতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কর্তৃক মুসাফিরের জন্য রোযা রাখা বা রোযা ভঙ্গ করার ক্ষেত্রে যে সুবিধা ও পছন্দের কথা জানানো হয়েছে, তার কারণ বর্ণিত হয়েছে। আর তা হলো—সহজীকরণ (তাইয়াসীর)। মানুষ এই বিষয়ে ভিন্ন ভিন্ন হয়, যেমনটি তাদের ক্ষমতা ও স্বভাবের পার্থক্য থেকে দৃশ্যমান ও জানা। তাদের মধ্যে কারো কারো জন্য সহজ হলো সকলের সাথে রোযা পালন করা, যাতে ইফতারের সময় তাদেরকে ক্বাযা করতে না হয়। আবার কারো কারো জন্য তা (ক্বাযা করা) গুরুত্বপূর্ণ নয়, তাই তারা সুযোগ হিসেবে রোযা ভেঙ্গে দেয় এবং পরে তা ক্বাযা করে। সুতরাং দরূদ ও সালাম বর্ষিত হোক সেই নিরক্ষর নবীর উপর, যার প্রতি নাযিল করা হয়েছিল:

"আল্লাহ তোমাদের জন্য সহজ চান, কঠিন চান না।" (সূরা আল-বাক্বারা ২:১৮৫)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2885)


2885 - ` إن شر الرعاء الحطمة `.
أخرجه مسلم (6 /




মা’কিল ইবনে ইয়াসার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন]:

"নিশ্চয়ই নিকৃষ্টতম রাখাল (বা শাসক) হলো কঠোর অত্যাচারী।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2886)


2886 - ` اللهم لا سهل إلا ما جعلته سهلا وأنت تجعل الحزن إذا شئت سهلا `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (2427) وابن السني (351) والضياء
في `
المختارة ` (1683 و 1684) وأبو نعيم في ` أخبار أصفهان ` (2 / 305)
والأصبهاني في ` الترغيب ` (131 / 1) من طريق حماد بن سلمة عن ثابت عن أنس
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط
مسلم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ‘হে আল্লাহ! আপনি যা সহজ করে দেন, তা ছাড়া কোনো কিছুই সহজ নয়। আর আপনি ইচ্ছা করলে কঠিন (বা শোক) বিষয়কেও সহজ করে দেন।’