হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2887)


2887 - ` اجلسي لا يتحدث الناس أن محمدا يغزو بامرأة `.
أخرجه ابن سعد (8 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"তুমি বসে যাও, যাতে লোকেরা বলাবলি না করে যে, মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজন নারীকে নিয়ে যুদ্ধাভিযান করছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2888)


2888 - ` وددت أني لقيت إخواني، فقال أصحابه: أوليس نحن إخوانك؟ قال: أنتم أصحابي
ولكن إخواني الذين آمنوا بي ولم يروني `.
أخرجه أحمد (3 / 155) : حدثنا هاشم بن القاسم حدثنا جسر (الأصل: حسن) عن
ثابت عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وهذا إسناد
رجاله ثقات رجال الشيخين غير جسر، وهو ابن فرقد، وهو ضعيف لسوء حفظه،
واختلفت أقوال الأئمة في تضعيفه، ولعل أعدل ما قيل فيه قول أبي حاتم: ` ليس
بالقوي، كان رجلا صالحا `. ومثله قول البخاري في ` التاريخ ` (1 / 1 / 246
) : ` ليس بذاك `. وقد أشار إلى هذا الذي ذكرته الذهبي في ` الميزان `، فقد
ساق له حديثا في اسم الله الأعظم، فعقب عليه بقوله: ` هذا شبه موضوع، وما
يحتمله جسر `. وأقره الحافظ. قلت: فمثله يستشهد به، ويتقوى بغيره، خلافا
لمن نفى ذلك من بعض المعاصرين الذين لم يتقنوا هذه الصناعة، فإنه قد توبع،
فقال أبو عبيدة الحداد: حدثنا محتسب بن عبد الرحمن عن ثابت البناني به،
ولفظه: ` متى ألقى إخواني؟ `. قالوا: يا رسول الله! ألسنا إخوانك؟ قال:
فذكره. أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (6 / 118) وعنه ابن عدي (6 / 2457)
والطبراني في ` المعجم الأوسط ` (2 / 39 / 5624) وقال: ` لم يروه عن ثابت
إلا المحتسب `.
كذا قال، ورواية أحمد عن جسر ترده، وهذه متابعة لا بأس بها
، فإن المحتسب هذا ذكره ابن حبان في ` الثقات ` (7 / 528) برواية أبي شهاب
الحناط عنه. وزاد في ` الجرح `: ` وعبد الواحد بن واصل أبو عبيدة الحداد `
. يعني راوي هذا الحديث عنه. فحديثه يحتمل التحسين، ولم يضعفه أحد سوى ابن
عدي، ولم يزد في ذلك على قوله: ` يروي عن ثابت أحاديث ليس محفوظة `. وهذا
معناه أنه يتقى من حديثه ما تفرد به، أو خالف الثقات فيه، وليس الأمر كذلك
هنا، فإنه لم يتفرد به كما عرفت. ثم إن له شاهدا من حديث أبي هريرة نحوه في
حديث السلام على المقبرة بلفظ: ` وددت أنا قد رأينا إخواننا `. قالوا:
أولسنا إخوانك يا رسول الله؟ قال: ` أنتم أصحابي، وإخواننا الذين لم يأتوا
بعد ` الحديث. أخرجه مسلم (1 / 150) وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` (3
/ 235 / 776) و ` أحكام الجنائز ` (ص 190) و ` التعليق الرغيب ` (1 / 93)
. والحديث أورده الهيثمي في ` المجمع ` (10 / 66) وقال: ` رواه أحمد وأبو
يعلى، وفي رجال أبي يعلى (محتسب أبو عائذ) ، وثقه ابن حبان، وضعفه ابن
عدي، وبقية رجال أبي يعلى رجال الصحيح غير الفضل بن الصباح، وهو ثقة، وفي
إسناد أحمد جسر، وهو ضعيف، ورواه الطبراني في
` الأوسط `، ورجاله رجال
الصحيح غير (محتسب) ، وبسند أبي يعلى إلى أنس قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: ` طوبى لمن رآني وآمن بي، وطوبى لمن آمن بي ولم يراني سبع مرات
`. رواه أحمد، وإسناد أبي يعلى - كما تقدم - حسن، وإسناد أحمد فيه جسر
وهو ضعيف `. قلت: تقدم تخريجه بهذا اللفظ، مع شواهد له، بعضها صحيحة برقم (
1241) ، فراجع إن شئت.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন: "আমার ইচ্ছা হয় যে আমি যেন আমার ভাইদের সাথে সাক্ষাৎ করি।"

তখন তাঁর সাহাবীগণ আরজ করলেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা কি আপনার ভাই নই?"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমরা হলে আমার সাহাবী (সঙ্গী)। কিন্তু আমার ভাই হলো তারা, যারা আমার প্রতি ঈমান এনেছে অথচ আমাকে দেখেনি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2889)


2889 - ` كان إذا أوى إلى فراشه نام على شقه الأيمن، ثم قال: اللهم أسلمت نفسي إليك
ووجهت وجهي إليك وفوضت أمري إليك وألجأت ظهري إليك رغبة ورهبة إليك لا ملجأ
ولا منجأ منك إلا إليك، آمنت بكتابك الذي أنزلت ونبيك الذي أرسلت، وقال
صلى الله عليه وسلم: ` من قالهن ثم مات تحت ليلته مات على الفطرة `.
أخرجه البخاري في ` صحيحه ` (11 / 115 / 6315) وفي ` الأدب المفرد ` (1213
) ومن طريقه البغوي في ` شرح السنة ` (5 / 102 / 1316) : حدثنا مسدد حدثنا
عبد الواحد بن زياد حدثنا العلاء بن المسيب قال: حدثني أبي عن البراء بن
عازب قال: فذكره. وقال البغوي: ` متفق على صحته `. كذا قال، وفيه نظر
لأنه يعني عادة أنه أخرجه الشيخان! ولم يخرجه مسلم
من هذه الطريق، وإنما من
طريقين آخرين عن البراء من أمره صلى الله عليه وسلم، وليس من فعله، وقد خفي
هذا على بعض الكاتبين من المعاصرين كما يأتي. وأخرجه الطبراني في ` الدعاء `
(2 / 905 / 246) من طريق مسدد به. ثم أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (
1211) من طريق عبد الله بن سعيد بن حازم أبي بكر النخعي قال: أخبرنا العلاء
بن المسيب به. قلت: وعبد الله بن سعيد هذا، لا بأس به في المتابعات، فقد
روى عنه ثلاثة من الثقات، ولهذا قال الحافظ في ` التقريب `: ` مقبول `.
وللحديث طريق أخرى، يرويه خلف بن خليفة عن حصين عن سعد بن عبيدة عن البراء به
أخرجه النسائي في ` عمل اليوم والليلة ` (461 / 785) . قلت: ورجاله ثقات
رجال الشيخين غير خلف بن خليفة، فمن رجال مسلم، لكن كان اختلط. وقد خولف في
متنه، فرواه منصور عن سعد بن عبيدة به مرفوعا بلفظ: ` إذا أتيت مضجعك فتوضأ
وضوءك للصلاة، ثم اضطجع على شقك الأيمن ثم قل.. ` فذكره، وزاد في آخره: `
واجعلهن آخر ما تتكلم به `. قال: فرددتها على النبي صلى الله عليه وسلم،
فلما بلغت: ` اللهم آمنت بكتابك الذي أنزلت `. قلت: ورسولك! قال: ` لا،
ونبيك الذي أرسلت `.
أخرجه البخاري (1 / 357 / 247) ومسلم (8 / 77)
وأبو داود (




বারাআ ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) যখন বিছানায় যেতেন, তখন ডান কাতে শুতেন। এরপর বলতেন:
"হে আল্লাহ! আমি আমার আত্মাকে আপনার কাছে সমর্পণ করলাম, আমার চেহারাকে আপনার দিকে ফিরালাম, আমার সমস্ত বিষয় আপনার কাছে সোপর্দ করলাম এবং আমার পিঠকে আপনার আশ্রয়ে রাখলাম— আপনার প্রতি আগ্রহ এবং আপনার প্রতি ভীতি নিয়ে। আপনি ছাড়া আপনার পাকড়াও থেকে আশ্রয় বা পরিত্রাণ পাওয়ার কোনো স্থান নেই, কেবল আপনার নিকটেই ছাড়া। আমি আপনার নাযিলকৃত কিতাবের উপর ঈমান আনলাম এবং আপনার প্রেরিত নবীর উপরও ঈমান আনলাম।"
এবং তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: “যে ব্যক্তি এই বাক্যগুলো বলে, অতঃপর ঐ রাতেই মৃত্যুবরণ করে, সে ফিতরাতের (ইসলামের স্বভাবজাত প্রকৃতির) উপর মৃত্যুবরণ করে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2890)


2890 - ` من صلى صلاة الصبح فهو في ذمة الله، فلا يطلبنكم الله من ذمته بشيء فإنه من
يطلبه من ذمته بشيء يدركه، ثم يكبه على وجهه في نار جهنم `.
أخرجه مسلم (2 / 125) وأبو عوانة (2 /




জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ফজরের সালাত আদায় করল, সে আল্লাহর যিম্মাদারিতে (আশ্রয়ে বা নিরাপত্তায়) রয়েছে। সুতরাং (সাবধান!) আল্লাহ যেন তাঁর যিম্মাদারির (প্রতিশ্রুতির) বিষয়ে তোমাদেরকে কোনো কিছু নিয়ে পাকড়াও না করেন। কেননা, আল্লাহ যদি তাঁর যিম্মা ভঙ্গের কোনো কারণে কাউকে পাকড়াও করেন, তবে তিনি তাকে অবশ্যই ধরে ফেলেন, অতঃপর তাকে উপুড় করে জাহান্নামের আগুনে নিক্ষেপ করবেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2891)


2891 - ` أيما امرئ قال لأخيه: يا كافر! فقد باء بها أحدهما إن كان كما قال وإلا
رجعت عليه (وفي رواية: ` على الآخر `) `.
أخرجه مسلم (1 / 57) وأبو عوانة (1 / 23) وابن حبان (1 / 234 / 250)
وأحمد (2 / 44) من طرق عن عبد الله بن دينار أنه سمع ابن عمر يقول: قال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. وأخرجه البخاري (6104) وأبو عوانة
، وابن حبان (249) والترمذي (7 / 293 / 2639) ، وأحمد (2 / 18 و 47
و60 و 112 و 113) من طرق أخرى عن ابن دينار به دون قوله: ` إن كان.. ` إلخ،
وكذا هو في ` موطأ مالك ` (3 / 148) ومن طريقه
أخرجه البخاري وغيره.
وكذلك رواه في ` الأدب المفرد ` (439) من طرق عن مالك. وقال الترمذي: `
حديث حسن صحيح `. وخالف الطرق المشار إليها عن مالك أحد الضعفاء، فقال
البخاري في ` الأدب المفرد ` (440) : حدثنا سعيد بن داود، قال: حدثنا مالك
أن نافعا حدثه أن عبد الله بن عمر أخبره أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:
فذكره بمعنى حديث الترجمة. وسعيد هذا هو الزنبري، قال الحافظ في ` التقريب `
: ` صدوق له مناكير عن مالك، ويقال: اختلط عليه بعض حديثه، وكذبه عبد الله
ابن نافع في دعواه أنه سمع من لفظ مالك `. قلت: وهذا من مناكيره، فإنه خالف
الجماعة في شيخ مالك، فجعله نافعا، وإنما هو عبد الله بن دينار. لكن له أصل
من حديث نافع عن ابن عمر مختصرا دون الزيادة. أخرجه مسلم (1 / 56) وأبو
عوانة (1 /




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

যে কোনো ব্যক্তি তার ভাইকে ‘হে কাফির’ বলে সম্বোধন করে, তবে তাদের দুজনের মধ্যে একজন অবশ্যই এর ভার বহন করবে। যদি সে (যাকে কাফির বলা হয়েছে) বাস্তবিকই সেরূপ হয় (অর্থাৎ কাফির প্রমাণিত হয়), অন্যথায় (যদি সে সেরূপ না হয়) তবে এই অপবাদ তার নিজের দিকেই (বক্তার দিকে) ফিরে আসে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2892)


2892 - ` أرأيت هذا الليل الذي قد كان ألبس عليك كل شيء أين جعل؟ فقال: الله أعلم.
قال: فإن الله يفعل ما يشاء `.
أخرجه إسحاق بن راهويه في ` مسند أبي هريرة ` (1 / 399 / 437) : أخبرنا
المخزومي: أخبرنا عبد الواحد بن زياد أخبرنا عبد الله بن عبد الله الأصم
أخبرنا يزيد بن الأصم عن أبي هريرة قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله
عليه وسلم فقال: يا محمد! أرأيت * (جنة عرضها السماوات والأرض) * فأين النار
؟ قال: فذكره. وأخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (1 / 158 / 103) من طريق ابن
راهويه وفيه بعض الأحرف قد حرفت فتصحح من هنا.
وتوبع إسحاق، فقال البزار في
` مسنده ` (3 / 43 / 2196) : حدثنا محمد بن معمر حدثنا مغيرة بن سلمة أبو
هشام حدثنا عبد الواحد بن زياد به. إلا أنه قال: ` قال: حيث شاء الله، قال
: فكذلك النار حيث شاء الله `. وتوبع البزار، فقال الحاكم (1 / 36) :
أخبرني محمد بن عبد الله الجوهري - واللفظ له - : حدثنا محمد بن إسحاق: أنبأ
محمد بن معمر بن ربعي القيسي: حدثنا أبو هشام المغيرة بن سلمة المخزومي به،
إلا أنه قال: ` قال: كذلك الله يفعل ما يشاء `. وقد توبع المخزومي، فأخرجه
الحاكم أيضا من طريق أبي النعمان محمد بن الفضل: حدثنا عبد الواحد بن زياد به
. وقال: ` حديث صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي. وأقول: إنما هو
على شرط مسلم فقط، لأن عبد الله بن عبد الله الأصم لم يرو عنه البخاري، وهو
ثقة كما قال ابن معين وغيره، وهو أخو عبيد الله بن عبد الله الأصم،
وكلاهما ذكرهما ابن حبان في ` الثقات ` (7 / 36 و 142) ، أكبرهما عبد الله،
وكلاهما يروي عن عمهما يزيد بن الأصم، وعن كل منهما عبد الواحد بن زياد كما في
` الجرح والتعديل ` وغيره، فكأنه لذلك اختلف الرواة أو المخرجون في راوي هذا
الحديث هل هو عبد الله المكبر، أم عبيد الله المصغر؟ فوقع في ` مسند إسحاق `
و` مستدرك الحاكم ` مكبرا، ووقع في ` الإحسان ` وفي ` مسند البزار ` مصغرا
، وكذا وقع في ` صحيح مسلم ` (2 / 59) وقد ساق له حديثا آخر فيما يقطع
الصلاة، ساقه عن شيخه إسحاق بن راهويه بإسناده المذكور أعلاه، لكنه قال: `
عبيد الله.. `، ومن الغريب أن الحافظ ذكر القطع هذا في ترجمة عبد الله
المكبر، وهو تابع في ذلك لأصله ` تهذيب المزي ` فإنه ساقه في
ترجمته (15 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, (রাসূলুল্লাহ ﷺ জিজ্ঞেস করলেন): “আপনি কি এই রাতটিকে দেখেছেন, যা সবকিছু আপনার ওপর আচ্ছাদিত করেছিল? এটিকে কোথায় স্থাপন করা হলো?”
সে (প্রশ্নকারী) বলল, “আল্লাহই ভালো জানেন।”
তিনি (রাসূল ﷺ) বললেন, “নিশ্চয় আল্লাহ যা ইচ্ছা করেন, তা-ই করেন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2893)


2893 - ` اركع ركعتين ولا تعودن لمثل هذا. يعني: التأخير في المجيء إلى الجمعة `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (4 / 92 / 2495) والدارقطني في ` سننه ` (2 /
16 / 11) من طريق ابن إسحاق: حدثني أبان بن صالح عن مجاهد عن جابر بن عبد
الله قال: دخل سليك الغطفاني المسجد يوم الجمعة ورسول الله صلى الله عليه
وسلم يخطب الناس، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره، قال:
فركعهما ثم جلس. قلت: وهذا إسناد حسن لأن ابن إسحاق قد صرح بالتحديث، فأمنا
بذلك شر تدليسه، وسائر رجاله ثقات، ولعله لذلك أشار الحافظ لتقوية الحديث
بقوله في ` الفتح ` (2 / 408) : ` أخرجه ابن حبان `، وسكت عليه.
وقال ابن
حبان عقبه. ` قوله: ` لا تعودن لمثل هذا `، أراد الإبطاء في المجيء إلى
الجمعة لا الركعتين اللتين أمر بهما، والدليل على صحة هذا خبر ابن عجلان الذي
تقدم ذكرنا له أنه أمره في الجمعة الثانية أن يركع ركعتين مثلهما `. قلت:
حديث ابن عجلان الذي أشار إليه ابن حبان، أخرجه ابن حبان قبيل هذا، وإسناده
حسن أيضا، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (1470) .




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
জুম্মার দিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন খুতবা দিচ্ছিলেন, তখন সুলাইক আল-গাতাফানি মসজিদে প্রবেশ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: "আপনি দুই রাকাত সালাত (নামাজ) আদায় করুন, আর এমনটি যেন আর না করেন।" (অর্থাৎ জুম্মার জন্য মসজিদে আসতে যেন আর দেরি না হয়।)
বর্ণনাকারী বলেন, অতঃপর তিনি (সুলাইক) সেই দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন এবং বসে গেলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2894)


2894 - ` لا وصال في الصيام `.
أخرجه أبو داود الطيالسي في ` مسنده ` (1765) : حدثنا اليمان أبو حذيفة عن
أبي عيسى عن جابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت:
وهذا إسناد ضعيف، اليمان هذا ضعيف اتفاقا. وأبو عيسى لم أعرفه. ورواه حرام
بن عثمان عن عبد الرحمن ومحمد ابني جابر عن أبيهما به. أخرجه عبد الرزاق في `
المصنف ` (4 / 269 / 7758) والبيهقي في ` السنن ` (7 / 319) من طريقين عنه
. لكن حرام هذا متروك، حتى قال الشافعي فيه: ` الرواية عن حرام حرام `!
وأخرجه الطيالسي أيضا (1764) : حدثنا خارجة بن مصعب عن حرام بن عثمان عن أبي
عتيق عن جابر به. وأبو عتيق هو عبد الرحمن بن جابر المتقدم في رواية عبد
الرزاق.
وخارجة بن مصعب متروك أيضا. لكن للحديث شاهد خير مما تقدم، فقال
أحمد في ` المسند ` (3 / 62) : حدثنا عبد الله بن الوليد حدثنا سفيان عن سلمة
بن كهيل عن قزعة عن أبي سعيد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير عبد الله بن الوليد
هذا، وهو العدني، وهو مختلف فيه، وقد قال أحمد فيه: ` حديثه صحيح `.
وقال الذهبي في ` المغني `: ` صدوق `. وكذا قال الحافظ، وزاد: ` ربما أخطأ
`. قلت: وقد توبع، فقد أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (5 / 236 / 3570) من
طريق أخرى عن أحمد قال: حدثنا مؤمل بن إسماعيل وعبد الله بن الوليد عن سفيان
به. ومؤمل هذا قريب حاله من حال العدني، قال الحافظ: ` صدوق سيىء الحفظ `.
فهو متابع قوي، والحديث صحيح، فقد جاء من طريق أخرى عن أبي سعيد مرفوعا بلفظ
: ` لا تواصلوا.. ` الحديث.
رواه البخاري وغيره، وهو مخرج في ` صحيح أبي
داود ` (2044) . والحديث لم يعزه السيوطي في ` الجامع الصغير ` إلا للطيالسي
، وأما في ` الجامع الكبير ` فزاد عليه: ` عم، سمويه، حب `. ولعل ` عم `
محرف من ` حم `، فإن عبد الله بن الوليد هو من شيوخ أحمد. ثم إنني أتعجب من
الهيثمي كيف فات عليه هذا الحديث فلم يورده في ` مجمع الزوائد ` مع أنه على
شرطه، وكذلك لم يورده في ` موارد الظمآن `! ولعل ملحظه في ذلك أنه بمعنى
رواية البخاري المتقدمة، فهو على ذلك ليس على شرطه. والله سبحانه وتعالى
أعلم. ثم إن للحديث طريقا ثالثة عن جابر، وشاهدا آخر من حديث علي رضي الله
عنهما، أخرجهما ابن الجوزي في ` الواهيات ` (2 /




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন:
"রোযার মধ্যে লাগাতার রোযা (বিছাল) রাখা বৈধ নয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2895)


2895 - ` من أحبهما فقد أحبني ومن أبغضهما فقد أبغضني. يعني الحسن والحسين رضي الله
عنهما `.
أخرجه أحمد في ` المسند ` (2 / 440) وفي ` الفضائل ` (2 / 777 / 1376)
ومن طريقه الحاكم (3 / 166) والبزار (3 / 227 / 2627) عن جعفر بن إياس عن
عبد الرحمن بن مسعود عن أبي هريرة قال: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه
وسلم ومعه حسن وحسين، هذا على عاتقه، وهذا على عاتقه، وهو يلثم هذا مرة
، ويلثم هذا مرة، حتى انتهى إلينا، فقال له رجل: يا رسول الله! إنك تحبهما
. فقال: فذكره. وقال البزار: ` لا نعلم روى عبد الرحمن بن مسعود عن أبي
هريرة إلا هذا `. قلت: بلى له عنه حديث آخر تقدم برقم (360) ، لكن وقع هناك
` عبد الرحمن بن عبد الله بن مسعود ` نقلا عن ` موارد الظمآن `، وبعد طبع
أصله ` صحيح ابن حبان `، وطبع كتاب شيخه فيه ` مسند أبي يعلى ` تبين أن زيادة
` عبد الله ` بين ` عبد الرحمن ` و ` مسعود ` خطأ من الناسخ أو الطابع
فليصحح.
وقال الحاكم عقب حديث الترجمة: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي. وهذا
منهما ذهاب إلى أن عبد الرحمن بن مسعود هذا ثقة، وقد وثقه ابن حبان (5 / 106
) ولم يذكر له راويا غير جعفر هذا، وكذلك فعل ابن أبي حاتم، لكن لما ترجمه
الحافظ في ` التعجيل ` قال: ` وعنه جعفر بن إياس وغيره `. وخفي هذا على
المعلق على ` الإحسان ` (10 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন, আর তাঁর সাথে হাসান ও হুসাইনও ছিলেন। তাঁদের একজন ছিলেন তাঁর এক কাঁধে এবং অন্যজন ছিলেন তাঁর আরেক কাঁধে। তিনি একবার এইজনকে চুম্বন করছিলেন এবং আরেকবার ঐজনকে চুম্বন করছিলেন, এভাবে তিনি আমাদের নিকট এসে পৌঁছালেন।

তখন এক ব্যক্তি তাঁকে জিজ্ঞাসা করল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি নিশ্চয়ই তাঁদের দু’জনকে খুব ভালোবাসেন?

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘যে ব্যক্তি তাঁদের দু’জনকে ভালোবাসলো, সে যেন আমাকেই ভালোবাসলো; আর যে ব্যক্তি তাঁদের দু’জনকে ঘৃণা করলো, সে যেন আমাকেই ঘৃণা করলো।’ (তিনি হাসান ও হুসাইন রাদিয়াল্লাহু আনহুমা-কে উদ্দেশ্য করেছিলেন।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2896)


2896 - ` مثل المجاهد في سبيل الله كمثل الصائم القائم الدائم الذي لا يفتر من صلاة
ولا صيام حتى يرجع `.
أخرجه مالك في ` الموطأ ` (2 / 2) وعنه ابن حبان في ` صحيحه ` (7 / 68 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাস্তায় জিহাদকারীর উদাহরণ হলো সেই নিরন্তর সাওম পালনকারী ও নামাযে দণ্ডায়মান ব্যক্তির মতো, যে (জিহাদ থেকে) ফিরে আসা পর্যন্ত নামায ও সাওম থেকে কখনো বিরত হয় না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2897)


2897 - ` وأنا أشهد، وأشهد: أن لا يشهد بها أحد إلا برئ من الشرك. يعني
الشهادتين `.
أخرجه النسائي في ` عمل اليوم والليلة ` (155 / 39) والطبراني في ` الأوسط
` (2 / 266 / 2 / 9059) من طريق أصبغ بن الفرج قال: أخبرني ابن وهب عن عمرو
بن الحارث عن سعيد بن أبي هلال أن يحيى بن عبد الرحمن حدثه عن عون بن عبد الله
عن يوسف بن عبد الله بن سلام عن أبيه قال: بينما نحن نسير مع رسول الله
صلى الله عليه وسلم سمع رجلا في الوادي يقول: أشهد أن لا إله إلا الله، وأن
محمدا رسول الله، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره، واللفظ
للنسائي، وزاد الطبراني في أوله: `.. إذ سمع القوم وهم يقولون: أي
الأعمال أفضل يا رسول الله؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إيمان بالله
ورسوله، وجهاد في سبيل الله، وحج مبرور، ثم سمع.. ` الحديث. وقال
الطبراني: ` لا يروى عن عبد الله بن سلام إلا بهذا الإسناد، تفرد به عمرو بن
الحارث `. قلت: وهو ثقة، وكذلك من فوقه، غير يحيى بن عبد الرحمن، وهو
الثقفي، ذكره ابن أبي حاتم (4 / 2 / 166) بهذه الرواية، وكذا ابن حبان في
` الثقات ` (5 / 524 و 527) ولهذا قال الذهبي في ` الميزان ` مشيرا إلى
جهالته:
` تفرد عنه سعيد بن أبي هلال `. والحديث أخرجه سعيد بن منصور في `
سننه ` (3 / 2 / 141 / 2338) قال: أخبرنا عبد الله ابن وهب به إسنادا ومتنا
مع زيادة الطبراني. وكذا أخرجه أحمد وابنه عبد الله (5 / 451) : حدثنا
هارون بن معروف حدثنا ابن وهب به. وكذلك أخرجه الضياء المقدسي في ` المختارة
` (58 / 8 / 1) من طرق قالوا: أخبرنا ابن وهب به. وخالفهم جميعا في إسناده
حرملة بن يحيى فقال: حدثنا ابن وهب به، إلا أنه قال: ` يحيى بن عبد الله بن
سالم ` مكان ` يحيى بن عبد الرحمن `. أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (7 / 58 /
4576) : أخبرنا عبد الله بن محمد بن سلم: حدثنا حرملة بن يحيى به. وابن
سالم هذا ثقة. وأنا أظن أن هذا وهم من حرملة، فإنه وإن كان ثقة ومن شيوخ
مسلم، فقد تكلم فيه بعضهم كما ترى في ` التهذيب `، ولذا قال الذهبي في `
الكاشف `: ` صدوق يغرب `. وأما ابن سلم - وهو الحمصي - فهو ثقة إمام محدث،
ووثقه ابن حبان، كما ذكر الذهبي في ` سير النبلاء ` (14 / 306) . وقد جهل
هذا التحقيق أو تجاهله المعلق على ` الإحسان ` (10 / 456 / 4596) - وأظنه
غير الشيخ شعيب من الذين يعملون تحت يده - فقال: ` إسناده قوي على شرط مسلم
غير يوسف بن عبد الله بن سلام، فقد روى عنه أصحاب السنن، وهو صحابي صغير `.
ثم خرجه من رواية سعيد وأحمد، ولم يعرج على المخالفة التي وقعت من حرملة
لروايتهما، كما أنه لم يعزه للنسائي وعبد الله بن أحمد والطبراني!
وبالجملة، فهذا الإسناد ضعيف لجهالة يحيى بن عبد الرحمن الثقفي، إلا أن حديثه
بشطريه ثابت صحيح بشواهده. أما حديث الترجمة، فيشهد له حديث عائشة رضي الله
عنها: ` كان إذا سمع المؤذن قال: وأنا، وأنا `. أخرجه أبو داود وغيره،
وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` رقم (538) ، ورواه ابن حبان، وهو مما سقط
من كتاب الهيثمي ` الموارد `! ويشهد لجملة البراءة من الشرك حديث رجل من
أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن النبي صلى الله عليه وسلم سمع رجلا يقرأ:
* (قل يا أيها الكافرون) *، قال: ` أما هذا فقد برىء من الشرك `. وسمع آخر
يقرأ: * (قل هو الله أحد) *، فقال: ` أما هذا فقد غفر له `. أخرجه أحمد (4
/ 65 و 5 / 376 و 378) من طريقين عن مهاجر الصائغ عنه. فهو إسناد صحيح.
ولهذا شاهد من حديث نوفل أبي فروة بلفظ: ` اقرأ * (قل يا أيها الكافرون) *، ثم
نم على خاتمتها، فإنها براءة من الشرك `. صححه ابن حبان (786 و 787 و 5500
و5520 و [..] ص 429 ج 7) ، والحاكم والذهبي، وهو في ` التعليق الرغيب ` (
1 / 209) . وأما الزيادة التي فيها السؤال عن أفضل الأعمال، فلها شواهد في
`
الصحيحين ` وغيرهما من حديث أبي هريرة وأبي ذر، وهذا أخرجه ابن حبان (4577
) . فراجع ` الترغيب ` (2 /




আব্দুল্লাহ ইবনে সালাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে পথ চলছিলাম, তখন লোকদেরকে বলতে শুনলাম: হে আল্লাহর রাসূল! সর্বোত্তম আমল কী? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: আল্লাহর প্রতি এবং তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান আনা, আল্লাহর পথে জিহাদ এবং মাবরুর (কবুল হওয়া) হজ। এরপর তিনি (রাসূল সাঃ) উপত্যকায় এক ব্যক্তিকে বলতে শুনলেন: ‘আশহাদু আল লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু, ওয়া আন্না মুহাম্মাদার রাসূলুল্লাহ (আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ব্যতীত আর কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহর রাসূল)।’ তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:

“আমিও সাক্ষ্য দিচ্ছি। আমি আরও সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, যে ব্যক্তিই এ দুটির (শাহাদাতাইনের) সাক্ষ্য দেবে, সে অবশ্যই শিরক থেকে মুক্ত হয়ে যাবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2898)


2898 - ` من أطرق فرسه مسلما كان له كأجر سبعين فرسا حمل عليه في سبيل الله فإن لم
تعقب كان له كأجر فرس يحمل عليها في سبيل الله `.
أخرجه ابن حبان (




যে ব্যক্তি আল্লাহর প্রতি অনুগত হয়ে তার ঘোড়াকে (জিহাদের জন্য) প্রস্তুত রাখে, তার জন্য সত্তরটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সাওয়াব থাকবে, যা আল্লাহর পথে নিয়োজিত হয়েছে। আর যদি সেই ঘোড়া কোনো ফলপ্রসূ না হয় (অর্থাৎ জিহাদে অংশগ্রহণ না করে), তবুও সে আল্লাহর পথে নিয়োজিত একটি ঘোড়ার সমপরিমাণ সাওয়াব লাভ করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2899)


2899 - ` كان يخمر وجهه وهو محرم `.
أخرجه الدارقطني في ` العلل ` (3 / 13) قال: حدثنا أبو بكر الشافعي قال:
حدثنا موسى بن الحسن قال: حدثنا القعنبي: حدثنا ابن أبي ذئب عن الزهري عن
أبان بن عثمان عن عثمان بن عفان: فذكره. وقال: ` هكذا كان في كتاب أبي
بكر مرفوعا، والصواب موقوف `! كذا قال! ثم ساق عقبه بسنده الصحيح عن عبد
الله بن عامر بن ربيعة أنه
رأى عثمان بن عفان بـ (العرج) مخمرا وجهه بقطيفة
أرجوان في يوم صائف وهو محرم. وأقول: لا تعارض بين المرفوع، وهذا الموقوف
، ولاسيما وإسنادهما مختلف، والأول صحيح أيضا رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين
غير شيخ أبي بكر الشافعي موسى بن الحسن، ولم يعرفه المعلق على كتاب ` العلل `
، وهو محدث ثقة يعرف بـ (الجلاجلي) لحسن صوته، وثقه محمد بن أبي الفوارس،
وتبعه الخطيب، وروى عن الدارقطني أنه قال: ` لا بأس به `. وهو مترجم في `
تاريخ بغداد ` (13 / 49) و ` تاريخ دمشق ` (17 /




উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তিনি ইহরাম অবস্থায় তাঁর মুখমণ্ডল আবৃত করে রাখতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2900)


2900 - ` يا أبا بكر! ما أنا بمستعذرك منها بعد هذا أبدا `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (319 /




“হে আবু বকর! এরপর থেকে আমি আর কখনো এ ব্যাপারে তোমার কোনো ওজর (বা অজুহাত) গ্রহণ করব না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2901)


2901 - ` ألا ترين أني قد حلت بين الرجل وبينك. يعني أبا بكر الصديق وابنته عائشة `.
أخرجه أحمد (4 /




(কোনো এক সাহাবী অথবা উম্মুল মু’মিনীন থেকে বর্ণিত)
তুমি কি দেখছো না যে, আমি ঐ ব্যক্তি এবং তোমার মাঝে বাধা সৃষ্টি করেছি (বা মধ্যস্থতা করেছি)? এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো আবু বকর আস-সিদ্দিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং তাঁর কন্যা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে (মধ্যস্থতা করা)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2902)


2902 - ` صلاة هاهنا - يريد المدينة - خير من ألف صلاة هاهنا - يريد إيلياء - `.
أخرجه الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1 / 247) والحاكم (3 / 504) والطبراني
في ` المعجم الكبير ` (1 / 285 / 907) ومن طريقه أبو نعيم في ` المعرفة ` (
2 / 381 / 1006) من طريق عطاف بن خالد عن عبد الله بن عثمان بن الأرقم [عن
جده الأرقم] أنه قال: جئت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال لي: أين
تريد؟ فقلت: إلى بيت المقدس،
¬_________
(¬1) كذا وقع فيه، وفي ` التهذيب ` (11 / 434) : ` سنن `! ولعل الصواب
الأول. اهـ.
فقال: إلى تجارة؟ فقلت: لا، ولكن أردت أن
أصلي فيه. فقال: فذكره، والسياق للطحاوي، والزيادة من الآخرين، ولفظهما
: ` صلاة ههنا، خير من ألف صلاة ثم `. وأورده الهيثمي في ` المجمع ` (4 / 5
) بلفظ: ` فالصلاة ههنا - وأومأ إلى مكة - خير من ألف صلاة - وأومأ بيده إلى
الشام - `. وقال الهيثمي: ` رواه أحمد، والطبراني في ` الكبير ` فقال:..
`. قلت: فساق لفظ الطبراني المتقدم، وليس فيه الإيماء الذي عزاه لرواية
أحمد، وقد بحثت عنها كثيرا في ` مسنده `، وقد استعنت على ذلك بكل الفهارس
الموضوعة لـ ` المسند ` والمعروفة اليوم فلم أهتد إليه، ولقد افترضت أنه
أورده - لمناسبة ما في غير مسند صحابيه (الأرقم) ، فراجعت كل أحاديث فضل
الصلاة في مسجده صلى الله عليه وسلم في مسانيد الصحابة الذين رووها مثل أبي
هريرة، وابن عمر، وغيرهما، فلم أعثر عليه، فمن المحتمل أن يكون في بعض
نسخ ` المسند `، فقد بلغني عن بعض إخواننا المشتغلين بهذا العلم الشريف أنه
عثر على قطعة منه غير مطبوعة، فلعل الحديث فيها، فإن وجد فغالب الظن أنه من
طريق عطاف هذا. ثم صدق ظني هذا، فقد أفادني هاتفيا الأخ علي الحلبي - جزاه
الله خيرا - أن الحديث أورده الحافظ ابن حجر في ` أطراف المسند ` (1 / 48 /




আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলাম। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: ‘তুমি কোথায় যেতে চাও?’ আমি বললাম: বাইতুল মাকদিসে (জেরুজালেমে)। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: ‘ব্যবসার উদ্দেশ্যে?’ আমি বললাম: ‘না, বরং আমি সেখানে সালাত আদায় করতে চেয়েছি।’ তখন তিনি বললেন:

"এখানে (অর্থাৎ মদীনা মুনাওয়ারায় এক ওয়াক্ত) সালাত, সেখানে (অর্থাৎ ইলিয়া তথা বাইতুল মাকদিসে) এক হাজার সালাতের চেয়ে উত্তম।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2903)


2903 - ` ضعوا ما كان معكم من الأنفال `.
أخرجه الحاكم (3 / 504) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (1 /




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমাদের কাছে আনফালের (যুদ্ধলব্ধ সম্পদের) যে অংশ রয়েছে, তা (সঠিক স্থানে) রেখে দাও।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2904)


2904 - ` تفل صلى الله عليه وسلم في رجل عمرو بن معاذ حين قطعت رجله، فبرأت `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (8 / 151 /




আমর ইবনে মু’আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনা সম্পর্কে বর্ণিত: যখন তাঁর পা বিচ্ছিন্ন হয়ে গিয়েছিল, তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাতে (পায়ের উপর) লালা প্রয়োগ করলেন, ফলে তা আরোগ্য লাভ করলো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2905)


2905 - ` نهى عن مجلسين وملبسين، فأما المجلسان: فجلوس بين الظل والشمس، والمجلس
الآخر: أن تحتبي في ثوب يفضي إلى عورتك، والملبسان: أحدهما: أن تصلي في
ثوب ولا توشح به. والآخر: أن تصلي في سراويل ليس عليك رداء `.
أخرجه الحاكم في ` المستدرك ` (4 / 272) وابن عدي في ` الكامل ` (4 /




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দুই ধরনের বসার স্থান এবং দুই ধরনের পোশাক (পরিধানের পদ্ধতি) থেকে নিষেধ করেছেন।

বসার স্থান দুটির মধ্যে একটি হলো: ছায়া ও সূর্যের মাঝখানে বসা।
আর দ্বিতীয় বসার স্থানটি হলো: এমন কাপড়ে ’ইহতিবা’ (আটসাট হয়ে বসা) করা, যা তোমার সতরকে উন্মুক্ত করে দেয়।

আর দুই ধরনের পোশাকের (পরিধানের) মধ্যে একটি হলো: এমন এক কাপড়ে সালাত আদায় করা যা কাঁধের উপর দিয়ে পেঁচিয়ে (বা চাদর দিয়ে) রাখা হয়নি।
আর দ্বিতীয়টি হলো: এমন পায়জামা (বা ট্রাউজার) পরে সালাত আদায় করা যার উপর কোনো চাদর (বা রداء) নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (2906)


2906 - ` لا يأتي على الناس مائة سنة، وعلى الأرض عين تطرف ممن هو حي اليوم `.
أخرجه أحمد (1 / 93) وابنه عبد الله (1 / 140) ومن طريقه الضياء في `
الأحاديث المختارة ` (2 / 378 / 760) وأبو يعلى (1 / 438 / 584)
والطبراني في ` المعجم الأوسط ` (2 / 59 / 1 / 5988) من طرق عن منصور عن
المنهال بن عمرو عن نعيم ابن دجاجة أنه قال: دخل أبو مسعود عقبة بن عمرو
الأنصاري على علي بن أبي طالب، فقال له علي: أنت الذي تقول: لا يأتي على
الناس مائة سنة وعلى الأرض عين تطرف؟! إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم
:.. (فذكر الحديث) ، والله إن رجاء هذه الأمة بعد مائة عام. وتابعه مطرف
بن طريف عن المنهال بن عمرو به. أخرجه الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1 / 161)
وأبو يعلى أيضا (1 / 360 / 467) ومن طريقه الضياء أيضا (761) والطبراني
في ` المعجم الكبير ` (17 / 248 / 693) .
قلت: وهذا إسناد صحيح، المنهال
بن عمرو ثقة من رجال البخاري، وفيه كلام لا يضر. ونعيم بن دجاجة، ذكره ابن
أبي حاتم (4 / 1 / 461) برواية ثقتين آخرين عنه، ولم يذكر فيه جرحا ولا
تعديلا. وذكره ابن حبان في كتابه في ` ثقات التابعين ` (5 / 478) والظاهر
أنه كان حيا في زمن النبي صلى الله عليه وسلم، ولذلك ألزم الحافظ من صنف في
الصحابة أن يذكروه فيهم. راجع كتابه ` التهذيب `. وللحديث شواهد كثيرة في `
الصحيحين ` وغيرهما، وخرجت طائفة منها في ` الروض النضير ` تحت حديث أبي
سعيد الخدري بمعناه (1100) ، وهو في ` صحيح مسلم ` و ` صحيح ابن حبان `.
والحديث أورده الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (1 / 198) وقال: ` رواه أحمد
وأبو يعلى والطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، ورجاله ثقات `. ومعنى
الحديث أنه لا يعيش أحد ممن كان يؤمئذ حيا على وجه الأرض بعد مائة سنة. وليس
فيه نفي حياة أحد يولد بعد ذلك. انظر ` فتح الباري ` (1 /




নুআইম ইবনে দাজাজাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত যে, আবু মাসউদ উকবা ইবনে আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: আপনিই কি সেই ব্যক্তি, যিনি বলেন— ’মানুষের ওপর এমন শতবর্ষ আসবে না যে, আজকের জীবিত কোনো ব্যক্তির পলক ফেলছে এমন চোখও পৃথিবীতে বাকি থাকবে?!’

(আলী রাঃ বললেন,) বরং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন— [অতঃপর তিনি হাদিসটি উল্লেখ করলেন]। আল্লাহর কসম! এই উম্মাহর (কল্যাণ লাভের) আশা শতবর্ষের পরেই রয়েছে।