হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (287)


287 - ` ألا أخبركم برجالكم من أهل الجنة؟ النبي في الجنة، والصديق في الجنة،
والشهيد في الجنة، والمولود في الجنة، والرجل يزور أخاه في ناحية المصر
لا يزوره إلا لله عز وجل، ونساؤكم من أهل الجنة الودود الولود العؤود على
زوجها التي إذا غضب جاءت حتى تضع يدها في يد زوجها، وتقول: لا أذوق غمضا
حتى ترضى `.
أخرجه تمام الرازي في ` الفوائد ` (ق 202 / 1) وعنه ابن عساكر (2 / 87 / 2
) بتمامه، وأبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (ق




আমি কি তোমাদেরকে জান্নাতবাসী পুরুষদের সম্পর্কে অবহিত করব না? নবী জান্নাতে, সিদ্দীক (পরম সত্যবাদী) জান্নাতে, শহীদ জান্নাতে, এবং (অপ্রাপ্তবয়স্ক) শিশু জান্নাতে। আর সেই ব্যক্তি যে শহরের দূরবর্তী প্রান্তে থাকা তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করে, সে কেবল মহান ও পরাক্রমশালী আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্যই তার সাথে সাক্ষাৎ করে।

আর তোমাদের জান্নাতী স্ত্রীগণ হলো— সেই অতিশয় প্রেমময়ী (আল-ওয়া দুধ), অধিক সন্তান জন্মদানকারীনী (আল-ওয়ালুদ), যে তার স্বামীর প্রতি সর্বদা মনোযোগী ও যত্নশীল (আল-আ’উ উদ)। ঐ স্ত্রী, যে তার স্বামী রাগান্বিত হলে এসে তার হাতের উপর নিজের হাত রেখে বলে: ‘আপনি সন্তুষ্ট না হওয়া পর্যন্ত আমি চোখে ঘুম দেব না।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (288)


288 - ` اثنان لا تجاوز صلاتهما رءوسهما: عبد أبق من مواليه حتى يرجع إليهم،
وامرأة عصت زوجها حتى ترجع `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الصغير ` (ص 97) و ` الأوسط ` (1 / 169 / 2)
عن محمد بن أبي صفوان الثقفي حدثنا إبراهيم بن أبي الوزير، والحاكم في
` المستدرك ` (4 / 173) من طريق محمد بن منده الأصبهاني حدثنا بكر بن بكار،
كلاهما قالا:
حدثنا عمر بن عبيد - زاد الأول: الطنافسي - عن إبراهيم بن مهاجر عن نافع عن
ابن عمر مرفوعا.
وقال الطبراني:
` لم يروه عن إبراهيم إلا عمر، ولا عنه إلا ابن أبي الوزير، تفرد به محمد
بن أبي صفوان `.
كذا قال، وطريق الحاكم ترد عليه، وقد سكت عنه هو والذهبي، وإسناده حسن
عندي، رجاله ثقات رجال الشيخين، سوى ابن مهاجر فإنه من رجال مسلم وحده،
وفيه ضعف يسير.
قال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق، لين الحفظ `.
وأورده الذهبي في ` الضعفاء ` تمييزا فقال: ` ثقة `.
والحديث قال المنذري (3 / 79) :
` رواه الطبراني بإسناد جيد، والحاكم `.
وقال الهيثمي (4 / 313) :
` رواه الطبراني في ` الصغير ` و ` الأوسط ` ورجاله ثقات `.
قلت: وله شاهد من حديث جابر بسند ضعيف أوردته في ` الأحاديث الضعيفة ` رقم
(1075) بلفظ:
` ثلاثة لا تقبل لهم صلاة ... العبد الآبق حتى يرجع إلى مواليه ... والمرأة
الساخط عليها زوجها حتى يرضى، والسكران حتى يصحو `.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

দু’জন ব্যক্তি এমন আছে যাদের সালাত (নামাজ) তাদের মাথা অতিক্রম করে না (অর্থাৎ আল্লাহ্‌র দরবারে কবুল হয় না): ১. মনিবের কাছ থেকে পলায়নকারী গোলাম, যতক্ষণ না সে তাদের কাছে ফিরে আসে, এবং ২. যে স্ত্রী তার স্বামীর অবাধ্যতা করে, যতক্ষণ না সে (আনুগত্যের দিকে) ফিরে আসে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (289)


289 - ` لا ينظر الله إلى امرأة لا تشكر لزوجها، وهي لا تستغني عنه `.
أخرجه النسائي في ` عشرة النساء ` من ` السنن الكبرى ` (1 / 84 / 1) أخبرنا
عمرو بن منصور قال: حدثنا محمد بن محبوب قال:
حدثنا سرار بن مجشر ابن قبيصة - ثقة - عن سعيد بن أبي عروبة عن قتادة عن سعيد
بن المسيب عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره.
وقال: ` سرار بصري ثقة، هو ويزيد بن زريع يقدمان في سعيد بن أبي عروبة
لأن سعيدا كان قد تغير في آخر عمره، فمن سمع منه قديما فحديثه صحيح `.
قلت: وتابعه ابن المبارك عن سعيد عن قتادة به.
أخرجه أبو سعيد الشاشي عيسى بن سالم في ` حديثه ` (ق 78 / 1) : أنبأنا ابن
المبارك به.
قلت: وهذا إسناد صحيح كسابقه.
وقد تابعه عمر بن إبراهيم عن قتادة به.
أخرجه الحاكم (2 / 190) عن شاذ بن فياض حدثنا عمر بن إبراهيم به. وقال:
` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي!
وخالف شاذا الخليل بن عمر بن إبراهيم فقال: حدثني أبي عن قتادة عن الحسن عن
عبد الله بن عمرو به مرفوعا. فذكر الحسن وهو البصري بدل ابن المسيب.
أخرجه النسائي والعقيلي في ` الضعفاء ` (ص 121) وقال:
` الخليل يخالف في بعض حديثه `.
قلت: ليس هو دون شاذ بن فياض في الثقة والحفظ، وفي ضبطهما كلام يسير،
ولعل الاختلاف من نفس عمر بن إبراهيم ففي ` التقريب `:
` صدوق، في حديثه عن قتادة ضعف `.
ورواية شاذ عنه أولى عندي لموافقتها لرواية ابن أبي عروبة عن قتادة،
ولمتابعة أخرى وقفت عليها في ` الكامل ` لابن عدي أخرجها (ق 289 / 2) من
طريق محمد بن بلال حدثنا عمران عن قتادة عن سعيد بن المسيب به. وقال:
` ومحمد بن بلال يغرب عن عمران القطان، وله عن غيره غرائب، وأرجو أنه لا
بأس به `.
قلت: وهذا إسناد حسن وشاهد قوي لما سبق.
لكن يبدو أن للحديث أصلا من رواية قتادة عن الحسن، فقد قال العقيلي عقب ما
نقلته عنه في الخليل بن عمر:
` وقال سرار بن مجشر: عن سعيد بن أبي عروبة عن قتادة عن الحسن وسعيد بن
المسيب عن عبد الله بن عمرو عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه `.
فإذا كان هذا محفوظا فهو يؤيد صحة رواية شاذ والخليل عن عمر بن إبراهيم عن
قتادة عن سعيد والحسن، ولكنه لم يسق إسناده إلى سرار لننظر فيه.
ثم ساق رواية ابن المبارك المتقدمة عن سعيد عن قتادة عن ابن المسيب به.
وقال: ` هذا أولى `. ثم قال:
` قال هشام الدستواني عن قتادة عن سعيد بن المسيب عن عبد الله بن عمرو، موقوف
نحوه. وهذا أولى `.
قلت: وكذلك رواه شعبة عن قتادة به موقوفا. أخرجه النسائي.
ورواية سرار عن قتادة مرفوعا أولى عندي لسماعه من سعيد قديما كما سبق عن
النسائي ولمتابعة عمر بن إبراهيم له. والله أعلم.
والحديث قال المنذري (3 / 78) :
` رواه النسائي والبزار بإسنادين رواة أحدهما رواة الصحيح، وقال الحاكم:
صحيح الإسناد `.
وقال الهيثمي (4 / 309) :
` رواه البزار بإسنادين والطبراني وأحد إسنادي البزار رجاله رجال الصحيح `.
وقد صححه عبد الحق الإشبيلي بسكوته عليه في ` الأحكام الكبرى ` (ق 144 / 1)
وإيراده إياه في ` الأحكام الصغرى ` (ق 153 / 1) التي خصها بالحديث الصحيح.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা সেই নারীর দিকে (রহমতের দৃষ্টিতে) তাকান না, যে তার স্বামীর প্রতি কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না, অথচ সে তাকে ছাড়া চলতে পারে না (অর্থাৎ তার সাহায্য ব্যতীত অমুখাপেক্ষী হতে পারে না)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (290)


290 - ` لا، بل يبايع على الإسلام، فإنه لا هجرة بعد الفتح، ويكون من التابعين
بإحسان `.
أخرجه الإمام أحمد (3 / 468، 469) عن أبي معاوية شيبان عن يحيى بن أبي كثير
عن يحيى بن إسحاق عن مجاشع بن مسعود.
أنه أتى النبي صلى الله عليه وسلم بابن أخ له يبايعه على الهجرة، فقال رسول
الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير يحيى بن إسحاق وهو
الأنصاري قال ابن معين وابن حبان: ` ثقة ` وكذا قال الحافظ في ` التقريب `.
ثم أخرجه من طريق أبي عثمان النهدي عن مجاشع بن مسعود قال:
` انطلقت بأخي معبد إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد الفتح، فقلت: يا
رسول الله بايعه على الهجرة، فقال: مضت الهجرة لأهلها، قال: فقلت فماذا؟
قال: على الإسلام والجهاد `.
زاد في رواية أخرى عن أبي عثمان النهدي:
` قال: فلقيت معبدا بعد، وكان هو أكبرهما، فسألته؟ فقال: صدق مجاشع `.
وإسناده صحيح على شرط الشيخين.
ويلاحظ القارىء أن المبايع في الرواية الأولى ابن أخي مجاشع، وفي هذه أنه هو
أخوه نفسه واسمه معبد، وهو أصح. والله أعلم.
وأما قوله صلى الله عليه وسلم ` لا هجرة بعد الفتح ` فقد صح من حديث ابن عباس
وعائشة وأبي سعيد، وقد خرجتها في ` إرواء الغليل ` (1173) .




মুজাশি’ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি বলেন: আমি ফাতহের (মক্কা বিজয়ের) পর আমার ভাই মাবাদকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে গেলাম। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তাকে হিজরতের উপর বায়আত করান।
তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) বললেন: না, বরং সে ইসলামের উপর বায়আত করবে। কেননা মক্কা বিজয়ের পর আর কোনো হিজরত নেই, এবং সে ইহসানের (সদাচরণের) সাথে অনুসরণকারীদের অন্তর্ভুক্ত হবে।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, তিনি (মুজাশি’) বলেন, আমি (হিজরতের কথা শুনে) জিজ্ঞাসা করলাম: তাহলে কিসের উপর (বায়আত করাবো)? তিনি বললেন: ইসলামের উপর এবং জিহাদের উপর।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (291)


291 - ` رأيت ليلة أسري بي رجالا تقرض شفاههم بمقاريض من نار، فقلت: من هؤلاء يا
جبريل؟ فقال: الخطباء من أمتك، يأمرون الناس بالبر وينسون أنفسهم، وهم
يتلون الكتاب، أفلا يعقلون؟! `.
هو من حديث أنس رضي الله عنه، وله عنه أربع طرق:
الأولى: عن مالك بن دينار عنه.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (ق 198 / 1) :
حدثنا محمد بن المنهال حدثنا يزيد حدثنا هشام الدستوائي عن المغيرة ختن مالك بن
دينار عن مالك بن دينا.
وأخرجه بن حبان في ` صحيحه ` (رقم




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

মি‘রাজের রাতে আমি এমন কিছু লোককে দেখলাম, যাদের ঠোঁট আগুনের কাঁচি দিয়ে কাটা হচ্ছিল। আমি জিজ্ঞেস করলাম, ‘হে জিবরীল! এরা কারা?’

তিনি বললেন, ‘এরা আপনার উম্মতের সেই খতীব বা বক্তারা, যারা মানুষকে সৎ কাজের আদেশ দিত, কিন্তু নিজেদের কথা ভুলে যেত, অথচ তারা কিতাব (কুরআন) পাঠ করত। তবুও কি তারা জ্ঞান খাটাবে না (বা বিবেক ব্যবহার করবে না)?’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (292)


292 - ` يجاء بالرجل يوم القيامة، فيلقى في النار، فتندلق أقتابه (وفي رواية:
أقتاب بطنه) في النار، فيدور كما يدور الحمار برحاه، فيجتمع أهل النار عليه
فيقولون: يا فلان ما شأنك؟ أليس كنت تأمرنا بالمعروف، وتنهانا عن المنكر؟
قال: كنت آمركم بالمعروف ولا آتيه، وأنهاكم عن المنكر وآتيه `.
أخرجه البخاري (2 /




উসামা ইবনু যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

কিয়ামতের দিন এক ব্যক্তিকে আনা হবে, অতঃপর তাকে জাহান্নামে নিক্ষেপ করা হবে। ফলে তার নাড়িভুঁড়ি (অন্য বর্ণনায়: তার পেটের নাড়িভুঁড়ি) জাহান্নামের মধ্যে বের হয়ে যাবে। সে তখন তার নাড়িভুঁড়ি নিয়ে ঘুরতে থাকবে, যেমন গাধা তার যাঁতার চারদিকে ঘোরে। তখন জাহান্নামের অধিবাসীরা তার চারপাশে জড়ো হবে এবং তারা বলবে: হে অমুক! তোমার কী হলো? তুমি কি আমাদেরকে সৎ কাজের আদেশ দিতে না এবং অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করতে না? সে বলবে: আমি তোমাদেরকে সৎ কাজের আদেশ দিতাম, কিন্তু আমি নিজে তা করতাম না; আর আমি তোমাদেরকে অসৎ কাজ থেকে নিষেধ করতাম, কিন্তু আমি নিজে তা করতাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (293)


293 - ` أنا أكبر منك سنا، والعيال على الله ورسوله، وأما الغيرة، فأرجو الله
أن يذهبها `.
أخرجه أبو يعلى في` مسنده ` (198 / 1) : حدثنا عبد الرحمن بن صالح الأزدي
حدثني عجلان ابن عبد الله من بني عدي عن مالك بن دينار عن أنس قال: لما
حضرت أبا سلمة الوفاة، قالت أم سلمة إلى من تكلني؟ فقال اللهم إنك لإم سلمة
خير من أبي سلمة، فلما توفي خطبها رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت إني
كبيرة السن قال: فذكره فتزوجها رسول الله صلى الله عليه وسلم فأرسل إليها
برحايين وجرة للماء `!
قلت: وهذا سند جيد رجاله ثقات معروفون غير عجلان هذا فأورده ابن حبان في
الثقات (2 / 234) وقال ابن أبي حاتم (3 / 2 / 19) عن أبي زرعة:
` بصري لا بأس به `.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যখন আবু সালামার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মৃত্যুর সময় ঘনিয়ে এল, তখন উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ’আপনি আমাকে কার কাছে রেখে যাচ্ছেন?’ তিনি বললেন, ’হে আল্লাহ! নিশ্চয়ই তুমি উম্মু সালামার জন্য আবু সালামার চেয়েও উত্তম।’ এরপর যখন তিনি ইন্তেকাল করলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। তখন তিনি বললেন, ’আমি তো বেশি বয়স্ক নারী।’

তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ’আমি তোমার চেয়ে বয়সে বড়। আর সন্তান-সন্ততির ভার আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের উপর। আর ঈর্ষা বা সতীনের প্রতি হিংসার বিষয়টি— আমি আল্লাহর কাছে আশা করি যে, তিনি তা দূর করে দেবেন।’

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে বিবাহ করলেন এবং তাঁর কাছে দুটি যাঁতা ও একটি পানির কলসি পাঠালেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (294)


294 - ` من كان له ثلاثة بنات فصبر عليهن وأطعمهن وسقاهن وكساهن من جدته كن له
حجابا من النار يوم القيامة `.
أخرجه ابن ماجه (3669) وكذا البخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 76) وأحمد
(4 / 154) من طريق حرملة بن عمران قال: سمعت أبا عشانة المعافري قال:
سمعت عقبة بن عامر يقول:
سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال مسلم غير أبي عشانة بضم المهملة وتشديد
المعجمة، واسمه حي بن يؤمن بضم التحتانية وسكون الواو المصري وهو ثقة مشهور
بكنيته.
وقال البوصيري في ` الزوائد ` (221 / 1) :
` إسناده صحيح، ورواه أحمد وأبو يعلى في ` مسنديهما `، وله شاهد من حديث
أبي سعيد الخدري، رواه أبو داود والترمذي `.
قلت: هذا الشاهد ضعيف، لجهالته واضطرابه، فأخرجه أبو داود (5147) من طريق
خالد، والبخاري في ` الأدب المفرد ` (79) عن عبد العزيز بن محمد، وأحمد
(3 / 42) عن إسماعيل بن زكريا، كلهم عن سهيل بن أبي صالح عن سعيد الأعشى
- وهو سعيد بن عبد الرحمن بن مكمل الزهري - عن أيوب ابن بشير الأنصاري عن أبي
سعيد الخدري مرفوعا بلفظ:
` من عال ثلاث بنات، فأدبهن وزوجهن، وأحسن إليهن، فله الجنة `.
ولفظ أحمد:
` لا يكون لأحد ثلاث بنات، أو ثلاث أخوات، أو ابنتان، أو أختان فيتقي الله
فيهن، ويحسن إليهن، إلا دخل الجنة `.
وهو لفظ البخاري باختصار.
وأخرجه الترمذي (1 / 349) من طريق عبد الله بن المبارك: أخبرنا ابن عيينة
عن سهل بن أبي صالح عن أيوب بن بشير عن سعيد الأعشى عن أبي سعيد الخدري مرفوعا
بلفظ:
` من كان له ثلاث بنات أو.. ` الحديث نحو لفظ أحمد.
وكذا أخرجه ابن حبان (2044) من طريق إبراهيم بن بشار الرمادي حدثنا سفيان
به. ووقع فيه بعض الأخطاء المطبعية في سنده.
فهذا اضطراب شديد فيه عجيب، فبينما نرى في الرواية الأولى سعيد الأعشى هو شيخ
سهيل بن أبي صالح، والراوي عن أيوب بن بشير، إذا بنا نراه في الرواية الأخرى
شيخ أيوب بن بشير والراوي عن أبي سعيد، ثم هو مجهول لم يوثقه غير ابن حبان،
ولهذا ضعفه الترمذي بقوله:
` حديث غريب `.




উকবাহ ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যার তিনটি কন্যা সন্তান থাকবে এবং সে তাদের প্রতি ধৈর্য ধারণ করবে, আর নিজের সামর্থ্য অনুযায়ী তাদের খাবার, পানীয় এবং পোশাকের ব্যবস্থা করবে, কিয়ামতের দিন তারা তার জন্য জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষাকারী আড়াল (বা পর্দা) হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (295)


295 - ` من كن له ثلاث بنات أو ثلاث أخوات فاتقى الله وأقام عليهن كان معي في الجنة
هكذا، وأومأ بالسباحة والوسطى `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (170 / 1) : حدثنا شيبان حدثنا محمد بن زياد
البرجمي حدثنا ثابت عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير محمد بن زياد البرجمي وهو
ثقة،
قال ابن عدي في ` الكامل ` (14 / 2) :
` قال لنا عبدان الأهوازي: سألت الفضل بن سهل الأعرج وابن إشكاب عن محمد بن
زياد البرجمي هذا، فقالا: هو من ثقات أصحابنا `.
وأورده ابن حبان في ` الثقات ` وقال (2 / 267) :
` يروي عن ثابت البناني، روى عنه البصريون `.
قلت: ولم يعرفه أبو حاتم الرازي فقال ابنه (3 / 2 / 258) : ` سألته عنه؟
فقال: هو مجهول `.
وقد تابعه حماد بن زيد بلفظ آخر، وهو:
` من عال ابنتين، أو ثلاث بنات، أو أختين أو ثلاث أخوات، حتى يمتن (وفي
رواية: يبن، وفي أخرى يبلغن) أو يموت عنهن كنت أنا وهو كهاتين، وأشار
بأصبعيه السبابة والوسطى `.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“যে ব্যক্তির তিনটি কন্যা সন্তান অথবা তিনটি বোন আছে, অতঃপর সে আল্লাহকে ভয় করে তাদের উত্তমরূপে তত্ত্বাবধান করে (অন্য বর্ণনায়: অথবা যে ব্যক্তি দুই বা তিনটি কন্যা সন্তান কিংবা দুই বা তিনটি বোনের ভরণপোষণ করে), যতক্ষণ না তারা বালেগা হয় বা তাদের বিয়ে হয়, অথবা সে তাদের আগে মারা যায়, তবে সে জান্নাতে আমার সাথে এমনভাবে থাকবে।”

এই বলে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর শাহাদাত আঙুল (তর্জনী) এবং মধ্যমা দ্বারা ইঙ্গিত করলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (296)


296 - ` من عال ابنتين أو ثلاث بنات أو أختين أو ثلاث أخوات حتى يمتن (وفي رواية:
يبن وفي أخرى يبلغن) أو يموت عنهن كنت أنا وهو كهاتين وأشار بأصبعيه
السبابة والوسطى `.
أخرجه أحمد (3 /




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“যে ব্যক্তি দুজন কন্যা বা তিনজন কন্যা অথবা দুজন বোন বা তিনজন বোনের ভরণপোষণ করে, যতক্ষণ না তারা মারা যায় (অন্য বর্ণনায়: যতক্ষণ না তারা সাবালিকা হয় বা স্বতন্ত্র হয়) অথবা সে তাদের থেকে মারা যায় (অর্থাৎ তাদের দায়িত্ব থেকে মুক্ত হয়), আমি এবং সে জান্নাতে এই দুটির মতো হব।” এই বলে তিনি তাঁর শাহাদাত আঙ্গুল (তর্জনী) এবং মধ্যমা আঙ্গুল দ্বারা ইশারা করলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (297)


297 - ` من عال جاريتين حتى تبلغا جاء يوم القيامة أنا وهو. وضم أصابعه `.
أخرجه مسلم (8 /




সাহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: “যে ব্যক্তি দু’টি কন্যার লালন-পালন ও ভরণ-পোষণ করবে তাদের সাবালিকা হওয়া পর্যন্ত, কিয়ামতের দিন আমি এবং সে এভাবে আসব।” এই বলে তিনি (নবীজি) তাঁর আঙ্গুলগুলো পরস্পরের সাথে মিলিয়ে দেখালেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (298)


298 - ` يكفيك الماء ولا يضرك أثره `.
أخرجه أبو داود (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তোমার জন্য পানিই যথেষ্ট, আর এর (অপবিত্রতার) কোনো চিহ্ন তোমাকে ক্ষতিগ্রস্ত করবে না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (299)


299 - ` إذا أصاب ثوب إحداكن الدم من الحيضة فلتقرصه ثم لتنضحه بالماء (وفي رواية:
ثم اقرصيه بماء ثم انضحي في سائره) ثم لتصلي فيه `.
أخرجه مالك (1 / 79) وعنه البخاري (1 / 325) ومسلم (1 / 166)
وأبو داود (ج 3 رقم




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তোমাদের (নারীদের) কারো কাপড়ে হায়েযের (মাসিকের) রক্ত লেগে যায়, তখন সে যেন প্রথমে তা (রক্তের স্থান) নখ দিয়ে ঘষে বা চেঁছে ফেলে। এরপর তা পানি দিয়ে ধুয়ে পরিষ্কার করে নেয়।

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: এরপর পানি দিয়ে ঘষে/চেঁছে নাও, অতঃপর কাপড়ের বাকি অংশে পানি ছিটিয়ে দাও।)

এরপর সে যেন সেই কাপড়ে সালাত আদায় করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (300)


300 - ` حكيه بضلع واغسليه بماء وسدر `.
أخرجه أبو داود (1 /




তা একটি হাড় (বা কাঠের টুকরা) দ্বারা ঘষে (বা খুঁচিয়ে) পরিষ্কার করো এবং পানি ও কুল পাতা (বরই পাতা) দিয়ে তা ধুয়ে ফেলো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (301)


301 - ` إنما ذلك عرق وليست بالحيضة، فإذا أقبلت الحيضة فدعي الصلاة، فإذا أدبرت
فاغسلي عنك الدم ثم صلي (ثم توضئي لكل صلاة حتى يجيء ذلك الوقت) `.
أخرجه الشيخان وأبو عوانة في ` صحاحهم ` وأصحاب السنن الأربعة ومالك
والدارمي والدارقطني والبيهقي وأحمد من حديث عائشة قالت:
` إن فاطمة بنت حبيش جاءت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنى امرأة
أستحاض فلا أطهر، أفأدع الصلاة؟ قال ... ` فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `. والزيادة له وللبخاري.
والشاهد من الحديث قوله: ` فاغسلي عنك الدم `، فهو دليل آخر على نجاسة دم
الحيض، ومن غرائب ابن حزم أنه ذهب إلى أن قوله فيه (الدم) على العموم يشمل
جميع الدماء من الإنسان والحيوان! فقال في ` المحلى ` (1 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন]: “নিশ্চয়ই এটি (ইস্তিহাযার রক্ত) একটি শিরা থেকে নির্গত রক্ত, এটি হায়েজ (মাসিক ঋতুস্রাব) নয়। সুতরাং, যখন হায়েজ শুরু হবে, তখন সালাত (নামাজ) ছেড়ে দাও। আর যখন তা শেষ হয়ে যাবে, তখন তুমি তোমার শরীর থেকে রক্ত ধুয়ে ফেলো এবং সালাত আদায় করো। (এরপর সেই সময় না আসা পর্যন্ত প্রত্যেক সালাতের জন্য ওযু করে নাও)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (302)


302 - ` إن الله اصطفى كنانة من ولد إسماعيل واصطفى قريشا من كنانة واصطفى من قريش
بني هاشم واصطفاني من بني هاشم `.
أخرجه مسلم (7 / 58) وأبو يعلى في ` مسنده ` (355 / 2) والخطيب
(13 / 64) وابن عساكر (17 / 353 / 1) من طريق الوليد بن مسلم: حدثنا
الأوزاعي عن أبي عمار شداد أنه سمع واثلة بن الأسقع يقول: سمعت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وأخرجه أحمد (4 / 107) : حدثنا أبو المغيرة قال: حدثنا الأوزاعي قال:
حدثني أبو عمار به.
قلت: وهذه متابعة قوية من أبي المغيرة للوليد بن مسلم، وإنما أخرجتها مع
إخراج مسلم لحديثه، خشية أن يتعلق أحد بالوليد فيعل الحديث به لأنه كان يدلس
تدليس التسوية، وهو لم يصرح بالتحديث بين الأوزاعي وأبي عمار، فأمنا تدليسه
بهذه
المتابعة.
وقد تابعه أيضا يزيد بن يوسف وهو الرحبي الصنعاني الدمشقي ولكنه ضعيف كما في
` التقريب `.
أخرجه أبو يعلى. وتابعه أيضا محمد بن مصعب قال: حدثنا الأوزاعي به إلا أنه
زاد في أوله:
` إن الله عز وجل اصطفى من ولد إبراهيم إسماعيل، واصطفى من بني إسماعيل
كنانة ... `.
أخرجه أحمد والترمذي (2 / 281) وقال:
` حديث حسن صحيح `.
قلت: محمد بن صعب وهو القرقساني صدوق كثير الغلط كما في ` التقريب `.
ففي ما تفرد به دون الثقات نظر، وتابعه يحيى بن أبي كثير لكن الراوي عنه
سليمان بن أبي سليمان وهو الزهري اليمامي أشد ضعفا من القرقساني،
فقال ابن معين ليس بشيء. وقال البخاري: منكر الحديث. ولفظ حديثه مغاير
للجميع وهو:
` إن الله اصطفى من ولد آدم إبراهيم، واتخذه خليلا، ثم اصطفى من ولد إبراهيم
إسماعيل، ثم اصطفى من ولد إسماعيل نزارا، ثم اصطفى من ولد نزار مضر، واصطفى
من ولد مضر كنانة ثم اصطفى من كنانة قريشا واصطفى من قريش بني هاشم، واصطفى
من بني هاشم بني عبد المطلب، واصطفاني من بني عبد المطلب `.
أخرجه الخطيب في ` الموضح ` (1 /




ওয়াছিলা ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা ইসমাঈল (আঃ)-এর সন্তানদের মধ্য থেকে কিনানাহকে মনোনীত করেছেন। আর কিনানাহর মধ্য থেকে কুরাইশকে মনোনীত করেছেন। আর কুরাইশের মধ্য থেকে বনু হাশিমকে মনোনীত করেছেন। আর বনু হাশিমের মধ্য থেকে আমাকে মনোনীত করেছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (303)


303 - ` أمرت أن أقاتل الناس حتى يشهدوا أن لا إله إلا الله وأن محمدا عبده ورسوله
وأن يستقبلوا قبلتنا ويأكلوا ذبيحتنا وأن يصلوا صلاتنا، فإذا فعلوا ذلك
` فقد ` حرمت علينا دماؤهم وأموالهم إلا بحقها لهم ما للمسلمين وعليهم ما على
المسلمين `.
أخرجه أبو داود (2641) والترمذي (2 / 100) عن سعيد بن يعقوب الطالقاني،
والنسائي (2 / 161، 269) عن حبان (وهو ابن موسى المروزي) وأحمد
(3 / 199) عن علي بن إسحاق (وهو السلمي المروزي) كلهم عن عبد الله بن
المبارك أخبرنا حميد الطويل عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
وتابعه ابن وهب: أخبرني يحيى بن أيوب عن حميد الطويل به.
أخرجه أبو داود (2642) والطحاوي في ` شرح معاني الآثار ` (2 / 123) .
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، وكذلك طريق حبان المروزي.
ورواه محمد بن عبد الله الأنصاري قال: أنبأنا حميد قال: سأل ميمون بن سياه
أنس بن مالك قال: يا أبا حمزة ما يحرم دم المسلم وماله، فقال:
فذكره موقوفا.
وإسناده صحيح أيضا، ولا منافاة بينه وبين المرفوع، فكل صحيح. على أن
المرفوع أصح، ورواته أكثر.
وفيه دليل على بطلان الحديث الشائع اليوم على ألسنة الخطباء والكتاب:
أن النبي صلى الله عليه وسلم قال في أهل الذمة:
` لهم ما لنا، وعليهم ما علينا `.
وهذا مما لا أصل له عنه صلى الله عليه وسلم، بل هذا الحديث الصحيح يبطله،
لأنه صريح في أنه صلى الله عليه وسلم إنما قال ذلك فيمن أسلم من المشركين وأهل
الكتاب، وعمدة أولئك الخطباء على بعض الفقهاء الذين لا علم عندهم بالحديث
الشريف، كما بينته في ` الأحاديث الضعيفة والموضوعة ` (رقم 1103) فراجعه
فإنه من المهمات.
وللحديث شاهد بلفظ آخر، وهو:
` من أسلم من أهل الكتاب فله أجره مرتين، وله مثل الذي لنا، وعليه مثل الذي
علينا، ومن أسلم من المشركين فله أجره، وله مثل الذي لنا، وعليه مثل الذي
علينا `.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

“আমাকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমি মানুষের সাথে ততক্ষণ পর্যন্ত যুদ্ধ করি, যতক্ষণ না তারা সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল, যতক্ষণ না তারা আমাদের কিবলার (কিবলার দিকে) মুখ করে, আমাদের যবেহ করা পশু খায় এবং আমাদের সালাতের মতো সালাত আদায় করে। যখন তারা এই কাজগুলো করবে, তখন তাদের রক্ত ও সম্পদ আমাদের জন্য হারাম হয়ে যাবে (সংরক্ষিত হয়ে যাবে), তবে তার প্রাপ্য অধিকারের ব্যতিক্রম ছাড়া। তাদের জন্য সেই সকল অধিকার থাকবে যা মুসলিমদের জন্য রয়েছে এবং তাদের উপর সেই সকল দায়িত্ব বর্তাবে যা মুসলিমদের উপর বর্তায়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (304)


304 - ` من أسلم من أهل الكتاب فله أجره مرتين وله مثل الذي لنا وعليه مثل الذي
علينا ومن أسلم من المشركين فله أجره وله مثل الذي لنا وعليه مثل الذي
علينا `.
رواه الروياني في ` مسنده ` (30 / 220 / 1) : أنبأنا أحمد أنبأنا عمي أنبأنا
ابن لهيعة عن سليمان بن عبد الرحمن عن القاسم عن أبي أمامة الباهلي قال:
` كنت تحت راحلة رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، فقال قولا حسنا
فقال فيما قال: ` فذكره.
قلت: وهذا سند حسن: القاسم هو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن الشامي صاحب
أبي أمامة وهو صدوق.
وسليمان بن عبد الرحمن هو أبو عمر الخراساني الدمشقي وهو ثقة.
وابن لهيعة هو عبد الله المصري وهو سيىء الحفظ إلا ما رواه العبادلة عنه عبد
الله بن وهب، وعبد الله بن يزيد المقري، وعبد الله بن المبارك، وهذا من
رواية الأول منهم، فإن عم أحمد في هذا السند هو عبد الله بن وهب وهو أشهر من
أن يذكر.
وأما أحمد فهو ابن عبد الرحمن بن وهب بن مسلم المصري الملقب (بحشل) وهو
صدوق تغير بآخره كما في ` التقريب ` واحتج به مسلم، فحديثه حسن إذا لم يخالف.
وقد أخرجه الإمام أحمد (5 / 259) : حدثنا يحيى بن إسحاق السيلحيني حدثنا
ابن لهيعة به إلا أنه قال:
` يوم الفتح `. بدل ` حجة الوداع `. والأول أصح.




আবু উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: আহলে কিতাবের (কিতাবধারী) মধ্য থেকে যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করবে, তার জন্য রয়েছে দ্বিগুণ পুরস্কার। আর আমাদের জন্য যে অধিকার রয়েছে, তার জন্যও রয়েছে সেই অধিকার; এবং আমাদের উপর যে কর্তব্য রয়েছে, তার উপরও রয়েছে সেই কর্তব্য। আর মুশরিকদের মধ্য থেকে যে ব্যক্তি ইসলাম গ্রহণ করবে, তার জন্য রয়েছে তার পুরস্কার (একগুণ)। আর আমাদের জন্য যে অধিকার রয়েছে, তার জন্যও রয়েছে সেই অধিকার; এবং আমাদের উপর যে কর্তব্য রয়েছে, তার উপরও রয়েছে সেই কর্তব্য।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (305)


305 - ` لا تسموا بالحريق. يعني في الوجه `.
رواه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 142 /




তোমরা আগুন দ্বারা দাগাঙ্কিত (দাগ বা চিহ্ন) করো না। অর্থাৎ, মুখে দাগাঙ্কিত করা (নিষেধ)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (306)


306 - ` لما أسري بالنبي صلى الله عليه وسلم إلى المسجد الأقصى أصبح يتحدث الناس
بذلك فارتد ناس ممن كانوا آمنوا به وصدقوه وسعوا بذلك إلى أبي بكر رضي الله
عنه فقالوا: هل لك إلى صاحبك يزعم أنه أسري به الليلة إلى بيت المقدس؟ قال:
أو قال ذلك؟ قالوا: نعم، قال: لئن كان قال ذلك لقد صدق، قالوا: أو تصدقه
أنه ذهب الليلة إلى بيت المقدس وجاء قبل أن يصبح؟ قال: نعم إني لأصدقه فيما
هو أبعد من ذلك، أصدقه بخبر السماء في غدوة أو روحة. فلذلك سمي أبو بكر
الصديق `.
أخرجه الحاكم (3 / 62) من طريق محمد بن كثير الصنعاني حدثنا معمر بن راشد عن
الزهري عن عروة عن عائشة رضي الله عنها قالت: فذكره.
وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: وفيه نظر، لأن الصنعاني فيه ضعف من قبل حفظه، ولذلك أورده الذهبي في
` الضعفاء ` وقال: ` ضعفه أحمد `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق كثير الغلط `.
قلت: فمثله لا يحتج به إذا انفرد، لكنه قد توبع كما يأتي، فحديثه لذلك صحيح
وقد عزاه الحافظ ابن كثير في ` التفسير ` (15 / 138) للبيهقي (يعني في
` الدلائل `) من طريق الحاكم، ثم سكت عليه، وكان ذلك لشواهده التي أشرنا
إليها آنفا، وإنما ذكرت الحديث من أجل ما فيه من سبب تسمية أبي بكر بـ
` الصديق `، وإلا فسائره متواتر صح من طرق جماعة من الصحابة قد استقصى كثيرا
منها الحافظ ابن كثير في أول تفسيره لسورة ` الإسراء `، فلنذكر هنا الشواهد
لهذه الزيادة فأقول:
الأول: عن شداد بن أوس مرفوعا بلفظ:
` صليت بأصحابي صلاة العتمة بمكة معتما فأتاني جبريل عليه السلام بدابة أبيض
أو قال: بيضاء ... (الحديث وفيه:) فقال أبو بكر: أشهد أنك لرسول الله،
وقال المشركون: انظروا إلى ابن أبي كبشة يزعم أنه أتى بيت المقدس الليلة!
... الحديث.
أخرجه ابن أبي حاتم والبيهقي وقال: ` هذا إسناد صحيح `.
الثاني: عن ابن شهاب عن أبي سلمة بن عبد الرحمن في قصة الإسراء قال:
` فتجهز - أو كلمة نحوها - ناس من قريش إلى أبي بكر، فقالوا: هل لك في صاحبك
يزعم أنه جاء إلى بيت المقدس ثم رجع إلى مكة في ليلة واحدة؟ !
فقال أبو بكر: أو قال ذلك؟ قالوا: نعم. قال: فأنا أشهد لئن كان قال ذلك
لقد صدق، قالوا: فتصدقه في أن يأتي الشام في ليلة واحدة، ثم يرجع إلى مكة
قبل أن يصبح؟ قال: نعم أنا أصدقه بأبعد من ذلك أصدقه بخبر السماء، قال
أبو سلمة: سمي أبو بكر الصديق `.
قلت: وهذا سند صحيح مرسل، وشاهد قوي لموصول عائشة.
الثالث: عن أبي معشر قال: أنبأنا أبو وهب مولى أبي هريرة:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة أسري به، قلت لجبريل إن قومي لا
يصدقوني، فقال له جبريل يصدقك أبو بكر وهو الصديق `.
أخرجه ابن سعد في ` الطبقات ` (3 / 1 / 120) وهذا سند ضعيف.
وروى الحاكم (3 / 62) عن محمد بن سليمان السعدي يحدث عن هارون بن سعد عن
عمران بن ظبيان عن أبي يحيى سمع عليا:
` لأنزل الله تعالى اسم أبي بكر رضي الله عنه من السماء صديقا ` وقال:
` لولا مكان محمد بن سليمان السعيدي من الجهالة لحكمت لهذا الإسناد بالصحة `.
ووافقه الذهبي.
(تنبيه) كذا وقع في ` المستدرك `: ` السعدي ` وفي الموضع الآخر:
` السعيدي ` وكله خطأ والصواب ` العبدي ` كما في ` الجرح والتعديل ` (3 / 2
/ 269) و ` الميزان ` و ` اللسان `.
هذا وقد جزم الإمام أبو جعفر الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (2 / 145) بأن سبب
تسمية أبي بكر رضي الله عنه و ` الصديق ` إنما هو سبقه الناس إلى تصديقه رسول
الله صلى الله عليه وسلم على إتيانه بيت المقدس من مكة، ورجوعه منه إلى منزله
بمكة في تلك الليلة، وإن كان المؤمنون يشهدون لرسول الله صلى الله عليه وسلم
بمثل ذلك إذا وقفوا عليه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে মসজিদুল আকসা-তে ইসরা (রাত্রিকালীন ভ্রমণ) করানো হলো, তখন সকালে মানুষজন এ নিয়ে আলোচনা করতে শুরু করল। ফলে যারা তাঁর প্রতি ঈমান এনেছিল এবং তাঁকে সত্যায়ন করেছিল, তাদের মধ্যে কিছু লোক মুরতাদ (ধর্মত্যাগী) হয়ে গেল।

তারা এই খবর নিয়ে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেল এবং বলল: আপনি কি আপনার বন্ধুর খবর রাখেন? তিনি দাবি করছেন যে, তাকে নাকি গত রাতে বাইতুল মাকদিসে (জেরুজালেম) ইসরা করানো হয়েছে?

তিনি (আবু বকর) বললেন: তিনি কি সত্যিই এমন বলেছেন? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যদি তিনি এমন বলে থাকেন, তবে অবশ্যই সত্য বলেছেন।

তারা বলল: আপনি কি তাকে এই বিষয়েও বিশ্বাস করেন যে, তিনি এক রাতের মধ্যে বাইতুল মাকদিসে গেলেন এবং সকাল হওয়ার আগেই ফিরেও আসলেন?

তিনি (আবু বকর) বললেন: হ্যাঁ, আমি তো তাঁকে এর চেয়েও দূরের বিষয়ে বিশ্বাস করি। আমি সকাল-সন্ধ্যা তাঁর কাছে আসা আসমানের (ওহীর) খবরকেও সত্য বলে বিশ্বাস করি।

এ কারণেই আবু বকরকে ’আস-সিদ্দিক’ (সত্যায়নকারী) নামে নামকরণ করা হলো।