সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
2927 - ` لا، إنه كان يعطي للدنيا وذكرها وحمدها، ولم يقل يوما قط: رب اغفر لي
خطيئتي يوم الدين `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (6965) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (23 /
279 / 606 و 391 / 932) من طرق عن منصور عن مجاهد عن أم سلمة قالت: قلت
للنبي صلى الله عليه وسلم: هشام بن المغيرة كان يصل الرحم ويقري الضيف ويفك
العناة ويطعم الطعام، ولو أدرك أسلم، هل ذلك نافعه؟ قال: فذكره.
قلت:
وهذا إسناد صحيح، رجاله رجال الشيخين. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (1 / 118
) : ` رواه الطبراني في ` الكبير `، وأبو يعلى، ورجاله رجال الصحيح `. قلت
: له طريق أخرى، يرويه عمرو بن ثابت عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن أبي بكر
بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام عن أم سلمة: أن الحارث بن هشام أتى النبي صلى
الله عليه وسلم عام حجة الوداع فقال: يا رسول الله! إنك تحث على صلة الرحم،
والإحسان إلى الجار، وإيواء اليتيم وإطعام الضيف وإطعام المساكين، وكل
هذا كان هشام بن المغيرة يفعله، فما ظنك به يا رسول الله! فقال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: ` كل قبر لا يشهد صاحبه أن لا إله إلا الله فهو جذوة من النار
، وقد وجدت عمي أبا طالب في طمطام من النار، فأخرجه الله لمكانه مني وإحسانه
إلي، فجعله في ضحضاح من النار `. أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (23 / 405 /
972) وفي ` المعجم الأوسط ` (2 / 165 / 2 / 7523) وقال: لا يروى عن أم
سلمة إلا بهذا الإسناد `. قلت: الظاهر أنه يعني بهذا التمام، وإلا فالطريق
التي قبلها بغير هذا الإسناد كما رأيت. ثم إن الهيثمي أعله بقوله: ` وفيه
عبد الله بن محمد بن عقيل، وهو منكر الحديث لا يحتجون بحديثه، وقد وثق `.
قلت: هو إلى التوثيق أقرب، والحق أنه وسط حسن الحديث، فقد كان أحمد وإسحاق
والحميدي يحتجون بحديثه، وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق في حديثه لين
، ويقال: تغير بأخرة `. قلت: فالأولى إعلاله بالراوي عنه: عمرو بن ثابت،
فإنه ضعيف باتفاقهم، وإن كان أبو داود قال فيه: ` أحاديثه مستقيمة `.
والحديث له شاهد من حديث عائشة رضي الله عنها، وله طرق: الأولى: عن مسروق
عنها قالت: قلت: يا رسول الله! ابن جدعان كان في الجاهلية يصل الرحم ويطعم
المسكين، فهل ذاك نافعه؟ قال: ` لا ينفعه، إنه لم يقل يوما: رب اغفر لي
خطيئتي يوم الدين `. أخرجه مسلم (1 / 136) وأبو عوانة (1 /
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: আমি (উম্মে সালামাহ) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে জিজ্ঞাসা করলাম: হিশাম ইবনে মুগীরাহ আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা করতেন, মেহমানের আপ্যায়ন করতেন, বন্দীদের মুক্ত করতেন এবং খাদ্য দান করতেন। যদি তিনি জীবিত থাকতেন, তবে হয়তো ইসলাম গ্রহণ করতেন। তার এই কাজগুলো কি তাকে কোনো উপকার দেবে? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:
"না। কারণ, সে তো দুনিয়ার জন্য, দুনিয়ায় তার আলোচনা ও প্রশংসার জন্য তা করত। সে কোনোদিনও একবারের জন্যও বলেনি: ‘হে আমার রব, বিচার দিবসে আমার ভুলত্রুটি ক্ষমা করে দাও।’"
2928 - ` من استطاع منكم أن لا يموت إلا بالمدينة فليمت بها، فإنه من يمت بها يشفع له
، أو يشهد له `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি মদিনা ছাড়া অন্য কোথাও মৃত্যুবরণ না করার সামর্থ্য রাখে, সে যেন সেখানেই মৃত্যুবরণ করে। কারণ, যে ব্যক্তি সেখানে (মদিনায়) মারা যায়, তার জন্য সুপারিশ করা হবে অথবা তার পক্ষে সাক্ষ্য দেওয়া হবে।
2929 - ` لقد خرج أبو بكر على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم تاجرا إلى بصرى، لم
يمنع أبا بكر الضن برسول الله صلى الله عليه وسلم شحه على نصيبه من الشخوص
للتجارة، وذلك كان لإعجابهم كسب التجارة، وحبهم للتجارة، ولم يمنع رسول
الله صلى الله عليه وسلم أبا بكر من الشخوص في تجارته لحبه صحبته وضنه بأبي
بكر، - فقد كان بصحبته معجبا - لاستحسان (وفي رواية: لاستحباب) رسول الله
صلى الله عليه وسلم للتجارة وإعجابه بها `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (23 / 300 / 674) : حدثنا الحسين بن
إسحاق: حدثنا أبو المعافى الحراني حدثنا محمد بن سلمة عن أبي عبد الرحيم عن
زيد بن أبي أنيسة عن الزهري عن عبد الله أخي أم سلمة قال: سمعت أم سلمة
تقول فذكره. قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله ثقات معروفون من رجال ` التهذيب `
غير الحسين ابن إسحاق، وهو التستري، قال الذهبي في ` سير أعلام النبلاء ` (
14 / 57) : ` كان من الحفاظ الرحلة، أكثر عنه أبو القاسم الطبراني `. قلت:
له حديث واحد في ` المعجم الصغير `، وخمسة أحاديث في ` المعجم الأوسط ` (1 /
198 /
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একজন ব্যবসায়ী হিসেবে বুসরার (শহর) দিকে গিয়েছিলেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের প্রতি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভালোবাসা ও তাঁর সান্নিধ্য লাভের তীব্র আগ্রহ তাঁকে ব্যবসার অংশ পূরণের জন্য (ব্যবসা উপলক্ষে) সফরে যাওয়া থেকে বিরত রাখেনি। এর কারণ হলো, তারা ব্যবসার উপার্জন দ্বারা মুগ্ধ ছিলেন এবং ব্যবসাকে ভালোবাসতেন।
অন্যদিকে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামও আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাহচর্যকে ভালোবাসতেন এবং তাঁর প্রতি যত্নশীল ছিলেন, বস্তুত তিনি তাঁর সাহচর্যে মুগ্ধ ছিলেন—তবুও তিনি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর ব্যবসায়িক সফরে যেতে বারণ করেননি। কারণ, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজেও ব্যবসাকে উত্তম মনে করতেন (অন্য বর্ণনায়: পছন্দ করতেন) এবং এর দ্বারা মুগ্ধ ছিলেন।
2930 - ` مروها فلتركب ولتختمر [ولتحج] ، [ولتهد هديا] `.
أخرجه الطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 / 74) والطبراني في ` المعجم الكبير `
(17 / 320 / 886) والزيادة له من طرق عن عبد العزيز بن مسلم قال: حدثنا
يزيد بن أبي منصور عن دخين الحجري عن عقبة بن عامر الجهني قال: نذرت أختي
أن تمشي إلى الكعبة حافية حاسرة، فأتى عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم
فقال: ` ما بال هذه؟ `. قالوا: نذرت أن تمشي إلى الكعبة حافية حاسرة! فقال
: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات كما تقدم بيانه تحت حديث آخر برقم
(492) . وتابعه الحسن عن عقبة أنه قال: يا رسول الله! إن أختي نذرت أن تحج
ماشية وتنشر شعرها، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: ` إن الله لغني عن نذر
أختك، مروها فلتركب ولتهد هديا، وأحسبه قال: وتغطي شعرها `. أخرجه
الروياني في ` مسنده ` (19 / 6 /
উকবাহ ইবনে আমের আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বোন খালি পায়ে এবং খোলা মাথায় হেঁটে হেঁটে কা’বাতে যাওয়ার মানত করেছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার কাছে এসে বললেন: ‘এর কী হয়েছে?’ লোকেরা বলল: ‘সে খালি পায়ে, খোলা মাথায় হেঁটে কা’বাতে যাওয়ার মানত করেছে!’
তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: “আল্লাহ তোমাদের বোনের মানত থেকে মুখাপেক্ষীহীন (অর্থাৎ এই ধরনের কষ্টকর মানতের আল্লাহর কোনো প্রয়োজন নেই)। তোমরা তাকে আদেশ করো, সে যেন সওয়ারীর পিঠে আরোহণ করে, মাথায় ওড়না দেয় (পর্দা করে), হজ সম্পন্ন করে এবং একটি কুরবানির পশু (হাদী) উৎসর্গ করে।”
অন্য বর্ণনায় তিনি বলেন: আমার বোন হেঁটে হজ করার এবং চুল খোলা রাখার মানত করেছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ তোমাদের বোনের মানত থেকে মুখাপেক্ষীহীন। তোমরা তাকে আদেশ করো, সে যেন আরোহণ করে এবং একটি কুরবানির পশু উৎসর্গ করে।” (বর্ণনাকারী বলেন,) আমার ধারণা, তিনি আরও বলেছিলেন: "আর সে যেন তার চুল ঢেকে রাখে।”
2931 - ` إذا سمعتم بالطاعون في أرض فلا تدخلوها، وإذا وقع بأرض وأنتم بها فلا
تخرجوا منها [فرارا منه] . وفي رواية:
` إن هذا الوجع أو السقم رجز عذب به
بعض الأمم قبلكم، [أو طائفة من بني إسرائيل] ، ثم بقي بعد بالأرض، فيذهب
المرة، ويأتي الأخرى، فمن سمع به في أرض فلا يقدمن عليه، ومن وقع بأرض
وهو بها فلا يخرجنه الفرار منه `.
حديث صحيح غاية، جاء من حديث أسامة بن زيد وسعد بن أبي وقاص وعبد الرحمن
بن عوف، وغيرهم.
সা’দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যখন তোমরা কোনো এলাকায় প্লেগ (মহামারী)-এর কথা শোনো, তখন সেখানে প্রবেশ করো না। আর যদি প্লেগ এমন কোনো এলাকায় দেখা দেয় যেখানে তোমরা অবস্থান করছো, তবে সেখান থেকে (তা থেকে পালিয়ে) বেরিয়ে যেও না।"
অপর এক বর্ণনায় এসেছে: "নিশ্চয়ই এই রোগ বা ব্যাধি হলো এক প্রকারের শাস্তি (রিজয), যা দ্বারা তোমাদের পূর্ববর্তী কতিপয় উম্মতকে, (অথবা বনী ইসরাঈলের একটি দলকে) শাস্তি দেওয়া হয়েছিল। এরপর তা পৃথিবীতে রয়ে গেছে। এটি একবার চলে যায় আবার আসে। সুতরাং যে ব্যক্তি কোনো এলাকায় এর কথা শোনে, সে যেন সেখানে না যায়। আর যে ব্যক্তি এমন কোনো এলাকায় থাকে যেখানে তা দেখা দিয়েছে, সে যেন তা থেকে পলায়নের জন্য সেখান থেকে বেরিয়ে না যায়।"
2932 - ` عمل هذا قليلا، وأجر كثيرا `.
أخرجه البخاري (2808) ، وأحمد (4 / 291 و 293) من طريق إسرائيل عن أبي
إسحاق قال: سمعت البراء رضي الله عنه يقول:
أتى النبي صلى الله عليه وسلم
رجل [من الأنصار] مقنع بالحديد، فقال: يا رسول الله! أقاتل أو أسلم؟ قال
: ` [لا، بل] أسلم ثم قاتل `، فأسلم ثم قاتل فقتل، فقال رسول الله صلى
الله عليه وسلم: فذكره. والسياق للبخاري، وليس عنده: ` هذا `، وهي
لأحمد مع الزيادتين الأخريين، والأولى منهما عند مسلم (6 /
বারা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
লোহার (বর্ম বা শিরস্ত্রাণ) দ্বারা আবৃত একজন (আনসারী) ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট এলেন। অতঃপর তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি (আগে) যুদ্ধ করব, নাকি ইসলাম গ্রহণ করব? তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন, "(না, বরং) ইসলাম গ্রহণ করো, তারপর যুদ্ধ করো।"
সুতরাং সে ইসলাম গ্রহণ করল, অতঃপর যুদ্ধ করল এবং শহীদ হয়ে গেল।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "এই ব্যক্তি সামান্য কাজ করেছে, কিন্তু প্রচুর প্রতিদান পেয়েছে।"
2933 - ` * (ومن يطع الله والرسول فأولئك مع الذين أنعم الله عليهم من النبيين
والصديقين والشهداء والصالحين وحسن أولئك رفيقا) * `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1 / 29 /
আর যে ব্যক্তি আল্লাহ ও রাসূলের আনুগত্য করবে, তারা তাদের সাথে থাকবে যাদেরকে আল্লাহ নিয়ামত দান করেছেন— অর্থাৎ নবীগণ, সিদ্দীকগণ (সত্যনিষ্ঠ), শহীদগণ এবং সালেহগণ (নেককার)। আর সঙ্গী হিসেবে তারা কতই না উত্তম!
2934 - ` أنذركم الدجال، أنذركم الدجال، أنذركم الدجال، فإنه لم يكن نبي إلا وقد
أنذره أمته، وإنه فيكم أيتها الأمة وإنه جعد آدم، ممسوح العين اليسرى،
وإن معه جنة ونارا، فناره جنة وجنته نار، وإن معه نهر ماء وجبل خبز،
وإنه يسلط على نفس فيقتلها ثم يحييها، لا يسلط على غيرها، وإنه يمطر السماء
ولا تنبت الأرض، وإنه يلبث في الأرض أربعين صباحا حتى يبلغ منها كل منهل،
وإنه لا يقرب أربعة مساجد: مسجد الحرام ومسجد الرسول ومسجد المقدس والطور،
وما شبه عليكم من الأشياء، فإن الله ليس بأعور (مرتين) `.
أخرجه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (15 /
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আমি তোমাদেরকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করছি, আমি তোমাদেরকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করছি, আমি তোমাদেরকে দাজ্জাল সম্পর্কে সতর্ক করছি! কারণ এমন কোনো নবী আসেননি, যিনি তাঁর উম্মতকে তার সম্পর্কে সতর্ক করেননি। হে উম্মতগণ, সে তোমাদের মধ্যেই আত্মপ্রকাশ করবে।
সে হবে কোঁকড়ানো চুল বিশিষ্ট, গায়ের রং লালচে-কালো (আদম), তার বাম চোখটি হবে নিশ্চিহ্ন (কানা)। আর তার সাথে থাকবে জান্নাত ও জাহান্নাম। তার জাহান্নাম হবে জান্নাত এবং তার জান্নাত হবে জাহান্নাম। তার সাথে থাকবে পানির একটি নদী এবং রুটির একটি পাহাড়।
সে একজন ব্যক্তির ওপর ক্ষমতা প্রয়োগ করে তাকে হত্যা করবে এবং তারপর তাকে জীবিত করবে। তবে সে অন্য কারো ওপর এই ক্ষমতা প্রয়োগ করতে সক্ষম হবে না।
সে আকাশ থেকে বৃষ্টি বর্ষণ করবে, কিন্তু জমিন ফসল উৎপন্ন করবে না।
সে পৃথিবীতে চল্লিশ সকাল (চল্লিশ দিন) অবস্থান করবে, এমনকি সে প্রতিটি পানির উৎসে পৌঁছাবে। আর সে চারটি মসজিদের কাছেও ঘেঁষতে পারবে না: মসজিদুল হারাম, মসজিদে রাসূল (মসজিদে নববী), মসজিদুল আকসা (বাইতুল মুকাদ্দাস) এবং তূর পর্বত (মসজিদ)।
আর যদি তোমাদের কাছে কোনো বিষয় নিয়ে সন্দেহ সৃষ্টি হয়, তবে (জেনে রাখো) আল্লাহ তাআলা এক চোখ বিশিষ্ট নন (এক চোখ কানা নন)। (কথাটি দুইবার বলা হলো)।
2935 - ` إن امرأة كانت فيه (يعني بيتا في المدينة) ، فخرجت في سرية من المسلمين،
وتركت ثنتي عشرة عنزا لها وصيصتها، كانت تنسج بها، قال: ففقدت عنزا من غنمها
وصيصتها، فقالت: يا رب! إنك قد ضمنت لمن خرج في سبيلك أن تحفظ عليه، وإني
قد فقدت عنزا من غنمي وصيصتي، وإني أنشدك عنزي وصيصتي، قال: فجعل رسول
الله صلى الله عليه وسلم يذكر شدة مناشدتها لربها تبارك وتعالى. قال رسول
الله صلى الله عليه وسلم: فأصبحت عنزها ومثلها، وصيصتها ومثلها، وهاتيك
فائتها فاسألها إن شئت `.
أخرجه أحمد في ` مسنده ` (5 / 67) قال: حدثنا عبد الصمد بن
عبد الوارث
أخبرنا سليمان (يعني ابن المغيرة) عن حميد (يعني ابن هلال) قال: كان رجل
من الطفاوة طريقه علينا، فأتى على الحي فحدثهم قال: قدمت المدينة في عير لنا
، فبعنا بضاعتنا (الأصل: بياعتنا) (¬1) ثم قلت: لأنطلقن إلى هذا الرجل،
فلآتين من بعدي بخبره، قال: فانتهيت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإذا
هو يريني بيتا. قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال
الشيخين غير الرجل الطفاوي، فإنه لم يسم، ولا يضر لأنه صحابي، والصحابة
كلهم عدول. وقال الهيثمي (5 / 277) : ` رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح `
. قوله: (صيصتها) هي الصنارة التي يغزل بها وينسج كما في ` النهاية `.
তাফাওয়ী সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
মদীনার একটি ঘরে একজন মহিলা বসবাস করতেন। তিনি মুসলমানদের একটি সামরিক অভিযানে (সারিয়্যাহ) বের হয়েছিলেন এবং রেখে গিয়েছিলেন তার বারোটি ছাগল এবং তার সূতা কাটার যন্ত্র (তকলি), যা দিয়ে তিনি বুনতেন।
তিনি (ফিরে এসে) দেখলেন যে তার ছাগলগুলোর মধ্য থেকে একটি ছাগল এবং তার সূতা কাটার যন্ত্রটি হারিয়ে গেছে। তখন তিনি বললেন, "হে আমার রব! নিশ্চয়ই আপনি আপনার পথে (ফী সাবীলিল্লাহ) বের হওয়া ব্যক্তির জন্য তার সম্পদ হিফাজত করার দায়িত্ব গ্রহণ করেছেন। আর আমার ছাগলগুলোর মধ্য থেকে একটি ছাগল এবং আমার সূতা কাটার যন্ত্রটি হারিয়ে গেছে। আমি আপনার কাছে আমার ছাগল ও সূতা কাটার যন্ত্রটি ফিরিয়ে দেওয়ার জন্য আবেদন করছি।"
বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল্লাহ তা’আলার কাছে ঐ মহিলার অত্যন্ত জোরপূর্বক আবেদনের (মুনাজাতের) কঠোরতা উল্লেখ করছিলেন।
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "এরপর সকালে সে দেখল যে তার হারানো ছাগলটি এবং তার সাথে আরও একটি ছাগল (অর্থাৎ দ্বিগুণ), আর তার সূতা কাটার যন্ত্রটি এবং তার সাথে আরও একটি যন্ত্র (অর্থাৎ সবকিছু দ্বিগুণ) ফিরে এসেছে। তুমি চাইলে তার কাছে যাও এবং তাকে জিজ্ঞেস করো।"
2936 - ` [يا أبا هريرة] خذهن (يعني تمرات دعا فيهن صلى الله عليه وسلم بالبركة)
فاجمعهن في مزودك هذا، أو في هذا المزود، كلما أردت أن تأخذ منه شيئا، فأدخل
يدك فيه فخذه ولا تنثره نثرا `.
أخرجه الترمذي (3838) وابن حبان (2150) والبيهقي في ` الدلائل ` (6 /
109) وأحمد (2 / 352) من طرق عن حماد بن زيد: حدثنا المهاجر عن أبي
العالية الرياحي عن أبي هريرة قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم بتمرات
فقلت: يا رسول الله! ادع الله فيهن بالبركة، فضمهن (وفي رواية: فصفهن بين
يديه) ، ثم دعا لي فيهن بالبركة، فقال لي: (فذكر الحديث) ، فقد حملت من
هذا التمر كذا وكذا من وسق (وفي طريق: خمسين وسقا) في سبيل الله، وكنا
نأكل منه ونطعم، وكان لا يفارق حقوي
¬_________
(¬1) والتصحيح من ` المجمع `، والمعنى قريب. اهـ.
حتى كان يوم قتل عثمان، فإنه انقطع [
عن حقوي فسقط] . وقال الترمذي - والسياق له - : ` حديث حسن غريب من هذا
الوجه `. قلت: وسقط التحسين من بعض نسخ ` الترمذي `، فحملني ذلك لما علقت
على ` المشكاة ` (5933) على تفسير قوله: ` غريب ` بالتضعيف. ولم يتنبه
لذلك بعض من انتقدني من المعاصرين النجديين - وقد بلغني وفاته رحمه الله -
فقال: ` لم يضعفه الترمذي بل قال: حسن غريب من هذا الوجه `. والآن وقد
تيسر لي تخريج الحديث تخريجا علميا، فقد ترجح عندي أمران: الأول: أن تحسين
الترمذي ثابت عنه لأنه نقله حافظان جليلان: ابن كثير في ` تاريخه ` (6 / 117
) والحافظ ابن حجر في ` فتحه ` (11 / 281) . والآخر: أن الحديث صحيح
بمجموع طرقه، وهي ثلاث: الأولى: هذه المتقدمة عن أبي العالية عن أبي هريرة
، وقلت: إن السياق للترمذي، والرواية الأولى والزيادة الأخيرة لأحمد.
والسند رجاله ثقات رجال الشيخين غير المهاجر، وهو ابن مخلد أبو مخلد، قال
الحافظ في ` التقريب `: ` مقبول `. أي عند المتابعة، وقد توبع كما يأتي.
الثانية: عن سهل بن زياد أبي زياد: حدثنا أيوب السختياني عن محمد بن سيرين عن
أبي هريرة به نحوه، ولفظه أتم، وفيه الزيادة الأولى.
أخرجه البيهقي.
وإسناده جيد، رجاله كلهم ثقات معروفون غير سهل بن زياد، أورده الذهبي في `
الميزان ` وقال: ` ما ضعفوه، وله ترجمة في (تاريخ الإسلام) `. قلت:
وقد وثقه ابن حبان (8 / 291) ، وروى عنه جمع من الثقات كما بينته في ` تيسير
انتفاع الخلان `، فهو صدوق يحتج به، ولعله لذلك سكت الحافظان ابن كثير وابن
حجر عن إسناده، فلا يلتفت إذن إلى ما ذكر في ` اللسان ` أن الأزدي قال فيه: `
منكر الحديث `. ومن الغريب أن الشيخ النجدي المشار إليه آنفا مع تصريحه بأن
إسناده صحيح، وترجمته للرواة الذين دون سهل بن زياد إلى شيخ البيهقي، فإنه
لم يتعرض لترجمته البتة، مع أنه أولى بها من الآخرين الذين ترجم لهم، لما
ذكرته آنفا في ترجمة سهل، وأنه لم يوثقه غير ابن حبان، والغالب أن من تفرد
هو بتوثيقه يكون مجهولا، لكني قد بينت أنه خرج عن الجهالة برواية أولئك الثقات
عنه. فلهذا كان أولى بترجمته وبيان حاله من الرواة الذين ترجم لهم! ثم وقفت
على توثيق البزار وغيره إياه، وألحقت ذلك بـ ` التيسير ` فالسند صحيح.
الثالثة: عن سهل بن أسلم العدوي عن يزيد (الأصل: زيد) بن أبي منصور عن أبيه
عن أبي هريرة نحوه. قلت: أخرجه أبو نعيم في ` الدلائل ` (ص 372) والبيهقي
من طريقين عن سهل ابن أسلم، وهو ثقة كما قال أبو داود الطيالسي، ومثله يزيد
بن أبي منصور.
وأما أبوه: أبو منصور، وهو الأزدي، فلم أجد له ترجمة إلا
في ` المقتنى في سرد الكنى ` للذهبي، فإنه قال: ` أبو يزيد الأزدي عن أبي
هريرة، وعنه سلام بن مسكين `. فيحتمل أنه هو، ومع ذلك فلا أعرف حاله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু খেজুর নিয়ে এলাম এবং বললাম, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি এগুলোতে বরকতের জন্য আল্লাহর কাছে দু’আ করুন।" তিনি খেজুরগুলো একসাথে রাখলেন (অন্য বর্ণনায়: তাঁর সামনে সাজালেন), এরপর আমার জন্য সেগুলোতে বরকতের দু’আ করলেন।
অতঃপর তিনি আমাকে বললেন: "হে আবু হুরায়রা! তুমি এই খেজুরগুলো (অর্থাৎ যেগুলোতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বরকতের দু’আ করেছেন) নাও এবং তোমার এই থলেতে, অথবা এই থলেতে ভরে রাখো। যখনই তুমি তা থেকে কিছু নিতে চাইবে, তোমার হাত এর ভেতরে প্রবেশ করিয়ে তা নেবে, কিন্তু খেজুরগুলো ছিটিয়ে দিও না।"
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, এরপর আমি আল্লাহর পথে এই খেজুরের এতো এতো ’ওয়াসাক’ (পরিমাণ) (অন্য বর্ণনায়: পঞ্চাশ ’ওয়াসাক’) বহন করেছি। আমরা তা থেকে খেতাম এবং অন্যদের খাওয়াতাম। আর এই থলেটি আমার কোমর থেকে কখনো বিচ্ছিন্ন হতো না, যতক্ষণ না উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহাদাতের দিন এলো। সেদিন সেটি আমার কোমর থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ে গেল।
2937 - ` لو تركها لدارت أو طحنت إلى يوم القيامة `.
أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` (2 / 41 / 2) والبيهقي في ` الدلائل ` (6 /
105) من طريق أحمد بن عبد الله بن يونس: حدثنا أبو بكر بن عياش عن هشام بن
حسان عن محمد بن سيرين عن أبي هريرة قال: أصاب رجلا حاجة فخرج إلى البرية
، فقالت امرأته: اللهم ارزقنا ما نعتجن وما نختبز، فجاء الرجل والجفنة ملأى
عجينا، وفي التنور حبوب الشواء، والرحى تطحن، فقال: من أين هذا؟ قالت:
من رزق الله، فكنس ما حول الرحى، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره
، والسياق للطبراني، وقال: ` لم يروه عن محمد بن سيرين إلا هشام، ولا عنه
إلا أبو بكر، تفرد به أحمد `. قلت: وهو ثقة من رجال الشيخين، وكذلك من
فوقه، سوى أبي بكر بن عياش، فمن رجال البخاري، وفيه كلام يسير لا يسقط
حديثه عن مرتبة الحسن، ولاسيما وله طريق أخرى كما يأتي. ومن هذا الوجه
أخرجه البزار في ` مسنده ` (4 / 267 / 3687) وقال: ` لا نعلم رواه عن هشام
إلا أبو بكر بن عياش `.
قلت: وهذا أدق تعبيرا من قول الطبراني المتقدم لأنه
لا يرد عليه ما يرد على قول الطبراني: أنه تفرد به أحمد بن يونس، فقال الإمام
أحمد في ` المسند ` (2 / 513) : حدثنا ابن عامر: أنبأنا أبو بكر عن هشام به
نحوه. وابن عامر هو (أسود بن عامر) كما في أحاديث قبله، وهو ثقة من رجال
الشيخين أيضا. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (10 / 257) بعد أن ساقه برواية
أحمد: ` رواه أحمد والبزار والطبراني في ` الأوسط ` بنحوه، ورجالهم رجال
الصحيح غير شيخ البزار، وشيخ الطبراني، وهما ثقتان `. وللحديث طريق ثان
يرويه أبو صالح عبد الله بن صالح: حدثنا الليث بن سعد عن سعيد بن أبي سعيد
المقبري عن أبي هريرة أن رجلا من الأنصار كان ذا حاجة.. الحديث نحوه أتم منه.
أخرجه البيهقي. وأبو صالح فيه ضعف. وله طريق ثالث عن شهر بن حوشب قال: قال
أبو هريرة: بينما رجل وامرأته في السلف الخالي لا يقدران على شيء، فجاء
الرجل من سفره فدخل على امرأته جائعا قد أصابته مسغبة شديدة، فقال لامرأته:
أعندك؟ قالت: نعم.. الحديث نحوه. أخرجه أحمد (2 / 421) وشهر بن حوشب
ضعيف، وفي حديثه زيادات منكرة، والله أعلم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক ব্যক্তি অভাবগ্রস্ত হলো। সে (রিযকের সন্ধানে) মরুভূমির দিকে বের হলো। তখন তার স্ত্রী বললেন, "হে আল্লাহ! আমাদের এমন রিযক দিন যা দিয়ে আমরা আটা মেখে রুটি তৈরি করতে পারি।"
এরপর লোকটি ফিরে এসে দেখল যে আটার পাত্রটি (খামির দিয়ে) পরিপূর্ণ, চুল্লিতে রুটি তৈরি হচ্ছে এবং (পাশের) যাঁতাটি নিজে নিজেই ঘুরছে। লোকটি জিজ্ঞাসা করল, "এসব কোথা থেকে এলো?" স্ত্রী উত্তর দিলেন, "আল্লাহর রিযক থেকে।" (এ দেখে আশ্চর্যান্বিত হয়ে) লোকটি তখন যাঁতার চারপাশে যা ছিল তা সরিয়ে/ঝাঁটিয়ে দিল।
এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যদি সে এটিকে (যাঁতাকে) ছেড়ে দিত, তবে তা কিয়ামত পর্যন্ত ঘুরতে থাকত বা আটা পিষতে থাকত।"
2938 - ` لا يحل لأحد يحمل فيها السلاح لقتال. يعني المدينة `.
أخرجه أحمد في ` المسند ` (3 / 347) : حدثنا موسى: حدثنا ابن لهيعة عن
أبي
الزبير أن جابرا أخبره أنه قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:
فذكره، وزاد في آخره: ` فقال قتيبة: يعني المدينة `. قلت: وقد توبع على
هذه الزيادة، فقال أحمد (3 / 393) : حدثنا حسن حدثنا ابن لهيعة أنبأنا أبو
الزبير قال: وأخبرني جابر أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: ` مثل
المدينة كالكير، وحرم إبراهيم مكة، وأنا أحرم المدينة، وهي كمكة، حرام
ما بين حرتيها وحماها كلها، لا يقطع منها شجرة، إلا أن يعلف رجل منها، ولا
يقربها إن شاء الله الطاعون، ولا الدجال، والملائكة يحرسونها على أنقابها
وأبوابها `. قال: وإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: ` ولا يحل
لأحد يحمل فيها سلاحا لقتال `. قلت: ورجال إسناده ثقات رجال مسلم غير ابن
لهيعة، وهو ثقة، لكنه سيىء الحفظ، وقال الهيثمي في ` المجمع ` (3 / 304)
: ` رواه أحمد، وفيه ابن لهيعة، وحديثه حسن، وفيه كلام `. قلت: ولحديث
الترجمة متابع بسند صحيح عنه، وهو معقل بن عبيد الله الجزري عن أبي الزبير عن
جابر مرفوعا بلفظ: ` لا يحل لأحد أن يحمل بمكة السلاح `. أخرجه مسلم (4 /
111) ومن طريقه البغوي في ` شرح السنة ` (7 / 302) وابن حبان (
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "মদীনার উদাহরণ হলো হাপরের (কামারের আগুনে ফুঁ দেওয়ার যন্ত্র) মতো। ইব্রাহীম (আঃ) মক্কাকে হারাম (পবিত্র) ঘোষণা করেছেন, আর আমি মদীনাকে হারাম ঘোষণা করছি। এটি মক্কার মতোই পবিত্র। এর দুই লাভাভূমির মধ্যবর্তী স্থান এবং এর সমগ্র সংরক্ষিত এলাকা (হিমা) পবিত্র। এর কোনো গাছ কাটা যাবে না, তবে কোনো ব্যক্তি যদি পশুর খাদ্যের জন্য তা করে (তবে ভিন্ন কথা)। ইনশাআল্লাহ, প্লেগ (মহামারি) এবং দাজ্জাল এর কাছেও ঘেঁষতে পারবে না। ফেরেশতারা এর প্রবেশপথ ও দরজাসমূহে প্রহরায় নিয়োজিত আছেন।"
তিনি আরও বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "কারো জন্য এই স্থানে (অর্থাৎ মদীনায়) যুদ্ধের উদ্দেশ্যে অস্ত্র বহন করা বৈধ নয়।"
2939 - ` إن أحب الكلام إلى الله أن يقول العبد: سبحانك اللهم وبحمدك، وتبارك اسمك
، وتعالى جدك، ولا إله غيرك، وإن أبغض الكلام إلى الله أن يقول الرجل
للرجل: اتق الله، فيقول: عليك نفسك `.
أخرجه النسائي في ` عمل اليوم والليلة ` (488 / 849) وابن منده في `
التوحيد ` (ق 123 /
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় উক্তি হলো বান্দার এই কথা: ‘সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, ওয়া তাবারাকা ইসমুকা, ওয়া তাআলা জাদ্দুকা, ওয়া লা ইলাহা গাইরুক।’
আর আল্লাহর নিকট সবচেয়ে অপছন্দের কথা হলো যখন কোনো ব্যক্তি অন্য ব্যক্তিকে বলে: ‘আল্লাহকে ভয় করো (তাকওয়া অবলম্বন করো),’ আর সে প্রত্যুত্তরে বলে: ‘তোমার নিজেকে সামলাও (বা, নিজের দিকে মনোযোগ দাও)।’”
2940 - ` لا بأس بذلك. يعني المسح على الخفين `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (
এতে কোনো অসুবিধা নেই; অর্থাৎ চামড়ার মোজার (খুফ্ফাইন) উপর মাসাহ করার ব্যাপারে।
2941 - ` جاءنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في مسجدنا بـ (قباء) ، فجئت وأنا غلام
[حدث] حتى جلست عن يمينه، [وجلس أبو بكر عن يساره] ثم دعا بشراب فشرب منه
، ثم أعطانيه، وأنا عن يمينه، فشربت منه، ثم قام يصلي، فرأيته يصلي في
نعليه `.
أخرجه أحمد (4 / 221) وابن أبي عاصم في ` الوحدان ` (4 / 167 / 2148) من
طريق مجمع بن يعقوب: أخبرنا محمد بن إسماعيل قال: قيل لعبد الله بن أبي
حبيبة رضي الله عنه: هل أدركت من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال:
فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن إن شاء الله تعالى، محمد بن إسماعيل هذا روى
عنه أيضا عاصم بن سويد إمام مسجد قباء كما في ` الجرح والتعديل `، وذكره ابن
حبان في ` الثقات ` (7 / 394) في أتباع التابعين، وكذلك ذكر فيهم الراويين
المذكورين عنه: مجمع بن يعقوب وعاصم بن سويد، وهذا مستغرب منه، لأن الظاهر
أن محمد بن إسماعيل تابعي أدرك جده من قبل أم عبد الله بن أبي حبيبة هذا.
ولذلك قال ابن السكن في ترجمته، أعني عبد الله هذا كما في ` الإصابة `:
`
إسناد حديثه صالح `. ثم ساق له هذا الحديث، وعزاه لابن أبي شيبة أيضا
والبغوي والطبراني. ويؤيد ما ذكرت إخراج الضياء المقدسي للحديث في ` المختارة
` (ج 56 / 136 /
আব্দুল্লাহ ইবনে আবি হাবিবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ক্বুবা-তে অবস্থিত আমাদের মসজিদে তাশরীফ আনলেন। আমি তখন একজন বালক ছিলাম। আমি এসে তাঁর ডান দিকে বসলাম, আর আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর বাম দিকে বসলেন। এরপর তিনি কোনো পানীয় চাইলেন এবং তা থেকে পান করলেন। এরপর তিনি আমাকে তা দিলেন। আমি যেহেতু তাঁর ডান দিকে ছিলাম, তাই আমিও তা থেকে পান করলাম। এরপর তিনি সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন, আর আমি তাঁকে দেখলাম যে, তিনি তাঁর জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করছেন।
2942 - ` قال الله عز وجل: أنا عند ظن عبدي، وأنا معه إذا دعاني `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (616) : حدثنا خليفة بن خياط قال: حدثنا
كثير بن هشام: حدثنا جعفر عن يزيد بن الأصم عن أبي هريرة عن رسول الله صلى
الله عليه وسلم قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم رجال الصحيح
، وقد أخرجه مسلم (8 / 66) من طريق وكيع عن جعفر بن برقان به. وله طريق
أخرى بزيادة في متنه بلفظ: `.. عبدي عند ظنه بي، وأنا معه إذا دعاني، فإن
ذكرني في نفسه ذكرته في نفسي، وإن ذكرني في ملأ ذكرته في ملأ خير منهم وأطيب
، وإن تقرب مني شبرا تقربت منه ذراعا، وإن تقرب مني ذراعا تقربت منه باعا،
وإن أتاني يمشي أتيته هرولة `. أخرجه أحمد (2 / 480) : حدثنا محمد بن جعفر
قال: حدثنا شعبة عن سليمان عن ذكوان عن أبي هريرة به. وهذا إسناد صحيح على
شرط الشيخين. ومن هذا الوجه أخرجه ابن حبان (2 / 91 / 809) إلى قوله: `
وأطيب `. وهو في ` الصحيحين ` من طريق أخرى عن سليمان - وهو الأعمش - بلفظ:
`.. وأنا معه إذا ذكرني.. `، وهو رواية لابن حبان (808) ، وهو مما تقدم
تخريجه تحت الرقم (2011) ، وذكرت هناك لحديث الترجمة شاهدا من حديث أنس رضي
الله عنه بسند صحيح.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন, মহান আল্লাহ্ তায়ালা ইরশাদ করেন:
"আমি আমার বান্দার ধারণা অনুযায়ী তার সাথে আচরণ করি (অর্থাৎ, আমি তার ধারণা অনুযায়ী থাকি)। আর যখন সে আমাকে ডাকে (বা স্মরণ করে), তখন আমি তার সাথেই থাকি। যদি সে আমাকে একান্তে স্মরণ করে, তবে আমিও তাকে একান্তে স্মরণ করি। আর যদি সে আমাকে কোনো সমাবেশে (জনসমক্ষে) স্মরণ করে, তবে আমি তাকে তাদের চেয়েও উত্তম ও পবিত্র সমাবেশে (ফেরেশতাদের মজলিসে) স্মরণ করি। যদি সে আমার দিকে এক বিঘত এগিয়ে আসে, তবে আমি তার দিকে এক হাত (এক বাহু) এগিয়ে যাই। আর যদি সে আমার দিকে এক হাত (এক বাহু) এগিয়ে আসে, তবে আমি তার দিকে দুই হাত (পূর্ণ প্রসারিত বাহু) এগিয়ে যাই। আর যদি সে হেঁটে আমার দিকে আসে, তবে আমি দ্রুত গতিতে (ত্বরা করে/দৌঁড়ে) তার দিকে যাই।"
2943 - ` ذهبت بي أمي إلى النبي صلى الله عليه وسلم [وأنا غلام] فمسح على رأسي،
ودعا لي بالرزق، [وفي رواية: بالبركة] `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (164 / 632) قال: حدثنا أبو نمير حدثنا
أبو اليمان قال: حدثنا إسماعيل بن أبي خالد قال: سمعت عمرو بن حريث يقول
: فذكره. قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات غير أبي نمير هذا فلم أعرفه، وليس في
الرواة من يكنى بهذه الكنية سوى واحد فوق هذه الطبقة، ولم يذكر الحافظ الذهبي
سواه في ` كناه `. وفي الإسناد إشكال ثان، وهو أن أبا اليمان - واسمه
الحكم بن نافع البهراني - وهو من شيوخ المؤلف هنا، وفي ` الصحيح `، روى عنه
مباشرة هنا نحو خمسة عشر حديثا، ولم يذكروا أنه يروي عنه بالواسطة، وبخاصة
لأبي نمير هذا المجهول. وثمة إشكال ثالث، وهو تصريح أبي اليمان بتحديث
إسماعيل بن أبي خالد إياه، فإن هذا مستبعد جدا بالنظر إلى تاريخ الولادة
والوفاة، فقد ذكروا في ترجمة أبي اليمان أنه ولد سنة (138) ، وفي ترجمة
إسماعيل أنه مات سنة (146) ، فيكون عمر أبي اليمان (8) سنوات حين وفاة
إسماعيل، ولذلك لم يذكروا له
رواية عنه. ولعله لما ذكرت من الإشكال ذهب
الشيخ الجيلاني في شرحه على ` الأدب `، إلى أن الصواب في اسم شيخ المؤلف: `
ابن نمير `، ثم قال (2 / 89) : ` لعله انقلب السند، والصحيح: حدثنا أبو
اليمان حدثنا ابن نمير، أي: عبد الله بن نمير، وكان في المطبوعة: حدثنا
أبو نمير `. فأقول: هذا احتمال قوي، فقد ذكروا لابن نمير هذا رواية عن
إسماعيل بن أبي خالد، ووجدت تصريحه بتحديث إسماعيل إياه في ` سنن ابن ماجه `
(رقم 817) بحديث القراءة في صلاة الفجر، لكنه أدخل بينه وبين عمرو بن حريث
(أصبغ مولى عمرو بن حريث) ، فإذا صح هذا الاحتمال، فالإسناد صحيح لتصريح
إسماعيل فيه بسماعه إياه من عمرو بن حريث. وإن مما يؤكد ذلك أنني وجدت تصريح
إسماعيل بالسماع في هذا الحديث نفسه من طريق أخرى عنه، فقال أبو يعلى في `
مسنده ` (3 / 41 / 1456) : حدثنا محمد بن عبد الله ابن نمير: حدثنا يحيى بن
يمان حدثنا إسماعيل قال: سمعت عمرو بن حريث به. قلت: وهذا إسناد لا بأس به
في المتابعات والشواهد، رجاله ثقات رجال الشيخين غير يحيى هذا، وهو صدوق
يخطىء كثيرا، وكان تغير كما في ` التقريب `، وأما قول المعلق على ` مسند
أبي يعلى `: ` وقد صحح مسلم حديثه في الزهد رقم (2972) `. ففيه تدليس لعله
غير مقصود، لأن مسلما لم يحتج به وإنما قرنه بـ ` عبدة بن سليمان ` وهو
الكلابي ثقة ثبت، فتصحيح مسلم لحديثه، وليس لحديث يحيى
كما زعم، فكان الحق
أن يقال روى له مقرونا. ومن الغريب أن فؤاد عبد الباقي قد لفت نظر القراء في
الحاشية إلى هذا المعنى، ومع ذلك لم يتنبه له المعلق المشار إليه، أو أنه لم
يأخذ به، لأنه رأى المترجمين له قد رمزوا له بأنه من رجال مسلم كالحافظ في
كتابيه، وكأبي نصر الكلاباذي في ` الجمع بين رجال الصحيحين ` أطلقوا ولم
يقيدوا بأنه مقرون عنده، ولكن هذا إن صح، فما كان ينبغي للمومى إليه أن يقول
ما قال، لأن ذلك لا يصدق على الحديث الذي أشار إليه، لما ذكرت أنه مقرون،
والكلاباذي قد أشار إليه أيضا ولم يزد! فتنبه، فإنه من خفايا هذا العلم
الشريف. ومع الضعف المشار إليه، فقد خالفه في إسناده محمد بن يزيد - وهو
الواسطي الثقة - فقال: عن إسماعيل بن أبي خالد عن مولى عمرو بن حريث عن عمرو
بن حريث.. فذكر حديث القراءة المشار إليه آنفا، وزاد عقبه: ` وقال: ذهبت
بي أمي أو أبي إليه، فدعا لي بالرزق `. أخرجه أبو يعلى (1469) . قلت: فزاد
الواسطي في الإسناد مولى عمرو بن حريث، فزيادته مقبولة لثقته وحفظه.
والظاهر أن هذا المولى هو (أصبغ) المذكور في إسناد حديث ابن ماجه المتقدم،
وهو ثقة، إلا أنه كان تغير كما في ` التقريب `، ويحتمل عندي أن يكون هو
الوليد بن سريع، فإنه مولى عمرو بن حريث أيضا، وشارك (أصبغ) في رواية حديث
القراءة عن مولاه عمرو عند مسلم وغيره كأبي يعلى (1457) وهو مخرج في `
الإرواء ` (2 / 63) ، فيحتمل عندي أيضا أن يكون هو (أصبغ) نفسه، ويكون
هذا لقبا له. والله سبحانه وتعالى أعلم.
وحديث عمرو هذا أورده الهيثمي في
` المجمع ` (9 / 405) بروايتيه، أعني عن أصبغ وعن الوليد، وقال: `
رواهما أبو يعلى والطبراني بأسانيد، ورجال أبي يعلى وبعض أسانيد الطبراني
رجال الصحيح `. ثم وجدت للحديث طريقا أخرى عن عمرو بن حريث يزداد بها قوة،
فقال البخاري في ` التاريخ الكبير ` (1 / 2 / 190) : قال أبو نعيم: حدثنا
فطر عن أبيه: سمع عمرو ابن حريث قال: انطلق بي أبي إلى النبي صلى الله عليه
وسلم، وأنا غلام، فدعا لي بالبركة، ومسح على رأسي. وهذا إسناد حسن في
الشواهد والمتابعات، رجاله رجال البخاري غير والد فطر، وهو خليفة مولى عمرو
بن حريث، أورده ابن حبان في ` الثقات ` (4 / 209) برواية أبيه هذه، وقال
ابن القطان: ` مجهول الحال `. وقال الحافظ في ` التقريب `: ` لين الحديث `
. أي عند التفرد، وإلا فهو مقبول الحديث عند المتابعة كما هنا. ولعله لذلك
جزم ابن عبد البر بالحديث، فقال في ترجمة عمرو بن حريث من ` الاستيعاب `: `
رأى النبي صلى الله عليه وسلم وسمع منه، ومسح برأسه ودعا له بالبركة، وخط
له بالمدينة دارا بقوس `.
وذكر هذا بتمامه الذهبي في ` السير ` (3 /
আমর ইবনে হুরাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আমার মা আমাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে গেলেন (যখন আমি ছিলাম এক বালক)। অতঃপর তিনি আমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং আমার জন্য রিযকের (জীবিকার) দু’আ করলেন। (অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি আমার জন্য বরকতের দু’আ করলেন)।
2944 - ` كان من دعائه صلى الله عليه وسلم: اللهم اغفر لي ما قدمت وما أخرت، وما
أسررت وما أعلنت، وما أنت أعلم به مني، إنك أنت المقدم والمؤخر، لا إله
إلا أنت `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (174 / 673) وأحمد (2 / 291 و 514 و 526
) من طرق عن عبد الرحمن المسعودي عن علقمة بن مرثد عن أبي الربيع عن أبي
هريرة قال: فذكره. قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات معروفون، وأبو
الربيع هو المدني، روى عنه أيضا سماك بن حرب ويزيد بن أبي زياد، وقال أبو
حاتم: ` صالح الحديث `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (5 / 582) ، وحسن
له الترمذي، وقال الذهبي: ` صدوق `. وأما اقتصار الحافظ فيه على قوله:
`
مقبول `. فهو غير مقبول. والحق في أمثاله ما قاله الذهبي: ` صدوق `،
وكثيرا ما أرى الحافظ يوافقه. والله الهادي. وأما المسعودي فهو وإن كان قد
اختلط، فهو صحيح الحديث إذا حدث قبل الاختلاط، وطريق معرفة ذلك النظر في
الراوي عنه، فإذا كان بصريا أو كوفيا، كان صحيحا حديثه لأنهم حدثوا عنه قبل
الاختلاط، ومنهم خالد بن الحارث كما في كتاب ` ابن الكيال ` مع كون خالد هذا
ثقة ثبتا، وهو بصري. وللحديث شواهد كثيرة أقربها إليه حديث أبي موسى
الأشعري عنه صلى الله عليه وسلم أنه كان يدعو بهذا الدعاء: ` اللهم اغفر لي
خطيئتي وجهلي.. ` الحديث بطوله، وفيه هذا، وزاد في آخره: ` وأنت على كل
شيء قدير `. أخرجه البخاري (6398 و 6399) ومسلم (8 / 81) والبخاري في `
الأدب المفرد ` أيضا (177 / 688) والزيادة في ` المستدرك ` (1 / 511) من
طريق أخرى عنه نحوه. وصححه على شرطهما، ووافقه الذهبي، ومن شواهده حديث
علي الطويل في دعاء الاستفتاح، وفي آخره: ` ثم يكون من آخر ما يقول بين
التشهد والتسليم.. ` فذكره بتمامه. وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (738)
برواية مسلم وغيره.
وله شاهد آخر عن ابن عباس فيما كان رسول الله صلى الله
عليه وسلم يقول إذا قام إلى الصلاة من جوف الليل، فذكره في آخره، ولكن ليس
فيه: ` وما أنت أعلم به مني `. اللهم إلا في رواية للبخاري برقم (7442)
وكذا ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (10 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দু’আসমূহের মধ্যে এই দু’আটি ছিল: "হে আল্লাহ! তুমি আমার পূর্বের ও পরের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দাও, যা আমি গোপনে করেছি এবং যা প্রকাশ্যে করেছি (তাও ক্ষমা করে দাও)। আর যে বিষয়ে তুমি আমার চেয়ে বেশি জানো (সেসবও ক্ষমা করো)। নিশ্চয়ই তুমিই অগ্রে স্থাপনকারী এবং তুমিই পশ্চাতে স্থাপনকারী (বা বিলম্বে স্থাপনকারী)। তুমি ব্যতীত আর কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই।"
2945 - ` لا تصم يوم الجمعة إلا في أيام هو أحدها، وأما أن لا تكلم أحدا، فلعمري
لأن تكلم بمعروف، وتنهى عن منكر خير من أن تسكت `.
أخرجه أحمد (5 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তোমরা শুধুমাত্র জুমু‘আর দিন রোযা রাখবে না, তবে যদি তা তোমাদের (অন্যান্য) রোযার দিনগুলোর মধ্যে একটি হয় (তাহলে ভিন্ন)। আর কারো সাথে কথা না বলার যে মান্নত (সংকল্প) করেছো—আমার জীবনের শপথ! তুমি যদি কোনো ভালো কথা বলো এবং মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করো, তা চুপ থাকার চেয়ে উত্তম।
2946 - ` لا تجمعوا بين اسمي وكنيتي، [أنا أبو القاسم، والله يعطي، وأنا أقسم]
`.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` والترمذي (2843) وابن حبان (
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা আমার নাম ও আমার কুনিয়াতকে (উপনাম) একসাথে করো না। [আমিই আবুল কাসিম, আর আল্লাহই দান করেন, এবং আমি (তা) বণ্টন করি।]