সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3101 - (لا تَصُمْ يومَ السبتِ إلا في فريضةٍ، ولو لم تَجِدْ إلا لحاءَ شجرةٍ فَأَفْطِرْ عليهِ) .
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير` (8/303/7722) : حدثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل: حدثني الحكم بن موسى: ثنا إسماعيل بن عياش عن عبد الله ابن دينار عن أبي أمامة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات؛ لكن فيه علة؛ قال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (3/198) :
` رواه الطبراني في `الكبير` من طريق إسماعيل بن عياش عن الحجازيين، وهو ضعيف فيهم `.
قلت: وهو كما قال؛ لكن لإسماعيل بن عياش فيه إسناد آخر شامي صحيح؛ قال الإمام أحمد (6/
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
তোমরা শনিবারের দিন সাওম (রোজা) পালন করবে না, তবে যদি তা ফরয রোজা হয় (তাহলে ভিন্ন কথা)। আর যদি (শনিবারের নফল রোজা ভাঙার জন্য) তোমরা গাছের ছাল ব্যতীত অন্য কিছু না পাও, তবে তা দিয়েই ইফতার করে নেবে।
3102 - (إياكم ومُحقراتُ الذنُوبِ، كقَومٍ نَزلُوا في بطْنِ وادٍ فجاءَ ذا بعودٍ، وجاء ذا بعودٍ حتى أنضَجُوا خبزتهم، وإنَّ محقَّراتِ الذُّنوب متى يُؤخذ بها صاحبُها تُهلِكْهُ) .
أخرجه الإمام أحمد (5/331) : ثنا أنس بن عياض: حدثني أبو حازم - لا أعلمه إلا - عن سهل بن سعد قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، وهو من ثلاثيات `المسند`. وأخرجه الروياني في `مسنده ` (29/12/
সহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
তোমরা ছোট ছোট গুনাহকে তুচ্ছজ্ঞান করা থেকে সাবধান থাকো। এর উদাহরণ হলো সেই সম্প্রদায়ের মতো, যারা কোনো উপত্যকার গভীরে শিবির স্থাপন করল; অতঃপর একজন একটি লাকড়ি আনল, আরেকজনও একটি লাকড়ি আনল, এভাবে (প্রয়োজনীয় পরিমাণ লাকড়ি একত্রিত করে) তারা তাদের রুটি সেঁকে নিলো। আর নিশ্চয়ই ছোট ছোট গুনাহ, যখনই এর দ্বারা এর লিপ্ত ব্যক্তিকে পাকড়াও করা হয়, তখন তা তাকে ধ্বংস করে দেয়।
3103 - (أَبشرْ يا كعبُ! فقالَتْ أمُّه: هنيئاً لكَ الجنَّةُ يا كعبُ! فقال: من هذه المتألّيةُ على الله؟ ! قالَ: هيَ أمِّي يا رسول الله! فقال: وما يدريك يا أمَّ كعب؟ ! لعلَّ كعباً قال ما لا يعنيه، أو منعَ ما لا يُغنيهِ) .
أخرجه ابن أبي الدنيا في `الصمت ` (74/110) : حدثنا أحمد بن عيسى المصري: حدثنا ضمام بن إسماعيل الإسكندراني: حدثني يزيد بن أبي حبيب وموسى بن وردان عن كعب بن عجرة رضي الله عنه:
أن النبي - صلى الله عليه وسلم - فقد كعباً، فسأل عنه؛ فقالوا: مريض، فخرج يمشي حتى أتاه، فلما دخل عليه قال ... فذكره.
وأخرجه الخطيب في `التاريخ ` (4/273) من طريق ابن أبي الدنيا،
والطبراني في `المعجم الأوسط ` (2/149/ 7299 بترقيمي) : حدثنا محمد بن عبد الرحيم: ثنا أحمد بن عيسى المصري به. وقال:
`لم يروه عن كعب إلا موسى بن وردان، تفرد به ضمام `.
قلت: وهو صدوق ربما أخطأ كما قال الحافظ في `التقريب `، وقال الذهبي في `الميزان `:
`صالح الحديث، لينه بعضهم بلا حجة `.
قلت: وسائر الرواة ثقات من رجال الشيخين؛ غير موسى بن وردان، وهو صدوق كما في ` الكاشف ` و` التقريب ` وزاد:
` ربما أخطأ `.
وأقول: هو مقرون بيزيد بن أبي حبيب الثقة كما ترى، ولا ينفي ذلك قول الطبراني: `لم يروه عن كعب إلا موسى` لأنه يعني: موصولاً، والله أعلم؛ لأن يزيد بن أبي حبيب ولد في نحو سنة (48) ، ومات كعب بعد الخمسين، فالظاهر أنه لم يلقه، فكأن الطبراني رحمه الله أشار إلى أنه منقطع من طريق يزيد؛ وموصول من طريق موسى، وقد ذكروا له رواية عن كعب بن عجرة، وقد أفادوا في ترجمة موسى أنه مات سنة سبع عشرة ومئة، وله أربع وسبعون سنة؛ فقد أدرك كعباً والله أعلم، - ولذلك؛ فيكون الإسناد حسناً - إن شاء الله تعالى - ، ولعله لذلك سكت عنه الحافظ في `الإصابة` وعزاه للطبراني وحده في `الأوسط `، وقال شيخه الهيثمي في `المجمع ` (10/314) :
`.. وإسناده جيد`. وقال المنذري في `الترغيب ` (4/110) :
`.. ولا يحضرني الآن إسناده، إلا أن شيخنا الحافظ أبا الحسن - رحمه الله -
كان يقول: إسناده جيد`.
(تنبيه) : محمد بن عبد الرحيم شيخ الطبراني في هذا الحديث هو الديباجي التستري، ولم أقف له الآن على ترجمة، ويظهر لي أنه من مشايخه المعروفين، فقد روى له في `معجمه الأوسط ` نحو عشرين حديثاً (2/148/
কা’ব ইবনে উজরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর অসুস্থতার সময় তাঁকে দেখতে গেলেন, তখন তিনি বললেন: "কা’ব! সুসংবাদ গ্রহণ করো।"
তখন তাঁর মা বললেন, "হে কা’ব! জান্নাত তোমার জন্য মোবারক হোক!"
নবীজী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আল্লাহর ওপর দৃঢ়ভাবে ভরসা করে এমন কথা বলছে কে?"
কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! ইনি আমার মা।"
তখন নবীজী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে কা’বের মা, তুমি কী করে জানলে? সম্ভবত কা’ব এমন কথা বলেছে যা তার জন্য প্রয়োজনীয় ছিল না (যা তার কোনো উপকারে আসেনি), অথবা সে এমন জিনিস আটকে দিয়েছে যা তাকে ধনী করত না (কিন্তু অন্যের উপকারে আসত)।"
3104 - (كان إذا أوى إلى فِراشهِ كلَّ ليلةٍ جمَعَ كفَّيهِ، ثم نفَثَ فيهما، فقرأ فيهما (قل هو الله أحد) و (قل أعوذ برب الفلق) و (قل أعوذ برب الناس) ، ثم يمسح بهما ما استطاع من جسده، يبدأُ بهما على رأسهِ ووجههِ، وما أقبل من جسده، يفعل ذلك ثلاث مرات) .
أخرجه البخاري (5017) ، وأبو داود (5056) ، والترمذي في `السنن ` (3399) و`الشمائل ` - باب ما جاء في نومه - صلى الله عليه وسلم - رقم (
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি রাতে যখন বিছানায় শুতে যেতেন, তখন তিনি তাঁর দু’হাতের তালু একত্রিত করতেন, অতঃপর তাতে ফুঁ দিতেন। এরপর তাতে তিনি ’ক্বুল হুওয়াল্লাহু আহাদ’ (সূরা ইখলাস), ’ক্বুল আ‘উযু বিরব্বিল ফালাক্ব’ (সূরা ফালাক্ব) এবং ’ক্বুল আ‘উযু বিরব্বিন্নাস’ (সূরা নাস) পাঠ করতেন। অতঃপর যতটুকু সম্ভব হতো, তিনি তা দ্বারা তাঁর শরীর মাসেহ করতেন। তিনি তাঁর মাথা ও মুখমণ্ডল দিয়ে এবং শরীরের সম্মুখভাগ দিয়ে মাসেহ শুরু করতেন। তিনি এই কাজটি তিনবার করতেন।
3105 - (في التي لمْ يُرتعْ منها. قاله لعائشةَ رضي الله عنها) .
أخرجه البخاري (9/120/
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: (এই উক্তিটি ছিল) সেই বিষয় সম্পর্কে, যা থেকে (তখন) কোনো সুবিধা নেওয়া বা উপভোগ করা হয়নি। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই কথাটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলেছিলেন।
Null
অনুবাদের জন্য কোনো আরবি হাদিস সরবরাহ করা হয়নি।
3107 - (إنَّ رسولَ الله يفعلُ ذلكَ (يعني: تقبيلَ الزوجةِ وهو صائمٌ) ، أنا أتقاكم للهِ، وأعلمُكم بحدودِ اللهِ) .
أخرجه عبد الرزاق في `المصنف ` (4/184/8412) ، ومن طريقه: أحمد (5/434) : أنا ابن جريج: أخبرني زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار عن رجل من الأنصار: أن الأنصاري أخبر عطاءً:
أنه قبَّل امرأته على عهد رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو صائم، فأمر امرأته فسألت النبي - صلى الله عليه وسلم - عن ذلك؟ فقال النبي - صلى الله عليه وسلم - :
`إن رسول الله يفعل ذلك `.
فأخبرته امرأته فقال: إن النبي يرخص له في أشياء، فارجعي إليه فقولي له، فرجعت إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقالت: قال: إن النبي يرخص له في أشياء؟ ! فقال:
`أنا أتقاكم لله، وأعلمكم بحدود الله `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين إلا الرجل الأنصاري فهو لم يسم، ومعلوم أن جهالة الصحابي لا تضر؛ لأنهم كلهم عدول عند أهل السنة.
والحديث أخرجه مالك (1/273) عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار: أن رجلاً ... ؛ فأرسله. لم يذكر الرجل الأنصاري، والموصول أرجح؛ لأن زيادة الثقة مقبولة.
وللحديث شواهد كثيرة من حديث عائشة وغيرها بنحوه من طرق بألفاظ متقاربة، تقدم أحدها برقم (328) ، وفي طريق آخر عنها بلفظ:
`والله! إني لأرجو أن أكون أخشاكم لله، وأعلمكم بما أتقي `.
أخرجه مسلم وابن خزيمة وابن حبان في `صحاحهم `، وهو مخرج في `صحيح أبي داود` (2067) .
وقد كان تقدم مني تخريج هذا الحديث برواية أحمد فقط عقب حديث عائشة المشار إليه آنفاً (329) ، والآن قدر لي إعادة تخريجه بزيادة فائدة والحمد لله.
وله شاهد بنحوه من حديث عمر بن أبي سلمة عند مسلم وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` (4/84) . *
আনসারী সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে রোযা অবস্থায় তাঁর স্ত্রীকে চুম্বন করলেন। তিনি তাঁর স্ত্রীকে আদেশ দিলেন যেন তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেন। তাঁর স্ত্রী নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে জিজ্ঞাসা করলে, তিনি (নবী) বললেন:
**"নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহও (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুরূপ করে থাকেন।"**
তাঁর স্ত্রী (ফিরে এসে) তাঁকে একথা জানালে, তিনি (সাহাবী) বললেন: "নবীজীকে তো কিছু কিছু ক্ষেত্রে বিশেষ অনুমতি দেওয়া হয়েছে। তুমি তাঁর কাছে আবার যাও এবং তাঁকে এই কথা বলো।" স্ত্রী পুনরায় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে ফিরে গিয়ে বললেন: (আমার স্বামী) বলেছেন, "নবীজীকে তো কিছু কিছু ক্ষেত্রে বিশেষ অনুমতি দেওয়া হয়েছে!"
তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন:
**"আমি তোমাদের মধ্যে আল্লাহকে সর্বাধিক ভয়কারী (সবচেয়ে মুত্তাকী), এবং তোমাদের মধ্যে আল্লাহর সীমাসমূহ সম্পর্কে সর্বাধিক জ্ঞাত।"**
3108 - (إنَّه سيُلحِدُ فيه رجلٌ من قريشٍ، لو وُزنتْ ذنوبُه بذنوبِ الثقلينِ لرجحت. يعني: الحرم) .
أخرجه أحمد (2/136) : ثنا محمد بن كُنَاسة: ثنا إسحاق بن سعيد عن أبيه قال:
أتى عبد الله بن عمر عبد الله بن الزبير فقال: يا ابن الزبير! إياك والإلحاد في - حرم الله تبارك وتعالى؛ فإني سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول ... فذكره. قال: فانظر لا تكونه.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير محمد بن كناسة - وهو محمد بن عبد الله بن عبد الأعلى بن كناسة الكوفي - وهو ثقة، لكن قال أبو حاتم: ` كان صاحب أخبار، يكتب حديثه ولا يحتج به `.
قلت: وقد خالفه هاشم بن القاسم، فقال أحمد في مسند عبد الله بن عمرو (2/219) : ثنا هاشم: ثنا إسحاق - يعني: ابن سعيد - : ثنا سعيد بن عمرو قال:
أتى عبد الله بن عمرو ابن الزبير، وهو جالس في الحجر فقال: يا ابن الزبير! إياك والإلحاد.. الحديث نحوه، قال: فانظر أن لا تكون هو يا ابن عمرو! فإنك قد قرأت الكتب، وصحبت الرسول - صلى الله عليه وسلم - ، قال: فإني أشهدك أن هذا وجهي إلى الشام مجاهداً.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، فهو أصح من الذي قبله؛ فإن هاشم بن القاسم - وهو أبو النضر الليثي مولاهم البغدادي - قال الحافظ فيه:
`ثقة ثبت `.
وقال في الذي قبله - ابن كناسة - :
` صدوق `.
وقال الهيثمي في حديث ابن كناسة هذا (3/258) :
`رواه أحمد، ورجاله ثقات `.
وقال في حديث هاشم:
`رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح `.
وإذا عرفت هذا؛ فقد اختلفا في راوي هذا الحديث عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - والقائل لابن الزبير: إياك والإلحاد في.. فقال ابن كناسة: عبد الله بن عمر، وقال هاشم: عبد الله بن عمرو. وهذا هو الأرجح؛ لأن هاشماً أحفظ من ابن كناسة كما عرفت من ترجمة الحافظ لهما، ومن تخريج الهيثمي لحديثهما. ويؤيد ذلك أمور ثلاثة:
الأول: أن ابن كناسة اضطرب في إسناده، فرواه مرة عن إسحاق بن سعيد كما تقدم. ومرة قال: ثنا إسحاق بن عيسى بن عاصم عن أبيه قال ... فذكره مثل روايته المتقدمة.
أخرجه الحاكم (2/388) من طريق الحسين بن الفضل البجلي: ثنا محمد ابن كناسة به. وقال:
` صحيح الإسناد `.
ورده الذهبي بقوله:
`قلت: [قال] أبو حاتم: ابن كناسة لا يحتج به `.
والحسين الراوي عنه إمام محدث مفسر لغوي جليل، له ترجمة في `سير الأعلام ` (13/ 414) للذهبي، ولذلك أنكر عليه الحافظ في `اللسان ` إيراده إياه في ` الميزان ` وقال:
`فكان الأولى أن لا يذكره لجلالته `. فراجع `اللسان ` (2/
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
“নিশ্চয়ই কুরাইশ গোত্রের একজন লোক এই স্থানে (অর্থাৎ পবিত্র হারামে) সীমা লঙ্ঘন বা ধর্মদ্রোহিতা করবে। যদি তার পাপসমূহকে সাক্বালাঈন (মানুষ ও জিন) এর পাপসমূহের সাথে ওজন করা হয়, তবে তার পাপই ভারী হবে।”
3109 - (كُلُوهُ من ذِي الحجَّةِ إلى ذي الحجَّةِ. يعني: لحمَ الأضاحي) .
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (4/2/
তোমরা এটি যিলহজ্জ মাস থেকে (পরবর্তী) যিলহজ্জ মাস পর্যন্ত খাও। অর্থাৎ: (এর দ্বারা) কুরবানীর গোশত বোঝানো হয়েছে।
3110 - (نهى أنْ يجلسَ بين الضَّحِّ والظل، وقال: مجلس الشيطان) .
أخرجه أحمد (3/
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রোদ এবং ছায়ার মাঝামাঝি স্থানে বসতে নিষেধ করেছেন এবং তিনি বলেছেন: এটি শয়তানের বসার স্থান।
3111 - (ليسَ في الأرضِ منَ الجنةِ إلا ثلاثةُ أشياء: غرْسُ العجوة، وأواقٍ تنزلُ في الفراتِ كلَّ يومٍ من بركةِ الجنةِ والحَجَرُ) .
أخرجه الخطيب في `التاريخ ` (1/55) قال: أخبرنا القاضي أبو عمر القاسم
ابن جعفر بن عبد الواحد الهاشمي - بالبصرة - قال: نا عبد الرحمن بن أحمد الخُتَّلي قال: حدثني عبد الله بن محمد بن علي البَلْخي قال: نا محمد بن أبان قال: نا أبو معاوية عن الحسن بن سالم بن أبي الجعد عن أبيه عن أبي هريرة: قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات، وإليك البيان:
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: পৃথিবীতে জান্নাতের তিনটি জিনিস ছাড়া আর কিছু নেই: আজওয়া খেজুরের চারা, জান্নাতের বরকতময় অংশ যা প্রতিদিন ফুরাত নদীতে নেমে আসে এবং (হাজরে আসওয়াদ) পাথর।
3112 - (اجعلُوا من صلاتِكم في بُيوتِكم، ولا تجعلُوها عليكم قُبوراً، كما اتَّخذت اليهود والنصارى في بيوتهم قبوراً، وإنَّ البيت ليُتلى فيه القرآن؛ فيتراءى لأهلِ السماء كما تتراءى النجومُ لأهل الأرضِ) .
أخرجه الذهبي في `سير أعلام النبلاء` (8/
তোমরা তোমাদের কিছু সালাত তোমাদের ঘরে আদায় করো এবং তোমাদের ঘরগুলোকে নিজেদের জন্য কবর বানিয়ে ফেলো না, যেমন ইহুদি ও নাসারারা তাদের ঘরগুলোকে কবরের ন্যায় বানিয়েছিল। আর নিশ্চয় যে ঘরে কুরআন তিলাওয়াত করা হয়, তা আসমানবাসীদের নিকট এমনভাবে দৃশ্যমান হয়, যেমন পৃথিবীর অধিবাসীদের নিকট নক্ষত্ররাজি দৃশ্যমান হয়।
3113 - (الله الله في قبطِ مِصرَ؛ فإنَّكم ستظهرونَ عليهم، ويكونُون لكم عُدَّةً وأعواناً في سبيل الله) .
أخرجه الطبراني في `الكبير` (23/265/561) قال: حدثنا زكريا بن يحيى الساجي: ثنا بُندار. ح حدثنا محمد بن صالح النَّرْسي: حدثنا محمد ابن المثنى قالا: حدثنا وهب بن جرير: حدثنا أبي عن يحيى بن أيوب عن يزيد ابن أبي حبيب عن أبي سلمة عن أم سلمة: أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - أوصى عند وفاته فقال ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح لا أعرف له علة؛ فإن رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين؛ غير شيخي الطبراني، لكن الأول منهما زكريا الساجي؛ فهو ثقة حافظ مترجم في `تذكرة الحفاظ `، وقال في `الميزان `:
`أحد الأثبات، ما عرفت فيه جرحاً أصلاً `.
وشيخه `بُندار` اسمه محمد بن بشار أبو بكر، وقد تابعه محمد بن المثنى،
وهو المعروف بـ `الزَّمِن `، وكلاهما من رجالهما، قال الحافظ في `التقريب `:
`وكان هو و`بندار` فَرَسَيْ رهان، وماتا في سنة واحدة`.
لكن الراوي عنه محمد بن صالح النرسي لم أجد له ترجمة، وقد روى له الطبراني في `المعجم الصغير` حديثاً واحداً (129/
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ওফাতের সময় উপদেশ দিয়ে বললেন:
"মিশরের কিবতিদের (খ্রিস্টান) ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো, আল্লাহকে ভয় করো (তাদের সাথে সদ্ব্যবহার করো)! কেননা তোমরা তাদের উপর অবশ্যই কর্তৃত্ব লাভ করবে, আর তারা তোমাদের জন্য আল্লাহর পথে শক্তি ও সাহায্যকারী হবে।"
3114 - (إن سَرَّك أنْ تفي بنذْركِ؛ فأعتقي مُحَرَّراً من هؤلاء. يعني: من بني العَنْبرِ) .
أخرجه مسلم (7/181) - ولم يسق لفظه - ، والحاكم (4/84) ، والبيهقي (9/75) من طريق مسلمة بن علقمة المازني عن داود بن أبي هند عن عامر عن أبي هريرة رضي الله عنه قال:
ثلاث سمعتهن لبني تميم من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ لا أبغض بني تميم بعدهن أبداً:
كان على عائشة رضي الله عنها نذرُ محرَّر من ولد إسماعيل، فسُبِيَ سَبْيٌّ من بني العنبر، فلما جيء بذلك السبي، قال لها رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكر الحديث وقال: فجعلهم من ولد إسماعيل.
وجيء بنَعَم من نعم الصدقة، فلما رآه راعه حسنه قال: فقال:
`هذا نَعَمُ قومي `، فجعلهم قومه، قال: وقال:
`هم أشد قتالاً في الملاحم `.
وقال الحاكم:
`حديث صحيح على شرط مسلم `.
وبيض له الذهبي، ولعل الحاكم إنما استدركه على مسلم؛ لأنه لم يسقه بتمامه وإنما ساق منه جملة الملاحم، وأحال سائره على حديث قبله من رواية أبي زرعة قال: قال أبو هريرة ... فذكر الحديث بتمامه نحوه. وقال في الجملة:
`هم أشد أمتي على الدجال `.
وهكذا أخرجه البخاري (2543 و 4366) ، وأبو يعلى في `مسنده ` (10/493/6108) ، ومن طريقه: البيهقي (7/11) .
وأخرجه أحمد (2/390) مختصراً بلفظ:
`هذه صدقة قومي، وهم أشد الناس على الدجال. يعني: بني تميم `.
قال أبو هريرة: ما كان قوم من الأحياء أبغض إلي منهم، فأحببتهم منذ سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول هذا.
وحديث الترجمة له شاهدان:
أحدهما: من حديث ابن عمر، بسند حسن، وصححه الحافظ ابن حجر في `مختصر الزوائد ` (2/382) .
والآخر: من حديث ابن مسعود، بسند ضعيف.
رواهما البزار، وهما مخرجان في الكتاب الآخر (5731) . *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট থেকে বনু তামিম গোত্র সম্পর্কে আমি তিনটি কথা শুনেছি। এরপর থেকে আমি তাদের প্রতি আর কখনো ঘৃণা পোষণ করিনি।
১. আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশোদ্ভূত একজন দাস মুক্ত করার মানত ছিল। একবার বনু আনবার গোত্রের কিছু যুদ্ধবন্দীকে (দাসী-দাস) ধরে আনা হলো। যখন সেই বন্দীদের আনা হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে (আয়িশা রাঃ-কে) বললেন: **"যদি তোমার মানত পূর্ণ করা তোমাকে আনন্দিত করে, তবে এদের (অর্থাৎ বনু আনবার গোত্রের) মধ্য থেকে একজন মুক্ত করে দাও।"** এভাবে তিনি তাদের (বনু আনবারকে) ইসমাঈল (আঃ)-এর বংশধর বলে গণ্য করলেন।
২. একবার সাদাকার (যাকাতের) কিছু পশু আনা হলো। যখন তিনি সেগুলোর সৌন্দর্য দেখে মুগ্ধ হলেন, তখন বললেন: "এগুলো আমার কওমের পশু।" এভাবে তিনি তাদের তাঁর কওম হিসেবে গণ্য করলেন।
৩. তিনি আরও বললেন: "মহা যুদ্ধসমূহে (আল-মালাহিম) তারা (বনু তামিম) হবে সবচেয়ে কঠোর যোদ্ধা।"
3115 - (كان في الكعبة صورٌ، فأمَرَ عمر بن الخطاب أنْ يمحوَها، فَبَلَّ عمرُ ثوباً ومحاها به، فدخلها - صلى الله عليه وسلم - وما فيها من شيءٍ) .
أخرجه أحمد (3/396) : ثنا سليمان بن داود: حدثنا عبد الرحمن عن موسى بن عقبة عن أبي الزبير عن جابر قال ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد على شرط مسلم، وأبو الزبير قد صرح بالتحديث وتوبع كما يأتي؛ فقال أحمد (3/383) : ثنا روح: ثنا ابن جريج: أخبرني أبو الزبير: أنه سمع جابر بن عبد الله يقول ... فذكره بنحوه.
وهذا إسناد متصل صحيح.
ثم أخرجه أحمد (3/335) ، والبيهقي في `دلائل النبوة` (5/73) من طريقين آخرين عن ابن جريح به.
وتابعه ابن لهيعة: ثنا أبو الزبير به.
أخرجه أحمد (3/336) .
وتابعه وهب عن جابر به.
أخرجه ابن سعد في `الطبقات ` (2/142) بسند جيد عن وهب، وهو ابن مُنَبَّه اليماني، وهو تابعي ثقة من رجال الشيخين.
وللحديث شاهدان مختصران:
أحدهما: عن صفية بنت شيبة قالت:
رأيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - بَلَّ ثوباً وهو في الكعبة، ثم جعل يضرب التصاوير التي فيها.
أخرجه الطبراني `المعجم الكبير` (24/323/811) : حدثنا جعفر بن الفضل المُخَرَّمي المؤدب: ثنا داود بن عبد الله بن أبي الكرام الجعفري: ثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي عن منصور بن صفية بنت شيبة عن أمه..
وهذا إسناد حسن رجاله صدوقون مترجمون في `التهذيب ` غير جعفر هذا، أورده الخطيب في `تاريخ بغداد` (7/194) برواية الطبراني فقط عنه، وساق له حديثاً آخر، رواه في ` المعجم الصغير` (
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
কা’বা শরীফের ভেতরে কিছু ছবি ছিল। তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেগুলোকে মুছে ফেলার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একটি কাপড় ভিজিয়ে নিলেন এবং তা দিয়ে ছবিগুলো মুছে দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) কা’বার ভেতরে প্রবেশ করলেন, যখন তার মধ্যে (কোনো ছবি বা আপত্তিকর) কিছুই অবশিষ্ট ছিল না।
3116 - (كان يستَحبُّ للرجل أن يقاتل تحت راية قومه) .
أخرجه أحمد (4/263) قال: ثنا يحيى بن عبد الملك بن أبي غَنِيَّة قال: حدثنا عقبة بن المغيرة عن جد أبيه المخارق قال:
لقيت عماراً يوم الجمل، وهو يبول في قرن؛ فقلت: أقاتل معك فأكون معك؟ فقال:
قاتل تحت راية قومك؛ فإن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - كان ... الحديث.
وأخرجه أبو يعلى في `مسنده ` (3/206/1641) : حدثنا عبد الله بن عمر بن أبان: حدثنا ابن أبي غنية به؛ إلا أنه أدخل واسطة بين عقبة والجد، فقال: `عمن حدثه عن جد أبيه.. `.
قلت: وهذه الزيادة أقرب إلى الصواب، ولعل ابن أبي غنية كان يضطرب في إسناده؛ فيذكرها أحياناً، وتسقط عنه أحياناً؛ فإنه - وإن كان ثقة، واحتج به مسلم، وخرج له البخاري مقروناً بآخر؛ كما في `الميزان ` ـ؛ فقد قال ابن عدي في `الكامل ` (7/210) :
`بعض ما يرويه لا يتابع عليه، وهو ممن يكتب حديثه `.
أضف إلى ذلك أن السَّقط لا يمكن أن ينسب إلى الإمام أحمد؛ لأنه إمام في الحفظ والضبط، ولأن الذي روى الزيادة عنه - وهو ابن أبان - ثقة أيضاً.
وإنما قلنا: إن الزيادة أقرب إلى الصواب؛ لأنه قد توبع عليها في الجملة؛ فقد رواه البخاري في ` التاريخ ` (4/1/430/1890) ، والبزار (2/278/1700) من طريقين عن عقبة بن المغيرة قال: حدثني إسحاق بن أبي إسحاق الشيباني عن أبيه عن المخارق بن سليم قال:
`رأيت عماراً يوم الجمل.. `. الحديث.
وقال البزار:
`لا نعلمه عن النبي - صلى الله عليه وسلم - إلا بهذا الإسناد`.
قلت: وهو حسن إن شاء الله تعالى، ولا بد من الكلام على رجاله ولو بإيجاز بعد أن اتفق الثقتان عليه، فأقول:
أما عقبة بن المغيرة؛ فهو صدوق، وثقه ابن حبان، وروى عنه جمع، كما كنت حققته في `الضعيفة` تحت الحديث (6035) .
ونحوه شيخه إسحاق بن أبي إسحاق الشيباني، كما تراه هناك.
وأما أبوه - واسمه سليمان بن أبي سليمان الشيباني - ؛ فثقة من رجال الشيخين.
وأما المخارق بن سُليم - وهو الشيباني - فهو تابعي كما في هذه الرواية، وصرح بذلك ابن حبان فذكره في `ثقات التابعين ` (5/444) برواية ابنه عبد الله عنه. وزاد في `التهذيب ` ابناً ثانياً عنه: قابوس. وظاهر صنيعه أنه لم يفرق بين المخارق ابن سليم الشيباني هذا الذي روى عنه أبو إسحاق الشيباني وبين مخارق أبي قابوس، وعنه ابنه قابوس. وقد ذكرهما البخاري في موضعين وابن أبي حاتم، خلافاً لابن حبان؛ فإنه ذكر في ترجمة أبي قابوس أنه روى عن علي وعمار، وهذا ذكره ابن أبي حاتم في الشيباني. وقال الحافظ في `التقريب `:
`مخارق بن سُليم الشيباني أبو قابوس، مختلف في صحبته، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين `.
وأما الذهبي؛ فجزم في `الكاشف ` بأنه صحابي!
قلت: فمثله حسن الحديث إن شاء الله تعالى.
والحديث قال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (5/326) :
`رواه أحمد - وإسناده منقطع - ، وأبو يعلى، والبزار، والطبراني، وفيه إسحاق ابن أبي إسحاق الشيباني، روى عنه جماعة، ولم يضعفه أحد، وبقية أحد أسانيد الطبراني ثقات `. *
মাখারিক ইবনে সুলাইম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত:
আমি জামাল যুদ্ধের দিন আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তখন তিনি একটি পাত্রে পেশাব করছিলেন। আমি বললাম, আমি কি আপনার সাথে যুদ্ধ করব এবং আপনার সাথে থাকব?
তিনি বললেন, তুমি তোমার নিজ গোত্রের পতাকার নিচে যুদ্ধ করো। কেননা, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এটা পছন্দনীয় ছিল যে, কোনো ব্যক্তি যেন তার নিজ গোত্রের পতাকার নিচে থেকে লড়াই করে।
3117 - (إنْ لمْ تجدِيني فَأتي أبا بكرٍ) .
أخرجه البخاري (3659 و7220 و360) ، ومسلم (7/110) ، والترمذي (3677) وصححه، وابن حبان (8/226/6622) ، والطيالسي في `مسنده ` (944) ، وكذا أحمد (4/82 و 83) ، وأبو يعلى (13/399/7402) ، وعنه ابن
حبان أيضاً (9/12/6832) ، وابن أبي عاصم في `السنة` (2/547/1151) ، والبيهقي في `السنن ` (8/153) من حديث جبير بن مطعم قال:
أتت امرأة النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فأمرها أن ترجع إليه، قالت: أرأيت إن جئتُ ولم أجدكَ؟ كأنها تقول الموت، قال - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره. *
জুবাইর ইবনে মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
এক মহিলা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর কাছে এলেন। তিনি তাকে (পরে) আবার তাঁর কাছে ফিরে আসার নির্দেশ দিলেন। মহিলাটি জিজ্ঞেস করলেন, "আপনি কি মনে করেন, যদি আমি আসি এবং আপনাকে না পাই?" (বর্ণনাকারী বলেন, যেন তিনি নাবীজীর মৃত্যুর ইঙ্গিত করছিলেন)। নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন, "যদি তুমি আমাকে না পাও, তবে আবূ বকরের কাছে যেও।"
3118 - (تَهجُمون على رجلٍ مُعتَجرٍ ببردٍ حَبِرَةٍ، يبايعُ الناسَ، من أهل الجنة)
أخرجه ابن أبي عاصم في `السنة` (2/290/1292) ، والحاكم (3/98) ، وابن عدي في `الكامل ` (3/393) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (9/
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তোমরা এমন একজন লোককে ঘিরে ধরেছ (বা আক্রমণ করতে উদ্যত হয়েছ), যিনি একটি মূল্যবান ডোরাকাটা চাদর দিয়ে (মাথা ও মুখ) মুড়িয়ে আছেন এবং লোকদের থেকে বাইয়াত গ্রহণ করছেন। তিনি জান্নাতের অধিবাসী।
3119 - (لَتَخْرُجَنَّ فتنةٌ من تحتِ قدمَيْ ـ أو بين رجلَيْ - هذا، (يعني: عثمان رضي الله عنه) ، هذا يومئذٍ ومن اتبعهُ على الهُدى) .
أخرجه أحمد (4/236) ، وابن أبي عاصم (2/591/1295) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (20/316/753) ، و`مسند الشاميين ` (2/394) من طرق عن معاوية عن سُليم بن عامر عن جُبَيْر بن نُفَيْرٍ قال:
كنا معسكِرِين مع معاوية بعد قتل عثمان رضي الله عنه، فقام كعب بن مرة
البهزي فقال: لولا شيء سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ما قمت هذا المقام، فلما سمع [معاوية] بذكر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - أجلس الناس، فقال:
بينما نحن عند رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ إذ مر عثمان بن عفان عليه مُرَجَّلاً [مُغدِفاُ] ، قال: فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره، قال: فقام ابن حوالة الأزدي من عند المنبر، فقال: إنك لصاحب هذا؟ قال: نعم، قال: والله! إني لحاضر ذلك المجلس، ولو علمت أن لي في الجيش مُصَدِّقاً؛ كنت أول متكلم به. والزيادتان للطبراني، واليه وحده عزاه الهيثمي في `المجمع ` (9/89) وقال:
` ورجاله وُثِّقوا `!
قلت: واسناد أحمد صحيح على شرط مسلم، ومعاوية: هو ابن صالح الحمصي، قال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق له أوهام `.
وله طريق ثان، يرويه وُهيب بن خالد: ثنا أيوب عن أبي قلابة عن أبي الأشعث قال:
قامت خطباء بـ (إيلياء) في إمارة معاوية رضي الله عنه؛ فتكلموا، وكان آخر من تكلم مُرَّةُ بن كعب، فقال: لولا حديث سمعته من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ما قمت ... فذكره مختصراً، وفيه:
`فمر رجل مُقنْع، فقال: `هذا يومئذ وأصحابه على الحق والهدى`، فقلت: هذا يا رسول الله - وأقبلت بوجهه إليه - ؟ فقال: `هذا`. فإذا هو عثمان رضي الله عنه `.
أخرجه أحمد أيضاً، والحاكم (3/102) وقال:
`صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
وتابعه عبد الوهاب الثقفي: حدثنا أيوب به.
أخرجه الترمذي (3705) وقال:
`حديث حسن صحيح `.
وخالفهما إسماعيل بن إبراهيم: ثنا أيوب عن أبي قلابة قال:
لما قُتل عثمان رضي الله عنه قام خطباء بـ (إيلياء) .. إلخ، لم يذكر في إسناده أبا الأشعث.
أخرجه أحمد (4/235) ، وابن أبي شيبة (12/41/12075) .
ورجاله ثقات أيضاً، وإسماعيل هذا هو ابن عُلَيَّة، لكن الموصول أصح، لاتفاق ثقتين عليه.
وله شاهد يرويه محمد بن سيرين عن كعب بن عُجرة قال:
ذكر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فتنة فقرَّبها، فمر رجل مقَنْغٌ رأسَه، فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : `هذا يومئذ على الهدى` فوثبت، فأخذت بضَبْعَيْ عثمان، ثم استقبلت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قلت: هذا؟ قال: هذا`.
أخرجه ابن ماجه (1/41/111) ، وابن أبي شيبة (12/41/12074) ، وعنه ابن أبي عاصم (1297) ، وأحمد (4/242 و 243) من طريقين عنه.
ورجاله ثقات، فالسند صحيح إن كان محمد بن سيرين سمع من كعب بن عُجرة؛ فقد ذكروا أن أبا حاتم قال: لم يسمع منه، مع أن سنَّه يمكنه من السماع
منه فإنه ولد سنة (33) ، ومات كعب بعد الخمسين. فالله أعلم.
ثم وجدت للحديث طريقاً أخرى من طريق أبي سلمة سليمان بن سُليم عن ابن جابر قال:
اجتمع الناس ببيت المقدس، قد همُّوا أن يبايعوا معاوية بيعة على ما اجتمعت عليه الأمة، وفيهم عبد الله بن حوالة وكعب بن مرة، فقام عبد الله بن حوالة فقال ... فذكر الحديث نحو رواية جبير بن نفير، إلا أنه جعل الخطيب الأول ابن حوالة كما ترى، وكعباً الخطيب الآخر.
أخرجه ابن أبي عاصم (1293) .
ورجاله ثقات؛ إلا أنه منقطع؛ لأن ابن جابر - وهو يحيى الطائي الحمصي - تابع تابعي؛ لم يدرك أحداً من الصحابة. *
কাব ইবনে মুররা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকটে ছিলাম। এমন সময় উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পরিপাটি অবস্থায় (বা মাথা ঢাকা অবস্থায়) আমাদের পাশ দিয়ে অতিক্রম করলেন।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “অবশ্যই এই লোকটির (অর্থাৎ, উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) দুই পায়ের মধ্যখান থেকে—অথবা তিনি বলেছেন, দুই পায়ের নিচ থেকে—একটি মহা ফিতনা বা বিপর্যয় বের হবে। সেই দিন এই ব্যক্তি এবং যারা তাঁর অনুসরণ করবে, তারা হিদায়াত ও সত্যের উপর থাকবে।”
(অপর এক বর্ণনায় এসেছে, সাহাবী প্রশ্ন করলেন: “হে আল্লাহর রাসূল! এই লোকটি?” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “হ্যাঁ।” তখন দেখা গেল তিনি হলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।)
3120 - (إذا تغوَّط الرَّجُلانِ، فليَتَوارَ كلَّ واحدٍ منهما عن صاحبِهِ، ولا يتحدَّثان على طوفِهِما، فإن الله يَمقُتُ على ذلك) .
قال أبو علي بن السكن: حدثني يحيى بن محمد بن صاعد: حدثنا الحسن ابن أحمد بن أبي شعيب الحراني: حدثنا مسكين بن بكير عن الأوزاعي عن يحيى بن أبي كثير عن محمد بن عبد الرحمن عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
كذا في `الوهم والإيهام ` (2/142/2) لابن القطان، وقال:
`قال ابن السكن: رواه عكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال بن عياض عن أبي سعيد عن النبي - صلى الله عليه وسلم - ، وأرجو أن يكونا صحيحين `.
وقال ابن القطان عقبه:
`وليس فيه تصحيح حديث أبي سعيد الذي فَرغْنَا من تعليله، وإنما يعني أن القولين عن يحيى بن أبي كثير صحيحان، وصدق في ذلك؛ صح عن يحيى بن أبي كثير أنه قال: عن محمد بن عبد الرحمن عن جابر، وأنه قال: عن عياض أو [هلال بن عياض، عن أبي سعيد الخدري. ولا يمكن أن يصحح ابن السكن حديث أبي سعيد] (¬1) أصلاً، ولو فعل، كان [ذلك خطأ من القول، وإنما يصح من حديث جابر] (1) ، ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان ثقة، وقد صح سماعه من جابر، وقد بينا ذلك فيما تقدم، ومسكين بن بكير أبو عبد الرحمن الحذاء لا بأس به؛ قاله ابن معين، وهذا اللفظ هو منه مؤنَس بين ذلك بنفسه، وبين أنه إذا قال في رجل: لا بأس به، فهو عنده ثقة، (¬2) وكذا قال فيه أبو حاتم.
والحسن بن أحمد بن أبي شعيب أبو مسلم: صدوق لا بأس به.
وسائر من في الإسناد لا يسأل عنه، وعن يحيى بن أبي كثير`.
قلت: وخلاصة تحقيق ابن القطان هذا أن الحديث من هذه الطريق جيد، وهو ما صرح به قبل أن يسوق إسناده، وبعد أن تكلم طويلاً على طريق عكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال بن عياض - وفي رواية: عياض بن أبي زهير - عن أبي سعيد، وأعله بالاضطراب في إسناده ومتنه، وجهالة عياض هذا، ومن أجل ذلك كنت أوردته في `ضعيف أبي داود` برقم (3) ، وبسطتُ القول فيه
¬_________
(¬1) في `الأصل ` المخطوط بياضٌ، ثم استدركناه من مطبوعته (5/260) حيث استدركه محققه - جزاه الله خيراً - .
(¬2) انظر `الرفع والتكميل في الجرح والتعديل ` لأبي الحسنات اللكنوي (ص 100) .
في اضطراب إسناده؛ وجهالة راويه عياض، ومن ذلك أنه روي عن عكرمة عن يحيى عن أبي سلمة عن أبي هريرة.
والآن وقد أوقفنا ابن القطان - جزاه الله خيراً - على هذا السند الجيد من غير طريق عكرمة بن عمار، فقد وجب نقله من `ضعيف أبي داود`، إلى `صحيح أبي داود` ومن `ضعيف الجامع ` إلى `صحيح الجامع `، و`ضعيف الترغيب ` إلى `صحيح الترغيب `، و`ضعيف ابن ماجه ` إلى `صحيح ابن ماجه `، ولفظه ولفظ أبي داود وغيرهما من طريق عكرمة نحو حديث الترجمة.
ثم وجدته في `تاريخ بغداد` (12/122) من طريق عبد الملك بن الصباح: حدثنا الأوزاعي عن يحيى، وعكرمة بن عمار عن يحيى بن أبي كثير عن هلال ابن عياض عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً بلفظ:
`إذا تغوط الرجلان.. ` الحديث.
ثم وجدت له طريقاً أخرى عن أبي سعيد، لكن فيها متهم بالوضع فلا يُفرح بها، أذكرها للعلم: أخرجه الدارقطني في `غرائب مالك ` من طريق محمد بن يوسف بن يعقوب الرازي قال: ثنا إدريس بن علي الرازي قال: ثنا يحيى ابن الضُّرَيْس قال: ثنا مالك عن زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد ... رفعه مثله. وقال الدارقطني:
`لا يصح عن عطاء، ولا عن زيد، ولا عن مالك، والمتهم بوضعه محمد بن يوسف، وكان يضع الأحاديث `.
ذكره الحافظ في ترجمة ابن يوسف هذا من `اللسان `.
وله شاهد من حديث خلاد بن السائب الجُهَني عن أبيه مرفوعاً نحوه،
سيأتي الكلام عليه تحت الحديث (3316) ، وبه يزداد الحديث قوة على قوة. *
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"যখন দুই ব্যক্তি মলত্যাগ করতে বসে, তখন তাদের প্রত্যেকে যেন তার সাথী থেকে আড়াল হয়ে যায় (অর্থাৎ দূরে সরে যায়)। আর তারা যেন মলত্যাগের সময় পরস্পরের সাথে কথাবার্তা না বলে। কারণ, আল্লাহ তাআলা এই কাজের ওপর অসন্তুষ্ট হন।"