হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3161)


3161 - (أعْتِقْها؟ فإنَّها مؤْمِنَةٌ. يعني: الجاريةَ التي شَهِدَتْ بأنَّ
اللهَ في السماء)




মু’আবিয়াহ ইবনু হাকাম আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—

"...তাকে মুক্ত করে দাও (বা আযাদ করে দাও)। কারণ, সে অবশ্যই ঈমানদার (মু’মিন)। (এখানে উদ্দেশ্য হলো) সেই দাসী, যে সাক্ষ্য দিয়েছিল যে আল্লাহ্ আসমানে (ঊর্ধ্বে) রয়েছেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3162)


3162 - (أَعطاني - صلى الله عليه وسلم - شَيئاً من تمر، فجعلتُه في مِكْتَلِ لنا، فعلّقناه
في سَقْفِ البيتِ، فلمْ نَزَل نأكلُ منه؛ حتَّى كانَ آخرُهُ أصابَهُ أهلُ الشام حيثُ أغارُوا على المدينةِ) .
أخرجه أحمد في `المسند` (2/324) : ثنا أبو عامر: ثنا إسماعيل - يعني:
ابن مسلم - عن أبي المتوكل عن أبي هريرة قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات رجال مسلم، وأبو عامر هو عبد الملك بن عمرو القيسي العَقَدي.
وأبو المتوكل: اسمه علي بن داود الناجي، ثقة اتفاقاً، وقد احتج به الشيخان وغيرهما، وقد ذكروا له رواية عن جمع من الصحابة غير أبي هريرة المتوفى سنة (59) ؛ مثل عائشة - رضي الله عنها - ، وقد توفيت قبله بسنتين، فضلاً عن غيرهما ممن تأخرت وفاته مثل ابن عباس وجابر وأم سلمة - رضي الله عنهم أجمعين - ، وروى له الترمذي حديثاً عن عائشة بلفظ:
`قام النبي - صلى الله عليه وسلم - بآية من القرآن `
ثم قال (2/100/448) :
`حديث حسن غريب من هذا الوجه `.
وهذا يعني - في اصطلاحه - أنه قوي لذاته، كما لا يخفى على العارفين بكتابه، كما روى له النسائي في `عمل اليوم والليلة` (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে কিছু খেজুর দান করলেন। আমি সেই খেজুর আমাদের একটি ঝুড়িতে রাখলাম এবং আমরা সেটি ঘরের চালে ঝুলিয়ে রাখলাম। আমরা সেখান থেকে সর্বদা খেতে থাকতাম। এমনকি এর শেষ অংশ অবশিষ্ট থাকা অবস্থায় যখন সিরিয়াবাসীরা (আহলে শাম) মদীনার ওপর আক্রমণ করল, তখন তারা তা (অর্থাৎ শেষ অবশিষ্ট খেজুর) নিয়ে গেল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3163)


3163 - (كانَ إذا خرجَ من بيته قال:
بسم الله، توكلتُ على الله، اللهمَّ! إنَّا نعوذُ بكَ أن نَزِلَّ (وفي رواية: أَزلَّ، أو أُزِلَّ..... بالإفراد في الأفعال كلها) ، أو نَضِلَّ، أو نَظلِمَ أو نُظْلمَ، أو نجهلَ أو يُجْهلَ علينا) .
هو من حديث أم سلمة - رضي الله تعالى عنها - : رواه عنها الشعبي، وعنه
منصور - وهو ابن المعتمر - وعنه جمع غفير من الثقات، فهو عنه متواتر، وإليك البيان:
الأول: سفيان الثوري - وهو أحفظهم - :
أخرجه الترمذي (9/126/3423) ، والنسائي في `السنن ` (2/322) ، و`عمل اليوم والليلة ` (176/87) ، وكذا ابن السني (72 1) ، والحاكم (1/519) ، وابن أبي شيبة في `المصنف ` (10/211/9250) ، وأحمد (6/306) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (23/320/727) وفي `الدعاء` (2/986/411) من طرق عنه، وقال الترمذي:
`حديث حسن صحيح `.
وقال الحاكم:
`صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، وربما توهم متوهم أن الشعبي لم يسمع من أم سلمة، وليس كذلك؛ فإنه دخل على عائشة وأم سلمة جميعاً؛ ثم أكثر الرواية عنهما جميعاً `.
كذا قال! وتعقبه الحافظ في `نتائج الأفكار` فقال عقبه (1/159) :
`وقد خالف ذلك في `علوم الحديث ` له، فقال: لم يسمع الشعبي من عائشة`.
قلت: هكذا قال الحاكم في `العلوم ` (ص 111) ، ولكن مما لا ريب فيه أن إثبات الحاكم مقدَّم على نفيه، ولا سيّما أن ما نفاه خاص بعائشة، وحديثه هنا عن أم سلمة، وقد تأخرت وفاتها عن وفاة عائشة خمس سنوات، فقد توفيت أم
سلمة سنة (62) على الأصح، وولد الشعبي في حدود سنة عشرين، فقد عاصرها وأدرك عمراً طيباً من حياتها، وقول الحافظ عقب ما تقدم:
`وقال علي بن المديني في كتاب `العلل `: لم يسمع الشعبي من أم سلمة، وعلى هذا فالحديث منقطع `:
أظنه قائماً على اشتراط ثبوت اللقاء الذي يقول به البخاري في ` صحيحه ` في ثبوت الاتصال، ولعله تلقى ذلك من شيخه ابن المديني، والجمهور يكتفون بثبوت المعاصرة، وهذا متحقق هنا كما تقدم، يضاف إلى ذلك ما جاء في ترجمة الشعبي: `أنه سمع من ثمانية وأربعين من الصحابة، وهو أكبر من أبي إسحاق بسنتين، وأبو إسحاق أكبر من عبد الملك بسنتين، ولا يكاد الشعبي يرسل إلا صحيحاً `.!
ذكره الحافظ في `التهذيب `، نقلاً عن العجلي، وأقره.
فلعله - أعني: الحافظ - من أجل هذا صدّر تخريجه للحديث بقوله:
`حديث حسن `.
وإلا؛ فحقه أن يقول - بناءً على حكمه بالانقطاع - :
`حديث ضعيف `! والله أعلم.
الثاني: شعبة بن الحجاج، قال الطيالسي في `مسنده ` (224/1607) :
حدثنا شعبة به.
ومن طريقه: أخرجه أبو داود (5/327/5094) ، والنسائي في `عمل اليوم والليلة ` (رقم 86) ، وأحمد (6/




উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর ঘর থেকে বের হতেন, তখন তিনি বলতেন:

“বিসমিল্লাহ, তাওয়াক্কালতু আলাল্লাহ, আল্লাহুম্মা! ইন্না না‘ঊযু বিকা আন নাযিল্লা আও নাদিল্লা, আও নাযলিমা আও নুজলামা, আও নাজহালা আও ইউজহালা ‘আলাইনা।”

অর্থ: “আল্লাহর নামে (বের হচ্ছি), আমি আল্লাহর উপর ভরসা করলাম। হে আল্লাহ! আমরা আপনার নিকট আশ্রয় চাই যেন আমরা পদস্খলিত না হই (বিপদগ্রস্ত না হই) কিংবা (অন্যের দ্বারা) পদস্খলিত না হই, অথবা আমরা যেন পথভ্রষ্ট না হই, অথবা আমরা যেন (কাউকে) জুলুম না করি কিংবা (কারও দ্বারা) অত্যাচারিত না হই, অথবা আমরা যেন মূর্খতাসুলভ আচরণ না করি কিংবা আমাদের প্রতি মূর্খতাসুলভ আচরণ করা না হয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3164)


3164 - (كان إذا جلسَ مَجْلِساً، أو صلَّى صلاة تكلَّمَ بكلماتٍ، فسألَتهُ عائشة عن الكلماتِ؟ فقال:
إن تكلّمَ بخيرٍ كان طابعاً عليهِنَّ إلى يومِ القيامةِ، وإن تكلَّمَ بغيرِ ذلكَ كان كفارةً له:
سبحانكَ اللهمَّ وبحمدِكَ، لا إلهَ إلا أنتَ، أستغفرُكَ وأتوبُ إليكَ) .
أخرجه النسائي في `عمل اليوم والليلة ` (309/400) ومن طريقه: الحافظ
في آخر كتابه `فتح الباري ` (13/546) : أخبرنا أبو بكر بن إسحاق: أخبرنا أبو سلمة الخُزَاعي منصور بن سَلَمة: أنا خلاد بن سليمان - قال أبو سلمة: وكان من
الخائفين - عن خالد بن أبي عمران عن عروة عن عائشة مرفوعاً.
وأخرجه البيهقي في `شعب الإيمان ` (1/435/629) من طريق أخرى عن محمد بن إسحاق الصغاني به.
وأخرجه أحمد (6/77) : ثنا أبو سلمة به.
وأخرجه الطبراني في `الدعاء` (3/




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো মজলিসে বসতেন অথবা কোনো সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি কিছু কালিমা (কথা) বলতেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সেই কালিমাগুলো সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি (নবী সাঃ) বললেন: যদি (ঐ মজলিসে) উত্তম কথা বলা হয়ে থাকে, তবে তা কিয়ামত দিবস পর্যন্ত সেগুলোর ওপর মোহর (স্বাক্ষর) স্বরূপ হবে। আর যদি এর ব্যতীত অন্য কিছু বলা হয়ে থাকে, তবে তা তার জন্য কাফফারা হবে। (সেই কালিমাগুলো হলো):

“সুবহানাকা আল্লাহুম্মা ওয়া বিহামদিকা, লা ইলাহা ইল্লা আন্তা, আসতাগফিরুকা ওয়া আতুবু ইলাইকা।” (হে আল্লাহ! আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করছি এবং আপনার প্রশংসা করছি। আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। আমি আপনার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করছি এবং আপনার দিকেই তওবা করছি।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3165)


3165 - (إنَّها ستكونُ فتنةٌ. فقالوا: كيف لنا يا رسول الله؟! أو كيف نصنعُ؟ قال:
ترجعون إلى أمْرِكم الأوَّلِ) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (3/




(রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"নিশ্চয়ই একটি ফিতনা (বিপর্যয়) দেখা দেবে।"

সাহাবীগণ জিজ্ঞাসা করলেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তখন আমাদের কী করণীয়? অথবা, আমরা কী করব?"

তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের প্রথম (পূর্ববর্তী) অবস্থার দিকে ফিরে যাবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3166)


3166 - (آخى - صلى الله عليه وسلم - بَين الزُّبَيرِ وبينَ عبْدِ اللهِ بْنِ مَسْعود) .
أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (568) ، والبيهقي في `السنن ` (6/262) من طريقين عن حماد بن سلمة عن ثابت عن أنس به.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم والحاكم، فالعجب منه كيف لم يستدركه عليه؟! وكذلك غفل عنه الحافظ في `الفتح ` (7/271) فلم يذكره من حديث أنس، وإنما من حديث ابن عباس مَعْزُوّاً للحاكم وابن عبد البر بسند حسن.
فأقول: أخرجه الحاكم (3/314) ، والطبراني في `الكبير` (12/179/
12816) و`الأوسط ` (1/53/ 1/915) من طريق سعيد بن سليمان الواسطي: ثنا عَبَّاد بق العَوَّام عن سفيان بن حسين عن يعلى بن مسلم عن جابر بن زيد عن ابن عباس قال: ... فذكره. وقال الحاكم:
`صحيح الإسناد`، ووافقه الذهبي.
وأقول: بل هو صحيح على شرط مسلم؛ فإن رجاله كلهم ثقات من رجال
الشيخين؛ إلا أن البخاري إنما أخرج لسفيان بن حسين تعليقاً كما في `تقريب الحافظ `، وقال فيه:
`ثقة في غير الزهري باتفاقهم `.
قلت: وهذا عن غير الزهري كما ترى، فلا أدري لماذا اقتصر الحافظ على تحسينه فقط، وسائر رجال الإسناد ثقات رجال الشيخين كما تقدم، وقد وثقهم جميعاً الحافظ في `تقريبه `؟!
وقد أخرجه الضياء المقدسي في `الأحاديث المختارة` (58/189/2) من طريق أبي نعيم والطبراني.
(فائدة) : قال ابن عبد البر: `كانت المؤاخاة مرتين: مرة بين المهاجرين خاصة، وذلك بمكة، ومرة بين المهاجرين والأنصار`.
ومن الأدلة على المؤاخاة الأولى هذا الحديث الصحيح؛ لأن الزبير وابن مسعود من المهاجرين كما هو معلوم، والظاهر أن شيخ الإسلام ابن تيمية - رحمه الله - لم يقف على هذا الحديث ونحوه؛ فأنكر هذه المؤاخاة (11/




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব বন্ধন (মুআখা) স্থাপন করেছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3167)


3167 - (بُعثَ موسى عليه السلامُ وهو راعي غنمٍ، وبُعثَ داودُ
عليه السلامُ وهو راعي غنمٍ، وبُعثتُ أنا وأنا راعي غنمٍ بأَجيادَ) .
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (3/2/




মূসা (আলাইহিস সালাম)-কে নবুওয়ত দিয়ে প্রেরণ করা হয়েছিল যখন তিনি মেষপালক ছিলেন। দাউদ (আলাইহিস সালাম)-কেও প্রেরণ করা হয়েছিল যখন তিনি মেষপালক ছিলেন। আর আমাকেও প্রেরণ করা হয়েছে যখন আমি আজিয়াদ (নামক স্থানে) মেষপালক ছিলাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3168)


3168 - (إنَّ سبحان اللهِ، والحمدُ للهِ، ولا إله إلا اللهُ، واللهُ أكبرُ
تنفضُ الخطايا كما تنفضُ الشجرةُ ورقَها) .
أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (634) ، وأحمد (3/152) ، والحارث
ابن أبي أسامة في `مسنده/ زوائده ` (ق 124/2) من طريق عبد الوارث قال: حدثنا أبو ربيعة سنان قال: حدثنا أنس بن مالك قال:
أخذالنبي - صلى الله عليه وسلم - غصناً فنفضه، فلم ينتفض، ثم نفضه فلم ينتفض، ثم
نفضه، فانتفض، فقال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن؛ سنان هو ابن ربيعة الباهلي، مختلف فيه، فلا
ينزل حديثه عن مرتبة الحسن، قال الذهبي في `الكاشف `:
`صدوق، وقال ابن معين: ليس بالقوي، وقرنه البخاري بآخر`.
وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق فيه لين، أخرج له البخاري مقروناً`.
وللحديث طريق آخر، يرويه الفضل بن موسى عن الأعمش عن أنس به.
أخرجه الترمذي (3527) ، وأبو نعيم في `الحلية ` (5/55) ، وأبو القاسم الأصبهاني في `الترغيب ` (1/317/ 721) ، وقال الترمذي:
`حديث غريب، ولا نعرف للأعمش سماعاً من أنس، إلا أنه قد رآه `.
قلت: الأعمش مدلس، فلا ندري عمَّن تلقاه! ولكنه لا يضعِّف رواية سنان
إن لم يقوِّها.
(تنبيه) : قوله: `فانتفض`، هكذا هو في كل المصادر المتقدمة في الرواية الأولى لفظاً؛ وفي الأخرى معنى، وهو الذي يقتضيه التشبيه المذكور في آخر الحديث كما هو ظاهر، إلا رواية `الأدب `؛ فقد وقع فيه: `فلم ينتفض ` كما في المرة الأولى والثانية، ومن الواضح أنه خطأ من الناسخ، فمن الغريب أن يخفى
ذلك على شارحه الجيلاني؛ فلا ينبه عليه في `شرحه `! *




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ডাল হাতে নিলেন এবং তা ঝাড়লেন, কিন্তু পাতা ঝরল না। তিনি দ্বিতীয়বার ঝাড়লেন, তখনও পাতা ঝরল না। তিনি তৃতীয়বার ঝাড়লে পাতা ঝরে পড়ল। অতঃপর তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই ‘সুবহানাল্লাহ’, ‘আলহামদুলিল্লাহ’, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু’ এবং ‘আল্লাহু আকবার’ — এই বাক্যগুলো গুনাহসমূহকে সেভাবে ঝেড়ে ফেলে দেয়, যেভাবে গাছ তার পাতা ঝেড়ে ফেলে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3169)


3169 - (رأيتُ ربِّي في أحسنِ صورةٍ، فقال: فيمَ يختصمُ الملأُ الأعلى، فقلت: لا أدري، فوضع يده بين كتفيَّ، حتَّى وجدتُ بردَ
أنامِله، ثمَّ قالَ: فيم يختصمُ الملأ الأعلى؟ قلتُ: في الكفَّارات
والدرجات، قال: وما الكفَّارات؟ قلت: إسباغُ الوضوءِ في السّبَرات،
ونقلُ الأقدام إلى الجماعاتِ، وانتظارُ الصلاةِ بعدَ الصلاة، قال: فما
الدرجاتُ؟ قلتُ: إطعامُ الطعامِ، وإفشاءُ السلامِ، وصلاةٌ بالليل
والناسُ نيام، قال: قل، قال: قلتُ: ما أقولُ؟ قالَ: قلِ: اللهمّ! إنِّي
أسألك عَمَلاً بالحسناتِ، وتركاً للمنكراتِ، وإذا أردتَ في قومٍ فتنةً
وأنا فيهم؛ فاقبضني إليكَ غيرَ مفتونٍ)
أخرجه الطبراني في `الدعاء` (3/1462/1416) : حدثنا الحسن بن علي المعمَري: ثنا سليمان بن محمد المُباركي: ثنا حماد بن دُليلٍ عن سفيان بن سعيد الثوري عن قيس بن مسلم عن طارق بن شهاب، أو عبد الرحمن بن سابط. قال حماد بن دُليلٍ: وحدثني الحسن بن صالح بن حَيٍّ عن عمرو بن مُرَّة عن
عبد الرحمن بن سابط عن أبي ثعلبة الخُشَنِي عن أبي عُبَيدة بن الجراح - رضي الله عنه - عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
وأخرجه الخطيب في `التاريخ ` (8/ 151) من طريق الطبراني، ولكنه زاد في أوله:
`لما كان ليلة أسري بي رأيت ربي ... ` الحديث.
وهذه الزيادة شاذة؛ لمخالفتها لكتاب الطبراني أولاً، ولأن الخطيب عقب عليها
من طريق أخرى عن محمد بن علي بن المديني: حدثنا أبو داود المباركي به.
وابن المديني هذا لم أعرفه، لكن تابعه الحسن بن علي المعمري كما تقدم،
وهو من شيوخ الطبراني الثقات، ومن فوقه ثقات من رجال مسلم، غير حماد بن دُليل، وهو صدوق كما في ` التقريب `، وقال الذهبي في ` الكاشف `:
`ثقة، جاور`، فالسند صحيح.
وقد جاء الحديث من طرق أخرى، صحح بعضها البخاري والترمذي، وفيها
أن ذلك كان رؤيا منامية، وذلك مما يؤكد شذوذ تلك الزيادة فتنبه! وراجع بعض تلك الطرق في `ظلال الجنة` 3881 و




আবু উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
আমি আমার রবকে সর্বোত্তম আকৃতিতে দেখেছি। তিনি বললেন: ঊর্ধ্ব জগতের ফেরেশতারা কী নিয়ে বিতর্ক করছে? আমি বললাম: আমি জানি না। অতঃপর তিনি তাঁর হাত আমার দুই কাঁধের মাঝখানে রাখলেন, এমনকি আমি তাঁর আঙুলের শীতলতা আমার বুকে অনুভব করলাম। এরপর তিনি আবার বললেন: ঊর্ধ্ব জগতের ফেরেশতারা কী নিয়ে বিতর্ক করছে? আমি বললাম: কাফফারাসমূহ (পাপ মোচনকারী কাজ) এবং মর্যাদাসমূহ (জান্নাতে উচ্চ স্তর) নিয়ে। তিনি বললেন: কাফফারাসমূহ কী? আমি বললাম: কষ্টের সময়েও (যেমন তীব্র শীতকালে) ভালোভাবে ওযু করা, জামা‘আতে সালাতের জন্য কদমে কদমে হেঁটে যাওয়া এবং এক সালাতের পর আরেক সালাতের (জন্য) অপেক্ষায় থাকা। তিনি বললেন: আর মর্যাদাসমূহ কী? আমি বললাম: খাদ্য খাওয়ানো, ব্যাপকভাবে সালামের প্রচার করা এবং রাতে যখন মানুষ ঘুমিয়ে থাকে, তখন সালাত আদায় করা। তিনি বললেন: তুমি বলো। বর্ণনাকারী বলেন: আমি বললাম: কী বলবো? তিনি বললেন: তুমি বলো:
‘আল্লাহুম্মা! ইন্নি আসআলুকা আমলান বিল-হাসানাতি, ওয়া তারকান লিল-মুনকারাতি, ওয়া ইযা আরাত্তা ফি ক্বাওমিন ফিতনাতান ওয়া আনা ফীহিম; ফাক্ববিদ্নি ইলাইকা গাইরা মাফতূন।’
(অর্থাৎ) ‘হে আল্লাহ! আমি আপনার কাছে উত্তম কাজ করার এবং মন্দ কাজ পরিহার করার তাওফীক চাই। আর যখন আপনি কোনো কওমকে ফিতনায় (বিপর্যয়ে) ফেলার ইচ্ছা করেন, আর আমি তাদের মাঝে থাকি, তখন আপনি আমাকে ফিতনামুক্ত অবস্থায় আপনার দিকে তুলে নিন (মৃত্যু দিন)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3170)


3170 - (كان يدعوُ ربَّه فيقولُ:
اللهمَّ! متِّعني بسمعِي وبصري، واجعلهُمَا الوارث منِّي، وانصرني
على من ظَلَمني، وخذ منهُ بثأرِي) .
روي عن جمع من الصحابة، منهم أبو هريرة، وجابر بن عبد الله، وعلي بن
أبي طالب، وعائشة، وسعد بن زرارة، وأنس بن مالك، وعبد الله بن الشِّخِّيرِ.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রবের কাছে দু’আ করতেন এবং বলতেন:

"হে আল্লাহ! আমাকে আমার শ্রবণশক্তি ও দৃষ্টিশক্তি দ্বারা উপকৃত করুন, এবং এ দুটিকে আমার স্থলাভিষিক্ত করুন (অর্থাৎ আমার মৃত্যুর আগ পর্যন্ত অক্ষুণ্ণ রাখুন)। যে আমার ওপর জুলুম করেছে, তার বিরুদ্ধে আমাকে সাহায্য করুন এবং তার কাছ থেকে আমার প্রতিশোধ গ্রহণ করুন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3171)


3171 - (أتريدُ أن تكون فتّاناً يا معاذُ؟! إذا أمَمتَ الناس فاقرأ
ب (والشمسِ وضُحاها) و (سبِّحِ اسمَ ربِّك الأعلى) و (والليلِ إذا
يغشى) و (اقرأ باسمِ ربِّك)) .
هو من حديث جابر بن عبد الله رضي الله عنهما، ورواه عنه جمع بألفاظ مختلفة، منهم المطول، ومنهم المختصر، وهذا لفظ أبي الزبير، يرويه عنه الليث بن سعد.
أخرجه مسلم (2/42) ، والنسائي (1/155) ، وابن ماجه (1/315/986) ،
وأبو عوانة (2/173) ، والبيهقي في `السنن ` (3/116) من طرق عن الليث عن أبي الزبير، عنه قال:
صلى معاذ بن جبل لأصحابه العشاء، فطول عليهم، فانصرف رجل منا، [فصلى] ، فأُخبر معاذ عنه، فقال: إنه منافق، فلما بلغ ذلك الرجل دخل على
النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فأخبره بما قال معاذ، فقال له النبي - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
وقرن البيهقيُّ ابن لهيعة مع الليث.
وتابع أبا الزبير: عمرُو بن دينار، فقال الحميدي في `مسنده ` (523/ 1246) :
ثنا سفيان قال؛ حدثنا عَمرُوكُم إن شاء الله قال: سمعت جابر بن عبد الله به
نحوه، وفيه:
`فتنحى رجل من خلفه، فصلى وحده `.
قال سفيان: فقلت لعمرو بن دينار: إن أبا الزبير يقول: قال النبي - صلى الله عليه وسلم - : `اقرأ
ب (سبح اسم ربك الأعلى) ... `؟ فقال عمرو: هو هذا أو نحو هذا.
وأخرجه أبو عوانة في `صحيحه ` (2/ 171) من طريق الحميدي، وكذا
البيهقي (3/112) .
وقال أحمد (3/308) : ثنا سفيان به، وكذا قال الشافعي في كتاب `الأم ` (1/




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু‘আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর সাথীদের নিয়ে ইশার সালাত আদায় করছিলেন এবং তিনি তা দীর্ঘায়িত করেন। তখন আমাদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি সরে গিয়ে একাকী সালাত আদায় করেন। অতঃপর মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এই ব্যক্তির ব্যাপারে জানানো হলে তিনি বললেন: ‘সে একজন মুনাফিক।’ যখন এই কথা সেই ব্যক্তির কাছে পৌঁছল, তখন সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য সম্পর্কে অবহিত করলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:
“হে মু‘আয! তুমি কি ফিতনা সৃষ্টিকারী হতে চাও?! যখন তুমি মানুষের ইমামতি করবে, তখন (তাদের জন্য) তুমি (সূরা) ওয়াশ-শামসি ওয়া দুহাহা, সাব্বিহিসমা রাব্বিকাল আ‘লা, ওয়াল-লাইলি ইযা ইয়াগশা এবং ইক্‌রা বিসমি রাব্বিকা (এই জাতীয় সূরাগুলো) দ্বারা ক্বিরাআত করবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3172)


3172 - (كانت (عائشةُ) تحتُّ المنِيَّ من ثوبه - صلى الله عليه وسلم - وهو يصلِّي) .
أخرجه ابن خزيمة في `صحيحه ` (1/147/290) : نا الحسن بن محمد: نا إسحاق - يعني: الأزرق - : نا محمد بن قيس عن محارب بن دِثار عن عائشة أنها كانت ... إلخ.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال `الصحيح `؛ محمد بن قيس هو الأسدي الوالِبي؛ وإسحاق هو ابن يوسف الواسطي؛ والحسن بن محمد هو ابن الصَّبَّاح الزعفراني.
والحديث قال الحافظ في `التلخيص الحبير` (1/32) :
`رواه ابن خزيمة والدارقطني والبيهقي وابن الجوزي من حديث محارب بن
دثار عن عائشة قالت: ربما حتتُّهُ من ثوب رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو يصلي. لفظ الدارقطني، ولفظ ابن خزيمة (فذكره) ، ولابن حبان من حديث الأسود بن يزيد عن عائشة قالت: لقد رأيتني أفرك المني من ثوب رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو يصلي `. قلت: لي على هذا التخريج ملاحظتان:
الأولى: أن إطلاق العزو للدار قطني إنما يعني - عُرفاً - `السنن` له، وليس الحديث فيه بهذا اللفظ، وكذلك ليس هو في `سنن البيهقي `.
والأخرى: أنني أشك في ثبوت قوله: `وهو يصلي ` في رواية ابن حبان؛
فإن إسناده عنده (2/330/




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাপড় থেকে বীর্য ঘষে বা খুঁটে ফেলে দিতেন, যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3173)


3173 - (أحسنَ (وفي رواية: صدق) ابنُ الخطابِ)
أخرجه أحمد (5/368) : حدثنا محمد بن جعفر: ثنا شعبة عن الأزرق بن
قيس عن عبد الله بن رباح عن رجل من أصحاب النبي - صلى الله عليه وسلم - :
أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - صلى العصر فقام رجل يصلي [بعدها] فرآه عمر [فأخذ بردائه أو بثوبه] فقال له اجلس فإنما أهلك أهل الكتاب أنه لم يكن لصلاتهم فصل فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : 0000 فذكره بالرواية الأولى
وأخرجه أبو يعلي في مسنده (13/107/7166) قال: حدثنا محمد بن بشار: حدثنا محمد به
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات على شرط مسلم غير الصحابي الذي لم يسم وذلك لا يضر لأن الصحابة كلهم عدول0
وقد توبع شعبة فقال عبد الرزاق في (المصنف) (2/432/3973) : عن عبد الله بن سعيد قال: أخبرني الأزرق بن قيس قال: سمعت عبد الله بن رباح الأنصاري به والرواية الثانية مع الزيادات له
وهذا إسناد صحيح أيضاً وعبد الله بن سعيد هو ابن أبي هند الفزاري ثقة من رجال الشيخين ذكره الحافظ المزي في شيوخ عبد الرزاق0
والحديث أورده الهيثمي في (المجمع) (2/234) قال:
(رواه أحمد وأبو يعلي ورجال أحمد رجال (الصحيح))
وأقول: لا وجه لتخصيص إسناد أحمد بذلك فإسناد أبو يعلى كذلك
رجاله رجال (الصحيح) فإن محمد بن بشار - وهو أبو بكر بندار - ثقة أيضاً من رجال الشيخين وشيخه محمد: هو ابن جعفر الملقب بـ (غندر)
وأخرجه أبو داود (1/611/1007) والحاكم (1/270) والبيهقي (2/190) ,والطبراني في (المعجم الكبير) (22/284/728) من طريق أشعث بن شعبة عن المنهال بن خليفة عن الأزرق بن قيس قال:
صلي لنا إمام يكنى أبا رمثة فقال صليت هذه الصلاة أو مثل هذه الصلاة
مع النبي - صلى الله عليه وسلم - : وكان أبو بكر وعمر يقومان في الصف المقدم عن يمينه وكان رجل قد شهد التكبيرة الأولى من الصلاة فصلي نبي الله - صلى الله عليه وسلم - ثم سلم عن يمينه وعن يساره حتى رأينا بياض خده ثم انتفل كانتفال أبي رمثة - يعنى نفسه -
فقام الرجل الذي أدرك معه التكبيرة الأولى من الصلاة يشفع فوثب إليه عمر فأخذ بمنكبه فهزه ثم قال: اجلس 000 الحديث إلا أنه قال: فرفع النبي - صلى الله عليه وسلم -
بصره فقال: (أصاب الله بك يا ابن الخطاب!)
وقال الحاكم
(صحيح علي شرط مسلم) !
ورده الذهبي بقوله
(قلت: المنهال ضعفه ابن معين وأشعث فيه لين والحديث منكر)
قلت: وبهما أعله المنذرى في (مختصر السنن) ولذلك كنت أوردته في
(ضعيف أبي داود) فلما وقفت على متابعة شعبة وعبد الله بن سعيد الفزاري لهما على الشطر الثاني من حديثهما قررت نقله إلى (صحيح أبي داود) لأن الشطر الأول منه ليس فيه كبير شيء مع كونه موقوفا, ً وكذلك كنت ضعفته في تعليقي علي (المشكاة) (1/




নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আসরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করতে শুরু করলে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে দেখে তার চাদর বা কাপড় ধরে বললেন: "বসো! নিশ্চয় কিতাবধারীরা (ইয়াহুদি ও খ্রিষ্টানরা) ধ্বংস হয়েছে, কারণ তারা তাদের (ফরজ) সালাতের সাথে (নফল সালাতের) কোনো পার্থক্য রাখতো না।"

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "ইবনুল খাত্তাব সঠিক কাজটি করেছে (অন্য বর্ণনায়: ইবনুল খাত্তাব সত্য বলেছে)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3174)


3174 - (كان لا يدعُ ركعتينِ قبل الفجرِ، وركعتينِ بعدالعصرِ) .
أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (2/352) : حدثنا عفان قال: نا أبو عوانة قال: ثنا إبراهيم بن محمد بن المنتشر عن أبيه: أنه كان يصلي بعد العصر ركعتين، فقيل له؟ فقال: لو لم أصلهما إلا أني رأيت مسروقاً يصليهما؛ لكان ثقة، ولكني سألت عائشة؟ فقالت: ... فذكره.
قلت: هذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، رجاله كلهم ثقات لا مغمز فيهم، وإنما خرجته لصحته وعزة إسناده، ولما فيه من عمل محمد بن المنتشر
تبعاً لمسروق التابعي الجليل - به، وإلا فالحديث مخرج في `الصحيحين ` وغيرهما كما تقدمت الإشارة إلى ذلك في الحديث الذي قبله.
والمرفوع من هذا قد أخرجه الطحاوي في`شرح المعاني` (1/177) من طريق أخرى عن أبي عوانة به.
وروى ابن أبي شيبة قبيل هذا بسند صحيح عن أشعث بن أبي الشعثاء قال: خرجت مع أبي (واسمه سُليم بن أسود المحاربي) وعمرو بن ميمون والأسود
ابن يزيد وأبي وائل، فكانوا يصلون بعد العصر.
ثم روى مثله عن جمع آخر من السلف؛ منهم الزبير بن العوام، وابنه عبد الله رضي الله عنهما، وكذا علي رضي الله عنه، وأبو بردة بن أبي موسى.
بل روى ابن حبان (




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) ফযরের পূর্বে দুই রাকাত এবং আসরের পরে দুই রাকাত (সালাত) কখনও ত্যাগ করতেন না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3175)


3175 - (إِِنَّ عبداً مِن عبادِ الله بعثهَُ الله إلى قومهِ؛ فكذَّبُوه
وشجُّوه، فكان يمسحُ الدم عن جبهته ويقول: اللهمَّ! اغفر لقومي؛ فإِنَّهم لا يعلمون) .
أخرجه البخاري في `الأدب المفرد` (757) ، وأحمد (1/427و456) من طريق حماد بن زيد عن عاصم ابن بهدلة عن أبي وائل عن ابن مسعود قال:
لما قسم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - غنائم حنين ب (الجِعرّانة) ازدحموا عليه فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : 000 فذكره. قال عبد الله بن مسعود: فكأني أنظر إلى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يحكي الرجل يمسح عن جبهته.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات رجال الشيخين، غير أنهما إنما أخرجا لعاصم ابن بهدلة مقروناً، كما في `التقريب `.
وقد تابع حماد بن زيد حماد بن سلمة عن عاصم به نحوه بزيادة فيه؛ فقال
تكلم رجل من الأنصار كلمة فيها مَوجِدة على النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فلم تُقِرَّني نفسي
أن أخبرت بها النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فلوددت أني افتديت منها بكل أهل ومال، فقال:
`قد آذوا موسى عليه الصلاة والسلام أكثر من ذلك، فصبر`، ثم أخبر أن نبياً كذبه قومه وشجوه حين جاءهم بأمر الله، فقال - وهو يمسح الدم عن وجهه - : `اللهم اغفر لقومي؛ فإنهم لا يعلمون `.
أخرجه أحمد أيضاً (1/453) بسندٍ حسن أيضاً.
وتابع عاصماً: الأعمشُ قال: حدثني شَقِيقٌ به مختصراً، فقال عبد الله بن
مسعود:
كأني أنظر إلى النبي يحكي نبيّاً من الأنبياء ضربه قومه، فأدموه وهو يمسح الدم عن وجهه ويقول:
`اللهم اغفر ... ` الحديث.
أخرجه البخاري (3477) ، ومسلم (5/ 179) ، وا بن ماجه (4025) ، وأحمد
(1/380 و 432 و441) ، وأبو نعيم في `أخبار أصبهان ` (2/ 161) من طرق عن الأعمش به، وزاد أحمد في رواية بلفظ:
`كان قومه يضربونه حتى يُصرع `.
وإسنادها صحيح على شرط الشيخين.
وساق بعدها بنفس الإسناد عن ابن مسعود قال:
قسم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قسماً، فقال رجل: إن هذه لقِسمةً ما أريدَ بها وجه الله!
قال: فأتيت النبي - صلى الله عليه وسلم - فذكرت ذلك له، فاحمر وجهه - قال شعبة: وأظنه قال: - وغضب؛ حتى وددت أني لم أخبره - قال شعبة: وأحسبه - قال: `يرحمنا الله وموسى - شك شعبة في `يرحمنا الله وموسى` - قد أوذي بأكثر من هذا فصبر`.
هذه ليس فيها شك: `قد أوذي بأكثر من ذلك، فصبر`.
وأخرجه في مكان آخر (1/ 411) دون شك شعبة.
وكذلك أخرجه البخاري (6/436/3405و11/136/6336) من طرق أخرى
عن شعبة به.
وكذلك رواه أحمد (1/ 380) ، والبخاري (8/55و10/475و511) من طريق
سفيان عن الأعمش به.
وتابع الأعمشَ: منصور عن أبي وائل به، وفيه قصة غنائم حنين.
وكأن الإمام أحمد - رحمه الله - أتبع رواية عاصم ابن بهدلة برواية شعبة
كشاهد للزيادة التي في روايته؛ ليؤكد صحتها. والله أعلم.
هذا، وقد اختصر بعض الرواة حديث الترجمة اختصاراً مُخِلاً بحيث يظهر
أن قوله: `اللهم اغفر ... ` لم يحكه - صلى الله عليه وسلم - عن ذاك النبي، وإنما صدر منه - صلى الله عليه وسلم - قاصداً قومه، فقال محمد بن فليح: عن موسى بن عقبة عن الزهري عن سهل بن سعد مرفوعاً به.
أخرجه ابن أبي عاصم في`الآحاد والمثاني` (4/123/2096) ، وأبو يوسف الفسوي في`المعرفة ` (1/338) ، وابن حبان في `صحيحه ` (2/160/969/الإحسان) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (6/146/5694) من طرق عنه.
وكذا رواه البيهقي في `الشعب ` (2/164/1448) .
قلت: ورجاله ثقات رجال البخاري؛ غير أن محمد بن فليح فيه كلام من قبل حفظه، أشار إلى ذلك الحافظ بقوله في `تقريبه `:
`صدوق يهم `.
ثم رأيت ما استظهرته آنفاً صريحاً في رواية البيهقي للحديث في `دلائل النبوة`؛ فإنه ساقه مطولاً (3/




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেনো একজন নবীর কথা বর্ণনা করছিলেন—যাকে তাঁর সম্প্রদায় আঘাত করেছিল এবং রক্তাক্ত করে দিয়েছিল। তিনি তাঁর কপাল থেকে রক্ত মুছতে মুছতে বলছিলেন:

“হে আল্লাহ! আমার জাতিকে ক্ষমা করে দিন, কারণ তারা জানে না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3176)


3176 - (اسمَعُوا وأطيعُوا فإنّما عليهم ما حُمِّلوا، وعليكُم ما حُمِّلتُم) .
أخرجه مسلم (6/11) ، والبخاري في `التاريخ ` (2/2/73) ، وأبو عوانة في
`صحيحه` (4/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমরা (শাসকের নির্দেশ) শোনো এবং আনুগত্য করো। কেননা তাদের (শাসকদের) উপর হলো সেই দায়িত্ব, যা তাদের উপর অর্পণ করা হয়েছে, আর তোমাদের উপর হলো সেই দায়িত্ব, যা তোমাদের উপর অর্পণ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3177)


3177 - (يا بَني كعبِ بن لُؤيٍّ! أنقذوا أنفسكم من النار، يا بني
مُرَّة بن كعبٍ! أنقذوا أنفسكم من النار، يا بني عبد شمس! أنقذوا أنفسكم من النار، يا بني عبد منافٍ! أنقذوا أنفسكم من النار، يا بني عبد المطَّلب! أنقذُوا أنفسكم من النار، يا فاطمةُ [بنت محمد!] أنقذي نفسكِ من النار، فإنِّي لا أملكُ لكُم من الله شيئاً؛ غير أنّ لكُم رحِماً سأبُلُّها بِبِلالِها) .
أخرجه البخاري في`الأدب المفرد` (48) ، ومسلم (1/133) - والسياق له - ،
وأبو عوانة (1/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

"হে বনু কা’ব ইবনে লুয়াই! তোমরা নিজেদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। হে বনু মুররাহ ইবনে কা’ব! তোমরা নিজেদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। হে বনু আবদে শামস! তোমরা নিজেদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। হে বনু আবদে মানাফ! তোমরা নিজেদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। হে বনু আব্দুল মুত্তালিব! তোমরা নিজেদেরকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। হে ফাতিমা (মুহাম্মাদের কন্যা)! তুমি নিজেকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করো। কেননা আমি আল্লাহর নিকট তোমাদের কোনো কিছুরই মালিক নই (বা: তোমাদের কোনো উপকার করতে পারব না); তবে তোমাদের সঙ্গে আমার যে আত্মীয়তার সম্পর্ক রয়েছে, তা আমি (আমার কর্তব্য পালনের মাধ্যমে) সদ্ব্যবহারের দ্বারা সতেজ রাখব।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3178)


3178 - (كنّا نشربُ ونحنُ قِيامٌ، ونأكلُ ونحنُ نمشي، على عهدِ رسولِ الله - صلى الله عليه وسلم - ) .
أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (8/205/4170) : حدثنا حفص عن
عبيد الله عن نافع عن ابن عمر قال: ... فذكره.
ومن طريق ابن أبي شيبة: أخرجه أحمد (2/108) ، وكذا الدارمي في
`سننه ` (2/120) .
وأخرجه الترمذي (6/148/1880) ، والطحاوي في `شرح المعاني ` (2/358) من طريق أخرى عن حفص بن غياث به. وقال الترمذي:
`حديث صحيح غريب من حديث عبيد الله بن عمر عن نافع عن ابن عمر`.
قلت: وإسناده صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين، وهو على شرط مسلم؛
لأنه روى لحفص عن عبيد الله بن عمر.
وللحديث طريق أخرى أشار إليها الترمذي عقب قوله المتقدم آنفاً، قال:
`وروى عمران بن حُديرٍ هذا الحديث عن أبي البرزي عن ابن عمر، وأبو البرزي اسمه يزيد بن عُطارد`.
قلت: هذا وصله ابن أبي شيبة (4167) ، والدار مي أيضاً، وكذا الطحاوي، والدّولابي في`الكنى ` (1/127) ، والبييقي في ` السنن ` (7/283) من طريق الطيالسي - وهذا في`مسنده` (258/1094) - ، وأحمد أيضاً (2/12) من طرق عنه.
قلت: ورجاله ثقات رجال مسلم؛ غير يزيد بن عطارد، قال ابن أبي حاتم عن أبيه (4/2/




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে দাঁড়িয়ে পান করতাম এবং হেঁটে হেঁটে আহার করতাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3179)


3179 - (أما إنّ ربَّك يُحبُّ المحامدَ) .
أخرجه البخاري في`الأدب المفرد` (859 و861و868) و` التاريخ ` (1/ 445/ 425 1) ، والنسائي في `السنن الكبرى` (4/416/7745) ، والحاكم (3/ 614) ، وأحمد (3/ 435) ، والطبراني في ` المعجم الكبير` (1/258/ 0




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
নিশ্চয়ই আপনার প্রতিপালক প্রশংসাসমূহ ভালোবাসেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3180)


3180 - (لا يُتمَ بعدَ احتلامٍ، ولا يُتمَ على جاريةٍ إذا هي حاضت) . أخرجه الطبراني في `الكبير` (4/16/3502) : حدثنا محمد بن عبد الله الحضرمي: ثنا محمد بن أبي بكر المقدَّمي: ثنا سَلمُ بن قتيبة: ثنا ذيَّالُ بن عُبَيد قال: سمعت جدي حنظلة يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات معروفون؛ وذيَّال بن عُبيد وثقه
ابن معين، وابن حبان (4/222) ، ولا ينافيه قول ابن أبي حاتم بعد أن روى توثيق ابن معين:
`سألت أبي عنه؟ فقال: تابعي. قلت: يحتج بحديثه؟ فقال: شيخ أعرابي `.
فأقول: إنه يشير بذلك إلى أنه وسط ليس في الحجة كغيره من الحفاظ المشهورين، وقد روى عنه جمع من الثقات، ولهذا؛ قال فيه الحافظ في`التقريب `: `صدوق`. وقال في`التلخيص الحبير` (3/ 101) :
`وإسناده لا بأس به `. وقال شيخه الهيثمي في مجمع الزوائد` (4/226) :
`رواه الطبراني، ورجاله ثقات `.
وعزاه الحافظ في ترجمة حنظلة من `الإصابة` للحسن بن سفيان والباوردي
وابن السكن من طريق سلم بن قتيبة به.
وللحديث طرق أخرى كنت خرجتها في `الإرواء` (5/




হানযালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

স্বপ্নদোষের মাধ্যমে সাবালক হওয়ার পর আর কেউ এতিম থাকে না, আর কোনো বালিকা যখন ঋতুমতী হয়, তখন সেও (এতিম হিসেবে গণ্য হওয়ার অবস্থা থেকে) মুক্ত হয়ে যায়।