সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
327 - ` لو كان بعدي نبي لكان عمر `.
رواه الترمذي (2 / 293) وحسنه، والحاكم (3 / 85) وصححه، وأحمد (4 /
154) والروياني في ` مسنده ` (50 / 1) والطبراني كما في ` المنتقى من
حديثه ` (4 / 7 / 2) ، وأبو بكر النجاد في ` الفوائد المنتقاة ` (17 /
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমার পরে কোনো নবী থাকতেন, তবে তিনি উমরই হতেন।"
328 - ` ما بال رجال بلغهم عني أمر ترخصت فيه، فكرهوه وتنزهوا عنه؟ ! فوالله لأنا
أعلمهم بالله وأشدهم له خشية `.
رواه مسلم (7 / 90) وأحمد (6 / 45، 181) من حديث عائشة رضي الله عنها
قالت: ` صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم أمرا فترخص فيه، فبلغ ذلك ناسا من
أصحابه، فكأنهم
كرهوه وتنزهوا عنه! فبلغه ذلك فقام خطيبا فقال: ` فذكره.
قلت: والأمر الذي ترخص فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم هو التقبيل في
الصيام خلافا لما قد يتبادر لبعض الأذهان، والدليل الحديث الآتي:
` أنا أتقاكم لله، وأعلمكم بحدود الله `.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কোনো এক কাজ করলেন এবং তাতে শিথিলতা প্রদান করলেন। তাঁর কতিপয় সাহাবীর নিকট যখন সে সংবাদ পৌঁছল, তারা যেন তা অপছন্দ করল এবং তা থেকে নিজেদেরকে বাঁচিয়ে রাখল। যখন তাঁর নিকট এই সংবাদ পৌঁছল, তখন তিনি খুতবা দেওয়ার জন্য দাঁড়ালেন এবং বললেন:
"কিছু লোকের কী হলো যে, তাদের নিকট আমার এমন একটি কাজের খবর পৌঁছল, যাতে আমি (শরয়ী) শিথিলতা প্রদান করেছি, কিন্তু তারা তা অপছন্দ করল এবং তা থেকে দূরে সরে থাকল?! আল্লাহর শপথ! আমি তাদের চেয়ে আল্লাহ সম্পর্কে অধিক জ্ঞানী এবং আমিই তাদের মধ্যে আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করি।"
329 - ` أنا أتقاكم لله، وأعلمكم بحدود الله `.
رواه الإمام أحمد (5 / 434) : حدثنا عبد الرزاق أنبأنا ابن جريج: أخبرني
زيد بن أسلم عن عطاء بن يسار عن رجل من الأنصار، أن الأنصاري أخبر عطاء:
` أنه قبل امرأته على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو صائم فأمر امرأته
فسألت النبي صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: إن
رسول الله يفعل ذلك، فأخبرته امرأته، فقال: إن النبي صلى الله عليه وسلم
يرخص له في أشياء، فارجعي إليه فقولي له، فرجعت إلى النبي صلى الله عليه وسلم
فقالت: قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم يرخص له في أشياء، فقال: فذكره.
قلت: وهذا سند صحيح متصل.
আনসারী এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেন): “আমি তোমাদের মধ্যে আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং তোমাদের মধ্যে আল্লাহর সীমারেখা সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি অবগত।”
ঐ আনসারী ব্যক্তিটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে রোজা অবস্থায় তাঁর স্ত্রীকে চুম্বন করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর স্ত্রীকে আদেশ করলেন, যেন তিনি এ বিষয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে জিজ্ঞাসা করেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা করে থাকেন।"
লোকটি তার স্ত্রীর কাছ থেকে (এই জবাব) শুনে বললেন, "নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে (কিছু বিশেষ) বিষয়ে ছাড় দেওয়া হয়েছে। তুমি তাঁর কাছে ফিরে যাও এবং তাঁকে এই কথাটি বলো।" স্ত্রী আবার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে ফিরে গিয়ে বললেন, তিনি (আমার স্বামী) বলেছেন: ’নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে কিছু বিষয়ে ছাড় দেওয়া হয়েছে।’ তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পূর্বের কথাটি (অর্থাৎ, আল্লাহর রাসূল তা করেন) পুনরায় উল্লেখ করলেন।
330 - ` كنا إذا انتهينا إلى النبي صلى الله عليه وسلم جلس أحدنا حيث ينتهي `.
أخرجه زهير بن حرب في ` العلم ` (رقم 100 بتحقيقي) والبخاري في ` الأدب
المفرد ` (1141) وأبو داود (4825) والترمذي (2 / 121) وأحمد (5 / 91
، 98،
জাবির ইবনে সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে আসতাম, তখন আমাদের মধ্যে যে কেউ যেখানে (উপস্থিত লোকজনের) শেষ হতো, সেখানেই বসে যেতো।
331 - ` إن الرقى، والتمائم، والتولة شرك `.
أخرجه أبو داود (3883) وابن ماجه (3530) وابن حبان (1412) وأحمد
(1 / 381) من طريق يحيى الجزار عن ابن أخي زينب امرأة عبد الله عن زينب امرأة
عبد الله عن عبد الله قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
فذكره.
قلت: ورجاله ثقات كلهم غير ابن أخي زينب قال الحافظ في ` التقريب `:
` كأنه صحابي، ولم أره مسمى `.
قلت: وسقط ذكره من كتاب ابن حبان،
فلا أدري أكذلك الرواية عنده أم سقط من
الناسخ.
وعلى كل حال، فإن للحديث طريقا أخرى يتقوى بها، أخرجه الحاكم (4 / 217)
من طريق قيس بن السكن الأسدي قال:
` دخل عبد الله بن مسعود رضي الله عنه على امرأة، فرأى عليها خرزا من الحمرة،
فقطعه قطعا عنيفا، ثم قال: إن آل عبد الله عن الشرك أغنياء، وقال:
كان مما حفظنا عن النبي صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال:
` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
وهو كما قالا.
الغريب:
(الرقى) هي هنا كان ما فيه الاستعاذة بالجن، أو لا يفهم معناها، مثل كتابة
بعض المشايخ من العجم على كتبهم لفظة (يا كبيج) لحفظ الكتب من الأرضة زعموا.
و (التمائم) جمع تميمة، وأصلها خرزات تعلقها العرب على رأس الولد لدفع
العين، ثم توسعوا فيها فسموا بها كل عوذة.
قلت: ومن ذلك تعليق بعضهم نعل الفرس على باب الدار، أو في صدر المكان!
وتعليق بعض السائقين نعلا في مقدمة السيارة أو مؤخرتها، أو الخرز الأزرق على
مرآة السيارة التي تكون أمام السائق من الداخل، كل ذلك من أجل العين زعموا.
وهل يدخل في (التمائم) الحجب التي يعلقها بعض الناس على أولادهم أو على
أنفسهم إذا كانت من القرآن أو الأدعية الثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم،
للسلف في ذلك قولان، أرجحهما عندي المنع كما بينته فيما علقته على ` الكلم
الطيب ` لشيخ الإسلام ابن تيمية (رقم التعليق 34) طبع المكتب الإسلامي.
و (التولة) بكسر التاء وفتح الواو، ما يحبب المرأة إلى زوجها من السحر
وغيره قال ابن الأثير:
` جعله من الشرك لاعتقادهم أن ذلك يؤثر ويفعل خلاف ما قدره الله تعالى `.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
"নিশ্চয়ই রুকা (মন্ত্র), তামা’ইম (তাবিজ-কবচ) এবং তিওয়ালাহ (প্রেমের জাদু) হচ্ছে শিরক।"
[এই হাদীসের সমর্থনে আরও বর্ণিত আছে:]
কাইস ইবনে সাকান আল-আসাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: একবার আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর এক স্ত্রীর কাছে প্রবেশ করলেন এবং তিনি তার শরীরে ‘হুমরা’ (এক প্রকার রোগের নাম) এর জন্য কিছু পুঁতি দেখতে পেলেন। তিনি তা কঠোরভাবে ছিঁড়ে ফেলে দিলেন। এরপর তিনি বললেন: নিশ্চয়ই আব্দুল্লাহর পরিবার শিরক থেকে মুখাপেক্ষীহীন (মুক্ত)। তিনি আরও বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে আমরা যা মুখস্থ রেখেছি, তার মধ্যে এটিও ছিল [যে রুকা, তামা’ইম ও তিওয়ালাহ শিরক]।
**শব্দের ব্যাখ্যা:**
**(আর-রুকা):** এখানে রুকা বলতে সেইসব মন্ত্রকে বোঝানো হয়েছে, যার মাধ্যমে জিনের কাছে আশ্রয় চাওয়া হয়, অথবা যার অর্থ বোঝা যায় না। যেমন, কিছু অনারব আলিমদের তাদের কিতাবসমূহে উইপোকা থেকে কিতাব রক্ষার জন্য ‘ইয়া কাবীজ’ শব্দ লেখা—যা তাদের ধারণা।
**(আত-তামা’ইম):** এটি ‘তামিমাহ’-এর বহুবচন। এর মূল হলো সেইসব পুঁতি বা পাথর, যা আরবের লোকেরা বাচ্চাদের চোখ লাগা (বদ নজর) থেকে রক্ষা করার জন্য তাদের মাথায় ঝুলিয়ে দিত। এরপর এটিকে বিস্তৃত করে যেকোনো ধরনের তাবিজ-কবচ বা রক্ষাকবচের ক্ষেত্রে ব্যবহার করা শুরু হয়। এর অন্তর্ভুক্ত হলো: কিছু লোকের ঘরের দরজায় অথবা কোনো স্থানের প্রবেশপথে ঘোড়ার নাল ঝুলিয়ে রাখা; অথবা কিছু চালকের গাড়ির সামনে বা পিছনে নাল ঝোলানো; অথবা চালকের ভেতরের আয়নায় নীল পুঁতি ঝোলানো। এই সবকিছুই তারা বদ নজর থেকে বাঁচার জন্য করে থাকে—যা তাদের ধারণা। তবে যেসব তাবিজ-কবচ কুরআন বা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে প্রমাণিত দোয়ার মাধ্যমে প্রস্তুত করে ঝোলানো হয়, তা কি তামা’ইম-এর অন্তর্ভুক্ত হবে? সালাফদের মধ্যে এ বিষয়ে দুটি মত রয়েছে, যার মধ্যে আমার নিকট প্রবল মতটি হলো নিষেধের।
**(আত-তিওয়ালাহ):** এটি এমন ধরনের জাদু বা অন্য কোনো উপায়, যা দ্বারা স্ত্রীকে তার স্বামীর নিকট প্রিয় করে তোলা হয়। ইবনুল আসীর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "এটিকে শিরক হিসেবে গণ্য করা হয়েছে, কারণ তাদের বিশ্বাস যে এটি প্রভাব ফেলে এবং আল্লাহ তাআলা যা নির্ধারণ করেছেন, তার বিপরীতে কাজ করে।"
332 - ` لقد رأيتنا نصلي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم صلاة الفجر في مروطنا،
وننصرف وما يعرف بعضنا وجوه بعض `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (214 / 1) : حدثنا إبراهيم حدثنا حماد عن عبيد
الله بن عمر عن عمرة بنت عبد الرحمن الأنصارية أن عائشة قالت: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال مسلم غير إبراهيم هذا وهو ابن
الحجاج، ثم هما اثنان: إبراهيم بن الحجاج بن زيد السامي أبو إسحاق البصري
وإبراهيم بن الحجاج النيلي أبو إسحاق البصري أيضا، وكلاهما يروي عنه
أبو يعلى، والأول، يروي عن حماد بن سلمة، والآخر عن حماد بن زيد، وكل من
الحمادين يروي عن عبيد الله بن عمر، ولذلك لم يتعين عندي أيهما المراد هنا،
ولا ضير في ذلك، فإنهما ثقتان، غير أن الأول احتج به مسلم، والآخر احتج به
الشيخان.
والحديث في ` الصحيحين ` دون ذكر الوجه، ولذلك أوردته، وهي زيادة مفسرة،
لا تعارض رواية الصحيحين، فهي مقبولة.
وهو دليل ظاهر على أن وجه المرأة ليس بعورة. والأدلة على ذلك متكاثرة.
ومعنى كونه ليس بعورة، أنه يجوز كشفه، وإلا فالأفضل، والأورع ستره،
لاسيما إذا كان جميلا. وأما إذا كان مزينا. فيجب ستره قولا واحدا، ومن شاء
تفصيل هذا الإجمال، فعليه بكتابنا ` حجاب المرأة المسلمة ` فإنه جمع فأوعى.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি অবশ্যই দেখেছি যে, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে আমাদের মোটা চাদর বা আবরণে ফযরের সালাত আদায় করতাম, আর যখন আমরা (সালাত শেষে) ফিরে যেতাম, তখন আমাদের একে অপরের মুখমণ্ডলও চেনা যেত না।"
333 - ` إن للإسلام صوى ومنارا كمنار الطريق، منها أن تؤمن بالله ولا تشرك به شيئا
وإقام الصلاة وإيتاء الزكاة وصوم رمضان وحج البيت والأمر بالمعروف والنهي
عن المنكر وأن تسلم على أهلك إذا دخلت عليهم وأن تسلم على القوم إذا مررت بهم
فمن ترك من ذلك شيئا، فقد ترك سهما من الإسلام ومن تركهن ` كلهن `، فقد ولى
الإسلام ظهره `.
أخرجه أبو عبيد القاسم بن سلام في ` كتاب الإيمان ` (رقم الحديث 3 بتحقيقي)
قال: حدثنيه يحيى بن سعيد العطار عن ثور بن يزيد عن خالد بن معدان عن رجل عن
أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم:
ومن طريق أبي عبيد أخرجه ابن بشران في ` الأمالي ` (ق 98 / 2) وعبد الغني
المقدسي في ` الأمر بالمعروف والنهي عن
المنكر ` (ق 82 / 1) وقال: ` رواه
الطبراني في السنة `.
قلت: ويحيى بن سعيد هذا شامي ضعيف. وقد خالفه جماعة في إسناده فلم يذكروا
الرجل فيه. وهو الصواب.
فمنهم الوليد بن مسلم قال: حدثنا ثور بن يزيد عن خالد بن معدان عن أبي هريرة
به.
أخرجه الحاكم (1 / 21) من طريق محمد بن أبي السري العسقلاني حدثنا الوليد ابن
مسلم به. وقال:
هذا حديث صحيح على شرط البخاري، فقد روى عن محمد بن خلف العسقلاني، واحتج
بثور بن يزيد الشامي، فأما سماع خالد بن معدان عن أبي هريرة، فغير مستبدع.
فقد حكى الوليد بن مسلم عن ثور بن يزيد عنه أنه قال: لقيت سبعة عشر رجلا من
أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم `.
قلت: لقد انتقل ذهن الحاكم رحمه الله من محمد بن أبي السري العسقلاني إلى محمد
بن خلف العسقلاني، ومع أن ابن خلف ليس له دخل في هذا الحديث، فلم يرو عنه
البخاري. وأما صاحب الحديث فهو ابن أبي السري كما هو مصرح به في سنده فهو
ضعيف وهو محمد بن المتوكل بن عبد الرحمن أبو عبد الله بن أبي السري، قال
الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق عارف له أوهام كثيرة `.
ومنهم محمد بن عيسى بن سميع عن ثور بن يزيد به.
أخرجه ابن شاهين في ` الترغيب والترهيب ` (ق 317 / 1) .
قلت: ومحمد هذا هو ابن عيسى بن القاسم بن سميع بالتصغير.
قال الحافظ: ` صدوق يخطىء ويدلس `.
ومنهم روح بن عبادة حدثنا ثور بن يزيد به.
أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (5 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
নিশ্চয় ইসলামের এমন সব সুস্পষ্ট নিদর্শন ও স্তম্ভ রয়েছে যা রাস্তার নির্দেশক বাতিসমূহের মতো। সেগুলোর মধ্যে অন্যতম হলো, তুমি আল্লাহর প্রতি ঈমান আনবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরিক করবে না; সালাত কায়েম করা; যাকাত প্রদান করা; রমজানের সিয়াম পালন করা; বাইতুল্লাহর হজ্ব করা; সৎকাজের আদেশ করা এবং অসৎকাজে নিষেধ করা। আর যখন তুমি তোমার পরিবারের নিকট প্রবেশ করবে, তখন তাদেরকে সালাম দেবে; এবং যখন তুমি কোনো দলের পাশ দিয়ে যাবে, তখন তাদেরকে সালাম দেবে।
সুতরাং যে ব্যক্তি এর কোনো একটি অংশও ছেড়ে দিল, সে যেন ইসলামের একটি অংশীদারি ছেড়ে দিল। আর যে ব্যক্তি এই সবকটিকেই ছেড়ে দিল, সে যেন ইসলামের প্রতি পৃষ্ঠ প্রদর্শন করল (ইসলাম থেকে মুখ ফিরিয়ে নিল)।
334 - ` من قال: رضيت بالله ربا وبالإسلام دينا وبمحمد رسولا وجبت له الجنة `.
أخرجه أبو داود (1529) من طريق أبي الحسين زيد بن الحباب حدثنا عبد الرحمن
بن شريح الإسكندراني: حدثني أبو هاني الخولاني أنه سمع أبا علي الجنبي أنه سمع
أبا سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات رجال مسلم غير أبي علي الجنبي واسمه عمرو
بن مالك الهمداني وهو ثقة.
واسم أبي هاني الخولاني حميد بن هاني.
وللحديث طريق أخرى عن أبي سعيد، يرويه ابن لهيعة عن خالد بن أبي عمران عن أبي
عبد الرحمن الحبلي عنه قال:
` أخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي فقال: يا أبا سعيد! ثلاثة من قالهن
دخل الجنة، قلت: ما هن يا رسول الله؟ قال: من رضي بالله ربا، وبالإسلام
دينا، وبمحمد رسولا. ثم قال: يا أبا سعيد والرابعة لها من الفضل كما بين
السماء إلى الأرض، وهي الجهاد في سبيل الله `.
أخرجه الإمام أحمد (3 / 14) .
قلت: وإسناده لا بأس به في المتابعات والشواهد.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"যে ব্যক্তি বলবে: আমি আল্লাহকে রব (প্রভু) হিসেবে, ইসলামকে দ্বীন (জীবন ব্যবস্থা) হিসেবে এবং মুহাম্মাদ (সালসাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রাসূল হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে গ্রহণ করলাম, তার জন্য জান্নাত ওয়াজিব হয়ে যায়।"
অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাত ধরে বললেন: "হে আবু সাঈদ! তিনটি বিষয়, যে ব্যক্তি এগুলো বলবে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।" আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! সেগুলো কী? তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহকে রব হিসেবে, ইসলামকে দ্বীন হিসেবে এবং মুহাম্মাদকে রাসূল হিসেবে সন্তুষ্টচিত্তে গ্রহণ করলো।" এরপর তিনি বললেন: "হে আবু সাঈদ! আর চতুর্থটির মর্যাদা আকাশ ও পৃথিবীর মধ্যবর্তী স্থানের সমান, আর তা হলো আল্লাহর পথে জিহাদ।"
335 - ` كنا ننهى أن نصف بين السواري على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ونطرد
عنها طردا `.
أخرجه ابن ماجه (1002) وابن خزيمة (1 /) وابن حبان (400) والحاكم
(1 / 218) والبيهقي (3 / 104) والطيالسي (1073) من طريق هارون أبي مسلم
حدثنا قتادة عن معاوية بن قرة عن أبيه قال: فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: هارون هذا مستور كما قال الحافظ، لكن
له شاهد من حديث أنس ابن مالك
يتقوى به، يرويه عبد الحميد بن محمود قال:
` صليت مع أنس بن مالك يوم الجمعة، فدفعنا إلى السواري فتقدمنا وتأخرنا،
فقال أنس: كنا نتقي هذا على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم `.
أخرجه أبو داود والنسائي والترمذي وابن حبان والحاكم وغيرهم بسند صحيح كما
بينته في ` صحيح أبي داود ` (677) .
قلت: وهذا الحديث نص صريح في ترك الصف بين السواري، وأن الواجب أن يتقدم
أو يتأخر.
وقد روى ابن القاسم في ` المدونة ` (1 / 106) والبيهقي (3 / 104) من طريق
أبي إسحاق عن معدي كرب عن ابن مسعود أنه قال:
` لا تصفوا بين السواري `.
وقال البيهقي:
` وهذا - والله أعلم - لأن الأسطوانة تحول بينهم وبين وصل الصف `.
وقال مالك:
` لا بأس بالصفوف بين الأساطين إذا ضاق المسجد `.
وفي ` المغني ` لابن قدامة (2 / 220) :
` لا يكره للإمام أن يقف بين السواري، ويكره للمأمومين، لأنها تقطع صفوفهم،
وكرهه ابن مسعود والنخعي، وروي عن حذيفة وابن عباس، ورخص فيه ابن سيرين
ومالك وأصحاب الرأي وبن المنذر، لأنه لا دليل على المنع.
ولنا ما روي عن معاوية بن قرة ... ، ولأنها تقطع الصف فإن كان الصف صغيرا،
قدر ما بين الساريتين لم يكره لا ينقطع بها `.
وفي ` فتح الباري ` (1 / 477) :
` قال المحب الطبري: كره قوم الصف بين السواري للنهي الوارد عن ذلك، ومحل
الكراهة عند عدم الضيق، والحكمة فيه إما لانقطاع الصف أو لأنه موضع النعال.
انتهى. وقال القرطبي: روي في سبب كراهة ذلك أنه مصلى الجن المؤمنين `.
قلت: وفي حكم السارية، المنبر الطويل ذي الدرجات الكثيرة، فإنه يقطع الصف
الأول، وتارة الثاني أيضا، قال الغزالي في ` الإحياء ` (2 / 139) :
` إن المنبر يقطع بعض الصفوف، وإنما الصف الأول الواحد المتصل الذي في فناء
المنبر، وما على طرفيه مقطوع، وكان الثوري يقول: الصف الأول، هو الخارج
بين يدي المنبر، وهو متجه لأنه متصل، ولأن الجالس فيه يقابل الخطيب ويسمع
منه `.
قلت: وإنما يقطع المنبر الصف إذا كان مخالفا لمنبر النبي صلى الله عليه وسلم
فإنه كان له ثلاث درجات، فلا ينقطع الصف بمثله، لأن الإمام يقف بجانب الدرجة
الدنيا منها. فكان من شؤم مخالفة السنة في المنبر الوقوع في النهي الذي في هذا
الحديث.
ومثل ذلك في قطع الصف المدافئ التي توضع في بعض المساجد وضعا يترتب منه قطع
الصف، دون أن ينتبه لهذا المحذور إمام المسجد أو أحد من المصلين فيه لبعد
الناس أولا عن التفقه في الدين، وثانيا لعدم مبالاتهم بالابتعاد عما نهى عنه
الشارع وكرهه.
وينبغي أن يعلم أن كل من يسعى إلى وضع منبر طويل قاطع للصفوف أو يضع المدفئة
التي تقطع الصف، فإنه يخشى أن يلحقه نصيب وافر من قوله صلى الله عليه وسلم:
` ... ومن قطع صفا قطعه الله `.
أخرجه أبو داود بسند صحيح كما بينته في ` صحيح أبي داود ` (رقم 672) .
মুআবিয়া ইবনু কুররাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে আমাদের কাতারসমূহের মাঝে স্তম্ভের (পিলার) স্থানে দাঁড়াতে নিষেধ করা হত, এবং আমরা সেখান থেকে কঠোরভাবে বিতাড়িত হতাম।
আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
“যে ব্যক্তি (সালাতের) কোনো কাতার ছিন্ন করে, আল্লাহ তাকে বিচ্ছিন্ন করে দেন।”
336 - ` لأن يمتلئ جوف أحدكم قيحا حتى يريه، خير له من أن يمتلئ شعرا `.
ورد هذا الحديث عن جماعة من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم أبو هريرة
وعبد الله ابن عمر وسعد بن أبي وقاص وأبو سعيد الخدري وعمر وغيرهم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তোমাদের কারো অভ্যন্তর পূঁজ দ্বারা এমনভাবে ভরে যাওয়া যে তা প্রকাশিত হয়ে যায়, তা তার জন্য উত্তম তার অভ্যন্তর কবিতা দ্বারা পূর্ণ হওয়ার চেয়ে।
337 - ` من كان يؤمن بالله واليوم الآخر، فلا يلبس حريرا ولا ذهبا `.
أخرجه الحاكم (4 / 191) من طريق عمرو بن الحارث وغيره عن سليمان ابن عبد
الرحمن عن القاسم عن أبي أمامة الباهلي رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم قال: فذكره.
وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: بل هو حسن، فإن القاسم وهو ابن عبد الرحمن أبو عبد الرحمن صاحب
أبي أمامة، قد تكلم فيه بعضهم، والراجح من مجموع كلام العلماء فيه أنه
حسن الحديث، وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق `.
وسليمان بن عبد الرحمن هو ابن عيسى الدمشقي خراساني الأصل، وثقه ابن معين
والنسائي وغيرهما.
وأما عمرو بن الحارث فهو أبو أيوب المصري ثقة فقيه حافظ.
وأما ` غيره ` الذي أشير إليه في الإسناد فالظاهر أنه عبد الله بن لهيعة، فقد
رأيناه مقرونا مع عمرو بن الحارث في غير ما حديث واحد، وقد أخرجه أحمد من
طريقه فقال (5 / 261) : حدثنا يحيى بن إسحاق أخبرني ابن لهيعة عن سليمان بن
عبد الرحمن به.
وقال المنذري في ` الترغيب ` (3 / 103) :
` رواه أحمد ورواته ثقات `!
وقال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 143) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه ابن لهيعة، وحديثه حسن وفيه ضعف،
وبقية رجاله ثقات `.
قلت: ويؤخذ عليه أنه لم يعزه لأحمد، كما يؤخذ على المنذري أنه لم يعزه
للحاكم، مع أن إسناده أصح، وأنه وثق ابن لهيعة، وفيه الضعف الذي ذكره
الهيثمي.
واعلم أن الحديث فيه دلالة بينة على تحريم الذهب والحرير، وهو بعمومه يشمل
النساء مع الرجال، إلا أنه قد جاءت أحاديث تدل على أن النساء مستثنيات من
التحريم كالحديث المشهور:
` هذان حرام على ذكور أمتي، حل لإناثها `.
إلا أن هذا ليس على عمومه، فقد جاءت أحاديث صحيحة تحرم على النساء جنسا معينا
من الذهب، وهو ما كان طوقا أو سوارا أو حلقة، وكذلك حرم عليهن الأكل
والشرب في آنية الذهب كالرجال، (راجع الأدلة في ` آداب الزفاف `) .
فبقي الحرير وحده مباحا لهن إباحة مطلقة لم يستثن منه شيء.
نعم قد استثنى من جنس المباح لهن أمهات المؤمنين، فقد صح عنه صلى الله عليه
وسلم أنه منع أهله منه كما في الحديث الآتي:
` كان يمنع أهله الحلية والحرير ويقول: إن كنتم تحبون حلية الجنة وحريرها
فلا تلبسوها في الدنيا `.
আবু উমামা আল-বাহিলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহ এবং শেষ দিনের (আখিরাতের) প্রতি ঈমান রাখে, সে যেন রেশম বা সোনা পরিধান না করে।”
338 - ` كان يمنع أهله الحلية والحرير ويقول: إن كنتم تحبون حلية الجنة وحريرها
فلا تلبسوها في الدنيا `.
أخرجه النسائي (2 / 284) وابن حبان (1463) والحاكم (4 / 191) وأحمد
(4 / 145) من طريق عمرو بن الحارث أن أبا عشانة المعافري حدثه أنه سمع عقبة
بن عامر يخبر به.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` قلت: لم يخرجا لأبي عشانة `.
قلت: واسمه حي بن يؤمن، وهو ثقة.
قال السندي في حاشيته على النسائي.
` قوله: ` أهله الحلية ` بكسر فسكون. الظاهر أنه يمنع أزواجه الحلية مطلقا
سواء كان من ذهب أو فضة، ولعل ذلك مخصوص بهم، ليؤثروا الآخرة على الدنيا،
وكذا الحرير، ويحتمل أن المراد بـ (الأهل) الرجال من أهل البيت، فالأمر
واضح `.
قلت: هذا الاحتمال بعيد غير متبادر فالاعتماد على ما ذكره أولا والله أعلم.
وأقول: فهذا الحديث يدل على مثل ما دل عليه الحديث المشهور الذي سبق آنفا من
إباحة الحرير لسائر النساء، إلا أنه قد يقال: إن الأولى بهن الرغبة عنه وعن
الحلية مطلقا تشبيها بنسائه صلى الله عليه وسلم، لاسيما وقد ثبت عنه أنه
قال:
` ويل للنساء من الأحمرين: الذهب والمعصفر `.
উকবা ইবনে আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পরিবারকে অলংকার ও রেশম ব্যবহার করতে নিষেধ করতেন এবং বলতেন: “যদি তোমরা জান্নাতের অলংকার ও রেশম পছন্দ করো, তবে তোমরা দুনিয়াতে তা পরিধান করো না।”
339 - ` ويل للنساء من الأحمرين: الذهب والمعصفر `.
أخرجه ابن حبان (1464) : أخبرنا الحسن بن سفيان حدثنا سريج بن يونس حدثنا
عباد بن عباد عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة عن النبي صلى الله
عليه وسلم قال: فذكره.
وأخرجه البيهقي في ` شعب الإيمان ` (2 / 230 / 2 مصورة المكتب الإسلامي) من
طريق أبي حاتم الرازي حدثنا سريج بن يونس به.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير الحسن بن سفيان
وهو الفسوي ثقة حافظ مشهور.
ومحمد بن عمرو هو ابن علقمة أخرج له البخاري مقرونا ومسلم ومتابعة.
وأما قول المناوي في ` فيض القدير ` بعد أن عزاه تبعا لأصله إلى البيهقي في
` شعب الإيمان `:
` وفيه عباد بن عباد، وثقه ابن معين، وقال ابن حبان: يأتي بالمناكير
فاستحق الترك. نقله الذهبي. ورواه أيضا أبو نعيم في ` الصحابة ` بهذا اللفظ
لكنه قال ` الزعفران ` بدل ` المعصفر `، قال الحافظ العراقي: ضعيف `.
وأقول: ما نقله عن الذهبي هو في ترجمة عباد بن عباد الأرسوفي من ` الميزان `
وليس هو المذكور في إسناد هذا الحديث، بل هو عباد بن عباد ابن حبيب المهلبي
وهو أعلى طبقة من الأرسوفي، وهو الذي ذكروا في شيوخه محمد بن عمرو بن علقمة
وفي الرواة عنه سريج بن يونس، وهو ثقة محتج به في الصحيحين، وترجمته في
` الميزان ` قبيل ترجمة (الأرسوفي) وقال فيه: ` صدوق `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` ثقة ربما وهم `.
فثبت الحديث والحمد لله، وزال ما أعله به المناوي، ولعل ما نقله عن
العراقي من التضعيف إنما هو على أساس توهمه أعني العراقي أن عبادا هو الأرسوفي
فضعفه بسببه. والله أعلم.
ثم نقل المناوي في معنى الحديث عن مسند الفردوس:
` يعني يتحلين بحلي الذهب، ويلبسن الثياب المزعفرة، ويتبرجن متعطرات
متبخترات، كأكثر نساء زمننا، فيفتن بهن `.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “দুই লাল বস্তু—সোনা এবং কুসুম (বা জাফরান) রঙে রঞ্জিত বস্ত্র থেকে নারীদের জন্য দুর্ভোগ (বা সর্বনাশ) রয়েছে।”
340 - ` نعم ليكررن عليكم حتى يرد إلى كل ذي حق حقه `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (ق 45 / 1) عن محمد بن عبيد حدثنا محمد ابن عمرو
عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب عن عبد الله بن الزبير عن الزبير قال:
` لما نزلت هذه الآية * (إنك ميت وإنهم ميتون) * قال الزبير: يا رسول الله
أيكرر علينا ما يكون بيننا في الدنيا مع خواص الذنوب؟ قال: ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات.
ثم أخرجه (46 /
যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: *‘নিশ্চয় আপনি মারা যাবেন এবং তারাও মারা যাবে’* (সূরা যুমার ৩৯:৩০), তখন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ‘হে আল্লাহর রাসূল! দুনিয়াতে আমাদের মাঝে যে লেনদেন ও পাপের বিষয়গুলো সংঘটিত হয়েছে, সেগুলো কি (আখিরাতে) আমাদের সামনে পুনরায় আনা হবে?’
তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘হ্যাঁ, অবশ্যই তোমাদের সামনে তা পেশ করা হবে, যতক্ষণ না প্রত্যেক হকদারকে তার হক (অধিকার) ফিরিয়ে দেওয়া হয়।’
341 - ` البذاذة من الإيمان. يعني التقشف `.
أخرجه ابن ماجه (4118) عن أيوب بن سويد عن أسامة بن زيد عن عبد الله بن
أبي أمامة الحارثي عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات غير أيوب بن سويد قال الحافظ: ` صدوق يخطىء `.
قلت: فهو لا بأس به في المتابعات، وقد توبع، فأخرجه الطبراني في ` المعجم
الكبير ` (1 / 40 / 1) من طريق سعيد بن سلمة بن أبي الحسام حدثني صالح
بن كيسان أن عبد الله بن أبي أمامة بن ثعلبة حدثه عن أبيه به.
وتابعه زهير بن محمد عن صالح به إلا أنه قال: ` صالح بن أبي صالح `.
خرجه الحاكم (1 / 9) وقال:
` احتج مسلم بصالح بن أبي صالح السمان `.
ووافقه الذهبي.
قلت: قد اختلف سعيد بن سلمة وزهير بن محمد في نسبة صالح هذا، فالأول قال:
` ابن كيسان ` والآخر ` ابن أبي صالح `. وفي كل منهما ضعف من قبل حفظه لكن
سعيدا أحسن حالا منه، وسواء كانت روايته أرجح، أو رواية زهير فإن كلا من
الصالحين ثقة في الحديث لاسيما صالح بن كيسان فإنه محتج به في ` الصحيحين `.
وإن مما يرجح أنه هو أنهم ذكروه في الرواة عن عبد الله بن أبي أمامة دون الآخر
والله أعلم.
ثم رأيت الحديث قد أخرجه القضاعي في ` مسند الشهاب ` (6 / 2 / 1) من طريق
زهير فقال: عن صالح بن كيسان، فجزمت بما رجحته وتبين أن ما في ` المستدرك `
وهم من بعض الرواة إن لم يكن من الحاكم نفسه.
وقد أدخل بعض الرواة بين عبد الله بن أبي أمامة وأبيه رجلا، فقال محمد
ابن إسحاق عن عبد الله بن أبي أمامة عن عبد الله بن كعب بن مالك عن أبي أمامة
قال: ` ذكر أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم يوما عنده الدنيا، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` ألا تسمعون، ألا تسمعون؟ إن البذاذة من الإيمان، إن البذاذة من الإيمان.
يعني التقحل `.
أخرجه أبو داود (4161) .
قلت: وابن إسحاق مدلس، وقد عنعنه.
وقد توبع، فرواه إسماعيل بن عياش عن عبد العزيز بن عبيد الله عن عبد الله
بن عبيد الله بن حكيم بن حزام أن أبا المنيب بن أبي أمامة (هو عبد الله
بن أبي أمامة) أخبره أنه لقي عبد الله بن كعب بن مالك: حدثني أبوك قال:
فذكره. أخرجه الطبراني.
ثم روى هو والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1 / 478 و 4 / 151) من طريق
عبد الحميد بن جعفر عن عبد الله بن ثعلبة عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك
قال: سمعت أباك يقول: فذكره.
قلت: ورجال هذه الطريق ثقات كلهم، بخلاف التي قبلها، ففيها عبد العزيز
ابن عبيد الله وهو الحمصي ضعيف. وشيخه عبد الله بن عبيد الله بن حكيم
بن حزام لم أجد له ترجمة.
وهي متفقة مع الطريق التي قبلها على تسمية الرجل بـ ` عبد الله بن كعب `
خلافا للطريق الأخيرة، ففيها ` عبد الرحمن بن كعب `، وهي أجود. وكل من
عبد الله وعبد الرحمن ثقة.
ومجموع هذه الطرق الثلاث تحملنا على الاقتناع بثبوت الواسطة بين عبد الله
بن أبي أمامة وأبيه.
ويؤيد ذلك ما روى الطبراني أيضا بسند صحيح عن المنيب بن عبد الله بن أبي أمامة
بن ثعلبة قال:
` انصرفت من المسجد، فإذا برجل عليه ثياب بيض، وقميص ورداء سابغ، وعمامة
بغير قلنسوة، قد أرخى من ورائه مثل ما بين يديه، فقال لي:
أخبرني جدك أبو أمامة بن ثعلبة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
والظاهر أن هذا الرجل الذي لم يسم هو ابن كعب بن مالك، وعلى هذا فيكون قد
حدث بهذا الحديث عبد الله بن أبي أمامة على ما سبق في الطرق المتقدمة، وابنه
المنيب على ما في روايته هذه، ولكن المنيب هذا مجهول ما روى عنه سوى ابنه
عبد الله، وهو الذي روى هذا الحديث عنه، ولذلك فلا يعتمد على روايته.
وخلاصة القول أن الرواة قد اختلفوا على عبد الله بن أبي أمامة في هذا
الحديث فأسامة بن زيد وصالح بن كيسان قالا: عنه عن أبيه. ومحمد بن إسحاق
وعبد الله بن عبيد الله بن حليم وعبد الحميد بن جعفر قالوا: عنه عن ابن كعب
بن مالك عن أبي أمامة.
ويبدو أن رواية هؤلاء الثلاثة أرجح لأنهم أكثر، ولأن معهم زيادة علم.
ومن علم حجة على من لم يعلم.
ثم اختلف هؤلاء الثلاثة في تسمية ابن كعب، فالأولان سمياه عبد الله، وسماه
عبد الحميد بن جعفر عبد الرحمن. ولا شك عندي في أن روايته أصح من روايتهما
لأنه ثقة احتج به مسلم، وكذلك سائر الرواة، فالاعتماد في تقوية الحديث على
هذا الطريق، لثقة رواتها وسلامتها من العلل، فلنسق إسنادها بكامله لزيادة
الاطمئنان لما ذكرنا. قال الطبراني رحمه الله: حدثنا محمد بن عبد الله
الحضرمي أنبأنا أحمد بن عاصم بن عنبسة العباداني أنبأنا عبد الله بن حمران
أنبأنا عبد الحميد بن جعفر عن عبد الله بن ثعلبة عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك
قال سمعت أباك يقول:
سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره باللفظ المذكور أعلاه، وهو
لفظ ابن ماجه.
ومحمد بن عبد الله الحضرمي ثقة حافظ وهو الملقب بـ (مطين) ، وترجمته في
` تذكرة الحفاظ ` (2 / 210) .
وأحمد بن عاصم بن عنبسة العباداني صدوق كما قال الحافظ في ` التقريب ` وتابعه
إبراهيم بن مرزوق عند الطحاوي، ولا بأس، وبقية الرجال ثقات رجال مسلم غير
عبد الله بن أبي أمامة وهو صدوق أيضا.
وكان الحامل على تحرير هذا أنني رأيت الحافظ المنذري قد نقل عن بعض المحدثين
ما يشعر بتضعيفه للحديث، ولم يحرر القول فيه، ولو بإيجاز مع وقوع
خطأ منه،
فاقتضى تحقيق القول فيه، فقد قال: (3 / 107) :
` رواه أبو داود وابن ماجه كلاهما من رواية محمد بن إسحاق، وقد تكلم أبو عمر
النمري في هذا الحديث `.
فأقول: وغالب الظن أن الكلام المشار إليه إنما هو الاختلاف الذي في إسناده،
وقد بينا الراجح منه فلا يضره.
وأيضا فإن الحديث ليس عند ابن ماجه من رواية محمد بن إسحاق، كما سبق ذكره في
أول البحث، فاقتضى التنبيه.
ثم إن السيوطي قد عزى الحديث للإمام أحمد أيضا، ومع أن الحاكم قد أخرجه من
طريقه، فإني لم أره في ` المسند ` له، وهو المراد عند إطلاق العزو إليه.
وذكر المناوي في شرحه عليه:
أن الحافظ العراقي قال في ` أماليه `: ` حديث حسن `.
والديلمي: ` هو صحيح `. وكذا قال الحافظ في ` الفتح `.
ثم رأيت للحديث طريقا أخرى، فقال الحميدي في ` مسنده ` (357) :
حدثنا سفيان قال: حدثنا محمد بن إسحاق عن معبد بن كعب عن عمه أو أمه قال:
` تعلمن يا هؤلاء أن البذاذة من الإيمان `.
وابن إسحاق مدلس، وقد عنعنه، وقد سبق من طريقه بإسناد آخر له.
কা’ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
সাদাসিধা জীবনযাপন (বা অনাড়ম্বরতা) ঈমানের অংশ। (এর অর্থ হলো: মিতব্যয়িতা বা সংযম অবলম্বন করা)।
342 - ` إنما العلم بالتعلم والحلم بالتحلم ومن يتحر الخير يعطه ومن يتوق الشر
يوقه `.
أخرجه الخطيب في ` تاريخه ` (9 / 127) أخبرنا علي بن أحمد الرزاز حدثنا
عبد الصمد بن علي الطستي حدثنا أحمد
بن بشر بن سعد المرثدي حدثنا سعد بن زنبور
حدثنا إسماعيل بن مجالد عن عبد الملك بن عمير عن رجاء بن حيوة عن أبي هريرة
مرفوعا به.
وهذا إسناد حسن أو قريب من الحسن: علي بن أحمد الرزاز قال الذهبي صدوق وله
ترجمة عند الخطيب (11 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
ইলম (জ্ঞান) তো কেবল শেখার মাধ্যমেই অর্জিত হয়, আর সহনশীলতা (ধৈর্য) আসে ধৈর্য চর্চার মাধ্যমে। যে ব্যক্তি কল্যাণের সন্ধান করে, তাকে তা প্রদান করা হয়, আর যে ব্যক্তি মন্দ থেকে বাঁচতে চায়, তাকে তা থেকে রক্ষা করা হয়।
343 - ` كف عنا جشاءك، فإن أكثرهم شبعا في الدنيا، أطولهم جوعا يوم القيامة `.
روي من حديث ابن عمر وأبي جحيفة، وابن عمرو، وابن عباس، وسلمان.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:) “তুমি আমাদের সামনে তোমার ঢেঁকুর দেওয়া বন্ধ করো। কারণ যারা দুনিয়াতে সবচেয়ে বেশি পরিতৃপ্ত হয় (অর্থাৎ পেট ভরে খায়), কিয়ামতের দিন তারাই সবচেয়ে দীর্ঘকাল ক্ষুধার্ত থাকবে।”
Null
অনুবাদ করার জন্য হাদিসের আরবি মূল পাঠ এবং বর্ণনাকারীর নাম প্রদান করা হয়নি। অনুগ্রহ করে মূল টেক্সটটি সরবরাহ করুন।
345 - 346) من طريق الطبراني،
وقال: ` لم يروه عن فضيل إلا يحيى بن سليمان القرشي وفيه مقال `.
وقال العراقي في ` تخريج الإحياء ` (3 / 71) : ` إسناده ضعيف `.
(৩৪৩-৩৪৩) ইমাম তাবারানির সূত্রে (বর্ণিত)।
তিনি (তাবারানি) বলেছেন: ‘ফুযাইল থেকে এটি কেবল ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-কুরাশি বর্ণনা করেছেন এবং তার (ইয়াহইয়ার) ব্যাপারে আলোচনা (সমালোচনা) রয়েছে।’
আর আল-ইরাকি ‘তাখরিজুল ইহয়া’ গ্রন্থে (৩/৭১) বলেছেন: ‘এর সনদ দুর্বল।’
346 - ` إذا حدثتكم حديثا فلا تزيدن علي وقال: أربع من أطيب الكلام وهن من القرآن
لا يضرك بأيهن بدأت: سبحان الله والحمد لله ولا إله إلا الله والله أكبر،
ثم قال: لا تسمين غلامك أفلح، ولا نجيحا، ولا رباحا، ولا يسارا (فإنك
تقول: أثم هو؟ فلا يكون، فيقول: لا) `.
أخرجه أحمد (5 / 11) : حدثنا محمد بن جعفر حدثنا شعبة عن سلمة بن كهيل عن
هلال بن يساف عن سمرة عن النبي صلى الله عليه وسلم.
وأخرجه الطيالسي في ` مسنده ` (899، 900) : حدثنا شعبة به مفرقا في موضعين
وتابعه سفيان وهو الثوري عن سلمة بن كهيل به، دون شطره الأول، والأخير.
أخرجه أحمد (5 / 20) وابن ماجه (3811) .
ولشعبة فيه شيخ آخر، فقال الطيالسي (893) : حدثنا شعبة عن منصور قال: سمعت
هلال بن يساف يحدث عن الربيع بن عميلة عن سمرة به مقتصرا على تسمية الغلام.
وكذلك أخرجه أحمد (5 / 7) ومسلم (6 / 172) من طرق أخرى عن شعبة به.
وتابعه زهير عن منصور به أتم منه مثل رواية شعبة الأولى عن ابن كهيل، إلا أنه
جعل الشطر الأول في آخر الحديث، وفيه الزيادة التي بين القوسين.
أخرجه أحمد (5 / 10) ومسلم.
ويتبين مما سبق أن هلال بن يساف، كان تارة يرويه عن سمرة مباشرة، وتارة عن
الربيع بن عميلة عنه، فلعله سمعه أولا على هذا الوجه، ثم لقي سمرة فسمعه منه
مباشرة، فكان يرويه تارة هكذا، وتارة هكذا، وهو ثقة غير معروف بالتدليس،
فيحتمل منه ذلك.
وقد تابعه الركين بن الربيع بن عميلة عن أبيه عن سمرة بقضية التسمية فقط، إلا
أنه ذكر ` نافعا ` مكان ` نجيحا `.
أخرجه مسلم وأحمد (5 / 12) .
وفي الحديث آداب ظاهرة، وفوائد باهرة، أهمها النهي عن الزيادة في حديثه
صلى الله عليه وسلم، وهذا وإن كان معناه في رواية حديثه ونقله، فإنه يدل
على المنع من الزيادة فيه تعبدا قصدا للاستزادة من الأجر بها من باب أولى،
وأبرز صور هذا، الزيادة على الأذكار والأوراد الثابتة عنه صلى الله عليه
وسلم، كزيادة ` الرحمن الرحيم ` في التسمية على الطعام، فكما أنه لا يجوز
للمسلم أن يروى قوله صلى الله عليه وسلم المتقدم (344) :
` قل: بسم الله ` بزيادة ` الرحمن الرحيم `، فكذلك لا يجوز له، أن يقول هذه
الزيادة على طعامه، لأنه زيادة على النص فعلا، فهو بالمنع أولى، لأن قوله
صلى الله عليه وسلم: ` قل باسم الله ` تعليم للفعل، فإذا لم يجز الزيادة في
التعليم الذي هو وسيلة للفعل، فلأن لا يجوز الزيادة في الفعل الذي هو الغاية
أولى وأحرى. ألست ترى إلى ابن عمر رضي الله عنه أنه أنكر على من زاد الصلاة
على النبي صلى الله عليه وسلم بعد الحمد عقب العطاس، بحجة أنه مخالف لتعليمه
صلى الله عليه وسلم، وقال له: ` وأنا أقول: الحمد لله، والسلام على رسول
الله صلى الله عليه وسلم، ولكن ليس
هكذا علمنا رسول الله صلى الله عليه وسلم
علمنا إذا عطس أحدنا أن يقول: الحمد لله على كل حال `.
أخرجه الحاكم (4 /
সামুরা ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ ﷺ বলেছেন: যখন আমি তোমাদের কোনো হাদিস বর্ণনা করি, তখন তোমরা আমার ওপর (কোনো কথা) বাড়িয়ো না।
আর তিনি (নবী ﷺ) বলেন: চারটি কথা হলো সর্বোত্তম কথার অন্তর্ভুক্ত এবং এইগুলি কুরআন শরীফেরও অংশ। এইগুলোর মধ্যে তুমি যে কোনো একটি দিয়ে শুরু করো না কেন, তোমার কোনো ক্ষতি হবে না: ’সুবহানাল্লাহ’ (আল্লাহ পবিত্র), ’আলহামদুলিল্লাহ’ (সকল প্রশংসা আল্লাহর জন্য), ’লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই), এবং ’আল্লাহু আকবার’ (আল্লাহ মহান)।
এরপর তিনি বললেন: তোমরা তোমাদের গোলামের নাম রাখবে না ‘আফলাহ’ (সফল), ‘নাজীহ’ (উত্তীর্ণ), ‘রাবাহ’ (মুনাফা) কিংবা ‘ইয়াসার’ (স্বচ্ছলতা)। (কারণ তুমি জিজ্ঞেস করবে: ‘সে কি সেখানে আছে?’ যদি সে সেখানে না থাকে, তখন (অন্য ব্যক্তি) বলবে: ‘না’।)