হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3367)


3367 - (إني أجد نفس الرحمن من هنا - يشير إلى اليمن) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (7/60/6358) : حدثنا أبو زرعة: ثنا أبو اليمان: ثنا إسماعيل بن عياش عن الوليد بن عبد الرحمن. (ح) ثنا بكر بن سهل: ثنا عبد الله بن يوسف: ثنا عبد الله بن صالح الحمصي: حدثني إبراهيم بن سليمان الأفطس عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشي عن جبير بن نفير: حدثني سلمة بن نفيل السكوني قال:
دنوت من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ، حتى كادت ركبتاي تمسان فخذه، فقلت: يارسول الله! تركت الخيل، وألقي السلاح، وزعم أقوام أن لا قتال! فقال:
`كذبوا! الآن جاء القتال، لا تزال من أمتي أمة قائمة على الحق، ظاهرة على الناس، يزيغ الله قلوب قوم قاتلوهم لينالوا منهم `.
وقال وهو مول ظهره إلى اليمن: ... فذكر الحديث، وزاد:
`ولقد أوحي إلي أني مكفوف (¬1) غير ملبث، وتتبعوني أفناداً، والخيل معقود
في نواصيها الخير إلى يوم القيامة، وأهلها معانون عليها`.
قلت: واسناده صحيح من الوجه الأول عن الوليد بن عبد الرحمن، وهو ثقة
من رجال مسلم.
وفي الوجه الآخر بكر بن سهل؛ فيه ضعف.
وشيخ عبد الله بن صالح الحمصي لم أعرفه! ثم تبين أن اسم أبيه محرف، صوابه (سالم) ، فقد رأيت البيهقي قد أخرج الحديث في `الأسماء والصفات ` (ص




সালামাহ ইবনে নুফাইল আস-সাকুনী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর এত কাছে গেলাম যে আমার হাঁটু প্রায় তাঁর উরুকে স্পর্শ করছিল। তখন আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! ঘোড়া ছেড়ে দেওয়া হয়েছে, অস্ত্র ফেলে দেওয়া হয়েছে, আর কিছু লোক মনে করে যে এখন আর কোনো যুদ্ধ নেই!

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) বললেন: ’তারা মিথ্যা বলেছে! এখনই জিহাদের (যুদ্ধের) সময় এসেছে। আমার উম্মতের মধ্যে সর্বদা একটি দল হকের (সত্যের) ওপর প্রতিষ্ঠিত থাকবে, যারা মানুষের ওপর বিজয়ী থাকবে। আল্লাহ এমন এক জাতির হৃদয়কে পথভ্রষ্ট করবেন যারা তাদের সাথে যুদ্ধ করবে এবং তাদের (ঐ সত্যপন্থীদের) ক্ষতি করার চেষ্টা করবে।’

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ), তাঁর পিঠ ইয়ামানের দিকে ফিরিয়ে থাকা অবস্থায়, বললেন: ’নিশ্চয়ই আমি এই দিক (ইয়ামান) থেকে দয়াময়ের (আল্লাহর) প্রশান্তি অনুভব করছি।’

তিনি আরও বলেন: ’আর নিশ্চয়ই আমার কাছে ওহী এসেছে যে আমি দ্রুতই (দুনিয়া থেকে) তুলে নেওয়া হব, বেশি দিন থাকব না। আর তোমরা আমার পরে দলে দলে বিভক্ত হয়ে যাবে। আর কেয়ামত পর্যন্ত ঘোড়ার কপালে কল্যাণ বাঁধা থাকবে এবং এর মালিকদেরকে এগুলোর জন্য সাহায্য করা হবে।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3368)


3368 - لما نزلت هذه الآية: (يا أيها الذين آمنوا من يرتد منكم عن دينه فسوف يأتي الله بقوم يحبهم ويحبونه) ؛ أوْمأ رسول الله - صلى الله عليه وسلم - إلى أبي موسى بشيء كان معه، فقال:
`هم قوم هذا `) .
أخرجه الحاكم (2/313) ، وابن أبي شيبة في `المصنف ` (12/125) ، وابن سعد في `الطبقات ` (4/107) ، وابن جرير في `التفسير` (6/183) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (17/371/1016) من طرق عن شعبة عن سماك بن حرب عن عياض الأشعري قال: ... فذكره. وقال الحاكم:
`صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
وقال الهيثمي في `المجمع ` (7/16) :
`رواه الطبرا ني، ورجاله رجال الصحيح `.
وأقول: عياض: هو ابن عمرو الأشعري، مختلف في صحبته. فقال الحافظ
في التقريب:
`صحابي، له حديث، وجزم أبو حاتم بأن حديثه مرسل، وأنه رأى أبا عبيدة
ابن الجراح؛ فيكون مخضرماً `.
قلت: وقد جاء موصولاً؛ فقال ابن جرير: حدثنا ابن المثنى قال: ثنا أبو الوليد قال: ثنا شعبة عن سماك بن حرب، قال: سمعت عياضاً يحدث عن أبي موسى: أن النبي - صلى الله عليه وسلم - قرأ هذه الآية ... الحديث نحوه.
قلت: وهذا إسناد صحيح متصل؛ فإن أبا الوليد هذا - واسمه هشام بن
عبد الملك - ثقة ثبت من رجال الشيخين؛ كما في `التقريب `، فالظاهر أن شعبة كان يرسله تارة ويسنده أخرى، فقد تابعه على إسناده عبد الصمد بن عبد الوارث: حدثنا شعبة به:
أخرجه ابن أبي حاتم في `تفسيره ` (3/13/1) .
ويشهد لهذا المسند: أنه قد توبع عليه من عبد الله بن إدريس عن أبيه عن سماك بن حرب به.
أخرجه البيهقي في `دلائل النبوة` (5/ 351) من طريق عبد الله بن أحمد بن حنبل قال: ثنا أبو معمر: حدثنا عبد الله بن إدريس به.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم أيضاً؛ غير عبد الله بن أحمد، وهو ثقة، وكذلك من دونه.
وللحديث شواهد:
أولاً: عن معاوية بن حفص قال: حدثنا أبو زياد - يعني: إسماعيل بن زكريا -
عن محمد بن قيس عن محمد بن المنكدر عن جابر قال:
سئل رسول الله - صلى الله عليه وسلم - عن قوله: (فسوف يأتي الله بقوم يحبهم ويحبونه) ؟ قال: `هؤلاء قوم من اليمن، ثم من كندة، ثم من السكون، ثم من تجيب `.
أخرجه ابن أبي حاتم أيضاً، والطبراني في `المعجم الأوسط ` (2/232/1414) ، وقال - والسياق له - :
`لم يروه عن محمد بن قيس الأسدي إلا أبو زياد، ولا عن أبي زياد إلا معاوية، تفرد به أبو حميد`.
كذا قال! ولم يتفرد به - وهو ثقة - ؛ فقد تابعه محمد بن المصفى عند ابن أبي حاتم، ولكنه مضعف، قال الحافظ:
`صدوق، له أوهام، وكان يدلس `.
قلت: وقد صرح بالتحديث، لكنه لم يذكر في إسناده: (محمد بن قيس الأسدي) ، فلعل ذلك من أوهامه! وعلى كل حال فالإسناد جيد، رجاله كلهم ثقات؛ غير معاوية بن حفص - وهو الشعبي الحلبي - ، قال الحافظ:
` صد وق `.
ولذلك قال الهيثمي:
`رواه الطبراني في `الأوسط `، وإسناده حسن `.
ثانياً: قال ابن أبي حاتم: حدثنا أبو سعيد الأشج: حدثنا عبد الله بن الأجلح عن محمد بن عمرو عن سالم عن سعيد بن جبير عن ابن عباس مثل حديث جابر؛ لكنه لم يذكر: `ثم من تُجِيبَ `.
وإسناده جيد حسن؛ ومحمد بن عمرو: هو ابن علقمة المدني، وسالم هو ابن عبد الله بن عمر. وقد روي عن أبيه شيء من هذا؛ وهو:
ثالثاً: أخرج البخاري في `تاريخه ` عن القاسم بن مخيمرة قال:
أتيت ابن عمر، فرحب بي ثم تلا: (من يرتد منكم عن دينه فسوف يأتي
الله بقوم يحبهم) ، ثم ضرب على منكبي؛ وقال:
أحلف بالله؛ إنهم منكم أهل اليمن (ثلاثاً) .
ذكره السيوطي في `الدر المنثور` (2/292) .
رابعاً: قال شريح بن عبيد:
لما أنزل الله: (يا أيها الذين آمنوا من يرتد منكم عن دينه ... ) إلى آخر الآية؛ قال عمر: أنا وقومي هم يا رسول الله؟! قال:
`لا، بل هذا وقومه `؛ يعني: أبا موسى الأشعري.
أخرجه ابن جرير. وإسناده مرسل صحيح رجاله كلهم ثقات؛ فهو شاهد قوي
في الجملة. والله سبحانه وتعالى أعلم. *******




আবু মুসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: (অর্থাৎ: “হে মুমিনগণ! তোমাদের মধ্যে যে কেউ তার দ্বীন থেকে ফিরে যাবে, অচিরে আল্লাহ এমন এক সম্প্রদায়কে আনবেন, যাদেরকে তিনি ভালোবাসবেন এবং তারাও তাঁকে ভালোবাসবে”) – তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবু মুসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে অথবা তাঁর কাছে থাকা কোনো কিছুর দিকে ইশারা করে বললেন, “এরা হলো এই ব্যক্তির সম্প্রদায়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3369)


3369 - (لما نزلت: (إذا جاء نصر الله والفتح) ، قال: أتاكم أهل اليمن؛ هم أرق قلوباً، الإيمان يمان، الفقه يمان، الحكمة يمانية) .
أخرجه عبد الرزاق في `تفسيره ` (2/ 404) ومن طريقه أحمد في `مسنده ` (2/277) : أنا هشام بن حسان عن محمد بن سيرين قال: سمعت أبا هريرة يقول: ... فذ كره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وقد أخرجه مسلم (1/52) وغيره من طريق أخرى عن ابن سيرين به دون الآية.
وكذلك أخرجه هو، والبخاري (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন (সূরা আন-নাসরের আয়াত) ‘ইযা জাআ নাসরুল্লাহি ওয়াল ফাতহ’ (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আগমন করে) অবতীর্ণ হলো, তখন (নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: “তোমাদের কাছে ইয়ামানবাসীরা এসেছে; তাদের অন্তর কোমলতর। ঈমান হলো ইয়ামানের, ফিকহ (ইসলামী জ্ঞান বা গভীর উপলব্ধি) হলো ইয়ামানের এবং হিকমতও (প্রজ্ঞা) হলো ইয়ামানের।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3370)


3370 - (كُفْرٌ بامْرِئ ادِّعاءُ نَسَبٍ لا يَعْرِفُه، أو جَحْدُهُ وإن دقَّ) .
أخرجه ابن ماجه (2/916/2744) ، والطبراني في `المعجم الأوسط ` (8/446/7915) و`الصغير` (ص 222 هند) من طريقين عن يحيى بن سعيد: حدثني عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - !: ... فذكره. قلت: وهذا إسناد حسن. وقول الطبراني فيه:
`لم يروه عن يحيى بن سعيد إلا أبو ضمرة أنس بن عياض `! فهو بالنسبة لما أحاط به علمه؛ وإلا فهو عند ابن ماجه من طريق سليمان بن بلال عن يحيى. وهذا ثبت في بعض نسخ `ابن ماجه ` دون بعض؛ كما نبه على ذلك الحافظ في `النكت الظراف ` (6/




আমর ইবনু শুআইব-এর দাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: কোনো ব্যক্তির জন্য এটা কুফরী কাজ যে সে এমন বংশের দাবি করে, যা সে জানে না; অথবা যদি সে নিজের বংশ (পরিচয়) অস্বীকার করে, যদিও তা সামান্য বা তুচ্ছ হয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3371)


3371 - (من شاب شيبةً في سبيل الله (وفي رواية: في الإسلام) ؛ كانت له نوراً يوم القيامة. فقال رجل عند ذلك: فإن رجالاً ينتفون الشيب؟ فقال:
من شاء؛ فلينتف نوره) .
أخرجه أحمد (6/20) : ثنا قتيبة بن سعيد: ثنا ابن لهيعة عن يزيد بن أبي
حبيب عن عبد العزيز بن أبي الصعبة عن حنش (¬1) عن فضالة بن عبيد أن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
ومن هذا الوجه: أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (18/304ـ 305) ؛
إلا أنه جمع بين الروايتين فقال:
`في الإسلام في سبيل الله `.
وأخرجه البزار (3/371/2973) من طريق أبي الأسود النضر بن عبد الجبار المصري: ثنا ابن لهيعة ... بالرواية الأخرى.
وابن عدي في `الكامل ` (4/152) من طريق ثالث عن ابن لهيعة به مختصراً.
وقد تابعه يحيى بن أيوب عن يزيد بن أبي حبيب ... بالرواية الأخرى.
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (18/304/782) ، وفي` الأوسط ` أيضاً (6/231/5489) من طريق وهب بن جرير بن حازم: ثنا أبي قال: سمعت يحيى ابن أيوب به.
وأخرجه البيهقي في `الشعب ` (5/210/6388) - من هذين الطريقين عن يزيد بن أبي حبيب - وكذا الشجري في `الأمالي ` (2/242) من طريق الطبراني من الوجهين.
إذا ثبت هذا؛ فرجال الإسناد كلهم ثقات معروفون؛ غير عبد العزيز بن أبي الصعبة؛ فقد ذكره ابن حبان في `الثقات ` (7/ 111) ؛ ومع أنه لم يرو عنه غير
¬_________
(¬1) قلت: وقع فيه: (حسن) مكان: (حنش) ! وهو خطأ قديم من بعض الرواة، كما بينت في `تيسير الانتفاع `، وهو ابن عبد الله الصنعاني الدمشقي.
يزيد هذا، وعمران بن موسى، ومع ذلك ` قال ابن المديني:
`ليس به بأس، معروف`.
فهو حسن الحديث إن شاء الله تعالى، وهو الذي كنت جنحت إليه فيما تقدم تحت حديث ابن عدي المشار إليه آنفاً برقم (1244) .
وإنما أعدت تخريجه هنا بشيء زائد في الفائدة والتخريج: أنني رأيت المنذري في `الترغيب ` - وأنا في صدد تهيئة الجزء الثاني والثالث من `صحيح الترغيب ` - رأيته قد أعل الحديث بابن لهيعة؛ فقال (3/113/2) :
`رواه البزار، والطبراني في `الكبير`، و`الأوسط ` من رواية ابن لهيعة، وبقية إسناده ثقات `!
قلت: ونحوه في `مجمع الزوائد` (5/158) !
فأقول: في هذا التخريج - على إيجازه - أمور عجيبة من الخلط؛ لم ينبه عليها الحافظ الناجي:
أولاً: لم يعزواه لأحمد، وهو أولى بالعزو لجلالته وعلو طبقته؛ كما هو معلوم.
ثانياً: غفلا عن متابعة يحيى بن أيوب - وهو الغافقي المصري - لابن لهيعة في `كبير الطبراني `، فلم يبق وجه لإعلاله بابن لهيعة، وقد كان من آثارها أن اغتر بهذا الإعلال المعلقون الثلاثة؛ فضعفوا الحديث!
ثالثاً: أخطأا في نسبة رواية ابن لهيعة للطبراني في `الأوسط `، وإنما عنده المتابعة المذكورة
رابعاً: لا يتوجه الإعلال المذكور بالنسبة لرواية قتيبة بن سعيد عن ابن لهيعة؛ لأنها صحيحة ملحقة برواية العبادلة عنه؛ كما في ترجمة ابن لهيعة في `سير أعلام النبلاء` (8/15) ، وقد سبق بيان هذا في غيرما موضع. ********




ফাদ্বালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (অন্য এক বর্ণনায়: ইসলামের মধ্যে) একটি শুভ্র চুল (পাক) লাভ করেছে, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য জ্যোতি (নূর) হবে।"

তখন সেখানে উপস্থিত একজন লোক জিজ্ঞাসা করল: "কিছু লোক তো তাদের পাকা চুল তুলে ফেলে দেয়?"

তিনি বললেন: "যে চায়, সে যেন তার জ্যোতি (নূর) তুলে ফেলে দেয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3372)


3372 - (إن أطول الناس جوعاً يوم القيامة؛ أكثرهم شبعاً في الدنيا)
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (22/126/327) : حدثنا عبدان بن أحمد: ثنا محمد بن خالد الكوفي: ثنا إسحاق بن منصور: ثنا عبد السلام بن حرب عن أبي رجاء عن أبي جحيفة قال:
تجشأت عند النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فقال:
`ما أكلت يا أبا جحيفة؟! `. فقلت: خبز ولحم، فقال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين؛ غير محمد بن خالد الكوفي، وأنا أظن أنه الذي في `ثقات ابن حبان ` (9/133) :
`محمد بن خالد بن صالح التميمي، أبو عبد الله، كوفى، يروي عن أبى
نعيم وأهل بلده، حدثنا عنه محمد بن المنذر بن سعيد وغيره `.
قلت: أظنه هذا؛ لأنه من هذه الطبقة؛ فإن عبدان بن أحمد، الثقة الحافظ من طبقة محمد بن المنذر بن سعيد، هذا توفي سنة ثلاث وثلاثمائة، وذاك توفي سنة ست وثلاثمائة.
وخفي حاله على الهيثمي فلم يعرفه، فقال في `المجمع ` (5/31) :
`رواه الطبراني في ` الأوسط `، و`الكبير` بأسانيد، وفي أحد أسانيد ` الكبير`
محمد بن خالد الكوفي، ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات `.
قلت: وهذا النفي منه هو الذي أهاب بي لتخريج الحديث هنا مرة أخرى، بعد أن كنت خرجته قديماً عن جمع من الصحابة منهم أبو جحيفة هذا، ومن ثلاثة طرق عنه، منها طريق أبي رجاء هذه، في المجلد الأول من هذه السلسلة برقم (343) ، وفي الطبعة الجديدة منه نقلت فيه النفي المذكور دون أي تعقيب عليه؛ لأن المصادر التي ساعدتني الآن على معرفة محمد بن خالد الكوفي هذا لم تكن مطبوعة يومئذ؛ مثل `ثقات ابن حبان `، و`معجم الطبراني الكبير`.
وقد كنت نقلت عن المنذري أنه قال في أحد إسنادي البزار: `رواته ثقات `.
ولما وقفت على إسناده بواسطة `كشف الأستار`؛ جودت إسناده في الطبعة الجديدة قائلاً:
`فهو جيد، رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير شيخ البزار: العباس بن جعفر - وهو البغدادي - ؛ ثقة `.
ولم أكن أعلم أنه متابع لمحمد بن خالد لما ذكرت من فقد `المعجم الكبير`، والآن وبمقابلة إسناده بإسناد البزار؛ فقد تبينت المتابعة؛ فإن إسناد البزار هكذا: `حدثنا العباس بن جعفر: ثنا إسحاق بن منصور به `.
فهذه متابعة قوية لمحمد بن خالد تدل على أنه قد حفظ الحديث، ولذلك فما كان ينبغي للهيثمي أن يعله به، ولو فرض أنه مجهول لا يعرف؛ كما هو معلوم عن العارفين بهذا العلم، ولكن يظهر أنه فاتته رواية البزار هذه فلم يقف على المتابعة، فقال ما قال! يدل على ذلك عدم عزوه إياه، بخلاف المنذري رحمه الله تعالى.
فهذا هو السبب في إعادة تخريج الحديث.
ثم رأيت البيهقي أخرجه في `الشعب ` (5/26/5643) من طريق عبيد الله ابن أحمد بن منصور الكسائي الهمداني: ثنا محمد بن خليد (¬1) الحنفي: ثنا عبد الواحد بن زياد، عن مسعر عن علي بن الأقمر عن عون بن أبي جحيفة عن أبيه به.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات ` غير محمد بن خليد الحنفي ` ضعفه ابن منده وابن حبان والدارقطني؛ كما في `اللسان `.
وعبيد الله بن أحمد بن منصور الكسائي؛ ترجمه الخطيب في `التاريخ`
(10/339ـ 340) ، وروى عن الحافظ أبي الفضل صالح بن أحمد أنه قال:
`محله الصدق`.
والمعروف: عن علي بن الأقمر عن أبي جحيفة مباشرة، وقد كنت خرجته هناك قديماً من وجهين عنه، أحدهما: من طريق مالك بن مغول عنه به؛ لكن أعله أحمد، فلما وقفت على رواية مسعر عنه؛ بادرت إلى إخراجها والنظر في إسنادها، فتبين ضعفها، فالعمدة في تصحيح الحديث على الإسناد الذي صدرت به التخريج، مع الشواهد المذكورة هناك، والله ولي التوفيق.
وإن مما يحسن التنبيه عليه هنا: أنني كنت ذكرت هناك في الشواهد حديث ابن عباس، ونقلت تضعيفه عن الحافظ العراقي، وتضعيف رواية (يحيى بن سليمان الحفري) من أبي نعيم في `الحلية`.
تم رأيت الهيثمي قد ذكر الحديث في `المجمع ` (10/250 ـ 251) ، ومال إلى تقوية الراوي بقوله:
¬_________
(¬1) الأصل: (خالد) ، والتصحيح من `تاريخ بغداد`.
`رواه الطبراني، وفيه (يحيى بن سليمان الحفري) ، وقد تقدم الكلام عليه.. وبقية رجاله ثقات `.
وفي المكان الذي أشار إليه؛ ساق حديثاً آخر عن ابن مسعود قد خرجته في `الضعيفة ` (6650) ، وبينت هناك حال (يحيى الحفري) هذا، وأن قول الذهبي فيه: `ما علمت به بأساً `! ليس له وجه، فلا داعي للإعادة. ********




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট ঢেঁকুর তুললাম। তিনি আমাকে বললেন: "হে আবু জুহাইফা! তুমি কী খেয়েছ?" আমি বললাম: রুটি ও গোশত। তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন:

"নিশ্চয়ই কিয়ামতের দিন যে ব্যক্তি সবচেয়ে দীর্ঘক্ষণ ধরে ক্ষুধার্ত থাকবে, সে হলো সেই ব্যক্তি যে দুনিয়াতে সবচেয়ে বেশি পরিতৃপ্ত ছিল।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3373)


3373 - (يجيء الرجل يوم القيامة من الحسنات ما يظن أنه ينجو بها، فلا يزال يقوم رجل قد ظلمه مظلمة، فيؤخذ من حسناته؛ فيعطى المظلوم حتى لا تبقى له حسنة، ثم يجيء من قد ظلمه؛ ولم يبق من حسناته شيء، فيؤخذ من سيئات المظلوم فتوضع على سيئاته) .
أخرجه البزار في مسنده `البحر الزخار` (6/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

কিয়ামতের দিন এমন লোক আসবে যার নিকট এত বেশি নেকী থাকবে যে সে মনে করবে, এই নেকীগুলোর কারণে সে মুক্তি পেয়ে যাবে। কিন্তু এরপর সে এমন ব্যক্তির সম্মুখীন হবে, যার প্রতি সে দুনিয়াতে কোনো যুলুম করেছিল। তখন তার নেকী থেকে নিয়ে সেই নির্যাতিত ব্যক্তিকে দেওয়া হতে থাকবে, যতক্ষণ না তার আর কোনো নেকী বাকি থাকে। এরপর যদি আরো কোনো মাযলুম ব্যক্তি তার কাছে আসে, অথচ তার আর কোনো নেকী অবশিষ্ট নেই, তখন সেই মাযলুম ব্যক্তির গুনাহসমূহ নিয়ে তার (যালেম ব্যক্তির) গুনাহের উপর চাপিয়ে দেওয়া হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3374)


3374 - (ثلاثة لا يرد الله دعاءهم: الذاكر الله كثيراً، ودعوة المظلوم، والإمام المقسط) .
أخرجه البزار (4/39/




মুআয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিন শ্রেণির মানুষের দুআ আল্লাহ্‌ তাআলা প্রত্যাখ্যান করেন না: ১. যে ব্যক্তি আল্লাহকে বেশি বেশি স্মরণ করে, ২. মজলুম বা অত্যাচারিত ব্যক্তির দুআ, এবং ৩. ন্যায়পরায়ণ শাসক।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3375)


3375 - (لا ينظر الله يوم القيامة إلى الشيخ الزاني ولا إلى العجوز الزانية) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (9/184/8396) قال: حدثنا موسى
ابن سهل قال: حدثنا إبراهيم بن سعيد الجوهري قال: حدثنا محمد بن ربيعة الكلابي عن عثمان بن واقد عن مسلم (!) بن يسار عن أبي هريرة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :.......فذكره
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات من رجال `التهذيب `، وفي بعضهم كلام لا يضر؛ إلا شيخ الطبراني - وهو أبو عمران الجوني كما في أول أحاديثه التي ساقها له الطبراني في `اوسطه (8367) وقد قال فيه الدارقطني: `ثقة ` كما في ترجمته من `تاريخ بغداد ` (13/56 ـ57) وخفي هذا على الشيخ الهيثمي , فقال (6/255) :
`رواه الطبراني في `الأوسط ` عن شيخه موسى بن سهل؛ ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات `!
(تنبيه) : تابعي هذا الحديث (مسلم بن يسار) ؛ هكذا وقع في مطبوعة `الأوسط `! وأنا أظن أن الصواب (موسى بن يسار) ؛ لأنه هو الذي ذكروه في شيوخ عثمان بن واقد، وفي الرواة عن أبي هريرة، دون (مسلم بن يسار) ، وكلاهما تابعي ثقة، وكذلك وقع في النسخة المصورة التي عندي. وقال الطبراني عقب الحديث: `لم يروه عن مسلم بن يسار إلا عثمان بن واقد، تفرد به محمد بن ربيعة`!
فالله سبحانه وتعالى أعلم *******




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল্লাহ তা‘আলা কিয়ামতের দিন বৃদ্ধ ব্যভিচারী পুরুষ এবং বৃদ্ধা ব্যভিচারিণী নারীর দিকে (দয়ার) দৃষ্টিপাত করবেন না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3376)


3376 - (لا، ولكنك تفلت بين يديك وأنت تؤمّ الناس فآذيت الله وملائكته) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (13/ 43 ــ 44/104) قال: حدثنا إسماعيل بن الحسن قال: ثنا أحمد بن صالح قال: ثنا ابن وهب قال: حدثني
حيي عن أبي عبد الرحمن عن عبد الله بن عمرو قال:
أمر رسول الله - صلى الله عليه وسلم - رجلاً يصلي بالناس صلاة الظهر، فتفل في القبلة وهو يصلي للناس، فلما كان صلاة العصر؛ أرسل إلى آخر، فأشفق الرجل الأول، فجاء إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقال: يا رسول الله - صلى الله عليه وسلم - أنزل فيّ؟ قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات مترجمون في `التهذيب `؛ على ضعف يسير في حيي - وهو ابن عبد الله المعافري المصري - ؛ سوى إسماعيل بن الحسن، ولم أعرفه، وهو الخفاف المصري، وقد أكثر عنه الطبراني في `كتاب الدعاء`، فروى عنه فيه (14) حديثاً، كما في مقدمة محققه للدكتور البخاري (1/187) , وروى له في ` الأوسط ` (4/5 ـ 6) حديثين، وفي ` الصغير` حديثاً واحداً (




আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে যুহরের সালাতে লোকদের ইমামতি করার নির্দেশ দিলেন। সে যখন লোকদের নিয়ে সালাত আদায় করছিল, তখন সে কিবলার দিকে থুথু নিক্ষেপ করল। এরপর যখন আসরের সালাতের সময় হলো, তখন (নবীজি) অন্য আরেকজনের কাছে (ইমামতি করার জন্য) লোক পাঠালেন। এতে প্রথম ব্যক্তিটি শঙ্কিত হয়ে পড়ল। সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার ব্যাপারে কি কোনো কিছু (ওহী/নির্দেশ) নাযিল হয়েছে?

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: "না, তবে তুমি যখন লোকদের ইমামতি করছিলে, তখন তুমি তোমার সামনে (কিবলার দিকে) থুথু ফেলেছ। এর মাধ্যমে তুমি আল্লাহ ও তাঁর ফেরেশতাদের কষ্ট দিয়েছ।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3377)


3377 - (استحيُوا, فإن الله لا يستحي من الحق، لا تأتوا النساء
في أدبارهن) .
أخرجه النسائي في `السنن الكبرى` (5/322/9009) ، والبزار في مسنده
` البحر الزخار` (1/ 474/339) ، والخرائطي في `مساوئ الأخلاق` (9 0




খুযাইমাহ ইবন সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তোমরা শালীন হও (লজ্জাশীল হও), কারণ আল্লাহ সত্য প্রকাশ করতে লজ্জা করেন না। তোমরা তোমাদের স্ত্রীদের সাথে তাদের পশ্চাৎপথ দিয়ে সহবাস করো না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3378)


3378 - (من أتى النساء في أعجازهن؛ فقد كفر) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (9/85/ 9180) : حدثنا مورّع بن عبد الله قال: حدثنا عمر بن يزيد السّيّاري قال: حدثنا عبد الوارث [عن ليث] عن أيوب عن مجاهد عن أبي هريرة مرفوعاً. وقال:
`لم يروه عن ليث إلا عبد الوارث، تفرد به عمر بن يزيد`.
قلت: هو صدوق، ومن فوقه ثقات؛ غير ليث؛ وهو ابن أبي سُليم الحمصي كما يستفاد من ترجمته في `تهذيب الحافظ المزي `، فقد ذكر في الرواة عنه عبد الوارث هذا - وهو ابن سعيد التنوري - .
وقد سقط ذكر الليث هذا من الإسناد، فاستدركته من تعقيب الطبراني المذكور
على الحديث، ولذلك جعلته بين المعكوفتين، مشيراً بذلك إلى سقوطه من الإسناد، ولعله سقطٌ قديمٌ حمل الحافظ المنذري على أن يقول في تخريج الحديث (3/201) :
`رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورواته ثقات `
وتبعه الهيثمي فقال (4/299) :
`رواه الطبراني، ورجا له ثقات `!
وإطلاقه العزو للطبراني يوهم أنه في `المعجم الكبير`، ولم أره فيه.
والليث هذا ضعيف لاختلاطه.
على أن شيخ الطبراني مورع بن عبد الله - وهو أبو ذُهْلٍ المصيصي - لم أجد له ترجمة، ويبدو أنه ليس من شيوخه المشهورين؛ فإن الطبراني لم يرو له في `الأوسط ` إلا سبعة أحاديث، هذا أحدها، ولم يرو له في `الصغير` شيئاً، وكذلك في كتابه `الدعاء`.
وإن مما يؤيد نكارة الحديث، وأنه من رواية ليث وتخاليطه: أنه رواه عبد الرزاق في `المصنف ` (11/443/20958) - عن معمر - ، وابن أبي شيبة (4/252) - عن حفص - كلاهما عن ليث عن مجاهد عن أبي هريرة أنه قال:
من أتى ذلك فقد كفر.
وأخرجه النسائي في `الكبرى` (5/323/9018) من طريق سفيان عن ليث بلفظ:
إتيان النساء والرجال في أدبارهن كفر.
ثم رواه (9021) من طريق علي بن بَذيمة عن مجاهد به.
قلت: وهذه متابعة قوية من علي بن بذيمة. ولذلك نقل السيوطي في `الدر المنثور` (1/264) عن الحافظ ابن كثيرأنه قال:
`هذا الموقوف أصح `.
قلت: ذكر ابن كثير هذا في `تفسيره/ البقرة` (1/264) وهو مما لا شك فيه. لكن لحديث الترجمة شاهد قوي من طريق أخرى عن أبي هريرة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - قال:
`من أتى حائضاً أو امرأة في دبرها، أو كاهناً فقد كفر بما أنزل على محمد`.
وإسناده جيد، وهو مخرج في `الإرواء ` (7/68 ـ 69) و`آداب الزفاف ` (




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যে ব্যক্তি নারীদের সাথে তাদের পশ্চাৎদ্বারে (মলদ্বারে) সহবাস করে, সে কুফরি করল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3379)


3379 - (من استطاع منكم أن لا يحول بينه وبين الجنة ملء كف من دم امرئ مسلم أن يهريقه؛ كأنما يذبح به دجاجة، كلما تعرض لباب من أبواب الجنة؛ حال الله بينه وبينه، ومن استطاع أن لا يجعل في بطنه إلا طيباً فإن أول ما ينتن من الإنسان بطنه) .
أخرجه الطبراني فى `المعجم الكبير` (2/ 171 / 1662) عن أبي كامل الجحدري - ، و`المعجم الأوسط ` (9/225/8490) والبيهقي في `شعب الإيمان ` (4/347/5350) كلاهما عن أبي بكر بن أبي الأسود - قالا: ثنا أبو عوانة عن قتادة عن الحسن عن جندب بن عبد الله قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :......فذكره، - السياق للبيهقي - ، وقال:
`وكذلك رواه أبو كامل عن أبي عوانة مرفوعاً، والصحيح موقوف `! وقال الهيثمي: (7/297)
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، و` الكبير`، ورجاله رجال (الصحيح) `. وهذا أدق من قول المنذري (3/203)
`رواه الطبراني، ورواته ثقات `.
قلت: وأبو عوانة ثقة من رجال الشيخين، وكذلك من فوقه؛ فهو إسناد صحيح لولا عنعنة الحسن - وهو البصري - .
لكنه قد صح مرفوعاً من غير طريقه، فلا وجه لإعلاله بالوقف؛ لأن الرفع زيادة يجب قبولها، ولا سيما أن الذي أوقفه كان اختلط، وهو سعيد بن إياس الجريري، فقد قال: عن طريف أبي تميمة قال:
شهدت صفوان وجندباً وأصحابه وهو يوصيهم، فقالوا: هل سمعت من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ قال: سمعته يقول:
`من سمع سمع الله به يوم القيامة`. قال:
`ومن يشاقق يشقق الله عليه يوم القيامة`.
قالوا: أوصنا! قال:
`إن أول ما ينتن.. ` فذكر الحديث مختصراً جملة الدجاجة وأبواب الجنة،
مع تقديم وتأخير.
هكذا أخرجه البخاري (7152) ، والبيهقي في `شعب الإيمان ` (5/54/ 5753) . وقال الحافظ في ترجمة الجريري من `التقريب `:
`ثقة، اختلط قبل موته بثلاث سنين `.
وعندي جواب آخر على افتراض أن الجريري حفظه - وهو قول الحافظ في `الفتح ` (13/129) ـ:
`وهذا لو لم يرد مصرحاً برفعه؛ لكان في حكم المرفوع؛ لأنه لا يقال بالرأي `. قلت: فكيف وقد صح مرفوعاً؟! فقال هشام بن عمار: ثنا علي بن سليمان
الكلبي: حدثني الأعمش عن أبي تميمة عن جندب بن عبد الله الأزدي - صاحب النبي - صلى الله عليه وسلم - قال:
انطلقت أنا وهو إلى البصرة، حتى أتينا مكاناً يقال له: (بيت المسكين) ، وهو
من البصرة مثل (الثوية) من الكوفة، فقال: هل كنت تدارس أحداً القرآن؟ فقلت: نعم، قال: فإذا أتينا البصرة؛ فأتني بهم، فأتيته بصالح بن مسرح، وبأبي بلال، ونجدة، ونافع بن الأزرق، وهم في نفسي يومئذ من أفاضل أهل البصرة (¬1) ، فأنشأ يحدثني عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ، فقال جندب: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
`مثل العالم الذي يعلم الناس الخير وينسى نفسه؛ كمثل السراج يضيء للناس ويحرق نفسه `.
وقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
` لا يحولن بين أحدكم وبين الجنة - وهو ينظر إلى أبوابها - ملء كف دم مسلم أهراقه ظلماً `.
قال: فتكلم القوم، فذكروا الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر، وهو ساكت يستمع منهم، ثم قال:
لم أر كاليوم قط قوماً أحق بالنجاة إن كانوا صادقين.
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (2/178/1681) .
قلت: وهذا إسناد جيد - وحسنه المنذري في `الترغيب ` (1/77/13) ، رجاله ثقات من رجال البخاري؛ غير علي بن سليمان الكلبي، وهو ثقة، وثقه هشام بن عمار. وقال أبو حاتم:
¬_________
(¬1) قال الحافظ (13/129) : `قلت: وهؤلاء الأربعة من رؤوس الخوارج `.
`ما أرى بحديثه بأساً، صالح الحديث، ليس بمشهور`.
وذكره ابن حبان في `الثقات ` وقال:
`يغرب `.
انظر `تيسير انتفاع الخلان `.
قلت: ومع ذلك كله لم يعرفه الهيثمي؛ كما يأتي.
وله طريق أخرى؛ يرويه ليث عن صفوان بن محرز عن جندب بن عبد الله:
أنه مر بقوم يقرأون القرآن، فقال: لا يغرنك هؤلاء؛ إنهم يقرأون القرآن اليوم، ويتجادلون بالسيوف غداً!
ثم قال: ائتني بنفر من قراء القرآن، وليكونوا شيوخاً، فأتيته بنافع بن الأزرق، ومرداس بن أبي بلال، وبنفر معهما ستة أو ثمانية، فلما أن دخلنا على جندب، قال: إني سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ... (قلت: فذكر مثل من يعلم الناس الخير) ، قال: `ومن رايا الناس بعلمه؛ رايا الله به يوم القيامة، ومن سمع الناس بعمله؛ سمع الله به؛ فاعلموا أن أول ما ينتن ... ` الحديث مثل رواية البخاري.
أخرجه الطبراني (2/179ـ180/1685) ، ورجاله ثقات؛ غير ليث - وهو
ابن أبي سُليم - وهو ضعيف لاختلاطه.
ومن طريقه: روى جملة العلم أبو الشيخ في `الأمثال ` (181/276) . وذكر الهيثمي رواية صفوان هذه، وطرفاً من رواية علي بن سليمان الكلبي المتقدمة، ثم قال:
`رواه الطبراني من طريقين، في أحدهما ليث بن أبي سُليم؛ وهو مدلس،
وفي الأخرى علي بن سليمان الكلبي، ولم أعرفه، وبقية رجالهما ثقات `! وقلده المعلقون الثلاثة!
قلت: أما الليث؛ فوصفه إياه بالتدليس من أوهامه المتكررة التي خالف فيها الأولين والآخرين، كما نبهنا عليه مراراً. وأما جهله بالكلبي؛ فمن غرائبه؛ فإن الرجل معروف ثقة كما تقدم، بل هو في كتابه `ترتيب ثقات ابن حبان ` فيما أظن؛ لأنه في أصله كما سبق، وإنما لم أجزم بذلك؛ لأن الجزء الثالث الذي فيه حرف (العين) لم أقف عليه، والله أعلم.
ثم إن الجملة الأولى من الحديث قد رواها أيضاً إسماعيل بن مسلم عن الحسن عن جندب مرفوعاً.
أخرجه عبد الرزاق في `مصنفه ` (10/26/18250) ، والرّوياني في `مسنده ` (2/143/662) ، والطبراني أيضاً في `المعجم الكبير` (2/ 170/ 1660 و 171/ 1661) .
وبالجملة؛ فالحديث بهذه الطرق والمتابعات صحيح مرفوعاً، ولا يضره وقف من أوقفه، ولذلك سكت عن هذه الطرق الحافظ في `الفتح `، بل صرح بأن الموقوف في حكم المرفوع؛ كما تقدم عنه، فاتفقت الروايات، وزال الخلاف من بينها. والحمد لله رب العالمين.
تنبيهان:
ا - علق الشيخ الأعظمي على رواية إسماعيل بن مسلم هذه عند عبد الرزاق بقوله:
`أخرجه الطبراني في `الكبير`، ورجاله رجال `الصحيح `. قاله الهيثمي 297: 7 `!
قلت: وهذا من أوهامه رحمه الله ` فإن الهيثمي إنما قال هذا في رواية قتادة
عن الحسن؛ كما تقدم، وتبعه على هذا الوهم أخونا حمدي السلفي في تعليقه على رواية إسماعيل هذه، وفي الموضعين المشار إليهما من `الطبراني `! وإسماعيل ابن مسلم هذا: هو المكي البصري وهو ضعيف؛ وليس هو العبدي البصري، وهذا ثقة؛ وهما - وإن كانا من طبقة واحدة - يشتركان في الرواية عن الحسن البصري، فيمكن في كثير من الأحيان تحديد المراد منهما بالنظر إلى الراوي عنه، كما هو الشأن هنا؛ فإن الثوري يروي عن المكي دون العبدي كما أفاده الخطيب رحمه الله.
2ـ تحرف اسم راوي الحديث: (جندب) في `المعجم الأوسط ` في بعض طبعاته إلى (خبيب) ! فاقتضى التنبيه.
ثم إن جملة: `مثل العالم الذي يعلم الناس ... ` قد أخرجه الأصبهاني في `الترغيب ` (2/876/2144) من طريق هشام بن عمار: ثنا علي بن سليمان الكلبي - قال هشام: وهو من أهل دمشق ثقة حدث عنه الوليد - ... ********




জুনদুব ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সক্ষম, সে যেন এমনভাবে কোনো মুসলিমের এক আঁজলা রক্ত না ঝরায়, যা তার ও জান্নাতের মাঝে বাধা হয়ে দাঁড়ায়—যদিও সে এর মাধ্যমে একটি মুরগি জবাই করে থাকে। যখনই সে জান্নাতের কোনো দরজার সম্মুখীন হবে, আল্লাহ তার ও দরজার মাঝে বাধা সৃষ্টি করবেন। আর তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সক্ষম, সে যেন তার পেটে কেবল পবিত্র বস্তু ছাড়া অন্য কিছু না রাখে। কেননা মানুষের মধ্যে প্রথম যা দুর্গন্ধযুক্ত হয়, তা হলো তার পেট।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3380)


3380 - (ألا أخبركم برجالكم في الجنة؛! النبي في الجنة، والصديق في الجنة، والشهيد في الجنة، والمولود في الجنة، والرجل يزور أخاه في ناحية المصر - لا يزوره إلا لله - في الجنة.
ألا أخبركم بنسائكم في الجنة؛! كل ودود ولود، إذا غضبت أو أسيء إليها [أو غضب زوجها] ؛ قالت: هذه يدي في يدك؛ لا أكتحل بغمض حتى ترضى) .
روي من حديث أنس، وابن عباس، وكعب بن عُجْرة.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইরশাদ করেছেন: “আমি কি তোমাদেরকে জান্নাতের পুরুষদের সম্পর্কে অবহিত করব না?

নবী জান্নাতে,
সিদ্দীক (পরম সত্যবাদী) জান্নাতে,
শহীদ জান্নাতে,
এবং (অপ্রাপ্তবয়স্ক) শিশু জান্নাতে।
আর সেই ব্যক্তি জান্নাতে, যে কোনো শহরের দূরবর্তী এলাকায় বসবাসকারী তার ভাইয়ের সাথে সাক্ষাৎ করতে যায়—শুধুমাত্র আল্লাহর (সন্তুষ্টির) জন্যেই সে সাক্ষাৎ করে।

আমি কি তোমাদেরকে জান্নাতের নারীদের সম্পর্কে অবহিত করব না?

তারা হলো প্রত্যেক প্রেমময়ী (স্নেহশীলা), অধিক সন্তান জন্মদানকারিণী নারী—যে যখন রাগান্বিত হয়, অথবা তার সাথে খারাপ ব্যবহার করা হয়, অথবা তার স্বামী রাগান্বিত হয়—তখন সে বলে: ‘এই যে আমার হাত তোমার হাতে; তুমি সন্তুষ্ট না হওয়া পর্যন্ত আমি চোখে ঘুম দিব না/শান্তি পাব না’।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3381)


3381 - (إن الحياء، والعفاف، والعيّ - عيّ اللسان لا عيّ القلب - والفقه (¬1) : من الإيمان، وإنّهن يزدن في الآخرة وينقصْن من الدّنيا، وما يزدن في الآخرة أكثر مما ينقصْن من الدنيا.
وإن الشحّ والفحش والبذاء من النفاق، وإنّهن ينقصْن من الآخرة، ويزدن في الدنيا، وما ينقصْن من الآخرة أكثر مما يزدن من الدنيا) .
أخرجه يعقوب بن سفيان الفسويّ في `المعرفة` قال (1/ 311) : حدثنا محمد بن أبي السّريّ: حدثني بكر بن بشر العسقلاني: حدثني عبد الحميد بن سوّار: حدثني إياس بن معاوية بن قرّة المزني عن أبيه عن جده قرة المزني قال:
كنا عند رسول اللة - صلى الله عليه وسلم - ، فذكر عنده الحياء، فقالوا: يا رسول الله! الحياء من الدين؟ فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قال إياس: فحدثت به عمر بن عبد العزيز، فأمرني فأمليتها عليه، ثم كتبه بخطه، ثم صلى بنا الظهر والعصر، وإنها لفي كفه ما يضعها.
ومن طريق يعقوب: أخرجه البيهقي في `الآداب ` (132/199) ، و`الشعب ` (6/134ـ135) ، وابن عساكر (10/6ـ7) .
ثم أخرجه البيهقي في `الشعب ` أيضاً، وفى `السنن الكبرى` (10/




ক্বুররাহ আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

নিশ্চয়ই লজ্জা (হায়া), পবিত্রতা (আফাফ), জিহ্বার সংযম (অপ্রয়োজনীয় কথা থেকে বিরত থাকা)—যা অন্তরের জড়তা বা নির্বুদ্ধিতা নয়—এবং দ্বীনের গভীর জ্ঞান (ফিক্বহ) হচ্ছে ঈমানের অংশ। আর এগুলি আখিরাতে বৃদ্ধি ঘটায় এবং দুনিয়ার প্রতি আসক্তি কমিয়ে দেয়। কিন্তু আখিরাতে যা বৃদ্ধি করে, দুনিয়াতে যা কমিয়ে দেয় তার চেয়েও তা অনেক বেশি।

আর নিশ্চয়ই চরম কৃপণতা (শুহ্), অশ্লীলতা ও কটুভাষণ (বা বেহায়াপনা) হচ্ছে মুনাফিকির (কপটাচারের) অংশ। আর এগুলি আখিরাতকে কমিয়ে দেয় এবং দুনিয়াতে বাড়িয়ে দেয়। কিন্তু আখিরাতে যা কমিয়ে দেয়, দুনিয়াতে যা বাড়িয়ে দেয় তার চেয়েও তা অনেক বেশি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3382)


3382 - (إن أولى الناس بالله؛ من بدأهم بالسّلام) .
هو من حديث أبي أمامة رضي الله عنه، وله عنه طرق:
الأولى: عن أبي خالد وهب عن أبي سفيان الحمصي عن أبي أمامة قال:
قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
أخرجه أبو داود (97 1 5) ، ومن طريقه البيهقي في `شعب الإيمان ` (6/433/8787) .
قلت: وإسناده صحيح، رجاله ثقات رجال البخاري؛ غير أبي خالد وهب
- وهو ابن خالد الحمصي - ، وهو ثقة بلا خلاف.
وشيخه أبو سفيان الحمصي؛ اسمه محمد بن زياد الألهاني.
وله عنه طريق آخر مختصر؛ فقال ابن أبي شيبة في `المصنف ` (8/435/5788) : إسماعيل بن عياش عن محمد بن زياد الألهاني عن أبي أمامة قال: أمرنا نبينا - صلى الله عليه وسلم - أن نفشي السلام.
ومن طريق ابن أبي شيبة: أخرجه ابن ماجه (3693) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (8/131/ 7525) ، ورواه من طريقين آخرين عن إسماعيل بن عياش به.
وهذا إسناد شامي صحيح.
وتابعه بقية بن الوليد: حدثني محمد بن زياد به.
أخرجه الطبراني أيضاً (7524) ، وهو صحيح أيضاً
الثانية: عن أبي فروة الرّهاوي يزيد بن سنان عن سُليم بن عامر عن أبي أمامة قال:
قيل: يا رسول الله! الرجلان يلتقيان؛ أيهما يبدأ بالسلام؟ فقال:
`أولاهما بالسلام `.
أخرجه الترمذي (2694) ، وقال:
`هذا حديث حسن `.
قلت: أي: حسن لغيره؛ لأن أبا فروة هذا متفق على ضعفه. ولذلك قال
الحافظ: `ضعيف`
الثالثة: عن عبيد الله بن زحر عن علي بن يزيد عن القاسم عن أبي أمامة
مرفوعاً بلفظ:
`من بدأ بالسلام؛ فهو أولى بالله عز وجل ورسوله `.
أخرجه أحمد (5/ 254 و 261/264 و 269) ، والطبراني في `المعجم ` (8/237/7814 و 7815)
وهذا إسناد ضعيف؛ لضعف علي بن يزيد - وهو الألهاني - .
ونحوه - أو خير منه - عبيد الله بن زحر، وقد توبع، فقال بقية بن الوليد: عن
إسحاق بن مالك عن يحيى بن الحارث عن القاسم به.
أخرجه الطبراني (8/ 210/7743) .
قلت: بقية مدلس.
وإسحاق بن مالك - وهو الحضرمي - ضعفه الأزدي، وقال ابن القطان:
`لا يعرف `.
وذكر له الأزدي هذا الحديث بلفظ:
`البادي بالسلام أولى بالله ورسوله `.
(تنبيه) من أوهام الحافظ أنه عزا في `الفتح ` (11/16) حديث الترجمة للترمذي! وقد عرفت أن لفظه مخالف للفظه، وأقر تحسينه دون أن يبين وجهه!
ومن تخاليط المعلقين الثلاثة على `الترغيب ` قولهم (3/416/3989) :
`حسن بشواهده، رواه أبو داود.. والترمذي.. وابن حبان (911) `!
فجهلوا صحة إسناد أبي داود، وحسنوه بشواهده دون أن يبينوها، أو أن يشيروا على الأقل إلى شيء منها كما هي عادتهم.
ثم كذبوا في عزوهم إياه لابن حبان! فإن الرقم الذي قرنوه به إنما هو عنده لحديث ابن مسعود:
`إن أولى الناس بي يوم القيامة أكثرهم عليّ صلاة`!
فالتبس عليهم هذا بحديث الترجمة، والسبب أنهم يستعينون بل يتكئون في التخريج والعزو على الفهارس، ولا يرجعون إلى الأصول، ولو رجعوا إليها؛ لم
يستطيعوا الاستفادة منها لجهلهم بهذا العلم، إنما هم مقلدة نقلة. وهذا هو الدليل بين يديك، فإسناد أبي داود صحيح كالشمس وضوحاً، ومع ذلك جهلوه، ولما توهموا أنه في `صحيح ابن حبان `؛ توسطوا في الحكم عليه، فلا هم صححوه، ولا هم ضعفوه، فقالوا: `حسن بشواهده `!! أنصاف حلول. وهذا هو الغالب عليهم: التحسين هذا أو التحسين مطلقاً في كثير مما هو صحيح، وكثير مما هو ضعيف عند التحقيق؛ ستراً لجهلهم! والله المستعان. *******




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বেশি অগ্রাধিকারপ্রাপ্ত হলো সে, যে তাদের মধ্যে (অন্যকে) প্রথমে সালাম দেয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3383)


3383 - (ما رأيت الذي هو أبخل منك؛ إلا الذي يبخل بالسلام) .
أخرجه أحمد في `مسنده ` (3/328) : ثنا أبو عامر العَقَديُّ: ثنا زهير عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر:
أدن رجلاً أتى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقال: إن لفلان في حائطي عِذقاً، وانه قد آذاني وشق علي مكان عذقه، فأرسل إليه النبي - صلى الله عليه وسلم - ` فقال:
`بعني عذقك الذي في حائط فلان `.
قال: لا. قال:
`فهبه لي `. قال:
قال: لا. قال:
`فبعنيه بعذق في الجنة`.
قال: لا. فقال - صلى الله عليه وسلم - : ... فذ كره.
وهكذا أخرجه البزار (2/417/2000) عن شيخين له ثقتين قالا: ثنا أبو عامر به. وقال:
`لا نعلم يروى عن جابر إلا بهذا الإسناد`.
قلت: فقوله المنذري في ` الترغيب ` (3/ 269) :
`رواه أحمد والبزار، وإسناد أحمد لا بأس به `!
ففيه نظر من جهة تفريقه بين رواية أحمد والبزار، وكلاهما روياه من طريق زهير - وهو ابن محمد التميمي الخراساني - ، تكلموا في رواية الشاميين عنه، وهذه ليست منها؛ فإن أبا عامر العقدي بصري ثقة، واسمه عبد الملك بن عمرو. قال الحافظ - في زهير - :
`رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، فضعف بسببها، قال البخاري عن أحمد: كأن زهيراً الذي يروي عنه الشاميون آخر. وقال أبو حاتم: حدث بالشام من حفظه، فكثرغلطه `.
وقال الذهبي في ` الكاشف `:
`ثقة يغرب، ويأتي بما ينكر`.
قلت: قد صرح غير واحد من الحفاظ بأن ما أنكر عليه هو من رواية الشاميين، فقال أحمد فيهم:
`يروون عنه أحاديث مناكير.. أما رواية أصحا بنا - يعني: العراقيين - عنه فمستقيمة ` عبد الرحمن بن مهدي وأبي عامر أحاديث مستقيمة صحاح `.
وقا ل البخا ري:
`ما روى عنه أهل الشام؛ فإنه مناكير، وما روى عنه أهل البصرة؛ فإنه صحيح `. إذا عرفت هذا؛ فالصواب قوله الهيثمي في `المجمع ` (8/32) :
`رواه أحمد والبزار، وفيه عبد الله بن محمد بن عقيل، وحديثه حسن، وفيه ضعف، وبقية رجاله رجال (الصحيح) `.
وقد توبع أبو عامر العقدي، فقال عبد بن حميد في `المنتخب من المسند` (3/22/1035) : حدثني موسى بن مسعود: حدثنا زهير بن محمد به.
وموسى بن مسعود: هو أبو حذيفة البصري أيضاً، أخرج له البخاري في
المتابعات، كما في `التقريب `.
ومن طريقه أخرجه الحاكم في `المستدرك ` (2/ 20) شاهداً.
وتابعه يحيى بن أبي بكير: ثنا زهير بن محمد به.
أخرجه البيهقي في `السنن ` (6/




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

একদা এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে অভিযোগ করলেন যে, অমুক ব্যক্তির খেজুরের একটি কাঁদি তার বাগানের মধ্যে রয়েছে, আর ওই কাঁদির অবস্থানের কারণে সে তাঁকে কষ্ট দেয় এবং তা তার জন্য কঠিন হয়ে দাঁড়িয়েছে।

তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই ব্যক্তির কাছে লোক পাঠিয়ে বললেন: "অমুক ব্যক্তির বাগানে তোমার যে খেজুরের কাঁদি আছে, তা আমার কাছে বিক্রি করে দাও।"

লোকটি বলল: "না।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তা আমাকে উপহার দাও।"

লোকটি বলল: "না।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তবে জান্নাতে একটি খেজুরের কাঁদির বিনিময়ে তা আমার কাছে বিক্রি করো।"

লোকটি বলল: "না।"

তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার চেয়ে কৃপণ আর কাউকে দেখিনি, তবে সেই ব্যক্তি ছাড়া, যে সালাম দিতেও কার্পণ্য করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3384)


3384 - (خصال ست؛ ما من مُسلم يموتُ في واحدة منْهن؛ إلا كانت ضامناً على الله أن يدْخِلََه الجنّة:




ছয়টি বৈশিষ্ট্য রয়েছে। কোনো মুসলিম যদি এই বৈশিষ্ট্যগুলোর মধ্য থেকে কোনো একটির ওপর ইন্তেকাল করে, তবে আল্লাহ তা‘আলার উপর তা তার জন্য জান্নাতে প্রবেশ করানোর নিশ্চয়তা (জামিন) হয়ে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3385)


3385 - (إذا قال الرجل لأخيه: يا كافر! فهو كقتله، ولعْنُ المؤمنِ كقتله) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكببر` (18/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "যখন কোনো ব্যক্তি তার ভাইকে বলে, ‘হে কাফির!’ তখন তা তাকে হত্যা করার সমতুল্য। আর মুমিনকে অভিশাপ দেওয়াও তাকে হত্যা করার মতোই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3386)


3386 - (لا يزالُ النّاس بخير؛ ما لم يتحاسدوا) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (8/369/8157) : حدثنا الحسن بن جرير الصُّوريُّ: ثنا سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي: ثنا إسماعيل بن عياش عن ضمضم بن زرعة عن شريح بن عبيد عن أبي بحرية عن ضمرة بن ثعلبة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات من رجال `التهذيب `، وفي بعضهم خلاف لا يضر؛ غير شيخ الطبراني الحسن بن جرير الصوري، وهو من شيوخه المشهورين، ترجم له الحافظ ابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (4/419) بروايته عن جمع من الثقات، وعنه نحو عشرين من الشيوخ بعضهم من الحفاظ، ووصفه الحافظ الذهبي في`سير أعلام النبلاء` (13/442) بـ: `الإمام المحدث `.
على أنه قد توبع، فقال أبو الشيخ ابن حيان في `التوبيخ ` (108/78) : حدثنا
أبو الجارود: ثنا أبو سيار: ثنا محمد بن إسماعيل بن عياش: ثنا أبي به.
ومحمد بن إسماعيل تكلموا فيه، ولا يضر ذلك هنا؛ لأنه متابع.
وأبو سيار هذا؛ الظاهر أنه الذي في `كنى أبي أحمد الحاكم ` (1/) :
`أبو سيار العلاء بن محمد بن سيار، يروي عن أبي المثنى محمد بن عمرو
ابن علقمة الليثي، حدث عنه إسحاق بن إبراهيم الصواب (¬1) البصري، حديثه في البصريين `.
(تنبيه) : تكلم الأخ حسن أبو الأشبال على بعض رجال `التوبيخ` مصرحاً بضعف إسناده، ثم أتبعه بذكر ما قاله مراجع كتابه الشيخ (محمد عمرو بن عبد اللطيف) ، فقال:
` [لكن أخشى أن لا يكون (شريح بن عبيد) قد سمعه من (أبي بحرية) ؛ فإنه كثير الإرسال، وقال ابن أبي حاتم في ` المراسيل ` (ص 90) : `شريح بن عبيد الحمصي، لم يدرك أبا أمامة، ولا الحارث بن الحارث، ولا المقدام `. قلت: وتوفي أبو أمامة سنة (86) ، وتوفي أبو بحرية سنة (77) ، أي: قبلهما بسنين. فأخشى أن لا يكون أدركه أيضاً. (م) ] `!!
فأقول: هذه الخشية غير واردة هنا في نقدي؛ لأن الإدراك الذي نفاه أبو حاتم لا يعني أنه لم يدركهم ولم يعاصرهم، وسنة وفاتهم المتقاربة تؤكد ذلك، وإنما يعني أنه لم يسمع منهم، وعليه فليس يعني أنه لم يسمع من كل من عاصرهم، فهذا هو الإمام البخاري يصرح أنه سمع من معاوية، وقد توفي سنة (60) ، فإمكان سماعه من أبي بحرية ظاهر جداً وأولى. فإذا لم يكن لدينا نص من حافظ
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(¬1) كذا أصل الشيخ، ولعله سبق قلم. والصواب: `الصَّوَّاف `؛ كما في `تهذيب المزي ` ترجمة إسحاق هذا (برقم: 325) .
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نقاد بأنه لم يسمع منه؛ فيكفينا في هذه الحالة ثبوت المعاصرة وإمكان اللقاء ` كما هو المختار عند جماهير العلماء بشرط السلامة من التدليس، ولم يُرْمَ (شريح) بشيء من التدليس فيما علمت، ولا تلازم بينه وبين الإرسال عند أهل العلم، فكم من راو ثقة وصف بالإرسال، ومع ذلك فحديثه صحيح عند الشيخين فضلاً عن غيرهم، ولو كانت روايته معنعنة! هذا أمر لا يخفى إن شاء الله على من مارس هذا العلم وعرفه حق المعرفة. والله سبحانه وتعالى أعلم.
والحديث؛ قال المنذري مشيراً إلى تقويته (4/12/4) :
`رواه الطبراني، ورواته ثقات `.
وكذا قال الهيثمي في `المجمع ` (8/78) . ********




দম্রা ইবনে সা’লাবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মানুষ ততদিন পর্যন্ত কল্যাণের মধ্যে থাকবে, যতদিন না তারা একে অপরের প্রতি হিংসা বা বিদ্বেষ পোষণ করে।