হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3381)


3381 - (إن الحياء، والعفاف، والعيّ - عيّ اللسان لا عيّ القلب - والفقه (¬1) : من الإيمان، وإنّهن يزدن في الآخرة وينقصْن من الدّنيا، وما يزدن في الآخرة أكثر مما ينقصْن من الدنيا.
وإن الشحّ والفحش والبذاء من النفاق، وإنّهن ينقصْن من الآخرة، ويزدن في الدنيا، وما ينقصْن من الآخرة أكثر مما يزدن من الدنيا) .
أخرجه يعقوب بن سفيان الفسويّ في `المعرفة` قال (1/ 311) : حدثنا محمد بن أبي السّريّ: حدثني بكر بن بشر العسقلاني: حدثني عبد الحميد بن سوّار: حدثني إياس بن معاوية بن قرّة المزني عن أبيه عن جده قرة المزني قال:
كنا عند رسول اللة - صلى الله عليه وسلم - ، فذكر عنده الحياء، فقالوا: يا رسول الله! الحياء من الدين؟ فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قال إياس: فحدثت به عمر بن عبد العزيز، فأمرني فأمليتها عليه، ثم كتبه بخطه، ثم صلى بنا الظهر والعصر، وإنها لفي كفه ما يضعها.
ومن طريق يعقوب: أخرجه البيهقي في `الآداب ` (132/199) ، و`الشعب ` (6/134ـ135) ، وابن عساكر (10/6ـ7) .
ثم أخرجه البيهقي في `الشعب ` أيضاً، وفى `السنن الكبرى` (10/




ক্বুররাহ আল-মুযানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

নিশ্চয়ই লজ্জা (হায়া), পবিত্রতা (আফাফ), জিহ্বার সংযম (অপ্রয়োজনীয় কথা থেকে বিরত থাকা)—যা অন্তরের জড়তা বা নির্বুদ্ধিতা নয়—এবং দ্বীনের গভীর জ্ঞান (ফিক্বহ) হচ্ছে ঈমানের অংশ। আর এগুলি আখিরাতে বৃদ্ধি ঘটায় এবং দুনিয়ার প্রতি আসক্তি কমিয়ে দেয়। কিন্তু আখিরাতে যা বৃদ্ধি করে, দুনিয়াতে যা কমিয়ে দেয় তার চেয়েও তা অনেক বেশি।

আর নিশ্চয়ই চরম কৃপণতা (শুহ্), অশ্লীলতা ও কটুভাষণ (বা বেহায়াপনা) হচ্ছে মুনাফিকির (কপটাচারের) অংশ। আর এগুলি আখিরাতকে কমিয়ে দেয় এবং দুনিয়াতে বাড়িয়ে দেয়। কিন্তু আখিরাতে যা কমিয়ে দেয়, দুনিয়াতে যা বাড়িয়ে দেয় তার চেয়েও তা অনেক বেশি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3382)


3382 - (إن أولى الناس بالله؛ من بدأهم بالسّلام) .
هو من حديث أبي أمامة رضي الله عنه، وله عنه طرق:
الأولى: عن أبي خالد وهب عن أبي سفيان الحمصي عن أبي أمامة قال:
قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
أخرجه أبو داود (97 1 5) ، ومن طريقه البيهقي في `شعب الإيمان ` (6/433/8787) .
قلت: وإسناده صحيح، رجاله ثقات رجال البخاري؛ غير أبي خالد وهب
- وهو ابن خالد الحمصي - ، وهو ثقة بلا خلاف.
وشيخه أبو سفيان الحمصي؛ اسمه محمد بن زياد الألهاني.
وله عنه طريق آخر مختصر؛ فقال ابن أبي شيبة في `المصنف ` (8/435/5788) : إسماعيل بن عياش عن محمد بن زياد الألهاني عن أبي أمامة قال: أمرنا نبينا - صلى الله عليه وسلم - أن نفشي السلام.
ومن طريق ابن أبي شيبة: أخرجه ابن ماجه (3693) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (8/131/ 7525) ، ورواه من طريقين آخرين عن إسماعيل بن عياش به.
وهذا إسناد شامي صحيح.
وتابعه بقية بن الوليد: حدثني محمد بن زياد به.
أخرجه الطبراني أيضاً (7524) ، وهو صحيح أيضاً
الثانية: عن أبي فروة الرّهاوي يزيد بن سنان عن سُليم بن عامر عن أبي أمامة قال:
قيل: يا رسول الله! الرجلان يلتقيان؛ أيهما يبدأ بالسلام؟ فقال:
`أولاهما بالسلام `.
أخرجه الترمذي (2694) ، وقال:
`هذا حديث حسن `.
قلت: أي: حسن لغيره؛ لأن أبا فروة هذا متفق على ضعفه. ولذلك قال
الحافظ: `ضعيف`
الثالثة: عن عبيد الله بن زحر عن علي بن يزيد عن القاسم عن أبي أمامة
مرفوعاً بلفظ:
`من بدأ بالسلام؛ فهو أولى بالله عز وجل ورسوله `.
أخرجه أحمد (5/ 254 و 261/264 و 269) ، والطبراني في `المعجم ` (8/237/7814 و 7815)
وهذا إسناد ضعيف؛ لضعف علي بن يزيد - وهو الألهاني - .
ونحوه - أو خير منه - عبيد الله بن زحر، وقد توبع، فقال بقية بن الوليد: عن
إسحاق بن مالك عن يحيى بن الحارث عن القاسم به.
أخرجه الطبراني (8/ 210/7743) .
قلت: بقية مدلس.
وإسحاق بن مالك - وهو الحضرمي - ضعفه الأزدي، وقال ابن القطان:
`لا يعرف `.
وذكر له الأزدي هذا الحديث بلفظ:
`البادي بالسلام أولى بالله ورسوله `.
(تنبيه) من أوهام الحافظ أنه عزا في `الفتح ` (11/16) حديث الترجمة للترمذي! وقد عرفت أن لفظه مخالف للفظه، وأقر تحسينه دون أن يبين وجهه!
ومن تخاليط المعلقين الثلاثة على `الترغيب ` قولهم (3/416/3989) :
`حسن بشواهده، رواه أبو داود.. والترمذي.. وابن حبان (911) `!
فجهلوا صحة إسناد أبي داود، وحسنوه بشواهده دون أن يبينوها، أو أن يشيروا على الأقل إلى شيء منها كما هي عادتهم.
ثم كذبوا في عزوهم إياه لابن حبان! فإن الرقم الذي قرنوه به إنما هو عنده لحديث ابن مسعود:
`إن أولى الناس بي يوم القيامة أكثرهم عليّ صلاة`!
فالتبس عليهم هذا بحديث الترجمة، والسبب أنهم يستعينون بل يتكئون في التخريج والعزو على الفهارس، ولا يرجعون إلى الأصول، ولو رجعوا إليها؛ لم
يستطيعوا الاستفادة منها لجهلهم بهذا العلم، إنما هم مقلدة نقلة. وهذا هو الدليل بين يديك، فإسناد أبي داود صحيح كالشمس وضوحاً، ومع ذلك جهلوه، ولما توهموا أنه في `صحيح ابن حبان `؛ توسطوا في الحكم عليه، فلا هم صححوه، ولا هم ضعفوه، فقالوا: `حسن بشواهده `!! أنصاف حلول. وهذا هو الغالب عليهم: التحسين هذا أو التحسين مطلقاً في كثير مما هو صحيح، وكثير مما هو ضعيف عند التحقيق؛ ستراً لجهلهم! والله المستعان. *******




আবু উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: "নিশ্চয়ই মানুষের মধ্যে আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বেশি অগ্রাধিকারপ্রাপ্ত হলো সে, যে তাদের মধ্যে (অন্যকে) প্রথমে সালাম দেয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3383)


3383 - (ما رأيت الذي هو أبخل منك؛ إلا الذي يبخل بالسلام) .
أخرجه أحمد في `مسنده ` (3/328) : ثنا أبو عامر العَقَديُّ: ثنا زهير عن عبد الله بن محمد بن عقيل عن جابر:
أدن رجلاً أتى النبي - صلى الله عليه وسلم - فقال: إن لفلان في حائطي عِذقاً، وانه قد آذاني وشق علي مكان عذقه، فأرسل إليه النبي - صلى الله عليه وسلم - ` فقال:
`بعني عذقك الذي في حائط فلان `.
قال: لا. قال:
`فهبه لي `. قال:
قال: لا. قال:
`فبعنيه بعذق في الجنة`.
قال: لا. فقال - صلى الله عليه وسلم - : ... فذ كره.
وهكذا أخرجه البزار (2/417/2000) عن شيخين له ثقتين قالا: ثنا أبو عامر به. وقال:
`لا نعلم يروى عن جابر إلا بهذا الإسناد`.
قلت: فقوله المنذري في ` الترغيب ` (3/ 269) :
`رواه أحمد والبزار، وإسناد أحمد لا بأس به `!
ففيه نظر من جهة تفريقه بين رواية أحمد والبزار، وكلاهما روياه من طريق زهير - وهو ابن محمد التميمي الخراساني - ، تكلموا في رواية الشاميين عنه، وهذه ليست منها؛ فإن أبا عامر العقدي بصري ثقة، واسمه عبد الملك بن عمرو. قال الحافظ - في زهير - :
`رواية أهل الشام عنه غير مستقيمة، فضعف بسببها، قال البخاري عن أحمد: كأن زهيراً الذي يروي عنه الشاميون آخر. وقال أبو حاتم: حدث بالشام من حفظه، فكثرغلطه `.
وقال الذهبي في ` الكاشف `:
`ثقة يغرب، ويأتي بما ينكر`.
قلت: قد صرح غير واحد من الحفاظ بأن ما أنكر عليه هو من رواية الشاميين، فقال أحمد فيهم:
`يروون عنه أحاديث مناكير.. أما رواية أصحا بنا - يعني: العراقيين - عنه فمستقيمة ` عبد الرحمن بن مهدي وأبي عامر أحاديث مستقيمة صحاح `.
وقا ل البخا ري:
`ما روى عنه أهل الشام؛ فإنه مناكير، وما روى عنه أهل البصرة؛ فإنه صحيح `. إذا عرفت هذا؛ فالصواب قوله الهيثمي في `المجمع ` (8/32) :
`رواه أحمد والبزار، وفيه عبد الله بن محمد بن عقيل، وحديثه حسن، وفيه ضعف، وبقية رجاله رجال (الصحيح) `.
وقد توبع أبو عامر العقدي، فقال عبد بن حميد في `المنتخب من المسند` (3/22/1035) : حدثني موسى بن مسعود: حدثنا زهير بن محمد به.
وموسى بن مسعود: هو أبو حذيفة البصري أيضاً، أخرج له البخاري في
المتابعات، كما في `التقريب `.
ومن طريقه أخرجه الحاكم في `المستدرك ` (2/ 20) شاهداً.
وتابعه يحيى بن أبي بكير: ثنا زهير بن محمد به.
أخرجه البيهقي في `السنن ` (6/




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

একদা এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে অভিযোগ করলেন যে, অমুক ব্যক্তির খেজুরের একটি কাঁদি তার বাগানের মধ্যে রয়েছে, আর ওই কাঁদির অবস্থানের কারণে সে তাঁকে কষ্ট দেয় এবং তা তার জন্য কঠিন হয়ে দাঁড়িয়েছে।

তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই ব্যক্তির কাছে লোক পাঠিয়ে বললেন: "অমুক ব্যক্তির বাগানে তোমার যে খেজুরের কাঁদি আছে, তা আমার কাছে বিক্রি করে দাও।"

লোকটি বলল: "না।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তা আমাকে উপহার দাও।"

লোকটি বলল: "না।"

তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তবে জান্নাতে একটি খেজুরের কাঁদির বিনিময়ে তা আমার কাছে বিক্রি করো।"

লোকটি বলল: "না।"

তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমার চেয়ে কৃপণ আর কাউকে দেখিনি, তবে সেই ব্যক্তি ছাড়া, যে সালাম দিতেও কার্পণ্য করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3384)


3384 - (خصال ست؛ ما من مُسلم يموتُ في واحدة منْهن؛ إلا كانت ضامناً على الله أن يدْخِلََه الجنّة:




ছয়টি বৈশিষ্ট্য রয়েছে। কোনো মুসলিম যদি এই বৈশিষ্ট্যগুলোর মধ্য থেকে কোনো একটির ওপর ইন্তেকাল করে, তবে আল্লাহ তা‘আলার উপর তা তার জন্য জান্নাতে প্রবেশ করানোর নিশ্চয়তা (জামিন) হয়ে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3385)


3385 - (إذا قال الرجل لأخيه: يا كافر! فهو كقتله، ولعْنُ المؤمنِ كقتله) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكببر` (18/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "যখন কোনো ব্যক্তি তার ভাইকে বলে, ‘হে কাফির!’ তখন তা তাকে হত্যা করার সমতুল্য। আর মুমিনকে অভিশাপ দেওয়াও তাকে হত্যা করার মতোই।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3386)


3386 - (لا يزالُ النّاس بخير؛ ما لم يتحاسدوا) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (8/369/8157) : حدثنا الحسن بن جرير الصُّوريُّ: ثنا سليمان بن عبد الرحمن الدمشقي: ثنا إسماعيل بن عياش عن ضمضم بن زرعة عن شريح بن عبيد عن أبي بحرية عن ضمرة بن ثعلبة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات من رجال `التهذيب `، وفي بعضهم خلاف لا يضر؛ غير شيخ الطبراني الحسن بن جرير الصوري، وهو من شيوخه المشهورين، ترجم له الحافظ ابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (4/419) بروايته عن جمع من الثقات، وعنه نحو عشرين من الشيوخ بعضهم من الحفاظ، ووصفه الحافظ الذهبي في`سير أعلام النبلاء` (13/442) بـ: `الإمام المحدث `.
على أنه قد توبع، فقال أبو الشيخ ابن حيان في `التوبيخ ` (108/78) : حدثنا
أبو الجارود: ثنا أبو سيار: ثنا محمد بن إسماعيل بن عياش: ثنا أبي به.
ومحمد بن إسماعيل تكلموا فيه، ولا يضر ذلك هنا؛ لأنه متابع.
وأبو سيار هذا؛ الظاهر أنه الذي في `كنى أبي أحمد الحاكم ` (1/) :
`أبو سيار العلاء بن محمد بن سيار، يروي عن أبي المثنى محمد بن عمرو
ابن علقمة الليثي، حدث عنه إسحاق بن إبراهيم الصواب (¬1) البصري، حديثه في البصريين `.
(تنبيه) : تكلم الأخ حسن أبو الأشبال على بعض رجال `التوبيخ` مصرحاً بضعف إسناده، ثم أتبعه بذكر ما قاله مراجع كتابه الشيخ (محمد عمرو بن عبد اللطيف) ، فقال:
` [لكن أخشى أن لا يكون (شريح بن عبيد) قد سمعه من (أبي بحرية) ؛ فإنه كثير الإرسال، وقال ابن أبي حاتم في ` المراسيل ` (ص 90) : `شريح بن عبيد الحمصي، لم يدرك أبا أمامة، ولا الحارث بن الحارث، ولا المقدام `. قلت: وتوفي أبو أمامة سنة (86) ، وتوفي أبو بحرية سنة (77) ، أي: قبلهما بسنين. فأخشى أن لا يكون أدركه أيضاً. (م) ] `!!
فأقول: هذه الخشية غير واردة هنا في نقدي؛ لأن الإدراك الذي نفاه أبو حاتم لا يعني أنه لم يدركهم ولم يعاصرهم، وسنة وفاتهم المتقاربة تؤكد ذلك، وإنما يعني أنه لم يسمع منهم، وعليه فليس يعني أنه لم يسمع من كل من عاصرهم، فهذا هو الإمام البخاري يصرح أنه سمع من معاوية، وقد توفي سنة (60) ، فإمكان سماعه من أبي بحرية ظاهر جداً وأولى. فإذا لم يكن لدينا نص من حافظ
¬_________
(¬1) كذا أصل الشيخ، ولعله سبق قلم. والصواب: `الصَّوَّاف `؛ كما في `تهذيب المزي ` ترجمة إسحاق هذا (برقم: 325) .
******
نقاد بأنه لم يسمع منه؛ فيكفينا في هذه الحالة ثبوت المعاصرة وإمكان اللقاء ` كما هو المختار عند جماهير العلماء بشرط السلامة من التدليس، ولم يُرْمَ (شريح) بشيء من التدليس فيما علمت، ولا تلازم بينه وبين الإرسال عند أهل العلم، فكم من راو ثقة وصف بالإرسال، ومع ذلك فحديثه صحيح عند الشيخين فضلاً عن غيرهم، ولو كانت روايته معنعنة! هذا أمر لا يخفى إن شاء الله على من مارس هذا العلم وعرفه حق المعرفة. والله سبحانه وتعالى أعلم.
والحديث؛ قال المنذري مشيراً إلى تقويته (4/12/4) :
`رواه الطبراني، ورواته ثقات `.
وكذا قال الهيثمي في `المجمع ` (8/78) . ********




দম্রা ইবনে সা’লাবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: মানুষ ততদিন পর্যন্ত কল্যাণের মধ্যে থাকবে, যতদিন না তারা একে অপরের প্রতি হিংসা বা বিদ্বেষ পোষণ করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3387)


3387 - (من أتى كاهناً، فصدَّقه بما يقول؛ فقد كفر بما أنزل على محمد) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (3/ 400/3045) : حدثنا عقبة بن سنان: ثنا غسان بن مضر: ثنا سعيد بن يزيد عن أبي نضرة عن جابر بن عبد الله عن النبي - صلى الله عليه وسلم - : ... فذ كره. وقال:
`لا نعلمه يروى عن جابر إلا من هذا الوجه، ولم نسمع أحداً يحدث به عن غسان إلا عقبة`.
قلت: قال الحافظ في `مختصر الزوائد` (1/647/1171) :
`قال الشيخ - يعني: الهيثمي - : وهو ثقة`.
قلت: وهذا هو الصواب، خلافاً لقول الهيثمي الآخر في `مجمع الزوائد` (5/117) :
`رواه البزار، ورجاله رجال الصحيح؛ خلا عقبة بن سنان، وهو ضعيف `.
وقد كنت شككت في هذا التضعيف في `غاية المرام ` (174/285) ؛ لأسباب كنت ذكرتها هناك، فمن شاء راجعها، وخلاصتها أنه لا وجه لهذا التضعيف؛ لأنه ليس فيمن يسمى بـ (عقبة بن سنان) مضعف؛ فإنهم ثلاثة، أحدهم: مجهول الحال، وهو أعلى من هذا طبقة، والآخران: ثقتان، أحدهما: (عقبة بن سنان بن عقبة الهدادي البصري) روى عن غسان بن مضر؛ فهو هذا، وقد قال فيه أبو حاتم: ` صد وق `.
وبقية رجال الإسناد ثقات رجال الشيخين؛ غير غسان بن مضر؛ وهو ثقة من شيوخ النسائي. وقد وهم الهيثمي في عدم استثنائه إياه مع عقبة بن سنان، في قوله المتقدم. فالإسناد جيد؛ كما قال المنذري في `الترغيب ` (4/52/7) ، وتبعه الحافظ في `الفتح ` (10/217) .
وللحديث شواهد كثيرة يزداد بها قوة، خرجت بعضها في `إرواء الغليل ` (7/68ـ 70) ، و`غاية المرام ` (72




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যে ব্যক্তি কোনো গণকের কাছে গেল এবং সে যা বলে, তা বিশ্বাস করল; সে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওপর যা নাযিল করা হয়েছে, তার সাথে কুফরি করল।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3388)


3388 - (قالت قريش للنبيّ - صلى الله عليه وسلم - : ادع لنا ربّك أن يجْعل لنا الصّفا ذهباً ونؤمن بك! قال:
وتفعلون؟ .
قالوا: نعم.
فدعا، فأتاه جبريل فقال: إن ربك يقرأ عليك السّلام ويقول:
إن شِئت أصبح لهم (الصّفا) ذهباً، فمن كفر بعد ذلك منهم؛ عذبته عذاباً لا أعذبه أحداً من العالمين، وإن شئت فتحت لهم باب التوبة والرحمة. قال:
بل باب التوبة والرحمة) .
أخرجه الحاكم (1/53و4/240) ، والبيهقي في `الدلائل ` (2/272) ،
وأحمد (1/242 و345) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (12/152/12736) من طرق منها: وكيع عن سفيان عن سلمة بن كهيل عن عمران بن الحكم (وفي رواية: أبي الحكم) السلمي عن ابن عباس قال: ... فذكره. وقال الحاكم:
`صحيح محفوظ من حديث الثوري عن سلمة بن كهيل `.
وهو كما قال، ورجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير عمران أبي الحكم السلمي
- وهو الصواب من الروايتين - ؛ فهو من رجال مسلم، وكأن الحاكم ذهل عن ذلك؛ فإنه في الموضع الثاني اقتصر على قوله:
`صحيح الإسناد`! ووافقه الذهبي!
والصواب أنه صحيح على شرط مسلم. وقد أشار إلى هذا المنذري بقوله في `الترغيب ` (4/ 75/ 12) :
`رواه الطبراني، ورواته رواة (الصحيح) `.
وكذا قال الهيثمي في `المجمع ` (10/196) .
وقد غفلا عن عزوه لأحمد - فضلاً عن الحاكم - ، وهذا على شرط المنذري دون الهيثمي كما لا يخفى على العارفين بكتابيهما ومنهجيهما فيهما.
والحديث أخرجه البزار في `مسنده ` (3/55/




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

কুরাইশরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলল: আপনি আমাদের রবের কাছে দোয়া করুন যেন তিনি আমাদের জন্য সাফা পর্বতকে সোনা বানিয়ে দেন, তাহলে আমরা আপনার প্রতি ঈমান আনব!

তিনি (নবী সাঃ) বললেন: তোমরা কি তা করবে?

তারা বলল: হ্যাঁ।

তখন তিনি দোয়া করলেন। অতঃপর তাঁর কাছে জিবরাইল (আঃ) এলেন এবং বললেন: আপনার রব আপনাকে সালাম জানাচ্ছেন এবং বলছেন: আপনি যদি চান, তবে আমি তাদের জন্য সাফা পর্বতকে সোনা বানিয়ে দেব। কিন্তু এরপরও তাদের মধ্য থেকে যে কুফরি করবে, তাকে আমি এমন শাস্তি দেব যা বিশ্বজগতের অন্য কাউকে দেব না। আর আপনি যদি চান, তবে আমি তাদের জন্য তওবা ও রহমতের দরজা উন্মুক্ত রাখব।

তিনি (নবী সাঃ) বললেন: বরং তওবা ও রহমতের দরজাই খোলা থাক।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3389)


3389 - (مَن أحسن فيما بقِيَ؛ غُفرَ له ما مضَى، ومن أَساءَ فيما بقيَ؛ أُخِذَ بما مضَى وما بقيَ) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (7/413/6802) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق ` (18/377) من طريقين عن سليمان بن عبد الرحمن قال: حدثنا يحيى بن حمزة عن الوَضين بن عطاء عن يزيد بن مرثد عن أبي ذر قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال الطبراني:
`لم يروه عن الوضين بن عطاء إلا يحيى بن حمزة `.
قلت: وهو ثقة من رجال الشيخين، وسائر الرجال ثقات، وفي الوضين، وسليمان بن عبد الرحمن - وهو ابن بنت شرحبيل - كلام من جهة حفظهما , لا ينزل به حديثهما عن درجة الحسن. ولذلك قال المنذري في `الترغيب ` (4/79) - وتبعه الهيثمي (10/202) - :
`رواه الطبراني بإسناد حسن `.
ورواه الأصبهاني في `الترغيب ` (1/94/151) مقطوعاً من قول الفضيل بن عياض، وفيه:
ثم بكى الفضيل، فقال: أسال الله أن يجعلنا وإياكم ممن يحسن فيما بقي.
وقد خفي رفعه على بعض المتأخرين، فقد أورده الشيخ العجلوني في `كشف الخفاء `، وقال (2/225) :
`قال النجم: لم أجده في الحديث المرفوع، وإنما أخرجه الأصبهاني في `الترغيب ` عن الفضيل بن عياض من قوله. وفي معناه ما أخرجه الشيخان وابن ماجه عن ابن مسعود ... `، ثم ذكر الحديث الآتي بعد هذا!
وروى الدارمي في أول `سننه ` (1/




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

যে ব্যক্তি তার অবশিষ্ট জীবনে উত্তম কাজ করবে, তার অতীতের (ত্রুটি) ক্ষমা করে দেওয়া হবে। আর যে ব্যক্তি তার অবশিষ্ট জীবনে মন্দ কাজ করবে, তাকে তার অতীত ও বর্তমান সব কিছুর জন্য পাকড়াও করা হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3390)


3390 - (مَن أحسنَ في الإِسلام، لم يُؤاخَذ بما عمِلَ في الجاهليّةِ، ومن أساءَ في الإِسلام؛ أُخِذَ بالأوّل والآخرِ) .
أخرجه البخاري (6921) ، ومسلم (1/




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

যে ব্যক্তি ইসলামে উত্তম কাজ করে, জাহিলিয়াতের যুগে সে যা কিছু করেছে, তার জন্য তাকে পাকড়াও করা হবে না। আর যে ব্যক্তি ইসলামে মন্দ কাজ করে, তাকে প্রথম (জাহিলিয়াতের) ও শেষ (ইসলামের) সব কাজের জন্য পাকড়াও করা হবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3391)


3391 - (نَعَم، تفعلُ الخيرات، وتتركُ السيئات، فيجعلُهنَّ اللهُ لكَ خيراتٍ كلَّهنَّ) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (4/




মু‘আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
“হ্যাঁ, তুমি যদি ভালো কাজ করো এবং মন্দ কাজ পরিহার করো, তবে আল্লাহ্ সেগুলোকে তোমার জন্য সম্পূর্ণরূপে নেকিতে (পুণ্যে) পরিণত করে দেবেন।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3392)


3392 - (والله! للدُّنيا أهونُ على اللهِ من هذه السَّخلةِ على أهلِها،
فلا أُلفينَّها أهلكت أحداً منكم) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (4/268/




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"আল্লাহর কসম! এই দুনিয়া আল্লাহ তাআলার কাছে এর মালিকের কাছে থাকা একটি ছোট মেষশাবকের (বা ছাগলছানার) চেয়েও অধিক তুচ্ছ ও নগণ্য। সুতরাং, আমি যেন কখনোই না দেখি যে, এই দুনিয়া তোমাদের মধ্য থেকে কাউকে ধ্বংস করে দিয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3393)


3393 - (إنّ اللهَ ليبتَلي عبدَه بالسَّقمِ، حتّى يُكفِّر ذلكَ عنه كلَّ ذَنبٍ) .
أخرجه الحاكم (1/




নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা তাঁর বান্দাকে অসুস্থতা দ্বারা পরীক্ষা করেন, যাতে এর মাধ্যমে তার সমস্ত গুনাহ মোচন করে দেওয়া হয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3394)


3394 - (يا أيُّها النّاسُ! إن هذه الأمَّةَ تُبتلى في قبورها، فإذا الإنسان دُفنَ فتفرَّق عنه أصحابُه؛ جاءه ملكٌ في يدهِ مِطراقٍ فأقعدَه، قال: ما تقولُ في هذا الرجلِ؟ فإن كان مؤمناً؛ قال: أشهد أن لا إله إلا الله وأن محمداً عبده ورسوله، فيقولُ: صدقْتَ، ثم يُفتحُ له بابٌ إلى النار فيقول: هذا كان منزلَكَ لو كفرْتَ بربك؛ فأمّا إذ آمنتَ؛ فهذا منزلُكَ؛ فيُفتحُ له باب إلى الجنَّة، فيريدُ أن ينهض إليه، فيقول له: اسكنْ! ويُفسحُ له في قبره.
وإن كان كافراً أو منافقاً؛ يقول له: ما تقولُ في هذا الرَّجلِ؟ فيقول: لا أدْري، سمعتُ النّاس يقولون شَيئاً، فيقول: لا دريْتَ ولا تليْتَ ولا اهتديْتَ! ثم يُفتحُ له بابٌ إلى الجنّة، فيقول: هذا منزلُك لو آمنْتَ بربِّك، فأما إذ كفرتَ به، فإنّ الله عزّ وجلّ أبدَلك به هذا، ويُفتحُ له باب إلى النّارِ، ثم يقمعهُ قَمْعة بالمطراقِ، يسمعُها خَلْقُ اللهِ كلّهم غيرَ الثّقلينِ.
فقال بعضُ القومِ: يا رسولَ الله! ما أحد ٌيقوم عليه مَلَكٌ في يدهِ مطراقٌ إلا هَبِلَ عند ذلك؟! فقالَ رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : (يثبتُ الله الذين آمنوا بالقول الثابت)) .
أخرجه الإمام أحمد (3/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

হে লোকসকল! নিশ্চয় এই উম্মতকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো ব্যক্তিকে দাফন করা হয় এবং তার সঙ্গীরা ফিরে যায়, তখন তার কাছে একজন ফেরেশতা আসেন যার হাতে একটি হাতুড়ি থাকে। তিনি তাকে বসিয়ে দেন এবং জিজ্ঞাসা করেন: ’এই ব্যক্তি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) সম্পর্কে তুমি কী বলো?’

যদি সে মুমিন হয়, তবে সে বলে: ‘আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ তাঁর বান্দা ও রাসূল।’ তখন ফেরেশতা বলেন: ’তুমি সত্য বলেছো।’ অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং বলা হয়: ’তুমি যদি তোমার রবের সাথে কুফরি করতে, তবে এটিই হতো তোমার ঠিকানা। কিন্তু যেহেতু তুমি ঈমান এনেছো, তাই এটি (জান্নাতের দরজা) তোমার ঠিকানা।’ এরপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে সেদিকে যেতে চায়, তখন তাকে বলা হয়: ’শান্ত হও!’ আর তার কবরকে প্রশস্ত করে দেওয়া হয়।

আর যদি সে কাফির বা মুনাফিক হয়, তবে তাকে জিজ্ঞাসা করা হয়: ’এই ব্যক্তি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) সম্পর্কে তুমি কী বলো?’ সে বলে: ’আমি জানি না, আমি লোকজনকে কিছু বলতে শুনেছি।’ তখন ফেরেশতা বলেন: ’না তুমি জানলে, না তুমি পড়লে এবং না তুমি হেদায়েত পেলে!’

অতঃপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং বলা হয়: ’যদি তুমি তোমার রবের প্রতি ঈমান আনতে, তবে এটিই হতো তোমার ঠিকানা। কিন্তু যেহেতু তুমি তাঁর সাথে কুফরি করেছো, তাই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এর বদলে তোমাকে এই ঠিকানা দিয়েছেন।’ এরপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। অতঃপর তাকে সেই হাতুড়ি দিয়ে এমন জোরে আঘাত করা হয় যে, মানুষ ও জিন ব্যতীত আল্লাহর সৃষ্টিকূলের সকলে তা শুনতে পায়।

তখন উপস্থিত কিছু লোক জিজ্ঞেস করল: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যার কাছেই হাতে হাতুড়ি নিয়ে ফেরেশতা উপস্থিত হবে, সে কি তখন হতবুদ্ধি হয়ে যাবে না?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "(যারা ঈমান এনেছে) আল্লাহ্‌ তাদের দৃঢ় বাণীর মাধ্যমে অবিচল রাখেন।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3395)


3395 - (يُحشر النّاسُ على ثلاثِ طرائقَ: راغبين وراهبين، واثنان على بعير، وثلاثةٌ على بعير، وأربعةٌ على بعير، وعشرةٌ على بعير، ويَحشرُ بقيتَهم النّارُ، تقيلُ معهم حيثُ قالُوا، وتبيتُ معهم حيثُ باتُوا، وتصبحُ معهم حيث أصبحُوا، وتُمسي معهم حيثُ أمسُوا) .
أخرجه البخاري (6522) ، ومسلم (8/157) ، والنسائي (1/295) ، وابن حبان في `صحيحه ` (9/217/7292) ، وابن أبي شيبة في `المصنف ` (13/248/16245) ، وابن أبي الدنيا في `الأهوال ` (239/235) ، والبيهقي في `شعب الإيمان ` (1/318/359) ، والطبراني في `المعجم الأوسط ` (6/50/5103) ، والبغوي
في `التفسير` (5/176) ، و`شرح السنة ` (15/




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

মানুষকে তিন প্রকারে (বা তিনটি অবস্থায়) সমবেত করা হবে: (এক প্রকার) আগ্রহকারী ও (আল্লাহর শাস্তি থেকে) ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায়; (আরেক প্রকার) (বাহনের স্বল্পতার কারণে) দুইজন আরোহণ করবে একটি উটে, তিনজন আরোহণ করবে একটি উটে, চারজন আরোহণ করবে একটি উটে, এবং দশজন আরোহণ করবে একটি উটে। আর অবশিষ্টদেরকে আগুন তাড়িয়ে নিয়ে যাবে। তারা যেখানে দ্বিপ্রহরের বিশ্রাম নিবে, আগুনও সেখানে তাদের সাথে বিশ্রাম নিবে। তারা যেখানে রাত্রি যাপন করবে, আগুনও সেখানে তাদের সাথে রাত্রি যাপন করবে। তারা যেখানে সকাল করবে, আগুনও সেখানে তাদের সাথে সকাল করবে। তারা যেখানে সন্ধ্যা করবে, আগুনও সেখানে তাদের সাথে সন্ধ্যা করবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3396)


3396 - (لو أنّ ما يُقِلُّ ظفرٌ ممّا في الجنّةِ بدَا؛ لتزخرفَت له خَوافقُ السماواتِ والأرضِ، ولو أنَّ رجُلاً من أهلِ الجنّةِ اطّلع فبدَا أساورُه؛ لطمسَ ضَوءَ الشّمسِ كما تطمسُ الشّمسُ ضَوءَ النُّجومِ) .
هو من حديث سعد بن أبي وقاص رضي الله عنه، وله عنه طريقان:
الأولى: عن عامر بن سعد بن أبي وقاص، وله عنه طريقان:




সা’দ ইবনু আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

জান্নাতের বস্তুসমূহের মধ্যে থেকে যদি নখের ডগার সমপরিমাণও কিছু প্রকাশিত হয়, তবে তার সৌন্দর্যে আসমান ও যমীনের দিগন্তসমূহ সুসজ্জিত হয়ে উঠবে। আর যদি জান্নাতবাসীদের মধ্য থেকে কোনো ব্যক্তি উঁকি দেয় এবং তার হাতের অলঙ্কার (বা চুড়ি) প্রকাশিত হয়, তবে তা সূর্যের আলোকে এমনভাবে ম্লান করে দেবে, যেমন সূর্য নক্ষত্ররাজির আলো ম্লান করে দেয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3397)


3397 - (مرحباً بطَالبِ العلمِ، [إن] طالبَ العِلم لتحفُّه الملائكةُ وتظلٌّه بأجنحتِها، ثمّ يركبُ بعضُهم بعضاً، حتّى يبلغُوا السَّماء الدُّنيا؛ من حبِّهم لما يَطلُب) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (8/64/7347) ، وابن عدي في `الكامل ` (6/331) ، وابن عبد البر في `جامع بيان العلم ` (1/32) عن الصَّعق ابن حزن: ثنا علي بن الحكم البُناني عن المنهال بن عمرو عن زِرِّ بن حُبيش عن عبد الله بن مسعود رضي الله عنه قال: حدث صفوان بن عَسال المرادي قال:
أتيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو متكئ في المسجد على برد له [أحمر] ، فقلت له: يا رسول الله! إني جئت أطلب العلم، فقال: ... فذكره.
قال: قال صفوان: يا رسول الله! لا نزال نسافر بين مكة والمدينة، فأفتنا عن المسح على الخفين؟! فقال له رسول الله عن:
`ثلاثة أيام للمسافر، ويوم وليلة للمقيم `.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات رجال `الصحيح `، وفي بعضهم كلام لا يضر. وقال المنذري في `الترغيب ` (1/54/4) :
`رواه أحمد، والطبراني بإسناد جيد - واللفظ له - وابن حبان في `صحيحه `، والحاكم، وقال: `صحيح الإسناد` ... `.
قلت: أخرجه الحاكم (1/




সাফওয়ান ইবনে আস্সাল আল-মুরাদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন:
আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম যখন তিনি মসজিদে তাঁর একটি (লাল) চাদরের উপর হেলান দিয়ে ছিলেন। আমি তাঁকে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি জ্ঞান অন্বেষণ করার জন্য এসেছি। তখন তিনি বললেন:
"জ্ঞান অন্বেষণকারীর প্রতি স্বাগতম। নিশ্চয়ই জ্ঞান অন্বেষণকারীকে ফিরিশতারা বেষ্টন করে রাখে এবং তাদের ডানা দ্বারা ছায়া দিতে থাকে। অতঃপর তারা যা সে (জ্ঞান অন্বেষণকারী) অন্বেষণ করছে তার প্রতি ভালোবাসার কারণে একে অপরের উপর আরোহণ করে পৃথিবীর নিকটবর্তী আকাশ পর্যন্ত পৌঁছে যায়।"
সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা মক্কা ও মদীনার মধ্যে সর্বদা সফর করে থাকি। তাই আমাদেরকে চামড়ার মোজার উপর মাসেহ করার ব্যাপারে ফতওয়া দিন। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন:
"মুসাফিরের (পথিকের) জন্য তিন দিন তিন রাত, আর মুকিমের (স্থায়ীভাবে বসবাসকারীর) জন্য এক দিন এক রাত।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3398)


3398 - (من توضَّأَ فأحسنَ وضوءَه، ثمّ قامَ فصلّى ركعتين - أو أربعاً؛ شكَّ سهلٌ - ، يُحسنُ فيها الذِّكر والخُشوعَ، ثم استغفرَ الله؛ غُفِرَ له)
أخرجه أحمد في `المسند` (6/ 450) : ثنا أحمد بن عبد الملك: حدثني سهل بن أبي صدقة قال: حدثني كثير بن الفضل الطَّفاوي: حدثني يوسف بن عبد الله بن سلام قال:
أتيت أبا الدرداء في مرضه الذي قُبض فيه، فقال لي: يا ابن أخي! ما أعمدك إلى هذا البلد، أو ما جاء بك؟ قال: قلت: لا؛ إلا صلة ما كان بينك وبين والدي عبد الله بن سلام، فقال أبو الدرداء: بئس ساعة الكذب هذه، سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول: ... فذكره.
قال عبد الله بن أحمد عقبه:
`وثناه سعيد بن أبي الربيع السمان، قال: ثنا صدقة بن أبي سهل الهُنائي ... `.
قال عبد الله: `وأحمد بن عبد الملك وهم في اسم الشيخ فقال: (سهل بن أبي صدقة) ، وإنما هو (صدقة بن أبي سهل الهنائي) `.
قلت: وهذا هو الصواب؛ لأن سعيد بن أبي الربيع السمان - مع كونه ثقة (انظر الحديث المتقدم 3154) - ؛ فقد تابعه غير واحد، فقال البخاري في `التاريخ` (2/2/297/2891) تحت ترجمة (صدقة بن أبي سهل البصري) :
`سمع كثيراً أبا الفضل، روى عنه مسلم بن إبراهيم وقتيبة.
قال أبو كامل: نا صدقة: نا كثير عن يوسف بن عبد الله بن سلام: أتيت أبا الدرداء في مرضه الذي مات فيه `.
وأبو كامل هذا؛ يغلب على ظني أنه فضيل بن حسين الجَحدري الثقة، فقد ذكر المزي في ترجمته أنه:
`روى عنه البخاري تعليقاً، ومسلم، و.. و.. `. (¬1)
وتابعه أيضاً خالد بن خِداش، وهو ثقة أيضاً من شيوخ مسلم، فقال الطبراني في `المعجم الأوسط ` (6/14/5022) : حدثنا محمد بن النضر الأزدي قال: حدثنا خالد بن خِداش قال: حدثنا صدقة بن أبي سهل أبو سهل الهُنائي قال: حدثني كثير أبو الفضل عن يوسف بن عبد الله بن سلام قال:
¬_________
(¬1) ثم رأيت ما يؤكد ذلك، فقد ذكر الحافظ في `التعجيل ` عن الطبراني - يعني: في `الكبير` - أنه أخرى عن أبي كامل الجحدري ...
أتيت أبا الدرداء وهو بالشام، فقال: ما جاء بك يا بني! إلى هذه البلدة، وما عناك إلى ذلك (¬1) ؟ قلت: ما جاء بي إلا صلة ما كان بينك وبين أبي، فأخذ بيدي فأجلسني، فساندته، ثم قال: بئس ساعة الكذب على رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ، سمعت النبي - صلى الله عليه وسلم - يقول:
`ما من مسلم يذنب ذنباً، فيتوضأ، ثم يصلي ركعتين، أو أربعاً، مفروضة أو غير مفروضة، ثم يستغفر الله؛ إلا غفر الله له ` (¬2) . وقال:
`لا يروى هذا الحديث عن أبي الدرداء إلا بهذا الإسناد، تفرد به صدقة ابن أبي سهل `.
قلت: وهو ثقة على ما يأتي بيانه، وسائر رجاله ثقات، فهو إسناد صحيح. وقال المنذري في `الترغيب ` (1/106و 146) :
`رواه أحمد بإسناد حسن `.
وقال الهيثمي (2/




আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

"যে ব্যক্তি ওযু করে এবং উত্তমরূপে ওযু সম্পন্ন করে, অতঃপর সে দাঁড়িয়ে দু’ রাকাত অথবা চার রাকাত (বর্ণনাকারী সন্দেহ করেছেন) সালাত আদায় করে—যে সালাতে সে উত্তমরূপে আল্লাহর স্মরণ (যিকর) ও বিনয় (খুশু) বজায় রাখে—অতঃপর আল্লাহর কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করে (ইস্তেগফার করে), তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3399)


3399 - (مَن بنَى مسجداً لا يريد به رِياءً ولا سُمعةً؛ بنى اللهُ له بيتاً في الجنة) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (8/5/7001) من طريق محمد بن عيسى بن سُمَيع عن المثنى بن الصَّبَّّاح عن عطاء عن عائشة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال:
`لم يروه عن المثنى إلا محمد بن عيسى، تفرد به هشام بن عمار، ولم يروه عن عطاء عن عائشة إلا كثير بن عبد الرحمن الكوفي، والمثنى بن الصباح `.
قلت: قال الذهبي في `الكاشف ` في المثنى:
`قال أبو حاتم وغيره: لين الحديث `.
وقال الحافظ في `التقريب `:
`ضعيف اختلط بأخرة`.
قلت: فمثله يستشهد به إن شاء الله، وقد أشار إلى ذلك ابن معين فقال:
`يكتب حديثه ولا يترك `.
ومثله الراوي عنه محمد بن عيسى بن سميع، فقد قال الذهبي في `المغني `:
`قال أبو حاتم: لا يحتج به. وقال ابن عدي: لا بأس به `.
وأما هشام بن عمار؛ فثقة من شيوخ البخاري، وفيه كلام معروف.
وأما كثير بن عبد الرحمن الكوفي الذي ذكره الطبراني متابعاً لابن الصباح؛ فهو العامري المؤذن، فقد ساق حديثه الطبراني في `الأوسط ` أيضاً (7/304/6582)
من طريق قيس بن الربيع عنه عن عطاء عن عائشة به دون قوله:
`.. لا يريد به رياء ولا سمعة`.
وقال:
`لم يروه عن عطاء إلا كثير بن عبد الرحمن `.
كذا قالت! وهو مخالف لروايته المتقدمة، ولما عقب عليها، من متابعة المثنى لكثيرهذا.
وقيس بن الربيع ضعيف؛ لكنه قد توبع من قبل عبيد الله بن موسى: حدثنا كثير بن عبد الرحمن به وزاد:
قلت: يا رسول الله! وهذه المساجد التي في طريق مكة؟ قال: `وتلك `.
أخرجه البخاري في ` التاريخ ` (1/1/332) - ولم يذكر الزيادة - ، والبزار في `مسنده ` (1/205/404) ، والعقيلي في `الضعفاء` (4/3/1554) ، والبيهقي في `الشعب ` (3/81/2939) ، والطحاوي في `مشكل الآثار` (4/13/1556) .
وتابعه آخران عند ابن أبي شيبة (1/310) . وقال العقيلي:
`كثير لا يتابع عليه. وهذا يروى بغير هذا الإسناد بإسناد أصلح من هذا`.
قلت: يعني دون هذه الزيادة، ودون زيادة (الرياء) أيضاً، وذلك عن جماعة من الصحابة، منهم عثمان بن عفان رضي الله عنه، وحديثه في `الصحيحين ` وغيرهما، وهو مخرج مع غيره في `الروض النضير` (883و953و954) ؛ ولفظه: `من بنى مسجداً لله بنى الله له بيتاً في الجنة`.
فقوله: `لله `؛ أي: مخلصاً له، فهو شاهد قوي لقوله:
`لا يريد به رياء ولا سمعة`.
وبمعناه حديث ابن عباس مرفوعاً بلفظ:
`من بنى مسجداً يراه الله؛ بنى الله له بيتاً في الجنة ... ` الحديث.
أخرجه الطبراني في `الأوسط ` أيضاً (9/216/8471) من طريق عمران بن عبيد الله - مولى عبيد الصِّيد - قال: سمعت الحكم بن أبان يحدث عن عكرمة عن ابن عباس ...
قال الهيثمي (2/8) في عمران هذا:
`ذكره البخاري في `تاريخه `، وقال: `فيه نظر`، وضعفه ابن معين أيضاً، وذكره ابن حبان في (الثقات) `.
وقال في تخريج حديث عائشة الذي قبله:
`رواه البزار، والطبراني في `الأوسط ` - باختصار - وفيه كثير بن عبد الله، ضعفه العقيلي، وذكره ابن حبان في (الثقات) `.
وسكت عنه ابن أبي حاتم (3/1/301) .
والخلاصة: أن الحديث حسن أو صحيح بهذه الشواهد. والله أعلم. *




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

যে ব্যক্তি লোক-দেখানো বা সুখ্যাতির উদ্দেশ্য ব্যতীত একটি মসজিদ নির্মাণ করবে, আল্লাহ তার জন্য জান্নাতে একটি ঘর তৈরি করে দেবেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (3400)


3400 - (إنّه ليسَ من مصلٍّ إلا وهو يناجِي ربَّه؛ فلا يجهر بعضُكم على بعضٍ بالقراءَةِ) .
أخرجه النسائي في `السنن الكبرى` (2/264/3360) ، وابن عبد البر في
`التمهيد` (32/317و318) من طرق عن ابن الهاد عن محمد بن إبراهيم عن عطاء بن يسار عن رجل من الأنصار من بني بَياضة: أنه سمع رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو مجاور في المسجد يوماً - ؛ فوعظ الناس وحذرهم ورغبهم، ثم قال: ... فذكره.
ثم رواه النسائي من طرق أخرى عن محمد بن إبراهيم مختصراً ومطولاً، ومرسلاً ومتصلاً.
وهذا إسناد متصل صحيح؛ كما قال ابن عبد البر؛ فإن رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين.
وقد رواه مالك في `الموطأ` (1/




আনসারী সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই যে কোনো নামাজী (সালাত আদায়কারী) তার প্রতিপালকের সাথে একান্ত কথোপকথন (মুনাজাত) করতে থাকে; অতএব, তোমাদের কেউ যেন কিরাআত পাঠের সময় একে অপরের উপর উচ্চস্বরে আওয়াজ না করে।