সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3427 - (صلاحُ أول هذه الأمّة بالزهد واليقين، ويهلك آخرُها بالبخل والأمل) .
أخرجه أحمد في `الزهد` (ص 10) ، والطبراني في `المعجم الأ وسط ` (8/316/7646) ، وابن عدي في `الكامل` (6/127) ، والبيهقي في`الشعب `
¬_________
(¬1) كذا الأ صل بالفاء! `وفي ` المجمع `: (طرقاً) بالقاف! وفي ` الحلية `: (طوقاً) بالواو والقاف، ولعله الأقرب.
(7/427/10845) ، والخطيب في `التاريخ ` (7/186) من طرق عن محمد بن مسلم عن إبراهيم بن ميسرة عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
وسقط من `الزهد` قوله: `عن أبيه `.
قلت: وهذا إسناد حسن لغيره على الأقل؛ لأن محمد بن مسلم - وهو الطائفي - فيه كلام من قبل حفظه، وروى له مسلم متابعة على التحقيق، وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق يخطئ من حفظه `.
قلت: وقد أمنا خطأه بمتابعة ابن لهيعة الآًتية. وقد روى الخطيب عن علي ابن محمد بن بشار الجنابي - وهوأجمع من جمع - : أنه ما سمع في الزهد أحسن من هذا الحديث.
ورواه ابن لهيعة عن عمرو بن شعيب به؛ ولفظه: `نجا أول هذه الأمة ... ` الحديث.
أخرجه ابن أبي الدنيا في `قصر الأمل ` (36/20) و`اليقين ` (17/3) ، ومن طريقه: الأصبهاني في `الترغيب ` (1/98/164 و2/2515) ، وكذا الديلمي في `مسند الفردوس` (3/104) - من طريق مروان بن محمد - ، والبيهقي (10844) - من طريق المعافى - عن ابن لهيعة به.
وابن لهيعة ثقة، لكن قد عرض له سوء الحفظ؛ فحديثه حسن على الأقل بما قبله. وقد أشار إلى ذلك الحافظ بسكوته عنه في `الفتح` (11/237) . وسبقه
إلى ذلك الحافظ المنذري بتصديره إياه بقوله (4/131/14) :
`وعن عبد الله بن عمرو ... `. وقوله في تخريجه:
`رواه الطبراني، وفي إسناده احتمال للتحسين. ورواه ابن أبي الدنيا والأصبهاني كلاهما من طريق ابن لهيعة عن ... `.
وكذا عزاه لابن أبي الدنيا: الحافظ العراقي في `المغني عن حمل الأسفار` (4/454) ، وسكت عنه.
ومن حداثة المشتغلين بالتعليق على الأحاديث وتخريجها: قول المعلق على هذه الطريق في `قصر الأمل `:
`الحديث مرسل كما يلاحظ، قال الحافظ العراقي ... `!! *
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এই উম্মতের প্রথম অংশের কল্যাণ এসেছিল যুহ্দ (দুনিয়াবিমুখতা) ও ইয়াকীন (দৃঢ় বিশ্বাস)-এর মাধ্যমে। আর এর শেষ অংশের ধ্বংস হবে কৃপণতা (বুখল) এবং (দীর্ঘ) দুনিয়াবি আকাঙক্ষার (আমল) কারণে।
3428 - (هل تدرُون ما هذا؟ قالوا: اللهُ ورسولُه أعلمُ! قال: هذا الإنسانُ، وهذا أجلُه، وهذا أملُه، يتعاطَى الأملَ، يختلجُه [الأجلُ] دون ذلك) .
أخرجه الإمام أحمد (3/18) : ثنا عبد الملك بن عمرو: ثنا علي بن علي عن أبي المتوكل عن أبي سعيد الخدري:
أن النبي - صلى الله عليه وسلم - غرز بين يديه عوداً (¬1) ، ثم غرز إلى جنبه آخر، ثم غرز الثالث فأبعده، ثم قال: ... فذكره.
قلت: وتابعه حَرَمِيُّ بن عُمارة عن علي بن علي الرفاعي به.
¬_________
(¬1) في الأصل: `غرزاً`! وما أثبته من مصادر التخريج؛ لعله الصواب!
أخرجه ابن أبي الدنيا في `قصر الأمل ` (
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
একবার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সামনে একটি কাঠি পুঁতে দিলেন, তারপর তার পাশে আরেকটি কাঠি পুঁতলেন এবং এরপর তৃতীয় কাঠিটি অনেক দূরে পুঁতে দিলেন। অতঃপর তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: “তোমরা কি জানো, এগুলো কী?”
সাহাবাগণ আরজ করলেন: “আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন।”
তিনি বললেন: “এই (কাছের কাঠি) হলো মানুষ, আর এই (পাশের কাঠি) হলো তার মৃত্যুর নির্ধারিত সময় (আযাল), আর এই (দূরের কাঠি) হলো তার আশা-আকাঙ্ক্ষা (আমল)। মানুষ তার আশা-আকাঙ্ক্ষা পূরণের চেষ্টা করতে থাকে, কিন্তু তার আগেই মৃত্যু এসে তাকে ছিনিয়ে নেয়।”
3429 - (إنّ في النّار حيّاتٍ أمْثالَ أعْناقٍ البُخت؛ يلْسعْن اللسعَة؛ فيجدُ حُمُوَّتها أربعينَ خريفاً.
وإنَّ فيها لَعقارب كالبغالِ الموكِفةِ؛ يلْسَعْنَ اللسعةَ، فيجدُ حُمُوَّتها أربعينَ خَريفاً) .
أخرجه البيهقي في `البعث والنشور` (298/616) من طريق الحاكم بسنده الصحيح عن أصبغ بن الفرج: ثنا ابن وهب عن عمرو بن الحارث أخبره أن درّاج أبا السمح حدثه أنه سمع عبد الله بن الحارث بن جَزْءِ الزبيدي - صاحب النبي - صلى الله عليه وسلم - - يقول عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله كلهم ثقات؛ على الخلاف المعروف في دراج أبي السمح، والراجح أنه مستقيم الحديث عن غير أبي الهيثم، وهذا منه، فقد رواه عن عبد الله بن الحارث بن جزء سماعاً.
وقد أخرجه الحاكم (4/593) - من طريق بَحْر بن نَصْر - ، وابن حبان (2613ـ الموارد) - من طريق حرملة - قالا: ثنا ابن وهب به؛ دون الشطر الثاني منه. وقال الحاكم:
`صحيح الإسناد`. ووافقه الذهبي.
وتابعه ابن لهيعة عن دراج به بشطريه.
أخرجه أحمد (4/ 191) .
قلت: وهذه متابعة قوية من ابن لهيعة؛ فإنما يخشى من سوء حفظه إذا تفرد. وقال المنذري في `الترغيب ` (4/233/1) وقد ذكره بشطريه:
`رواه أحمد، والطبراني من طريق ابن لهيعة عن دراج عنه.
ورواه ابن حبان في `صحيحه `، والحاكم من طريق عمرو بن الحارث عن دراج عنه، وقال الحاكم: `صحيح الإسناد` ... `.
(تنبيه) : لقد خرج حديث ابن حبان: المعلق على `الإحسان ` (16/
আব্দুল্লাহ ইবনু হারিস ইবনু জুয’ আয-যুবাইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"নিশ্চয় জাহান্নামের মধ্যে এমন সাপ রয়েছে যা বুখত (লম্বা গলাবিশিষ্ট) উটের গর্দানের মতো বিশাল। তারা একটিবার দংশন করলে, দংশিত ব্যক্তি চল্লিশ বছর ধরে এর তীব্র জ্বালা অনুভব করবে। আর নিশ্চয়ই এর মধ্যে এমন বিচ্ছু রয়েছে, যা লাগাম লাগানো খচ্চরের মতো (বিশাল ও ভয়ঙ্কর)। তারা একবার দংশন করলে, দংশিত ব্যক্তি চল্লিশ বছর ধরে এর তীব্র জ্বালা অনুভব করবে।"
3430 - (أمّا بعدُ؛ أيّها الناسُ! إنّ النّاس يكثرون وتقلُّ الأنصارُ؛ حتى يكونُوا كالملح في الطعامِ، فمن وَليَ منكُم أمراً [من أمّةِ محمّدِ - صلى الله عليه وسلم - ، فاستطاعَ أن] يضرّ فيه أحداً أو ينفعَه؛ فليقبلْ من محسنِهم، ويتجاوزْ عن مُسيئهم) .
أخرجه البخاري في `صحيحه ` (927 و3628 و 3800) ، - والسياق والزيادة له - ، والحاكم (2/
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
"আম্মা বা’দ (অতঃপর), হে মানবজাতি! নিশ্চয়ই মানুষ সংখ্যায় বৃদ্ধি পাবে, আর আনসারগণ (সাহায্যকারীরা) হ্রাস পাবে। এমনকি তারা খাদ্যের লবণের মতো হয়ে যাবে (অর্থাৎ সংখ্যায় কম হলেও অপরিহার্য হবে)। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে কেউ মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের কোনো বিষয়ে কর্তৃত্ব লাভ করবে এবং এতে কারো ক্ষতি বা উপকার করার ক্ষমতা রাখবে, সে যেন তাদের সৎকর্মশীলদের নেক আমল গ্রহণ করে এবং মন্দ কাজকারীদের ত্রুটি এড়িয়ে যায় (বা তাদের ক্ষমা করে দেয়)।"
3431 - (خيرُ النّاسِ قرني الذي أنا منهم، ثمّ الذين يلونَهم، [ثمّ الذين يلونَهم] ، ثم ينشَأ أقوامٌ يفشُو فيهم السِّمَنُ، يشهدُون ولا يُستشهَدون، ولهم لَغَطٌ في أسواقِهم) .
أخرجه البزار في `البحر الزخار` (1/370 /248) من طريق أبي داود الطيالسي، وهذا في `مسنده ` (ص 6/32) : ثنا حماد بن يزيد - بصري، روى عنه
جماعة - : ثنا معاوية بن قرة عن كَهْمَس الهلالي قال: سمعت عمر بن الخطاب يقول: سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول ... فذكره.
وسقط من `البحر`، وكذا من `كشف الأستار` (3/289/2764) الزيادة، واستدركتها من `المسند`؛ وهي عنده بلفظ:
`ثم الثاني، ثم الثالث `.
وقال البزار:
`لا نعلم أسند كهمس عن عمر إلا هذا، وكهمس قد روى عن النبي - صلى الله عليه وسلم - حديثاً واحداً`.
قلت: وهذا إسناد جيد، ورجاله ثقات رجال مسلم؛ غير حماد بن يزيد البصري، وقد وثقه ابن حبان، وروى عنه جماعة؛ كما تقدم في إسناد البزار، وهو - كما يبدو - من قوله، وقد مضى تسمية بعض من روى عنه في تخريج الحديث الواحد الذي أشار إليه البزار - برقم (2623) ، ونقلنا هناك عن البزار أنه قال:
`لا بأس به `،
وقال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (10/ 19) :
`رواه البزار - واللفظ له - ، وله عند الطبراني في `الأوسط `: `خير قرن؛ القرن الذي أنا فيه، ثم الثاني، ثم الثالث، ثم الرابع لا يعبأ الله بهم شيئاً`.
قلت: عند ابن ماجه طرف منه، ورجال البزار ثقات، وفي رجال الطبراني إسحاق بن إبراهيم صاحب الباب (!) ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات `.
قلت: هو في `الأوسط ` (4/255/3449) من طريق الفيض بن وثيق الثقفي
قال: حدثنا إسحاق بن إبراهيم صاحب الباز (!) قال: حدثنا الأعمش عن زيد ابن وهب عن عمر بن الخطاب مرفوعاً. وقال:
`لا يروى عن الأعمش إلا من هذا الوجه `.
قلت: وهو ضعيف لجهالة إسحاق هذا، وابن الوثيق قد ضعف؛ كما تراه في `الميزان `، و`لسانه `.
ثم إن قوله: `خير قرن،.. ` منكر؛ لأن المحفوظ في الأحاديث الصحيحة: `خير الناس ... ` في `الصحيحين ` وغيرهما، وقد مضى تخريج بعضها برقم (699 و 700) .
(تنبيه) : تحرف اسم والد (حماد بن يزيد) في `مسند الطيالسي ` إلى: (زيد) ! ولم يتنبه له مرتبه الشيخ أحمد البنا الساعاتي في `منحة المعبود` في موضعين منه (2/71 و199) !! رحمه الله تعالى.
وسقط من إسناد `الكشف ` اسم (أبي داود) الراوي عن (حماد بن يزيد) ، ولم يتنبه له محققه الشيخ الأعظمي رحمه الله تعالى. *
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:
"উত্তম মানুষ হলো আমার যুগের মানুষ, যে যুগে আমি আছি। অতঃপর তারা, যারা তাদের পরবর্তী (প্রজন্ম)। অতঃপর তারা, যারা তাদেরও পরবর্তী (প্রজন্ম)। এরপর এমন একদল লোকের উদ্ভব হবে যাদের মধ্যে স্থূলতা ও মেদবহুলতা ব্যাপক হবে। তারা সাক্ষ্য দেবে অথচ তাদের কাছে সাক্ষ্য তলব করা হবে না। আর তাদের বাজারগুলোতে উচ্চস্বর ও গোলমাল থাকবে।"
3432 - (طوبَى له، ثم طوبَى له، ثم طوبى له. يعنِي: من آمنَ به - صلى الله عليه وسلم - ولم يَره) .
أخرجه أحمد (4/
আব্দুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন): তার জন্য রয়েছে সুসংবাদ, অতঃপর তার জন্য রয়েছে সুসংবাদ, অতঃপর তার জন্য রয়েছে সুসংবাদ। (তিনি উদ্দেশ্য করেছেন:) ঐ ব্যক্তিকে, যে তাঁর (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের) প্রতি ঈমান এনেছে অথচ তাঁকে দেখেনি।
3433 - (مَنْ أَخافَ هذا الحيُّ من الأنصارِ؛ فقدْ أخافَ ما بين هذين؛ يعني: جَنْبَيْه) .
أخرجه الطيالسي في `مسنده ` (242/ 1760) ، ومن طريقه: البزار في `مسنده ` (3/304 /2805) - والسياق له - : حدثنا طالب بن حبيب عن عبد الرحمن ابن جابر بن عبد الله عن أبيه:
أنه خرج يوم الحَرَة، فكبت قدمه [بحجر] ، فقال: تعس من أخاف رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ! [قلت: ومن أخاف رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟] قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره ` والزيادات من الطيالسي.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات رجال مسلم؛ غير طالب بن حبيب، وهو صدوق يهم؛ كما في `التقريب `. وقال البزار عقبه:
`لا نعلم يروى عن جابر إلا بهذا الإسناد`!
قلت: قد جاء بإسناد آخر يرويه محمد بن كليب - وهو ثقة؛ كما قال أبو زرعة - عن محمود ومحمد ابني جابر سمعا جابراً قال: سمعت النبي - صلى الله عليه وسلم - يقول:
`من أخاف الأنصار ... ` الحديث.
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (1/ 1/53/110 و4/1/ 404/1767) ، والطبراني في `المعجم الأوسط ` (6/143/5293) بلفظ: قالا:
خرجنا يوم دخل جيش ابن دلجة المدينة بعد الحرة بعام، فدخل المدينة حتى ظهر المنبر، ففزع الناس، فخرجنا بجابر في الحرة؛ وقد ذهب بصره، فنكبه الحجر، فقال: أخافه الله من أخاف رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ! فقالها مرتين أو ثلاثاً قبل أن نسأله، فقلنا: يا أبتاه: ومن أخاف رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟! فقال: أشهد لسمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول: ... فذكره. وقال:
`لا يروى هذا الحديث عن محمد ومحمود ابني جابر إلا بهذا الإسناد، تفرد به موسى بن شيبة`.
قلت: وهو لين الحديث؛ كما في `التقريب `، ولكنه شاهد جيد لحديث طالب بن حبيب.
ومحمد ومحمود؛ ذكرهما ابن حبان في `الثقات `؛ كما تقدم تحت الحديث (2304) ، فأحدهما يقوي الآخر.
وقد أخرجه البخاري (1/ 1/53/ 110) ، والطبراني في `الأوسط ` أيضاً (2/
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
যে ব্যক্তি আনসারদের এই গোত্রকে ভয় দেখাবে (বা আতঙ্কিত করবে), সে অবশ্যই এই দুই পার্শ্বের মধ্যবর্তী বস্তুকে—অর্থাৎ তাঁর (আমার) সত্তাকে—ভয় দেখাল।
3434 - (ما ضرّ امرأةً نزلتْ بين بَيتينِ من الأَنصار، أو نزلتْ بين أبويْها) .
أخرجه ابن حبان (2296) ، والحاكم (4/83) ، وأحمد (6/257) ، وعنه أبو نعيم في `الحلية` (9/224) ، والبزار في مسنده (3/
বর্ণিত হয়েছে যে, যে নারীর আশ্রয়স্থল হলো আনসারদের দু’টি ঘরের (পরিবারের) মাঝে, অথবা যে নারী তার পিতা-মাতার (পৈতৃক) বাড়িতে অবস্থান করে—তার কোনো ক্ষতি নেই।
3435 - (شهدتُ رسولَ اللهِ - صلى الله عليه وسلم - يدعُو لهذا الحيِّ من (النَّخَع) ، أو قال: يُثني عليهم؛ حتّى تمنيتُ أنّي رجلٌ منهم) .
أخرجه الإمام أحمد (1/403) : حدثنا طلق بن غنام بن طلق: ثنا زكريا بن عبد الله بن يزيد عن أبيه قال: حدثني شيخ من بني أسد - إما قال: شقيق، وإما قال: زر - عن عبد الله قال: ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات مترجمون في `التهذيب `؛ غير زكريا ابن عبد الله بن يزيد - وهو الصهباني النخعي - ؛ ترجمه ابن أبي حاتم (1/2/598)
برواية جمع من الثقات، ويضم إليهم طلق هذا، وما يأتي متابعاً له، ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً، وأورده ابن حبان في كتابه `الثقات ` (8/252) من رواية أحد الثقات قتيبة بن سعيد.
وتردد عبد الله بن يزيد في شيخه؛ هل هو (شقيق) أو (زر) ؟! مما لا يؤثر في صحة الحديث؛ لأنه انتقال من ثقة إلى ثقة؛ كما قال الشيخ أحمد شاكر - رحمه الله - في تعليقه على `المسند` (5/317) .
على أن الراجح عندي أنه (زر بن حبيش) ؛ لأنه قد جاء ذلك من طريقين آخرين عن ابنه زكريا بن عبد الله:
أحدهما: عن يحيى بن أبي زكريا: ثنا زكريا بن عبد الله بن يزيد الصهباني به. أخرجه البزار (4/235/
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট উপস্থিত ছিলাম, যখন তিনি নাখা’ (النَّخَع) গোত্রের এই অংশের জন্য দু’আ করছিলেন—অথবা (বর্ণনাকারী বলেছেন) তিনি তাদের প্রশংসা করছিলেন। [তা দেখে] এমনকি আমি এই আকাঙ্ক্ষা করলাম যে, আমি যদি তাদের অন্তর্ভুক্ত একজন হতাম।
3436 - (غِلَظُ القلوبِ والجفاءُ في المشْرقِ، والإيمانُ في أهْل الحِجاز) .
هو من حديث جابر - رضي الله عنه - ، وله عنه طرق:
الأولى: عن أبي الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - .... فذكره.
أخرجه مسلم (1/53) ، وأبو عوانة (1/60) ، وابن حبان (9/ 204/7252) ، وأحمد في `المسند` (3/335) و`فضائل الصحابة` (2/863/ 1611) من طريق ابن جريج قال: أخبرني أبو الزبير به.
وتابعه موسى بن عقبة عن أبي الزبير عن جابر به؛ إلا أنه قال:
`والإيمان يمان، والسكينة في أهل الحجاز`.
أخرجه البزار (3/
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “অন্তরের কঠোরতা ও রুক্ষতা হলো পূর্বাঞ্চলে, আর ঈমান হলো হিজাজবাসীদের মধ্যে।”
3437 - (يطلُعُ عليكم أهلُ اليمن كأنّهم السّحاب، هم خيارُ من في الأرض. فقال رجلٌ من الأنصار: ولا نحنُ يا رسولَ الله؟! فسكت، قال: ولا نحن يا رسول الله؟! فسكت، قال: ولا نحن يا رسول الله؟! فقال في الثالثة كلمةً ضعيفةً: إلا أنتُم) .
أخرجه أحمد في `المسند` (4/84) وفي `الفضائل ` (2/
জুবাইর ইবনে মুত’ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “ইয়েমেনের লোকেরা মেঘমালার মতো তোমাদের সামনে উপস্থিত হবে; তারা পৃথিবীর বুকে যারা আছে, তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ।”
তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন ব্যক্তি জিজ্ঞেস করলেন, “ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরাও কি (শ্রেষ্ঠ নই)?”
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব থাকলেন।
সে আবার জিজ্ঞেস করলো, “ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরাও কি (শ্রেষ্ঠ নই)?”
তিনি নীরব থাকলেন।
সে তৃতীয়বার জিজ্ঞেস করলো, “ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরাও কি (শ্রেষ্ঠ নই)?”
তখন তৃতীয়বার তিনি মৃদু বা ক্ষীণ স্বরে বললেন: “তবে তোমরা ব্যতীত।”
3438 - (إنّ قوماً يأتونَ من بعْدِي، يودُّ أحدُهم أنْ يفتدِيَ برؤيتي أهلَه ومالَه) .
أخرجه البزار في `مسنده ` (3/319/ 2841) : حدثنا أحمد بن عمرو بن عبيدة العُصفري: ثنا عبيد الله بن عبد المجيد الحنفي: ثنا عبد الرحمن بن أبي الزناد عن عمرو بن أبي عمرو عن سهيل بن أبي صالح عن أبيه عن أبي هريرة قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات؛ على خلاف في عبد الرحمن بن أبي الزناد،
وكلهم من رجال `التهذيب `؛ غير أحمد بن عمرو بن عبيدة العصفري؛ فإني لم أجد له ترجمة ولا ذكراً في شيء من كتب التراجم، ولا ذكروه في الرواة عن عبيد الله الحنفي، ولا فيمن نسبته (العصفري) . ومع ذلك قال الهيثمي في `المجمع ` (10/66) :
`رواه البزار، وفيه عبد الرحمن بن أبي الزناد، وحديثه حسن، وفيه ضعف، وبقية رجاله ثقات `!
فلا أدري هل عنى بهذا التوثيق (العصفري) هذا أم لا؟!
ويبدو لي أن الحافظ ابن حجر يرى الأول؛ فإنه قال في `مختصر الزوائد` (2/
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় আমার পরে এমন কিছু লোক আসবে, যাদের প্রত্যেকে আমাকে একবার দেখার জন্য তার পরিবার-পরিজন ও ধন-সম্পদ উৎসর্গ (বিনিময়) হিসেবে দিতে চাইবে।"
3439 - (الحمّام حرامٌ على نساء أمتي) .
أخرجه الحاكم (4/289) فقال: أخبرنا إسماعيل بن محمد بن الفضل بن محمد الشعراني: ثنا جدي: ثنا سعيد بن أبي مريم: ثنا نافع بن يزيد: حدثني يحيى بن أبي أسيد عن عبيد بن أبي سويّة أنه سمع سُبيعة الأسلمية تقول:
دخل على عائشة نسوة من أهل الشام، فقالت عائشة: ممن أنتن؟ فقلن: من أهل حمص. فقالت: صواحب الحمامات؟ فقلن: نعم. قالت عائشة رضي الله عنها:! سمعت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول ... فذكر الحديث.
فقالت امرأة منهن: فلي بنات أمشطهن بهذا الشراب؟ قالت: بأي الشراب؟ فقالت: الخمر! فقالت عائشة - رضي الله عنها - : أَفكنتِ - طيبة النفس أن تمتشطي بدم خنزير؟ قالت: لا، قالت: فإنه مثله. وقال الحاكم:
`صحيح الإسناد`، ووافقه الذهبي، وأقره الحافظ العراقي في `تخريج
الإحياء` (1/ 140) ، ثم الزبيدي في `شرح الإحياء` (1/407) ، ومن قبلهم الحافظ المنذري في `الترغيب ` (1/89/ 4) .
فأقول: هذا إسناد جيد متصل إن شاء الله تعالى، ولتحقيق ذلك لا بد من الكلام على رواته فرداً فرداً:
সুবেই’আ আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সিরিয়ার (শামের) কিছু মহিলা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আগমন করলেন। তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞাসা করলেন, "তোমরা কোথাকার?" তারা বললেন, "আমরা হিমসের অধিবাসী।" তিনি (আয়েশা) বললেন, "তোমরা কি সেই গোত্রের যারা জনসমাগমের জন্য তৈরি হাম্মামখানায় (গণগোসলখানায়) যাও?" তারা বললেন, "হ্যাঁ।"
তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ’আমার উম্মতের মহিলাদের জন্য জনসমাগমের হাম্মামখানা (গণগোসলখানা) ব্যবহার করা হারাম (নিষিদ্ধ)।’"
অতঃপর তাদের মধ্য থেকে একজন মহিলা জিজ্ঞাসা করলেন, "আমার কিছু কন্যা আছে, আমি কি তাদের চুল এই পানীয় দ্বারা আঁচড়ে দেব?" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞাসা করলেন, "কোন পানীয়?" মহিলাটি বললেন, "খামর (মদ)!" তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "তুমি কি স্বেচ্ছায় (পবিত্র মনে) শূকরের রক্ত দ্বারা চুল আঁচড়ে দিতে প্রস্তুত ছিলে?" মহিলাটি বললেন, "না।" আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "তাহলে এটা (মদ)ও অনুরূপ (শূকরের রক্তের মতো অপবিত্র)।"
3440 - (إن خيارَ عِباد اللهِ: الذين يراعُونَ الشّمسَ والقمرَ والنُّجومَ والأظلّة؛ لذكر الله عزّ وجل) .
أخرجه ابن شاهين في `الأفراد` (ق 5/1) ، والبزار في `مسنده` (1/186/366) ، والطبراني في `الدعاء` (3/1637/1876) ، والحاكم (1/51) ، ومن طريقه:
¬_________
(¬1) ثم طبع بحمد الله. (الناشر) .
البيهقي في `السنن` (1/379) من طريق سفيان بن عيينة عن مسعر عن إبراهيم السَّكْسَكِي عن ابن أبي أوفى قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. وقال البزار:
`لا نعلم رواه عن مسعر إلا سفيان، والصحيح أنه موقوف على أبي الدرداء`.
وقال ابن شاهين:
`تفرد به سفيان عن مسعر، ما حدث به عنه غيره، وهو حديث غريب صحيح حسن `!
وقال الحاكم:
`هذا إسناد صحيح، وقد احتج مسلم والبخاري بإبراهيم السكسكي، واذا صح مثل هذه الاستقامة؛ لم يضره توهين من أفسد إسناده `.
ثم ساقه من طريق عبد الله عن مسعر عن إبراهيم السكسكي قال حدثني أصحابنا عن أبي الدرداء أنه قال ... فذكر موقوفاً نحوه. وقال:
`هذا لا يفسد الأول، ولا يعلله؛ فإن ابن عيينة حافظ ثقة، وكذلك عبد الله ابن المبارك `.
قلت: وسكت عن الحديث الحافظ ابن حجر في `التلخيص الحبير` (1/208) !
ولي هنا ملاحظات لا بد لي من ذكرها:
أولاً: قول البزار: `والصحيح موقوف `!
فأقول: لا وجه لهذا التصحيح؛ فقد رأيت أن مدار المرفوع والموقوف على (إبراهيم السكسكي) ؛ فإن كان حجة؛ فالأمر كما قال الحاكم: الموقوف لا يفسد المرفوع؛ لأن الإسناد إليه بكل منهما صحيح. فتأمل!
ثانياً: تصحيح الحاكم والذهبي وابن شاهين لإسناده؛ فيه نظر قوي! ذلك؛ لأن (السكسكي) وإن أخرج له البخاري؛ ففيه كلام من قبل حفظه، يمنع من الحكم على إسناده بالصحة. أما الحسن فيمكن، قال الذهبي نفسه في `الميزان `:
`كوفي صدوق، لينه شعبة والنسائي، ولم يترك، قال النسائي: ليس بذاك القوي. وخرج له البخاري. وقال أحمد: ضعيف. وقال ابن عدي: لم أجد له حديثًًاً منكر المتن `.
وقال في `الرواة المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد` (ص 55) :
`لينه شعبة، وضعفه أحمد، حديثه حسن `.
وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق، ضعيف الحفظ `؛ وانظر `إرواء الغليل ` (2/12) ؛ فإن له فيه حديثًاً صححه ابن خزيمة، وابن حبان، وابن الجارود.
ثالثاً: قول الحاكم: `وقد احتج به مسلم `! خطأ لعله من بعض النساخ؛ فإن المنقول عن الحاكم خلافه؛ فقد ذكر الحافظ في ترجمة (السكسكي) هذا من كتابه `مقدمة الفتح ` (ص 388) :
`قال الحاكم: قلت للدارقطني: لم ترك مسلم حديثه؟ قال: تكلم فيه يحيى
ابن سعيد. قلت: بحجة؟ قال: هو ضعيف `.
رابعاً: ومع هذا كله؛ فإن في سكوت الحافظ عن الحديث ما يشير إلى تقويته، وذلك في مرتبة الحسن، كما في عبارة ابن شاهين المتقدمة، وهذا عند الحافظ: لذاته، أو لغيره، وهو الأقرب عندي؛ فقد ذكر له البيهقي شاهداً من
رواية واصل بن أيوب الأسواري عن أبي هريرة موقوفاً عليه.
والأسواري هذا لم أجد من ذكره؛ ولا السمعاني في هذه النسبة.
وكذلك أشار إلى تقويته الحافظ المنذري أيضاً في `الترغيب ` (1/109/14) بتصديره إياه بقوله: `وعن.. `، وسكوته أو إقراره لتصحيح الحاكم وابن شاهين، وذكر له شاهداً من حديث أنس رضي الله عنه، وقد خرجته في الكتاب الآخر برقم (5038) ، مع بيان ضعفه، وإعلال الهيثمي إياه. وأما هذا فقد قال فيه (1/327) :
`رواه الطبراني في ` الكبير`، والبزار، ورجاله موثقون، لكنه معلول `!
قلت: يشير إلى الخلاف في رفعه ووقفه، وفي توثيق إبراهيم السكسكي، وقد حررت القول في ذلك كله، وتبيين - إن شاء الله تعالى - صوابه من خطئه.
ثم لا بد لي بهذه المناسبة من كلمة حول هذا الحديث وما فيه من الفقه، فأقول:
ليس يخفى على أهل العلم أن الأذان شعيرة من شعائر الإسلام، وأنه قد جاء في فضله أحاديث كثيرة معروفة في `الصحاح ` و `السنن ` وغيرها، وإنما قصدت هنا تخريج هذا من بينها لسببين اثنين:
أحدهما: تحقيق الكلام في إسناده، والنظر في الذين صححوه؛ هل أصابوا أم أخطؤوا؟! ثم الحكم عليه بما تقتضيه القواعد العلمية الحديثية من صحة، أو حسن، أو ضعف، وقد فعلت، راجياً من الله تعالى أن أكون قد وفقت للصواب الذي يرضيه عز وجل.
والآخر: التذكير بما أصاب هذه الشعيرة الإسلامية من الاستهانة بها، وإهمالها، وعدم الاهتمام بها، وتعطيلها في بعض المساجد التي يجب رفع الأذان فيها من
مؤذنيها، اكتفاءً بأذان إذاعة الدولة التي يذاع بواسطة الكهرباء من مكبرات الصوت المركبة على المآذن في بعض البلاد الإسلامية، وبناءً على التوقيت الفلكي، الذي لا يوافق التوقيت الشرعي في بعض الأوقات، وفي كثير من البلاد، فقد علمنا أن الفجر يذاع قبل الفجر الصادق بنحو ربع ساعة أو أكثر، يختلف ذلك باختلاف البلاد، والظهر قبل ربع ساعة، والمغرب بعد نحو عشر دقائق، والعشاء بعد نصف ساعة! وهذا كما ترى يجعل بعض الصلوات تصلى قبل الوقت الشرعي مما لا يخفى فساده، والسبب واضح، وهو الجهل بالشرع؛ والاعتماد على علم الفلك حساباته التي تخالف الشرع؛ الأمر الذي صيّر المؤذنين الذين قد يؤذنون في مساجدهم، ولا يكتفون بالأذان المعلن من إذاعة الحكومة يجهلون كلّ الجهل المواقيت الشرعية المبنية على الرؤية البصرية، التي يسهل على كل مكلف أن يعرفها، لا فرق في ذلك بين أمي وغيره، بعد أن يكون قد عرفها من الشرع، فالفجر عند سطوع النور الأبيض وانتشاره في الأفق، والظهر عند زوال الشمس عن وسط السماء، والعصر عند صيرورة ظل الشيء مثله، بالإضافة إلى ظل الزوال، والمغرب عند غروب الشمس وسقوطها وراء الأفق، والعشاء عند غروب الشفق الأحمر.
وإن مما لا شك فيه: أن هذه المواقيت تختلف باختلاف الأقاليم والبلاد ومواقعها في الأرض؛ من حيث خطوط الطول والعرض من جهة، ومن حيث انخفاضها وارتفاعها من جهة أخرى، الأمر الذي يوجب على المؤذنين مراعاتها والانتباه لها، فمدينة كبيرة كالقاهرة مثلاً؛ يطلع الفجر في شرقها قبل مغربها، وهكذا يقال في سائر الأوقات، بل قد تكون البلدة ليست في اتساعها كالقاهرة، كدمشق مثلاً، فمن كان في جبل قاسيون مثلاً تختلف مواقيته عمن كان في وسطها، أو في مسجدها مسجد بني أمية، أو في الغوطة منها مثلاً، ومع ذلك
فأهلها جميعاً من كان في الأعلى أو الأدنى من مناطقها يصلون ويصومون ويفطرون على أذان مسجدها! وما لنا نذهب بعيداً؛ فقد شاهدت أنا وغيري في بعض قرى عمان؛ (الناعور) - لما ذهبنا إلى صلاة المغرب في مسجدها - الشمس لما تغرب بعد، والأذان يعلن من مكبر الصوت الذي على المنارة مذاعاً من إذاعة الدولة من بعض مناطق عمان! وتتكرر هذه المشاهد المخالفة في كثير من البلاد كما رأينا وسمعنا مثله من غيرنا؛ وقد بينت هذا في مكان آخر من التعليقات والتوجيهات. والمقصود: أن الثناء المذكور على المؤذنين في هذا الحديث؛ صاروا اليوم غير مستحقين له؛ بسبب أنهم لا يراعون الشمس و.. ولمعرفة أوقات الصلاة التي ائتمنوا عليها، ودعا لهم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : بالمغفرة لو قاموا بها في قوله - صلى الله عليه وسلم - : `الإمام ضامن، والمؤذن مؤتمن، اللهم! أرشد الأئمة، واغفر للمؤذنين ` (¬1) .
فلعل من كان يملك أذانه من المؤذنين، ومن كان من الحكام الغيورين على أحكام الدين يهتمون بالمؤذنين وتوجيههم أحكام دينهم وأذانهم، ويمكنونهم من أداء الأمانة التي أنيطت بهم، وهم يعلمون قوله - صلى الله عليه وسلم - : `كلكم راع وكلكم مسؤول عن رعيته `.
{إن في ذلك لذكرى لمن كان له قلب أوألقى السمع وهو شهيد} ! *
আব্দুল্লাহ ইবন আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
নিশ্চয়ই আল্লাহ্ তা’আলার বান্দাদের মধ্যে সর্বোত্তম তারা, যারা আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল (মহাপ্রতাপশালী ও মহিমান্বিত)-এর যিকিরের (স্মরণের) জন্য সূর্য, চন্দ্র, নক্ষত্ররাজি এবং ছায়াসমূহ পর্যবেক্ষণ করেন।
3441 - (ما منكنّ امرأةٌ يموتُ لها ثلاثةٌ؛ إلا أدخلَها الله عزّ وجلّ الجنة، فقالت أجلُّهن امرأة: يا رسولَ الله! وصاحبةُ الاثنينِ في الجنّة؟! قال: وصاحبة الاثنين في الجنة) .
أخرجه أحمد (1/ 421) : حدثنا عبد الصمد: حدثنا حماد: حدثنا عاصم عن أبي وائل عن ابن مسعود:
¬_________
(¬1) `صحيح أبي داود` (530) ، و`الإرواء ` (217) .
أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - خطب النساء فقال لهن: ... فذكره.
وتابعه زائدة عن عاصم به نحوه.
رواه البزار في ` البحر الزخار` (5/139/1729) ، وأبو يعلى (5085) .
قلت: وهذا إسناد حسن رجاله ثقات رجال مسلم؛ إلا أن عاصماً - وهو ابن بهدلة - إنما أخرج له مقروناً.
وحماد: هو ابن سلمة، وقد توبع. فقال الطبراني في `المعجم الأوسط ` (7/44/6073) : حدثنا محمد بن عثمان بن أبي سُويد قال: حدثنا عثمان بن الهيثم قال: حدثنا أبي عن عاصم به. وقال:
`لم يروه عن عاصم إلا الهيثم بن جهم، تفرد به عثمان بن الهيثم `.
قلت: وهذا إسناد حسن أيضاً؛ غير ابن أبي سويد هذا، فقد ضعفه ابن عدي؛ كما بينته تحت حديث آخر له بهذا الإسناد في `الضعيفة` (6817) .
لكنه قد توبع فقال الطبراني في `المعجم الكبير` (10/232/10414) : حدثنا إبراهيم بن صالح الشيرازي: ثنا عثمان بن الهيثم المؤذن به؛ إلا أنه قال:
`ليس من أجلهن `! فلعل `ليس ` مقحمة.
قلت: وابراهيم بن صالح الشيرازي لم يترجموه؛ إلا الذهبي في `تاريخ الإسلام ` ترجمة مختصرة جداً، ليس فيها سوى أنه حدث بمكة عن حجاج بن نصير الفساطيطي، وعنه الطبراني. ولم يزد عليه شيئاً الشيخ الأنصاري في `بلغته ` (ص 16) ! مع أن تحديثه المذكور عن حجاج إنما استفاده الذهبي من `المعجم الصغير` للطبراني، وفيه فائدة أخرى وهي تاريخ سنة التحديث والوفاة،
فقال (
ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) মহিলাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিতে গিয়ে বললেন:
“তোমাদের মধ্যে যে কোনো নারীর (প্রাপ্তবয়স্ক হওয়ার পূর্বে) তিনটি সন্তান মারা যায়, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল অবশ্যই তাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবেন।”
তখন তাদের মধ্যে উপস্থিত একজন সম্মানিতা নারী বললেন, “হে আল্লাহর রাসূল! আর যার দুটি সন্তান মারা যায়, সে কি জান্নাতে যাবে?”
তিনি (নবী ﷺ) বললেন, “যার দুটি সন্তান মারা যায়, সেও জান্নাতে যাবে।”
3442 - (ما مِن امرأةٍ تنزعُ ثيابَها في غيرِ بيتها؛ إلا هتكتْ ما بينها وبينَ اللهِ من سترٍ) .
أخرجه أحمد في `المسند` (6/362) ، والدّولابي في `الأسماء والكنى` (2/134) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (24/255/652) من طرق عن عبد الله ابن وهب: أخبرني حيوة بن شريح قال: حدثني أبو صخر أن يُحنّس أبا موسى حدثه أن أم الدرداء حدثته:
أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - لقيها يوماً، فقال:
`من أين جئت يا أم الدرداء؟! `.
قالت: من الحمّام، فقال لها رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات رجاله مسلم، وفي بعضهم كلام لا يضر؛ وهو مخرج تخريجاً مختصراً في `آداب الزفاف ` (ص 140) ، و`غاية المرام` (ص
উম্মে দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করে জিজ্ঞেস করলেন, “হে উম্মে দারদা! তুমি কোথা থেকে এসেছ?” তিনি উত্তর দিলেন, “আমি হাম্মাম (জনসাধারণের গোসলখানা) থেকে এসেছি।” তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, “যে নারী তার ঘর ছাড়া অন্য কোথাও (অপ্রয়োজনীয়ভাবে) পোশাক খুলে ফেলে, সে তার ও আল্লাহ্র মধ্যবর্তী আবরণ বা পর্দা ছিন্ন করে দেয়।”
3443 - (كان يقولُ حينَ يريدُ أنْ ينامَ:
اللهمَ! فاطرَ السماواتِ والأرضِ! عالمَ الغيبِ والشهادةِ! ربَّ كلّ شيءٍ! وإله كلِّ شيءٍ! أشهدُ أنْ لا إلهَ إلا أنتَ، وحدَك لا شريكَ لك، وأنَّ محمّداً عبدُك ورسولُك، والملائكة يشهدون، اللهم! إنِّي أعوذُ بك من الشيطانِ وشِرْكِه، وأعوذُ بك أن أقرِفَ على نفْسي إثْماً، أو أردَّه إلى مسلم) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (13/40/94) وفي `الدعاء` (2/913/263) من طريق ابن وهب: حدثني حُييُّ عن أبي عبد الرحمن عن عبد الله بن عمرو قال: ... فذكره.
وتابعه ابن لهيعة: ثنا حُييُّ بن عبد الله أن أبا عبد الرحمن الحبلي حدثه قال:
أخرج لنا عبد الله بن عمرو قرطاساً، وقال: كان رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يعلمنا يقول ... فذكر الدعاء مع اختلاف يسير في بعض الألفاظ؛ وزاد:
قال أبو عبد الرحمن: كان رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يعلمه عبد الله بن عمرو أن يقول ذلك حين يريد أن ينام.
أخرجه أحمد (2/171) : حدثنا حسن عن ابن لهيعة به.
وقال المنذري (1/211/13) - وتبعه الهيثمي (10/122) ، وقلدهما المقلدون الثلاثة (1/ 471) ، فقالوا - :
`رواه أحمد بإسناد حسن `!
قلت: ابن لهيعة سيىء الحفظ معروف بذلك، فهو حسن بالمتابع الذي قبله، وبما يأتي.
وقد توبع حيي بن عبد الله؛ فقال عبد الرحمن بن زياد بن أنعم عن عبد الله بن يزيد عن عبد الله بن عمرو، فذكره نحو حديث ابن لهيعة.
أخرجه عبد بن حميد في `المنتخب من المسند` (1/301/338) ، والطبراني أيضاً (13/26/52) ، والبيهقي في ` الدعوات الكبير` (2/112/353) ؛ وعندهما جملة التعليم لأبي بكر.
واسناده ضعيف؛ ابن أنعم - وهو الإفريقي - ضعيف.
وله طريق أخرى: عن أبي راشد الحبراني قال:
أتيت عبد الله بن عمرو بن العاص، فقلت له: حدثنا ما سمعت من رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟؛ فألقى بين يدي صحيفة، فقال: هذا ما كتب لي رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؛ فنظرت فيها؛ فإذا فيها:
أن أبا بكر الصديق قالت: يا رسول الله! علمني ما أقول إذا أصبحت وإذا أمسيت؟ فقال رسول - صلى الله عليه وسلم - :
`يا أبا بكر! قل ... ` فذكر الدعاء إلى قوله: `وأن أقترف على نفسي سوءاً، أو أجرّّه إلى مسلم `.
أخرجه أحمد (2/196) ، والبيهقي في `الدعوات ` (1/ رقم 30) .
قلت: وإسناده حسن.
وله شاهد صحيح من حديث أبي هريرة، وزاد في آخره:
`قله إذا أصبحت، وإذا أمسيت، وإذا أخذت مضجعك `.
وقد مضى تخريجه مبسطاً (2753 و 2763) .
وبالجملة؛ فالحديث عن ابن عمرو صحيح بهذه الطرق والشاهد. *
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ঘুমাতে যেতেন, তখন তিনি বলতেন:
"হে আল্লাহ! হে আকাশমন্ডলী ও পৃথিবীর সৃষ্টিকর্তা! হে দৃশ্যমান ও অদৃশ্যের মহাজ্ঞানী! হে প্রত্যেক বস্তুর রব এবং প্রত্যেক উপাস্যের ইলাহ! আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আপনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই; আপনি একক, আপনার কোনো শরীক নেই; এবং নিশ্চয়ই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার বান্দা ও আপনার রাসূল, আর ফেরেশতাগণও (এই বিষয়ে) সাক্ষ্য দিচ্ছেন। হে আল্লাহ! আমি আপনার নিকট শয়তান এবং তার শিরক (ফাঁদ বা প্ররোচনা) থেকে আশ্রয় চাই। আমি আপনার কাছে আশ্রয় চাই যেন আমি নিজের ওপর কোনো পাপ কাজ না চাপিয়ে দেই, অথবা তা কোনো মুসলিমের দিকে ফিরিয়ে না দেই (অর্থাৎ কোনো মুসলিমের ক্ষতি না করি)।"
3444 - (من قال إذا أوَى إلى فراشه:
الحمد لله الذي كفاني وآواني.
الحمد لله الذي أطعمني وسقاني.
الحمد لله الذي مَنَّ عليَّ وأفضلَ، اللهم! إنِّي أسألك بعزَّتك أنْ تُنَجِّيَني من النّار؛ فقدْ حَمِدَ الله بجميع محامدِ الخلقِ كلِّهم) .
أخرجه الحاكم (1/
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যে ব্যক্তি যখন তার বিছানায় আশ্রয় গ্রহণ করে (ঘুমাতে যায়), তখন বলে:
সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাকে যথেষ্ট করেছেন এবং আশ্রয় দিয়েছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমাকে আহার করিয়েছেন ও পান করিয়েছেন। সকল প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমার প্রতি অনুগ্রহ করেছেন এবং শ্রেষ্ঠত্ব দান করেছেন। হে আল্লাহ! আমি আপনার ইজ্জতের (সম্মান ও ক্ষমতার) মাধ্যমে আপনার কাছে প্রার্থনা করি যে, আপনি যেন আমাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন— তবে সে যেন সকল সৃষ্টির সকল প্রশংসার মাধ্যমে আল্লাহর প্রশংসা করল।
3445 - (من بنَى للهِ مسجداَ بنَى اللهُ له بَيتاً في الجنّة أوسعَ منْه) .
أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (8/
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যে ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে একটি মসজিদ নির্মাণ করে, আল্লাহ তাআলা তার জন্য জান্নাতে তার চেয়েও প্রশস্ত একটি ঘর তৈরি করে দেন।
3446 - (من خرجَ حتى أتَى هذا المسجدَ - مسجدَ قُباء - فصلّى فيه؛ كان له عِدْل عمْرةٍ) .
أخرجه البخاري في `التاريخ ` (1/1/96) ، والنسائي (1/
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি বের হয়ে এই মসজিদে—অর্থাৎ ক্বুবা মসজিদে—উপস্থিত হলো এবং সেখানে সালাত আদায় করলো, তার জন্য একটি উমরাহ্র সমতুল্য সওয়াব হবে।”