সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
3567 - (نهى أن يضعَ (وفي رواية: يرفعَ) الرّجل إحدى رجليه على الأخرى - زاد في الرواية الأخرى - وهو مستلق على ظهره) .
أخرجه أبو داود في `سننه ` (4865) هكذا: حدثنا قتيبة بن سعيد: حدثنا الليث. (ح) وحدثنا موسى بن إسماعيل: حدثنا حماد عن أبي الزبير عن جابر قال: ... فذكره، واللفظ الثاني، والزيادة لقتيبة.
ورواية الليث أخرجها مسلم، وأحمد (3/349) من طرق أخرى عنه باللفظ الثاني والزيادة.
وذكره باللفظ الأول والزيادة الحافظ ابن عبد البر في`التمهيد` (9/204) من رواية الليث بن سعد وابن جريج وحماد بن سلمة؛ رووه عن أبي الزبير عن جابر به. ورواية ابن جريج: عند مسلم، وأحمد أيضاً باللفظ الأول نحوه.
وقد كنت خرجت الحديث مبسطاً فيما مضى برقم (1255) ، وفاتني هناك عزوه لرواية أبي داود، والآن - وأنا في صدد تهذيب `صحيح الجامع `، و`ضعيف الجامع ` منذ بضعة أشهر - وجدت السيوطي قد أورد حديث الترجمة باللفظ الأول من رواية (حم - عن أبي سعيد) ، فاستغربت عزوه لحديث أبي سعيد؛ فإني لما رجعت إلى التخريج المبسط؛ وجدته مخرجاً من حديث جابر، وابن عباس، وأبي هريرة دون أبي سعيد، فرابني الأمر، فأخذت أبحث من جديد، واضعاً نصب عيني احتمال أن يكون فاتني الوقوف عليه يومئذ، ولكن دون جدوى، فلم أجد له أثراً فيما لدي من المصادر أصولها وفروعها، ومن هذه `مجمع الزوائد`. ولكني
رأيت المناوي قد انطلى عليه عزو السيوطي، وغفل عن الخطأ الذي فيه، فأقره عليه، بل واستدرك عليه، فقال:
`ورواه الطبراني أيضاً، ورمز المصنف لحسنه، وهو تقصير، بل حقه الرمز لصحته، فقد قال الهيثمي: رجاله ثقات `!
والهيثمي إنما قال هذا في رواية الطبراني عن جابر، ولم يذكره ألبتة من حديث أبي سعيد!
ثم قال المناوي:
`وظاهر صنيع المصنف أنه لا يوجد مخرجاً في أحد `الصحيحين `، بل ولا لأحد من الستة؛ وإلا لما اقتصر على غيره، وهو غفلة؛ فقد خرجه مسلم والبخاري في اللباس باللفظ المذكور، لكنه قال: (يرفع) بدل (يضع) `!
وهذا خطأ آخر ومزدوج؛ فإن مسلماً أخرجه باللفظين؛ كما تقدم. وأما البخاري؛ فلم يخرجه مطلقاً، لا في (اللباس) ، ولا في غيره.
ومن عجائبه: قوله في آخر كلامه:
`.. وذهل عن رد الحافظ ابن حجر له بأنه عند البخاري في (اللباس) `!
والحافظ نفسه إنما عزاه في آخر (اللباس) (10/399) لمسلم فقط! نعم؛ لقد ذكر رحمه الله في (الاستئذان) (11/ 81) بأنه قد سبقه القلم في (أبواب المساجد) فكتب `صحيح البخاري `، والمراد `صحيح مسلم `. *
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কোনো পুরুষকে তার এক পা অপর পায়ের উপর রাখতে (অন্য এক বর্ণনায়: উঠিয়ে দিতে) নিষেধ করেছেন, যখন সে চিৎ হয়ে নিজের পিঠের উপর ভর দিয়ে শুয়ে থাকে।
3568 - (نهى عن الأكل والشرب في آنية الذهب والفضّة) .
أخرجه النسائي في `السنن الكبرى` (4/149/16632) ، وكذا البيهقي
(1/28) من طريق إبراهيم بن طهمان عن الحجاج بن الحجاج عن أنس بن سيرين عن أنس بن مالك قال:.. فذكره مرفوعاً عن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - .
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
ثم روى البيهقي من طريق يونس بن عبيد عن أنس بن سيرين قال:
كنت مع أنس بن مالك عند نفر من المجوس، قال: فجيء بفالوذج على إناء من فضة، قال: فلم يأكله، فقيل له: حوّله، قال: فحوله على إناء من خلج (شجر معروف) ، فجيء به، فأكله.
ورجاله ثقات؛ غير أحمد بن عمرو القطواني؛ فلم أعرفه الآن.
ثم رأيته في `السير` (13/506) وموصوفاً بـ`المحدّث المعمّر، الثقة `، ونسبته (القطراني) .
وللحديث شاهد من حديث حذيفة بن اليمان رضي الله عنه، رواه الشيخان وغيرهما بنحوه، وهو مخرج في ` الإرواء ` (32) . *
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) সোনা ও রূপার পাত্রে পানাহার করতে নিষেধ করেছেন।
3569 - (نهى عن المخابرة) .
أخرجه ابن أبي شيبة في`المصنف` (6/346/1296) ، ومن طريقه: أبو داود (3407) ، وعنه البيهقي (6/133) ، وأحمد (5/187 و188) من طريق جعفر بن برقان عن ثابت بن الحجاج عن زيد بن ثابت قال: ... فذكره مرفوعاً.
قلت: وما المخابرة؟ قال:
أن تأخذ الأرض بنصف، أو ثلث، أو ربع.
قلت: إسناده صحيح رجاله كلهم ثقات.
وهذا التفسير للمخابرة؛ الظاهر أنه من زيد بن ثابت، فهو الذي ينبغي أن يعتمد من بين الأقوال التي ذكرها ابن الأثير في `النهاية`؛ لأنه تفسير صحابي، وراو للحديث؛ فهو أدرى بمرويّه من غيره.
وقد جاء بيان سبب نهيه - صلى الله عليه وسلم - عن المخابرة في طريق آخر؛ يرويه عروة بن الزبير قال؛ قال زيد بن ثابت:
يغفر الله لرافع بن خديج! أنا والله أعلم بالحديث منه؛ إنما أتى رجلان اقتتلا، فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
`إن كان هذا شأنكم؛ فلا تكروا المزارع `. قال: فسمع رافع قوله: `لا تكروا المزارع`.
أخرجه أحمد (5/182 و187) ، وسنده حسن.
قلت: وهذه الرواية تفيدنا فائدة هامة، وهي أن النهي عن (المخابرة) ليس لذاتها، وإنما ما قد ينتج من النزاع بين صاحب الأرض والمستأجر، وما ذاك إلا بسبب شروط توضع من أحد الفريقين غير مشروعة فيقع النزاع. وهذا هو ما أفادته مجموع روايات حديث رافع بن خديج، كما كنت حققته في `إرواء الغليل ` (5/297 ~ 302) ، ومن أبينها رواية لمسلم وغيره من طريق حنظلة بن قيس قال:
سألت رافع بن خديج عن كراء الأرض بالذهب والورق؟ فقال:
لا بأس به؛ إنما كان الناس يؤاجرون على عهد النبي - صلى الله عليه وسلم - على الماذيانات وأقبال الجداول، وأشياء من الزرع، فيهلك هذا، ويسلم هذا، ويسلم هذا ويهلك هذا، فلم يكن للناس كراء إلا هذا، فلذلك زجر عنه، وأما شيء مضمون؛ فلا بأس به. *
যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত...
(নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ’আল-মুখাবারা’ (পদ্ধতিতে ভূমি বর্গা দেওয়া) থেকে নিষেধ করেছেন।
(বর্ণনাকারী) জিজ্ঞেস করলেন, ’আল-মুখাবারা’ কী? তিনি বললেন, "তুমি জমিনকে (জমির মোট ফসলের) অর্ধেক, অথবা এক-তৃতীয়াংশ, কিংবা এক-চতুর্থাংশের বিনিময়ে গ্রহণ করা।"
যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহ রাফি‘ ইবনু খাদীজকে ক্ষমা করুন! আল্লাহর কসম, আমি তার চেয়ে এই হাদীস সম্পর্কে বেশি অবগত। (আসলে ঘটনা ছিল এই যে,) দু’জন লোক ঝগড়া করতে এলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যদি তোমাদের অবস্থা এই হয়, তবে তোমরা (নিজেদের) জমি বর্গা দিও না।" যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাফি‘ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেবল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কথা, "তোমরা জমি বর্গা দিও না"— এতোটুকুই শুনেছিলেন।
(অন্য একটি সূত্রে) হানযালা ইবনু কায়স (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাফি‘ ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সোনা বা রূপার বিনিময়ে জমি ভাড়া দেওয়া সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন, এতে কোনো অসুবিধা নেই। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে মানুষজন জমির উৎপাদিত ফসলের নির্দিষ্ট অংশ, যেমন— খাল বা নদীর তীরবর্তী অংশসমূহ, অথবা (সেচের) নালাগুলোর অগ্রভাগের (ফসল), বা শস্যের নির্দিষ্ট কিছু অংশের বিনিময়ে (ভূমি) ভাড়া দিত। ফলে কখনও এই অংশের ফসল নষ্ট হতো, আর সেই অংশের ফসল ভালো থাকতো; আবার কখনও সেই অংশের ফসল ভালো থাকতো, আর এই অংশের ফসল নষ্ট হতো। তখন মানুষের কাছে এর (এই নির্দিষ্ট অংশ ভাড়া দেওয়ার) চেয়ে ভালো কোনো ব্যবস্থা ছিল না। এই কারণেই তিনি (নবী সাঃ) তা থেকে নিষেধ করেছিলেন। কিন্তু যা (জমির মালিক ও চাষী উভয়ের জন্য) সুনিশ্চিত (অর্থাৎ ফসলের অংশ নির্দিষ্ট না করে গোটা ফসলের ঝুঁকি ভাগ করে নেওয়া হয়), তাতে কোনো অসুবিধা নেই।
3570 - (هذا رمضانُ قد جاءكم، تفتح فيه أبوابُ الجنة، وتغلقُ فيه أبواب النار، وتسلسلُ فيه الشياطينُ) .
أخرجه النسائي (1/296) ، وأحمد (3/236) من طريق ابن إسحاق قال: وذكر محمد بن مسلم عن أويس بن أبي أويس - عديد بني تيم - عن أنس بن مالك أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره. وقال النسائي:
`هذا الحديث خطأ`.
قلت: يعني: إسناده. وقد بين ذلك أبو حاتم؛ وقد سأله عنه ابنه في `العلل` (1/ 240/ 700) فأجابه بقوله:
`هذا خطأ، إنما هو عن الزهري عن ابن أبي أنس عن أبيه عن أبي هريرة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - . قلت (ابن أبي حاتم) : فإنه روى ابن إسحاق على أثر هذا الحديث عن الزهري قال: حدثني ابن أبي أنس أنه سمع أبا هريرة يحدث عن النبي - صلى الله عليه وسلم - بنحوه؟ قال أبي: وهذا أيضاً: ابن أبي أنس عن أبيه عن أبي هريرة عن النبي - صلى الله عليه وسلم - `.
قلت: والخلاصة أن الحديث حديث أبي هريرة - لا أنس - وأنه عن ابن أبي أنس عن أبيه عنه. وهكذا أخرجه الشيخان وغيرهما من طرق عن ابن شهاب به؛ وقد سبق تخريجه برقم (1307) مع طريق آخر عن أبي هريرة.
وهذه المخالفة من ابن إسحاق ليست غريبة ` فإنه معروف عند الحفاظ بأن في حفظه شيئاً، ولذلك؛ لم يخرج له الشيخان إلا مسلماً؛ فإنه أخرج له في المتابعات، يضاف إلى هذا أنه موصوف بالتدليس، وقد اجتمعت فيه هنا العلتان، فإنه - مع المخالفة المذكورة - لم يصرح بالتحديث، وإنما ذكره معلقاً مُنقطعاً!! وقد روى هذا الحديث بإسناد آخر وزيادة في المتن، فقال:
عن الفضل الرقاشي عن يزيد الرقاشي عن أنس بن مالك مرفوعاً به نحوه، وزاد:
`بُعداً لمن أدرك رمضان ولم يغفر له، إذا لم يغفر له فيه؛ فمتى؟ `.
أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف ` (3/2) ، والطبراني في`الأوسط ` (7/323/7627) .
لكن العلة في هذا ممن فوقه. ولذلك قال الهيثمي (3/143) :
`رواه الطبراني في `الأوسط `، وفيه الفضل بن عيسى الرقاشي، وهو ضعيف `.
قلت: ومثله شيخه يزيد - وهو ابن أبان الرقاشي - ، وهو عمه كما وقع في إسناد ابن أبي شيبة، قال الحافظ في `التقريب `:
`ضعيف`. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এই রমজান তোমাদের নিকট সমাগত হয়েছে। এতে জান্নাতের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, জাহান্নামের দরজাগুলো বন্ধ করে দেওয়া হয় এবং শয়তানদেরকে শৃংখলিত করা হয়।"
[অতিরিক্ত বর্ণনা হিসেবে আরও এসেছে:] "বড়ই দুর্ভাগ্য তার, যে রমজান মাস পেলো কিন্তু তাকে ক্ষমা করা হলো না। যদি তাকে এতে ক্ষমা না করা হয়, তবে আর কবে ক্ষমা করা হবে?"
3571 - (الوسيلةُ درجة عند الله؛ ليس فوقها درجة، فسَلُوا الله أن يؤتيني الوسيلة) .
أخرجه أحمد (3/83) : ثنا موسى بن داود عن ابن لهيعة عن موسى بن وردان قال: سمعت أبا سعيد الخدري يقول: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات؛ على ضعف في حفظ ابن لهيعة؛ لكنه قد توبع، فدل على أنه قد حفظ؛ فقال الطبراني في `المعجم الأوسط ` (1/89/263) : حدثنا أحمد بن رشدين قال: نا روحُ بن الصلاح قال: نا سعيد بن أيوب عن عُمارة بن غزية به.
وهذه متابعة قوية، لكن السند إليها ضعيف.
إلا أنه قد صح إلى متابع آخر ثقة، فقال في`الأوسط` أيضاً (2/126/1466) : حدثنا أحمد قال: نا يحيى بن محمد بن السكن قال: نا محمد بن جهضم قال: نا إسماعيل بن جعفر عن عمارة بن غزية به، وزاد في آخره:
`على خلقه `.
وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات من رجال `التهذيب `؛ غير أحمد هذا - وهو ابن محمد بن صدقة - ، من شيوخ الطبراني الذين أكثر عنهم، وهو حافظ متقن.
ومن هذا التخريج يتبين للباحث تقصير الهيثمي في تخريج الحديث والحكم عليه ` بقوله (1/332) :
`رواه أحمد، والطبراني في `الأوسط `، وفيه ابن لهيعة، وفيه ضعف، وقال الطبراني فيه: فسلوا الله عز وجل أن يؤتيني الوسيلة على خلقه `!!
فأوهم أن إسناد الطبراني بهذا اللفظ الأخير فيه ابن لهيعة أيضاً! وليس كذلك كما بينا.
وللحديث شاهد من حديث عبد الله بن عمرو أتم منه.
رواه مسلم وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` (1/259/242) ، و`صحيح أبي داود` (536) . *
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আল-ওয়াসীলা হলো আল্লাহর নিকট এমন এক বিশেষ মর্যাদা; যার উপরে আর কোনো মর্যাদা নেই। অতএব, তোমরা আল্লাহর নিকট প্রার্থনা করো যেন তিনি আমাকে সেই আল-ওয়াসীলা দান করেন।”
3572 - (الوزغُ فُوَيْسِقٌ) .
جاء من حديث عائشة، وسعد بن أبي وقاص.
أما حديث عائشة؛ فيرويه ابن شهاب عن عروة بن الزبير عنها أن رسول
الله - صلى الله عليه وسلم - قال: ... فذكره.
قالت: ولم أسمعه أمر بقتله.
أخرجه البخاري (1831 و3306) ، ومسلم (7/42) ، والنسائي (2/63) ، وابن ماجه (3230) ، وابن حبان (3952) ، والبيهقي (5/210 ~ 211) ، وأحمد (6/87 ~ 271 و279) . وقال ابن حبان:
`وهذا غريب `!
قلت: ولم يظهر لي وجه استغرابه إياه؛ ورجاله جبال في الحفظ، ولا سيما ويشهد له الحديث الثاني:
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “টিকটিকি (বা গেছো টিকটিকি) হলো একটি ক্ষতিকর ক্ষুদ্র প্রাণী (ফুওয়াইসিক)।” তিনি (আয়েশা) বলেন: তবে আমি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে) সেটিকে হত্যার আদেশ দিতে শুনিনি।
3573 - (لا تصومُوا هذه الأيام؛ فإنّها أيامُ أكل وشرب) .
أخرجه أحمد في`المسند` (3/494) من طريق قتادة عن سليمان بن يسَار عن حمزة الأسلمي:
أنه رأى رجلاً على جمل يتبع رحال الناس بمنى؛ ونبي الله - صلى الله عليه وسلم - شاهد، والرجل يقول: ... فذكره.
قال قتادة: فذكر لنا أن ذلك المنادي كان بلالاً.
ومن هذا الوجه أخرجه النسائي في `السنن الكبرى` (2/165/2875/ 1) دون قول قتادة؛ وذكر الخلاف في إسناده على سليمان بن يسار، وأنه اتفق سالم أبو النضر وعبد الله بن أبي بكر عن سليمان بن يسار عن عبد الله بن حذافة:
أن النبي - صلى الله عليه وسلم - أمره أن ينادي في أيام التشريق:
`إنها أيام أكل وشرب `.
قلت: وهذا إسناد صحيح.
ثم ذكر خلافاً آخر على سليمان بن يسار.
ثم ذكر له بعض الشواهد، منها: عن عمرو بن دينار عن نافع بن جبير بن مطعم عن بشر بن سحيم مرفوعاً نحوه.
وإسناده صحيح أيضاً.
وفي الباب عن جمع آخر من الصحابة؛ خرج أحاديثهم الهيثمي في `مجمع الزوائد` (3/ 202 ~ 204) .
ومنها: ما رواه صالح بن كيسان عن عيسى بن مسعود الزرقيّ عن جدته حبيبة بنت شريق:
أنها كانت مع أمها ابنة العجماء في أيام الحج بمنى، قال: فجاء بُديلُ بن ورقاء على راحلة رسول الله - صلى الله عليه وسلم - برحله، فنادى: إن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يقول:
`من كان صائماً فليفطر؛ فإنهن أيام أكل وشرب `.
أخرجه الحاكم (2/250) ، والطبراني في `الأوسط ` (4/27/3526) ، وأبو نعيم في `معرفة الصحابة` (2/342/1) .
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات؛ غير عيسى بن مسعود بن الحكم الزرقي، وقد وثقه ابن حبان (7/236) وقد روى عنه ثلاثة من الثقات؛ ذكر منهم اثنين في `التهذيب `، وفاتهما هذا الثالث - وهو صالح بن كيسان - ، وهو ثقة ثبت فقيه.
وهذا الحديث قال الهيثمي:
`رواه أحمد، والطبراني في`الأوسط `، وفي إسناد أحمد رجل لم يسم`!
فلم يتكلم عن إسناد الطبراني بشيء! ورجاله كلهم ثقات.
ويظهر أن هذا الحديث مما سقط من بعض نسخ`المسند`؛ ومنها النسخة المطبوعة في مصر، وقد عزاه أيضاً لأحمد الحافظ ابن كثير في`جامع المسانيد` (2/15) ، وكذلك صنع الحافظ في `أطراف المسند` (1/572/1113) ، ولذلك؛ صدره محققه الدكتور زهير ناصر بقوله:
`لم أجده`. فلعل القائمين على طبع `المسند` في `مؤسسة الرسالة` يستدركون هذا الحديث مع أحاديث أخرى سقطت من المطبوعة، سبق التنبيه على بعضها.
(تنبيه) : سكت الحاكم عن حديث بديل هذا، بل إنه عقب عليه بقوله:
`هذا الحديث ليس من جملة هذا الكتاب `!
قلت: فلم أفهم مراده منه، ولا ذكره الذهبي في `تلخيصه `. والله سبحانه وتعالى أعلم.
ثم رأيت لـ (عيسى بن مسعود الزرقي) متابعاً، وهو أخوه (يوسف بن مسعود ابن الحكم الزرقي) ، أخرجه البيهقي في `سننه ` (4/298) ، والمزي في ترجمة (يوسف) من `التهذيب ` (32/461) أخرجاه من طريقين عن يحيى بن سعيد الأنصاري عن يوسف بن مسعود به.
وعلقه النسائي في `السنن الكبرى` (2/168/2885) بصيغة الجزم، فقال:
`وقد روى هذا الحديث يحيى بن سعيد عن يوسف بن مسعود بن الحكم ... `.
وذكر المزي أنه وصله من طريق عيسى بن حماد عن ليث بن سعد عن يحيى ابن سعيد الأنصاري.
ولم أره عند النسائي هكذا موصولاً. والله أعلم.
ويوسف هذا وثقه ابن حبان أيضاً (5/551) . *
হামযাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
“তোমরা এই দিনগুলোতে রোযা রেখো না; কারণ এই দিনগুলো হলো পানাহার ও উপভোগের দিন।”
3574 - (لا صاعَيْ تمرٍ بصاعٍ، ولا صاعَيْ حنطةٍ بصاعٍ، ولا درْهَمَ بدرهمَينِ) .
هو من حديث أبي سعيد الخدري رضي الله عنه، وله عنه طريقان:
الأولى: عن أبي سلمة عنه قال:
كنا نُرزقُ تمر الجمع على عهد رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وهو الخلط من التمر - ؛ فكنا
نبيع صاعين بصاع، فبلغ ذلك رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فقال: ... فذكره.
أخرجه البخاري (2080) ، ومسلم (5/48) - والسياق له - ، والنسائي (2/ 220 ~ 221) ، والبيهقي (5/291) ، وأحمد (3/49 و50 ~ 51) من طريق يحيى بن أبي كثير به.
وتابعه الحارث بن عبد الرحمن: عند الطحاوي في `الشرح ` (2/234) .
ورواه الشيخان وغيرهما من طريق سعيد بن المسيب عن أبي سعيد وأبي هريرة معاً نحوه؛ وهو مخرج في `الإرواء` (1340) .
والطريق الأخرى: عن عقبة بن عبد الغافر عن أبي سعيد به.
أخرجه ابن حبان (5024/ المؤسسة) من طريق الوليد عن الأوزاعي عن يحيى بن أبي كثيرعنه.
قلت: وإسناده صحيح؛ لولا عنعنة الوليد - وهو ابن مسلم - في إسناده.
لكنه قد توبع، فرواه يحيى بن حمزة قال: حدثنا الأوزاعي به مختصراً.
أخرجه النسائي.
ورواه معاوية بن سلام: أخبرني يحيى بن أبي كثير قال: سمعت عقبة بن عبد الغافر يقول: سمعت أبا سعيد يقول:
جاء بلال بتمر برّني، فقال له رسول الله - صلى الله عليه وسلم - :
`من أين هذا؟ `.
فقال بلال: تمر كان عندنا رديء؛ فبعت منه صاعين بصاع لمطعم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - . فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - عند ذلك:
`أوّه؛ عين الربا، لا تفعل، ولكن إذا أردت أن تشتري التمر؛ فبعه ببيع آخر، ثم اشتر به `.
أخرجه البخاري (2312) ، ومسلم، وابن حبان (5022) ، وأحمد (3/62) ؛ وزاد في آخره: `ما بدا لك `. وسنده جيد.
ورواه محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي سعيد مرفوعاً بلفظ:
`لا يصلح صاع تمر بصاعين، ولا درهم بدرهمين، والدرهم بالدرهم، والدينار بالدينار؛ ولا فضل بينهما إلا وزناً `.
أخرجه ابن ماجه (2256) ، وابن أبي شيبة في`المصنف` (7/102/2529) . قلت: وإسناده حسن. *
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
একদা বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছু ‘বারনী’ (উত্তম প্রকারের) খেজুর নিয়ে আসলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন, "এটা কোথা থেকে আনলে?"
বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমাদের কাছে কিছু নিম্নমানের খেজুর ছিল। আমি আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খাদ্যের জন্য তার দুই ‘সা’ পরিমাণ খেজুর বিক্রি করে এই এক ‘সা’ (উত্তম) খেজুর কিনেছি।"
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আহ! এটা তো একেবারে সুদ (রিবা)! এমন করো না। কিন্তু যদি তুমি (উত্তম) খেজুর কিনতে চাও, তবে তোমার খেজুর অন্য কোনো বিক্রয়যোগ্য বস্তুর (যেমন—টাকার) বিনিময়ে বিক্রি করো, তারপর সেই মূল্য দিয়ে (উত্তম খেজুর) কিনে নাও।"
তিনি আরও বলেছেন: "এক ‘সা’ খেজুরের বিনিময়ে দুই ‘সা’ খেজুর বিক্রি করা বৈধ নয়, এক ‘সা’ গমের বিনিময়ে দুই ‘সা’ গম বিক্রি করাও বৈধ নয়, আর এক দিরহামের বিনিময়ে দুই দিরহাম বিক্রি করাও (বৈধ) নয়।" (কারণ একই জিনিসের পরিমাণের তারতম্য সুদ বা রিবা)।
3575 - (إنما هو جبريلُ؛ لم أرَهُ على صُورته التي خُلق عليها إلا هاتين المرتين؛ رأيته مُنهبطاً من السّماء، سادّاً عِظَمُ خَلْقِه ما بين السماء والأرض) .
رواه مسلم (1/ 110) - واللفظ له - ، وأحمد (6/236 و241) ، والطيالسي (1408) ، والنسائي في `الكبرى` (11532) ، والترمذي (3068) ، وإسحاق بن راهويه في`مسنده ` (884) ، وابن خزيمة في `التوحيد` (ص 145 ~ 146) ، وأبو الشيخ الأصبهاني في `العظمة` (485) من طريق داود بن أبي هند عن الشعبي عن مسروق قال:
كنتُ مُتكئاً عند عائشة فقالت: يا أبا عائشة! ثلاث من تكلم بواحدة منهنّ
فقد أعظم على الله الفرية، قال: وكنت متكئاً فجلست، فقلت: يا أم المؤمنين! أنظريني ولا تعجليني، ألم يقل الله - عز وجل - : {ولقد رآه بالأفق المبين} ، {ولقد رآه نزلة أخرى} ؟! فقالت:
أنا أول هذه الأمة سأل عن ذلك رسول الله - صلى الله عليه وسلم - ؟ فقال: ... فذكره.
فقالت: أولم تسمع أن الله يقول: {لا تدركه الأبصار وهو يُدركُ الأبصار وهو اللطيف الخبير} ؟! أولم تسمع أن الله يقول: {وما كان لبشر أن يُكلمه الله إلا وحياً أومن وراء حجاب أو يرسل رسولاً فيوحي بإذنه ما يشاء إنه عليٌ حكيم} ؟!
قالت: ومن زعم أن رسول الله - صلى الله عليه وسلم - كتم شيئاً من كتاب الله؛ فقد أعظم على الله الفرية، والله يقول: {يا أيها الرسول بلغ ما أنزل إليك من ربك وإن لم تفعل فما بلغت رسالته} .
قالت: ومن زعم أنه يخبر بما يكون في غد؛ فقد أعظم على الله الفرية، والله يقول: {قل لا يعلم من في السماوات والأرض الغيب إلا الله} . *
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মাসরূক (রহ.) বলেন: আমি একবার আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে হেলান দিয়ে বসা ছিলাম। তখন তিনি বললেন: "হে আবু আয়িশা! তিনটি বিষয় রয়েছে, যে ব্যক্তি এগুলোর কোনো একটি সম্পর্কেও কথা বলবে, সে আল্লাহ তাআলার উপর চরম মিথ্যা আরোপ করল।" মাসরূক বলেন: আমি তখন হেলান দেওয়া অবস্থা থেকে সোজা হয়ে বসলাম এবং বললাম: "হে উম্মুল মুমিনীন! আমাকে থামতে দিন, দ্রুত সিদ্ধান্ত দেবেন না। আল্লাহ তাআলা কি এ কথা বলেননি: {আর নিশ্চয়ই তিনি তাকে স্পষ্ট দিগন্তে দেখেছেন} [সূরা তাকভীর: ২৩], এবং {আর নিশ্চয়ই তিনি তাকে দ্বিতীয়বার দেখেছেন} [সূরা নাজম: ১৩]?!"
তখন তিনি (আয়িশা) বললেন: "আমিই এই উম্মতের প্রথম ব্যক্তি, যে এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। তখন তিনি বললেন: ‘তিনি (যাকে দেখা হয়েছে), তো কেবল জিবরীল; তাঁর প্রকৃত রূপ, যে রূপে তাঁকে সৃষ্টি করা হয়েছে, আমি এই দুইবার ছাড়া তাঁকে আর দেখিনি। আমি তাঁকে আসমান থেকে অবতরণ করতে দেখেছি, তাঁর বিরাট সৃষ্টি আসমান ও যমীনের মধ্যবর্তী স্থানকে আচ্ছন্ন করে রেখেছিল।’"
এরপর তিনি বললেন: "তুমি কি শোনোনি যে আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {দৃষ্টিসমূহ তাঁকে আয়ত্ত করতে পারে না, তবে তিনি দৃষ্টিসমূহকে আয়ত্ত করেন। আর তিনি সূক্ষ্মদর্শী, সম্যক পরিজ্ঞাত} [সূরা আন‘আম: ১০৩]?"
"আর তুমি কি শোনোনি যে আল্লাহ তাআলা বলেছেন: {কোনো মানুষের এমন মর্যাদা নেই যে, আল্লাহ তার সাথে সরাসরি কথা বলবেন; তবে ওহীর মাধ্যমে, অথবা পর্দার আড়াল থেকে, অথবা তিনি কোনো রাসূল (ফেরেশতা) প্রেরণ করবেন, অতঃপর তিনি আল্লাহর অনুমতিক্রমে যা চান, তা ওহী করেন। নিশ্চয়ই তিনি সুউচ্চ, প্রজ্ঞাময়} [সূরা শূরা: ৫১]?"
তিনি (আয়িশা) বললেন: "আর যে ব্যক্তি এই ধারণা করে যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আল্লাহর কিতাবের কোনো অংশ গোপন করেছেন (প্রচার করেননি), সে আল্লাহ তাআলার উপর চরম মিথ্যা আরোপ করল। কেননা আল্লাহ তাআলা বলেন: {হে রাসূল! আপনার রবের পক্ষ থেকে আপনার প্রতি যা নাযিল করা হয়েছে, তা প্রচার করুন। আর যদি আপনি তা না করেন, তবে আপনি তাঁর রিসালাত প্রচার করলেন না} [সূরা মায়েদা: ৬৭]।"
তিনি বললেন: "আর যে ব্যক্তি এই ধারণা করে যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আগামীকাল কী ঘটবে সে সম্পর্কে খবর দিতে পারতেন, সে আল্লাহ তাআলার উপর চরম মিথ্যা আরোপ করল। কেননা আল্লাহ তাআলা বলেন: {বলুন, আল্লাহ ছাড়া আসমান ও যমীনে যারা আছে, তারা কেউই গায়েব জানে না} [সূরা নামল: ৬৫]।"
3576 - (إنما مثل المهجّر إلى الصلاة: كمثل الذي يُهدي البدنة، ثم الذي على إثره: كالذي يُهدي البقرة، ثم الذي على إثره: كالذي يُهدي الكبش، ثم الذي على إثره: كالذي يُهدي الدجاجة، ثم الذي على إثره: كالذي يُهدي البيضة) .
هو من حديث أبي هريرة، وله عنه طرق:
الأولى: الأغرّ عنه:
رواه البخاري (929) ، ومسلم (3/7 ~ 8) ، والنسائي (1/138) - واللفظ له -
و (1/205 ~ 206) ، والدارمي (1/362) ، وابن أبي شيبة (2/ 152) ، وعبد الرزاق (5562) ، وأحمد (2/259 و280 و499 و505) ، والطحاوي في`مشكل الآثار` (2600 و2601) وفي`شرح معاني الآثار` (4/ 180) ، والبيهقي (3/226) ، وأبو يعلى (6158) .
الثانية: عن أبي سلمة عنه:
رواه الطحاوي في `المشكل` (2603) وفي` الشرح` (4/ 180) ، وأبو الشيخ في `الأمثال` (2 31) ، وابن خزيمة (1768) من طريقين عنه عن أبي هريرة.
(تنبيه) : أعلّ أبو حاتم - كما في `العلل` (600) لابنه - رواية ابن أبي العشرين عن الأوزاعي عن يحيى عن أبي سلمة عن أبي هريرة بالوقف!
وابن العشرين متابع من مُبشر بن إسماعيل - في رواية ابن خزيمة - عن الأوزاعي به.
ومُبشر ثقة، والطرق قبله تؤيد روايته.
وقد رواه البخاري (3211) ، والنسائي في `الصغرى` (2/116) و`الكبرى` (936) ، وأحمد (2/512) من طريق أبي سلمة والأغر - معاً - عنه بألفاظ.
الثالث: عن سعيد بن المسيّب عنه:
رواه مسلم (3/8) - ولم يسق لفظه - ، وأحمد (2/239) ، وابن خزيمة (1769) ، وابن ماجه (1092) ، والبيهقي (3/225 ~ 226) ، والبغوي في `شرح السنة` (1061) ، والطحاوي في `المشكل ` (2602) وفي `شرح المعاني` (4/180) .
الرابع: هلال المدني عنه:
رواه أحمد (2/499) .
وهلال هذا مجهول. ولكن الطرق قبله تثبت روايته.
وفي معنى هذه الرواية أحاديث متعددة عن أبي هريرة رضي الله عنه وغيره. *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: নামাযের (প্রথম দিকে দ্রুত) গমনকারীর উপমা হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি উট (আল্লাহর পথে) উৎসর্গ করে। এরপর যে তার পরে আসে, সে সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি গরু উৎসর্গ করে। এরপর যে তার পরে আসে, সে সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি ভেড়া উৎসর্গ করে। এরপর যে তার পরে আসে, সে সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি মুরগি দান করে। এরপর যে তার পরে আসে, সে সেই ব্যক্তির মতো, যে একটি ডিম দান করে।
3577 - (إنما مثلُ صاحب القرآن: كمثل صاحب الإبل المُعَقَّلَةِ؛ إن عاهد عليها أمسكها، وإن أطلقها ذهبت) .
جاء من حديث ابن عمر، وله عنه طريقان:
الأول: عن نافع:
رواه البخاري (5031) ، ومسلم (1/190 ~ 191) ، والنسائي في ` الصغرى` (2/154) و`الكبرى` (1/327) ، وابن ماجه (3783) ، وابن حبان (761 و762) ، ومالك (1/202) ، وابن أبي شيبة (2/500و10/476) ، وعبد الرزاق (5971 و5972 و6032) ، وأحمد (2/17و24و30 و 64) ، والبيهقي (2/395) ، والبغوي في`شرح السنة` (1221) من طرق عنه.
الثاني: عن سالم: رواه عبد الرزاق (5972) . *
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কুরআনের ধারকের উদাহরণ হলো রশি দিয়ে বাঁধা উটের মালিকের মতো; যদি সে সেগুলোর নিয়মিত যত্ন নেয় (ও রক্ষণাবেক্ষণ করে), তবে সে সেগুলোকে ধরে রাখতে পারে। আর যদি সে সেগুলোকে ছেড়ে দেয়, তবে সেগুলো চলে যায়।"
3578 - (إنّما هلك من كان قبلكم: باختلافهم في الكتاب) .
رواه مسلم (7/57) ، والنسائي في` الكبرى` (8095) ، وأحمد (2/ 192) ، والآجُرّي في `الشريعة` (ص 67) من حديث عبد الله بن عمرو قال:
هجّرتُ إلى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - يوماً قال: فسمع أصوات رجلين اختلفا في آية، فخرج علينا رسول الله - صلى الله عليه وسلم - - يُعرفُ في وجهه الغضب - ؛ فقال: ... فذكره. *
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একদিন আমি খুব সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট গেলাম। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) দু’জন লোকের কণ্ঠস্বর শুনলেন, যারা (কুরআনের) একটি আয়াত নিয়ে মতভেদ করছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রাগান্বিত অবস্থায় আমাদের নিকট বেরিয়ে আসলেন— তাঁর চেহারায় রাগ স্পষ্ট ফুটে উঠছিল। অতঃপর তিনি বললেন:
"নিশ্চয়ই তোমাদের পূর্ববর্তী লোকেরা একমাত্র এই কারণেই ধ্বংস হয়েছিল যে, তারা কিতাব (আল্লাহর গ্রন্থ) নিয়ে মতপার্থক্য সৃষ্টি করেছিল।"
3579 - (إنّه اتبعنا رجلٌ لم يكن معنا حين دعوتنا؛ فإن أذنتَ له دخل) .
جاء من حديث أبي مسعود البدري، وجابر بن عبد الله.
أما حديث أبي مسعود، فقد رواه البخاري (5434 و5461) ، ومسلم (6/115 ~ 116) ، والترمذي (1099) - واللفظ له - ، والدارمي (2/105 ~ 106) ، وأبوعوانة (5/373 ~ 375) ، وابن حبان (5276) ، وأحمد (4/ 121) من طرق عن الأعمش عن أبي وائل عن أبي مسعود البدري الأنصاري قال:
جاء رجل - يقال له: أبو شعيب - إلى غلام له لحام، فقال: اصنع لي طعاماً يكفي خمسة؛ فإني رأيت في وجه رسول الله - صلى الله عليه وسلم - الجوع.
قال: فصنع طعاماً، ثم أرسل إلى النبي - صلى الله عليه وسلم - ، فدعاه وجُلساءه الذين معه، فلما قام النبي - صلى الله عليه وسلم - اتبعهم رجل لم يكن معهم حين دعوا، فلما انتهى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - إلى الباب ` قال لصاحب المنزل: ... فذكره.
قال: فقد أذنّا له؛ فليدخل.
وأما حديث جابر؛ فقد رواه مسلم (6/116) - ولم يسق لفظه - ، وأبو عوانة (5/375) ، وأحمد (3/353) من طريق عمار بن رُزيق.
ومسلم - أيضاً - ولم يسق لفظه - ، وأبو عوانة أيضاً، وأحمد (3/396) من طريق زهير: كلاهما عن الأعمش عن أبي سفيان عن جابر. *
আবু মাসঊদ আল-বদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আবু শুআইব নামক একজন ব্যক্তি তার মাংস বিক্রেতা গোলামের কাছে এসে বললেন, "আমার জন্য এমন খাবার তৈরি করো যা পাঁচজনের জন্য যথেষ্ট হয়। কেননা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের চেহারায় ক্ষুধার চিহ্ন দেখতে পেয়েছি।"
বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর সে খাবার তৈরি করলো এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে লোক পাঠিয়ে তাঁকে এবং তাঁর সঙ্গে থাকা সঙ্গীদের দাওয়াত দিলো। যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (খাবারের জন্য) রওনা হলেন, তখন একজন লোক তাঁদের অনুসরণ করলো, যাকে দাওয়াত দেওয়ার সময় তারা সঙ্গে ছিলেন না।
যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দরজায় পৌঁছলেন, তখন তিনি গৃহকর্তাকে বললেন: "সে আমাদের অনুসরণ করেছে। দাওয়াতের সময় সে আমাদের সাথে ছিল না। আপনি যদি তাকে অনুমতি দেন, তবে সে প্রবেশ করতে পারে।"
গৃহকর্তা বললেন: "আমরা তাকে অনুমতি দিলাম, সে প্রবেশ করুক।"
3580 - (إنّه لم يُقبض نبيٌ حتّى يُرى مقعدُه من الجنة، ثم يُخيّر) .
رواه البخاري (4463) - واللفظ له - ، و (4437) ، ومسلم (7/137 ~ 138) ، وأحمد (6/89) من طريق عروة وسعيد بن المسيّب أن عائشة قالت:
كان النبي - صلى الله عليه وسلم - يقول وهو صحيح: ... فذكرته.
فلما نزل به - ورأسه على فخذي - غشي عليه، ثم أفاق، فأشخص بصره إلى سقف البيت، ثم قال:
`اللهم! الرفيق الأعلى`.
فقلت: إذن؛ لا يختارنا، وعرفتُ أنه الحديث الذي كان يحدثنا وهو صحيح. قالت: فكان آخر كلمة تكلم بها:
`اللهم! الرفيق الأعلى`. *
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সুস্থ অবস্থায় বলতেন: "কোনো নবীরই রূহ কবয করা হয় না, যতক্ষণ না তিনি জান্নাতে তাঁর অবস্থানস্থল দেখে নেন। এরপর তাঁকে এখতিয়ার দেওয়া হয় (বেছে নেওয়ার সুযোগ দেওয়া হয়)।"
যখন তাঁর (মৃত্যুর) সময় উপস্থিত হলো, আর তাঁর মাথা আমার উরুর ওপর ছিল, তখন তিনি বেহুঁশ হয়ে গেলেন। এরপর যখন তাঁর হুঁশ ফিরল, তখন তিনি তাঁর দৃষ্টিকে ঘরের ছাদের দিকে স্থির করলেন এবং বললেন:
"হে আল্লাহ! (আমি) সর্বোত্তম বন্ধুর (বা সর্বোচ্চ সঙ্গীর) কাছে যেতে চাই।"
আমি (মনে মনে) বললাম: তাহলে তো তিনি আমাদের বেছে নিচ্ছেন না। আর আমি বুঝতে পারলাম যে, এটি সেই হাদিস, যা তিনি সুস্থ অবস্থায় আমাদের বলতেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তাঁর উচ্চারিত শেষ কথাটি ছিল:
"হে আল্লাহ! সর্বোত্তম বন্ধুর কাছে (আমাকে নিয়ে যান)।"
3581 - (إئه ليأتي الرّجل العظيمُ السّمين يومَ القيامة؛ لا يزنُ عندَ الله جناح بعوضة) .
رواه البخاري (4729) - واللفظ له - ، ومن طريقه: البغوي في `شرح السنة ` (4327) ، ومسلم (8/25) من طريق أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي - صلى الله عليه وسلم - ... فذكره.
وقال: اقرؤوا: {فلا نُقيم لهم يوم القيامة وزناً} .
قال الحافظ ابن حجر في`الفتح ` (8/426) تعليقاً على قوله: `اقرؤوا`:
`القائل يُحتمل أن يكون الصحابي، أو هو مرفوع من بقية الحديث `.
قلت: وليس في رواية مسلم قوله: `وقال `.
وللحديث طريق آخر نحوه؛ رواه ابن أبي حاتم - كما في`تفسير ابن كثير` (3/107) - من طريق ابن أبي الزناد عن صالح مولى التوأمة؛ وفيه قوله: `وقال `
ورواه ابن جرير في `تفسيره ` (16/29) من الطريق نفسه، وليس فيه قوله: `وقال `.
وقد أورد السيوطي الحديث في `الزيادة على الجامع الصغير` (
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইরশাদ করেছেন:
"নিশ্চয়ই কিয়ামতের দিন বিশালদেহী, স্থূলকায় ব্যক্তি আগমন করবে; কিন্তু আল্লাহর নিকট সে একটি মশকের ডানার সমানও ওজন রাখবে না।"
অতঃপর তিনি বললেন, তোমরা (এই আয়াতটি) পাঠ করো: "সুতরাং কিয়ামতের দিন আমি তাদের জন্য কোনো ওজন (মূল্য) স্থাপন করব না।" (সূরা কাহফ, ১০৫)
3582 - (إنها حرمٌ آمنٌ) .
رواه مسلم (8/118) ، وابن أبي شيبة (12/182 و14/198 ~ 199) ، والطحاوي في `شرح معاني الآثار` (4/192) ، والبيهقي في `سننه ` (5/195) ، وأحمد (3/486) ، والطبراني في `الكبير` (5610 و5611 و5612) من طريق يُسير بن عمرو عن سهل بن حنيف قال:
أهوى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - بيده إلى المدينة، فقال: ... فذكره.
(تنبيه) : وقع في بعض المصادر تكرار لفظ حديث الترجمة مرتين، وبعضها بلفظ: `حرام `. *
সাহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাত দ্বারা মদীনার দিকে ইঙ্গিত করলেন এবং বললেন:
"নিশ্চয়ই এটি (মদীনা) একটি নিরাপদ হারাম (পবিত্র ও সংরক্ষিত অঞ্চল)।"
3583 - (إنها طَيْبةُ، تَنفِي الخَبَثَ؛ كما تنفِي النارُ خَبَثَ الفِضّةِ) .
جاء من حديث زيد بن ثابت، وأبي هريرة، وجابر، وأبي أمامة، وأبي قتادة:
أما حديث زيد؛ فإنه من طريق شعبة عن عدي عن عبد الله بن يزيد عن زيد ابن ثابت رضي الله عنه:
{فما لكم في المنافقين فئتين} ، رجع ناس من أصحاب النبي - صلى الله عليه وسلم - من أحد، وكان الناس فيهم فرقتين؛ فريق يقول: اقتلهم، وفريق يقول: لا، فنزلت: {فما لكم في المنافقين فئتين} ، وقال: ... فذكره.
رواه البخاري (4589) قال: حدثني محمد بن بشار: حدثنا غندر وعبد الرحمن قالا: حدثنا شُعبة به.
ورواه الترمذي (¬1) (3028) ، والنسائي في `الكبرى` (1113) - عن محمد بن بشار - ، وأحمد (5/188) - عن فيّاض بن محمد - كلاهما عن غندر عن شعبة به.
وتابع غندراً على هذا اللفظ:
1 ـ معاذ العنبري: عند مسلم (1384) .
যায়িদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
নিশ্চয়ই তা (মদিনা) হলো ত্বাইবাহ (পবিত্র)। এটি মন্দ বিষয় ও দুষ্টতা দূর করে, যেমনভাবে আগুন রুপার খাদ বা ময়লা দূর করে।
3584 - (للمهاجرين منابرُ من ذهبٍ يجلسون عليها يوم القيامة، قد أمنوا من الفزع)
أخرجه ابن حبان (1582) - من طريق إبراهيم بن حمزة الزبيري - ، والبزار (2/306/1753) - عن سفيان بن حمزة - ، والحاكم (4/76) - من طريق أحمد بن عبد الرحمن بن وهب: حدثني عمي - ثلاثتهم عن كثير بن زيد عن عبد الرحمن ابن أبي سعيد الخدري عن أبيه قال: قال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : ... فذكره. قال أبو سعيد الخدري:
والله! لو حبوت بها أحداً؛ لحبوت بها قومي.
وقال الحاكم:
`صحيح الإسناد`! ورده الذهبي بقوله:
`قلت: أحمد - يعني: ابن عبد الرحمن بن وهب - واه `.
قلت: هو عند ابن حبان والبزار من غير طريقه كما سبقت الإشارة إليه. وأما قوله المناوي في `فيض القدير`:
`فتعقبه الذهبي بأن أحمد بن سليمان بن بلال - أحد رواته - واه؛ فالصحة من أين؟! `!
أقول: أحمد بن سليمان بن بلال شخصية لا وجود لها، وإنما رواه الحاكم من طريق أحمد بن عبد الرحمن بن وهب: حدثني عمي: أخبرني سليمان بن بلال ...
قلت: فتأمل كيف اختلط الأمر على المناوي، فتركب في ذهنه من ثلاثة أسماء في هذا الإسناد ذاك الاسم الذي لا وجود له!
والذي دارت عليه الطرق: كثير بن زيد - وهو الأسلمي المدني - مختلف فيه، وقد قال فيه أبو زرعة - وتبعه الذهبي في `الكاشف ` - :
`صدوق، فيه لين `. وقال العسقلاني:
`صدوق يخطئ `.
وقد ساق له ابن عدي في `الكامل ` (6/67ـ 69) أحاديث من رواية بعض الثلاثة عنه، وقال:
`ولم أر بحديثه بأساً `.
قلت: ويبدو لي من قوله هذا، وأقوال الأئمة الآخرين: أنه وسط حسن الحديث ما لم يخالف، ولذلك حسنت له بعض الأحاديث فيما تقدم من هذه
`السلسلة`، فانظر مثلأ (1128 و 1296) من المجلد الثالث.
هذا.. ولم يتنبه الشيخ الغماري في كتابه الحاوي الذي أسماه `المداوي لعلل الجامع الصغير وشرحي المناوي ` للخلط الذي وقع فيه المناوي بين الأسماء الثلاثة! وانما تعقبه فيما قاله في رواية البزار بلفظ: `إن للمهاجرين ` لقوله في شيخ البزار: `مجهول `، وعقب عليه برواية الحاكم المتقدمة، وقال:
`فإن كان البزار رواه من غير طريقه (يعني: أحمد بن عبد الرحمن) ؛ فهو شاهد جيد له `!
قلت: وهذا - مع الأسف - مما يشعر الباحث أن الشيخ الغماري رحمه الله يهتم بنقد الأشخاص وتتبع زلاتهم كأنها غاية عنده، ولا يهتم بنقد الحديث وتتبع طرقه وبيان صحيحه من ضعيفه، وهو الغاية عند أهل العلم؛ كما لا يخفى! فانشغل بالوسيلة عن الغاية، ألا تراه علق قوله: `فهو شاهد جيد` على كون طريق البزار من غير طريق (أحمد بن عبد الرحمن) ، وهذا صريح في أنه لم يرجع إلى `البزار` فضلأ عن `ابن حبان `!!
ثم كيف يكون شاهداً جيداً، وهو لا يدري هوية الشاهد، فلعله يكون كذاباً أو متروكاً لا يصلح للشهادة؟!
ثم لنفترض أنه صالح - كما هو الواقع - ؛ فكان عليه أن يتم المداواة والمعالجة؛ بأن يبين سلامة الحديث من العلة، وصلاحيته للحجة - كما قدمنا - ؛ أو إذا كان معلولأ عنده ممن فوق المتابعين، حتى تتم الفائدة من النقد. والله المستعان.
وأما الهيثمي؛ فقال في `المجمع ` (5/254 ~ 255) :
`رواه البزار عن شيخه حمزة بن مالك؛ ولم أعرفه، وبقية رجاله ثقات`!
قلت: هو - أولاً - متابع كما تقدم، وثانياً: روى عنه أبو حاتم؛ ولم يضعفه. *
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুহাজিরদের জন্য স্বর্ণের মিম্বরসমূহ থাকবে, যার উপর তারা কিয়ামতের দিন উপবিষ্ট হবেন। তারা সেই মহা আতঙ্ক ও ভয় থেকে সম্পূর্ণরূপে নিরাপদ থাকবেন।"
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম! আমি যদি এই মর্যাদা কাউকে দিতে পারতাম, তবে অবশ্যই তা আমার স্বজাতিকে দিতাম।
3585 - (إنها مباركة، إنها طعامُ طُعْمٍ) .
جاء من حديث أبي ذر، وابن عباس:
أولاً: حديث أبي ذر، وله عنه طريقان:
الأول: عن عبد الله بن الصامت:
رواه مسلم (3/152 ~ 155) من طريق حميد بن هلال عن عبد الله بن الصامت عن أبي ذر قال:
خرجنا من قومنا غفار - وكانوا يحلون الشهر الحرام - ، فخرجت أنا وأخي أنيس وأمنا، فنزلنا على خال لنا، فأكرمنا خالنا، وأحسن إلينا، فحسدنا قومه، فقالوا: إنك إذا خرجت عن أهلك خالف إليهم أنيس، فجاء خالنا، فنثا علينا الذي قيل له، فقلت: أمّا ما مضى من معروفك فقد كدَّرته، ولا جماع لك فيما بعد، فقربنا صرمتنا فاحتملنا عليها، وتغطى خالنا ثوبه، فجعل يبكي، فانطلقنا حتى نزلنا بحضرة مكة، فنافر أنيس عن صرمتنا وعن مثلها، فأتيا الكاهن، فخير أنيساً، فأتانا أنيس بصرمتنا ومثلها معها، قال: وقد صليت يا ابن أخي! قبل أن ألقى رسول الله - صلى الله عليه وسلم - بثلاث سنين، قلت: لمن؟ قال: لله، قلت: فأين توجه؟ قال: أتوجه حيث يوجهني ربي، أصلي عشاء حتى إذا كان من آخر الليل، ألقيت كأني خفاء حتى تعلوني الشمس، فقال أنيس: إن لي حاجة بمكة فاكفني، فانطلق أنيس، حتى أتى مكة، فراث علي، ثم جاء، فقلت: ما صنعت؟ قال: لقيت رجلاً بمكة على دينك، يزعم أن الله أرسله، قلت: فما يقول الناس؟ قال: يقولون: شاعر، كاهن، ساحر، وكان أنيس أحد الشعراء، قال أنيس: لقد سمعت قول
الكهنة، فما هو بقولهم، ولقد وضعت قوله على أقراء الشعر، فما يلتئم على لسان أحد بعدي أنه شعر، والله! إنه لصادق، وإنهم لكاذبون، قال: قلت: فاكفني حتى أذهب فأنظر، قال: فأتيت مكة، فتضعّفت رجلاً منهم، فقلت: أين هذا الذي تدعونه الصابىء؟ فأشار إلي، فقال: الصابىء؟! فمال على أهل الوادي بكل مدرة وعظم حتى خررت مغشياً علي، قال: فارتفعت حين ارتفعت كأني نصب أحمر، قال: فأتيت زمزم، فغسلت عني الدماء، وشربت من مائها، ولقد لبثت - يا ابن أخي - ثلاثين بين ليلة ويوم، ما كان لي طعام إلا ماء زمزم، فسمنت حتى تكسرت عُكَن بطني، وما وجدت على كبدي سخفة جوع، قال: فبينا أهل مكة في ليلة قمراء إضحيان؛ إذ ضرب على أسمختهم، فما يطوف بالبيت أحد، وامرأتان منهم تدعوان إسافاً ونائلة، قال: فأتتا علي في طوافهما، فقلت: أنكحا أحدهما الأخرى، قال: فما تناهتا عن قولهما، قال: فأتتا علي، فقلت هن مثل الخشبة، غير أني لا أكني، فانطلقتا تولولان وتقولان: لو كان هاهنا أحد من أنفارنا! قال: فاستقبلهما رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وأبو بكر وهما هابطان، قال: `ما لكما؟ `، قالتا: الصابىء بين الكعبة وأستارها، قال: `ما قال لكما؟ `، قالتا: إنه قال لنا كلمة تملأ الفم، وجاء رسول الله - صلى الله عليه وسلم - حتى استلم الحجر، وطاف بالبيت هو وصاحبه، ثم صلى، فلما قضى صلاته قال أبو ذر: فكنت أنا أول من حياه بتحية الإسلام، قال: فقلت: السلام عليك يا رسول الله! فقال: `وعليك ورحمة الله `، ثم قال: `من أنت؟ `، قال: قلت: من غفار، قال: فأهوى بيده، فوضع أصابعه على جبهته، فقلت في نفسي: كره أن انتميت إلى غفار؟! فذهبت آخذ بيده، فَقَدَعَنِي صاحبه - وكان أعلم به مني - ثم رفع رأسه، ثم قال: `متى كنت هاهنا؟ `، قال: قلت: قد كنت هاهنا منذ ثلاثين بين ليلة ويوم، قال: `فمن كان يطعمك؟ `،
قال: قلت: ما كان لي طعام إلا ماء زمزم، فسمنت حتى تكسرت عُكن بطني، وما أجد على كبدي سُخفة جوع، قال: ... فذكره.
فقال أبو بكر: يا رسول الله! ائذن لي في طعامه الليلة؟! فانطلق رسول الله - صلى الله عليه وسلم - وابوبكر، وانطلقت معهما، ففتح أبوبكر باباً، فجعل يقبض لنا من زبيب. الطائف، وكان ذلك أول طعام أكلته بها، ثم غَبَرْتُ ما غَبَرْتُ، ثم أتيت رسول الله - صلى الله عليه وسلم - فقال: `إنه قد وجهت لي أرض ذات نخل، لا أراها إلا يثرب؛ فهل أنت مُبَلِّغٌ عني قومك، عسى الله أن ينفعهم بك وبأجرك فيهم `.
فأتيت أنيساً، فقال: ما صنعت؟ قلت: صنعت أني قد أسلمت وصدقت، قال: ما بي رغبة عن دينك؛ فإني قد أسلمت وصدقت، فأتينا أمَّنا فقالت: ما بي رغبة عن دينكما، فإني قد أسلمت وصدقت، فاحتملنا حتى أتينا قومنا غفاراً، فأسلم نصفهم، وكان يؤمهم إيماء بن رحضة الغفاري، وكان سيدهم، وقال نصفهم: إذا قدم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - المدينة أسلمنا، فقدم رسول الله - صلى الله عليه وسلم - المدينة، فأسلم نصفهم الباقي، وجاءت أسلم، فقالوا: يا رسول الله! إخوتنا؛ نسلم على الذي أسلموا عليه! فأسلموا، فقال رسول الله - صلى الله عليه وسلم - : `غفار غفر الله لها، وأسلم سالمهاالله`.
وقد رواه عن حميد جماعة - مطولاً ومختصراً - :
أولهم: خالد الحذاء:
وهي رواية مسلم - المتقدمة - . ورواه أيضاً البزار في `مسنده ` (1171) بلفظ: `زمزم: طعام طعم، وشفاء سقم `، والفاكهي في `أخبار مكة` (1080) بلفظ: `إنهاطعام طعم، وشفاء سقم `.
الثاني: سليمان بن المغيرة:
رواه ابن أبي شيبة (18447) بلفظ: `إنها مباركة؛ إنها طعام طعم `، وابن حبان (7133) ، وأحمد (4/174 ~ 175و175) من طريقين عن سليمان بن المغيرة - ولم يسق متنه في الموضع الثاني - ، والطيالسي (61) ، وابن سعد في `الطبقات الكبرى` (4/219 ~ 222) ، والفاكهي في `أخبار مكة ` (1081) - وعزا المتن دون إيراده لما قبله، وقال: وزاد فيه: `إنها مباركة `، والبيهقي في `الدلائل ` (2/ 211) و`السنن ` (5/147) بلفظ: `إنها مباركة؛ إنها طعام طعم، وشفاء سقم `، وأبو نعيم في `الدلائل ` (ص 207 ~ 210) - دون قوله: `وشفاء سقم `، وفي `الحلية` (1/157 و 159) مختصراً جذاً، ولم يسق حديث الترجمة.
الثالث: ابن عون:
رواه الأزرقي في `تاريخ مكة ` (2/53) بلفظ: `إنها طعام طعم `، والبزار (1172) - ولم يسق لفظه - ، والفاكهي (1082) - ولم يسق لفظه - ، وابن عدي في `الكامل ` (6/ 2301) بلفظ: `زمزم طعام طعم، وشفاء سقم `.
الرابع: عبد الله بن بكر المزني:
رواه الطبراني في `المعجم الصغير` (
আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমরা আমাদের গোত্র গিফার ছেড়ে বের হলাম—তারা হারাম মাসকে হালাল (লঙ্ঘন) করত—সুতরাং আমি, আমার ভাই উনাইস এবং আমাদের মা বের হলাম। আমরা আমাদের এক মামার কাছে অবস্থান নিলাম। আমার মামা আমাদের সম্মান করলেন এবং আমাদের সাথে সদ্ব্যবহার করলেন। কিন্তু তার গোত্রের লোকেরা আমাদের প্রতি ঈর্ষান্বিত হলো। তারা বলল: যখন তুমি তোমার পরিবার ছেড়ে যাও, তখন উনাইস তাদের কাছে আসে (ব্যভিচার করে)।
আমার মামা এসে আমাদের কাছে সেই কথা বললেন, যা তাঁকে বলা হয়েছিল। আমি বললাম: আপনার পূর্বের সব নেক কাজ এই কথার মাধ্যমে পণ্ড হয়ে গেল, এরপরে আপনার সাথে আমাদের আর কোনো সম্পর্ক থাকবে না। অতঃপর আমরা আমাদের সামান্য উটগুলো প্রস্তুত করে সেগুলোর ওপর জিনিসপত্র চাপিয়ে নিলাম। আমার মামা তাঁর পোশাক দিয়ে মাথা ঢেকে কাঁদতে লাগলেন। আমরা রওনা হলাম এবং মক্কার কাছাকাছি একটি স্থানে অবতরণ করলাম।
উনাইস আমাদের উট এবং সমপরিমাণ সম্পদের বিষয়ে (অন্য এক ব্যক্তির সাথে) প্রতিযোগিতা (মুনাফারাহ) করল। তারা একজন ভবিষ্যদ্বক্তার কাছে গেল। সেই ভবিষ্যদ্বক্তা উনাইসের পক্ষে রায় দিল। উনাইস আমাদের উট এবং তার সাথে সমপরিমাণ সম্পদ নিয়ে এলো।
তিনি (আবু যার) বললেন: হে আমার ভাতিজা! আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাক্ষাতের তিন বছর পূর্বেই আমি সালাত আদায় করতাম। আমি বললাম: কার জন্য? তিনি বললেন: আল্লাহর জন্য। আমি বললাম: আপনি কোন দিকে মুখ করতেন? তিনি বললেন: আমার রব আমাকে যেদিকে মুখ করতে বলতেন, আমি সেদিকেই মুখ করতাম। আমি রাতে এশার সালাত আদায় করতাম, অতঃপর যখন রাতের শেষ অংশ হতো, তখন আমি একটি কম্বলের মতো শুয়ে থাকতাম, যতক্ষণ না সূর্য আমাকে আচ্ছাদিত করত।
উনাইস বলল: মক্কায় আমার একটি কাজ আছে, তুমি আমার জন্য যথেষ্ট হও (অর্থাৎ অপেক্ষা করো)। উনাইস মক্কার দিকে রওনা হলো। সে আমার কাছে আসতে দেরি করল। এরপর সে এলো। আমি বললাম: কী করলে? সে বলল: মক্কায় তোমার ধর্মের এক ব্যক্তির সাথে দেখা হয়েছে, সে দাবি করে যে আল্লাহ তাকে রাসূল হিসেবে পাঠিয়েছেন। আমি বললাম: লোকেরা কী বলে? সে বলল: তারা বলে: কবি, ভবিষ্যদ্বক্তা, জাদুকর। (উল্লেখ্য, উনাইস ছিলেন একজন কবি।) উনাইস বলল: আমি ভবিষ্যদ্বক্তাদের কথা শুনেছি, কিন্তু এর কথা তাদের কথার মতো নয়। আমি তার কথাকে কাব্যের ছন্দে সাজিয়ে দেখেছি, কিন্তু আমার পরে কারো পক্ষে এটি কবিতা হিসেবে মেনে নেওয়া সম্ভব নয়। আল্লাহর কসম! সে নিঃসন্দেহে সত্যবাদী, আর তারা মিথ্যাবাদী।
তিনি বললেন: আমি বললাম: তুমি আমার জন্য যথেষ্ট হও যাতে আমি গিয়ে দেখতে পারি। আমি মক্কায় এলাম। আমি তাদের মধ্যে একজন দুর্বল লোককে খুঁজে নিলাম এবং বললাম: তোমরা যাকে ’সাবিয়ী’ (ধর্মত্যাগী) বলো, সে কোথায়? সে আমার দিকে ইশারা করে বলল: সাবিয়ী?! তখন উপত্যকার সব লোক প্রতিটি পাথর ও হাড় নিয়ে আমার ওপর ঝাঁপিয়ে পড়ল, ফলে আমি অজ্ঞান হয়ে মাটিতে লুটিয়ে পড়লাম।
তিনি বললেন: যখন আমি জ্ঞান ফিরে পেলাম, তখন আমি যেন একটি লাল পাথরের মূর্তির মতো দাঁড়িয়ে আছি। আমি যমযমের কাছে গেলাম। আমি আমার শরীর থেকে রক্ত ধুয়ে নিলাম এবং যমযমের পানি পান করলাম। হে আমার ভাতিজা! আমি সেখানে ত্রিশ দিন-রাত অবস্থান করেছিলাম। যমযমের পানি ছাড়া আমার কোনো খাবার ছিল না। আমি এত মোটা হয়ে গেলাম যে আমার পেটের ভাঁজগুলো ভেঙে গিয়েছিল। আর আমার কলিজায় ক্ষুধার কোনো দুর্বলতা অনুভব করিনি।
তিনি বললেন: এক রাতে মক্কাবাসীরা যখন আলোকিত চাঁদের আলোয় ছিল, তখন তাদের কানে ঘুম এসে গেল। বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করার মতো কেউ ছিল না। তাদের দুজন মহিলা ’ইসাফ’ ও ’নায়লা’ নামে মূর্তিদের ডাকছিল। তারা তাদের তাওয়াফের সময় আমার পাশ দিয়ে গেল। আমি বললাম: তোমরা তোমাদের একজনকে অন্যজনের সাথে বিয়ে দাও। তারা আমার কথা থেকে বিরত হলো না। তারা আবার আমার পাশ দিয়ে গেল। আমি বললাম: তারা কাঠের মতো (অশালীন শব্দ ব্যবহার করলাম), তবে আমি কটু কথা বলব না। তারা আর্তনাদ করতে করতে চলে গেল এবং বলতে লাগল: যদি আমাদের পুরুষদের মধ্যে কেউ এখানে থাকত!
আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিচে নামার সময় তাদের সামনে পড়লেন। তিনি (রাসূল) বললেন: ’তোমাদের কী হয়েছে?’ তারা বলল: কাবা ও তার পর্দার মাঝে এক ’সাবিয়ী’ আছে। তিনি বললেন: ’সে তোমাদের কী বলেছে?’ তারা বলল: সে আমাদের এমন কথা বলেছে যা মুখ ভরে যায়।
আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এলেন এবং হাজরে আসওয়াদ চুম্বন করলেন, অতঃপর তিনি এবং তাঁর সঙ্গী তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি সালাত শেষ করলেন, আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমিই প্রথম ব্যক্তি যে তাঁকে ইসলামের অভিবাদন জানাল। আমি বললাম: আসসালামু আলাইকা ইয়া রাসূলাল্লাহ! তিনি বললেন: ’ওয়া আলাইকা ওয়া রাহমাতুল্লাহ।’ অতঃপর তিনি বললেন: ’তুমি কে?’ আমি বললাম: গিফার গোত্রের লোক। তিনি তাঁর হাত দিয়ে ইশারা করলেন এবং তাঁর আঙুলগুলো কপালে রাখলেন। আমি মনে মনে বললাম: আমি গিফার গোত্রের লোক বলায় কি তিনি অপছন্দ করলেন? আমি তাঁর হাত ধরতে গেলাম, কিন্তু তাঁর সঙ্গী (আবু বকর) আমাকে সরিয়ে দিলেন—তিনি আমার চেয়ে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বেশি জানতেন।
অতঃপর তিনি (রাসূল) মাথা উঁচু করলেন এবং বললেন: ’তুমি কতদিন ধরে এখানে আছো?’ আমি বললাম: আমি এখানে ত্রিশ দিন-রাত ধরে আছি। তিনি বললেন: ’কে তোমাকে খাবার দিত?’ আমি বললাম: যমযমের পানি ছাড়া আমার কোনো খাবার ছিল না। আমি এত মোটা হয়ে গিয়েছিলাম যে আমার পেটের ভাঁজগুলো ভেঙে গিয়েছিল, তবুও আমার কলিজায় ক্ষুধার কোনো দুর্বলতা অনুভব করিনি।
(তখন রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:) **’নিঃসন্দেহে তা বরকতময়; নিঃসন্দেহে তা খাদ্যের পুষ্টিদানকারী (طعام طعم)।’**
তখন আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আজ রাতে কি আমাকে তাঁর খাবারের অনুমতি দেবেন? এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চললেন এবং আমিও তাঁদের সাথে চললাম। আবু বকর একটি দরজা খুললেন এবং আমাদের জন্য তায়েফের কিশমিশ থেকে কিছু নিলেন। এটাই ছিল আমার সেখানে খাওয়া প্রথম খাবার।
অতঃপর আমি যত দিন থাকার ছিলাম, থাকলাম। এরপর আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম। তিনি বললেন: ’আমাকে খেজুরযুক্ত এক ভূমিতে যাওয়ার নির্দেশনা দেওয়া হয়েছে, আমার মনে হয় তা ইয়াসরিব (মদীনা); তুমি কি আমার পক্ষ থেকে তোমার গোত্রের কাছে (ইসলামের বার্তা) পৌঁছাবে? হয়তো আল্লাহ তোমার মাধ্যমে এবং তাদের মধ্যে তোমার প্রতিদানের মাধ্যমে তাদের উপকৃত করবেন।’
আমি উনাইসের কাছে এলাম। সে বলল: কী করলে? আমি বললাম: আমি ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং বিশ্বাস স্থাপন করেছি। সে বলল: তোমার ধর্ম থেকে আমার আগ্রহ কম নয়; আমিও ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং বিশ্বাস স্থাপন করেছি। এরপর আমরা আমাদের মায়ের কাছে এলাম। তিনি বললেন: তোমাদের ধর্ম থেকে আমার আগ্রহ কম নয়; আমিও ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং বিশ্বাস স্থাপন করেছি।
আমরা রওনা হয়ে আমাদের গোত্র গিফারের কাছে এলাম। তাদের অর্ধেক লোক ইসলাম গ্রহণ করল। তাদের নেতা উমাইমা ইবনু রহদা আল-গিফারী তাদের ইমামতি করতেন। আর অর্ধেক লোক বলল: যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করবেন, তখন আমরা ইসলাম গ্রহণ করব। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় আগমন করলে অবশিষ্ট অর্ধেকও ইসলাম গ্রহণ করল।
এরপর আসলাম গোত্রের লোকেরা এসে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আমাদের ভাই, যাদের ওপর তাঁরা ইসলাম গ্রহণ করেছেন, আমরাও সেভাবে ইসলাম গ্রহণ করব! অতঃপর তারা ইসলাম গ্রহণ করল। তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: **’গিফার, আল্লাহ যেন তাদের ক্ষমা করেন (غفر الله لها); আর আসলাম, আল্লাহ যেন তাদের নিরাপদ রাখেন (سالمها الله)।’**
(ইমামগণ থেকে ভিন্ন ভিন্ন সনদে এই হাদিসটি বর্ণিত হয়েছে, যেখানে যমযমের পানির গুণাগুণ সম্পর্কে বলা হয়েছে: **"নিঃসন্দেহে তা বরকতময়; নিঃসন্দেহে তা খাদ্যের পুষ্টিদানকারী।"** কিছু বর্ণনায় আরও আছে: **"এবং রোগের আরোগ্যদাতা।"**)
3586 - (إن المؤمن لَيُنْضِي شياطينه؛ كما يُنضِي أحدكم بَعيرَه في السفر) .
أخرجه أحمد (2/380) قال: حدثنا قتيبة بن سعيد قال: حدثنا ابن لهيعة عن موسى بن وردان عن أبي هريرة مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد حسن؛ لأن ابن لهيعة صحيح الحديث من رواية قتيبة؛ كما قدمت أكثر من مرة.
وموسى بن وردان صدوق؛ كما قال الذهبي وغيره، ومرت له أحاديث، فانظر مثلأ المجلد الأول رقم (225 و 467) .
والحديث عزاه السيوطي في `الجامع ` للحكيم أيضاً، وابن أبي الدنيا في `مكايد الشيطان `، فقال المناوي:
`قال الهيثمي - تبعاً لشيخه الحافظ العراقي - : فيه ابن لهيعة. وأقول: فيه أيضاً سعيد بن شرحبيل، أورده الذهبي في `الضعفاء`، وعده من المجاهيل. وفي `الميزان `: قال أبو حاتم: مجهول. وموسى بن وردان ضعفه ابن معين، ووثقه أبو داود `!
قلت: ابن شرحبيل هذا ليس له ذكر في إسناد أحمد، خلافاً لما أوهمه كلام المناوي.
وموسى بن وردان؛ الراجح فيه أنه وسط حسن الحديث كما تقدم، وإلى ذلك يشير قول الذهبي المذكور. ومثله - أو نحوه - قول الحافظ في `التقريب `: `صدوق ربما أخطأ`.
ثم رأيت الشيخ أحمد الغماري قد حمل في كتابه `المداوي ` على المناوي حملة
شعواء لوهمه المذكور، وأطال النفس في ذلك في صفحتين (2/414 ~ 415) دون فائدة تذكر بالنسبة لمتن الحديث؛ فإنه سكت عن ابن لهيعة وإعلال العراقي ثم الهيثمي الحديث به، فلا يدري القارئ بعد قراءته الصفحتين ما موقفه من الحديث ورواية ابن لهيعة؟ هل هو عنده ضعيف مطلقاً لسوء حفظه؟! أم يفرق بين ما يرويه جمهور الرواة عنه فهو على الضعف، وما يرويه العبادلة ونحوهم ممن سمع منه قديماً مثل قتيبة بن سعيد الراوي عنه هنا، كما عليه المحققون من الحفاظ؟ هذا هو المهم في نقد الرجال، سواءً كانوا من رواة الحديث أو من المخرجين له. لكن الشيخ الغماري - عفا الله عنه - قد شغف قلبه بنقد المناوي وتتبع زلاته، وشغله ذلك عن الغاية من نقد الرجال، كما ذكرت في الحديث الذي قبل هذا بحديث، إلى سلاطة باللسان ومبالغة في الكلام؛ يذكرني بمن قال في ابن حزم رحمه الله: (السان ابن حزم وسيف الحجاج قرينان) . ولا أدل على ذلك من قوله في تضاعيف حملته المذكورة.
`فإن أكثررجال `الصحيح ` بل كلهم متكلّم فيهم `! *
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় মুমিন ব্যক্তি তার শয়তানদেরকে ক্লান্ত-শ্রান্ত করে দেয়, যেমন তোমাদের কেউ সফরের সময় তার উটকে ক্লান্ত করে দেয়।