হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (381)


381 - ` نهى عن المتعة، وقال: ألا إنها حرام من يومكم هذا إلى يوم القيامة، ومن
كان أعطى شيئا فلا يأخذه `.
أخرجه مسلم (4 / 134) من طريق معقل عن ابن أبي عبلة عن عمر بن عبد العزيز
قال: حدثنا الربيع بن سبرة عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ...
فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات، ليس فيهم من ينبغي النظر فيه سوى معقل هذا
وهو ابن عبيد الله الجزري.
قال الذهبي فيه: ` صدوق ضعفه ابن معين `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق يخطىء `.
قلت: فمثله يكون حديثه في مرتبة الحسن لذاته، أو لغيره على الأقل، ولم
يتفرد بهذا الحديث، فقد أخرجه مسلم وغيره من طرق عن الربيع بن سبرة،
لكن ليس
فيها ذكر تأييد التحريم إلى يوم القيامة، إلا في هذه وفي طريق أخرى سأذكرها
إن شاء الله، ومن أجل هذه الزيادة أوردت الحديث في هذه ` السلسلة ` وإلا
فأحاديث النهي عن المتعة أشهر من أن تخرج هنا، وإن أنكرتها طائفة من الناس،
اتباعا لأهوائهم، ولا ينفع البحث معهم إلا بعد وضع منهج علمي لنقد أحاديث
الفريقين على ضوئه، وهيهات هيهات.
والطريق التي أشرت إليها يرويها عبد العزيز بن عمر (بن عبد العزيز) :
حدثني الربيع بن سبرة به بلفظ:
` أنه كان مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا أيها الناس إني قد كنت
أذنت لكم في الاستمتاع من النساء، وإن الله قد حرم ذلك إلى يوم القيامة، فمن
كان عنده منهن شيء فليخل سبيله، ولا تأخذوا مما آتيتموهن شيئا `.
أخرجه مسلم (4 / 132) والدارمي (2 / 140) وابن ماجه (1962) والطحاوي
(2 / 14) وابن أبي شيبة في ` المصنف ` (7 / 44 / 1) وابن الجارود (699)
والبيهقي (7 / 203) وأحمد (3 /




সাবরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ’হে লোক সকল! আমি তোমাদেরকে নারীদের সাথে মুত’আ (সাময়িক বিবাহ) করার অনুমতি দিয়েছিলাম। কিন্তু নিশ্চয় আল্লাহ কিয়ামত দিবস পর্যন্ত তা হারাম (নিষিদ্ধ) করে দিয়েছেন। সুতরাং, তোমাদের মধ্যে যার কাছে তাদের কেউ (মুত’আ চুক্তিতে) থাকে, সে যেন তাকে মুক্ত করে দেয় (ছেড়ে দেয়)। আর তোমরা তাদেরকে যা কিছু প্রদান করেছ, তার কিছুই যেন ফিরিয়ে না নাও।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (382)


382 - ` إن مطعم ابن آدم قد ضرب للدنيا مثلا، فانظر ما يخرج من ابن آدم وإن قزحه
وملحه، قد علم إلى ما يصير `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (2489) والطبراني في ` الكبير ` (1 / 27 / 2)
والبيهقي في ` الزهد الكبير ` (ق 47 / 1) وعبد الله بن أحمد في ` زوائد
المسند ` (5 / 136) عن أبي حذيفة موسى بن مسعود حدثنا سفيان عن يونس بن عبيد
عن الحسن عن عتي عن أبي بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره.
وأخرجه ابن أبي الدنيا في ` الجوع ` (8 /




উবাই ইবনে কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই আদম সন্তানের খাদ্যকে এই দুনিয়ার জন্য একটি উপমা হিসেবে স্থির করা হয়েছে। অতএব, তুমি লক্ষ্য করো আদম সন্তান থেকে কী বের হয়—যদিও সে তাতে মসলা ও লবণ যোগ করে (অর্থাৎ, যতই সুস্বাদু করুক না কেন)—তা কিসে পরিণত হবে, তা কিন্তু জানা আছে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (383)


383 - ` من السنة في الصلاة أن تضع أليتيك على عقبيك بين السجدتين `.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (3 / 106 / 1) : حدثنا أحمد بن النضر
العسكري حدثني عبد الرحمن بن عبيد الله الحلبي أنبأنا سفيان بن عيينة عن
عبد الكريم عن طاووس عن ابن عباس رضي الله عنه قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح إن كان عبد الكريم هذا هو ابن مالك الجزري الحراني
وأما إن كان هو ابن أبي المخارق المعلم البصري فهو ضعيف، وليس بين يدي ما
يرجح أحد الاحتمالين على الآخر، فإن كلا منهما روى عن طاووس، وروى عن كل
منهما ابن عيينة.
بيد أن الحديث صحيح على كل حال، فقد رواه ابن عيينة أيضا عن إبراهيم ابن ميسرة
عن طاووس به نحوه.
أخرجه الطبراني: حدثنا إسحاق عن عبد الرزاق عن ابن عيينة.
قلت: وهذا إسناد جيد.
وأخرج (3 / 105 / 2) بهذا الإسناد عن ابن جريج: أخبرني أبو الزبير أنه سمع
طاووسا يقول:
` قلت لابن عباس في الإقعاء على القدمين؟ قال: هي السنة، فقلت: إنا لنراه
جفاء بالرجل! قال: هي سنة نبيك `.
وقد أخرجه مسلم وأبو عوانة في ` صحيحيهما ` والبيهقي (2 / 119) من طريق
أخرى عن ابن جريج به.
وهذا سند صحيح، صرح فيه كل من ابن جريج وأبي الزبير بالتحديث.
وله طريق أخرى عن ابن عباس يرويه ابن إسحاق قال: حدثني عن انتصاب رسول الله
صلى الله عليه وسلم على عقبيه وصدور قدميه بين السجدتين إذا صلى - عبد الله
ابن أبي نجيح المكي عن مجاهد بن جبر أبي الحجاج قال: سمعت عبد الله بن عباس
يذكره قال: فقلت له: يا أبا العباس! والله إن كنا لنعد هذا جفاء ممن صنعه!
قال: فقال: إنها سنة `.
أخرجه البيهقي.
قلت: وإسناده حسن صرح فيه ابن إسحاق أيضا بالتحديث.
ثم روى بإسناد آخر صحيح عن أبي زهير معاوية بن حديج قال:
` رأيت طاووسا يقعي، فقلت: رأيتك تقعي! قال: ما رأيتني أقعي؟ ! ولكنها
الصلاة، رأيت العبادلة الثلاثة يفعلون ذلك عبد الله بن عباس وعبد الله بن عمر
وعبد الله بن الزبير، يفعلونه. قال أبو زهير: وقد رأيته يقعي `.
قلت: ففي الحديث وهذه الآثار دليل على شرعية الإقعاء المذكور، وأنه سنة
يتعبد بها وليست للعذر كما زعم بعض المتعصبة، وكيف يكون كذلك وهؤلاء
العبادلة اتفقوا على الإتيان به في صلاتهم، وتبعهم طاووس التابعي الفقيه
الجليل وقال الإمام أحمد في ` مسائل المروزي ` (19) :
` وأهل مكة يفعلون ذلك `.
فكفى بهم سلفا لمن أراد أن يعمل بهذه السنة ويحييها.
ولا منافاة بينها، وبين السنة الأخرى، وهي الافتراش، بل كل سنة، فيفعل
تارة هذه، وتارة هذه، اقتداء به صلى الله عليه وسلم، وحتى لا يضيع عليه
شيء من هديه عليه الصلاة والسلام.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

১. সালাতে দুই সিজদার মাঝখানে আপনার নিতম্ব (বসার স্থান) আপনার গোড়ালির ওপর রাখা সুন্নাহ।

২. (তাউস থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন): আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পায়ের পাতার ওপর ভর করে বসা (*ইক’আ’*) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, “এটিই সুন্নাহ।” আমি বললাম, “আমরা তো এটিকে পুরুষের জন্য কাঠিন্য বা রূঢ়তা মনে করি!” তিনি বললেন, “এটি তোমার নবীর সুন্নাহ।”

৩. (তাউস আরো বলেন): আমি তিন আব্দুল্লাহকে—আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস, আব্দুল্লাহ ইবনে উমার ও আব্দুল্লাহ ইবনে যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে—সালাতে এই (গোড়ালির উপর বসার) পদ্ধতিটি অনুসরণ করতে দেখেছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (384)


384 - ` من لبس الحرير في الدنيا لم يلبسه في الآخرة ومن شرب الخمر في الدنيا لم
يشربه في الآخرة ومن شرب في آنية الذهب والفضة في الدنيا لم يشرب بها في
الآخرة ثم قال: لباس أهل الجنة وشراب أهل الجنة وآنية أهل الجنة `.
أخرجه الحاكم (4 / 141) وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (15 / 202 / 2) من
طريق يحيى بن حمزة حدثني زيد بن واقد أن خالد بن عبد الله بن حسين حدثه قال:
حدثني أبو هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:
فذكره. وقال: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: ورجاله ثقات رجال البخاري غير خالد بن عبد الله بن حسين وهو الأموي
الدمشقي مولى عثمان بن عفان.
قال ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 37) :
` عداده في أهل الشام، يروي عن أبي هريرة. روى عنه زيد بن واقد، وإسماعيل
بن عبيد الله بن أبي المهاجر `.
قلت: وزاد ابن أبي حاتم (1 / 2 / 339) في الرواة عنه: ` محمد بن عبد الله
الشعيثي ` وكذا في ` التهذيب `.
وقال: ` قال البخاري: سمع أبا هريرة. وقال إسحاق بن سيار النصيبي: أظنه
لم يسمع من أبي هريرة. وذكره ابن حبان في ` الثقات `.
قلت: وقال الآجري عن أبي داود: كان أعقل أهل زمانه `.
قلت: وهذا الإسناد يشهد لقول البخاري أنه سمع أبا هريرة، ويجعل ظن النصيبي
وهما.
واعلم أن الأحاديث في تحريم لبس الحرير، وشرب الخمر، والشرب في أواني
الذهب والفضة، هي أكثر من أن تحصر، وإنما أحببت أن أخص هذا بالذكر لأنه جمع
الكلام على هذه الأمور الثلاثة، وساقها مساقا واحدا، ثم ختمها بقوله ` لباس
أهل الجنة ... `، الذي يظهر أنه خرج مخرج التعليل، يعني أن الله تعالى حرم
لباس الحرير (على الرجال خاصة) لأنه لباسهم في الجنة كما قال تعالى:
(ولباسهم فيها حرير) ، وحرم الخمر على الرجال والنساء لأنه شرابهم في
الجنة (مثل الجنة التي وعد المتقون فيها أنهار من ماء غير آسن، وأنهار من
لبن لم يتغير طعمه، وأنهار من خمر لذة للشاربين) ، وحرم الشرب في آنية
الذهب والفضة على الرجال والنساء أيضا لأنها آنيتهم (ادخلوا الجنة أنتم
وأزواجكم تحبرون. يطاف عليهم بصحاف من ذهب وأكواب) . فمن استعجل التمتع
بذلك غير مبال
ولا تائب عوقب بحرمانها منها في الآخرة جزاء وفاقا.
وما أحسن ما روى الحاكم (2 / 455) عن صفوان بن عبد الله بن صفوان قال:
` استأذن سعد على ابن عامر، وتحته مرافق من حرير، فأمر بها فرفعت، فدخل
عليه، وعليه مطرف خز، فقال له: اسأذنت علي وتحتي مرافق من حرير، فأمرت
بها فرفعت، فقال له: نعم الرجل أنت يا ابن عامر إن لم تكن ممن قال الله
عز وجل (أذهبتم طيباتكم في حياتكم الدنيا) ، والله لأن اضطجع على جمر الغضا
أحب إلي من أن أضطجع عليها `.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي. وأقره المنذري!!
وأقول: إنما هو على شرط مسلم وحده، لأن صفوان بن عبد الله، لم يخرج له
البخاري في ` الصحيح `، وإنما روى له في ` الأدب المفرد `.
واعلم أن الحرير المحرم إنما هو الحرير الحيواني المعروف في بلاد الشام
بالحرير البلدي وأما الحرير النباتي المصنوع من ألياف بعض النباتات، فليس
من التحريم في شيء.
وأما الخمر فهي محرمة بجميع أنواعها وأجناسها، ما اتخذ من العنب أو الذرة
أو التمر أو غير ذلك، فكله حرام، لا فرق في شيء منه بين قليله وكثيره،
لأن العلة الخمرية (السكر) وليس المادة التي يحصل بها (السكر) كما قال
صلى الله عليه وسلم:
` كل مسكر خمر، وكل خمر حرام `. رواه مسلم.
وقال: ` ما أسكر كثيره فقليله حرام `.
ولا تغتر بما جاء في بعض الكتب الفقهية عن بعض الأئمة من إباحة جنس منها
بتفاصيل تذكر فيها، فإنما هي زلة من عالم، كان الأحرى أن تدفن ولا تذكر
لولا العصبية الحمقاء.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি দুনিয়াতে রেশম (পোশাক) পরিধান করবে, সে আখেরাতে তা পরিধান করবে না। আর যে ব্যক্তি দুনিয়াতে মদ পান করবে, সে আখেরাতে তা পান করবে না। আর যে ব্যক্তি দুনিয়াতে সোনা ও রুপার পাত্রে পান করবে, সে আখেরাতে তাতে পান করবে না। এরপর তিনি (নবী ﷺ) বললেন: (এগুলোই হলো) জান্নাতবাসীদের পোশাক, জান্নাতবাসীদের পানীয় এবং জান্নাতবাসীদের পাত্র।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (385)


385 - ` نهى عن النفخ في الشراب، فقال له رجل: يا رسول الله إني لا أروى من نفسي
واحد، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم: فأبن القدح عن فيك، ثم تنفس
قال: فإني أرى القذاة فيه، قال: فأهرقها `.
أخرجه مالك (2 / 925 / 12) وعنه الترمذي (1 / 345) وابن حبان في
` صحيحه ` (1367) والحاكم (4 / 139) وأحمد (3 / 32) كلهم عن مالك عن
أيوب بن حبيب مولى سعد بن أبي وقاص عن أبي المثنى الجهني قال:
` كنت عند مروان بن الحكم، فدخل عليه أبو سعيد الخدري، فقال له مروان
بن الحكم أسمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه نهى عن النفخ في الشرب؟
فقال له أبو سعيد: نعم، فقال له رجل: يا رسول الله ... ` الحديث.
وقال الترمذي: ` هذا حديث حسن صحيح `.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
قلت: وتابعه فليح عن أيوب بن حبيب به.
أخرجه أحمد (3 /




আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) পানীয়ের মধ্যে ফুঁ দিতে নিষেধ করেছেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি এক নিঃশ্বাসে (পান করে) তৃপ্ত হই না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: তবে পাত্রটি তোমার মুখ থেকে সরিয়ে নাও, অতঃপর শ্বাস নাও। লোকটি বলল: যদি আমি এতে কোনো ময়লা বা আবর্জনা দেখতে পাই (তখন কী করব)? তিনি (নবী ﷺ) বললেন: তবে তা ফেলে দাও।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (386)


386 - ` إذا شرب أحدكم فلا يتنفس في الإناء فإذا أراد أن يعود فلينح الإناء ثم ليعد
إن كان يريد `.
أخرجه ابن ماجه (3427) والحاكم (4 / 139) من طريق الحارث بن أبي ذباب عن
عمه عنه.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي.
وسكت عنه الحافظ في ` الفتح ` (10 / 81) وإسناده حسن عندي، فإن الحارث
هذا هو ابن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد بن أبي ذباب، ليس به بأس كما قال
أبو زرعة.
وعمه ذكره ابن منده في الصحابة وسماه عياضا كما قال الحافظ في ` التهذيب `.
وقال البوصيري في ` الزوائد ` (ق 206 / 2) :
` هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، وعم الحارث اسمه عبد الله بن عبد الرحمن ابن
الحارث `.
وقال الحافظ في ` الفتح `:
` واستدل به لمالك على جواز الشرب بنفس واحد، وأخرج ابن أبي شيبة الجواز عن
سعيد بن المسيب وطائفة، وقال عمر بن عبد العزيز:
` إنما نهي عن التنفس داخل الإناء، فأما من لم يتنفس، فإن شاء فليشرب بنفس
واحد `.
قلت: وهو تفصيل حسن، وقد ورد الأمر بالشرب بنفس واحد من حديث أبي قتادة
مرفوعا. أخرجه الحاكم، وهو محمول على التفصيل المذكور `.
قلت: لم أر الحديث المشار إليه عند الحاكم من حديث أبي قتادة، وإنما هو عنده
من حديث أبي هريرة، وهو الذي سقت لفظه آنفا من رواية ابن ماجه، ولفظه عند
الحاكم:
` لا يتنفس أحدكم في الإناء إذا كان يشرب منه، ولكن إذا أراد أن يتنفس
فليؤخره عنه ثم يتنفس `.
فأنا أظن أنه هو الذي أراده الحافظ، لكنه وهم في عزوه لحديث أبي قتادة.
والله أعلم.
ثم إن ما تقدم من جواز الشرب بنفس واحد، لا ينافي أن السنة أن يشرب بثلاثة
أنفاس، فكلاهما جائز لكن الثاني أفضل لحديث أنس بن مالك رضي الله عنه قال:
` كان إذا شرب تنفس ثلاثا، وقال: هو أهنأ وأمرأ وأبرأ `.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন তোমাদের কেউ পান করে, তখন সে যেন পাত্রের ভেতরে নিঃশ্বাস না ফেলে। আর সে যদি (পান করার সময়) নিঃশ্বাস নিতে চায়, তবে সে যেন পাত্রটিকে সরিয়ে নেয়, অতঃপর সে চাইলে পুনরায় পান করতে পারে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (387)


387 - ` كان إذا شرب تنفس ثلاثا، وقال: هو أهنأ وأمرأ وأبرأ `.
أخرجه مسلم وأبو داود (3727) والنسائي في ` الكبرى ` (ق 65 / 2)
والترمذي (1 / 344) وحسنه، وأحمد (3 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ ﷺ যখন পান করতেন, তখন তিনি (পাত্র থেকে মুখ সরিয়ে) তিনবার নিঃশ্বাস নিতেন। আর তিনি বলতেন: "এভাবে পান করা অধিক তৃপ্তিদায়ক, সহজে হজম হয় এবং অধিক রোগমুক্তকারী (বা পিপাসা নিবারণকারী)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (388)


388 - ` نهى عن الشرب من ثلمة القدح، وأن ينفخ في الشراب `.
أخرجه أبو داود (3722) وابن حبان (1366) وأحمد (3 / 80) وكذا ابنه
عبد الله من طريق قرة بن عبد الرحمن عن ابن شهاب عن عبيد الله بن عبد الله بن
عتبة عن أبي سعيد الخدري أنه قال: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم رجال مسلم لولا ما في قرة بن عبد الرحمن
من الكلام.
وقال الحافظ:
` اسمه يحيى، صدوق، وله مناكير `.
قلت: لكن لحديثه شواهد تدل على صحته، وأنه قد حفظه.
أما الشطر الثاني منه، فله شواهد كثيرة تقدم ذكر أحدها في الحديث الذي قبله.
وأما الشطر الأول، فيشهد له حديث أبي هريرة قال:
` نهى أن يشرب من كسر القدح `.
قال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 78) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله ثقات رجال الصحيح `.
وحديث سهل بن سعد:
` أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن ينفخ في الشراب وأن يشرب من ثلمة
القدح `. ` رواه الطبراني، وفيه عبد المهيمن بن عباس بن سهل وهو ضعيف `.
وعن ابن عباس وابن عمر قالا:
` يكره أن يشرب من ثلمة القدح، وأذن القدح `.
` رواه الطبراني، ورجاله رجال الصحيح `.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পাত্রের ভাঙা স্থান বা ফাটা মুখ দিয়ে পান করতে এবং পানীয়ের মধ্যে ফুঁ দিতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (389)


389 - ` إياكم ومحقرات الذنوب كقوم نزلوا في بطن واد فجاء ذا بعود وجاء ذا بعود حتى
أنضجوا خبزتهم وإن محقرات الذنوب متى يؤخذ بها صاحبها تهلكه `.
أخرجه أحمد (5 / 331) حدثنا أنس بن عياض حدثني أبو حازم لا أعلمه إلا عن
سهل بن سعد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ومن هذا الوجه أخرجه الروياني أيضا في ` مسنده ` (29 /




সহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

তোমরা তুচ্ছ জ্ঞান করা গুনাহ (মুহাক্কারাত আয-যুনুব) থেকে নিজেদেরকে বাঁচিয়ে রাখবে। এর দৃষ্টান্ত হলো সেই কওমের মতো, যারা কোনো উপত্যকার গভীরে অবতরণ করল। অতঃপর একজন একটি করে ছোট কাঠ নিয়ে আসল এবং আরেকজনও একটি করে ছোট কাঠ নিয়ে আসল, শেষ পর্যন্ত তারা তাদের রুটি (খাবার) তৈরি করে ফেলল। আর নিশ্চয়ই এই তুচ্ছ জ্ঞান করা গুনাহসমূহ যখনই এর কর্তাকে পাকড়াও করে, তখনই তা তাকে ধ্বংস করে দেয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (390)


390 - ` كان إذا أراد أن ينام وهو جنب توضأ، وإذا أراد أن يأكل غسل يديه `.
أخرجه النسائي (1 / 50) : أخبرنا محمد بن عبيد بن محمد قال: حدثنا عبد الله
بن المبارك عن يونس عن الزهري عن أبي سلمة عن عائشة رضي الله عنها:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ... `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير محمد بن عبيد وهو
أبو جعفر أو أبو يعلى النحاس الكوفي وهو صدوق.
وتابعه سويد بن نصر قال أنبأنا عبد الله عن يونس به.
أخرجه النسائي وفي ` الكبرى ` أيضا (ق 65 / 2) .
وسويد بن نصر ثقة. وتابعه علي بن إسحاق قال: أنبأنا عبد الله به. وتابعه
محمد بن بكر قال: أنبأنا يونس به. أخرجه أحمد (6 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন জুনুবী (গোসল ফরয) অবস্থায় ঘুমাতে ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি (ঘুমের জন্য) ওযু করে নিতেন। আর যখন তিনি খেতে ইচ্ছা করতেন, তখন তাঁর উভয় হাত ধুয়ে নিতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (391)


391 - ` إذا أكل أحدكم الطعام فلا يمسح يده حتى يلعقها أو يلعقها ولا يرفع صحفة حتى
يلعقها أو يلعقها، فإن آخر الطعام فيه بركة `.
أخرجه النسائي في ` السنن الكبرى ` (ق 60 /




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

“যখন তোমাদের কেউ খাবার খায়, তখন সে যেন নিজের হাত না মোছে, যতক্ষণ না সে নিজে তা চেটে নেয় অথবা অন্য কাউকে দিয়ে তা চেটে নেয়। আর সে যেন পাত্রটিও (থালা/প্লেট) তুলে না নেয়, যতক্ষণ না সে নিজে তা চেটে নেয় অথবা অন্য কাউকে দিয়ে তা চেটে নেয়। কারণ, খাবারের শেষ অংশে বরকত (কল্যাণ) থাকে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (392)


392 - ` إنه أعظم للبركة. يعني الطعام الذي ذهب فوره `.
أخرجه الدارمي (2 / 100) وابن حبان (1344) والحاكم (4 / 118) وابن أبي
الدنيا في ` الجوع ` (14 / 2) والبيهقي (7 / 280) عن قرة بن عبد الرحمن عن
ابن شهاب عن عروة بن الزبير عن أسماء بنت أبي بكر.
أنها كانت إذا ثردت غطته شيئا حتى يذهب فوره ثم تقول: إنى سمعت رسول الله صلى
الله عليه وسلم يقول ... فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي!
قلت: وذلك من أوهامهما فإن قرة بن عبد الرحمن لم يحتج به مسلم، وإنما أخرج
له في الشواهد كما صرح بذلك الذهبي نفسه في ` الميزان `، ثم هو في نفسه ضعيف
من قبل حفظه، وقد مضى ذكر شيء من حاله في أول الكتاب.
نعم إنه لم يتفرد به، فقد تابعه عقيل بن خالد عن ابن شهاب به.
أخرجه أحمد (6 / 350) : حدثنا قتيبة بن سعيد قال: حدثنا ابن لهيعة عن عقيل،
وحدثنا عتاب قال: حدثنا عبد الله، قال: أنبأنا ابن لهيعة، قال: حدثني
عقيل ابن خالد عن ابن شهاب به.
قلت: وهذا إسناد صحيح من طريق عبد الله وهو ابن المبارك، فإن ابن لهيعة
وإن كان معروفا بسوء الحفظ، لكن المحققين من العلماء على أن حديثه صحيح إذا
كان من رواية العبادلة عنه منهم عبد الله بن المبارك. وقد رواه عنه كما ترى.
وعتاب هو ابن زياد المروزي، قال ابن أبي حاتم (3 / 2 / 13) عن أبيه:
` ثقة `.
ولم يورده الحافظ في ` التعجيل ` مع أنه على شرطه!
وقد صح عن أبي هريرة رضي الله عنه أنه قال:
` لا يؤكل طعام حتى يذهب بخاره `.
أخرجه البيهقي بإسناد صحيح كما بينته في ` الإرواء ` (2038) .
وأخرج الحاكم من طريق محمد بن عبيد الله بن العرزمي عن عطاء عن جابر
مرفوعا بلفظ:
` أبردوا الطعام الحار، فإن الطعام الحار غير ذي بركة `.
والعرزمي هذا متروك شديد الضعف، لكن ذكر له السيوطي في ` الجامع ` شواهد عدة
في بعضها نظر، منها حديث
أسماء هذا، ولا يخفى على اللبيب أن قوله فيه
` أعظم للبركة ` لا يساوي قوله ` غير ذي بركة ` فإن الأول يدل بمفهومه أنه دونه
في البركة، فهذا شيء، وقوله ` غير ذي بركة ` فليحقق النظر في الشواهد الأخرى
من حيث إسنادها ومن جهة شهادتها، فإن من تلك الشواهد ما عزاه لـ ` الحلية `
من حديث أنس. ولم أره فيه بهذا اللفظ. ثم رأيت المناوي ذكر أنه يعني حديث
أنس قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم بقصعة تفور، فرفع يده منها وقال:
إن الله لم يطعمنا نارا، ثم ذكره.
ولم يتكلم عن إسناده بشيء ولا رأيته في ` البغية في ترتيب أحاديث الحلية `.




আসমা বিনতে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি যখন ’সারিদ’ (গোশত ও ঝোলে ভেজানো রুটির খাবার) প্রস্তুত করতেন, তখন তা কোনো কিছু দিয়ে ঢেকে রাখতেন যতক্ষণ না তার বাষ্প বা প্রচণ্ড গরম কমে যেত। এরপর তিনি বলতেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই তা (অর্থাৎ ঠান্ডা হওয়া বা যার বাষ্প চলে গেছে) বরকতের দিক থেকে অনেক বেশি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (393)


393 - ` كلوا من جوانبها، ودعوا ذروتها يبارك لكم فيها، ثم قال: خذوا فكلوا،
فوالذي نفس محمد بيده ليفتحن عليكم أرض فارس والروم، حتى يكثر الطعام فلا
يذكر اسم الله عليه `.
صحيح، رواه أبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (98 / 1) وعنه ابن عساكر (8 /
532 / 2) والبيهقي (7 / 283) والضياء في ` المختارة ` (112 / 1) عن عمرو
بن عثمان حدثنا أبي حدثنا محمد بن عبد الرحمن بن عرق حدثنا عبد الله بن بسر
قال:
أهديت للنبي صلى الله عليه وسلم شاة والطعام يومئذ قليل، فقال لأهله: اطبخوا
هذه الشاة وانظروا إلى هذا الدقيق فاخبزوه واطبخوا واثردوا عليه، قال:
وكان للنبي صلى الله عليه وسلم قصعة يقال لها الغراء يحملها أربعة رجال، فلما
أصبح وسبحوا الضحى أتى بتلك القصعة والتقوا عليها، فإذا كثر الناس جثا رسول
الله صلى الله عليه وسلم، فقال: أعرابي ما هذه الجلسة؟ فقال النبي صلى الله
عليه وسلم: إن الله جعلني عبدا كريما ولم يجعلني جبارا عنيدا ثم قال رسول
الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وأخرجه أبو داود (3773) وابن ماجه مفرقا في موضعين (3263، 3275) دون
قوله: ` ثم قال ... `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات وعثمان هو ابن سعيد بن كثير الحمصي.
والحديث علم من أعلام نبوته صلى الله عليه وسلم فقد فتح سلفنا أرض فارس
والروم وورثنا ذلك منهم، وطغى الكثيرون منا فأعرضوا عن الشريعة وآدابها
التي منها ابتداء الطعام بـ ` بسم الله ` فنسوا هذا حتى لا تكاد تجد فيهم
ذاكرا!




আব্দুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট একটি বকরী হাদিয়া হিসেবে এলো, আর সেদিন খাদ্যদ্রব্য ছিল অপ্রতুল। তিনি তাঁর পরিবারের লোকদের বললেন: তোমরা এই বকরীটি রান্না করো এবং এই আটা/ময়দার দিকে লক্ষ্য করো, তা দিয়ে রুটি তৈরি করো, রান্না করো এবং সেটির ওপর (ঝোল দিয়ে) সরিদ (এক ধরনের খাদ্য) তৈরি করো।

(বর্ণনাকারী) বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একটি বড় পাত্র ছিল, যাকে ‘আল-গাররা’ বলা হতো এবং এটি চারজন লোক বহন করত। যখন সকাল হলো এবং সকলে সালাতুত দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করলেন, তখন সেই পাত্রটি আনা হলো এবং সকলে এর চারপাশ ঘিরে বসলেন।

যখন লোকজনের ভিড় বাড়ল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাঁটু গেড়ে বসলেন (জানু পেতে বসলেন)। একজন বেদুঈন (আরব) জিজ্ঞেস করল: এ কেমন বসা? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আমাকে সম্মানিত বান্দা বানিয়েছেন, আমাকে অহংকারী বা অত্যাচারী বানাননি।

অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তোমরা পাত্রের কিনারা থেকে খাও এবং মাঝখানটা ছেড়ে দাও; এতে তোমাদের জন্য বরকত দেওয়া হবে।”

এরপর তিনি বললেন: “নাও, খাও! যার হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর কসম! শীঘ্রই তোমাদের জন্য পারস্য ও রোমের দেশসমূহ জয় করা হবে, এমনকি খাদ্যদ্রব্যের প্রাচুর্য ঘটবে, ফলে (খাওয়ার শুরুতে) তার ওপর আল্লাহর নাম (বিসমিল্লাহ) আর স্মরণ করা হবে না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (394)


394 - ` يا عثمان إني لم أومر بالرهبانية أرغبت عن سنتي؟! قال: لا يا رسول الله
قال: إن من سنتي أن أصلي وأنام وأصوم وأطعم وأنكح وأطلق، فمن رغب عن
سنتي فليس مني، يا عثمان إن لأهلك عليك حقا ولنفسك عليك حقا `.
أخرجه الدارمي (2 / 132) : حدثنا محمد بن يزيد الحزامي حدثنا يونس بن بكير:
حدثني ابن إسحاق: حدثني الزهري عن سعيد بن المسيب عن سعد ابن أبي وقاص
قال:
` لما كان من أمر عثمان بن مظعون الذي كان من ترك النساء، بعث إليه رسول الله
صلى الله عليه وسلم، فقال ... (فذكره) . قال سعد: فو الله لقد كان أجمع
رجال من المسلمين على أن رسول الله صلى الله عليه وسلم إن هو أقر عثمان على ما
هو عليه أن نختصي، فنتبتل `.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات رجال البخاري غير ابن إسحاق، وهو ثقة
مدلس، ولكنه صرح بالتحديث، فزالت شبهة تدليسه.
وله فيه إسناد آخر عن عائشة رضي الله عنها نحوه، وتوبع عليه كما بينته في
` إرواء الغليل ` (2075) .




সা’দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

যখন উসমান ইবনে মাযউন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নারীদের বর্জন করার বিষয়টি জানাজানি হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন:

"হে উসমান! আমাকে তো বৈরাগ্যের (রাহবানিয়াত) আদেশ দেওয়া হয়নি। তুমি কি আমার সুন্নাত থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছো?"

তিনি বললেন, "না, ইয়া রাসূলাল্লাহ!"

তিনি (নবী সাঃ) বললেন, "আমার সুন্নাত হলো যে, আমি সালাত আদায় করি ও ঘুমাই, আমি সাওম পালন করি ও (অন্যকে) আহার করাই, আমি বিবাহ করি এবং তালাকও দেই। অতএব, যে আমার সুন্নাত থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়, সে আমার দলভুক্ত নয়। হে উসমান! তোমার স্ত্রীর (পরিবারের) তোমার উপর হক রয়েছে এবং তোমার নফসের (নিজের)ও তোমার উপর হক রয়েছে।"

সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম! উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যে অবস্থায় ছিলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যদি তাঁকে সে অবস্থায় থাকার অনুমতি দিতেন, তাহলে মুসলিমদের মধ্য থেকে কিছু লোক এই সিদ্ধান্ত নিয়েছিল যে, আমরা খাসী হয়ে যাবো (অর্থাৎ যৌন ক্ষমতা নষ্ট করে ফেলবো) এবং বৈরাগ্য অবলম্বন করবো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (395)


395 - ` لا تصوم المرأة يوما تطوعا في غير رمضان وزوجها شاهد إلا بإذنه `.
أخرجه الدارمي في ` سننه ` (2 / 12) : أخبرنا محمد بن أحمد حدثنا سفيان عن
أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، جميع رواته ثقات من رجاله.
والحديث أخرجه الشيخان من طرق عن سفيان دون قوله: ` يوما تطوعا في غير
رمضان `.
وهي زيادة صحيحة ثابتة، ومن أجلها خرجت الحديث هنا، وقد جاءت من طريقين
آخرين عن أبي هريرة نحوه. وإسناد أحدهما صحيح، والآخر حسن، وله شاهد من
حديث أبي سعيد الخدري أتم منه وفيه بيان سبب وروده، مع فوائد أخرى ينبغي
الاطلاع عليها، وهذا نصه، قال رضي الله عنه:
` جاءت امرأة إلى النبي صلى الله عليه وسلم ونحن عنده، فقالت: يا رسول الله
إن زوجي صفوان بن المعطل يضربني إذا صليت، ويفطرني إذا صمت، ولا يصلي صلاة
الفجر حتى تطلع الشمس، قال: وصفوان عنده، قال: فسأله عما قالت؟ فقال:
يا رسول الله أما قولها: ` يضربني إذا صليت `، فإنها تقرأ بسورتين،
(فتعطلني) وقد نهيتها (عنهما) ، قال: فقال: لو كانت سورة واحدة لكفت
الناس.
وأما قولها ` يفطرني `، فإنها تنطلق فتصوم وأنا رجل شاب، فلا أصبر، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ: ` لا تصوم امرأة إلا بإذن زوجها `.
وأما قولها ` إنى لا أصلي حتى تطلع الشمس ` فإنا أهل بيت قد عرف لنا
ذاك،
لا نكاد نستيقظ حتى تطلع الشمس، قال: فإذا استيقظت فصل `.
أخرجه أبو داود والسياق له وابن حبان والحاكم وأحمد بإسناد صحيح على شرط
الشيخين. وقد خرجته مع طرق حديث أبي هريرة في ` الإرواء ` (2063) .




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"রমযান ব্যতীত অন্য কোনো দিন কোনো স্ত্রীলোক তার স্বামীর উপস্থিতিতে তার অনুমতি ছাড়া নফল রোযা রাখবে না।"

*(এই সংক্রান্ত বিবরণের কারণসহ আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা নিম্নে প্রদান করা হলো:)*
আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট ছিলাম, এমন সময় এক মহিলা তাঁর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্বামী সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল আমাকে প্রহার করে যখন আমি সালাত আদায় করি, আর রোযা রাখলে সে আমার রোযা ভেঙে দেয়, এবং সে সূর্য ওঠা পর্যন্ত ফজরের সালাত আদায় করে না।"

বর্ণনাকারী বলেন: সাফওয়ান তখন সেখানেই উপস্থিত ছিল। তিনি (নবী সাঃ) তাকে মহিলাটির অভিযোগ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন।

সাফওয়ান বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! তার কথা, ’সে আমাকে প্রহার করে যখন আমি সালাত আদায় করি’— এর কারণ হলো, সে (সালাতে) এত দীর্ঘ করে দু’টি সূরা পড়ে যে (আমাকে দীর্ঘক্ষণ আটকে রাখে), অথচ আমি তাকে তা করতে নিষেধ করেছি।" তিনি (নবী সাঃ) বললেন: "যদি মাত্র একটি সূরাও (সালাতে দীর্ঘ করা হয়), তবে তা-ও মানুষের (কষ্টের জন্য) যথেষ্ট।"

সাফওয়ান আরও বলল: "আর তার কথা, ’সে আমার রোযা ভেঙে দেয়’— এর কারণ হলো, সে (স্বেচ্ছায়) রোযা শুরু করে দেয়, অথচ আমি একজন যুবক মানুষ, তাই আমি ধৈর্য ধারণ করতে পারি না।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন বললেন: "স্বামীকে অনুমতি ব্যতীত কোনো স্ত্রীলোক রোযা রাখবে না।"

সাফওয়ান বলল: "আর তার কথা, ’আমি সূর্য ওঠা পর্যন্ত সালাত আদায় করি না’— এর কারণ হলো, আমরা এমন এক পরিবার যাদের সম্বন্ধে এটি পরিচিত যে আমরা সূর্য না উঠা পর্যন্ত সচরাচর জেগে উঠি না।" তিনি (নবী সাঃ) বললেন: "যখন তুমি জেগে উঠবে, তখন সালাত আদায় করে নিও।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (396)


396 - ` كان في سفره الذي ناموا فيه حتى طلعت الشمس، فقال: إنكم كنتم أمواتا
فرد الله إليكم أرواحكم، فمن نام عن صلاة فليصلها إذا استيقظ، ومن نسي
صلاة فليصل إذا ذكر `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (58 / 1) عن عبد الجبار بن العباس الهمداني عن
عون بن أبي جحيفة عن أبيه قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير عبد الجبار هذا وهو
صدوق يتشيع كما قال الحافظ في ` التقريب `.
قلت: والتشيع لا يضر في الرواية عند المحدثين، لأن العبرة في الراوي إنما
هو كونه مسلما عدلا ضابطا، أما التمذهب بمذهب مخالف لأهل السنة، فلا يعد
عندهم جارحا ما لم ينكر ما هو معلوم من الدين بالضرورة، كما بينه الحافظ
ابن حجر في ` شرح النخبة `.
لاسيما وهذا الحديث قد جاء معناه في ` الصحيحين ` وغيرهما من حديث أنس
وغيره من الصحابة، وفي حديثه زيادة: ` لا كفارة لها إلا ذلك `.
فقه الحديث:
وفي الحديث دلالة على أن النائم عن الصلاة أو الناسي لها لا تسقط عنه
الصلاة،
وأنه يجب عليه أن يبادر إلى أدائها فور الاستيقاظ أو التذكر لها.
ودلت زيادة أنس رضي الله عنه، على أن ذلك هو الكفارة، وأنه إن لم يفعل فلا
يكفره شيء من الأعمال، اللهم إلا التوبة النصوح.
وفي ذلك كله دليل على أن الصلاة التي تعمد صاحبها إخراجها عن وقتها، فلا
يكفرها أن يصليها بعد وقتها، لأنه لا عذر له، والله عز وجل يقول: (إن
الصلاة كانت على المؤمنين كتابا موقوتا) ، وليس هو كالذى نام عنها أو نسيها،
فهذا معذور بنص الحديث، ولذلك جعل له كفارة أن يصليها إذا تذكرها.
ألست ترى أن هذا المعذور نفسه إذا لم يبادر إلى الصلاة حين التذكر فلا كفارة له
بعد ذلك، لأنه أضاع الوقت الذي شرع الله له أن يتدارك فيه الصلاة الفائتة.
فإذا كان هذا هو شأن المعذور أنه لا قضاء له بعد فوات الوقت المشروع له، فمن
باب أولى أن يكون المتعمد الذي لم يصل الصلاة في وقتها وهو متذكر لها مكلف بها
أن لا يكون له كفارة. وهذا فقه ظاهر لمن تأمله متجردا عن التأثر بالتقليد
ورأي الجمهور.
ومما سبق يتبين خطأ بعض المتأخرين الذي قاسوا المتعمد على الناسي فقالوا:
` إذا وجب القضاء على النائم والناسي مع عدم تفريطهما فوجوبه على العامد
المفرط أولى `!
مع أن هذا القياس ساقط الاعتبار من أصله، لأنه من باب قياس النقيض على نقيضه،
فإن العامد المتذكر ضد الناسي والنائم.
على أن القول بوجوب القضاء على المتعمد ينافي حكمة التوقيت للصلاة الذي هو شرط
من شروط صحة الصلاة، فإذا أخل بالشرط بطل المشروط بداهة،
وقول شيخ الشمال في
نشرة له في هذه المسألة ` أن المصلي وجب عليه أمران: الصلاة، وإيقاعها في
وقتها، فإذا ترك أحد الأمرين بقي الآخر `.
فهذا مما يدل على جهل بالغ في الشرع، فإن الوقت للصلاة ليس فرضا فحسب، بل
وشرط أيضا، ألا ترى أنه لو صلى قبل الوقت لم تقبل صلاته باتفاق العلماء.
لكن كلام الشيخ المسكين يدل على أنه قد خرق اتفاقهم بقوله المتقدم، فإنه صريح
أنه لو صلى قبل الوقت فإنه أدى واجبا، وضيع آخر!
وهكذا يصدق عليه المثل السائر (من حفر بئرا لأخيه وقع فيه) ! فإنه يدندن
دائما حول اتهام أنصار السنة بخرقهم الإجماع أو اتفاق العلماء، فها هو قد
خالفهم بقوله المذكور الهزيل، هدانا الله وإياه سواء السبيل.
وبعد فهذه كلمة وجيزة حول هذه المسألة المهمة بمناسبة هذا الحديث الشريف،
ومن شاء تفصيل الكلام فيها فليرجع إلى كتاب الصلاة لابن القيم رحمه الله تعالى
فإنه أشبع القول عليها مع التحقيق الدقيق بما لا تجده في كتاب.
واعلم أنه ليس معنى قول أهل العلم المحققين ومنهم العز ابن عبد السلام
الشافعي أنه لا يشرع القضاء على التارك للصلاة عمدا، أنه من باب التهوين لشأن
ترك الصلاة حاشا لله، بل هو على النقيض من ذلك، فإنهم يقولون: إن من خطورة
الصلاة وأدائها في وقتها أنه لا يمكن أن يتداركها بعد وقتها إلى الأبد، فلا
يكفر ذنب إخراج الصلاة عن وقتها إلا ما يكفر أكبر الذنوب، ألا وهو التوبة
النصوح.
ولذلك فهم ينصحون من ابتلي بترك الصلاة أن يتوب إلى الله فورا، وأن يحافظ
على أداء الصلاة في أوقاتها ومع الجماعة، وأن يكثر من الصلاة النافلة حتى
يعوض بذلك بعض ما فاته من الثواب بتركه للصلاة في الوقت (وإن الحسنات يذهبت
السيئات) وقد دل على ذلك حديث أبي هريرة ` انظروا هل لعبدي من تطوع فتكملوا
بها فريضته `. أخرجه أبو داود وغيره.




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

(নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এমন এক সফরে ছিলেন যখন সাহাবীরা ঘুমে ছিলেন যতক্ষণ না সূর্য উদিত হলো। অতঃপর তিনি বললেন: “নিশ্চয় তোমরা মৃত ছিলে, অতঃপর আল্লাহ তোমাদের রূহ (আত্মা) তোমাদের নিকট ফিরিয়ে দিয়েছেন। অতএব, যে ব্যক্তি নামাযের সময় ঘুমিয়ে পড়ল, সে যখন জাগ্রত হবে, তখন যেন তা আদায় করে নেয়। আর যে ব্যক্তি নামাযের কথা ভুলে গেল, সে যখন স্মরণ করবে, তখন যেন তা আদায় করে নেয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (397)


397 - ` ما صدق نبي (من الأنبياء) ما صدقت، إن من الأنبياء من لم يصدقه من أمته
إلا رجل واحد `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (2305 موارد) قال: أخبرنا أبو خليفة حدثنا علي
بن المديني حدثنا حسين بن علي عن زائدة عن المختار بن فلفل عن أنس ابن مالك
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، وقد أخرجه مسلم في ` صحيحه ` (1 / 130) حدثنا
أبو بكر بن أبي شيبة حدثنا حسين بن علي به وزاد في أوله:
` أنا أول شفيع في الجنة، لم يصدق نبي من الأنبياء.... `.
ومن طريق مسلم أخرجه أبو بكر محمد بن الحسن الطبري في ` الأمالي ` (7 / 1)
ثم رواه (4 / 1) من طريق أخرى عن المختار به.
ويشهد للحديث ما روى ابن عباس رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
(عرضت علي الأمم، فرأيت النبي ومعه الرهط، والنبي ومعه الرجل والرجلان
والنبي ليس معه أحد.... ` الحديث.
أخرجه الشيخان وغيرهما.
وفي الحديث دليل واضح على أن كثرة الأتباع وقلتهم، ليست معيارا لمعرفة كون
الداعية على حق أو باطل، فهؤلاء الأنبياء عليهم الصلاة والسلام مع كون دعوتهم
واحدة، ودينهم واحدا، فقد اختلفوا من حيث عدد أتباعهم قلة وكثرة، حتى كان
فيهم من لم يصدقه إلا رجل واحد، بل ومن ليس معه أحد! ففي ذلك عبرة بالغة
للداعية والمدعوين في هذا العصر، فالداعية عليه أن يتذكر هذه الحقيقة،
ويمضي قدما في سبيل الدعوة إلى الله تعالى، ولا يبالي بقلة المستجيبين له،
لأنه ليس عليه إلا البلاغ المبين، وله أسوة حسنة بالأنبياء السابقين
الذين لم
يكن مع أحدهم إلا الرجل والرجلان!
والمدعو عليه أن لا يستوحش من قلة المستجيبين للداعية، ويتخذ ذلك سببا للشك
في الدعوة الحق وترك الإيمان بها، فضلا عن أن يتخذ ذلك دليلا على بطلان دعوته
بحجة أنه لم يتبعه أحد، أو إنما اتبعه الأقلون! ولو كانت دعوته صادقة لاتبعه
جماهير الناس! والله عز وجل يقول (وما أكثر الناس ولو حرصت بمؤمنين) .




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"অন্য কোনো নবীকে (তাঁর অনুসারীরা) আমার মতো এত বেশি সংখ্যক মানুষের দ্বারা সত্যায়ন করেনি। নিশ্চয়ই নবীদের মধ্যে এমনও নবী ছিলেন, যাঁর উম্মতের মধ্যে মাত্র একজন পুরুষই তাঁকে সত্যায়ন করেছে।"

(মুসলিমের বর্ণনায় এর শুরুতে অতিরিক্ত এসেছে): "আমিই জান্নাতে প্রথম সুপারিশকারী হব। কোনো নবীকেই এত বেশি সংখ্যক মানুষ সত্যায়ন করেনি..."

(অন্য একটি হাদীসে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, যা এই হাদীসকে সমর্থন করে): "আমার সামনে সকল উম্মতকে পেশ করা হয়েছিল। আমি এমন নবীকেও দেখলাম, যাঁর সাথে ছিল একটি ছোট দল, এবং এমন নবীকেও দেখলাম, যাঁর সাথে ছিল মাত্র একজন বা দুজন লোক। আর এমন নবীও ছিলেন, যাঁর সাথে কেউ ছিল না..."









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (398)


398 - ` استأمروا النساء في أبضاعهن، قيل: فإن البكر تستحي أن تكلم؟ قال: سكوتها
إذنها `.
رواه النسائي (2 / 78) وأحمد (6 / 45، 203) عن ابن جريج قال: سمعت ابن
أبي مليكة يحدث عن ذكوان أبي عمرو مولى عائشة عن عائشة مرفوعا.
وهذا سند صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرجه البخاري (8 / 57) ومسلم
(4 / 141) وأحمد أيضا (6 / 165) من هذا الوجه بمعناه.
وفي رواية ` البكر تستأذن `.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা নারীদের সাথে তাদের নিজেদের বিষয়ে (বিবাহের ব্যাপারে) পরামর্শ নাও।” জিজ্ঞাসা করা হলো: “যদি কুমারী মেয়ে লজ্জার কারণে কথা বলতে না পারে (অর্থাৎ সে মুখ ফুটে অনুমতি দিতে না পারে)?” তিনি বললেন: “তার নীরবতাই হলো তার সম্মতি (অনুমতি)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (399)


399 - ` نهى أن يشرب من في السقاء `.
أخرجه أحمد (2 / 230، 487) : حدثنا إسماعيل قال أنبأنا أيوب عن عكرمة عن
أبي هريرة مرفوعا به.
قال أيوب: أنبئت أن رجلا شرب من في السقاء فخرجت حية.
وهذا إسناد صحيح على شرط البخاري وأخرجه الحاكم (4 / 140) من هذا الوجه
وقال: ` صحيح على شرط (خ) .
ووافقه الذهبي.
قلت: وقد أخرجه في ` صحيحه ` (10 / 74) من طريق أيوب عن عكرمة به دون قول
أيوب ` انبئت.... `. وكذلك أخرجه ابن ماجه (2 / 336) ، وهو رواية لأحمد
(2 / 247، 327) .
وقد تابعه حماد بن زيد عن عكرمة به. أخرجه أحمد (2 / 353) وإسناده على شرط
البخاري. وأورده الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 78) وقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` ورجاله ثقات `.
وقد ذهل عن كونه في بعض الكتب الستة وقد ذكره المنذري في ` الترغيب ` (3 /
118) من رواية الحاكم دون قوله ` قال أيوب ` فلم يحسن لأنه بذلك صار قول أيوب
مدرجا في الحديث من قول أبي هريرة، ولا يخفى ما فيه.
وللحديث شاهد من حديث ابن عباس مثل حديث أبي هريرة.
أخرجه البخاري وأبو داود (2 / 134) والدارمي (2 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মশকের মুখ লাগিয়ে (সরাসরি) পান করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (400)


400 - ` نهى أن يشرب من في السقاء لأن ذلك ينتنه `.
أخرجه الحاكم (4 / 140) من طريق الحارث بن أبي أسامة: حدثنا روح بن عبادة:
حدثنا حماد بن سلمة عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعا.
وقال: صحيح الإسناد.
وفي التلخيص: صحيح على شرط مسلم. وقال الحافظ في ` الفتح ` (10 / 79) :
` سنده قوي `.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মশকের মুখ লাগিয়ে সরাসরি পান করতে নিষেধ করেছেন। কারণ তা সেটিকে (পাত্রের ভেতরের অংশকে) দুর্গন্ধযুক্ত করে দেয়।