হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (387)


387 - ` كان إذا شرب تنفس ثلاثا، وقال: هو أهنأ وأمرأ وأبرأ `.
أخرجه مسلم وأبو داود (3727) والنسائي في ` الكبرى ` (ق 65 / 2)
والترمذي (1 / 344) وحسنه، وأحمد (3 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ ﷺ যখন পান করতেন, তখন তিনি (পাত্র থেকে মুখ সরিয়ে) তিনবার নিঃশ্বাস নিতেন। আর তিনি বলতেন: "এভাবে পান করা অধিক তৃপ্তিদায়ক, সহজে হজম হয় এবং অধিক রোগমুক্তকারী (বা পিপাসা নিবারণকারী)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (388)


388 - ` نهى عن الشرب من ثلمة القدح، وأن ينفخ في الشراب `.
أخرجه أبو داود (3722) وابن حبان (1366) وأحمد (3 / 80) وكذا ابنه
عبد الله من طريق قرة بن عبد الرحمن عن ابن شهاب عن عبيد الله بن عبد الله بن
عتبة عن أبي سعيد الخدري أنه قال: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم رجال مسلم لولا ما في قرة بن عبد الرحمن
من الكلام.
وقال الحافظ:
` اسمه يحيى، صدوق، وله مناكير `.
قلت: لكن لحديثه شواهد تدل على صحته، وأنه قد حفظه.
أما الشطر الثاني منه، فله شواهد كثيرة تقدم ذكر أحدها في الحديث الذي قبله.
وأما الشطر الأول، فيشهد له حديث أبي هريرة قال:
` نهى أن يشرب من كسر القدح `.
قال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 78) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، ورجاله ثقات رجال الصحيح `.
وحديث سهل بن سعد:
` أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن ينفخ في الشراب وأن يشرب من ثلمة
القدح `. ` رواه الطبراني، وفيه عبد المهيمن بن عباس بن سهل وهو ضعيف `.
وعن ابن عباس وابن عمر قالا:
` يكره أن يشرب من ثلمة القدح، وأذن القدح `.
` رواه الطبراني، ورجاله رجال الصحيح `.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পাত্রের ভাঙা স্থান বা ফাটা মুখ দিয়ে পান করতে এবং পানীয়ের মধ্যে ফুঁ দিতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (389)


389 - ` إياكم ومحقرات الذنوب كقوم نزلوا في بطن واد فجاء ذا بعود وجاء ذا بعود حتى
أنضجوا خبزتهم وإن محقرات الذنوب متى يؤخذ بها صاحبها تهلكه `.
أخرجه أحمد (5 / 331) حدثنا أنس بن عياض حدثني أبو حازم لا أعلمه إلا عن
سهل بن سعد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.
ومن هذا الوجه أخرجه الروياني أيضا في ` مسنده ` (29 /




সহল ইবনে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

তোমরা তুচ্ছ জ্ঞান করা গুনাহ (মুহাক্কারাত আয-যুনুব) থেকে নিজেদেরকে বাঁচিয়ে রাখবে। এর দৃষ্টান্ত হলো সেই কওমের মতো, যারা কোনো উপত্যকার গভীরে অবতরণ করল। অতঃপর একজন একটি করে ছোট কাঠ নিয়ে আসল এবং আরেকজনও একটি করে ছোট কাঠ নিয়ে আসল, শেষ পর্যন্ত তারা তাদের রুটি (খাবার) তৈরি করে ফেলল। আর নিশ্চয়ই এই তুচ্ছ জ্ঞান করা গুনাহসমূহ যখনই এর কর্তাকে পাকড়াও করে, তখনই তা তাকে ধ্বংস করে দেয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (390)


390 - ` كان إذا أراد أن ينام وهو جنب توضأ، وإذا أراد أن يأكل غسل يديه `.
أخرجه النسائي (1 / 50) : أخبرنا محمد بن عبيد بن محمد قال: حدثنا عبد الله
بن المبارك عن يونس عن الزهري عن أبي سلمة عن عائشة رضي الله عنها:
` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ... `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات رجال الشيخين غير محمد بن عبيد وهو
أبو جعفر أو أبو يعلى النحاس الكوفي وهو صدوق.
وتابعه سويد بن نصر قال أنبأنا عبد الله عن يونس به.
أخرجه النسائي وفي ` الكبرى ` أيضا (ق 65 / 2) .
وسويد بن نصر ثقة. وتابعه علي بن إسحاق قال: أنبأنا عبد الله به. وتابعه
محمد بن بكر قال: أنبأنا يونس به. أخرجه أحمد (6 /




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন জুনুবী (গোসল ফরয) অবস্থায় ঘুমাতে ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি (ঘুমের জন্য) ওযু করে নিতেন। আর যখন তিনি খেতে ইচ্ছা করতেন, তখন তাঁর উভয় হাত ধুয়ে নিতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (391)


391 - ` إذا أكل أحدكم الطعام فلا يمسح يده حتى يلعقها أو يلعقها ولا يرفع صحفة حتى
يلعقها أو يلعقها، فإن آخر الطعام فيه بركة `.
أخرجه النسائي في ` السنن الكبرى ` (ق 60 /




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:

“যখন তোমাদের কেউ খাবার খায়, তখন সে যেন নিজের হাত না মোছে, যতক্ষণ না সে নিজে তা চেটে নেয় অথবা অন্য কাউকে দিয়ে তা চেটে নেয়। আর সে যেন পাত্রটিও (থালা/প্লেট) তুলে না নেয়, যতক্ষণ না সে নিজে তা চেটে নেয় অথবা অন্য কাউকে দিয়ে তা চেটে নেয়। কারণ, খাবারের শেষ অংশে বরকত (কল্যাণ) থাকে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (392)


392 - ` إنه أعظم للبركة. يعني الطعام الذي ذهب فوره `.
أخرجه الدارمي (2 / 100) وابن حبان (1344) والحاكم (4 / 118) وابن أبي
الدنيا في ` الجوع ` (14 / 2) والبيهقي (7 / 280) عن قرة بن عبد الرحمن عن
ابن شهاب عن عروة بن الزبير عن أسماء بنت أبي بكر.
أنها كانت إذا ثردت غطته شيئا حتى يذهب فوره ثم تقول: إنى سمعت رسول الله صلى
الله عليه وسلم يقول ... فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي!
قلت: وذلك من أوهامهما فإن قرة بن عبد الرحمن لم يحتج به مسلم، وإنما أخرج
له في الشواهد كما صرح بذلك الذهبي نفسه في ` الميزان `، ثم هو في نفسه ضعيف
من قبل حفظه، وقد مضى ذكر شيء من حاله في أول الكتاب.
نعم إنه لم يتفرد به، فقد تابعه عقيل بن خالد عن ابن شهاب به.
أخرجه أحمد (6 / 350) : حدثنا قتيبة بن سعيد قال: حدثنا ابن لهيعة عن عقيل،
وحدثنا عتاب قال: حدثنا عبد الله، قال: أنبأنا ابن لهيعة، قال: حدثني
عقيل ابن خالد عن ابن شهاب به.
قلت: وهذا إسناد صحيح من طريق عبد الله وهو ابن المبارك، فإن ابن لهيعة
وإن كان معروفا بسوء الحفظ، لكن المحققين من العلماء على أن حديثه صحيح إذا
كان من رواية العبادلة عنه منهم عبد الله بن المبارك. وقد رواه عنه كما ترى.
وعتاب هو ابن زياد المروزي، قال ابن أبي حاتم (3 / 2 / 13) عن أبيه:
` ثقة `.
ولم يورده الحافظ في ` التعجيل ` مع أنه على شرطه!
وقد صح عن أبي هريرة رضي الله عنه أنه قال:
` لا يؤكل طعام حتى يذهب بخاره `.
أخرجه البيهقي بإسناد صحيح كما بينته في ` الإرواء ` (2038) .
وأخرج الحاكم من طريق محمد بن عبيد الله بن العرزمي عن عطاء عن جابر
مرفوعا بلفظ:
` أبردوا الطعام الحار، فإن الطعام الحار غير ذي بركة `.
والعرزمي هذا متروك شديد الضعف، لكن ذكر له السيوطي في ` الجامع ` شواهد عدة
في بعضها نظر، منها حديث
أسماء هذا، ولا يخفى على اللبيب أن قوله فيه
` أعظم للبركة ` لا يساوي قوله ` غير ذي بركة ` فإن الأول يدل بمفهومه أنه دونه
في البركة، فهذا شيء، وقوله ` غير ذي بركة ` فليحقق النظر في الشواهد الأخرى
من حيث إسنادها ومن جهة شهادتها، فإن من تلك الشواهد ما عزاه لـ ` الحلية `
من حديث أنس. ولم أره فيه بهذا اللفظ. ثم رأيت المناوي ذكر أنه يعني حديث
أنس قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم بقصعة تفور، فرفع يده منها وقال:
إن الله لم يطعمنا نارا، ثم ذكره.
ولم يتكلم عن إسناده بشيء ولا رأيته في ` البغية في ترتيب أحاديث الحلية `.




আসমা বিনতে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি যখন ’সারিদ’ (গোশত ও ঝোলে ভেজানো রুটির খাবার) প্রস্তুত করতেন, তখন তা কোনো কিছু দিয়ে ঢেকে রাখতেন যতক্ষণ না তার বাষ্প বা প্রচণ্ড গরম কমে যেত। এরপর তিনি বলতেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "নিশ্চয়ই তা (অর্থাৎ ঠান্ডা হওয়া বা যার বাষ্প চলে গেছে) বরকতের দিক থেকে অনেক বেশি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (393)


393 - ` كلوا من جوانبها، ودعوا ذروتها يبارك لكم فيها، ثم قال: خذوا فكلوا،
فوالذي نفس محمد بيده ليفتحن عليكم أرض فارس والروم، حتى يكثر الطعام فلا
يذكر اسم الله عليه `.
صحيح، رواه أبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (98 / 1) وعنه ابن عساكر (8 /
532 / 2) والبيهقي (7 / 283) والضياء في ` المختارة ` (112 / 1) عن عمرو
بن عثمان حدثنا أبي حدثنا محمد بن عبد الرحمن بن عرق حدثنا عبد الله بن بسر
قال:
أهديت للنبي صلى الله عليه وسلم شاة والطعام يومئذ قليل، فقال لأهله: اطبخوا
هذه الشاة وانظروا إلى هذا الدقيق فاخبزوه واطبخوا واثردوا عليه، قال:
وكان للنبي صلى الله عليه وسلم قصعة يقال لها الغراء يحملها أربعة رجال، فلما
أصبح وسبحوا الضحى أتى بتلك القصعة والتقوا عليها، فإذا كثر الناس جثا رسول
الله صلى الله عليه وسلم، فقال: أعرابي ما هذه الجلسة؟ فقال النبي صلى الله
عليه وسلم: إن الله جعلني عبدا كريما ولم يجعلني جبارا عنيدا ثم قال رسول
الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وأخرجه أبو داود (3773) وابن ماجه مفرقا في موضعين (3263، 3275) دون
قوله: ` ثم قال ... `.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات وعثمان هو ابن سعيد بن كثير الحمصي.
والحديث علم من أعلام نبوته صلى الله عليه وسلم فقد فتح سلفنا أرض فارس
والروم وورثنا ذلك منهم، وطغى الكثيرون منا فأعرضوا عن الشريعة وآدابها
التي منها ابتداء الطعام بـ ` بسم الله ` فنسوا هذا حتى لا تكاد تجد فيهم
ذاكرا!




আব্দুল্লাহ ইবনে বুসর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট একটি বকরী হাদিয়া হিসেবে এলো, আর সেদিন খাদ্যদ্রব্য ছিল অপ্রতুল। তিনি তাঁর পরিবারের লোকদের বললেন: তোমরা এই বকরীটি রান্না করো এবং এই আটা/ময়দার দিকে লক্ষ্য করো, তা দিয়ে রুটি তৈরি করো, রান্না করো এবং সেটির ওপর (ঝোল দিয়ে) সরিদ (এক ধরনের খাদ্য) তৈরি করো।

(বর্ণনাকারী) বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর একটি বড় পাত্র ছিল, যাকে ‘আল-গাররা’ বলা হতো এবং এটি চারজন লোক বহন করত। যখন সকাল হলো এবং সকলে সালাতুত দুহা (চাশতের সালাত) আদায় করলেন, তখন সেই পাত্রটি আনা হলো এবং সকলে এর চারপাশ ঘিরে বসলেন।

যখন লোকজনের ভিড় বাড়ল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হাঁটু গেড়ে বসলেন (জানু পেতে বসলেন)। একজন বেদুঈন (আরব) জিজ্ঞেস করল: এ কেমন বসা? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আমাকে সম্মানিত বান্দা বানিয়েছেন, আমাকে অহংকারী বা অত্যাচারী বানাননি।

অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “তোমরা পাত্রের কিনারা থেকে খাও এবং মাঝখানটা ছেড়ে দাও; এতে তোমাদের জন্য বরকত দেওয়া হবে।”

এরপর তিনি বললেন: “নাও, খাও! যার হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর কসম! শীঘ্রই তোমাদের জন্য পারস্য ও রোমের দেশসমূহ জয় করা হবে, এমনকি খাদ্যদ্রব্যের প্রাচুর্য ঘটবে, ফলে (খাওয়ার শুরুতে) তার ওপর আল্লাহর নাম (বিসমিল্লাহ) আর স্মরণ করা হবে না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (394)


394 - ` يا عثمان إني لم أومر بالرهبانية أرغبت عن سنتي؟! قال: لا يا رسول الله
قال: إن من سنتي أن أصلي وأنام وأصوم وأطعم وأنكح وأطلق، فمن رغب عن
سنتي فليس مني، يا عثمان إن لأهلك عليك حقا ولنفسك عليك حقا `.
أخرجه الدارمي (2 / 132) : حدثنا محمد بن يزيد الحزامي حدثنا يونس بن بكير:
حدثني ابن إسحاق: حدثني الزهري عن سعيد بن المسيب عن سعد ابن أبي وقاص
قال:
` لما كان من أمر عثمان بن مظعون الذي كان من ترك النساء، بعث إليه رسول الله
صلى الله عليه وسلم، فقال ... (فذكره) . قال سعد: فو الله لقد كان أجمع
رجال من المسلمين على أن رسول الله صلى الله عليه وسلم إن هو أقر عثمان على ما
هو عليه أن نختصي، فنتبتل `.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات رجال البخاري غير ابن إسحاق، وهو ثقة
مدلس، ولكنه صرح بالتحديث، فزالت شبهة تدليسه.
وله فيه إسناد آخر عن عائشة رضي الله عنها نحوه، وتوبع عليه كما بينته في
` إرواء الغليل ` (2075) .




সা’দ ইবনে আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

যখন উসমান ইবনে মাযউন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নারীদের বর্জন করার বিষয়টি জানাজানি হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন:

"হে উসমান! আমাকে তো বৈরাগ্যের (রাহবানিয়াত) আদেশ দেওয়া হয়নি। তুমি কি আমার সুন্নাত থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছো?"

তিনি বললেন, "না, ইয়া রাসূলাল্লাহ!"

তিনি (নবী সাঃ) বললেন, "আমার সুন্নাত হলো যে, আমি সালাত আদায় করি ও ঘুমাই, আমি সাওম পালন করি ও (অন্যকে) আহার করাই, আমি বিবাহ করি এবং তালাকও দেই। অতএব, যে আমার সুন্নাত থেকে মুখ ফিরিয়ে নেয়, সে আমার দলভুক্ত নয়। হে উসমান! তোমার স্ত্রীর (পরিবারের) তোমার উপর হক রয়েছে এবং তোমার নফসের (নিজের)ও তোমার উপর হক রয়েছে।"

সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আল্লাহর কসম! উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যে অবস্থায় ছিলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যদি তাঁকে সে অবস্থায় থাকার অনুমতি দিতেন, তাহলে মুসলিমদের মধ্য থেকে কিছু লোক এই সিদ্ধান্ত নিয়েছিল যে, আমরা খাসী হয়ে যাবো (অর্থাৎ যৌন ক্ষমতা নষ্ট করে ফেলবো) এবং বৈরাগ্য অবলম্বন করবো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (395)


395 - ` لا تصوم المرأة يوما تطوعا في غير رمضان وزوجها شاهد إلا بإذنه `.
أخرجه الدارمي في ` سننه ` (2 / 12) : أخبرنا محمد بن أحمد حدثنا سفيان عن
أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، جميع رواته ثقات من رجاله.
والحديث أخرجه الشيخان من طرق عن سفيان دون قوله: ` يوما تطوعا في غير
رمضان `.
وهي زيادة صحيحة ثابتة، ومن أجلها خرجت الحديث هنا، وقد جاءت من طريقين
آخرين عن أبي هريرة نحوه. وإسناد أحدهما صحيح، والآخر حسن، وله شاهد من
حديث أبي سعيد الخدري أتم منه وفيه بيان سبب وروده، مع فوائد أخرى ينبغي
الاطلاع عليها، وهذا نصه، قال رضي الله عنه:
` جاءت امرأة إلى النبي صلى الله عليه وسلم ونحن عنده، فقالت: يا رسول الله
إن زوجي صفوان بن المعطل يضربني إذا صليت، ويفطرني إذا صمت، ولا يصلي صلاة
الفجر حتى تطلع الشمس، قال: وصفوان عنده، قال: فسأله عما قالت؟ فقال:
يا رسول الله أما قولها: ` يضربني إذا صليت `، فإنها تقرأ بسورتين،
(فتعطلني) وقد نهيتها (عنهما) ، قال: فقال: لو كانت سورة واحدة لكفت
الناس.
وأما قولها ` يفطرني `، فإنها تنطلق فتصوم وأنا رجل شاب، فلا أصبر، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ: ` لا تصوم امرأة إلا بإذن زوجها `.
وأما قولها ` إنى لا أصلي حتى تطلع الشمس ` فإنا أهل بيت قد عرف لنا
ذاك،
لا نكاد نستيقظ حتى تطلع الشمس، قال: فإذا استيقظت فصل `.
أخرجه أبو داود والسياق له وابن حبان والحاكم وأحمد بإسناد صحيح على شرط
الشيخين. وقد خرجته مع طرق حديث أبي هريرة في ` الإرواء ` (2063) .




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"রমযান ব্যতীত অন্য কোনো দিন কোনো স্ত্রীলোক তার স্বামীর উপস্থিতিতে তার অনুমতি ছাড়া নফল রোযা রাখবে না।"

*(এই সংক্রান্ত বিবরণের কারণসহ আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা নিম্নে প্রদান করা হলো:)*
আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট ছিলাম, এমন সময় এক মহিলা তাঁর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্বামী সাফওয়ান ইবনু মুআত্তাল আমাকে প্রহার করে যখন আমি সালাত আদায় করি, আর রোযা রাখলে সে আমার রোযা ভেঙে দেয়, এবং সে সূর্য ওঠা পর্যন্ত ফজরের সালাত আদায় করে না।"

বর্ণনাকারী বলেন: সাফওয়ান তখন সেখানেই উপস্থিত ছিল। তিনি (নবী সাঃ) তাকে মহিলাটির অভিযোগ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন।

সাফওয়ান বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! তার কথা, ’সে আমাকে প্রহার করে যখন আমি সালাত আদায় করি’— এর কারণ হলো, সে (সালাতে) এত দীর্ঘ করে দু’টি সূরা পড়ে যে (আমাকে দীর্ঘক্ষণ আটকে রাখে), অথচ আমি তাকে তা করতে নিষেধ করেছি।" তিনি (নবী সাঃ) বললেন: "যদি মাত্র একটি সূরাও (সালাতে দীর্ঘ করা হয়), তবে তা-ও মানুষের (কষ্টের জন্য) যথেষ্ট।"

সাফওয়ান আরও বলল: "আর তার কথা, ’সে আমার রোযা ভেঙে দেয়’— এর কারণ হলো, সে (স্বেচ্ছায়) রোযা শুরু করে দেয়, অথচ আমি একজন যুবক মানুষ, তাই আমি ধৈর্য ধারণ করতে পারি না।" রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন বললেন: "স্বামীকে অনুমতি ব্যতীত কোনো স্ত্রীলোক রোযা রাখবে না।"

সাফওয়ান বলল: "আর তার কথা, ’আমি সূর্য ওঠা পর্যন্ত সালাত আদায় করি না’— এর কারণ হলো, আমরা এমন এক পরিবার যাদের সম্বন্ধে এটি পরিচিত যে আমরা সূর্য না উঠা পর্যন্ত সচরাচর জেগে উঠি না।" তিনি (নবী সাঃ) বললেন: "যখন তুমি জেগে উঠবে, তখন সালাত আদায় করে নিও।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (396)


396 - ` كان في سفره الذي ناموا فيه حتى طلعت الشمس، فقال: إنكم كنتم أمواتا
فرد الله إليكم أرواحكم، فمن نام عن صلاة فليصلها إذا استيقظ، ومن نسي
صلاة فليصل إذا ذكر `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (58 / 1) عن عبد الجبار بن العباس الهمداني عن
عون بن أبي جحيفة عن أبيه قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله كلهم ثقات رجال الشيخين غير عبد الجبار هذا وهو
صدوق يتشيع كما قال الحافظ في ` التقريب `.
قلت: والتشيع لا يضر في الرواية عند المحدثين، لأن العبرة في الراوي إنما
هو كونه مسلما عدلا ضابطا، أما التمذهب بمذهب مخالف لأهل السنة، فلا يعد
عندهم جارحا ما لم ينكر ما هو معلوم من الدين بالضرورة، كما بينه الحافظ
ابن حجر في ` شرح النخبة `.
لاسيما وهذا الحديث قد جاء معناه في ` الصحيحين ` وغيرهما من حديث أنس
وغيره من الصحابة، وفي حديثه زيادة: ` لا كفارة لها إلا ذلك `.
فقه الحديث:
وفي الحديث دلالة على أن النائم عن الصلاة أو الناسي لها لا تسقط عنه
الصلاة،
وأنه يجب عليه أن يبادر إلى أدائها فور الاستيقاظ أو التذكر لها.
ودلت زيادة أنس رضي الله عنه، على أن ذلك هو الكفارة، وأنه إن لم يفعل فلا
يكفره شيء من الأعمال، اللهم إلا التوبة النصوح.
وفي ذلك كله دليل على أن الصلاة التي تعمد صاحبها إخراجها عن وقتها، فلا
يكفرها أن يصليها بعد وقتها، لأنه لا عذر له، والله عز وجل يقول: (إن
الصلاة كانت على المؤمنين كتابا موقوتا) ، وليس هو كالذى نام عنها أو نسيها،
فهذا معذور بنص الحديث، ولذلك جعل له كفارة أن يصليها إذا تذكرها.
ألست ترى أن هذا المعذور نفسه إذا لم يبادر إلى الصلاة حين التذكر فلا كفارة له
بعد ذلك، لأنه أضاع الوقت الذي شرع الله له أن يتدارك فيه الصلاة الفائتة.
فإذا كان هذا هو شأن المعذور أنه لا قضاء له بعد فوات الوقت المشروع له، فمن
باب أولى أن يكون المتعمد الذي لم يصل الصلاة في وقتها وهو متذكر لها مكلف بها
أن لا يكون له كفارة. وهذا فقه ظاهر لمن تأمله متجردا عن التأثر بالتقليد
ورأي الجمهور.
ومما سبق يتبين خطأ بعض المتأخرين الذي قاسوا المتعمد على الناسي فقالوا:
` إذا وجب القضاء على النائم والناسي مع عدم تفريطهما فوجوبه على العامد
المفرط أولى `!
مع أن هذا القياس ساقط الاعتبار من أصله، لأنه من باب قياس النقيض على نقيضه،
فإن العامد المتذكر ضد الناسي والنائم.
على أن القول بوجوب القضاء على المتعمد ينافي حكمة التوقيت للصلاة الذي هو شرط
من شروط صحة الصلاة، فإذا أخل بالشرط بطل المشروط بداهة،
وقول شيخ الشمال في
نشرة له في هذه المسألة ` أن المصلي وجب عليه أمران: الصلاة، وإيقاعها في
وقتها، فإذا ترك أحد الأمرين بقي الآخر `.
فهذا مما يدل على جهل بالغ في الشرع، فإن الوقت للصلاة ليس فرضا فحسب، بل
وشرط أيضا، ألا ترى أنه لو صلى قبل الوقت لم تقبل صلاته باتفاق العلماء.
لكن كلام الشيخ المسكين يدل على أنه قد خرق اتفاقهم بقوله المتقدم، فإنه صريح
أنه لو صلى قبل الوقت فإنه أدى واجبا، وضيع آخر!
وهكذا يصدق عليه المثل السائر (من حفر بئرا لأخيه وقع فيه) ! فإنه يدندن
دائما حول اتهام أنصار السنة بخرقهم الإجماع أو اتفاق العلماء، فها هو قد
خالفهم بقوله المذكور الهزيل، هدانا الله وإياه سواء السبيل.
وبعد فهذه كلمة وجيزة حول هذه المسألة المهمة بمناسبة هذا الحديث الشريف،
ومن شاء تفصيل الكلام فيها فليرجع إلى كتاب الصلاة لابن القيم رحمه الله تعالى
فإنه أشبع القول عليها مع التحقيق الدقيق بما لا تجده في كتاب.
واعلم أنه ليس معنى قول أهل العلم المحققين ومنهم العز ابن عبد السلام
الشافعي أنه لا يشرع القضاء على التارك للصلاة عمدا، أنه من باب التهوين لشأن
ترك الصلاة حاشا لله، بل هو على النقيض من ذلك، فإنهم يقولون: إن من خطورة
الصلاة وأدائها في وقتها أنه لا يمكن أن يتداركها بعد وقتها إلى الأبد، فلا
يكفر ذنب إخراج الصلاة عن وقتها إلا ما يكفر أكبر الذنوب، ألا وهو التوبة
النصوح.
ولذلك فهم ينصحون من ابتلي بترك الصلاة أن يتوب إلى الله فورا، وأن يحافظ
على أداء الصلاة في أوقاتها ومع الجماعة، وأن يكثر من الصلاة النافلة حتى
يعوض بذلك بعض ما فاته من الثواب بتركه للصلاة في الوقت (وإن الحسنات يذهبت
السيئات) وقد دل على ذلك حديث أبي هريرة ` انظروا هل لعبدي من تطوع فتكملوا
بها فريضته `. أخرجه أبو داود وغيره.




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

(নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এমন এক সফরে ছিলেন যখন সাহাবীরা ঘুমে ছিলেন যতক্ষণ না সূর্য উদিত হলো। অতঃপর তিনি বললেন: “নিশ্চয় তোমরা মৃত ছিলে, অতঃপর আল্লাহ তোমাদের রূহ (আত্মা) তোমাদের নিকট ফিরিয়ে দিয়েছেন। অতএব, যে ব্যক্তি নামাযের সময় ঘুমিয়ে পড়ল, সে যখন জাগ্রত হবে, তখন যেন তা আদায় করে নেয়। আর যে ব্যক্তি নামাযের কথা ভুলে গেল, সে যখন স্মরণ করবে, তখন যেন তা আদায় করে নেয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (397)


397 - ` ما صدق نبي (من الأنبياء) ما صدقت، إن من الأنبياء من لم يصدقه من أمته
إلا رجل واحد `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (2305 موارد) قال: أخبرنا أبو خليفة حدثنا علي
بن المديني حدثنا حسين بن علي عن زائدة عن المختار بن فلفل عن أنس ابن مالك
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، وقد أخرجه مسلم في ` صحيحه ` (1 / 130) حدثنا
أبو بكر بن أبي شيبة حدثنا حسين بن علي به وزاد في أوله:
` أنا أول شفيع في الجنة، لم يصدق نبي من الأنبياء.... `.
ومن طريق مسلم أخرجه أبو بكر محمد بن الحسن الطبري في ` الأمالي ` (7 / 1)
ثم رواه (4 / 1) من طريق أخرى عن المختار به.
ويشهد للحديث ما روى ابن عباس رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
(عرضت علي الأمم، فرأيت النبي ومعه الرهط، والنبي ومعه الرجل والرجلان
والنبي ليس معه أحد.... ` الحديث.
أخرجه الشيخان وغيرهما.
وفي الحديث دليل واضح على أن كثرة الأتباع وقلتهم، ليست معيارا لمعرفة كون
الداعية على حق أو باطل، فهؤلاء الأنبياء عليهم الصلاة والسلام مع كون دعوتهم
واحدة، ودينهم واحدا، فقد اختلفوا من حيث عدد أتباعهم قلة وكثرة، حتى كان
فيهم من لم يصدقه إلا رجل واحد، بل ومن ليس معه أحد! ففي ذلك عبرة بالغة
للداعية والمدعوين في هذا العصر، فالداعية عليه أن يتذكر هذه الحقيقة،
ويمضي قدما في سبيل الدعوة إلى الله تعالى، ولا يبالي بقلة المستجيبين له،
لأنه ليس عليه إلا البلاغ المبين، وله أسوة حسنة بالأنبياء السابقين
الذين لم
يكن مع أحدهم إلا الرجل والرجلان!
والمدعو عليه أن لا يستوحش من قلة المستجيبين للداعية، ويتخذ ذلك سببا للشك
في الدعوة الحق وترك الإيمان بها، فضلا عن أن يتخذ ذلك دليلا على بطلان دعوته
بحجة أنه لم يتبعه أحد، أو إنما اتبعه الأقلون! ولو كانت دعوته صادقة لاتبعه
جماهير الناس! والله عز وجل يقول (وما أكثر الناس ولو حرصت بمؤمنين) .




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন:

"অন্য কোনো নবীকে (তাঁর অনুসারীরা) আমার মতো এত বেশি সংখ্যক মানুষের দ্বারা সত্যায়ন করেনি। নিশ্চয়ই নবীদের মধ্যে এমনও নবী ছিলেন, যাঁর উম্মতের মধ্যে মাত্র একজন পুরুষই তাঁকে সত্যায়ন করেছে।"

(মুসলিমের বর্ণনায় এর শুরুতে অতিরিক্ত এসেছে): "আমিই জান্নাতে প্রথম সুপারিশকারী হব। কোনো নবীকেই এত বেশি সংখ্যক মানুষ সত্যায়ন করেনি..."

(অন্য একটি হাদীসে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, যা এই হাদীসকে সমর্থন করে): "আমার সামনে সকল উম্মতকে পেশ করা হয়েছিল। আমি এমন নবীকেও দেখলাম, যাঁর সাথে ছিল একটি ছোট দল, এবং এমন নবীকেও দেখলাম, যাঁর সাথে ছিল মাত্র একজন বা দুজন লোক। আর এমন নবীও ছিলেন, যাঁর সাথে কেউ ছিল না..."









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (398)


398 - ` استأمروا النساء في أبضاعهن، قيل: فإن البكر تستحي أن تكلم؟ قال: سكوتها
إذنها `.
رواه النسائي (2 / 78) وأحمد (6 / 45، 203) عن ابن جريج قال: سمعت ابن
أبي مليكة يحدث عن ذكوان أبي عمرو مولى عائشة عن عائشة مرفوعا.
وهذا سند صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرجه البخاري (8 / 57) ومسلم
(4 / 141) وأحمد أيضا (6 / 165) من هذا الوجه بمعناه.
وفي رواية ` البكر تستأذن `.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা নারীদের সাথে তাদের নিজেদের বিষয়ে (বিবাহের ব্যাপারে) পরামর্শ নাও।” জিজ্ঞাসা করা হলো: “যদি কুমারী মেয়ে লজ্জার কারণে কথা বলতে না পারে (অর্থাৎ সে মুখ ফুটে অনুমতি দিতে না পারে)?” তিনি বললেন: “তার নীরবতাই হলো তার সম্মতি (অনুমতি)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (399)


399 - ` نهى أن يشرب من في السقاء `.
أخرجه أحمد (2 / 230، 487) : حدثنا إسماعيل قال أنبأنا أيوب عن عكرمة عن
أبي هريرة مرفوعا به.
قال أيوب: أنبئت أن رجلا شرب من في السقاء فخرجت حية.
وهذا إسناد صحيح على شرط البخاري وأخرجه الحاكم (4 / 140) من هذا الوجه
وقال: ` صحيح على شرط (خ) .
ووافقه الذهبي.
قلت: وقد أخرجه في ` صحيحه ` (10 / 74) من طريق أيوب عن عكرمة به دون قول
أيوب ` انبئت.... `. وكذلك أخرجه ابن ماجه (2 / 336) ، وهو رواية لأحمد
(2 / 247، 327) .
وقد تابعه حماد بن زيد عن عكرمة به. أخرجه أحمد (2 / 353) وإسناده على شرط
البخاري. وأورده الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 78) وقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` ورجاله ثقات `.
وقد ذهل عن كونه في بعض الكتب الستة وقد ذكره المنذري في ` الترغيب ` (3 /
118) من رواية الحاكم دون قوله ` قال أيوب ` فلم يحسن لأنه بذلك صار قول أيوب
مدرجا في الحديث من قول أبي هريرة، ولا يخفى ما فيه.
وللحديث شاهد من حديث ابن عباس مثل حديث أبي هريرة.
أخرجه البخاري وأبو داود (2 / 134) والدارمي (2 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মশকের মুখ লাগিয়ে (সরাসরি) পান করতে নিষেধ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (400)


400 - ` نهى أن يشرب من في السقاء لأن ذلك ينتنه `.
أخرجه الحاكم (4 / 140) من طريق الحارث بن أبي أسامة: حدثنا روح بن عبادة:
حدثنا حماد بن سلمة عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعا.
وقال: صحيح الإسناد.
وفي التلخيص: صحيح على شرط مسلم. وقال الحافظ في ` الفتح ` (10 / 79) :
` سنده قوي `.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মশকের মুখ লাগিয়ে সরাসরি পান করতে নিষেধ করেছেন। কারণ তা সেটিকে (পাত্রের ভেতরের অংশকে) দুর্গন্ধযুক্ত করে দেয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (401)


401 - ` إذا قمت في صلاتك فصل صلاة مودع، ولا تكلم بكلام تعتذر منه غدا، واجمع
الإياس مما في أيدي الناس `.
أخرجه ابن ماجه (2 / 542) وأحمد (5 / 412) وأبو نعيم في ` الحلية `
(1 / 462) عن عبد الله بن عثمان بن خثيم بن عثمان بن جبير مولى أبي أيوب
عن أبي أيوب الأنصاري قال: جاء رجل إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال:
عظني وأوجز. فقال: فذكره.
وهذا سند ضعيف لجهالة عثمان بن جبير قال في ` الميزان `:
ما روى عنه سوى عبد الله بن عثمان بن خثيم حسب ` وفي ` التقريب `: ` مقبول `
وبقية الرجال ثقات. وفي ` الزوائد `:
إسناده ضعيف وعثمان بن جبير قال الذهبي في ` الطبقات ` مجهول.
وذكره ابن حبان في الثقات، وقال البخاري وأبو حاتم روى عن أبيه عن جده
عن أبي أيوب `.
قال المحقق السندي (رح) بعد أن نقل هذا الكلام عن الزوائد:
قلت: لكن كون الحديث من أوجز الكلمات وأجمعها للحكمة يدل على قربه
للثبوت
فليتأمل.
قلت: والحديث وإن كان إسناده ضعيفا فإنه لا يدل على ضعفه وعدم ثبوته في
نفسه لاحتمال أن له إسنادا حسنا أو صحيحا أو أن له شواهد يدل مجموعها على ثبوته
والواقع أن هذا الحديث كذلك فإن له شواهد تدل على أن له أصلا فقد روي من حديث
ابن عمر عند الضياء المقدسي في ` الأحاديث المختارة ` ومن حديث سعد بن أبي
وقاص عند الحاكم (4 /




আবূ আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

"যখন তুমি তোমার সালাতে (নামাজে) দাঁড়াও, তখন বিদায় গ্রহণকারী ব্যক্তির ন্যায় সালাত আদায় করো। আর এমন কোনো কথা বলো না, যার জন্য আগামীকাল (কিয়ামতের দিন বা ভবিষ্যতে) তোমাকে ক্ষমা প্রার্থনা করতে হবে। আর মানুষের হাতে যা কিছু আছে, তা থেকে সম্পূর্ণরূপে নিরাশ হয়ে যাও (অর্থাৎ, তাদের প্রতি ভরসা ত্যাগ করো)।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (402)


402 - ` ما بال قوم جاوزهم القتل اليوم حتى قتلوا الذرية! فقال رجل: يا رسول الله:
إنما هم أولاد المشركين! فقال: ألا إن خياركم أبناء المشركين، ثم قال: ألا
لا تقتلوا ذرية، ألا لا تقتلوا ذرية، قال: كل نسمة تولد على الفطرة حتى يهب
عنها لسانها فأبواها يهودانها وينصرانها `.
أخرجه أحمد (3 / 435) والدارمي (2 / 223) والحاكم (2 / 123) والبيهقي
(9 / 77) من طريق يونس بن عبيد عن الحسن عن الأسود بن سريع قال:
` أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وغزوت معه فأصبت ظهر أفضل الناس يومئذ
حتى
قتلوا الولدان وقال مرة: الذرية فبلغ ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم
فقال: فذكره.
والسياق لأحمد وليس عند الدارمي منه إلا المرفوع منه دون قوله:
فقال رجل الخ.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين، ووافقه الذهبي.
وهو كما قالا وقد صرح الحسن بسماعه من الأسود بن سريع في رواية الحاكم.




আসওয়াদ ইবনু সারি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"ঐ সব লোকদের কী হলো, যারা আজ (যুদ্ধে) মাত্রাতিরিক্ত বাড়াবাড়ি করে শিশুদেরও হত্যা করেছে!"

তখন এক ব্যক্তি বলল, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা তো মুশরিকদেরই সন্তান!"

তিনি (নবী ﷺ) বললেন, "সাবধান! জেনে রাখো, তোমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠতম ব্যক্তিরাও (পূর্বে) মুশরিকদের সন্তান ছিলেন!" এরপর তিনি বললেন, "সাবধান! তোমরা শিশুদের হত্যা করবে না! সাবধান! তোমরা শিশুদের হত্যা করবে না!"

তিনি আরও বললেন, "প্রত্যেক প্রাণই ফিতরাতের (ইসলামের স্বাভাবিক প্রবণতার) উপর জন্মগ্রহণ করে, যতক্ষণ না তার জিহ্বা স্পষ্ট হয় (বা সে কথা বলতে শুরু করে)। অতঃপর তার মাতাপিতা তাকে ইহুদি বানায় অথবা খ্রিস্টান বানায়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (403)


403 - ` إذا فسد أهل الشام فلا خير فيكم، لا تزال طائفة من أمتي منصورين لا يضرهم من
خذلهم حتى تقوم الساعة `.
أخرجه الترمذي (2 / 30) من طريق الطيالسي وهو في ` المسند ` (ص 145 رقم
1076) وكذا أحمد (3 / 436، 5 / 35) وابن حبان (2313) من طريق شعبة عن
معاوية بن قرة عن أبيه مرفوعا. وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
قلت: وهو على شرط الشيخين، وقد أخرج الخطيب (8 /




কুররাহ ইবনে ইয়াস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন শাম অঞ্চলের লোকেরা দুর্নীতিগ্রস্ত হয়ে পড়বে, তখন তোমাদের মাঝেও আর কোনো কল্যাণ বাকি থাকবে না। আমার উম্মতের মধ্যে সর্বদা একটি দল সাহায্যপ্রাপ্ত (বিজয়ী) অবস্থায় থাকবে। যারা তাদের পরিত্যাগ করবে, কিয়ামত সংঘটিত হওয়া পর্যন্ত তারা তাদের কোনো ক্ষতি করতে পারবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (404)


404 - ` نضر الله امرءا سمع منا حديثا فحفظه حتى يبلغه غيره، فإنه رب حامل فقه ليس
بفقيه، ورب حامل فقه إلى من هو أفقه منه، ثلاث خصال لا يغل عليهن قلب مسلم
أبدا: إخلاص العمل لله،
ومناصحة ولاة الأمر، ولزوم الجماعة، فإن دعوتهم
تحيط من ورائهم، وقال: من كان همه الآخرة، جمع الله شمله، وجعل غناه في
قلبه، وأتته الدنيا وهي راغمة، ومن كانت نيته الدنيا، فرق الله عليه
ضيعته، وجعل فقره بين عينيه، ولم يأته من الدنيا إلا ما كتب له `.
أخرجه أحمد (5 / 183) واللفظ له والدارمي (1 / 75) وابن حبان (72،




যায়েদ ইবনে ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ সেই ব্যক্তির চেহারা উজ্জ্বল করুন, যে আমাদের থেকে কোনো হাদীস শুনল, তারপর তা মুখস্থ করল, এবং তা অন্যের কাছে পৌঁছে দিল। কেননা, অনেক ফিকহ বহনকারীই আছে যে নিজে ফকীহ (ইসলামী আইনজ্ঞ) নয়। এবং অনেক ফিকহ বহনকারীই আছে যে তা তার চেয়েও অধিক জ্ঞানী ব্যক্তির কাছে পৌঁছে দেয়।

তিনটি গুণ আছে, যার কারণে কোনো মুসলিমের অন্তর কখনও বিদ্বেষপূর্ণ হয় না: আল্লাহর জন্য কর্মে একনিষ্ঠতা, (মুসলিম) শাসকদের প্রতি কল্যাণ কামনা, এবং জামাআতকে (মুসলিম ঐক্যবদ্ধ সমাজকে) আঁকড়ে ধরে থাকা। কেননা তাদের (জামাআতের) দোয়া পিছন থেকে তাদেরকে বেষ্টন করে রাখে।

আর তিনি (রাসূল ﷺ) আরও বললেন: যে ব্যক্তির একমাত্র চিন্তা হবে আখিরাত, আল্লাহ তার বিক্ষিপ্ত বিষয়সমূহকে একত্রিত করে দেন, তার অন্তরকে প্রাচুর্যময় করে দেন, আর দুনিয়া তার কাছে অবনত হয়ে আসে। আর যার উদ্দেশ্য শুধু দুনিয়া হয়, আল্লাহ তার কাজকে বিক্ষিপ্ত করে দেন, এবং দারিদ্র্যকে তার দুই চোখের মাঝখানে স্থির করে দেন, আর দুনিয়া থেকে শুধু ততটুকুই সে লাভ করে যা তার জন্য লিপিবদ্ধ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (405)


405 - ` لا تسبوا ورقة فإني رأيت له جنة أو جنتين `.
أخرجه الحاكم (2 / 609) من طريق أبي سعيد الأشج حدثنا أبو معاوية عن هشام
بن عروة عن أبيه عن عائشة رضي الله عنها مرفوعا.
وقال: ` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي. وهو كما قالا.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা ওয়ারাকাহকে গালি দিও না। কারণ আমি তার জন্য একটি অথবা দুইটি জান্নাত দেখেছি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (406)


406 - ` كان يذكر الله على كل أحيانه `.
أخرجه مسلم (1 / 194) وأبو داود (1 / 4) والترمذي (2 / 244 طبع بولاق)
وابن ماجه (1 / 129) وكذا أبو عوانة في ` صحيحه ` (1 / 217) والبيهقي
(1 / 90) وأحمد (6 / 70، 153) من طريق يحيى بن زكريا بن أبي زائدة عن
أبيه عن خالد بن سلمة عن عبد الله البهي عن عروة عن عائشة مرفوعا.
وقال الترمذي: ` حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث يحيى بن زكريا بن أبي
زائدة `.
قلت: بلى قد تابعه الوليد بن القاسم بن الوليد الهمداني، وهو ثقة حسن الحديث
إذا لم يخالف.
أخرجه الإمام أحمد (6 / 278) : حدثنا الوليد حدثنا زكريا قال: حدثنا خالد
ابن سلمة، به.
وفيه فائدة هامة وهي تصريح زكريا بسماعه من خالد، فإنه قد قيل فيه: إنه
يدلس عن الشعبي، وبعضهم كأبي داود وغيره أطلق ولم يقيده بالشعبي.
والله أعلم.
وفي ` العلل ` (1 / 51) : ` سألت أبا زرعة عن حديث خالد بن سلمة ...
(فذكره) ؟ فقال: ليس بذاك، هو حديث لا يروى إلا من هذا الوجه.
فذكرت قول أبي زرعة لأبي رحمه الله؟ فقال: الذي أرى أن يذكر الله على الكنيف
وغيره على هذا الحديث `.
قلت: فقد اختلف الإمامان أبو زرعة وأبو حاتم في هذا الحديث، فضعفه الأول،
وصححه الآخر، كما يدل عليه احتجاجه بالحديث وعدم موافقته على قول أبو زرعة،
وذلك عجيب منه، فقد ذكروا في ترجمة البهي عنه أنه قال:
` لا يحتج به وهو مضطرب الحديث `.
والحق أن الحديث قوي لم يتكلم فيه غير أبي حاتم وقد صحح الحديث مسلم ووثق
البهي ابن سعد وابن حبان.
وفي الحديث دلالة على جواز تلاوة القرآن للجنب لأن القرآن ذكر (وأنزلنا إليك
الذكر ... ) فيدخل في عموم قولها ` يذكر الله `.
نعم الأفضل أن يقرأ على طهارة لقوله صلى الله عليه وسلم حين رد السلام عقب
التيمم:
` إنى كرهت أن أذكر الله ألا على طهارة `.
أخرجه أبو داود وغيره وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` رقم (13) .




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) তাঁর সকল অবস্থাতেই আল্লাহর যিকির করতেন।