হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (461)


461 - ` جزى الله الأنصار عنا خيرا، ولا سيما عبد الله بن عمرو بن حرام وسعد
بن عبادة `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (ق 116 / 1) : حدثنا ابن أبي سمينة حدثنا إبراهيم
بن حبيب بن الشهيد قال: قال أبي: عن عمرو بن دينار عن جابر بن عبد الله
قال:
` أمر أبي بخريزة فصنعت، ثم أمرني فأتيت بها النبي صلى الله عليه وسلم، قال:
فأتيته وهو في منزله، قال: فقال لي: ماذا معك يا جابر؟ ألحم ذا؟ قال:
قلت: لا، قال: فأتيت أبي، فقال لي: هل رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم
؟ قلت: نعم، قال: فهلا سمعته يقول شيئا؟ قال: قلت: نعم، قال لي: ماذا
معك يا جابر؟ ألحم ذا؟ قال: لعل رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكون اشتهى
فأمر بشاة داجن فذبحت، ثم أمر بها فشويت، ثم أمرني فأتيت بها النبي صلى الله
عليه وسلم، فقال لي: ماذا معك يا جابر؟ فأخبرته فقال ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات غير ابن سمينة ولم أعرفه الآن. ثم رأيت ابن
السني أخرج الحديث في ` عمل اليوم والليلة ` (271) فقال: أخبرنا أبو يعلى
حدثنا محمد بن يحيى بن أبي سمينة. فعرفناه وهو صدوق كما في ` التقريب ` فثبت
الإسناد والحمد لله. وقد توبع، فقال أبو يعلى عقبه: حدثنا أحمد بن الدورقي
حدثنا إبراهيم بن حبيب بن الشهيد به نحوه.
والدورقي هذا - بفتح الدال - أحمد بن إبراهيم النكري البغدادي ثقة حافظ من
شيوخ مسلم، فصح الحديث والحمد لله. وقد رواه النسائي كما في ترجمة إبراهيم
من ` التهذيب `.
وتابعه محمد بن عمر بن علي بن مقدم حدثنا إبراهيم بن حبيب بن الشهيد به.
أخرجه أبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2 / 285) عن عبد الله بن أحمد ابن سوادة
عنه.
وهذه متابعة قوية فإن ابن مقدم - بالتشديد - صدوق من رجال ` السنن `.
وابن سوادة صدوق أيضا كما في ` تاريخ بغداد ` (9 / 373) .
ثم رأيته في ` مستدرك الحاكم ` (4 /




জাবের ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আমার পিতা (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে হারাম) ‘খারিযাহ’ (এক প্রকার খাদ্য) তৈরি করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি আমাকে তা নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট যেতে বললেন। আমি তাঁর বাড়িতে উপস্থিত হলাম। তিনি আমাকে বললেন: “হে জাবের, তোমার সাথে কী আছে? এটা কি মাংস?”

আমি বললাম: না। এরপর আমি আমার পিতার কাছে ফিরে গেলাম। তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছিলে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তুমি কি তাঁকে কিছু বলতে শুনেছ? আমি বললাম: হ্যাঁ, তিনি আমাকে জিজ্ঞেস করলেন: “হে জাবের, তোমার সাথে কী আছে? এটা কি মাংস?”

(আমার পিতা) বললেন: সম্ভবত রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মাংস খেতে চেয়েছেন। সুতরাং তিনি একটি গৃহপালিত মেষ জবাই করার নির্দেশ দিলেন, তারপর সেটি ভালোভাবে ভুনা করার নির্দেশ দিলেন। এরপর তিনি আমাকে তা নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট যেতে বললেন।

আমি তা নিয়ে তাঁর কাছে গেলে তিনি আমাকে বললেন: “হে জাবের, তোমার সাথে কী আছে?” আমি তাঁকে (মাংসের কথা) জানালাম। তখন তিনি বললেন:

**“আল্লাহ তাআলা আনসারদের আমাদের পক্ষ থেকে উত্তম প্রতিদান দিন, বিশেষ করে আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে হারাম এবং সাদ ইবনে উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে।”**









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (462)


462 - ` جرح رجل فيمن كان قبلكم جراحا، فجزع منه، فأخذ سكينا فخز بها يده، فما رقى
الدم عنه حتى مات، فقال الله عز وجل: عبدي بادرني نفسه حرمت عليه الجنة `.
رواه الطبراني (1 /




বর্ণিত আছে যে, তোমাদের পূর্ববর্তী উম্মতদের মধ্যে এক ব্যক্তি গুরুতর আহত হয়েছিল। আঘাতের যন্ত্রণায় সে অস্থির ও ধৈর্যহারা হয়ে পড়ল। ফলে সে একটি ছুরি নিয়ে তা দিয়ে তার হাতে আঘাত করল (শিরা কেটে ফেলল)। তার রক্তপাত বন্ধ হলো না, অবশেষে সে মারা গেল। মহান আল্লাহ তাআলা বললেন: ‘আমার বান্দা আমার ফয়সালার আগেই নিজেকে শেষ করে দিল। আমি তার জন্য জান্নাত হারাম করে দিলাম।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (463)


463 - ` اجعلوا مكان الدم خلوقا. يعني في رأس الصبي يوم الذبح عنه `.
أخرجه ابن حبان في ` صحيحه ` (1057) : أخبرنا محمد بن المنذر بن سعيد:
حدثنا يوسف بن سعيد حدثنا حجاج عن ابن جريج: أخبرني يحيى بن سعيد عن عمرة
عن عائشة قالت:
` كانوا في الجاهلية إذا عقوا عن الصبي خضبوا قطنة بدم العقيقة، فإذا حلقوا
رأس الصبي، وضعوها على رأسه، فقال النبي صلى الله عليه وسلم `. فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات من رجال ` التهذيب ` غير شيخ ابن حبان
محمد بن المنذر بن سعيد وهو أبو عبد الرحمن الهروي ثقة حافظ له
ترجمة في
` تذكرة الحفاظ ` (2 / 284) و ` الشذرات ` (2 / 242) .
وأخرجه البيهقي في ` السنن الكبرى ` (9 / 303) من طريق عبد المجيد ابن
عبد العزيز عن ابن جريج عن يحيى بن سعيد الأنصاري به. وصححه ابن السكن كما
في ` التلخيص ` رقم (1983) ، وقال الهيثمي في ` المجمع ` (4 / 58) :
` رواه أبو يعلى، ورجاله رجال الصحيح خلا شيخه إسحاق فإني لم أعرفه `.
قلت: إسناد أبي يعلى في ` مسنده ` (3 / 1114 مصورة المكتب الإسلامي) هكذا:
حدثنا إسحاق أنبأنا عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي رواد به.
وإسحاق هذا الذي لم يعرفه الهيثمي هو إسحاق بن أبي إسرائيل كما في حديث آخر
عند أبي يعلى قبل هذا الحديث، واسم أبيه إبراهيم بن كامجرا أبو يعقوب المروزي
وهو من شيوخ البخاري في ` الأدب المفرد ` وأبي داود وغيرهما، وهو ثقة كما
قال ابن معين وغيره مات سنة (240) .




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: জাহেলিয়্যাতের যুগে লোকেরা যখন কোনো ছেলের আকীকা করত, তখন তারা আকীকার রক্ত দিয়ে এক টুকরা তুলা রঞ্জিত করত। যখন তারা শিশুটির মাথা মুণ্ডন করত, তখন সেই রঞ্জিত তুলা তার মাথার উপর রেখে দিত। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “তোমরা রক্তের পরিবর্তে ‘খালূক’ (সুগন্ধি বিশেষ) ব্যবহার করো।” (অর্থাৎ, শিশুর আকীকার দিন তার মাথার উপর এই সুগন্ধি ব্যবহার করবে।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (464)


464 - ` كان إذا فرغ من قراءة أم القرآن رفع صوته، وقال: (آمين) `.
أخرجه ابن حبان (462) والدارقطني (127) والحاكم (1 / 223) والبيهقي
(2 / 58) من طريق إسحاق بن إبراهيم بن العلاء الزبيدي:
حدثنا عمرو بن الحارث حدثنا عبد الله بن سالم عن الزبيدي قال: أخبرني محمد بن
مسلم عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة عن أبي هريرة قال: كان رسول الله صلى
الله عليه وسلم ...
وقال الدارقطني:
` هذا إسناد حسن `. وأقره البيهقي.
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين `! ووافقه الذهبي!
قلت: وهذا عجب منهم جميعا، لاسيما الذهبي منهم، فإنه نفسه أورد إسحاق
ابن إبراهيم هذا في ` الضعفاء ` وقال:
` كذبه محمد بن عوف، وقال أبو داود: ليس بشيء `.
وقال الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق يهم كثيرا، وأطلق محمد بن عوف أنه يكذب `.
ثم هو ليس من رجال الشيخين كما زعم الذهبي تبعا للحاكم!!
وعبد الله بن سالم هو الأشعري الوحاظي الحمصي ولم يخرج له مسلم! وهو ثقة،
وكذلك سائر الرواة ثقات وهم من رجال الشيخين، فالعلة من إسحاق بن إبراهيم.
لكنه لم يتفرد بهذا الحديث، فإن له طريقا آخر، يرويه بشر بن رافع عن أبي
عبد الله بن عم أبي هريرة قال: ` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا تلا
(غير المغضوب عليهم ولا الضالين) قال: آمين حتى يسمع من يليه من الصف
الأول `.
زاد في رواية: ` فيرتج بها المسجد `.
أخرجه أبو داود (934) وابن ماجه (853) والزيادة له.
قلت: وهذا إسناد ضعيف بينه البوصيري في ` الزوائد ` (56 / 1) بقوله:
` هذا إسناد ضعيف، أبو عبد الله، لا يعرف حاله، وبشر ضعفه أحمد،
وقال ابن حبان: يروي الموضوعات `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` بشر بن رافع، فقيه، ضعيف الحديث `.
ومما يقوي الحديث ويشهد لصحته حديث وائل بن حجر قال: فذكره بمعناه.
أخرجه أبو داود (932) والترمذي (2 / 27) وحسنه من طريق سفيان عن سلمة
ابن كهيل عن حجر بن عنبس عنه.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله رجال الشيخين غير حجر بن عنبس وهو صدوق كما في
` التقريب `.
وسفيان هو ابن سعيد الثوري، وتابعه علي بن صالح عن سلمة بن كهيل به ولفظه:
` أنه صلى خلف رسول الله صلى الله عليه وسلم فجهر بآمين، وسلم عن يمينه،
وعن شماله، حتى رأيت بياض خده `.
أخرجه أبو داود (933) .
وإسناده جيد أيضا.
وفي الحديث مشروعية رفع الإمام صوته بالتأمين، وبه يقول الشافعي وأحمد
وإسحاق وغيرهم من الأئمة، خلافا للإمام أبي حنيفة وأتباعه، ولا حجة عندهم
سوى التمسك بالعمومات القاضية بأن الأصل في الذكر خفض الصوت فيه. وهذا مما لا
يفيد في مقابلة مثل هذا الحديث الخاص في بابه، كما لا يخفى على أهل العلم
الذين أنقذهم الله تبارك وتعالى من الجمود العقلي والتعصب المذهبي!
وأما جهر المقتدين بالتأمين وراء الإمام، فلا نعلم فيه حديثا مرفوعا صحيحا
يجب المصير إليه، ولذلك بقينا فيه على الأصل الذي سبقت الإشارة إليه.
وهذا هو مذهب الإمام الشافعي في ` الأم ` أن الإمام يجهر بالتأمين دون
المأمومين وهو أوسط المذاهب في المسألة وأعدلها.
وإني لألاحظ أن الصحابة رضي الله عنهم لو كانوا يجهرون بالتأمين خلف النبي صلى
الله عليه وسلم لنقله وائل بن حجر وغيره ممن نقل جهره صلى الله عليه وسلم به،
فدل ذلك على أن الإسرار به من المؤتمين هو السنة، فتأمل.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন উম্মুল কুরআন (সূরা ফাতিহা) পাঠ শেষ করতেন, তখন তিনি তাঁর কণ্ঠস্বর উঁচু করে ‘আমীন’ বলতেন।

[অন্য এক বর্ণনায় এসেছে:] রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন (সূরা ফাতিহার শেষাংশ) ‘গাইরিল মাগদূবি আলাইহিম ওয়ালাদ-দ্বা-ল্লীন’ পাঠ করতেন, তখন তিনি এমনভাবে ‘আমীন’ বলতেন যে প্রথম কাতারের তাঁর পাশের মুসল্লিরাও তা শুনতে পেত। এবং (তাঁর আমীন বলার কারণে) পুরো মসজিদ প্রতিধ্বনিত হতো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (465)


465 - ` عليكم بالنسلان `.
رواه الحاكم (1 / 443، 2 / 101) وأبو نعيم في ` الطب ` (2 / 8 / 1)
عن روح بن عبادة حدثنا ابن جريج أخبرني جعفر بن محمد عن أبيه عن جابر
قال: ` شكا ناس إلى النبي صلى الله عليه وسلم المشي فدعا بهم فقال: (فذكره)
فنسلنا فوجدناه أخف علينا `.
وقال: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي وهو كما قالا.
وله شاهد مرسل أخرجه ابن قتيبة في ` غريب الحديث ` (1 / 127 / 1) :
حدثني أبي حدثني محمد بن عبيد عن معاوية بن عمرو، عن أبي إسحاق عن ابن عيينة
عن رجل أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بأصحابه وهم يمشون فشكوا الإعياء
فأمرهم أن ينسلوا.
قلت: وهذا مرسل لأن ابن عيينة واسمه الحكم أبو محمد الكندي مولاهم تابعي روى
عن أبي جحيفة وغيره. ورجاله كلهم ثقات رجال الشيخين، غير والد ابن قتيبة
واسمه مسلم بن قتيبة فلم أجد له ترجمة، ويبدو أنه مجهول لا يعرف، فقد ترجم
الخطيب (10 / 170) وغيره لابنه عبد الله بن مسلم بن قتيبة، فلم يذكروا في
شيوخه والده هذا!
(النسلان) بفتح النون والسين المهملة - الإسراع في المشي.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

কিছু লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে (দীর্ঘপথ) হাঁটার কষ্ট সম্পর্কে অভিযোগ করলো। তখন তিনি তাদেরকে ডাকলেন এবং বললেন: "তোমরা দ্রুতগতিতে হাঁটো (নেস্লান অবলম্বন করো)।"

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর আমরা দ্রুতগতিতে হাঁটা শুরু করলাম এবং দেখলাম যে এটি আমাদের জন্য অনেক হালকা বা সহজ হয়ে গেল।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (466)


466 - ` اركع ركعتين ولا تعودون لمثل هذا. يعني الإبطاء عن الخطبة. قاله لسليك
الغطفاني `.
أخرجه ابن حبان (569) والدارقطني (169) من طريق يعقوب بن إبراهيم حدثنا
أبي عن ابن إسحاق حدثني أبان بن صالح عن مجاهد عن جابر بن عبد الله قال:
` دخل سليك الغطفاني المسجد يوم الجمعة، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب
الناس، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
وقال ابن حبان: ` أراد الإبطاء `.
قلت: وإسناده حسن قد صرح عنده ابن إسحاق بالتحديث بخلاف
الدارقطني، وهي
فائدة من أجلها خرجت الحديث هنا، وقد أورده عبد الحق الإشبيلي في ` أحكامه `
(رقم




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুমুআর দিন সুলাইক আল-গাতফানি মসজিদে প্রবেশ করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিচ্ছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "তুমি দুই রাকাত সালাত আদায় করো এবং এমন কাজ আর কখনো করবে না।"

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সুলাইক আল-গাতফানিকে এই কথাটি বলেছিলেন। (অর্থাৎ খুতবা চলাকালীন (তাহিয়্যাতুল মাসজিদ) সালাত আদায় না করে বসে পড়ায় বিলম্ব করাকে তিনি নিষেধ করেছিলেন)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (467)


467 - ` أكثروا من شهادة أن لا إله إلا الله، قبل أن يحال بينكم وبينها ولقنوها
موتاكم `.
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (4 /




তোমরা ’লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’-এর সাক্ষ্য (শাহাদা) বেশি বেশি প্রদান করো, তোমাদের ও এটির (শাহাদার) মধ্যে প্রতিবন্ধকতা সৃষ্টির পূর্বেই। আর তোমরা তোমাদের মুমূর্ষু ব্যক্তিদেরকে এটি তালকীন করো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (468)


468 - ` إذا نعس أحدكم في المسجد يوم الجمعة، فليتحول من مجلسه ذلك إلى غيره `.
أخرجه أبو داود (1119) والترمذي (2 / 404) وابن حبان (571) والحاكم
(1 / 291) والبيهقي (3 / 237) وأحمد (2 / 22، 32) وأبو نعيم في
` أخبار أصبهان ` (2 / 186) من طرق عن محمد بن إسحاق عن نافع عن ابن عمر
قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `!
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `! ووافقه الذهبي!
كذا قالا! وابن إسحاق مدلس، وقد عنعنه في جميع الطرق عنه،
وكأنه لذلك قال البيهقي عقبه:
` ولا يتثبت رفع هذا الحديث، والمشهور عن ابن عمر من قوله `.
ثم ساقه من طريق عمرو بن دينار عنه نحوه.
قلت: وإسناده صحيح. لكن يتقوى المرفوع بأن له طريقا أخرى، وشاهدا.
أما الطريق، فهو عند البيهقي عن أحمد بن عمر الوكيعي حدثنا عبد الرحمن بن محمد
المحاربي عن يحيى بن سعيد الأنصاري عن نافع به بلفظ:
` إذا نعس أحدكم في الصلاة في المسجد يوم الجمعة ... ` وقال:
` والمراد بالصلاة موضع الصلاة، ولا يثبت رفع هذا الحديث ... `.
قلت: ورجال هذه الطريق رجال مسلم، إلا أن المحاربي وصفه أحمد بأنه كان يدلس
وكأنه لذلك لم يثبت البيهقي حديثه، ولولا ذلك لكان السند صحيحا، فلا أقل من
أن يصلح للاستشهاد به.
وأما الشاهد، فيرويه إسماعيل بن مسلم عن الحسن عن سمرة بن جندب أن النبي
صلى الله عليه وسلم قال: فذكره وزاد في روايته:
` قيل لإسماعيل: والإمام يخطب؟ قال: نعم `.
أخرجه البيهقي (3 /




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: "যদি তোমাদের কেউ জুমুআর দিন মসজিদে তন্দ্রাচ্ছন্ন হয়ে পড়ে, তবে সে যেন তার সেই বসার স্থান পরিবর্তন করে অন্য স্থানে চলে যায়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (469)


469 - ` إذا حكمتم فاعدلوا وإذا قتلتم فأحسنوا، فإن الله محسن يحب المحسنين `.
أخرجه ابن أبي عاصم في ` الديات ` (ص 56) وابن عدي في ` الكامل `
(328 / 2) وأبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2 / 113) من طرق عن محمد
ابن بلال حدثنا عمران عن قتادة عن أنس بن مالك رضي الله عنه قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات معروفون غير محمد بن بلال وهو البصري الكندي
قال ابن عدي: ` أرجو أنه لا بأس به `.
وقال الحافظ: ` صدوق يغرب `.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন তোমরা বিচার করবে, তখন ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠা করো। আর যখন তোমরা (কাউকে কিসাস হিসেবে) হত্যা করো, তখন তা উত্তম পন্থায় করো। কেননা আল্লাহ তাআলা ইহসানকারী (উত্তম কাজ সম্পাদনকারী) এবং তিনি ইহসানকারীদের ভালোবাসেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (470)


470 - ` صنفان من أمتي لن تنالهما شفاعتي، إمام ظلوم غشوم، وكل غال مارق `.
أخرجه أبو إسحاق الحربي في ` غريب الحديث ` (5 / 120 / 2) والجرجاني في
` الفوائد ` (112 / 1) وابن أبي الحديد السلمي في ` حديث أبي الفضل السلمي `
(2 / 1) وأبو بكر الكلاباذي في ` مفتاح المعاني ` (360 / 2) من طرق عن
المعلى ابن زياد عن أبي
غالب عن أبي أمامة عن النبي صلى الله عليه وسلم
قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم ثقات رجال مسلم، غير أبي غالب وهو صاحب
أبي أمامة، وهو حسن الحديث. وفي ` التقريب `: ` صدوق يخطىء `.
والحديث قال المنذري في ` الترغيب ` (3 / 144) :
` رواه الطبراني في ` الكبير ` ورجاله ثقات `.
وقال الهيثمي في ` المجمع ` (5 / 235) : ` رواه الطبراني في ` الكبير `
و` الأوسط `، ورجال الكبير ثقات `.
وفيه إشعار بأن إسناد الأوسط ليس كذلك، فإنه عنده (1 / 197 / 2) من طريق
العلاء بن سليمان عن الخليل بن مرة عن أبي غالب به، وقال: ` لم يروه عن
الخليل إلا العلاء `.
قلت: وكلاهما ضعيف.
والحديث أخرجه ابن أبي عاصم في ` السنة ` (4 / 1) وابن سمعون الواعظ في
` المجلس الخامس عشر ` (




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার উম্মতের মধ্যে দুই শ্রেণির লোক এমন, যাদের জন্য আমার শাফাআত (সুপারিশ) নসিব হবে না: (১) একজন সীমালঙ্ঘনকারী, চরম জালেম ও প্রতারক শাসক; এবং (২) প্রত্যেক বাড়াবাড়িকারী (দ্বীনের বিষয়ে সীমা অতিক্রমকারী) ধর্মচ্যুত ব্যক্তি।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (471)


471 - ` إن الشيطان قد أيس أن يعبد بأرضكم هذه، ولكنه قد رضي منكم بما تحقرون `.
أخرجه الإمام أحمد (2 / 368) : حدثنا معاوية: حدثنا أبو إسحاق عن الأعمش
عن أبي صالح عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين.
وأبو إسحاق هو الفزاري.
ومعاوية هو ابن عمرو بن المهلب الأزدي الكوفي البغدادي، ومن طريقه أخرجه
أبو نعيم في ` الحلية ` (8 / 256) وقال: ` صحيح ثابت، رواه عن الأعمش
الناس جميعا `.
قلت: منهم الثوري عند أبي نعيم (7 / 86) .
وللحديث شاهد من حديث ابن مسعود أخرجه أبو يعلى في مسنده بسند ضعيف، وأخرجه
أحمد (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন]: নিশ্চয়ই শয়তান এই ব্যাপারে নিরাশ হয়ে গেছে যে, তোমাদের এই ভূমিতে আর কখনও তার ইবাদত করা হবে। তবে সে তোমাদের এমন সব ছোট ছোট কাজে সন্তুষ্ট, যা তোমরা তুচ্ছ মনে করো।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (472)


472 - ` من استطاع منكم أن ينفع أخاه فليفعل `.
أخرجه مسلم (7 /




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি তার ভাইয়ের কোনো উপকার করতে সক্ষম হয়, সে যেন অবশ্যই তা করে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (473)


473 - ` كان إذا انصرف من صلاة الغداة يقول: هل رأى أحد منكم الليلة رؤيا؟ ويقول:
ليس يبقى بعدي من النبوة إلا الرؤيا الصالحة `.
أخرجه مالك في ` الموطأ ` (2 / 956 / 2) وعند الحاكم (4 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) যখন ফজরের সালাত থেকে ফিরতেন, তখন তিনি বলতেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ কি গত রাতে কোনো স্বপ্ন দেখেছো?" এবং তিনি আরও বলতেন: "আমার পরে নবুয়তের আর কিছুই অবশিষ্ট থাকবে না, নেক (বা ভালো) স্বপ্ন ছাড়া।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (474)


474 - ` أيتكن تنبح عليها كلاب الحوأب `.
أخرجه أحمد (6 / 52) عن يحيى وهو ابن سعيد، و (6 / 97) عن شعبة،
وأبو إسحاق الحربي في ` غريب الحديث ` (5 / 78 / 1) عن عبدة، وابن حبان
في ` صحيحه ` (




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তোমাদের মধ্যে কে সে হবে, যার উপর ‘হাউআব’ (নামক এলাকার) কুকুরগুলো ঘেউ ঘেউ করবে?"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (475)


475 - ` لا تأكل الحمار الأهلي ولا كل ذي ناب من السباع `.
أخرجه الطحاوي في ` شرح المعاني ` (2 / 320) : حدثنا علي بن معبد قال: حدثنا
شبابة بن سوار قال: حدثنا أبو زيد عبد الله بن العلاء قال: حدثنا مسلم
ابن مشكم كاتب أبي الدرداء رضي الله عنه قال: سمعت أبا ثعلبة الخشني
يقول:
` أتيت النبي صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله حدثني ما يحل لي
مما يحرم علي، فقال: ` فذكره.
وأخرجه في ` مشكل الآثار ` (4 / 375) بهذا الإسناد دون سبب الحديث.
قلت: وإسناده صحيح رجاله كلهم ثقات من رجال ` التهذيب `.
وهو في ` الصحيحين ` و ` السنن ` وغيرها من طريق أخرى بلفظ: ` نهى عن أكل
كل ذي ناب من السباع `.
وهو مخرج في ` الارواء ` (2552) .
وله شاهد من حديث أبي هريرة بلفظ: ` كل ذي ناب من السباع فأكله حرام `.




আবু ছা’লাবা আল-খুশানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) বলেছেন: "তোমরা গৃহপালিত গাধা ভক্ষণ করবে না এবং হিংস্র পশুদের মধ্যে দাঁত বা নখর বিশিষ্ট (অর্থাৎ শিকারী) কোনো প্রাণীও ভক্ষণ করবে না।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (476)


476 - ` كل ذي ناب من السباع فأكله حرام `.
أخرجه مسلم ومالك والشافعي وأحمد والطحاوي والبيهقي من طريق عبيدة
ابن سفيان عنه.
وله طريق أخرى عن أبي هريرة بمعناه.
وإسناده جيد، خرجته في المصدر السابق (2553) .
فقه الحديث
فيه دليل على أن الحمار الأهلي وكل ذي ناب من الوحوش حرام أكله وليس مكروها
فقط، كما زعم بعض المفسرين في هذا العصر وتأول النهي على أنه للتنزيه.
ولما رأى التصريح بالتحريم في حديث أبي هريرة زعم أنه رواية بالمعنى، ويدفعه
أنه إن كانت الرواية بالمعنى من الصحابي وهو أبو هريرة فهو أدرى به ممن بعده،
وإن كان يعني أنه من بعض من بعده فيرده مجيئه بلفظ التحريم من الطريق الأخرى.
ويؤكده أن أبا ثعلبة سأل النبي صلى الله عليه وسلم عما يحل له وما يحرم؟
فأجابه بقوله: ` لا تأكل ... ` فهذا نص في أن النهي للتحريم لأنه هو الذى سأل
عنه أبو ثعلبة، ولا
يصح في النظر السليم أن يكون الجواب عليه ` لا تأكل ... `
وهو يعني يجوز الأكل مع الكراهة!




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

প্রতিটি হিংস্র জন্তু যার শ্বদন্ত (শিকারের জন্য ধারালো দাঁত) রয়েছে, তা ভক্ষণ করা হারাম (নিষিদ্ধ)।

[এটি মুসলিম, মালিক, শাফেয়ী, আহমাদ, তাহাবী এবং বাইহাকী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মাধ্যমে উবাইদা ইবনে সুফিয়ান-এর সূত্রে তাঁর (আবু হুরায়রা রাঃ) থেকে বর্ণিত হয়েছে। এর সমার্থক আরেকটি বর্ণনাও আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রয়েছে। এর সনদ (বর্ণনাসূত্র) ভালো, যা আমি পূর্ববর্তী উৎসে (২৫৫৩) উল্লেখ করেছি।]

**হাদীসের ফিকহ**

এই হাদীস প্রমাণ করে যে, গৃহপালিত গাধা এবং প্রতিটি শ্বদন্তবিশিষ্ট হিংস্র পশুর গোশত ভক্ষণ করা হারাম, কেবল মাকরুহ (অপছন্দনীয়) নয়। যেমনটি বর্তমান যুগের কিছু ব্যাখ্যাকার দাবি করে থাকেন এবং নিষেধাজ্ঞাকে মাকরুহে তানযিহী (অননুমোদিত কিন্তু কঠোরভাবে নিষিদ্ধ নয়) হিসেবে ব্যাখ্যা করেন।

যখন তারা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে সুস্পষ্টভাবে ’হারাম’ শব্দটি দেখলেন, তখন তারা দাবি করলেন যে এটি মূলত শব্দানুগ বর্ণনা নয়, বরং ভাবার্থের বর্ণনা (রিওয়ায়াত বিল মা’না)। কিন্তু এই দাবি খণ্ডন করা যায়: যদি সাহাবী (অর্থাৎ আবু হুরায়রা রাঃ) নিজেই ভাবার্থের বর্ণনা দিয়ে থাকেন, তবে তিনি পরবর্তী বর্ণনাকারীদের চেয়ে তা সম্পর্কে অধিক অবগত। আর যদি তারা বোঝাতে চান যে পরবর্তী কোনো বর্ণনাকারী ভাবার্থের বর্ণনা দিয়েছেন, তবে এর জবাবে বলা যায় যে অন্য সূত্রেও ’হারাম’ শব্দটি স্পষ্টভাবে এসেছে।

এটিকে আরো নিশ্চিত করে যে, যখন আবু ছা’লাবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করিম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে তার জন্য কী হালাল এবং কী হারাম—তা জানতে চাইলেন, তখন তিনি উত্তরে বললেন: "তোমরা ভক্ষণ করো না..." এটি নিষেধাজ্ঞার মাধ্যমে হারাম করার সুস্পষ্ট প্রমাণ, কারণ আবু ছা’লাবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হারামের বিষয়েই জিজ্ঞাসা করেছিলেন। যুক্তিসঙ্গত দৃষ্টিতে এটি সঠিক হতে পারে না যে উত্তরটি "তোমরা ভক্ষণ করো না..." হবে, অথচ এর মানে হবে ভক্ষণ করা বৈধ, কেবল মাকরুহ!









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (477)


477 - ` البيت المعمور في السماء السابعة يدخله كل يوم ألف ملك، ثم لا يعودون إليه
حتى تقوم الساعة `.
أخرجه أحمد (3 / 153) وابن جرير (27 / 11) والحاكم (2 / 468)
وعبد ابن حميد في ` المنتخب ` (ق 132 / 2) وتمام في ` الفوائد `
(ج 1 رقم 67) من طريق حماد بن سلمة حدثنا ثابت البناني عن أنس مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، وقال الحاكم: ` على شرط الشيخين `
ووافقه الذهبي، وهو وهم. فإن حمادا لم يخرج له البخاري شيئا.
وتابعه سليمان وهو ابن المغيرة عن ثابت به نحوه.
أخرجه ابن جرير حدثنا محمد بن سنان القزاز قال: حدثنا موسى بن إسماعيل قال:
حدثنا سليمان.
قلت: وهذا سند رجاله ثقات رجال الشيخين غير القزاز وهو ضعيف.
وله طريق أخرى عند البخاري (3 /




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “বায়তুল মামুর সপ্তম আসমানে অবস্থিত। প্রতিদিন এক হাজার ফেরেশতা তাতে প্রবেশ করেন। এরপর কিয়ামত কায়েম না হওয়া পর্যন্ত তারা আর সেখানে ফিরে আসেন না।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (478)


478 - ` قال الله عز وجل: لا يأتي النذر على ابن آدم بشيء لم أقدره عليه، ولكنه
شيء أستخرج به من البخيل يؤتيني عليه ما لا يؤتيني على البخل. وفي رواية: ما
لم يكن آتاني من قبل `.
أخرجه الإمام أحمد في ` المسند ` (2 / 242) : حدثنا سفيان عن أبي الزناد
عن الأعرج عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين، وقد أخرجاه في ` صحيحيهما `
وأبو داود وغيرهم من طرق أخرى عن أبي الزناد به، إلا أنهم لم يجعلوه حديثا
قدسيا، وقد ذكرت لفظه ومن خرجه وطرقه في ` إرواء الغليل ` (2650) .
ورواه النسائي (2 / 142) من طريق أخرى عن سفيان به مختصرا.
وتابعه همام بن منبه عن أبي هريرة به.
أخرجه ابن الجارود في ` المنتقى ` (932) وأحمد (2 / 314) بإسناد صحيح على
شرطهما، ولم يخرجاه من هذا الطريق، ولا بلفظ الحديث القدسي.
وللحديث طريق ثالث بلفظ:
` لا تنذروا، فإن النذر لا يغني من القدر شيئا وإنما يستخرج به من البخيل `.
أخرجه مسلم وصححه الترمذي.
من فقه الحديث:
دل الحديث بمجموع ألفاظه أن النذر لا يشرع عقده، بل هو مكروه، وظاهر النهي
في بعض طرقه أنه حرام، وقد قال به قوم. إلا أن قوله تعالى: ` أستخرج به من
البخيل ` يشعر أن الكراهة أو الحرمة خاص بنذر المجازاة أو المعاوضة، دون نذر
الابتداء والتبرر، فهو قربة محضة، لأن للناذر فيه غرضا صحيحا وهو أن يثاب
عليه ثواب الواجب، وهو فوق ثواب التطوع. وهذا النذر هو المراد - والله
أعلم - بقوله تعالى (يوفون بالنذر) دون الأول.
قال الحافظ في ` الفتح ` (11 / 500) :
` وقد أخرج الطبري بسند صحيح عن قتادة في قوله تعالى (يوفون بالنذر) قال:
كانوا ينذرون طاعة الله من الصلاة والصيام والزكاة والحج والعمرة ومما
افترض عليهم فسماهم الله أبرارا، وهذا صريح في أن الثناء وقع في غير نذر
المجازاة `.
وقال قبل ذلك: ` وجزم القرطبي في ` المفهم ` بحمل ما ورد في الأحاديث من
النهي، على نذر المجازاة، فقال:
هذا النهي محله أن يقول مثلا: إن شفى الله مريضي فعلي صدقة كذا.
ووجه الكراهة أنه لما وقف فعل القربة المذكورة على حصول الغرض المذكور ظهر
أنه لم يتمحض له نية التقرب إلى الله تعالى لما صدر منه، بل سلك فيه مسلك
المعاوضة، ويوضحه أنه لو لم يشف مريضه لم يتصدق بما علقه على شفائه، وهذه
حالة البخيل، فإنه لا يخرج من ماله شيئا إلا بعوض عاجل يزيد على ما أخرج غالبا
وهذا المعنى هو المشار إليه في الحديث بقوله:
` وإنما يستخرج به من البخيل ما لم يكن البخيل يخرجه `. وقد ينضم إلى هذا
اعتقاد جاهل يظن أن النذر يوجب حصول ذلك الغرض، أو أن الله يفعل معه ذلك الغرض
لأجل ذلك النذر، وإليهما الإشارة بقوله في الحديث أيضا ` فإن النذر لا يرد من
قدر الله شيئا `. والحالة الأولى تقارب الكفر، والثانية خطأ صريح `.
قال الحافظ:
قلت: بل تقرب من الكفر أيضا.
ثم نقل القرطبي عن العلماء حمل النهي الوارد في الخبر على الكراهة وقال:
` الذي يظهر لي أنه على التحريم في حق من يخاف عليه ذلك الاعتقاد الفاسد،
فيكون إقدامه على ذلك محرما، والكراهة في حق من لم يعتقد ذلك `.
وهو تفصيل حسن، ويؤيده قصة ابن عمر راوي الحديث في النهي عن النذر فإنها
في نذر المجازاة.
قلت: يريد بالقصة ما أخرجه الحاكم (4 / 304) من طريق فليح بن سليمان عن سعيد
بن الحارث أنه سمع عبد الله بن عمر وسأله رجل من بني كعب يقال له مسعود بن
عمرو: يا أبا عبد الرحمن إن ابني كان بأرض فارس فيمن كان عند عمر بن عبيد الله
وإنه وقع بالبصرة طاعون شديد فلما بلغ ذلك نذرت: إن الله جاء بابني أن أمشي
إلى الكعبة، فجاء مريضا، فمات، فما ترى؟ فقال ابن عمر: (أو لم تنهوا عن
النذر؟ ! إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ` النذر لا يقدم شيئا، ولا
يؤخره، فإنما يستخرج به من البخيل `، أوف بنذرك) .
وقال الحاكم: ` صحيح على شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي.
قلت: وهو عند البخاري دون القصة من هذا الوجه، وفليح يقول الحافظ في
` التقريب ` عنه: ` صدوق كثير الخطأ `.
قلت: فلا ضير على أصل حديثه ما دام أنه لم يتفرد به. والله أعلم.
وبالجملة ففي الحديث تحذير للمسلم أن يقدم على نذر المجازاة، فعلى الناس أن
يعرفوا ذلك حتى لا يقعوا في النهي وهم يحسبون أنهم يحسنون صنعا!




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন, আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্ল বলেছেন:

"কোনো মানত আদম সন্তানের জন্য এমন কিছু নিয়ে আসে না, যা আমি তার জন্য নির্ধারিত তাকদিরে রাখিনি। তবে এটা এমন একটি বিষয়, যার মাধ্যমে আমি কৃপণ ব্যক্তির কাছ থেকে (দান) বের করে আনি। এর কারণে সে আমাকে এমন জিনিস দেয়, যা সে তার কৃপণতার কারণে দিত না।"

(অন্য বর্ণনায় এসেছে: যা সে আমাকে এর আগে দিত না)।

এই হাদিসের আরেকটি সূত্রে এই শব্দগুলো বর্ণিত হয়েছে:
"তোমরা মানত করো না, কারণ মানত তাকদীরের কোনো কিছুকে সামান্যতমও পরিবর্তন করতে পারে না। বরং এর মাধ্যমে কৃপণ ব্যক্তির কাছ থেকে (সম্পদ) বের করে আনা হয়।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (479)


479 - ` النذر نذران، فما كان لله فكفارته الوفاء، وما كان للشيطان فلا وفاء فيه
وعليه كفارة يمين `.
أخرجه ابن الجارود في ` المنتقى ` (935) وعنه البيهقي (10 / 72) :
حدثنا محمد بن يحيى قال: حدثنا محمد بن موسى بن أعين قال حدثنا خطاب: حدثنا
عبد الكريم عن عطاء بن أبي رباح عن ابن عباس رضي الله عنهما عن النبي صلى
الله عليه وسلم.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال البخاري غير خطاب وهو ابن القاسم
الحراني وهو ثقة كما قال ابن معين وأبو زرعة في رواية عنه.
وقال البرذعي عنه: ` منكر الحديث، يقال: إنه اختلط قبل موته `.
وذكره ابن حبان في ` الثقات `.
وقال الحافظ في ` التقريب `: ` ثقة اختلط قبل موته `.
قلت: جزمه باختلاطه غير جيد، ولم يذكره أحد به غير أبي زرعة كما سبق،
ولكنه لم يجزم به بل أشار إلى عدم ثبوت ذلك فيه بقوله: ` يقال ... ` فإنه من
صيغ التمريض كما هو معلوم.
ثم إن الحديث له شواهد من حديث عائشة وغيرها، وقد خرجتها في ` الإرواء `
فراجع الأحاديث (2653، 2654، 2656، 2657) .
وفي الحديث دليل على أمرين اثنين:
الأول: أن النذر إذا كان طاعة لله، وجب الوفاء به وأن ذلك كفارته، وقد صح
عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال: ` من نذر أن يطيع الله فليطعه، ومن نذر أن
يعصي الله فلا يعصه `.
متفق عليه.
والآخر: أن من نذر نذرا فيه عصيان للرحمن، وإطاعة للشيطان، فلا يجوز
الوفاء به، وعليه الكفارة كفارة اليمين، وإذا كان النذر مكروها أو مباحا
فعليه الكفارة من باب أولى، ولعموم قوله عليه الصلاة والسلام: ` كفارة
النذر كفارة اليمين `.
أخرجه مسلم وغيره من حديث عقبة بن عامر رضي الله عنه، وهو مخرج في
` الإرواء ` (2653) .
وما ذكرنا من الأمر الأول والثاني متفق عليه بين العلماء، إلا في وجوب
الكفارة في المعصية ونحوها، فالقول به مذهب الإمام أحمد وإسحاق كما قال
الترمذي (1 / 288) ، وهو مذهب الحنفية أيضا، وهو الصواب لهذا الحديث
وما في معناه مما أشرنا إليه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"মানত (নযর) দুই প্রকার। যে মানত আল্লাহর জন্য করা হয়, তা পূর্ণ করাই হলো তার কাফফারা। আর যে মানত শয়তানের জন্য করা হয় (অর্থাৎ, যা গুনাহের কাজ), তা পূর্ণ করা যাবে না এবং তার উপর শপথের (কাসসামের) কাফফারা ওয়াজিব হবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (480)


480 - ` هو الطهور ماؤه، الحل ميتته `.
أخرجه مالك (1 / 44 ـ 45) عن صفوان بن سليم عن سعيد بن سلمة من آل بني الأزرق
عن المغيرة بن أبي بردة وهو من بني عبد الدار أنه سمع أبا هريرة يقول:
` جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله إنا نركب
البحر، ونحمل معنا القليل من الماء، فإن توضأنا به عطشنا أفنتوضأ به؟ فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم ... ` فذكره.
ومن طريق مالك أخرجه أصحاب السنن وغيرهم وصححه الترمذي وجماعة من المتقدمين
والمتأخرين ذكرت أسماءهم في ` صحيح أبي داود ` (76) .
وهذا إسناد رجاله ثقات غير سعيد بن سلمة، وقد ادعى بعضهم أنه مجهول لم يرو
عنه غير صفوان، ومع ذلك وثقه النسائي وابن حبان، لكن قيل: إنه روى عنه
أيضا الجلاح أبو كثير، وفيه نظر عندي يأتي بيانه.
قال الحافظ في ` التلخيص ` (1 / 10) :
` وأما سعيد بن سلمة، فقد تابع صفوان بن سليم على روايته له عند الجلاح
أبو كثير، رواه عنه الليث بن سعيد، وعمرو بن الحارث وغيرهما، ومن طريق
الليث رواه أحمد والحاكم والبيهقي عنه `.
قلت: يعني أن الجلاح هذا رواه أيضا عن سعيد بن سلمة، فيكون له راويان صفوان
والجلاح.
وحينئذ فعزو هذه المتابعة لأحمد فيه نظر، لأن السند عنده (2 / 378) هكذا:
` حدثنا قتيبة بن سعيد عن ليث عن الجلاح أبي كثير عن المغيرة بن أبي بردة عن
أبي هريرة ... `.
فالجلاح في هذا السياق متابع لسعيد بن سلمة، لا لصفوان كما أدعى الحافظ
رحمه الله، نعم إنما تصح دعواه بالنظر إلى سياق الحاكم لإسناده (1 / 141)
وعنه تلقاه البيهقي (1 / 3) ، رواه من طريق عبيد بن عبد الواحد بن شريك
حدثنا يحيى بن بكير: حدثني الليث عن يزيد بن أبي حبيب حدثني الجلاح (أبو)
كثير أن ابن سلمة المخزومي حدثه أن المغيرة بن أبي بردة أخبره به.
فهذا السياق مخالف لسياق أحمد في موضعين:
الأول: أنه أدخل بين الليث والجلاح يزيد بن أبي حبيب، والأول أسقطه من
بينهما.
والآخر: أنه أدخل بين الجلاح وبين المغيرة بن سلمة المخزومي وهو سعيد ابن
سلمة، والآخر أسقطه.
وهذا الاختلاف كما يبدو لأول وهلة إنما هو بين قتيبة بن سعيد ويحيى بن بكير،
ولو ثبتت هذه المخالفة عن يحيى لكانت مرجوحة لأنه دون قتيبة في الحفظ
والضبط
فقد أطلق النسائي فيه الضعف، وتكلم فيه غيره، لكن قال ابن عدي:
هو أثبت الناس في الليث. وهذا القول اعتمده الحافظ في ` التقريب ` فقال:
` ثقة في الليث `. وقال في قتيبة: ` ثقة ثبت `.
وإذا تبين الفرق بين الرجلين، فالنفس تطمئن لرواية قتيبة المتفق على ثقته
وضبطه، أكثر من رواية يحيى بن بكير المختلف فيه، ولو أن عبارة ابن عدي تعطي
بإطلاقها ترجيح روايته عن الليث خاصة على رواية غيره عنه.
ومع ذلك فإن في ثبوت هذا السياق عن يحيى نظر، لأن الراوي عنه عبيد ابن
عبد الواحد بن شريك فيه كلام أيضا. وإليك ما جاء في ترجمته عند الخطيب في
` تاريخ بغداد ` (11 / 99) :
` قال الدارقطني: صدوق. وقال أبو مزاحم موسى بن عبيد الله: كان أحد الثقات
ولم أكتب عنه في تغيره شيئا. وقال ابن المنادي (يعني في تاريخه) :
أكثر الناس عنه، ثم أصابه أذى فغيره في آخر أيامه، وكان على ذلك صدوقا.
وقال الخطبي: لم أكتب عنه شيئا `.
ويتلخص مما سبق أن سياق أحمد عن الليث عن الجلاح أبي كثير عن المغيرة ابن أبي
بردة عن أبي هريرة، هو الصحيح عن الليث والجلاح.
وإذا تبين هذا، فالسند صحيح رجاله كلهم ثقات رجال مسلم غير المغيرة وهو ثقة
كما قال النسائي، وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট এসে জিজ্ঞেস করলেন, “হে আল্লাহর রাসূল! আমরা সমুদ্রপথে ভ্রমণ করি এবং আমাদের সাথে খুব সামান্য পরিমাণ পানি বহন করি। যদি আমরা তা দিয়ে ওযু করি, তবে আমরা পিপাসার্ত হয়ে পড়ব। আমরা কি তা দিয়ে ওযু করতে পারি?”

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “এর (সমুদ্রের) পানি পবিত্রকারী (পবিত্র), আর এর মৃত জীব হালাল (ভক্ষণের জন্য)।”