সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
47 - ` إن الله عز وجل قبض قبضة فقال: في الجنة برحمتي، وقبض قبضة فقال: في
النار ولا أبالي `.
رواه أبو يعلى في ` مسنده ` (171 / 2) والعقيلي في ` الضعفاء ` (ص 93)
وابن عدي في ` الكامل ` (66 / 2) ، والدولابي في ` الأسماء والكنى `
(2 / 48) من حديث الحكم بن سنان، عن ثابت، عن أنس مرفوعا.
وقال ابن عدي:
` الحكم بن سنان بعض ما يرويه مما لا يتابع عليه `.
ونحوه قال العقيلي.
قلت: قد توبع عليه فالحديث صحيح، وقد أشار إلي ذلك العقيلي بقوله:
` وقد روي في القبضتين أحاديث بأسانيد صالحة `.
قلت: وها نحن موردوها إن شاء الله تعالى.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি বলেন,) নিশ্চয়ই আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল (মহাপ্রতাপশালী ও মহামহিম) এক মুষ্টি গ্রহণ করলেন এবং বললেন: ‘এরা আমার রহমতের দ্বারা জান্নাতে যাবে।’ আর তিনি (অপর) এক মুষ্টি গ্রহণ করলেন এবং বললেন: ‘এরা জাহান্নামে যাবে, আর আমি (তাতে) কোনো পরোয়া করি না।’
48 - ` إن الله عز وجل خلق آدم، ثم أخذ الخلق من ظهره وقال: هؤلاء إلى الجنة
ولا أبالي وهؤلاء إلى النار ولا أبالي، فقال قائل: يا رسول الله فعلى ماذا
نعمل؟ قال: على مواقع القدر `.
رواه أحمد (4 / 186) وابن سعد في ` الطبقات ` (1 / 30، 7 / 417) ،
وابن حبان في ` صحيحه ` (1806) ، والحاكم (1 / 31) والحافظ عبد الغني
المقدسي في (الثالث والتسعين من ` تخريجه ` 41 / 2) من طريق أحمد عن
عبد الرحمن بن قتادة السلمي،
وكان من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم
مرفوعا.
وقال الحاكم: ` صحيح `.
ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
আবদুর রহমান ইবনে ক্বাতাদাহ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আদম (আঃ)-কে সৃষ্টি করলেন। এরপর তিনি তাঁর পিঠ থেকে (সমুদয়) সৃষ্টিকে বের করলেন এবং বললেন: ‘এরা জান্নাতের অধিবাসী হবে, আর আমি (তাতে) কোনো পরোয়া করি না। আর এরা জাহান্নামের অধিবাসী হবে, আর আমি (তাতে) কোনো পরোয়া করি না।’
তখন একজন প্রশ্নকারী বলল, ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! তাহলে আমরা কীসের ভিত্তিতে আমল করব?’
তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, ‘তাকদীরের গন্তব্যের (যা নির্ধারিত হয়েছে তার) উপর।’
49 - ` خلق الله آدم حين خلقه فضرب كتفه اليمنى، فأخرج ذرية بيضاء كأنهم الذر،
وضرب كتفه اليسرى، فأخرج ذرية سوداء كأنهم الحمم، فقال للذي في يمينه:
إلى الجنة ولا أبالي وقال للذي في كتفه اليسرى: إلى النار ولا أبالي `.
رواه أحمد وابنه في زوائد ` المسند ` (6 / 441) وابن عساكر في
` تاريخ دمشق ` (ج 15 / 136 / 1) .
قلت: وإسناده صحيح.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
আল্লাহ তাআলা যখন আদম (আঃ)-কে সৃষ্টি করলেন, তখন তিনি তাঁর ডান কাঁধে আঘাত করলেন। ফলে সেখান থেকে এক শুভ্র প্রজন্ম বের হয়ে এলো, যেন তারা ক্ষুদ্র কণা বা পিপীলিকা। আর তিনি তাঁর বাম কাঁধে আঘাত করলেন। ফলে সেখান থেকে এক কালো প্রজন্ম বের হয়ে এলো, যেন তারা কালো কয়লা বা অঙ্গার। অতঃপর তিনি ডান দিকে থাকা (সৃষ্টিদের) বললেন: “জান্নাতের দিকে যাও, আমি পরোয়া করি না।” আর তিনি বাম কাঁধে থাকা (সৃষ্টিদের) বললেন: “জাহান্নামের দিকে যাও, আমি পরোয়া করি না।”
50 - ` إن الله تبارك وتعالى قبض قبضة بيمينه فقال: هذه لهذه ولا أبالي وقبض
قبضة أخرى، يعني: بيده الأخرى، فقال: هذه لهذه ولا أبالي `.
رواه أحمد (55 / 68) عن أبي نضرة قال:
` مرض رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فدخل عليه أصحابه يعودونه،
فبكى، فقيل له: ما يبكيك يا عبد الله! ألم يقل لك رسول الله صلى الله عليه
وسلم: خذ من شاربك
ثم أقره حتى تلقاني؟ قال: بلى، ولكني سمعت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يقول: (فذكره، وقال في آخره:) فلا أدري في أي
القبضتين أنا `.
وإسناده صحيح.
وفي الباب عن أبي موسى وأبي سعيد وغيرهما فليراجعها من شاء في ` مجمع
الزوائد ` (6 /
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একজন সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে একজন ব্যক্তি অসুস্থ হয়ে পড়লে, তাঁর অন্য সাহাবীগণ তাঁকে দেখতে (শুশ্রূষা করতে) গেলেন। তিনি তখন কেঁদে উঠলেন। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো, “হে আল্লাহর বান্দা, আপনি কাঁদছেন কেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আপনাকে বলেননি: ‘তুমি তোমার গোঁফ ছেঁটে নাও, অতঃপর তা (এই অবস্থায়) রেখে দাও যতক্ষণ না তুমি আমার সাথে মিলিত হও’?”
তিনি বললেন, “হ্যাঁ, (তিনি বলেছিলেন) কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তাঁর ডান হাতে একটি মুষ্টি গ্রহণ করলেন এবং বললেন: এরা এর জন্য, আমি কোনো পরোয়া করি না। আর তিনি অপর একটি মুষ্টি গ্রহণ করলেন – অর্থাৎ, তাঁর অন্য হাত দিয়ে – এবং বললেন: এরা এর জন্য, আমি কোনো পরোয়া করি না।’
(তারপর তিনি এই হাদিসটি বর্ণনা করে শেষে বললেন:) তাই আমি জানি না যে, আমি এই দুই মুষ্টির মধ্যে কোনটিতে আছি।”
51 - ` أيما أهل بيت من العرب والعجم أراد الله بهم خيرا أدخل عليهم الإسلام، ثم
تقع الفتن كأنها الظلل `.
رواه أحمد (3 / 477) ، والحاكم (1 / 34) ، والبيهقي أيضا في ` الأسماء `
(ص 117) ، وابن الأعرابي في ` حديث سعدان بن نصر ` (1 / 4 / 1) .
وقال الحاكم: ` صحيح وليس له علة `.
وأقره الذهبي وهو كما قالا.
وروى الحاكم (1 /
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আরবের বা অনারবের যে কোনো পরিবারের জন্য আল্লাহ যখন কল্যাণকর কিছু করার ইচ্ছা করেন, তখন তাদের মধ্যে ইসলাম প্রবেশ করিয়ে দেন। অতঃপর ফিতনাসমূহ (বিপর্যয়) মেঘের ছায়ার মতো তাদের উপর আপতিত হয়।
52 - ` إن الله عز وجل لا يقبل من العمل إلا ما كان له خالصا وابتغي به وجهه `.
وسببه كما رواه أبو أمامة رضي الله عنه قال:
` جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: أرأيت رجلا غزا يلتمس الأجر
والذكر ماله؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: لا شيء له، فأعادها ثلاث
مرات، يقول له رسول الله صلى الله عليه وسلم: لا شيء له. ثم قال.... `
فذكره.
رواه النسائي في ` الجهاد ` (2 / 59) وإسناده حسن كما قال الحافظ العراقي
في ` تخريج الإحياء ` (4 / 328) .
والأحاديث بمعناه كثيرة تجدها في أول كتاب ` الترغيب ` للحافظ المنذري.
فهذا الحديث وغيره يدل على أن المؤمن لا يقبل منه عمله الصالح إذا لم يقصد به
وجه الله عز وجل، وفي ذلك يقول تعالى: (فمن كان يرجو لقاء ربه فليعمل عملا
صالحا، ولا يشرك بعبادة ربه أحدا) . فإذا كان هذا شأن المؤمن فماذا يكون حال
الكافر بربه إذا لم يخلص له في عمله؟ الجواب في قول الله تبارك وتعالى:
(وقدمنا إلى ما عملوا من عمل فجعلناه هباء منثورا) .
وعلى افتراض أن بعض الكفار يقصدون بعملهم الصالح وجه الله على كفرهم، فإن
الله تعالى لا يضيع ذلك عليهم، بل يجازيهم عليها في الدنيا، وبذلك جاء النص
الصحيح الصريح عن رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو:
` إن الله لا يظلم مؤمنا حسنته، يعطى بها (وفي رواية: يثاب عليها الرزق في
الدنيا) ويجزى بها في الآخرة، وأما الكافر فيطعم بحسنات ما عمل بها لله في
الدنيا، حتى إذا أفضى إلى الآخرة لم يكن له حسنة يجزى بها `.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা কোনো আমল কবুল করেন না, যতক্ষণ না তা একমাত্র তাঁরই জন্য খালেস হয় এবং এর মাধ্যমে তাঁর সন্তুষ্টি চাওয়া হয়।
(এই নির্দেশের প্রেক্ষাপট বর্ণনা করতে গিয়ে তিনি বলেন,) এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে এসে জিজ্ঞেস করল: আপনি এমন ব্যক্তি সম্পর্কে কী বলেন, যে জিহাদে বের হয়েছে সওয়াব ও খ্যাতি অর্জনের উদ্দেশ্যে? তার কী প্রাপ্তি হবে?
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: তার জন্য কিছুই নেই। লোকটি তিনবার এই প্রশ্নটির পুনরাবৃত্তি করল। প্রতিবারই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: তার জন্য কিছুই নেই। তারপর তিনি বললেন... (অর্থাৎ উপরোক্ত হাদিসের প্রথম অংশটি উল্লেখ করলেন)।
[এবং অন্য একটি হাদীসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেন:]
নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা কোনো মুমিন বান্দার নেক আমলের প্রতি জুলুম করেন না। সে এর বিনিময়ে দুনিয়াতে প্রদান করা হয় (অন্য বর্ণনায়: এর কারণে তাকে দুনিয়ায় রিযিক দিয়ে পুরস্কৃত করা হয়) এবং আখিরাতেও তাকে এর প্রতিদান দেওয়া হয়। আর কাফিরের ক্ষেত্রে, সে আল্লাহর (সন্তুষ্টির) জন্য দুনিয়াতে যে নেক আমল করে, এর বিনিময়ে তাকে দুনিয়াতেই ভোগ করতে দেওয়া হয়। এমনকি যখন সে আখিরাতে পৌঁছাবে, তখন তার জন্য এমন কোনো নেক আমল অবশিষ্ট থাকবে না যার জন্য তাকে পুরস্কৃত করা হবে।
53 - ` إن الله لا يظلم مؤمنا حسنته يعطى بها (وفي رواية: يثاب عليها الرزق في
الدينا) ويجزى بها في الآخرة وأما الكافر فيطعم بحسنات ما عمل بها لله في
الدنيا حتى إذا أفضى إلى الآخرة لم يكن له حسنة يجزى بها `.
أخرجه مسلم (8 / 135) ، وأحمد (3 / 125) ، ولتمام في ` الفوائد `
(879) الشطر الأول.
تلك هي القاعدة في هذه المسألة: أن الكافر يجازى على عمله الصالح شرعا في
الدنيا، فلا تنفعه حسناته في الآخرة، ولا يخفف عنه العذاب بسببها فضلا عن
أن ينجو منه.
وقد يظن بعض الناس أن في السنة ما ينافي القاعدة المذكورة من مثل الحديث
الآتى:
عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر عنده عمه أبو طالب،
فقال: ` لعله تنفعه شفاعتي يوم القيامة فيجعل في ضحضاح من نار، يبلغ كعبيه،
يغلي منه دماغه `.
নিশ্চয় আল্লাহ কোনো মুমিনের একটি সৎকর্মেও অবিচার করেন না। এর বিনিময়ে তিনি তাকে (দুনিয়ায়) প্রদান করেন (অন্য বর্ণনায়: এর কারণে তিনি দুনিয়াতে জীবিকা দ্বারা পুরস্কৃত হন) এবং আখিরাতেও এর প্রতিদান দেওয়া হবে। আর কাফিরের বিষয়টি হলো, সে দুনিয়ায় আল্লাহর জন্য যে সৎকর্মগুলো করে, তার বিনিময়ে তাকে (দুনিয়াতে) ভক্ষণ করানো হয় (বা ভোগ দেওয়া হয়)। অবশেষে যখন সে আখিরাতে পৌঁছবে, তখন তার এমন কোনো সৎকর্ম থাকবে না যার বিনিময়ে তাকে প্রতিদান দেওয়া হবে।
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট তাঁর চাচা আবু তালিবের আলোচনা করা হলো। তখন তিনি বললেন: "সম্ভবত কিয়ামতের দিন আমার সুপারিশ তাকে কিছুটা উপকার দেবে। ফলে তাকে আগুনের হালকা ও অগভীর এক স্থানে রাখা হবে, যা তার গোড়ালি পর্যন্ত পৌঁছবে। আর তাতেই তার মস্তিষ্ক টগবগ করে ফুটতে থাকবে।"
54 - عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر عنده عمه أبو طالب،
فقال: ` لعله تنفعه شفاعتي يوم القيامة فيجعل في ضحضاح من نار يبلغ كعبيه يغلي
منه دماغه `.
عن أبي سعيد الخدري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر عنده عمه أبو طالب
فقال: ` نعم، هو في ضحضاح من نار، ولولا أنا
(أي شفاعته) لكان في الدرك الأسفل من النار `.
رواه مسلم (1 / 135) ، وأحمد (3 /
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট তাঁর চাচা আবু তালিবের কথা আলোচনা করা হলে তিনি বললেন: "সম্ভবত কিয়ামতের দিন আমার সুপারিশ তাকে উপকার করবে। ফলে তাকে আগুনের একটি অগভীর স্থানে (’দাহদাহ’-এ) রাখা হবে, যা তার গোড়ালি পর্যন্ত পৌঁছাবে এবং এর কারণে তার মস্তিষ্ক ফুটতে থাকবে।"
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরও বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (আবু তালিবের অবস্থা প্রসঙ্গে) বললেন: "হ্যাঁ, সে আগুনের একটি অগভীর স্থানে রয়েছে। যদি আমি না থাকতাম (অর্থাৎ আমার সুপারিশ না থাকত), তবে সে অবশ্যই জাহান্নামের সর্বনিম্ন স্তরে (আদ-দারক আল-আসফালে) থাকত।"
55 - عن العباس بن عبد المطلب أنه قال: يا رسول الله، هل نفعت أبا طالب بشيء
فإنه كان يحوطك ويغضب لك؟ قال: ` نعم هو في ضحضاح من نار ولولا أنا (أي
شفاعته) لكان في الدرك الأسفل من النار `.
(عن العباس بن عبد المطلب) :
رواه مسلم (1 /
আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আপনি কি আবু তালিবকে কোনোভাবে উপকৃত করেছেন? কেননা তিনি আপনাকে নিরাপত্তা দিতেন এবং আপনার জন্য রাগ করতেন (আপনাকে রক্ষা করতেন)।" তিনি (নবী সাঃ) বললেন, "হ্যাঁ, সে আগুনের হালকা গর্তে (অগভীর স্থানে) আছে। যদি আমি না থাকতাম (অর্থাৎ আমার সুপারিশ), তবে সে জাহান্নামের সর্বনিম্ন স্তরে থাকত।"
56 - ` كان يأكل القثاء بالرطب `.
رواه البخاري (2 / 506) ، ومسلم (6 / 122) ، وأبو داود (رقم 3835)
والترمذي (1 / 339) ، والدارمي (2 / 103) ، وابن ماجه (3325) وأحمد (
1 /
203) ، وأبو الحسن أحمد بن محمد المعروف بابن الجندي في ` الفوائد الحسان
` (ق 2 / 1) ، من حديث عبد الله بن جعفر مرفوعا،
واللفظ لأبي داود، والترمذي، وقال الآخرون: ` رأيت `، بدل: ` كان `.
وقال الترمذي: ` حديث حسن صحيح `.
وفي رواية لأحمد (1 / 204) بلفظ:
` إن آخر ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في إحدى يديه رطبات، وفي
الأخرى قثاء، وهو يأكل من هذه، وبعض من هذه `.
وفي إسناده نصر بن باب وهو واه. وعزاه الهيثمي في ` مجمع الزوائد `
(5 / 38) للطبراني في ` الأوسط ` في حديث طويل، وقال:
` وفيه أصرم بن حوشب وهو متروك `.
وكذلك عزاه إليه فقط الحافظ في ` الفتح ` (9 / 496) وقال:
` في سنده ضعف `.
وفاتهما أنه في ` المسند ` أيضا كما ذكرنا، وفي عبارة الحافظ تهوين ضعف
إسناده مع أنه شديد كما يشير إلى ذلك قول الهيثمي في رواية: ` وهو متروك `.
ولذلك أقول: إن الحديث بهذه الزيادة ضعيف، ولا يتقوى أحد الإسنادين بالآخر
لشدة ضعفهما، نعم له شاهد من حديث أنس بن مالك بلفظ:
` كان يأخذ الرطب بيمينه والبطيخ بيساره، فيأكل الرطب بالبطيخ، وكان أحب
الفاكهة إليه `.
ولكنه ضعيف أيضا شديد الضعف، فقال الهيثمي:
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه يوسف بن عطية الصفار، وهو متروك `.
ومن طريقه أخرجه الحاكم (4 / 121) ، وذكر أنه تفرد به يوسف هذا.
قال الذهبي: ` وهو واه `.
وقول الحافظ فيه: ` وسنده ضعيف، فيه ما قلناه آنفا في قوله المتقدم في حديث
ابن جعفر.
وهو مع الضعف المذكور فقد ذكر ` البطيخ ` بدل القثاء. لكن لهذا أصل عن جماعة
من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم منهم أنس رضي الله عنه ويأتي بعد هذا.
وأخرج أبو داود (3903) وابن ماجه (3324) عن عائشة قالت:
` كانت أمي تعالجني للسمنة، تريد أن تدخلني على رسول الله صلى الله عليه وسلم
فما استقام لها ذلك حتى أكلت القثاء بالرطب، فسمنت كأحسن سمنة `.
وإسناده صحيح. وعزاه الحافظ لابن ماجه والنسائي، وكأنه يعني في
` السنن
الكبرى `. قال:
` وعند أبي نعيم في ` الطب ` من وجه آخر عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم
أمر أبويها بذلك `.
قلت: وينظر في إسناده.
আব্দুল্লাহ ইবনে জাফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাজা খেজুরের (রুতাব) সাথে কিসসা’ (শসা বা শসা-জাতীয় ফল) খেতেন।
অপর এক বর্ণনায় তিনি বলেন: সর্বশেষ আমি যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখেছি, তখন তাঁর এক হাতে ছিল তাজা খেজুর এবং অন্য হাতে ছিল কিসসা’, আর তিনি উভয়টি থেকেই খাচ্ছিলেন।
আয়েশা সিদ্দিকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার মা আমার ওজন বৃদ্ধির জন্য যত্ন নিতেন। তিনি আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট (তাঁর ঘরে) পাঠাতে চাচ্ছিলেন। কিন্তু তিনি তাতে সফল হচ্ছিলেন না, যতক্ষণ না আমি তাজা খেজুরের সাথে কিসসা’ (কাঁচা শসা) খেলাম। অতঃপর আমি সর্বোত্তমভাবে মোটা হয়ে উঠলাম।
57 - كان يأكل البطيخ بالرطب فيقول: ` نكسر حر هذا ببرد هذا وبرد هذا بحر هذا `.
رواه الحميدي في ` مسنده ` (42 / 1) ، وأبو داود (3835) ، والترمذي
(1 / 338) وأبو بكر محمد بن عبد الله الأبهري في ` الفوائد ` (ق 144 / 1)
وأبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (1 / 103) ، وكذا أبو جعفر البحتري في
` الفوائد ` (4 / 77 / 2) ، وأبو بكر بن أبي داود في ` مسند عائشة `
(54 / 2) من حديث عائشة رضي الله عنها.
وقال الترمذي: ` حديث حسن غريب `.
قلت: وإسناد الحميدي صحيح على شرط الشيخين، وإسناد أبي داود حسن،
والزيادة له، وعزاه الحافظ (9 / 496) للنسائي بدونها وقال:
` سنده صحيح `.
وله شاهد من حديث أنس مثل رواية النسائي أخرجه ابن الضريسي في ` أحاديث مسلم
بن إبراهيم الأزدي ` (5 / 1) بسند رجاله ثقات.
ورواه ابن ماجه (3326) من حديث سهل بن سعد، لكن إسناده واه جدا، فيه يعقوب
بن الوليد كذبه أحمد وغيره. ففي حديث عائشة غنية.
قال ابن القيم في ` زاد المعاد ` (3 / 175) بعد أن ذكره بالزيادة:
` وفي البطيخ عدة أحاديث، لا يصح منها شيء غير هذا الحديث الواحد، والمراد
به الأخضر وهو بارد رطب، وفيه جلاء، وهو أسرع انحدارا عن المعدة من القثاء
والخيار، وهو سريع الاستحالة إلى أي خلط كان صادفه في المعدة، وإذا كان
آكله محرورا انتفع به جدا، وإن كان مبرودا دفع ضرره بيسير من الزنجبيل ونحوه
وينبغي أكله قبل الطعام، ويتبع به، وإلا غثى وقيأ.
وقال بعض الأطباء:
إنه قبل الطعام يغسل البطن غسلا، ويذهب الداء أصلا `.
وهذا الذي عزاه لبعض الأطباء قد روي مرفوعا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم
ولكنه لا يصح، وقد سبق الكلام عليه في ` الأحاديث الضعيفة ` (رقم 144) ،
فليراجعه من شاء.
وقوله: ` المراد به الأخضر `، هو الظاهر من الحديث. ولكن الحافظ رده في
` الفتح ` وذكر أن المراد به الأصفر، واحتج بالحديث الآتي، ويأتي الجواب
عنه فيه. وهو:
` كان يأكل الرطب مع الخربز يعني البطيخ `.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তরমুজ তাজা পাকা খেজুরের (রুতাব) সাথে খেতেন এবং বলতেন: "আমরা এর (খেজুরের) উষ্ণতাকে এর (তরমুজের) শীতলতা দ্বারা এবং এর (তরমুজের) শীতলতাকে এর (খেজুরের) উষ্ণতা দ্বারা প্রশমিত করি।"
58 - ` كان يأكل الرطب مع الخربز. يعني البطيخ `.
رواه أحمد (3 / 142، 143) وأبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (105 / 2)
والضياء في ` المختارة ` (86 / 2) عن جرير بن حازم عن حميد عن أنس
مرفوعا.
ثم رواه الضياء من طريق أحمد حدثنا وهب بن جرير حدثني أبي به نحوه ثم قال:
` وروي عن مهنا صاحب أحمد بن حنبل عنه أنه قال: ليس هو صحيحا، ليس يعرف من
حديث حميد ولا من غير حديث حميد، ولا يعرف إلا من قبل عبد الله بن جعفر.
قلت: - والله أعلم - رواية أحمد له في ` المسند ` يوهن هذا القول أو (يؤيد)
رجوعه عنه بروايته له وتركه في كتابه وحديث عبد الله بن جعفر في ` الصحيحين `.
قال: ` رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يأكل القثاء بالرطب `.
قلت: وإسناده صحيح، ولا علة قادحة فيه، وجرير بن حازم وإن كان اختلط
فإنه لم يحدث في اختلاطه كما قال الحافظ في ` التقريب `، ولذلك صحح إسناده
في ` الفتح ` (9 / 496) بعد أن عزاه للنسائي. يعني في الكبرى. ثم قال:
` و (الخربز) وهو بكسر الخاء المعجمة وسكون الراء وكسر الموحدة بعدها زاي
نوع من البطيخ الأصفر، وقد تكبر القثاء فتصفر من شدة الحر فتصير كالخربز كما
شاهدته كذلك بالحجاز، وفي هذا تعقب على من زعم أن المراد بالبطيخ في الحديث
الأخضر واعتل بأن في الأصفر حرارة كما في الرطب، وقد ورد التعليل بأن أحدهما
يطفئ حرارة الآخر.
والجواب عن ذلك بأن في الأصفر بالنسبة للرطب برودة، وإن كان فيه لحلاوته طرف
حرارة. والله أعلم `.
أقول: وفي هذا التعقب نظر عندي، ذلك لأن الحديثين مختلفا المخرج، فالأول
من حديث عائشة، وهذا من حديث أنس فلا يلزم تفسير أحدهما بالآخر، لاحتمال
التعدد والمغايرة ` لاسيما وفي الأول تلك الزيادة ` نكسر حر هذا ببرد هذا ...
` ولا يظهر هذا المعنى تمام الظهور بالنسبة إلى الخربز، ما دام أنه يشابه
الرطب في الحرارة. والله أعلم.
من فوائد الحديث
قال الخطيب في ` الفقيه والمتفقه ` (79 /
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি (নবী ﷺ) তাজা খেজুর (রুতাব) এর সাথে খারবুজ খেতেন, অর্থাৎ তরমুজ।
এটি আহমদ (৩/১৪২, ১৪৩), আবু বকর আশ-শাফিঈ তাঁর ‘আল-ফাওয়ায়েদ’ (১০৫/২) এবং যিয়া তাঁর ‘আল-মুখতারা’ (৮৬/২)-তে জারীর ইবন হাযিম সূত্রে হুমাইদ হতে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
অতঃপর যিয়া এই হাদিসটি আহমদের মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের নিকট ওয়াহব ইবন জারীর বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার পিতা আমার নিকট একই রকম বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি (যিয়া) বলেন:
‘আর ইমাম আহমাদ ইবন হাম্বলের সাথী মুহান্না থেকে বর্ণিত আছে যে, তিনি (আহমদ) বলেছেন: "এটি সহীহ নয়। এটি হুমাইদের হাদিস বা হুমাইদ ব্যতীত অন্য কারো হাদিস হিসেবে পরিচিত নয়। এটি কেবল আবদুল্লাহ ইবন জা’ফরের সূত্রেই পরিচিত।"’
আমি (গ্রন্থকার) বলি—আল্লাহই ভালো জানেন—ইমাম আহমদের তাঁর ‘মুসনাদে’ এটি বর্ণনা করা এই বক্তব্যকে দুর্বল করে দেয় অথবা (সমর্থন করে) (অথবা তিনি এই হাদিস তাঁর কিতাবে রেখে দিয়ে এর থেকে প্রত্যাবর্তন করাকে সমর্থন করে)। আর আবদুল্লাহ ইবন জা’ফরের হাদিস সহীহাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এ রয়েছে। তিনি বলেন: "আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে শসা (কিসসা) ও তাজা খেজুর (রুতাব) খেতে দেখেছি।"
আমি বলি: এর সনদ সহীহ, এবং এর মধ্যে কোনো মারাত্মক ত্রুটি নেই। যদিও জারীর ইবন হাযিম শেষ বয়সে স্মৃতিভ্রমের শিকার হয়েছিলেন, কিন্তু তিনি স্মৃতিভ্রমের সময় বর্ণনা করেননি, যেমনটি হাফিয ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন। এই কারণে তিনি (হাফিয ইবন হাজার) ‘আল-ফাতহ’ (৯/৪৯৬)-এ আন-নাসাঈর দিকে সম্বন্ধিত করার পর এর সনদকে সহীহ বলেছেন (অর্থাৎ আস-সুনানুল কুবরা)।
অতঃপর তিনি বলেন: ‘আল-খারবুজ’ (الخربز) হলো—খাঁ মু’জামাহ (خ) বর্ণে যের, রা (ر)-তে সুকুন, এবং বা (ب) মুওয়াহহাদা-তে যেরের পর যা (ز)—এটি এক প্রকার হলুদ তরমুজ বা বাঙ্গি। অনেক সময় শসা (কিসসা) অত্যধিক গরমে বড় হয়ে হলুদ হয়ে যায়, ফলে তা খারবুজের মতো হয়ে যায়, যেমনটি আমি হিজাজে দেখেছি। এর দ্বারা তাদের দাবি খণ্ডন করা যায় যারা মনে করেন যে, হাদিসে উল্লেখিত তরমুজ বলতে সবুজ তরমুজ উদ্দেশ্য ছিল এবং তারা কারণ দেখিয়েছিল যে, হলুদ তরমুজে রুতাবের (তাজা খেজুর) মতোই উষ্ণতা আছে। যদিও অন্য বর্ণনায় এই ব্যাখ্যা এসেছে যে, একটি অপরটির উষ্ণতা প্রশমিত করে।
এর উত্তর হলো: রুতাবের (তাজা খেজুর) তুলনায় হলুদ তরমুজে শীতলতা বিদ্যমান, যদিও এর মিষ্টি হওয়ার কারণে সামান্য উষ্ণতার অংশ থাকে। আল্লাহই সর্বজ্ঞ।
আমি বলি: এই খণ্ডন (হাফিয ইবন হাজারের ব্যাখ্যা) আমার মতে পুনর্বিবেচনার দাবি রাখে। কারণ দুটি হাদিসের উৎস ভিন্ন। প্রথমটি (শসা সংক্রান্ত হাদিস) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদিস থেকে, আর এটি (খারবুজ সংক্রান্ত হাদিস) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদিস থেকে বর্ণিত। তাই একটির ব্যাখ্যা অন্যটি দ্বারা আবশ্যক নয়, কেননা উভয়টির মধ্যে বহুত্ব ও ভিন্নতা থাকার সম্ভাবনা রয়েছে। বিশেষ করে প্রথম হাদিসে এই অতিরিক্ত অংশ রয়েছে: ’আমরা এর উষ্ণতাকে ওটার শীতলতা দ্বারা ভাঙি (প্রশান্ত করি)...’। এই অর্থটি খারবুজের ক্ষেত্রে পুরোপুরি স্পষ্ট হয় না, কারণ এটি উষ্ণতার দিক থেকে রুতাবের (তাজা খেজুর) অনুরূপ হতে পারে। আল্লাহই সর্বজ্ঞ।
হাদিসের কিছু উপকারিতা থেকে: আল-খাতীব ‘আল-ফাক্বীহ ওয়াল মুতাফাক্কিহ’ (৭৯/-)-এ বলেছেন: [অসম্পূর্ণ]
59 - ` يا علي أصب من هذا فهو أنفع لك `.
رواه أبو داود (3856) والترمذي (2 / 2، 3) وابن ماجه (2442) وأحمد
(6 / 364)
والخطيب في ` الفقيه والمتفقه ` (225 / 2) من طريق فليح
ابن سليمان عن أيوب بن عبد الرحمن بن صعصعة الأنصاري عن يعقوب بن أبي يعقوب
عن أم المنذر بنت قيس الأنصارية قالت:
` دخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعه علي عليه السلام، وعلي ناقه
ولنا دوالي معلقة، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم يأكل منها، وقام علي
ليأكل، فطفق رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لعلي: مه إنك ناقه، حتى كف
علي عليه السلام، قالت: وصنعت شعيرا وسلقا، فجئت به، فقال رسول الله
صلى الله عليه وسلم: فذكره `.
وقال الترمذي:
` حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث فليح `.
قلت: وهو مختلف فيه وقد ضعفه جماعة، ومشاه بعضهم واحتج به الشيخان في
` صحيحيهما `، والراجح عندنا أنه صدوق في نفسه وأنه يخطىء أحيانا فمثله حسن
الحديث إن شاء الله تعالى إذا لم يتبين خطؤه. وقد أخرج حديثه هذا الحاكم في
` المستدرك ` (4 / 407) وقال:
` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبي. وإنما هو حسن فقط كما قال الترمذي.
والله أعلم.
قال ابن القيم رحمه الله في ` زاد المعاد ` (3 / 97) بعد أن ساق الحديث:
` واعلم أن في منع النبي صلى الله عليه وسلم لعلي من الأكل من الدوالي وهو
ناقه أحسن التدبير، فإن الدوالي أقناء من الرطب تعلق في البيت للأكل بمنزلة
عناقيد العنب، والفاكهة تضر بالناقه من المرض لسرعة استحالتها وضعف الطبيعة
عن دفعها، فإنها بعد لم تتمكن قوتها، وهي مشغولة بدفع آثار العلة وإزالتها
من البدن، وفي الرطب
خاصة نوع ثقل على المعدة، فتشتغل بمعالجته وإصلاحه عما
هي بصدده من إزالة بقية المرض وآثاره، فإما أن تقف تلك البقية، وإما أن
تتزايد. فلما وضع بين يديه السلق والشعير أمره أن يصيب منه، فإنه من أنفع
الأغذية للناقه، ولاسيما إذا طبخ بأصول السلق، فهذا من أوفق الغذاء لمن في
معدته ضعف، ولا يتولد عنه من الأخلاط ما يخاف منه `.
উম্মুল মুনযির বিনতে কায়স আল-আনসারিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সঙ্গে নিয়ে আমার ঘরে প্রবেশ করলেন। সে সময় আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রোগমুক্ত হয়ে সবেমাত্র দুর্বলতা কাটিয়ে উঠছিলেন (না-কিহ)। আমাদের ঘরে ঝুলন্ত খেজুরের থোকা (দাওয়ালী) ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উঠে তা থেকে খেতে শুরু করলেন। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও খাওয়ার জন্য দাঁড়ালেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বারবার বলতে লাগলেন: ‘থামো! তুমি সদ্য রোগমুক্ত হয়েছো।’ ফলে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিরত হলেন। তিনি (উম্মুল মুনযির) বলেন: এরপর আমি যব ও সাক (এক প্রকার সবজি বা পালংশাক) রান্না করে নিয়ে আসলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: ‘হে আলী! তুমি এ খাবার থেকে খাও। কারণ, এটি তোমার জন্য অধিক উপকারী।’
60 - ` نهى عن الوحدة: أن يبيت الرجل وحده، أو يسافر وحده `.
رواه أحمد (2 / 91) عن عاصم بن محمد عن أبيه عن ابن عمر مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد صحيح، وهو على شرط البخاري، رجاله كلهم من رجال الشيخين،
غير أبي عبيدة الحداد واسمه عبد الواحد بن واصل فمن رجال البخاري وحده وهو
ثقة. وعاصم بن محمد هو ابن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب العمري وقد روى
عن العبادلة الأربعة ومنهم جده عبد الله بن عمر.
والحديث أورده في ` المجمع ` (8 / 104) وقال: ` رواه أحمد ورجاله رجال
الصحيح `.
وقد رواه جماعة عن عاصم بلفظ آخر، وهو:
` لو يعلم الناس في الوحدة ما أعلم ما سار راكب بليل وحده (أبدا) `.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একাকীত্ব থেকে নিষেধ করেছেন – অর্থাৎ, কোনো ব্যক্তি যেন একা রাত যাপন না করে, অথবা একা সফর না করে।
61 - ` لو يعلم الناس في الوحدة ما أعلم ما سار راكب بليل وحده (أبدا) `.
رواه البخاري (2 / 247) والترمذي (1 / 314) والدارمي (2 / 289)
وابن ماجه (3768) وابن حبان في ` صحيحه ` (
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেছেন: মানুষ একাকী (নিঃসঙ্গ) থাকার মধ্যে কী (ভয়াবহতা) রয়েছে, তা যদি জানত যা আমি জানি, তবে কোনো আরোহীই রাতে কখনো একা পথ চলত না।
62 - ` الراكب شيطان والراكبان شيطانان والثلاثة ركب `.
مالك (2 / 978 / 35) ، وعنه أبو داود (2607) ، وكذا الترمذي (1 / 314)
والحاكم (2 / 102) ، والبيهقي (5 / 267) ، وأحمد (2 / 186، 214) من
طريق عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده مرفوعا.
وسببه كما في ` المستدرك ` والبيهقي:
` أن رجلا قدم من سفر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: من صحبت؟ فقال:
ما صحبت أحدا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` فذكره.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `.
ووافقه الذهبي.
وقال الترمذي: ` حديث حسن `.
قلت: وإسناده حسن، للخلاف في عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده. والمتقرر فيه
أنه حسن كما فصلت القول فيه في ` صحيح أبي داود ` (رقم 124) .
وفي هذه الأحاديث تحريم سفر المسلم وحده وكذا لو كان معه آخر، لظاهر النهي
في الحديث الذي قبل هذا، ولقوله فيه: ` شيطان ` أي عاص، كقوله تعالى
(شياطين الإنس والجن) فإن معناه: عصاتهم كما قال المنذري.
وقال الطبري: ` هذا زجر أدب وإرشاد لما يخاف على الواحد من الوحشة، وليس
بحرام، فالسائر وحده بفلاة، والبائت في بيت وحده لا يأمن من الاستيحاش،
لاسيما إن كان ذا فكرة رديئة أو قلب ضعيف. والحق أن الناس يتفاوتون في ذلك،
فوقع الزجر لحسم المادة فيكره الانفراد سدا للباب، والكراهة في الاثنين أخف
منها في الواحد `.
ذكره المناوي في ` الفيض `.
قلت: ولعل الحديث أراد السفر في الصحارى والفلوات التي قلما يرى المسافر
فيها أحدا من الناس، فلا يدخل فيها السفر اليوم في الطرق المعبدة الكثيرة
المواصلات. والله أعلم.
ثم إن فيه ردا صريحا على خروج بعض الصوفية إلى الفلاة وحده للسياحة وتهذيب
النفس، زعموا! وكثيرا ما تعرضوا في أثناء ذلك للموت عطشا وجوعا، أو لتكفف
أيدي الناس، كما ذكروا ذلك في الحكايات عنهم. وخير الهدي هدي محمد صلى الله
عليه وآله وسلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "একাকী আরোহী (মুসাফির) হলো শয়তান, আর দুইজন আরোহী হলো দুই শয়তান। কিন্তু তিনজন হলো (নিরাপদ) কাফেলা।"
63 - ` تبايعوني على السمع والطاعة في النشاط والكسل والنفقة في العسر واليسر
وعلى الأمر بالمعروف والنهي عن المنكر وأن تقولوا في الله لا تخافون في الله
لومة لائم وعلى أن تنصروني فتمنعوني إذا قدمت عليكم مما تمنعون منه أنفسكم
وأزواجكم وأبناءكم ولكم الجنة `.
رواه أحمد (3 / 322،
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
তোমরা আমার কাছে বায়আত গ্রহণ করো এই মর্মে যে, তোমরা আমার কথা শুনবে এবং আমার আনুগত্য করবে উদ্যম ও অলসতা— উভয় অবস্থাতেই; আর অভাব ও প্রাচুর্য উভয় অবস্থায় অর্থ-সম্পদ ব্যয় করবে; তোমরা সৎকাজের আদেশ করবে ও অসৎকাজ থেকে নিষেধ করবে; আর আল্লাহর ব্যাপারে কথা বলার সময় তোমরা কোনো নিন্দুকের নিন্দার পরোয়া করবে না। আর তোমরা আমাকে সাহায্য করবে ও রক্ষা করবে, যখন আমি তোমাদের কাছে আসব, ঠিক যেভাবে তোমরা তোমাদের নিজেদের, তোমাদের স্ত্রীদের ও তোমাদের সন্তানদের রক্ষা করো। আর এর বিনিময়ে তোমাদের জন্য রয়েছে জান্নাত।
64 - ` من قال: سبحان الله العظيم وبحمده غرست له نخلة في الجنة `.
رواه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (12 / 125 / 2) والترمذي (2 / 258 / 259)
وابن حبان (2335) ، والحاكم (1 /
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি ‘সুবহানাল্লাহিল আযীম ওয়া বিহামদিহি’ বলবে, তার জন্য জান্নাতে একটি খেজুর গাছ রোপণ করা হবে।”
65 - ` لأن يزني الرجل بعشر نسوة أيسر عليه من أن يزني بامرأة جاره، ولأن يسرق
الرجل من عشر أبيات أيسر عليه من يسرق من جاره `.
رواه أحمد (6 / 8) ، والبخاري في ` الأدب المفرد ` (رقم 103) ،
والطبراني في ` الكبير ` (مجموع 6 / 80 / 2) عن محمد بن سعد الأنصاري
قال: سمعت أبا ظبية الكلاعي يقول: سمعت المقداد بن الأسود قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:
` ما تقولون في الزنا؟ قالوا: حرمه الله ورسوله، فهو حرام إلى يوم القيامة
قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` فذكر الشطر الأول من الحديث ثم
سألهم عن السرقة، فأجابوا بنحو ما أجابوا عن الزنا، ثم ذكر صلى الله عليه
وسلم الشطر الثاني منه.
قلت: وهذا إسناد جيد، ورجاله كلهم ثقات، وقول الحافظ في الكلاعي هذا
` مقبول `، يعني عند المتابعة فقط، ليس بمقبول، فقد وثقه ابن معين.
وقال الدارقطني: ` ليس به بأس `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (1 / 270)
فهو حجة.
وقال المنذري (3 / 195) ، والهيثمي (8 / 168) :
` رواه أحمد والطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط ورجاله ثقات `.
মিকদাদ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
কোনো ব্যক্তি যদি দশজন নারীর সাথে ব্যভিচার করে, তবে তা তার জন্য অপেক্ষাকৃত কম গুরুতর হবে, তার প্রতিবেশীর স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করার চেয়ে।
আর কোনো ব্যক্তি যদি দশটি বাড়ি থেকে চুরি করে, তবে তা তার জন্য অপেক্ষাকৃত কম গুরুতর হবে, তার প্রতিবেশীর বাড়ি থেকে চুরি করার চেয়ে।
66 - ` إذا أدرك أحدكم (أول) سجدة من صلاة العصر قبل أن تغرب الشمس فليتم صلاته
وإذا أدرك (أول) سجدة من صلاة الصبح قبل أن تطلع الشمس فليتم صلاته `.
أخرجه البخاري في ` صحيحه ` (1 / 148) : حدثنا أبو نعيم قال: حدثنا شيبان
عن يحيى عن أبي سلمة عن أبي هريرة مرفوعا به، دون الزيادتين، وهما عند
النسائي والبيهقي وغيرهما، فقال النسائي (1 / 90) : أخبرنا عمرو بن منصور
قال حدثنا الفضل بن دكين به.
وهذا سند صحيح، فإن عمرا هذا ثقة ثبت كما في ` التقريب ` وباقي الرجال
معروفون، والفضل بن دكين هو أبو نعيم شيخ البخاري فيه وقد توبع هو والراوي
عنه على الزيادتين.
أما عمرو فتابعه محمد بن الحسين بن أبي الحنين عند البيهقي (1 / 368) وقال:
` رواه البخاري في ` الصحيح ` عن أبي نعيم الفضل بن دكين `.
ويعني أصل الحديث كما هي عادته، وإلا فالزيادتان ليستا عند البخاري كما عرفت
وأما أبو نعيم فتابعه حسين بن محمد أبو أحمد المروذي: حدثنا شيبان به.
أخرجه السراج في ` مسنده ` (ق 95 / 1) . وحسين هذا هو ابن بهرام التميمي،
وهو ثقة محتج به في ` الصحيحين `.
وللحديث عن أبي هريرة ستة طرق وقد خرجتها في كتابي: ` إرواء الغليل في تخريج
أحاديث منار السبيل ` الذي أنا في صدد تأليفه، يسر الله إتمامه ثم طبعه.
انظر (رقم 250 منه) .
وإنما آثرت الكلام على هذه الطريق لورود الزيادتين المذكورتين فيها، فإنهما
تحددان بدقة المعنى المراد من لفظ ` الركعة ` الوارد في طرق الحديث وهو إدراك
الركوع والسجدة الأولى معا، فمن لم يدرك السجدة لم يدرك الركعة، ومن لم
يدرك الركعة لم يدرك الصلاة.
من فوائد الحديث:
ومن ذلك يتبين أن الحديث يعطينا فوائد هامة:
الأولى: إبطال قول بعض المذاهب أن من طلعت عليه الشمس وهو في الركعة الثانية
من صلاة الفجر بطلت صلاته! وكذلك قالوا فيمن غربت عليه الشمس وهو في آخر
ركعة من صلاة العصر! وهذا مذهب ظاهر البطلان لمعارضته لنص الحديث كما صرح
بذلك الإمام النووي وغيره. ولا يجوز معارضة الحديث بأحاديث النهي عن الصلاة
في وقت الشروق والغروب لأنها عامة وهذا خاص، والخاص يقضي على العام كما هو
مقرر في علم الأصول.
وإن من عجائب التعصب للمذهب ضد الحديث أن يستدل البعض به لمذهبه في مسألة،
ويخالفه في هذه المسألة التي نتكلم فيها! وأن يستشكله آخر من أجلها!
فإلى الله المشتكى مما جره التعصب على أهله من المخالفات للسنة الصحيحة!
قال الزيلعي في ` نصب الراية ` (1 / 229) بعد أن ساق حديث أبي هريرة هذا
وغيره مما في معناه:
` وهذه الأحاديث أيضا مشكلة عند مذهبنا في القول ببطلان صلاة الصبح إذا طلعت
عليها الشمس، والمصنف استدل به على أن آخر وقت العصر ما لم تغرب الشمس `.!
فيا أيها المتعصبون! هل المشكلة مخالفة الحديث الصحيح لمذهبكم، أم العكس هو
الصواب! .
الفائدة الثانية: الرد على من يقول: إن الإدراك يحصل بمجرد إدراك أي جزء من
أجزاء الصلاة ولو بتكبيرة الإحرام وهذا خلاف ظاهر للحديث، وقد حكاه في
` منار السبيل ` قولا للشافعي، وإنما هو وجه في مذهبه كما في ` المجموع `
للنووي (3 / 63) وهو مذهب الحنابلة مع أنهم نقلوا عن الإمام أحمد أنه قال:
لا تدرك الصلاة إلا بركعة. فهو أسعد الناس بالحديث. والله أعلم.
قال عبد الله بن أحمد في مسائله (ص 46) :
` سألت أبي عن رجل يصلي الغداة، فلما صلى ركعة قام في الثانية طلعت الشمس
قال: يتم الصلاة، هي جائزة. قلت لأبي: فمن زعم أن ذلك لا يجزئه؟ فقال:
قال النبي صلى الله عليه وسلم: من أدرك من صلاة الغداة ركعة قبل أن تطلع الشمس
فقد أدرك `.
ثم رأيت ابن نجيح البزاز روى في ` حديثه ` (ق 111 / 1) بسند صحيح عن سعيد
ابن المسيب أنه قال: ` إذا رفع رأسه من آخر سجدة فقد تمت صلاته `.
ولعله يعني آخر سجدة من الركعة الأولى، فيكون قولا آخر في المسألة.
والله أعلم.
الفائدة الثالثة: واعلم أن الحديث إنما هو في المتعمد تأخير الصلاة إلى هذا
الوقت الضيق، فهو على هذا آثم بالتأخير، وإن أدرك الصلاة، لقوله صلى الله
عليه وسلم
` تلك صلاة المنافق، يجلس يرقب الشمس، حتى إذا كانت بين قرني
الشيطان، قام فنقرها أربعا، لا يذكر الله فيها إلا قليلا `. رواه مسلم
(2 / 110) وغيره من حديث أنس رضي الله عنه. وأما غير المتعمد، وليس هو
إلا النائم والساهي، فله حكم آخر، وهو أنه يصليها متى تذكرها ولو عند طلوع
الشمس وغروبها، لقوله صلى الله عليه وسلم ` من نسي صلاة (أو نام عنها)
فليصلها إذا ذكرها، لا كفارة لها إلا ذلك، فإن الله تعالى يقول: (أقم
الصلاة لذكري) `.
أخرجه مسلم أيضا (2 / 142) عنه، وكذا البخاري.
فإذن هنا أمران: الادراك والإثم:
والأول: هو الذي سيق الحديث لبيانه، فلا يتوهمن أحد من سكوته عن الأمر الآخر
أنه لا إثم عليه بالتأخير كلا، بل هو آثم على كل حال، أدرك الصلاة، أو لم
يدرك، غاية ما فيه أنه اعتبره مدركا للصلاة بإدراك الركعة، وغير مدرك لها
إذا لم يدركها، ففي الصورة الأولى صلاته صحيحة مع الإثم، وفي الصورة الأخرى
صلاته غير صحيحة مع الإثم أيضا، بل هو به أولى وأحرى، كما لا يخفى على أولي
النهى.
الفائدة الرابعة: ومعنى قوله صلى الله عليه وسلم: ` فليتم صلاته `، أي لأنه
أدركها في وقتها، وصلاها صحيحة، وبذلك برئت ذمته. وأنه إذا لم يدرك
الركعة فلا يتمها. لأنها ليست صحيحة، بسبب خروج وقتها، فليست مبرئة للذمة.
ولا يخفى أن مثله وأولى منه من لم يدرك من صلاته شيئا قبل خروج الوقت، أنه
لا صلاة له، ولا هي مبرئة لذمته. أي أنه إذا كان الذي لم يدرك الركعة لا
يؤمر
بإتمام الصلاة، فالذي لم يدركها إطلاقا أولى أن لا يؤمر بها، وليس ذلك
إلا من باب الزجر والردع له عن إضاعة الصلاة، فلم يجعل الشارع الحكيم لمثله
كفارة كي لا يعود إلى إضاعتها مرة أخرى، متعللا بأنه يمكنه أن يقضيها بعد
وقتها، كلا، فلا قضاء للمتعمد كما أفاده هذا الحديث الشريف وحديث أنس
السابق: ` لا كفارة لها إلا ذلك `.
ومن ذلك يتبين لكل من أوتي شيئا من العلم والفقه في الدين أن قول بعض
المتأخرين ` وإذا كان النائم والناسى للصلاة - وهما معذوران - يقضيانها بعد
خروج وقتها، كان المتعمد لتركها أولى `، أنه قياس خاطئ بل لعله من أفسد قياس
على وجه الأرض، لأنه من باب قياس النقيض على نقيضه، وهو فاسد بداهة، إذ كيف
يصح قياس غير المعذور على المعذور والمتعمد على الساهي.
ومن لم يجعل الله له كفارة، على من جعل الله له كفارة! ! وما سبب ذلك إلا
من الغفلة عن المعنى المراد من هذا الحديث الشريف، وقد وفقنا الله تعالى
لبيانه، والحمد لله تعالى على توفيقه.
وللعلامة ابن القيم رحمه الله تعالى بحث هام مفصل في هذه المسألة، أظن أنه لم
يسبق إلى مثله في الإفادة والتحقيق، وأرى من تمام هذا البحث أن أنقل منه
فصلين أحدهما في إبطال هذا القياس. والآخر في الرد على من استدل بهذا الحديث
على نقيض ما بينا.
قال رحمه الله تعالى بعد أن ذكر القول المتقدم:
` فجوابه من وجوه: أحدها المعارضة بما هو أصح منه أو مثله، وهو أن يقال:
لا يلزم من صحة القضاء بعد الوقت من المعذور - المطيع لله ورسوله الذي لم يكن
منه تفريط في فعل ما أمر به وقبوله منه - صحته وقبوله من متعد لحدود الله،
مضيع لأمره، تارك لحقه عمدا وعدوانا. فقياس هذا على هذا في صحة العبادة،
وقبولها منه، وبراءة الذمة بها من أفسد القياس `.
الوجه الثاني: أن المعذور بنوم أو نسيان لم يصل الصلاة في غير وقتها، بل في
نفس وقتها الذي وقته الله له، فإن الوقت في حق هذا حين يستيقظ ويذكر، كما
قال صلى الله عليه وسلم: ` من نسي صلاة فوقتها إذا ذكرها ` رواه البيهقي
والدارقطني.
فالوقت وقتان: وقت اختيار، ووقت عذر، فوقت المعذور بنوم أو سهو، هو وقت
ذكره واستيقاظه، فهذا لم يصل الصلاة إلا في وقتها، فكيف يقاس عليه من صلاها
في غير وقتها عمدا وعدوانا؟ !
الثالث: أن الشريعة قد فرقت في مواردها ومصادرها بين العامد والناسي، وبين
المعذور وغيره، وهذا مما لا خفاء به. فإلحاق أحد النوعين بالآخر غير جائز.
الرابع: أنا لم نسقطها عن العامد المفرط ونأمر بها المعذور، حتى يكون ما
ذكرتم حجة علينا، بل ألزمنا بها المفرط المتعدي على وجه لا سبيل له إلى
استدراكها تغليظا عليه، وجوزنا للمعذور غير المفرط.
(فصل) :
وأما استدلالكم بقوله صلى الله عليه وسلم: ` من أدرك ركعة من العصر قبل أن
تغرب الشمس فقد أدرك ` فما أصحه من حديث. وما أراه على مقتضى قولكم! فإنكم
تقولون: هو مدرك للعصر، ولو لم يدرك من وقتها شيئا البتة.
بمعنى أنه مدرك لفعلها صحيحة منه، مبرئة لذمته، فلو كانت تصح بعد خروج وقتها
وتقبل منه، لم يتعلق إدراكها بركعة، ومعلوم أن النبي صلى الله عليه وسلم لم
يرد أن من أدرك ركعة من العصر صحت صلاته بلا إثم بل هو آثم بتعمد ذلك اتفاقا.
فإنه أمر أن يوقع جميعها في وقتها، فعلم أن هذا الادراك لا يرفع الإثم، بل هو
مدرك آثم، فلو كانت تصح بعد الغروب، لم يكن فرق بين أن يدرك ركعة من الوقت،
أو لا يدرك منها شيئا.
فإن قلتم: إذا أخرها إلى بعد الغروب كان أعظم إثما.
قيل لكم: النبي صلى الله عليه وسلم لم يفرق بين إدراك الركعة وعدمها في كثرة
الإثم وخفته،
وإنما فرق بينهما في الإدراك وعدمه. ولا ريب أن المفوت
لمجموعها في الوقت أعظم من المفوت لأكثرها، والمفوت لأكثرها فيه، أعظم من
المفوت لركعة منها.
فنحن نسألكم ونقول: ما هذا الإدراك الحاصل بركعة؟ أهذا إدراك يرفع الإثم؟
فهذا لا يقوله أحد! أو إدراك يقتضي الصحة، فلا فرق فيه بين أن يفوتها بالكلية
أو يفوتها إلا ركعة منها `.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমাদের মধ্যে কেউ যদি সূর্য অস্ত যাওয়ার পূর্বে আসরের সালাতের প্রথম সিজদা পায়, তাহলে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে নেয়। আর যদি সূর্য উদিত হওয়ার পূর্বে ফজরের সালাতের প্রথম সিজদা পায়, তাহলে সে যেন তার সালাত পূর্ণ করে নেয়।”