হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (627)


627 - ` إذا دخل أحدكم على أخيه المسلم، فأطعمه من طعامه، فليأكل ولا يسأله عنه
وإن سقاه من شرابه، فليشرب من شرابه ولا يسأله عنه `.
أخرجه الحاكم (4 / 126) وأحمد (2 / 399) والخطيب (3 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন তোমাদের কেউ তার মুসলিম ভাইয়ের কাছে যায়, আর সে তাকে তার খাবার থেকে কিছু খেতে দেয়, তখন সে যেন তা খায় এবং সে সম্পর্কে (খাবারের উৎস বা ধরন নিয়ে) যেন জিজ্ঞাসা না করে। আর যদি সে তাকে তার পানীয় থেকে কিছু পান করায়, তবে সে যেন তা পান করে এবং সে সম্পর্কে যেন জিজ্ঞাসা না করে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (628)


628 - ` عليكم بالرمي فإنه خير لعبكم `.
رواه أبو حفص المؤدب في ` المنتقى من حديث ابن مخلد وغيره ` (225 / 2)
والخطيب في ` الموضح ` (2 / 30) عن حاتم بن الليث حدثنا يحيى بن حماد حدثنا
أبو عوانة عن عبد الملك بن عمير عن مصعب بن سعد عن أبيه مرفوعا.
قلت: وهذا سند حسن رجاله كلهم ثقات من رجال ` التهذيب ` غير حاتم بن الليث
فقال الخطيب (8 / 245) : ` كان ثقة ثبتا متقنا حافظا `. وبقية رجاله رجال
الشيخين ولولا أن عبد الملك بن عمير كان تغير حفظه في آخر
عمره لجزمت بصحة هذا
السند. والحديث قال المنذري في ` الترغيب ` (2 / 170) : ` رواه البزار
والطبراني في الأوسط وإسنادهما جيد قوي `. وقال الهيثمي (6 / 269) :
` رواه الطبراني في الأوسط والكبير والبزار ورجال الطبراني رجال الصحيح خلا
عبد الوهاب بن بخت وهو ثقة `.




সা’দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

"তোমরা অবশ্যই তীর নিক্ষেপ বা তীরন্দাজির অভ্যাস করো, কারণ এটিই তোমাদের সর্বোত্তম ক্রীড়া।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (629)


629 - ` ما من إمام يغلق بابه دون ذوي الحاجة والخلة والمسكنة إلا أغلق الله أبواب
السماء دون خلته وحاجته ومسكنته `.
أخرجه الترمذي (1 / 249) والحاكم (4 / 94) وأحمد (4 / 231) من طريق علي
بن الحكم قال: حدثني أبو حسن عن عمرو بن مرة قال: قلت: لمعاوية بن أبي
سفيان إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره. قال: فجعل معاوية رجلا
على حوائج الناس. وقال الحاكم: إسناده صحيح ووافقه الذهبي! وذلك من
أوهامها، فإن أبا الحسن هذا هو الجزري وقد قال الذهبي نفسه في ترجمته من
الميزان: ` تفرد عنه علي بن الحكم ` وقال الحافظ في التقريب ` مجهول `. لكن
الحديث له إسناد آخر صحيح بلفظ: ` من ولاه الله عز وجل شيئا من أمر المسلمين،
فاحتجب دون حاجتهم وخلتهم وفقرهم احتجب الله عنه دون حاجته وخلته وفقره `.
أخرجه أبو داود (2948) والترمذي ولم يسق لفظه
والحاكم وابن عساكر في
` تاريخ دمشق ` (19 / 84 /




মুআবিয়া ইবনে আবু সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যাকে আল্লাহ তাআলা মুসলিমদের কোনো বিষয়ের দায়িত্ব দেন, অতঃপর সে তাদের প্রয়োজন, অভাব ও দারিদ্র্য থেকে নিজেকে আড়াল করে রাখে (তাদের সঙ্গে দেখা দেওয়া থেকে বিরত থাকে), আল্লাহ তাআলাও তার প্রয়োজন, অভাব ও দারিদ্র্য থেকে নিজেকে আড়াল করে রাখবেন (অর্থাৎ, তার ডাকে সাড়া দেবেন না)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (630)


630 - ` بل عارية مؤداة `.
أخرجه أبو داود (2 / 266) والنسائي كما في ` المحلى ` (9 / 173)
وابن حبان في ` صحيحه ` (1173) وأحمد (4 / 222) عن حبان بن هلال أنبأنا
همام بن يحيى أنبأنا قتادة عن عطاء بن أبي رباح عن صفوان بن يعلى ابن أمية عن
أبيه قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` إذا أتتك رسلي فأعطهم
ثلاثين درعا وثلاثين بعيرا. فقلت: يا رسول الله أعارية مضمونة أم عارية
مؤداة؟ قال ... ` فذكره. وقال ابن حزم:
` حديث حسن، ليس في شيء مما يروى
في العارية خبر يصح غيره `. كذا قال: وفي الباب حديثان آخران ثابتان
سأذكرهما بعد هذا. وإسناده صحيح رجاله كلهم ثقات وقد قال الحافظ في ` بلوغ
المرام `: ` رواه أحمد وأبو داود والنسائي وصححه ابن حبان `.
قلت: وليس هو عند النسائي في ` المجتبى ` فالظاهر أنه في سننه الكبرى!
وفي الحديث دلالة على وجوب أداء العارية ما بقيت عينها، فإذا تلفت في يد
المستعير لم يجب عليه الضمان، لأنه فرق فيه بين الضمان والأداء، فأوجب
الأداء دون الضمان. وهذا مذهب أبي حنيفة وابن حزم واختاره الصنعاني فقال:
` والحديث دليل لمن ذهب إلى أنها لا تضمن العارية، إلا بالتضمين وهو أوضح
الأقوال `. ويدل للاستثناء المذكور، حديث صفوان بن أمية الآتي وهو:
` لا بل عارية مضمونة `.




ইয়া’লা ইবনু উমাইয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "যখন আমার দূতরা তোমার কাছে আসবে, তখন তুমি তাদেরকে ত্রিশটি বর্ম এবং ত্রিশটি উট দেবে।"

আমি বললাম: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এটা কি ক্ষতিপূরণযোগ্য ধার (যা নষ্ট হলে ক্ষতিপূরণ দিতে হবে), নাকি কেবল ফেরতযোগ্য ধার (যা অক্ষত থাকলে ফেরত দিতে হবে)?"

তিনি বললেন: "বরং তা কেবলই ফেরতযোগ্য ধার।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (631)


631 - ` لا بل عارية مضمونة `.
أخرجه أبو داود (2 / 265) والبيهقي (6 / 89) وأحمد (6 / 465) عن شريك
عن عبد العزيز بن رفيع عن أمية بن صفوان بن أمية عن أبيه أن رسول الله صلى
الله عليه وسلم استعار منه أدراعا يوم حنين، فقال: أغصب يا محمد؟ . فقال:
فذكره.
قلت: وهذا سند ضعيف، وله علتان:
الأولى: جهالة أمية هذا، لم يورده ابن أبي حاتم ولا وثقه أحد ولهذا قال
الحافظ ` مقبول `. لكنه لم يتفرد به كما يأتي.
الثانية: شريك وهو ابن عبد الله القاضي وهو سيء الحفظ، وقد تابعه قيس بن
الربيع، ولكنه خالفه في إسناده، فأدخل بين عبد العزيز وأمية بن صفوان ابن
أبي مليكة. علقه البيهقي. وتابعه أيضا جرير لكنه قال: عن عبد العزيز عن
أناس من آل عبد الله بن صفوان أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: يا صفوان
هل عندك من سلاح، قال: عارية أم غصبا، قال: لا بل عارية، فأعاره ما بين
الثلاثين إلى الأربعين درعا ... الحديث. أخرجه أبو داود وعنه البيهقي. ثم
أخرجه هذا من طريق أنس بن عياض الليثي عن جعفر بن محمد عن أبيه. أن صفوان أعار
رسول الله صلى الله عليه وسلم سلاحا هي ثمانون درعا فقال له أعارية،
مضمونة أم
غصبا؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. ثم قال: ` وبعض هذه
الأخبار وإن كان مرسلا فإنه يقوى بشواهده مع ما تقدم من الموصول `. ويشير
بقوله ` بشواهده ` إلى حديث جابر بن عبد الله وحديث ابن عباس. أما حديث جابر
، فأخرجه الحاكم (3 /




সাফওয়ান ইবনে উমাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুনায়নের যুদ্ধের দিন তাঁর কাছ থেকে কিছু বর্ম ধার চাইলেন।
তিনি (সাফওয়ান) জিজ্ঞাসা করলেন: "হে মুহাম্মাদ, এটা কি জবরদখল (বা জোরপূর্বক গ্রহণ)?"
তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) উত্তর দিলেন: "না, বরং এটি এমন ধার (আরিয়াহ) যা ফেরত দেওয়ার নিশ্চয়তা দেওয়া হলো (বা ক্ষতিপূরণযোগ্য ধার)।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বলেছিলেন: "হে সাফওয়ান! আপনার কাছে কি কোনো অস্ত্র আছে?" তিনি বললেন: "এটা কি ধার হিসেবে, নাকি জোর করে কেড়ে নেওয়া হবে?" তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: "না, বরং তা ধার হিসেবেই নেওয়া হবে।" অতঃপর তিনি তাঁকে ত্রিশ থেকে চল্লিশটি বর্ম ধার দিয়েছিলেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (632)


632 - ` المختلعات والمنتزعات هن المنافقات `.
أخرجه النسائي (2 / 104) والبيهقي (7 / 316) وأحمد (2 / 414) من طريق
أيوب عن الحسن عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: فذكره
قال النسائي: ` قال الحسن: لم أسمعه من غير أبي هريرة `.
قلت: وهذا نص صريح منه أنه سمعه من أبي هريرة، وهو ثقة صادق فلا أدري وجه
جزم النسائي رحمه الله تعالى بنفي سماعه منه! مع أن السند إليه صحيح على شرط
مسلم، وقد قال الحافظ في ` التهذيب ` بعد أن ساقه في ترجمة الحسن:
` وهذا إسناد لا مطعن في أحد من رواته وهو يؤيد أنه سمع من أبي هريرة في
الجملة، وقصته في هذا شبيهة بقصته في سمرة سواء `.
قلت: يعني أن الذي تحرر في اختلاف العلماء في سماع الحسن من سمرة أنه سمع شيئا
قليلا، فكذلك سماعه من أبي هريرة ثابت، ولكنه قليل أيضا بدلالة هذا الحديث.
والله أعلم.
وبالجملة فهذا الإسناد متصل صحيح، فلا يتلفت إلى إعلال النسائي بالانقطاع،
لأنه يلزم منه أحد أمرين: إما تكذيب الحسن البصري في قوله المذكور، وإما
توهيم أحد الرواة الذين رووا ذلك عنه. وكل منهما مما لا سبيل إليه، أما
الأول فواضح، وأما الآخر، فلأنه لا يجوز توهيم الثقات بدون حجة أو بينة
وهذا واضح بين. ثم إن للحديث شواهد: الأول: عن أنس بن مالك مرفوعا مثله.
أخرجه المخلص في ` العاشر من حديثه ` (214 / 2) عن أبي سحيم حدثنا عبد العزيز
بن صهيب عنه. وهذا إسناد ضعيف جدا، أبو سحيم - واسمه المبارك بن سحيم - قال
الحافظ في ` التقريب `: ` متروك `.
الثاني: عن عبد الله بن مسعود أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره إلا
أنه قال: ` والمتبرجات ` ` مكان والمنتزعات `. أخرجه أبو نعيم في ` الحلية
` (8 / 376) والخطيب في ` التاريخ ` (3 / 358) من طريق محمد بن هارون
الحضرمي حدثنا الحسين بن علي بن الأسود العجلي حدثنا وكيع
حدثنا سفيان الثوري
عن الأعمش عن أبي وائل عنه. وقال أبو نعيم: ` غريب من حديث الأعمش والثوري
تفرد به وكيع `.
قلت: هو ثقة حجة وكذلك من فوقه، فالسند صحيح إن سلم ممن دونه وهو الذي يدل
عليه قول أبي نعيم ` تفرد به وكيع ` فإن مفهومه أن من دونه لم يتفرد به، وهذا
خلاف ما رواه الخطيب عن الدارقطني أنه قال: ` ما حدث به غير أبي حامد `.
قلت: يعني الحضرمي هذا وهو ثقة أيضا، لكن شيخه العجلي متكلم فيه، قال أبو
حاتم: ` صدوق `. وذكره ابن حبان في ` الثقات ` وقال: ربما أخطأ، وقال
أحمد: لا أعرفه. وقال ابن عدي: ` يسرق الحديث وأحاديثه لا يتابع عليها `.
قلت: فإن كان قد توبع عليه كما يفيده مفهوم كلام أبي نعيم المتقدم فالإسناد
صحيح، وذلك ما أستبعده لما سبق ذكره عن الدارقطني، ولأن العجلي قد خولف في
إسناده! فقال ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (7 / 141 / 1) : أنبأنا وكيع قال:
أنبأنا أبو الأشهب عن الحسن قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكره بلفظ
العجلي. فهذا هو الصحيح عن وكيع، وهو إسناد صحيح مرسل، فهو على كل حال شاهد
قوي للحديث. والله أعلم.
الثالث: عن ثوبان عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره دون قوله:
` والمنتزعات `. أخرجه الترمذي (1 / 323) وابن عدي والحربي في ` غريب
الحديث ` (5 / 185 / 1) عن ليث عن أبي الخطاب عن زرعة عن أبي إدريس عنه.
وقال الترمذي: ` هذا حديث غريب، وليس إسناده بالقوي `.
قلت: وعلته ليث وهو ابن أبي سليم ضعيف، وشيخه أبو الخطاب مجهول، كما قال
الحافظ. وله علة أخرى، فقد ذكره ابن أبي حاتم (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যে সকল নারী খোলা তালাক গ্রহণ করে (অর্থাৎ, বিনিময় দিয়ে স্বামীর নিকট থেকে বিচ্ছেদ চায়) এবং যারা (স্বামীর বন্ধন থেকে) নিজেদের মুক্ত করে নেয়, তারাই হলো মুনাফিক নারী।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (633)


633 - ` كان يكتحل في عينه اليمنى ثلاث مرات واليسرى مرتين `.
أخرجه ابن سعد في ` الطبقات ` (1 / 484) عن عبد الحميد ابن جعفر عن عمران
بن أبي أنس قال: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد مرسل قوي، عمران تابعي، مات سنة (117) .
ثم أوقفني الأستاذ شعيب الأرناؤط على وصله في ` أخلاق النبي صلى الله عليه وسلم
لأبي الشيخ (ص 183) من هذا الوجه عن عمران عن أنس مرفوعا به. ورجاله ثقات،
فثبت موصولا والحمد لله.
وقد روي له شاهد من طريق عتيق بن يعقوب الزبيري أنبأنا عقبة بن علي عن عبد
الله بن عمر عن نافع عن ابن عمر مرفوعا بلفظ: ` كان إذا اكتحل جعل في العين
اليمنى ثلاثا وفي اليسرى مرودين، فجعلها وترا `. أخرجه الطبراني في ` المعجم
الكبير ` (3 / 199 / 1) .
قلت: وهذا إسناد ضعيف، عبد الله بن عمر وهو العمري المكبر ضعيف. وعقبة بن
علي ليس بالمشهور، قال العقيلي في ` الضعفاء `:
` لا يتابع على حديثه وربما
حدث بالمنكر عن الثقات `. وعتيق بن يعقوب فيه ضعف يسير كما بينه في ` اللسان
`، فالعلة ممن فوقه عبد الله أو عقبة. ومن طريقه أخرجه الطبراني في ` الأوسط
` أيضا والبزار كما في ` مجمع الزوائد ` (5 / 96) وقال: ` وهو ضعيف `.
قلت: ولم أره في ` الطب ` من ` زوائد البزار `. والله أعلم.
وإنما فيه (ص 166) من طريق الوضاح بن يحيى حدثنا أبو الأحوص عن عاصم عن أنس
مرفوعا بلفظ: ` كان يكتحل وترا `. وقال الهيثمي: ` والوضاح بن يحيى ضعيف `
. قلت: ولفظه مجمل، يحتمل أنه عنى وترا في عين واحدة دون الأخرى، أي فهو
وتر بالنسبة إليهما معا وهو الأظهر. ويحتمل أنه عنى وترا بالنسبة لكل واحدة
منهما، يعني ثلاثا في كل عين، وهذا روي صريحا في حديث ابن عباس، من طريق
عباد بن منصور عن عكرمة عنه. لكنه إسناد لا تقوم به حجة، لأن عباد بن منصور
كان تغير في آخره، مع كونه مدلسا، كما كنت بينته في تخريج حديثه هذا في
` إرواء الغليل ` رقم (75) ، وأن بينه وبين عكرمة رجلين أسقطهما هو،
أحدهما وهو إبراهيم ابن أبي يحيى الأسلمي كذاب، والآخر ضعيف.
وأشرت هناك إلى تخطئة العلامة الشيخ أحمد شاكر لتصحيحه إسناد هذا
الحديث في
تعليقه على ` المسند ` (3318) . والآن قد بدا لي أنه لابد من توضيح ما أشرنا
إليه هناك لأن بعض الأساتذة المشتغلين بالتحقيق لما اطلع عليه أشكل عليه الأمر
، فأقول: إن العلامة أحمد شاكر رحمه الله تعالى بنى تصحيحه المذكور على أمور
هامة: الأول: أن عباد بن منصور ثقة (ج 4 / 6، 5 / 108) .
الثاني: أنه لم يكن مدلسا أصلا.
الثالث: شكه في ثبوته الكلمات التي وردت عن بعض أئمة الحديث الدالة على أن
عبادا كان مدلسا، وشكه في دلالتها إن صحت!
الرابع: أن ابن أبي يحيى الذي دلسه عباد ليس هو إبراهيم ابن أبي يحيى الكذاب،
وإنما هو محمد بن أبي يحيى الثقة! هذه هي الدعائم التي بنى عليها الشيخ
المومى إليه صحة الحديث. وجوابا على ذلك أقول، وبالله التوفيق:
أولا: لا نعلم أحدا من الأئمة المتقدمين، ولا من الحفاظ المتأخرين أطلق
التوثيق على عباد بن منصور كما فعل الشيخ رحمه الله تعالى، اللهم إلا رواية عن
يحيى بن سعيد هي معارضة بأقوى منها. وقبل الشروع في بيان ذلك أسرد لك أقوال
الأئمة التي ذكرها الحافظ في ` التهذيب ` في ترجمة عباد هذا:




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
তিনি (রাসূলুল্লাহ ﷺ) তাঁর ডান চোখে তিনবার এবং বাম চোখে দুইবার সুরমা লাগাতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (634)


634 - ` لك بها سبعمائة ناقة مخطومة في الجنة `.
أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (8 / 116) من طرق عن فضيل بن عياض عن سليمان بن
مهران عن أبي عمرو الشيباني عن ابن مسعود قال: ` جاء رجل بناقة مخطومة،
فقال: يا رسول الله هذه الناقة في سبيل الله، قال ... ` فذكره. وقال:
` مشهور من حديث الأعمش، ثابت، حدث به عن الفضيل جماعة من المتقدمين `.
قلت: والشيباني اسمه سعد بن إياس. وقد تابعه جرير عن الأعمش به. أخرجه
الحاكم (2 / 90) وقال: ` صحيح على شرط الشيخين `، ووافقه الذهبي، وهو
كما قالا.




ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি লাগাম পরানো একটি উটনী নিয়ে আসলেন এবং বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! এই উটনীটি আল্লাহর পথে (ফি সাবিলিল্লাহ)।" (তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "(এর বিনিময়ে) আপনার জন্য জান্নাতে লাগাম পরানো সাতশো উটনী রয়েছে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (635)


635 - ` من تطبب ولا يعلم منه طب، فهو ضامن `.
أخرجه أبو داود (4586) والنسائي (2 / 250) وابن ماجه (3466)
والدارقطني (ص 370) والحاكم (4 / 212) والبيهقي (141) من طريق الوليد
بن مسلم عن ابن جريج عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم قال: فذكره. وقال أبو داود: ` لم يروه إلا الوليد، لا ندري هو
صحيح أم لا؟ `. وأما الحاكم فقال: ` صحيح الإسناد `! ووافقه الذهبي!
قلت: وهو بعيد، فإن ابن جريج والوليد مدلسان وقد عنعناه، إلا عند
الدارقطني والحاكم فقد وقع فيه تصريح الوليد بالتحديث. فقد انحصرت العلة في
عنعنة شيخه ابن جريج.
وأعله البيهقي بعلة أخرى فقال: ` ورواه محمود بن خالد
عن الوليد، عن ابن جريج عن عمرو بن شعيب عن جده عن النبي صلى الله عليه وسلم،
لم يذكر أباه `. كذا قال، ولعلها رواية وقعت له، وإلا فقد رواه النسائي
عنه مثل رواية الجماعة عن الوليد، فقال عقبها: ` أخبرنا محمود بن خالد قال:
حدثنا الوليد عن ابن جريج عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده مثله سواء `.
وأما الدارقطني فأعله بعلة أخرى، فقال: ` لم يسنده عن ابن جريج غير الوليد
بن مسلم، وغيره يرويه عن ابن جريج عن عمرو بن شعيب مرسلا عن النبي صلى الله
عليه وسلم `.
قلت: وذا لا يضر فإن الوليد ثقة حافظ، وإنما العلة العنعنة كما بينا.
وللحديث شاهد من رواية عبد العزيز بن عمر بن عبد العزيز: حدثني بعض الوفد
الذين قدموا على أبي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` أيما طبيب تطبب على قوم لا يعرف له تطبب قبل ذلك، فأعنت، فهو ضامن `.
قال عبد العزيز: أما إنه ليس بالعنت إنما هو قطع العروق والبط والكي.
قلت: وإسناده حسن لولا أنه مرسل مع جهالة المرسل، لكن الحديث حسن بمجموع
الطريقين. والله أعلم.




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি চিকিৎসা করে অথচ তার চিকিৎসা জ্ঞান আছে বলে জানা যায় না, সে (ক্ষতির জন্য) দায়ী হবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (636)


636 - ` أبايعك على أن تعبد الله وتقيم الصلاة وتؤتي الزكاة وتناصح المسلمين
وتفارق المشرك `.
أخرجه النسائي (2 / 183) والبيهقي (9 / 13) وأحمد (4 / 365)
من طريق
أبي وائل عن أبي نخيلة البجلي قال: قال جرير: ` أتيت النبي صلى الله عليه
وسلم وهو يبايع فقلت: يا رسول الله ابسط يدك حتى أبايعك، واشترط علي فأنت
أعلم، قال ... ` فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، وأبو نخيلة بالخاء المعجمة، وقيل بالمهملة وبه
جزم إبراهيم الحربي وقال: هو رجل صالح. وقد جزم غير واحد بصحبته كما بينه
الحافظ في ` الإصابة `. ولهذا الحديث شاهد من حديث أعرابي، ويأتي بلفظ:
` إنكم إن شهدتم ... `. والحديث أخرجه الطبراني أيضا في ` المعجم الكبير `
(ج 1 ورقه 111 وجه 1) من طريق أبي وائل به. وقد رويت الجملة الأخيرة منه
من طريق أخرى عن جرير بلفظ: ` أنا برىء من كل مسلم يقيم بين أظهر المشركين،
قالوا: يا رسول الله: ولم؟ قال: لا تراءى نارهما `.
أخرجه الترمذي (2 / 397) : حدثنا هناد: حدثنا أبو معاوية عن إسماعيل بن أبي
خالد عن قيس بن أبي حازم عن جرير بن عبد الله: أن رسول الله بعث سرية إلى خثعم
، فاعتصم ناس بالسجود، فأسرع فيهم القتل، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم
، فأمر لهم بنصف العقل وقال ... ` فذكره.
ثم قال الترمذي: حدثنا هناد: حدثنا عبدة عن إسماعيل بن أبي خالد عن قيس بن
أبي حازم مثل حديث أبي معاوية ولم يذكر فيه عن جرير، وهذا أصح. وفي الباب
عن سمرة، وأكثر أصحاب إسماعيل قالوا: عن إسماعيل عن قيس بن أبي حازم أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم بعث سرية ولم يذكروا فيه عن جرير، وروى حماد بن
سلمه عن الحجاج بن أرطاة عن إسماعيل بن أبي خالد عن جرير مثل حديث أبي معاوية،
وسمعت محمدا يقول: الصحيح حديث قيس عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسل، وروى
سمرة بن جندب عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا تساكنوا المشركين ولا
تجامعوهم، فمن ساكنهم أو جامعهم فهو مثلهم `.
قلت: إسناد الحديث الأول الموصول رجاله ثقات رجال مسلم، لكن أعله الترمذي
تبعا للبخاري وغيره بالإرسال، ولولا أن في أبي معاوية - واسمه محمد بن خازم
بمعجمتين - شيئا من الضعف من قبل حفظه لقلت ` إنه زاد الوصل، والزيادة من
الثقة مقبولة، على أنه قد تابعه في وصله الحجاج بن أرطاة كما ذكر الترمذي وقد
وصله البيهقي (9 /




জারীর ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলাম যখন তিনি বায়আত গ্রহণ করছিলেন। আমি বললাম, "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনার হাত প্রসারিত করুন যেন আমি আপনার নিকট বায়আত গ্রহণ করতে পারি। আমার উপর শর্তারোপ করুন, কারণ আপনিই সর্বাধিক জ্ঞানী।"
অতঃপর তিনি বললেন: "[আমি তোমার নিকট] এই শর্তে বায়আত গ্রহণ করছি যে, তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে, সালাত প্রতিষ্ঠা করবে, যাকাত প্রদান করবে, সকল মুসলিমের কল্যাণ কামনা করবে এবং মুশরিকদের পরিহার করে চলবে (বা মুশরিকদের থেকে সম্পর্ক ছিন্ন করবে)।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (637)


637 - ` ما تواد اثنان في الله عز وجل، أو في الإسلام، فيفرق بينهما إلا ذنب يحدثه
أحدهما `.
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (401) من طريق سنان بن سعد عن أنس أن
رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وإسناده حسن، رجاله ثقات رجال الشيخين، غير سنان ابن سعد، ويقال:
سعد بن سنان، قال الحافظ: ` صدوق له أفراد `.
قلت: وهذا مما لم يتفرد به، فقد رواه جماعة عن غير أنس من الصحابة، فمنهم
عبد الله بن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقول: فذكره في حديث.
أخرجه أحمد (2 / 68) من طريق ابن لهيعة عن خالد بن أبي عمران عن نافع، عن
ابن عمر. ورجاله ثقات، إلا أن ابن لهيعة سيء الحفظ، فحديثه مما يستشهد به.
ومنهم أبو هريرة عنه صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. أخرجه أبو نعيم في
` الحلية ` (5 / 202) عن إسحاق بن راهويه حدثنا كلثوم بن محمد بن أبي سدرة
حدثنا عطاء بن ميسرة عنه.
قلت: وهذا إسناد منقطع ضعيف، عطاء بن ميسرة هو ابن أبي مسلم الخراساني ولم
يسمع من أحد من الصحابة. وكلثوم هذا قال أبو حاتم: يتكلمون فيه. ومنهم رجل
من بني سليط قال: ` أتيت النبي صلى الله عليه وسلم ... ` فذكر حديثا فيه هذا.
يرويه علي بن زيد عن الحسن حدثني رجل من بني سليط. أخرجه أحمد (5 / 71) .
وهذا إسناد لا بأس به في الشواهد، وحسنه الهيثمي (10 / 275) ، رجاله ثقات
غير علي بن زيد وهو ابن جدعان وهو ضعيف الحفظ.
وبالجملة فالحديث بمجموع هذه الطرق صحيح. وبالله التوفيق.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

“আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা’র সন্তুষ্টির জন্য অথবা ইসলামের ভিত্তিতে দুজন মানুষ পরস্পরের মধ্যে যে বন্ধুত্ব স্থাপন করে, তাদের মধ্যে বিচ্ছেদ ঘটে না—কেবল তাদের দুজনের যে কোনো একজনের সংঘটিত কোনো পাপের কারণে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (638)


638 - ` أقيلوا ذوي الهيئات عثراتهم إلا الحدود `.
أخرجه أبو داود (4375) والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (3 / 129) وأحمد
(6 / 181) وأبو نعيم في ` الحلية ` (9 / 43) وابن عدي في ` الكامل `
(306 / 1) والحافظ ابن المظفر في ` الفوائد المنتقاة ` (2 / 214 / 2)
والضياء المقدسي في ` المنتقى من مسموعاته بمرو ` (ق 48 / 1) وكذا البيهقي
(8 / 334) من طرق عن عبد الملك بن زيد عن محمد بن أبي بكر عن أبيه عن عمرة عن
عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
أورده ابن عدي في
ترجمة عبد الملك هذا مع حديث آخر له، وقال: ` وهذان الحديثان منكران بهذا
الإسناد، لم يروهما غير عبد الملك ابن زيد `.
قلت: قد وثقه ابن حبان، وقال النسائي: ليس به بأس، وقال ابن الجنيد:
ضعيف الحديث. فمثله حسن الحديث، وهو ما يعطيه قول النسائي المذكور، وقد
اعتمده الحافظ في ` التقريب `. ومثله يحتج بحديثه في مرتبة الحسن، إلا أن
يتبين خطؤه، وهذا غير موجود في هذا الحديث، وكأنه لذلك قوى الطحاوي حديثه
هذا، بل قد جاء ما يؤيد حفظه إياه سندا ومتنا، فقد تابعه أبو بكر بن نافع
العمري عن محمد بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم عن عمرة به. أخرجه البخاري
في ` الأدب المفرد ` (465) والطحاوي، وابن حبان في ` صحيحه ` (1520)
وكذا أبو يعلى في ` مسنده ` (237 / 2) وأبو بكر الشافعي في ` الفوائد `
(73 / 255 / 1) وابن المظفر في ` الفوائد ` والبيهقي كلهم من طرق عن العمري
به لم يذكروا في إسناده ` عن أبيه ` غير ابن المظفر في إحدى روايتيه.
لكن أبو بكر هذا - وهو مولى زيد بن الخطاب كما وقع صريحا في ` فوائد الشافعي `
ورواية للطحاوي - قال ابن معين: ليس بشيء.
وقال أبو داود: لم يكن عنده إلا
حديث واحد. ثم ذكر هذا. وقال الحاكم أبو أحمد: ليس بالقوي عندهم. وقال
الحافظ في ` التقريب `: ` ضعيف `. وتابعه أيضا عبد الرحمن بن محمد بن أبي
بكر بن حمد بن عمرو ابن حزم عن أبيه عن عمرة به. دون قوله ` إلا الحدود `.
أخرجه الطحاوي (3 / 128) والعقيلي في ` الضعفاء ` (ص 236) وقال: ` وقد
روي بغير هذا الإسناد، وفيه أيضا لين وليس فيه شيء ثابت `. أورده في ترجمة
عبد الرحمن هذا، وروى عن البخاري أنه قال: ` روى عنه الواقدي عجائب `.
قلت: الواقدي متهم، فلا يغمز في شيخه بما روى من العجائب عنه، والأصل براءة
الذمة، فلا ينقل عنها إلا بحجة، وكأنه لذلك قال الحافظ فيه: ` مقبول `.
يعني عند المتابعة، وقد توبع كما عرفت فيكون حديثه مقبولا. وقد توبع أيضا
مع شيء من المخالفة لا تضر إن شاء الله تعالى. فقال الخلال في ` الأمر
بالمعروف ` (ق 5 / 2) : أنبأنا أحمد بن الفرج أبو عتبة الحمصي قال: حدثنا
ابن أبي فديك حدثنا ابن أبي ذئب عن محمد بن أبي بكر عن أبيه عن جده عن عمر
مرفوعا به.
وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات، رجال الشيخين، غير أحمد بن الفرج،
فهو ضعيف من قبل حفظه، غير متهم في صدقه، قال ابن عدي: ` لا يحتج به، هو
وسط `. وقال ابن أبي حاتم: ` محله الصدق `.
قلت: فمثله يستشهد به ولا يحتج به، خصوصا فيما خالف فيه الثقات كقوله في هذا
الإسناد: ` عن أبيه عن جده عن عمر ` فهو من أخطائه، لا ممن فوقه، فإنهم ثقات
والصواب: ` عن أبيه عن عمرة عن عائشة ` كما تقدم في رواية الجماعة.
وعلى كل حال فاتفاق هؤلاء الأربعة على رواية هذا الحديث عن محمد بن أبي بكر
دليل قاطع على أن له أصلا عنه لأنه يبعد عادة تواطؤهم على الخطأ، فإذا اختلفوا
عليه، فالعبرة بما عليه رواية الجماعة وقد عرفتها. وقد تابعهم عبد العزيز
بن عبد الله بن عبيد الله بن عمر بن الخطاب. عند الطحاوي (3 / 129) .
وعبد العزيز هذا ثقة، وكذلك من دونه، فهو إسناد صحيح.
وقد وجدت له طريقا أخرى عن عائشة رضي الله عنها، فقال الطبراني في ` المعجم
الأوسط ` (1 / 185 / 1) : أنبأنا محمد بن عبد الله الحضرمي: أنبأنا إسحاق بن
زيد الخطابي أنبأنا محمد بن سليمان بن (أبي) داود أنبأنا المثنى أبو حاتم
العطار: أنبأنا عبيد الله بن عيزار عن القاسم بن محمد عنها أن النبي صلى الله
عليه وسلم قال: فذكره دون الزيادة. وقال: ` لم يروه عن عبيد الله إلا
المثنى، ولا عنه إلا محمد، وريحان بن سعيد `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف المثنى هذا وهو ابن بكر البصري قال العقيلي (ص 429)
: ` لا يتابع على حديثه `.
وقال الدارقطني: ` متروك `. وعبيد الله بن
عيزار ثقة كما في ` الجرح والتعديل ` (2 / 2 / 330) . وسائر الرواة ثقات
معروفون، غير إسحاق بن زيد الخطابي ترجمه ابن أبي حاتم في ` الجرح `،
والسمعاني في ` الأنساب `، ولم يذكرا فيه جرحا ولا تعديلا ولعله في
` الثقات ` لابن حبان. وله شاهد من حديث عبد الله بن مسعود. قال: قال رسول
الله صلى الله عليه وسلم فذكره بلفظ الترجمة إلا أنه قال: ` زلاتهم ` دون
الحدود. أخرجه الطبراني في ` الأوسط ` وعنه أبو نعيم في ` تاريخ أصبهان ` (2
/ 234) والخطيب في ` تاريخه ` (10 /




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:

মর্যাদা ও সম্মানের অধিকারী ব্যক্তিদের ভুলত্রুটি ক্ষমা করে দাও, তবে আল্লাহর নির্ধারিত শাস্তি (হুদূদ) এর ক্ষেত্রে নয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (639)


639 - ` كان لا يقنت إلا إذا دعا لقوم، أو دعا على قوم `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` رقم (620) : أنبأنا محمد بن محمد بن مرزوق
الباهلي حدثنا محمد بن عبد الله الأنصاري حدثنا سعيد بن أبي عروبة عن قتادة،
عن أنس مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد جيد وهو على شرط مسلم وفي ابن مرزوق كلام لا يسقط
حديثه عن
مرتبة الاحتجاج به، لاسيما وللحديث شاهد من حديث أبي هريرة. ` أن النبي صلى
الله عليه وسلم كان لا يقنت إلا أن يدعو لأحد، أو يدعو على أحد `. أخرجه ابن
خزيمة أيضا من طريق أبي داود: حدثنا إبراهيم بن سعد عن الزهري عن سعيد وأبي
سلمة عنه. وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুনূত পড়তেন না, তবে যখন তিনি কোনো সম্প্রদায়ের (কল্যাণের) জন্য দোয়া করতেন অথবা কোনো সম্প্রদায়ের বিরুদ্ধে (অকল্যাণের) বদদোয়া করতেন (তখনই কুনূত পড়তেন)।

(এই মর্মে আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণনা রয়েছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুনূত পড়তেন না, তবে যখন তিনি কারো জন্য দোয়া করতেন অথবা কারো বিরুদ্ধে বদদোয়া করতেন।)









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (640)


640 - ` أيما ضيف نزل بقوم، فأصبح الضيف محروما، فله أن يأخذ بقدر قراه، ولا حرج
عليه `.
أخرجه الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (4 / 40) وأحمد (2 / 380) من طريق
معاوية بن صالح عن أبي طلحة، عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم
قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات رجال مسلم غير أبي طلحة واسمه نعيم بن
زياد، وهو ثقة.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে কোনো মেহমান যদি কোনো গোত্রের নিকট অবতরণ করে (আশ্রয় নেয়), আর যদি সেই মেহমান (আতিথেয়তা থেকে) বঞ্চিত অবস্থায় সকাল করে, তবে তার জন্য বৈধ যে সে তার আপ্যায়নের সমপরিমাণ (খাদ্য বা পাথেয়) গ্রহণ করে নেবে। আর এতে তার কোনো গুনাহ বা সমস্যা নেই।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (641)


641 - ` كان لا ينام حتى يقرأ الزمر وبني إسرائيل `.
أخرجه الترمذي (4 /




বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সূরা আয-যুমার এবং সূরা বানী ইসরাঈল (সূরা আল-ইসরা) তিলাওয়াত না করা পর্যন্ত ঘুমাতেন না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (642)


642 - ` من قام بعشر آيات لم يكتب من الغافلين ومن قام بمائة آية كتب من القانتين
ومن قرأ بألف آية كتب من المقنطرين `.
أخرجه أبو داود (1 /




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি (রাতে সালাতে) দাঁড়িয়ে দশটি আয়াত তিলাওয়াত করে, তাকে গাফিলিন (অমনোযোগী বা উদাসীনদের) তালিকা থেকে বাদ দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি একশটি আয়াত তিলাওয়াত করে দাঁড়ায়, তাকে কানিতীন (আল্লাহর একান্ত অনুগতদের) অন্তর্ভুক্ত করা হয়। আর যে ব্যক্তি এক হাজার আয়াত তিলাওয়াত করে দাঁড়ায়, তাকে মুকানতারীন (বিশাল পরিমাণ সওয়াবের অধিকারী) হিসেবে লিপিবদ্ধ করা হয়।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (643)


643 - ` من قرأ في ليلة مائة آية لم يكتب من الغافلين، أو كتب من القانتين `.
أخرجه ابن نصر في ` قيام الليل ` (ص 66) وابن خزيمة في ` صحيحه `
(1 / 124 / 2) كلاهما بإسناد واحد، فقال: حدثنا أحمد بن سعيد الدارمي حدثنا
علي بن الحسن بن شقيق أخبرنا أبو حمزة (السكري) عن الأعمش عن أبي صالح عن
أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم. وهذا إسناد صحيح على
شرط الشيخين. وقوله: ` أو كتب من القانتين `. شك من بعض رواته، وهو مما
لا ينبغي الشك فيه عندي وذلك لأمرين: الأول: أن قوله: ` لم يكتب من
الغافلين `، قد ثبت فيمن قام بعشر آيات، كما تقدم في الحديث الآنف الذكر.
والآخر: أن قوله ` كتب من القانتين `، ثبت فيمن قام بمائة آية.
فقد روى عبد الله بن زياد عن محمد بن كعب القرظي عن ابن عمر رضي الله عنهما عن
رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:
` من قرأ عشر آيات في ليلة لم يكتب من
الغافلين، ومن قرأ مائة آية كتب من القانتين `. أخرجه الحاكم (1 /




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো এক রাতে একশো আয়াত তিলাওয়াত করবে, তাকে গাফিলদের (অমনোযোগীদের) অন্তর্ভুক্ত লেখা হবে না, অথবা তাকে ক্বানিতীনদের (আল্লাহর প্রতি বিনীতভাবে ইবাদতকারীদের) অন্তর্ভুক্ত লেখা হবে।”

আর ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত অপর এক হাদীসে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি কোনো রাতে দশটি আয়াত তিলাওয়াত করবে, তাকে গাফিলদের (অমনোযোগীদের) অন্তর্ভুক্ত লেখা হবে না, আর যে ব্যক্তি একশো আয়াত তিলাওয়াত করবে, তাকে ক্বানিতীনদের (বিনয়ী ও ইবাদতকারীদের) অন্তর্ভুক্ত লেখা হবে।”









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (644)


644 - ` من قرأ بمائة آية في ليلة كتب له قنوت ليلة `.
أخرجه الدارمي (2 / 464) : حدثنا يحيى بن بسطام، حدثنا يحيى ابن حمزة حدثني
زيد بن واقد، عن سليمان بن موسى عن كثير بن مرة عن تميم الداري أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله ثقات معروفون غير يحيى بن بسطام، قال ابن أبي
حاتم (4 / 2 / 132) : ` سألت أبي عنه؟ فقال: شيخ صدوق، ما بحديثه بأس،
قدري، أدخله البخاري في ` كتاب الضعفاء `، فيحول من هناك `. ثم رأيته في
` المسند ` (4 / 103) من طريق الهيثم بن حميد عن زيد بن واقد به، فصح الحديث
والحمد لله.




তামিম আদ-দারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এক রাতে একশোটি আয়াত তিলাওয়াত করবে, তার জন্য পুরো রাত ইবাদত (কুনূত) করার সওয়াব লেখা হবে।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (645)


645 - ` اقرءوا المعوذات في دبر كل صلاة `.
أخرجه النسائي (1 / 196) وابن خزيمة في ` صحيحه ` (755) عن ليث عن حنين
بن أبي حكيم عن علي بن
رباح عن عقبة قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه
وسلم.
قلت: وهذا إسناد جيد، رجاله ثقات رجال مسلم غير حنين ابن أبي حكيم، فهو
صدوق.




উকবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "তোমরা প্রত্যেক সালাতের (নামাজের) শেষে মু’আওবিযাত (অর্থাৎ সূরা ইখলাস, সূরা ফালাক ও সূরা নাস) পাঠ করো।"









সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ (646)


646 - ` نعمت السورتان يقرأ بهما في ركعتين قبل الفجر * (قل هو الله أحد) * و * (قل
يا أيها الكافرون) * `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 121 / 2) : حدثنا بندار، أنبأنا إسحاق بن
يوسف الأزرق، حدثنا الجريري، عن عبد الله بن شفيق عن عائشة قالت:
` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي أربعا قبل الظهر، وركعتين قبل العصر
لا يدعهما، قالت: وكان يقول.... `. فذكره. وأخرجه ابن حبان (610) من
طريق يزيد بن هارون عن سعيد الجريري به، دون قوله في أوله: ` كان.... `.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات رجال مسلم، غير أن الجريري كان اختلط قليلا
قبل موته بثلاث سنوات.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুহরের (ফরযের) আগে চার রাকাত এবং আসরের (ফরযের) আগে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন, যা তিনি কখনও ছাড়তেন না। তিনি আরও বলেন: তিনি (নবীজী) বলতেন:
"ফজরের আগের দুই রাকাআতে (সুন্নাত সালাতে) পাঠ করার জন্য সূরা দু’টি কতই না উত্তম: ’কুল হুওয়াল্লাহু আহাদ’ (সূরা ইখলাস) এবং ’কুল ইয়া আইয়ুহাল কাফিরূন’ (সূরা কাফিরূন)।"