সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ
687 - ` ائت حرثك أنى شئت وأطعمها إذا طعمت واكسها إذا اكتسيت ولا تقبح الوجه
ولا تضرب `.
أخرجه أبو داود (1 / 334) وأحمد (5 / 3، 5) عن بهز بن حكيم حدثني أبي
عن جدي قال: ` قلت: يا رسول الله نساؤنا ما نأتي منهن وما نذر؟ قال ... `
فذكره.
قلت: وهذا إسناد حسن للخلاف المعروف في بهز بن حكيم، وهو صدوق كما
في
` التقريب `. وأما أبوه حكيم وهو ابن معاوية بن حيدة فروى عنه جمع من الثقات
ووثقه ابن حبان (1 / 24) .
মু’আবিয়াহ ইবনে হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"তুমি তোমার শস্যক্ষেত্রে (স্ত্রীর নিকট) যেভাবে ইচ্ছা গমন করতে পারো। যখন তুমি আহার করবে, তখন তাকেও আহার করাও; যখন তুমি পোশাক পরিধান করবে, তখন তাকেও পোশাক দাও; আর চেহারায় কটূক্তি করো না (বা কুৎসিত বলো না) এবং প্রহার করো না।"
688 - ` أالفقر تخافون؟ والذي نفسي بيده لتصبن عليكم الدنيا صبا حتى لا يزيغ قلب
أحدكم إزاغة إلا هيه، وايم الله لقد تركتكم على مثل البيضاء ليلها ونهارها
سواء `.
أخرجه ابن ماجه (رقم 5) حدثنا هشام بن عمار الدمشقي حدثنا محمد بن عيسى بن
سميع حدثنا إبراهيم بن سليمان الأفطس عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشي عن جبير
بن نفير عن أبي الدرداء قال: ` خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم
ونحن نذكر الفقر ونتخوفه، فقال (فذكره) قال أبو الدرداء: صدق - والله -
رسول الله صلى الله عليه وسلم تركنا - والله - على مثل البيضاء ليلها ونهارها
سواء `.
قلت: وهذا إسناد حسن، رجاله كلهم ثقات وفي هشام بن عمار وإبراهيم الأفطس
كلام لا ينزل الحديث عما ذكرنا وقد بيض له البوصيري في ` زوائد ابن ماجه `
(1 / 2) .
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা যখন দারিদ্র্যের আলোচনা করছিলাম এবং এর ভয় করছিলাম, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের কাছে এলেন এবং বললেন:
"তোমরা কি দারিদ্র্যকে ভয় করছো? যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! অচিরেই তোমাদের উপর দুনিয়া (সম্পদ) এমনভাবে ঢেলে দেওয়া হবে যে, তোমাদের কারো অন্তর সামান্যতমও (সত্য পথ থেকে) বিচ্যুত হবে না—যদি না সে সেদিকে (দুনিয়ার দিকে) বিচ্যুত হয়। আল্লাহর কসম! আমি তোমাদেরকে এমন এক শুভ্র, উজ্জ্বল পথের উপর রেখে গেলাম, যার রাত ও দিন সমান।"
আবু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সত্য বলেছেন। আল্লাহর কসম! তিনি আমাদের এমন এক শুভ্র পথের উপর রেখে গেছেন, যার রাত ও দিন সমান।
689 - ` أبى الله أن يجعل لقاتل المؤمن توبة `.
أخرجه محمد بن حمزة الفقيه في ` أحاديثه ` (ق 215 / 2) والواحدي في ` الوسيط
` (1 / 180 / 2) والضياء في ` المختارة ` (127 / 1) من طريقين عن سويد بن
نصر حدثنا ابن المبارك عن سليمان التيمي (زاد الأولان: عن حميد) عن أنس
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح وسليمان التيمي سمع من أنس، فهو متصل سواء ثبتت
الزيادة أو لم تثبت ورجاله كلهم ثقات رجال مسلم.
والحديث عزاه في ` الجامعين ` للطبراني أيضا في ` المعجم الكبير `، ولم أره
في ترجمة أنس منه، فالله أعلم وفي ` الفيض `: ` قال في ` الفردوس `: صحيح.
ورواه جمع عن عقبة بن مالك الليثي، وسببه أن النبي صلى الله عليه وسلم بعث
سرية، فأغاروا على قوم، فشذ رجل منهم فاتبعه رجل من السرية شاهرا سيفه فقال:
إني مسلم، فقتله، فنهي إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال قولا شديدا، ثم
ذكره `.
قلت: حديث عقبة أخرجه النسائي في ` السير ` (1 / 39 / 1) وأحمد (4 / 110،
5 /
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ তা’আলা কোনো মুমিন হত্যাকারীর জন্য তওবার সুযোগ রাখা প্রত্যাখ্যান করেছেন।"
690 - ` أبى الله والمؤمنون أن يختلف عليك يا أبا بكر `.
أخرجه أحمد (6 / 47) والحسن بن عرفة في ` جزئه ` (2 / 2) ومن طريقه ابن
بلبان في ` تحفة الصديق، في فضائل أبي بكر الصديق ` (50 / 1) من طريق عبد
الرحمن بن أبي بكر القرشي عن ابن أبي مليكة عن عائشة قالت: ` لما ثقل رسول
الله صلى الله عليه وسلم، قال لعبد الرحمن بن أبي بكر: ائتني بكتف أو لوح حتى
أكتب لأبي بكر كتابا لا يختلف عليه، فلما ذهب عبد الرحمن ليقوم قال ... `.
فذكره. وقال ابن بلبان: ` تفرد به ابن أبي مليكة أبو محمد ويقال له: أبو
بكر القرشي `.
قلت: وهو ضعيف لكنه لم يتفرد به، فقال أحمد (6 / 106) : حدثنا مؤمل قال:
حدثنا نافع يعني ابن عمر حدثنا ابن أبي مليكة به نحوه. وهذا إسناد جيد في
المتابعات، نافع هذا ثقة ثبت ومؤمل هو ابن إسماعيل وهو صدوق سيء الحفظ كما
في ` التقريب `. وله طريق أخرى من رواية عروة عن عائشة قالت: قال لي رسول
الله صلى الله عليه وسلم في مرضه: ` ادعي لي أبا بكر وأخاك حتى أكتب كتابا
فإني أخاف أن يتمنى متمن ويقول قائل: أنا أولى، ويأبى الله والمؤمنون إلا
أبا بكر `. أخرجه مسلم (7 / 110) وأحمد (6 / 144) .
وله طريق ثالث يرويه القاسم بن محمد عنها نحوه ولفظه: ` لقد هممت أو أردت أن
أرسل إلى أبي بكر وابنه، وأعهده أن يقول القائلون أو
يتمنى المتمنون، ثم
قلت: يأبى الله ويدفع المؤمنون أو يدفع الله ويأبى المؤمنون `. أخرجه
البخاري (4 /
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
যখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অসুস্থতার কারণে দুর্বল হয়ে পড়লেন, তিনি আবদুর রহমান ইবনে আবী বকরকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "আমার কাছে একটি কাঁধের হাড় (বা অনুরূপ কিছু) অথবা একটি ফলক নিয়ে এসো, যাতে আমি আবু বকরের জন্য একটি চিঠি লিখে দিতে পারি, যার ওপর আর কোনো মতভেদ সৃষ্টি হবে না।"
আবদুর রহমান যখন উঠে যাওয়ার জন্য গেলেন, তখন তিনি (নবী ﷺ) বললেন: "আল্লাহ এবং মুমিনগণ তা প্রত্যাখ্যান করবেন যে, হে আবু বকর, তোমার ব্যাপারে কেউ মতভেদ সৃষ্টি করুক।"
[অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, নবী ﷺ তাঁর অসুস্থতার সময় আমাকে (আয়েশাকে) বলেছিলেন:] "আবু বকর এবং তোমার ভাইকে আমার কাছে ডেকে আনো, যাতে আমি একটি লিখিত অঙ্গীকার তৈরি করে দিতে পারি। কারণ আমি আশঙ্কা করছি যে, কেউ আকাঙ্ক্ষা প্রকাশ করতে পারে এবং কেউ বলতে পারে: আমিই অধিক যোগ্য। অথচ আল্লাহ এবং সকল মুমিনগণ আবু বকর ছাড়া অন্য কাউকে মেনে নিতে অস্বীকৃতি জানাবেন।"
[আরেকটি বর্ণনায় এসেছে:] তিনি বলেন: "আমি সংকল্প করেছিলাম বা চেয়েছিলাম যে, আমি আবু বকর ও তার পুত্রের কাছে লোক পাঠাই এবং তার ব্যাপারে একটি অঙ্গীকার লিখে দিই (এই আশঙ্কায়) যে, যেন কোনো বক্তা কথা না বলে বা কোনো আকাঙ্ক্ষাকারী আকাঙ্ক্ষা পোষণ না করে। কিন্তু এরপর আমি বললাম: আল্লাহ তা প্রত্যাখ্যান করবেন এবং মুমিনগণ তা প্রতিহত করবেন, অথবা আল্লাহ প্রতিহত করবেন এবং মুমিনগণ তা প্রত্যাখ্যান করবেন।"
691 - ` إن اليهود قوم حسد وإنهم لا يحسدوننا على شيء كما يحسدونا على السلام وعلى
(آمين) `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 73 / 2) : حدثنا أبو بشر الواسطي أنبأنا
خالد يعني ابن عبد الله عن سهيل - وهو ابن أبي صالح - عن أبيه عن عائشة
قالت: ` دخل يهودي على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: السام عليك يا
محمد فقال النبي صلى الله عليه وسلم: وعليك، فقالت عائشة: فهممت أن أتكلم،
فعلمت كراهية النبي صلى الله عليه وسلم لذلك، فسكت. ثم دخل آخر، فقال:
السام عليك فقال: عليك، فهممت أن أتكلم، فعلمت كراهية النبي صلى الله عليه
وسلم لذلك، ثم دخل الثالث فقال. السام عليك، فلم أصبر حتى قلت: وعليك
السام وغضب الله ولعنته إخوان القردة والخنازير! أتحيون رسول الله بما لم
يحيه الله؟ ! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إن الله لا يحب الفحش ولا
التفحش، قالوا قولا فرددنا عليهم، إن اليهود ... `. ورواه أبو نعيم أيضا.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله كلهم ثقات رجال الصحيح، وأبو بشر الواسطي اسمه
إسحاق بن شاهين وهو من شيوخ البخاري. والحديث أخرجه ابن ماجه (1 / 281) من
طريق حماد بن سلمة حدثنا سهيل بن أبي صالح به مقتصرا على الجملة المذكورة أعلاه
بنحوه. وقال البوصيري في ` الزوائد `: ` هذا إسناد صحيح، احتج مسلم بجميع
رواته `. وللحديث طريق أخرى، يرويه حصين بن عبد الرحمن عن عمرو بن قيس عن
محمد بن الأشعث عن عائشة قالت: ` بينا أنا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ
استأذن رجل من اليهود ... ` الحديث بتمامه نحوه وأتم منه إلا أن لم يذكر الحسد
على السلام ولفظه: ` لا يحسدوننا على شيء كما يحسدوننا على يوم الجمعة التي
هدانا الله وضلوا عنها وعلى القبلة التي هدانا الله لها وضلوا عنها وعلى
قولنا خلف الإمام: آمين `.
وهذا إسناد جيد رجاله ثقات رجال مسلم غير محمد بن
الأشعث وقد وثقه ابن حبان وروى عنه جماعة وهو تابعي كبير.
وللترجمة شاهد من حديث أنس بلفظ:
` إن اليهود ليحسدونكم على السلام والتأمين `.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,
[রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:] “নিশ্চয়ই ইহুদিরা হলো হিংসুক জাতি। তারা অন্য কোনো কিছুর জন্য আমাদের এত হিংসা করে না, যতটা হিংসা করে সালামের জন্য এবং ‘আমীন’ বলার জন্য।”
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট একজন ইহুদি প্রবেশ করল এবং বলল: ‘আস-সামু আলাইকা ইয়া মুহাম্মাদ’ (হে মুহাম্মাদ, আপনার মৃত্যু হোক)।
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: ‘ওয়া আলাইক’ (তোমারও তাই হোক)।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি কথা বলতে উদ্যত হলাম, কিন্তু নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর অপছন্দ বুঝতে পেরে চুপ থাকলাম।
এরপর আরেকজন প্রবেশ করল এবং বলল: ‘আস-সামু আলাইক’। তিনি বললেন: ‘আলাইক’ (তোমারও)। আমি কথা বলতে উদ্যত হলাম, কিন্তু নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর অপছন্দ বুঝতে পারলাম।
এরপর তৃতীয়জন প্রবেশ করল এবং বলল: ‘আস-সামু আলাইক’। আমি নিজেকে আর সামলাতে না পেরে বলে উঠলাম: ‘ওয়া আলাইকুমুস সামু ওয়া গাদাবুল্লাহি ওয়া লা’নাহ! ওহে বানর ও শূকরদের ভাইরা! তোমরা কি রাসূলুল্লাহকে এমন অভিবাদন জানাচ্ছো যা আল্লাহ তাঁকে জানাননি?!’
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “নিশ্চয় আল্লাহ খারাপ ও অশ্লীল কথা পছন্দ করেন না। তারা এমন একটি কথা বলেছিল, যার উত্তর আমরা তাদের দিয়ে দিয়েছি।”
অন্য এক সূত্রে [আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে] বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “তারা অন্য কোনো কিছুর জন্য আমাদের এত হিংসা করে না, যতটা হিংসা করে জুমু’আর দিনের জন্য, যা দিয়ে আল্লাহ আমাদের পথ দেখিয়েছেন আর তারা তা থেকে পথভ্রষ্ট হয়েছে; আর কিবলার জন্য, যা দিয়ে আল্লাহ আমাদের পথ দেখিয়েছেন আর তারা তা থেকে পথভ্রষ্ট হয়েছে; এবং ইমামের পেছনে আমাদের ‘আমীন’ বলার জন্য।”
এবং আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে বর্ণিত অন্য এক বর্ণনায় আছে: “নিশ্চয়ই ইহুদিরা তোমাদের সালাম ও আমীন বলার জন্য তোমাদের প্রতি হিংসা করে।”
692 - ` إن اليهود ليحسدونكم على السلام والتأمين `.
أخرجه أبو نعيم في ` أحاديث مشايخ أبي القاسم الأصم ` (35 / 1) والخطيب في
` التاريخ ` (11 / 43) والضياء المقدسي في ` المختارة ` (ق 45 / 1) من
طريق إبراهيم بن إسحاق الحربي: حدثنا أبو ظفر حدثنا سليمان بن المغيرة عن ثابت
عن أنس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
وقال المقدسي: ` أبو ظفر اسمه عبد السلام بن مطهر بن حسام بن مصك بن ظالم بن
شيطان الأزدي البصري، روى عنه البخاري وأبو داود `.
قلت: وبقية رجال الإسناد ثقات، فهو صحيح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “নিশ্চয়ই ইহুদিরা তোমাদেরকে সালাম দেওয়া এবং ‘আমীন’ বলার কারণে হিংসা করে।”
693 - ` الفجر فجران فجر يحرم فيه الطعام وتحل فيه الصلاة وفجر تحرم فيه الصلاة
ويحل فيه الطعام `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 52 / 2) وعنه الحاكم (1 / 425) من طريق
أبي أحمد الزبيري حدثنا سفيان عن ابن جريج عن عطاء عن ابن عباس أن رسول
الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. وقال ابن خزيمة:
` (لم) يرفعه في
الدنيا غير أبي أحمد الزبيري `. وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه
الذهبي.
من فقه الحديث:
قال ابن خزيمة: ` في هذا الخبر دلالة على أن صلاة الفرض لا يجوز أداؤها قبل
دخول وقتها `. وقال: ` (فجر يحرم فيه الطعام) يريد على الصائم. (ويحل
فيه الصلاة) يريد صلاة الصبح. (وفجر يحرم فيه الصلاة) يريد صلاة الصبح،
إذا طلع الفجر الأول لم يحل أن يصلي في ذلك الوقت صلاة الصبح، لأن الفجر الأول
يكون بالليل، ولم يرد أنه لا يجوز أن يتطوع بالصلاة بعد الفجر الأول. وقوله
(ويحل فيه الطعام) يريد لمن يريد الصيام `.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
ফজর হলো দুই প্রকার— একটি হলো সেই ফজর, যখন (রোযাদারের জন্য) পানাহার (খাবার গ্রহণ) হারাম হয়ে যায় এবং তাতে সালাত (ফজরের ওয়াক্ত) হালাল হয়; আর (অপর) একটি হলো সেই ফজর, যখন সালাত (আদায় করা) হারাম থাকে এবং তাতে পানাহার (খাবার গ্রহণ) হালাল থাকে।
694 - ` التيمم ضربة للوجه والكفين `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (38 / 2) وأحمد (4 / 263) عن سعيد بن عبد
الرحمن بن أبزى عن أبيه عن عمار بن ياسر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم
قال في التيمم ضربة ...
قلت: وهذا سند صحيح على شرط الشيخين، ومعناه في ` الصحيحين ` وأبي داود
وغيرهما وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (
আম্মার ইবনে ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তায়াম্মুম হলো মুখমণ্ডল ও দু’হাতের কব্জির জন্য (মাটিতে) একবার আঘাত করা।”
695 - ` إن من أشراط الساعة أن يلتمس العلم عند الأصاغر `.
أخرجه ابن المبارك في ` الزهد ` (61) وعنه أبو عمرو الداني في ` الفتن `
(62 / 2) واللالكائي في ` شرح أصول السنة ` (230 /
নিশ্চয়ই কিয়ামতের অন্যতম নিদর্শন হলো এই যে, জ্ঞান অন্বেষণ করা হবে ‘আসাগির’ তথা ছোটদের (বা জ্ঞান ও মর্যাদার দিক থেকে নিম্নস্তরের লোকদের) নিকট থেকে।
696 - ` تنام عيناي ولا ينام قلبي `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 9 / 2) من طريق يحيى بن سعيد عن ابن عجلان
قال: سمعت أبي يحدث عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره
. قلت: وهذا إسناد جيد. وله عنده شاهد صحيح من حديث عائشة قالت: ` فقلت:
يا رسول الله! أتنام قبل أن توتر؟ فقال: يا عائشة إن عيني تنامان ولا ينام
قلبي `. وقد رواه الشيخان في ` صحيحيهما ` وغيرهما، وهو مخرج في ` صحيح
أبي داود ` (1212) . وله شاهد ثالث من حديث أبي بكرة مرفوعا. أخرجه أحمد
(5 / 40، 49،
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমার চক্ষুদ্বয় ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"
(এর সমর্থনে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি বিতর সালাত আদায়ের আগেই ঘুমিয়ে যান? তিনি বললেন: হে আয়েশা! নিশ্চয়ই আমার চোখ দুটি ঘুমিয়ে পড়ে, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।)
697 - ` نعم الميتة أن يموت الرجل دون حقه `.
أخرجه أحمد (1 / 184) وعنه أبو عمرو الداني في ` الفتن ` (148 / 1) وأبو
نعيم في ` الحلية ` (8 / 290) من طريق إبراهيم بن المهاجر عن أبي بكر بن
حفص
- فذكر قصة - قال: سمعت أبي سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
فذكره. وقال أبو نعيم: ` وأبو بكر اسمه عبد الله بن حفص بن عمر بن سعد بن
أبي وقاص `.
قلت: وهو ثقة من رجال الشيخين. وإبراهيم بن المهاجر وهو البجلي مختلف فيه
، فقال أحمد: لا بأس به وقال يحيى القطان: لم يكن بقوي، وفي ` التقريب `:
` صدوق لين الحفظ `.
قلت: فهو حسن الحديث أن شاء الله تعالى.
সা’দ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
কতই না উত্তম সেই মৃত্যু, যখন কোনো ব্যক্তি তার অধিকার রক্ষায় মৃত্যুবরণ করে।
698 - ` خير الناس في الفتن رجل آخذ بعنان فرسه أو قال برسن فرسه خلف أعداء الله
يخيفهم ويخيفونه، أو رجل معتزل في باديته يؤدي حق الله الذي عليه `.
أخرجه الحاكم (4 / 446) من طريق عبد الرزاق أنبأنا معمر عن عبد الله بن طاووس
عن أبيه عن ابن عباس مرفوعا. وقال: ` صحيح على شرط الشيخين ` ووافقه
الذهبي، وهو كما قالا إذا كان الراوي له عن عبد الرزاق وهو إسحاق بن إبراهيم
- وهو الدبري - لم يتفرد به.
وله طريق أخرى عنه بلفظ: ` ألا أخبركم بخير الناس منزلة `، وقد سبق. ثم
رأيته في المستدرك (4 / 464) من طريق يحيى بن جعفر حدثنا عبد الرزاق به فقال
: أيضا: صحيح على شرطهما ووافقه الذهبي.
وهو كما قالا فقد توبع عليه الدبري. ثم رأيت في ` الفتن `، لأبي عمرو الداني
(ق 153 / 1) من طريق عبد الله بن المبارك عن معمر به. فصح الحديث يقينا
والحمد لله. وله شاهد من حديث أم مالك البهزية. أخرجه الترمذي وحسنه،
` راجع المشكاة ` (5400) .
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
ফিতনার সময় উত্তম মানুষ হলো এমন ব্যক্তি, যে তার ঘোড়ার লাগাম ধরে আছে—অথবা বলেছেন, তার ঘোড়ার রশি ধরে আছে—আল্লাহর শত্রুদের পিছনে; সে তাদেরকে ভয় দেখায় এবং তারাও তাকে ভয় দেখায়। অথবা এমন ব্যক্তি, যে তার মরু অঞ্চলে (নির্জনে) একাকী জীবন যাপন করে এবং তার উপর আরোপিত আল্লাহর হক্ব যথাযথভাবে আদায় করে।
699 - ` خير الناس قرني، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم يجيء قوم يتسمنون:
يحبون السمن ينطقون الشهادة قبل أن يسألوها `.
أخرجه الترمذي (2 / 35، 49) وابن حبان (2285) والحاكم (3 / 471)
وأحمد (4 / 426) عن وكيع حدثنا الأعمش حدثنا هلال بن يساف عن عمران بن
حصين مرفوعا. وهذا سند صحيح على شرط مسلم وقول الحاكم: ` على شرط الشيخين
` وهم وإن وافقه الذهبي لأن هلالا إنما أخرج له خ تعليقا. وقد أخرجه الترمذي
أيضا من طريق محمد بن الفضيل عن الأعمش عن علي بن مدرك عن هلال بن يساف به.
فادخل علي بن مدرك بين الأعمش وهلال. قال الترمذي: هكذا روى محمد بن فضيل
هذا الحديث عن الأعمش عن علي بن مدرك عن هلال بن يساف، وروى غير واحد من
الحفاظ هذا الحديث عن الأعمش عن هلال بن يساف ولم يذكروا فيه علي بن مدرك. ثم
ساق إسناده المذكور ثم قال:
` وهذا أصح من حديث محمد بن فضيل `. وللحديث
طريقان آخران سبق ذكرهما في ` خير أمتي ` وله شاهد بلفظ:
` خير الناس قرني، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم يجيء قوم تسبق
شهادة أحدهم يمينه ويمينه شهادته `.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মানুষের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হলো আমার প্রজন্ম, অতঃপর তারা যারা তাদের নিকটবর্তী হবে, অতঃপর তারা যারা তাদের নিকটবর্তী হবে। এরপর এমন এক সম্প্রদায় আসবে যারা আরামপ্রিয় হবে (বা নিজেদেরকে বড় করে দেখাতে চাইবে): তারা স্থূলতা পছন্দ করবে এবং তাদেরকে সাক্ষ্য দেওয়ার জন্য অনুরোধ করার আগেই তারা সাক্ষ্য দেবে।”
700 - ` خير الناس قرني، ثم الذين يلونهم، ثم الذين يلونهم، ثم يجيء قوم تسبق
شهادة أحدهم يمينه ويمينه شهادته `.
أخرجه البخاري (5 / 199، 7 / 6، 11 / 460) ومسلم (7 /
আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: মানুষের মধ্যে সর্বোত্তম হলো আমার যুগ (বা আমার প্রজন্ম), তারপর তারা যারা তাদের নিকটবর্তী, অতঃপর তারা যারা তাদের নিকটবর্তী। এরপর এমন এক জাতি আসবে, যখন তাদের একজনের সাক্ষ্য তার কসমের চেয়ে আগে চলে যাবে এবং তার কসম তার সাক্ষ্যের চেয়ে আগে চলে যাবে।
701 - ` قل لخالد لا يقتلن امرأة ولا عسيفا `.
أخرجه أبو داود (1 / 416) من طريق عمر بن المرقع بن صيفي حدثني أبي عن جده
رباح بن ربيع قال: ` كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة، فرأى
الناس مجتمعين على شيء، فبعث رجلا فقال: انظر علام اجتمع هؤلاء؟ فجاء، فقال
: امرأة قتيل، فقال: ما كانت هذه لتقاتل! قال: وعلى المقدمة خالد بن
الوليد فبعث رجلا فقال ... ` فذكره.
وهذا إسناد صحيح، رجاله كلهم ثقات وقد رواه أبو الزناد عن المرقع أتم منه
وهذا لفظه: ` الحق خالدا فقل: لا تقتلن ذرية ولا عسيفا `.
أخرجه الطحاوي (2 / 127) والحاكم (2 / 122) وأحمد (3 / 488) عن أبي
الزناد قال: حدثني المرقع بن صيفي عن جده رياح بن الربيع أخي حنظلة الكاتب أنه
أخبره: أنه خرج مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة غزاها وعلى مقدمتها
خالد بن الوليد، فمر رباح وأصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم على امرأة
مقتولة مما أصابت المقدمة، فوقفوا ينظرون إليها، ويتعجبون من خلقها، حتى
لحقهم رسول الله صلى الله عليه وسلم على راحلته، فانفرجوا عنها، فوقف عليها
رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما كانت هذه لتقاتل، فقال لأحدهم ...
فذكره. ورواه ابن ماجه (2 / 195) من هذا الوجه وقال الحاكم: ` صحيح على
شرط الشيخين `. ووافقه الذهبي.
وأقول: كلا بل هو صحيح فقط، المرقع بن صيفي لم يرو له الشيخان شيئا، وهو
ثقة.
ثم إن الحديث في سنده اختلاف على أبي الزناد، فرواه عنه هكذا ابنه عبد
الرحمن، وهي رواية الحاكم، ورواية لأحمد (4 /
রাবাহ ইবনু রাবি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি যুদ্ধে বের হলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছু লোককে কোনো কিছুর উপর একত্রিত হয়ে থাকতে দেখলেন। তিনি একজনকে পাঠিয়ে বললেন: দেখো, এরা কিসের উপর একত্রিত হয়েছে? লোকটি ফিরে এসে বলল: একজন নিহত নারী। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: এই নারী তো যুদ্ধ করার মতো ছিল না!
(বর্ণনাকারী বললেন:) অগ্রভাগে ছিলেন খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন একজন লোককে পাঠালেন এবং বললেন: খালিদকে গিয়ে বলো, সে যেন কোনো নারী কিংবা কোনো ‘আসীফ’ (ভৃত্য বা শ্রমিক)-কে যেন হত্যা না করে।
702 - ` إني لا أخيس بالعهد ولا أحبس البرد ولكن ارجع، فإن كان في نفسك الذي في
نفسك الآن فارجع `.
أخرجه أبو داود (1 /
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
নিশ্চয় আমি অঙ্গীকার ভঙ্গ করি না এবং দূতকেও আটক করি না। তবে আপনি ফিরে যান, যদি আপনার মনে এখন যা আছে, তখনও যদি তা-ই থাকে, তাহলে ফিরে আসবেন।
703 - ` لا يحافظ على صلاة الضحى إلا أواب وهي صلاة الأوابين `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 133 / 1) والحاكم (1 / 314) من طريق
إسماعيل بن عبيد الله بن زرارة الرقي حدثنا خالد بن عبد الله حدثنا محمد بن
عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره. وقال الحاكم: ` صحيح على شرط مسلم `. ووافقه الذهبي.
وقال ابن خزيمة: ` لم يتابع هذا الشيخ إسماعيل بن عبد الله على إيصال هذا
الخبر، رواه الدراوردي عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة مرسلا، ورواه حماد بن
سلمة عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة قوله `.
قلت: إسماعيل بن عبد الله هذا صدوق كما في ` التقريب `، وقد وصله مرفوعا
وهي زيادة فيجب قبولها لكنه ليس على شرط مسلم، فإنه لم يخرج لإسماعيل شيئا
ولا لابن عمرو إلا متابعة. والإسناد حسن.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
"চাশতের সালাত (সালাতুত দুহা) কেবলমাত্র ’আওয়াব’ (আল্লাহর দিকে বারবার প্রত্যাবর্তনকারী) ব্যক্তিই নিয়মিতভাবে আদায় করে থাকে। আর এটিই হলো আওয়াবীনদের (আল্লাহর দিকে প্রত্যাবর্তনকারীদের) সালাত।"
704 - ` لا تبدءوا اليهود والنصارى بالسلام وإذا لقيتم أحدهم في طريق، فاضطروهم
إلى أضيقه `.
أخرجه مسلم والبخاري في ` الأدب المفرد ` وأحمد وغيرهم من حديث أبي هريرة
مرفوعا وهو مخرج في ` إرواء الغليل ` (1271) . والغرض من إيراده هنا أنه
جمعنا مجلس فيه طائفة من أصحابنا أهل الحديث فورد سؤال عن جواز بدء غير المسلم
بالسلام، فأجبت بالنفي محتجا بهذا الحديث، فأبدى أحدهم فهما للحديث مؤداه أن
النهي الذي فيه إنما هو إذا لقيه في الطريق وأما إذا أتاه في حانوته أو منزله
فلا مانع من بدئه بالسلام! ثم جرى النقاش حوله طويلا. وكل يدلي بما عنده من
رأي، وكان من قولي يومئذ: أن قوله: لا تبدؤوا مطلق، ليس مقيدا بالطريق
وأن قوله: ` وإذا لقيتم أحدهم في طريق ... ` لا يقيده، فإنه من عطف الجملة
على الجملة، ودعمت ذلك بالمعنى الذي تضمنته هذه الجملة، وهو أن اضطرارهم
إلى أضيق الطرق إنما هو إشارة إلى ترك إكرامهم لكفرهم، فناسب أن لا يبادؤوا من
أجل ذلك بالسلام لهذا المعنى، وذلك يقتضي تعميم الحكم.
هذا ما ذكرته يومئذ، ثم وجدت ما يقويه ويشهد له في عدة روايات:
الأولى: قول راوي الحديث سهيل بن أبي صالح: ` خرجت مع أبي إلى الشام، فكان
أهل الشام يمرون بأهل الصوامع فيسلمون عليهم، فسمعت أبي يقول: سمعت رسول الله
صلى الله عليه وسلم يقول ... ` فذكره. أخرجه أحمد (2 / 346) وأبو داود بسند
صحيح على شرط مسلم. فهذا نص من راوي الحديث - وهو أبو صالح واسمه ذكوان
تابعي ثقة، أن النهي يشمل الكتابي ولو كان في منزله ولم يكن في الطريق.
وراوي الحديث أدرى بمرويه من غيره، فلا أقل من أن يصلح للاستعانة به على
الترجيح.
ولا يشكل على هذا لفظ الحديث عند البخاري في ` أدبه ` (1111)
وأحمد في ` مسنده ` (2 / 444) : ` إذا لقيتم المشركين في الطريق، فلا
تبدؤوهم بالسلام واضطروهم إلى أضيقها `. فإنه شاذ بهذا اللفظ، فقد أخرجه
البخاري أيضا (1103) ومسلم وأحمد (2 / 266، 459) وغيرهما من طرق عن
سهيل بن أبي صالح باللفظ المذكور أعلاه.
الثانية: عن أبي عثمان النهدي قال: ` كتب أبو موسى إلى رهبان يسلم عليه في
كتابه، فقيل له: أتسلم عليه وهو كافر؟ ! قال: إنه كتب إلي، فسلم علي
ورددت عليه `. أخرجه البخاري في ` أدبه ` (1101) بسند جيد.
ووجه الاستدلال به، أن قول القائل ` أتسلم عليه وهو كافر ` يشعر بأن بدأ
الكافر بالسلام كان معروفا عندهم أنه لا يجوز على وجه العموم وليس خاص بلقائه
في الطريق، ولذلك استنكر ذلك السائل على أبي موسى وأقره هذا عليه ولم ينكره
بل اعتذر بأنه فعل ذلك ردا عليه لا مبتدئا به، فثبت المراد.
الثالثة: أن النبي صلى الله عليه وسلم لما كتب إلى هرقل ملك الروم وهو في
الشام لم يبدأه بالسلام، وإنما قال فيه: بسم الله الرحمن الرحيم: من محمد
بن عبد الله ورسوله إلى هرقل عظيم الروم: سلام على من اتبع الهدى ...
أخرجه البخاري ومسلم وهو في ` الأدب المفرد ` (1109) . فلو كان النهي
المذكور خاصا بالطريق لبادأه عليه السلام بالسلام الإسلامي، ولم يقل له:
` سلام على من اتبع الهدى `.
الرابعة: أن النبي صلى الله عليه وسلم لما عاد الغلام اليهودي قال له: أسلم
... الحديث، فلم يبدأه بالسلام. وهو حديث صحيح رواه البخاري وغيره وهو
مخرج في ` الإرواء ` (1272) . فلو كان البدء الممنوع إنما هو إذا لقيه في
الطريق لبدأه عليه السلام بالسلام لأنه ليس في الطريق كما هو ظاهر. ومثله.
الخامسة: أن النبي صلى الله عليه وسلم لما جاء عمه أبا طالب في مرض موته لم
يبدأه أيضا بالسلام، وإنما قال له: ` يا عم قل لا إله إلا الله ` ...
الحديث أخرجه الشيخان وغيرهما، وهو مخرج في ` الإرواء ` (1273) .
فثبت من هذه الروايات أن بدأ الكتابي بالسلام لا يجوز مطلقا سواء كان في الطريق
أو في المنزل أو غيره.
فإن قيل: فهل يجوز أن يبدأه بغير السلام من مثل قوله: كيف أصبحت أو أمسيت أو
كيف حالك ونحو ذلك؟ فأقول: الذي يبدو لي والله أعلم الجواز، لأن النهي
المذكور في الحديث إنما هو عن السلام وهو عند الإطلاق إنما يراد به السلام
الإسلامي المتضمن لاسم الله عز وجل، كما في قوله صلى الله عليه وسلم:
` السلام اسم من أسماء الله وضعه في الأرض فأفشوه بينهم `. أخرجه البخاري في
` الأدب المفرد ` (989) وسيأتي (1894) .
ومما يؤيد ما ذكرته قول علقمة: ` إنما سلم عبد الله (يعني ابن مسعود) على
الدهاقين إشارة `. أخرجه البخاري (1104) مترجما له بقوله: ` من سلم على
الذمي إشارة `. وسنده صحيح.
فأجاز ابن مسعود ابتداءهم في السلام بالإشارة
لأنه ليس السلام الخاص بالمسلمين، فكذلك يقال في السلام عليهم بنحو ما ذكرنا
من الألفاظ.
وأما ما جاء في بعض كتب الحنابلة مثل ` الدليل ` أنه يحرم بداءتهم أيضا بـ
` كيف أصبحت أو أمسيت؟ ` أو ` كيف أنت أو حالك؟ ` فلا أعلم له دليلا من السنة
بل قد صرح في شرحه ` منار السبيل ` أنه قيس على السلام! أقول: ولا يخفى أنه
قياس مع الفارق، لما في السلام من الفضائل التي لم ترد في غيره من الألفاظ
المذكورة. والله أعلم.
مسألة أخرى جرى البحث فيها في المجلس المشار إليه، وهي: هل يجوز أن يقال في
رد السلام على غير المسلم: وعليكم السلام؟ فأجبت بالجواز بشرط أن يكون سلامه
فصيحا بينا لا يلوي فيه لسانه، كما كان اليهود يفعلونه مع النبي صلى الله عليه
وسلم وأصحابه بقولهم: السام عليكم. فأمر النبي صلى الله عليه وسلم
بإجابابتهم بـ ` وعليكم ` فقط، كما ثبت في ` الصحيحين ` وغيرهما من حديث
عائشة. قلت: فالنظر في سبب هذا التشريع، يقتضي جواز الرد بالمثل عند تحقق
الشرط المذكور، وأيدت ذلك بأمرين اثنين:
الأول: قوله صلى الله عليه وسلم: ` إن اليهود إذا سلم عليكم أحدهم فإنما يقول
: السام عليك، فقولوا: وعليك ` أخرجه الشيخان، والبخاري أيضا في ` الأدب
المفرد ` (1106) . فقد علل النبي صلى الله عليه وسلم قوله: ` فقولوا:
وعليك ` بأنهم يقولون: السام عليك، فهذا التعليل يعطي أنهم إذا قالوا:
` السلام عليك ` أن يرد عليهم بالمثل: ` وعليك السلام `، ويؤيده الأمر
الآتي وهو: الثاني: عموم قوله تعالى * (وإذا حييتم بتحية فحيوا بأحسن منها
أو ردوها) * فإنها بعمومها تشمل غير المسلمين أيضا.
هذا ما قلته في ذلك المجلس. وأزيد الآن فأقول: ويؤيد أن الآية على عمومها
أمران: الأول: ما أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (1107) والسياق له
وابن جرير الطبري في ` التفسير ` (10039) من طريقين عن سماك عن عكرمة عن ابن
عباس قال: ` ردوا السلام على من كان يهوديا أو نصرانيا أو مجوسيا ذلك بأن الله
يقول: * (وإذا حييتم بتحية ... ) * الآية `.
قلت: وسنده صحيح لولا أنه من رواية سماك عن عكرمة وروايته عنه خاصة مضطربة
ولعل ذلك إذا كانت مرفوعة وهذه موقوفة كما ترى، ويقويها ما روى سعيد بن
جبير عن ابن عباس قال: لو قال لي فرعون: ` بارك الله فيك ` قلت: وفيك.
وفرعون قد مات. أخرجه البخاري في ` أدبه ` (113) ، وسنده صحيح على شرط
مسلم.
والآخر: قول الله تبارك وتعالى: * (لا ينهاكم الله عن الذين لم يقاتلوكم في
الدين ولم يخرجوكم من دياركم أن تبروهم وتقسطوا إليهم إن الله يحب المقسطين
) *. فهذه الآية صريحة بالأمر بالإحسان إلى الكفار المواطنين الذين يسالمون
المؤمنين ولا يؤذونهم والعدل معهم ومما لا ريب فيه أن أحدهم إذا سلم قائلا
بصراحة: ` السلام عليكم `، فرددناه عليه باقتضاب: ` وعليك ` أنه ليس من
العدل في شيء بله البر لأننا في هذه الحالة نسوي بينه وبين من قد يقول منهم
` السام عليكم `، وهذا ظلم ظاهر. والله أعلم.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
"তোমরা ইহুদী ও খ্রিষ্টানদেরকে প্রথমে সালাম দেবে না। আর যখন তোমরা তাদের কাউকে রাস্তার মধ্যে পাবে, তখন তাকে রাস্তার সংকীর্ণ দিকে বাধ্য করবে।"
(এই হাদীসটি ইমাম মুসলিম, বুখারী তাঁর ‘আল-আদাবুল মুফরাদ’ গ্রন্থে এবং ইমাম আহমাদ সহ অন্যান্যরা আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এটি ‘ইরওয়াউল গালীল’ (১২৭১) গ্রন্থেও উল্লেখ করা হয়েছে।)
এর উদ্দেশ্য হলো, একবার আমাদের আহলে হাদীসের কিছু সাথীর সাথে এক বৈঠকে মিলিত হয়েছিলাম। সেখানে অমুসলিমদেরকে প্রথমে সালাম দেওয়া জায়েয কিনা—এই বিষয়ে একটি প্রশ্ন উত্থাপিত হয়েছিল। আমি এই হাদীসের ভিত্তিতে না-বাচক উত্তর দিই। তখন তাদের একজন এই হাদীসটির এমন এক ব্যাখ্যা প্রদান করেন যে, এখানে যে নিষেধ করা হয়েছে, তা কেবল তখনই প্রযোজ্য, যখন পথে তাদের সাথে সাক্ষাৎ হয়। আর যদি কেউ তার দোকানে বা বাড়িতে যায়, তবে তাকে প্রথমে সালাম দিতে কোনো বাধা নেই! এরপর এ নিয়ে দীর্ঘ আলোচনা চলে। প্রত্যেকেই নিজ নিজ মতামত ব্যক্ত করেন।
সেই দিন আমার বক্তব্য ছিল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: “তোমরা প্রথমে সালাম দেবে না” এটি শর্তহীন (মুত্বলাক), পথের সাথে এটি সীমাবদ্ধ নয়। আর তাঁর বাণী: “আর যখন তোমরা তাদের কাউকে রাস্তার মধ্যে পাবে...” তা পূর্বের বাক্যকে সীমাবদ্ধ করে না। কারণ এটি এক বাক্যের সাথে অন্য বাক্যের সংযোজন (আ’তফে জুমলাহ)। আমি এর সমর্থনে এই বাক্যের অন্তর্নিহিত অর্থ তুলে ধরি, যা হলো: তাদেরকে রাস্তার সংকীর্ণতম অংশে বাধ্য করা হলো তাদের কুফরের কারণে তাদেরকে সম্মান না করার ইঙ্গিত। তাই এই একই কারণে তাদেরকে প্রথমে সালাম না দেওয়াও মানানসই। আর এটিই এই হুকুমকে সাধারণভাবে প্রযোজ্য করার দাবি রাখে।
এই কথাগুলো সেদিন বলেছিলাম। এরপর আমি এমন কিছু বিষয় পেয়েছি যা এটিকে শক্তিশালী করে এবং এর সপক্ষে সাক্ষ্য দেয়:
**প্রথমত:** হাদীসের বর্ণনাকারী সুহাইল ইবনু আবি সালিহর বক্তব্য: “আমি আমার বাবার সাথে শামে গিয়েছিলাম। শামের লোকেরা মঠবাসীদের পাশ দিয়ে যেত এবং তাদের সালাম দিত। তখন আমি আমার বাবাকে বলতে শুনলাম: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি...” এরপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন। (আহমাদ ও আবু দাউদ কর্তৃক সহীহ সনদে বর্ণিত)। হাদীসের বর্ণনাকারী—আবু সালিহ (যার নাম যাকওয়ান, তিনি একজন নির্ভরযোগ্য তাবেঈ)—এর এই বর্ণনাটিই প্রমাণ করে যে, নিষেধটি আহলে কিতাবকে অন্তর্ভুক্ত করে, যদিও তারা পথে না থেকে তাদের বাড়িতে থাকে। হাদীসের বর্ণনাকারী অন্যদের চেয়ে তার বর্ণিত বিষয় সম্পর্কে বেশি অবগত থাকেন। সুতরাং এটি অন্ততপক্ষে অগ্রাধিকারের জন্য সাহায্যকারী হতে পারে।
তবে বুখারী (আদাব, ১১২১) এবং আহমাদ (২/৪৪৪) এ উল্লেখিত হাদীসের শব্দ: “যদি তোমরা মুশরিকদেরকে পথে পাও, তবে তোমরা প্রথমে তাদেরকে সালাম দেবে না এবং তাদের রাস্তার সংকীর্ণ দিকে বাধ্য করবে।” এই শব্দগুলো এখানে আপত্তিকর নয়, কারণ এই বাক্যবিন্যাসটি শায (বিরল বা অস্বাভাবিক)। অন্যথায় বুখারী, মুসলিম এবং আহমাদ সহ অন্যান্যরা সুহাইল ইবনু আবি সালিহ থেকে পূর্বে উল্লিখিত শব্দেই বর্ণনা করেছেন।
**দ্বিতীয়ত:** আবু উসমান আন-নাহদী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কিছু সন্ন্যাসীর কাছে একটি পত্র লিখেছিলেন, যাতে তিনি তাদের সালাম দেন। তখন তাকে জিজ্ঞাসা করা হলো: “আপনি কি তাকে সালাম দিচ্ছেন, অথচ সে কাফির?!” তিনি বললেন: “সে আমাকে চিঠি লিখেছিল, সে আমাকে সালাম দিয়েছে, তাই আমি তার জবাব দিয়েছি।” (বুখারী, আদাব, ১১০১, ভালো সনদে বর্ণিত)। এখানে দলিলের ভিত্তি হলো, প্রশ্নকর্তার বক্তব্য “আপনি কি তাকে সালাম দিচ্ছেন, অথচ সে কাফির?”—এটা ইঙ্গিত দেয় যে, কাফিরকে প্রথমে সালাম দেওয়া সাধারণভাবে নিষিদ্ধ ছিল, কেবল পথের সাথে এটি নির্দিষ্ট ছিল না। তাই প্রশ্নকর্তা আবু মূসার প্রতি নিন্দা জানিয়েছিলেন এবং আবু মূসা তা অস্বীকার না করে বরং এই বলে ওজর পেশ করলেন যে, তিনি এটি জবাব স্বরূপ করেছেন, প্রথমে শুরু করেননি। ফলে উদ্দেশ্য প্রমাণিত হলো।
**তৃতীয়ত:** নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রোমের সম্রাট হিরাক্লিয়াসের কাছে চিঠি লিখেছিলেন, যিনি শামে ছিলেন, তখন তিনি তাকে প্রথমে সালাম দেননি। বরং তিনি লিখেছিলেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল মুহাম্মাদের পক্ষ থেকে রোমের মহান অধিপতি হিরাক্লিয়াসের প্রতি। যে ব্যক্তি হেদায়েত অনুসরণ করবে, তার উপর শান্তি বর্ষিত হোক..." (বুখারী ও মুসলিম)। যদি নিষেধাজ্ঞা কেবল পথের সাথে নির্দিষ্ট থাকত, তবে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে ইসলামী সালাম দিয়ে চিঠি শুরু করতেন, কিন্তু তিনি তা করেননি; বরং বলেছেন: "যে ব্যক্তি হেদায়েত অনুসরণ করবে, তার উপর শান্তি বর্ষিত হোক।"
**চতুর্থত:** নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন অসুস্থ ইহুদী বালকটিকে দেখতে গিয়েছিলেন, তখন তিনি তাকে বলেছিলেন: “ইসলাম গ্রহণ করো...” কিন্তু তিনি তাকে প্রথমে সালাম দেননি। (বুখারী ও অন্যান্যরা বর্ণিত সহীহ হাদীস)। যদি নিষিদ্ধতা কেবল পথের সাথে নির্দিষ্ট থাকত, তবে রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে সালাম দিতেন, কারণ সে তখন পথে ছিল না—যেমনটা স্পষ্ট।
**পঞ্চমত:** নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তাঁর চাচা আবু তালিবের মৃত্যুশয্যায় গিয়েছিলেন, তখনো তিনি তাঁকে প্রথমে সালাম দেননি। বরং বলেছিলেন: “হে চাচা! আপনি বলুন, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’...” (বুখারী ও মুসলিম সহ অন্যান্যরা বর্ণিত)।
সুতরাং এই বর্ণনাগুলো থেকে প্রমাণিত হয় যে, আহলে কিতাবদেরকে প্রথমে সালাম দেওয়া সাধারণভাবে নিষিদ্ধ, তা পথে হোক বা বাড়িতে হোক অথবা অন্য কোথাও।
যদি প্রশ্ন করা হয়: তাহলে কি ‘কেমন কাটলো সকাল/সন্ধ্যা’ বা ‘কেমন আছেন’—এর মতো অন্য কোনো শব্দ দ্বারা তাদের সাথে কথা বলা জায়েয?
আমি বলব: আমার কাছে যা স্পষ্ট মনে হয়—আল্লাহই ভালো জানেন—তা হলো, এটা জায়েয। কারণ হাদীসে যে নিষেধাজ্ঞা এসেছে, তা কেবল ‘সালাম’ এর বিষয়ে। আর যখন ‘সালাম’ শব্দটি শর্তহীনভাবে ব্যবহৃত হয়, তখন এটি দ্বারা আল্লাহর নাম সম্বলিত ইসলামী সালামকেই বোঝানো হয়, যেমন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আস-সালাম আল্লাহর নামসমূহের মধ্যে একটি, তিনি তা জমিনে রেখেছেন, সুতরাং তোমরা তা পরস্পরের মধ্যে ছড়িয়ে দাও।” (বুখারী, আদাব, ৯৮৯)।
আমার এই বক্তব্যের সমর্থনে রয়েছে আলকামাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য: “আব্দুল্লাহ (অর্থাৎ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) ইশারার মাধ্যমে (পারস্যের জমিদারদের) ‘দেহাকিন’দেরকে সালাম দিয়েছিলেন।” (বুখারী ১১০৪, ‘যে ব্যক্তি ইশারায় জিম্মিকে সালাম দেয়’ এই শিরোনামে)। এর সনদ সহীহ।
ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদেরকে ইশারায় প্রথমে সালাম দেওয়া জায়েয মনে করতেন, কারণ এটি মুসলমানদের জন্য নির্দিষ্ট সালাম নয়। সুতরাং, আমরা পূর্বে উল্লিখিত শব্দগুলো (কেমন আছেন ইত্যাদি) ব্যবহার করে তাদের সাথে কুশল বিনিময়ের ক্ষেত্রেও একই কথা বলব।
তবে কোনো কোনো হাম্বলী ফিকহের গ্রন্থে, যেমন ‘আদ-দলীল’ গ্রন্থে বলা হয়েছে যে, ‘কেমন কাটলো সকাল/সন্ধ্যা’ বা ‘আপনি কেমন আছেন’—এগুলো দ্বারাও প্রথমে সম্বোধন করা হারাম। আমি সুন্নাহতে এর কোনো প্রমাণ পাইনি। বরং এর ব্যাখ্যা গ্রন্থ ‘মানারুস সাবীল’-এ স্পষ্ট বলা হয়েছে যে, এটি সালামের ওপর কিয়াস (তুলনা) করে বলা হয়েছে! আমি বলি: এটি ‘কিয়াসে মা’আল ফারিক’ (পার্থক্য সত্ত্বেও কিয়াস), কারণ সালামের মধ্যে এমন কিছু ফযীলত রয়েছে যা উল্লিখিত অন্য কোনো শব্দে নেই। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
পূর্বোক্ত আলোচনা সভায় আরেকটি বিষয় নিয়ে আলোচনা হয়েছিল: অমুসলিমদের সালামের উত্তরে কি ‘ওয়া আলাইকুমুস সালাম’ বলা জায়েয?
আমি উত্তরে বলেছিলাম যে, যদি তাদের সালাম সুস্পষ্ট ও ত্রুটিমুক্ত হয়, তারা জিভ বাঁকিয়ে কথা না বলে—যেমন ইহুদীরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীদের সাথে করতো, তারা বলত ‘আস-সামু আলাইকুম’ (তোমাদের উপর মরণ আসুক)। তাই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুধু ‘ওয়া আলাইকা’ বলার নির্দেশ দিয়েছিলেন, যেমন সহীহাইন ও আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বর্ণিত হাদীসে প্রমাণিত।
আমি বললাম: এই বিধান প্রণয়নের কারণটি বিবেচনা করলে, উল্লিখিত শর্ত পূরণ হলে অনুরূপভাবে জবাব দেওয়া জায়েয হওয়ার দাবি রাখে। আমি এর সমর্থনে দুটি বিষয়ের অবতারণা করি:
**প্রথমত:** নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: “যদি ইহুদীরা তোমাদেরকে সালাম দেয়, তবে তারা কেবল ‘আস-সামু আলাইক’ (তোমার উপর মরণ) বলে। তাই তোমরা বলো: ‘ওয়া আলাইকা’ (আর তোমার উপরেও)।” (বুখারী ও মুসলিম)। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ‘তোমরা বলো: ওয়া আলাইকা’ বলার কারণ হিসেবে উল্লেখ করেছেন যে, তারা ‘আস-সামু আলাইকা’ বলে। এই কারণটি নির্দেশ করে যে, যদি তারা ‘আস-সালামু আলাইকা’ বলে, তবে তাদের জবাবে অনুরূপভাবে বলা উচিত: ‘ওয়া আলাইকুমুস সালাম’।
**দ্বিতীয়ত:** আল্লাহ তাআলার সাধারণ বাণী: **“আর যখন তোমাদেরকে অভিবাদন করা হয়, তখন তোমরা তার চেয়ে উত্তম পন্থায় অভিবাদন করো, অথবা সেটারই অনুরূপ ফিরিয়ে দাও।”** (সূরা নিসা, ৪:৮৬)। এই আয়াতটি তার ব্যাপকতার কারণে অমুসলিমদেরকেও অন্তর্ভুক্ত করে।
আমি এখন আরও যোগ করে বলছি: এই আয়াতটি যে সাধারণভাবে প্রযোজ্য, তার সমর্থনে আরও দুটি বিষয় রয়েছে:
**প্রথমত:** ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: “তোমরা ইহুদী, খ্রিষ্টান বা অগ্নিপূজক যেই হোক না কেন, তাদেরকে সালামের জবাব দাও। কারণ আল্লাহ তাআলা বলেন: **‘আর যখন তোমাদেরকে অভিবাদন করা হয়...’**।” (বুখারী, আদাব, ১১০৭)।
সাঈদ ইবনু জুবাইর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন: যদি ফিরআউন আমাকে বলত, ‘আল্লাহ তোমার উপর বরকত দিন,’ তবে আমি বলতাম, ‘আর তোমার উপরেও।’ আর ফিরআউন তো মৃত। (বুখারী, আদাব, ১১৩, যার সনদ সহীহ)।
**অন্যটি:** আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার বাণী: **“যারা তোমাদের সাথে দ্বীনের ব্যাপারে যুদ্ধ করেনি এবং তোমাদেরকে তোমাদের বাড়িঘর থেকে বের করে দেয়নি, তাদের প্রতি তোমরা সদাচরণ করবে ও ন্যায়বিচার করবে—এতে আল্লাহ তোমাদেরকে নিষেধ করেন না। নিশ্চয় আল্লাহ ন্যায়পরায়ণদের ভালোবাসেন।”** (সূরা মুমতাহিনাহ, ৬০:৮)। এই আয়াতটি স্পষ্ট নির্দেশ করে যে, যারা মুমিনদের সাথে শান্তিতে বসবাস করে এবং কোনো কষ্ট দেয় না, সেই অমুসলিম নাগরিকদের প্রতি ইহসান (সদাচরণ) করা এবং তাদের সাথে ন্যায়বিচার করা প্রয়োজন।
এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, যদি তাদের কেউ স্পষ্টভাবে ‘আস-সালামু আলাইকুম’ বলে সালাম দেয়, আর আমরা সংক্ষেপে উত্তর দিই ‘ওয়া আলাইক’, তবে তা কোনোভাবেই ন্যায়বিচারের অন্তর্ভুক্ত হয় না, সদাচরণ তো দূরের কথা। কারণ এই অবস্থায় আমরা তাকে তার সাথে সমান করে দিচ্ছি, যে হয়তো ‘আস-সামু আলাইকুম’ বলে। আর এটা স্পষ্ট জুলুম। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
705 - ` كان إذا أكل أو شرب قال: الحمد لله الذي أطعم وسقى وسوغه وجعل له مخرجا `.
أخرجه أبو داود (3851) وابن حبان (1351) وابن السني في ` عمل اليوم
والليلة ` (464) والطبراني في ` المعجم الكبير ` (1 / 204 / 2) عن ابن
وهب: أخبرني
سعيد بن أيوب عن أبي عقيل زهرة بن معبد القرشي عن أبي عبد الرحمن
الحبلي عن أبي أيوب الأنصاري قال: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين. وتابعه رشدين بن سعد عن زهرة بن
معبد به. أخرجه الطبراني. ورشدين ضعيف من قبل حفظه مع صلاحه وعبادته.
আবু আইয়ুব আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন আহার করতেন অথবা পান করতেন, তখন বলতেন:
"আলহামদুলিল্লাহিল্লাজি আত্ব‘আমা ওয়া সাক্বা ওয়া সাওয়াগাহু ওয়া জা‘আলা লাহু মাখরাজান।"
(সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি আহার করিয়েছেন, পান করিয়েছেন, তা সহজে গলাধঃকরণের ব্যবস্থা করেছেন এবং এর জন্য নির্গমনের পথ সৃষ্টি করেছেন।)
706 - ` إن الله يبعث الأيام يوم القيامة على هيئتها ويبعث يوم الجمعة زهراء منيرة
أهلها يحفون بها كالعروس تهدى إلى كريمها تضيء لهم يمشون في ضوئها ألوانهم
كالثلج بياضا وريحهم تسطع كالمسك يخوضون في جبال الكافور ينظر إليهم الثقلان
ما يطرقون تعجبا حتى يدخلوا الجنة لا يخالطهم أحد إلا المؤذنون المحتسبون `.
أخرجه ابن خزيمة في ` صحيحه ` (1 / 182 / 1) والحاكم (1 / 277) من طريقين
عن الهيثم بن حميد أخبرني أبو معبد - وهو حفص بن غيلان - عن طاووس عن أبي
موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد جيد رجاله ثقات. وقال الحاكم: ` هذا حديث شاذ، صحيح
الإسناد، فإن أبا معبد من ثقات الشاميين الذين يجمع حديثهم والهيثم بن حميد
من أعيان أهل الشام `. ووافقه الذهبي.
وأقول: وصف هذا الحديث الصحيح الإسناد بأنه شاذ، إنما هو اصطلاح تفرد به
الحاكم دون الجمهور، فقد نقلوا عنه أنه قال في ` الشاذ `: ` هو الذي يتفرد به
الثقة، وليس له متابع `. وهذا خلاف قول الإمام الشافعي: ` هو أن يروي
الثقة حديثا يخالف ما روى الناس، وليس من ذلك أن يروي ما لم يرو غيره `.
وهذا هو الذي عليه جمهور العلماء من المتقدمين والمتأخرين، وخلافه هو الشاذ
ومن الغريب أن تعريف الحاكم للشاذ بما سبق يلزم منه رد مئات الأحاديث الصحيحة
، لاسيما ما كان منها في كتابه هو نفسه ` المستدرك `!
আবু মূসা আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয় আল্লাহ কিয়ামতের দিন অন্যান্য দিনগুলোকে তাদের স্বাভাবিক রূপে পুনরুত্থিত করবেন। আর তিনি জুমুআর দিনকে উজ্জ্বল, দীপ্তিমান রূপে উত্থিত করবেন।
জুমুআর দিনের অনুসারীরা (বা জুমুআর দিনে বিশেষ আমলকারীরা) এর চারপাশে এমনভাবে বেষ্টন করে থাকবে, যেমন নববধূকে তার সম্মানিত স্বামীর কাছে নিয়ে যাওয়া হয়। তা তাদের জন্য আলো দেবে, আর তারা সেই আলোতে হেঁটে যাবে। তাদের গায়ের রং হবে বরফের মতো সাদা এবং তাদের সুগন্ধি মেশকের মতো ছড়িয়ে পড়বে। তারা কর্পূরের পাহাড়ে বিচরণ করবে।
জিন ও মানবজাতি (সকালান) তাদের দিকে অবাক বিস্ময়ে অপলক দৃষ্টিতে তাকিয়ে থাকবে, যতক্ষণ না তারা জান্নাতে প্রবেশ করে। আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে যারা আযান দিয়েছে, সেই মুয়াযযিনুন মুহতাসিবুন ছাড়া অন্য কেউ তাদের সাথে মিলিত হবে না।