সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ
` إذا ضرب أحدكم خادمه فذكر الله فليمسك، (وفي رواية) : فارفعوا أيديكم `.
ضعيف جدا
رواه الترمذي (1/354) وعبد بن حميد في ` المنتخب من المسند ` (ق 104/2)
وتمام في ` الفوائد ` (ق 104/2) والبغوي في ` شرح السنة ` (3/69/2) وابن
عساكر في ` تاريخ دمشق ` (15/131/1) عن أبي هارون العبدي عن أبي سعيد
الخدري مرفوعا، وقال الترمذي والبغوي:
` أبوهارون العبدي اسمه عمارة بن جوين، ضعفه شعبة `.
قلت: بل ضعفه جدا، فقال:
` لأن أقدم فيضرب عنقي، أحب إلي من أن أحدث عن أبي هارون العبدي `.
رواه العقيلي (3/313) بسند صحيح عنه.
ولهذا قال الذهبي في ` الميزان `:
` تابعي، لين بمرة `.
وقال في ` الكاشف `:
` متروك `.
وكذا قال الحافظ في ` التقريب ` وزاد:
` ومنهم من كذبه `.
১৪৪১। যখন তোমাদের কেউ তার খাদেমকে প্রহার করবে আর সে আল্লাহকে স্মরণ করবে তখন যেন (প্রহার করা থেকে) বিরত হয়। অন্য বর্ণনায় এসেছে তখন তোমরা তোমাদের হাতকে উঠিয়ে নাও।
হাদীসটি খুবই দুর্বল।
হাদীসটিকে ইমাম তিরমিযী (১/৩৫৪), আব্দ ইবনু হুমায়েদ `আলমুনতাখাব মিনাল মুসনাদ` গ্রন্থে (কাফ ২/১০৪), তাম্মাম `আলফাওয়াইদ` গ্রন্থে (কাফ ২/১০৪), বাগাবী `শারহুস সুন্নাহ` গ্রন্থে (৩/৬৯/২) ও ইবনু আসাকির “তারীখু দামেস্ক” গ্রন্থে (১/১৩১/১৫) আবু হারূন আবাদী হতে, তিনি আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী ও বাগাবী বলেনঃ আবু হারূন আবাদীর নাম হচ্ছে উমারাহ ইবনু জুওয়াইন, তাকে শুবা দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ বরং তাকে তিনি খুবই দুর্বল আখ্যা দিয়ে বলেছেনঃ আমার গর্দানে প্রহার করার জন্য এগিয়ে দেয়া আমার নিকট বেশী পছন্দের আবূ হারূন আবাদী হতে হাদীস বর্ণনা করার চেয়ে। এটিকে ওকায়লী সহীহ সনদে তার (শুবাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন।
এ কারণেই হাফিয যাহাবী “আল-মীযান” গ্রন্থে বলেনঃ তিনি একজন তাবেঈ, তিনি একেবারে দুর্বল।
তিনি “আলকাশেফ” গ্রন্থে বলেনঃ তিনি মাতরূক।
হাফিয ইবনু হাজার অনুরূপ কথা “আত-তাকরীব” গ্রন্থেও বলে আরো বলেছেন তাকে কেউ কেউ মিথ্যুক আখ্যা দিয়েছেন।
` أفضل الصدقة اللسان، قالوا: وما صدقة اللسان؟ قال: الشفاعة؛ يفك بها
الأسير، ويحقن بها الدم، ويجر بها المعروف والإحسان إلى أخيك المسلم،
وتدفع عنه الكريهة `.
ضعيف
أخرجه ابن الأعرابي في ` المعجم ` (ق 194/1) : نا عبد الله (يعني ابن أيوب
المخرمي) : نا مروان (يعني ابن جعفر بن سعد بن سمرة) : حدثني محمد بن هاني
عن محمد بن يزيد عن المستلم بن سعيد عن أبي بكر عن الحسن عن سمرة مرفوعا.
وأخرجه البيهقي في ` الشعب ` (2/453/1) من طريق أخرى عن مروان به،
لكن سقط
منه بعض رجال إسناده.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، فيه علل:
الأولى: عنعنة الحسن، وهو البصري، فقد كان مدلسا.
الثانية: ضعف أبي بكر، وهو الهذلي، قال الحافظ:
` متروك الحديث `.
الثالثة: جهالة حال محمد بن هاني، وهو والد أبي بكر الأثرم، ترجمه ابن أبي
حاتم (4/1/117) ثم الخطيب (3/370) ، ولم يذكرا فيه جرحا ولا تعديلا.
الرابعة: مروان بن جعفر؛ مختلف فيه، قال أبو حاتم:
` صالح الحديث `. وقال ابنه:
` صدوق `.
وخالفهما الأزدي فقال:
` يتكلمون فيه `.
ومن أجل هذا القول أورده الذهبي في ` الضعفاء ` فلم يحسن، لأن الأزدي نفسه
متكلم فيه، فلا يعتد بقوله مع مخالفته لأبي حاتم وابنه، نعم قال الذهبي في
ترجمة مروان من ` الميزان `:
` له نسخة عن قراءته على محمد بن إبراهيم فيها ما ينكر، رواها الطبراني `.
لكن لعله لم يتفرد به، فقد أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (6962) والقضاعي
في ` مسند الشهاب ` (ق 104/1) من طريق محمد بن أبي نعيم الواسطي قال: نا
محمد بن يزيد به.
بيد أن محمدا هذا، وهو ابن موسى بن أبي نعيم، قال الحافظ:
` صدوق، لكن طرحه ابن معين `.
والحديث أورده السيوطي في ` الجامع ` من رواية الطبراني في ` الكبير `
والبيهقي في ` شعب الإيمان `، وقال المناوي:
` قال الهيثمي: فيه أبو بكر الهذلي، ضعيف، ضعفه أحمد وغيره، وقال
البخاري
: ليس بالحافظ، ثم أورد له هذا الخبر `.
وأقول: فيه أيضا عند البيهقي مروان بن جعفر السمري، أورده الذهبي في `
الضعفاء ` وقال:
` قال الأزدي: يتكلمون فيه `!
১৪৪২। সর্বোত্তম সাদাকাহ্ হচ্ছে যবান। তারা বললঃ যবানের সাদাকাহ্ কী? তিনি বললেনঃ এমন সুপারিশ করা যার দ্বারা বন্দীকে ছেড়ে দেয়া হয়। যার দ্বারা রক্তপাত বন্ধ করা হয়, যার দ্বারা তোমার মুসলিম ভাইয়ের নিকট ভালো এবং সৎকর্মকে নিয়ে যাওয়া হয় আর তা তার থেকে মন্দ কর্মকে প্রতিহত করে।
হাদীসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে ইবনুল আরাবী `আলমু'জাম` গ্রন্থে (কাফ ১/১৯৪) আব্দুল্লাহ্ ইবনু আইউব মাখরামী হতে, তিনি মারওয়ান ইবনু জাফার ইবনে সা'দ ইবনে সামুরাহ হতে, তিনি মুহাম্মাদ হানী হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ হতে, তিনি আলমুসতালিম ইবনু সাঈদ হতে, তিনি আবু বাকর হতে, তিনি হাসান হতে, তিনি সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
বাইহাকী হাদীসটিকে “আশশুয়াব” গ্রন্থে (২/৪৫৩/১) অন্য সূত্রে মারওয়ান হতে বর্ণনা করেছেন। কিন্তু তার থেকে কোন কোন বর্ণনাকারী উহ্য হয়ে গেছে।
আমি (আলবানী) বলছিঃ নিম্নোল্লেখিত কারণে এ সনদটি খুবই দুর্বলঃ
১। হাসান আন আন করে বর্ণনা করেছেন। তিনি হচ্ছেন হাসান বাসরী। তিনি মুদাল্লিস ছিলেন।
২। বর্ণনাকারী আবু বাকর দুর্বল। তিনি হচ্ছেন হুযালী। হাফিয ইবনু হাজার বলেনঃ তিনি মাতরূকুল হাদীস।
৩। মুহাম্মাদ ইবনু হানীর অবস্থা অজ্ঞাত। তিনি আবু বাকর আসরামের পিতা। ইবনু আবী হাতিম (৪/১/১১৭) অতঃপর খাতীব বাগদাদী (৩/৩৭০) তার জীবনী আলোচনা করে তারা উভয়েই তার সম্পর্কে ভালো-মন্দ কিছুই বলেননি।
৪ । মারওয়ান ইবনু জাফার বিতর্কিত বর্ণনাকারী। আবু হাতিম বলেনঃ তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে ভালো। আর তার ছেলে ইবনু আবী হাতিম বলেনঃ তিনি সত্যবাদী।
তাদের দু’জনের বিরোধিতা করে আযদী বলেছেনঃ মুহাদ্দিসগণ তার সমালোচনা করেছেন।
আযদীর এ কথার কারণেই হাফিয যাহাবী তাকে “আয-যুয়াফা` গ্রন্থে উল্লেখ করে ভালো কাজ করেননি। কারণ আযদীই সমালোচিত ব্যক্তি। আবু হাতিম এবং ইবনু আবী হাতিম কর্তৃক বিরোধী মন্তব্য আসায় তার (আযদীর) মন্তব্য গ্রহণযোগ্য নয়।
অতঃপর হাফিয যাহাবী “আল-মীযান” গ্রন্থে মারওয়ানের জীবনীতে বলেনঃ মুহাম্মাদ ইবনু ইবরাহীমের নিকট পাঠ করা তার একটি কপি রয়েছে যার মধ্যে মুনকার বর্ণনাও রয়েছে। সেটিকে ত্ববারানী বর্ণনা করেছেন।
তবে সম্ভবত তিনি এককভাবে বর্ণনা করেননি। ত্ববারানী `আলমুজামুল কাবীর” গ্রন্থে (৬৯৬২) আর কাযাঈ “মুসনাদুশ শিহাব” গ্রন্থে (কাফ ১/১০৪) মুহাম্মাদ ইবনু আবী নুয়াইম ওয়াসেতী সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ হতে বর্ণনা করেছেন।
এ মুহাম্মাদ হচ্ছেন ইবনু মূসা ইবনে আবী নুয়াইম। হাফিয ইবনু হাজার বলেন তিনি সত্যবাদী। কিন্তু ইবনু মাঈন তাকে নিক্ষেপ (ত্যাগ) করেছেন।
হাদীসটিকে সুয়ূতী “আলজামেউস সাগীর” গ্রন্থে ত্ববারানী ও বাইহাকীর বর্ণনা থেকে উল্লেখ করেছেন। আর মানবী বলেছেনঃ হায়সামী বলেনঃ এর সনদের আবু বাকর হুযালী দুর্বল। তাকে আহমাদ প্রমুখ দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন। আর ইমাম বুখারী বলেছেনঃ তিনি হাফিয নন। অতঃপর তার এ হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ বাইহাকীর নিকটেও মারওয়ান ইবনু জাফার সামরী রয়েছেন।
` يأتيكم عكرمة بن أبي جهل مؤمنا مهاجرا، فلا تسبوا أباه، فإن سب الميت يؤذي
الحي، ولا يبلغ الميت، فلما بلغ باب رسول الله صلى الله عليه وسلم استبشر
ووثب له رسول الله صلى الله عليه وسلم قائما على رجليه، فرحا بقدومه `.
موضوع
أخرجه الحاكم (3/241) من طريق محمد بن عمر: أن أبا بكر بن عبد الله بن أبي
سبرة: حدثه موسى بن عقبة عن أبي حبيبة مولى عبد الله بن الزبير عن عبد الله
ابن الزبير قال:
لما كان يوم فتح مكة، هرب عكرمة بن أبي جهل، وكانت امرأته أم حكيم بنت
الحارث بن هشام امرأة عاقلة، أسلمت، ثم سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم
الأمان لزوجها، فأمرها برده، فخرجت في طلبه، وقالت له: جئتك من عند أوصل
الناس، وأبر الناس، وخير الناس، وقد استأمنت لك، فأمنك، فرجع معها،
فلما دنا من مكة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه: فذكر الحديث.
قلت: سكت عليه الحاكم والذهبي، وإسناده واه جدا، بل موضوع، آفته ابن أبي
سبرة، أومحمد بن عمر، وهو الواقدي، وكلاهما كذاب وضاع، وأبو حبيبة لا
يعرف، أورده ابن أبي حاتم (4/2/3459) فلم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا،
ولكنه قال:
` أبو حبيبة، مولى الزبير، صاحب عبد الله بن الزبير، روى عن الزبير، روى
عنه موسى بن عقبة، وأبو الأسود محمد بن عبد الرحمن `.
قلت: وإنما خرجت هذا الحديث لما فيه من نسبة القيام إلى النبي صلى الله عليه
وسلم لعكرمة بن أبي جهل، فقد لهج المتأخرون بالاستدلال على جواز بل استحباب
القيام للداخل، فأحببت أن أبين وهاءه وأظهر عواره، حتى لا يغتر به من يريد
انصح لدينه، ولا سيما،
وهو مخالف لما دلت السنة العملية عليه من كراهته
صلى الله عليه وسلم لهذا القيام، كما حققته في غير هذا المقام.
ونحوه ما ذكره الأستاذ عزت الدعاس في تعليقه على ` الشمائل ` المحمدية ` (ص -
175 - طبع حمص) أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يقوم لعبد الله بن أم مكتوم -
(الأصل: ابن أم كلثوم!) ويفرش له رداءه ليجلس عليه ويقول: أهلا بالذي
عاتبني ربي من أجله، ولا أعلم لهذا الحديث أصلا يمكن الاعتماد عليه، وغاية
ما روي في بعض الروايات في ` الدر المنثور ` أنه صلى الله عليه وسلم كان يكرم
ابن أم مكتوم إذا دخل عليه. وهذا إن صح لا يستلزم أن يكون إكرامه صلى الله
عليه وسلم إياه بالقيام له، فقد يكون بالقيام إليه، أوبالتوسيع له في المجلس
، أوبإلقاء وسادة إليه، ونحوذلك من أنواع الإكرام المشروع.
وبهذه المناسبة لا بد لي من التنبيه على بعض الأخطاء التي وقعت للأستاذ
المذكور في تعليقه على حديث أنس: ` لم يكن شخص أحب إليهم من رسول الله
صلى الله عليه وسلم، وكانوا لا يقومون له لما يعلمون من كراهيته لذلك `، فقد
ذكر أن هذا الحديث الصحيح لا ينافي القيام لأهل الفضل من الصالحين، والدليل:
1 - أن النبي صلى الله عليه وسلم كان لا يكره قيام بعضهم لبعض.
2 - وأنه أمر أسرى بني قريظة فقال لهم: قوموا لسيدكم، يعني سعد بن معاذ.
3 - أنه قام لعكرمة بن أبي جهل.
4 - وكان يقوم لعدي بن حاتم كلما دخل عليه.
5 - وكان يقوم لعبد الله بن أم مكتوم …
6 - وقد ورد أن الصحابة قاموا لرسول الله صلى الله عليه وسلم.
والجواب: أنه لا يصح شيء من هذه الأدلة مطلقا، وهى على ثلاثة أنواع:
الأول: ما لا أصل له البتة في شيء من كتب السنة، كالدليل الأول، بل ولا
علمت أحدا من العلماء المتقدمين ذكره حديثا، وكأنه رأي رآه بعضهم، فجاء غيره
فتوهمه حديثا! ويعارضه قول الشيخ علي القاري في ` شرح الشمائل `: إن الأصحاب
ما كان يقوم بعضهم لبعض، واستدل عليه بحديث أنس المذكور آنفا، وهذا هو
اللائق بهم رضي
الله عنهم، لحرصهم المعروف على الاقتداء به صلى الله عليه وسلم
في كل كبير وصغير، خلافا لبعض المعاصرين الذين يقولون في مثل هذه المسألة:
هذه قشور لا قيمة لها! ونحوذلك من العبارات التي تصد الشباب المؤمن عن
الاقتداء به صلى الله عليه وسلم، بل وتحمله على مخالفته، لأن الأمر كما قيل
: نفسك إن لم تشغلها بالخير شغلتك بالشر!
الثاني: ما له أصل ولكنه غير ثابت كالدليل الثالث والرابع والخامس، فكل
ذلك مما لا يصح من قبل إسناده والمثال بين يديك، وهو الدليل الثالث، ومثله
حديث قيامه صلى الله عليه وسلم لأخيه في الرضاعة، فهو ضعيف أيضا كما سبق بيانه
برقم (1120) ، ومثله قيامه لعدي، وأما الدليل الخاس، فلم أقف عليه كما
سبق، وقد اعترف غير ما واحد بضعف هذا النوع، منهم ابن حجر الهيتمي، ولكنهم
ركنوا في الرد على من عارضهم بما ذكرنا من الضعف إلى قولهم المعروف بينهم،
والواهي عند المحققين من العلماء: ` يعمل بالحديث الضعيف في فضائل الأعمال `
! فنقول: فأين الدليل على أن هذا القيام من فضائل الأعمال، حتى يصدق فيه
قولهم المذكور إن صح؟ ! وقد تنبه لهذا الشيخ القاريء، فقال:
` إن هذا الرد مدفوع؛ لأن الضعيف يعمل به في فضائل الأعمال المعروفة في الكتاب
والسنة، لكن لا يستدل به على إثبات الخصلة المستحبة `.
قلت: وهذه حقيقة يغفل عنها جماهير العلماء والمؤلفين، فضلا عن غيرهم،
وبيانه مما لا يتسع له المجال هنا.
والنوع الثالث والخير: ما له أصل أصيل من حيث الثبوت، ولكن طرأ عليه شيء
من التحريف والتغيير لفظا أومعنى أوكليهما معا ولوبدون قصد، من ذلك
الدليل الثاني؛ فقد وقع فيه تحريفان: قديم وحديث، أما القديم، فهو أن نص
الحديث في البخاري وغيره: ` قوموا إلى سيدكم ` فجعله السيد عزت وغيره ` …
لسيدكم `، وتأكد التحريف برواية أخرى قوية بلفظ: ` قوموا إلى سيدكم فأنزلوه
` وهذا مفصل في ` الصحيحة ` (رقم - 67) فلا نطيل القول فيه.
وأما التحريف الجديد، فقد اختص به السيد المذكور، وهو قوله: أنه صلى الله
عليه وسلم أمر
أسرى بني قريظة.. والحقيقة أن الأمر كان موجها إلى الأنصار
الذين هم قوم سعد وهو أميرهم وسيدهم فعلا، وأنه كان لإنزاله لأنه كان مريضا
، ولذلك جاء النص: ` قوموا إليه ` وليس: ` قوموا له ` وأكده زيادة الرواية
الأخرى: ` فأنزلوه ` فلا علاقة للحديث بموضع النزاع.
ومن ذلك قيامه صلى الله عليه وسلم إلى ابنته فاطمة إذا دخلت عليه، وقيامها
إليه صلى الله عليه وسلم إذا دخل عليها، فإنه صحيح الإسناد، ولكن ليس في
القيام المتنازع فيه، لأنه قام إليها ليجلسها في مجلسه، وقامت إليه لتجلسه
في مجلسها، وهذا مما لا خلاف فيه. ألست ترى القائلين باستحباب القيام
المزعوم لا يقوم أحدهم لابنه ولوكان عالما فاضلا؟ ! بل قال العصام الشافعي
كما في شرح المناوي على ` الشمائل `.
` وقد اتفق الناس في القديم والحديث على استهجان قيام الوالد لولده، وإن
عظم، ولووقع ذلك من بعض الآباء لاتخذه الناس ضحكة وسخروا منه `!
وخلاصة القول أنه لا يوجد دليل صحيح صريح في استحباب هذا القيام، والناس
قسمان: فاضل ومفضول، فمن كان من القسم الأول فعليه أن يقتدي بالنبي صلى الله
عليه وسلم فيكره القيام من غيره له، ومن كان من القسم الآخر، فعليه أن يقتدي
بأصحابه صلى الله عليه وسلم، فلا يقوم لمن كان من القسم الأول فضلا عن غيره!
ويعجبني في هذا الصدد ما ذكره الشيخ جسوس في شرحه على ` الشمائل ` نقلا عن ابن
رشد في ` البيان ` قال:
` القيام للرجل على أربعة أوجه:
1 - وجه يكون فيه محظورا لا يحل، وهو أن يقوم إكبارا وتعظيما وإجلالا لمن
يحب أن يقام له تكبرا وتجبرا على القائمين له.
2 - ووجه يكون فيه مكروها، وهو أن يقوم إكبارا وتعظيما وإجلالا لمن لا يحب
أن يقام له، ولا يتكبر على القائمين له، فهذا يكره للتشبه بفعل الجبابرة
وما يخشى أن يدخله من تغيير نفس المقوم له.
3 - ووجه يكون فيه جائزا، وهو أن يقوم تجلة وإكبارا لمن لا يريد ذلك،
ولا يشبه
حاله حال الجبابرة، ويؤمن أن تتغير نفس المقوم له لذلك، وهذه صفة
معدومة إلا فيمن كان بالنبوة معصوما.
4 - ووجه يكون فيه حسنا، وهو أن يقوم إلى القادم عليه من سفر فرحا بقدومه
يسلم عليه، أوالقادم عليه المصاب بمصيبة ليعزيه بمصابه، وما أشبه ذلك،
فعلى هذا يتخرج ما ورد في هذا الباب من الآثار، ولا يتعارض شيء منها `.
ولقد صدق رحمه الله وأحسن مثواه.
১৪৪৩। তোমাদের নিকট ইকরিমাহ ইবনু আবী জাহল ঈমানদার মুহাজির হয়ে আসবে। তোমরা তার পিতাকে গালি দিও না। কারণ মৃত ব্যক্তিকে গালি দেয়া জীবিতকে কষ্ট দেয় অথচ তা মৃত ব্যক্তির নিকট পৌঁছে না। সে যখন রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এর দরজার নিকট পৌঁছল তখন তিনি সুসংবাদ গ্রহণ করলেন এবং তার আগমন উপলক্ষে খুশি হয়ে লাফ দিয়ে তার দু'পায়ের উপর দাঁড়িয়ে গেলেন।
হাদীসটি বানোয়াট।
হাদীসটিকে হাকিম (৩/২৪১) মুহাম্মাদ ইবনু উমার সূত্রে আবু বাকর ইবনু আব্দিল্লাহ ইবনে আবী সাররাহ হতে, তিনি মূসা ইবনু উকবাহ হতে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুয যুবায়েরের দাস আবী হাবীবাহ হতে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুয যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ যখন মক্কা বিজয় হয়েছিলো তখন ইকরিমাহ ইবনু আবী জাহল পালিয়ে যায়। তার স্ত্রী উম্মু হাকীম বিনতুল হারেস ইবনে হিশাম বুদ্ধিমতি নারী ছিলো। সে নিজে ইসলাম গ্রহণ করে রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট তার স্বামীর নিরাপত্তা প্রার্থনা করল। তখন রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম স্ত্রীকে তাকে ফিরিয়ে নিয়ে আসার নির্দেশ প্রদান করলেন ফলে সে তার খোঁজে বেরিয়ে পড়ল। অতঃপর সে তাকে (পাওয়ার পর) বললঃ আমি তোমার নিকট লোকদের সাথে সর্বাপেক্ষা বেশী সম্পর্ক স্থাপনকারী, সর্বাপেক্ষা সৎ এবং সর্বাপেক্ষা উত্তম ব্যক্তির নিকট থেকে এসেছি। অতঃপর রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন মক্কার নিকটবর্তী হলেন তখন রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার সাথীদেরকে উদ্দেশ্য করে বললেনঃ ...।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হাফিয যাহাবী ও হাকিম হাদীসটির ব্যাপারে চুপ থেকেছেন, অথচ এর সনদটি খুবই দুর্বল, বরং বানোয়াট। এর সমস্যা হচ্ছে ইবনু আবী সাবরাহ অথবা মুহাম্মাদ ইবনু উমার, তিনি হচ্ছেন ওয়াকেদী। তারা দু’জনই মিথ্যুক, জালকারী। আর আবু হাবীবাহকে চেনা যায় না। তাকে ইবনু আবী হাতিম (৪/২/৩৪৫৯) উল্লেখ করে তার সম্পর্কে ভালো-মন্দ কিছুই বলেননি। তবে তিনি বলেছেনঃ আবূ হাবীবাহ যুবায়েরের দাস, আব্দুল্লাহ ইবনু যুবায়েরের সাথী। তিনি যুবায়ের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন আর তার থেকে মূসা ইবনু উকবাহ এবং আবুল আসওয়াদ মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ আমি এ হাদীসটি সম্পর্কে আলোচনা করছি এ কারণে যে, এতে উল্লেখ করা হয়েছে যে, রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইকরিমাহ ইবনু আবী জাহলের জন্য দাঁড়িয়ে ছিলেন। পরের যুগের লোকেরা আগমনকারীর (সম্মানের) জন্যে দাঁড়ানো জায়েয বরং মুস্তাহাব এ মতের স্বপক্ষে এ বর্ণনার দ্বারা দলীল গ্রহণ করতে অভ্যাস্ত হয়ে পড়েছেন। এ কারণেই এ হাদীসের দুর্বলতাকে স্পষ্ট ও প্রকাশ করাকে ভালো মনে করেছি, যাতে করে কেউ এর দ্বারা ধোঁকায় না পড়ে। এছাড়া এরূপ দাঁড়ানো যে অপছন্দনীয় সে সম্পর্কে সুন্নাতী আমলও এর বিপরীতে বর্ণিত হয়েছে যেমনটি আমি অন্যত্র আলোচনা করেছি।
উস্তায ইযযাত আদদি'আস `আশশামাইলুল মুহাম্মাদিয়্যাহ` গ্রন্থের উপর টীকা দিতে গিয়ে (পৃঃ ১৭৫) যে ভুলগুলো করেছেন আমি এখানে সেগুলোর ব্যাপারে সতর্ক করা জরুরী মনে করছি। বিশেষ করে তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত হাদীসের টীকায় বলেছেনঃ `রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর চেয়ে তাদের নিকট অন্য কোন ব্যক্তি বেশী ভালোবাসার ছিলেন না, অথচ তারা তার জন্য দাড়াতেন না, কারণ তারা জানতো যে, তিনি এরূপ দাড়ানোকে অপছন্দ করতেন।`
তিনি লিখেছেন যে, এ সহীহ হাদীস নেককার সম্মানিতদের উদ্দেশ্যে দাঁড়ানোর বিপরীত নয়। এর প্রমাণঃ
১। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের পরস্পরের জন্য দাঁড়ানোকে অপছন্দ করতেন না।
২। তিনি বানু কুরায়যার বন্দীদেরকে নির্দেশ প্রদান করে বলেনঃ তোমরা তোমাদের সরদারের উদ্দেশ্যে দাঁড়াও (অর্থাৎ সাদ ইবনু মুয়াযের উদ্দেশ্যে)।
৩। তিনি নিজে ইকরিমাহ ইবনু আবী জাহলের উদ্দেশ্যে দাঁড়িয়েছেন।
৪। আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখনই তার নিকট প্রবেশ করতেন তিনি তখনই তার জন্য দাঁড়াতেন।
৫। তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উম্মে মাকতুমের উদ্দেশ্যে দাঁড়াতেন।
৬। বর্ণিত হয়েছে যে, সাহাবীগণ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উদ্দেশ্যে দাঁড়াতেন।
এ সব দলীলের উত্তরঃ এ দলীলগুলোর কোন কিছুই সহীহ নয়। এগুলোকে তিনভাগে বিভক্ত করা যায়
১। সম্পূর্ণরূপে ভিত্তিহীন যেগুলো সুন্নাতের কোন গ্রন্থে নেই। যেমন প্রথম দলীলটি। বরং পূর্ববর্তী কোন একজন আলেম হতেও অবগতি হইনি যে, তিনি এটিকে হাদীস হিসেবে উল্লেখ করেছেন। সম্ভবত তিনি দেখেছেন যে, তাদের কেউ এটিকে নিজ সিদ্ধান্ত হিসেবে উল্লেখ করেছেন। অতঃপর অন্য কেউ এসে সন্দেহবশত সেটিকে হাদীস মনে করেছেন। এছাড়া তার এ কথা “শারহুশ শামায়েল” গ্রন্থে শাইখ আলী আলকারী যা উল্লেখ করেছেন তার সাথে সাংঘর্ষিকঃ সাহাবীগণ পরস্পরের জন্য দাঁড়াতেন না। তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত উক্ত হাদীস দ্বারা দলীল গ্রহণ করেছেন। তাদের জন্য এরূপ করাই উচিত ছিলো। কারণ তারা ছোট আর বড় সব কিছুর ক্ষেত্রেই রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর অনুসরণ আর অনুকরণের ব্যাপারে বেশী উৎসাহী ছিলেন। এর বিপরীত শুধুমাত্র বর্তমান যুগের কতিপয় ব্যক্তির ক্ষেত্রে যারা এ মাসআলার ব্যাপারে বলছেনঃ এগুলো ছিলকা (চামড়া) মূল্যহীন (বিষয়) এরূপ ভাষা মুমিন যুবকদেরকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর অনুসরণ হতে বাধা প্রদান করবে বরং তাঁর অনুসরণের বিপরীত যেতে উৎসাহিত করবে। কারণ ব্যাপারটি এরূপ, যেরূপ বলা হয় যে, তুমি যদি নিজেকে কল্যাণের মাঝে ব্যস্ত না রাখো তাহলে সে তোমাকে মন্দের (খারাপের) সাথে ব্যস্ত করে ফেলবে।
২। যেগুলোর ভিত্তি আছে তবে দলীল হিসেবে সাব্যস্ত হয়নি যেমন তিন, চার ও পাচ নম্বরে যা বলা হয়েছে। সেগুলোর কোনটিই তার সনদের দিক থেকে সহীহ নয়। যার উদাহরণ আপনার সামনেই সেটি হচ্ছে তৃতীয় নম্বরে বলা দলীলটি। রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কর্তৃক তার দুধ ভাইয়ের জন্য দাঁড়ানো মর্মে বর্ণিত হাদীসটিও এর মতই। সেটিও দুর্বল যেটিকে (১১২০) নম্বরে আলোচনা করা হয়েছে। আদীর জন্য দাঁড়ানো মর্মে বর্ণিত হাদীসটিও এরূপই। আর পাচ নম্বরে বর্ণিত দলীলটির এমন কোন ভিত্তি নেই যার উপর নির্ভর করা যায়। এ সম্পর্কে বর্ণিত কোন কোন বর্ণনায় এসেছে যেমনটি “আদদুররুল মানসূর” গ্রন্থে এসেছে যে, ইবনু উম্মে মাকতুম যখন রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট প্রবেশ করতেন তখন তিনি তাকে সম্মান করতেন। এটা যদি সহীহ হয় তাহলে এ থেকে এরূপ কিছুকে অপরিহার্য করে না যে, তিনি তাকে তিনি তার জন্য মজলিসের মধ্যে জায়গা করে দিতেন অথবা তিনি তার জন্য বালিশ এগিয়ে দিতেন। এরূপ শারী'য়াত সম্মত সম্মান দেখানোর প্রকারগুলো।
এ প্রকারের দলীলগুলো দুর্বল হওয়ার বিয়ষটিকে একাধিক আলেম স্বীকার করেছেন। যেমন ইবনু হাজার হায়তামী। কিন্তু তার পরেও বলেছেনঃ ফাযায়েলে আমলের ক্ষেত্রে দুর্বল হাদীসের উপর আমল করা যায়।
আমরা বলছিঃ কিন্তু এভাবে দাঁড়ানো যে ফাযায়েলে আমলের অন্তর্ভুক্ত তার প্রমাণ কোথায়? যাতে করে তাদের এরূপ কথাকে সত্যে পরিণত করতে পারে যদি সঠিক হয়?
এ ব্যাপারে শাইখ আলকারী সতর্ক দৃষ্টি দিয়ে বলেছেনঃ এরূপ উত্তর প্রত্যাখ্যাত। কারণ দুর্বল হাদীসের উপর আমল করা যায় সেই পরিচিত আমলের ফাযায়েলের ক্ষেত্রে যে আমলগুলো কিতাবুল্লাহ্ এবং সুন্নাতের মধ্যে প্রমাণিত হয়েছে। কিন্তু দুর্বল হাদীসের দ্বারা মুস্তাহাব খাসালাতকে সাব্যস্ত করার জন্য দলীল গ্রহণ করা যায় না।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ বাস্তবতা থেকে অধিকাংশ আলেম এবং লেখকগণ গাফেল রয়েছেন। তারা ছাড়া অন্যরা সে তো ভিন্ন কথা। কিন্তু এখানে সে বিষয়টি নিয়ে আলোচনার স্থান নয়।
৩। এমন দলীল যার সাব্যস্ত হওয়ার দিক থেকে ভিত্তি রয়েছে। কিন্তু সেগুলোর শব্দ অথবা ভাবার্থ অথবা উভয়কেই পরিবর্তন (তাহরীফ) করে ফেলা হয়েছে, যদিও তা ইচ্ছাকৃত করা না হয়ে থাক।
যেমন দ্বিতীয় দলীলটি। এ দলীলের ব্যাপারে দুটি পরিবর্তন ঘটানো হয়েছেঃ যার একটি পুরাতন আর একটি হচ্ছে নতুন। পুরাতনটি হচ্ছে এই যে, বুখারী প্রমুখ হাদীস গ্রন্থে এসেছেঃ (قوموا الى سيدكم) “তোমরা তোমাদের সরদারের কাছে দাড়াও”। অথচ সাইয়্যেদ ইযযাত এ ভাষাকে এরূপ বানিয়ে ফেলেছেন (قوموا لسيدكم) “তোমরা তোমাদের সরদারের জন্য দাঁড়াও”। ভাষাকে যে পরিবর্তন করা হয়েছে একে আরো শক্তিশালী করছে অন্য একটি শক্তিশালী বর্ণনা (قوموالى سيدكم فأنزلوه) “তোমরা তোমাদের সরদারের কাছে দাঁড়াও অতঃপর তাকে নামাও।” এ সম্পর্কে `সিলসিলাহ সহীহাহ` গ্রন্থে (হা/ ৬৭) বিস্তারিত আলোচনা করা হয়েছে। এখানে আর দীর্ঘ করতে চাচ্ছি না।
আর নতুন তাহরীফ (পরিবর্তন) হচ্ছে সেটিই যেটিকে উস্তায ইযযাত বিশেষভাবে উল্লেখ করেছেন। সেটি হচ্ছে তার এ কথা যে, তিনি বানু কুরায়যার বন্দীদেরকে নির্দেশ প্রদান করে বলেনঃ তোমরা তোমাদের সরদারের উদ্দেশ্যে দাঁড়াও (অর্থাৎ সা'দ ইবনু মুয়াযের উদ্দেশ্যে)।
বাস্তবতা এই যে, এ নির্দেশ ছিলো আনসারদেরকে উদ্দেশ্য করে যারা সা'দের গোত্র আর তিনি তাদের নেতা এবং তাদের সরদার। আর এ নির্দেশ ছিলো তাকে নামানোর উদ্দেশ্যে কারণ তিনি অসুস্থ ছিলেন। এ কারণে হাদীসের ভাষার মধ্যে এসেছেঃ `কূমূ ইলায়হি`, তার কাছে দাঁড়াও। “কুমূ লাহু” তার জন্য দাঁড়াও আসেনি। অন্য বর্ণনায় বৃদ্ধি করে শক্তিশালী করা হয়েছেঃ `ফাআনযিলুহু` `অতঃপর তাকে নামাও`। অতএব যে বিষয়ে বিতর্ক করা হচ্ছে তার সাথে হাদীসটির কোন সম্পর্ক নেই।
রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কর্তৃক তার মেয়ে ফাতিমার দিকে দাঁড়ানো যখন সে তার নিকট প্রবেশ করতো এবং তাঁর দিকে ফাতিমার দাঁড়ানো যখন তিনি তার নিকট প্রবেশ করতেন এ প্রকারের অন্তর্ভুক্ত। কারণ এগুলোর সনদ সহীহ। কিন্তু এর মধ্যে বিতর্কিত দাঁড়ানোর বিষয়টি নেই। কারণ তিনি তার নিকটে দাঁড়াতেন তাকে তাঁর বসার স্থানে বসানোর জন্যে। আর ফাতিমাও তার নিকটে দাঁড়াতেন তাকে তাঁর বসার স্থানে বসানোর জন্যে। এ ব্যাপারে কোন মতভেদ নেই। কারণ আপনি কি দেখছেন না যারা দাঁড়ানোকে মুস্তাহাব বলছেন তাদের কেউ তার ছেলের জন্য দাঁড়ান না যদিও সে সম্মানিত আলেম হয়!
বরং ইসাম আশশাফে'ঈ বলেনঃ যেমনটি “শামাইল” গ্রন্থের ভাষ্যকার মানবী উল্লেখ করেছেনঃ পুরাতন এবং নতুন সকলেই এ মর্মে ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে, তারা পিতা কর্তৃক ছেলের জন্য দাঁড়ানোকে অপছন্দ করেন। যদিও সে সম্মানিত হয়। যদি কোন পিতার পক্ষ থেকে এরূপ ঘটে তাহলে একে লোকেরা হাসি এবং উপহাসের বিষয় বানিয়ে থাকে।
মোটকথাঃ এরূপ দাঁড়ানো মুস্তাহাব হওয়ার স্বপক্ষে স্পষ্ট কোন সহীহ দলীল পাওয়া যায় না। মানুষ দু’ভাগে বিভক্তঃ সম্মানিত আর তার চেয়ে নিম্ন পর্যায়ের। যে প্রথম প্রকারের অন্তর্ভুক্ত তার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর অনুসরণ করা উচিত, কারণ তিনি অন্যের পক্ষ থেকে তার জন্য দাঁড়ানোকে অপছন্দ করতেন। আর যে দ্বিতীয় প্রকারের অন্তর্ভুক্ত তার উচিত রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীগণের অনুসরণ করা, কারণ তারা প্রথম প্রকারের জন্য দাঁড়াতেন না।
এ বিষয়ে আমাকে আনন্দিত করেছে `আশশামাইল` গ্রন্থের ভাষ্যকার শাইখ জাসূসের আলোচনা যা তিনি “আলবায়ান” গ্রন্থে উল্লেখিত ইবনু রুশদ এর উদ্ধৃতি থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেনঃ ব্যক্তির জন্য দাঁড়ানোটা চার ধরনেরঃ
(১) এক ধরনের দাঁড়ানো যার মধ্যে নিষেধের সংমিশ্রণ ঘটে থাকে এরূপ দাড়ানো অবৈধ। এটি হচ্ছে অন্যকে বড় মনে করে সম্মান ও মর্যাদা দেখিয়ে দাঁড়ানো যে, যারা তার জন্য দাঁড়ায় তাদের উপরে অহঙ্কার করে নিজের জন্য দাঁড়ানোকে ভালোবাসে।
(২) এক ধরনের দাড়ানো যার মধ্যে মাকরূহ কর্মের সংমিশ্রণ ঘটে। এটি হচ্ছে অন্যকে বড় মনে করে সম্মান ও মর্যাদা দেখিয়ে দাঁড়ানো যে, যারা তার জন্য দাঁড়ায় তাদের উপরে অহঙ্কার করে না এবং তার জন্য দাঁড়ানোকে ভালোও বাসে না। তবে এরূপ করা মাকরূহু শাসকদের কর্মের সাথে এর সাদৃশ্যতার জন্য এবং যার জন্য দাঁড়ানো হচ্ছে তার পরিবর্তন ঘটার আশঙ্কা থাকার কারণে।
(৩) এক ধরনের দাড়ানো যার মধ্যে জায়েয কর্মের সংমিশ্রণ ঘটে থাকে। এটি সেই ব্যক্তির জন্য দাঁড়ানো যাকে সম্মান ও মর্যাদা দিয়ে দাঁড়ানো হয় অথচ তিনি তা চান না আর তার অবস্থা শাসকদের অবস্থার মতও না এবং তার মাঝে কোন প্রকার পরিবর্তন (অহঙ্কারের ভাব) আসা হতে তিনি নিরাপদ। কিন্তু এরূপ গুণাবলী সম্পন্ন ব্যক্তি অনুপস্থিত। এরূপ গুণাবলী তার মাঝেই পাওয়া যেতে পারে যিনি নুবুওয়াত লাভের মাধ্যমে নিম্পাপ।
(৪) এক ধরনের দাঁড়ানো যার মধ্যে ভালো কর্মের সংমিশ্রণ ঘটে থাকে। আর তা হচ্ছে সফর হতে আগমনকারী কোন ব্যক্তির আগমনে খুশিতে সালাম দেয়ার উদ্দেশ্যে তার নিকটে দাঁড়িয়ে যাওয়া, অথবা কোন বিপদগ্রস্ত ব্যক্তি আগমন করলে তাকে সাস্তুনা দেয়ার লক্ষ্যে তার নিকট দাঁড়ানো। এছাড়া এর সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ অন্য কিছু। এগুলোর মাধ্যমে বিতর্ক থেকে মুক্ত হওয়া সম্ভব এবং এর দ্বারা বর্ণিত আসারগুলোর মধ্যে পারস্পারিক সাংঘর্ষিক অবস্থারও অবসান ঘটবে।
` المدينة خير (وفي رواية: أفضل) من مكة `.
باطل
رواه البخاري في ` التاريخ الكبير ` (1/1/160/476) والمفضل الجندي في `
فضائل المدينة ` (رقم 12 من منسوختي) والطبراني في ` الكبير ` (4450) عن
محمد بن عبد الرحمن العامري عن يحيى بن سعيد عن عمرة بنت عبد الرحمن قالت: خطب
مروان بن الحكم بمكة، فذكر مكة وفضلها، فأطنب فيها، ورافع بن خديج عند
المنبر فقال: ذكرت مكة وفضلها وهي على ما ذكرت، ولم أسمعك ذكرت المدينة،
أشهد لسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
قلت: وهذا سند ضعيف، علته محمد بن عبد الرحمن العامري، وهو الرداد، قال
أبو حاتم:
` ليس بقوي `.
وقال أبو زرعة:
` لين `.
وقال ابن عدي:
` رواياته ليست محفوظة `.
ثم ساق له أحاديث هذا أحدها، وقال الذهبي بعد أن ذكره:
` ليس هو بصحيح، وقد صح: صلاة في مكة … `.
يشير إلى حديث ` أن الصلاة في مكة أفضل من الصلاة في المدينة ` فكيف تكون
المدينة أفضل من مكة؟ ويعارضه أيضا قوله صلى الله عليه وسلم لمكة:
` والله إنك لخير أرض الله، وأحب أرض الله إلى الله.. `.
وهو مخرج في المشكاة (2725) .
والحديث ضعفه أيضا عبد الحق في ` أحكامه ` (108/2) فقال:
` ومحمد بن عبد الرحمن هذا ليس حديثه بشيء عندهم `.
والحديث ذكره السيوطي في ` الجامع ` من رواية الطبراني في ` الكبير `
والدارقطني في ` الأفراد ` عن رافع، وقال في رسالته ` الحجج المبينة في
التفضيل بين مكة والمدينة ` (ق 68/2) :
` وهو ضعيف، كما قال ابن عبد البر `.
১৪৪৪। মদীনা মক্কা হতে উত্তম, অন্য বর্ণনায় এসেছেঃ বেশী মর্যাদাপূর্ণ।
হাদীসটি বাতিল।
হাদীসটিকে ইমাম বুখারী “আততারীখুল কাবীর” গ্রন্থে (১/১/১৬০/৪৭৬), আলমুফাযযালুল জুনদী `ফাযাইলুল মাদীনাহ` গ্রন্থে (নং ১২) ও ত্ববারানী `আলমুজামুল কাবীর` গ্রন্থে` (৪৪৫০) মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান আমেরী হতে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ হতে, তিনি আমরাহ বিনতু আবদির রহমান হতে, তিনি বলেনঃ মারওয়ান ইবনুল হাকাম মক্কায় খুৎবাহ দিয়ে মক্কার ফাযীলাত সম্পর্কে আলোচনা করলেন, মক্কার খুব প্রশংসা করলেন। এ সময় রাফে ইবনু খাদীজ মিম্বারের নিকটে ছিলেন, তিনি বললেনঃ আপনি মক্কার কথা উল্লেখ করলেন এবং তার ফাযীলাত বর্ণনা করলেন অথচ আপনাকে মাদীনার বিষয়টি উল্লেখ করতে শুনলাম না। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, অবশ্যই আমি রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছিঃ ...।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সনদটি দুর্বল। এর সমস্যা হচ্ছে মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান আমেরী, তিনি হচ্ছেন রাদাদ। আবু হাতিম তার সম্পর্কে বলেনঃ তিনি শক্তিশালী নন।
আবু যুর’য়াহ বলেনঃ তিনি দুর্বল।
ইবনু আদী বলেনঃ তার বর্ণনাগুলো নিরাপদ নয়। অতঃপর তিনি তার কতিপয় হাদীস উল্লেখ করেন, এটি সেগুলোর একটি। আর হাফিয যাহাবী হাদীসটি উল্লেখ করে বলেনঃ এটি সহীহ নয়। মক্কাতে সালাত আদায়ের ফাযীলাত সম্পর্কে সহীহ হাদীস বর্ণিত হয়েছে।
তিনি এর দ্বারা নিম্নোক্ত হাদীসের দিকে ইঙ্গিত করেছেনঃ
`মক্কায় সালাত আদায় করা বেশী উত্তম মাদীনায় সালাত আদায় করার চেয়ে।`
অতএব কিভাবে মক্কার চেয়ে মাদীনা উত্তম হবে? এছাড়াও মক্কা সম্পর্কে রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিম্নোক্ত বাণীও আলোচ্য হাদীসের সাথে সাংঘর্ষিকঃ
`আল্লাহর কসম! অবশ্যই তুমি আল্লাহর যমীনের মধ্যে সর্বোত্তম এবং আল্লাহর যমীনের মধ্যে আল্লাহর নিকট সর্বাপেক্ষা বেশী পছন্দের। আল্লাহর কসম! আমাকে যদি তোমার থেকে বের করে দেয়া না হতো তাহলে আমি তোমার থেকে বের হতাম না।` [`সহীহ তিরমিযী` (৩৯২৫), `সহীহ ইবনু মাজাহ` (৩১০৮) ও “মিশকাত` (২৭২৫)]।
আলোচ্য হাদীসটিকে আব্দুল হকও তার “আহকাম` গ্রন্থে (২/১০৮) দুর্বল আখ্যা দিয়ে বলেছেনঃ মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান, এর হাদীস তাদের নিকট কিছুই নয়।
হাদীসটিকে সুয়ুতী “আলজামেউস সাগীর” গ্রন্থে ত্ববারানীর `আলমুজামুল কাবীর` এবং দারাকুতনীর `আলআফরাদ` গ্রন্থের উদ্ধৃতিতে রাফে হতে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি তার গ্রন্থ (আলহুজাজুল মুবায়্যিনাহ্ ফিত তাফযীলে বাইনা মাক্কা অল-মাদানীহ` এর মধ্যে (কাফ ২/২৮) বলেছেনঃ এটি দুর্বল যেমনটি ইবনু আব্দিল বার বলেছেন।
` إني سألت ربي عز وجل فقلت: اللهم إنك أخرجتني من أحب أرضك إلي، فأنزلني أحب
الأرض إليك، فأنزلني المدينة `.
موضوع
أخرجه الحاكم (3/277 - 278) من طريق الحسين بن الفرج: حدثنا محمد بن عمر:
وحدثني الضحاك بن عثمان: أخبرني عبد الله بن عبيد بن عمير: سمعت عبد الرحمن
ابن الحارث بن هشام يحدث عن أبيه قال:
` رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجته، وهو واقف على راحلته، وهو
يقول:
والله إنك لخير الأرض وأحب الأرض إلى الله، ولولا أني أخرجت منك ما خرجت
. قال: فقلت: يا ليتنا لم نفعل، فارجع إليها فإنها منبتك ومولدك، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم … ` فذكره.
أخرجه الحاكم في ترجمة الحارث بن هشام هذا رضي الله عنه، وسكت عن إسناده، هو
والذهبي، وهو إسناد هالك، آفته محمد بن عمر، وهو الواقدي، فإنه كذاب،
كما قال غير واحد من الأئمة، على أن الراوي عنه الحسين بن فرج قريب منه، فقد
أورده الذهبي في ` الضعفاء والمتروكين ` وقال:
` قال ابن معين: يسرق الحديث `.
وقال في ` الميزان `:
` قال ابن معين: كذاب يسرق الحديث، ومشاه غيره، وقال أبو زرعة: ذهب حديثه `.
قال الحافظ في ` اللسان `:
` قوله: مشاه غيره، ما علمت من عنى `.
ثم نقل عن جمع آخر من الأئمة تضعيفه، وعن أبي حاتم أنه تركه.
والحديث له طريق أخرى عند الحاكم أيضا (3/3) عن موسى الأنصاري: حدثنا سعد
ابن سعيد المقبري: حدثني أخي عن أبي هريرة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله
عليه وسلم قال: فذكره، وقال:
` رواته مدنيون من بيت أبي سعيد المقبري `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` لكنه موضوع، فقد ثبت أن أحب البلاد إلى الله مكة، وسعد ليس بثقة `.
قلت: تعصيب الجناية بأخيه عبد الله أولى، فإنه أشد ضعفا من سعد، وقد
أوردهما الذهبي في ` الضعفاء `، فقال في سعد:
` مجمع على ضعفه `.
وقال في أخيه:
` تركوه `.
وقد قال أبو حاتم في الأول منهما:
` هو في نفسه مستقيم، وبليته أنه يحدث عن أخيه عبد الله، وعبد الله ضعيف،
ولا يحدث عن غيره `.
وموسى الأنصاري لم أعرفه، ويحتمل أنه موسى بن شيبة بن عمرو الأنصاري السلمي
المدني، قال أحمد:
` أحاديثه مناكير `.
وقال أبو حاتم:
` صالح الحديث `.
১৪৪৫। আমি আমার প্রতিপালককে প্রার্থনা জানিয়ে বলেছিলামঃ হে আল্লাহ্ তুমি আমাকে তোমার সেই যমীন থেকে বের করে দিয়েছো যেটি আমার নিকট সর্বাপেক্ষা বেশী প্রিয় ছিল। অতএব তুমি আমাকে তোমার নিকট সর্বাপেক্ষা প্রিয় যমীনে অবতরণ করাও। এ কারণে তিনি আমাকে মাদীনাতে অবতরণ করান।
হাদীসটি বানোয়াট।
হাদীসটিকে হাকিম (৩/২৭৭-২৭৮) হুসাইন ইবনুল ফারাজ সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু উমার হতে, তিনি যাহহাক ইবনু উসমান হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ওবায়েদ ইবনে উমায়ের হতে, তিনি বলেনঃ আব্দুর রহমান ইবনুল হারেস ইবনে হিশাম তার পিতার উদ্ধৃতিতে হাদীস বর্ণনা করে বলেছেনঃ আমি রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে তার হাজ্জের মধ্যে দেখেছি, তিনি তার বাহনের উপর দাঁড়িয়ে বলেনঃ ...।
হাদীসটিকে হাকিম হারেস ইবনু হিশামের জীবনীতে উল্লেখ করে এর সনদ সম্পর্কে তিনি এবং হাফিয যাহাবী চুপ থেকেছেন। অথচ সনদটি ধ্বংসপ্রাপ্ত। এর সমস্যা হচ্ছে মুহাম্মাদ ইবনু উমার তিনি হচ্ছেন ওয়াকেদী। কারণ তিনি মিথ্যুক, যেমনটি একাধিক ইমাম তা বলেছেন। আর তার থেকে বর্ণনাকারী হুসাইন ইবনু ফারাজ (দুর্বলতার দিক দিয়ে) তার নিকটবর্তী। হাফিয যাহাবী তাকে (হুসাইনকে) `আযযুয়াফা অলমাতরূকীন` গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ ইবনু মাঈন বলেনঃ তিনি হাদীস চোর।
তিনি “আল মীযান” গ্রন্থে বলেনঃ ইবনু মাঈন বলেনঃ তিনি মিথ্যুক হাদীস চোর। আর অন্য ব্যক্তি তাকে চালিয়ে দিয়েছেন। আবু যুর’য়াহ বলেনঃ তার হাদীস চলে গেছে।
হাফিয ইবনু হাজার `আল-লিসান` গ্রন্থে বলেনঃ অন্য কেউ তাকে চালিয়ে দিয়েছেন। জানি না তিনি এর দ্বারা কাকে বুঝিয়েছেন।
অতঃপর তিনি এক দল ইমাম হতে তার দুর্বল হওয়ার বিষয়টি উল্লেখ করেছেন। তিনি আবু হাতিম হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি তাকে ত্যাগ করেছেন।
হাকিমের (৩/৩) নিকট হাদীসটির অন্য সূত্রও রয়েছে। তিনি মূসা আনসারী হতে, তিনি সা'দ ইবনু সাঈদ মাকবুরী হতে, তিনি তার ভাই হতে, তিনি আবু হুরাইরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
অতঃপর বলেছেনঃ এর বর্ণনাকারীগণ মদীনাবাসী আবু সাঈদ মাকবুরীর গৃহের লোকজন।
হাফিয যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ কিন্তু হাদীসটি বানোয়াট। সাব্যস্ত হয়েছে যে, মক্কা হচ্ছে আল্লাহর নিকট সর্বাপেক্ষা প্রিয় শহর আর সা'দ নির্ভরযোগ্য নয়।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ক্ৰটিটা সাদের ভাই আব্দুল্লাহর উপর বর্তনোই বেশী উত্তম। কারণ তিনি সা'দের চেয়ে বেশী দুর্বল। তাদের দু’জনকেই হাফিয যাহাবী `আয-যুয়াফা` গ্রন্থে উল্লেখ করে সা'দ সম্পর্কে বলেছেনঃ তিনি সকলের ঐকমত্যে দুর্বল। আর তার ভাই সম্পর্কে বলেছেনঃ তাকে মুহাদ্দিসগণ পরিত্যাগ করেছেন।
আবু হাতিম প্রথমজন সম্পর্কে বলেন । তিনি নিজে ভালো, কিন্তু তার সমস্যা হচ্ছে তিনি তার ভাই আব্দুল্লাহ হতে হাদীস বর্ণনা করেন। অথচ তার ভাই আব্দুল্লাহ দুর্বল। আর তিনি তাকে ছাড়া অন্য কোন ব্যক্তি হতে হাদীস বর্ণনা করেননি।
আর মূসা আনসারীকে আমি চিনি না। হতে পারে তিনি হচ্ছেন মূসা ইবনু শায়বাহ ইবনে আমর আনসারী সুলামী মাদানী। তার সম্পর্কে ইমাম আহমাদ বলেনঃ তার হাদীসগুলা মুনকার।
আবু হাতিম বলেনঃ তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে উপযুক্ত।
` حد الساحر ضربة بالسيف `.
ضعيف
أخرجه الترمذي (1/276) والدارقطني (ص 336) والحاكم (4/360) والطبراني
في ` المعجم الكبير ` (رقم - 1665) والرامهرمزي في ` الفاصل ` (ص 141)
وابن عدي في ` الكامل ` (8/2) وعنه البيهقي (8/136) من طريق إسماعيل بن
مسلم المكي عن الحسن عن جندب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
فذكره.
وقال الترمذي:
` لا نعرفه مرفوعا إلا من هذا الوجه، وإسماعيل بن مسلم المكي يضعف في الحديث
، والصحيح عن جندب موقوف `.
وأما الحاكم فقال:
` صحيح الإسناد؛ وإن كان الشيخان تركا حديث إسماعيل بن مسلم؛ فإنه غريب صحيح `!
قلت: ووافقه الذهبي! وهذا هو الغريب حقا، فإن الذهبي نفسه قد أورد إسماعيل
هذا في ` الضعفاء والمتروكين ` وقال:
` متفق على ضعفه `. وقال في ` الكاشف `: ` ضعفوه، وتركه النسائي `.
وقد وجدت له متابعا، يرويه محمد بن الحسن بن سيار أبو عبد الله: حدثنا خالد
العبدي عن الحسن به.
أخرجه الطبراني (1666) وأبو سهل القطان في ` حديثه ` (4/245/2) .
لكنها متابعة واهية، فإن خالدا هذا، لم أجد من ترجمه، وكذلك الراوي عنه،
فلا يعضد بها، على أن مدار الطريقين على الحسن، وهو مدلس وقد عنعن. ولذلك
فمن رام تحسين الحديث فما أحسن، لا سيما والصحيح عن جندب موقوف كما تقدم عن
الترمذي، وقد أخرجه الحاكم (4/361) من طريق أشعث بن عبد الملك عن الحسن:
` أن أميرا من أمراء الكوفة دعا ساحرا يلعب بين يدي الناس فبلغ جندب، فأقبل
بسيفه، واشتمل عليه، فلما رآه ضربه بسيفه، فتفرق الناس عنه، فقال: أيها
الناس لن تراعوا، إنما أردت الساحر - فأخذه الأمير فحبسه. فبلغ ذلك سلمان،
فقال: بئس ما صنعا! لم يكن ينبغي لهذا وهو إمام يؤتم به يدعوساحرا يلعب بيد
يديه، ولا ينبغي لهذا
أن يعاتب أميره بالسيف `.
قلت: وهذا إسناد موقوف صحيح إلى الحسن. وقد توبع، فقال هشيم: أنبأنا خالد
الحذاء عن أبي عثمان النهدي:
` أن ساحرا كان يلعب عند الوليد بن عقبة، فكان يأخذ سيفه فيذبح نفسه، ولا
يضره، فقام جندب إلى السيف فأخذه فضرب عنقه، ثم قرأ: ` أفتأتون السحر
وأنتم تبصرون `.
أخرجه الدارقطني وعنه البيهقي وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (4/19/1 و2)
والسياق له من طرق عن هشيم به.
وهذا إسناد صحيح موقوف، صرح فيه هشيم بالتحديث.
وله طريق أخرى عند البيهقي عن ابن وهب: أخبرني ابن لهيعة عن أبي الأسود:
` أن الوليد بن عقبة كان بالعراق يلعب بين يديه ساحر، وكان يضرب رأس الرجل،
ثم يصيح به، فيقوم خارجا، فيرتد إليه رأسه، فقال الناس: سبحان الله، يحيى
الموتى! ورآه رجل من صالح المهاجرين، فنظر إليه، فلما كان من الغد، اشتمل
على سيفه فذهب يلعب لعبه ذلك، فاخترط الرجل سيفه فضرب عنقه، فقال: إن كان
صادقا فليحي نفسه! وأمر به الوليد دينارا صاحب السجن - وكان رجلا صالحا -
فسجنه، فأعجبه نحوالرجل، فقال: أتستطيع أن تهرب؟ قال: نعم، قال: فاخرج
لا يسألني الله عنك أبدا `.
قلت: وهذا إسناد صحيح إن كان أبو الأسود أدرك القصة فإنه تابعي صغير، واسمه
محمد بن عبد الرحمن بن نوفل يتيم عروة.
قلت: ومثل هذا الساحر المقتول، هؤلاء الطرقية الذين يتظاهرون بأنهم من
أولياء الله، فيضربون أنفسهم بالسيف والشيش، وبعضه سحر وتخييل لا حقيقة له
، وبعضه تجارب وتمارين، يستطيعه كل إنسان من مؤمن أوكافر إذا تمرس عليه
وكان قوي القلب، ومن ذلك مسهم النار بأفواههم وأيديهم، ودخولهم التنور،
ولي مع أحدهم في حلب موقف تظاهر فيه أنه من هؤلاء، وأنه يطعن نفسه بالشيش،
ويقبض على الجمر
فنصحته، وكشفت له عن الحقيقة، وهددته بالحرق إن لم يرجع
عن هذه الدعوى الفارغة! فلم يتراجع، فقمت إليه وقربت النار من عمامته مهددا
، فلما أصر أحرقتها عليه، وهو ينظر! ثم أطفأتها خشية أن يحترق هو من تحتها
معاندا. وظني أن جندبا رضي الله عنه، لورأى هؤلاء لقتلهم بسيفه كما فعل
بذلك الساحر ` ولعذاب الآخرة أشد وأبقى `.
১৪৪৬। যাদুকরের শাস্তি হচ্ছে তরবারী দ্বারা (তাকে) একটি আঘাত করা।
হাদীসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে ইমাম তিরমিযী (১/২৭৬), দারাকুতনী (পৃঃ ৩৩৬), হাকিম (৪/৩৬০), ত্ববারানী `আলমুজামুল কাবীর` গ্রন্থে (নং ১৬৬৫), রামাহুরমুযী `আলফাসেল` গ্রন্থে (পৃঃ ১৪১), ইবনু আদী `আলকামেল` গ্রন্থে (২/৮) আর তার থেকে বাইহাকী (৮/১৩৬) ইসমাঈল ইবনু মুসলিম মাক্কী হতে, তিনি হাসান হতে, তিনি জুন্দুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
তিরমিযী বলেনঃ হাদীসটিকে মারফু' হিসেবে একমাত্র এ সূত্রেই চিনি। আর ইসমাঈল ইবনু মুসলিম মাক্কীকে হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল আখ্যা দেয়া হয়েছে। আর হাদীসটি জুন্দুব হতে মওকুফ হিসেবে সহীহ।
হাকিম বলেনঃ সনদটি সহীহ। যদিও দু'শাইখ (বুখারী ও মুসলিম) ইসমাঈলের হাদীসকে ত্যাগ করেছেন, কারণ তিনি গারীব সহীহ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হাফিয যাহাবী তার সাথে ঐকমত্য পোষণ করেছেন! সত্যিকারেই এটা অদ্ভুত ব্যাপার। কারণ হাফিয যাহাবী নিজেই ইসমাঈলকে `আয-যুয়াফা অলমাতরূকীন` গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ তার দুর্বল হওয়ার ব্যাপারে সকলেই একমত। আর `আলকাশেফ` গ্রন্থে বলেছেনঃ তাকে মুহাদ্দিসগণ দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন আর নাসাঈ তাকে ত্যাগ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তার সাথে মুতাবা'য়াতকারী একজন পেয়েছি। তিনি হচ্ছেন মুহাম্মাদ ইবনুল হাসান ইবনে সায়্যার আবূ আব্দিল্লাহ, তিনি খালেদ আবাদী হতে, তিনি হাসান হতে বর্ণনা করেছেন ...।
এটিকে ত্ববারানী (১৬৬৬) ও আবু সাহল কাত্তান তার “হাদীস” গ্রন্থে (৪/২৪৫/২) বর্ণনা করেছেন।
কিন্তু এ মুতাবা'য়াতটি খুবই দুর্বল। কারণ এ খালেদের জীবনী কে আলোচনা করেছেন পাচ্ছি না। অনুরূপভাবে তার থেকে বর্ণনাকারীরও জীবনী পাচ্ছি না। অতএব এরূপ মুতাবা'য়াতের দ্বারা হাদীসটির শক্তি বৃদ্ধি পায় না। এ ছাড়াও উভয় সূত্রেই হাসান রয়েছেন। তিনি মুদাল্লিস আন আন করে বর্ণনা করেছেন। এ কারণে যিনি হাদীসটিকে হাসান আখ্যা দিয়েছেন তিনি সঠিক সিদ্ধান্ত দেননি।
তবে হাদীসটি জুন্দুব হতে মওকুফ হিসেবে সহীহ। [বিস্তারিত দেখুন মূল গ্রন্থ]।
` من خلال المنافق: إذا حدث كذب، وإذا وعد أخلف، وإذا ائتمن خان. ولكن
المنافق إذا حدث وهو يحدث نفسه أنه يكذب، وإذا وعد وهو يحدث نفسه أنه يكذب
(لعله: يخلف) ، وإذا ائتمن وهو يحدث نفسه أنه يخون `.
منكر بهذا التمام
أخرجه الطبراني في ` الكبير ` (6186) من طريق مهران بن أبي عمر: حدثنا علي
ابن عبد الأعلى عن أبي النعمان: حدثني أبو الوقاص: حدثني سلمان الفارسي
قال:
` دخل أبو بكر وعمر رضي الله عنهما على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال
رسول الله صلى الله عليه وسلم: (فذكر الشطر الأول منه) فخرجا من عند
رسول الله صلى الله عليه وسلم وهما ثقيلان، فلقيتهما، فقلت: ما لي أراكما
ثقيلين؟ قالا: حديث سمعناه من رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: (فذكره)
قال: أفلا سألتماه؟ قالا: هبنا رسول الله صلى الله عليه وسلم. قلت: لكني
سأسأله. فدخلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: لقيني أبو بكر وعمر،
وهما ثقيلان. ثم ذكرت ما قالا. فقال: قد حدثتهما، ولم أضعه على الموضع
الذي يضعانه، ولكن المنافق.. ` الحديث.
قلت: وإسناده ضعيف، أبو النعمان وأبو وقاص كلاهما مجهول كما قال الترمذي ثم
الذهبي، ثم العسقلاني. فقول هذا في ` الفتح `:
` وإسناده لا بأس به، ليس فيهم من أجمع على تركه `.
أقول: يكفي في ضعف السند أن يكون فيه مجهول واحد فكيف وهما مجهولان؟ ! فلعل
الحافظ نسي أولم يستحضر الجهالة التي اعترف بها في ` التقريب `،
فكون السند
سالما ممن أجمع على تركه لا يستلزم القول بأنه لا بأس بإسناده كما يخفى على
العارفين بهذا العلم. ولذلك ضعف الحديث الترمذي كما يأتي.
ثم إن فيه علة أخرى وهي تفرد ابن عبد الأعلى، وقد قال فيه الذهبي:
` صويلح الحديث، قال أبو حاتم: ليس بقوي. وقال أحمد والنسائي: ليس به بأس `.
وقال في ` الكاشف `:
` صدوق، قال أبو حاتم: ليس بالقوي `.
وقال الحافظ:
` صدوق، ربما وهم `.
قلت: فمثله يترشح ليكون حسنا، فإذا توبع من مثله جزم بحسنه، ولكنه تفرد به
كما جزم بذلك الذهبي في ` الميزان `.
وقد اختلف عليه في إسناده فرواه مهران عنه بإسناده المتقدم.
وخالفه إبراهيم بن طهمان عنه عن أبي النعمان عن أبي وقاص عن زيد بن أرقم عن
النبي صلى الله عليه وسلم قال:
` إذا وعد الرجل أخاه ومن نيته أن يفي له فلم يف ولم يجىء للميعاد فلا إثم
عليه `.
أخرجه أبو داود (4995) والترمذي (2635) وقال:
` حديث غريب، وليس إسناده بالقوي، علي بن عبد الأعلى ثقة، ولا يعرف أبو
النعمان ولا أبو وقاص، وهما مجهولان `.
ولعل رواية ابن طهمان أصح من رواية ابن أبي عمر وهو العطار الرازي، فإن
الأول أخرج له الشيخان، وقال فيه الحافظ:
` ثقة يغرب `.
والآخر لم يخرج له الشيخان شيئا، وقال فيه الحافظ:
` صدوق له أوهام سيىء الحفظ `!
وجملة القول أن الحديث ضعيف للجهالة والاضطراب.
ثم إن في قوله: ` ولكن المنافق.. ` إلخ نكارة لمخالفته لحديث أبي هريرة
وابن عمرو مرفوعا (1) بنحوالشطر الأول منه دون هذه الزيادة المفسرة للمراد بـ
` المنافق `، وهو خلاف المتبادر من إطلاق الحديث الصحيح، فإنه يشمل من كان
في نيته أن يفي، ثم لم يف، ومن لم يكن في نيته أن يفعل، خلافا لما نقله
الحافظ عن الغزالي. والله أعلم.
১৪৪৭। মুনাফিকের খাসলত হচ্ছেঃ সে কথা বললে মিথ্যা বলবে, সে ওয়াদাহ করে ওয়াদা খেলাফ করবে, তার নিকট আমানাত রাখা হলে সে তার খিয়ানাত করবে। আর মুনাফিক যখন কথা বলে তখন সে নিজের মনের সাথে কথা বলে যে, সে মিথ্যা বলছে। সে যখন ওয়াদা করে তখন সে নিজের মনের সাথে কথা বলে যে, সে মিথা বলছে (সম্ভবত সঠিক হচ্ছেঃ সে বিপরীত করবে)। আর তার নিকট যখন আমানাত রাখা হয় তখন সে নিজের মনের সাথে কথা বলে যে, সে খিয়ানাত করবে।
হাদীসটি এ ভাষায় মুনকার।
এ হাদীসটিকে ত্ববারানী `আলমুজামুল কাবীর` গ্রন্থে (৬১৮৬) মিহরান ইবনু আবী উমার হতে, তিনি আলী ইবনু আব্দিল আ'লা হতে, তিনি আবুন নুমান হতে, তিনি আবুল অক্কাস হতে, তিনি সালমান ফারেসী রাঃ হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ ...৷
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সনদটি দুর্বল। আবুন নুমান ও আবু অক্কাস তারা উভয়েই মাজহুল (অপরিচিত) যেমনটি ইমাম তিরমিযী অতঃপর হাফিয যাহাবী ও আসকালানী বলেছেন।
তারপরেও তিনি `ফাতহুল বারী` গ্রন্থে বলেছেনঃ এর সনদটিতে কোন সমস্যা নেই। কারণ বর্ণনাকারীদের মধ্যে এমন কেউ নেই যাকে ত্যাগ করার ব্যাপারে ঐকমত্য হয়েছে।
আমি (আলবানী) বলছিঃ সনদ দুর্বল হওয়ার জন্য একজন মাজহুল (অপরিচিত) বর্ণনাকারীই যথেষ্ট। অতএব কিভাবে এটি দুর্বল হবে না যেখানে দু’জন বর্ণনাকারী মাজহুল?
সম্ভবত হাফিয ইবনু হাজার ভুলে গিয়ে উক্ত কথা বলেছেন।
এ সনদের মধ্যে আরেকটি সমস্যা রয়েছে সেটি হচ্ছে ইবনু আব্দিল আ'লা কর্তৃক এককভাবে বর্ণনা করা। তার সম্পর্কে হাফিয যাহাবী বলেনঃ তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে সামান্য ভালো। আবু হাতিম বলেনঃ তিনি নির্ভরযোগ্য নন। ইমাম আহমাদ ও নাসাঈ বলেনঃ তার ব্যাপারে সমস্যা নেই।
হাফিয যাহাবী `আলকাশেফ” গ্রন্থে বলেনঃ তিনি সত্যবাদী। আবু হাতিম বলেনঃ তিনি শক্তিশালী নন।
হাফিয ইবনু হাজার বলেনঃ তিনি সত্যবাদী, কখনও কখনও সন্দেহ করতেন।
আমি (আলবানী) বলছি এরূপ ব্যক্তির হাদীসকে হাসান হিসেবে গণ্য করা যেতে পারে যদি তার মত ব্যক্তি কর্তৃক মুতাবায়াতকৃত হয়। কিন্তু তিনি হাদীসটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন যেমনটি হাফিয যাহাবী “আল-মীযান” গ্রন্থে দৃঢ়তার সাথে উল্লেখ করেছেন।
এ ছাড়া সনদের মধ্যে ইযতিরাবও সংঘটিত হয়েছে।
` احضروا موتاكم، ولقنوهم لا إله إلا الله، وبشروهم بالجنة، فإن الحليم من
الرجال والنساء يتحيرون عند ذلك المصرع، وإن الشيطان لأقرب ما يكون عند ذلك
المصرع، والذي نفسي بيده لا تخرج نفس عبد من الدنيا حتى يألم كل عرق منه على
حياله `.
ضعيف
أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (5/186) من طريق إسماعيل بن عياش عن أبي معاذ
عتبة بن حميد عن مكحول عن واثلة بن الأسقع قال: قال رسول الله صلى الله
عليه وسلم: فذكره وقال:
` غريب من حديث مكحول لم نكتبه إلا من حديث إسماعيل `.
قلت: وهو ضعيف في روايته عن غير الشاميين، وهذه منها، فإن أبا معاذ هذا
بصري، ومع ذلك ففي حفظه - أعني أبا معاذ - شيء كما يشعر بذلك قول الحافظ فيه:
` صدوق له أوهام `.
ومكحول وهو الشامي، وإن كان سمع من واثلة، فإنه موصوف بالتدليس، فمثله
يتحفظ من حديثه المعنعن كهذا.
والحديث أورده السيوطي في زيادته على ` الجامع الصغير ` وسكت عليه في
(1) انظر ` مختصر البخاري ` (24 و25) . اهـ
` الحاوي للفتاوي ` (2/119) ! وقد ذكر فيه بعضه شاهدا فقال:
` وأخرج الحارث بن أبي أسامة في ` مسنده ` من مرسل عطار بن يسار عن النبي
صلى الله عليه وسلم قال:
` معالجة ملك الموت أشد من ألف ضربة بالسيف، وما من مؤمن يموت إلا وكل عرق
منه يألم على حدة، وأقرب ما يكون عدوالله منه تلك الساعة. مرسل جيد الإسناد `.
(فائدة) : وأما ما نقله الغزالي في ` الدرة الفاخرة في كشف علوم الآخرة ` من
فتنة الموت، وأن إبليس لعنه الله وكل أعوانه يأتون الميت على صفة أبو يه على
صفة اليهودية، فيقولان له: مت يهوديا، فإن انصرف عنهم جاء أقوام آخرون على
صفة النصارى حتى يعرض عليه عقائد كل ملة، فمن أراد الله هدايته أرسل إليه
جبريل فيطرد الشيطان وجنده، فيبتسم الميت … إلخ، فقال السيوطي:
` لم أقف عليه في الحديث `.
১৪৪৮। তোমরা তোমাদের মৃত্যুর পথিক ব্যক্তিদের নিকট উপস্থিত হয়ে তাদেরকে 'লা-ইলাহা ইল্লাল্লাহ্' পাঠ করার তালকীন দাও এবং তাদেরকে জান্নাতের সুসংবাদ প্রদান করো। কারণ পুরুষ এবং নারীদের ধৈর্যশীলরা সে মুহুর্তে বিচলিত হয়ে পড়ে। আর সে সময়ে শয়তান সর্বাপেক্ষা বেশী নিকটবর্তী হয়। সেই সত্ত্বার কসম যার হাতে আমার আত্মা, মালাকুল মাওতকে দেখা তরবারীর এক হাজার আঘাতের চেয়েও বেশী কঠিন। সেই সত্ত্বার কসম যার হাতে আমার আত্মা, কোন বান্দার আত্মাই দুনিয়া থেকে বের হবে না যে পর্যন্ত তার প্রতিটি রগের অগ্রভাগ ব্যথিত না হবে।
হাদীসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে আবু নুয়াইম `আলহিলইয়াহ` গ্রন্থে (৫/১৮৬) ইসমাঈল ইবনু আইয়্যাশ সূত্রে আবু মুয়ায উৎবাহ ইবনু হামীদ হতে, তিনি মাকহুল হতে, তিনি ওয়াসিলাহ ইবনুল আসকা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
আবু নুয়াইম বলেনঃ এটি মাকহুলের হাদীস হতে গারীব। এটি একমাত্র ইসমাঈলের হাদীস হতেই লিখেছি।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি (ইসমাঈল) শামী ছাড়া অন্যদের থেকে বর্ণনা করার ক্ষেত্রে দুর্বল আর এটি অন্যদের থেকে বর্ণনাকৃত। কারণ আবু মুয়ায হচ্ছেন বাসরী। এ ছাড়াও তার হেফযের মধ্যে কিছু সমস্যা রয়েছে যেমনটি হাফিয ইবনু হাজারের কথা থেকে বুঝা যায়ঃ
তিনি সত্যবাদী তবে তার সন্দেহমূলক বর্ণনা রয়েছে।
মাকহুল হচ্ছেন শামী। তিনি যদিও ওয়াসিলাহ্ হতে শ্রবণ করেছেন তার পরেও তিনি তাদলীসের দোষে দোষী। অতএব আন আন করে বর্ণনাকৃত তার মত ব্যক্তির হাদীস থেকে বেঁচে থাকতে হবে, যেমন এ হাদীসটি।
হাদীসটিকে সুয়ূতী “যিয়াদাতুল জামেইস সাগীর` গ্রন্থে উল্লেখ করে `আলহাবী লিলফাতওয়া` গ্রন্থে (২/১১৯) চুপ থেকেছেন।
` من قرأ في إثر وضوئه: ` إنا أنزلناه في ليلة القدر ` مرة واحدة كان من
الصديقين، ومن قرأها مرتين كتب في ديوان الشهداء، ومن قرأها ثلاثا
حشره الله محشر الأنبياء `.
موضوع
رواه الديلمي في ` مسند الفردوس ` من طريق أبي عبيدة عن الحسن عن أنس قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وأبو عبيدة مجهول. كذا في ` الحاوي للفتاوي ` للسيوطي (2/11) وفيه علة
أخرى وهي عنعنة البصري.
وأما الحديث فلوائح الوضع عليه ظاهرة، وظني أن الآفة من هذا المجهول أوممن
دونه، لكن السيوطي لم يسق من إسناده إلا ما ذكرت. والله أعلم.
وقد كنت ذكرت الحديث مختصرا برقم (68) ونقلت عن الحافظ السخاوي أنه قال: `
لا أصل له `، فلما وقفت على لفظه وشيء من سنده بادرت إلى تخريجه والكشف
عن علته، لكي لا يفهم قول السخاوي: ` لا أصل له ` بمعنى لا إسناد له كما هو المتبادر عند المتأخرين.
১৪৪৯। যে ব্যক্তি তার ওযুর পরক্ষণেই একবার `ইন্না আনযালনাহু কী লাইলাতিল কদর` পাঠ করবে সে সিদ্দীকীনদের অন্তর্ভুক্ত হবে। আর যে ব্যক্তি দু'বার পাঠ করবে তাকে শাহীদগণের তালিকাভুক্ত করা হবে। আর যে ব্যক্তি তিনবার পাঠ করবে তাকে আল্লাহ্ তা'আলা কিয়ামতের দিন নবীগণকে যেখানে একত্রিত করা হবে সেখানে একত্রিত করবেন।
হাদীসটি বানোয়াট।
এটিকে দায়লামী `মুসনাদুল ফিরফাউস` গ্রন্থে আবূ ওবায়দাহ সূত্রে হাসান হতে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
আবু ওবায়দাহ মাজহুল (অপরিচিত)। সুয়ুতীর `আলহাবী লিলফাতওয়া` গ্রন্থে (২/১১) এরূপই এসেছে। এর মধ্যে আরেকটি সমস্যা হচ্ছে হাসান বাসরী এটিকে আন আন করে বর্ণনা করেছেন।
হাদীসটির মধ্যে বানোয়াটের আলামত সুস্পষ্ট। আমার ধারণা এ মাজহুল বর্ণনাকারী হতে অথবা তার নিচের বর্ণনাকারী হতে সমস্যা সৃষ্টি হয়েছে। কিন্তু যাদেরকে সনদে উল্লেখ করা হয়েছে সুয়ূতী তাদেরকে ছাড়া অন্য কাউকে উল্লেখ করেননি।
আমি (আলবানী) হাদীসটিকে সংক্ষেপে (৬৮ নম্বরে) উল্লেখ করেছি। আমি হাফিয সাখাবী হতে বর্ণনা করেছি তিনি বলেন যে, এর কোন ভিত্তি নেই। অতঃপর আমি যখন হাদীসটির ভাষা এবং তার সনদের কিছু অংশ সম্পর্কে অবগত হলাম তখন এটিকে তাখরীজ এবং এর সমস্যা প্রকাশ করার জন্য মনোযোগী হই।
` ليهبطن عيسى ابن مريم حكما عدلا، وإماما مقسطا، وليسلكن فج [الروحاء]
حاجا أومعتمرا، أوليثنينهما (1) ، وليأتين قبري حتى يسلم علي، ولأردن عليه `.
منكر بهذا التمام
وأخرجه الحاكم (2/595) من طريق يعلى بن عبيد: حدثنا محمد بن إسحاق عن سعيد
ابن أبي سعيد المقبري عن عطاء مولى أم صبية قال: سمعت أبا هريرة يقول:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فكذكره، وقال:
` صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السياقة `. ووافقه الذهبي.
وأقول: كلا، بل هو ضعيف، فيه ثلاث علل:
الأولى: جهالة عطاء هذا قال الذهبي نفسه في ترجمته من ` الميزان `:
` لا يعرف، تفرد عنه المقبري `.
الثانية: عنعنة ابن إسحاق، فإنه مدلس مشهور بذلك.
الثالثة: الاختلاف عليه في إسناده، فقد قال ابن أبي حاتم في ` العلل ` (2/413) :
` سألت أبا زرعة عن حديث اختلف فيه عن محمد بن إسحاق، فيروي محمد بن سلمة عن
محمد بن إسحاق عن سعيد بن أبي سعيد المقبري عن أبيه عن أبي هريرة عن النبي
صلى الله عليه وسلم أنه قال: (فذكره) . وروى يونس بن بكير عن محمد بن إسحاق
عن سعيد المقبري عن عطاء مولى أم صبية عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه
وسلم؟ قال أبو زرعة: قد اختلف فيه عن محمد بن سلمة في هذا الحديث، حدثنا
أحمد بن أبي شعبة، فقال فيه: عن محمد بن سلمة عن ابن إسحاق عن سعيد عن أبيه
عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال أبو زرعة: وحدثنا أبو الأصبغ
عبد العزيز بن يحيى الحراني عن محمد بن سلمة عن ابن
(1) الأصل: ` بنيتهما `. والتصحيح من ` صحيح مسلم `. اهـ.
إسحاق عن عطاء مولى أم صبية
عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا أصح `.
قلت: ويؤيده رواية يعلى بن عبيد عن ابن إسحاق به. والله أعلم.
وإنما أوردت الحديث هنا، من أجل شطره الثاني، وأما شطره الأول فصحيح،
أخرجه مسلم (4/60) وغيره من طريق أخرى عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه
وسلم قال:
` والذي نفسي بيده، ليهلن ابن مريم.. ` الحديث دون قوله: ` وليأتين قبري..
১৪৫০। ঈসা ইবনু মারইয়াম ন্যায়পরায়ণ ফয়সালাকারী এবং ন্যায়পরায়ণ ইমাম হিসেবে অবতরণ করবেন। তিনি রাওহার প্রশস্ত দূরবর্তী রাস্তা হতে হাজ্জ অথবা উমরাহ করার অথবা উভয়টি আদায় করার জন্য পথ চলা শুরু করবেন। আমার কবরের নিকট এসে আমার প্রতি সালাম প্রদান করবেন, আর আমি তার প্রতি সালামের উত্তর দিবো।
হাদীসটি এভাবে মুনকার।
হাদীসটিকে হাকিম (২/৫৯৫) ইয়ালা ইবনু ওবায়েদ সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক হতে, তিনি সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ মাকবুরী হতে, তিনি উম্মু সুবাইয়্যার দাস আতা হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ আমি আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেনঃ ...।
হাকিম বলেনঃ সনদটি সহীহ। বুখারী ও মুসলিম এভাবে বর্ণনা করেননি। হাফিয যাহাবীও তার সাথে ঐকমত্য পোষণ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ কখনও নয় বরং সনদটি তিনটি কারণে দুর্বলঃ
১। বর্ণনাকারী আতা মাজহুল (অপরিচিত)। হাফিয যাহাবী নিজে “আল-মীযান” গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলেছেনঃ তাকে চেনা যায় না, তার থেকে মাকবুরী এককভাবে বর্ণনা করেছেন।
২। এটিকে ইবনু ইসহাক আন আন করে বর্ণনা করেছেন আর তিনি হচ্ছেন একজন প্রসিদ্ধ মুদাল্লিস বর্ণনাকারী।
৩। সনদের মধ্যে বর্ণনা করার ক্ষেত্রে মতভেদ সৃষ্টি হওয়া। [বিস্তারিত দেখুন মূল গ্রন্থ]।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হাদীসটিকে আমি এখানে উল্লেখ করেছি হাদীসটির দ্বিতীয়ার্ধের কারণে। কারণ প্রথমার্ধ সহীহ। প্রথমার্ধকে ইমাম মুসলিম (৪/৬০) প্রমুখ অন্য সূত্রে আবু হুরাইরাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ সেই সত্ত্বার কসম যার হাতে আমার আত্মা ...। এ সহীহ হাদীসেوليأتين قبري حتى يسلم علي، ولأردن عليه উল্লেখ করা হয় নি।
` ليس صدقة أعظم أجرا من الماء `.
ضعيف جدا
أخرجه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (2/1/152 - طبع دمشق) من طريق البيهقي
بسنده عن داود بن عطاء عن يزيد بن عبد الملك بن المغيرة النوفلي عن أبيه عن
يزيد بن خصيفة عن يزيد بن رومان عن سعيد بن أبي سعيد عن أبي هريرة عن النبي
صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
ومن طريق البيهقي أورده السيوطي في ` الجامع الصغير `، فقال المناوي:
رمز لحسنه (!) وفيه داود بن عطاء أورده الذهبي في ` الضعفاء والمتروكين
وقال:
` قال البخاري: متروك `.
ويزيد بن عبد الملك النوفلي ضعفوه.
وسعيد بن أبي سعيد قال ابن عدي: ` مجهول `. انتهى كلام المناوي.
قلت: سعيد هذا هو المقبري ما في ذلك ريب، وهو معروف بالإكثار من الرواية عن
أبي هريرة، وهو ثقة، لا دخل له في هذا الحديث، وإنما العلة من اللذين
ذكرهما قبله.
وقال في ` التيسير `:
` وإسناده ضعيف، وقول المؤلف: ` حسن ` ممنوع `.
১৪৫১। পানির চেয়ে বড় সাওয়াবের কোন সাদাকাহ্ নেই।
হাদীসটি খুবই দুর্বল।
হাদীসটিকে ইবনু আসাকির `তারীখু দেমাস্ক` গ্রন্থে (২/১/১৫২) বাইহাকীর সূত্রে তার সনদে দাউদ ইবনু আতা হতে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আব্দিল মালেক ইবনে মুগীরাহ নাওফালী হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু খুসায়ফাহ্ হতে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু রূমান হতে, তিনি সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ হতে, তিনি আবু হুরাইরাহু (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ ...।
বাইহাকীর সূত্রে সুয়ূতী হাদীসটিকে “আলজামেউস সাগীর” গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। আর মানবী বলেছেনঃ এটিকে তিনি হাসান হিসেবে চিহ্নিত করেছেন! অথচ এর সনদে দাউদ ইবনু আতা রয়েছেন যাকে হাফিয যাহাবী `আয-যুয়াফা অলমাতরূকীন` গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ ইমাম বুখারী বলেনঃ তিনি মাতরূক।
আর ইয়াযীদ ইবনু আব্দুল মালেক নাওফালীকে তারা (মুহাদ্দিসগণ) দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন।
আরেক বর্ণনাকারী সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ সম্পর্কে ইবনু আদী বলেনঃ তিনি মাজহুল (অপরিচিত)।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সাঈদ মাকবুরী হওয়ার ব্যাপারে কোন প্রকার সন্দেহ নেই। তিনিই আবু হুরাইরাহু (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বেশী বেশী হাদীস বর্ণনাকারী হিসেবে পরিচিত। তিনি নির্ভরযোগ্য। তার পক্ষ থেকে হাদীসটির মধ্যে কোন সমস্যা নেই। সমস্যা এসেছে তার পূর্বে উল্লেখিত দু'জন থেকে।
তিনি (মানবী) “আততায়সীর” গ্রন্থে বলেনঃ তার সনদটি দুর্বল। আর লেখক কর্তৃক কৃত উক্তি 'হাদীসটি হাসান' অসম্ভবমূলক।
` خمس ليال لا ترد فيهن الدعوة: اول ليلة من رجل، وليلة النصف من شعبان،
وليلة الجمعة، وليلة الفطر، وليلة النحر `.
موضوع
أخرجه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (10/275 - 276) من طريق أبي سعيد بندار بن
عمر بن محمد الروياني بسنده عن إبراهيم بن أبي يحيى عن أبي قعنب عن أبي أمامة
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.
أورده في ترجمة بندار هذا، وروى عن عبد العزيز النخشبي أنه قال:
` لا تسمع منه، فإنه كذاب `.
قلت: وإبراهيم بن أبي يحيى كذاب أيضا كما قال يحيى وغيره. وهو من شيوخ
الشافعي الذين خفي عليه حالهم.
وأبو قعنب، لم أعرفه.
والحديث أورده السيوطي في ` الجامع ` من هذا الوجه فأساء! ويبدو أن المناوي
لم يقف على إسناده، فلم يتكلم عليه بشيء، ولكنه قال:
` ورواه عن أبي أمامة أيضا الديلمي في ` الفردوس `، فما أوهمه صنيع المصنف من
كونه لم يخرجه أحد ممن وضع لهم الرموز غير سديد، ورواه البيهقي من حديث ابن
عمر، وكذا ابن ناصر والعسكري. قال ابن حجر: وطرقه كلها معلولة `.
قلت: ومن هذه الطرق ما أخرجه أبو بكر بن لال في ` أحاديث أبي عمران الفراء `
(ق 64/2) وابن عساكر أيضا (3/217/2) من طريق إبراهيم بن محمد بن برة
الصنعاني: حدثنا عبد القدوس بن الحجاج بن مرداس: حدثنا إبراهيم بن أبي يحيى
عن ابن معتب عن أبي أمامة به.
كذا وقع عند ابن لال: ` ابن معتب `، وعن ابن عساكر: ` أبو قعيب ` وعنده في
الطريق الأولى: ` أبي قعنب `، وكل ذلك مما لم يوجد، ولعل الصواب أبو معتب
وهو ابن عمرو الأسلمي، ذكره أبو حاتم في ` الصحابة ` ولا يثبت كما قال ابن
منده.
وعبد القدوس بن الحجاج الظاهر أنه أبو المغيرة الخولاني وهو ثقة، لكني لم أر
من سمى جده مرداسا.
وأما الراوي عنه ابن برة، فلم أعرفه، ولم يترجمه الحافظ في ` التبصير `
كعادته.
وبالجملة فمدار هذه الطريق على إبراهيم بن أبي يحيى الكذاب.
ثم رأيته في ` مسند الفردوس ` في نسخة مصورة مخرومة (ص 130) من طريق إبراهيم
ابن محمد بن مرة (كذا) الصنعاني: حدثنا عبد القدوس بن مرداس: حدثنا إبراهيم
ابن أبي يحيى به.
وفي ` الجرح والتعديل ` (3/1/56) :
` عبد القدوس بن إبراهيم بن عبيد الله بن مرداس العبدري من بني عبد الدار
الصنعاني روى عن إبراهيم بن عمر الصنعاني. روى عنه إسماعيل بن أبي أويس حديث
المائدة `.
فلعله هو هذا، لكن وقع منسوبا لجده، وقوله في الطريق المتقدمة: ` ابن
الحجاج ` من زيادات بعض النساخ.
ثم إن في ` الديلمي `: ` أبي قعنب ` كما في الطريق الأولى. والله أعلم.
১৪৫২। পাঁচটি রাত রয়েছে যেগুলোর মধ্যে দু'আ প্রত্যাখ্যাত হয় নাঃ রজব মাসের প্রথম রাত, মধ্য শা'বানের রাত (শবে বারাআত), জুম'আর রাত, ঈদুল ফিতরের রাত ও কুরবানীর রাত।
হাদীসটি বানোয়াট।
হাদীসটিকে ইবনু আসাকির `তারীখু দেমাস্ক` গ্রন্থে (১০/২৭৫-২৭৬) আবু সাঈদ বুন্দার ইবনে উমর ইবনে মুহাম্মাদ রূইয়ানী হতে, তার সনদে ইবরাহীম ইবনু আবী ইয়াহইয়া হতে, তিনি আবু কা'নাব হতে, তিনি আবু উমামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
তিনি হাদীসটিকে বুন্দারের জীবনী আলোচনা করতে গিয়ে উল্লেখ করেছেন। তিনি (ইবনু আসাকির) আব্দুল আযীদ নাখশাবী হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ তুমি তার থেকে শ্রবণ করো না, কারণ সে মিথ্যুক।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ইবরাহীম ইবনু আবী ইয়াহইয়াও মিথ্যুক যেমনটি ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন প্রমুখ বলেছেন। তিনি হচ্ছেন ইমাম শাফে'ঈর সেই শাইখদের অন্তর্ভুক্ত যাদের অবস্থা তার নিকট গোপনই রয়ে যায়। আর আবু কানাবকে আমি চিনি না।
হাদীসটিকে সুয়ূতী `আলজামে` গ্রন্থে এ সূত্রেই উল্লেখ করে ক্রটি করেছেন। মানবী হাদীসটির সনদ সম্পর্কে অবগত হতে পারেননি। এ কারণে তিনি কোন সমালোচনামূলক কিছুই বলেননি। তবে তিনি বলেছেনঃ আবু উমামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে দায়লামী `আল-ফিরদাউস` গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। ... বাইহাকী ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর হাদীস হতে বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে ইবনু নাসের ও আসকারীও বর্ণনা করেছেন। আর ইবনু হাজার বলেছেনঃ তার সব সূত্রগুলোই ক্রটিযুক্ত।
আমি (আলবানী) বলছিঃ প্রতিটি সূত্রের কেন্দ্রবিন্দু হচ্ছে মিথ্যুক ইবরাহীম ইবনু আবী ইয়াহইয়া। [অতএব হাদীসটি বানোয়াটই। বিস্তারিত দেখুন মূল গ্রন্থ]।
` سادة السودان أربعة: لقمان الحبشي، والنجاشي، وبلال، ومهجع `.
ضعيف
أخرجه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (10/1/330) من طريق أحمد بن شبويه: نا
سليمان بن صالح: حدثني عبد الله يعني ابن المبارك عن عبد الرحمن بن يزيد بن
جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، فإنه مع إرساله؛ فيه أحمد بن شبويه مجهول كما قال
الحافظ في ` اللسان `، وساق له حديثا من روايته عن محمد بن سلمة بإسناده إلى
ابن عباس وقال:
` والحديث باطل مركب على هذا الإسناد، والآفة منه أومن شيخه، فإنه ضعيف `.
والحديث أورده السيوطي في ` الجامع ` من طريق ابن عساكر، ويبدو أن المناوي
لم يتنبه لهذه الجهالة، فقال مستدركا عليه:
` ابن عساكر في ` تاريخه ` في ترجمة بلال من طريق ابن المبارك مصرحا فلوعزاه
المصنف إليه لكان أولى `!
قلت: كيف يصح عزوه إليه، والسند غير صحيح إليه، وهو لم يخرجه - فيما علمت
- في شيء من مصنفاته الثابتة النسبة إليه، مثل ` الزهد ` مثلا؟ !
وقد روي من وجه آخر معضلا بلفظ:
` خير السودان أربعة: لقمان، والنجاشي، وبلال، ومهجع `.
১৪৫৩। সুদানের সর্দার হচ্ছে চারজনঃ লোকমান হাবাশী, নাজাশী, বিলাল ও মাহ্জা।
হাদিসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে ইবনু আসাকির `তারীখু দেমাস্ক` (১০১/৩৩০) আহমাদ ইবনু শাবওয়াইহ সূত্রে সুলায়মান ইবনু সালেহ হতে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনুল মুবারাক হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ ইবনে জাবের হতে তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সনদটি দুর্বল। কারণ এটি মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও এর সনদের মধ্যে আহমাদ ইবনু শাবওয়াইহ রয়েছেন তিনি মাজহুল, যেমনটি হাফিয ইবনু হাজার “আল-লিসান” গ্রন্থে বলেছেন এবং তার একটি হাদীস তার বর্ণনায় মুহাম্মাদ ইবনু সালামাহ হতে তার সনদে আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেছেনঃ ...।
হাদীসটি বাতিল। সমস্যা তার থেকে অথবা তার শাইখ হতে। কারণ তিনি দুর্বল।
হাদিসটিকে সুয়ূতী `আল-জামে` গ্রন্থে ইবনু আসাকিরের সূত্রে উল্লেখ করেছেন। সম্ভবত মানবী এর মাজহুল হওয়ার বিষয়টি সতর্ক দৃষ্টিতে দেখেননি।
` خير السودان أربعة: لقمان، والنجاشي، وبلال، ومهجع `.
ضعيف
أخرجه ابن عساكر (10/330/331) من طريق أبي صالح عن معاوية عن الأوزاعي
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد معضل كما قال السيوطي في ` الجامع ` لأن الأوزاعي واسمه
عبد الرحمن بن عمرو من أتباع التابعين.
قلت: والسند إليه فيه ضعف لأن؛ أبا صالح وهو عبد الله أبي صالح كاتب الليث
متكلم فيه من قبل حفظه. قال الحافظ:
` صدوق كثير الغلط، ثبت في كتابه، وكانت فيه غفلة `.
وقد روي الحديث عن الأوزاعي موصولا بلفظ آخر وهو:
১৪৫৪। সুদানের সর্বোত্তম ব্যক্তিগণ হচ্ছেন চারজন লোকমান, নাজাশী, বিলাল ও মাহজা'।
হাদীসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে ইবনু আসাকির (১০/৩৩০/৩৩১) আবু সালেহ সূত্রে মুয়াবিয়্যাহ হতে, তিনি আওযাঈ হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সনদটি মু'যাল। যেমনটি সুয়ূতী “আলজামে” গ্রন্থে বলেছেন। কারণ আওযাঈ হচ্ছেন আব্দুর রহমান ইবনু আমর তিনি একজন তাবে তাবেঈ ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তার নিকট পর্যন্ত সনদও দুর্বল। কারণ আবু সালেহ হচ্ছেন লাইসের কাতেব আবদুল্লাহ আবূ সালেহ, তার হেফযে সমস্যা থাকার কারণে তার সমালোচনা করা হয়েছে। হাফিয ইবনু হাজার বলেনঃ তিনি সত্যবাদী বহু ভুলকারী, তার কিতাবের ক্ষেত্রে তিনি নির্ভরযোগ্য, তার মধ্যে গাফলতি ছিলো।
হাদীসটিকে আওযাঈ হতে মওসূল হিসেবে অন্য ভাষায় বর্ণনা করা হয়েছেঃ (দেখুন পরেরটি)
` خير السودان ثلاثة: لقمان، وبلال، ومهجع مولى رسول الله صلى الله عليه
وسلم `.
منكر
أخرجه الحاكم (3/284) : أخبرني إسماعيل بن محمد بن الفضل الشعراني: حدثنا
جدي: حدثنا الحكم عن الهقل بن زياد عن الأوزاعي: حدثني أبو عمار عن واثلة
ابن الأسقع رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره،
وقال:
` صحيح الإسناد `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` كذا قال: ` مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم ` ولا أعرف ذا `.
قلت: يشير إلى نكارة هذا القول، ولكنه لم يتكلم على الإسناد بشيء فأوهم
سلامته من قادح، وليس كذلك، فإن إسماعيل الشعراني هذا قد أورده الذهبي نفسه
في ` الميزان ` وقال:
` من شيوخ الحاكم، قال الحاكم: ارتبت في لقيه بعض الشيوخ. ثم قال: حدثنا
إسماعيل: حدثنا جدي.. `.
قلت: فذكر له بإسناد آخر عن أنس حديث ` طلب العلم فريضة على كل مسلم ` وقال:
` غريب فرد `.
فكأن الحاكم يشير بهذا إلى شكه في سماع إسماعيل من جده الفضل.
والفضل نفسه فيه كلام أيضا، فقد قال ابن أبي حاتم (3/2/69) :
` كتبت عنه بالري، وتكلموا فيه `.
ومن أجل هذا ذكره الذهبي أيضا في ` الميزان ` لكنه أتبع ذلك بقوله:
` وقال الحاكم: كان أديبا فقيها عابدا، عارفا بالرجال، كان يرسل شعره. قلت
: عرف بالشعراني، وهو ثقة، لم يطعن فيه بحجة، وقد سئل عنه الحسين القتباني
؟ فرماه بالكذب. قال: وسمعت أبا عبد الله بن الأخرم يسأل عنه، فقال: صدوق
إلا أنه كان غاليا في التشيع قلت: مات سنة اثنتين وثمانين ومائتين `.
قلت: وبالجملة فعلة هذا الإسناد، إنما هي إسماعيل الشعراني، فإنه مع تكلم
الحاكم في سماعه لا أعلم أحدا وثقه. مع النكارة التي في متنه، كما تقدم عن
الذهبي، وتبعه على ذلك الحافظ فإنه أورد مهجعا هذا في القسم الأول من `
الإصابة ` وقال:
` هو مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم. ذكره الحاكم في ` صحيحه ` من طريق
الهقل بن زياد.. (فذكر الحديث وقال:) قلت: وأخشى أن يكون الذي بعده `.
قلت: والذي بعده:
` مهجع العكي مولى عمر بن الخطاب. قال ابن هشام: أصله من (عك) ، فأصابه
سباء، فمن عليه عمر فأعتقه، وكان من السابقين إلى الإسلام، وشهد بدرا
واستشهد بها، وقال موسى بن عقبة: كان أول من قتل ذلك اليوم `.
فقد أخطأ الشعراني فجعل مهجعا هذا حبشيا مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم،
وهو عكي عربي مولى عمر. والله أعلم.
১৪৫৫। সুদানের সর্বোত্তম ব্যক্তি হচ্ছেন তিনজন লোকমান, বিলাল ও রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দাস মাহজা ।
হাদীসটি মুনকার।
হাদীসটিকে হাকিম (৩/২৮৪) ইসমাঈল ইবনু মুহাম্মাদ ইবনিল ফাযল শা'রানী হতে, তিনি তার দাদা হতে, তিনি হাকাম হতে, তিনি হাকল ইবনু যিয়াদ হতে, তিনি আওযাঈ হতে, তিনি আবু আম্মার হতে, তিনি ওয়াসিলাহ ইবনুল আসকা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
হাকিম বলেনঃ সনদটি সহীহ। আর হাফিয যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ তিনি এরূপই বলেছেনঃ `রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর দাস`। কিন্তু তাকে চিনি না।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি এ কথার দ্বারা মুনকার হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন। কিন্তু তিনি সনদের ব্যাপারে কোন সমালোচনামূলক কিছু না বলার কারণে সন্দেহ সৃষ্টি করছে যে, সনদটি হয়তো সমালোচনা থেকে নিরাপদ। কিন্তু আসলে তা নয়। কারণ ইসমাঈল শারানীকে হাফিয যাহাবী নিজে “আল-মীযান” গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ তিনি হাকিমের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত। হাকিম বলেনঃ আমি কোন কোন শাইখের সাথে তার সাক্ষাতের ব্যাপারে সন্দেহ পোষণ করি। অতঃপর বলেনঃ আমাকে ইসমাঈল হাদীস বর্ণনা করেছেন আর তিনি তার দাদা হতে বর্ণনা করেছেন ...।
হাকিম ইসমাঈল শা'রানীর আরেকটি হাদীস আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে ভিন্ন সনদে উল্লেখ করে বলেছেনঃ এটি গরীব। সম্ভবত তিনি এর দ্বারা ইসমাঈল কর্তৃক তার দাদা ফাযল হতে শ্রবণ করাকে সন্দেহযুক্ত হওয়ার দিকেই ইঙ্গিত করছেন। আর এ ফাযলের ব্যাপারেও সমালোচনা করা হয়েছে।
ইবনু আবী হাতিম (৩/২/৬৯) বলেনঃ তার থেকে রাই নামক স্থানে লিখেছি আর তারা তার ব্যাপারে সমালোচনা করেছেন।
` إن الرحمة لا تنزل على قوم فيهم قاطع رحم `.
ضعيف جدا
أخرجه البخاري في ` الأدب المفرد ` (63) وكذا الطبراني في ` الكبير ` وابن
عدي (ق 155/2) من طريق سليمان أبي إدام قال: سمعت عبد الله بن أبي أوفى يقول
: عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد واه جدا، سليمان هذا وهو ابن زيد المحاربي قال ابن معين:
` ليس بثقة، كذاب، ليس يسوى حديثه فلسا `.
وقال النسائي:
` متروك الحديث `.
وقال أبو حاتم:
` ليس بقوي `.
وقال الهيثمي في ` المجمع ` (8/151) :
` رواه الطبراني، وفيه أبو إدام المحاربي وهو كذاب `.
১৪৫৬। সেই সম্প্রদায়ের প্রতি (আল্লাহর) রহমত নাযিল হবে না যাদের মধ্যে আত্মীয়তার সম্পর্ক ছিন্নকারী রয়েছে।
হাদীসটি খুবই দুর্বল।
হাদীসটিকে ইমাম বুখারী “আলআদাবুল মুফরাদ” গ্রন্থে (৬৩), ত্ববারানী অনুরূপভাবে “আলমুজামুল কাবীর” গ্রন্থে ও ইবনু আদী (কাফ ২/১৫৫) সুলায়মান আবু ইদাম সূত্রে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ আমি আব্দুল্লাহ ইবনু আবী আউফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ ...।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এ সনদটি খুবই দুর্বল। সুলায়মান হচ্ছেন ইবনু যায়েদ আল মুহারিবী। তার সম্পর্কে ইবনু মাঈন বলেনঃ তিনি নির্ভরযোগ্য নন। তিনি মিথ্যুক, তার হাদীস এক পয়সার সমতুল্যও নয়। নাসাঈ বলেনঃ তিনি মাতরূকুল হাদীস। আবু হাতিম বলেনঃ তিনি শক্তিশালী নন। হায়সামী `আলমাজমা` গ্রন্থে (৮/১৫১) বলেনঃ হাদীসটিকে ত্ববারানী বর্ণনা করেছেন। আর তার সনদের মধ্যে আবু ইদাম মুহারিবী রয়েছেন তিনি মিথ্যুক।
` من سأل في المساجد فاحرموه `.
لا أصل له
كما قال السيوطي في ` الحاوي للفتاوي ` (1/120) ، وهو من الأحاديث التي وقعت
في كتاب ` المدخل ` لابن الحاج (1/310) ، وكم فيه من الأحاديث الضعيفة
والموضوعة، وما لا أصل له، وهو في هذا شبيه بكتاب ` الإحياء ` للغزالي،
كما لا يخفى على من درس الكتابين من أهل العلم.
ثم قال السيوطي:
` وإنما قلنا بالكراهة أخذا من حديث النهي عن نشد الضالة في المسجد، ويلحق
به ما في معناه، من البيع والشراء ونحوها، وكراهة رفع الصوت في
المسجد بالعلم وغيره `.
وقد استدل السيوطي على جواز السؤال والتصدق عليه في المسجد بالحديث الآتي
وقواه، ولما كان ضعيف الإسناد كان لا بد من أن أورده لأكشف عن علته فقلت:
` هل منكم أحد أطعم اليوم مسكينا؟ فقال أبو بكر رضي الله عنه: دخلت المسجد
فإذا أنا بسائل، فوجدت كسرة خبز في يد عبد الرحمن، فأخذتها منه، فدفعتها
إليه `.
১৪৫৭। যে ব্যক্তি মাসজিদগুলোর মধ্যে চাইবে তাকে তোমরা বঞ্চিত করো।
হাদিসটির কোন ভিত্তি নেই।
যেমনটি সুয়ূতী `আলহাবী লিলফাতাওয়া` গ্রন্থে (১/১২০) বলেছেন। এটি সেই সব হাদীসগুলোর একটি যেগুলো ইবনুল হাজের `আলমাদখাল` গ্রন্থে (১/৩১০) উল্লেখ করা হয়েছে। আর এ গ্রন্থের মধ্যে কতই না দুর্বল, বানোয়াট ও ভিত্তিহীন হাদীসের সমাবেশ ঘটেছে। এ দিক থেকে এ কিতাবটি গাযালীর “ইহইয়াউল উলুমুদ্দীন” গ্রন্থের ন্যায়। আর বিষয়টি দু'গ্ৰন্থ পাঠকারী জ্ঞানী ব্যক্তিদের নিকট অস্পষ্ট নয়।
অতঃপর সুয়ুতী বলেন ; আমরা মসজিদের মধ্যে চাওয়াকে মাকরূহ বলেছিলাম, মসজিদের মধ্যে হারিয়ে যাওয়া বস্তু ঘোষণা দিয়ে অনুসন্ধান করা নিষেধ হওয়া মর্মে বর্ণিত হাদীস দ্বারা দলীল গ্রহণ করে। আর এ নিষেধ অনুরূপ ভাবার্থের বস্তুগুলোকেও সম্পৃক্ত করবে যেমন ক্রয়-বিক্রয় ও ভাড়া দেয়া ইত্যাদি এবং মসজিদের মধ্যে উঁচু আওয়াজে কথা ইত্যাদি।
ইমাম সুয়ূতী মসজিদের মধ্যে চাওয়া এবং সাদাকাহ করা জায়েয হওয়ার স্বপক্ষে নিম্নের হাদীস দ্বারা দলীল গ্রহণ করেছেন। যেহেতু হাদীসটির সনদ দুর্বল সে কারণে হাদীসটির সমস্যা প্রকাশ করার লক্ষ্যে আমি এখানে উল্লেখ করলামঃ (দেখুন পরের হাদিস)
` هل منكم أحد أطعم اليوم مسكينا؟ فقال أبو بكر رضي الله عنه: دخلت المسجد
فإذا أنا بسائل، فوجدت كسرة خبز في يد عبد الرحمن، فأخذتها منه، فدفعتها
إليه `.
منكر
أخرجه أبو داود (1/265) والحاكم (1/412) وعنه البيهقي (4/199) من طريق
مبارك بن فضالة عن ثابت البناني عن عبد الرحمن بن أبي ليلى عن عبد الرحمن بن
أبي بكر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال الحاكم:
` صحيح على شرط مسلم `! ووافقه الذهبي!
قلت: وهذا من عجائبهما، ولا سيما الذهبي؛ فإنه أورد المبارك هذا في `
الضعفاء والمتروكين ` وقال:
` ضعفه أحمد والنسائي، وكان يدلس `.
فأنت تراه قد عنعنه، ثم هو مع ذلك ليس من رجال مسلم! ! ومن هذا تعلم أن قول
النووي في ` شرح المهذب `:
` رواه أبو داود بإسناد جيد ` ليس بجيد وإن أقره السيوطي في ` الحاوي للفتاوي
` (1/118) ! !
ومما يؤكد ضعف الحديث بهذا السياق أنه قد صح من حديث أبي هريرة مرفوعا نحوه.
وليس فيه أن تصدق أبي بكر رضي الله عنه كان في المسجد، أخرجه مسلم وغير،
وهو مخرج في الكتاب الآخر ` الصحيحة ` (رقم 88) .
وإذا عرفت ذلك فلا يستقيم استدلال السيوطي بالحديث على أن الصدقة على السائل
في المسجد ليست مكروهة، وأن السؤال فيه ليس بمحرم، والله أعلم.
১৪৫৮। তোমাদের কেউ এমন আছে কি যে আজ মিসকীনকে খাবার দিয়েছে? আবু বাকর বললেনঃ আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম এ সময় এক ভিক্ষুককে পেলাম সে (কিছু) চাচ্ছে। এমতাবস্থায় আমি আব্দুর রহমানের হাতে রুটির একটা টুকরো দেখে তার কাছ থেকে টুকরোটি নিয়ে সে ভিক্ষুককে দিয়ে দিলাম।
হাদীসটি মুনকার।
হাদীসটিকে আবু দাউদ (১/২৬৫), হাকিম (১/৪১২) ও তার থেকে বাইহাকী (৪/১৯৯) মুবারাক ইবনু ফুযালাহু সূত্রে সাবেত বুনানী হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবী লাইলাহ হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন তিনি বলেনঃ রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ ...।
হাকিম বলেনঃ হাদীসটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ। হাফিয যাহাবীও তার সাথে ঐকমত্য পোষণ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এরূপ সিদ্ধান্ত তাদের দু'জনের নিকট থেকে বর্ণিত আজব ধরনের সিদ্ধান্তগুলোর একটি আজব সিদ্ধান্ত। বিশেষ করে হাফিয যাহাবী হতে। কারণ তিনিই এ মুবারাককে `আয-যুয়াফা অলমাতরূকীন` গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ তাকে ইমাম আহমাদ ও নাসাঈ দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন এবং তিনি তাদলীস করতেন।
আপনি দেখছেন তিনি হাদীসটিকে আন্ আন্ করে বর্ণনা করেছেন। এছাড়াও তিনি ইমাম মুসলিমের বর্ণনাকারী নন। এ থেকে জানা যায় যে, ইমাম নাবাবী যে, “শারহুল মুহাযযাব” গ্রন্থে বলেছেনঃ হাদীসটিকে আবু দাউদ ভালো সনদে বর্ণনা করেছেন, এ কথাটা ভালো (ঠিক) হয়নি। যদিও ইমাম সুয়ূতী `আলহাবী লিলফাতাওয়া` গ্রন্থে (১/১১৮) তাকে সমর্থন করেছেন।
এ হাদীসটি দুর্বল হওয়াকে আরো শক্তিশালী করছে আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসেবে বর্ণিত অনুরূপ সহীহ হাদীস। যার মধ্যে আবু বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের মধ্যে সাদাকাহ করেন কথাটি নেই। এটিকে ইমাম মুসলিম প্রমুখ বর্ণনা করেছেন। সেটিকে আমি `সিলসিলাহ্ সহীহাহ` গ্রন্থে (৮৮) উল্লেখ করেছি।
আপনি যখন এ বিষয়টি সম্পর্কে অবগত হলেন তখন ইমাম সুয়ুতী কর্তৃক এ হাদীস দ্বারা এ মর্মে দলীল গ্রহণ করা সঠিক হয়নি যে, মসজিদের মধ্যে সাহায্য প্রার্থীকে সাদাকাহ্ করা মাকরূহ নয় এবং মসজিদের মধ্যে চাওয়া হারাম নয়।
` ليس لقاتل وصية `.
موضوع
رواه الطبراني في ` الأوسط ` (1/152/2 - مجمع البحرين) والدارقطني في ` سننه
` (4/236/115) والبيهقي (6/281) عن بقية عن مبشر بن عبيد عن حجاج بن أرطاة
عن عاصم عن زر عن علي، وقال الطبراني:
` لا يروى عن علي إلا بهذا الإسناد، تفرد به بقية `.
قلت: وهو مدلس، ومثله حجاج بن أرطاة، لكن الآفة من الذي بينهما، وبه
أعله الدارقطني فقال:
` مبشر بن عبيد متروك الحديث يضع الحديث `.
وقال البيهقي:
` تفرد به مبشر بن عبيد الحمصي وهو منسوب إلى وضع الحديث، وإنما ذكرت هذا
الحديث لتعرف روايته `.
قلت: وقال الإمام أحمد:
` روى عنه بقية وأبو المغيرة أحاديث موضوعة كذب `.
وقال مرة:
` يضع الحديث `.
وقال البخاري:
` منكر الحديث `.
وقال ابن حبان في ` الضعفاء والمتروكين ` (3/30) :
` روى عن الثقات الموضوعات، لا يحل كتب حديثه إلا على جهة التعجب `.
ومما ذكرنا عن هؤلاء الأئمة يظهر تقصير الهيثمي أوتساهله في قوله في ` المجمع
` (4/214) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` وفيه بقية، وهو مدلس `!
وأسوأ منه عملا السيوطي؛ فإنه أورد الحديث في ` الجامع الصغير ` الذي نص في
مقدمته أنه صانه عما تفرد به وضاع أوكذاب! وقد تعقبه المناوي في ` فيض القدير ` بقوله:
` قال (يعني الذهبي) في ` المهذب `:
(فيه مبشر بن عبيد؛ منسوب إلى الوضع، وقال أحمد: أحاديثه منكرة، وقال
البخاري: منكر الحديث) `.
فمن العجيب حقا أن يتساهل المناوي أيضا وبعد أن نقل هذا، فيقول في ` التيسير `: ` ضعيف؛ لضعف مبشر (الأصل: بشر) بن عبيد `!
১৪৫৯। হত্যাকারী ব্যক্তির জন্য কোন অসিয়্যাত নেই।
হাদীসটি বানোয়াট।
হাদীসটিকে ত্ববারানী “আলমুজামুল আওসাত” গ্রন্থে (১/১৫২/২), দারাকুতনী তার `সুনান` গ্রন্থে (৪/২৩৬/১১৫) ও বাইহাকী বাকিয়্যাহ হতে, তিনি মুবাশশির ইবনু ওবায়েদ হতে, তিনি হাজ্জাজ ইবনু আরতাত হতে, তিনি আসেম হতে, তিনি যারর হতে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। দারাকুতনী বলেনঃ আলী হতে একমাত্র এ সনদেই বর্ণনা করা হয়ে থাকে। এটিকে বাকিয়্যাহ্ এককভাবে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি মুদ্দাল্লিস বর্ণনাকারী। আর হাজ্জাজ ইবনু আরতাত তার মতই। তবে হাদীসটির সমস্যা হচ্ছে তাদের উভয়ের মাঝের বর্ণনাকারী। দারাকুতনী তার দ্বারায় সমস্যা বর্ণনা করে বলেছেনঃ মুবাশশির ইবনু ওবায়েদ মাতরূকুল হাদীস, হাদীস জালকারী।
বাইহাকী বলেনঃ মুবাশশির ইবনু ওয়ায়েদ হিমসী এটিকে এককভাবে বর্ণনা করেছেন। তিনি হাদীস জাল করার দোষে দোষী। আমি এ হাদীসটিকে উল্লেখ করেছি যাতে তার বর্ণনা সম্পর্কে ধারণা পাওয়া যায়।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ইমাম আহমাদ বলেনঃ তার থেকে বাকিয়্যাহ্ এবং আবুল মুগীরাহ বানোয়াট ও মিথ্যা হাদীস বর্ণনা করেছেন।
তিনি আরেকবার বলেনঃ তিনি হাদীস জালকারী। ইমাম বুখারী বলেনঃ তিনি মুনকারুল হাদীস।
ইবনু হিব্বান `আয-যুয়াফা অলমাতরূকীন` গ্রন্থে (৩/৩০) বলেনঃ তিনি নির্ভরযোগ্যদের উদ্ধৃতিতে বানোয়াট হাদীস বর্ণনা করেন। আশ্চর্য হওয়ার উদ্দেশ্য ছাড়া তার হাদীস লিখাই বৈধ নয়।
উপরের আলোচিত ইমামগণের মন্তব্য থেকে স্পষ্ট হয় যে, হায়সামী যে `আলমাজমা` গ্রন্থে (৪/২১৪) বলেছেনঃ এর সনদে বাকিয়্যাহ্ রয়েছেন, আর তিনি হচ্ছেন মুদাল্লিস। এর দ্বারা তিনি শিথিলতা প্রদর্শন করেছেন।
আর সুয়ূতী আরো ত্রুটিযুক্ত কাজ করেছেন হাদিসটিকে `আলজামে'উস সাগীর` গ্রন্থে উল্লেখ করে। অথচ তিনি এ গ্রন্থের ভূমিকাতে লিখেছেনঃ তিনি গ্রন্থটিকে জালকারী অথবা মিথ্যুক ব্যক্তির একক বর্ণনা থেকে হেফাযাত করেছেন।
এ কারণে মানবী “ফায়যুল কাদীর” গ্রন্থে তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ হাফিয যাহাবী “আলমুহাযযাব” গ্রন্থে বলেনঃ এর সনদে মুবাশশির ইবনু ওবায়েদ রয়েছেন তিনি জাল করার দোষে দোষী। আর ইমাম আহমাদ বলেনঃ তার হাদীসগুলো মুনকার। ইমাম বুখারী বলেনঃ তিনি মুনকারুল হাদীস। আশ্চর্যের ব্যাপার এই যে, এতো কিছু বর্ণনা করার পরেও মানবী `আত-তায়সীর` গ্রন্থে শিথিলতা প্রদর্শন করে বলেছেনঃ হাদিসটি দুর্বল, মুবাশশির ইবনু ওবায়েদ দুর্বল হওয়ার কারণে।
` الله الله فيمن ليس له [ناصر] إلا الله `.
ضعيف
أخرجه ابن عدي في ` الكامل ` (ق 137/1) : حدثنا أحمد بن عمر بن المهلب أبو
الطيب المصري: حدثنا عيسى بن إبراهيم بن مثرود: حدثنا رشدين بن سعد عن
إبراهيم بن نشيط عن ابن حجيرة الأكبر عن أبي هريرة. قال رسول الله
صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال:
` وهذا الحديث كتبته عن جماعة عن عيسى بن مثرود، ولم يقل في هذا الإسناد أحد
: ` عن أبي هريرة ` إلا ابن المهلب هذا، وغيره يرسله `.
قلت: وابن المهلب هذا لم أجد له ترجمة، والإسناد ضعيف مسندا ومرسلا،
وعيسى بن إبراهيم بن مثرود ذكره ابن أبي حاتم (3/1/272) برواية ابن خزيمة
عنه، ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا.
وشيخه رشدين بن سعد معروف بالضعف لسوء حفظه، وفي ` التقريب `:
` ضعيف، رجح أبو حاتم عليه ابن لهيعة. وقال ابن يونس: كان صالحا في دينه،
فأدركته غفلة الصالحين، فخلط في الحديث `.
والحديث قال المناوي في ` الفيض `:
` رمز المصنف لضعفه، وهو مما بيض له الديلمي `.
قلت: ولم يتكلم المناوي على إسناده بشيء، فكأنه لم يقف عليه.
১৪৬০। আল্লাহই সাহায্যকারী সেই ব্যক্তির জন্য আল্লাহ্ ছাড়া যার কোনই সাহায্যকারী নেই।
হাদীসটি দুর্বল।
হাদীসটিকে ইবনু আদী `আলকামেল` গ্রন্থে (কাফ ১/১৩৭) আহমাদ ইবনু উমার ইবনিল মুহাল্লাব আবুত ত্বাইয়্যিব মিসরী হতে, তিনি ঈসা ইবনু ইবরাহীম ইবনু মাসরূদ হতে, তিনি রুশদীন ইবনু সা'দ হতে, তিনি ইবরাহীম ইবনু নাশীদ হতে, তিনি ইবনু হুজায়রাহ আকবার হতে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন, রসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেনঃ ...।
ইবনু আদী বলেনঃ এ হাদীসটিকে আমি একদল বর্ণনাকারী হতে লিখেছি, তারা ঈসা ইবনু মাসরুদ হতে বর্ণনা করেছেন। এ সনদের মধ্যে ইবনুল মুহাল্লাব ছাড়া অন্য কেউ আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেননি। তিনি ছাড়া অন্যরা হাদীসটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ইবনু মুহাল্লাবের জীবনী পাচ্ছি না। আর সনদটি মুসনাদ এবং মুরসাল উভয়ভাবেই দুর্বল।
ঈসা ইবনু ইবরাহীম ইবনে মাসরূদকে ইবনু আবী হাতিম (৩/১/২৭২) ইবনু খুযায়মার বর্ণনায় উল্লেখ করে তার সম্পর্কে ভালো-মন্দ কিছুই বলেননি।
তার শাইখ রুশদীন ইবনু সা'দ হেফযে ক্রটি থাকার কারণে দুর্বল হওয়ার দিক থেকে পরিচিত।
“আত-তাকরীব” গ্রন্থে এসেছেঃ তিনি দুর্বল। ইবনু ইউনুস বলেনঃ তিনি দ্বীনী ব্যাপারে নেককার লোক ছিলেন। তাকে অমনোযোগিতা পেয়ে বসে, ফলে তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে গোলমাল করে ফেলেন।