সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ
(إن الله لطف الملكين الحافظين حتى أجلسهما على الناجذين (1) ، وجعل لسانه قلمهما، وريقه مدادهما) .
موضوع
أخرجه أبو الشيخ في ` طبقات الأصيهانيين ` (ق 51/1) ، وأبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (2/1
/1) ، والديلمي (1/2/236) عن نعيم بن المورع عن علي بن سالم عن مكحول عن معاذ بن جبل مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد موضوع، آفته نعيم هذا، قال النسائي:
` ليس بثقة `. وقال ابن عدي:
` يسرق الحديث، وعامة ما يرويه غير محفوظ `.
وقال الحاكم وأبو سعيد النقاش:
` روى عن هشام أحاديث موضوعة `.
وعلي بن سالم، إن كان ابن شوال فضعيف. وإن كان علي بن أبي طلحة:
(1) يعني سنَّيْه الضاحكين، وهما اللذان بين الناب والأضراس. ` نهاية `
سالم مولى بني العباس الذي يروي عن ابن عباس ولم يره فهو صدوق قد يخطىء، كما قال الحافظ.
(নিশ্চয় আল্লাহ্ তা'আলা হাফেয (সংরক্ষণকারী) ফেরেশতাদ্বয়ের প্রতি অনুগ্রহ করেছেন, এমনকি তিনি তাদেরকে (মানুষের) দুটি নাজিযের (1) উপর বসিয়েছেন এবং তার জিহ্বাকে তাদের কলম বানিয়েছেন, আর তার লালাকে তাদের কালি বানিয়েছেন)।
মাওদ্বূ (জাল)
এটি বর্ণনা করেছেন আবূশ শাইখ তাঁর ‘তাবাকাতুল আসবাহানিয়্যীন’ (খন্ড ৫১/১), আবূ নুআইম তাঁর ‘আখবারু আসবাহান’ (২/১/১) এবং দায়লামী (১/২/২৩৬) নাঈম ইবনুল মুওয়াররি' হতে, তিনি আলী ইবনু সালিম হতে, তিনি মাকহূল হতে, তিনি মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' সূত্রে।
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি মাওদ্বূ (জাল)। এর ত্রুটি হলো এই নাঈম (ইবনুল মুওয়াররি')। নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘সে নির্ভরযোগ্য নয়।’ ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘সে হাদীস চুরি করত, এবং সে যা বর্ণনা করে তার অধিকাংশই অসংরক্ষিত (গায়র মাহফূয)।’ হাকিম এবং আবূ সাঈদ আন-নাক্কাশ বলেছেন: ‘সে হিশামের সূত্রে মাওদ্বূ (জাল) হাদীস বর্ণনা করেছে।’
আর আলী ইবনু সালিম, যদি সে ইবনু শাওয়াল হয়, তবে সে যঈফ (দুর্বল)। আর যদি সে আলী ইবনু আবী তালহা: সালিম মাওলা বানী আব্বাস হয়, যে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করে কিন্তু তাকে দেখেনি, তবে সে সাদূক (সত্যবাদী), তবে সে ভুল করতে পারে, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন।
(১) অর্থাৎ তার হাসি উদ্রেককারী দাঁতদ্বয়, যা শ্ব-দন্ত (ক্যানাইন) ও মাড়ির দাঁতের মাঝখানে থাকে। [নিহায়া]
(الصيام جنة ما لم يخرقه بكذبه أو بغيبة) .
ضعيف جدا
أخرجه أبو الشيخ في ` أحاديثه ` (ق 15/2) ، والأصبهاني في ` الترغيب ` (214/2) من طريق الربيع بن بدر عن يونس عن الحسن عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، الربيع بن بدر متروك، كما قال الحافظ الهيثمي في ` المجمع ` (3/171) ، وخرجه من رواية الطبراني في ` الأوسط ` (3/128/1546 - مجمع البحرين ط) .
وقد روي الشطر الأول منه من حديث أبي عبيدة، وإسناده ضعيف خلافا لمن حسنه، كما بينته في
` تخريح الترغيب ` (2/97) ، و ` الضعيفة ` أيضا (6438) .
وأما قوله: ` الصيام جنة ` فقد صح عن أبي هريرة وغيره، وهو مخرج في ` الإوراء ` (18) وغيره.
(রোযা ঢালস্বরূপ, যতক্ষণ না সে তার মিথ্যা বা গীবত দ্বারা তা ছিন্ন করে ফেলে।)
খুবই যঈফ
আবূশ শাইখ তাঁর ‘আহাদীসুহূ’ (ক্ব ১৫/২) এবং আল-আসবাহানী ‘আত-তারগীব’ (২/২১৪)-এ রবী‘ ইবনু বাদ্রের সূত্রে ইউনুস হতে, তিনি আল-হাসান হতে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই যঈফ। আর-রাবী‘ ইবনু বাদ্র মাতরূক (পরিত্যক্ত), যেমনটি হাফিয আল-হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৭১)-এ বলেছেন। আর তিনি (আল-হাইসামী) এটি ত্বাবারানীর ‘আল-আওসাত্ব’ (৩/১২৮/১৫৪৬ - মাজমাউল বাহরাইন সংস্করণ)-এর বর্ণনা হতেও তাখরীজ করেছেন।
এর প্রথম অংশ আবূ উবাইদাহর হাদীস হতেও বর্ণিত হয়েছে, আর এর সনদ যঈফ, যদিও কেউ কেউ এটিকে হাসান বলেছেন (যা সঠিক নয়)। যেমনটি আমি ‘তাখরীজুত তারগীব’ (২/৯৭) এবং ‘আয-যঈফাহ’ (৬৪৩৮)-এও স্পষ্ট করে দিয়েছি।
আর তাঁর এই উক্তি: ‘আস-সিয়ামু জুন্নাহ’ (রোযা ঢালস্বরূপ) আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্যদের সূত্রে সহীহ প্রমাণিত। আর এটি ‘আল-ইরওয়া’ (১৮) এবং অন্যান্য গ্রন্থে তাখরীজ করা হয়েছে।
(إذا سئل أحدكم: أمؤمن أنت؟ فلا يشك) .
منكر
أخرجه ابن جرير الطبري في ` تهذيب الآثار ` (2/186) ، قال: حدثني، وأبو نعيم في ` الحلية ` (7/238) من طريق أحمد بن حماد بن سيفان قالا: حدثنا أحمد بن بديل: حدثنا أبو معاوية: حدثنا مسعر، عن زياد بن علاقة، عن عبد الله بن يزيد الأنصاري مرفوعا. وقال أبو نعيم:
` تفرد برفعه أحمد بن بديل عن أبي معاوية `.
قلت: يشير إلى نكارة رفعه، وذلك لسببين:
أحدهما - وهو الأقوى - أن أحمد بن بديل مضعف من قبل حفظه، كما قال ابن عدي في ` الكامل ` (1/186) .
` له أحاديث لا يتابع عليها عن قوم ثقات، وهو ممن يكتب حديثه مع ضعفه `.
وقد خالفه ثقة حافظ من رجال الشيخين، فقال ابن أبي شيبة في ` كتاب الإيمان ` (9 - 10/27 - بتحقيقي) : حدثنا وكيع عن مسعر به موقوفا على (عبد الله بن يزيد) .
وهذا إسناد صحيح، رجاله ثقات كلهم رجال الشيخين، وعبد الله بن يزيد الأنصاري، الراجح عندي أنه (الخطمي) ، صحابي صغير، ولي الكوفة لابن الزبير.
والحديث ذكره الهيثمي في ` المجمع ` (1/55) من حديث عبد الله بن يزيد - كذا - الأنصاري مرفوعا، وقال:
` رواه الطبراني في ` الكبير ` وفي إسناده أحمد بن بديل، وثقه النسائي وأبو حاتم، وضعفه آخرون `.
قلت: وفيما ذكر نظر من وجهين:
الأولى: التوثيق، ففيه خطأ وتسامح.
أما الخطأ، فقوله: ` أبو حاتم `، والصواب: (ابن أبي حاتم) ، فإنه لم يحك
عن أبيه شيئا في (أحمد بن بديل) ، ولا عن غيره، وإنما قال هو من عنده (1/43) :
` ومحله الصدق `.
وكذلك غزوه إليه في ` التهذيب `.
وأما التسامح، فهو نسبته التوثيق إليهما، فقد عرفت آنفا ما قال ابن أبي حاتم فيه، وذلك لا يساوي عنده أنه ثقة، بل هو دونه كما نص عليه في مقدمة كتابه (1/37) ، وذلك يساوي عندي أنه وسط حسن الحديث عنده.
ونحو يقال فيما نسب إلى النسائي، فإنه لم يوثقه، وإنما قال: لا بأس به `. كما قال في ` التهذيب `.
وذلك يساوي أيضا أنه وسط. ولذلك قال الحافظ الذهبي في ` الكاشف `:
` قال (س) : لا بأس به، ولسنه ابن عدي والدارقطني، وكان عابدا `.
ولخص ذلك الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق له أوهام `.
قلت: ورفعه لهذا الحديث - خلافا للثقة الحافظ - مما يؤكد وهمه.
وأما الوجه الآخر: فقوله: ` عبد الله بن زيد `، وقد أشرت آنفا إليه، وذلك لأن (زيد) تحريف (يزيد) خلافا لزعم الأخ الداراني، فإنه أثبت المحرف (زيد) في طبعته لـ ` مجمع الزوائد ` وعلق عليه بقوله (1/354) :
` في (مص) وعند أبي نعيم ` يزيد `، وهو تحريف `!
وهذا من عجائب تعليقاته، وبالغ أخطائه، وبيان ذلك من الوجوه الآتية:
أولا: لم يذكر عمدته فيما ادعاه من التحريف.
ثانيا: ما عند أبي نعيم موافق لما في ` كتاب الإيمان ` كما سبق.
ثالثا: ومطابق أيضا لرواية أخرى عنده (10/32) من طريق الشيباني، عن ابن علاقة، عن عبد الله بن يزيد النصاري قال:
` تسموا باسمكم الذي سماكم الله به؛ بـ (الحنيفية) و (الإسلام) ، و (الإيمان) `.
وإسناده صحيح.
رابعا: وهو رواية الطبراني أيضا، ولم يققف عليها الداراني.
خامسا: وهو كذلك في ` الجامع الكبير ` للسيوطي (1/62) برواية الطبراني.
سادسا: قوله: ` في (مص) وعند أبي نعيم.. ` إلخ.
قلت: كل ما سبق من الوجوه مما يبطل زعم الأخ الداراني التحريف المذكور يعود جلها إلى عدم اطلاعه عليها، فالخطب سهل، ولكن العجب من مخالفته لما في (مص) ، وهو رمز يشير به إلى النسخة المصرية التي اعتمد عليها في تحقيق ` مجمع الزوائد `، وحق له ذلك، فإنها أصح النسخ المخطوطة عنده، لأنها قرئت على المؤلف الهيثمي من قبل ثلاثة من العلماء أحدهم الحافظ ابن حجر العسقلاني تلميذ الهيثمي، كما نص على ذلك في المقدمة (45) ، فكيف استجاز مخالفتها، ودون أن يذكر عمدته في ذلك إلا مجرد الدعوى؟ !
وإن من أوهامه أنه وثق أحمد بن بديل، وقد عرفت الضعف الذي فيه الدال على أنه جرح مفسر، فإعراضه عنه، مما يدل على جهله أو تجاهله لما عليه العلماء من القواعد العلمية، وهذا شائع - مع الأسف - في تعليقاته بصورة رهيبة جدا،
يضاف إلى ذلك أنه ليس لديه ثقافة عامة وحفظ للأحاديث النبوية، ولا معرفة - بالأولى - بالآثار السلفية، فإن ذلك مما يساعد الباحث على أن يكون أبعد ما يمكن عن التتابع والوقوع في الأخطاء. وها هو المثال بين أيدينا: (أحمد بن بديل) ، فقد دلتنا أقوال أئمة الجرح أنه (وسط) ، فمن كان كذلك، فحديثه معرض للوهن والضعف والنكارة بالمخالفة كما سبق.
وهنا شيء آخر، وهو أنه مخالف للآثار السلفية المجمعة على أن الإيمان يزيد وينقص، وأن زيادته بالطاعة، وقد تفرع منه جواز الاستثناء فيما إذا سئل المؤمن - كما في الآثار - : هل أنت مؤمن؟ أن يقول: أنا مؤمن إن شاء الله. خلافا لما في حديث ابن بديل. وذلك مشروح في كتب السنة والعقيدة، ومنها كتاب الإمام الطبري المتقدم ` تهذيب الآثار `، وغيرها، فليرجع إليها من شاء، فمن كان على علم بها مسبقا،؟ كان عونا له على تحقيق القول في حديث ابن بديل والقطع بأنه حديث منكر. والله الموفق.
هذا؛ ولفظ الحديث عند الطبراني كلفظة الترجمة، وقد أورده السيوطي في ` جامعيه ` بزيادة: ` في إيمانه `، وعزاه في ` الكبير ` للطبراني وأبي نعيم، وفي ` الصغير ` للطبراني وحده! وقد عرفت أنه لا أصل لها عند المصدرين المذكورين، فلعلها سبق قلم من السيوطي رحمه الله تعالى.
(যখন তোমাদের কাউকে জিজ্ঞাসা করা হয়: তুমি কি মুমিন? তখন সে যেন সন্দেহ না করে)।
মুনকার
এটি ইবনু জারীর আত-তাবারী তাঁর ‘তাহযীবুল আসার’ (২/১৮৬) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাকে বর্ণনা করেছেন, এবং আবূ নুআইম ‘আল-হিলইয়াহ’ (৭/২৩৮) গ্রন্থে আহমাদ ইবনু হাম্মাদ ইবনু সাইফান-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়ে বলেন: আমাদেরকে আহমাদ ইবনু বুদাইল বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে আবূ মুআবিয়াহ বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে মিসআর, যিয়াদ ইবনু ইলাকাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আর আবূ নুআইম বলেছেন:
‘আহমাদ ইবনু বুদাইল আবূ মুআবিয়াহ হতে এটি মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করার ক্ষেত্রে একক।’
আমি (আলবানী) বলি: তিনি এর মারফূ‘ হওয়ার মুনকার হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন, আর এর কারণ দুটি:
প্রথমটি – আর এটিই অধিক শক্তিশালী – হলো এই যে, আহমাদ ইবনু বুদাইল তাঁর মুখস্থশক্তির কারণে দুর্বল হিসেবে গণ্য। যেমনটি ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ (১/১৮৬) গ্রন্থে বলেছেন:
‘তার এমন কিছু হাদীস রয়েছে, যেগুলোর ক্ষেত্রে তিনি নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের থেকে বর্ণনা করলেও তার অনুসরণ করা হয় না। দুর্বলতা থাকা সত্ত্বেও তার হাদীস লেখা যায় এমন ব্যক্তিদের মধ্যে সে একজন।’
আর তাকে শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবীগণের অন্তর্ভুক্ত একজন নির্ভরযোগ্য হাফিয (স্মৃতিশক্তিধর) ব্যক্তি বিরোধিতা করেছেন। ইবনু আবী শাইবাহ ‘কিতাবুল ঈমান’ (৯-১০/২৭ – আমার তাহকীককৃত) গ্রন্থে বলেছেন: আমাদেরকে ওয়াকী‘, মিসআর হতে এই হাদীসটি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আর এই সনদটি সহীহ, এর সকল রাবী নির্ভরযোগ্য এবং তারা শাইখাইন-এর রাবী। আর আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে আমার নিকট প্রাধান্যপ্রাপ্ত মত হলো যে, তিনি হলেন (আল-খাতমী), একজন ছোট সাহাবী, যিনি ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে কূফার শাসক ছিলেন।
আর হাদীসটি হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (১/৫৫) গ্রন্থে আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ – এভাবেই – আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে মারফূ‘রূপে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘এটি তাবারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। এর সনদে আহমাদ ইবনু বুদাইল রয়েছেন, যাকে নাসায়ী ও আবূ হাতিম নির্ভরযোগ্য বলেছেন, আর অন্যরা দুর্বল বলেছেন।’
আমি (আলবানী) বলি: তিনি যা উল্লেখ করেছেন, তাতে দুটি দিক থেকে পর্যালোচনার অবকাশ রয়েছে:
প্রথমত: নির্ভরযোগ্যতা (তাওসীক), এতে ভুল ও শিথিলতা রয়েছে।
ভুলের দিকটি হলো, তাঁর উক্তি: ‘আবূ হাতিম’, অথচ সঠিক হলো: (ইবনু আবী হাতিম)। কারণ তিনি (ইবনু আবী হাতিম) তাঁর পিতা (আবূ হাতিম) হতে আহমাদ ইবনু বুদাইল সম্পর্কে কিছুই বর্ণনা করেননি, না অন্য কারো থেকে। বরং তিনি নিজেই (১/৪৩) বলেছেন:
‘তার অবস্থান হলো সত্যবাদিতা।’
অনুরূপভাবে ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থেও তার দিকেই (ইবনু আবী হাতিম) এই মতটি আরোপ করা হয়েছে।
আর শিথিলতার দিকটি হলো, তাদের উভয়ের দিকে নির্ভরযোগ্যতার (তাওসীক) মত আরোপ করা। আপনি ইতোপূর্বে জেনেছেন যে, ইবনু আবী হাতিম তার সম্পর্কে কী বলেছেন। আর এটি তার নিকট ‘সিকাহ’ (নির্ভরযোগ্য) হওয়ার সমতুল্য নয়, বরং তার চেয়ে নিম্নমানের, যেমনটি তিনি তার কিতাবের মুকাদ্দিমাহ (১/৩৭) তে স্পষ্ট করেছেন। আর আমার নিকট এর অর্থ হলো, তিনি মধ্যম মানের এবং তার নিকট তার হাদীস ‘হাসান’ (গ্রহণযোগ্য)।
অনুরূপ কথা নাসায়ী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর দিকে যা আরোপ করা হয়েছে, সে সম্পর্কেও বলা যায়। কারণ তিনি তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি, বরং বলেছেন: ‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’ যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে বলা হয়েছে।
আর এর অর্থও হলো যে, তিনি মধ্যম মানের। এই কারণে হাফিয আয-যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তিনি (নাসায়ী) বলেছেন: তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই। আর ইবনু আদী ও দারাকুতনী তাকে দুর্বল বলেছেন, আর তিনি ছিলেন একজন ইবাদতকারী।’
আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে এর সারসংক্ষেপ করেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে তার কিছু ভুলভ্রান্তি রয়েছে।’
আমি (আলবানী) বলি: আর নির্ভরযোগ্য হাফিযের বিপরীত গিয়ে এই হাদীসটিকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করা তার ভুলভ্রান্তিকেই নিশ্চিত করে।
আর দ্বিতীয় দিকটি হলো: তাঁর উক্তি: ‘আব্দুল্লাহ ইবনু যায়িদ’, আমি ইতোপূর্বে এর দিকে ইঙ্গিত করেছি। কারণ (যায়িদ) হলো (ইয়াযীদ)-এর বিকৃতি, যা ভাই আদ্-দারানী-এর দাবির বিপরীত। কারণ তিনি ‘মুজমাউয যাওয়াইদ’-এর তার সংস্করণে বিকৃত নাম (যায়িদ) কে সাব্যস্ত করেছেন এবং এর উপর মন্তব্য করে বলেছেন (১/৩৫৪):
‘(মিম-সোয়াদ) [মিসরীয় কপি] এবং আবূ নুআইম-এর নিকট ‘ইয়াযীদ’ রয়েছে, আর এটি বিকৃতি!’
আর এটি তার মন্তব্যগুলোর মধ্যে আশ্চর্যজনক এবং তার মারাত্মক ভুলগুলোর অন্তর্ভুক্ত। এর ব্যাখ্যা নিম্নোক্ত দিকগুলো থেকে স্পষ্ট হয়:
প্রথমত: তিনি বিকৃতির যে দাবি করেছেন, তার পক্ষে কোনো প্রমাণ উল্লেখ করেননি।
দ্বিতীয়ত: আবূ নুআইম-এর নিকট যা রয়েছে, তা ‘কিতাবুল ঈমান’-এ যা রয়েছে, তার সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ, যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।
তৃতীয়ত: এটি তার নিকট (১০/৩২) শায়বানী-এর সূত্রে, ইবনু ইলাকাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আন-নাসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত অন্য একটি বর্ণনার সাথেও হুবহু মিলে যায়, যেখানে তিনি বলেছেন:
‘তোমরা সেই নামে নিজেদের নামকরণ করো, যে নামে আল্লাহ তোমাদের নামকরণ করেছেন; (আল-হানিফিয়্যাহ), (আল-ইসলাম) এবং (আল-ঈমান) দ্বারা।’
আর এর সনদ সহীহ।
চতুর্থত: এটি তাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এরও বর্ণনা, যা আদ্-দারানী খুঁজে পাননি।
পঞ্চমত: অনুরূপভাবে এটি সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-জামি‘উল কাবীর’ (১/৬২) গ্রন্থে তাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনা হিসেবে রয়েছে।
ষষ্ঠত: তার উক্তি: ‘(মিম-সোয়াদ) [মিসরীয় কপি] এবং আবূ নুআইম-এর নিকট...’ ইত্যাদি।
আমি (আলবানী) বলি: পূর্বোক্ত সকল দিক যা ভাই আদ্-দারানী-এর উল্লিখিত বিকৃতির দাবিকে বাতিল করে, তার অধিকাংশই তার অনবধানতার কারণে ঘটেছে, তাই বিষয়টি সহজ। কিন্তু আশ্চর্যের বিষয় হলো, তিনি (মিম-সোয়াদ)-এ যা রয়েছে, তার বিরোধিতা করেছেন। আর এটি এমন একটি প্রতীক, যা দ্বারা তিনি মিসরীয় পাণ্ডুলিপির দিকে ইঙ্গিত করেন, যার উপর তিনি ‘মুজমাউয যাওয়াইদ’-এর তাহকীক করার সময় নির্ভর করেছেন। আর তার জন্য এটিই সঠিক ছিল, কারণ এটিই তার নিকট সবচেয়ে সহীহ পাণ্ডুলিপি, কেননা এটি তিনজন আলিমের দ্বারা মূল লেখক হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সামনে পাঠ করা হয়েছিল, যাদের মধ্যে একজন হলেন হাফিয ইবনু হাজার আল-আসকালানী, যিনি হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ছাত্র ছিলেন, যেমনটি তিনি মুকাদ্দিমাহ (৪৫)-এ স্পষ্ট করেছেন। তাহলে তিনি কীভাবে এর বিরোধিতা করার সাহস পেলেন, আর তার পক্ষে কোনো প্রমাণ উল্লেখ না করে কেবল দাবির উপর নির্ভর করলেন?!
আর তার ভুলগুলোর মধ্যে এটিও রয়েছে যে, তিনি আহমাদ ইবনু বুদাইলকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। অথচ আপনি তার মধ্যে বিদ্যমান দুর্বলতা সম্পর্কে জেনেছেন, যা স্পষ্ট জারহ (দোষারোপ)-এর প্রমাণ দেয়। তাই তার পক্ষ থেকে এটি এড়িয়ে যাওয়া প্রমাণ করে যে, তিনি আলিমগণের বৈজ্ঞানিক নীতিগুলো সম্পর্কে অজ্ঞ অথবা তিনি তা উপেক্ষা করেছেন। আর দুঃখের বিষয় হলো, তার মন্তব্যগুলোতে এটি অত্যন্ত ভয়াবহভাবে প্রচলিত।
এর সাথে যোগ করা যায় যে, তার সাধারণ জ্ঞান এবং নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীস মুখস্থ নেই, আর সালাফী আসার (পূর্বসূরিদের উক্তি) সম্পর্কে তো জ্ঞান নেই বললেই চলে। অথচ এগুলো একজন গবেষককে অনুসরণ এবং ভুল করার হাত থেকে যথাসম্ভব দূরে থাকতে সাহায্য করে। আর এই উদাহরণটি আমাদের সামনেই রয়েছে: (আহমাদ ইবনু বুদাইল)। জারহ (দোষারোপ)-এর ইমামগণের উক্তি আমাদের দেখিয়েছে যে, তিনি (মধ্যম মানের)। আর যে ব্যক্তি এমন, তার হাদীস বিরোধিতার কারণে দুর্বলতা, যঈফ হওয়া এবং মুনকার হওয়ার ঝুঁকিতে থাকে, যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।
এখানে আরেকটি বিষয় রয়েছে, আর তা হলো, এই হাদীসটি সালাফী আসার (পূর্বসূরিদের উক্তি)-এর বিরোধী, যা এই বিষয়ে ঐকমত্য পোষণ করে যে, ঈমান বাড়ে ও কমে, আর তা আনুগত্যের মাধ্যমে বাড়ে। আর এর থেকে এই শাখা বের হয়েছে যে, যখন কোনো মুমিনকে জিজ্ঞাসা করা হয় – যেমনটি আসারসমূহে রয়েছে – ‘তুমি কি মুমিন?’ তখন তার জন্য বলা জায়েয: ‘আমি মুমিন, ইনশাআল্লাহ।’ যা ইবনু বুদাইল-এর হাদীসের বিপরীত। আর এই বিষয়টি সুন্নাহ ও আকীদা বিষয়ক কিতাবসমূহে বিস্তারিত ব্যাখ্যা করা হয়েছে, যার মধ্যে ইমাম তাবারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পূর্বে উল্লিখিত কিতাব ‘তাহযীবুল আসার’ এবং অন্যান্য কিতাবও রয়েছে। যে কেউ চাইলে সেগুলোতে ফিরে যেতে পারে। সুতরাং, যে ব্যক্তি এই বিষয়ে পূর্ব থেকে জ্ঞান রাখে, তা তাকে ইবনু বুদাইল-এর হাদীস সম্পর্কে চূড়ান্ত সিদ্ধান্ত নিতে এবং এটিকে মুনকার হাদীস হিসেবে নিশ্চিত করতে সাহায্য করবে। আর আল্লাহই তাওফীকদাতা।
এই হলো অবস্থা; আর তাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট হাদীসের শব্দাবলী অনুচ্ছেদের শব্দের মতোই। আর সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আল-জামি‘আয়ন’ (উভয় জামি‘) গ্রন্থে অতিরিক্ত শব্দসহ এটি উল্লেখ করেছেন: ‘তার ঈমানের ব্যাপারে’, এবং ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে তিনি এটিকে তাবারানী ও আবূ নুআইম-এর দিকে এবং ‘আস-সাগীর’ গ্রন্থে কেবল তাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর দিকে সম্পর্কিত করেছেন! অথচ আপনি জেনেছেন যে, উল্লিখিত উভয় উৎসে এই অতিরিক্ত শব্দের কোনো ভিত্তি নেই। সম্ভবত এটি সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কলমের ভুল ছিল।
(إن الماء لا ينجسه شيء، إلا ما غلب على ريحه، وطعمه، ولونه) .
ضعيف
أخرجه ابن ماجه (521) ، والدارقطني في ` سننه ` (ص 11) ، والبيهقي (1/295) من طريق رشدين بن سعد: أنبأنا معاوية بن صالح عن
راشد بن سعد عن أبي أمامة الباهلي (وفي رواية للدارقطني: عن ثوبان) قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. وليس في حديث ثوبان ذكر اللون.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله كلهم ثقات غير رشدين بن سعد، قال الحافظ:
` ضعيف، رجح أبو حاتم عليه ابن لهيعة، وقال ابن يونس: كان صالحا في دينه فأدركته غفلة الصالحين، فخلط في الحديث `.
ولذلك قال الدارقطني عقبه:
` لم يرفعه غير رشدين بن سعد عن معاوية بن صالح؛ وليس بالقوي، والصواب في قول راشد `.
كذا الأصل، ولعله صوابه: ` والصواب أنه من قول راشد `.
فقد قال البيهقي:
` ورواه أبو أسامة عن الأحوص عن ابن عون وراشد بن سعد من قولهما والحديث غير قوي، إلا أنا لا نعلم في نجاسة الماء إذا تغير بالنجاسة خلافا `.
قلت: لكن لم يتفرد به رشدين، فقد رواه الأحوص بن حكيم عن راشد بن سعد قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
أخرجه الطحاوي في ` شرح المعاني ` (1/9) .
وهذا شاهد لا بأس به في الجملة، فإن الأحوص بن حكيم ضعيف الحفظ كما قال الحافظ، وقد أرسله، فلم يذكر في إسناده أبا أمامة.
وتابعه عطية بن بقية بن الوليد: حدثنا أبي عن ثور بن يزيد عن راشد بن سعد
عن أبي أمامة مرفوعا به.
أخرجه البيهقي (1/259 - 260) .
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات كلهم غير عطية بن بقية، قال ابن أبي حاتم (3/1/381) :
` كتبت عنه، ومحله الصدق، وكانت فيه غفلة `.
وذكره ابن حبان في ` الثقات ` وقال:
` يخطىء ويغرب، يعتبر حديثه إذا روى عن أبيه غير الأشياء المدلسة `.
قلت: فليس لهذا الإسناد علة قادحة غير عنعنة بقية.
وتابعه حفص بن عمر: حدثنا ثور بن يزيد به.
أخرجه ابن عدي في ` الكامل ` (ق 101/2) والبيهقي، وقال ابن عدي:
` وهذا الحديث ليس يوصله عن ثور إلا حفص بن عمر، ورواه رشدين بن سعد عن معاوية بن صالح عن راشد بن سعد عن أبي أمامة موصولا أيضا، ورواه الأحوص بن حكيم مع ضعفه عن راشد بن سعد عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، ولا يذكر أبا أمامة `.
قلت: وحفص بن عمر هو الأيلي واه جدا؛ كذبه أبو حاتم وغيره، فلا يستشهد به، وإني لأخشى أن يكون بقية تلقاه عنه ثم دلسه!
وبالجملة؛ فالحديث ضعيف لعدم وجود شاهد معتبر له تطمئن النفس إليه، فإن مدار الحديث على راشد بن سعد كما رأيت، وقد اختلف عليه، فمنهم من رفعه عنه، ومنهم من أوقفه، ومن رفعه؛ منهم من أسنده، ومنهم من أرسله، وكل
من المسند والمرسل ضعيف لا يحتج بحديثه، على أنه لو كان المرسل ثقة، ولكان علة قادحة في الحديث، فكيف ومرسله ضعيف؟ !
ومن هذا التحقيق يتبين أن قول العلامة السيد محمد بن إدريس القادري في رسالته ` إزالة الدهش والوله عن المتحير في صحة حديث ماء زمزم لما شرب له ` (ص 4) :
` وهذا الحديث عندي حسن لغيره، أو لنفسه، فإن رشدين أحد رواته الذي ضعفوا الحديث لأجله هو وإن ضعفه ابن حبان وقال: إنه متروك … فقد حسن له الترمذي، وقال المنذري: مختلف في الاحتجاج به، وقال الإمام أحمد أيضا فيه: ليس به بأس في الرقائق، أرجو أنه صالح الحديث `.
قلت: فهذا التحسين بنوعيه فيه نظر عندي:
أما الأول، فلما سبق بيانه من فقدان الشاهد المعتبر له، ومن غرائب هذا السيد أنه قال عقب كلامه السابق:
` وللحديث شواهد منها حديث أحمد والطبراني في ` الوسط ` عن عائشة مرفوعا: ` الماء لا ينجسه شيء ` قال الأسيوطي: حسن، ومنها حديث الدارقطني في ` الأفراد ` عن ثوبان مرفوعا: ` الماء طهور إلا ما غلب على ريحه وطعمه `، ومنها حديث الطبراني عن ابن عباس مرفوعا في شأن الحجر الأسود وكان أبيض كالماء كما يأتي `.
قلت: ووجه الغرابة من وجوه:
أولا: أن حديث عائشة ليس فيه ذكر اللون؛ وهو محل الشاهد في الحديث عنده، ومثله حديث ثوبان.
ثانيا: أن حديث عائشة قد جاء من حديث أبي سعيد أيضا وابن عباس، فاقتصاره على ذكر حديثها قصور ظاهر، راجع ` صحيح أبي داود `.
ثالثا: أن حديث ثوبان لا يصح جعله شاهدا لحديث أبي أمامة، لأن مدارهما على رشدين كما عرفت، وهو من ضعفه جعله مرة من حديث هذا، ومرة من حديث هذا.
رابعا: أن حديث ابن عباس ضعيف، ومع ذلك قوله: ` كالماء `، تحرف عليه تبعا للمناوي وهذا تبعا للسيوطي في ` جامعيه `، والصواب ` كالمهاة `، هكذا هو في ` كبير الطبراني ` و ` أوسطه `، وكذلك رواه أبو الحجاج الأدمي من طريق أبي نعيم الأصبهاني؛ وقد خرجته في ` الصحيحة ` تحت الحديث (2619) شاهدا.
(নিশ্চয়ই পানিকে কোনো কিছু অপবিত্র করে না, তবে যদি তার গন্ধ, স্বাদ ও রং পরিবর্তন করে দেয়।)
যঈফ (দুর্বল)
এটি ইবনু মাজাহ (৫২১), দারাকুতনী তাঁর ‘সুনান’ গ্রন্থে (পৃ. ১১) এবং বাইহাকী (১/২৯৫) রুশদীন ইবনু সা’দ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে মু’আবিয়াহ ইবনু সালিহ সংবাদ দিয়েছেন, তিনি রাশিদ ইবনু সা’দ হতে, তিনি আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে (আর দারাকুতনীর এক বর্ণনায়: সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে) বর্ণনা করেন যে, তিনি (আবূ উমামাহ/সাওবান) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। সাওবানের হাদীসে রঙের উল্লেখ নেই।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর সকল বর্ণনাকারী সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), শুধুমাত্র রুশদীন ইবনু সা’দ ব্যতীত। হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘যঈফ (দুর্বল)। আবূ হাতিম তার (রুশদীনের) উপর ইবনু লাহী’আহকে প্রাধান্য দিয়েছেন। ইবনু ইউনুস বলেছেন: সে তার দ্বীনের ক্ষেত্রে নেককার ছিল, কিন্তু নেককারদের অসতর্কতা তাকে পেয়ে বসেছিল, ফলে সে হাদীস বর্ণনায় তালগোল পাকিয়ে ফেলেছিল।’
আর একারণেই দারাকুতনী এর পরপরই বলেছেন: ‘মু’আবিয়াহ ইবনু সালিহ হতে রুশদীন ইবনু সা’দ ব্যতীত আর কেউ এটিকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করেনি; আর সে শক্তিশালী নয়। সঠিক হলো এটি রাশিদ-এর উক্তি।’ মূল কিতাবে এমনই আছে, সম্ভবত এর সঠিক রূপ হলো: ‘সঠিক হলো এটি রাশিদ-এর উক্তি (মাওকূফ)।’
বাইহাকী বলেছেন: ‘আবূ উসামাহ এটি আল-আহওয়াস হতে, তিনি ইবনু ‘আওন ও রাশিদ ইবনু সা’দ হতে তাদের উভয়ের উক্তি হিসেবে বর্ণনা করেছেন। হাদীসটি শক্তিশালী নয়, তবে অপবিত্রতার কারণে যখন পানির পরিবর্তন ঘটে, তখন তার অপবিত্র হওয়া নিয়ে আমরা কোনো মতভেদ জানি না।’ আমি বলি: কিন্তু রুশদীন এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। আল-আহওয়াস ইবনু হাকীম এটি রাশিদ ইবনু সা’দ হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
এটি ত্বাহাবী ‘শারহুল মা’আনী’ গ্রন্থে (১/৯) সংকলন করেছেন।
সামগ্রিকভাবে এই শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) মন্দ নয়। তবে আল-আহওয়াস ইবনু হাকীম দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন। আর তিনি এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন, কারণ তিনি তাঁর সনদে আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি। তাকে অনুসরণ করেছেন আতিয়্যাহ ইবনু বাক্বিয়্যাহ ইবনু আল-ওয়ালীদ: তিনি বলেন, আমাদেরকে আমার পিতা সাওব ইবনু ইয়াযীদ হতে, তিনি রাশিদ ইবনু সা’দ হতে, তিনি আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন।
এটি বাইহাকী (১/২৫৯-২৬০) সংকলন করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদের সকল বর্ণনাকারী সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), শুধুমাত্র আতিয়্যাহ ইবনু বাক্বিয়্যাহ ব্যতীত। ইবনু আবী হাতিম (৩/১/৩৮১) বলেছেন: ‘আমি তার নিকট থেকে লিখেছি, তার অবস্থান হলো সত্যবাদী হিসেবে, তবে তার মধ্যে অসতর্কতা ছিল।’ ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিক্বাত’ (নির্ভরযোগ্যদের তালিকা)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘সে ভুল করে এবং অপরিচিত হাদীস বর্ণনা করে। তার হাদীস গ্রহণযোগ্য হবে যদি সে তার পিতা হতে এমন বিষয়গুলো ব্যতীত বর্ণনা করে যা তাদলিস (সনদ গোপন) করা হয়েছে।’ আমি বলি: এই সনদে বাক্বিয়্যাহ-এর ‘আনআনাহ’ (আন শব্দ দ্বারা বর্ণনা) ব্যতীত আর কোনো মারাত্মক ত্রুটি নেই।
তাকে অনুসরণ করেছেন হাফস ইবনু উমার: তিনি বলেন, আমাদেরকে সাওব ইবনু ইয়াযীদ এটি বর্ণনা করেছেন।
এটি ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (খ. ১০১/২) এবং বাইহাকী সংকলন করেছেন। ইবনু আদী বলেছেন: ‘এই হাদীসটি সাওব হতে হাফস ইবনু উমার ব্যতীত আর কেউ মাওসূল (সংযুক্ত সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেনি। আর রুশদীন ইবনু সা’দও এটি মু’আবিয়াহ ইবনু সালিহ হতে, তিনি রাশিদ ইবনু সা’দ হতে, তিনি আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মাওসূল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর আল-আহওয়াস ইবনু হাকীম তার দুর্বলতা সত্ত্বেও রাশিদ ইবনু সা’দ হতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করেননি।’
আমি বলি: আর এই হাফস ইবনু উমার হলেন আল-আইলী, যিনি অত্যন্ত দুর্বল (ওয়াহী জিদ্দান)। আবূ হাতিম এবং অন্যান্যরা তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। সুতরাং তার দ্বারা শাহেদ পেশ করা যাবে না। আর আমি আশঙ্কা করি যে, বাক্বিয়্যাহ হয়তো তার নিকট থেকে এটি গ্রহণ করেছেন, অতঃপর তা তাদলিস করেছেন! মোটকথা; হাদীসটি যঈফ (দুর্বল), কারণ এর কোনো নির্ভরযোগ্য শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) পাওয়া যায়নি, যার প্রতি মন আশ্বস্ত হতে পারে। যেমনটি আপনি দেখেছেন, এই হাদীসের কেন্দ্রবিন্দু হলো রাশিদ ইবনু সা’দ। আর তার উপর মতভেদ হয়েছে। তাদের মধ্যে কেউ কেউ এটিকে মারফূ’ করেছেন, আবার কেউ কেউ মাওকূফ করেছেন। আর যারা মারফূ’ করেছেন, তাদের মধ্যে কেউ কেউ মুসনাদ (সংযুক্ত) করেছেন, আবার কেউ কেউ মুরসাল (বিচ্ছিন্ন) করেছেন। মুসনাদ এবং মুরসাল উভয়ের বর্ণনাকারীই দুর্বল, যাদের হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায় না। যদি মুরসাল বর্ণনাকারী সিকাহও হতেন, তবুও তা হাদীসের জন্য মারাত্মক ত্রুটি হতো, তাহলে যখন তার মুরসাল বর্ণনাকারীই দুর্বল, তখন অবস্থা কেমন হবে?!
এই তাহক্বীক্ব (গবেষণা) থেকে স্পষ্ট হয়ে যায় যে, আল্লামা সাইয়্যেদ মুহাম্মাদ ইবনু ইদরীস আল-ক্বাদরী তাঁর রিসালাহ ‘ইযালাতুল দাহশ ওয়াল ওয়ালাহ আনিল মুতাহাইয়্যির ফী সিহহাতি হাদীসি মা-ই যমযাম লিমা শুরিবা লাহ’ (পৃ. ৪)-এ যে উক্তি করেছেন: ‘এই হাদীসটি আমার নিকট হাসান লি-গাইরিহী (অন্যের কারণে হাসান) অথবা হাসান লি-নাফসিহী (স্বয়ং হাসান), কারণ রুশদীন হলেন এর একজন বর্ণনাকারী, যার কারণে তারা হাদীসটিকে দুর্বল বলেছেন। যদিও ইবনু হিব্বান তাকে দুর্বল বলেছেন এবং বলেছেন যে, সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)... তবুও তিরমিযী তার জন্য তাহসীন (হাসান হিসেবে গণ্য) করেছেন। আর মুনযিরী বলেছেন: তার দ্বারা প্রমাণ পেশ করা নিয়ে মতভেদ রয়েছে। আর ইমাম আহমাদও তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘রাক্বা-ইক্ব (নরম হৃদয়ের বিষয়)-এর ক্ষেত্রে তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই। আমি আশা করি যে, সে সালিহুল হাদীস (গ্রহণযোগ্য হাদীস বর্ণনাকারী)।’
আমি বলি: আমার মতে, এই দুই প্রকারের তাহসীন (হাসান গণ্য করা) প্রশ্নবিদ্ধ: প্রথমত, এর কোনো নির্ভরযোগ্য শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) না থাকার কারণে, যা পূর্বে ব্যাখ্যা করা হয়েছে। আর এই সাইয়্যেদ সাহেবের অদ্ভুত বিষয়গুলোর মধ্যে এটিও যে, তিনি তার পূর্বের বক্তব্যের পরে বলেছেন: ‘এই হাদীসের কিছু শাহেদ রয়েছে, তার মধ্যে একটি হলো আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে আহমাদ ও ত্বাবারানীর ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণিত হাদীস: ‘পানিকে কোনো কিছু অপবিত্র করে না।’ আস-সুয়ূতী বলেছেন: হাসান। আর তার মধ্যে একটি হলো সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে দারাকুতনীর ‘আল-আফরাদ’ গ্রন্থে বর্ণিত হাদীস: ‘পানি পবিত্রকারী, তবে যদি তার গন্ধ ও স্বাদ পরিবর্তন করে দেয়।’ আর তার মধ্যে একটি হলো ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে ত্বাবারানীতে বর্ণিত হাদীস, যা হাজারে আসওয়াদ (কালো পাথর)-এর প্রসঙ্গে এসেছে এবং তা পানির মতো সাদা ছিল, যেমনটি পরে আসছে।’
আমি বলি: অদ্ভুত হওয়ার কারণগুলো কয়েকটি: প্রথমত: আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে রঙের উল্লেখ নেই; অথচ এটিই তার নিকট হাদীসের শাহেদের মূল স্থান। সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসও অনুরূপ। দ্বিতীয়ত: আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকেও এসেছে। সুতরাং শুধু তার হাদীস উল্লেখ করা স্পষ্ট ত্রুটি। ‘সহীহ আবূ দাঊদ’ দেখুন। তৃতীয়ত: সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসকে আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের শাহেদ হিসেবে গণ্য করা সঠিক নয়, কারণ আপনি যেমনটি জেনেছেন, উভয়ের কেন্দ্রবিন্দু হলো রুশদীন। আর সে তার দুর্বলতার কারণে একবার এটিকে এর হাদীস থেকে, আবার আরেকবার ওটির হাদীস থেকে বর্ণনা করেছে। চতুর্থত: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি যঈফ (দুর্বল)। এতদসত্ত্বেও তার উক্তি: ‘পানির মতো’—এটি আল-মুনাভীর অনুসরণ করে বিকৃত হয়েছে, আর এটি আস-সুয়ূতীর ‘জাওয়ামি’ গ্রন্থের অনুসরণ করে হয়েছে। সঠিক হলো ‘আল-মাহা-এর মতো’ (অর্থাৎ স্বচ্ছ স্ফটিকের মতো)। ত্বাবারানীর ‘আল-কাবীর’ ও ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে এমনই আছে। অনুরূপভাবে আবূল হাজ্জাজ আল-আদমী এটি আবূ নু’আইম আল-আসফাহানীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন; আর আমি এটিকে ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (২৬১৯) নং হাদীসের অধীনে শাহেদ হিসেবে উল্লেখ করেছি।
(من تحبب إلى الناس بما يحبون، وبارز الله بما يكرهون لقي الله وهو عليه غضبان) .
موضوع
أخرجه الطبراني في ` الوسط ` (رقم -
(যে ব্যক্তি মানুষের কাছে প্রিয় হতে চায় তারা যা পছন্দ করে তার মাধ্যমে, এবং আল্লাহর সামনে প্রকাশ্যভাবে এমন কাজ করে যা তিনি অপছন্দ করেন, সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যখন তিনি তার উপর রাগান্বিত।)
মাওদ্বূ
এটি ত্ববারানী সংকলন করেছেন তাঁর ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে (নং -)
(إذا عطس الرجل والإمام يخطب يوم الجمعة فيشمت) .
ضعيف جدا
أخرجه البيهقي (3/223) من طريق الشافعي وهذا في
` مسنده ` (ص 24) : أنبأ إبراهيم عن هشام عن الحسن عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، فإنه مع كونه مرسلا فيه إبراهيم - وهو ابن محمد بن أبي يحيى الأسلمي - وهو متهم، وقال الحافظ:
` متروك `.
(যখন কোনো ব্যক্তি জুমুআর দিন খুতবারত অবস্থায় ইমামের সামনে হাঁচি দেয়, তখন তার হাঁচির জবাব দেওয়া হবে)।
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)
বাইহাকী এটি বর্ণনা করেছেন (৩/২২৩) শাফিঈর সূত্রে। আর এটি রয়েছে তাঁর ‘মুসনাদে’ (পৃ. ২৪)-এ: ইবরাহীম আমাদের অবহিত করেছেন হিশাম থেকে, তিনি হাসান থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে। তিনি (হাসান) বলেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
আমি বলি: আর এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)। কারণ এটি মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও এতে ইবরাহীম রয়েছে—আর তিনি হলেন ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবী ইয়াহইয়া আল-আসলামী—আর তিনি মুত্তাহাম (অভিযুক্ত)। আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।
(إذا عمل أحدكم عملا فليتقنه، فإنه مما يسلي بنفس المصاب) .
ضعيف جدا
أخرجه ابن سعد (1/141 - 142) من طريق طلحة بن عمرو عن عطاء قال:
لما سوي جدثه (يعني إبراهيم بن محمد عليه السلام كأن رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى كالحجر في جانب الجدث، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يسوي بأصبعه ويقول: فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا؛ فإن طلحة بن عمرو - وهو الحضرمي المكي - متروك كما قال الحافظ، ثم هو مرسل.
(যখন তোমাদের কেউ কোনো কাজ করে, তখন সে যেন তা নিখুঁতভাবে করে। কেননা, এটা বিপদগ্রস্তের আত্মাকে সান্ত্বনা দেয়।)
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)
এটি ইবনু সা'দ (১/১৪১ - ১৪২) তালহা ইবনু আমর-এর সূত্রে আতা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন:
যখন তাঁর কবর সমান করা হচ্ছিল (অর্থাৎ ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ আলাইহিস সালাম-এর কবর), তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কবরের একপাশে পাথরের মতো কিছু দেখতে পেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর আঙুল দিয়ে তা সমান করতে লাগলেন এবং বললেন: (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন)।
আমি বলি: আর এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল); কেননা তালহা ইবনু আমর - যিনি আল-হাদরামী আল-মাক্কী - তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত), যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন। উপরন্তু, এটি মুরসাল।
(إذا كان الغلام لم يطعم الطعام صب على بوله، وإذا كانت الجارية غسله) .
ضعيف
رواه الطبراني في ` الأوسط ` (11/2 - من ترتيبه) عن إسماعيل بن مسلم عن الحسن عن أمه عن أم سلمة مرفوعا. وقال:
` لم يروه عن الحسن عن أمه إلا إسماعيل `.
قلت: وهو المكي؛ وهو ضعيف.
وقد صح عن أم سلمة موقوفا عليها من فعلها، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (403) ، والأحاديث المرفوعة ليس فيه ذكر الطعام، وقد خرجت بعضها في المصدر المذكور (398 - 400) .
(যখন বালক খাদ্য গ্রহণ না করে, তখন তার পেশাবের উপর পানি ছিটিয়ে দাও। আর যখন বালিকা হয়, তখন তা ধৌত করো।)
যঈফ
এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে (১১/২ – তাঁর বিন্যাস অনুযায়ী) ইসমাঈল ইবনু মুসলিম হতে, তিনি আল-হাসান হতে, তিনি তাঁর মাতা হতে, তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে। আর তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন:
‘আল-হাসান হতে, তাঁর মাতা হতে এটি ইসমাঈল ব্যতীত আর কেউ বর্ণনা করেননি।’
আমি (আলবানী) বলি: তিনি হলেন মাক্কী (মক্কার অধিবাসী); আর তিনি যঈফ (দুর্বল)।
আর এটি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তাঁর নিজস্ব আমল হিসেবে মাওকূফ সূত্রে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। আর এটি ‘সহীহ আবূ দাঊদ’ (৪০৩)-এ সংকলিত হয়েছে।
আর মারফূ’ হাদীসসমূহে খাদ্যের উল্লেখ নেই। আমি সেগুলোর কিছু অংশ উল্লিখিত উৎসে (৩৯৮ – ৪০০) সংকলন করেছি।
(إذا سميتم محمدا فلا تضربوه ولا تحرموه) .
ضعيف
أخرجه البزار في ` مسنده ` (243) : حدثنا غسان بن أبي عبد الله: حدثنا يوسف بن نافع: حدثنا عبد الرحمن بن أبي الموالي عن عبيد الله بن أبي رافع عن أبيه مرفوعا به. قال الشيخ (يعني الهيثمي) :
` غسان فيه ضعف `.
قلت: ولم أعرف غسانا هذا من يكون؟ فإني لم أر فيمن يسمى به منسوبا إلى أبي عبد الله.ثم إن شيخه يوسف بن نافع لم أعرفه أيضا، ويحتمل احتمالا قويا أن يكون هو الذي في ` الجرح والتعديل ` (4/2/232) :
` يوسف بن نافع، روى عن عبد الرحمن بن أبي الزناد، روى عنه جعفر بن عبد الواحد `.
وهذا مجهول كما ترى.
ثم رأيت في ` كشف الأستار ` (2/412) : ` حدثنا غسان بن عبيد الله … `. وفي مجمع الزوائد (8/48) :
` رواه البزار عن شيخه (غسان بن عبيد) وثقه ابن حبان وغيره، وفيه ضعف `.
قلت: فهذا هو الصواب (غسان بن عبيد) ، وهكذا هو في ` ثقات ابن حبان ` (9/1) وهو موصلي، وكذا هو في ` الجرح والتعديل ` (3/2/51) برواية جمع، ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا. و ` الكامل ` لابن عدي (6/8 - 9) وقال:
` والضعف على حديثه بين `.
وله ترجمة مبسطة في ` الميزان ` و ` اللسان `.
(যখন তোমরা কারো নাম মুহাম্মাদ রাখবে, তখন তাকে প্রহার করো না এবং তাকে বঞ্চিত করো না)।
যঈফ (দুর্বল)
এটি বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২৪৩) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন গাসসান ইবনু আবী আব্দুল্লাহ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইউসুফ ইবনু নাফি‘: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনু আবিল মাওয়ালী, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী রাফি‘ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে মারফূ‘ হিসেবে।
শাইখ (অর্থাৎ হাইসামী) বলেছেন:
‘গাসসানের মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে।’
আমি (আলবানী) বলি: এই গাসসান কে, তা আমি জানতে পারিনি। কারণ, যারা এই নামে পরিচিত, তাদের মধ্যে আবূ আব্দুল্লাহর দিকে নিসবতকৃত কাউকে আমি দেখিনি। অতঃপর তার শাইখ ইউসুফ ইবনু নাফি‘-কেও আমি চিনতে পারিনি। প্রবল সম্ভাবনা রয়েছে যে, সে ঐ ব্যক্তি, যার কথা ‘আল-জারহু ওয়াত-তা‘দীল’ গ্রন্থে (৪/২/২৩২) রয়েছে:
‘ইউসুফ ইবনু নাফি‘, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবীয যিনাদ থেকে বর্ণনা করেছেন, আর তার থেকে বর্ণনা করেছেন জা‘ফার ইবনু আব্দুল ওয়াহিদ।’
যেমনটি আপনি দেখছেন, এই ব্যক্তি মাজহূল (অজ্ঞাত)।
অতঃপর আমি ‘কাশফুল আসতার’ গ্রন্থে (২/৪১২) দেখলাম: ‘আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন গাসসান ইবনু উবাইদুল্লাহ...।’ আর ‘মাজমাউয যাওয়ায়িদ’ গ্রন্থে (৮/৪৮) রয়েছে:
‘এটি বাযযার তাঁর শাইখ (গাসসান ইবনু উবাইদ) থেকে বর্ণনা করেছেন, যাকে ইবনু হিব্বান ও অন্যান্যরা সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, তবে তার মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে।’
আমি (আলবানী) বলি: এটিই সঠিক (গাসসান ইবনু উবাইদ)। আর ‘সিকাতু ইবনি হিব্বান’ গ্রন্থে (৯/১) এভাবেই রয়েছে, এবং তিনি মাওসিলী। অনুরূপভাবে ‘আল-জারহু ওয়াত-তা‘দীল’ গ্রন্থেও (৩/২/৫১) একাধিক বর্ণনাকারীর সূত্রে এভাবেই রয়েছে, তবে তাতে তার সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা‘দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করা হয়নি। আর ইবনু আদী-এর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৬/৮-৯) তিনি বলেছেন:
‘তার হাদীসের উপর দুর্বলতা স্পষ্ট।’
তার বিস্তারিত জীবনী ‘আল-মীযান’ ও ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে।
(إذا استوحشت الإنسية وتمنعت؛ فإنه يحلها ما يحل الوحشية، ارجعوا إلى بقرتكم وكلوها) .
ضعيف جدا
أخرجه أبو يعلى في ` مسنده ` (509) ، والبيهقي في ` السنن الكبرى ` (9/246) عن حرام عن عبد الرحمن ومحمد ابني جابر عن أبيهما أنه قال:
` مرت علينا بقرة ممتنعة نافرة، لا تمر على أحد إلا نطحته، وشدت عليه، فخرجنا عليه نكدها، حتى بلغنا الصماء، ومعنا غلام قبطي لبني حرام، ومعه مشتمل فشدت عليه لتنطحه، فضربها أسفل من المنحر، وفوق مرجع الكتف، فركبت ردعها، فلم يدرك لها ذكاة، قال جابر: فأخبرت رسول الله صلى الله عليه وسلم شأنها فقال: فذكره، فرجعنا إليها فاجتزرناها.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، حرام هذا هو ابن عثمان الأنصاري المدني؛ قال الذهبي في ` الضعفاء `:
` متروك باتفاق `.
"(যখন পোষা প্রাণী বন্য হয়ে যায় এবং ধরা দিতে অস্বীকার করে; তখন যা বন্য প্রাণীকে হালাল করে, তা একেও হালাল করে দেয়। তোমরা তোমাদের গরুর কাছে ফিরে যাও এবং তা খাও)।
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)
এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৫০৯), এবং বাইহাকী তাঁর ‘আস-সুনানুল কুবরা’ গ্রন্থে (৯/২৪৬) হারাম হতে, তিনি আব্দুর রহমান ও মুহাম্মাদ ইবনু জাবির হতে, তাঁরা তাঁদের পিতা হতে, তিনি বলেন:
‘আমাদের পাশ দিয়ে একটি গরু চলে গেল যা ছিল বন্য ও ভীতসন্ত্রস্ত। এটি যার পাশ দিয়ে যেত, তাকেই শিং দিয়ে আঘাত করত এবং তার উপর চড়াও হতো। আমরা সেটিকে ধরার জন্য বের হলাম, অবশেষে আমরা ‘আস-সাম্মা’ নামক স্থানে পৌঁছলাম। আমাদের সাথে ছিল বানী হারামের একজন কিবতী গোলাম, তার সাথে ছিল একটি ধারালো অস্ত্র (বা চাদর)। গরুটি তাকে শিং মারার জন্য তার উপর চড়াও হলো। তখন সে সেটিকে কণ্ঠনালীর নিচ বরাবর এবং কাঁধের সংযোগস্থলের উপর আঘাত করল। ফলে গরুটি তার আঘাতের স্থানে বসে পড়ল। এটিকে যবেহ করার সুযোগ পাওয়া গেল না। জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এর অবস্থা জানালাম। তখন তিনি উপরোক্ত কথাটি বললেন। অতঃপর আমরা সেটির কাছে ফিরে গেলাম এবং সেটিকে টুকরা টুকরা করে নিলাম (খেলাম)।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)। এই হারাম হলো ইবনু উসমান আল-আনসারী আল-মাদানী। ইমাম যাহাবী ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলেছেন:
‘সর্বসম্মতিক্রমে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’"
(إن لكل شىء دعامة، ودعامة هذا الدين الفقه، ولفقيه واحد أشد على الشيطان من ألف عابد) .
موضوع
أخرجه الخطيب في ` التاريخ ` (2/402) من طريق خلف بن يحيى: حدثنا إبراهيم بن محمد عن صفوان بن سليم (عن عطاء) بن يسار عن أبي هريرة مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد هالك، آفته خلف بن يحيى، وهو الخراساني، قال ابن أبي حاتم (1/2/372) عن أبيه:
` متروك الحديث، كان كذابا، لا يشتغل به ولا بحديثه `.
وأبراهيم بن محمد لم أعرفه، ولعله إبراهيم بن محمد بن أبي يحيى الأسلمي وهو متروك أيضا، وقد ذكر الذهبي في ترجمة خلف هذا أنه روى عن أبراهيم بن أبي يحيى. لكن تعقبه في ` اللسان ` بقوله:
` كذا فيه: إبراهيم بن أبي يحيى، والصواب إبراهيم بن حماد `.
وعمدته في هذا التصويب أن ابن أبي حاتم لم يذكر في شيوخ خلف غير إبراهيم بن حماد. ولا يخفى أن ذلك لا ينفي أن يكون له شيخ آخر وهو إبراهيم ابن محمد بن أبي يحيى الذي وقع في إسناد هذا الحديث. والله أعلم.
وإبراهيم بن حماد هذا له ترجمة في ` اللسان ` وذكر عن الدارقطني أنه كان ضعيفا.
وأخرجه ابن عدي (24/1) من طريق أبي الربيع السمان عن أبي الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة مرفوعا به، وقال:
` لاأعلم رواه عن أبي الزناد غير أبي الربيع السمان `.
قلت: واسمه أشعث بن سعيد، وهومتهم. قال ابن معين:
` ليس بشيء `. وقال هشيم:
` كان يكذب `.
وقد رواه كذاب آخر عن صفوان بن سليم بزيادة في متنه، وسيأتي برقم (6912) .
(নিশ্চয়ই প্রত্যেক বস্তুর একটি ভিত্তি (দয়ামাহ) রয়েছে, আর এই দ্বীনের ভিত্তি হলো ফিকহ (ইসলামী আইনশাস্ত্র)। একজন ফকীহ (আইনজ্ঞ) শয়তানের উপর এক হাজার আবিদ (ইবাদতকারী) অপেক্ষা অধিক কঠিন।)
মাওদ্বূ (Fabricated)
এটি আল-খাতীব (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আত-তারীখ’ (২/৪০২) গ্রন্থে খালফ ইবনু ইয়াহইয়া-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ, তিনি সাফওয়ান ইবনু সুলাইম থেকে, তিনি আতা ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে।
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি ধ্বংসাত্মক (হালিক)। এর ত্রুটি হলো খালফ ইবনু ইয়াহইয়া, আর তিনি হলেন খুরাসানী। ইবনু আবী হাতিম (রাহিমাহুল্লাহ) (১/২/৩৭২) তাঁর পিতা (আবূ হাতিম)-এর সূত্রে বলেন: ‘সে মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত বর্ণনাকারী), সে ছিল মিথ্যাবাদী। তার দ্বারা বা তার হাদীস দ্বারা কাজ করা যাবে না।’
আর ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদকে আমি চিনতে পারিনি। সম্ভবত তিনি হলেন ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবী ইয়াহইয়া আল-আসলামী, আর তিনিও মাতরূক (পরিত্যক্ত)। আল-যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এই খালফ-এর জীবনীতে উল্লেখ করেছেন যে, সে ইবরাহীম ইবনু আবী ইয়াহইয়া থেকে বর্ণনা করেছে। কিন্তু (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে এই বলে তার (যাহাবীর) অনুসরণ করেছেন: ‘এতে এমন আছে: ইবরাহীম ইবনু আবী ইয়াহইয়া, কিন্তু সঠিক হলো ইবরাহীম ইবনু হাম্মাদ।’
এই সংশোধনের ক্ষেত্রে তাঁর (ইবনু হাজারের) ভিত্তি হলো এই যে, ইবনু আবী হাতিম (রাহিমাহুল্লাহ) খালফ-এর শাইখদের মধ্যে ইবরাহীম ইবনু হাম্মাদ ছাড়া অন্য কারো কথা উল্লেখ করেননি। তবে এটা গোপন নয় যে, এই বিষয়টি এই হাদীসের সনদে উল্লেখিত ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবী ইয়াহইয়া নামক অন্য কোনো শাইখ থাকার সম্ভাবনাকে নাকচ করে না। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
আর এই ইবরাহীম ইবনু হাম্মাদ-এর জীবনী ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে এবং দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে উল্লেখ করা হয়েছে যে, তিনি ছিলেন যঈফ (দুর্বল)।
আর এটি ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) (২৪/১) আবূ আর-রাবী’ আস-সাম্মান-এর সূত্রে, তিনি আবূয যিনাদ থেকে, তিনি আল-আ’রাজ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তিনি (ইবনু আদী) বলেন: ‘আমি জানি না যে, আবূয যিনাদ থেকে আবূ আর-রাবী’ আস-সাম্মান ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: তার নাম হলো আশ’আস ইবনু সাঈদ, আর সে মুত্তাহাম (অভিযুক্ত)। ইবনু মাঈন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘সে কিছুই নয়।’ হুশাইম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘সে মিথ্যা বলত।’
অন্য একজন মিথ্যাবাদীও সাফওয়ান ইবনু সুলাইম থেকে এর মতন-এ অতিরিক্ত অংশ যোগ করে বর্ণনা করেছে, যা শীঘ্রই (৬৯১২) নম্বরে আসবে।
(إذا سجدتما فضما بعض اللحم إلى الأرض، فإن المرأة ليست في ذلك كالرجل) .
ضعيف
أخرجه البيهقي (2/223) من طريق سالم بن غيلان عن يزيد ابن أبي حبيب: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مر على امرأتين تصليان فقال: فذكره. وقال: ` حديث منقطع `.
قلت: يعني مرسل، فإن يزيد بن أبي حبيب تابعي ثقة. وتعقبه ابن التركماني بقوله:
` قلت: ظاهر كلامه أنه ليس في هذا الحديث إلا الانقطاع، وسالم متروك، حكاه صاحب ` الميزان ` عن الدارقطني `.
قلت: وظاهر هذا التعقب أن صاحب ` الميزان ` لم يحك في المترجم غير ما حكاه عن الدارقطني، وليس كذلك، فقد قال عقبه:
` قال أحمد: ما أرى هـ بأسا، وقال دس: لا بأس به. وذكره ابن حبان في (الثقات) `.
قلت: فتوثيق هؤلاء الأئمة أولى بالاعتماد عليه من جرح الدارقطني، لأنه جرح غير مفسر، فكأنه لذلك لم يورده الذهبي في ` الضعفاء `، ولا في ` ذيله `، وقال الحافظ في ` التقريب `:
` ليس به بأس `.
فعلة الحديث الإرسال فقط. والله أعلم.
(যখন তোমরা সিজদা করবে, তখন কিছু গোশত (শরীর) মাটির সাথে মিলিয়ে দেবে। কেননা এই ক্ষেত্রে নারী পুরুষের মতো নয়।)
যঈফ
বাইহাকী (২/২২৩) এটি বর্ণনা করেছেন সালিম ইবনু গাইলান-এর সূত্রে ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব হতে: যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দু’জন মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন যারা সালাত আদায় করছিল। অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করেন। এবং তিনি (বাইহাকী) বলেন: ‘হাদীসটি মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন)।
আমি (আল-আলবানী) বলি: অর্থাৎ এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন), কেননা ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব একজন নির্ভরযোগ্য তাবেঈ। ইবনু আত-তুরকুমানী এর প্রতিবাদ করে বলেন:
‘আমি বলি: তার কথার বাহ্যিক অর্থ হলো এই হাদীসে কেবল ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা) ছাড়া আর কোনো সমস্যা নেই, অথচ সালিম মাতরূক (পরিত্যক্ত)। ‘আল-মীযান’ এর লেখক দারাকুতনী হতে এটি বর্ণনা করেছেন।’
আমি বলি: এই প্রতিবাদের বাহ্যিক অর্থ হলো ‘আল-মীযান’-এর লেখক অনুবাদকৃত ব্যক্তি (সালিম) সম্পর্কে দারাকুতনী যা বর্ণনা করেছেন, তা ছাড়া আর কিছু বর্ণনা করেননি। কিন্তু বিষয়টি এমন নয়। কেননা তিনি (আল-মীযান-এর লেখক) এর পরপরই বলেছেন:
‘আহমাদ (ইবনু হাম্বল) বলেছেন: আমি তার মধ্যে কোনো সমস্যা দেখি না। এবং দিস (আবু দাউদ আস-সিজিস্তানী) বলেছেন: তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই। আর ইবনু হিব্বান তাকে (আস-সিকাত) ‘নির্ভরযোগ্যদের’ মধ্যে উল্লেখ করেছেন।’
আমি বলি: এই সকল ইমামগণের নির্ভরযোগ্য ঘোষণা দারাকুতনীর জারহ (সমালোচনা) অপেক্ষা অধিক নির্ভর করার যোগ্য, কারণ এটি (দারাকুতনীর জারহ) অ-ব্যাখ্যাত জারহ (Jarh Ghayr Mufassar)। সম্ভবত এই কারণেই যাহাবী তাকে ‘আয-যুআফা’ (দুর্বল বর্ণনাকারীগণ)-এর মধ্যে বা এর ‘যাইল’ (পরিশিষ্ট)-এর মধ্যে উল্লেখ করেননি। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন:
‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’
সুতরাং হাদীসটির ত্রুটি কেবল ইরসাল (বিচ্ছিন্নতা)। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
(كان يصلي في المكان الذي يبول فيه الحسن والحسين، فقالت عائشة: يا رسول الله! ألا تنظر مكانا أنظف من هذا؟ قال: يا حميراء! أما علمت أن العبد إذا سجد سجدة لله تعالى طهر له موضع سجوده إلى سبع أرضين) .
موضوع
رواه أبو حفص ابن الزيات في ` حديثه ` (1/2) ، وابن عدي (40/2) عن بزيع بن حسان أبي الخليل الخصاف عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعا. ذكره ابن عدي في ترجمة بزيع هذا في جملة أحاديث له عن هشام وقال:
` كلها مناكير لا يتابعه عليها أحد `.
ومن هذا الوجه رواه الطبراني في ` الأوسط ` (21/1 - من زوائده) وقال:
` لم يروه عن هشام إلا بزيع `.
قلت: وقال عبد الحق في ` الأحكام الكبرى ` (26/1) :
` وهذا حديث منكر لم يتابع عليه بزيع، وبزيع قال فيه ابن أبي حاتم: ذاهب الحديث `.
وأورده ابن الجوزي في ` الموضوعات ` من رواية ابن عدي ثم قال:
` موضوع، تفرد به بزيع وهو متروك. قال ابن حبان: يأتي عن الثقات بأشياء موضوعات كأنه المتعمد لها `.
وتعقبه السيوطي في ` اللآلي المصنوعة ` (ص 307 - 308 - هند) بقوله:
` قلت: أخرجه الطبراني أيضا: حدثنا مطلب بن شعيب: حدثنا عبد الله بن صالح: حدثني الليث عن زهرة بن معبد عن أبيه عن عائشة:
أن رسول الله! كان يصلي [حيث] ما دنا من البيت، فقالت له: يا رسول الله! ربما صليت في المكان الذي تمر فيه الحائض؟ فلو اتخذت مسجدا تصلي فيه، فقال: واعجبا لك يا عائشة! أما علمت أن المؤمن تطهر سجدته موضعها إلى سبع أرضين. قال الطبراني:
لم يروه عن معبد إلا ابنه، تفرد به الليث، ولم يرو معبد عن عائشة غير هذا `.
قلت: سكت عنه السيوطي، ومعبد هذا - وهو ابن عبد الله بن هشام بن زهرة والد أبي عقيل - مجهول، كما يشير إليه قول الذهبي:
` تفرد عنه ابنه `.
وعبد الله بن صالح فيه ضعف، لكنه لم يتفرد به كما زعم الطبراني، فقد خرج له ابن عراق في ` التنزيه ` (2/100) متابعا قويا، ولكنه لم يصب كل الإصابة في قوله:
` وهذا المتن مع نكارته إسناده حسن، فمعبد قال في ` التقريب `: مقبول … `.
قلت: قول الحافظ: ` مقبول `. معناه في اصطلاحه، غير مقبول! لأنه قد بين في المقدمة من ` التقريب ` أن قوله هذا فيه إنما يعني عند المتابعة، وإلا فهو لين الحديث. فأنى للإسناد الحسن، لاسيما مع قول الذهبي المتقدم:
` تفرد عنه ابنه `.
فهو مجهول العين. وتوثيق ابن حبان إياه لا يخرجه عن الجهالة، لما هو معروف به من التساهل في التوثيق، كما شرحه الحافظ في مقدمة ` لسان الميزان `، وكما عرفنا ذلك منه بالتجربة، وبينته في رسالتي في الرد على ` التعقيب الحثيث `.
ثم إن تعقب السيوطي لا يفيد لأنه في الصلاة في مكان مرور الحائض، وحديث الترجمة في مكان بول الحسن والحسين، وشتان ما بينهما!
(তিনি এমন স্থানে সালাত আদায় করতেন যেখানে হাসান ও হুসাইন পেশাব করতেন। তখন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি এর চেয়ে পরিষ্কার কোনো স্থান দেখবেন না? তিনি বললেন: হে হুমাইরা! তুমি কি জানো না যে, বান্দা যখন আল্লাহর জন্য একটি সিজদা করে, তখন তার সিজদার স্থান সাত জমিন পর্যন্ত পবিত্র হয়ে যায়।)
মাওদ্বূ (জাল)
এটি বর্ণনা করেছেন আবূ হাফস ইবন আয-যায়্যাত তাঁর ‘হাদীসে’ (১/২) এবং ইবন আদী (২/৪০) বাযী‘ ইবন হাসসান আবিল খলীল আল-খাসসাফ হতে, তিনি হিশাম ইবন উরওয়াহ হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে। ইবন আদী এই বাযী‘-এর জীবনীতে হিশাম হতে তার বর্ণিত হাদীসসমূহের মধ্যে এটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘এগুলো সবই মুনকার (অস্বীকৃত), এর উপর কেউ তার অনুসরণ করেনি।’
এই সূত্রেই এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’-এ (১/২১ - তাঁর অতিরিক্ত অংশ হতে) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘হিশাম হতে এটি বাযী‘ ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেনি।’
আমি (আলবানী) বলছি: আর আব্দুল হক্ব ‘আল-আহকামুল কুবরা’-তে (১/২৬) বলেছেন:
‘এটি মুনকার হাদীস, এর উপর বাযী‘-এর অনুসরণ করা হয়নি। আর বাযী‘ সম্পর্কে ইবন আবী হাতিম বলেছেন: সে ‘যাহিবুল হাদীস’ (হাদীসের ক্ষেত্রে বাতিল/অকেজো)।’
ইবনুল জাওযী ইবন আদী-এর বর্ণনা হতে এটি ‘আল-মাওদ্বূ‘আত’-এ এনেছেন, অতঃপর বলেছেন:
‘মাওদ্বূ (জাল), এটি বর্ণনায় বাযী‘ একক, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)। ইবন হিব্বান বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের সূত্রে এমন সব মাওদ্বূ (জাল) বিষয় নিয়ে আসে যেন সে ইচ্ছাকৃতভাবে তা করেছে।’
সুয়ূতী ‘আল-লাআলী আল-মাসনূ‘আহ’-তে (পৃ. ৩০৭-৩০৮ - হিন্দ) তার এই কথা দ্বারা এর সমালোচনা করেছেন:
‘আমি বলছি: ত্ববারানীও এটি বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুত্ত্বালিব ইবন শু‘আইব, তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবন সালিহ, তিনি বলেন: আমার নিকট বর্ণনা করেছেন আল-লায়স, তিনি যুহরাহ ইবন মা‘বাদ হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে:
নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরের কাছাকাছি স্থানে সালাত আদায় করতেন। তখন তিনি (আয়িশাহ) তাকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি হয়তো এমন স্থানে সালাত আদায় করেন যেখান দিয়ে ঋতুমতী মহিলা চলাচল করে? আপনি যদি সালাত আদায়ের জন্য একটি মসজিদ (নির্দিষ্ট স্থান) তৈরি করতেন। তখন তিনি বললেন: হে আয়িশাহ! তোমার জন্য আফসোস! তুমি কি জানো না যে, মুমিনের সিজদা তার স্থানকে সাত জমিন পর্যন্ত পবিত্র করে দেয়। ত্ববারানী বলেছেন:
মা‘বাদ হতে তার পুত্র ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেনি, আল-লায়স এটি বর্ণনায় একক, আর মা‘বাদ আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এটি ছাড়া আর কিছু বর্ণনা করেননি।’
আমি (আলবানী) বলছি: সুয়ূতী এ বিষয়ে নীরব থেকেছেন। আর এই মা‘বাদ – যিনি ইবন আব্দুল্লাহ ইবন হিশাম ইবন যুহরাহ এবং আবূ আক্বীল-এর পিতা – তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত), যেমনটি যাহাবী-এর এই উক্তি দ্বারা ইঙ্গিত পাওয়া যায়:
‘তার পুত্র ছাড়া আর কেউ তার থেকে এককভাবে বর্ণনা করেনি।’
আর আব্দুল্লাহ ইবন সালিহ-এর মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে। তবে ত্ববারানী যেমনটি ধারণা করেছেন, তিনি এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। কেননা ইবন ইরাক্ব তাঁর ‘আত-তানযীহ’-এ (২/১০০) তার জন্য একটি শক্তিশালী মুতাবা‘আত (সমর্থক বর্ণনা) বের করেছেন। কিন্তু তিনি (ইবন ইরাক্ব) তার এই কথায় পুরোপুরি সঠিক হননি:
‘এই মাতন (মূল হাদীস) মুনকার হওয়া সত্ত্বেও এর ইসনাদ হাসান, কেননা মা‘বাদ সম্পর্কে ‘আত-তাক্বরীব’-এ বলা হয়েছে: মাক্ববূল (গ্রহণযোগ্য)...।’
আমি (আলবানী) বলছি: হাফিয (ইবন হাজার)-এর উক্তি ‘মাক্ববূল’ (গ্রহণযোগ্য) – পরিভাষাগতভাবে এর অর্থ হলো, অগ্রহণযোগ্য! কারণ তিনি ‘আত-তাক্বরীব’-এর ভূমিকায় স্পষ্ট করেছেন যে, তার এই উক্তি কেবল মুতাবা‘আত (সমর্থক বর্ণনা) থাকলেই প্রযোজ্য, অন্যথায় সে ‘লায়্যিনুল হাদীস’ (দুর্বল বর্ণনাকারী)। সুতরাং ইসনাদটি হাসান হবে কীভাবে, বিশেষত যাহাবী-এর পূর্বোক্ত উক্তি থাকা সত্ত্বেও:
‘তার পুত্র ছাড়া আর কেউ তার থেকে এককভাবে বর্ণনা করেনি।’
অতএব সে ‘মাজহূলুল ‘আইন’ (ব্যক্তিগতভাবে অজ্ঞাত)। আর ইবন হিব্বান তাকে নির্ভরযোগ্য বললেও তা তাকে জাহালাত (অজ্ঞাত অবস্থা) থেকে বের করে না, কারণ তিনি তাউছীক্ব (নির্ভরযোগ্য ঘোষণা)-এর ক্ষেত্রে শিথিলতার জন্য পরিচিত, যেমনটি হাফিয (ইবন হাজার) ‘লিসানুল মীযান’-এর ভূমিকায় ব্যাখ্যা করেছেন এবং যেমনটি আমরা অভিজ্ঞতা দ্বারা জানতে পেরেছি এবং ‘আর-রাদ্দু ‘আলাত তা‘ক্বীবিল হাছীছ’ নামক আমার রিসালাহতে তা স্পষ্ট করেছি।
অতঃপর সুয়ূতী-এর সমালোচনা কোনো কাজে আসে না, কারণ তা হলো ঋতুমতী মহিলার চলাচলের স্থানে সালাত আদায় করা প্রসঙ্গে, আর আলোচ্য হাদীসটি হলো হাসান ও হুসাইন-এর পেশাবের স্থানে সালাত আদায় করা প্রসঙ্গে, আর এই দুটির মধ্যে অনেক পার্থক্য!
(ما قبض نبي قط حتى يؤمه رجل من أمته) .
ضعيف
أخرجه أحمد (1/13) ، والبزار في ` مسنده ` (3/211/2591 - الكشف) والسياق له - من طريق عاصم بن كليب: حدثني شيخ: حدثني فلان وفلان، حتى عد سبعة أحدهم عبد الله بن الزبير عن عمر قال:سمعت أبا بكر رضي الله عنه يقول: فذكره مرفوعا. وقال البزار:
` لا نعلمه يروى عن أبي بكر إلا بهذا الإسناد، ولا نعلم أحدا سمى الرجل الذي روى عنه عاصم، فلذلك ذكرناه `.
قلت: فهو مجهول، ولذلك أوردته هنا. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (4/207) :
` رواه أحمد، وفيه راو لم يسم، وبقية رجاله رجال الصحيح `.
قلت: هو عند أحمد في حديث طويل، وقد فات الهيثمي أن يشير إلى رواية البزار هذه المختصرة. وقد أخرجها ابن سعد في ` الطبقات ` (2/222) من
حديث محمد إبراهيم التيمي، وحديث محمد بن قيس، وكلاهما مرسل، وفي الأول محمد بن عمر، وهو الواقدي متهم، وفي الآخر أبو معشر، وهو ضعيف.
وقد صح اقتداء النبي صلى الله عليه وسلم بعبد الرحمن بن عوف في غزوة تبوك كما في ` صحيح مسلم ` وغيره، وهو مخرج في ` الإرواء ` (2/259) فلعل رواي حديث الترجمة أراد هذه القضية، فجاء بلفظ عام شمل جميع الأنبياء، فوهم. والله أعلم.
(কোনো নবীই ততক্ষণ পর্যন্ত ইন্তেকাল করেননি, যতক্ষণ না তাঁর উম্মতের একজন লোক তাঁর ইমামতি করেছেন।)
যঈফ
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (১/১৩), এবং বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’-এ (৩/২১১/২৫৯১ - আল-কাশফ)। আর এই বর্ণনাটি বাযযারের। এটি ‘আসিম ইবনু কুলাইব-এর সূত্রে বর্ণিত: তিনি বলেন: আমাকে একজন শাইখ হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাকে অমুক ও অমুক হাদীস বর্ণনা করেছেন, এভাবে তিনি সাতজনের নাম উল্লেখ করেছেন, তাদের মধ্যে একজন হলেন আব্দুল্লাহ ইবনু যুবাইর, তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি (উমার) বলেন: আমি আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: অতঃপর তিনি মারফূ' হিসেবে এটি উল্লেখ করেছেন।
বাযযার বলেছেন: ‘আমরা জানি না যে, আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই সনদ ছাড়া এটি অন্য কোনোভাবে বর্ণিত হয়েছে। আর আমরা জানি না যে, ‘আসিম যার থেকে বর্ণনা করেছেন, সেই লোকটির নাম কেউ উল্লেখ করেছে। এই কারণেই আমরা এটি উল্লেখ করেছি।’
আমি (আলবানী) বলি: সুতরাং সে (বর্ণনাকারী) মাজহূল (অজ্ঞাত), এই কারণেই আমি এটিকে এখানে (যঈফ হাদীসের সিলসিলায়) এনেছি। আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৪/২০৭)-তে বলেছেন: ‘এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন, এতে একজন বর্ণনাকারী আছেন যার নাম উল্লেখ করা হয়নি, তবে এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা সহীহ-এর বর্ণনাকারী।’
আমি (আলবানী) বলি: এটি আহমাদের নিকট একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ হিসেবে রয়েছে। আর হাইসামী বাযযারের এই সংক্ষিপ্ত বর্ণনাটির প্রতি ইঙ্গিত করতে ভুলে গেছেন। ইবনু সা'দ এটি ‘আত-তাবাকাত’ (২/২২২)-এ মুহাম্মাদ ইবরাহীম আত-তাইমী-এর হাদীস এবং মুহাম্মাদ ইবনু কাইস-এর হাদীস সূত্রে বর্ণনা করেছেন। উভয়টিই মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)। আর প্রথমটিতে মুহাম্মাদ ইবনু উমার রয়েছেন, যিনি হলেন আল-ওয়াকিদী, তিনি মুত্তাহাম (অভিযুক্ত)। আর শেষোক্তটিতে আবূ মা'শার রয়েছেন, যিনি যঈফ (দুর্বল)।
অথচ তাবূক যুদ্ধে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আব্দুর রহমান ইবনু ‘আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে ইকতিদা (অনুসরণ) করা সহীহ দ্বারা প্রমাণিত, যেমনটি ‘সহীহ মুসলিম’ ও অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে। এটি ‘আল-ইরওয়া’ (২/২৫৯)-তে উল্লেখ করা হয়েছে। সম্ভবত এই অনুচ্ছেদের হাদীসের বর্ণনাকারী এই ঘটনাটিই চেয়েছিলেন, কিন্তু তিনি এমন একটি সাধারণ শব্দ ব্যবহার করেছেন যা সকল নবীকে অন্তর্ভুক্ত করে ফেলেছে, ফলে তিনি ভুল করেছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।
(حواري من الرجال الزبير، وحواري من النساء عائشة) .
منكر بهذا التمام
أخرجه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (6/365) من طريق الزبير بن بكار قال: حدثني يحيى بن أكثم عن وهب بن جرير عن أبيه عن يحيى بن أيوب عن يزيد بن أبي الخير مرثد بن عبد الله: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: فذكره.
قال الحافظ في ` الفتح ` (7/80) بعدما عزاه للزبير بن بكار:
` ورجاله موثقون، لكنه مرسل `.
قلت: وهو مع إرساله منكر المتن عندي، لأن الجملة الأولى قد صحت عن النبي صلى الله عليه وسلم عن جابر وغيره من الصحابة، وهو مخرج في ` الصحيحة ` (1877) ، وليس في شيء من طرفه الشطر الثاني منه فكان منكرا.
وأيضا فقد صح عن ابن عمر: أنه سمع رجلا يقول: يا ابن حواري رسول الله صلى الله عليه وسلم! فقال ابن عمر:
إن كنت من آل الزبير، وإلا فلا.
وهومخرج في كتابي ` صحيح كشف الأستار ` (المناقب) ، يسر الله إتمامه. وفي رواية لابن عساكر في ` التاريخ ` (6/365) :
` فقد كذبت `.
لكن في إسناده عبد العزيز بن أبان، وهو متروك.
(পুরুষদের মধ্যে আমার হাওয়ারী হলেন যুবাইর, আর নারীদের মধ্যে আমার হাওয়ারী হলেন আয়েশা)।
এই পূর্ণতার সাথে মুনকার (Munkar).
ইবনু আসাকির এটি তাঁর ‘তারীখে দিমাশক’ (৬/৩৬৫)-এ যুবাঈর ইবনু বাক্কারের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি (যুবাঈর) বলেন: আমাকে ইয়াহইয়া ইবনু আকছাম হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি ওয়াহব ইবনু জারীর থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু আইয়ূব থেকে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবিল খায়র মারছাদ ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে (বর্ণনা করেন) যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ (৭/৮০)-এ যুবাঈর ইবনু বাক্কারের দিকে এর সূত্র উল্লেখ করার পর বলেন: ‘এর বর্ণনাকারীগণ বিশ্বস্ত, কিন্তু এটি মুরসাল।’
আমি (আলবানী) বলি: এটি মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও আমার নিকট এর মতন (মূল বক্তব্য) মুনকার। কারণ প্রথম বাক্যটি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্য সাহাবীগণের সূত্রে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে। আর এটি ‘আস-সহীহাহ’ (১৮৭৭)-এ সংকলিত হয়েছে। কিন্তু এর কোনো সূত্রে এর দ্বিতীয় অংশটি (শতরুছ ছানী) নেই। তাই এটি মুনকার।
এছাড়াও ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহভাবে প্রমাণিত হয়েছে যে, তিনি এক ব্যক্তিকে বলতে শুনেছেন: হে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর হাওয়ারীর পুত্র! তখন ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি তুমি যুবাইরের বংশধর হও, তবে ঠিক আছে, অন্যথায় নয়।
আর এটি আমার কিতাব ‘সহীহ কাশফুল আসতার’ (আল-মানাকিব)-এ সংকলিত হয়েছে। আল্লাহ এর সমাপ্তি সহজ করুন।
আর ইবনু আসাকিরের ‘আত-তারীখ’ (৬/৩৬৫)-এর অন্য এক বর্ণনায় রয়েছে: ‘তুমি তো মিথ্যা বলেছ।’ কিন্তু এর ইসনাদে আব্দুল আযীয ইবনু আবান রয়েছে, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।
(لحجة أفضل من عشر غزوات، ولغزوة أفضل من عشر حجات) .
ضعيف جدا
أخرجه البيهقي في ` شعب الإيمان ` (4/12/4222) من طريق سعيد بن عبد الجبار: أخبرنا أبو عبد العزيز قال: حدثني مرداس الليثي عن أبي هريرة مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، وفيه علتان:
الأولى: سعيد بن عبد الجبار، وهو الحمصي، قال الذهبي في ` المغني `:
` قال النسائي: ليس بثقة `.
وكان جرير يكذبه، كما في ` التهذيب `.
والأخرى: عبد الله بن عبد العزيز، وهو الليثي، قال الذهبي أيضا:
` ضعفوه `.
وفي ` التقريب `:
` ضعيف، واختلط بأخرة `.
وأما مرداس الليثي، فذكره ابن حبان في ` ثقات التابعين ` (5/449) ، وروى عنه جمع.
وقد روي الحديث عن ابن عمرو بنحوه أتم منه عند البيهقي وغيره، وقد سبق تخرجه برقم (1230) . وروي عن ابن عمر بلفظ أنكر منه، وسيأتي برقم (3481) .
(একটি হজ দশটি যুদ্ধের চেয়ে উত্তম, আর একটি যুদ্ধ দশটি হজের চেয়ে উত্তম)।
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)
এটি বাইহাকী তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ (৪/১২/৪২২২) গ্রন্থে সাঈদ ইবনু আব্দুল জাব্বার-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে আবূ আব্দুল আযীয সংবাদ দিয়েছেন, তিনি বলেন: আমাকে মিরদাস আল-লাইসী আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান), এবং এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাহ) রয়েছে:
প্রথমটি: সাঈদ ইবনু আব্দুল জাব্বার, তিনি হলেন আল-হিমসী। যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘নাসাঈ বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য নয় (লাইসা বিসিকাহ)।’ আর জারীর তাকে মিথ্যাবাদী বলতেন, যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে রয়েছে।
আর অন্যটি: আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল আযীয, তিনি হলেন আল-লাইসী। যাহাবী আরও বলেছেন: ‘তারা তাকে দুর্বল বলেছেন।’ আর ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে: ‘সে দুর্বল (যঈফ), এবং শেষ বয়সে তার স্মৃতিভ্রম ঘটেছিল (ইখতিলাত হয়েছিল)।’
আর মিরদাস আল-লাইসী সম্পর্কে বলতে গেলে, ইবনু হিব্বান তাকে ‘সিকাতুত তাবিয়ীন’ (৫/৪৪৯) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, এবং তার থেকে একটি দল বর্ণনা করেছে।
আর এই হাদীসটি ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর কাছাকাছি এবং এর চেয়ে পূর্ণাঙ্গ রূপে বাইহাকী ও অন্যান্যদের নিকট বর্ণিত হয়েছে, যার তাখরীজ পূর্বে ১২৩০ নং-এ অতিবাহিত হয়েছে। আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর চেয়েও মুনকার (অস্বীকৃত) শব্দে বর্ণিত হয়েছে, যা শীঘ্রই ৩৪২১ নং-এ আসবে।
(إني محدثكم بحديث فاحفظوه، وحدثوا به من بعدكم:
إن الله تبارك وتعالى اصطفى من خلقه خلقا، ثم تلا هذه الآية: (الله يصطفي من الملائكة رسلا ومن الناس) خلقا قد خلقهم للجنة، وإني أصطفي منكم من أحب أن أصطفيه، ومؤاخ بينكم كما آخى الله بين الملائكة. قم يا أبا بكر! فقام. . . الحديث.
وهو طويل جدا في ثلاث صفحات. وفيه قصة مؤاخاته صلى الله عليه وسلم بين بعض الصحابة، كالمؤاخاة بين أبي بكر وعمر، وبين عثمان وعبد الرحمن بن عوف، وبين طلحة والزبير، وسعد وعمار، وأبي الدرداء وسلمان، ويتخللذلك ذكر بعض فضائلهم، منها ما يصح، وهو قليل، كقوله في أبي بكر: ` لو كنت متخذا خليلا، لا تخذتك خليلا ` ومنها ما لا يصح، وهو الأكثر، كقوله لسلمان:
` أنت منا أهل البيت،قد آتاك الله العلم الأول والعلم الآخر، والكتاب الأول والكتاب الآخر `!
وفي آخر الحديث المؤاخاة بينه وبين علي، وأنه قال له:
` والذي بعثني بالحق، ما أخرتك إلا لنفسي، فأنت عندي بمنزلة
هارون من موسى، غير أنه لا نبي بعدي، وأنت أخي ووزيري ووارثي. . ما أورثت الأنبياء، كتاب الله، وسنة نبيهم، وأنت معي في قصري في الجنة مع ابنتي فاطمة. . . `) الحديث بطوله.
منكر جدا
بل موضوع ظاهر الوضع. أخرجه البزار في في ` مسنده ` (3/215/217) ، وعبد الله بن أحمد في ` الفضائل ` (2/638/1085) ، والقطيعي في ` زياداته عليه ` (2/666/667) ، والطبراني في ` المعجم الكبير ` (5/251/353) من طريقين عن عبد المؤمن بن عباد بن عمرو العبدي: حدثنا يزيد بن معن - وقال الآخر: زيد بن معن - حدثني عبد الله بن شر حبيل عن رجل من قريش عن زيد بن أبي أوفى قال:
دحلت على رسول الله صلى الله عليه وسلم مسجد المدينة، فجعل يقول: ` أن فلان؟ أين فلان؟ ` فلم يزل يتفقدهم، ويبعث إليهم، حتى اجتمعوا عنده، فقال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مظلم، مسلسل بالعلل:
الأولى: عبد المؤمن العبدي هذا، ال ابن أبي حاتم (3/1/66) عن أبيه:
` ضعيف الحديث `.
وقال البخاري:
` لا يتابع على حديثه `.
وذكره الساجي وابن الجارود في ` الضعفاء ` كما في ` اللسان `. وشذ ابن حبان فذكره في ` الثقات ` (8/117) .
الثانية: زيد أو يزيد بن معن، لم أعرفه، ويحتمل أن يكون محرفا من (يحيى ابن معن) ، تحرف على (العبدي) ، فقد جاء في ` الميزان ` وذيوله:
` يحيى بن معن، عن سعد بن شراحيل، مجهول، كشيحه `.
وقال الحافظ في ` اللسان `:
` وفي ` الثقات ` لابن حبان [ (9/260) في طبقة تبع أتباع التابعين] : ` يحيى بن معن الأنصاري عن أبيه عن سعيد بن المسيب، وعنه أهل المدينة `. قلت (الحافظ) : فيحتمل أن يكون هو:
يحيى بن المنذر الكندي، عن إسرائيل، ضعفه الدارقظني وغيره، وقال العقيلي: في حديثه نظر `.
الثالثة: عبد الله بن شر حبيل، وهو ابن حسنة، ذكره ابن حبان في ` ثقات التابعين ` (5/14) برواية ثقتين عنه، ولم يذكر فيه البخاري وابن أبي حاتم جرحا ولا تعديلا.
الرابعة: الرجل القرشي الذي لم يسم، فهو مجهول.
ثم رأيت الحديث قد أورده ابن أبي حاتم في ` العلل ` (2/361/2598) بأسناد يختلف عن هذا فقال:
` سألت أبي عن حديث رواه حسان بن حسان عن إبراهيم بن بشر عن يحيى ابن معين (!) عن إبراهيم القرشي عن سعيد بن شرحبيل عن زيد بن أبي أوفى قال. . . فذكره مختصرا ملخصا. وقال:
` قال أبي: هذا حديث منكر، وفي إسناده مجهولون `.
(নিশ্চয় আমি তোমাদেরকে একটি হাদীস বর্ণনা করব, সুতরাং তোমরা তা মুখস্থ রাখো এবং তোমাদের পরে যারা আসবে তাদের কাছে তা বর্ণনা করো:
নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা তাঁর সৃষ্টির মধ্য থেকে কিছু সৃষ্টিকে মনোনীত করেছেন। অতঃপর তিনি এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: (আল্লাহ ফেরেশতাদের মধ্য থেকে রাসূল মনোনীত করেন এবং মানুষের মধ্য থেকেও) এমন সৃষ্টি যাদেরকে তিনি জান্নাতের জন্য সৃষ্টি করেছেন। আর আমি তোমাদের মধ্য থেকে তাকে মনোনীত করব যাকে আমি মনোনীত করতে ভালোবাসি, এবং তোমাদের মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করব যেমন আল্লাহ ফেরেশতাদের মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করেছেন। হে আবূ বকর! দাঁড়াও! অতঃপর তিনি দাঁড়ালেন... হাদীসটি।
আর এটি তিন পৃষ্ঠা জুড়ে অত্যন্ত দীর্ঘ। আর এতে রয়েছে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কর্তৃক কতিপয় সাহাবীর মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করার ঘটনা, যেমন আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে, উসমান ও আবদুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে, তালহা ও যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে, সা'দ ও আম্মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে, এবং আবূ দারদা ও সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন। আর এর মাঝে তাদের কিছু ফযীলত উল্লেখ করা হয়েছে, যার মধ্যে কিছু সহীহ, যা খুবই কম। যেমন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সম্পর্কে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উক্তি: ‘যদি আমি কাউকে খলীল (অন্তরঙ্গ বন্ধু) বানাতাম, তবে অবশ্যই তোমাকে খলীল বানাতাম।’ আর এর মধ্যে কিছু আছে যা সহীহ নয়, আর সেটাই বেশি। যেমন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উক্তি: ‘তুমি আমাদের আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত। আল্লাহ তোমাকে প্রথম জ্ঞান ও শেষ জ্ঞান, এবং প্রথম কিতাব ও শেষ কিতাব দান করেছেন!’
আর হাদীসের শেষে তাঁর (নবী সাঃ) ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন এবং তাঁকে (আলীকে) তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই উক্তি রয়েছে: ‘ঐ সত্তার কসম, যিনি আমাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন! আমি তোমাকে কেবল আমার নিজের জন্যই বিলম্বিত করেছি। সুতরাং তুমি আমার কাছে হারূণ (আঃ)-এর কাছে মূসা (আঃ)-এর মর্যাদার মতো, তবে আমার পরে কোনো নবী নেই। আর তুমি আমার ভাই, আমার উযীর (মন্ত্রী) এবং আমার ওয়ারিশ (উত্তরাধিকারী)... যা নবীরা উত্তরাধিকার সূত্রে রেখে যান—আল্লাহর কিতাব এবং তাদের নবীর সুন্নাহ। আর তুমি জান্নাতে আমার প্রাসাদে আমার কন্যা ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আমার সঙ্গী হবে...’) হাদীসটি সম্পূর্ণ।
**মুনকার জিদ্দান (খুবই মুনকার)। বরং মাওদ্বূ (জাল), যার জাল হওয়া সুস্পষ্ট।**
এটি বর্ণনা করেছেন বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৩/২১৫/২১৭), আবদুল্লাহ ইবনু আহমাদ ‘আল-ফাযায়েল’ গ্রন্থে (২/৬৩৮/১০৮৫), আল-কুতাইঈ তাঁর ‘যিয়াদাতুহু আলাইহি’ গ্রন্থে (২/৬৬৬/৬৬৭), এবং ত্বাবারানী ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৫/২৫১/৩৫৩) দুটি সূত্রে আব্দুল মু'মিন ইবনু ইবাদ ইবনু আমর আল-আবদী থেকে। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াযীদ ইবনু মা'ন – আর অপরজন বলেছেন: যায়দ ইবনু মা'ন – তিনি বলেন: আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবদুল্লাহ ইবনু শুরাহবীল কুরাইশের এক ব্যক্তি থেকে, তিনি যায়দ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন:
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে মদীনার মসজিদে প্রবেশ করলাম। তিনি বলতে লাগলেন: ‘অমুক কোথায়? অমুক কোথায়?’ তিনি তাদের খোঁজ নিতে থাকলেন এবং তাদের কাছে লোক পাঠাতে থাকলেন, যতক্ষণ না তারা তাঁর কাছে একত্রিত হলেন। অতঃপর তিনি বললেন: তারপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), অন্ধকারাচ্ছন্ন এবং ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত (ইল্লত দ্বারা সজ্জিত):
**প্রথমত:** এই আব্দুল মু'মিন আল-আবদী সম্পর্কে ইবনু আবী হাতিম (৩/১/৬৬) তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন: ‘তিনি দুর্বল হাদীসের রাবী।’
আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘তাঁর হাদীসের অনুসরণ করা হয় না।’
আস-সাজী এবং ইবনু আল-জারূদ তাঁকে ‘আয-যুআফা’ (দুর্বল রাবীদের) মধ্যে উল্লেখ করেছেন, যেমনটি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে। আর ইবনু হিব্বান ব্যতিক্রমভাবে তাঁকে ‘আছ-ছিকাত’ (নির্ভরযোগ্য রাবীদের) মধ্যে উল্লেখ করেছেন (৮/১১৭)।
**দ্বিতীয়ত:** যায়দ অথবা ইয়াযীদ ইবনু মা'ন, আমি তাকে চিনতে পারিনি। সম্ভবত এটি (ইয়াহইয়া ইবনু মা'ন)-এর বিকৃতি, যা আল-আবদী-এর কাছে বিকৃত হয়ে গেছে। কেননা ‘আল-মীযান’ এবং এর পরিশিষ্টে এসেছে: ‘ইয়াহইয়া ইবনু মা'ন, সা'দ ইবনু শুরাহবীল থেকে, তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত), যেমন তার শায়খও মাজহূল।’
আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘ইবনু হিব্বানের ‘আছ-ছিকাত’ গ্রন্থে [(৯/২৬০) তাবঈনদের অনুসারীদের অনুসারীদের স্তরে] রয়েছে: ‘ইয়াহইয়া ইবনু মা'ন আল-আনসারী তাঁর পিতা থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু আল-মুসাইয়্যাব থেকে, আর তাঁর থেকে মদীনার লোকেরা বর্ণনা করেছেন।’ আমি (হাফিয) বলি: সম্ভবত তিনি হলেন: ইয়াহইয়া ইবনু আল-মুনযির আল-কিনদী, ইসরাঈল থেকে। দারাকুতনী এবং অন্যান্যরা তাঁকে দুর্বল বলেছেন। আর উকাইলী বলেছেন: তাঁর হাদীসের মধ্যে আপত্তি রয়েছে।
**তৃতীয়ত:** আবদুল্লাহ ইবনু শুরাহবীল, আর তিনি হলেন ইবনু হাসানা। ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘ছিকাতুত তাবঈন’ (নির্ভরযোগ্য তাবঈন)-এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন (৫/১৪), তাঁর থেকে দুজন নির্ভরযোগ্য রাবীর বর্ণনার মাধ্যমে। আর বুখারী ও ইবনু আবী হাতিম তাঁর সম্পর্কে জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (নির্ভরযোগ্যতা) কিছুই উল্লেখ করেননি।
**চতুর্থত:** কুরাইশী লোকটি, যার নাম উল্লেখ করা হয়নি, সুতরাং সে মাজহূল (অজ্ঞাত)।
অতঃপর আমি দেখলাম যে, ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/৩৬১/২৫৯৮) এই সনদ থেকে ভিন্ন একটি সনদে হাদীসটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘আমি আমার পিতাকে এমন একটি হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম যা হাসসান ইবনু হাসসান, ইবরাহীম ইবনু বিশর থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন (!) থেকে, তিনি ইবরাহীম আল-কুরাশী থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু শুরাহবীল থেকে, তিনি যায়দ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বললেন... অতঃপর তিনি তা সংক্ষিপ্ত ও সারসংক্ষেপ আকারে উল্লেখ করলেন। আর তিনি (ইবনু আবী হাতিম) বললেন: ‘আমার পিতা বলেছেন: এই হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত), এবং এর সনদে মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবীগণ রয়েছেন।’
(ليس بحكيم من لم يعاشر بالمعروف من لا يجد من معاشرته بدا، حتى يجعل الله له من ذلك فرجا) .
منكر
أخرجه البيهقي في ` شعب الإيمان ` (6/266 - 267/8104)
من طريق أبي عبد الله الحافظ ` بسنده ` عن عنبسة بن عبد الواحد، عن أبي عمران عن أبي فاطمة الإيادي مرفوعا. وقال:
` قال أبو عبد الله: لم نكتبه عنه إلا بهذا الإسناد وأنما نعرف هذا الكلام عن محمد ابن الحنفية من قوله `.
قلت: وعلة هذا المرفوع أبو عمران هذا، فإنه لا يعرف إلا بهذه الرواية، ولم يذكروه في شيوخ (عنبسة بن عبد الواحد) وهو ثقة، ولا في الرواة عن (أبي فاطمة الإيادي) وهو مذكور في الصحابة.
وأما الموقوف على ابن الحنفية، فهو صحيح، أخرجه الحسن بن عرفة في ` جزئه ` (50/15) ، ومن طريقه البيهقي (8105) ، وابن عساكر في ` التاريخ ` (15/731) ، والذهبي في ` السير ` (4/117) . قال ابن عرفة: حدثنا عبد الله بن المبارك عن الحسن بن عمرو الفقيمي عن منذر الثوري عن محمد بن الحنفية قال: فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح رجاله ثقات.
قلت: عرفت مما سبق أن البيهقي رواه عن شيخه أبي عبد الله الحافظ - وهو الحاكم صاحب ` المستدرك ` - ولم يعزه السيوطي في ` الجامع ` إلا للبيهقي، فتعقبع المناوي في ` فيض القدير ` بقوله - عطفا على البيهقي - :
` وكذا الحاكم، وعنه ومن طريقه خرجه البيهقي مصرحا، فلو عزاه للأصل كان أحق `.
فأقول: كذا أطلق العزو للحاكم، وسلفه في ذلك الحافظ السخاوي في ` المقاصد ` (351/912) ، وذلك مما يوهم أنه أخرجه في كتابه ` المستدرل `، وليس كذلك، فالظاهر أنه أخرجه في غيره من كتبه، ولعله في ` تاريخ نيسابور`،
فقد رأيت الحافظ الذهبي قال في ` معجم شيوخه الكبير ` عقب أثر ابن الحنفية المذكور:
` رواه الحاكم في (تاريخ بلده) `.
وعليه كان على المناوي أن لا يطلق العزو إليه، ذفعا للوهم المشار إليه. والله الموفق.
(সে ব্যক্তি জ্ঞানী নয়, যে এমন ব্যক্তির সাথে সদ্ভাব বজায় রেখে বসবাস করে না যার সাথে বসবাস করা ছাড়া তার কোনো উপায় নেই, যতক্ষণ না আল্লাহ তার জন্য তা থেকে কোনো মুক্তির পথ করে দেন।)
মুনকার
এটি বাইহাকী তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (৬/২৬৬ - ২৬৭/৮১০৪) সংকলন করেছেন।
আবূ আব্দুল্লাহ আল-হাফিযের সূত্রে, তিনি তাঁর ‘সনদ’ সহকারে আনবাসাহ ইবনু আব্দুল ওয়াহিদ হতে, তিনি আবূ ইমরান হতে, তিনি আবূ ফাতিমাহ আল-আইয়াদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে সম্বন্ধিত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি (বাইহাকী) বলেছেন:
‘আবূ আব্দুল্লাহ (আল-হাফিয) বলেছেন: আমরা এই সনদ ছাড়া এটি তাঁর (আবূ ফাতিমাহ) নিকট থেকে লিখিনি। আমরা এই কথাটি কেবল মুহাম্মাদ ইবনুল হানাফিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিজস্ব উক্তি হিসেবেই জানি।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই মারফূ’ বর্ণনাটির ত্রুটি হলো এই আবূ ইমরান। কেননা এই বর্ণনা ছাড়া তাকে জানা যায় না। আর তারা (মুহাদ্দিসগণ) তাকে (আনবাসাহ ইবনু আব্দুল ওয়াহিদ)-এর শাইখদের মধ্যে উল্লেখ করেননি, অথচ তিনি (আনবাসাহ) সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। আর তারা তাকে (আবূ ফাতিমাহ আল-আইয়াদী)-এর রাবীদের মধ্যেও উল্লেখ করেননি, অথচ তিনি (আবূ ফাতিমাহ) সাহাবীদের মধ্যে গণ্য।
আর ইবনুল হানাফিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উপর মাওকূফ (তাঁর নিজস্ব উক্তি হিসেবে বর্ণিত) বর্ণনাটি সহীহ। এটি হাসান ইবনু আরাফাহ তাঁর ‘জুয’ গ্রন্থে (৫০/১৫) সংকলন করেছেন। আর তাঁর (হাসান ইবনু আরাফাহ) সূত্রেই বাইহাকী (৮১০৫), ইবনু আসাকির ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (১৫/৭৩১) এবং যাহাবী ‘আস-সিয়ার’ গ্রন্থে (৪/১১৭) সংকলন করেছেন। ইবনু আরাফাহ বলেছেন: আমাদের নিকট আব্দুল্লাহ ইবনুল মুবারাক (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন, তিনি হাসান ইবনু আমর আল-ফুকাইমী হতে, তিনি মুনযির আস-সাওরী হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনুল হানাফিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
আমি বলি: এই সনদটি সহীহ এবং এর রাবীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।
আমি বলি: পূর্বের আলোচনা থেকে আপনি জানতে পেরেছেন যে, বাইহাকী এটি তাঁর শাইখ আবূ আব্দুল্লাহ আল-হাফিয হতে বর্ণনা করেছেন – আর তিনি হলেন ‘আল-মুসতাদরাক’-এর লেখক আল-হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ)। কিন্তু সুয়ূতী ‘আল-জামি’ গ্রন্থে এটি কেবল বাইহাকীর দিকেই সম্বন্ধিত করেছেন। ফলে মানাভী ‘ফাইদুল কাদীর’ গ্রন্থে বাইহাকীর সাথে যোগ করে এই বলে তার সমালোচনা করেছেন:
‘আর অনুরূপভাবে আল-হাকিমও (সংকলন করেছেন)। আর তাঁর (আল-হাকিম) নিকট হতে এবং তাঁর সূত্রেই বাইহাকী স্পষ্টভাবে এটি সংকলন করেছেন। সুতরাং যদি তিনি (সুয়ূতী) মূল উৎসের দিকে সম্বন্ধিত করতেন, তবে তা অধিকতর সঠিক হতো।’
আমি বলি: এভাবে আল-হাকিমের দিকে সাধারণভাবে সম্বন্ধিত করা হয়েছে। আর এই ক্ষেত্রে তাঁর (মানাভীর) পূর্বসূরি হলেন হাফিয আস-সাখাবী ‘আল-মাকাসিদ’ গ্রন্থে (৩৫১/৯১২)। আর এটি এই ধারণা দেয় যে, তিনি এটি তাঁর ‘আল-মুসতাদরাক’ গ্রন্থে সংকলন করেছেন। কিন্তু বিষয়টি এমন নয়। বরং স্পষ্টত তিনি এটি তাঁর অন্যান্য গ্রন্থে সংকলন করেছেন। সম্ভবত তা ‘তারীখে নাইসাবূর’ গ্রন্থে রয়েছে।
কেননা আমি দেখেছি যে, হাফিয যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) উল্লিখিত ইবনুল হানাফিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর আছারের পরে তাঁর ‘মু’জামু শুয়ূখিহিল কাবীর’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘আল-হাকিম এটি (তাঁর) ‘তারীখে বালাদিহী’ (তাঁর শহরের ইতিহাস) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।’
অতএব, উল্লিখিত ভুল ধারণা দূর করার জন্য মানাভীর উচিত ছিল না যে, তিনি সাধারণভাবে তাঁর (আল-হাকিমের) দিকে সম্বন্ধিত করবেন। আর আল্লাহই তাওফীকদাতা।
(إنه لم يكن نبي قبلي إلا قد أعطي سبعة رفقاء نجباء وزراء، وإني أعطيت أربعة عشر: حمزة، وجعفر، وعلي، وحسن، وحسين، وأبو بكر، وعمر، والمقداد، وعبد الله بن مسعود، وأبو ذر، وحذيفة، وسليمان، وعمار، وبلال) .
منكر
أخرجهالترمذي (9/390/3787) وحسنه، والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (4/17 - 18 - هند) ، وأحمد (1/148) ، وفي ` فضائل الصحابة ` (1/228/227و2/715/1225) ، وابن أبي عاصم في ` السنة ` (2/617/1421) ، والبزالر في ` مسنده ` (3/220 - 221 - الكشف) ، وأبو نعيم في ` الحلية ` (1/128) ، وابن عدي في ` الكامل ` (6/66 - 67) ، وابن عساكر في ` التاريخ ` (4/516 - المصورة و 10/321 - ط) من طرق عن كثير بن نافع النواء قال: سمعت عبد الله بن مليل، قال: سمعت عليا رضي الله عنه يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. والسياق لأحمد.
ورواه سفيان بن عيينة، فقال: عن كثير النواء عن أبي إدريس - وفي رواية لم يقل: عن أبي إدريس - عن المسيب بن نجبة عن علي به.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (6/264/6047 و 6048) ، وابن عساكر في رواية.
قلت: وهذا من اضطراب (كثير النواء) فإنه ضعيف باتفاق الجمهور، بل قال السعدي:
` متروك ` كما في ` الكامل ` وإلى ذلك أشار أبو حاتم بقوله فيه:
` ضعيف الحديث `، بابة (سعد بن طريف) `.
وكذا قال في سعد هذا وزاد:
` متروك الحديث `.
وقال الذهبي في ` المغني `:
` شيعي جلد، ضعفوه `.
وذكر له في ` الميزان ` تبعا لابن عدي حدثين مما أنكر عليه هذا أحدهما والآخر سيأتي تخريجه تحت الحديث (6267) .
ومن الطريق المشارأليها ما رواه إسماعيل بن زكريا عن كثير النواء به، مختصرا دون تسمية وزرائه صلى الله عليه وسلم.
أخرجه أحمد، وابنه عبد الله في ` زوائده ` (1/88) .
ورواه سفيان الثوري عن سالم بن أبي حفصة قال: بلغني عن عبد الله بن مليل [هذا الحديث] ، فغدوت إليه، فوجدته في جنازة، فحدثني رجل عن عبد الله بن مليل قال: سمعت عليا يقول: فذكره بنحوه موقوفا.
أخرجه أحمد (1/142) ، وفي ` الفضائل ` (1/228/275) ، وابنه عبد الله فيه (276) ،والسياق له وهو رواية للطحاوي، والزيادة له.
وسالم بن أبي حفصة صدوق في الحديث، وإن كان شيعيا غاليا كما في
` التقريب `، ولكن شيخه الذي حدثه عن عبد الله بن مليل لم يسم، فهو مجهول، ويغلب على الظن أنه كثير النواء، فإن كان غيره، فعبد الله بن مليل مجهول أيضا لم يوثقه غير ابن حبان (7/55) ، وجهالته إما حالية، أو عينية، على ما بينته في ` تيسير الانتفاع `.
(تنبيه) : وقع اسم والد (عبد الله بن مليل) في كل طرق حديث ` مشكل الآثار `: (منين) فوثقه المعلق عليه الشيخ (الحسن النعماني) ، نقلا عن ` تقريب العسقلاني ` ولم ينتبه أنه تحرف على ناسخ ` المشكل `، وعلى الصواب وقع في طبعة المؤسسة (7/196 - 199) .
(আমার পূর্বে এমন কোনো নবী ছিলেন না, যাঁকে সাতজন অভিজাত সঙ্গী ও উজির (মন্ত্রী) দেওয়া হয়নি। আর আমাকে চৌদ্দজন দেওয়া হয়েছে: হামযাহ, জা‘ফর, আলী, হাসান, হুসাইন, আবূ বকর, উমার, মিকদাদ, আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ, আবূ যার, হুযাইফাহ, সুলাইমান, আম্মার এবং বিলাল।)
মুনকার
এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (৯/৩৯০/৩৭৮৭) এবং তিনি এটিকে হাসান বলেছেন, ত্বাহাবী তাঁর ‘মুশকিলাল আ-ছার’ গ্রন্থে (৪/১৭-১৮ - হিন্দ), আহমাদ (১/১৪৮), এবং ‘ফাযা-ইলুস সাহা-বাহ’ গ্রন্থে (১/২২৮/২২৭ ও ২/৭১৫/১২২৫), ইবনু আবী আ-সিম তাঁর ‘আস-সুন্নাহ’ গ্রন্থে (২/৬১৭/১৪২১), বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৩/২২০-২২১ - আল-কাশফ), আবূ নু‘আইম তাঁর ‘আল-হিলইয়াহ’ গ্রন্থে (১/১২৮), ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কা-মিল’ গ্রন্থে (৬/৬৬-৬৭), ইবনু আসাকির তাঁর ‘আত-তা-রীখ’ গ্রন্থে (৪/৫১৬ - আল-মুসাওওয়ারাহ ও ১০/৩২১ - ত্ব) বিভিন্ন সূত্রে কাছীর ইবনু না-ফি‘ আন-নাওয়া- থেকে। তিনি বলেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইলকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। আর এই বর্ণনাটি আহমাদের।
আর এটি সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: কাছীর আন-নাওয়া- থেকে, তিনি আবূ ইদরীস থেকে – এবং অন্য বর্ণনায় তিনি আবূ ইদরীস থেকে বলেননি – তিনি আল-মুসাইয়্যাব ইবনু নুজবাহ থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।
এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু‘জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৬/২৬৪/৬০৪৭ ও ৬০৪৮), এবং ইবনু আসাকির অন্য এক বর্ণনায়।
আমি (আলবানী) বলি: এটি (কাছীর আন-নাওয়া)-এর ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা)-এর অন্তর্ভুক্ত। কেননা তিনি জমহুর (অধিকাংশ মুহাদ্দিস)-এর ঐকমত্যে যঈফ (দুর্বল)। বরং আস-সা‘দী বলেছেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যাজ্য), যেমনটি ‘আল-কা-মিল’ গ্রন্থে রয়েছে। আবূ হা-তিম তাঁর সম্পর্কে এই কথা বলে সেদিকেই ইঙ্গিত করেছেন: ‘যঈফ আল-হাদীস (দুর্বল হাদীসের বর্ণনাকারী), সা‘দ ইবনু ত্বারীফ-এর স্তরের।’ আর তিনি এই সা‘দ সম্পর্কেও একই কথা বলেছেন এবং অতিরিক্ত বলেছেন: ‘মাতরূক আল-হাদীস’ (পরিত্যাজ্য হাদীসের বর্ণনাকারী)। যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তিনি কঠোর শী‘আ, মুহাদ্দিসগণ তাঁকে যঈফ বলেছেন।’ তিনি ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে ইবনু আদী-এর অনুসরণ করে তাঁর (কাছীর আন-নাওয়া-এর) দুটি হাদীস উল্লেখ করেছেন, যা তাঁর উপর মুনকার হিসেবে আরোপ করা হয়েছে। এটি তার মধ্যে একটি, আর অন্যটির তাখরীজ (সূত্র) হাদীস (৬২৬৭)-এর অধীনে আসবে।
উল্লিখিত সূত্রগুলোর মধ্যে একটি হলো যা ইসমাঈল ইবনু যাকারিয়া কাছীর আন-নাওয়া- থেকে বর্ণনা করেছেন, সংক্ষেপে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উজিরদের নাম উল্লেখ করা ছাড়াই।
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ, এবং তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ তাঁর ‘যাওয়া-ইদ’ গ্রন্থে (১/৮৮)।
আর এটি সুফিয়ান আস-সাওরী সা-লিম ইবনু আবী হাফসাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইল থেকে [এই হাদীসটি] আমার কাছে পৌঁছেছিল। আমি তার কাছে সকালে গেলাম, তখন তাকে একটি জানাযায় পেলাম। অতঃপর একজন লোক আমাকে আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইল থেকে হাদীসটি বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: আমি আলীকে বলতে শুনেছি: অতঃপর তিনি অনুরূপভাবে মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি হিসেবে) হিসেবে তা উল্লেখ করেন।
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (১/১৪২), এবং ‘আল-ফাযা-ইল’ গ্রন্থে (১/২২৮/২৭৫), এবং তাঁর পুত্র আব্দুল্লাহ তাতে (২৭৬), আর এই বর্ণনাটি তাঁরই (আব্দুল্লাহর), এবং এটি ত্বাহাবী-এর একটি বর্ণনা, আর অতিরিক্ত অংশটি তাঁরই। সা-লিম ইবনু আবী হাফসাহ হাদীসের ক্ষেত্রে ‘সাদূক’ (সত্যবাদী), যদিও তিনি কঠোর শী‘আ ছিলেন, যেমনটি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে। কিন্তু তাঁর শায়খ, যিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইল থেকে তাঁকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, তাঁর নাম উল্লেখ করা হয়নি, সুতরাং তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)। প্রবল ধারণা এই যে, তিনি কাছীর আন-নাওয়া-। যদি তিনি অন্য কেউ হন, তবে আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইলও মাজহূল, ইবনু হিব্বান (৭/৫৫) ছাড়া আর কেউ তাঁকে বিশ্বস্ত বলেননি। তাঁর এই অজ্ঞতা হয় ‘হা-লিয়াহ’ (অবস্থার দিক থেকে), অথবা ‘আইনিয়্যাহ’ (ব্যক্তির দিক থেকে), যেমনটি আমি ‘তাইসীরুল ইনতিফা-’ গ্রন্থে স্পষ্ট করেছি।
(সতর্কতা): ‘মুশকিলাল আ-ছার’ গ্রন্থের হাদীসের সকল সূত্রে (আব্দুল্লাহ ইবনু মুলাইল)-এর পিতার নাম এসেছে: (মুনাইন)। এর উপর মন্তব্যকারী শায়খ (আল-হাসান আন-নু‘মানী) ‘তাকরীবুল আসক্বালানী’ থেকে উদ্ধৃত করে তাঁকে বিশ্বস্ত বলেছেন। কিন্তু তিনি খেয়াল করেননি যে, এটি ‘আল-মুশকিলাত’-এর লিপিকারের দ্বারা বিকৃত হয়েছে। আর সঠিক নামটি মুআস্সাসাহ সংস্করণে (৭/১৯৬-১৯৯) এসেছে।
(إن الله يبغض العفريت النفريت الذي لا يرزأ في ولده، ولا يصاب في ماله) .
ضعيف. أخرجه الحارث بن أبي أسامة في ` مسنده ` (ق 33/1) حدثنا يحيى بن إسحاق: أنبأ عبد الواحد بن زياد عن عاصم الأحوال عن ابي عثمان النهدي قال:
دخل على النبي صلى الله عليه وسلم أعرابي جسيم أو جسمان عظيم، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:متى عهدك بالحمى؟ قال: لا أعرفها. قال: فالصداع؟ قال: لا أدري ماهو. قال: فأصبت بمالك؟ قال: لا. قال: فرزئت بولدك؟ قال: لا. فقال النبي صلى الله عليه وسلم. . . فذكره.
قلت: وهذا إسناد صحيح مرسل رجاله ثقات رجال الشيخين، غير يحيى بن إسحاق - وهو السيلحيني - فهو من شيوخ مسلم. وأبو عثمان النهدي اسمه عبد الرحمن بن مل، وهو من كبارالتابعين، فالحديث مرسل، وكذلك ذكره ابن قتيبة
في ` غريب الحديث ` كما رواه عنه القضاعي في ` مسند الشهاب ` (ق 90/2) ، وقد روي موصولا، فقال الرامهرمزي في ` الأمثال` (ص 160 - حيدر أباد) : حدثنا عبدان بن عبد الرحمن الشافعي: حدثنا هلال بن يحيى بن مسلم: حدثنا عبد الواحد بن زياد بسنده المتقدم عن النهدي عن أبي سعيد الخدري:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بايع الناس وفيهم رجل دحسمان فقال النبي صلى الله عليه وسلم. . . فذكره نحوه.
لكن عبدان هذا وشيخه هلال بن يحيى لم أجد لهما ترجمة، فيبقى الحديث على الإرسال، فهو ضعيف. والله أعلم.
(নিশ্চয় আল্লাহ তাআলা সেই ধূর্ত, অহংকারী ব্যক্তিকে ঘৃণা করেন, যার সন্তান-সন্ততিতে কোনো ক্ষতি হয় না এবং তার সম্পদেও কোনো বিপদ আসে না।)
যঈফ (দুর্বল)।
এটি বর্ণনা করেছেন আল-হারিস ইবনু আবী উসামাহ তাঁর ‘মুসনাদ’-এ (খন্ড ৩৩/১)। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু ইসহাক: তিনি খবর দিয়েছেন আব্দুল ওয়াহিদ ইবনু যিয়াদ থেকে, তিনি আসিম আল-আহওয়াল থেকে, তিনি আবূ উসমান আন-নাহদী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে। তিনি বলেন:
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এক বিশালদেহী বা বিরাটকায় গ্রাম্য আরব প্রবেশ করল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: তোমার সর্বশেষ কবে জ্বর হয়েছিল? সে বলল: আমি জ্বর চিনি না। তিনি বললেন: তাহলে মাথাব্যথা? সে বলল: মাথাব্যথা কী, তা আমি জানি না। তিনি বললেন: তোমার সম্পদে কি কোনো বিপদ এসেছে? সে বলল: না। তিনি বললেন: তোমার সন্তান-সন্ততিতে কি কোনো ক্ষতি হয়েছে? সে বলল: না। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন. . . অতঃপর তিনি (উপরের) হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি সহীহ, কিন্তু মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য এবং শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর বর্ণনাকারী। তবে ইয়াহইয়া ইবনু ইসহাক - যিনি আস-সায়লাহিনী - তিনি মুসলিমের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত। আর আবূ উসমান আন-নাহদী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নাম হলো আব্দুল রহমান ইবনু মিল। তিনি কুবরা তাবেঈনদের অন্তর্ভুক্ত। সুতরাং হাদীসটি মুরসাল।
অনুরূপভাবে ইবনু কুতাইবাহও এটিকে ‘গারীবুল হাদীস’-এ উল্লেখ করেছেন, যেমনটি আল-কুদ্বাঈ তাঁর ‘মুসনাদুশ শিহাব’-এ (খন্ড ৯০/২) তাঁর (ইবনু কুতাইবাহর) সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
এটি মাওসূল (সংযুক্ত) সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে। আর-রামাহুরমুযী ‘আল-আমসাল’-এ (পৃষ্ঠা ১৬০ - হায়দারাবাদ) বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবদান ইবনু আব্দুর রহমান আশ-শাফিঈ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হিলাল ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু মুসলিম: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল ওয়াহিদ ইবনু যিয়াদ তাঁর পূর্বোক্ত সনদসহ আন-নাহদী থেকে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে:
নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মানুষের নিকট বাইয়াত নিচ্ছিলেন, আর তাদের মধ্যে একজন বিশালদেহী লোক ছিল। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন. . . অতঃপর তিনি অনুরূপ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।
কিন্তু এই আবদান এবং তার শাইখ হিলাল ইবনু ইয়াহইয়া, আমি তাদের উভয়ের জীবনী খুঁজে পাইনি। সুতরাং হাদীসটি মুরসাল হিসেবেই রয়ে গেল, তাই এটি যঈফ (দুর্বল)। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।