হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2661)


(دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم، وهو يمسي على أربع، وعلى ظهره الحسن والحسين، وهو يقول:
نعم الجمل جملكما، ونعم العدلان أنتما) .
منكر جدا بهذا السياق

أخرجه العقيلي في ` الضعفاء ` (4/247) ، والرامهرمزي في ` الأمثال ` (201/98) ، وابن عدي في ` الكامل ` (5/259) ، والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3/46/2621) ، وابن حبان في ` الضعفاء ` (3/19) ، وابن الجوزي في ` العلل ` (1/254 - 255 9، وكذا الدولابي في ` الكني ` (2/6) ،وابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (4/511 - 512) من طريق مسروح أبي شهاب هن سفيان الثوري عن أبي الزبير عن جابر قال: فذكره. وقال العقيلي:
` مسروح لا يتابع على حديثه، ولا يعرف إلا به، وقد روي بأسناد أصلح من هذا، وبخلاف هذا اللفظ `.
وقال ابن حبان:
` يروي عن الثوري ما لا يتابع عليه، لا يجوز الا حتجاج بخبره، لمخالفته الأثبات في كل ما يرويه `.
وقال الدولابي:
` قال أبو عبد الرحمن النسائى: هذا الحديث منكر، يشبه أن يكون باطلا `.
وقال ابن أبي حاتم (4/1/424) :
` سألت ابي عنه، وعرضت عليه بعض حديثه؟ فقال: ` لا أعرفه ` وقال: يحتاج أن يتوب إلى الله عز وجل من حديث باطل رواه عن الثوري `.
` إي والله، هذا هو الحق: أن كل من روى حديثا يعلم أنه غير صحيح فعليه التوبه أو يهتكه `.
وأفاد الحافظ العسقلاني في ` اللسان ` أن أبا حاتم يعني هذا الحديث. ونقل عن ابن عدي أنه قال في (مسرح) هذا:
` مجهول `.
وعليه يدل كلام العقيلي وأبي حاتم، فقول الذهبي في ` السير ` (3/256) عقب الحديث:
` مسروح لين `، ونحوه قول الهيثمي (9/182) : ` ضعيف `!
فهو غير منسجم مع كلامهما. فتأمل.
وقول العقيلي المتقدم: ` وقد روي بإسناد أصلح. . . ` يشير إلى حديث عمر أو غيره بلفظ آخر نحوه بلفظ:
` على عاتقي النبي صلى الله علبه وسلم `. ليس فيه التشبيه المنكر. وقد خرجته في ` الصحيحة ` (3320) محسنا إياه لطرفه.
(تنبيهات) :
أحدهما: لفظ الحديث في كل المصادر المتقدمة: ` الجمل جملكما ` بالجيم في اللفظين، إلا في ` كامل ` ابن عدي، فهما فيه بالحاء المهملة! وكذلك وقع في تاريخ ابن كثير ` البداية ` (8/36 - السعادة) ، فإن طابعها لم يتشبع بما تشبع به طابع ` الكامل ` بقوله مزينا الوجه الأول به: ` تحقيق الدكتور فلان، ودققها على المخطوطات فلان خريج جامعة أم القرى `! هذا في الطبعة الثالثة التي إليها العزو، واما الطبعة الأولى منه فكانت العبارة فيه هكذا: ` تحقيق وضبط ومراجعة لجنة من المختصين بإشراف الناشر `! بدعة ابتداعها بعض الناشرين ترويجا للبضاعة وزرها أول من ابتدعها.
والآخر: أن الحديث وقع في ` التاريخ ` معزوا للترمذي عن أبي الزبير عن جابر. وهو خطأ فاحش لعله من الطابع أو الناسخ. وأفحش منه قوله عقبه: ` على شرط مسلم، ولم يخرجوه `! فقد عرفت أنه تفرد به مسروح، وأنه مع جهالته ليس من رجال مسلم. نعم عند الترمذي حديث ابن عباس بلفظ:
` ونعم الراكب هو `.
وسأذكره إن شاء الله في الموضع المشار إليه من ` الصحيحة `، وقد عزاه في ` التاريخ ` لأبي يعلى، وسبقه إلى ذلك ابن عساكر، ولم أره في ` المسند ` المطبوع لأبي يعلى، ولا عزاه إليه الهيثمي وغيره، وإنما عند أبي يعلى في ` المسند الكبير ` حديث عمر المشار إليه آنفا. ولله سبحانه وتعالى أعلم.
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(আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম, তখন তিনি চার হাত-পায়ের উপর ভর দিয়ে হাঁটছিলেন, আর তাঁর পিঠের উপর ছিলেন হাসান ও হুসাইন। তিনি বলছিলেন: তোমাদের উট কতই না উত্তম উট, আর তোমরা দু’জন কতই না উত্তম বোঝা।)
এই সূত্রে এটি খুবই মুনকার (Munkar Jiddan)।

এটি বর্ণনা করেছেন উকাইলী ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে (৪/২৪৭), রামাহুরমুযী ‘আল-আমসাল’ গ্রন্থে (২০১/৯৮), ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৫/২৫৯), ত্বাবারানী ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৩/৪৬/২৬২১), ইবনু হিব্বান ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে (৩/১৯), ইবনু আল-জাওযী ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (১/২৫৪-২৫৫), অনুরূপভাবে দুলাবী ‘আল-কুনা’ গ্রন্থে (২/৬), এবং ইবনু আসাকির ‘তারীখে দিমাশক’ গ্রন্থে (৪/৫১১-৫১২) মাসরূহ আবূ শিহাবের সূত্রে সুফিয়ান আস-সাওরী হতে, তিনি আবূয যুবাইর হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি (জাবির) বলেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

উকাইলী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন:
‘মাসরূহ তার হাদীসের উপর অনুসরণীয় নন, তাকে কেবল এই হাদীসের মাধ্যমেই জানা যায়। আর এটি এর চেয়ে উত্তম সনদ এবং এই শব্দের ব্যতিক্রম শব্দে বর্ণিত হয়েছে।’

ইবনু হিব্বান (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন:
‘সে সাওরী হতে এমন কিছু বর্ণনা করে যার উপর সে অনুসরণীয় নয়। তার বর্ণনার দ্বারা দলীল পেশ করা জায়েয নয়, কারণ সে যা কিছু বর্ণনা করে তাতে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের বিরোধিতা করে।’

দুলাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন:
‘আবূ আব্দুর রহমান আন-নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: এই হাদীসটি মুনকার, এটি বাতিল হওয়ার কাছাকাছি।’

ইবনু আবী হাতিম (৪/১/৪২৪) বলেন:
‘আমি আমার পিতাকে (আবূ হাতিমকে) তার (মাসরূহের) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম এবং তার কিছু হাদীস তার সামনে পেশ করলাম? তিনি বললেন: ‘আমি তাকে চিনি না।’ এবং তিনি বললেন: ‘সাওরী হতে সে যে বাতিল হাদীস বর্ণনা করেছে, তার জন্য তার উচিত মহান আল্লাহর কাছে তওবা করা।’

‘হ্যাঁ, আল্লাহর কসম, এটাই সত্য: যে ব্যক্তি এমন হাদীস বর্ণনা করে যা সে জানে যে সহীহ নয়, তার উপর তওবা করা ওয়াজিব, অথবা সে নিজেকে (তার সম্মান) নষ্ট করে।’

হাফিয আল-আসকালানী ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন যে, আবূ হাতিম এই হাদীসটিকেই উদ্দেশ্য করেছেন। তিনি ইবনু আদী হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি এই (মাসরূহ) সম্পর্কে বলেছেন:
‘মাজহূল’ (অজ্ঞাত)।

আর উকাইলী ও আবূ হাতিমের বক্তব্য এর দিকেই ইঙ্গিত করে। সুতরাং হাদীসটির পরে যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আস-সিয়ার’ গ্রন্থে (৩/২৫৬) এই উক্তি: ‘মাসরূহ দুর্বল (লায়্যিন)’, এবং অনুরূপভাবে হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উক্তি (৯/১৮২): ‘যঈফ’ (দুর্বল)!—এই দু’জনের (উকাইলী ও আবূ হাতিমের) বক্তব্যের সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ নয়। অতএব, চিন্তা করুন।

আর উকাইলী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পূর্বোক্ত উক্তি: ‘আর এটি এর চেয়ে উত্তম সনদ...’ ইঙ্গিত করে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বা অন্য কারো হাদীসের দিকে, যা অন্য শব্দে বর্ণিত হয়েছে, যেমন: ‘নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাঁধের উপর’। এতে মুনকার সাদৃশ্য (তাশবীহ) নেই। আমি এটিকে ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (৩৩২০) এর অংশবিশেষের কারণে ‘হাসান’ হিসেবে তাখরীজ করেছি।

(সতর্কীকরণসমূহ):
প্রথমত: পূর্বোক্ত সকল উৎসে হাদীসের শব্দ হলো: উভয় শব্দে ‘জীম’ (ج) সহ ‘আল-জামালু জামালুকুমা’ (الجمل جملكما), তবে ইবনু আদী’র ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে উভয়টিই ‘হা’ (ح) সহ (আল-হামালু হামালুকুমা) এসেছে! অনুরূপভাবে ইবনু কাসীরের ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থ ‘আল-বিদায়াহ’ (৮/৩৬ - আস-সা’আদাহ) গ্রন্থেও এটি এসেছে। এর মুদ্রক ‘আল-কামিল’ গ্রন্থের মুদ্রকের মতো প্রথম পৃষ্ঠাকে এই কথা দ্বারা সজ্জিত করে তৃপ্ত হননি: ‘ডক্টর অমুকের তাহকীক, এবং উম্মুল কুরা বিশ্ববিদ্যালয়ের স্নাতক অমুক কর্তৃক পাণ্ডুলিপিগুলোর উপর সূক্ষ্ম নিরীক্ষা’! এটি তৃতীয় সংস্করণের কথা, যার দিকে আমি ইঙ্গিত করছি। আর এর প্রথম সংস্করণে বাক্যটি ছিল এমন: ‘প্রকাশকের তত্ত্বাবধানে বিশেষজ্ঞ কমিটির তাহকীক, বিন্যাস ও পর্যালোচনা’! এটি এমন একটি বিদ’আত যা কিছু প্রকাশক তাদের পণ্য প্রচারের জন্য উদ্ভাবন করেছে এবং যে প্রথম এটি উদ্ভাবন করেছে তার উপর এর পাপ বর্তাবে।

দ্বিতীয়ত: এই হাদীসটি ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে আবূয যুবাইর হতে জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করা হয়েছে। এটি একটি মারাত্মক ভুল, সম্ভবত মুদ্রক বা লিপিকারের পক্ষ থেকে। আর এর চেয়েও মারাত্মক হলো এর পরে তার উক্তি: ‘এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী, কিন্তু তারা এটি বর্ণনা করেননি’! অথচ আপনি জেনেছেন যে, এটি মাসরূহ এককভাবে বর্ণনা করেছেন, এবং তার মাজহূল হওয়া সত্ত্বেও সে মুসলিমের রাবীদের অন্তর্ভুক্ত নয়। হ্যাঁ, তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি এই শব্দে রয়েছে: ‘আর তিনি কতই না উত্তম আরোহী।’ আমি ইনশাআল্লাহ ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থের নির্দেশিত স্থানে এটি উল্লেখ করব। আর তিনি (ইবনু কাসীর) ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে এটিকে আবূ ইয়া’লা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করেছেন, এবং ইবনু আসাকির (রাহিমাহুল্লাহ) তার পূর্বে এটি করেছেন। আমি এটিকে আবূ ইয়া’লা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মুদ্রিত ‘আল-মুসনাদ’ গ্রন্থে দেখিনি, আর হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) বা অন্য কেউও এটিকে তার দিকে সম্বন্ধযুক্ত করেননি। বরং আবূ ইয়া’লা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-মুসনাদুল কাবীর’ গ্রন্থে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি রয়েছে, যা পূর্বে ইঙ্গিত করা হয়েছে। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলাই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2662)


(بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم في ليلة باردة، أو في غداة باردة فذهبت ثم جئت ورسول الله صلى الله عليه وسلم معه بعض نسائه في لحاف، فطرح علي طرف ثوبه [فصرنا ثلاثة] ) .
موضوع

أخرجه الحاكم (3/364) ، والبزار (3/212/2595) ، وابن أبي عاصم في ` السنة ` (2/611/1394) ، وابن عساكر في ` التاريخ ` (6/374) من طرق عن إسحاق بن إدريس: حدثنا أبو معاوية الضرير: حدثنا هشام بن عروة عن أبيه عن عبد الله بن الزبير عن أبيه قال: فذكره. والسياق للبزار، وقال:
` لا نعلم له إسنادا غير هذا، ولا تابع إسحاق عليه أحد `.
قلت: وهوالأسواري، قال البخاري:
` تركه الناس `.
وتبنى هذا الذهبي في ` المغني `. وفي ` الميزان `:
` وقال يحيى بن معين: كذاب يضع الحديث `.
ومع هذا قال الحاكم عقب الحديث:
` صحيح الإسناد `! والظاهر أنه خفي عليه حال الأسواري هذا، لكن الغريب أن الذهبي أقره ولم يتعقبه بشيء! والأعجب من ذلك أن الزيادة في آخر المتن هي عند الحاكم من طريق محمد بن سنان القزاز، قال الذهبي في ` المغني `:
` رماه بالكذب أبو داود وابن خراش `.
والحديث قال الهيثمي في ` المجمع ` (9/152) :
` رواه البزار، وفيه إسحاق بن إدريس، وهو متروك `.
وأما ما نقله الدكتور محفوظ الرحمن في تعليقه على ` البحر الزخار` (3/184) عن الهيثمي أنه قال في نفس الموضع الذي أشرت إليه:
` رواه البزار، وإسناده حسن `!
فهو وهم محض، سببه أنه انتقل بصره حين النقل عنه إلى قول الهيثمي عقب الحديث الذي يلي هذا عنده مباشرة، وهو قوله:
` وعن ابن عمر: أن الزبير استأذن عمر في الجهاد؟ فقال: اجلس فقد جاهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. رواه البزار، وإسناده حسن `.
على أن هذا التحسين غير مسلم، لأن البزار أخرجه عقب حديث الترجمة برقم (2596) من طريق فضيل بن مرزوق عن عطية عن ابن عمر، وهذا إسناد معروف ضعفه، وهو إسناد حديث: ` اللهم بحق السائلين عليك. . . ` المتقدم تخريجه وبيان ضعفه في المجلد الأول برقم (24) ، والرد في مقدمته على الشيخ إسماعيل الأنصاري، الذي انتصر لشيخ الدعوة محمد بن عبد الوهاب رحمه الله بالباطل، والاعتداء على المؤلف ببهته والافتراء عليه، وتكلف تكلفا ظاهرا في تقويه الحديث، فراجعها فإنها مهمة.
نعم لحديث ابن عمر هذا طريق آخر يرويه قيس بن أبي حازم: أن الزبير استأذن عمر. . . فذكره.

أخرجه البزار أيضا (2597) ، وهو في ` مسند عمر ` من ` البحر الزخار ` (1/466/332) وقال:
` وهذا الإ سناد أحسن من إسناد حديث فضيل `.
وقال الحافظ عقبه في ` مختصر الزوائد ` (2/324) :
` قلت: وأصح، بل هو صحيح مطلقا `.
وهو كما قال رحمه الله.
ورواه حبلة بن سحيم عن عبد الله بن عمر به، وأتم منه.

أخرجه ابن عساكر (6/380) ، وفيه رجل لم يسم.
ثم رأيت حديث الترجمة في ` العلل ` لابن أبي حاتم (2/371) وقال عقبه:
` قال أبو زرعة: لا أعلم رواه غير إسحاق بن إدريس، وهو واه `.
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(রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এক ঠাণ্ডা রাতে, অথবা এক ঠাণ্ডা সকালে পাঠালেন। আমি গেলাম, তারপর ফিরে এলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কিছু স্ত্রীর সাথে এক কম্বলের নিচে ছিলেন। তিনি তাঁর কাপড়ের এক প্রান্ত আমার উপর ফেলে দিলেন [ফলে আমরা তিনজন হলাম])।
মাওদ্বূ (জাল)

এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (৩/৩৬৪), বাযযার (৩/২১২/২৫৯৫), ইবনু আবী আসিম তাঁর ‘আস-সুন্নাহ’ গ্রন্থে (২/৬১১/১৩৯৪), এবং ইবনু আসাকির তাঁর ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৬/৩৭৪) ইসহাক ইবনু ইদরীস থেকে বিভিন্ন সূত্রে। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ মু'আবিয়াহ আদ্ব-দ্বা'রীর: তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন হিশাম ইবনু উরওয়াহ তাঁর পিতা থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি তাঁর পিতা (যুবাইর ইবনু আওয়াম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) থেকে। তিনি (যুবাইর) বলেন: অতঃপর তিনি (হাদীসটি) উল্লেখ করেন। আর হাদীসের শব্দগুলো বাযযারের। তিনি (বাযযার) বলেন:
‘আমরা এই সূত্র ছাড়া এর অন্য কোনো সনদ জানি না, আর ইসহাককে এর উপর কেউ অনুসরণও করেনি।’
আমি (আলবানী) বলি: আর ইনি হলেন আল-আসওয়ারী। ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘মানুষ তাকে পরিত্যাগ করেছে।’ ইমাম যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে এই মত গ্রহণ করেছেন। আর ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে (আছে):
‘ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: সে মিথ্যাবাদী, হাদীস জাল করত।’
এতদসত্ত্বেও হাকিম হাদীসটির শেষে বলেছেন: ‘সহীহুল ইসনাদ’ (সহীহ সনদ)! স্পষ্টতই আল-আসওয়ারী’র অবস্থা তাঁর কাছে গোপন ছিল। কিন্তু আশ্চর্যের বিষয় হলো, ইমাম যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে সমর্থন করেছেন এবং কোনো আপত্তি জানাননি! এর চেয়েও বিস্ময়কর হলো, মতন (মূল হাদীস)-এর শেষে যে অতিরিক্ত অংশটি রয়েছে, তা হাকিমের কাছে মুহাম্মাদ ইবনু সিনান আল-কায্যায-এর সূত্রে বর্ণিত। ইমাম যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘আবূ দাঊদ ও ইবনু খিরাশ তাকে মিথ্যাবাদী বলে অভিযুক্ত করেছেন।’
আর হাদীসটি সম্পর্কে হাইসামী ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৯/১৫২) বলেছেন:
‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এতে ইসহাক ইবনু ইদরীস রয়েছে, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
আর ডক্টর মাহফূযুর রহমান ‘আল-বাহর আয-যাখখার’ (৩/১৮৪)-এর টীকায় হাইসামী থেকে যা উদ্ধৃত করেছেন যে, তিনি আমার নির্দেশিত একই স্থানে বলেছেন:
‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এর সনদ হাসান’!
এটি সম্পূর্ণ ভুল ধারণা। এর কারণ হলো, যখন তিনি হাইসামী থেকে উদ্ধৃত করছিলেন, তখন তাঁর দৃষ্টি সরাসরি এর পরের হাদীসের উপর হাইসামী’র মন্তব্যের দিকে চলে গিয়েছিল। আর সেটি হলো তাঁর এই উক্তি:
‘ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে জিহাদের অনুমতি চাইলেন? তিনি বললেন: বসে থাকো, তুমি তো রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে জিহাদ করেছ। এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এর সনদ হাসান।’
যদিও এই ‘হাসান’ বলা গ্রহণযোগ্য নয়। কারণ বাযযার এটি মূল হাদীসের পরপরই (২৫৯৬) নং-এ ফুদাইল ইবনু মারযূক্ব-এর সূত্রে আতিয়্যাহ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এই সনদটির দুর্বলতা সুপরিচিত। এটি সেই হাদীসের সনদ: ‘হে আল্লাহ! তোমার কাছে যাচনাকারীদের অধিকারের মাধ্যমে...’ যার তাখরীজ ও দুর্বলতার বর্ণনা প্রথম খণ্ডে (২৪) নং-এ পূর্বে করা হয়েছে। আর এর ভূমিকায় শাইখ ইসমাঈল আল-আনসারী’র জবাব দেওয়া হয়েছে, যিনি বাতিলভাবে শাইখুদ দাওয়াহ মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল ওয়াহহাব (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পক্ষাবলম্বন করেছেন এবং লেখকের উপর মিথ্যা অপবাদ ও বানোয়াট কথা আরোপ করে আক্রমণ করেছেন, আর হাদীসটিকে শক্তিশালী করার জন্য সুস্পষ্টভাবে কষ্ট স্বীকার করেছেন। সুতরাং আপনি সেটি দেখে নিন, কারণ তা গুরুত্বপূর্ণ।
হ্যাঁ, ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসের আরেকটি সূত্র রয়েছে, যা ক্বাইস ইবনু আবী হাযিম বর্ণনা করেছেন: যে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে অনুমতি চাইলেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
এটি বাযযারও বর্ণনা করেছেন (২৫৯৭), আর এটি ‘আল-বাহর আয-যাখখার’-এর ‘মুসনাদ উমার’ অংশে (১/৪৬৬/৩৩২) রয়েছে। তিনি (বাযযার) বলেন:
‘আর এই সনদটি ফুদাইল-এর হাদীসের সনদ থেকে উত্তম।’
আর হাফিয (ইবনু হাজার) এর পরপরই ‘মুখতাসারুয যাওয়ায়িদ’ গ্রন্থে (২/৩২৪) বলেছেন:
‘আমি বলি: এটিই অধিক সহীহ, বরং এটি নিঃশর্তভাবে সহীহ।’
তিনি (হাফিয) যেমন বলেছেন, তা-ই সঠিক, আল্লাহ তাঁকে রহম করুন।
আর এটি হাবলাহ ইবনু সুহাইম আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, এবং এটি তার চেয়েও পূর্ণাঙ্গ।
এটি ইবনু আসাকির (৬/৩৮০) বর্ণনা করেছেন, আর এতে একজন বর্ণনাকারী রয়েছে যার নাম উল্লেখ করা হয়নি।
এরপর আমি মূল হাদীসটি ইবনু আবী হাতিম-এর ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/৩৭১) দেখতে পেলাম। তিনি এর শেষে বলেছেন:
‘আবূ যুর’আহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: আমি ইসহাক ইবনু ইদরীস ছাড়া অন্য কাউকে এটি বর্ণনা করতে জানি না, আর সে ওয়াহী (দুর্বল)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2663)


(أمرت بهدم الطبل والمزمار) .
ضعيف
رواه الديلمي (1/2/219) عن محمد بن عبد الله بن بزرة: حدثنا همام عن عاصم بن علي عن ابن ثوبان عن أبيه عن مكحول عن جبر بن مالك عن عكرمة عن ابن عباس مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مظلم، جبر بن الك لم أعرفه. ومثله همام ومحمد بن عبد الله بن بزرة
وروى ابن عدي في ` الكامل ` (1/2) من طريق إبراهيم بن اليسع التميمي المكي عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعا بلفظ:
` أمرني ربي بنفي الطنبور والمزمار `. وقال:
` هذا الحديث لم يتابع إبراهيم عليه أحد، قال البخاري: منكر الحديث. وقال النسائي: ضعيف `.
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(আমাকে ঢোল ও বাঁশি ভেঙে ফেলার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে।)
যঈফ
এটি বর্ণনা করেছেন দায়লামী (১/২/২১৯) মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু বাযরাহ থেকে: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন হাম্মাম, তিনি আসিম ইবনু আলী থেকে, তিনি ইবনু সাওবান থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি মাকহূল থেকে, তিনি জাবর ইবনু মালিক থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল) ও অন্ধকারাচ্ছন্ন (অত্যন্ত দুর্বল)। জাবর ইবনু মালিককে আমি চিনি না। অনুরূপভাবে হাম্মাম এবং মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু বাযরাহ-ও (অপরিচিত)।
আর ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (১/২) ইবরাহীম ইবনু আল-ইয়াসা' আত-তামিমী আল-মাক্কী-এর সূত্রে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
‘আমার রব আমাকে তানবূর (এক প্রকার বাদ্যযন্ত্র) ও মিযমার (বাঁশি) দূর করার নির্দেশ দিয়েছেন।’ আর তিনি (ইবনু আদী) বলেন:
‘এই হাদীসের ক্ষেত্রে ইবরাহীমের অনুসরণ কেউ করেনি। ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস প্রত্যাখ্যানযোগ্য)। আর ইমাম নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যঈফ (দুর্বল)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2664)


(إذا شهدت أمة من الأمم، وهم أربعون فصاعدا أجاز الله شهادتهم. أو قال: صدق شهادتهم) .
منكر

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (1/26/1) - وعنه الضياء المقدسي في ` المختارة ` (1/454) - : حدثنا إبراهيم بن عمر الوكيعي: حدثنا إبراهيم بن الحجاج السامي: حدثنا سوادة بن أبي الأسود: أخبرنا صالح بن هلال عن أبي المليح بن أسامة الهذلي: حدثني أبي رضي الله عنه عن نبي الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات معروفون من رجال ` التهذيب ` غير الوكيعي هذا فلم أعرفه؛ وغير صالح بن هلال، وقد أورده ابن أبي حاتم (2/1/418 - 419) من رواية سوادة هذا وحده عنه، وقال:
` سئل أبي عنه فقال: (شيخ) `.
قلت: كأنه يشير إلى جهالته، وقد خالفه في إسناده ومتنه من هو مثله، ألا وهو مبشر بن أبي المليح عن أبيه عن ابن عمر مرفوعا بلفظ:
` ما من رجل يصلي عليه مئة إلا غفر له `.

أخرجه الطبراني عقب الذي قبله، ومن طريقه: أبو نعيم في ` الحلية ` (8/391) ، وقال الضياء بعد أن ساقه:
` ويحتمل أن يكون أبو المليح سمعه من أبيه ومن ابن عمر، والله أعلم `.
قلت: هذا الاحتمال وجيه، لو كان الراوي لكل من الوجهين ثقة، وليس كذلك، فقد عرفت أن راوي الأول صالح بن هلال مجهول، ومثله مبشر بن أبي مليح، قال ابن أبي حاتم (4/1/342) :
` روى عنه شعبة `. ولم يزد!
ولم يقف على هذا الهيثمي فقال في ` المجمع ` (3/36) :
` رواه الطبراني في ` الكبير `، وفيه مبشر بن أبي المليح ولم أجد من ذكره `.
وقد خالفهما أبو بكار الحكم بن فروخ قال:
` صلى بنا أبو المليح على جنازة فظننا أنه قد كبر، فأقبل علينا بوجهه فقال: أقيموا صفوفكم، ولتحسن شفاعتكم، قال أبو المليح: حدثني عبد الله - وهو ابن سليط - عن إحدى أمهات المؤمنين - وهي ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: أخبرني النبي صلىاللع عليه وسلم قال: ما من ميت يصلي عليه أمة من الناس إلا شفعوا فيه. فسألت أبا المليح عن ` الأمة `؟ فقال ` أربعون `.

أخرجه النسائي (1/282) ، وأحمد (6/331و334) .
والحكم بن فروخ ثقة، فروايته أصح، لكن عبد الله بن سليط ما روى عنه غير أبي المليح كما حققه الحافظ في ` التهذيب `، وذكره ابن حبان في ` الثقات `.
وله شاهد من حديث ابن عباس مرفوعا نحوه بلفظ:
` ما من رجل مسلم يموت فيقوم على جنازته أربعون رجلا لا يشركون بالله شيئا، إلا شفعهم الله فيه `.
رواه مسلم وغيره، وخرجته في ` الجنائز ` (ص 99) فهو شاهد قوي للفظ الترجمة، لولا أنه في الصلاة على الميت، وهذا في الشهادة له، فهو بهذا اللفظ منكر.
وللفظ مبشر بن أبي المليح في الصلاة على الميت شاهد أيضا من حديث عائشة وأنس وأبي هريرة، وهو مخرج هناك أيضا.
(تنبيه) : قال المناوي:
` قال الهيثمي: وفيه صالح بن هلال؛ مجهول على قاعدة أبي حاتم، أي دون غيره، ففي تجهيله خلف، فالأوجه تحسين الحديث `.
قلت: لا وجه لتحسينه، ولا خلاف في تجهيله، فإنه لا يلزم من كونه مجهولا عند أبي حاتم؛ أن يكون مقبولا عند غيره. إذ إننا نعلم بالضرورة أن كثيرا ممن جهلهم أبو حاتم هم كذلك عند غيره، وليس هنا نقل على خلافه، فوجب التسليم له، لأنه إمام هذا الشأن.
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(যখন কোনো উম্মত সাক্ষ্য দেয়, আর তারা চল্লিশ বা তার বেশি হয়, তখন আল্লাহ তাদের সাক্ষ্যকে অনুমোদন করেন। অথবা তিনি বলেছেন: তাদের সাক্ষ্যকে সত্য বলে গ্রহণ করেন।)
মুনকার

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১/২৬/১)-এ, এবং তাঁর সূত্রে যিয়া আল-মাক্বদিসী ‘আল-মুখতারা’ (১/৪৫৪)-তে: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু উমার আল-ওয়াকীয়ী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু আল-হাজ্জাজ আস-সামী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সুওয়াদাহ ইবনু আবী আল-আসওয়াদ: আমাদের অবহিত করেছেন সালিহ ইবনু হিলাল, আবিল মালীহ ইবনু উসামাহ আল-হুযালী থেকে: তিনি বলেন, আমার পিতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটির বর্ণনাকারীগণ বিশ্বস্ত এবং পরিচিত, যারা ‘আত-তাহযীব’-এর রাবী। তবে এই আল-ওয়াকীয়ী ছাড়া, যাকে আমি চিনতে পারিনি; এবং সালিহ ইবনু হিলাল ছাড়া। ইবনু আবী হাতিম (২/১/৪১৮-৪১৯) কেবল এই সুওয়াদাহ-এর সূত্রে তাঁর (সালিহ ইবনু হিলালের) বর্ণনা উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘আমার পিতাকে (আবু হাতিমকে) তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বলেন: (শাইখ)।’

আমি বলি: মনে হচ্ছে তিনি (আবু হাতিম) তার অজ্ঞাত হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন। আর তার মতোই আরেকজন বর্ণনাকারী সনদ ও মতন উভয় ক্ষেত্রেই তার বিরোধিতা করেছেন। তিনি হলেন মুবাশশির ইবনু আবিল মালীহ, যিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
‘এমন কোনো ব্যক্তি নেই যার উপর একশত লোক সালাত আদায় করে, কিন্তু তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়।’

এটি ত্বাবারানী আগেরটির পরপরই বর্ণনা করেছেন, এবং তাঁর (ত্বাবারানীর) সূত্রে আবূ নু’আইম ‘আল-হিলইয়াহ’ (৮/৩৯১)-তে বর্ণনা করেছেন। যিয়া (আল-মাক্বদিসী) এটি উল্লেখ করার পর বলেছেন:
‘সম্ভবত আবিল মালীহ এটি তাঁর পিতা এবং ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উভয়ের নিকট থেকেই শুনেছেন, আল্লাহই ভালো জানেন।’

আমি বলি: এই সম্ভাবনাটি যুক্তিযুক্ত হতো, যদি উভয় সূত্রের বর্ণনাকারী বিশ্বস্ত হতেন, কিন্তু তা নয়। আপনি জেনেছেন যে, প্রথমটির বর্ণনাকারী সালিহ ইবনু হিলাল মাজহূল (অজ্ঞাত), এবং মুবাশশির ইবনু আবী মালীহও তার মতোই। ইবনু আবী হাতিম (৪/১/৩৪২) বলেছেন:
‘শু’বাহ তার থেকে বর্ণনা করেছেন।’ এর বেশি কিছু তিনি বলেননি!

হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) এই বিষয়ে অবগত ছিলেন না, তাই তিনি ‘আল-মাজমা’ (৩/৩৬)-তে বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’-এ বর্ণনা করেছেন, এতে মুবাশশির ইবনু আবিল মালীহ আছেন, কিন্তু আমি এমন কাউকে পাইনি যিনি তার উল্লেখ করেছেন।’

আর আবূ বাক্কার আল-হাকাম ইবনু ফাররুখ তাদের উভয়ের বিরোধিতা করেছেন। তিনি বলেন:
‘আবুল মালীহ আমাদের নিয়ে এক জানাযার সালাত আদায় করলেন। আমরা মনে করলাম যে তিনি তাকবীর দিয়েছেন। তখন তিনি আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: তোমরা তোমাদের কাতার সোজা করো, আর তোমাদের সুপারিশকে সুন্দর করো। আবুল মালীহ বললেন: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ—তিনি হলেন ইবনু সুলাইত—উম্মাহাতুল মু’মিনীনদের একজন থেকে—তিনি হলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে অবহিত করেছেন, তিনি বলেছেন: এমন কোনো মৃত ব্যক্তি নেই যার উপর একদল লোক সালাত আদায় করে, কিন্তু তাদের সুপারিশ তার জন্য কবুল করা হয়। আমি আবুল মালীহকে ‘উম্মত’ (দল) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: ‘চল্লিশ জন’।’

এটি বর্ণনা করেছেন নাসাঈ (১/২৮২) এবং আহমাদ (৬/৩৩১ ও ৩৩৪)।

আর আল-হাকাম ইবনু ফাররুখ বিশ্বস্ত (সিক্বাহ), সুতরাং তাঁর বর্ণনাটিই অধিক সহীহ। কিন্তু আব্দুল্লাহ ইবনু সুলাইত থেকে আবুল মালীহ ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেননি, যেমনটি হাফিয ‘আত-তাহযীব’-এ নিশ্চিত করেছেন। আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিক্বাত’-এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন।

আর এর পক্ষে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে অনুরূপ শব্দে একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে:
‘এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি নেই যে মারা যায়, আর তার জানাযায় চল্লিশ জন লোক দাঁড়ায় যারা আল্লাহর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করে না, কিন্তু আল্লাহ তাদের সুপারিশ তার জন্য কবুল করেন।’

এটি মুসলিম এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন, এবং আমি এটি ‘আল-জানায়েয’ (পৃ. ৯৯)-এ তাখরীজ করেছি। এটি অনুচ্ছেদের শব্দগুলোর জন্য একটি শক্তিশালী শাহেদ, তবে পার্থক্য হলো এটি (শাহেদটি) মৃত ব্যক্তির উপর সালাত আদায়ের ক্ষেত্রে, আর এটি (মূল হাদীসটি) তার পক্ষে সাক্ষ্য দেওয়ার ক্ষেত্রে। সুতরাং এই শব্দে এটি মুনকার।

আর মৃত ব্যক্তির উপর সালাত আদায়ের ক্ষেত্রে মুবাশশির ইবনু আবিল মালীহ-এর শব্দগুলোর পক্ষেও আয়িশা, আনাস এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে শাহেদ রয়েছে, যা সেখানেও তাখরীজ করা হয়েছে।

(সতর্কীকরণ): আল-মুনাভী বলেছেন:
‘আল-হাইসামী বলেছেন: এতে সালিহ ইবনু হিলাল আছেন; যিনি আবূ হাতিমের নীতি অনুসারে মাজহূল (অজ্ঞাত), অর্থাৎ অন্য কারো মতে নন, তাই তাকে মাজহূল বলার ক্ষেত্রে মতভেদ রয়েছে। সুতরাং হাদীসটিকে হাসান বলাটাই অধিক যুক্তিযুক্ত।’

আমি বলি: এটিকে হাসান বলার কোনো যুক্তি নেই, আর তাকে মাজহূল বলার ক্ষেত্রে কোনো মতভেদও নেই। কারণ আবূ হাতিমের নিকট মাজহূল হওয়ার অর্থ এই নয় যে, তিনি অন্যদের নিকট মাকবূল (গ্রহণযোগ্য) হবেন। কেননা আমরা নিশ্চিতভাবে জানি যে, আবূ হাতিম যাদেরকে মাজহূল বলেছেন, তাদের অনেকেই অন্যদের নিকটও অনুরূপ। আর এর বিপরীতে এখানে কোনো বর্ণনা নেই, তাই তাঁর (আবূ হাতিমের) সিদ্ধান্ত মেনে নেওয়া আবশ্যক, কারণ তিনি এই শাস্ত্রের ইমাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2665)


(إذا قعد أحدكم إلى أخيه فليسأله تفقها، ولا يسأله تعنتا) .
ضعيف جدا
رواه الديلمي (1/1/135) عن المسيب بن شريك عن عبد الله بن يزيد عن مكحول عن علي بن أبي طالب مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا، المسيب بن شريك قال الذهبي في ` الضعفاء `:
` تركوه `.
وعبد الله بن يزيد؛ الظاهر أنه النخعي الصهباني الكوفي، وهو ثقة.
ومكحول؛ ثقة أيضا، لكنه لم يسمع من علي.
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(যখন তোমাদের কেউ তার ভাইয়ের কাছে বসে, তখন সে যেন তাকে জ্ঞান অর্জনের উদ্দেশ্যে জিজ্ঞাসা করে, এবং যেন তাকে কষ্ট দেওয়ার উদ্দেশ্যে জিজ্ঞাসা না করে।)
খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)
এটি বর্ণনা করেছেন দায়লামী (১/১/১৩৫) মুসাইয়্যাব ইবনু শারীক থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি মাকহূল থেকে, তিনি আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)। মুসাইয়্যাব ইবনু শারীক সম্পর্কে যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আদ-দু'আফা’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তারা তাকে পরিত্যাগ করেছেন।’
আর আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ; স্পষ্টত তিনি হলেন নাখঈ আস-সাহবানী আল-কূফী, এবং তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)।
আর মাকহূল; তিনিও সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), কিন্তু তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে শোনেননি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2666)


(إذا كان اثنان صليا معا، فإذا كانوا ثلاثة تقدمهم أحدهم) .
ضعيف

أخرجه الدارقطني في ` سننه ` (1/278 - طبع مصر) ،
والديلمي (1/1/140 - 141) عن الحسن بن حبيب بن ندبة عن إسماعيل المكي عن الحسن عن سمرة مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف فيه علتان:
الأولى: عنعنة الحسن؛ وهو البصري فإنه كان يدلس.
والأخرى: إسماعيل المكي؛ وهو ابن مسلم ضعيف.
لكن معنى الحديث صحيح مطابق للسنة العملية في قصة جابر وجبار حيث أقامهما صلى الله عليه وسلم خلفه. كما في مسلم وغيره. وهو مخرج في ` الإرواء ` (539) وغيره.
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(যদি দুইজন থাকে, তবে তারা একসাথে সালাত আদায় করবে। আর যদি তারা তিনজন হয়, তবে তাদের মধ্যে একজন তাদের ইমামতি করবে।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি দারাকুতনী তাঁর ‘সুনান’ গ্রন্থে (১/২৭৮ - মিশর সংস্করণ), এবং দায়লামী (১/১/১৪০ - ১৪১) তে সংকলন করেছেন।
(সনদটি হলো) হাসান ইবনু হাবীব ইবনু নুদবাহ হতে, তিনি ইসমাঈল আল-মাক্কী হতে, তিনি হাসান হতে, তিনি সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল। এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাত) রয়েছে:
প্রথমটি: আল-হাসান (আল-বাসরী)-এর ‘আনআনা’ (অস্পষ্ট বর্ণনা); কেননা তিনি তাদলীস করতেন।
এবং অন্যটি: ইসমাঈল আল-মাক্কী; তিনি হলেন ইবনু মুসলিম, যিনি দুর্বল (রাবী)।

তবে হাদীসটির অর্থ সহীহ এবং তা জাবির ও জাব্বার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনায় বর্ণিত আমলী সুন্নাহর সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ, যখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁদের দু’জনকে তাঁর পিছনে দাঁড় করিয়েছিলেন। যেমনটি মুসলিম ও অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে। এটি ‘আল-ইরওয়া’ (৫৩৯) ও অন্যান্য গ্রন্থেও উল্লেখ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2667)


(إذا كان مطر وابل، فصلوا في رحالكم) .
منكر بذكر (وابل)

أخرجه الحاكم (1/293) ، وأحمد (5/62) عن ناصح بن العلاء: حدثني عمار بن أبي عمار قال:
` مررت بعبد الرحمن بن سمرة يوم الجمعة وهو على نهر يسيل الماء مع غلمانه ومواليه، فقلت له: يا أبا سعيد الجمعة؟ فقال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره. وقال الحاكم:
` ناصح بن العلاء بصري ثقة، إنما المطعون فيه ناصح أبو عبد الله المحلمي الكوفي فإنه روى عنه سماك بن حرب المناكير `.
وتعقبه الذهبي بقوله:
` ضعفه النسائي وغيره، وقال البخاري: منكر الحديث، ووثقه ابن المديني وأبو داود، ما خرج له أحد `.
وقال الحافظ:
` لين الحديث `.
(فائد) : الوابل: المطر الشديد الضخم القطر. كما في كتب اللغة. ولم أجد في أحاديث الرخصة بالصلاة في الرحال هذا الشرط، بل في بعضها: ` فأصابهم مطر لم تبتل أسفل نعالهم `. صحيح أبي داود (969) . وانظر ` تمام المنة في التعليق على فقه السنة ` (ص 330) .
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(যখন মুষলধারে বৃষ্টি হবে, তখন তোমরা তোমাদের অবস্থানে (ঘরে/তাঁবুতে) সালাত আদায় করো।)

(ওয়াবিল) শব্দটি উল্লেখ থাকার কারণে এটি মুনকার।

এটি হাকিম (১/২৯৩) এবং আহমাদ (৫/৬২) বর্ণনা করেছেন নাসেহ ইবনুল আলা থেকে, তিনি বলেন: আমাকে আম্মার ইবনু আবী আম্মার হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন:
` আমি জুমুআর দিন আব্দুর রহমান ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম। তিনি তখন তাঁর গোলাম ও মুক্ত দাসদের সাথে একটি বহমান নদীর তীরে ছিলেন। আমি তাঁকে বললাম: হে আবূ সাঈদ, জুমুআহ (সালাত)? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন। আর হাকিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
` নাসেহ ইবনুল আলা একজন বিশ্বস্ত বাসরি (বসরাবাসী)। যার উপর আপত্তি তোলা হয়েছে, তিনি হলেন নাসেহ আবূ আব্দুল্লাহ আল-মুহাল্লামী আল-কূফী। কেননা তার থেকে সিমাক ইবনু হারব মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেছেন। `
আর যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর (হাকিমের) সমালোচনা করে বলেছেন:
` নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) ও অন্যান্যরা তাকে যঈফ (দুর্বল) বলেছেন। আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত)। ইবনুল মাদীনী ও আবূ দাঊদ তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন। তবে কেউ তার থেকে (তাদের মূল সংকলনে) হাদীস বর্ণনা করেননি। `
আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
` লীনুল হাদীস (হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল) `।

(ফায়দা): ‘আল-ওয়াবিল’ (الوابل): হলো ভাষাবিদদের কিতাব অনুযায়ী, বড় ফোঁটাযুক্ত তীব্র বৃষ্টি। ঘরে সালাত আদায়ের অনুমতির হাদীসসমূহে আমি এই শর্তটি (ওয়াবিল) পাইনি। বরং সেগুলোর কোনো কোনোটিতে এসেছে: ` তাদের উপর এমন বৃষ্টি আঘাত হানল যে, তাদের জুতার নিচের অংশও ভেজেনি। ` সহীহ আবূ দাঊদ (৯৬৯)। আর দেখুন: `তামামুল মিন্নাহ ফী আত-তা'লীক আলা ফিকহিস সুন্নাহ` (পৃষ্ঠা ৩৩০)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2668)


(إذا كان يوم الخميس بعث الله عز وجل ملائكة معهم صحف من فضة وأقلام من ذهب يكتبون يومالخميس وليلة الجمعة أكثر الناس صلاة على محمد صلى الله عليه وسلم .
موضوع
رواه تمام في ` الفوائد ` (194/1) ، وابن عساكر (12/248/2) عن سليمان بن داود: حدثنا عمرو بن جرير البجلي: حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة عن أبي سلمة عن أبي هريرة مرفوعا. .
قلت: وهذا موضوع، آفته من عمرو بن جرير البجلي؛ فقد كذبه أبو حاتم، وقال الدارقطني:
` متروك الحديث `.
ويحتمل أن تكون الآفة من سليمان بن داود وهو الشاذكوني، فقد قال البخاري:
` فيه نظر `. وكذبه ابن معين. وقال أبو حاتم:
` متروك الحديث `.
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যখন বৃহস্পতিবার আসে, আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা ফেরেশতাদের প্রেরণ করেন, যাদের সাথে থাকে রূপার সহীফা (দলিলপত্র) এবং সোনার কলম। তারা বৃহস্পতিবার ও জুমু'আর রাতে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সর্বাধিক দরূদ পাঠকারী ব্যক্তিদের নাম লিখতে থাকেন।

মাওদ্বূ (বানোয়াট)

এটি বর্ণনা করেছেন তাম্মাম তাঁর ‘আল-ফাওয়াইদ’ গ্রন্থে (১৯৪/১), এবং ইবনু আসাকির (১২/২৪৮/২) সুলাইমান ইবনু দাউদ হতে, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আমর ইবনু জারীর আল-বাজালী, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আমর ইবনু আলক্বামাহ, তিনি আবূ সালামাহ হতে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (বানোয়াট)। এর ত্রুটি এসেছে আমর ইবনু জারীর আল-বাজালী হতে; কেননা আবূ হাতিম তাকে মিথ্যুক বলেছেন। আর দারাকুতনী বলেছেন: ‘মাতরূকুল হাদীস’ (হাদীস পরিত্যাজ্য)।

আর সম্ভাবনা রয়েছে যে, ত্রুটিটি সুলাইমান ইবনু দাউদ, যিনি আশ-শাযাকূনী, তার থেকেও হতে পারে। কেননা আল-বুখারী তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘ফীহি নাযার’ (তার ব্যাপারে বিবেচনা আছে/সন্দেহ আছে)। আর ইবনু মাঈন তাকে মিথ্যুক বলেছেন। আর আবূ হাতিম বলেছেন: ‘মাতরূকুল হাদীস’ (হাদীস পরিত্যাজ্য)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2669)


(إذا كان يوم القيامة أتي بالموت كالكبش الأملح، فيوقف بين الجنة والنار، فيذبح وهم ينظرون، فلو أن أحدا مات فرحا لمات أهل الجنة، ولو أن أحدا مات حزنا لمات أهل النار) .
ضعيف

أخرجه الترمذي (رقم 2561) : حدثنا سفيان بن وكيع: حدثنا أبي عن فضيل بن مرزوق عن عطية عن أبي سعيد يرفعه قال: فذكره. وقال:
` هذا حديث حسن ` زاد في بعض النسخ: ` صحيح `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، عطية - وهو ابن سعد العوفي - مدلس وضعيف، وسفيان بن وكيع ضعيف أيضا.
ثم رواه الترمذي (3155) من طريق أخرى عن أبي سعيد به؛ وفيه النضر بن إسماعيل وليس بالقوي كما في ` التقريب `، وقد خالفه الثقات كما في ` الصحيحين ` وغيرهما من حديث أبي صالح عن أبي سعيد مرفوعا به نحوه، دون قوله: ` فلو أن أحدا مات … ` فهو منكر، ولقد أخطأ صديقنا الفاضل الأستاذ الدعاس في تعليقه على الترمذي حيث أطلق عزو الحديث إلى البخاري ومسلم، فأوهم أنه عندهما بتمامه، فاقتضى التنبيه.
نعم قد وردت هذه الزيادة من حديث ابن عمر مرفوعا بلفظ:
` إذا صار أهل الجنة إلى الجنة … ` الحديث، وفيه:
` فيزداد أهل الجنة فرحا إلى فرحهم، ويزداد أهل النار حزنا إلى حزنهم `.

أخرجه أحمد (2/118 و 120 - 121) ، والشيخان عنه.
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(যখন কিয়ামত দিবস হবে, তখন মৃত্যুকে সাদা-কালো মিশ্রিত রঙের একটি ভেড়ার আকৃতিতে আনা হবে। অতঃপর তাকে জান্নাত ও জাহান্নামের মাঝখানে দাঁড় করানো হবে। অতঃপর তারা দেখতে থাকবে আর তাকে যবেহ করা হবে। যদি কেউ আনন্দের কারণে মারা যেত, তবে জান্নাতবাসীরা মারা যেত। আর যদি কেউ দুঃখের কারণে মারা যেত, তবে জাহান্নামবাসীরা মারা যেত।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন (নং ২৫৬১): আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুফইয়ান ইবনু ওয়াকী': আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আমার পিতা ফুদ্বাইল ইবনু মারযূক থেকে, তিনি আতিয়্যাহ থেকে, তিনি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তিনি (তিরমিযী) বলেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। আর তিনি বলেন:
`এই হাদীসটি হাসান (উত্তম)।` কিছু নুসখায় অতিরিক্ত রয়েছে: `সহীহ (বিশুদ্ধ)।`
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। আতিয়্যাহ – আর তিনি হলেন ইবনু সা'দ আল-আওফী – তিনি মুদাল্লিস এবং যঈফ। আর সুফইয়ান ইবনু ওয়াকী'ও যঈফ।
অতঃপর তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি (৩১৫৫) আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য সূত্রে বর্ণনা করেছেন; এতে রয়েছে নাদ্ব্র ইবনু ইসমাঈল, আর তিনি শক্তিশালী নন, যেমনটি `আত-তাকরীব`-এ রয়েছে। আর নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীরা তার বিরোধিতা করেছেন, যেমনটি `আস-সহীহাইন` (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্য গ্রন্থে আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে এর কাছাকাছি বর্ণনা করেছেন, তবে এই অংশটি ছাড়া: `যদি কেউ আনন্দের কারণে মারা যেত...`। সুতরাং এই অংশটি মুনকার (অস্বীকৃত)। আর আমাদের সম্মানিত বন্ধু উস্তাদ আদ-দা'আস তিরমিযীর উপর তার টীকায় ভুল করেছেন, যখন তিনি হাদীসটিকে বুখারী ও মুসলিমের দিকে সাধারণভাবে সম্পর্কিত করেছেন। ফলে তিনি এই ধারণা দিয়েছেন যে, হাদীসটি তাদের উভয়ের কাছে সম্পূর্ণভাবে বিদ্যমান। তাই সতর্ক করা আবশ্যক ছিল।
হ্যাঁ, এই অতিরিক্ত অংশটি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে মারফূ' হিসেবে এই শব্দে বর্ণিত হয়েছে:
`যখন জান্নাতবাসীরা জান্নাতে প্রবেশ করবে...` হাদীসটি। আর এতে রয়েছে:
`তখন জান্নাতবাসীদের আনন্দ তাদের আনন্দের সাথে আরও বৃদ্ধি পাবে, আর জাহান্নামবাসীদের দুঃখ তাদের দুঃখের সাথে আরও বৃদ্ধি পাবে।`

এটি ইমাম আহমাদ (২/১১৮ এবং ১২০-১২১) এবং শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) তার (ইবনু উমর) থেকে বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2670)


(العلماء أمناء الرسل على عباد الله ما لم يخالطوا السلطان، ويدخلوا في الدنيا، فإذا خالطوا ودخلوا في الدنيا فقد خانوا الرسل، فاعتزلوهم واحذروهم) .
ضعيف

أخرجه العقيلي كما في ` جامع بيان العلم ` (1/185) ، والرافعي في ` تاريخ قزوين ` (2/445) ، والضياء المقدسي في ` المنتقى من مسموعاته بمرو ` (ق 99/2) من طريق إبراهيم بن رستم: حدثنا حفص الإبري عن إسماعيل بن سميع عن أنس مرفوعا به. وقال العقيلي:
` حفص هذا كوفي حديثه غير محفوظ `.
قلت: لم أجد هذه الترجمة ولا لحديث في ` الضعفاء ` للعقيلي من نسخة الظاهرية، ويظهر أن فيها خرما، فقد ذكرها ابن حجر في ` اللسان ` لكلام العقيلي المذكور فيه؛ وتعقبه بقوله:
` قلت: هو عمر بن حفص، غلط في اسمه بعض الرواة، وسيأتي `.
وذكر هناك أنه عمر بن حفص بن ذكوان العبدي. قال أحمد:
` تركنا حديثه، وحرقناه `. وقال علي:
` ليس بثقة `.
وقال النسائي:
` متروك `.
قلت: ويؤيد ما ذكره من الغلط أن ابن أبي حاتم أورد الحديث في ` العلل ` (2/137) من طريق أخرى عن إبراهيم بن رستم قال: حدثنا أبو حفص الإبري
به. وكذلك رواه الحاكم في ` تاريخه ` كما في ` اللآلي المصنوعة ` (13 - هند) ، إلا أنه قال: ` العبدي ` مكان ` الإبري `.
فهذا كله يؤيد أنه أبو حفص، وليس حفصا كما في الرواية الأولى. وقد عرفت مما نقلناه عن الأئمة فيه أنه شديد الضعف، فمن الغريب أن ابن أبي حاتم لم يعل الحديث به، فإنه قال عقبه:
` هذا حديث منكر، يشبه أن يكون في الإسناد رجل لم يسم، وأسقط ذلك الرجل `.
فيبدو - والله أعلم - أن أبا حفص هذا ليس هو عند أبي حاتم العبدي المجروح، وإلا لأعل الحديث به، فقد ضعفه هو أيضا كما نقله عنه ابنه في ` الجرح والتعديل ` (3/103) ، ولعل السبب هو أنه وقع في روايته أنه ` الإبري ` - نسبة إلى بيع الإبر وعملها - وأبو حفص عمر بن حفص العبدي لم ينسب هذه النسبة، فمن هو هذا الإبري؟ لم أجد أحدا ترجمه بكنيته أبي حفص؛ وبهذه النسبة ` الإبري `، وإنما ترجمه العقيلي باسم ` حفص الإبري ` وهو خطأ من بعض الرواة كما تقدم عن الحافظ، وإذا كان كذلك فهو أبو حفص العبدي الإبري، له نسبتان الأولى نسبة إلى الجد، والأخرى إلى الصنعة. ولا مانع من مثل هذا الجمع، فقد يتوفر في بعض الرواة أكثر من نسبة واحدة، بل ومن نسبتين، فهذا - مثلا - سمي المترجم عمر بن رياح العبدي أبو حفص البصري الضرير، لما ترجمه الحافظ في ` التهذيب ` قال في حاتمتها:
` فتحصلنا على أنه ينسب ألوانا: عبدي، وسعدي، وباهلي `!
قلت: وأنا لا أستبعد أن يكون هو المترجم نفسه لأنه في طبقته وقد روى عن
ثابت وهو من شيوخه، ويكون نسبته إلى حفص، ورياح من قبيل نسبته إلى الأب؛ دون الجد، أو العكس. أعني أن أحدهما أبوه والآخر جده، والباهلي هذا متروك أيضا. والله أعلم.
والحديث أورده ابن الجوزي في ` الموضوعات ` (1) من طريق الحاكم وقال:
` تابعه محمد بن معاوية النيسابوري عن محمد بن يزيد عن إسماعيل، والعبدي متروك، وإبراهيم (يعني ابن رستم) لا يعرف، ومحمد بن معاوية كذاب `.
ورده السيوطي في ` اللآلي ` بأن إبراهيم بن رستم معروف، وثقه ابن معين وغيره.
وهو كما قال على خلاف فيه. ثم ذكر أن له شواهد كثيرة؛ صحيحة وحسنة، فوق الأربعين حديثا، وأنه يحكم له على مقتضى صناعة الحديث بالحسن.
وأقره ابن عراق في ` تنزيه الشريعة ` (1/267 - 268) .
قلت: وأنا في شك كبير من صواب الحكم المذكور، لا سيما وهو يخالف مقدمة كلامه، لأنه إذا كان - حقا - له شواهد صحيحة، فلماذا يكون حسنا فقط، ولا يكون صحيحا؟! وانتقادي هذا إنما ينصب على ظاهر كلامه الدال على أنه أراد الحديث بتمامه، فإني لا أعرف له ولا شاهدا واحدا، ولا ذكره السيوطي نفسه في ` الجامع الكبير ` (1/360/1) إلا من حديث أنس هذا. وأما إن كان يريد طرفه الأول ` العلماء أمناء الرسل ` فمن الممكن أن يكون ثابتا، وذلك يحتاج إلى بحث وتحقيق، فلنفعل:
(1) وأقره الحافظ العراقي في ` تخريج الإحياء `: (1 / 60) .
لقد سبق في كلام ابن الجوزي أن محمد بن معاوية النيسابوري قد رواه عن محمد بن يزيد عن إسماعيل بن سميع، وأن ابن معاوية كذاب، وهو كما قال لكن يبدو أنه لم يتفرد به، فقد أخرجه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (5/48/1) من طريق أبي عمرو أحمد بن الحسن بن يحيى الروياني: أخبرنا أبو عمر محمد بن عيسى الواسطي: أخبرنا محمد بن معاوية النيسابوري به مقتصرا على الطرف الأول منه: ` العلماء أمناء الله على خلقه `.
وروى الخطيب في ` التاريخ ` (3/271) عن ابن حبان قال:
` وجدت في كتاب أبي بخط يده: ذكر لأبي زكريا (يعني يحيى بن معين) : أن محمد بن معاوية النيسابوري حدث عن محمد بن يزيد عن إسماعيل بن سميع عن أنس: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: الرسل أمناء الله؟ فقال أبو زكريا: هذا باطل وكذب، ما حدث محمد بن يزيد عن إسماعيل بن سميع بشيء ولا سمع منه، ولا سمع إسماعيل بن سميع (الأصل: ابن رافع) من أنس شيئا، ومحمد بن معاوية حدث بأحاديث كثيرة كذب، ليس لها أصول.... `.
قلت: لكن لم يتفرد به ابن معاوية، فقد قال ابن الأعرابي في ` معجمه ` (56/2) ، ومن طريقه القضاعي في ` مسند الشهاب ` (1/2 - الكراس الثاني) : أخبرنا محمد بن عيسى: أخبرنا محمد بن الصباح الجرجرائي: أخبرنا محمد بن يزيد عن إسماعيل بن سميع به بلفظ: ` العلماء أمناء الله على خلقه `.
وهذه متابعة قوية؛ لأن الجرجرائي هذا؛ وثقه أبو زرعة وغيره، وقال الحافظ:
` صدوق `.
وسائر الرجال ثقات أيضا، ومحمد بن عيسى هو الواسطي المعروف بابن أبي
قماش؛ له ترجمة في ` تاريخ بغداد ` (2/400) .
وأما محمد بن يزيد؛ فلم أعرفه، وقد جزم ابن معين فيما تقدم بأنه لم يسمع من إسماعيل بن سميع شيئا، وهذا يشعر بأنه معروف لديه، فلعله محمد بن يزيد بن سنان الرهاوي الجزري؛ وقد قال الحافظ:
` ليس بالقوي `.
وكذلك جزم ابن معين بأن ابن سميع لم يسمع من أنس، فلعله من أجل ذلك كتب بعض المحدثين على هامش ` القضاعي ` وأظنه ابن المحب المقدسي:
` منكر `.
وقد وجدت له شاهدا من حديث معاذ بن جبل مرفوعا بلفظ:
` العالم أمين الله في الأرض `.
ولكنه واه جدا، أخرجه أبو الفضل السهلكي في ` حديثه ` (1/2) ، وابن عبد البر في ` الجامع ` (1/52) من طريق عيسى بن إبراهيم الهاشمي عن الحكم بن عبد الله: أخبرنا عبادة بن نسي (1) عن عبد الرحمن بن غنم عنه.
قلت: وهذا إسناد هالك، عيسى هذا وشيخه الحكم بن عبد الله - وهو الأيلي - كلاهما هالك؛ كما قال الذهبي، والآخر شر من الأول. فقد قال فيه أبو حاتم وغيره:
` كذاب `. وقال أحمد:
` أحاديثه كلها موضوعة `.
ومن هذا التحقيق يتبين أن الحافظ العراقي لم يعطه حقه من النقد حين قال
(1) الأصل: الحكم بن عبيد الله: نا عبادة بن قيس. والتصحيح من كتب الرجال.
في ` تخريج الإحياء ` (1/6) :
` رواه ابن عبد البر من حديث معاذ بسند ضعيف `!
فإن من لا علم عنده بالرواة قد يتكىء على مثل هذا التضعيف اللين لحديث معاذ هذا فيعتبره شاهدا، وهو لا يصلح لذلك لشدة ضعفه، ولذلك فالحديث باق على ضعفه لعدم وقوفنا على شاهد معتبر له، ولا لطرفه الأول. والله أعلم.
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(আলেমগণ আল্লাহর বান্দাদের উপর রাসূলগণের আমানতদার, যতক্ষণ না তারা শাসকের সাথে মিশে যায় এবং দুনিয়ার মধ্যে প্রবেশ করে। যখন তারা মিশে যায় এবং দুনিয়ার মধ্যে প্রবেশ করে, তখন তারা রাসূলগণের সাথে খিয়ানত করে। সুতরাং তোমরা তাদের থেকে দূরে থাকো এবং তাদের ব্যাপারে সতর্ক হও।)

যঈফ (দুর্বল)

হাদীসটি উকাইলী তাঁর ‘জামি‘উ বায়ানিল ইলম’ (১/১৮৫)-এ, রাফি‘ঈ তাঁর ‘তারীখে কাযবীন’ (২/৪৪৫)-এ এবং যিয়া আল-মাক্বদিসী তাঁর ‘আল-মুনতাক্বা মিন মাসমূ‘আতিহি বিমারও’ (ক্ব ৯৯/২)-তে ইবরাহীম ইবনু রুস্তমের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন হাফস আল-ইব্রী, তিনি ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর উকাইলী বলেছেন:
‘এই হাফস কূফী, তার হাদীস সংরক্ষিত নয় (গায়র মাহফূয)।’

আমি (আলবানী) বলি: আমি যাহিরিয়্যাহ্ নুসখা থেকে উকাইলীর ‘আয-যু‘আফা’ গ্রন্থে এই জীবনী বা এই হাদীসটি পাইনি। মনে হচ্ছে এতে কিছু অংশ বাদ পড়েছে। কেননা ইবনু হাজার ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উকাইলীর এই বক্তব্য উল্লেখ করেছেন এবং এর সমালোচনা করে বলেছেন:
‘আমি বলি: তিনি হলেন উমার ইবনু হাফস। কিছু বর্ণনাকারী তার নাম ভুল করেছে। শীঘ্রই তা আসছে।’
তিনি সেখানে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি হলেন উমার ইবনু হাফস ইবনু যাকওয়ান আল-‘আবদী। আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘আমরা তার হাদীস পরিত্যাগ করেছি এবং তা জ্বালিয়ে দিয়েছি।’ আলী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘তিনি সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য) নন।’
নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
আমি (আলবানী) বলি: এই ভুলের সমর্থনে ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ (২/১৩৭)-এ ইবরাহীম ইবনু রুস্তমের অন্য সূত্রে হাদীসটি এনেছেন। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ হাফস আল-ইব্রী। অনুরূপভাবে হাকিম তাঁর ‘তারীখ’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, যেমনটি ‘আল-লাআলী আল-মাসনূ‘আহ’ (১৩ - হিন্দ)-এ আছে, তবে তিনি ‘আল-ইব্রী’-এর স্থলে ‘আল-‘আবদী’ বলেছেন।

এই সব কিছুই প্রমাণ করে যে, তিনি আবূ হাফস, প্রথম বর্ণনায় যেমন হাফস বলা হয়েছে, তিনি হাফস নন। ইমামগণ থেকে আমরা যা উদ্ধৃত করেছি, তা থেকে আপনি জানতে পেরেছেন যে, তিনি অত্যন্ত দুর্বল (শাদীদুদ-যঈফ)। তাই এটা আশ্চর্যের বিষয় যে, ইবনু আবী হাতিম এই বর্ণনাকারীর কারণে হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু‘আল্লা) করেননি। কেননা তিনি এর পরে বলেছেন:
‘এই হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত)। মনে হচ্ছে ইসনাদে এমন একজন লোক আছে যার নাম উল্লেখ করা হয়নি এবং সেই লোকটিকে বাদ দেওয়া হয়েছে।’
সুতরাং মনে হচ্ছে—আল্লাহই ভালো জানেন—আবূ হাফস এই ব্যক্তি আবূ হাতিমের নিকট সেই ত্রুটিযুক্ত আল-‘আবদী নন। অন্যথায় তিনি এর দ্বারা হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত করতেন। কেননা আবূ হাতিমও তাকে দুর্বল বলেছেন, যেমনটি তার পুত্র ‘আল-জারহু ওয়াত-তা‘দীল’ (৩/১০৩)-এ তার থেকে বর্ণনা করেছেন। সম্ভবত কারণ এই যে, তার বর্ণনায় ‘আল-ইব্রী’ এসেছে—যা সুঁই বিক্রি ও তৈরির সাথে সম্পর্কিত—আর আবূ হাফস উমার ইবনু হাফস আল-‘আবদীকে এই নিসবতে (সম্পর্ক) উল্লেখ করা হয়নি। তাহলে এই ইব্রী কে? আমি এমন কাউকে পাইনি যার জীবনী তার কুনিয়াত (উপনাম) আবূ হাফস এবং এই নিসবত ‘আল-ইব্রী’ দ্বারা উল্লেখ করা হয়েছে। বরং উকাইলী তার জীবনী ‘হাফস আল-ইব্রী’ নামে উল্লেখ করেছেন, যা কিছু বর্ণনাকারীর ভুল, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) থেকে পূর্বে বলা হয়েছে। যদি তাই হয়, তবে তিনি হলেন আবূ হাফস আল-‘আবদী আল-ইব্রী। তার দুটি নিসবত রয়েছে: প্রথমটি দাদার দিকে সম্পর্কিত, আর অন্যটি পেশার দিকে। এই ধরনের সমন্বয় অসম্ভব নয়। কেননা কিছু বর্ণনাকারীর ক্ষেত্রে একাধিক নিসবত, এমনকি দুটি নিসবতও পাওয়া যায়। উদাহরণস্বরূপ, হাফিয (ইবনু হাজার) যখন ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে উমার ইবনু রিয়াহ আল-‘আবদী আবূ হাফস আল-বাসরী আয-যরীর-এর জীবনী লিখেছেন, তখন উপসংহারে বলেছেন:
‘আমরা এই সিদ্ধান্তে পৌঁছেছি যে, তাকে বিভিন্নভাবে সম্পর্কিত করা হয়: ‘আবদী, সা‘দী এবং বাহিলী!’
আমি (আলবানী) বলি: আমি এটা অসম্ভব মনে করি না যে, তিনি সেই একই ব্যক্তি যার জীবনী লেখা হয়েছে, কারণ তিনি তার স্তরের এবং তিনি সাবিত থেকে বর্ণনা করেছেন, যিনি তার শায়খদের একজন। আর তার নিসবত হাফস-এর দিকে, এবং রিয়াহ-এর দিকে নিসবত পিতার দিকে সম্পর্কিত হতে পারে, দাদার দিকে নয়, অথবা এর বিপরীতও হতে পারে। অর্থাৎ তাদের একজন তার পিতা এবং অন্যজন তার দাদা। আর এই বাহিলীও মাতরূক (পরিত্যক্ত)। আল্লাহই ভালো জানেন।

ইবনু আল-জাওযী হাদীসটি হাকিমের সূত্রে ‘আল-মাওদ্বূ‘আত’ (১)-এ এনেছেন এবং বলেছেন:
‘মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ আন-নায়সাবূরী, মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি ইসমাঈল থেকে তার অনুসরণ করেছেন। আর আল-‘আবদী মাতরূক, এবং ইবরাহীম (অর্থাৎ ইবনু রুস্তম) অপরিচিত (লা ইউ‘রাফ), আর মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ কাযযাব (মহা মিথ্যাবাদী)।’
সুয়ূতী ‘আল-লাআলী’ গ্রন্থে এর প্রতিবাদ করেছেন এই বলে যে, ইবরাহীম ইবনু রুস্তম পরিচিত, তাকে ইবনু মা‘ঈন ও অন্যান্যরা সিক্বাহ বলেছেন। যদিও তার ব্যাপারে মতভেদ আছে, তবুও সুয়ূতীর কথা সঠিক। অতঃপর তিনি উল্লেখ করেছেন যে, এর বহু শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে; সহীহ ও হাসান, যা চল্লিশটিরও বেশি হাদীস। এবং হাদীস শাস্ত্রের নীতি অনুসারে এটিকে হাসান হিসেবে গণ্য করা যায়। ইবনু ইরাক্ব ‘তানযীহুশ শারী‘আহ’ (১/২৬৭-২৬৮)-এ তা সমর্থন করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: আমি উল্লিখিত এই হুকুমের (সিদ্ধান্তের) সঠিকতা নিয়ে ঘোর সন্দেহে আছি, বিশেষত যখন এটি তার বক্তব্যের প্রারম্ভিক অংশের বিরোধী। কারণ, যদি সত্যিই এর সহীহ শাহেদ থাকে, তবে এটি কেবল হাসান হবে কেন, সহীহ হবে না কেন?! আমার এই সমালোচনা তার বক্তব্যের বাহ্যিক অর্থের উপর নিবদ্ধ, যা প্রমাণ করে যে তিনি সম্পূর্ণ হাদীসটিকেই উদ্দেশ্য করেছেন। কেননা আমি এর একটিও শাহেদ জানি না, আর সুয়ূতী নিজেও ‘আল-জামি‘উল কাবীর’ (১/৩৬০/১)-এ আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীস ছাড়া অন্য কোনো শাহেদ উল্লেখ করেননি। তবে যদি তিনি এর প্রথম অংশ ‘আলেমগণ রাসূলগণের আমানতদার’ উদ্দেশ্য করে থাকেন, তবে তা সাবিত (প্রতিষ্ঠিত) হওয়া সম্ভব। আর এর জন্য গবেষণা ও তাহক্বীক্বের প্রয়োজন, সুতরাং আমরা তা করি:

(১) হাফিয আল-‘ইরাক্বী ‘তাখরীজুল ইহয়া’ (১/৬০)-এ তা সমর্থন করেছেন।

ইবনু আল-জাওযীর বক্তব্যে পূর্বে বলা হয়েছে যে, মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ আন-নায়সাবূরী, মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং ইবনু মু‘আবিয়াহ কাযযাব। তার কথা সঠিক, তবে মনে হচ্ছে তিনি এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। কেননা ইবনু আসাকির ‘তারীখে দিমাশক্ব’ (৫/৪৮/১)-এ আবূ ‘আমর আহমাদ ইবনু আল-হাসান ইবনু ইয়াহইয়া আর-রূইয়ানী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের খবর দিয়েছেন আবূ ‘উমার মুহাম্মাদ ইবনু ‘ঈসা আল-ওয়াসিতী: আমাদের খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ আন-নায়সাবূরী, তিনি এর প্রথম অংশটুকুর উপর সীমাবদ্ধ থেকে বর্ণনা করেছেন: ‘আলেমগণ আল্লাহর সৃষ্টির উপর আল্লাহর আমানতদার।’
আর খতীব ‘আত-তারীখ’ (৩/২৭১)-এ ইবনু হিব্বান থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ‘আমি আমার পিতার কিতাবে তার হাতের লেখায় পেয়েছি: আবূ যাকারিয়া (অর্থাৎ ইয়াহইয়া ইবনু মা‘ঈন)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো যে, মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ আন-নায়সাবূরী, মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: রাসূলগণ আল্লাহর আমানতদার? তখন আবূ যাকারিয়া বললেন: এটা বাতিল ও মিথ্যা। মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে কিছুই বর্ণনা করেননি এবং তার থেকে শোনেনওনি। আর ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ (মূল নুসখায়: ইবনু রাফি‘) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কিছুই শোনেননি। আর মুহাম্মাদ ইবনু মু‘আবিয়াহ বহু মিথ্যা হাদীস বর্ণনা করেছে, যার কোনো ভিত্তি নেই....।’

আমি (আলবানী) বলি: কিন্তু ইবনু মু‘আবিয়াহ এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। কেননা ইবনু আল-আ‘রাবী তাঁর ‘মু‘জাম’ (৫৬/২)-এ এবং তার সূত্রে ক্বুযা‘ঈ তাঁর ‘মুসনাদুশ শিহাব’ (১/২ - দ্বিতীয় খণ্ড)-এ বলেছেন: আমাদের খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু ‘ঈসা: আমাদের খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনুস সাব্বাহ আল-জারজারায়ী: আমাদের খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ, তিনি ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: ‘আলেমগণ আল্লাহর সৃষ্টির উপর আল্লাহর আমানতদার।’ আর এটি একটি শক্তিশালী মুতাবা‘আহ (সমর্থন); কারণ এই জারজারায়ীকে আবূ যুর‘আহ ও অন্যান্যরা সিক্বাহ বলেছেন, আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘সাদূক্ব (সত্যবাদী)।’ অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরাও সিক্বাহ। আর মুহাম্মাদ ইবনু ‘ঈসা হলেন আল-ওয়াসিতী, যিনি ইবনু আবী ক্বুমাস নামে পরিচিত; ‘তারীখে বাগদাদ’ (২/৪০০)-এ তার জীবনী রয়েছে।
আর মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ; আমি তাকে চিনতে পারিনি। তবে ইবনু মা‘ঈন পূর্বে নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে, তিনি ইসমাঈল ইবনু সুমাই‘ থেকে কিছুই শোনেননি। এটি ইঙ্গিত দেয় যে, তিনি তার কাছে পরিচিত ছিলেন। সম্ভবত তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ ইবনু সিনান আর-রুহাবী আল-জাযারী। আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘তিনি শক্তিশালী নন।’ অনুরূপভাবে ইবনু মা‘ঈন নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে, ইবনু সুমাই‘ আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি। সম্ভবত এই কারণেই কিছু মুহাদ্দিস ‘আল-ক্বুযা‘ঈ’-এর টীকায় লিখেছেন—আর আমার ধারণা তিনি ইবনু আল-মুহিব আল-মাক্বদিসী—: ‘মুনকার।’

আমি মু‘আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে মারফূ‘ হিসেবে এর একটি শাহেদ পেয়েছি এই শব্দে:
‘আলেম পৃথিবীতে আল্লাহর আমানতদার।’
কিন্তু এটি অত্যন্ত দুর্বল (ওয়াহী জিদ্দান)। আবূ আল-ফাযল আস-সাহলাকী তাঁর ‘হাদীস’ (১/২)-এ এবং ইবনু ‘আবদিল বার্র ‘আল-জামি‘ (১/৫২)-এ ‘ঈসা ইবনু ইবরাহীম আল-হাশিমী-এর সূত্রে, তিনি আল-হাকাম ইবনু ‘আবদিল্লাহ থেকে: আমাদের খবর দিয়েছেন ‘উবাদাহ ইবনু নুসায় (১), তিনি ‘আবদুর রহমান ইবনু গানাম থেকে, তিনি মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই ইসনাদটি ধ্বংসাত্মক (হালিক)। এই ‘ঈসা এবং তার শায়খ আল-হাকাম ইবনু ‘আবদিল্লাহ—যিনি আল-আইলী—উভয়ই হালিক (ধ্বংসপ্রাপ্ত), যেমনটি যাহাবী বলেছেন। আর শেষের জন প্রথম জনের চেয়েও খারাপ। আবূ হাতিম ও অন্যান্যরা তার সম্পর্কে বলেছেন:
‘কাযযাব (মহা মিথ্যাবাদী)।’ আর আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘তার সমস্ত হাদীস মাওদ্বূ‘ (জাল)।’

(১) মূল নুসখায়: আল-হাকাম ইবনু ‘উবাইদিল্লাহ: না ‘উবাদাহ ইবনু ক্বায়স। আর সংশোধন করা হয়েছে রিজাল শাস্ত্রের কিতাব থেকে।

এই তাহক্বীক্ব (গবেষণা) থেকে স্পষ্ট হয় যে, হাফিয আল-‘ইরাক্বী ‘তাখরীজুল ইহয়া’ (১/৬)-এ যখন বললেন: ‘ইবনু ‘আবদিল বার্র মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি দুর্বল সনদসহ বর্ণনা করেছেন!’—তখন তিনি এর সমালোচনার যথাযথ হক্ব আদায় করেননি। কারণ, যে ব্যক্তির বর্ণনাকারীদের সম্পর্কে জ্ঞান নেই, সে মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটির এমন হালকা দুর্বলতার উপর নির্ভর করে এটিকে শাহেদ (সমর্থক) হিসেবে গণ্য করতে পারে। অথচ এটি তার চরম দুর্বলতার কারণে শাহেদ হওয়ার উপযুক্ত নয়। এই কারণে, এর জন্য বা এর প্রথম অংশের জন্য কোনো গ্রহণযোগ্য শাহেদ না পাওয়ায় হাদীসটি তার দুর্বলতার উপরই বহাল থাকবে। আল্লাহই ভালো জানেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2671)


(إذا كنتم في القصب، أو الثلج، أو الرداغ فحضرت الصلاة؛ فأومئوا إيماء) .
ضعيف

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (13/199/473) من طريق إسماعيل بن عمرو البجلي، قال: حدثنا محمد بن فضاء، عن أبيه عن علقمة بن عبد الله المزني، عن أبيه مرفوعا، ومن هذا الوجه أخرجه في ` الأوسط ` (8/46/7913) .
قلت: وهذا إسناد ضعيف، (فضاء) والد (محمد) فيه جهالة كما في ` المغني `.
وولده (محمد) ضعفه ابن معين.
وإسماعيل بن عمرو البجلي ضعفه ابن عدي وجماعة، لكن ذكر الطبراني في ` الأوسط ` أنه تابعه معدي بن سليمان (الأصل: سنان، والتصحيح من ` تهذيب الكمال ` و ` ميزان الاعتدال ` وغيرهما) وهو متفق على ضعفه، وتقدم له حديث منكر برقم (2369) .
والحديث قال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (2/11) :
` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، وفيه (محمد بن فضاء) ، وهو ضعيف `!
(القصب) : كل نبات كانت ساقه أنابيب وكعوبا، ومنه (قصب السكر) . ` المعجم الوسيط `.
(الرداغ) : (الردغة) بسكون الدال وفتحها: طين ووحل كثير، ويجمع على (ردغ) . كذا في ` النهاية `.
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(যখন তোমরা কাসাব (নলখাগড়া/বেত), অথবা বরফ, অথবা আর-রাদাগ (কাদামাটি)-এর মধ্যে থাকবে এবং সালাতের সময় উপস্থিত হবে; তখন ইশারা দ্বারা সালাত আদায় করবে।)
যঈফ

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১৩/১৯৯/৪৭৩)-এ ইসমাঈল ইবনু আমর আল-বাজালী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ফাদাআ, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আলক্বামাহ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-মুযানী হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এই সূত্রেই তিনি এটি ‘আল-আওসাত্ব’ (৮/৪৬/৭৯১৩)-এও বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ। (ফাদাআ) যিনি (মুহাম্মাদ)-এর পিতা, তাঁর মধ্যে জাহালাত (অজ্ঞাত পরিচয়) রয়েছে, যেমনটি ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ আছে। আর তাঁর পুত্র (মুহাম্মাদ)-কে ইবনু মাঈন যঈফ বলেছেন। আর ইসমাঈল ইবনু আমর আল-বাজালী-কে ইবনু আদী এবং একদল মুহাদ্দিস যঈফ বলেছেন। তবে ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ উল্লেখ করেছেন যে, মা'দী ইবনু সুলাইমান (মূল: সিনান, আর ‘তাহযীবুল কামাল’ ও ‘মীযানুল ই'তিদাল’ ইত্যাদি গ্রন্থ থেকে সংশোধন করা হয়েছে) তাঁর অনুসরণ করেছেন। আর তাঁর (মা'দী ইবনু সুলাইমানের) দুর্বলতার ব্যাপারে সকলে একমত। তাঁর একটি মুনকার হাদীস পূর্বে (২৩৬৯) নম্বরে উল্লেখ করা হয়েছে।

আর হাদীসটি সম্পর্কে হাইসামী ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’ (২/১১)-এ বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ ও ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন। এর মধ্যে (মুহাম্মাদ ইবনু ফাদাআ) রয়েছে, আর সে যঈফ!’

(আল-কাসাব): প্রতিটি উদ্ভিদ যার কাণ্ড নলাকার এবং গাঁটযুক্ত, যেমন (আখের কাসাব/আখ)। ‘আল-মু'জামুল ওয়াসীত’।
(আর-রাদাগ): (আর-রাদগাহ) দাল-এর সুকুন (স্থিরতা) এবং ফাতহা (উপরের স্বরচিহ্ন) সহ: প্রচুর কাদা ও কর্দমাক্ত স্থান। এর বহুবচন হলো (রাদগ)। ‘আন-নিহায়াহ’ গ্রন্থে এমনটিই আছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2672)


(إذا كان يوم القيامة يجاء بالأعمال في صحف مختمة فيقول الله عز وجل: اقبلوا هذا وردوا هذا، فتقول الملائكة: وعزتك ما كتبنا إلا ما عمل، فيقول: صدقتم إن عمله كان لغير وجهي، وإني لا أقبل اليوم إلا ما كان لوجهي) .
ضعيف جدا
رواه السلفي في ` معجم السفر ` (50/2) عن عمر بن يحيى الأبلي: حدثنا الحارث بن غسان عن أبي عمران الجوني عن أنس بن مالك مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ الحارث بن غسان مجهول.
وعمر بن يحيى الأبلي (1) ؛ اتهمه ابن عدي بسرقة الحديث عن يحيى بن بسطام؛ وهو ضعيف جدا.
(1) كذا في مسودتي بالباء الموحدة قبل اللام، وفي ` اللسان `: (الأيلي) بالمثناة التحتية
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(যখন কিয়ামত দিবস হবে, তখন আমলসমূহকে মোহর মারা সহীফাসমূহে (দলিলপত্রে) আনা হবে। অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলবেন: এটাকে গ্রহণ করো এবং ওটাকে প্রত্যাখ্যান করো। তখন ফেরেশতাগণ বলবে: আপনার ইজ্জতের কসম, আমরা তো শুধু সেটাই লিখেছি যা সে আমল করেছে। তখন তিনি বলবেন: তোমরা সত্য বলেছ, কিন্তু তার আমল ছিল আমার সন্তুষ্টি ছাড়া অন্যের জন্য। আর আমি আজ শুধু সেটাই গ্রহণ করব যা আমার সন্তুষ্টির জন্য ছিল।)

যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন আস-সালাফী তাঁর ‘মু'জামুস সফর’ গ্রন্থে (২/৫০) উমার ইবনু ইয়াহইয়া আল-আবালী থেকে: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হারিস ইবনু গাসসান, তিনি আবূ ইমরান আল-জাওনী থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল; আল-হারিস ইবনু গাসসান মাজহূল (অজ্ঞাত)।

আর উমার ইবনু ইয়াহইয়া আল-আবালী (১); ইবনু আদী তাঁকে ইয়াহইয়া ইবনু বাসতাম থেকে হাদীস চুরির অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন; আর তিনি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)।

(১) আমার পাণ্ডুলিপিতে লাম-এর পূর্বে একক বা (ب) সহ এভাবেই আছে। আর ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে: (আল-আইলী) ইয়া (ي) সহ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2673)


(الجماعة بركة، والثريد بركة، والسحور بركة، والطعام المكيل بركة، تسحروا تزدادوا قوة، تسحروا تصيبوا السنة، تسحروا ولو بجرعة ماء، صلوات الله على المتسحرين) .
ضعيف. رواه أحمد بن المهندس في ` حديث عافية وغيره ` (132/2) عن عمرو بن بزيع الأزدي عن الحارث عن علي مرفوعا.
قلت: وهذا سند ضعيف، الحارث - وهو الأعور بن عبد الله - ضعيف، والحارث بن الحجاج الأزدي مجهول، وكذا الراوي عنه ابن بزيع الأزدي؛ واسمه عمر كما في ` الميزان ` و ` اللسان `، فلعل ما في رواية ابن المهندس ` عمرو ` خطأ من بعض النساخ. والله أعلم.
وله شاهد من حديث أنس مرفوعا به دون قوله: ` والطعام المكيل بركة … ` إلخ. ولكنه واه جدا.
رواه ابن شاذان في ` المشيخة الصغيرة ` (رقم 63) عن أبي سعيد الحسن بن علي بن زكريا العدوي: أخبرنا إبراهيم بن سليمان السلمي: أخبرنا سلم بن مسلم قال: سمعت أنسا يقول: فذكره مرفوعا.
قلت: وهذا موضوع؛ آفته العدوي هذا؛ فإنه كذا وضاع، ولذلك فقد أساء السيوطي بإيراد هذا الحديث من رواية ابن شاذان هذه في ` الجامع الصغير `؛ وإن كان معناه ثابتا من طرق أخرى كما سبق في الصحيحة (1045) ` البركة في ثلاثة … `.لكن قد جاء معناه من حديث أبي هريرة وغيره، وقد خرجته في الموضع المثار إليه آنفا.
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(জামাআত (দলবদ্ধতা) বরকত, এবং ছারীদ (এক প্রকার খাবার) বরকত, এবং সাহরী বরকত, এবং পরিমাপকৃত খাবার বরকত। তোমরা সাহরী খাও, শক্তি বৃদ্ধি পাবে। তোমরা সাহরী খাও, সুন্নাহ লাভ করবে। তোমরা সাহরী খাও, যদিও এক ঢোক পানি দ্বারা হয়। যারা সাহরী খায় তাদের উপর আল্লাহর সালাত (রহমত) বর্ষিত হোক।)

যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনুল মুহান্দিস তাঁর ‘হাদীছ আফিয়াহ ওয়া গাইরুহু’ (২/১৩২) গ্রন্থে আমর ইবনু বাযী' আল-আযদী হতে, তিনি আল-হারিছ হতে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। আল-হারিছ – আর তিনি হলেন আল-আ'ওয়ার ইবনু আব্দুল্লাহ – তিনি যঈফ। আর আল-হারিছ ইবনু আল-হাজ্জাজ আল-আযদী মাজহূল (অজ্ঞাত)। অনুরূপভাবে তার থেকে বর্ণনাকারী ইবনু বাযী' আল-আযদীও (মাজহূল); তার নাম উমার, যেমনটি ‘আল-মীযান’ ও ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে। সুতরাং সম্ভবত ইবনুল মুহান্দিসের বর্ণনায় ‘আমর’ শব্দটি কিছু লিপিকারের ভুল। আল্লাহই ভালো জানেন।

এর একটি শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীছ হতে মারফূ' হিসেবে, তবে তাতে এই উক্তিটি নেই: ‘আর পরিমাপকৃত খাবার বরকত...’ ইত্যাদি। কিন্তু সেটি খুবই ওয়াহী (অত্যন্ত দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু শা-যান তাঁর ‘আল-মাশায়িখাহ আস-সাগীরাহ’ (নং ৬৩) গ্রন্থে আবূ সাঈদ আল-হাসান ইবনু আলী ইবনু যাকারিয়া আল-আদাবী হতে: তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন ইবরাহীম ইবনু সুলাইমান আস-সুলামী: তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন সালাম ইবনু মুসলিম, তিনি বলেন: আমি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি। অতঃপর তিনি তা মারফূ' হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ' (জাল)। এর ত্রুটি হলো এই আল-আদাবী; কেননা সে একজন জালিয়াত (ওয়াদ্দা')। এই কারণে, সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু শা-যানের এই বর্ণনাটিকে ‘আল-জামি' আস-সাগীর’ গ্রন্থে অন্তর্ভুক্ত করে ভুল করেছেন; যদিও এর অর্থ অন্যান্য সূত্রে প্রমাণিত, যেমনটি পূর্বে ‘আস-সহীহাহ’ (১০৪৫)-এ উল্লেখ করা হয়েছে: ‘বরকত তিনটি বস্তুতে...’। তবে এর অর্থ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যদের হাদীছ হতে এসেছে, আর আমি তা পূর্বে উল্লেখিত স্থানে তাখরীজ (বিশ্লেষণ) করেছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2674)


(التمسوا الجار قبل الدار، والرفيق قبل الطريق) .
ضعيف جدا
رواه الطبراني (1/220/2) ، والقضاعي (60/1) عن
عثمان بن عبد الرحمن الطرائفي: أخبرنا أبان بن المحبر عن سعيد بن رافع بن خديج عن أبيه عن جده مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا؛ مسلسل بالعلل:
الأولى: سعيد هذا - وهو ابن معروف بن راقع بن خديج - قال الأزدي:
` لا تقوم به حجة `.
الثانية: أبان بن المحبر؛ قال الذهبي:
` متروك `.
الثالثة: عثمان بن عبد الرحمن الطرائفي؛ قال الحافظ:
` صدوق، أكثر الرواية عن الضعفاء والمجاهيل، فضعف بسبب ذلك، حتى نسبه ابن نمير إلى الكذب، وقد وثقه ابن معين `.
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(বাড়ির আগে প্রতিবেশী তালাশ করো, আর পথের আগে সঙ্গী তালাশ করো)।

যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী (১/২২০/২), এবং আল-কুদ্বাঈ (৬০/১)
উসমান ইবনু আবদির রহমান আত-ত্বারাঈফী হতে। তিনি বলেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আবান ইবনুল মুহাব্বার, তিনি সাঈদ ইবনু রাফি' ইবনু খাদীজ হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি তাঁর দাদা হতে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই দুর্বল; এটি ত্রুটিসমূহের (ইল্লত) একটি সিলসিলাহ (ধারাবাহিকতা):

প্রথমত: এই সাঈদ – আর তিনি হলেন ইবনু মা'রূফ ইবনু রাফি' ইবনু খাদীজ – তাঁর সম্পর্কে আল-আযদী বলেছেন: ‘তাকে দিয়ে দলীল প্রতিষ্ঠিত হয় না।’

দ্বিতীয়ত: আবান ইবনুল মুহাব্বার; তাঁর সম্পর্কে আয-যাহাবী বলেছেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।

তৃতীয়ত: উসমান ইবনু আবদির রহমান আত-ত্বারাঈফী; তাঁর সম্পর্কে আল-হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘তিনি সাদূক (সত্যবাদী), তবে তিনি দুর্বল ও মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবীদের থেকে অধিক বর্ণনা করেছেন। ফলে এই কারণে তিনি দুর্বল হয়ে গেছেন। এমনকি ইবনু নুমাইর তাঁকে মিথ্যার সাথেও সম্পৃক্ত করেছেন। তবে ইবনু মাঈন তাঁকে বিশ্বস্ত (সিকাহ) বলেছেন।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2675)


(الجار قبل الدار، والرفيق قبل الطريق، والزاد قبل الرحيل) .
ضعيف
رواه الخطيب في ` الجامع ` (22/1 - من المنتقى منه) عن عبد الغفار بن عبيد الله بن السري الحصيني: أخبرنا أحمد بن نصر الباهلي: أخبرنا إبراهيم بن إسحاق الأحمري: أخبرنا عبد الله بن حماد الأنصاري عن محمد بن مسلم عن أبي جعفر محمد بن علي عن أبيه علي بن الحسين بن علي عن أبيه علي بن أبي طالب مرفوعا.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مظلم، من دون أبي جعفر - وهو الصادق - لم أعرفهم، غير الأحمري؛ فأورده الحافظ في ` اللسان ` وقال:
` ذكره الطوسي في ` رجال الشيعة ` وقال: كان ضعيفا في حديثه `.
وعبد الغفار هذا ليس هو عبد الغفار بن عبيد الله بن عبد الأعلى بن عبد الله بن عامر بن كريز القرشي، فإنه متقدم الطبقة على هذا، وترجمه ابن أبي حاتم (3/1/54) وقال:
` روى عنه أبي ومحمد بن مسلم بن وارة `، ولم يذكر فيه جرحا ولا تعديلا.
والحديث سكت على إسناده السخاوي في ` المقاصد ` (ص 84) بعد أن عزاه لـ ` جامع الخطيب `! وقال في الطريق المتقدمة:
` وابن المحبر متروك، وهو وسعيد لا تقوم بهما حجة. ولكن له شاهد، رواه العسكري فقط من حديث عبد الملك بن سعيد الخزاعي عن جعفر بن محمد عن أبيه عن آبائه عن علي … `.
قلت: فذكر متنه بنحوه، وسكت عليه أيضا، وكأنه لظهور ضعفه؛ فإن عبد الملك بن سعيد هذا لا يعرف؛ فإنهم أغفلوه ولم يترجموه، ثم إنني لا أدري إذا كان السند إليه ثابتا أم لا؟
ثم ذكر من رواية الخطيب أيضا من طريق عبد الله بن محمد اليمامي عن أبيه عن جده قال: قال خفاف بن ندبة: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكر حديثا فيه مرفوعا: ` يا خفاف! ابتغ الرفيق قبل الطريق، فإن عرض لك أمر لم يضرك، وإن احتجت إليه نفعك `. وقال:
` وكلها ضعيفة `.
قلت: واليمامي هذا مجهول؛ كما قال ابن أبي حاتم (2/2/158) عن أبيه، وتبعه الذهبي والعسقلاني. ثم قال السخاوي:
` ولكن بانضمامها تقوى `.
وفيه عندي نظر، لأن الطريق الأولى واهية جدا فلا تقويها الشواهد؛ كما هو معلوم من ` المصطلح `، وبقية الطرق مظلمة مجهولة، على أن الأخير منها قاصر ليس فيه: ` الجار قبل الدار `. والله أعلم.
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(প্রতিবেশী ঘরের আগে, সঙ্গী পথের আগে, এবং পাথেয় সফরের আগে)।
যঈফ (দুর্বল)
এটি বর্ণনা করেছেন খতীব তাঁর ‘আল-জামি’ গ্রন্থে (২২/১ – এর নির্বাচিত অংশ থেকে) আব্দুল গাফফার ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনুস সারী আল-হুসাইনীর সূত্রে: তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আহমাদ ইবনু নাসর আল-বাহিলী: তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন ইবরাহীম ইবনু ইসহাক আল-আহমারী: তিনি বলেন, আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আব্দুল্লাহ ইবনু হাম্মাদ আল-আনসারী, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু মুসলিম থেকে, তিনি আবূ জা’ফার মুহাম্মাদ ইবনু আলী থেকে, তিনি তাঁর পিতা আলী ইবনুল হুসাইন ইবনু আলী থেকে, তিনি তাঁর পিতা আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল ও অন্ধকারাচ্ছন্ন (মাজহুল)। আবূ জা’ফার (যিনি আস-সাদিক) ব্যতীত নিচের রাবীদেরকে আমি চিনি না, আল-আহমারী ছাড়া; কারণ হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁকে ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তুসী তাঁকে ‘রিজালুশ শী’আহ’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: তিনি তাঁর হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল ছিলেন।’
আর এই আব্দুল গাফফার সেই আব্দুল গাফফার ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্দুল আ’লা ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আমির ইবনু কুরাইয আল-কুরাশী নন। কারণ তিনি এই রাবীর চেয়ে পূর্ববর্তী স্তরের। ইবনু আবী হাতিম তাঁর জীবনী (৩/১/৫৪) উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তাঁর থেকে আমার পিতা এবং মুহাম্মাদ ইবনু মুসলিম ইবনু ওয়ারা বর্ণনা করেছেন,’ এবং তিনি তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।
আর এই হাদীসের সনদ সম্পর্কে সাখাবী ‘আল-মাকাসিদ’ গ্রন্থে (পৃ. ৮৪) নীরবতা অবলম্বন করেছেন, খতীবের ‘আল-জামি’ গ্রন্থের দিকে এর সূত্র উল্লেখ করার পর! এবং তিনি পূর্বোক্ত সনদের ব্যাপারে বলেছেন: ‘আর ইবনুল মুহাব্বার মাতরূক (পরিত্যক্ত), আর সে এবং সাঈদ উভয়ের দ্বারা দলীল প্রতিষ্ঠিত হয় না। তবে এর একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে, যা শুধু আল-আসকারী বর্ণনা করেছেন আব্দুল মালিক ইবনু সাঈদ আল-খুযাঈর হাদীস থেকে, তিনি জা’ফার ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পূর্বপুরুষগণ থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে...।’
আমি (আলবানী) বলি: অতঃপর তিনি এর কাছাকাছি মতন (মূলপাঠ) উল্লেখ করেছেন এবং এর ব্যাপারেও নীরবতা অবলম্বন করেছেন। সম্ভবত এর দুর্বলতা সুস্পষ্ট হওয়ার কারণে; কারণ এই আব্দুল মালিক ইবনু সাঈদ অপরিচিত (লা ইউ’রাফ); কারণ তারা তাঁকে উপেক্ষা করেছেন এবং তাঁর জীবনী উল্লেখ করেননি। এরপর আমি জানি না যে তাঁর পর্যন্ত সনদটি প্রমাণিত কি না?
অতঃপর তিনি (সাখাবী) খতীবের আরেকটি বর্ণনাও উল্লেখ করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ আল-ইয়ামামী তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে, তিনি বলেন: খুফাফ ইবনু নুদ্ববাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট আসলাম... অতঃপর তিনি একটি হাদীস উল্লেখ করলেন, যার মধ্যে মারফূ’ হিসেবে রয়েছে: ‘হে খুফাফ! পথের আগে সঙ্গী তালাশ করো। কারণ যদি তোমার সামনে কোনো বিপদ আসে, তবে তা তোমাকে ক্ষতি করবে না, আর যদি তোমার তাকে প্রয়োজন হয়, তবে সে তোমাকে উপকার করবে।’ এবং তিনি (সাখাবী) বলেছেন: ‘এগুলো সবই দুর্বল।’
আমি (আলবানী) বলি: আর এই আল-ইয়ামামী মাজহূল (অজ্ঞাত); যেমনটি ইবনু আবী হাতিম (২/২/১৫৮) তাঁর পিতা থেকে বলেছেন, আর যাহাবী ও আসকালানীও তাঁকে অনুসরণ করেছেন। অতঃপর সাখাবী বলেছেন: ‘কিন্তু এগুলো একত্রিত হলে শক্তিশালী হয়।’ আমার মতে এতে আপত্তি আছে, কারণ প্রথম সনদটি খুবই দুর্বল (ওয়াহিয়াহ জিদ্দান), তাই শাহেদসমূহ এটিকে শক্তিশালী করতে পারে না; যেমনটি ‘মুসতালাহ’ (হাদীস পরিভাষা) থেকে জানা যায়। আর বাকি সনদগুলো অন্ধকারাচ্ছন্ন ও মাজহূল। উপরন্তু, শেষ সনদটি অসম্পূর্ণ, তাতে ‘প্রতিবেশী ঘরের আগে’ অংশটি নেই। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2676)


(ما انتعل أحد قط ولا تخفف ولا لبس ثوبا ليغدو في طلب علم يتعلمه إلا غفر الله عز وجل له حيث يخطو عتبة باب بيته) .
موضوع.
رواه ابن عدي في ` الكامل ` (12 / 1) ، والطبراني في ` الأوسط ` (6 / 37 / 5722 - حرمين) ، وتمام في ` الفوائد ` (272 / 1 - 2) ، وابن عساكر (2 / 373 / 1) عن إسماعيل بن يحيى بن عبيد الله أبي علي التيمي: ثنا فطر بن خليفة عن أبي الطفيل عن علي مرفوعا.
ورواه عفيف الدين في ` فضل العلم ` (122 / 2) عن المحاربي ثنا فطر به.
وقال ابن عدي:
` وهذا باطل ليس يرويه عن فطر غير إسماعيل، وعامة ما يرويه بواطيل عن الثقات وعن الضعفاء `.
وقد روي بإسناد آخر له بلفظ:
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(কেউই কখনো জুতা পরিধান করে না, অথবা হালকা পোশাক পরে না, অথবা জ্ঞান অর্জনের উদ্দেশ্যে বের হওয়ার জন্য কাপড় পরিধান করে না, তবে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাকে ক্ষমা করে দেন, যখনই সে তার ঘরের দরজার চৌকাঠ অতিক্রম করে।)
মাওদ্বূ।
এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (১২/১), ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৬/৩৭/৫৭২২ - হারামাইন), তাম্মাম তাঁর ‘আল-ফাওয়াইদ’ গ্রন্থে (২৭২/১-২), এবং ইবনু আসাকির (২/৩৭৩/১) ইসমাঈল ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু উবাইদুল্লাহ আবূ আলী আত-তাইমী হতে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ফিতর ইবনু খালীফা, তিনি আবূ তুফাইল হতে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ সূত্রে।
আর এটি বর্ণনা করেছেন আফীফ উদ্দীন তাঁর ‘ফাদলুল ইলম’ গ্রন্থে (১২২/২) আল-মুহারিবী হতে, তিনি বলেন, আমাদের নিকট ফিতর এটি বর্ণনা করেছেন।
আর ইবনু আদী বলেছেন:
‘এটি বাতিল (মিথ্যা)। ইসমাঈল ব্যতীত অন্য কেউ ফিতর হতে এটি বর্ণনা করেননি। আর সে (ইসমাঈল) সাধারণত যা বর্ণনা করে, তা নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী এবং দুর্বল বর্ণনাকারী উভয়ের সূত্রেই বাতিল (মিথ্যা) হয়ে থাকে।’
আর এটি অন্য একটি ইসনাদে এই শব্দে বর্ণিত হয়েছে:
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2677)


(من انتعل يتعلم علما، غفر له قبل أن يخطوَ)
موضوع. رواه ابن شاهين في ` الترغيب ` (ق 191 / 1) ، وأبو الفضل السهلكي في ` حديثه ` (94 / 2) عن إسماعيل بن يحيى: حدثنا سفيان عن مجاهد عن الشعبي عن الأسود عن عائشة مرفوعا.
قلت: وهذا موضوع؛ إسماعيل بن يحيى وهو أبو يحيى التيمي كان يضع الحديث كما قال صالح جزرة، وكذبه الدراقطني وغيره، وعرفت قول ابن عدي فيه آنفاً.
(تنبيه) : الحديث في الجامع الصغير بلفظ، ` انتقل ` من الانتقال وعليه شرح المناوي، وهو تصحيف، والصواب ما في روايتنا: ` انتَعَلَ ` أي لبس نعله، بدليل قوله: ` قبل أن يخطو `، وهذا بيَّن لا يخفى، ويؤيده الرواية السابقة: ` ما انتعل أحد قط. . . `، وعلى الصواب وقع في الجامع الكبير (2 / 228 / 2) وأعلَّه بإسماعيل هذا! فكيف استجاز إيراده في ` الجامع الصغير `؟!
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(যে ব্যক্তি ইলম (জ্ঞান) অর্জনের জন্য জুতা পরিধান করে, কদম ফেলার পূর্বেই তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়।)
মাওদ্বূ (জাল)।
এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু শাহীন তাঁর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (ক্বাফ ১৯১/১), এবং আবুল ফাদল আস-সাহলাকী তাঁর ‘হাদীস’ গ্রন্থে (৯৪/২) ইসমাঈল ইবনু ইয়াহইয়া থেকে, তিনি বলেন: আমাদের নিকট সুফিয়ান বর্ণনা করেছেন মুজাহিদ থেকে, তিনি শা‘বী থেকে, তিনি আসওয়াদ থেকে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে।
আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল); ইসমাঈল ইবনু ইয়াহইয়া, আর তিনি হলেন আবূ ইয়াহইয়া আত-তাইমী, তিনি হাদীস জাল করতেন, যেমনটি সালেহ জাযারাহ বলেছেন। আর দারাকুতনী ও অন্যান্যরা তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। ইবনু আদী তার সম্পর্কে পূর্বে যে মন্তব্য করেছেন, তা আপনি জেনেছেন।
(সতর্কীকরণ): হাদীসটি ‘আল-জামি‘উস সাগীর’ গ্রন্থে ‘انتقل’ (ইনতাক্বালা) শব্দে বর্ণিত হয়েছে, যা ‘স্থানান্তর হওয়া’ (আল-ইনতিক্বাল) থেকে এসেছে এবং এর উপরই আল-মুনাভীর ব্যাখ্যা রয়েছে। কিন্তু এটি ভুল পাঠ (তাসহীফ)। সঠিক হলো আমাদের বর্ণনায় যা রয়েছে: ‘انتَعَلَ’ (ইনতা‘আলা), অর্থাৎ জুতা পরিধান করা। এর প্রমাণ হলো তাঁর (হাদীসের) বাণী: ‘কদম ফেলার পূর্বেই’। আর এটি স্পষ্ট, যা গোপন থাকার নয়। পূর্বের বর্ণনাটিও এটিকে সমর্থন করে: ‘কেউ কখনো জুতা পরিধান করেনি...’। সঠিক পাঠের উপর ভিত্তি করেই এটি ‘আল-জামি‘উল কাবীর’ গ্রন্থে (২/২২৮/২) এসেছে এবং তিনি (সুয়ূতী) ইসমাঈল নামক এই রাবীর কারণে এটিকে দুর্বল (আ‘আল্লাহু) বলেছেন! তাহলে তিনি কীভাবে ‘আল-জামি‘উস সাগীর’ গ্রন্থে এটি উল্লেখ করার অনুমতি পেলেন?!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2678)


(أكرموا العلماء، فإنهم ورثة الأنبياء، من أكرمهم فقد أكرم الله ورسوله `
موضوع.

أخرجه ابن جبرون المعدل في ` الفوائد العوالي ` (1/15/2) ، والخطيب في ` تاريخ بغداد ` (4/437 - 438) ، والديلمي (1/1/32) عن الضحاك بن حجوة الفريابي عن الثوري عن ابن المنكدر عن جابر مرفوعا.
قلت: أشار الحافظ إلى إعلاله بالضحاك هذا، ولكنه لم يذكر من حاله شيئا. وقد قال الدارقطني:
` كان يضع الحديث `.
وذكره الذهبي في ` الميزان `، ثم قال:
` ومن مصائبه هذا الحديث `!
ولذلك أورده السيوطي في ` ذيل الأحاديث الموضوعة ` (رقم 182 - بترقيمي) ، كما أورده في ` الجامع الصغير ` فما أشد تناقضه!
وأورده فيه أيضا من رواية ابن عساكر عن ابن عباس! دون الشطر الثاني، وتساهل المناوي في ` التيسير ` فقال في حديث الترجمة:
` ضعيف لضعف الضحاك بن حجوة، لكن يعضده حديث ابن عباس `.
وهذه غفلة شديدة منه تبعه عليها الشيخ الغماري في ` المداوي ` (2/182 - 183) ، وكأنهما لم يقفا على إسناده عند ابن عساكر، فقد أخرجه في ترجمة (عبد الملك بن محمد بن يونس أبي عقيل السمرقندي) (37/103 - 104) بإسناده عن أحمد بن عيسى اللخمي، عن إبراهيم بن مالك: أخبرنا شعبة بن الحجاج عن الحكم بن عتيبة عن عكرمة عن ابن عباس مرفوعا.
وهذا كالذي قبله موضوع. أحمد بن عيسى اللخمي هو التنيسي المصري كما في ` تهذيب التهذيب `، أورده ابن حبان في ` الضعفاء ` (1/146) وقال:
` يروي عن المجاهيل الأشياء المناكير، وعن المشاهير الأشياء المقلوبة، لا يجوز عندي الاحتجاج بما انفرد به من الأخبار `.
ثم ذكر له حديثين آخرين وقال:
` جميعا موضوعان `.
وذكر له ابن عدي (1/194) أحاديث بواطيل.
وشيخه إبراهيم بن مالك هو الأنصاري، ذكر له ابن عدي (1/252 - 253) . وساق له أحاديث وقال:
` وهذه الأحاديث مع أحاديث سواها لإبراهيم بن مالك موضوعة، كلها مناكير `، وقد حقق الذهبي والعسقلاني أنه (إبراهيم بن البراء بن النضر بن أنس بن مالك الأنصاري) ، عن شعبة والحمادين، قال ابن عدي:
` ضعيف جدا، حدث بالبواطيل `. فراجع ` اللسان `.
لكن جملة ` العلماء ورثة الأنبياء ` ثبتت عند ابن حبان وغيره، وبعض أسانيده مقبولة؛ كما في ` التعليق الرغيب ` (1/53/2) .
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(তোমরা আলেমদের সম্মান করো, কারণ তারা নবীদের উত্তরাধিকারী। যে তাদের সম্মান করলো, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সম্মান করলো।)
মাওদ্বূ (Mawdu - জাল)।

এটি ইবনু জাবরূন আল-মু'আদ্দাল তাঁর ‘আল-ফাওয়াইদ আল-আওয়ালী’ (১/১৫/২)-তে, এবং খতীব তাঁর ‘তারীখে বাগদাদ’ (৪/৪৩৭-৪৩৮)-এ, এবং দায়লামী (১/১/৩২)-তে আদ-দাহহাক ইবনু হাজওয়াহ আল-ফিরইয়াবী হতে, তিনি সাওরী হতে, তিনি ইবনু আল-মুনকাদির হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: হাফিয (ইবনু হাজার) এই হাদীসটিকে এই দাহহাক-এর কারণে ত্রুটিযুক্ত (ই'লাল) বলে ইঙ্গিত করেছেন, কিন্তু তিনি তার অবস্থা সম্পর্কে কিছু উল্লেখ করেননি। আর দারাকুতনী বলেছেন:
‘সে হাদীস জাল করত।’
আর যাহাবী তাকে ‘আল-মীযান’-এ উল্লেখ করেছেন, অতঃপর বলেছেন:
‘তার মারাত্মক ভুলগুলোর মধ্যে এই হাদীসটি অন্যতম!’
এই কারণে সুয়ূতী এটিকে ‘যায়লুল আহাদীসিল মাওদ্বূ'আহ’ (আমার ক্রমিক নং ১৮২)-তে অন্তর্ভুক্ত করেছেন, যেমন তিনি এটিকে ‘আল-জামি'উস সাগীর’-এও অন্তর্ভুক্ত করেছেন। তার এই স্ববিরোধিতা কতই না তীব্র!

তিনি (সুয়ূতী) এটিকে ইবনু আসাকিরের সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতেও তাতে (আল-জামি'উস সাগীর-এ) উল্লেখ করেছেন! তবে দ্বিতীয় অংশটি (যে তাদের সম্মান করলো, সে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের সম্মান করলো) ছাড়া। আর আল-মুনাভী ‘আত-তাইসীর’-এ শৈথিল্য দেখিয়েছেন এবং আলোচ্য হাদীস সম্পর্কে বলেছেন:
‘দাহহাক ইবনু হাজওয়াহ-এর দুর্বলতার কারণে এটি যঈফ (দুর্বল), কিন্তু ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস এটিকে সমর্থন করে।’
এটি তার পক্ষ থেকে চরম অসতর্কতা, যার অনুসরণ করেছেন শাইখ আল-গুমারী ‘আল-মুদাওয়ী’ (২/১৮২-১৮৩)-তে। মনে হয় তারা উভয়েই ইবনু আসাকিরের নিকট এর সনদ পাননি। কেননা তিনি এটিকে (আব্দুল মালিক ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ইউনুস আবূ আকীল আস-সামারকান্দী)-এর জীবনীতে (৩৭/১০৩-১০৪) তাঁর সনদসহ আহমাদ ইবনু ঈসা আল-লাখমী হতে, তিনি ইবরাহীম ইবনু মালিক হতে বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে শু'বাহ ইবনু আল-হাজ্জাজ খবর দিয়েছেন, তিনি আল-হাকাম ইবনু উতাইবাহ হতে, তিনি ইকরিমাহ হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আর এটিও পূর্বেরটির মতোই মাওদ্বূ (জাল)। আহমাদ ইবনু ঈসা আল-লাখমী হলেন আত-তিয়ানীসী আল-মিসরী, যেমনটি ‘তাহযীবুত তাহযীব’-এ রয়েছে। ইবনু হিব্বান তাকে ‘আয-যু'আফা’ (১/১৪৬)-তে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবীদের সূত্রে মুনকার (অস্বীকৃত) বিষয়াদি বর্ণনা করেন এবং প্রসিদ্ধ রাবীদের সূত্রে মাকলূব (উল্টে দেওয়া) বিষয়াদি বর্ণনা করেন। আমার মতে, তিনি এককভাবে যে সকল খবর বর্ণনা করেন, তা দ্বারা দলীল পেশ করা জায়েয নয়।’
অতঃপর তিনি তার জন্য আরও দুটি হাদীস উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘উভয়টিই মাওদ্বূ।’
আর ইবনু আদী তার জন্য (১/১৯৪)-তে বাতিল হাদীসসমূহ উল্লেখ করেছেন।

আর তার শাইখ ইবরাহীম ইবনু মালিক হলেন আল-আনসারী। ইবনু আদী তাকে (১/২৫২-২৫৩)-তে উল্লেখ করেছেন। এবং তার সূত্রে হাদীসসমূহ বর্ণনা করে বলেছেন:
‘ইবরাহীম ইবনু মালিকের এই হাদীসগুলো এবং অন্যান্য হাদীসসমূহ মাওদ্বূ, সবগুলোই মুনকার।’
আর যাহাবী ও আসকালানী নিশ্চিত করেছেন যে, তিনি হলেন (ইবরাহীম ইবনু আল-বারা ইবনু আন-নাদর ইবনু আনাস ইবনু মালিক আল-আনসারী), যিনি শু'বাহ ও হাম্মাদাইন (দুই হাম্মাদ) হতে বর্ণনা করেন। ইবনু আদী বলেছেন:
‘খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান), তিনি বাতিল বিষয়াদি বর্ণনা করতেন।’ সুতরাং ‘আল-লিসান’ দেখুন।

কিন্তু ‘আলেমগণ নবীদের উত্তরাধিকারী’ এই বাক্যটি ইবনু হিব্বান ও অন্যান্যদের নিকট প্রমাণিত হয়েছে, এবং এর কিছু সনদ মাকবূল (গ্রহণযোগ্য); যেমনটি ‘আত-তা'লীকুর রাগীব’ (১/৫৩/২)-তে রয়েছে।
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2679)


(أكرموا حملة القرآن، فمن أكرمهم فقد أكرمني) .
منكر
رواه الديلمي (1/1/34) من طريق الدارقطني عن خلف الضرير: حدثنا وكيع عن الأعمش عن زائدة عن عاصم عن زر عن عبد الله بن عمرو مرفوعا.
أشار الحافظ إلى إعلاله بخلف هذا، ولكنه لم يذكر من حاله شيئا، وقد قال الذهبي:
` فيه جهالة؛ قال ابن الجوزي: روى حديثا منكرا `.
وأورده السيوطي في ` ذيل الأحاديث الموضوعة ` (ص 39 - رقم 184 - بترقيمي) وأعله بما ذكرنا.
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(কুরআন বহনকারীদের সম্মান করো, কেননা যে তাদের সম্মান করলো, সে আমাকেই সম্মান করলো।)

মুনকার (Munkar)

এটি বর্ণনা করেছেন দায়লামী (১/১/৩৪) দারাকুতনীর সূত্রে খালাফ আয-দ্বামীর (খলফ আয-দ্বামীর) থেকে, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ওয়াকী', তিনি আ'মাশ থেকে, তিনি যায়েদাহ থেকে, তিনি আসিম থেকে, তিনি যির থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।

হাফিয (ইবনু হাজার) এই হাদীসটিকে এই খালাফের (খলফ আয-দ্বামীর) কারণে ত্রুটিযুক্ত বলে ইঙ্গিত করেছেন, কিন্তু তিনি তার অবস্থা সম্পর্কে কিছু উল্লেখ করেননি। আর ইমাম যাহাবী বলেছেন:
‘তার মধ্যে জাহালাত (অজ্ঞাত অবস্থা) রয়েছে; ইবনুল জাওযী বলেছেন: সে একটি মুনকার হাদীস বর্ণনা করেছে।’

আর সুয়ূতী এটিকে তাঁর ‘যাইলুল আহাদীসিল মাওদ্বূ'আহ’ (পৃষ্ঠা ৩৯ - নং ১৮৪ - আমার ক্রমিক অনুসারে) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং আমরা যা উল্লেখ করেছি তার দ্বারা এটিকে ত্রুটিযুক্ত (যঈফ) সাব্যস্ত করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (2680)


(أكرموا بيوتكم ببعض صلاتكم) .
ضعيف

أخرجه ابن خزيمة (1/130/2) ، والحاكم (1/313) ، والديلمي (1/1/33) عن الطبراني والضياء في ` المختارة ` (6/309 - 310) عن عبد الله بن فروخ عن ابن جريج عن عطاء عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: فذكره.
وقال الحافظ: ` أخرجه الحاكم من هذا الوجه وصححه `!
قلت: عبارة الحاكم:
` لفظه عجب، وعبد الله بن فروخ صدوق `!
وتعقبه الذهبي بقوله:
` قال ابن عدي: أحاديثه غير المحفوظة `.
وقال الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق يغلط `.
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(তোমাদের কিছু সালাত দ্বারা তোমাদের ঘরসমূহকে সম্মানিত করো।)
যঈফ

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু খুযাইমাহ (১/১৩০/২), হাকিম (১/৩১৩), দায়লামী (১/১/৩৩) তাবারানী ও যিয়া কর্তৃক ‘আল-মুখতারাহ’ (৬/৩০৯ - ৩১০) গ্রন্থে। তারা বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ফাররুখ হতে, তিনি ইবনু জুরাইজ হতে, তিনি আতা হতে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘হাকিম এই সূত্র ধরে এটি বর্ণনা করেছেন এবং সহীহ বলেছেন!’

আমি (আলবানী) বলি: হাকিমের বক্তব্য হলো:
‘এর শব্দগুলো আশ্চর্যজনক, আর আব্দুল্লাহ ইবনু ফাররুখ সাদূক (সত্যবাদী)।’

আর যাহাবী এর সমালোচনা করে বলেছেন:
‘ইবনু আদী বলেছেন: তার হাদীসগুলো সংরক্ষিত নয় (গায়রুল মাহফূযাহ)।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তিনি সাদূক (সত্যবাদী), তবে ভুল করেন (ইয়াগলিতু)।’