হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4963)


(ألا قلت: فكيف تكونان خيراً مني؛ وزوجي محمد، وأبي هارون، وعمي موسى؟!) .
ضعيف

أخرجه الترمذي (2/ 323) ، والحاكم (4/ 29) عن هاشم بن سعيد الكوفي: حدثنا كنانة قال: حدثتنا صفية بنت حيي قالت:
دخل علي رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ وقد بلغني عن حفصة وعائشة كلام، فذكرت ذلك له فقال … فذكره.
وكان الذي بلغها أنهم قالوا: نحن أكرم على رسول الله صلى الله عليه وسلم منها، وقالوا: نحن أزواج النبي صلى الله عليه وسلم وبنات عمه.
هذا لفظ الترمذي. وقال:
`حديث غريب، لا نعرفه من حديث ضفية إلا من حديث هاشم الكوفي، وليس إسناده بذلك القوي`.
قلت: وقال الحافظ في `التقريب`:
`ضعيف`.
قلت: وكنانة مولى صفية؛ لم يوثقه غير ابن حبان. لكن روى عنه جمع. وقال الحافظ:
`مقبول` (1) !
وقد ذكر الحافظ في ترجمته من `التهذيب` أن الحديث رواه ابن عدي من طريق يزيد بن مغلس الباهلي: حدثنا كنانة بن نبيه مولى صفية … فذكر الحديث.
قلت: وهذا ظاهره أن يزيد بن المغلس تابع هاشم بن سعيد. وحينئذ يتقوى الحديث بمتابعته.
ولكني أرى أن في إسناد ابن عدي انقطاعاً أو سقطاً؛ فإن ابن المغلس إنما يروي عن مالك وطبقته من أتباع التابعين، فمثله لم يدرك أحداً من التابعين قطعاً، وكنانة منهم.
ويؤيده أنهم ذكروا في شيوخ يزيد هذا هاشم بن سعيد الراوي للحديث عن كنانة، فالظاهر أنه هو الساقط بين يزيد وكنانة. والله أعلم.
والحديث؛ بيض له الحاكم والذهبي، ولعل ذلك لظهور ضعفه.
وأشار إلى ذلك ابن عبد البر في ترجمة صفية من `الاستيعاب` (4/ 1872) بقوله:
`ويروى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل على صفية … ` فذكره.
(1) وقد تراجح للشيخ رحمه الله أخيراً، أن (كنانة) هذا (صدوق) ؛ فانظر ما سبق من هذه ` السلسلة ` (1/190 - 191) . (الناشر)
وتجاهل الشيعي في `مراجعاته` (ص 239) ضعف الحديث، فاستدل به على أن عائشة رضي الله عنها ليست أفضل من صفية وسائر زوجاته صلى الله عليه وسلم.
ومن غرائب جهله أو تجاهله: أنه عزاه للترمذي، ولم ينقل عنه تضعيفه إياه بقوله:
`حديث غريب … ` إلخ.
كما جهل أو تجاهل أيضاً إشارة ابن عبد البر إلى تضعيفه.
ولكن هذا غريباً منه وهو يكذب على العلماء الكذب الصريح؛ كما تقدم بيانه مراراً وتكراراً!
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(তুমি কেন বললে না: তারা আমার চেয়ে কীভাবে উত্তম হবে? আমার স্বামী মুহাম্মাদ, আমার পিতা হারূন এবং আমার চাচা মূসা?!)।
যঈফ

এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (২/৩২৩) এবং হাকিম (৪/২৯) হাশিম ইবনু সাঈদ আল-কূফী থেকে, তিনি বলেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন কিনানাহ, তিনি বলেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন সাফিয়্যাহ বিনতু হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার কাছে প্রবেশ করলেন। তখন হাফসাহ ও আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে কিছু কথা আমার কাছে পৌঁছেছিল। আমি তাঁকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা জানালাম। তখন তিনি বললেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
আর তাঁর কাছে যা পৌঁছেছিল, তা হলো তারা বলেছিল: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে তার (সাফিয়্যাহর) চেয়ে বেশি সম্মানিত। আর তারা বলেছিল: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের স্ত্রী এবং তাঁর চাচাতো বোন।
এটি তিরমিযীর শব্দ। তিনি বলেন:
‘হাদীসটি গারীব (অপরিচিত)। আমরা সাফিয়্যাহর হাদীস হিসেবে এটি হাশিম আল-কূফীর হাদীস ছাড়া অন্য কোনো সূত্রে জানি না। আর এর সনদ ততটা শক্তিশালী নয়।’
আমি (আলবানী) বলি: আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘যঈফ (দুর্বল)’।
আমি বলি: আর কিনানাহ ছিলেন সাফিয়্যাহর আযাদকৃত গোলাম। ইবনু হিব্বান ছাড়া অন্য কেউ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি। তবে তার থেকে একটি দল বর্ণনা করেছে। আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘মাকবূল (গ্রহণযোগ্য)’ (১)!
আর হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর জীবনীতে ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন যে, হাদীসটি ইবনু আদী ইয়াযীদ ইবনু মুগাল্লিস আল-বাহিলীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন কিনানাহ ইবনু নুবাইহ, সাফিয়্যাহর আযাদকৃত গোলাম... অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন।
আমি বলি: এর বাহ্যিক অর্থ হলো ইয়াযীদ ইবনু মুগাল্লিস, হাশিম ইবনু সাঈদের মুতাবা‘আত (অনুসরণ) করেছেন। আর এই মুতাবা‘আতের কারণে হাদীসটি শক্তিশালী হয়।
কিন্তু আমি মনে করি যে, ইবনু আদীর সনদে ইনকিতা‘ (বিচ্ছিন্নতা) অথবা সাকত (বর্ণনাকারীর পতন) রয়েছে। কারণ ইবনুল মুগাল্লিস কেবল মালিক এবং তাঁর স্তরের তাবে‘ঈনদের অনুসারীদের থেকে বর্ণনা করেন। তাই তাঁর মতো ব্যক্তি নিশ্চিতভাবে তাবে‘ঈনদের কাউকে পাননি, আর কিনানাহ তাদের অন্তর্ভুক্ত।
এর সমর্থন করে যে, তারা এই ইয়াযীদের শায়খদের মধ্যে হাশিম ইবনু সাঈদকে উল্লেখ করেছেন, যিনি কিনানাহ থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। সুতরাং স্পষ্টতই ইয়াযীদ ও কিনানাহর মাঝে তিনিই (হাশিম) পতিত (সাকিত) হয়েছেন। আল্লাহই ভালো জানেন।
আর এই হাদীসটির ক্ষেত্রে হাকিম ও যাহাবী নীরবতা পালন করেছেন (بيض له)। সম্ভবত এর দুর্বলতা সুস্পষ্ট হওয়ার কারণেই এমনটি হয়েছে।
আর ইবনু ‘আবদিল বার্র ‘আল-ইসতি‘আব’ (৪/১৮৭২) গ্রন্থে সাফিয়্যাহর জীবনীতে এই দিকে ইঙ্গিত করেছেন, তাঁর এই উক্তি দ্বারা:
‘বর্ণিত আছে যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাফিয়্যাহর কাছে প্রবেশ করলেন...’ অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কাছে অবশেষে এই মতটি প্রাধান্য পেয়েছে যে, এই (কিনানাহ) ‘সাদূক’ (সত্যবাদী)। এই ‘সিলসিলাহ’র পূর্বের অংশ (১/১৯০-১৯১) দেখুন। (প্রকাশক)
আর শিয়া ব্যক্তি তার ‘মুরাজা‘আত’ (পৃ. ২৩৯) গ্রন্থে হাদীসটির দুর্বলতাকে উপেক্ষা করেছে। অতঃপর সে এর দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছে যে, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাফিয়্যাহ এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অন্যান্য স্ত্রীদের চেয়ে উত্তম নন।
তার অজ্ঞতা বা উপেক্ষার অদ্ভুত দিকগুলোর মধ্যে এটিও যে, সে হাদীসটিকে তিরমিযীর দিকে সম্পর্কিত করেছে, কিন্তু তিরমিযীর দুর্বলতা ঘোষণার উক্তিটি—‘হাদীসটি গারীব...’ ইত্যাদি—সে উদ্ধৃত করেনি।
যেমন সে ইবনু ‘আবদিল বার্র-এর দুর্বলতার দিকে ইঙ্গিত করাকেও অজ্ঞতা বা উপেক্ষা করেছে।
কিন্তু তার কাছ থেকে এটি অদ্ভুত নয়, কারণ সে স্পষ্ট মিথ্যাচার করে ‘উলামাদের উপর; যেমনটি এর আগে বারবার ব্যাখ্যা করা হয়েছে!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4964)


(خذ هذا السيف؛ فانطلق، فاضرب عنق ابن عم مارية حيث وجدته) .
ضعيف جداً

أخرجه الحاكم (4/ 39) من طريق أبي معاذ سليمان بن الأرقم الأنصاري عن الزهري عن عروة عن عائشة رضي الله عنها قالت:
أهديت مارية إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ومعها ابن عم لها؛ قالت: فوقع عليها وقعة، فاستمرت حاملاً. قالت: فعزلها عند ابن عمها. قالت: فقال أهل الإفك والزور: من حاجته إلى الولد ادعى ولد غيره! وكانت أمة قليلة اللبن، فابتاعت له ضائنة لبون، فكان يغذى بلبنها، فحسن عليها لحمه. قالت عائشة رضي الله عنها: فدخل به على النبي صلى الله عليه وسلم ذات يوم. فقال:
`كيف ترين؟ `. فقلت: من غذي بلحم الضأن يحسن لحمه! قال:
`ولا الشبه؟ `. قالت: فحملني ما يحمل النساء من الغيرة أن قلت: ما أرى
شبهاً! قالت: وبلغ رسول الله صلى الله عليه وسلم ما يقول الناس. فقال لعلي … (فذكر الحديث) . قالت: فانطلق؛ فإذا هو في حائط على نخلة يخترف رطبات. قال: فلما نظر إلى علي ومعه السيف؛ استقبلته رعدة. قال: فسقطت الخرقة؛ فإذا هو لم يخلق الله عز وجل له ما للرجال؛ شيء ممسوح.
قلت: سكت عنه الحاكم والذهبي، ولعله لظهور ضعفه؛ فإن سليمان بن الأرقم متفق بين الأئمة على تضعيفه، بل هو ضعيف جداً؛ فقد قال البخاري:
`تركوه`. وقال أبو داود، وأبو أحمد الحاكم، والدارقطني:
`متروك الحديث`. وقال أبو داود:
`قلت لأحمد: روى عن الزهري عن أنس في التلبية؟ قال: لا نبالي روى أم لم يرو`! وقال ابن عدي في آخر ترجمته - وقد ساق له نيفاً وعشرين حديثاً (154/ 1 - 2) - :
`وعامة ما يرويه لا يتابعه عليه أحد`.
قلت: وللحديث أصل صحيح، زاد عليه ابن الأرقم هذا زيادات منكرة، تدل على أنه سيىء الحفظ جداً، أو أنه يتعمد الكذب والزيادة؛ لهوى في نفسه، ثم يحتج بها أهل الأهواء!
فأنا أسوق لك النص الصحيح للحديث؛ ليتبين لك تلك الزيادات المنكرة، فروى ثابت عن أنس:
أن رجلاً كان يتهم بأم ولد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعلي:
`اذهب فاضرب عنقه`.
فأتاه علي؛ فإذا هو في ركي يتبرد فيها. فقال له علي: اخرج. فناوله يده، فأخرجه؛ فإذا هو محبوب ليس له ذكر، فكف علي عنه. ثم أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إنه لمحبوب؛ ما له ذكر.

أخرجه مسلم (8/ 119) ، والحاكم (4/ 39 - 40) ، وأحمد (3/ 281) ، وابن عبد البر في ترجمة مارية من `الاستيعاب` (4/ 1912) ؛ كلهم عن عفان: حدثنا حماد بن سلمة: أخبرنا ثابت … وقال الحاكم:
`صحيح على شرط مسلم، ولم يخرجاه`!
فوهم في استدراكه على مسلم! وقال ابن عبد البر:
`وروى الأعمش هذا الحديث فقال فيه: قال علي: يا رسول الله! أكون كالسكة المحماة؛ أو الشاهد يرى ما لا يرى الغائب؟ فقال: بل الشاهد يرى ما لا يرى الغائب`.
قلت: هذه الزيادة لم أقف عليها من رواية الأعمش، وإنما من رواية غيره من حديث علي نفسه، وقد مضى تخريجه في `الصحيحة` برقم (1904) ، وليس فيه أيضاً تلك الزيادات المنكرة التي تفرد بها ابن الأرقم في هذا الحديث.
وأشدها نكارة ما ذكره عن عائشة أنها قالت: ما أرى شبهاً!
فقد استغلها عبد الحسين الشيعي في `مراجعاته` أسوأ الاستغلال، واتكأ عليها في اتهامه للسيدة عائشة في خلقها ودينها، فقال (ص 247 - 248) :
`وحسبك مثالاً لهذا ما أيدته - نزولاً على حكم العاطفة - من إفك أهل الزور إذ قالوا - بهتاناً وعدواناً - في السيدة مارية وولدها عليه السلام ما قالوا،
حتى برأهما الله عز وجل من ظلمهم براءة - على يد أمير المؤمنين - محسوسة ملموسة! (ورد الله الذين كفروا بغيظهم لم ينالوا خيراً) `!
وعلق على هذا بقوله:
`من أراد تفصيل هذه المصيبة؛ فليراجع أحوال السيدة مارية رضي الله عنها في (ص 39) من الجزء الرابع من `المستدرك` للحاكم، أو من `تلخيصه` للذهبي`!
يشير بذلك إلى هذا الحديث المنكر!
وإن من مكره وخبثه: أنه لم يكتف في الاعتماد عليه - مع ضعفه الشديد - بل إنه زد على ذلك أنه لم يسق لفظه؛ تدليساً على الناس وتضليلاً؛ فإنه لو فعل وساق اللفظ؛ لتبين منه لكل من كان له لب ودين أن عائشة بريئة مما نسب إليها في هذا الحديث المنكر من القول - براءتها مما اتهمها المنافقون به؛ فبرأها الله تعالى بقرآن يتلى - ، آمن الشيعة بذلك أم كفروا، عامل الله الكذابين والمؤيدين لهم بما يستحقون! وإنا لله وإنا إليه راجعون.
وتأمل ما في إيراده في آخر كلامه للآية الكريمة: (ورد الله الذين كفروا … ) من رمي السيدة عائشة بالكفر، مع أنه يترضى عنها أحياناً (ص 229) ! ويتعرف (ص 238) بأن لها فضلها ومنزلتها!
وما إخال ذلك منه إلا من باب التقية المعهودة منهم، وإلا؛ فكيف يتلقي ذلك مع حشره إياها في زمرة الذين كفروا؟! عامله الله بما يستحق!
ثم إن الحديث؛ أخرجه ابن شاهين أيضاً من طريق سليمان بن أرقم عن الزهري به؛ كما في `الإصابة` (6/ 14) للحافظ العسقلاني؛ وقال:
`وسليمان ضعيف`.
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(এই তরবারিটি নাও; অতঃপর যাও এবং মারিয়ার চাচাতো ভাইকে যেখানে পাও, তার গর্দান উড়িয়ে দাও।)
খুবই যঈফ (ضعيف جداً)

এটি হাকিম (৪/৩৯) বর্ণনা করেছেন আবূ মুআয সুলাইমান ইবনুল আরকাম আল-আনসারী-এর সূত্রে যুহরী হতে, তিনি উরওয়াহ হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন:
মারিয়াকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট হাদিয়া দেওয়া হলো এবং তার সাথে তার এক চাচাতো ভাইও ছিল। তিনি (আয়িশাহ) বলেন: অতঃপর তিনি (রাসূল সাঃ) তার সাথে সহবাস করলেন এবং তিনি গর্ভবতী হলেন। তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (রাসূল সাঃ) তাকে তার চাচাতো ভাইয়ের নিকট আলাদা করে রাখলেন। তিনি বলেন: তখন মিথ্যা ও অপবাদের লোকেরা বলতে শুরু করল: সন্তানের প্রতি তার (রাসূলের) এতই প্রয়োজন যে, তিনি অন্যের সন্তানকে নিজের বলে দাবি করেছেন! মারিয়া ছিলেন এমন দাসী যার দুধ কম ছিল। তাই তিনি তার জন্য একটি দুগ্ধবতী ভেড়া ক্রয় করলেন। অতঃপর তাকে (সন্তানকে) সেই ভেড়ার দুধ পান করানো হতো, ফলে তার গোশত সুন্দর হলো। আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: একদিন তিনি তাকে নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট প্রবেশ করলেন। তিনি বললেন:
‘তুমি কেমন দেখছ?’ আমি বললাম: যাকে ভেড়ার গোশত দ্বারা প্রতিপালন করা হয়, তার গোশত সুন্দরই হয়! তিনি বললেন:
‘আর সাদৃশ্য?’ তিনি বলেন: তখন মহিলাদের মধ্যে যে ঈর্ষা কাজ করে, তা আমাকে প্ররোচিত করল যে, আমি বললাম: আমি কোনো সাদৃশ্য দেখছি না! তিনি বলেন: মানুষেরা যা বলছিল, তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট পৌঁছল। অতঃপর তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন... (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন)। তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (আলী) গেলেন; গিয়ে দেখলেন যে, সে একটি বাগানে খেজুর গাছের উপর তাজা খেজুর পাড়ছে। তিনি বলেন: যখন সে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তার হাতে তরবারি সহ দেখল; তখন সে কাঁপতে শুরু করল। তিনি বলেন: অতঃপর তার পরিধেয় বস্ত্রটি পড়ে গেল; তখন দেখা গেল যে, আল্লাহ তা‘আলা তাকে পুরুষের জন্য যা সৃষ্টি করেছেন, তা সৃষ্টি করেননি; সে ছিল মসহ (মসৃণ/পুরুষাঙ্গহীন)।

আমি (আলবানী) বলি: হাকিম ও যাহাবী এ ব্যাপারে নীরবতা অবলম্বন করেছেন। সম্ভবত এর দুর্বলতা সুস্পষ্ট হওয়ার কারণেই। কারণ সুলাইমান ইবনুল আরকাম-কে দুর্বল বলার ব্যাপারে ইমামগণের মধ্যে ঐকমত্য রয়েছে। বরং সে খুবই যঈফ। বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘তারা তাকে বর্জন করেছেন।’ আবূ দাঊদ, আবূ আহমাদ আল-হাকিম এবং দারাকুতনী বলেছেন: ‘সে মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত রাবী)।’ আবূ দাঊদ বলেন: ‘আমি আহমাদকে বললাম: সে কি যুহরী হতে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে তালবিয়াহ সম্পর্কে বর্ণনা করেছে? তিনি বললেন: সে বর্ণনা করুক বা না করুক, আমরা পরোয়া করি না!’ ইবনু আদী তার জীবনী আলোচনার শেষে - যেখানে তিনি তার থেকে বিশটিরও বেশি হাদীস উল্লেখ করেছেন (১৫৪/১-২) - বলেছেন: ‘সে যা বর্ণনা করে, সাধারণত তার উপর কেউ তাকে সমর্থন করে না।’

আমি বলি: এই হাদীসের একটি সহীহ মূল রয়েছে। ইবনুল আরকাম এর সাথে মুনকার (অস্বীকৃত) কিছু অতিরিক্ত অংশ যোগ করেছে, যা প্রমাণ করে যে, সে খুবই খারাপ স্মৃতিশক্তির অধিকারী, অথবা সে তার মনের খেয়ালবশত ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা ও অতিরিক্ত অংশ যোগ করেছে; অতঃপর এই অতিরিক্ত অংশ দ্বারা আহলুল আহওয়া (মনগড়া মতবাদের অনুসারীরা) দলীল পেশ করে!

তাই আমি তোমার জন্য হাদীসটির সহীহ পাঠ উল্লেখ করছি; যাতে তোমার নিকট সেই মুনকার অতিরিক্ত অংশগুলো স্পষ্ট হয়ে যায়। সাবিত (রাহিমাহুল্লাহ) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর উম্মে ওয়ালাদ (সন্তানের জননী)-এর ব্যাপারে এক ব্যক্তির বিরুদ্ধে অপবাদ দেওয়া হতো। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন:
‘যাও, তার গর্দান উড়িয়ে দাও।’
অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার নিকট আসলেন; দেখলেন যে, সে একটি কূপের মধ্যে গোসল করে শরীর ঠান্ডা করছে। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: বের হও। সে তার দিকে হাত বাড়িয়ে দিল, অতঃপর তিনি তাকে বের করলেন; তখন দেখা গেল যে, সে ছিল মসহ (পুরুষাঙ্গহীন), তার কোনো পুরুষাঙ্গ ছিল না। অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার থেকে বিরত থাকলেন। তারপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! সে তো মসহ; তার কোনো পুরুষাঙ্গ নেই।

এটি মুসলিম (৮/১১৯), হাকিম (৪/৩৯-৪০), আহমাদ (৩/২৮১) এবং ইবনু ‘আবদিল বার্র ‘আল-ইসতিয়াব’ গ্রন্থে মারিয়ার জীবনীতে (৪/১৯১২) বর্ণনা করেছেন; তারা সকলেই ‘আফ্ফান হতে, তিনি হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হতে, তিনি সাবিত হতে...। হাকিম বলেছেন: ‘এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ, অথচ তারা উভয়ে (বুখারী ও মুসলিম) এটি বর্ণনা করেননি!’ মুসলিমের উপর তার এই ইসতিদরাক (ভুল সংশোধন) করার ক্ষেত্রে তিনি ভুল করেছেন! ইবনু ‘আবদিল বার্র বলেছেন: ‘আ‘মাশ এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন এবং তাতে বলেছেন: আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি কি উত্তপ্ত শলাকার মতো হব; নাকি প্রত্যক্ষদর্শী এমন কিছু দেখে যা অনুপস্থিত ব্যক্তি দেখে না? তিনি বললেন: বরং প্রত্যক্ষদর্শী এমন কিছু দেখে যা অনুপস্থিত ব্যক্তি দেখে না।’

আমি বলি: এই অতিরিক্ত অংশটি আমি আ‘মাশ-এর বর্ণনায় পাইনি, বরং তা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হতে অন্য রাবীর বর্ণনায় রয়েছে। এর তাখরীজ ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (১৯০৪) নম্বর হাদীসে গত হয়েছে। তাতেও সেই মুনকার অতিরিক্ত অংশগুলো নেই, যা ইবনুল আরকাম এই হাদীসে এককভাবে বর্ণনা করেছে।

আর এর মধ্যে সবচেয়ে বেশি মুনকার হলো আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার এই উক্তিটি উল্লেখ করা যে, তিনি বলেছেন: ‘আমি কোনো সাদৃশ্য দেখছি না!’ শিয়া আব্দুল হুসাইন তার ‘মুরাজা‘আত’ গ্রন্থে এর নিকৃষ্টতম সুযোগ গ্রহণ করেছে এবং এর উপর নির্ভর করে সে উম্মুল মু’মিনীন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চরিত্র ও দ্বীনের উপর অপবাদ দিয়েছে। সে (পৃষ্ঠা ২৪৭-২৪৮) এ বলেছে: ‘এর উদাহরণ হিসেবে তোমার জন্য যথেষ্ট হলো, যা তিনি (আয়িশাহ) - আবেগের বশবর্তী হয়ে - মিথ্যাবাদীদের অপবাদকে সমর্থন করেছিলেন, যখন তারা - মিথ্যা ও সীমালঙ্ঘন করে - সাইয়্যিদাহ মারিয়া ও তার সন্তান (আলাইহিস সালাম) সম্পর্কে যা বলার তা বলেছিল, যতক্ষণ না আল্লাহ তা‘আলা আমীরুল মু’মিনীন (আলী)-এর হাতে তাদের (মারিয়া ও তার সন্তানের) উপর করা যুলুম হতে এমনভাবে মুক্তি দিলেন যা ছিল অনুভবযোগ্য ও স্পর্শযোগ্য! (আর আল্লাহ কাফিরদেরকে তাদের ক্রোধসহ ফিরিয়ে দিলেন, তারা কোনো কল্যাণ লাভ করেনি!)’ সে এর উপর মন্তব্য করে বলেছে: ‘যে ব্যক্তি এই মুসীবতের বিস্তারিত জানতে চায়; সে যেন হাকিমের ‘আল-মুসতাদরাক’-এর চতুর্থ খণ্ডের ৩৯ পৃষ্ঠায় অথবা যাহাবীর ‘তালখীস’-এ সাইয়্যিদাহ মারিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অবস্থা দেখে নেয়!’ এর দ্বারা সে এই মুনকার হাদীসটির দিকে ইঙ্গিত করেছে!

আর তার ধূর্ততা ও দুষ্টামির মধ্যে এটিও ছিল যে, সে এর উপর নির্ভর করেই ক্ষান্ত হয়নি - যদিও এটি ছিল খুবই দুর্বল - বরং এর সাথে সে এর শব্দগুলোও উল্লেখ করেনি; মানুষকে ধোঁকা দেওয়া ও বিভ্রান্ত করার জন্য। কারণ, যদি সে তা করত এবং শব্দগুলো উল্লেখ করত; তাহলে যার জ্ঞান ও দ্বীন আছে, তার নিকট স্পষ্ট হয়ে যেত যে, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই মুনকার হাদীসে তার প্রতি আরোপিত উক্তি হতে সম্পূর্ণ মুক্ত - যেমনভাবে তিনি মুনাফিকরা তার প্রতি যে অপবাদ দিয়েছিল তা হতে মুক্ত ছিলেন; অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা পঠিতব্য কুরআনের মাধ্যমে তাকে মুক্ত ঘোষণা করেছেন - শিয়ারা এতে বিশ্বাস করুক বা না করুক, আল্লাহ মিথ্যাবাদী ও তাদের সমর্থকদের সাথে তাদের প্রাপ্য অনুযায়ী আচরণ করুন! ইন্না লিল্লা-হি ওয়া ইন্না ইলাইহি রাজি‘ঊন।

আর তার কথার শেষে এই আয়াতটি (আর আল্লাহ কাফিরদেরকে ফিরিয়ে দিলেন...) উল্লেখ করার মধ্যে সাইয়্যিদাহ আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে কুফরীর সাথে অভিযুক্ত করার যে ইঙ্গিত রয়েছে, তা নিয়ে চিন্তা করো, যদিও সে মাঝে মাঝে তার প্রতি সন্তুষ্টি প্রকাশ করে (পৃষ্ঠা ২২৯)! এবং স্বীকার করে (পৃষ্ঠা ২৩৮) যে, তার মর্যাদা ও স্থান রয়েছে! আমি মনে করি না যে, এটি তাদের চিরাচরিত ‘তাকিয়্যাহ’ (ভণ্ডামি)-এর বাইরে কিছু। অন্যথায়, কাফিরদের দলে তাকে অন্তর্ভুক্ত করার সাথে এটি কীভাবে সামঞ্জস্যপূর্ণ হতে পারে?! আল্লাহ তার প্রাপ্য অনুযায়ী তার সাথে আচরণ করুন!

অতঃপর এই হাদীসটি; ইবনু শাহীনও সুলাইমান ইবনু আরকাম-এর সূত্রে যুহরী হতে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন; যেমনটি হাফিয আল-‘আসকালানী-এর ‘আল-ইসাবাহ’ (৬/১৪) গ্রন্থে রয়েছে। তিনি বলেছেন: ‘আর সুলাইমান যঈফ।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4965)


(لقد رأيت خالاً بخدها؛ اقشعرت كل شعرة منك) .
موضوع

أخرجه ابن سعد في `الطبقات` (8/ 160 - 161) : أخبرنا محمد ابن عمر: حدثني الثوري عن جابر عن عبد الرحمن بن سابط قال:
خطب رسول الله صلى الله عليه وسلم امرأة من كلب، فبعث عائشة تنظر إليها، فذهبت ثم وجعت. فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`ما رأيت؟ `. فقالت: ما رأيت طائلاً. فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. فقالت: يا رسول الله! ما دونك سر!
قلت: وهذا موضوع؛ فإنه مع كونه مرسلاً، فإن محمد بن عمر - وهو الواقدي - كذاب، كما تقدم مراراً.
وقد استغل الشيعي أيضاً هذا الحديث الباطل استغلالاً غير شريف؛ فطعن به على السيدة عائشة رضي الله عنها، فنسبها إلى الكذب، كما طعن عليها بالحديث الذي قبله!
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(আমি তার গালে একটি তিল দেখেছি; তোমার প্রতিটি লোম দাঁড়িয়ে গেছে/শিহরিত হয়েছে)।
মাওদ্বূ (জাল)

এটি ইবনু সা'দ তাঁর ‘আত-তাবাকাত’ গ্রন্থে (৮/১৬০-১৬১) বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমার: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আস-সাওরী, তিনি জাবির থেকে, তিনি আবদুর রহমান ইবনু সাবিত থেকে, তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কালব গোত্রের এক মহিলাকে বিবাহের প্রস্তাব দিলেন। অতঃপর তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাঠালেন তাকে দেখার জন্য। তিনি গেলেন, অতঃপর অসুস্থ হয়ে পড়লেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: “তুমি কী দেখলে?” তিনি বললেন: আমি উল্লেখযোগ্য কিছু দেখিনি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন... অতঃপর তিনি তা (উপরের কথাটি) উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার কাছে কোনো গোপন বিষয় নেই!

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল); কারণ এটি মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও, এর বর্ণনাকারী মুহাম্মাদ ইবনু উমার – যিনি হলেন আল-ওয়াকিদী – সে একজন মিথ্যুক (কাযযাব), যেমনটি পূর্বে বহুবার উল্লেখ করা হয়েছে।

শিয়া সম্প্রদায়ভুক্ত ব্যক্তিরাও এই বাতিল হাদীসটিকে অসৎ উদ্দেশ্যে ব্যবহার করেছে; তারা এর মাধ্যমে সাইয়্যিদাহ আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর অপবাদ দিয়েছে এবং তাঁকে মিথ্যার সাথে সম্পৃক্ত করেছে, যেমনটি তারা এর পূর্বের হাদীস দ্বারাও তাঁর উপর অপবাদ দিয়েছিল!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4966)


(إنا لم نرد هذا، إنا لم نرد هذا) .
ضعيف

أخرجه الديلمي عن عائشة:
أنها خاصمت النبي صلى الله عليه وسلم إلى أبي بكر؛ فقالت: يا رسول الله! اقصد! فلطم أبو بكر خدها؛ وقال: تقولين لرسول الله صلى الله عليه وسلم: اقصد؟! وجعل الدم يسيل من أنفها على ثيابها، ورسول الله صلى الله عليه وسلم يغسل الدم من ثيابها بيده؛ ويقول … فذكره.
كذا في `كنز العمال` (7/ 116/ 1020) .
قلت: وعزوه للديلمي يشعر بضعف إسناده؛ كما نص عليه في مقدمة `الجامع الكبير`، ونقلته عنه في مقدمتي لكل من `صحيح الجامع الصغير وزيادته` و `ضعيف الجامع الصغير وزيادته`.
وقد صرح بضعفه الحافظ العراقي؛ فقال في `تخريج الإحياء` (2/ 40) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، والخطيب في `التاريخ` من حديث عائشة بسند ضعيف`.
قلت: ومع ذلك؛ احتج به الشيعي في `مراجعاته` (249) في الطعن في السيدة عائشة رضي الله عنها! عامله الله بما يستحق!
وقد روى طرفاً منه ابن سعد (8/ 80) : أخبرنا محمد بن عمر: أخبرنا محمد بن عبد الله عن الزهري عن ابن المسيب قال:
قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأبي بكر:
`يا أبا بكر! ألا تعذرني من عائشة؟! `.
قال: فرفع أبو بكر يده، فضرب صدرها ضربة شديدة، فجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
`غفر الله لك يا أبا بكر! ما أردت هذا`.
لكنه إسناد واه بمرة؛ فإن محمد بن عمر - وهو الواقدي - كذاب.
ومحمد بن عبد الله: هو أبو بكر بن عبد الله بن محمد بن أبي سبرة؛ قال الحافظ:
`رموه بالوضع`.
ثم وقفت على إسناد الحديث عند الديلمي في `مسنده` (ص 319 - 320 - مصورة) : أخرجه من طريق إسماعيل بن إبراهيم المنقري عن أبيه عن مبارك بن فضالة عن عبيد الله بن عمر عن القاسم عن عائشة …
قلت: والمبارك بن فضالة؛ وإن كان صدوقاً؛ فهو مدلس تدليس التسوية (1) !
وإسماعيل بن إبراهيم المنقري وأبوه؛ لم أعرفهما.
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(আমরা এটা চাইনি, আমরা এটা চাইনি)।
যঈফ

এটি দায়লামী (Ad-Daylami) আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন:
যে তিনি (আইশা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বিচারপ্রার্থী হলেন। অতঃপর তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! ইনসাফ করুন! তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর গালে চড় মারলেন এবং বললেন: তুমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলছো: ইনসাফ করুন?! আর তাঁর নাক থেকে রক্ত গড়িয়ে তাঁর কাপড়ের উপর পড়তে লাগল। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে তাঁর কাপড় থেকে রক্ত ধুয়ে দিচ্ছিলেন এবং বলছিলেন... অতঃপর তিনি তা (উপরের অংশ) উল্লেখ করলেন।
`কানযুল উম্মাল`-এ এভাবেই আছে (৭/১১৬/১০২০)।

আমি (আলবানী) বলি: দায়লামীর দিকে এর সম্বন্ধ করা এর ইসনাদের দুর্বলতার ইঙ্গিত দেয়; যেমনটি তিনি (`আল-জামি‘উল কাবীর`-এর) মুকাদ্দিমায় উল্লেখ করেছেন, আর আমি তা তাঁর থেকে আমার মুকাদ্দিমায়ও নকল করেছি, যা `সহীহুল জামি‘উস সাগীর ওয়া যিয়াদাতুহু` এবং `যঈফুল জামি‘উস সাগীর ওয়া যিয়াদাতুহু` উভয়ের জন্যই লেখা।

হাফিয আল-ইরাকী (রাহিমাহুল্লাহ) এর দুর্বলতা স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন। তিনি `তাখরীজুল ইহয়া`-তে (২/৪০) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী (`আল-আওসাত্ব`-এ) এবং খতীব (`আত-তারীখ`-এ) আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে দুর্বল সনদ সহকারে বর্ণনা করেছেন।’

আমি বলি: এতদসত্ত্বেও, শিয়া ব্যক্তি তার `মুরাজা‘আত` (২৪৯)-এ সাইয়্যিদাহ আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর প্রতি অপবাদ দেওয়ার জন্য এটি দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছে! আল্লাহ তাকে তার প্রাপ্য অনুযায়ী প্রতিদান দিন!

ইবনু সা‘দ (৮/৮০) এর কিছু অংশ বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু উমার সংবাদ দিয়েছেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ যুহরী থেকে, তিনি ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে সংবাদ দিয়েছেন, তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন:
‘হে আবূ বকর! তুমি কি আইশার ব্যাপারে আমাকে ক্ষমা করবে না?!’
তিনি বলেন: তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাত উঠালেন এবং তার (আইশার) বুকে জোরে আঘাত করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতে লাগলেন:
‘আল্লাহ তোমাকে ক্ষমা করুন হে আবূ বকর! আমি এটা চাইনি।’

কিন্তু এর ইসনাদ অত্যন্ত দুর্বল; কারণ মুহাম্মাদ ইবনু উমার – যিনি আল-ওয়াকিদী – তিনি কায্‌যাব (মহা মিথ্যাবাদী)। আর মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ: তিনি হলেন আবূ বকর ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আবী সাবরাহ; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘তারা তাকে জালকারী (মাওদ্বূকারী) হিসেবে অভিযুক্ত করেছেন।’

অতঃপর আমি দায়লামীর `মুসনাদ`-এ (পৃ. ৩১৯-৩২০ – ফটোকপি) হাদীসটির ইসনাদ খুঁজে পেলাম: তিনি এটি ইসমাঈল ইবনু ইবরাহীম আল-মিনকারী তার পিতা থেকে, তিনি মুবারাক ইবনু ফাযালাহ থেকে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার থেকে, তিনি কাসিম থেকে, তিনি আইশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন...

আমি বলি: আর মুবারাক ইবনু ফাযালাহ; যদিও তিনি সাদূক (সত্যবাদী); কিন্তু তিনি তাদলিসুত তাসবিয়াহকারী মুদাল্লিস (১)! আর ইসমাঈল ইবনু ইবরাহীম আল-মিনকারী এবং তার পিতাকে আমি চিনি না।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4967)


(إن الغيرى لا تبصر أسفل الوادي من أعلاه) (2) .
ضعيف

أخرجه أبو يعلى في `مسنده` (3/ 1148) عن سلمة بن الفضل عن محمد بن إسحاق عن يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير عن أبيه عن عائشة أنها قالت:
وكان متاعي فيه خف، وكان على جمل ناج، وكان متاع صفية فيه ثقل، وكان على جمل ثفال بطيء؛ يبطىء بالركب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` [حولوا متاع عائشة على جمل صفية] ، وحولوا متاع صفية على جمل عائشة حتى يمضي الركب`. قالت عائشة: فلما رأيت ذلك قلت: يا لعباد الله! غلبتنا هذه اليهودية على رسول الله صلى الله عليه وسلم! قالت: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`يا أم عبد الله! إن متاعك كان فيه خف، وكان متاع صفية فيه ثقل، فأبطأ بالركب، فحولنا متاعها على بعيرك، وحولنا متاعك على بعيرها`. قالت: فقلت: ألست تزعم أنك رسول الله؟! قالت: فتبسم فقال:
(1) انظر كلام الشيخ حول تدليس المبارك في ` الصحيحة ` (1/950 - 951) . (الناشر)
(2) كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن: ` تقدم برقم (2985) ؛ لكن يستفاد منه `. (الناشر)
`أو في شك أنت يا أم عبد الله؟! `. قالت: قلت: ألست تزعم أنك رسول الله، فهلا عدلت؟! وسمعني أبو بكر - وكان فيه غرب؛ أي: حدة - ؛ فأقبل علي فلطم وجهي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`مهلاً يا أبا بكر! `. فقال: يا رسول الله! أما سمعت ما قالت؟! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لعنعنة ابن إسحاق؛ فإنه مدلس.
وسلمة بن الفضل كثير الخطأ؛ كما قال الحافظ. وقال الهيثمي (4/ 322) :
`رواه أبو يعلى، وفيه محمد بن إسحاق؛ وهو مدلس. وسلمة بن الفضل، وقد وثقه جماعة: ابن معين وابن حبان وأبو حاتم، وضعفه جماعة، وبقية رجاله رجال `الصحيح`. وقد رواه أبو الشيخ ابن حبان في `كتاب الأمثال`، وليس فيه غير أسامة ابن زيد الليثي؛ وهو من رجال `الصحيح`؛ وفيه ضعف، وبقية رجاله ثقات`!
كذا قال! وفي آخر كلامه وقفة عندي؛ فقد قال الحافظ العراقي في `تخريج الإحياء` (2/ 40) :
`رواه أبو يعلى في `مسنده`؛ وأبو الشيخ في `كتاب الأمثال` من حديث عائشة، وفيه ابن إسحاق؛ وقد عنعنه`.
قلت: فهذا صريح في مخالفة ما ذكره الهيثمي.
ومن المحتمل أن يكون أبو الشيخ أخرجه من طريقين، في أحدهما ابن إسحاق دون الطريق الأخرى، وفي هذه الليثي فقط كما أفاده الهيثمي؛ فإن صح كلامه؛ فالحديث حسن عندي على أقل المراتب. والله أعلم.
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(নিশ্চয়ই ঈর্ষান্বিত ব্যক্তি উপত্যকার নিচ থেকে এর ওপরের অংশ দেখতে পায় না)। (২)
যঈফ (দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৩/১১৪৮) সালামাহ ইবনুল ফাদল হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক হতে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু আব্বাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন:

আমার মালপত্রে হালকা ছিল এবং তা ছিল দ্রুতগামী উটের উপর। আর সাফিয়্যাহর মালপত্রে ভারী ছিল এবং তা ছিল ধীরগামী, মন্থর উটের উপর; যা কাফেলাকে ধীর করে দিচ্ছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:

`[আয়িশাহর মালপত্র সাফিয়্যাহর উটের উপর সরিয়ে দাও], আর সাফিয়্যাহর মালপত্র আয়িশাহর উটের উপর সরিয়ে দাও, যাতে কাফেলা চলতে পারে।`

আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমি তা দেখলাম, তখন বললাম: হে আল্লাহর বান্দাগণ! এই ইয়াহুদী নারী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর আমাদের চেয়ে প্রাধান্য বিস্তার করে ফেলেছে!

তিনি (আয়িশাহ) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:

`হে উম্মু আব্দুল্লাহ! তোমার মালপত্র হালকা ছিল, আর সাফিয়্যাহর মালপত্র ভারী ছিল, ফলে তা কাফেলাকে ধীর করে দিচ্ছিল। তাই আমরা তার মালপত্র তোমার উটের উপর সরিয়ে দিয়েছি এবং তোমার মালপত্র তার উটের উপর সরিয়ে দিয়েছি।`

তিনি বলেন: তখন আমি বললাম: আপনি কি দাবি করেন না যে আপনি আল্লাহর রাসূল?! তিনি বলেন: তখন তিনি মুচকি হাসলেন এবং বললেন:

(১) মুবারকের তাদলীস (দোষ গোপন করা) সম্পর্কে শাইখের আলোচনা দেখুন ‘আস-সহীহাহ’ (১/৯৫০-৯৫১)-এ। (প্রকাশক)
(২) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মতনটির উপরে লিখেছেন: ‘এটি ২৯৮৫ নম্বরে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে; তবে এটি থেকে উপকার পাওয়া যায়।’ (প্রকাশক)

`হে উম্মু আব্দুল্লাহ! তুমি কি সন্দেহে আছো?!`

তিনি বলেন: আমি বললাম: আপনি কি দাবি করেন না যে আপনি আল্লাহর রাসূল, তাহলে কেন আপনি ইনসাফ করলেন না?!

আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমার কথা শুনলেন—আর তাঁর মধ্যে কঠোরতা ছিল; অর্থাৎ: তীক্ষ্ণতা—; তখন তিনি আমার দিকে এগিয়ে এসে আমার মুখে চপেটাঘাত করলেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:

`থামো, হে আবূ বকর!`

তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! সে যা বলেছে, আপনি কি তা শোনেননি?! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); ইবনু ইসহাকের ‘আনআনাহ’ (অস্পষ্ট বর্ণনা) থাকার কারণে; কেননা তিনি মুদাল্লিস (দোষ গোপনকারী)।

আর সালামাহ ইবনুল ফাদল অনেক ভুলকারী; যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন। আর হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন (৪/৩২২):

`এটি আবূ ইয়া'লা বর্ণনা করেছেন, আর এতে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক রয়েছেন; যিনি মুদাল্লিস। আর সালামাহ ইবনুল ফাদলকে একদল রাবী বিশ্বস্ত বলেছেন: ইবনু মাঈন, ইবনু হিব্বান ও আবূ হাতিম, আর একদল তাকে যঈফ বলেছেন। আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ ‘সহীহ’ গ্রন্থের বর্ণনাকারী।`

`আর আবূশ শাইখ ইবনু হিব্বান এটি ‘কিতাবুল আমসাল’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এতে উসামাহ ইবনু যায়িদ আল-লাইসী ছাড়া অন্য কেউ নেই; আর তিনি ‘সহীহ’ গ্রন্থের বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত; তবে তার মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে, আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (সিকাহ)!`

তিনি এমনই বলেছেন! আর তাঁর শেষ কথায় আমার কাছে আপত্তি আছে; কেননা হাফিয আল-ইরাকী ‘তাখরীজুল ইহয়া’ (২/৪০)-এ বলেছেন:

`এটি আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে এবং আবূশ শাইখ ‘কিতাবুল আমসাল’ গ্রন্থে আয়িশাহর হাদীস হতে বর্ণনা করেছেন, আর এতে ইবনু ইসহাক রয়েছেন; যিনি ‘আনআনাহ’ করেছেন।`

আমি বলি: এটি হাইসামী যা উল্লেখ করেছেন, তার স্পষ্ট বিরোধিতা করছে।

আর সম্ভবত আবূশ শাইখ এটি দু’টি সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যার একটিতে ইবনু ইসহাক আছেন, অন্যটিতে নেই, আর এই (দ্বিতীয়) সূত্রে কেবল লাইসী আছেন, যেমনটি হাইসামী জানিয়েছেন; যদি তাঁর কথা সহীহ হয়; তাহলে হাদীসটি আমার কাছে সর্বনিম্ন স্তরে ‘হাসান’ হবে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4968)


(علمني ألف باب، يفتح كل باب ألف باب) .
منكر

أخرجه ابن عدي (ق 111/ 2) ، وعنه ابن عساكر (12/ 161/ 1) من طريق ابن لهيعة: حدثني حيي بن عبد الله عن أبي عبد الرحمن الحبلي عن عبد الله بن عمرو:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في مرضه:
`ادعوا لي أخي`. فدعوا له أبا بكر، فأعرض عنه. ثم قال:
`ادعوا لي أخي`. فدعوا له عمر، فأعرض عنه. ثم قال:
`ادعوا لي أخي`. فدعي له عثمان، فأعرض عنه. ثم قال:
`ادعوا لي أخي`. فدعي له علي بن أبي طالب، فستره بثوب، وانكب عليه. فلما خرج من عنده قيل له: ما قال؟ قال … فذكره. وقال ابن عدي:
`هذا حديث منكر، ولعل البلاء فيه من ابن لهيعة؛ فإنه شديد الإفراط في التشيع، وقد تكلم فيه الأئمة ونسبوه إلى الضعف`.
وأقره الحافظ ابن عساكر، ثم الحافظ الذهبي في ترجمة ابن لهيعة، أورده في جملة ما أنكر عليه من الأحاديث.
والحديث؛ مما احتج به الشيعي في `المراجعات` (ص 253) ؛ وقال:
`وأخرجه أبو نعيم في `حليته`، وأبو أحمد الفرضي في `نسخته` كما في ص (392) من الجزء السادس من [الكنز] `!
وكذلك قال (ص 251) .
وأنا أظن أن عزوه إلى `الحلية` خطأ من صاحب `الكنز` أو طابعه، اغتر به الشيعي؛ فإن نصه في الموضع المشار إليه من الشيعي:
`عن علي قال: علمني رسول الله صلى الله عليه وسلم ألف باب.. (أبو أحمد الفرضي في `جزئه`، وفيه الأجلح أبو جحفة (!) قال في `المغني`: صدوق شيعي جلد. حل) `!
قلت: والمعروف من صاحب `الكنز` - تبعاً لأصله `الجامع الكبير` - أنه يسوق رموز مخرجي الحديث أولاً، ثم يتكلم عليه - على قلة كلامه - !
وهنا نجد رمز (حل) قد جاء بعد كلامه على الأجلح، مما يشعر أنه مقحم!
وقد تأكدت من ذلك بعد رجوعي إلى نسخة مصورة عندي من `الجامع الكبير`؛ فلم يقع فيها الرمز المذكور. وتأيد ذلك بأني رجعت إلى `فهرس الحلية` للشيخ الغماري؛ فلم أر الحديث فيه.
(تنبيه) : حديث علي هذا مع ضعفه؛ فإن الشيعي قد دس فيه زيادة من عنده؛ دون أن ينبه القراء إلى ذلك؛ فإنه ساقه عقب الحديث المتقدم (4945) الذي فيه: أن النبي صلى الله عليه وسلم توفي وهو مستند إلى علي، فزاد - بعد قوله: … علمني رسول الله صلى الله عليه وسلم - :
- يعني: حينئذ - . يعني: حين وفاته صلى الله عليه وسلم!
فإن قيل: إن معنى هذه الزيادة في حديث ابن عمرو؛ فإنه صريح أن التعليم المذكور كان في مرضه.
فأقول: كلا؛ ليس في معناه، وذلك من وجهين:
الأول: أنه ليس فيه أن المرض هو مرض موته.
والآخر: هب أنه مرض موته؛ فليس فيه أنه علمه ومات مستنداً إلى علي؛ بل هو صريح بأن علياً خرج وتركه مريضاً.
فهذا كله من الأدلة الكثيرة على أن الشيعة يستحلون الدس والكذب في سبيل تأييد ما هم عليه من الضلال! نسأل الله السلامة.
وفي الباب في فضل علي وأهل بيته: عن أبي أمامة الباهلي، وسوف يأتي إن شاء الله تخريجه برقم (6254) .
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(তিনি আমাকে এক হাজার জ্ঞান দান করেছেন, যার প্রতিটি দরজা আরও এক হাজার দরজা খুলে দেয়)।
মুনকার

ইবনু আদী (খ. ২/১১১), এবং তাঁর সূত্রে ইবনু আসাকির (১২/১৬১/১) ইবনু লাহী'আহর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন হুয়াই ইবনু আব্দুল্লাহ, তিনি আবূ আব্দুর রহমান আল-হুবালী থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর অসুস্থতার সময় বলেছিলেন:
‘আমার ভাইকে ডেকে আনো।’ অতঃপর তারা আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনলেন। তিনি তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন।
অতঃপর তিনি বললেন: ‘আমার ভাইকে ডেকে আনো।’ অতঃপর তারা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনলেন। তিনি তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন।
অতঃপর তিনি বললেন: ‘আমার ভাইকে ডেকে আনো।’ অতঃপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনা হলো। তিনি তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন।
অতঃপর তিনি বললেন: ‘আমার ভাইকে ডেকে আনো।’ অতঃপর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডেকে আনা হলো। তিনি তাঁকে একটি কাপড় দিয়ে ঢেকে নিলেন এবং তাঁর উপর ঝুঁকে পড়লেন।
যখন তিনি তাঁর নিকট থেকে বের হলেন, তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: তিনি কী বলেছেন? তিনি বললেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন:
‘এই হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত)। সম্ভবত এর ত্রুটি ইবনু লাহী'আহর পক্ষ থেকে এসেছে; কারণ তিনি শিয়া মতবাদের প্রতি চরমভাবে আসক্ত ছিলেন। ইমামগণ তাঁর সম্পর্কে কথা বলেছেন এবং তাঁকে দুর্বলতার দিকে সম্পর্কিত করেছেন।’
হাফিয ইবনু আসাকির (রাহিমাহুল্লাহ) এবং অতঃপর হাফিয যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু লাহী'আহর জীবনীতে এই বক্তব্যকে সমর্থন করেছেন এবং এটিকে তাঁর উপর আরোপিত মুনকার হাদীসসমূহের অন্তর্ভুক্ত করেছেন।
এই হাদীসটি সেইগুলোর অন্তর্ভুক্ত, যা শিয়া মতাবলম্বী ব্যক্তি ‘আল-মুরাজা‘আত’ (পৃ. ২৫৩)-এ প্রমাণ হিসেবে পেশ করেছে এবং বলেছে:
‘আর আবূ নু‘আইম তাঁর ‘হিলইয়াহ’ গ্রন্থে এবং আবূ আহমাদ আল-ফারাদী তাঁর ‘নুসখাহ’ গ্রন্থে এটি বর্ণনা করেছেন, যেমনটি [আল-কানয]-এর ষষ্ঠ খণ্ডের (পৃ. ৩৯২)-এ রয়েছে!’
অনুরূপভাবে তিনি (পৃ. ২৫১)-এও বলেছেন।
আমি মনে করি যে, ‘আল-হিলইয়াহ’ গ্রন্থের দিকে এর সম্পর্ক দেওয়া ‘আল-কানয’ গ্রন্থের লেখক অথবা এর মুদ্রণকারীর ভুল, যার দ্বারা শিয়া মতাবলম্বী ব্যক্তি প্রতারিত হয়েছে। কারণ শিয়া মতাবলম্বী ব্যক্তির উল্লিখিত স্থানে এর পাঠ হলো:
‘আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে এক হাজার জ্ঞান দান করেছেন... (আবূ আহমাদ আল-ফারাদী তাঁর ‘জুয’ গ্রন্থে, আর তাতে আল-আজলাহ আবূ জুহফা (!) রয়েছে। ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলা হয়েছে: তিনি সত্যবাদী, কঠোর শিয়া। হাল) !’
আমি (আলবানী) বলি: ‘আল-কানয’ গ্রন্থের লেখকের ক্ষেত্রে যা পরিচিত—তাঁর মূল গ্রন্থ ‘আল-জামি‘ আল-কাবীর’-এর অনুসরণক্রমে—তা হলো, তিনি প্রথমে হাদীসের বর্ণনাকারীদের প্রতীকগুলো উল্লেখ করেন, অতঃপর এর উপর কথা বলেন—যদিও তাঁর কথা কম থাকে!
আর এখানে আমরা (حل) প্রতীকটি আল-আজলাহ সম্পর্কে তাঁর আলোচনার পরে দেখতে পাচ্ছি, যা ইঙ্গিত করে যে এটি প্রক্ষিপ্ত (পরে ঢোকানো)!
আমার নিকট রক্ষিত ‘আল-জামি‘ আল-কাবীর’-এর একটি ফটোকপি সংস্করণে ফিরে যাওয়ার পর আমি এ বিষয়ে নিশ্চিত হয়েছি; সেখানে উল্লিখিত প্রতীকটি পাওয়া যায়নি। আর শাইখ আল-গুমারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘ফাহরাস আল-হিলইয়াহ’ (আল-হিলইয়াহ-এর সূচীপত্র)-এর দিকে ফিরে গিয়েও আমি এই হাদীসটি সেখানে দেখতে পাইনি, যা দ্বারা এটি আরও সমর্থিত হয়েছে।
(সতর্কীকরণ): আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটি দুর্বল হওয়া সত্ত্বেও, শিয়া মতাবলম্বী ব্যক্তি এতে নিজের পক্ষ থেকে একটি অতিরিক্ত অংশ ঢুকিয়ে দিয়েছে; অথচ পাঠকদেরকে সে বিষয়ে সতর্ক করেনি। কারণ সে এটিকে পূর্ববর্তী হাদীস (৪৯৪৫)-এর পরপরই উল্লেখ করেছে, যেখানে রয়েছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ভর দিয়ে ইন্তিকাল করেন। অতঃপর সে এই উক্তির পরে অতিরিক্ত যোগ করেছে: ... রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে শিক্ষা দিয়েছেন—
—অর্থাৎ: তখন। অর্থাৎ: তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকালের সময়!
যদি বলা হয়: ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে এই অতিরিক্ত অংশের অর্থ নিহিত আছে; কারণ তাতে স্পষ্টভাবে বলা হয়েছে যে, উল্লিখিত শিক্ষা তাঁর অসুস্থতার সময় হয়েছিল।
আমি বলব: না; এর অর্থে তা নিহিত নেই। এর কারণ দুটি দিক:
প্রথমত: তাতে এই কথা নেই যে, সেই অসুস্থতা তাঁর মৃত্যুশয্যার অসুস্থতা ছিল।
দ্বিতীয়ত: ধরে নিলাম যে, তা তাঁর মৃত্যুশয্যার অসুস্থতা ছিল; তবুও তাতে এই কথা নেই যে, তিনি তাঁকে শিক্ষা দিয়েছেন এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর ভর দিয়ে ইন্তিকাল করেছেন; বরং তাতে স্পষ্টভাবে বলা হয়েছে যে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হয়ে গেলেন এবং তাঁকে অসুস্থ অবস্থায় রেখে গেলেন।
এই সবকিছুই অসংখ্য প্রমাণের অন্তর্ভুক্ত যে, শিয়ারা তাদের ভ্রষ্ট মতবাদকে সমর্থন করার উদ্দেশ্যে হাদীসে ভেজাল মেশানো ও মিথ্যা বলাকে বৈধ মনে করে! আমরা আল্লাহর নিকট নিরাপত্তা কামনা করি।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তাঁর আহলে বাইতের ফযীলত সম্পর্কে এই অধ্যায়ে আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীস রয়েছে, ইনশাআল্লাহ যার তাখরীজ (হাদীস সূত্র) শীঘ্রই ৬২৫৪ নং-এ আসবে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4969)


(توفي [صلى الله عليه وسلم] وإنه لمستند إلى صدر علي) .
موضوع

أخرجه ابن سعد (2/ 263) : أخبرنا محمد بن عمر: حدثني سليمان بن داود بن الحصين عن أبيه عن أبي غطفان قال:
سألت ابن عباس: أرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم توفي ورأسه في حجر أحد؟ قال: توفي وهو لمستند إلى صدر علي. قلت: فإن عروة حدثني عن عائشة أنها قالت:
توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم بين سحري ونحري؟! فقال ابن عباس: أتعقل؟! والله! لتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وإنه لمستند إلى صدر علي؛ وهو الذي غسله وأخي الفضل ابن عباس. وأبي أبي أن يحضر، وقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يأمرنا أن نستتر، فكان عند الستر.
قلت: وهذا موضوع؛ آفته محمد بن عمر - وهو الواقدي - ؛ كذاب.
وشيخه سليمان بن داود بن الحصين؛ لا يعرف؛ أورده ابن أبي حاتم (2/ 1/ 111) ، ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
ثم رأيت الحافظ قال في `الفتح` (8/ 107) :
`لا يعرف حاله`.
قلت: وإن مما يؤكد وضع الحديث؛ مخالفته لحديث عروة المذكور عن عائشة؛ فإن عروة وهو - ابن الزبير - من كبار التابعين وثقاتهم، وقد رواه عنه جمع من الثقات في `مسند الإمام أحمد` (6/ 121،200،270،274) ، و `صحيح البخاري` (8/ 105 - 110) ، و `مسلم` (7/ 137 - 138) .
وتابعه عندهما جماعة من الثقات عن عائشة رضي الله عنها، وكذلك في `المسند` (6/ 32،48،64،74،77،231،274) ، و `ابن سعد` (2/ 261،262) . فهو حديث مشهور عن عائشة رضي الله عنها؛ إن لم يكن متواتراً.
ولذلك جزم به إبراهيم النخعي فقال: قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يوص، وقبض وهو مستند إلى صدر عائشة.
رواه ابن سعد بإسناد رجاله ثقات؛ غير عبد الرحمن بن جريس؛ ترجمه ابن أبي حاتم (2/ 2/ 221) ؛ ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
فمثل هذا الحديث المشهور عن عائشة يبعد جداً أن يخفى على ابن عباس رضي الله عنه! فنفيه عن عائشة وإثباته لعلي رضي الله عنه؛ إنما هو من صنع الكذابين من الشيعة أو من يساندهم.
ونحوه ما رواه الواقدي أيضاً: أخبرنا عبد العزيز بن محمد عن حرام بن عثمان عن أبي حازم عن جابر بن عبد الله الأنصاري:
أن كعب الأحبار قام زمن عمر فقال - ونحن جلوس عند عمر أمير المؤمنين - :
ما كان آخر ما تكلم به رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال عمر: سل علياً. قال: أين هو؟ قال: هو هنا. فسأله، فقال علي: أسندته إلى صدري، فوضع رأسه على منكبي، فقال:
`الصلاة الصلاة`. فقال كعب: كذلك آخر عهد الأنبياء وبه أمروا، وعليه يبعثون. قال: فمن غسله يا أمير المؤمنين؟! قال: سل علياً. قال: فسأله؟ فقال: كنت أنا أغسله، وكان عباس جالساً، وكان أسامة وشقران يختلفان إلي بالماء.

أخرجه ابن سعد.
قلت: وهذا موضوع أيضاً؛ والآفة الواقدي، أو الشيخ شيخه حرام بن عثمان؛ فقد قال الإمام الشافعي وغيره:
`الرواية عن حرام حرام`! وقال الحافظ:
`وفي سنده الواقدي، وحرام بن عثمان؛ وهما متروكان`.
ومما يؤكد وضعه، أن في رواية لعائشة في حديثها المتقدم:
فجعل يقول:
`في الرفيق الأعلى`؛ حتى قبض.

أخرجه البخاري.
نعم؛ قد روي بإسناد آخر خير من هذا عن علي قال:
كان آخر كلام رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`الصلاة الصلاة! اتقوا الله فيما ملكت أيمانكم`.
وله شواهد خرجتها في `الصحيحة` (868) من حديث أم سلمة وغيرها.
فإن صح هذا القدر عن علي؛ فهو محمول على ما سمعه هو نفسه من النبي صلى الله عليه وسلم في مرضه، فلا ينافي حينئذ قول عائشة المذكور؛ لأنه محدد لا يقبل التخصيص كما هو ظاهر لكل ذي عينين.
ومن ذلك أيضاً: ما رواه الواقدي: حدثني عبد الله بن محمد بن عمر بن علي عن أبيه عن علي بن حسين قال:
قبض رسول الله صلى الله عليه وسلم ورأسه في حجر علي.

أخرجه ابن سعد. قال الحافظ:
`فيه انقطاع، مع الواقدي. وعبد الله فيه لين`.
ثم أخرج عن الواقدي: حدثني أبو الجويرية عن أبيه عن الشعبي مثله. قال الحافظ:
`فيه الواقدي، والانقطاع، وأبو الحويرث (قلت: وهو أبو الجويرية) ؛ اسمه عبد الرحمن بن معاوية بن الحارث المدني؛ قال مالك: ليس بثقة. وأبوه لا يعرف حاله`.
قلت: وهذه الأحاديث الموضوعة؛ لم يتورع عبد الحسين الشيعي - كعادته - عن الاحتجاج بها في معارضة حديث السيدة عائشة المعارض لها؛ تحت عنوان:
`الصحاح المعارضة لدعوى أم المؤمنين` (ص 247 - 252) ! ولم يعزها لغير ابن سعد. ومدارها كلها - كما رأيت - على الواقدي الكذاب، مع عدم سلامتها ممن فوقه.
ولم يكتف الشيعي بهذا؛ بل أخذ يحتج بما جاء في `نهج البلاغة` و `شرحها` لابن أبي الحديد المعتزلي!!
وضم إلى ذلك احتجاجه بحديث أم سلمة المتقدم تحت الحديث (4945) ؛ وتقديمه لحديثها - وهو ضعيف كما سبق - على حديث عائشة المروي من طرق كثيرة صحيحة عنها! ثم رجحه على حديثها بالطعن عليها والغمز منها بأمور بعضها ثابت عنها، منها أمور لازمة لغير الأنبياء المعصومين، كحضورها وقعة المل، وقد تابت منه. ومنها ما لا عيب عليها فيها؛ كصلاة النبي صلى الله عليه وسلم إليها وهي مادة رجليها! ومنها ما لا يصح نسبته إليها، وإنما اعتماده في ذلك على كتب التاريخ التي تروي ما هب ودب، وبخاصة `شرح نهج البلاغة` لابن أبي الحديد المعتزلي! إلى غير ذلك من الأمور التي يطول الكلام بنقدها، ولم تتجه الهمة إلى بسط الكلام عليها.
لكن لا بد من الكلام على أمر منها؛ قد يشكل على من لا علم عنده بطرق الحديث وألفاظه، ومكر هذا الشيعي وخبثه وضلاله، وطعنه في أهل السنة عامة، وأم المؤمنين الصديقة بنت الصديق خاصة؛ ألا وهو حديث البخاري عن عبد الله ابن عمر قال:
قام النبي صلى الله عليه وسلم خطيباً، فأشار نحو مسكن عائشة فقال:
`ههنا الفتنة (ثلاثاً) من حيث يطلع قرن الشيطان`. ولفظه عند مسلم:
خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من بيت عائشة فقال:
`رأس الكفر من ها هنا؛ حيث يطلع قرن الشيطان`.
فأوهم الشيعي قراءه أن الفتنة في الحديث إنما هي عائشة رضي الله عنها، وبرأها الله من ذلك كما برأها من المنافقين من قبل - !
وكل من أمعن النظر في بعض طرق الحديث - فضلاً عن مجموعها - ؛ يعلم
يقيناً أن الجهة التي أشار إليها النبي صلى الله عليه وسلم بقوله: `ههنا`؛ إنما هي جهة المشرق، وهي على التحديد العراق، والواقع يشهد أنها منبع الفتن قديماً وحديثاً.
وقد جمعت طرق الحديث وألفاظه وخرجتها في `الصحيحة` برقم (2494) ، وقد قدمت إليك خلاصتها بما فيه كفاية للكشف عن تدجيل الشيعي وبهته، فلا داعي للإعادة.
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(তিনি [সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম] আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় ইন্তেকাল করেন)।
মাওদ্বূ (জাল/বানোয়াট)

ইবনু সা'দ এটি বর্ণনা করেছেন (২/২৬৩): আমাদেরকে খবর দিয়েছেন মুহাম্মাদ ইবনু উমার: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনু দাউদ ইবনুল হুসাইন তার পিতা হতে, তিনি আবূ গাতফান হতে। তিনি বলেন:
আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি দেখেছেন যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন অবস্থায় ইন্তেকাল করেছেন যে, তাঁর মাথা কারো কোলে ছিল? তিনি বললেন: তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় ইন্তেকাল করেন। আমি বললাম: উরওয়াহ তো আমাকে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার বুক ও গলার মধ্যবর্তী স্থানে ইন্তেকাল করেন?! তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি কি বুঝতে পারছ না?! আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় ইন্তেকাল করেন; আর তিনিই তাঁকে গোসল দিয়েছেন এবং আমার ভাই ফাদল ইবনু আব্বাসও। আর আমার পিতা (আব্বাস) উপস্থিত হতে অস্বীকার করেন এবং বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে পর্দা করতে আদেশ করতেন, তাই তিনি পর্দার কাছে ছিলেন।

আমি (আলবানী) বলি: আর এটি মাওদ্বূ (জাল); এর ত্রুটি হলো মুহাম্মাদ ইবনু উমার – আর তিনি হলেন ওয়াকিদী – সে একজন মহা মিথ্যাবাদী।
আর তার শায়খ সুলাইমান ইবনু দাউদ ইবনুল হুসাইন; তিনি অপরিচিত; ইবনু আবী হাতিম তাকে উল্লেখ করেছেন (২/১/১১১), কিন্তু তার সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।
অতঃপর আমি দেখলাম যে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (৮/১০৭) বলেছেন:
‘তার অবস্থা জানা যায় না।’
আমি বলি: আর যা এই হাদীসটিকে মাওদ্বূ হওয়ার বিষয়টি নিশ্চিত করে, তা হলো— এটি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত উরওয়াহ-এর উল্লিখিত হাদীসের বিরোধী। কারণ উরওয়াহ – আর তিনি হলেন ইবনু যুবাইর – তিনি হলেন শীর্ষস্থানীয় তাবেঈ ও নির্ভরযোগ্যদের অন্তর্ভুক্ত। নির্ভরযোগ্যদের একটি দল তার থেকে এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন ‘মুসনাদে ইমাম আহমাদ’ (৬/১২১, ২০০, ২৭০, ২৭৪), ‘সহীহুল বুখারী’ (৮/১০৫-১১০) এবং ‘মুসলিম’ (৭/১৩৭-১৩৮)-এ। আর তাদের উভয়ের (বুখারী ও মুসলিমের) নিকট নির্ভরযোগ্যদের একটি দল আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তার অনুসরণ করেছেন। অনুরূপভাবে ‘মুসনাদ’ (৬/৩২, ৪৮, ৬৪, ৭৪, ৭৭, ২৩১, ২৭৪) এবং ‘ইবনু সা'দ’ (২/২৬১, ২৬২)-এও। সুতরাং এটি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত একটি প্রসিদ্ধ হাদীস; যদি না তা মুতাওয়াতির হয়ে থাকে।
আর একারণেই ইবরাহীম নাখঈ দৃঢ়তার সাথে বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কোনো অসিয়ত না করেই ইন্তেকাল করেন এবং তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বুকের উপর হেলান দেওয়া অবস্থায় ইন্তেকাল করেন।
ইবনু সা'দ এটি এমন সনদে বর্ণনা করেছেন যার বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য; তবে আব্দুর রহমান ইবনু জুরাইস ছাড়া; ইবনু আবী হাতিম তার জীবনী উল্লেখ করেছেন (২/২/২২১); কিন্তু তার সম্পর্কে কোনো জারহ বা তা'দীল উল্লেখ করেননি।
সুতরাং আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত এমন প্রসিদ্ধ হাদীস ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গোপন থাকাটা খুবই অসম্ভব! তাই আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে তা অস্বীকার করা এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য তা সাব্যস্ত করা; এটা কেবল শিয়াদের মিথ্যাবাদী বা তাদের সমর্থকদের কাজ।

অনুরূপ আরেকটি বর্ণনা ওয়াকিদীও বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন আব্দুল আযীয ইবনু মুহাম্মাদ, তিনি হারাম ইবনু উসমান হতে, তিনি আবূ হাযিম হতে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে:
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে কা'ব আল-আহবার দাঁড়ালেন এবং বললেন – আমরা তখন আমীরুল মু'মিনীন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসে ছিলাম – রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের শেষ কথা কী ছিল? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আলীকে জিজ্ঞেস করো। সে বলল: তিনি কোথায়? তিনি বললেন: তিনি এখানেই আছেন। অতঃপর সে তাঁকে জিজ্ঞেস করল। আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাঁকে আমার বুকের উপর হেলান দিলাম, অতঃপর তিনি তাঁর মাথা আমার কাঁধের উপর রাখলেন এবং বললেন:
‘সালাত, সালাত (নামায, নামায)।’ কা'ব বললেন: নবীদের শেষ কথা এমনই ছিল, আর এর দ্বারাই তাঁদেরকে আদেশ করা হয়েছিল এবং এর উপরই তাঁদেরকে পুনরুত্থিত করা হবে। সে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! তাঁকে কে গোসল দিয়েছেন? তিনি বললেন: আলীকে জিজ্ঞেস করো। সে তাঁকে জিজ্ঞেস করল? তিনি বললেন: আমিই তাঁকে গোসল দিচ্ছিলাম, আর আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বসে ছিলেন, আর উসামাহ ও শুকরান আমার কাছে পানি আনা-নেওয়া করছিলেন।

ইবনু সা'দ এটি বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: আর এটিও মাওদ্বূ (জাল); এর ত্রুটি হলো ওয়াকিদী, অথবা তার শায়খের শায়খ হারাম ইবনু উসমান; কারণ ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) ও অন্যান্যরা বলেছেন:
‘হারাম (ইবনু উসমান) হতে বর্ণনা করা হারাম!’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘এর সনদে ওয়াকিদী এবং হারাম ইবনু উসমান রয়েছে; আর তারা উভয়েই মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
আর যা এর মাওদ্বূ হওয়ার বিষয়টি নিশ্চিত করে, তা হলো— আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্বোক্ত হাদীসের একটি বর্ণনায় রয়েছে:
অতঃপর তিনি বলতে লাগলেন:
‘সর্বোচ্চ বন্ধুর সাথে’; যতক্ষণ না তিনি ইন্তেকাল করলেন।

বুখারী এটি বর্ণনা করেছেন।
হ্যাঁ; এর চেয়ে উত্তম অন্য একটি সনদে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের শেষ কথা ছিল:
‘সালাত, সালাত (নামায, নামায)! তোমাদের ডান হাত যার মালিক হয়েছে (দাস-দাসী), তাদের ব্যাপারে আল্লাহকে ভয় করো।’
এর শাওয়াহিদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে যা আমি ‘আস-সহীহাহ’ (৮৬৮)-এ উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যদের হাদীস হতে তাখরীজ করেছি।
যদি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এই অংশটুকু সহীহ হয়; তবে তা এমন বিষয়ের উপর প্রযোজ্য হবে যা তিনি নিজেই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অসুস্থতার সময় শুনেছিলেন। সুতরাং তা আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উল্লিখিত কথার বিরোধী হবে না; কারণ এটি সুনির্দিষ্ট যা কোনো প্রকারের বিশেষীকরণ গ্রহণ করে না, যেমনটি চক্ষুষ্মান সকলের কাছে স্পষ্ট।
আর এর অন্তর্ভুক্ত হলো: ওয়াকিদী যা বর্ণনা করেছেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু উমার ইবনু আলী তার পিতা হতে, তিনি আলী ইবনু হুসাইন হতে। তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইন্তেকাল করেন, আর তাঁর মাথা আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কোলে ছিল।

ইবনু সা'দ এটি বর্ণনা করেছেন। হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘এতে ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে, ওয়াকিদী তো আছেই। আর আব্দুল্লাহ-এর মধ্যে দুর্বলতা (লিন) রয়েছে।’
অতঃপর তিনি ওয়াকিদী হতে বর্ণনা করেছেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবুল জুওয়াইরিয়্যাহ তার পিতা হতে, তিনি শা'বী হতে অনুরূপ। হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘এতে ওয়াকিদী, ইনকিতা' (বিচ্ছিন্নতা) এবং আবুল হুওয়াইরিস (আমি বলি: আর ইনিই আবুল জুওয়াইরিয়্যাহ) রয়েছে; তার নাম আব্দুল্লাহ ইবনু মু'আবিয়াহ ইবনুল হারিস আল-মাদানী; ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য নয়। আর তার পিতার অবস্থা জানা যায় না।’
আমি বলি: আর এই মাওদ্বূ (জাল) হাদীসগুলো; আব্দুল হুসাইন আশ-শিঈ – তার স্বভাব অনুযায়ী – উম্মুল মু'মিনীন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দাবির বিরোধী সহীহ হাদীসসমূহ’ (পৃষ্ঠা ২৪৭-২৫২) শিরোনামের অধীনে, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরোধী হাদীসের বিপরীতে এগুলো দ্বারা প্রমাণ পেশ করতে দ্বিধা করেননি! আর তিনি ইবনু সা'দ ছাড়া অন্য কারো দিকে এগুলোকে সম্পর্কিত করেননি। আর আপনি যেমন দেখলেন, এই সবগুলোর ভিত্তি হলো মিথ্যাবাদী ওয়াকিদীর উপর, উপরন্তু তার উপরের বর্ণনাকারীরাও ত্রুটিমুক্ত নন।
আর এই শিয়া এতেই ক্ষান্ত হননি; বরং তিনি ‘নাহজুল বালাগা’ এবং ইবনু আবিল হাদীদ আল-মু'তাযিলীর ‘শারহুহা’ (এর ব্যাখ্যাগ্রন্থ)-এ যা এসেছে, তা দ্বারা প্রমাণ পেশ করতে শুরু করেছেন!! এর সাথে তিনি হাদীস (৪৯৪৫)-এর অধীনে পূর্বে উল্লিখিত উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারাও প্রমাণ পেশ করেছেন; এবং তার হাদীসকে – যা পূর্বে বলা হয়েছে যঈফ – আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বহু সহীহ সূত্রে বর্ণিত হাদীসের উপর প্রাধান্য দিয়েছেন! অতঃপর তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর দোষারোপ করে এবং তার প্রতি ইঙ্গিত করে এমন কিছু বিষয়ের মাধ্যমে তার হাদীসকে প্রাধান্য দিয়েছেন, যার কিছু অংশ তার থেকে প্রমাণিত, যার মধ্যে কিছু বিষয় রয়েছে যা নিষ্পাপ নবীগণ ছাড়া অন্যদের জন্য স্বাভাবিক, যেমন ‘জঙ্গলে’ (উটের যুদ্ধে) তার উপস্থিতি, যদিও তিনি তা থেকে তাওবা করেছেন। আর কিছু বিষয় রয়েছে যাতে তার কোনো দোষ নেই; যেমন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার দিকে মুখ করে সালাত আদায় করতেন যখন তিনি পা ছড়িয়ে রাখতেন! আর কিছু বিষয় রয়েছে যা তার প্রতি আরোপ করা সহীহ নয়, বরং এই ক্ষেত্রে তার নির্ভরতা হলো ইতিহাসের কিতাবসমূহের উপর যা যা ইচ্ছা তাই বর্ণনা করে, বিশেষ করে ইবনু আবিল হাদীদ আল-মু'তাযিলীর ‘শারহু নাহজিল বালাগা’! এছাড়াও আরও অনেক বিষয় রয়েছে যার সমালোচনা করতে গেলে আলোচনা দীর্ঘ হয়ে যাবে, আর সেগুলোর উপর বিস্তারিত আলোচনার দিকে মনোযোগ দেওয়া হয়নি।
কিন্তু এর মধ্যে একটি বিষয় নিয়ে কথা বলা অপরিহার্য, যা হাদীসের সূত্র ও শব্দ সম্পর্কে জ্ঞান রাখে না এমন ব্যক্তির জন্য বিভ্রান্তিকর হতে পারে, আর তা হলো এই শিয়া ব্যক্তির ধূর্ততা, দুষ্টুমি ও পথভ্রষ্টতা এবং সাধারণভাবে আহলুস সুন্নাহ এবং বিশেষভাবে উম্মুল মু'মিনীন সিদ্দীকা বিনতে সিদ্দীক (আয়িশাহ)-এর প্রতি তার আক্রমণ; আর তা হলো আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বুখারীর হাদীস, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খুতবা দেওয়ার জন্য দাঁড়ালেন, অতঃপর তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাসস্থানের দিকে ইশারা করে বললেন:
‘ফিতনা এই দিকে (তিনবার), যেখান থেকে শয়তানের শিং উদিত হয়।’ আর মুসলিমের নিকট এর শব্দ হলো: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘর থেকে বের হলেন এবং বললেন:
‘কুফরের মাথা এই দিক থেকে; যেখান থেকে শয়তানের শিং উদিত হয়।’
অতঃপর এই শিয়া তার পাঠকদেরকে এই ধারণা দিয়েছেন যে, হাদীসে উল্লিখিত ফিতনা হলো আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), অথচ আল্লাহ তাকে তা থেকে মুক্ত করেছেন, যেমন পূর্বে মুনাফিকদের থেকে তাকে মুক্ত করেছিলেন!
আর যে কেউ হাদীসের কিছু সূত্রের দিকে মনোযোগ সহকারে লক্ষ্য করবে – তার সমষ্টির কথা তো বাদই দিলাম – সে নিশ্চিতভাবে জানতে পারবে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ‘এই দিকে’ বলে যে দিকের দিকে ইশারা করেছিলেন, তা হলো পূর্ব দিক, আর সুনির্দিষ্টভাবে তা হলো ইরাক, আর বাস্তবতা সাক্ষ্য দেয় যে, প্রাচীনকাল থেকে আধুনিক কাল পর্যন্ত এটিই ফিতনার উৎস।
আমি হাদীসটির সূত্র ও শব্দগুলো একত্রিত করে ‘আস-সহীহাহ’তে (২৪৯৪) তাখরীজ করেছি, আর আমি আপনার কাছে এর সারসংক্ষেপ পেশ করেছি যা এই শিয়া ব্যক্তির প্রতারণা ও মিথ্যাচার উন্মোচন করার জন্য যথেষ্ট, তাই পুনরাবৃত্তির প্রয়োজন নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4970)


(جاء الملك بصورتي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم. فتزوجني رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا ابنة سبع سنين. وأهديت إليه وأنا ابنة تسع سنين. وتزوجني بكراً لم يكن في أحد من الناس. وكان يأتيه الوحي وأنا وهو في لحاف واحد. وكنت من أحب الناس إليه. ونزل في آيات من القرآن كادت الأمة تهلك فيها. ورأيت جبريل عليه الصلاة والسلام؛ ولم يره أحد من نسائه غيري. وقبض في بيتي؛ لم يله أحد غير الملك إلا أنا) .
منكر

أخرجه الحاكم (4/ 10) من طريق إسماعيل بن أبي خالد: أنبأ عبد الرحمن بن الضحاك:
أن عبد الله بن صفوان أتى عائشة وآخر معه، فقالت عائشة لأحدهما: أسمعت حديث حفصة يا فلان؟! قال: نعم يا أم المؤمنين؟! فقال لها عبد الله بن صفوان: وما ذاك يا أم المؤمنين؟! قالت: خلال لي تسع؛ لم يكن لأحد من النساء قبلي؛ إلا ما آتى الله عز وجل مريم بنت عمران، والله! ما أقول هذا أني أفخر على أحد من صواحباتي. فقال لها عبد الله بن صفوان: وما هن يا أم المؤمنين؟! قالت … فذكره. وقال:
`صحيح الإسناد`! ووافقه الذهبي!
قلت: ورجاله ثقات رجال مسلم؛ غير عبد الرحمن بن الضحاك، وقد أورده ابن أبي حاتم (2/ 2/ 246 - 247) من رواية إسماعيل بن أبي خالد هذا؛ إلا أنه وقع فيه عبد الرحمن بن أبي الضحاك! ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
ولم أره في `ثقات ابن حبان`؛ فهو على كل حال مجهول، فهو علة الحديث.
وقد وجدت له طريقاً أخرى؛ إلا أنه لا يتقوى بها، فقال ابن سعد (8/ 65) : أخبرنا هشام أبو الوليد: حدثنا أبو عوانة عن عبد الملك بن عمير عن عائشة به نحوه. وقال في الخلة الأخيرة:
ومرض رسول الله صلى الله عليه وسلم في بيتي؛ فمرضته، فقبض ولم يشهده غيري والملائكة.
قلت: ورجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير أن عبد الملك بن عمير لم يذكروا له رواية عن عائشة. على أنه قد رمي بالتدليس.
فمن المحتمل أن يكون الواسطة بينه وبينها رجلاً مطعوناً أو مجهولاً؛ كعبد الرحمن هذا.
وإنما أوردت الحديث من أجل ذكر مريم فيه مع هذه الخلة الأخيرة؛ فإني لم أجد لها شاهداً يقويها، وقد استغلها الشيعي عبد الحسين في `مراجعاته` (257 - 258) ؛ فجزم بنسبة الحديث إليها، ثم أخذ يغمز منها بسبب هذه الخلة، وهي مما لم يثبت عنها كما تبين لك من هذا التخريج، بخلاف الخلال التي قبلها، فكلها صحيحة ثابتة عنها في `الصحيحين` وغيرهما.
فاعلم هذا؛ يساعدك على دفع المطاعن الشيعية عن أم المؤمنين رضي الله عنها!
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(ফেরেশতা আমার আকৃতি নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসেছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বিবাহ করেন যখন আমার বয়স ছিল সাত বছর। আর আমাকে তাঁর নিকট সোপর্দ করা হয় যখন আমার বয়স ছিল নয় বছর। আর তিনি আমাকে কুমারী অবস্থায় বিবাহ করেন, যা অন্য কোনো মানুষের ক্ষেত্রে ঘটেনি। আর যখন তাঁর নিকট ওহী আসত, তখন আমি এবং তিনি একই চাদরের নিচে থাকতাম। আর আমি ছিলাম তাঁর নিকট মানুষের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়। আর আমার ব্যাপারে কুরআনের এমন আয়াত নাযিল হয়েছে, যার কারণে উম্মত প্রায় ধ্বংস হয়ে যাচ্ছিল। আর আমি জিবরীল আলাইহিস সালাতু ওয়াসসালামকে দেখেছি; আমার ব্যতীত তাঁর অন্য কোনো স্ত্রী তাঁকে দেখেনি। আর তিনি আমার ঘরে ইন্তেকাল করেন; ফেরেশতা ব্যতীত অন্য কেউ তাঁকে (মৃত্যুর সময়) দেখভাল করেনি, আমি ছাড়া)।
মুনকার

এটি হাকিম (৪/১০) ইসমাঈল ইবনু আবী খালিদের সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি আব্দুর রহমান ইবনুয যাহ্হাক থেকে বর্ণনা করেছেন যে, আব্দুল্লাহ ইবনু সাফওয়ান এবং তার সাথে অন্য একজন ব্যক্তি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের একজনকে বললেন: হে অমুক! তুমি কি হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস শুনেছ? সে বলল: হ্যাঁ, হে উম্মুল মুমিনীন! তখন আব্দুল্লাহ ইবনু সাফওয়ান তাঁকে বললেন: হে উম্মুল মুমিনীন! সেটি কী? তিনি বললেন: আমার নয়টি বৈশিষ্ট্য রয়েছে; যা আমার পূর্বে মারইয়াম বিনতে ইমরানকে আল্লাহ তা‘আলা যা দিয়েছেন তা ব্যতীত অন্য কোনো নারীর জন্য ছিল না। আল্লাহর কসম! আমি আমার অন্য সঙ্গিনীদের উপর গর্ব করার জন্য এটি বলছি না। তখন আব্দুল্লাহ ইবনু সাফওয়ান তাঁকে বললেন: হে উম্মুল মুমিনীন! সেগুলো কী? তিনি বললেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। আর তিনি (হাকিম) বললেন:
‘সনদ সহীহ’! এবং যাহাবীও তাতে একমত পোষণ করেছেন!

আমি (আলবানী) বলি: এর বর্ণনাকারীগণ মুসলিমের নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী; তবে আব্দুর রহমান ইবনুয যাহ্হাক ব্যতীত। আর ইবনু আবী হাতিম (২/২/২৪৬-২৪৭) ইসমাঈল ইবনু আবী খালিদের এই বর্ণনা থেকে তাকে উল্লেখ করেছেন; তবে সেখানে ‘আব্দুর রহমান ইবনু আবীয যাহ্হাক’ এসেছে! আর তিনি তার ব্যাপারে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা‘দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।

আমি তাকে ‘সিকাত ইবনু হিব্বান’-এ দেখিনি; সুতরাং সে সর্বাবস্থায় মাজহূল (অজ্ঞাত), আর সে-ই হাদীসটির ত্রুটি (ইল্লত)।

আমি এর জন্য অন্য একটি সূত্র পেয়েছি; তবে তা দ্বারা এটি শক্তিশালী হয় না। ইবনু সা‘দ (৮/৬৫) বলেছেন: আমাদেরকে হিশাম আবুল ওয়ালীদ সংবাদ দিয়েছেন: আবূ ‘আওয়ানা আমাদের নিকট আব্দুল মালিক ইবনু ‘উমাইর থেকে, তিনি ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আর শেষ বৈশিষ্ট্যটির ব্যাপারে তিনি বলেছেন:

আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার ঘরে অসুস্থ হলেন; অতঃপর আমি তাঁর সেবা করলাম, আর তিনি ইন্তেকাল করলেন এবং আমি ও ফেরেশতাগণ ব্যতীত অন্য কেউ তাঁর (মৃত্যুর সময়) উপস্থিত ছিল না।

আমি (আলবানী) বলি: এর বর্ণনাকারীগণ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী; তবে আব্দুল মালিক ইবনু ‘উমাইরের ‘আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করার কথা তারা উল্লেখ করেননি। উপরন্তু, তাকে তাদলীস (দোষ গোপন) করার অভিযোগে অভিযুক্ত করা হয়েছে।

সুতরাং এটি সম্ভবত যে, তার এবং তাঁর (আয়িশা) মাঝে যে মধ্যস্থতাকারী রয়েছে, সে একজন দোষারোপিত বা মাজহূল (অজ্ঞাত) ব্যক্তি; যেমন এই আব্দুর রহমান।

আমি এই হাদীসটি কেবল এই কারণে উল্লেখ করেছি যে, এতে মারইয়াম (আঃ)-এর উল্লেখ রয়েছে এবং এই শেষ বৈশিষ্ট্যটি রয়েছে; কারণ আমি এর সমর্থনে শক্তিশালী কোনো শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) পাইনি। আর শিয়া আব্দুল হুসাইন তার ‘মুরাজা‘আত’ (২৫৭-২৫৮)-এ এটিকে কাজে লাগিয়েছে; সে নিশ্চিতভাবে হাদীসটিকে তাঁর (আয়িশা) দিকে সম্পর্কিত করেছে, অতঃপর এই বৈশিষ্ট্যের কারণে তাঁকে দোষারোপ করতে শুরু করেছে। অথচ এই তাখরীজ থেকে যেমনটি তোমার নিকট স্পষ্ট হয়েছে, এটি তাঁর থেকে প্রমাণিত নয়। এর পূর্বের বৈশিষ্ট্যগুলোর বিষয়টি ভিন্ন, কেননা সেগুলো ‘সহীহাইন’ (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্য গ্রন্থে তাঁর থেকে সহীহ ও প্রমাণিত।

সুতরাং এটি জেনে রাখো; এটি উম্মুল মুমিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর শিয়াদের পক্ষ থেকে আরোপিত দোষারোপসমূহ প্রতিহত করতে তোমাকে সাহায্য করবে!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4971)


(دعوهن؛ فإنهن خير منكم) .
منكر
روي عن عمر بن الخطاب قال:
لما مرض النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`ادعوا لي بصحيفة ودواة؛ أكتب لكم كتاباً لا تضلون بعدي أبداً`. فكرهنا ذلك أشد الكراهة. ثم قال:
`ادعوا لي بصحيفة؛ أكتب لكم كتاباً لا تضلون بعده أبداً`. فقالت النسوة من وراء الستر: ألا يسمعون ما يقول رسول الله صلى الله عليه وسلم؟! فقلت: إنكن صواحبات يوسف! إذا مرض رسول الله صلى الله عليه وسلم عصرتن أعينكن. وإذا صح ركبتن رقبته! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. قال الهيثمي (9/ 34) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه محمد بن جعفر بن إبراهيم الجعفري؛ قال العقيلي: في حديث نظر. وبقية رجاله وثقوا، وفي بعضهم خلاف`!
قلت: ومحمد بن جعفر هذا؛ لم أجده في `الضعفاء` للعقيلي (1) !
وفي `الجرح والتعديل` (3/ 2/ 189) :
`محمد بن إسماعيل الجعفري، وهو ابن إسماعيل بن جعفر بن إبراهيم بن محمد بن علي بن عبد الله بن جعفر بن أبي طالب. روى عن الدراوردي … روى عنه أبو زرعة. سألت أبي عنه؟ فقال: منكر الحديث، يتكلمون فيه`.
(1) الحديث رواه الطبراني في ` الأوسط ` (5338) ؛ ومننه تبين أن في نقل الهيثمي تحريفاً في اسم الرواي، وهو (موسى بن جعفر … ) ، وهو الذي قال فيه العقيلي: ` في حديثه نظر `. (الناشر)
قلت: فمن الظاهر أنه هذا، وقع عند الطبراني منسوباً إلى جده، ولكني لم أجده منسوباً إلى أبيه عند العقيلي! فالله أعلم.
وذكر في `اللسان` أن أبا نعيم الأصبهاني قال:
`متروك`.
وأما ابن حبان؛ فذكره في `الثقات`!
والحديث في `الصحيحين` وغيرهما من حديث ابن عباس نحوه؛ دون قوله: فقالت النسوة … إلخ؛ فهو منكر.
وراجع شرح الحديث في `فتح الباري` (1/ 185 - 187 و 8/ 100 - 103) .
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(তাদেরকে ছেড়ে দাও; কারণ তারা তোমাদের চেয়ে উত্তম)।
মুনকার

উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অসুস্থ হলেন, তখন তিনি বললেন:
‘আমার জন্য একটি সহীফা (কাগজ) ও দোয়াত নিয়ে এসো; আমি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব (দলিল) লিখে দেব, যার পরে তোমরা আর কখনো পথভ্রষ্ট হবে না।’ তখন আমরা তা অত্যন্ত অপছন্দ করলাম। অতঃপর তিনি বললেন:
‘আমার জন্য একটি সহীফা নিয়ে এসো; আমি তোমাদের জন্য এমন একটি কিতাব লিখে দেব, যার পরে তোমরা আর কখনো পথভ্রষ্ট হবে না।’ তখন পর্দার আড়াল থেকে মহিলারা বলল: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা বলছেন, তা কি তারা শুনছে না?! তখন আমি বললাম: তোমরা তো ইউসুফের সঙ্গিনীরা! যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অসুস্থ হন, তখন তোমরা চোখ ডলতে থাকো (কান্নার ভান করো)। আর যখন তিনি সুস্থ হন, তখন তোমরা তাঁর ঘাড়ে চড়ে বসো (তাঁর উপর কর্তৃত্ব ফলাও)! তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন... অতঃপর তিনি তা (প্রথমোক্ত বাক্যটি) উল্লেখ করলেন। হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন (৯/৩৪):
‘এটি তাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। এর সনদে মুহাম্মাদ ইবনু জা’ফার ইবনু ইবরাহীম আল-জা’ফারী রয়েছে; আল-উকাইলী বলেছেন: তার হাদীসে আপত্তি আছে (ফি হাদীসিহি নাযার)। আর বাকি বর্ণনাকারীরা নির্ভরযোগ্য, তবে তাদের কারো কারো ব্যাপারে মতভেদ আছে!’
আমি (আল-আলবানী) বলি: আর এই মুহাম্মাদ ইবনু জা’ফারকে আমি আল-উকাইলীর ‘আয-যু’আফা’ গ্রন্থে পাইনি (১)!
আর ‘আল-জারহ ওয়াত-তা’দীল’ গ্রন্থে (৩/২/১৮৯) রয়েছে:
‘মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আল-জা’ফারী, আর তিনি হলেন ইসমাঈল ইবনু জা’ফার ইবনু ইবরাহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আলী ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু জা’ফার ইবনু আবী তালিবের পুত্র। তিনি আদ-দারওয়ার্দী থেকে বর্ণনা করেছেন... আর তার থেকে আবূ যুর’আহ বর্ণনা করেছেন। আমি আমার পিতাকে তার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: সে মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত), তার ব্যাপারে সমালোচনা করা হয়।’
(১) হাদীসটি তাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ (৫৩৩৮) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন; আর তা থেকে স্পষ্ট হয় যে, হাইসামী কর্তৃক বর্ণনাকারীর নাম উল্লেখের ক্ষেত্রে বিকৃতি ঘটেছে, আর তা হলো (মূসা ইবনু জা’ফার...), আর এই ব্যক্তিই যার সম্পর্কে আল-উকাইলী বলেছেন: ‘তার হাদীসে আপত্তি আছে (ফি হাদীসিহি নাযার)’। (প্রকাশক)
আমি (আল-আলবানী) বলি: সুতরাং বাহ্যত প্রতীয়মান হয় যে, এই ব্যক্তিই সে, তাবারানীর নিকট তার দাদার দিকে সম্পর্কিত হয়ে এসেছে, কিন্তু আমি তাকে আল-উকাইলীর নিকট তার পিতার দিকে সম্পর্কিত অবস্থায় পাইনি! আল্লাহই ভালো জানেন।
আর ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উল্লেখ করা হয়েছে যে, আবূ নু’আইম আল-আসবাহানী বলেছেন:
‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।
আর ইবনু হিব্বান; তিনি তাকে ‘আস-সিকাত’ (নির্ভরযোগ্যদের) মধ্যে উল্লেখ করেছেন!
আর এই হাদীসটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে ‘সহীহাইন’ (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্য গ্রন্থে অনুরূপভাবে বর্ণিত হয়েছে; তবে তাতে এই বাক্যটি নেই: ‘তখন মহিলারা বলল...’ ইত্যাদি; সুতরাং এই অংশটি মুনকার।
আর হাদীসটির ব্যাখ্যা ‘ফাতহুল বারী’ গ্রন্থে দেখুন (১/১৮৫-১৮৭ এবং ৮/১০০-১০৩)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4972)


(أنفذوا بعث أسامة، لعن الله من تخلف عنه. وكرر ذلك) .
منكر

أخرجه أبو بكر أحمد بن عبد العزيز الجوهري في `كتاب السقيفة` قال: حدثنا حمد بن إسحاق بن صالح عن أحمد بن سيار عن سعيد بن كثير الأنصاري عن رجاله عن عبد الله بن عبد الرحمن:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرض موته أمر أسامة بن زيد بن حارثة على جيش فيه جلة المهاجرين والأنصار؛ منهم أبو بكر، وعمر، وأبو عبيدة بن الجراح، وعبد الرحمن بن عوف، وطلحة، والزبير، وأمره أن يغير على مؤتة (قلت: فساق الحديث فيه) . وقام أسامة فتجهز للخروج، فلما أفاق رسول الله صلى الله عليه وسلم سأل عن أسامة والبعث، فأخبر أنهم يتجهزون، فجعل يقول … فذكره.
فخرج أسامة واللواء على رأسه؛ والصحابة بين يديه … إلخ.
قلت: ساقه هكذا - إلا ما اختصرته أنا - عبد الحسين الشيعي في `مراجعاته`
(291 - 292) ، وسكت عليه كعادته؛ إلا أنه زعم أن الشهرستاني أرسله إرسال المسلمات في المقدمة الرابعة من كتاب `الملل والنحل`!
وكأنه - لبالغ جهله بالحديث - لا يعلم أن الشهرستاني ليس من علماء هذا الشأن أولاً، وأن إسناد الحديث الذي نقله عن الجوهري ضعيف لا يصح ثانياً!! وبيان هذا من وجوه:
الأول: أن عبد الله بن عبد الرحمن هذا؛ يغلب على الظن أنه عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي عمرة الأنصاري الذي روى له ابن جرير في `تاريخه` (3/ 218 - 222) قطعة كبيرة من قصة بيعة السقيفة، ولم أجد من ذكره غير ابن أبي حاتم (2/ 2/ 96) . وقال:
`روى عن جده أبي عمرة. روى عنه المسعودي`.
ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً!
الثاني: رجال سعيد بن كثير الأنصاري؛ مبهمون لا يعرفون.
الثالث: حمد بن إسحاق بن صالح؛ لم أجده.
الرابع: أحمد بن عبد العزيز الجوهري: هو من رجال الشيعة المجهولين، أورده الطوسي في `الفهرست` (36/ 100) . وقال:
`له كتاب السقيفة`.
ولم يزد على ذلك شيئاً، فدل على أنه غير معروف لديهم؛ فضلاً عن غيرهم من أهل السنة؛ فقد قال في `المقدمة` (ص 2) :
`.. فإذا ذكرت كل واحد من المصنفين وأصحاب الأصول؛ فلا بد من أن أشير إلى ما قيل فيه من التعديل والتجريح، وهل يعول على روايته أم لا؟ … `.
قلت: ومن هذا تعلم جهل عبد الحسين الشيعي حتى برجال مذهبه! فيحتج بحديث الجوهري هذا؛ وهو غير معروف عندهم، فضلاً عمن فوقه ممن لا يعرفون أيضاً!
ومن الترجمة السابقة؛ تعلم أن كتاب `السقيفة` هو من كتب الشيعة التي لا يعتمد عليها عندنا. وقد علق عليه السيد محمد صادق آل بحر العلوم بقوله:
`ينقل عن كتاب `السقيفة` هذا كثيراً: ابن أبي الحديد المعتزلي في `شرح نهج البلاغة`؛ مع نسبته لأبي بكر أحمد بن عبد العزيز الجوهري؛ فراجع`.
قلت: وعن ابن أبي الحديد الشيعي؛ نقله عبد الحسين؛ كما صرح بذلك عقب الحديث، مع تدليسه على القراء وإيهامه إياهم أن مؤلف `السقيفة` هو من أهل السنة! كما يظهر ذلك لمن أمعن النظر في المراجعة (91) ، وجوابه عليها في المراجعة التي بعدها!
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(উসামার অভিযানকে কার্যকর করো। যে ব্যক্তি তা থেকে পিছিয়ে থাকবে, তার উপর আল্লাহর লা'নত। তিনি এই কথাটি বারবার বললেন।)
মুনকার

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ বকর আহমাদ ইবনু আব্দুল আযীয আল-জাওহারী তাঁর ‘কিতাবুস সাকীফাহ’ গ্রন্থে। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হামদ ইবনু ইসহাক ইবনু সালিহ, তিনি আহমাদ ইবনু সায়্যার থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু কাছীর আল-আনসারী থেকে, তিনি তাঁর বর্ণনাকারীদের থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান থেকে:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর মৃত্যুশয্যার অসুস্থতার সময় উসামা ইবনু যায়িদ ইবনু হারিসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এমন এক বাহিনীর সেনাপতি নিযুক্ত করেন, যাতে মুহাজির ও আনসারদের মধ্যেকার গণ্যমান্য ব্যক্তিবর্গ ছিলেন; তাঁদের মধ্যে ছিলেন আবূ বকর, উমার, আবূ উবাইদাহ ইবনুল জাররাহ, আব্দুর রহমান ইবনু আওফ, তালহা এবং যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি তাঁকে মু'তার উপর আক্রমণ করার নির্দেশ দেন। (আমি (আলবানী) বললাম: অতঃপর তিনি তাতে হাদীসটি বর্ণনা করেন)। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং বের হওয়ার জন্য প্রস্তুতি নিলেন। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছুটা সুস্থ হলেন, তখন তিনি উসামা ও বাহিনী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তাঁকে জানানো হলো যে, তারা প্রস্তুতি নিচ্ছেন। অতঃপর তিনি বলতে শুরু করলেন... অতঃপর তিনি তা (উপরের মাতন) উল্লেখ করলেন।
অতঃপর উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বের হলেন, আর পতাকা তাঁর মাথার উপর ছিল; এবং সাহাবীগণ তাঁর সামনে ছিলেন... ইত্যাদি।

আমি (আলবানী) বললাম: আমি যা সংক্ষিপ্ত করেছি তা ব্যতীত, আব্দুল হুসাইন আশ-শি'ঈ তার ‘মুরাজা'আত’ (২৯১-২৯২) গ্রন্থে এভাবে বর্ণনা করেছেন এবং তার অভ্যাস অনুযায়ী এ বিষয়ে নীরবতা পালন করেছেন; তবে তিনি দাবি করেছেন যে, শাহরাস্তানী তাঁর ‘আল-মিলাল ওয়ান-নিহাল’ কিতাবের চতুর্থ ভূমিকায় এটিকে (হাদীসটিকে) স্বতঃসিদ্ধ বিষয় হিসেবে উল্লেখ করেছেন!
আর সম্ভবত সে - হাদীস সম্পর্কে তার চরম অজ্ঞতার কারণে - জানে না যে, প্রথমত, শাহরাস্তানী এই শাস্ত্রের আলেমদের অন্তর্ভুক্ত নন, এবং দ্বিতীয়ত, জাওহারী থেকে সে যে হাদীসের সনদটি নকল করেছে, তা যঈফ (দুর্বল) এবং সহীহ নয়!! এর ব্যাখ্যা কয়েকটি দিক থেকে দেওয়া হলো:

প্রথমত: এই আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান সম্ভবত আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী আমরাহ আল-আনসারী, যার থেকে ইবনু জারীর তাঁর ‘তারীখ’ (৩/২১৮-২২২) গ্রন্থে সাকীফার বাই'আতের ঘটনার একটি বড় অংশ বর্ণনা করেছেন। ইবনু আবী হাতিম (২/২/৯৬) ব্যতীত আর কেউ তাঁর উল্লেখ করেছেন বলে আমি পাইনি। তিনি (ইবনু আবী হাতিম) বলেছেন: ‘তিনি তাঁর দাদা আবূ আমরাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। তাঁর থেকে মাসঊদী বর্ণনা করেছেন।’ তিনি তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (প্রশংসা) উল্লেখ করেননি!

দ্বিতীয়ত: সাঈদ ইবনু কাছীর আল-আনসারীর বর্ণনাকারীরা (রিজাল) অজ্ঞাত (মুভহামূন) এবং অপরিচিত।

তৃতীয়ত: হামদ ইবনু ইসহাক ইবনু সালিহ; আমি তাঁকে পাইনি।

চতুর্থত: আহমাদ ইবনু আব্দুল আযীয আল-জাওহারী: তিনি শিয়াদের অজ্ঞাত বর্ণনাকারীদের (রিজাল) অন্তর্ভুক্ত। তূসী তাঁকে ‘আল-ফিহরিস্ত’ (৩৬/১০০) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। এবং বলেছেন: ‘তাঁর ‘কিতাবুস সাকীফাহ’ নামে একটি গ্রন্থ রয়েছে।’ তিনি এর চেয়ে বেশি কিছু যোগ করেননি। এটি প্রমাণ করে যে, সুন্নাহপন্থীদের কথা তো বাদই দিলাম, এমনকি তাদের (শিয়াদের) নিকটও তিনি অপরিচিত; কারণ তিনি (তূসী) ‘ভূমিকা’ (পৃষ্ঠা ২)-তে বলেছেন: ‘...যখন আমি সংকলক ও মূলনীতিবিদদের প্রত্যেককে উল্লেখ করব; তখন তাদের সম্পর্কে তা'দীল (প্রশংসা) ও তাজরীহ (দোষারোপ) কী বলা হয়েছে, এবং তাদের বর্ণনা নির্ভরযোগ্য কি না, তা উল্লেখ করা অপরিহার্য...।’

আমি (আলবানী) বললাম: এর থেকে তুমি আব্দুল হুসাইন আশ-শি'ঈর অজ্ঞতা সম্পর্কে জানতে পারবে, এমনকি তার নিজ মাযহাবের বর্ণনাকারীদের (রিজাল) সম্পর্কেও! সে এই জাওহারীর হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করে; অথচ সে তাদের (শিয়াদের) নিকটও অপরিচিত, আর তার উপরের বর্ণনাকারীরাও অপরিচিত, তাদের কথা তো বাদই দিলাম!

আর পূর্বের জীবনী থেকে তুমি জানতে পারবে যে, ‘কিতাবুস সাকীফাহ’ আমাদের নিকট নির্ভরযোগ্য নয় এমন শিয়াদের গ্রন্থসমূহের অন্তর্ভুক্ত। সাইয়্যিদ মুহাম্মাদ সাদিক আল বাহরুল উলূম এই বিষয়ে মন্তব্য করে বলেছেন: ‘এই ‘কিতাবুস সাকীফাহ’ থেকে ইবনু আবী আল-হাদীদ আল-মু'তাযিলী তাঁর ‘শারহু নাহজিল বালাগাহ’ গ্রন্থে আবূ বকর আহমাদ ইবনু আব্দুল আযীয আল-জাওহারীর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করে প্রচুর উদ্ধৃতি দিয়েছেন; সুতরাং তুমি তা দেখে নাও।’

আমি (আলবানী) বললাম: আর আব্দুল হুসাইন এটি ইবনু আবী আল-হাদীদ আশ-শি'ঈ থেকে নকল করেছেন; যেমনটি তিনি হাদীসটির শেষে স্পষ্ট করেছেন, তবে পাঠকদের উপর তাদলীস (ধোঁকা) করেছেন এবং তাদের এই ধারণা দিয়েছেন যে, ‘সাকীফাহ’ গ্রন্থের লেখক আহলুস সুন্নাহর অন্তর্ভুক্ত! যেমনটি ৯১ নং ‘মুরাজা'আহ’ এবং এর পরের ‘মুরাজা'আহ’-তে তার জবাবের প্রতি গভীরভাবে দৃষ্টি দিলে স্পষ্ট হয়ে যায়!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4973)


(إنه لا يحل المسجد لجنب ولا حائض؛ إلا لمحمد صلى الله عليه وسلم وأزواجه، وعلي وفاطمة بنت محمد صلى الله عليه وسلم. ألا! هل بينت لكم الأسماء أن تضلوا) (1) .
موضوع

أخرجه ابن عساكر في `التاريخ` (12/ 3/ 2) من طريق عبد الملك ابن أبي غنية عن أبي الخطاب عمر الهجري عن محدوج عن جسرة بنت دجاجة قالت: أخبرتني أم سلمة قالت:
خرج النبي صلى الله عليه وسلم من بيته، حتى انتهى إلى صرح المسجد؛ فنادى بأعلى صوته … فذكره.
(1) كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن: ` كرر برقم (2685) `. (الناشر)
قلت: وهذا إسناد مظلم؛ أبو الخطاب مجهول، وقد مضى (1) .
ومثله محدوج؛ وهو الباهلي.
وجسرة مختلف فيها، وقد قال البخاري:
`عندها عجائب`.
ولم يوثقها من يوثق بتوثيقه.
وقد روي الحديث من طريق أخرى عنها عن عائشة، وهو أقوى من هذا، وقد أوردته في `ضعيف أبي داود` (32) ؛ من أجل جسرة هذه.
والحديث؛ رواه ابن أبي حاتم في `العلل` (1/ 99/ 269) من هذا الوجه دون قوله:
`ألا هل بينت … `.
وكذلك رواه ابن ماجه (645) ؛ إلا أنه لم يذكر الاستثناء مطلقاً، وكأنه تعمد حذفها؛ لما فيها من النكارة.
ولذلك قال ابن القيم رحمه الله تعالى:
`فهذا الاستثناء باطل موضوع؛ من زيادة بعض غلاة الشيعة، ولم يخرجه ابن ماجه في الحديث`.
راجع كتابي المشار إليه آنفاً.
وخالف ابن أبي غنية في إسناده منصور بن [أبي] الأسود؛ فقال: عن عمر ابن عمير الهجري عن عروة بن فيروز عن جسرة به.
(1) في ` الإرواء ` (1/211) . (الناشر)

أخرجه ابن عساكر أيضاً.
ومنصور هذا؛ شيعي ثقة.
أما عروة بن فيروز؛ فلم أجد أحداً ذكره!
ولعل رواية الهجري عنه مما يدل على عدم ضبطه واضطرابه في إسناده - أي: الهجري - : فتارة يرويه عن محدوج، وتارة عن ابن فيروز. والله أعلم.
ونحو هذا الحديث: ما روى الحسن بن زيد عن خارجة بن سعد عن أبيه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعلي:
`لا يحل لأحد أن يجنب في هذا المسجد غيري وغيرك`.

أخرجه البزار (ص 268 - زوائد) (1) . وقال:
`لا نعلمه يروى إلا بهذا الإسناد`.
قلت: وهو ضعيف ومنقطع؛ لأن خارجة بن سعد: هو خارجة بن عبد الله بن سعد بن أبي وقاص، فيما ظهر لي؛ فقد أورده ابن أبي حاتم في `الجرح والتعديل` (1/ 2/ 375) ، وقال:
`روى عن أبيه. روى عنه يونس بن حمران`.
قلت: ولم يزد على ذلك؛ فهو مجهول الحال.
ثم ترجم لأبيه عبد الله بن سعد بن أبي وقاص (2/ 2/ 63 - 64) ؛ وأفاد أنه أخو مصعب، وعمر، ويحيى، وإبراهيم، وعمرو؛ بني سعد. وقال:
`روى عن أبي أيوب. روى [عنه ابنه] خارجة بن عبد الله`. ولم يزد!
(1) وهو في ` مسنده ` برقم (2557) . (الناشر)
قلت: وعلى ذلك؛ فالحديث - على جهالة خارجة وأبيه عبد الله - ؛ فهو مرسل.
ثم إن الحسن بن زيد - وهو العلوي أبو محمد المدني والد الست نفيسة - فيه ضعف من قبل حفظه؛ قال الحافظ:
`صدوق يهم، وكان فاضلاً`.
وأما قول الهيثمي في `المجمع` (9/ 115) :
`رواه البزار، وخارجة لم أعرفه، وبقية رجاله ثقات`!
فأقول: فيه ما لا يخفى من التقصير والتساهل؛ إذا تذكرت ما تقدم من التحقيق.
والحديث؛ أخرجه الترمذي (3729) من حديث عطية عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً نحوه مختصراً.
وعطية: هو ابن سعد العوفي، وهو ضعيف مدلس، كما سبق مراراً.
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(নিশ্চয়ই জুনুবী (যার গোসল ফরয হয়েছে) এবং হায়েযগ্রস্ত নারীর জন্য মসজিদে প্রবেশ হালাল নয়; তবে মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর স্ত্রীগণ, এবং আলী ও মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা ফাতিমার জন্য হালাল। সাবধান! আমি কি তোমাদের জন্য নামগুলো স্পষ্ট করে দেইনি, যাতে তোমরা পথভ্রষ্ট না হও?) (১)।
মাওদ্বূ

ইবনু আসাকির এটি তাঁর ‘আত-তারীখ’ (১২/৩/২)-এ আব্দুল মালিক ইবনু আবী গুনইয়াহ্ হতে, তিনি আবুল খাত্তাব উমার আল-হিজরী হতে, তিনি মাহদূজ হতে, তিনি জাসরাহ বিনত দাজাজাহ্ হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি (জাসরাহ) বলেন: উম্মু সালামাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে জানিয়েছেন, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর ঘর থেকে বের হলেন, এমনকি মসজিদের চত্বর পর্যন্ত পৌঁছলেন; অতঃপর উচ্চস্বরে ডাক দিলেন... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।
(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনের উপরে লিখেছেন: ‘এটি ২৬৮৫ নম্বর দ্বারা পুনরাবৃত্তি করা হয়েছে।’ (প্রকাশক)
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন (মাজলুম); আবুল খাত্তাব মাজহূল (অজ্ঞাত), যা পূর্বে গত হয়েছে (১)।
আর অনুরূপ মাহদূজও; আর তিনি হলেন আল-বাহিলী।
আর জাসরাহ্ সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে। ইমাম বুখারী বলেছেন:
‘তার নিকট অদ্ভুত বিষয়াদি রয়েছে।’
আর যার তাউসীক (নির্ভরযোগ্যতা প্রদান) নির্ভরযোগ্য, তিনি তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি।
আর হাদীসটি অন্য সূত্রে তার (জাসরাহ্) হতে আয়িশাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত হয়েছে, যা এর চেয়ে শক্তিশালী। আর আমি এই জাসরাহ্-এর কারণে এটিকে ‘যঈফ আবী দাঊদ’ (৩২)-এ উল্লেখ করেছি।
আর হাদীসটি ইবনু আবী হাতিম ‘আল-ইলাল’ (১/৯৯/২৬৯)-এ এই সূত্রেই বর্ণনা করেছেন, তবে এই উক্তিটি ছাড়া:
‘সাবধান! আমি কি স্পষ্ট করে দেইনি...’।
অনুরূপভাবে ইবনু মাজাহ্ (৬৪৫)-ও বর্ণনা করেছেন; তবে তিনি ব্যতিক্রম অংশটি (ইস্তিসনা) একেবারেই উল্লেখ করেননি। মনে হয় যেন তিনি এর মধ্যে মুনকার (অস্বীকৃত) কিছু থাকার কারণে ইচ্ছাকৃতভাবে তা বাদ দিয়েছেন।
আর একারণেই ইবনুল কায়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘এই ব্যতিক্রম অংশটি বাতিল ও মাওদ্বূ (জাল); যা কিছু চরমপন্থী শী‘আদের সংযোজন। আর ইবনু মাজাহ্ হাদীসটিতে এটি বর্ণনা করেননি।’
আমার পূর্বে উল্লেখিত কিতাবটি দেখুন।
আর ইবনু আবী গুনইয়াহ্-এর সনদে মানসূর ইবনু [আবী] আল-আসওয়াদ ভিন্নমত পোষণ করেছেন; তিনি বলেছেন: উমার ইবনু উমাইর আল-হিজরী হতে, তিনি উরওয়াহ্ ইবনু ফাইরূয হতে, তিনি জাসরাহ্ হতে এটি বর্ণনা করেছেন।
(১) ‘আল-ইরওয়া’ (১/২১১)-তে। (প্রকাশক)

ইবনু আসাকিরও এটি বর্ণনা করেছেন।
আর এই মানসূর হলেন শী‘আ, তবে নির্ভরযোগ্য।
কিন্তু উরওয়াহ্ ইবনু ফাইরূয; আমি এমন কাউকে পাইনি যিনি তার উল্লেখ করেছেন!
আর সম্ভবত আল-হিজরী কর্তৃক তার থেকে বর্ণনা করাটা তার (আল-হিজরীর) দুর্বল স্মৃতিশক্তি এবং সনদে তার অস্থিরতা প্রমাণ করে—অর্থাৎ আল-হিজরী—: কেননা তিনি কখনও মাহদূজ হতে বর্ণনা করেন, আবার কখনও ইবনু ফাইরূয হতে। আল্লাহ্ই ভালো জানেন।
আর এই হাদীসের অনুরূপ হলো: যা হাসান ইবনু যায়দ বর্ণনা করেছেন খারিজাহ্ ইবনু সা‘দ হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন:
‘এই মসজিদে আমার এবং তোমার ব্যতীত অন্য কারো জন্য জুনুবী (অপবিত্র) অবস্থায় থাকা হালাল নয়।’

আল-বাযযার এটি বর্ণনা করেছেন (পৃ. ২৬৮ - যাওয়াইদ) (১)। আর তিনি বলেছেন:
‘আমরা জানি না যে, এটি এই সনদ ব্যতীত অন্য কোনো সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।’
আমি (আলবানী) বলি: আর এটি যঈফ (দুর্বল) ও মুনকাতি‘ (বিচ্ছিন্ন); কারণ খারিজাহ্ ইবনু সা‘দ হলেন: খারিজাহ্ ইবনু আব্দুল্লাহ্ ইবনু সা‘দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস, যা আমার নিকট স্পষ্ট হয়েছে; কেননা ইবনু আবী হাতিম তাকে ‘আল-জারহ ওয়াত-তা‘দীল’ (১/২/৩৭৫)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘তিনি তার পিতা হতে বর্ণনা করেছেন। তার থেকে ইউনুস ইবনু হুমরান বর্ণনা করেছেন।’
আমি বলি: তিনি এর চেয়ে বেশি কিছু বলেননি; সুতরাং তিনি মাজহূলুল হাল (যার অবস্থা অজ্ঞাত)।
অতঃপর তিনি তার পিতা আব্দুল্লাহ্ ইবনু সা‘দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (২/২/৬৩-৬৪)-এর জীবনী উল্লেখ করেছেন; এবং জানিয়েছেন যে, তিনি মুস‘আব, উমার, ইয়াহ্ইয়া, ইবরাহীম ও আমর—সা‘দ-এর পুত্রদের ভাই। আর তিনি বলেছেন:
‘তিনি আবূ আইয়ূব হতে বর্ণনা করেছেন। তার থেকে [তার পুত্র] খারিজাহ্ ইবনু আব্দুল্লাহ্ বর্ণনা করেছেন।’ আর তিনি এর চেয়ে বেশি কিছু বলেননি!
(১) আর এটি তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে ২৫৫৭ নম্বর দ্বারা রয়েছে। (প্রকাশক)
আমি বলি: আর এর ভিত্তিতে, খারিজাহ্ এবং তার পিতা আব্দুল্লাহ্ উভয়ের মাজহূল হওয়া সত্ত্বেও—হাদীসটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)।
অতঃপর হাসান ইবনু যায়দ—আর তিনি হলেন আল-আলাবী আবূ মুহাম্মাদ আল-মাদানী, সিত্তুন নাফীসাহ্-এর পিতা—তার স্মৃতিশক্তির দিক থেকে দুর্বলতা রয়েছে; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন, আর তিনি ছিলেন একজন ফাযিল (গুণী ব্যক্তি)।’
আর ‘আল-মাজমা’ (৯/১১৫)-এ হাইসামী-এর এই উক্তি সম্পর্কে:
‘আল-বাযযার এটি বর্ণনা করেছেন, আর খারিজাহ্-কে আমি চিনি না, তবে এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য’!
আমি বলি: পূর্বের তাহকীক (গবেষণা) স্মরণ করলে এতে যে ত্রুটি ও শৈথিল্য রয়েছে, তা গোপন থাকে না।
আর হাদীসটি; তিরমিযী (৩৭২৯) আতিয়্যাহ্ হতে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে এর অনুরূপ সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন।
আর আতিয়্যাহ্ হলেন: ইবনু সা‘দ আল-আওফী, আর তিনি যঈফ (দুর্বল) ও মুদাল্লিস, যেমনটি পূর্বে বহুবার বলা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4974)


(لما نزلت: (قل لا أسألكم عليه أجراً إلا المودة في القربى) ؛ قالوا: يا رسول الله! ومن قرابتك هؤلاء الذين وجبت علينا مودتهم؟ قال: علي، وفاطمة، وابناهما) .
باطل

أخرجه الطبراني (1/ 124/ 2) ، والقطيعي في زياداته على `الفضائل` (2/ 669) عن حرب بن حسن الطحان: أخبرنا حسين الأشقر عن قيس بن الربيع عن الأعمش عن سعيد بن جبير عن ابن عباس رضي الله عنهما قال … فذكره.
قلت: وهذا إسناد مظلم، مسلسل بالعلل:
الأولى: قيس بن الربيع ضعيف؛ لسوء حفظه.
الثانية: حسين الأشقر؛ قال الحافظ:
`صدوق يهم؛ ويلغو في التشيع`.
الثالثة: حرب بن حسن الطحان؛ قال في `الميزان`:
`ليس حديثه بذاك. قاله الأزدي`.
وأما ابن حبان؛ فذكره في `الثقات`؛ كما في `اللسان`!
قلت: فأحد هؤلاء الثلاثة هو العلة؛ فإن الحديث منكر ظاهر النكارة؛ بل هو باطل، وذلك من وجهين:
الأول: أن الثابت عن ابن عباس في تفسير الآية خلاف هذا، بل صح عنه إنكاره على سعيد بن جبير ذلك؛ فقد روى شعبة: أنبأني عبد الملك قال: سمعت طاوساً يقول:
سأل رجل ابن عباس - المعنى - عن قوله عز وجل: (قل لا أسألكم عليه أجراً إلا المودة في القربى) ، فقال سعيد بن جبير: قرابة محمد صلى الله عليه وسلم. قال ابن عباس: عجلت؛ إن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يكن بطن من قريش إلا لرسول الله صلى الله عليه وسلم فيهم قرابة، فنزلت: (قل لا أسألكم عليه أجراً إلا المودة في القربى) :
`إلا أن تصلوا قرابة ما بيني وبينكم`.

أخرجه البخاري (6/ 386 و 8/ 433) ، وأحمد (1/ 229،286) ، والطبري في `تفسيره` (25/ 15) .
وأخرجه الحاكم (2/ 444) من طريقين آخرين عن ابن عباس نحوه، وأحدهما عند الطبري. وقال الحاكم في أحدهما:
`صحيح على شرط البخاري`. وفي الآخر:
`صحيح على شرط مسلم`. ووافقه الذهبي.
والآخر: أن الآية مكية؛ كما جزم بذلك غير واحد من الحفاظ، كابن كثير وابن حجر وغيرهما.
فكيف يأمر الله بمودة أبناء علي وفاطمة وهما لم يتزوجا بعد؟! ولهذا قال الحافظ في `الفتح` (8/ 433) - بعد أن ساق حديث الترجمة - :
`وإسناده واه، فيه ضعيف ورافضي. وهو ساقط لمخالفته هذا الحديث الصحيح، وذكر الزمخشري هنا أحاديث ظاهر وضعها. ورده الزجاج بما صح عن ابن عباس من رواية طاوس في حديث الباب، وبما نقله الشعبي عنه؛ وهو المعتمد … ويؤيد ذلك أن السورة مكية`.
والحديث؛ أورده الهيثمي في `المجمع` (9/ 168) . وقال:
`رواه الطبراني، وفيه جماعة ضعفاء، وقد وثقوا`.
قلت: وذكره ابن كثير في `تفسيره` (7/ 365) من رواية ابن أبي حاتم: حدثنا علي بن الحسين: حدثنا رجل - سماه - : حدثنا حسين الأشقر … فذكره نحو ما تقدم من رواية الطبراني. ثم قال ابن كثير:
`وهذا إسناد ضعيف؛ فيه مبهم لا يعرف (قلت: قد عرف من رواية الطبراني كما تقدم) عن شيخ شيعي محترق، وهو حسين الأشقر، ولا يقبل خبره في هذا المحل، وذكر نزول الآية بعيد؛ فإنها مكية، ولم يكن إذ ذاك لفاطمة رضي الله عنها أولاد بالكلية؛ فإنها لم تتزوج بعلي رضي الله عنه إلا بعد بدر من السنة الثانية من الهجرة.
والحق: تفسير هذه الآية بما فسرها به حبر الأمة، وترجمان القرآن عبد الله بن عباس رضي الله عنهما؛ كما رواه عنه البخاري؛ ولا ننكر الوصاة بأهل البيت، والأمر بالإحسان إليهم واحترامهم وإكرامهم؛ فإنهم من ذرية طاهرة، من أشرف بيت وجد على وجه الأرض فخراً وحسباً ونسباً؛ ولا سيما إذا كانوا متبعين للسنة النبوية الصحيحة الواضحة الجلية، كما كان عليه سلفهم؛ كالعباس وبنيه، وعلي وأهل بيته وذريته، رضي الله عنهم أجمعين`.
(تنبيهان) :
الأول: عزا حديث الترجمة ابن حجر الهيتمي في `الصواعق` (ص 101) لأحمد أيضاً والحاكم!
وهذا وهم فاحش؛ فإنما أخرج أحمد والحاكم عن ابن عباس ما يبطله؛ كما سبق بيانه.
والآخر: أن عبد الحسين الشيعي - في كتابه `المراجعات` (ص 33) - فسر الآية المذكورة بما دل عليه هذا الحديث الباطل؛ غير ملتفت إلى أن الآية مكية، وأن ابن عباس فسرها على نقيضه!
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(যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: (বলো, আমি এর বিনিময়ে তোমাদের কাছে কোনো পারিশ্রমিক চাই না, তবে আত্মীয়তার বন্ধন হিসেবে ভালোবাসা চাই) [সূরা শুরা: ২৩]; তখন তারা বললো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনার সেই আত্মীয় কারা, যাদের প্রতি ভালোবাসা আমাদের উপর ওয়াজিব? তিনি বললেন: আলী, ফাতিমা এবং তাদের দুই পুত্র।)
বাতিল

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী (১/১২২/২), এবং আল-ক্বাত্বীঈ তাঁর ‘আল-ফাযায়েল’ গ্রন্থের অতিরিক্ত অংশে (২/৬৬৯) হারব ইবনু হাসান আত-ত্বাহহান থেকে, তিনি বলেন: আমাদেরকে খবর দিয়েছেন হুসাইন আল-আশ্‌ক্বার, তিনি ক্বায়স ইবনু আর-রাবী’ থেকে, তিনি আল-আ’মাশ থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি বলেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন (মুষলিম), যা ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত (ইল্লত দ্বারা পরিপূর্ণ):

প্রথমত: ক্বায়স ইবনু আর-রাবী’ যঈফ (দুর্বল); তার দুর্বল মুখস্থশক্তির কারণে।

দ্বিতীয়ত: হুসাইন আল-আশ্‌ক্বার; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন; এবং শিয়া মতবাদে বাড়াবাড়ি করেন।’

তৃতীয়ত: হারব ইবনু হাসান আত-ত্বাহহান; ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলা হয়েছে:
‘তার হাদীস তেমন শক্তিশালী নয়। এটি বলেছেন আল-আযদী।’
আর ইবনু হিব্বান; তিনি তাকে ‘আস-সিক্বাত’ (নির্ভরযোগ্যদের) মধ্যে উল্লেখ করেছেন; যেমনটি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে!

আমি বলি: এই তিনজনের মধ্যে একজনই হলো ত্রুটি (ইল্লত); কারণ হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত), যার মুনকার হওয়া সুস্পষ্ট; বরং এটি বাতিল (মিথ্যা), আর তা দুই দিক থেকে:

প্রথমত: এই আয়াতের তাফসীর সম্পর্কে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা প্রমাণিত, তা এর বিপরীত। বরং সাঈদ ইবনু জুবাইরের এই মতকে তিনি অস্বীকার করেছেন বলে সহীহ সূত্রে প্রমাণিত। শু’বাহ বর্ণনা করেছেন: আমাকে খবর দিয়েছেন আব্দুল মালিক, তিনি বলেন: আমি তাউসকে বলতে শুনেছি:
এক ব্যক্তি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে আল্লাহ তা’আলার বাণী: (বলো, আমি এর বিনিময়ে তোমাদের কাছে কোনো পারিশ্রমিক চাই না, তবে আত্মীয়তার বন্ধন হিসেবে ভালোবাসা চাই) এর অর্থ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলো। তখন সাঈদ ইবনু জুবাইর বললেন: (এর অর্থ) মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়-স্বজন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তুমি তাড়াহুড়ো করেছো; কুরাইশের এমন কোনো গোত্র ছিল না, যাদের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো আত্মীয়তা ছিল না। সুতরাং এই আয়াতটি নাযিল হয়েছে: (বলো, আমি এর বিনিময়ে তোমাদের কাছে কোনো পারিশ্রমিক চাই না, তবে আত্মীয়তার বন্ধন হিসেবে ভালোবাসা চাই) এই অর্থে:
‘তবে আমার ও তোমাদের মধ্যকার আত্মীয়তার বন্ধন তোমরা রক্ষা করবে।’

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (৬/৩৮৬ ও ৮/৪৩৩), আহমাদ (১/২২৯, ২৮৬), এবং ত্বাবারী তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (২৫/১৫)।
আর এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (২/৪৪৪) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ অন্য দুটি সূত্রে, যার একটি ত্বাবারীর নিকটও রয়েছে। হাকিম সেগুলোর একটি সম্পর্কে বলেছেন:
‘বুখারীর শর্তানুযায়ী সহীহ।’ আর অন্যটি সম্পর্কে বলেছেন:
‘মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।’ এবং যাহাবীও তার সাথে একমত পোষণ করেছেন।

আর দ্বিতীয়ত: এই আয়াতটি মাক্কী (মক্কায় নাযিলকৃত); যেমনটি ইবনু কাসীর, ইবনু হাজার এবং অন্যান্য হাফিযগণ নিশ্চিতভাবে বলেছেন। তাহলে আল্লাহ কিভাবে আলী ও ফাতিমার সন্তানদের প্রতি ভালোবাসার আদেশ দিতে পারেন, যখন তাদের বিবাহই হয়নি?!
এই কারণেই হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (৮/৪৩৩) – আলোচ্য হাদীসটি উল্লেখ করার পর – বলেছেন:
‘এর সনদ ওয়াহী (অত্যন্ত দুর্বল), এতে দুর্বল রাবী এবং একজন রাফিযী (শিয়া) রয়েছে। আর এটি বাতিল, কারণ এটি এই সহীহ হাদীসের বিরোধী। যামাখশারী এখানে এমন কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন, যা সুস্পষ্টভাবে মাওদ্বূ (জাল)। আর যুজ্জাজ তাউসের সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহভাবে যা বর্ণিত হয়েছে, এবং শা’বী তার থেকে যা বর্ণনা করেছেন, তার মাধ্যমে তা খণ্ডন করেছেন; আর এটিই নির্ভরযোগ্য... এবং এই মতকে সমর্থন করে যে, সূরাটি মাক্কী।’

আর এই হাদীসটি; হাইসামী ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৯/১৬৮) উল্লেখ করেছেন। এবং বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এতে দুর্বল রাবীদের একটি দল রয়েছে, যদিও তাদের কেউ কেউ নির্ভরযোগ্য বলে গণ্য হয়েছেন।’

আমি বলি: ইবনু কাসীর তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (৭/৩৬৫) ইবনু আবী হাতিমের সূত্রে এটি উল্লেখ করেছেন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আলী ইবনু আল-হুসাইন: আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন এক ব্যক্তি – যার নাম তিনি উল্লেখ করেছেন – : আমাদেরকে হাদীস বর্ণনা করেছেন হুসাইন আল-আশ্‌ক্বার... অতঃপর তিনি ত্বাবারানীর বর্ণনার অনুরূপ উল্লেখ করেছেন। এরপর ইবনু কাসীর বলেছেন:
‘এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); এতে একজন অজ্ঞাত (মুবহাম) রাবী রয়েছে, যাকে চেনা যায় না (আমি বলি: ত্বাবারানীর বর্ণনায় যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে, তাতে তাকে চেনা যায়), সে একজন চরম শিয়া শায়খ, আর তিনি হলেন হুসাইন আল-আশ্‌ক্বার, এবং এই স্থানে তার বর্ণনা গ্রহণযোগ্য নয়। আর আয়াতটি নাযিলের এই কারণ উল্লেখ করা সুদূরপরাহত; কারণ এটি মাক্কী (মক্কায় নাযিলকৃত), আর তখন ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কোনো সন্তানই ছিল না; কারণ তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হিজরতের দ্বিতীয় বছরে বদরের যুদ্ধের পরে বিবাহ করেছিলেন।

আর সত্য হলো: এই আয়াতের তাফসীর তাই, যা উম্মাহর মহাজ্ঞানী এবং কুরআনের অনুবাদক আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাফসীর করেছেন; যেমনটি বুখারী তার থেকে বর্ণনা করেছেন। আর আমরা আহলে বাইতের (নবী পরিবারের) প্রতি অসীয়ত, তাদের প্রতি ইহসান করার আদেশ, তাদের সম্মান ও মর্যাদা দেওয়ার বিষয়কে অস্বীকার করি না; কারণ তারা পবিত্র বংশধর, যারা পৃথিবীতে পাওয়া যায় এমন বংশমর্যাদা, আভিজাত্য ও বংশের দিক থেকে সর্বশ্রেষ্ঠ ঘর থেকে এসেছেন; বিশেষত যদি তারা সুস্পষ্ট সহীহ নবুওয়াতী সুন্নাহর অনুসারী হন, যেমনটি তাদের পূর্বসূরিগণ ছিলেন; যেমন আল-আব্বাস ও তার সন্তানেরা, এবং আলী ও তার পরিবার ও বংশধরগণ, আল্লাহ তাদের সকলের উপর সন্তুষ্ট হোন।

(দুটি সতর্কতা):
প্রথমত: ইবনু হাজার আল-হাইতামী ‘আস-সাওয়াইক্ব’ গ্রন্থে (পৃ. ১০১) আলোচ্য হাদীসটিকে আহমাদ ও হাকিমের দিকেও সম্পর্কিত করেছেন!
এটি একটি মারাত্মক ভুল; কারণ আহমাদ ও হাকিম তো ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এমন বর্ণনা করেছেন যা এই হাদীসটিকে বাতিল করে দেয়; যেমনটি পূর্বে ব্যাখ্যা করা হয়েছে।

আর দ্বিতীয়ত: আব্দুল হুসাইন আশ-শিয়ায়ী – তার ‘আল-মুরাজা’আত’ গ্রন্থে (পৃ. ৩৩) – এই বাতিল হাদীস দ্বারা যা নির্দেশিত হয়, সেই অনুযায়ী উল্লিখিত আয়াতের তাফসীর করেছেন; এই দিকে মনোযোগ না দিয়ে যে, আয়াতটি মাক্কী এবং ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর বিপরীত তাফসীর করেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4975)


(يا أيها الناس! إن الله أمر موسى وهارون أن يتبوأ لقومهما بيوتاً، وأمرهما أن لا يبيت في مسجدهما جنب، ولا يقربوا فيه النساء؛ إلا هارون وذريته. ولا يحل لأحد أن يعرن (1) النساء في مسجدي هذا؛ ولا يبيت فيه جنب؛ إلا علي وذريته) .
موضوع

أخرجه ابن عساكر (12/ 93/ 2) عن محمد بن عبيد الله بن أبي رافع
(1) كذا؛ ولعلها: ` يعرك `. (الناشر)
عن أبيه وعمه عن أبيهما أبي رافع:
أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب الناس فقال … فذكره.
قلت: وهذا موضوع؛ آفته محمد بن عبيد الله، وقد مضى له عدة أحاديث فانظر مثلاً: (1546،1754،4882،4887) .
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(হে লোক সকল! নিশ্চয় আল্লাহ মূসা ও হারূনকে আদেশ করেছিলেন যে, তারা যেন তাদের কওমের জন্য ঘর তৈরি করে। আর তাদের উভয়কে আদেশ করেছিলেন যে, তাদের মসজিদে যেন কোনো জুনুব (বড় নাপাক ব্যক্তি) রাত যাপন না করে এবং তাতে যেন তারা নারীদের নিকটবর্তী না হয়; তবে হারূন ও তাঁর বংশধরগণ ব্যতীত। আর আমার এই মসজিদে কারো জন্য নারীদের [১] সাথে [يعرن] করা বৈধ নয়; আর তাতে যেন কোনো জুনুব রাত যাপন না করে; তবে আলী ও তাঁর বংশধরগণ ব্যতীত।)
মাওদ্বূ (বানোয়াট)

এটি ইবনু আসাকির (১২/৯৩/২) মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদিল্লাহ ইবনু আবী রাফি’ থেকে বর্ণনা করেছেন।
(১) এমনই আছে; সম্ভবত এটি হবে: ‘يَعْرُك’ (ইয়া’রুক)। (প্রকাশক)
তিনি তাঁর পিতা ও চাচা থেকে, তারা উভয়ে তাদের পিতা আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন:
যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম লোকজনের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং বললেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (বানোয়াট)। এর ত্রুটি হলো মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদিল্লাহ। তার থেকে ইতোপূর্বে বেশ কয়েকটি হাদীস অতিবাহিত হয়েছে। উদাহরণস্বরূপ দেখুন: (১৫৪৬, ১৭৫৪, ৪৮৮২, ৪৮৮৭)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4976)


(أيها الناس! أما تستحون؟! تجمعون ما لا تأكلون، وتأملون ما لا تدركون، وتبنون ما لا تعمرون!) .
ضعيف جداً

أخرجه ابن أبي الدنيا في `قصر الأمل` (ق 47/ 1) من طريق علي بن ثابت عن الوازع بن نافع عن سالم بن عبد الله بن عمر عن أم المنذر (1) قالت:
اطلع رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات عشية إلى الناس، فقال … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً؛ آفته الوازع بن نافع؛ ضعيف جداً؛ قال البخاري:
`منكر الحديث`. وقال النسائي:
`متروك`.
والحديث؛ أورده المنذري في `الترغيب` (4/ 131) مشيراً إلى ضعفه من رواية الطبراني. وقال الهيثمي (10/ 284) :
`وفيه الوازع بن نافع؛ وهو متروك`.
(1) في طريق الطبراني التي سيشير إليها الشيخ - بعدُ - تسميتها: (أم الوليد) . وانظر ` معجم الطبراني ` (25/172/421) ، و ` ضعيف الترغيب ` (1953) . (الناشر)
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(হে লোক সকল! তোমরা কি লজ্জা পাও না?! তোমরা এমন কিছু জমা করো যা তোমরা খাও না, আর এমন কিছুর আশা করো যা তোমরা লাভ করো না, আর এমন কিছু নির্মাণ করো যা তোমরা আবাদ করো না!)।
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)

এটি ইবনু আবিদ দুনিয়া তাঁর ‘কাসরুল আমাল’ (ق ৪৭/ ১) গ্রন্থে আলী ইবনু ছাবিত সূত্রে, তিনি আল-ওয়াযি' ইবনু নাফি' সূত্রে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার সূত্রে, তিনি উম্মুল মুনযির (১) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন:
এক সন্ধ্যায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকজনের দিকে তাকালেন এবং বললেন... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল); এর ত্রুটি হলো আল-ওয়াযি' ইবনু নাফি'; সে যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল); ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘মুনকারুল হাদীস’ (অগ্রহণযোগ্য হাদীস বর্ণনাকারী)। আর ইমাম নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।

আর হাদীসটি; মুনযিরী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আত-তারগীব’ (৪/ ১৩১) গ্রন্থে ত্বাবারানীর বর্ণনা থেকে এর দুর্বলতার প্রতি ইঙ্গিত করে উল্লেখ করেছেন। আর হাইছামী (রাহিমাহুল্লাহ) (১০/ ২৮৪) বলেন: ‘এর মধ্যে আল-ওয়াযি' ইবনু নাফি' রয়েছে; আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

(১) ত্বাবারানীর সনদে, যার প্রতি শাইখ (আলবানী) পরবর্তীতে ইঙ্গিত করবেন, তাতে তার নাম উল্লেখ করা হয়েছে: (উম্মুল ওয়ালীদ)। দেখুন: ‘মু'জামুত ত্বাবারানী’ (২৫/১৭২/৪২১), এবং ‘যঈফুত তারগীব’ (১৯৫৩)। (প্রকাশক)









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4977)


(ألا تعجبون من أسامة؟! اشترى إلى شهر! إن أسامة لطويل الأمل. والذي نفسي بيده! ما طرفت عيناي إلا ظننت أن شفري لا يلتقيان حتى يقبض الله روحي، ولا رفعت طرفي فظننت أني واضعه حتى أقبض، ولا لقمت إلا ظننت أني لا أسيغها حتى أغص بها من الموت، يا بني آدم! إن كنتم تعقلون فعدوا أنفسكم من الموتى. والذي نفسي بيده؛ (إن ما توعدون لآت وما أنتم بمعجزين)) .
ضعيف

أخرجه ابن أبي الدني في `قصر الأمل` (1/ 2/ 1) ، وأبو نعيم في `الحلية` (6/ 91) ، وابن عساكر (2/ 348/ 2) عن أبي بكر بن أبي مريم عن عطاء بن أبي رباح عن أبي سعيد الخدري قال:
اشترى أسامة بن زيد بن ثابت وليدة بمئة دينار إلى شهر. فسمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، وعلته أبو بكر بن أبي مريم؛ ضعيف، وكان اختلط.
والحديث؛ رواه أيضاً البيهقي والأصبهاني؛ كما في `الترغيب` (4/ 131) ؛ وأشار إلى تضعيفه.
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(তোমরা কি উসামাহকে দেখে আশ্চর্য হচ্ছ না?! সে এক মাসের জন্য (বাকিতে) ক্রয় করেছে! নিশ্চয়ই উসামাহ দীর্ঘ আকাঙ্ক্ষী (দীর্ঘজীবী হওয়ার প্রত্যাশী)। যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! আমার চোখ একবারও পলক ফেলেনি, তবে আমি ধারণা করেছি যে, আল্লাহ আমার রূহ কবজ না করা পর্যন্ত আমার চোখের পাতা আর মিলিত হবে না। আর আমি আমার দৃষ্টি উপরে উঠাইনি, তবে আমি ধারণা করেছি যে, মৃত্যু আমাকে গ্রাস না করা পর্যন্ত আমি তা নিচে নামাতে পারব না। আর আমি কোনো লোকমা গ্রহণ করিনি, তবে আমি ধারণা করেছি যে, মৃত্যুর কারণে তাতে আমার শ্বাসরুদ্ধ না হওয়া পর্যন্ত আমি তা গিলতে পারব না। হে আদম সন্তানগণ! যদি তোমরা বিবেকবান হও, তবে নিজেদেরকে মৃতদের মধ্যে গণ্য করো। যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! (তোমাদেরকে যে বিষয়ে ওয়াদা দেওয়া হয়েছে, তা অবশ্যই আসবে এবং তোমরা তা ব্যর্থ করতে পারবে না)।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আবিদ দুনইয়া তাঁর ‘কাসরুল আমাল’ গ্রন্থে (১/২/১), আবূ নুআইম তাঁর ‘আল-হিলইয়াহ’ গ্রন্থে (৬/৯১), এবং ইবনু আসাকির (২/৩৪৮/২) আবূ বাকর ইবনু আবী মারইয়াম হতে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ হতে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন:
উসামাহ ইবনু যায়িদ ইবনু সাবিত এক মাসের জন্য একশ দিনারের বিনিময়ে একটি দাসী ক্রয় করলেন। তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনলাম... অতঃপর তিনি তা (উপরের হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর ত্রুটি হলো আবূ বাকর ইবনু আবী মারইয়াম; তিনি যঈফ (দুর্বল) এবং তিনি স্মৃতিভ্রমের শিকার হয়েছিলেন (ইখতিলাত)।
আর হাদীসটি বর্ণনা করেছেন বাইহাকী এবং আল-আসবাহানীও; যেমনটি ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (৪/১৩১) রয়েছে; এবং তিনি (আল-মুনযিরী) এটিকে দুর্বল বলে ইঙ্গিত করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4978)


(إن كرسيه وسع السماوات والأرض، وإنه ليقعد عليه فما يفضل منه مقدار أربع أصابع - ثم قال بأصابعه فجمعها - ؛ وإن له أطيطاً كأطيط الرحل الجديد إذا ركب؛ من ثقله) (1) .
منكر

أخرجه ابن جرير الطبري في `تفسيره` (5796،5798) من طريق إسرائيل عن أبي إسحاق عن عبد الله بن خليفة قال:
(1) كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن: ` تقدم في أواخر المجلد الثاني فيما أظن `.
قلت: وهو فيه برقم (866) . (الناشر)
أتت امرأة النبي صلى الله عليه وسلم فقالت: ادع الله أن يدخلني الجنة! فعظم الرب تعالى ذكره، ثم قال … فذكره.
وكذلك أخرجه عبد الله بن أحمد في `السنة` (ص 71) من هذه الطريق، لكنه زاد في متنه أداة الاستثناء فقال:
` … إلا قيد أربع أصابع`.
فاختلف المعنى.
ثم أخرجه ابن جرير (5797) من طريق أخرى عن إسرائيل نفسه به؛ إلا أنه زاد في إسناده فقال: عن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم بنحوه.
وقد أخرجه غير هؤلاء.
وللحديث ثلاث علل:
الأولى: جهالة عبد الله بن خليفة؛ قال الذهبي:
`لا يكاد يعرف`. وقال الحافظ في `التقريب`:
`مقبول`؛ أي: عند المتابعة، وإلا؛ فلين الحديث؛ كما ذكر في المقدمة.
الثانية: اختلاط أبي إسحاق - وهو السبيعي - ، وعنعنته؛ فإنه كان مدلساً.
الثالثة: الاضطراب في سنده وفي متنه؛ كما رأيته في رواية ابن جرير وعبد الله بن أحمد.
وبهذا أعله شيخ الإسلام ابن تيمية في `مجموعة الفتاوى` (16/ 434 - 436) ؛ فإنه ذكره كمثال للأحاديث الضعيفة التي يرويها بعض المؤلفين في الصفات، كعبد الرحمن بن منده وغيره، فقال:
`ومن ذلك: حديث عبد الله بن خليفة المشهور الذي يرويه عن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم. وقد رواه أبو عبد الله محمد بن عبد الواحد المقدسي في `المختارة`. وطائفة من أهل الحديث ترده لاضطرابه، كما فعل ذلك أبو بكر الإسماعيلي وابن الجوزي وغيرهم، لكن أكثر أهل السنة قبلوه.
ورواه الإمام أحمد وغيره مختصراً وذكر أنه حدث به وكيع. لكن كثير ممن رواه رووه بقوله: `إنه ما يفضل منه إلا أربع أصابع`؛ فجعل العرش يفضل منه أربع أصابع.
واعتقد القاضي وابن الزاغوني صحة هذا اللفظ، فأمروه، وتكلموا على معناه بأن ذلك القدر لا يحصل عليه الاستواء، وذكر عن أيمن العائذ أنه قال: هو موضع جلوس محمد صلى الله عليه وسلم (!) `.
ثم ذكر لفظ ابن جرير المخالف، ثم قال:
`فلو لم يكن في الحديث إلا اختلاف الروايتين؛ هذه تنفي ما أثبتت هذه، ولا يمكن مع ذلك الجزم بأن رسول الله صلى الله عليه وسلم أراد الإثبات، وأنه يفضل من العرش أربع أصابع لا يستوي عليها الرب. وهذا معنى غريب ليس له قط شاهد في شيء من الروايات، بل هذا يقتضي أن يكون العرش أعظم من الرب وأكبر! وهذا باطل مخالف للكتاب والسنة والعقل`.
ثم أطال الكلام في ترجيح رواية ابن جرير المخالفة النافية، وهي بلا شك أولى من حيث المعنى. ولكن الحديث عندي معلول بما ذكرنا من العلل، وهي تحيط بكل من الروايتين المثبتة والنافية؛ فلا فائدة تذكر من الإطالة. والله أعلم.
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(নিশ্চয়ই তাঁর কুরসী আসমান ও যমীনকে পরিব্যাপ্ত করে আছে, আর তিনি এর উপর উপবেশন করেন, ফলে তা থেকে চার আঙ্গুল পরিমাণও অতিরিক্ত থাকে না - অতঃপর তিনি তাঁর আঙ্গুলগুলো দিয়ে ইশারা করলেন এবং সেগুলোকে একত্রিত করলেন - ; আর এর একটি ক্যাঁচ ক্যাঁচ শব্দ হয়, যেমন নতুন হাওদার শব্দ হয় যখন তাতে আরোহণ করা হয়; তাঁর ভারের কারণে।) (১)
মুনকার

এটি ইবনু জারীর আত-তাবারী তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (৫৭৯৬, ৫৭৯৮) ইসরাঈল-এর সূত্রে আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু খালীফা থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন:
(১) শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনটির উপরে লিখেছেন: ‘আমার ধারণা, এটি দ্বিতীয় খণ্ডের শেষ দিকে উল্লেখ করা হয়েছে।’ আমি বলছি: এটি সেখানে (৮৬৬) নং-এ রয়েছে। (প্রকাশক)
এক মহিলা নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট এসে বললেন: আল্লাহর নিকট দু‘আ করুন যেন তিনি আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করান! তখন তিনি মহান রবের মহিমা বর্ণনা করলেন, অতঃপর বললেন... তারপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

অনুরূপভাবে আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ তাঁর ‘আস-সুন্নাহ’ গ্রন্থে (পৃ. ৭১) এই সূত্রেই এটি বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি এর মাতনে ব্যতিক্রমের সরঞ্জাম (أداة الاستثناء) যোগ করে বলেছেন:
‘...চার আঙ্গুল পরিমাণ ব্যতীত।’
ফলে অর্থ ভিন্ন হয়ে যায়।

অতঃপর ইবনু জারীর (৫৭৯৭) ইসরাঈল থেকেই অন্য সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন; তবে তিনি এর ইসনাদে অতিরিক্ত যোগ করে বলেছেন: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

এদের ছাড়াও অন্যরা এটি বর্ণনা করেছেন।
আর হাদীসটির তিনটি ত্রুটি (ইল্লত) রয়েছে:

প্রথমটি: আব্দুল্লাহ ইবনু খালীফার অপরিচিতি (জাহালাহ); ইমাম যাহাবী বলেছেন:
‘তিনি পরিচিত নন বললেই চলে।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘মাকবূল’ (গ্রহণযোগ্য); অর্থাৎ, যদি মুতাবা‘আত (সমর্থন) থাকে, অন্যথায় হাদীসটি দুর্বল (লাইনুল হাদীস); যেমনটি তিনি মুকাদ্দিমাহ (ভূমিকা)-তে উল্লেখ করেছেন।

দ্বিতীয়টি: আবূ ইসহাক - আর তিনি হলেন আস-সাবীয়ী - এর ইখতিলাত (স্মৃতিবিভ্রাট), এবং তাঁর ‘আন‘আনাহ (অস্পষ্ট বর্ণনা); কারণ তিনি মুদাল্লিস ছিলেন।

তৃতীয়টি: এর সনদ ও মাতনে ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা); যেমনটি আপনি ইবনু জারীর ও আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদের বর্ণনায় দেখেছেন।

আর এই কারণেই শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ ‘মাজমূ‘উল ফাতাওয়া’ (১৬/৪৩৪-৪৩৬)-তে এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মা‘লূল) বলেছেন; কারণ তিনি এটিকে সিফাত (আল্লাহর গুণাবলী) সংক্রান্ত দুর্বল হাদীসসমূহের উদাহরণ হিসেবে উল্লেখ করেছেন, যা আব্দুর রহমান ইবনু মান্দাহ প্রমুখ কিছু লেখক বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেছেন:
‘আর এর মধ্যে রয়েছে: আব্দুল্লাহ ইবনু খালীফার প্রসিদ্ধ হাদীসটি, যা তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন। আবূ আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল ওয়াহিদ আল-মাকদিসী এটি ‘আল-মুখতারা’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। আহলে হাদীসের একটি দল এর ইযতিরাবের কারণে এটিকে প্রত্যাখ্যান করেছেন, যেমনটি করেছেন আবূ বাকর আল-ইসমাঈলী, ইবনুল জাওযী এবং অন্যান্যরা। তবে অধিকাংশ আহলুস সুন্নাহ এটিকে গ্রহণ করেছেন।
আর ইমাম আহমাদ ও অন্যান্যরা এটি সংক্ষিপ্তাকারে বর্ণনা করেছেন এবং উল্লেখ করেছেন যে, ওয়াকী‘ এটি বর্ণনা করেছেন। কিন্তু যারা এটি বর্ণনা করেছেন তাদের অনেকেই এই কথা বলে বর্ণনা করেছেন: ‘নিশ্চয়ই তা থেকে চার আঙ্গুল ব্যতীত অতিরিক্ত থাকে না’; ফলে তারা আরশ থেকে চার আঙ্গুল অতিরিক্ত থাকার কথা বলেছেন।
আর আল-কাদী এবং ইবনুয যাগূনী এই শব্দটির বিশুদ্ধতা বিশ্বাস করতেন, তাই তারা এটিকে বহাল রেখেছেন এবং এর অর্থ নিয়ে আলোচনা করেছেন যে, এই পরিমাণ জায়গায় ইসতিওয়া (উপবেশন) সংঘটিত হয় না। আর আইমান আল-আয়িয থেকে উল্লেখ করা হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: এটি মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর বসার স্থান (!)।’
অতঃপর তিনি ইবনু জারীরের বিপরীত শব্দগুলো উল্লেখ করলেন, অতঃপর বললেন:
‘যদি হাদীসটিতে কেবল দুটি বর্ণনার এই ভিন্নতা ছাড়া আর কিছু না থাকত, যেখানে একটি যা সাব্যস্ত করে, অন্যটি তা অস্বীকার করে, তবুও এর সাথে নিশ্চিতভাবে বলা সম্ভব নয় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সাব্যস্ত করার ইচ্ছা করেছেন, এবং আরশ থেকে চার আঙ্গুল অতিরিক্ত থাকে যার উপর রব ইসতিওয়া করেন না। আর এই অর্থটি একটি অদ্ভুত অর্থ, যার কোনো সাক্ষী কোনো বর্ণনায় নেই, বরং এটি দাবি করে যে, আরশ রবের চেয়েও মহান ও বড়! আর এটি বাতিল, যা কিতাব, সুন্নাহ ও যুক্তির পরিপন্থী।’
অতঃপর তিনি ইবনু জারীরের বিপরীতমুখী অস্বীকারকারী বর্ণনাটিকে প্রাধান্য দেওয়ার বিষয়ে দীর্ঘ আলোচনা করেছেন, আর অর্থের দিক থেকে এটি নিঃসন্দেহে অধিক উত্তম। কিন্তু আমার নিকট হাদীসটি আমরা যে ত্রুটিগুলো উল্লেখ করেছি, সেগুলোর কারণে মা‘লূল (ত্রুটিযুক্ত), আর এই ত্রুটিগুলো সাব্যস্তকারী ও অস্বীকারকারী উভয় বর্ণনাকেই ঘিরে রেখেছে; সুতরাং দীর্ঘ আলোচনার কোনো উল্লেখযোগ্য ফায়দা নেই। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4979)


(لا تمنوا الموت؛ فإن هول المطلع شديد، وإن من السعادة أن يطول عمر العبد ويرزقه الله الإنابة) .
ضعيف

أخرجه أحمد (3/ 332) : حدثنا أبو عامر وأبو أحمد قالا: حدثنا كثير ابن زيد: حدثني الحارث بن يزيد - قال أبو أحمد: عن الحارث بن أبي يزيد - قال: سمعت جابر بن عبد الله يقول … فذكره مرفوعاً.
وتابعهما سليمان بن بلال عن كثير بن زيد عن الحارث بن أبي يزيد به.

أخرجه البيهقي في `الشعب` (7/ 362/ 10589) .
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ كثير بن زيد - وهو الأسلمي مولاهم - ؛ في حفظه ضعف، وقد اضطرب في اسم والد الحارث؛ كما في هذه الرواية.
وزاده بياناً الإمام البخاري في `التاريخ الكبير`؛ فقال (1/ 2/ 285) :
`الحارث بن يزيد مولى الحكم عن جابر عن النبي صلى الله عليه وسلم: `لا تمنوا الموت … `؛ قاله أبو أحمد الزبيري عن كثير بن زيد. وقال عيسى وحاتم: عن كثير بن الحارث بن أبي يزيد مولى الحاكم. وقال وكيع: عن كثير عن سلمة بن أبي يزيد. قال أبو عبد الله (هو البخاري) : وسلمة لا يصح ههنا`.
قلت: وقوله: `قاله أبو أحمد الزبيري`؛ لعله سبق قلم! والصواب: قال أبو عامر؛ فإن الزبيري قال: الحارث بن أبي يزيد؛ كما بينته رواية أحمد.
وعيسى: هو ابن يونس.
وقد أسنده عنه ابن عدي أيضاً في ترجمة كثير من `الكامل`، والبيهقي في `الزهد` (ق 72/ 1) .
وخلاصة كلام البخاري: أن كثير بن زيد اضطرب في إسناده على ثلاثة وجوه:
الأول: الحارث بن يزيد.
الثاني: الحارث بن أبي يزيد.
الثالث: سلمة بن أبي يزيد.
وفاته وجه رابع، وهو قول هشام بن عبيد الله الرازي: حدثنا سليمان بن بلال: حدثنا كثير بن زيد عن الوليد بن رباح عن أبي هريرة عن جابر مرفوعاً.

أخرجه ابن عدي (6/ 68) .
وذكره الذهبي من هذا الوجه في ترجمة كثير، ثم قال:
`وقد رواه البزار في `مسنده` عن عدة عن العقدي: حدثنا كثير بن زيد: حدثنا الحارث بن أبي يزيد عن جابر … فهذا - مع نكارته - له علة كما رأيت`.
يعني: الاضطراب، وهو من كثير بن زيد نفسه، وليس من الرواة عنه؛ فإنهم ثقات جميعاً على ضعف في الرازي.
والاضطراب دليل على أن الراوي لم يضبط الحديث ولم يحفظه، ولذلك كان الحديث المضطرب من أقسام الحديث الضعيف؛ حتى ولو كان الاضطراب من ثقة، فما بالك إذا كان من مضعف؛ كما هو الشأن هنا!
ثم إن الحارث بن يزيد - على الخلاف في أبيه كما رأيت - ليس بالمشهور؛ فقد أورده ابن أبي حاتم (1/ 2/ 94) . وقال:
`روى عن جابر. روى عنه كثير بن زيد، ومحمد بن أبي يحيى الأسلمي والد إبراهيم`.
فلم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
نعم؛ وثقه ابن حبان كما في `التعجيل`! وتساهله في التوثيق مشهور، ولذلك لا يعتمد عليه المحققون.
ومما سبق تعلم تساهل المنذري (4/ 136) في قوله:
`رواه أحمد بإسناد حسن، والبيهقي`!
ومثله قول الهيثمي (10/ 203) :
`رواه أحمد والبزار، وإسناده حسن`!
ومثله قول الحاكم (4/ 240) - وقد أخرج الشطر الثاني منه - :
`صحيح الإسناد`! ووافقه الذهبي!
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(তোমরা মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা করো না; কেননা (মৃত্যুর পর) প্রথম দৃশ্যের ভয়াবহতা কঠিন। আর নিশ্চয়ই এটা সৌভাগ্যের অংশ যে, বান্দার জীবন দীর্ঘ হবে এবং আল্লাহ তাকে (আল্লাহর দিকে) প্রত্যাবর্তন করার তাওফীক দান করবেন।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (৩/৩৩২২): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আমির ও আবূ আহমাদ, তারা উভয়ে বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন কাসীর ইবনু যায়দ: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হারিস ইবনু ইয়াযীদ – আবূ আহমাদ বলেছেন: আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ হতে – তিনি বলেন: আমি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি... অতঃপর তিনি এটিকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

সুলাইমান ইবনু বিলা-ল তাদের উভয়ের অনুসরণ করেছেন কাসীর ইবনু যায়দ হতে, তিনি আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ হতে, এই সূত্রে।

এটি বর্ণনা করেছেন বাইহাকী তাঁর ‘আশ-শু‘আব’ গ্রন্থে (৭/৩৬২/১০৫৮৯)।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); কাসীর ইবনু যায়দ – যিনি তাদের মাওলা আল-আসলামী – তার স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা রয়েছে। আর তিনি হারিসের পিতার নাম নিয়ে দ্বিধাগ্রস্ত হয়েছেন (ইযতিরাব করেছেন); যেমনটি এই বর্ণনায় দেখা যায়।

আর ইমাম বুখারী তাঁর ‘আত-তারীখুল কাবীর’ গ্রন্থে এর ব্যাখ্যা আরও বাড়িয়ে দিয়েছেন; তিনি বলেছেন (১/২/২৮৫):
‘আল-হারিস ইবনু ইয়াযীদ, আল-হাকামের মাওলা, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে বর্ণনা করেছেন: ‘তোমরা মৃত্যুর আকাঙ্ক্ষা করো না...’; এটি আবূ আহমাদ আয-যুবাইরী কাসীর ইবনু যায়দ হতে বর্ণনা করেছেন। আর ঈসা ও হাতিম বলেছেন: কাসীর হতে, তিনি আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ, আল-হাকিমের মাওলা হতে। আর ওয়াকী’ বলেছেন: কাসীর হতে, তিনি সালামাহ ইবনু আবী ইয়াযীদ হতে। আবূ আব্দুল্লাহ (তিনিই বুখারী) বলেছেন: আর সালামাহ এখানে সহীহ নয়।’

আমি বলি: তাঁর এই উক্তি: ‘এটি আবূ আহমাদ আয-যুবাইরী বলেছেন’; সম্ভবত এটি কলমের ভুল! সঠিক হলো: আবূ আমির বলেছেন; কেননা আয-যুবাইরী বলেছেন: আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ; যেমনটি আহমাদ-এর বর্ণনা স্পষ্ট করেছে।

আর ঈসা: তিনি হলেন ইবনু ইউনুস। ইবনু আদীও তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে কাসীরের জীবনীতে এবং বাইহাকী ‘আয-যুহদ’ গ্রন্থে (পৃ. ৭২/১) তাঁর সূত্রে এটি সনদসহ বর্ণনা করেছেন।

আর বুখারীর বক্তব্যের সারসংক্ষেপ হলো: কাসীর ইবনু যায়দ এই সনদে তিনটি ভিন্ন ভিন্ন রূপে ইযতিরাব (দ্বিধা) করেছেন:
প্রথম: আল-হারিস ইবনু ইয়াযীদ।
দ্বিতীয়: আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ।
তৃতীয়: সালামাহ ইবনু আবী ইয়াযীদ।

তাঁর (বুখারীর) চতুর্থ একটি দিক বাদ পড়েছে, আর তা হলো হিশাম ইবনু উবাইদুল্লাহ আর-রাযীর উক্তি: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনু বিলা-ল: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন কাসীর ইবনু যায়দ, তিনি আল-ওয়ালীদ ইবনু রাবাহ হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে।

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আদী (৬/৬৮)।

আর যাহাবী এই সূত্রে কাসীরের জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন, অতঃপর তিনি বলেছেন:
‘বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে আল-উকদী হতে একাধিক সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন কাসীর ইবনু যায়দ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হারিস ইবনু আবী ইয়াযীদ, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... সুতরাং এটি – এর মুনকার হওয়া সত্ত্বেও – এর একটি ত্রুটি (ইল্লত) রয়েছে, যেমনটি আপনি দেখলেন।’

অর্থাৎ: ইযতিরাব (দ্বিধা), আর এটি কাসীর ইবনু যায়দ-এর নিজের থেকেই এসেছে, তাঁর থেকে বর্ণনাকারীদের পক্ষ থেকে নয়; কেননা আর-রাযীর মধ্যে দুর্বলতা থাকা সত্ত্বেও তারা সকলেই সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। আর ইযতিরাব হলো এই কথার প্রমাণ যে, বর্ণনাকারী হাদীসটি সঠিকভাবে সংরক্ষণ করতে পারেননি এবং মুখস্থ রাখতে পারেননি। এই কারণে মুদ্বতারিব (দ্বিধাগ্রস্ত) হাদীস যঈফ হাদীসের প্রকারগুলোর অন্তর্ভুক্ত; এমনকি যদি ইযতিরাব কোনো সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকেও আসে, তাহলে দুর্বল হিসেবে চিহ্নিত বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকে এলে তো কথাই নেই; যেমনটি এখানে ঘটেছে!

অতঃপর আল-হারিস ইবনু ইয়াযীদ – যেমনটি আপনি দেখলেন, তার পিতার নাম নিয়ে মতভেদ থাকা সত্ত্বেও – তিনি প্রসিদ্ধ নন; ইবনু আবী হাতিম তাঁকে উল্লেখ করেছেন (১/২/৯৪)। এবং বলেছেন:
‘তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তাঁর থেকে কাসীর ইবনু যায়দ এবং মুহাম্মাদ ইবনু আবী ইয়াহইয়া আল-আসলামী, যিনি ইবরাহীমের পিতা, বর্ণনা করেছেন।’
তিনি তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।

হ্যাঁ; ইবনু হিব্বান তাঁকে সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, যেমনটি ‘আত-তা’জীল’ গ্রন্থে রয়েছে! কিন্তু তাউসীক (নির্ভরযোগ্যতা প্রদান)-এর ক্ষেত্রে তাঁর শিথিলতা প্রসিদ্ধ, এই কারণে মুহাক্কিকগণ (গবেষকগণ) তাঁর উপর নির্ভর করেন না।

পূর্বোক্ত আলোচনা থেকে আপনি আল-মুনযিরী (৪/১৩৬)-এর শিথিলতা জানতে পারলেন, যখন তিনি বলেন:
‘এটি আহমাদ হাসান সনদে বর্ণনা করেছেন, এবং বাইহাকীও।’
অনুরূপভাবে আল-হাইসামীর উক্তি (১০/২০৩):
‘এটি আহমাদ ও বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এর সনদ হাসান।’
অনুরূপভাবে আল-হাকিমের উক্তি (৪/২৪০) – যিনি এর দ্বিতীয় অংশটুকু বর্ণনা করেছেন – :
‘সহীহুল ইসনাদ (সহীহ সনদবিশিষ্ট)!’ আর যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4980)


(لما خلق الله آدم عليه السلام وذريته؛ قالت الملائكة: يا رب! خلقتهم يأكلون ويشربون وينكحون ويركبون، فاجعل لهم الدنيا ولنا الآخرة! فقال الله تبارك وتعالى: لا أجعل من خلقته بيدي ونفخت فيه من روحي كمن قلت له: (كن) فكان) .
ضعيف

أخرجه البيهقي في `شعب الإيمان` (1/ 106 - هندية) عن أبي زرعة الرازي: حدثنا هشام بن عمار: حدثنا عبد الله بن صالح النرسي: حدثنا عروة بن رويم عن الأنصاري أن النبي صلى الله عليه وسلم قال … فذكره. وقال البيهقي:
`وقال فيه غيره: عن هشام بن عمار بإسناده عن جابر بن عبد الله الأنصاري. وفي ثبوته نظر`.
قلت: وعلته: إما النرسي هذا؛ فإني لم أعرفه.
وإما هشام بن عمار؛ فإنه - مع كونه من شيوخ البخاري - ؛ فقد كان يتلقن.
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(যখন আল্লাহ তা'আলা আদম (আলাইহিস সালাম) এবং তাঁর বংশধরদের সৃষ্টি করলেন; তখন ফেরেশতাগণ বলল: হে রব! আপনি তাদের সৃষ্টি করেছেন, তারা খাবে, পান করবে, বিবাহ করবে এবং আরোহণ করবে। সুতরাং তাদের জন্য দুনিয়াকে এবং আমাদের জন্য আখিরাতকে নির্ধারণ করুন! তখন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা'আলা বললেন: যাকে আমি নিজ হাতে সৃষ্টি করেছি এবং যার মধ্যে আমার রূহ ফুঁকে দিয়েছি, তাকে আমি তার মতো করব না, যাকে আমি বলেছি: (হও) আর সে হয়ে গেল।)

যঈফ

এটি বাইহাকী তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (১/১০৬ - হিন্দী সংস্করণ) বর্ণনা করেছেন আবূ যুর'আ আর-রাযী থেকে: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন হিশাম ইবনু আম্মার: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহ আন-নারসী: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন উরওয়াহ ইবনু রুওয়াইম আল-আনসারী থেকে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আর বাইহাকী বলেছেন:
‘অন্যান্য বর্ণনাকারীগণ এতে হিশাম ইবনু আম্মার থেকে তাঁর সনদসহ জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। আর এর নির্ভরযোগ্যতা নিয়ে প্রশ্ন আছে।’

আমি (আলবানী) বলি: আর এর ত্রুটি হলো: হয় এই আন-নারসী (আব্দুল্লাহ ইবনু সালিহ); কারণ আমি তাকে চিনতে পারিনি।
অথবা হিশাম ইবনু আম্মার; কারণ তিনি - বুখারীর শাইখ হওয়া সত্ত্বেও - তালকীন গ্রহণ করতেন (অর্থাৎ, তাকে যা শোনানো হতো, তিনি তা গ্রহণ করে নিতেন)।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4981)


(ما من شيء أكرم على الله من ابن آدم. قيل: ولا الملائكة؟! قال: الملائكة مجبورون بمنزلة الشمس والقمر) .
منكر مرفوعاً

أخرجه البيهقي في `الشعب` (1/ 108) عن عبيد الله بن تمام السلمي عن خالد الحذاء عن بشر بن شغاف عن أبيه عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم … فذكره. وقال:
`تفرد به عبيد الله بن تمام، قال البخاري: عنده عجائب`.
قلت: وهو متفق على تضعيفه، بل كذبه بعضهم؛ فقال الساجي:
`كذاب، يحدث بمناكير عن يونس وخالد وابن أبي هند`. ثم قال البيهقي:
`ورواه غيره عن خالد الحذاء موقوفاً على عبد الله بن عمرو، وهو الصحيح`.
ثم ساق إسناده بذلك.
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(আল্লাহর নিকট আদম সন্তানের চেয়ে অধিক সম্মানিত আর কিছুই নেই। জিজ্ঞাসা করা হলো: ফেরেশতারাও না?! তিনি বললেন: ফেরেশতারা বাধ্য, তারা সূর্য ও চন্দ্রের মর্যাদার মতো।)

মুনকার মারফূ' হিসেবে।

এটি বাইহাকী তাঁর ‘আশ-শু'আব’ গ্রন্থে (১/১০৮) উবাইদুল্লাহ ইবনু তাম্মাম আস-সুলামী হতে, তিনি খালিদ আল-হাযযা হতে, তিনি বিশর ইবনু শুগাফ হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। আর তিনি (বাইহাকী) বলেছেন:
‘উবাইদুল্লাহ ইবনু তাম্মাম এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারী বলেছেন: ‘তার নিকট অদ্ভুত (আশ্চর্যজনক) বিষয়াদি রয়েছে।’

আমি (আলবানী) বলি: তার দুর্বলতার ব্যাপারে সকলে একমত, বরং কেউ কেউ তাকে মিথ্যাবাদীও বলেছেন। যেমন আস-সাজী বলেছেন:
‘সে মিথ্যাবাদী, সে ইউনুস, খালিদ এবং ইবনু আবী হিন্দ হতে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করে।’

অতঃপর বাইহাকী বলেছেন: ‘অন্যান্য বর্ণনাকারীগণ খালিদ আল-হাযযা হতে এটি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে মাওকূফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি) রূপে বর্ণনা করেছেন, আর এটিই সহীহ (বিশুদ্ধ)।’
অতঃপর তিনি (বাইহাকী) এর সনদটি উল্লেখ করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (4982)


(هلم يا عمر! اجلس حتى أخبرك بغنى الرب عن صلاة أبي جحش الليثي؛ إن لله في السماء الدنيا ملائكة خشوعاً، لا يرفعون رؤوسهم حتى تقوم الساعة، فإذا قامت الساعة؛ رفعوا رؤوسهم، ثم قالوا: ربنا! ما عبد ناك حق عبادتك) .
ضعيف

أخرجه الحاكم (3/ 87 - 88) ، والبيهقي في `شعب الإيمان` (1/ 114 - 115) - من طريقه - عن عبد الملك بن قدامة الجمحي عن عبد الرحمن ابن عبد الله بن دينار عن أبيه عن عبد الله بن عمر:
أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه جاء والصلاة قائمة؛ وثلاثة نفر جلوس؛ أحدهم أبو جحش الليثي. قال: قوموا فصلوا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقام اثنان، وأبى أبو جحش أن يقوم، فقال له عمر: صل يا أبا جحش! مع النبي صلى الله عليه وسلم. قال: لا أقوم حتى يأتيني رجل هو أقوى مني ذراعاً، وأشد مني بطشاً، فيصرعني، ثم يدس وجهي في التراب. قال عمر: فقمت إليه، فكنت أشد منه ذراعاً، وأقوى منه بطشاً، فصرعته ثم دسست وجهه في التراب، فأتى علي عثمان فحجزني. فخرج عمر بن الخطاب مغضباً، حتى انتهى إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فلما رآه النبي صلى الله عليه وسلم ورأى الغضب في وجهه؛ قال: `ما رابك يا أبا حفص؟ `. فقال: يا رسول الله! أتيت على نفر جلوس على باب المسجد وقد أقيمت الصلاة، وفيهم أبو جحش الليثي، فقام الرجلان … (فأعاد الحديث) . ثم قال عمر: والله يا رسول الله! ما كانت معونة عثمان إياه إلا أنه ضافه ليلة، فأحب أن يشكرها له! فسمعه عثمان فقال: يا رسول الله! ألا تسمع ما يقول لنا عمر عندك؟! فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`إن رضى عمر رحمة الله! لوددت أنك كنت جئتني برأس الخبيث`. فقام عمر. فلما بعد ناداه النبي صلى الله عليه وسلم فقال:
`هلم يا عمر! أين أردت أن تذهب؟ `. فقال: أردت أن آتيك برأس الخبيث. فقال:
`اجلس حتى أخبرك بغنى الرب … ` الحديث.
فقال له عمر بن الخطاب رضي الله عنه: وما يقولون يا رسول الله؟! قال:
`أما أهل السماء الدنيا فيقولون: سبحان ذي الملك والملكوت. وأما أهل السماء الثانية فيقولون: سبحان الحي الذي لا يموت؛ فقلها يا عمر! في صلاتك`. فقال: يا
رسول الله! فكيف بالذي علمتني وأمرتني أن أقوله في صلاتي؟ قال:
`قل هذه مرة، وهذه مرة`. وكان الذي أمر به أن قال:
`أعوذ بعفوك من عقابك، وأعوذ برضاك من سخطك، وأعوذ بك منك، جل وجهك`.
هكذا ساقه الحاكم - دون البيهقي - بتمامه. لكن سقط من سياقه ذكر ملائكة السماء الثانية الذين أشير إليهم وما يقولونه في آخر الحديث! والظاهر أنه من الناسخ أو الطابع؛ فقد ذكرهم البيهقي، وهو قد تلقاه عن الحاكم - كما سبق - ولفظه:
`وإن لله في السماء الثانية [ملائكة] سجوداً، لا يعرفون رؤوسهم حتى تقوم الساعة، فإذا قامت الساعة رفعوا رؤوسهم ثم قالوا: ربنا! ما عبد ناك حق عبادتك`. وقال البيهقي عقبه:
`قد أخرجته بطوله في (مناقب عمر رضي الله عنه `. وقال الحاكم:
`صحيح على شرط البخاري`!
ورده الذهبي بقوله:
`قلت: منكر غريب، وما هو على شرط (خ) ؛ عبد الملك ضعيف، تفرد به`.
قلت: وكذا جزم بضعفه الحافظ في `التقريب`.
وقال في `الإصابة` - عقب قول الذهبي المذكور - :
`قلت: وليس في سنده [إلا] أبو عبد الملك بن قدامة الجمحي، وهو مختلف فيه؛ وثقه ابن معين والعجلي. وضعفه أبو حاتم والنسائي. وقال البخاري: يعرف وينكر`!
وأقول: والحصر المذكور غير مسلم عندي؛ فإن عبد الرحمن بن عبد الله بن دينار - وإن كان من رجال البخاري - ؛ ففيه كلام كثير، حتى إن ابن عدي ختم ترجمته بقوله فيه:
`هو من جملة من يكتب حديثه من الضعفاء`.
والحافظ نفسه لم يوثقه في `التقريب`؛ بل قال فيه:
`هو صدوق يخطىء`.
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(হে উমার! এদিকে এসো! বসো, যেন আমি তোমাকে আবূ জাহশ আল-লায়সীর সালাত থেকে রবের অমুখাপেক্ষিতা সম্পর্কে জানাতে পারি। নিশ্চয়ই দুনিয়ার আকাশে আল্লাহর এমন বিনয়ী ফেরেশতাগণ আছেন, যারা কিয়ামত সংঘটিত হওয়ার আগ পর্যন্ত তাদের মাথা উঠান না। যখন কিয়ামত সংঘটিত হবে, তখন তারা তাদের মাথা উঠিয়ে বলবেন: হে আমাদের রব! আমরা আপনার ইবাদত করার হক অনুযায়ী ইবাদত করতে পারিনি।)
যঈফ (দুর্বল)

এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (৩/৮৭-৮৮), এবং তাঁর সূত্রে বাইহাক্বী তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (১/১১৪-১১৫) – আব্দুল মালিক ইবনু কুদামাহ আল-জুমাহী হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে:
যে উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন যখন সালাত ক্বায়িম হয়ে গিয়েছিল; আর তিনজন লোক বসে ছিল; তাদের মধ্যে একজন ছিলেন আবূ জাহশ আল-লায়সী। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা দাঁড়াও এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করো। তখন দু’জন দাঁড়ালো, কিন্তু আবূ জাহশ দাঁড়াতে অস্বীকার করলো। উমার তাকে বললেন: হে আবূ জাহশ! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করো। সে বললো: আমি দাঁড়াবো না যতক্ষণ না আমার চেয়ে শক্তিশালী বাহু এবং আমার চেয়ে কঠোর মুষ্টির অধিকারী কোনো লোক এসে আমাকে আছাড় মেরে মাটিতে ফেলে দেয়, অতঃপর আমার মুখমণ্ডল মাটিতে ঘষে দেয়। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তখন আমি তার দিকে এগিয়ে গেলাম, আমি তার চেয়ে শক্তিশালী বাহু এবং কঠোর মুষ্টির অধিকারী ছিলাম। আমি তাকে আছাড় মারলাম, অতঃপর তার মুখমণ্ডল মাটিতে ঘষে দিলাম। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে আমাকে বাধা দিলেন। উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাগান্বিত অবস্থায় বের হলেন, অবশেষে তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলেন। যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে দেখলেন এবং তাঁর চেহারায় রাগ দেখতে পেলেন; তখন বললেন: “হে আবূ হাফস! কী তোমাকে চিন্তিত করেছে?” তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি মসজিদের দরজায় বসা কিছু লোকের কাছে আসলাম, তখন সালাত ক্বায়িম হয়ে গিয়েছিল, তাদের মধ্যে আবূ জাহশ আল-লায়সীও ছিল। তখন দু’জন লোক দাঁড়ালো... (অতঃপর তিনি হাদীসটি পুনরাবৃত্তি করলেন)। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! উসমান তাকে সাহায্য করার কারণ কেবল এই ছিল যে, সে এক রাতে তার মেহমান হয়েছিল, তাই সে এর প্রতিদান দিতে চেয়েছিল! উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! উমার আমাদের সম্পর্কে আপনার কাছে যা বলছে, তা কি আপনি শুনছেন না?! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “নিশ্চয়ই উমারের সন্তুষ্টি আল্লাহর রহমত! আমি তো চাইছিলাম যে, তুমি যেন ঐ খবীসের মাথা নিয়ে আমার কাছে আসতে।” তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়ালেন। যখন তিনি কিছুটা দূরে গেলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে ডাকলেন এবং বললেন: “হে উমার! এদিকে এসো! তুমি কোথায় যেতে চেয়েছিলে?” তিনি বললেন: আমি ঐ খবীসের মাথা নিয়ে আপনার কাছে আসতে চেয়েছিলাম। তিনি বললেন: “বসো, যেন আমি তোমাকে রবের অমুখাপেক্ষিতা সম্পর্কে জানাতে পারি...” (সম্পূর্ণ হাদীস)। তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তারা কী বলে? তিনি বললেন: “দুনিয়ার আকাশের অধিবাসীরা বলে: ‘সুবহানা যিল মুলকি ওয়াল মালাকূত’ (পরাক্রম ও রাজত্বের অধিকারী আল্লাহ পবিত্র)। আর দ্বিতীয় আকাশের অধিবাসীরা বলে: ‘সুবহানাল হাইয়্যিল্লাযী লা ইয়ামূত’ (সেই চিরঞ্জীব সত্তা পবিত্র, যিনি মৃত্যুবরণ করেন না); হে উমার! তুমি তোমার সালাতে এটি বলো।” তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আমাকে যা শিখিয়েছেন এবং আমার সালাতে বলতে আদেশ করেছেন, তার কী হবে? তিনি বললেন: “এটি একবার বলো, আর ওটি একবার বলো।” আর তিনি যা বলার আদেশ করেছিলেন, তা হলো: “আ‘ঊযু বি‘আফবিকা মিন ‘ইক্বাবিকা, ওয়া আ‘ঊযু বিরিদ্বাকা মিন সাখত্বিকা, ওয়া আ‘ঊযু বিকা মিনকা, জাল্লা ওয়াজহুক” (আমি আপনার ক্ষমা দ্বারা আপনার শাস্তি থেকে আশ্রয় চাই, আপনার সন্তুষ্টি দ্বারা আপনার ক্রোধ থেকে আশ্রয় চাই, এবং আপনার দ্বারা আপনার থেকে আশ্রয় চাই, আপনার চেহারা মহিমান্বিত)।

হাকিম – বাইহাক্বী নন – এভাবে সম্পূর্ণ হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। কিন্তু তাঁর বর্ণনায় দ্বিতীয় আকাশের ফেরেশতাদের উল্লেখ এবং হাদীসের শেষে তারা যা বলে, তার উল্লেখ বাদ পড়েছে! বাহ্যত এটি লিপিকার বা মুদ্রণকারীর ভুল; কারণ বাইহাক্বী তাদের উল্লেখ করেছেন, আর তিনি তা হাকিম থেকেই গ্রহণ করেছেন – যেমনটি পূর্বে বলা হয়েছে – এবং তাঁর শব্দ হলো: “আর নিশ্চয়ই দ্বিতীয় আকাশে আল্লাহর [এমন] ফেরেশতাগণ আছেন, যারা সিজদাবনত, তারা কিয়ামত সংঘটিত হওয়ার আগ পর্যন্ত তাদের মাথা উঠান না। যখন কিয়ামত সংঘটিত হবে, তখন তারা তাদের মাথা উঠিয়ে বলবেন: হে আমাদের রব! আমরা আপনার ইবাদত করার হক অনুযায়ী ইবাদত করতে পারিনি।” বাইহাক্বী এর পরে বলেছেন: “আমি এটি সম্পূর্ণভাবে ‘মানাক্বিবু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছি।” আর হাকিম বলেছেন: “এটি বুখারীর শর্তানুযায়ী সহীহ!”

যাহাবী তাঁর এই কথা দ্বারা তা প্রত্যাখ্যান করেছেন: “আমি বলি: এটি মুনকার গারীব (অস্বীকৃত ও একক), আর এটি (খ)-এর (বুখারীর) শর্তানুযায়ী নয়; আব্দুল মালিক যঈফ (দুর্বল), তিনি এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (আলবানী) বলি: অনুরূপভাবে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে এর দুর্বলতা নিশ্চিত করেছেন।

আর তিনি ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে – যাহাবীর উপরোক্ত বক্তব্যের পরে – বলেছেন: “আমি বলি: এর সনদে [কেবল] আবূ আব্দুল মালিক ইবনু কুদামাহ আল-জুমাহী ছাড়া আর কেউ নেই, আর তার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে; ইবনু মাঈন ও আল-ইজলী তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন। আর আবূ হাতিম ও নাসাঈ তাকে দুর্বল বলেছেন। আর বুখারী বলেছেন: তিনি পরিচিত, তবে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেন!”

আর আমি (আলবানী) বলি: উপরোক্ত সীমাবদ্ধতা আমার কাছে গ্রহণযোগ্য নয়; কারণ আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু দীনার – যদিও তিনি বুখারীর রাবীদের অন্তর্ভুক্ত – তবুও তার ব্যাপারে অনেক কথা রয়েছে, এমনকি ইবনু আদী তার জীবনী শেষ করেছেন এই বলে: “তিনি দুর্বলদের অন্তর্ভুক্ত, যাদের হাদীস লেখা হয়।” আর হাফিয (ইবনু হাজার) নিজেও ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে তাকে বিশ্বস্ত বলেননি; বরং তার সম্পর্কে বলেছেন: “তিনি সাদূক্ব (বিশ্বস্ত), তবে ভুল করেন।”