হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (521)


` من قام ليلتي العيدين محتسبا لله، لم يمت قلبه يوم تموت القلوب `.
ضعيف جدا.

أخرجه ابن ماجة (1 / 542) عن بقية بن الوليد عن ثور بن يزيد عن خالد بن معدان عن أبي أمامة مرفوعا. قال في ` الزوائد `: ` إسناده ضعيف لتدليس بقية `. وقال العراقي في ` تخريج الإحياء ` (1 / 328) : ` إسناده ضعيف `. قلت: بقية سيء التدليس، فإنه يروي عن الكذابين عن الثقات ثم يسقطهم من بينه وبين الثقات ويدلس عنهم! فلا يبعد أن يكون شيخه الذي أسقطه في هذا الحديث من أولئك الكذابين، فقد قال ابن القيم في هديه صلى الله عليه وسلم ليلة النحر من المناسك (1 / 212) : ` ثم نام حتى أصبح، ولم يحي تلك الليلة، ولا صح عنه في إحياء ليلتي العيدين شيء `.
ثم رأيت الحديث من رواية عمر بن هارون الكذاب، والمذكور في الحديث السابق، يرويه عن ثور بن يزيد به.
فلا أستبعد أن يكون هو الذي تلقاه بقية عنه ثم دلسه وأسقطه. وسيأتي تخريج حديثه فيما بعد إن شاء الله تعالى برقم (5163) .
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৫২১। যে ব্যক্তি আল্লাহর সম্ভষ্টি এবং ছাওয়াবের প্রত্যাশায় ঈদুল ফিতর এবং ঈদুল আযহার রাত্রি জাগরণ করবে, সে ব্যক্তির হৃদয় ঐদিন মৃত্যু বরণ করবে না যেদিন অন্য হৃদয়গুলো মৃত্যু বরণ করবে।





হাদীছটি নিতান্তই দুর্বল।





এটি ইবনু মাজাহ (১/৫৪২) বাকিয়াহ ইবনুল ওয়ালীদ সূত্রে ... আবৃ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।





হাদীছটির সনদ দুর্বল বাকিয়াহ কর্তৃক তাদলীসের কারণে। হাফিয ইরাকী `তাখরযুল ইহইয়্যা` (১/৩২৮) গ্রন্থে বলেনঃ সনদটি দুর্বল।





আমি (আলবানী) বলছিঃ বাকিয়াহ তাদলীসের ব্যাপারে মন্দ ব্যক্তি। কারণ তিনি মিথ্যুকদের মাধ্যমে নির্ভরযোগ্যদের থেকে বর্ণনা করতেন। অতঃপর তার এবং নির্ভরযোগ্যদের মাঝের মিথ্যুকদেরকে ফেলে দিয়ে তাদলীস করতেন। তিনি তার যে শাইখকে সনদ হতে ফেলে দিয়েছেন তিনিই যে সেই সব মিথ্যুক শাইখদের একজন তা কোন দূরবর্তী কথা নয়।





আমি মিথ্যুক উমর ইবনু হারূণের বর্ণনাতে হাদীছটি দেখেছি যা পূর্বের হাদীছে উল্লেখ করা হয়েছে। তিনি ছাওর ইবনু ইয়াযীদ হতে বর্ণনা করেছেন। দোষ গোপন করণার্থে বাকিয়াই যে তার শাইখকে ফেলে দিয়ে ছাওর হতে বর্ণনা করেছেন এটি কোন অসম্ভবমূলক কথা নয়। তার হাদীছের তাখরীজ ইনশাআল্লাহ ৫১৬৩ নং হাদীছে আসবে।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (522)


` من أحيا الليالي الأربع وجبت له الجنة، ليلة التروية وليلة عرفة وليلة النحر وليلة الفطر `.
موضوع.
رواه نصر المقدسي في جزء من ` الأمالي ` (186 / 2) عن سويد بن سعيد حدثني عبد الرحيم بن زيد العمي عن أبيه عن وهب بن منبه عن معاذ بن جبل مرفوعا.
وهذا إسناد موضوع كما يأتي بيانه، وأورده السيوطي في ` الجامع الصغير ` من رواية ابن عساكر عن معاذ. فتعقبه شارحه المناوي بقوله: ` قال ابن حجر في ` تخريج الأذكار `: حديث غريب، وعبد الرحيم بن زيد العمي أحد رواته متروك وسبقه ابن الجوزي فقال: حديث لا يصح، وعبد الرحيم قال يحيى: كذاب، والنسائي: متروك `.
قلت: وسويد بن سعيد ضعيف أيضا، فالإسناد ظلمات بعضها فوق بعض! والحديث أورده المنذري في ` الترغيب ` (2 / 100) بلفظ `.... الليالي الخمس.... ` فذكره وزاد في آخره: ` وليلة النصف من شعبان ` ثم قال: ` رواه الأصبهاني `. وأشار المنذري لضعفه أو وضعه. قلت: وهو عند الأصبهاني في ` الترغيب ` (ق 50 / 2) من الوجه المذكور.
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৫২২। যে ব্যক্তি চারটি রাত (ইবাদাতকরণার্থে) জাগ্রত থাকবে তার জন্য জান্নাত ওয়াজিব হয়ে যাবে। তারবিয়ার রাত (যিল হিজ্জার আট তারিখের রাত) আরাফার রাত, কুরবানীর দিবসের রাত এবং ঈদুল ফিতরের রাত।





হাদীছটি জাল।





এটি নাসর ইবনুল মাকদেসী `আল-আমলী` গ্রন্থের এক অংশে (২/১৮৬) সুওয়ায়েদ ইবনু সাঈদ সূত্রে আব্দুর রহীম ইবনু যায়েদ ইবনে আল-আমী হতে ... বর্ণনা করেছেন। এ সনদটি বানোয়াট। হাদীছটিকে সুয়ূতী `আল-জামেউস সাগীর` গ্রন্থে ইবনু আসাকিরের বর্ণনায় মুয়ায (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তার ভাষ্যকার মানবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ ইবনু হাজার “তাখরীজুল আযকার” গ্রন্থে বলেছেনঃ হাদীছটি গারীব। বর্ণনাকারী আব্দুর রহীম ইবনু যায়েদ আল-আমী মাতরূক। ইবনুল জাওয়ী বলেনঃ হাদীছটি সহীহ নয়। আব্দুর রহীম সম্পর্কে ইয়াহইয়া বলেনঃ তিনি মিথ্যুক। নাসাঈ বলেনঃ তিনি মাতরূক।





আমি (আলবানী) বলছিঃ সুওয়ায়েদ ইবনু সাঈদও দুর্বল। অতএব সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন যার একটি অপরটির ঊর্ধ্বে। হাদীছটি মুনযেরী `আত-তারগীব` (২/১০০) গ্রন্থে মধ্য শাবানের রাতকে যুক্ত করে পাঁচটি রাতের কথা উল্লেখ করে বর্ণনা করেছেন। এটি আল-আসফাহানী বর্ণনা করেছেন। অতঃপর মুনযের হাদীছটি দুর্বল কিংবা বানোয়াট হওয়ার দিকেই ইঙ্গিত করেছেন।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (523)


الروض النضير) - ، وعليه: يكون عبدان قد أسقط جده المباشر ونسبه إلى جده
الأعلى، أم هو غيره كما يشعر بذلك قول الحافظ في آخر حرف الصاد من ` اللسان `:
` صهيب بن محمد بن صهيب ابن أخي عباد بن صهيب. له ذكر في ترجمة
عمه عباد بن صهيب `.
والله سبحانه وتعالى أعلم.
وأما عباد بن صهيب؛ فقال الذهبي في ` الضعفاء `:
(تركه غير واحد، وبعضهم رماه بالكذب، وأما أبو داود فقال: صدوقٌ قَدَرِيّ) .
قلت: ونحوه ما رواه الطبراني في الصغير، عقب الحديث المشار إليه آنفًا: سمعت عبد الله بن أحمد يقول: سألت أبي عن عباد بن صهيب فقال:
(إنما أنكروا عليه مجالسته لأهل القدر، فأما الحديث فلا بأس فيه) .
وهذه الرواية عن أحمد قد خلت منها كتب التراجم، فلتستفد من الحافظ الطبراني الذي ليس بينه وبين الإمام أحمد سوى عبد الله بن أحمد.
وأبو سعد البقال، قال الذهبي في الضعفاء:
(ليس بالحجة، قال ابن معين: لا يُكتب حديثه، وقال أبو زرعة: صدوق مدلس، وقال الفلاس: متروك) .
قلت: وأنا أرى أنه علة هذا الحديث، فإنه - مع ضعفه الشديد - فقد خالفه جمعٌ من الثقات، رووه عن إبراهيم التيمي عن أبيه عن أبي ذر موقوفًا عليه، قال:
(كانت المتعة في الحج لأصحاب محمد صلى الله عليه وسلم خاصة) .

أخرجه مسلم (4 / 46) وغيره، ومنهم الطبراني في المعجم الصغير، وقد خرّجته في الروض النضير (رقم 949، 450) .
فهذا هو المحفوظ عن أبي ذر، موقوف، ثم هو مخالف لقوله صلى الله عليه وسلم حين أمرهم بفسخ الحج إلى العمرة، وسأله سراقة بن مالك بن جعشم فقال: عمرتنا هذه لعامنا هذا أم لأبد الأبد؟ فشبك رسول الله صلى الله عليه وسلم أصابعه واحدة في أخرى، وقال:
(دخلت العمرة في الحج إلى يوم القيامة، لا، بل لأبد أبد [ثلاث مرات] ) .
ظر كتابي حجة النبي صلى الله عليه وسلم كما رواها جابر رضي الله عنه (ص 60 - 62) والتعليق عليه.
بل الحديث مخالفٌ لقوله تعالى: {فمن تمتع بالعمرة إلى الحج فما استيسر من الهدي} ، ولذلك قال الإمام أحمد: رحم الله أبا ذر! هي في كتاب الرحمن: {فمن تمتع. . .} الآية، ذكره ابن القيم في زاد المعاد (1 / 290) .
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৫২৩। তোমাদের মধ্য হতে যে ব্যক্তি উত্তমরূপে আরবী ভাষায় কথা বলতে পারে সে যেন ফার্সি ভাষায় কথা না বলে। কারণ তা নেফাকের অধিকারী করে দেয়।





হাদীছটি জাল।





এটি হাকিম (৪/৮৭) উমর ইবনু হারূণ সূত্রে উসামা ইবনু যায়েদ আল-লাইছী হতে তিনি নাফে হতে তিনি ইবনু উয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন। হাকিম হাদীছটির ব্যাপারে চুপ থেকেছেন আর ইমাম যাহাবী তার প্রতিবাদ করে বলেছেনঃ উমারকে ইবনু মাঈন মিথ্যুক আখ্যা দিয়েছেন এবং তাকে একদল পরিত্যাগ করেছেন।





সুয়ূতী তার “আল-জামে`-তে এ হাদীছটি উল্লেখ করার মাধ্যমে গ্রন্থটিকে কালিমালিপ্ত করেছেন। এ কারণে তার ভাষ্যকার মানাৰী ইমাম যাহাবীর কথা উল্লেখ করে তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ লেখকের উচিত ছিল হাদিসটিকে ফেলে দেয়া অথবা তার প্রকৃত অবস্থা তুলে ধরে ব্যাখ্যা প্ৰদান করা।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (524)


الروض) .
ثم قال ابن الجوزي (1/233) :
`وقد ذكره ابن مردويه من نحو عشرين طريقاً، كلها مظلم، وفيها مطاعن، فلم أر الإطالة بذلك`.
قلت: ولم يكن الحاكم مبالغاً في قوله المتقدم أنه رواه عن أنس من أصحابه زيادة على ثلاثين نفساً، فقد رأيت الأخ الفاضل أحمد البلوشي قد أبلغها هذا العدد في تعليقه على `خصائص علي` (ص29 - 33) ، وقارب ذلك الأخ
الفاضل سعد بن عبد الله آل حميد في تعليقه على `مختصر استدراك الحافظ الذهبي` (3/1447 - 1454) ، فأوصلها إلى خمس وعشرين طريقاً، وقد أطالا النفس في تخريجهما والكشف عن عللها. وجزاهما الله خيراً.
إلا أنني أخذت عليهما بعض الأشياء، أهمهما: أن الأول منهما لم يتكلم على الطريق الأولى التي مدارها على عبيد الله بن موسى عن عيسى بن عمر عن السدي، فأوهم بسكوته أنها سالمة من العلة، وهي في الحقيقة أقرب طرقه الثلاثين إلى السلامة، فكان الأولى به أن يعنى بها عناية خاصة.
وأما الفاضل الآخر: فأعله (3/1456) بالسدي، تبعاً لابن الجوزي، ولكنه زاد عليه إعلاله لرواية الترمذي - التي لم يسقها ابن الجوزي - بسفيان بن وكيع.
ولكنه قال:
`وأما متابعة حاتم بن الليث لسفيان بن وكيع فيتوقف فيها إلى أن يتضح من هو حاتم بن الليث هذا، فإني لم أجد له ذكراًَ في غير هذا الموضع من `علل ابن الجوزي`، ولم يذكره المزي في الرواة عن عبيد الله بن موسى، ولا الخطيب
البغدادي في شيوخ محمد بن مخلد بن حفص شيخ الدارقطني`.
قلت: حاتم هذا ثقة - كما سبقت الإشارة إلى ذلك في أول هذا التخريج - ، والآن لا بد من ذكر مستندي في ذلك، فأقول:
لقد ترجمه الخطيب في ` تاريخ بغداد` (8/245 - 246) ، وذكر في الرواة
عنه ابن مخلد هذا، ثم قال:
`وكان ثقة ثبتاً متقناً حافظاً`. وقال الحافظ الذهبي في `السير` (12/519) :
`....الحافظ المكثر الثقة`.
قلت: فهذه متابعة قوية جداً لسفيان بن وكيع، فلم يبق كبير فائدة لإعلال الحديث بإسماعيل السدي عند الفاضل وغيره، ولا سيما وقد ردها الحافظ العسقلاني على الشيخ القزويني في رده المطبوع في آخر `المشكاة` (3/314)
بقوله:
`قلت: أخرج له مسلم، ووثقه جماعة، منهم: شعبة وسفيان ويحيى القطان`.
وقد خفيت عليهم جميعاً علة الحديث الحقيقية في هذه الطرق، وهي وهم عبيد الله بن موسى واضطرابه في إسناده، قال: (إسماعيل السدي) … مكان:
(إسماعيل بن سلمان) ، كما سبق بيانه - . وهو مما لم أسبق إليه - فيما علمت.
فإن أصبت، فمن الله وفضله، وإن أخطأت، فمن نفسي. والله تعالى أسأل أن يغفر لي ذنبي، وخطئي وعمدي، وكل ذلك عندي.
`ثم صحت الرواية عن علي، وأبي سعيد، وسفينة`.
وسكت عنه الذهبي هنا في `التلخيص`، فلم يتعقبه بشيء، وإنما تعقبه في `جزءه` الذي جمعه في هذا الحديث فقال:
` لا اللهَ! ما صح من ذلك شيء`.
نقله عنه تلميذه ابن كثير في `تاريخه` (7/350 - 351) .
قلت: وما حنث الذهبي رحمه الله، فقد بين ابن كثير علل الطرق عن هؤلاء الأصحاب الثلاثة - كما بين علل كثير من الطرق المشار إليها آنفاً - ، وختم ذلك كله بقوله:
`وبالجملة، ففي القلب من صحة هذا الحديث نظر، وإن كثرت طرقه. والله أعلم`.
قلت: تقوية الحديث بكثرة الطرق الضعيفة ليست قاعدة مضطردة - كما هو مشروح في علم المصطلح - ، فكم من حديث كثرت طرقه، ومع ذلك ضعفه العلماء كحديث: `من حفظ على أمتي أربعين حديثاً … ` وغيره. ولذلك قال الحافظ الزيلعي في كتابه القيم `نصب الراية لأحاديث الهداية` (1/358 -
360) :
`وأحاديث الجهر - وإن كثرت رواتها، لكنها - كلها ضعيفة، وكم من حديث كثرت رواته، وتعددت طرقه، وهو حديث ضعيف، كحديث الطير`.
ومن هذا القبيل حديث قصة الغرانيق، ولي فيها رسالة نافعة مطبوعة.
ولهذا لم نر الحفاظ المتقدمين أعملوا هذه القاعدة هنا، بل صرحوا بضعف الحديث - كما تقدم عن الإمام البخاري والعقيلي والبزار، وأبي يعلى الخليلي - ، بل إن هذا نقل رده عن جميع أهل الحديث - كما سبق - . ولقد كان من هؤلاء الذين ضعفوه ولم يلتفتوا إلى طرقه الحاكم نفسه، فيما ذكره الذهبي في ترجمته
من `السير` (17/168) :
أنهم كانوا في مجلس، فسئل أبو عبد الله الحاكم عن حديث الطير؟ فقال:
`لا يصح، ولو صح، لما كان أحد أفضل من علي بعد النبي صلى الله عليه وسلم `.
قال الذهبي عقبه:
`فهذه حكاية قوية، فما باله أخرج حديث الطير في `المستدرك`؟! فكأنه اختلف اجتهاده، وقد جمعت طرق حديث الطير في جزء`.
قلت: وقد أشار الحاكم بجوابه المذكور إلى حقيقة علمية مقطوع بها عند أهل السنة، ولا يرتاب فيها إلا الرافضة وأمثالهم من فرق الضلالة، وهي أن أفضل الصحابة بعد النبي صلى الله عليه وسلم على الإطلاق أبو بكر، ثم عمر رضي الله عنهما، كما جاء من طرق عن ابن عمر رضي الله عنه وبعضها في `صحيح البخاري`، وهي
مخرجة في آخر المجلد الثاني من `ظلال الجنة في تخريج كتاب السنة`.
وكذلك، فحديث الطير يخالف حديث عمرو بن العاص: أنه سأل النبي صلى الله عليه وسلم عن أحب الناس إليك؟ قال: `عائشة`. قال: قلت: من الرجال؟ قال: `أبوها`.
متفق عليه. (انظر مقدمة المجلد الثالث من `المشكاة`) . ولذلك قال شيخ الإسلام ابن تيمية في رده على الشيعي في `منهاج السنة` (4/99) :
`إن حديث الطائر من المكذوبات الموضوعات عند أهل العلم والمعرفة بحقائق النقل … `؟ في بحث له قيم، فراجعه.
قلت: ومن الغرائب أنه أصاب الذهبي في هذا الحديث من اختلاف الاجتهادما أصاب الحاكم، فإنه في كتابه `المنتقى من منهاج الاعتدال` نقل (ص




৫২৪। আল্লাহর নিকট কোন ব্যাপারে রৌপ্য মুদ্রা খরচ করা ঈদের দিনে কুরবানী করার চাইতেও অতি উত্তম।





হাদীছটি নিতান্তই দুর্বল।





এটি ইবনু হিব্বান `আল-মাজরূহীন` (১/৮৮) গ্রন্থে, তাবারানী (৩/১০২/১), আবুল কাসেম আল-হামাদানী `আল-ফাওয়ায়েদ` (১/১৯৬/১) গ্রন্থে, দারাকুতনী তার `সুনান` (পৃঃ ৫৪৩) গ্রন্থে, আল-মুখাল্লেস তার “ফাওয়ায়েদ” (১/৮৪) গ্রন্থের এক অংশে এবং ইবনু আবী শুরাইহ `জুযউ বীবী` (১৬৮/১-২) গ্রন্থে ইবরাহীম ইবনু ইয়াযীদ আল-খাওযী হতে ... ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ হিসাবে বর্ণনা করেছেন। ইমাম সুয়ূতী `আল-জামে` গ্রন্থে তাবরানী এবং বাইহাকীর “সুনান” গ্রন্থের উদ্ধৃতিতে উল্লেখ করেছেন।





হায়ছামী `আল-মাজমা` (৪/১৭) গ্রন্থে বলেছেনঃ তাবারানী ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন, যার সনদে ইবরাহীম ইবনু ইয়াযীদ আল-খাওযী রয়েছেন, তিনি দুর্বল।





আমি (আলবানী) বলছিঃ বরং তিনি খুবই দুর্বল। ইবনু হিব্বান বলেনঃ তিনি বহু মুনকার এবং অতিশয় সন্দেহযুক্ত হাদীছ বর্ণনা করেছেন। এমন কি হৃদয়ে এটিই প্রাধান্য পাবে যে তিনি তা ইচ্ছাকৃতই করেছেন। তার সম্পর্কে আল-বারকী বলেনঃ তাকে মিথ্যার দোষে দোষী করা হতো। আল-বারকী যা উল্লেখ করেছেন ইমাম বুখারী তার ভাষ্যে সে দিকেই ইঙ্গিত করে বলেছেনঃ তার ব্যাপারে মুহাদ্দিসগণ চুপ থেকেছেন। হাফিয ইবনু কাসীর `ইখতিসারু উলুমিল হাদীছ` (পৃঃ ১১৮ তাহকীক আহমাদ মুহাম্মাদ শাকের) গ্রন্থে বলেনঃ যখন ইমাম বুখারী কারো সম্পর্কে বলেনঃسكتوا عنه ‘তার ব্যাপারে মুহাদ্দিসগণ চুপ থেকেছেন অথবা বলেন যে, فيه نظر তার ব্যাপারে বিরূপ মন্তব্য রয়েছে, তখন বুঝতে হবে যে, তার স্তরটি তার নিকট অত্যন্ত নিচু পর্যায়ের। তিনি দোষারোপ করার ক্ষেত্রে নরম ভাষা ব্যবহার করেছেন।





আহমাদ শাকের বলেনঃ অনুরূপভাবে তিনিمنكر الحديث 'মুনকারুল হাদীছ' বললে তা দ্বারা তিনি বুঝিয়েছেন মিথ্যুকদেরকে। ইমাম যাহাবী “আল-মীযান” (১/৫) গ্রন্থে বলেনঃ ইবনুল কাত্তান বুখারীর উদ্ধৃতিতে বলেছেন, তিনি বলেনঃ আমি যে ব্যক্তি সম্পর্কে মুনকারুল হাদীছ বলেছি তার থেকে হাদীছ বর্ণনা করা হালাল নয়।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (525)


` ما عمل ابن آدم في هذا اليوم أفضل من دم يهراق، إلا أن تكون رحما توصل `.
ضعيف.
قال المنذري (2 / 102) : ` رواه الطبراني في الكبير عن ابن عباس وفي إسناده يحيى بن الحسن الخشني لا يحضرني حاله `. وأما الهيثمي فقال (4 / 18) : ` هو ضعيف وقد وثقه جماعة `. كذا قال، ولم أجد له ذكرا في شيء من كتب الرجال التي عندي. والله أعلم.
هذا ما كنت نشرته في ` مجلة التمدن الإسلامي ` الغراء، وأزيد الآن فأقول: ذكر السمعاني في مادة (الخشني) جمعا من الرواة منهم الحسن بن يحيى الخشني، وحكى اختلاف العلماء فيه، وهو من رجال ` التهذيب ` وقال الحافظ في ` التقريب `: ` صدوق كثير الغلط `.
فلعله هو راوي هذا الحديث، لكن انقلب اسمه على بعض نساخ ` الطبراني ` فقال: ` يحيى بن الحسن الخشني ` فلم يعرفه المنذري، وعرفه الهيثمي، ولكنه فاته أن ينبه على انقلاب اسمه على الناسخ، والله أعلم. ثم راجعت ` معجم الطبراني الكبير ` فوجدت الحديث فيه (3 / 104 / 1) عن الحسن بن
يحيى الخشني عن إسماعيل بن عياش عن ليث عن طاووس عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في يوم الأضحى.... فذكره. قلت: فتبين أنه هو الحسن بن يحيى الذي ذكره السمعاني وأنه انقلب اسمه على بعضهم. وازددت علما بضعف الحديث حين رأيت فيه إسماعيل بن عياش وليث وهو ابن أبي سليم فهو إسناد مسلسل بالضعفاء! . والحمد لله على توفيقه.
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৫২৫। রক্তের সম্পর্ক রক্ষা করা ব্যতীত আজকের এইদিনে আদম সন্তান যে সব আমল করে, সে সবের মধ্যে রক্ত প্রবাহিত করার চেয়ে উত্তম আর কোন আমল নেই।





হাদীছটি দুর্বল।





মুনযেরী (২/১০২) বলেনঃ হাদীছটি তাবারানী “মুজামুল কাবীর” গ্রন্থে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তার সনদে ইয়াহইয়া ইবনুল হাসান আল-খুশানী রয়েছেন। তার অবস্থা আমার নিকট স্পষ্ট নয়।


হায়ছামী `আল-মাজমা` (৪/১৮) গ্রন্থে বলেনঃ তিনি দুর্বল, যদিও তাকে একদল নির্ভরযোগ্য বলেছেন। তিনি যা বলেছেন তাই। কারণ আমার নিকট যে সব আসমায়ে রিজালের গ্রন্থ রয়েছে তার কোনটিতেই তাকে পাচ্ছি না। সাম'আনী যার কথা উল্লেখ করেছেন তিনি হচ্ছেন আল-হাসান ইবনু ইয়াহইয়া আল-খুশানী এবং তিনি তার সম্পর্কে আলেমদের মতভেদও উল্লেখ করেছেন। হাফিয ইবনু হাজার “আত-তাহযীব” গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলেনঃ তিনি সত্যবাদী, বহু ভুলকারী। সম্ভবত তিনিই এ হাদীছের বর্ণনাকারী। কিন্তু তাবারানীর কোন কপিকারকের নিকট তা পরিবর্তিত হয়ে গেছে, সে সম্পর্কে মুনযেরী অবহিত হননি। অতঃপর আমি “আল-মুজামুল কাবীর” (৩/১০৪/১) গ্রন্থে পেয়েছি, হাদীছটি আইয়াশ হতে তিনি লাইছ হতে ... বর্ণনা করেছেন। এ কারণে আমি আলবানীর নিকট আলোচ্য হাদীছের বর্ণনাকারী হচ্ছেন আল-হাসান ইবনু ইয়াহইয়া আল-খুশানী। যেমনটি উল্লেখ করেছেন আস-সাম'আনী। এ সনদের বর্ণনাকারী ইসমাঈল এবং লাইছ ইবনু আবী সুলায়েমও দুর্বল।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (526)


` ما عمل آدمي من عمل يوم النحر أحب إلى الله من إرهاق الدم، إنه ليأتي يوم القيامة بقرونها وأشعارها وأظلافها، وإن الدم ليقع من الله بمكان قبل أن يقع على الأرض، فطيبوا بها نفسا `.
ضعيف.

أخرجه الترمذي (2 / 352) وابن ماجة (2 / 272) والحاكم (4 /221 - 222) والبغوي في ` شرح السنة ` (1 / 129 / 1) من طريق أبي المثنى سليمان بن يزيد عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعا. قلت: وحسنه الترمذي وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `! فتعقبه الذهبي بقوله: ` قلت: سليمان واه، وبعضهم تركه `. وكذلك تعقبه المنذري في ` الترغيب ` (2 / 101) فقال: ` رووه كلهم من طريق أبي المثنى وهو واه وقد وثق `. وقال البغوي عقبه: ` ضعفه أبو حاتم جدا `.
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৫২৬। ঈদুল আযহার দিবসে রক্ত প্রবাহিত করার চেয়ে আল্লাহর নিকট অতি পছন্দনীয় মানুষের আর কোন আমল নেই। কারণ সে কিয়ামত দিবসে তার শিং, তার পশম এবং তার খুরগুলো নিয়ে উঠবে। আর রক্ত যমীনে পতিত হওয়ার পূর্বেই আল্লাহর মনোনীত এক স্থানে পতিত হবে। অতএব তোমরা তা দ্বারা আত্মাকে পবিত্র কর।





হাদীছটি দুর্বল।





এটি ইমাম তিরমিয়ী (২/৩৫২), ইবনু মাজাহ (২/২৭২), হাকিম (৪/২২১-২২২) এবং বাগাবী `শারহুস সুন্নাহ` (১/১২৯/১) গ্রন্থে আবুল মুসান্না সুলায়মান ইবনু ইয়াযীদ সূত্রে হিশাম ইবনু উরওয়াহ হতে ... আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।





আমি (আলবানী) বলছিঃ হাদীছটিকে ইমাম তিরমিয়ী হাসান আখ্যা দিয়েছেন আর হাকিম বলেছেনঃ সনদটি সহীহ! এ কারণে হাফিয যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ সুলায়মান দুর্বল, কেউ কেউ তাকে পরিত্যাগ করেছেন (গ্রহণ করেননি)।





অনুরূপভাবে মুনযেরীও `আত-তারগীব` (২/১০১) গ্রন্থে তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ তারা সকলেই আবুল মুসান্না সূত্রে বর্ণনা করেছেন অথচ তিনি দুর্বল যদিও তাকে কেউ কেউ নির্ভরযোগ্য বলেছেন। বাগাবী হাদীছটির শেষে বলেছেনঃ তাকে আবূ হাতিম নিতান্তই দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (527)


` الأضاحي سنة أبيكم إبراهيم، قالوا: فما لنا فيها؟ قال: بكل شعرة حسنة، قالوا: فالصوف؟ قال: بكل شعرة من الصوف حسنة `.
موضوع.

أخرجه ابن ماجة (2 / 273) والحاكم (2 / 389) عن عائذ الله بن عبد الله المجاشعي عن أبي داود السبيعي عن زيد بن أرقم قال: ` قال أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما هذه الأضاحي قال `: فذكره. وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `! فرده الذهبي بقوله: ` قلت: عائذ الله قال أبو حاتم: منكر الحديث `.
وهذا تعقب قاصر يوهم أنه سالم ممن فوق عائذ، قال المنذري بعد أن حكى تصحيح الحاكم: ` بل واهية، عائذ الله هو المجاشعي وأبو داود هو نفيع بن الحارث الأعمى وكلاهما ساقط `. وأبو داود هذا قال الذهبي فيه: ` يضع `. وقال ابن حبان: ` لا تجوز الرواية عنه، هو الذي روى عن زيد بن أرقم … ` فذكر الحديث.
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৫২৭। কুরবানী তোমাদের পিতা ইবরাহীম (আঃ)-এর সুন্নাত। তারা বললঃ তাতে আমাদের জন্য কী রয়েছে? তিনি বললেনঃ প্রত্যেক লোমের বিনিময়ে একটি করে হাসানাহ (ছাওয়াব) রয়েছে। তারা বললঃ পশম? তিনি বললেনঃ পশমের প্রতিটি লোমে একটি করে হাসানাহ (ছাওয়াব) রয়েছে।





হাদীছটি জাল।





এটি ইবনু মাজাহ (২/২৭৩) এবং হাকিম (২/৩৮৯) আয়েযুল্লাহ ইবনু আবদিল্লাহ আল-মুশাজেঈ সূত্রে আবু দাউদ আস-সাবী'ঈ হতে তিনি যায়েদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেনঃ সনদটি সহীহ আর হাফিয যাহাবী তার প্রতিবাদ করে বলেছেনঃ আয়েযুল্লাহ সম্পর্কে আবু হাতিম বলেনঃ তিনি মুনকারুল হাদীছ। এ সমালোচনাতে ঘাটতি রয়েছে, কারণ এতে সন্দেহ জাগায় যে, তার উপরের বর্ণনাকারী নিরাপদ। কারণ মুনযের হাকিম-এর সহীহ আখ্যা দানকে উল্লেখ করে বলেছেনঃ বরং তিনি নিতান্তই দুর্বল। আয়েযুল্লাহ হচ্ছেন আল-মুশাযে’ঈ আর আবু দাউদ হচ্ছেন নুফাঈ ইবনুল হারেস আল-আ'মা, তারা উভয়েই সাকেত (নিক্ষিপ্ত-গ্ৰহণ যোগ্য নয়)।





এই আবু দাউদ সম্পর্কে হাফিয যাহাবী বলেনঃ তিনি জালকারী। ইবনু হিব্বান বলেনঃ তার থেকে বর্ণনা করাই হালাল নয়। তিনিই যায়েদ ইবনু আরকাম হতে বর্ণনা করেছেন।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (528)


بترقيمي) ، ومع ذلك أورده في `الجامع الصغير`! وفي `الكبير` أيضاً (1/ 518) من رواية الحاكم في `تاريخه`.
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৫২৮। হে ফাতেমা! তোমার কুরবানীর নিকটে যাও এবং তা অবলোকন কর। কারণ তুমি যে সব গুনাহ করেছ তার রক্তের প্রথম ফোটা নির্গত হওয়ার সময়েই তোমাকে ক্ষমা করে দেয়া হবে। আর বলঃ `আমার সালাত, আমার কুরবানী, আমার জীবন এবং আমার মৃত্যু সারা জাহানের প্রতিপালক আল্লাহর জন্যে যার কোন শরীক নেই, এর জন্যেই আমাকে নির্দেশ দেয়া হয়েছে আর আমি মুসলিমদের দল ভুক্ত`।





ইমরান ইবনু হুসাইন বলেন, আমি বললামঃ হে আল্লাহর রাসূল। এটি আপনার, আপনার পরিবার এবং আপনাদের পরিবারের জন্য খাস নাকি আমভাবে সকল মুসলিমের জন্য? তিনি বললেনঃ না, আমভাবে সকল মুসলিমদের জন্য।





হাদীছটি মুনকার।





এটি হাকিম নযর ইবনু ইসমাঈল আল-বাজালী সূত্রে আবু হামযা ছুমালী হতে ... ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করে বলেছেনঃ সনদটি সহীহ! হাফিয যাহাবী তার প্রতিবাদ করে বলেছেনঃ বরং আবু হামযা খুবই দুর্বল, আর ইবনু ইসমাঈল সেরূপ নয়।





আবু হামযা (ছাবেত ইবনু আবী সুফিয়া) সূত্রে তাবারানী “আল-কাবীর” এবং “আল-আওসাত” গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন যেমনটি `আল-মাজমা` (৪/১৭) গ্রন্থে এসেছে। হাকিম তার একটি শাহেদ আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে উল্লেখ করেছেন। তবে ভাষায় কিছুটা ভিন্নতা রয়েছে। হাফিয যাহাবী তার প্রতিবাদ করে বলেছেনঃ আতিয়াহ দুর্বল। তার সূত্রেই বাযযার এবং আবুশ শাইখ ইবনু হাইয়্যান “কিতাবুয যহায়া” গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন যেরূপভাবে “আত-তারগীব” (২/১০২) গ্রন্থে এসেছে। ইবনু আবী হাতিম “আল-ইলাল” (২/৩৮-৩৯) গ্রন্থে বলেছেনঃ আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছিঃ উক্ত হাদীছটি মুনকার।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (529)


` من ضحى طيبة بها نفسه، محتسبا لأضحيته، كانت له حجابا من النار `.
موضوع.
قال الهيثمي في ` المجمع ` (4 / 17) وقد ذكره من حديث حسن بن علي: ` رواه الطبراني في ` الكبير ` وفيه سليمان بن عمرو النخعي وهو كذاب `. قلت: وقال ابن حبان فيه (1 / 330) : ` كان رجلا صالحا في الظاهر إلا أنه كان يضع الحديث وضعا `.
ومن سهو السيوطي أنه أورده في ` الجامع الصغير ` من هذا الوجه! ورده عليه شارحه المناوي بكلام الهيثمي هذا ثم قال: ` فكان ينبغي للمصنف حذفه من الكتاب `.
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৫২৯। যে ব্যক্তি নিজ খুশিতে কুরবানী করবে, তার কুরবানীর মাধ্যমে সম্ভষ্টি ও ছাওয়াব প্রাপ্তির আশায়, তার জন্য তা জাহান্নাম হতে পর্দা স্বরূপ হয়ে যাবে।





হাদীছটি জাল।





হায়ছামী `আল-মাজমা` (৪/১৭) গ্রন্থে বলেনঃ এটি হাসান ইবনু আলীর হাদীছ হতে বর্ণনা করা হয়ে থাকে। এটিকে তাবারানী `আল-মুজামুল কাবীর` গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। হাদীছটির সনদে সুলায়মান ইবনু আমর আন-নাখ'ঈ রয়েছেন, তিনি মিথ্যুক।





আমি (আলবানী) বলছিঃ সুলায়মান সম্পর্কে ইবনু হিব্বান (১/৩৩০) বলেনঃ তিনি বাহ্যিকভাবে একজন নেককার ব্যক্তি ছিলেন, কিন্তু তিনি হাদীছ জাল করতেন।





সুয়ূতীর ক্রটি এই যে, তিনি “আল-জামেউস সাগীর” গ্রন্থে এ সূত্রেই বর্ণনা করেছেন। তার ভাষ্যকার মানবী হায়ছামীর বক্তব্য দ্বারা তার প্রতিবাদ করে বলেছেনঃ লেখকের উচিত ছিল কিতাব হতে হাদীছটি মুছে ফেলা।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (530)


` أيها الناس ضحوا، واحتسبوا بدمائها، فإن الدم وإن وقع في الأرض، فإنه يقع في حرز الله عز وجل `.
موضوع.
قال الهيثمي وقد ذكره من حديث علي أيضا: ` رواه الطبراني في الأوسط، وفيه عمرو بن الحصين العقيلي وهو متروك الحديث `.
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৫৩০। হে মানুষ! তোমরা কুরবানী কর এবং তার রক্ত দ্বারা ছাওয়াব ও সম্ভষ্টি প্রত্যাশা কর। কারণ রক্ত যদিও যমীনে পড়ে তবুও তা প্রকৃতপক্ষে আল্লাহর হেফাযাতের মধ্যে পড়ে।





হাদীছটি জাল।





হায়ছামী বলেনঃ এটি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীছ হতেও উল্লেখ করা হয়েছে। যেটিকে তাবারানী “মুজামুল আওসাত” গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। যার সনদে আমর ইবনুল হুসাইন আল-উকায়লী রয়েছেন, তিনি মাতরূকুল হাদীছ।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (531)


` يخرج قوم هلكى لا يفلحون قائدهم امرأة، قائدهم في الجنة `.
منكر.
رواه أبو سعيد بن الأعرابي في ` المعجم ` (77 / 1) : أخبرنا الصاغاني: أخبرنا أبو نعيم أخبرنا عبد الجبار بن العباس عن عطاء بن السائب عن عمر بن الهجنع عن أبي بكرة قال: ` قيل له: ما منعك ألا تكون قاتلت عن
صبرتك يوم الجمل؟ فقال ` فذكره مرفوعا. ورواه أبو منصور بن عساكر في: ` الأربعين في مناقب أمهات المؤمنين ` (28 / 2 الحديث 12) من طريق الصغاني.
وأورده العقيلي في ` الضعفاء ` (289) وقال: حدثنا محمد بن عبيدة قال: حدثنا أبو نعيم به وقال: ` عمر بن الهجنع لا يتابع عليه، ولا يعرف إلا به وعبد الجبار بن العباس من الشيعة `. قلت: وهذا صدوق، وأما عمر بن الهجنع، فقال الذهبي تبعا للعقيلي: ` لا يعرف `. وأما ابن حبان فذكره في ` الثقات ` (1 / 145) على قاعدته في توثيق المجهولين، فلا يغتر به كما نبهنا عليه مرارا.
وعطاء بن السائب كان اختلط، فالحديث ضعيف منكر، وقد أورده ابن الجوزي في ` الموضوعات ` (2 / 10) من طريق العقيلي، وأعله بعبد الجبار هذا، فلم يصنع شيئا! ولذلك رد عليه السيوطي في ` اللآلي ` (1091) ثم ابن عراق في ` تنزيه الشريعة ` (195 / 1) بأن العقيلي أورده في ترجمة ابن الهجنع، فقال فيه ما سبق: ` متروك الحديث `. قلت: لأنه كان كذابا، فسقط حديثه.
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৫৩১। যাদের নেতৃত্ব দিবে নারী এমন একটি ধ্বংসপ্রাপ্ত জাতি প্রকাশ পাবে, তারা নাজাতপ্রাপ্ত হবে না। তবে তাদের নেতৃত্ব দানকারী জান্নাতী হবে।





হাদীছটি মুনকার।





এটি আবু সাঈদ ইবনুল আরাবী `আল-মু'জাম` (১/৭৭) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। আবু মানসূর ইবনু আসাকির `আল-আরবাউন ফী মানাকিবে উম্মাহাতিল মু'মেনীন` (২/২২৮ হাঃ ১২) গ্রন্থে সাগানী সূত্রে বর্ণনা করেছেন। উকায়লী `আয-যো'য়াফা` (২৮৯) গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেনঃ সনদের বর্ণনাকারী উমর ইবনু হাজান্না অনুসরণযোগ্য নয়। তার মাধ্যম ছাড়া হাদীছটিকে চেনা যায় না। আরেক বর্ণনাকারী আব্দুল জাব্বার ইবনুল আব্বাস শী'আহ সম্প্রদায়ভুক্ত।





আমি (আলবানী) বলছিঃ এই আব্দুল জাব্বার সত্যবাদী। তবে উমর ইবনু হাজান্না' সম্পর্কে উকায়লীর অনুসরণ করে হাফিয যাহাবী বলেনঃ তাকে চেনা যায় না। ইবনু হিব্বান তাকে `আছ-ছিকাত` (১/১৪৫) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন অপরিচিতদেরকে নির্ভরশীল আখ্যা দেয়া তার নীতি হওয়ার কারণে। তার এ নির্ভরযোগ্য আখ্যাদানের দ্বারা ধোকায় পড়া যাবে না। এ ব্যাপারে বার বার সতর্ক করা হয়েছে।





এ ছাড়া আরেক বর্ণনাকারী আতা ইবনুস সায়েবের মস্তিষ্ক বিকৃতি ঘটেছিল। অতএব হাদীছটি দুর্বল মুনকার। হাদীছটিকে ইবনুল জাওযী “আল-মাওযু'আত” (২/১০) গ্রন্থে উকায়লীর সূত্রে উল্লেখ করেছেন এবং আব্দুল জাব্বার দ্বারা সমস্যা বর্ণনা করেছেন। তিনি তাতে ঠিক কাজটি করেননি! এ কারণেই `আল-লাআলী` (১০৯১) গ্রন্থে সুয়ূতী এবং “তানযীহুশ শারীয়াহ` (১/১৯৫) গ্রন্থে উকায়লীর ভাষ্য দ্বারা তার প্রতিবাদ করেছেন। তিনি বলেনঃ ইবনুল হাজান্না মাতরূকুল হাদীছ।





আমি (আলবানী) বলছিঃ কারণ তিনি মিথ্যুক ছিলেন। অতএব তার হাদীছ গ্রহণযোগ্য নয়।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (532)


` إن الله نظر في قلوب العباد فلم يجد قلبا أنقى من أصحابي، ولذلك اختارهم، فجعلهم أصحابا، فما استحسنوا فهو
عند الله حسن، وما استقبحوا فهو عند الله قبيح `.
موضوع.
رواه الخطيب (4 / 165) من طريق سليمان بن عمرو النخعي: حدثنا أبان بن أبي عياش وحميد الطويل عن أنس مرفوعا. وقال: ` تفرد به النخعي `. قلت: وهو كذاب كما سبق مرارا، أقربها الحديث (529) ولهذا قال الحافظ ابن عبد الهادي: ` إسناده ساقط، والأصح وقفه على ابن مسعود `. نقله في ` الكشف ` (2 / 188) ويعني بالموقوف الحديث الآتي: ` ما رأى المسلمون حسنا فهو عند الله حسن، وما رآه المسلمون سيئا فهو عند الله سيء `.
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৫৩২। আল্লাহ তা'আলা বান্দাদের হৃদয়গুলোতে দৃষ্টি দিলে আমার সাথীদের চেয়ে পরিষ্কার পরিচ্ছন্ন হৃদয় আর কারো পাননি। যার জন্য আল্লাহ তাদেরকে চয়ন করে আমার সাথী বানিয়ে দিয়েছেন। অতএব তারা যা কিছু উত্তম মনে করেছে তাই আল্লাহর নিকট উত্তম। আর তারা যা কিছুকে মন্দ জেনেছে তাই আল্লাহর নিকট মন্দ।





হাদীছটি জাল।





এটি আল-খাতীব (৪/১৬৫) সুলায়মান ইবনু আমর আন-নাখ'ঈ সূত্রে আবান ইবনু আবী আইয়াশ হতে তিনি হুমায়েদ আত-তাবীল হতে তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করে বলেছেনঃ নাখ'ঈ এককভাবে বর্ণনা করেছেন।





আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি মিথ্যুক, বার বার তা উল্লেখ করা হয়েছে। নিকটবর্তী হাদীছটি হচ্ছে (৫২৯)। এ জন্যই হাফিয ইবনু আবদিল হাদী বলেছেনঃ তার সনদটি সাকেত (নিক্ষিপ্ত)। সঠিক হচ্ছে এই যে, এটি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ হতে মওকুফ হিসাবে সহীহ। এটিকে “আল-কাশফ” (২/১৮৮) গ্রন্থে উল্লেখ করা হয়েছে। মওকুফ হাদীছটি নিম্নরূপঃ (দেখুন পরের হাদিস)।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (533)


` ما رأى المسلمون حسنا فهو عند الله حسن، وما رآه المسلمون سيئا فهو عند الله سيء `.
لا أصل له مرفوعا.
وإنما ورد موقوفا على ابن مسعود قال: ` إن الله نظر في قلوب العباد فوجد قلب محمد صلى الله عليه وسلم خير قلوب العباد، فاصطفاه لنفسه، فابتعثه برسالته، ثم نظر في قلوب العباد بعد محمد صلى الله عليه وسلم فوجد قلوب أصحابه خير قلوب العباد، فجعلهم وزراء نبيه، يقاتلون على دينه فما رأى المسلمون.... ` إلخ.

أخرجه أحمد (رقم 3600) والطيالسي في ` مسنده ` (ص 23) وأبو سعيد ابن الأعرابي في ` معجمه ` (84 / 2) من طريق عاصم عن زر بن حبيش عنه. وهذا إسناد حسن. وروى الحاكم منه الجملة التي أوردنا في الأعلى وزاد في آخره: ` وقد رأى الصحابة جميعا أن يستخلفوا أبا بكر رضي الله عنه ` وقال: ` صحيح الإسناد ` ووافقه الذهبي. وقال الحافظ السخاوي: ` هو موقوف حسن `.
قلت: وكذا رواه الخطيب في ` الفقيه والمتفقه ` (100 / 2) من طريق المسعودي عن عاصم به إلا أنه قال: ` أبي وائل ` بدل ` زر بن حبيش `. ثم أخرجه من طريق عبد الرحمن بن يزيد قال: قال عبد الله: فذكره.
وإسناده صحيح. وقد روي مرفوعا ولكن في إسناده كذاب كما بينته آنفا. وإن من عجائب الدنيا أن يحتج بعض الناس بهذا الحديث على أن في الدين بدعة حسنة، وأن الدليل على حسنها اعتياد المسلمين لها! ولقد صار من الأمر المعهود أن يبادر هؤلاء إلى الاستدلال بهذا الحديث عندما تثار هذه المسألة وخفي عليهم.
أ - أن هذا الحديث موقوف فلا يجوز أن يحتج به في معارضة النصوص القاطعة في
أن ` كل بدعة ضلالة ` كما صح عنه صلى الله عليه وسلم.
ب - وعلى افتراض صلاحية الاحتجاج به فإنه لا يعارض تلك النصوص لأمور: الأول:
أن المراد به إجماع الصحابة واتفاقهم على أمر، كما يدل عليه السياق، ويؤيده استدلال ابن مسعود به على إجماع الصحابة على انتخاب أبي بكر خليفة، وعليه فاللام في ` المسلمون ` ليس للاستغراق كما يتوهمون، بل للعهد.
الثاني: سلمنا أنه للاستغراق ولكن ليس المراد به قطعا كل فرد من المسلمين، ولوكان جاهلا لا يفقه من العلم شيئا، فلابد إذن من أن يحمل على أهل العلم منهم، وهذا مما لا مفر لهم منه فيما أظن.
فإذا صح هذا فمن هم أهل العلم؟ وهل يدخل فيهم المقلدون الذين سدوا على أنفسهم باب الفقه عن الله ورسوله، وزعموا أن باب الاجتهاد قد أغلق؟ كلا ليس هؤلاء منهم وإليك البيان: قال الحافظ ابن عبد البر في ` جامع العلم ` (2 / 36 - 37) : ` حد العلم عند العلماء ما استيقنته وتبينته، وكل من استيقن شيئا وتبينه فقد علمه، وعلى هذا من لم يستيقن الشيء، وقال به تقليدا، فلم يعلمه، والتقليد عند جماعة العلماء غير الاتباع، لأن الاتباع هو أن تتبع القائل على ما بان لك من صحة قوله، والتقليد أن تقول بقوله وأنت لا تعرفه ولا وجه القول ولا معناه `.
ولهذا قال السيوطي رحمه الله: ` إن المقلد لا يسمى عالما ` نقله السندي في حاشية ابن ماجة (1 / 7) وأقره. وعلى هذا جرى غير واحد من المقلدة أنفسهم بل زاد بعضهم في الإفصاح عن هذه الحقيقة فسمى المقلد جاهلا فقال صاحب ` الهداية ` تعليقا على قول الحاشية: ` ولا تصلح ولاية القاضي حتى … يكون من أهل الاجتهاد ` قال (5 / 456) من ` فتح القدير `: ` الصحيح أن أهلية الاجتهاد شرط الأولوية، فأما تقليد الجاهل فصحيح عندنا، خلافا للشافعي `.
قلت: فتأمل كيف سمى القاضي المقلد جاهلا، فإذا كان هذا شأنهم، وتلك منزلتهم في العلم باعترافهم أفلا تتعجب معي من بعض المعاصرين من هؤلاء المقلدة كيف أنهم يخرجون عن الحدود والقيود التي وضعوها بأيديهم وارتضوها مذهبا لأنفسهم، كيف يحاولون الانفكاك
عنها متظاهرين بأنهم من أهل العلم لا يبغون بذلك إلا تأييد ما عليه العامة من البدع والضلالات، فإنهم عند ذلك يصبحون من المجتهدين اجتهادا مطلقا، فيقولون من الأفكار والآراء والتأويلات ما لم يقله أحد من الأئمة المجتهدين، يفعلون ذلك، لا لمعرفة الحق بل لموافقة العامة! وأما فيما يتعلق بالسنة والعمل بها في كل فرع من فروع الشريعة فهنا يجمدون على آراء الأسلاف، ولا يجيزون لأنفسهم مخالفتها إلى السنة، ولوكانت هذه السنة صريحة في خلافها، لماذا؟ لأنهم مقلدون! فهلا ظللتم مقلدين أيضا في ترك هذه البدع التي لا يعرفها أسلافكم، فوسعكم ما وسعهم، ولم تحسنوا ما لم يحسنوا، لأن هذا اجتهاد منكم، وقد أغلقتم بابه على أنفسكم؟! بل هذا تشريع في الدين لم يأذن به رب العالمين، (أم لهم شركاء شرعوا لهم من الدين ما لم يأذن به الله) وإلى هذا يشير الإمام الشافعي رحمة الله عليه بقوله المشهور: ` من استحسن فقد شرع `. فليت هؤلاء المقلدة إذ تمسكوا بالتقليد واحتجوا به - وهو ليس بحجة على مخالفيهم - استمروا في تقليدهم، فإنهم لوفعلوا ذلك لكان لهم العذر أو بعض العذر لأنه الذي في وسعهم، وأما أن يردوا الحق الثابت في السنة بدعوى التقليد، وأن ينصروا البدعة بالخروج عن التقليد إلى الاجتهاد المطلق، والقول بما لم يقله أحد من مقلديهم (بفتح اللام) ، فهذا سبيل لا أعتقد يقول به أحد من المسلمين. وخلاصة القول: أن حديث ابن مسعود هذا الموقوف لا متمسك به للمبتدعة، كيف وهو رضي الله عنه أشد الصحابة محاربة للبدع والنهي عن اتباعها، وأقواله وقصصه في ذلك معروفة في ` سنن الدارمي ` و` حلية الأولياء ` وغيرهما، وحسبنا الآن منها قوله رضي الله عنه: ` اتبعوا ولا تبتدعوا فقد كفيتم، عليكم بالأمر العتيق `. فعليكم أيها المسلمون بالسنة تهتدوا وتفلحوا.
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৫৩৩। যেটিকে মুসলিমরা ভাল জানে তা আল্লাহর নিকটে ভাল। আর যাকে মুসলিমরা মন্দ জানে তা আল্লাহর নিকটেও মন্দ।





মারফু' হিসাবে এটির কোন ভিত্তি নেই।





ইবনু মাসউদ হতে মওকুফ হিসাবে এসেছে।





এটিকে ইমাম আহমাদ (নং ৩৬০০), তায়ালিসী তার `মুসনাদ` (পৃঃ ২৩) এবং আবু সাঈদ ইবনুল আরাবী তার “মু'জাম` (২/৮৪) গ্রন্থে আসেম সূত্রে যার্‌র ইবনু হুবায়েশ হতে বর্ণনা করেছেন। এ সনদটি হাসান। এটি হাকিম বর্ণনা করে বলেছেনঃ সনদটি সহীহ। ইমাম যাহাবী তার সাথে একমত পোষণ করেছেন। হাফিয সাখাবী বলেছেনঃ মওকুফ হিসাবে হাসান।





আমি (আলবানী) বলছিঃ অনুরূপভাবে আল-খাতীব `আল-ফাকীহ ওয়াল মুতাফাক্কিহ` (২/১০০) গ্রন্থে মাসউদী সূত্রে বর্ণনা করেছেন। কিন্তু তিনি যার ইবনু হুবায়েশ-এর স্থলে আবু ওয়ায়েলকে উল্লেখ করেছেন। অতঃপর তিনি আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এ সনদটি সহীহ ।





মারফু' হিসাবে বর্ণনা করা হয়েছে। কিন্তু তার সনদে মিথ্যুক বর্ণনাকারী রয়েছে। যেমনটি কিছু পূর্বেই বর্ণনা করেছি।





আশ্চর্যজনক ব্যাপার এই যে, ধর্মের মধ্যে বিদ'আতে হাসানা (ভাল বিদ'আত) সাব্যস্ত করার জন্যে কিছু লোক এ হাদীছ দ্বারা দলীল গ্রহণ করে থাকে। বিদ'আতে হাসানার জন্যে দলীল গ্রহণ করাটা মুসলিমদের অভ্যাসগত ব্যাপার হয়ে দাঁড়িয়েছে। তারা এ হাদীছ দ্বারা দলীল গ্রহণ করার দিকে ধাবিত হয় অথচ তাদের নিকট নিম্নোক্ত বিষয়গুলো লুক্কায়িতই রয়ে গেছেঃ





ক। এ হাদীছটি মওকুফ, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সাব্যস্ত হওয়া সুস্পষ্ট দলীল সকল প্রকার বিদ'আতই ভ্ৰষ্টতা'-এর সাথে সাংঘর্ষিক। অতএব তা দ্বারা দলীল গ্রহণ করাই জায়েয নয় ।





খ। যদি ধরে নেয়া হয় যে দলীল গ্রহণ করার যোগ্য তাহলে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সাব্যস্ত দলীলের বিপক্ষে হওয়ার কারণে তা নিম্নোক্ত কারণে গ্রহণ যোগ্য নয়ঃ





১। এর দ্বারা কোন বিষয়ের উপর শুধুমাত্র সাহাবাগণের একমত হওয়াকেই বুঝানো হয়েছে। যার ইঙ্গিত বহণ করছে হাদীছটির অন্য অংশ। যাকে শক্তি যোগাচ্ছে ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে খলীফা হিসাবে নির্বাচিত করার বিষয়ে সাহাবাগণের একমত হওয়া দ্বারা দলীল গ্রহণ করা। এর ভিত্তিতে বলতে হচ্ছে যে আল-মুসলেমূন এর আলিফ ও লামটি ইসতিগরাকের (সবাইকে সম্পৃক্তকারী সূচক আলিফ-লাম) জন্য নয় যেমনটি তারা ধারনা করছে বরং এটি আলিফ-লামে আহাদ-এর জন্য অর্থাৎ নির্দিষ্ট মুসলিমদেরকে বুঝানো হয়েছে।





২। যদি ধরেইনি যে ইসতিগরাকের জন্য তাহলে অবশ্যই তা দ্বারা মুসলিমদের প্রত্যেক ব্যক্তিকে বুঝানো হচ্ছে এমনটি নয়। কারণ জাহেল (অজ্ঞ) ব্যক্তি যে কিছুই বুঝে না সে কোনক্রমেই এ মুসলিমদের অন্তর্ভুক্ত হতে পারে না। অতএব যারা (আহলে ইলম) জ্ঞানী তাদেরকেই বুঝানো হচ্ছে এমনটিই ধরে নিতে হবে।





যদি তাই হয় তাহলে আমাদেরকে জানতে হবে আহলে ইলম কারা? এই আহলে ইলমের দলে সেই সব মুকল্লিদ যারা নিজেদের উপর ইজতিহাদের পথকে বন্ধ করে ফেলেছে এবং ধারণা পোষণ করেছে যে, ইজতিহাদের দরজা বন্ধ হয়ে গেছে তারা অন্তর্ভুক্ত কি না? কখনই তারা তাদের অন্তর্ভুক্ত নয়। তার বিবরণ নিম্নে প্রদান করা হলোঃ





আল্লামা সুয়ূতী বলেনঃ إن المقلد لا يسمى عالما মুকাল্লিদ কখনও আলেম হতে পারে না। সিন্দী ইবনু মাজার (১/৭) হাশিয়াতে এটি নকল করেছেন এবং তা স্বীকার করেছেন।





মোটকথা ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই মওকুফ হাদীছ বিদ'আতীদের জন্য দলীল নয়। কিভাবে তা হতে পারে যেখানে তিনি নিজেই সাহাবাদের মধ্যে বিদ'আতের বিরুদ্ধে এবং তার অনুসরণ করতে নিষেধ করার ব্যাপারে যুদ্ধ ঘোষণায় কঠোর ছিলেন। তার বাক্য ও ঘটনাবলী “সুনানুদ্দারেমী` এবং `হিলইয়াতুল আওলিয়া` সহ অন্যান্য গ্রন্থে আলোচিত হয়েছে। তার নিম্নোক্ত বাক্যটিই আমাদের জন্য এ মূহুর্তে যথেষ্টঃ





اتبعوا ولا تبتدعوا فقد كفيتم، عليكم بالأمر العتيق





‘তোমরা অনুসরণ করো-বিদ’আত চালু করবে না-তোমাদের জন্য তাই যথেষ্ট। তোমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নির্দেশকে ধারণ কর।’





অতএব হে মুসলিম ভাইয়েরা, আপনারা সুন্নাতকে আঁকড়ে ধরুন হেদায়েত প্রাপ্ত হবেন এবং সফলকাম হবেন।















সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (534)


` الهر سبع `.
ضعيف.
رواه أحمد (2 / 442) والعقيلي (331) والبيهقي (1 / 251 - 252) عن عيسى بن المسيب عن أبي زرعة عن أبي هريرة مرفوعا. وهذا سند ضعيف من أجل عيسى بن المسيب، ضعفه ابن معين، وأبو زرعة والنسائي والدارقطني وغيرهم كما في ` الميزان ` للذهبي، ثم ساق له هذا الحديث وقال العقيلي: ` ولا يتابعه إلا من هو مثله أو دونه `.
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৫৩৪। বিড়াল হচ্ছে হিংস্র জন্তু।





হাদীছটি দুর্বল।





এটিকে ইমাম আহমাদ (২/৪৪২), উকায়লী (৩৩১) এবং বাইহাকী (১/২৫১-২৫২) ঈসা ইবনুল মুসাইয়্যাব হতে তিনি আবু যুর'আহ হতে তিনি আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।





এ সনদটি দুর্বল ঈসা ইবনুল মুসাইয়্যাবের কারণে। তাকে ইবনু মা'ঈন, আবূ যুর'আহ, নাসাঈ, দারাকুতনী ও অন্য বিদ্বানগণ দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন। যেরূপ ইমাম যাহাবীর `আল-মীযান` গ্রন্থে এসেছে। অতঃপর তিনি তার এ হাদীছটি উল্লেখ করেছেন। উকায়লী বলেনঃ যে তার ন্যায় বা তার চেয়ে নিম্ন মানের সে ছাড়া অন্য কেউ তার অনুসরণ করেনি।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (535)


` حمل العصا علامة المؤمن، وسنة الأنبياء `.
موضوع.

أخرجه الديلمي في ` مسند الفردوس ` (2 / 97 - زهر الفردوس) من طريق
يحيى بن هاشم الغساني عن قتادة عن أنس مرفوعا. قلت: وهذا موضوع، وإن ذكره السيوطي في ` الفتاوي ` (2 / 201) وسكت عليه! بل أورده في ` الجامع الصغير `! فقد تعقبه شارحه المناوي بأن الغساني هذا قال الذهبي في ` الضعفاء `: ` قالوا: كان يضع الحديث `.
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৫৩৫। লাঠি বহন করা মুমিনের আলামত এবং নবীগণের সুন্নাত।





হাদীছটি জাল।





হাদীছটি দাইলামী “মুসনাদুল ফিরদাউস” (২/৯৭) গ্রন্থে ইয়াহইয়া ইবনু হাশিম আল-গাসসানী সূত্রে কাতাদা হতে তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু' হিসাবে বর্ণনা করেছেন।





আমি (আলবানী) বলছিঃ এটি বানোয়াট। যদিও সুয়ূতী তার `আল-ফাতাওয়া` (২/২০১) গ্রন্থে উল্লেখ করে চুপ থেকেছেন। তিনি `আল-জামেউল সাগীর` গ্রন্থেও উল্লেখ করেছেন! এ জন্য তার ভাষ্যকার মানবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ এই গাসসানী সম্পর্কে ইমাম যাহাবী `আয-যোয়াফা` গ্রন্থে বলেনঃ তিনি হাদীছ জাল করতেন











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (536)


` كان للأنبياء كلهم مخصرة يتخصرون بها تواضعا لله عز وجل `.
موضوع.
رواه الديلمي من طريق وثيمة بن موسى عن سلمة بن الفضل عن محمد بن إسحاق عن الزهري عن سعيد بن المسيب عن ابن عباس رفعه. ذكره السيوطي في ` الفتاوي ` (2 / 201) وسكت عليه! ووثيمة هذا قال ابن أبي حاتم في ` الجرح ` (4 / 2 / 5) : ` روى عن سلمة أحاديث موضوعة `. واعلم أنه ليس في الباب في الحض على حمل العصا، حديث يصح، وأن حمل العصا من سنن العادة لا العبادة.
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৫৩৬। প্রত্যেক নবীরই লাঠি ছিল তার উপর ভর করে চলতেন আল্লাহ রব্বুল আলামীনের জন্য নম্রতা প্রকাশের লক্ষ্যে।





হাদীছটি জাল।





এটিকে দাইলামী ওয়াহীমা ইবনু মূসা সূত্রে সালামা ইবনুল ফযল হতে ... ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু' হিসাবে বর্ণনা করেছেন। সুয়ূতী “আল-ফাতাওয়া” গ্রন্থে (২/২০১) উল্লেখ করে চুপ থেকেছেন। এই ওয়াহীমা সম্পর্কে ইবনু আবী হাতিম “আল-জারহু” (৩/২/৫) গ্রন্থে বলেনঃ তিনি সালামা হতে জাল হাদীছ বর্ণনা করেছেন।





জেনে রাখুন! লাঠি বহন করাকে উৎসাহিত করে কোন সহীহ হাদীছ বর্ণিত হয়নি। এতটুকু বলা যায় যে, লাঠি বহন করা অভ্যাসগত সুন্নাত, ইবাদাতগত সুন্নত নয়।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (537)


538) :
`إن `ضعفاء` البخاري ليس هو بأشهر من ` تاريخ قزوين ` للرافعي بين أهل الحديث `!!!
ومن تناقض المناوي أنه بعد أن أعله في ` الشرح الكبير ` بتكذيب السفيانين اقتصر في `التيسير ` على قوله:
() كتب الشيخ رحمه الله فوق متن هذا الحديث: ` تقدم برقم (3255) فيحقق`. (الناشر) .
` ضعيف `!!
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৫৩৭। যে ব্যক্তি লাল গোলাপের ঘ্রাণ নিবে, অতঃপর আমার উপর দুরূদ পাঠ করবে না, সে আমার সাথে কর্কশ আচরণ করল।





হাদীছটি জাল।





সুয়ূতী “আল-ফাতাওয়া” (২/১৮৩, ১৯২, ২০৮) গ্রন্থে বলেছেনঃ হাদীছটি আব্দুর রহমান আস-সাফীর `নুযহাতুল মাজালেস` গ্রন্থে বর্ণিত সেই সব হাদীছের একটি যেগুলো নির্দ্বিধায় বাতিল।





আমি (আলবানী) বলছিঃ এ জন্যই সুয়ূতী “যায়লুল আহাদীছিল মাওষু'আহ” (৮৫,৮৬) গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন যে, এটি মরক্কোবাসী কোন ব্যক্তির তৈরি করা।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (538)


` من وجد ماله في الفيء قبل أن يقسم فهو له، ومن وجده بعدما قسم فليس له شيء `.
ضعيف.

أخرجه الدارقطني (ص 472) من طريق إسحاق بن عبد الله عن ابن شهاب عن سالم عن أبيه ابن عمر مرفوعا، وقال: ` إسحاق هو ابن أبي فروة متروك `. قلت: ثم رواه من طريق أخرى عن ابن عمر، وفيه رشدين بن سعد وهو ضعيف، ومن طريق أخرى عن ابن عباس مرفوعا نحوه. وفيه الحسن بن عمارة، وهو يضع. وقد روي من طرق أخرى ضعفها الزيلعي في ` نصب الراية ` (3 / 435) وروى الدارقطني وغيره معنى هذا الحديث عن عمر موقوفا عليه وهو ضعيف أيضا لانقطاعه كما قال الدارقطني وغيره.
وقد قال بهذا التفصيل الذي تضمنه هذا الحديث جماعة من العلماء، وذهب الشافعي وجماعة آخرون إلى أنه لا يملك أهل الحرب بالغلبة شيئا من المسلمين، ولصاحبه أخذه قبل القسمة وبعدها وهذا هو الحق الذي لا شك فيه وإن تبجح بعض الكتاب المعاصرين بخلافه، واعتبر ذلك من مفاخر الإسلام فقال:
` إن الإسلام قرر حق تملك الغنائم لمن حازها من المتحاربين، المسلمون وغيرهم في ذلك سواء `. وهذا باطل لأنه مع أنه لا مستند له إلا هذا الحديث الضعيف، فهو مخالف لحديث المرأة الصحابية التي أسرها المشركون، وكانوا أصابوا ناقة النبي صلى الله عليه وسلم (العضباء) ، فانفلتت المرأة ذات ليلة، وهربت على العضباء، فطلبوها فأعجزتهم، وقدمت فقالت: إنها نذرت إن أنجاها الله عليها لتنحرنها! فقال صلى الله عليه وسلم: ` لا نذر لابن آدم فيما لا يملك، ولا في معصية الله تبارك وتعالى `: رواه مسلم (5 / 78 - 79) وأحمد (4 / 429، 430 / 432، 434) .
فهذا صريح في أن هذه المرأة لم تملك هذه الناقة، ولوأن الأمر كما قال ذلك البعض، لكانت الناقة من حق هذه المرأة وهذا بين لا يخفى.
ثم وجدت ابن عبد الهادي في ` تنقيح التحقيق ` (2 / 374 - 375) استدل بهذا الحديث الصحيح لمذهب أحمد القائل: ` إذا استولى المشركون على أموال المسلمين لم يملكوها، (قال:) ووجه الحجة أنه لو ملكها المشركون ما أخذها رسول الله صلى الله عليه وسلم وأبطل نذرها، إنما أخذ الناقة لأنه أدركها غير مقسومة `.
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৫৩৮। যে ব্যক্তি তার মাল বন্টন করার পূর্বে ফায়ের মালের মধ্যে পাবে তা তার জন্যেই। আর যে ব্যক্তি বন্টন করার পরে পাবে তার জন্য তা হতে কোন কিছুই নেই।





হাদীছটি য'ঈফ।





এটি দারাকুতনী (পৃঃ ৪৭২) ইসহাক ইবনু আদিল্লাহ সূত্রে ইবনু শিহাব হতে ... ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করে বলেছেনঃ ইসহাক হচ্ছেন ইবনু আবী ফারওয়াহ। তিনি মাতরূক।





আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অন্য সূত্রেও বর্ণনা করেছেন। যাতে রিশদীন ইবনু সা’আদ রয়েছেন, তিনি দুর্বল। অন্য একটি সূত্রে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতেও মারফু' হিসাবে বর্ণনা করেছেন। যার সনদে আল-হাসান ইবনু আম্মারা রয়েছেন, তিনি হাদীস জালকারী।





হাদিসটি অন্যান্য সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে যেগুলোকে যায়লা'ঈ `নাসবুর রায়া` (৩/৪৩৫) গ্রন্থে দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন। দারাকুতনী ও অন্য বিদ্বানগণ এর অর্থবোধক হাদীছ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মওকুফ হিসাবে বর্ণনা করেছেন। সেটিও দুর্বল, সনদে বিচ্ছিন্নতা থাকার কারণে। দারাকুতনী ও অন্য বিদ্বানগণ এরূপই বলেছেন।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (539)


` لا تذكروني عند ثلاث: تسمية الطعام، وعند الذبح، وعند العطاس `.
موضوع.
رواه البيهقي (9 / 286) من طريق سليمان بن عيسى: أخبرني عبد الرحيم بن زيد العمي عن أبيه مرفوعا وقال: ` هذا منقطع، وعبد الرحيم وأبوه ضعيفان، وسليمان بن عيسى السجزي في عداد من يضع الحديث `. وذكر نحوه ابن عبد الهادي في ` تنقيح التحقيق ` (2 / 392) وعزاه للحاكم بدل البيهقي، والله أعلم.
وقال ابن حبان في عبد الرحيم (2 / 152) : ` يروي عن أبيه العجائب مما لا يشك من الحديث صناعته أنها معمولة أو مقلوبة كلها `. قلت: فإن سلم منهما فلن يسلم من السجزي.
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৫৩৯। তিনটি সময়ে তোমরা আমাকে স্মরণ করো নাঃ খাবারের জন্য বিসমিল্লাহ বলার সময়, যবেহ করার সময় এবং হাঁচি দেয়ার সময়।





হাদীছটি জাল।





এটিকে বাইহাকী (৯/২৮৬) সুলায়মান ইবনু ঈসা সূত্রে আব্দুর রহীম ইবনু যায়েদ আল-আম্মী হতে ... মারফু হিসাবে বর্ণনা করে বলেছেনঃ এটি মুনকাতি'। আব্দুর রহীম ও তার পিতা উভয়েই দুর্বল। আর সুলায়মান ইবনু ঈসা আস-সাজয়ীকে হাদীছ জালকারীদের মধ্যে গণ্য করা হয়।





অনুরূপ কথা ইবনু আব্দিল হাদী `তানকীহিত তাহকীক` (২/৩৯২) গ্রন্থে বলেছেন। আর বাইহাকীর পরিবর্তে হাকিমের উদ্ধৃতিতে বলেছেন। এই আব্দুর রহীম সম্পর্কে ইবনু হিব্বান (২/১৫২) বলেনঃ তিনি তার পিতা হতে আশ্চর্যজনক কিছু বর্ণনা করেছেন। কোন সন্দেহ নেই যে, সে সবগুলো তারই কৃতকর্ম বা উলট পালটকৃত।





আমি (আলবানী) বলছিঃ যদি তাদের দু'জন হতে সেগুলো নিরাপদও হয় তবুও সাজয়ী হতে নিরাপদ নয়।











সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (540)


` نهينا عن صيد كلب المجوسي وطائره `.
ضعيف.

أخرجه الترمذي (2 / 341) والبيهقي (9 / 245) من طريق شريك عن الحجاج
عن القاسم بن أبي بزة عن سليمان اليشكري عن جابر. وضعفه الترمذي بقوله: ` غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه `، والبيهقي بقوله: ` في هذا الإسناد من لا يحتج به `.
قلت: وهما شريك وهو ابن عبد الله القاضي، وهو ضعيف من قبل حفظه. والحجاج وهو بن أرطاة، وهو مدلس وقد عنعنه. وليس في الباب ما يشهد للحديث، ويمكن فهمه على وجهين: الأول: أن يكون كلب المجوسي صاد بإرسال صاحبه فعلى هذا لا يجوز أكل صيده فيكون معنى الحديث صحيحا.
الثاني: أن يكون الذي أرسله مسلما، وعلى هذا يحل صيده ولا يصح معنى الحديث وقد أوضح المسألة الإمام مالك أحسن التوضيح فقال في ` الموطأ ` (2 / 41) : `
الأمر المجتمع عليه عندنا أن المسلم إذا أرسل كلب المجوسي الضاري فصاد أو قتل أنه إذا كان متعلما فأكل ذلك الصيد حلال لا بأس به، وإن لم يذكه المسلم، وإنما مثل ذلك مثل المسلم يذبح بشفرة المجوسي، أو يرمي بقوسه، أو بنبله، فيقتل بها، فصيده ذلك وذبيحته حلال لا بأس بأكله، وإذا أرسل المجوسي كلب المسلم الضاري على صيد فأخذه فإنه لا يؤكل ذلك الصيد إلا أن يذكى، وإنما مثل ذلك مثل قوس المسلم ونبله، يأخذها المجوسي، فيرمي بها الصيد فيقتله، وبمنزلة شفرة المسلم يذبح بها المجوسي، فلا يحل أكل شيء من ذلك `.
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৫৪০। আমাদেরকে অগ্নিপূজকের কুকুর ও তার পাখী দ্বারা শিকারকৃত পশু (ভক্ষণ করা) হতে নিষেধ করা হয়েছে।





হাদীছটি য’ঈফ।





এটি ইমাম তিরমিয়ী (২/৩৪১), বাইহাকী (৯/২৪৫) শুরায়েক সূত্রে হাজ্জাজ হতে তিনি কাসিম ইবনু আবী বাযযাহ হতে তিনি সুলায়মান আল-ইয়াশকুরী হতে ... বর্ণনা করেছেন। তিরমিয়ী হাদীছটিকে দুর্বল বলেছেন তার এ ভাষায়ঃ এটি গারীব, এ মাধ্যম ছাড়া এটিকে আমি চিনি না।





বাইহাকীও দুর্বল বলেছেন তার এ ভাষায়ঃ এটির সনদে এমন ব্যক্তি রয়েছেন যাকে দলীল হিসাবে গ্রহণ করা যায় না।





আমি (আলবানী) বলছিঃ তারা দু'জন হচ্ছেন শুরায়েক ইবনু আবদিল্লাহ আল কাযী, তিনি তার মুখস্থ বিদ্যার দিক থেকে দুর্বল। আর হাজ্জাজ ইবনু আরতাত, তিনি মুদাল্লিস বর্ণনাকারী। আর এ অধ্যায়ে এমন কোন হাদীছ নেই যা আলোচ্য হাদীছটির জন্য সাক্ষী হতে পারে। আলোচ্য হাদীছটিকে আমরা দু’ভাবে বুঝতে পারিঃ





১। যদি অগ্নিপূজক তার কুকুরকে নিজেই প্রেরণের মাধ্যমে শিকার করে, তাহলে তার শিকারকৃত পশু খাওয়া যাবে না। তখন হাদীছটির অর্থ সহীহ হবে।





২। আর যদি কোন মুসলিম অগ্নিপূজকের কুকুরকে প্রেরণের মাধ্যমে শিকার করে তাহলে তার শিকারকৃত পশু খাওয়া যাবে, এ সময় হাদীছটির অর্থ সহীহ হবে না। ইমাম মালেক (রাহিমাহুল্লাহ) `আল-মুওয়াত্তা` (২/৪১) গ্রন্থে এ বিষয়ে বিস্তারিত আলোচনা করেছেন।