সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ
` ثلاث من أخلاق الإيمان: من إذا غضب لم يدخله غضبه في باطل، ومن إذا رضي لم يخرجه رضاه من حق، ومن إذا قدر لم يتعاط ما ليس له `.
موضوع.
أخرجه الطبراني في ` المعجم الصغير ` (ص 31) وعنه أبو نعيم في ` أخبار أصبهان ` (1 / 132) وابن بشران في ` الأمالي الفوائد ` (2 / 133 / 2) من طريق حجاج بن يوسف بن قتيبة الهمداني: حدثنا بشر بن الحسين عن الزبير بن عدي عن أنس بن مالك مرفوعا.
وقال الطبراني: ` لم يرو هـ عن الزبير بن عدي إلا بشر بن الحسين `. قلت: وهو كذاب كما سبق مرارا.
وقال الهيثمي (1 / 59) بعد أن عزاه للمعجم: ` وفيه بشر بن الحسين وهو كذاب `.
قلت: وراويه عنه الهمداني مجهول كما قال ابن المديني، والحديث مما سود به السيوطي ` جامعه `: ولهذا تعقبه شارحه المناوي بكلام الهيثمي المذكور ثم قال: ` فكان ينبغي للمصنف حذفه من هذا الكتاب `.
ولعل السيوطي اغتر باقتصار الحافظ العراقي على تضعيفه في ` تخريج الإحياء ` (4 / 307)
وهو منه قصور أو ذهو ل أو تسامح في التعبير لأن الحديث الموضوع من أقسام الحديث الضعيف، ثم إن الحديث هو أول حديث في ` نسخة الزبير بن عدي ` المحفوظة في ظاهرية دمشق حرسها الله تعالى.
৫৪১। ঈমানী চরিত্রের পরিচয় পাওয়া যায় তিনটি বস্তুতেঃ যখন কোন ব্যক্তি রাগাম্বিত হবে তখন তার রাগ কোন বাতিলকে ঘিরে হবে না। যখন সম্ভষ্ট হবে তখন তার সম্ভষ্টি হকের সীমা অতিক্রম করবে না। যখন সক্ষম হবে তখন যা তার নয় তা অন্য কাউকে দিবে না।
হাদীছটি জাল।
এটি তাবারানী `আল-মুজামুস সাগীর` (পৃঃ ৩১) গ্রন্থে, তার থেকে আবু নোয়াইম `আখবারু আসবাহান` (১/১৩২) গ্রন্থে এবং ইবনু বিশরান “আল-আমলীল ফাওয়ায়েদ` (২/১৩৩/২) গ্রন্থে হাজ্জাজ ইবনু ইউসুফ ইবনে কুতায়বাহ হামাদানী হতে তিনি বিশর ইবনুল হুসাইন হতে তিনি যুবায়ের ইবনু আদী হতে ... আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
তাবারানী বলেনঃ বিশর ইবনুল হুসাইন ছাড়া অন্য কেউ যুবায়ের হতে বর্ণনা করেননি।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি (বিশর) মিথ্যুক। হায়ছামী (১/৫৯) বলেনঃ তাতে বিশর ইবনুল হুসাইন রয়েছেন, তিনি মিথ্যুক।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তার থেকে বর্ণনাকারী আল-হামাদানী মাজহুল যেমনটি ইবনুল মাদীনী বলেছেন। সুয়ূতী তার “আল-জামে” গ্রন্থে উল্লেখ করে কালিমালিপ্ত করেছেন। এ কারণে তার ভাষ্যকার মানবী হায়ছামীর উক্ত কথা দ্বারা তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ লেখকের উচিত ছিল হাদীছটিকে এ গ্রন্থ হতে ফেলে দেয়া।
হাফিয ইরাকী যে “তাখরাজুল ইহইয়া” (৪/৩০৭) গ্রন্থে শুধুমাত্র দুর্বল বলেছেন, তা তার থেকে এক ধরনের ভুল বা শিথিলতা। কারণ জাল হাদীছ দুর্বল হাদীছগুলোরই একটি প্রকার।
الروض) . والله أعلم.
وإبراهيم بن العلاء مختلف فيه، فقال أبو داود:
`ليس بشيء`.
وذكره ابن حبان في `الثقات` (8/71) . وقال فيه أبو حاتم (1/121) :
`صدوق`.
لكنهم ذكروا أنه كان له ولد يسوِّي الأحاديث، فأنكروا عليه حديث `استعتبوا
الخيل` فقالوا:إنه من عمل ابنه!! انظر الحديث المتقدم (2755) .
وأما محمد بن إبراهيم، فهو كابن أخيه عمرو بن إسحاق لم أجد له ترجمة.
وبقية بن الوليد ثقة، ولكنه مدلس، وقد عنعنه - كما ترى - .
إذا عرفت هذا، فإن من عجائب الهيثمي قوله عقب الحديث (9/379) :
رواه الطبراني، بإسناد حسن`.
وذلك لأن من عادته - على القاعدة العلمية - إعلال رواية بقية المعنعنة
بالتدليس الذي عرف به. ومع ذلك فقد وجدته حسَّن إسناده هنا، مع ما في
الطريق إليه من ضعف.
وعلى العكس من هذا وجدته فِي حَدِيثِ آخر لبقية في فضل ضمرة بن
ثعلبة عزاه لأحمد والطبراني، ومع أن هذا قد وقع في إسناده تصريح بقية
بالتحديث. ومع ذلك أعله بأن بقية مدلس! وقد وافق الطبراني على التصريح
المذكور بعض الرواة الثقات عن بقية عند البخاري في `تاريخه`، والبزار في
`مسنده` في الحديث الآخر المشار إليه، وقد خرجته في `الصحيحة` (3018) .
৫৪২। তোমরা হজ্জ কর, কারণ হজ্জ গুনাহগুলোকে ধুয়ে ফেলে যেরূপ পানি ময়লাগুলোকে ধুয়ে ফেলে।
হাদীছটি জাল।
এটিকে আবুল হাজ্জাজ ইউসুফ ইবনু খালীল “আস-সুবাঈয়াত” (১/১৮/১) গ্রন্থে ইয়ালা ইবনুল আশদাক হতে আব্দুল্লাহ ইবনু জারাদ হতে ... বর্ণনা করেছেন। একই সূত্রে তাবারানী “মুজামুল আওসাত” গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। যেরূপ `আল-মাজমা` (৩/২০৯) ও `আল-জামে` গ্রন্থে এসেছে। হায়ছামী বলেনঃ এটির মধ্যে ইয়ালা ইবনুল আশদাক রয়েছেন, তিনি মিথ্যুক।
` حجوا قبل أن لا تحجوا: يقعد أعرابها على أذناب أو ديتها، فلا يصل إلى الحج أحد `.
باطل.
رواه أبو نعيم في ` أخبار أصفهان ` (2 / 76 - 77) والبيهقي (4 / 341) والخطيب في ` التلخيص ` (96 / 2) من طريق عبد الله بن عيسى بن بحير: حدثني محمد بن أبي محمد عن أبيه عن أبي هريرة مرفوعا.
قلت: عبد الله هذا هو الجندي، ذكره العقيلي في ` الضعفاء `، وساق له هذا الحديث وقال: ` إسناد مجهول فيه نظر ` وقال الذهبي: ` إسناد مظلم، وخبر منكر `.
وقال في ` المهذب ` كما في المناوي: ` إسناده واه `. وشيخه محمد بن أبي محمد مجهول كما قال أبو حاتم، وأما ابن حبان فأورده في ` الثقات ` (2 / 268) ! وساق له هذا الحديث ثم قال: ` وهذا خبر باطل، وأبو محمد لا يدرى من هو؟ ` يعني أنه هو علة الحديث. والله أعلم.
৫৪৩। তোমাদেরকে হজ্জ করার সুযোগ না দেয়ার পূর্বেই নিজেরা হজ্জ কর। গ্রাম্য লোকেরা কাবার ওয়াদির অলি-গলিতে বসে থাকবে। ফলে হজ্জ আদায় করার জন্য কোন ব্যক্তি পৌঁছতে পারবে না।
হাদীছটি বাতিল।
হাদীছটি আবু নোয়াইম `আখবারু আসফাহান` (২/৭৬-৭৭) গ্রন্থে, বাইহাকী (৪/৩৪১), আল-খাতীব “আত-তালখীস` (২/৯৬) গ্রন্থে আব্দুল্লাহ ইবনু ঈসা ইবনে বুহায়ের সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু আবী মুহাম্মাদ হতে তিনি তার পিতা হতে ... আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু' হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এই আব্দুল্লাহ হচ্ছেন জানাদী। তাকে উকায়লী `আয-যোয়াফা` গ্রন্থে উল্লেখ করে তার এ হাদীছটি বর্ণনা করেছেন। অতঃপর বলেছেনঃ সনদটি মাজহুল, এতে বিরূপ মন্তব্যও রয়েছে। ইমাম যাহাবী বলেনঃ সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন আর খবরটি মুনকার। তিনি `আল-মুহাযযাব` গ্রন্থে বলেনঃ হাদীছটির সনদ নিতান্তই দুর্বল।
আব্দুল্লাহর শাইখ মুহাম্মাদ মাজহুল যেরূপ আবু হাতিম বলেছেন। তবে ইবনু হিব্বান তাকে `আছ-ছিকাত` (২/২৬৮) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন তিনি তার এ হাদীছটি উল্লেখ করে বলেছেনঃ এ খবরটি বাতিল। আবু মুহাম্মাদ কে জানা যায় না। তিনিই হচ্ছেন হাদীছটির সমস্যা।
` حجوا قبل أن لا تحجوا، فكأني أنظر إلى حبشي أصمع، أفدع، بيده معول يهدمها حجرا حجرا `.
موضوع.
أخرجه الحاكم (1 / 148) وأبو نعيم (4 / 131) والبيهقي (4 / 340) عن يحيى بن عبد الحميد الحماني: حدثنا حصين بن عمر الأحمسي: حدثنا الأعمش عن إبراهيم التيمي عن الحارث بن سويد عن علي مرفوعا.
سكت عليه الحاكم وتعقبه الذهبي بقوله:
` قلت: حصين واه، ويحيى الحماني ليس بعمدة `.
وأقول: حصين كذاب كما قال ابن خراش وغيره. وقال الحاكم: (1 / 268) :
` يروي الموضوعات عن الأثبات ` وقد تفرد بهذا الحديث كما قال أبو نعيم.
وأما الحماني، فقد تابعه جبارة عند ابن عدي (102 / 2) في ترجمة حصين هذا وقال: ` عامة أحاديثه معاضيل `.
৫৪৪৷ তোমাদেরকে হজ্জ করার সুযোগ না দেয়ার পূর্বেই নিজেরা হজ্জ কর। আমি যেন ক্ষুদ্র কান এবং হাতের ও পায়ের জোড়া বাকা বিশিষ্ট এক হাবশীকে দেখছি যার হাতে একটি হাতুড়ি রয়েছে সে (কাবা গৃহের) পাথরগুলোকে একটি একটি করে ভেঙ্গে ফেলছে।
হাদীছটি জাল।
এটি হাকিম (১/১৪৮), আবু নোয়াইম (৪/১৩১) এবং বাইহাকী (৪/৩৪০) ইয়াহইয়া ইবনু আব্দিল হামীদ আল-হিম্মানী হতে তিনি হুসাইন ইবনু উমার আল-আহমাসী হতে তিনি আমাশ হতে ... বর্ণনা করেছেন।
হাকিম কোন হুকুম সিদ্ধান্ত প্রদান হতে চুপ থেকেছেন। এ কারণে হাফিয যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ হুসাইন দুর্বল আর ইয়াহইয়া আল-হিম্মানী ভাল নয়।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হুসাইন মিথ্যুক যেরূপ ইবনু খাররাশ ও অন্য বিদ্বানগণ বলেছেন। আর ইবনু হিব্বান (১/২৬৮) বলেছেনঃ তিনি নির্ভরযোগ্যদের উদ্ধৃতিতে জাল হাদীছ বর্ণনাকারী। তিনি এককভাবে এ হাদীছটি বর্ণনা করেছেন যেমনটি আবু নোয়াইম বলেছেন।
` من غش العرب لم يدخل في شفاعتي، ولم تنله مودتي `.
موضوع.
أخرجه الترمذي (4 / 376) وأحمد رقم (519) ومن طريقه العراقي في ` محجة القرب إلى محبة العرب ` (8 / 2) وعبد بن حميد في ` المنتخب من المسند ` (8 / 1) وأبو سعيد بن الأعرابي في ` معجمه ` (136 / 2) من طريق حصين بن عمر عن مخارق بن عبد الله عن طارق بن شهاب عن عثمان بن عفان مرفوعا.
وقال الترمذي: ` حديث غريب لا نعرفه إلا من حديث حصين بن عمر الأحمسي، وليس عند أهل الحديث بذاك القوي `. قلت: بل هو كذاب عند غير واحد منهم، كما سبق ذكره قبل هذا، وحديثه هذا معارض لما صح عنه صلى الله عليه وسلم من قوله: ` شفاعتي لأهل الكبائر من أمتي `. وهو مخرج في ` الروض النضير ` رقم (43،
65) ، و` المشكاة ` (5598 و5599) .
৫৪৫। যে ব্যক্তি আরবদের সাথে প্রতারণা করবে, সে আমার শাফায়াতের অন্ত ভূক্ত হবে না। আর আমার ভালবাসাও তাকে গ্রহণ করবে না।
হাদীছটি জাল।
এটি ইমাম তিরমিযী (৪/৩৭৬), ইমাম আহমাদ (নং ৫১৯) এবং তার সূত্রে হাফিয ইরাকী `মহাজ্জাতুল কুরবে ইলা মুহাব্বাতিল আরাব` (২/৮) গ্রন্থে, আব্দ ইবনু হুমায়েদ `আল-মুস্তাখাব মিনাল মুসনাদ` (১/৮) গ্রন্থে এবং আবু সাঈদ ইবনুল আরাবী তার `মুজাম` (২/১৩৬) গ্রন্থে হুসাইন ইবনু উমার সূত্রে মুখারিক ইবনু আবদিল্লাহ হতে তিনি তারেক ইবনু শিহাব হতে ... উছমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু' হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
ইমাম তিরমিয়ী বলেনঃ হাদীছটি গরীব। হুসাইন ইবনু উমার আল-আহমাসী ছাড়া অন্য কোন মাধ্যমে হাদীছটিকে চিনি না। আর তিনি হাদীছবিদদের নিকট শক্তিশালী নন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ বরং তিনি তাদের একাধিক ব্যক্তির নিকট মিথ্যুক। এ হাদীছটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সাব্যস্ত সহীহ হাদীছের সাথে সাংঘর্ষিক। তিনি বলেছেনঃشفاعتي لأهل الكبائر من أمتي `আমার শাফা'আত আমার উম্মতের কাবীরা গুনাহকারীদের জন্য।` “আর-রাওযুন নায়ীর` (নং ৪৩,৬৫) গ্রন্থে এবং `মিশকাত` (৫৫৯৮,৫৫৯৯) গ্রন্থে এটির তাখরীজ করা হয়েছে।
` للإمام سكتتان، فاغتنموا القراءة فيهما بفاتحة الكتاب `.
لا أصل له مرفوعا.
وإنما رواه البخاري في ` جزء القراءة ` (ص 33) عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف قال: فذكره موقوفا عليه. قلت: وإسناده حسن.
ثم رواه عن أبي سلمة عن أبي هريرة موقوفا عليه، وسنده حسن أيضا. (1)
والذي دعاني إلى التنبيه على بطلان رفعه أنني رأيت ما نقله بعضهم في تعليقه على قول النووي في ` الأذكار ` (ص 63) : ` إنه يستحب للإمام في الصلاة الجهرية أن يسكت بعد التأمين سكتة طويلة بحيث يقرأ المأموم الفاتحة `. فقال المعلق عليه وهو الشيخ محمد حسين أحمد: ` قال الحافظ: دليل استحباب تطويل هذه السكتة حديث أبي سلمة بن عبد الرحمن
(1) قلت: فيه دليل على أبي هريرة في ` مسلم `: ` اقرأ بها في نفسك يا فارسي ` إنما يعني قراءتها في سكتات الإمام إن وجدت. وهذه فائدة هامة. فخذها شاكرا الله تعالى.
أن للإمام سكتتين.... أخرجه البخاري في كتاب ` القراءة خلف الإمام ` وأخرجه فيه أيضا عن أبي سلمة عن أبي هريرة. وعن عروة بن الزبير قال: يا بني اقرؤوا إذا سكت الإمام، واسكتوا إذا جهر، فإنه لا صلاة لمن لم
يقرأ بفاتحة الكتاب `. فقوله: ` حديث أبي سلمة.... ` فيه إيهام كبير أنه حديث مرفوع إلى النبي صلى الله عليه وسلم وأن اللفظ من قوله صلى الله عليه وسلم كما هو المتبادر عند الإطلاق، وراجعني من أجل ذلك بعض الشافعية محتجا به! فبينت له أن الحديث ليس هو من كلامه صلى الله عليه وسلم، وإنما هو مقطوع موقوف على أبي سلمة، حتى ولوكان مرفوعا لكان ضعيفا لأنه مرسل تابعي.
ثم قلت: ولوصح عنه صلى الله عليه وسلم لما كان حجة لكم بل هو عليكم! قال كيف؟ قلت: لأنه يقول: ` فاغتنموا القراءة في السكتتين ` وهما سكتة الافتتاح وسكتة بعد القراءة، وأنتم لا تقولون بقراءة الفاتحة أو بعضها في السكتة الأولى!
نعم نقل ابن بطال عن الشافعي أن سبب سكوت الإمام السكتة الأولى ليقرأ المأموم فيها الفاتحة. لكن الحافظ تعقبه في ` الفتح ` (2 / 182) بقوله: ` وهذا النقل من أصله غير معروف عن الشافعي، ولا عن أصحابه، إلا أن الغزالي قال في ` الإحياء `: إن المأموم يقرأ الفاتحة إذا اشتغل الإمام بدعاء الافتتاح وخولف في ذلك، بل أطلق المتولي وغيره كراهية تقديم المأموم قراءة الفاتحة على الإمام `. وكذلك قول عروة المتقدم حجة على الشافعية، لأنه يأمر المؤتم بالسكوت إذا جهر الإمام. وهذا هو أعدل الأقوال في مسألة القراءة وراء الإمام، أن يقرأ إذا أسر الإمام، وينصت إذا جهر. وقد فصلت القول في هذه المسألة وجمعت الأحاديث الواردة فيها في تخريج أحاديث ` صفة صلاة النبي صلى الله عليه وسلم `.
৫৪৬। ইমামের জন্য দুটি সাকতা (চুপ থাকার সময়) রয়েছে, অতএব তোমরা দুই সাকতার সময় সূরা ফাতিহা পাঠ করার সুযোগ গ্রহণ কর।
হাদীছটির মারফু' হিসাবে কোন ভিত্তি নেই।
এটিকে ইমাম বুখারী `জুযউল কিরাআহ` (পৃঃ ৩৩) গ্রন্থে আবু সালামা ইবনু আদির রহমান ইবনে আউফ হতে মওকুফ হিসাবে বর্ণনা করেছেন। আমি (আলবানী) বলছিঃ তার সনদটি হাসান।
অতঃপর তিনি আবু সালামা হতে তিনি আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মওকুফ হিসাবে বর্ণনা করেছেন। তার সনদটিও হাসান।
ইমাম নাবাবী “আল-আযকার” (পূঃ ৬৩) গ্রন্থে বলেনঃ সালাতুয যেহরিয়াতে ইমামের জন্য মুস্তাহাব হচ্ছে এই যে, আমীন বলার পর দীর্ঘক্ষণ চুপ থাকবে যাতে করে মুক্তাদীগণ সূরা ফাতিহা পড়ে নিতে পারেন। তার উপর টীকা লেখক শাইখ মুহাম্মাদ হুসাইন আহমাদ বলেনঃ হাফিয ইবনু হাজার বলেছেনঃ দীর্ঘক্ষণ চুপ থাকা মুস্তাহাব হওয়ার দলীল হচ্ছে আবু সালামা ইবনু আবদির রহমানের হাদীছঃ ইমামের জন্য দুটি সাকতা রয়েছে...। হাদীছটি ইমাম বুখারী “আল-কিরাআতু খালফাল ইমাম` গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। তিনি তাতে আবু সালামা সূত্রে আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এবং উরওয়াহ ইবনুয যুবায়ের হতেও বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেনঃ হে আমার সন্তানেরা, তোমরা সূরা ফাতিহা পাঠ করবে যখন ইমাম চুপ থাকবে। আর চুপ থাকবে যখন ইমাম উচু স্বরে পাঠ করবে। কারণ যে ব্যক্তি সূরা ফাতিহা পাঠ না করবে তার সালাতই হবে না।
তার ভাষ্যে যে বলেছেনঃ হাদীছ আবী সালাম... , এ কথা বলাতে সন্দেহ হতে পারে যে এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পর্যন্ত মারফু হাদীছ। যার জন্য এখানে হাদীছটি উল্লেখ করে সতর্ক করে দেয়া হয়েছে যে, এটি মারফু নয় বরং এটি মওকুফ।
` كان للنبي صلى الله عليه وسلم سكتتان، سكتة حين يكبر، وسكتة حين يفرغ من قراءته `.
ضعيف.
أخرجه البخاري في ` جزء القراءة ` (ص 23) وأبو داود والترمذي وابن ماجة وغيرهم من حديث الحسن البصري عن سمرة بن جندب. وهذا سند ضعيف أعله الدارقطني في سننه (ص 138) بالانقطاع فقال عقب الحديث: ` الحسن مختلف في سماعه من سمرة، وقد سمع منه حديثا واحدا، وهو حديث العقيقة `.
قلت: ثم هو على جلالة قدره مدلس كما سبق التنبيه على ذلك مرارا، ولم أجد تصريحه بسماعه لهذا الحديث بعد مزيد البحث والتفتيش عن طرقه إليه، فلو سلم أنه ثبت سماعه من سمرة لغير حديث العقيقة، لما ثبت سماعه لهذا، كما لا يخفى على المشتغلين بعلم السنة المطهرة. ثم إن للحديث علة أخرى وهي الاضطراب في متنه.
ففي هذه الرواية أن السكتة الثانية محلها بعد الفراغ من القراءة، وفي رواية ثانية: بعد الفراغ
من قراءة الفاتحة، وفي الأخرى بعد الفراغ من الفاتحة وسورة عند الركوع. وهذه الرواية الأخيرة هي الصواب في الحديث لوصح، لأنه اتفق عليها أصحاب الحسن، يونس، وأشعث، وحميد الطويل، وقد سقت رواياتهم في ذلك في ` ضعيف سنن أبي داود ` (رقم 135 و138) ونقلت فيه عن أبي بكر الجصاص أنه قال: ` هذا حديث غير ثابت `. فبعد معرفة علة الحديث لا يلتفت المنصف إلى قول من حسنه. وإذا عرفت هذا فلا حجة للشافعية في هذا الحديث على استحبابهم السكوت للإمام بقدر ما يقرأ المأموم الفاتحة، وذلك لوجوه:
الأول: ضعف سند الحديث.
الثاني: اضطراب متنه.
الثالث: أن الصواب في السكتة الثانية
فيه أنها قبل الركوع بعد الفراغ من القراءة كلها لا بعد الفراغ من الفاتحة.
الرابع: على افتراض أنها أعني السكتة بعد الفاتحة، فليس فيه أنها طويلة بمقدار ما يتمكن المقتدي من قراءة الفاتحة! ولهذا صرح بعض المحققين بأن هذه السكتة الطويلة بدعة فقال شيخ الإسلام ابن تيمية في ` الفتاوى ` (2 / 146 - 147) :
` ولم يستحب أحمد أن يسكت الإمام لقراءة المأموم، ولكن بعض أصحابه استحب ذلك، ومعلوم أن النبي صلى الله عليه وسلم لوكان يسكت سكتة تتسع لقراءة الفاتحة لكان هذا مما تتوفر الهمم والدواعي على نقله، فلما لم ينقل هذا أحد، علم أنه لم يكن، وأيضا فلوكان الصحابة كلهم يقرؤون الفاتحة خلفه صلى الله عليه وسلم، إما في السكتة الأولى وإما في الثانية لكان هذا مما تتوفر الهمم والدواعي على نقله فكيف ولم ينقل أحد من الصحابة أنهم كانوا في السكتة الثانية يقرءون الفاتحة، مع أن ذلك لوكان شرعا لكان الصحابة أحق الناس بعلمه، فعلم أنه بدعة `.
قلت: ومما يؤيد عدم سكوته صلى الله عليه وسلم تلك السكتة الطويلة قول أبي هريرة رضي الله عنه: ` كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا كبر للصلاة سكت هنية، فقلت: يا رسول الله أرأيت سكوتك بين التكبير والقراءة ماذا تقول؟ قال أقول: اللهم باعد بيني وبين خطاياي.... ` الحديث فلو كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسكت تلك السكتة بعد الفاتحة بمقدارها لسألوه عنها كما سألوه عن هذه.
৫৪৭। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাতে দু'টি সাকতা ছিল। একটি সাকতা যখন তাকবীর দিতেন, আরেকটি সাকতা যখন তার কিরাআত সমাপ্ত করতেন।
হাদীছটি দুর্বল।
ইমাম বুখারী `জুযউল কিরাআহ` (পৃঃ ২৩), আবু দাউদ তিরমিয়ী, ইবনু মাজাহ ও অন্য বিদ্বানগণ হাসান বাসরীর হাদীছ হতে সামুরা ইবনু জুন্দুব থেকে বর্ণনা করেছেন। এ সনদটি দুর্বল। দারাকুতনী তার `সুনান` (পৃঃ ১৩৮) গ্রন্থে সনদে বিচ্ছিন্নতা রয়েছে বলে সমস্যা বর্ণনা করেছেন। অতঃপর বলেছেনঃ হাসান সামুরা হতে শুনেছেন কি না তাতে মতভেদ রয়েছে। তিনি তার থেকে মাত্র একটি হাদীছ শুনেছেন। সেটি হচ্ছে আকীকার হাদীছ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি (হাসান) সম্মানিত ব্যক্তি হওয়া সত্ত্বেও মুদাল্লিস ছিলেন। যেমনটি বার বার তার সম্পর্কে আলোচনা করা হয়েছে। তিনি যে আলোচ্য হাদীছটি সামুরা হতে শুনেছেন তা সাব্যস্ত হয়নি।
এ হাদীছটির আরেকটি সমস্যা হচ্ছে হাদীছের বাক্যে ইযতিরাব সংঘটিত হয়েছে। কারণ ভিন্ন বর্ণনায় এসেছে সূরা ফাতিহা পাঠ শেষে সাকতার কথা, আরেক বর্ণনায় এসেছে সূরা ফাতিহা এবং আরেকটি সূরা পাঠ শেষে রূকুর সময় সাকতা।
এই শেষোক্ত বাক্যটিই সঠিকের বেশী নিকটবর্তী। কারণ হাসানের ছাত্ররা এ বাক্যের উপরই একমত হয়েছেন।
আবু বাকর আল-জাসসাস বলেনঃ এ হাদীছটি সাব্যস্ত হয়নি।
নিম্নে বর্ণিত কারণে এ হাদীছটি শাফেঈ মাযহাবের অনুসারীদের জন্য সাকতা মুস্তাহাব হওয়ার জন্য দলীল হতে পারে নাঃ
১। হাদীছটির সনদ দুর্বল।
২ । তার মতনে ইযতিরাব।
৩। দ্বিতীয় সাকতার ব্যাপারে সঠিক হচ্ছে এই যে, সেটি হবে রূকুর পূর্বে সকল প্রকার কিরাআত হতে মুক্ত হওয়ার পর, সূরা ফাতিহার শেষে নয়।
৪। যদি ধরে নেয়া হয় এই সাকতা দ্বারা সূরা ফাতিহা পাঠের পরের সাকতা বুঝানো হচ্ছে। তাহলে বলতে হবে যে এই সাকতা এমন দীর্ঘ নয় যে, তাতে মুক্তাদীগণ সূরা ফাতিহা পাঠ করতে সক্ষম হবে। এ জন্যেই কোন কোন মুহাক্কিক বলেছেন যে, এই দীর্ঘ সাকতা বিদ'আত। শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ “আল-ফাতাওয়া` (২/১৪৬-১৪৭) গ্রন্থে বলেছেনঃ ইমাম আহমাদ মুক্তাদির কিরাআতের জন্য ইমাম কর্তৃক সাকতা করাকে মুস্তাহাব মনে করেননি। তার কোন কোন সাথী তাকে মুস্তাহাব বলেছেন। এটি জানা কথা যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যদি সূরা ফাতিহা পড়া যায় এরূপ দীর্ঘ সাকতা দিতেন তাহলে অবশ্যই তা আমাদের নিকট যথাযথভাবে বর্ণনা হয়ে আসত। অতএব যখন কেউ এটি নকল করেননি তখন বুঝা যাচ্ছে তা ছিল না। এ ছাড়া সকল সাহাবাগণ যদি ইমামের পিছনে প্রথম অথবা দ্বিতীয় সাকতার মধ্যে সূরা ফাতিহা পাঠ করতেন, তাহলেও তা যথাযথভাবে বর্ণিত হয়ে আসত। এটি কিভাবে যেখানে একজন সাহাবাও বর্ণনা করেননি যে, তারা দ্বিতীয় সাকতাতে সূরা ফাতিহা পাঠ করতেন। যদি শরীয়তের হুকুম এরূপই হতো তাহলে অবশ্যই সাহাবাগণ সে সম্পর্কে সবার আগে জানবেন এটিই বেশী যুক্তিযুক্ত। অতএব বুঝা যাচ্ছে এরূপ সাকতা বিদ’আত ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ আবু হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিম্নের কথাই শক্তি যোগাচ্ছে যে, রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দীর্ঘক্ষণ চুপ থাকেননিঃ রাসূলসাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন সালাতের জন্য তাকবীর দিতেন তখন কিছুক্ষণ চুপ থাকতেন। আমি বললামঃ হে আল্লাহর রাসূল! তাকবীর এবং কিরাআতের মাঝে আপনার চুপ থাকা অবস্থায় কী বলেনঃ তিনি বললেনঃ আমি আল্লাহুম্মা বাইদ বাইনী ওয়া বাইনা খাতাইয়াইয়া ... বলি। রাসূলসাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যদি সূরা ফাতিহা পাঠ শেষে অনুরূপ সাকতা করতেন, তাহলে অবশ্যই তারা সেই সাকতা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতেন যেরূপ তাকবীরের পরের সাকতা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছেন।
` لئن أظهرني الله عليهم (يعني كفار قريش الذين قتلوا حمزة) لأمثلن بثلاثين رجلا منهم `.
ضعيف.
رواه ابن إسحاق في ` السيرة ` عن بعض أصحابه عن عطاء بن يسار قال: نزلت سورة (النمل) بمكة وهي مكية إلا ثلاث آيات من آخرها نزلت بالمدينة بعد أحد، حين قتل حمزة ومثل به، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: (فذكره) ، فلما سمع المسلمون ذلك قالوا:
والله لئن ظهرنا عليهم لنمثلن بهم مثلة لم يمثلها أحد من العرب بأحد قط، فأنزل الله (وإن عاقبتهم فعاقبوا بمثل ما عوقبتهم به) إلى أخر السورة. ذكره الحافظ ابن كثير (2 / 592) وضعفه بقوله: ` وهذا مرسل وفيه رجل مبهم لم يسم، وقد روي من وجه آخر متصل `.
قلت: وهذا المتصل من حديث أبي هريرة ضعيف كما يأتي بعده. وروي من حديث ابن عباس وهو: ` لئن ظفرت بقريش لأمثلن بثلاثين رجلا منهم، فأنزل الله عز وجل في ذلك: (وإن عاقبتهم فعاقبوا) إلى قوله: (يمكرون) `.
৫৪৮। যদি আল্লাহ তা'আলা আমাকে তাদের উপর (কুরাইশ কাফিরদের উপর যারা হামযাকে হত্যা করেছে) বিজয়ী করে, তাহলে তাদের ত্রিশজনকে আমি মুসলা (নাক, কান, হাত, পা ইত্যাদি কর্তন) করবো।
হাদীছটি দুর্বল।
এটি ইবনু ইসহাক “আস-সীরাহ” গ্রন্থে তার কোন এক সাথী হতে আতা ইবনু ইয়াসার থেকে বর্ণনা করেছেন। হাদীছটি ইবনু কাসীর (২/৫৯২) উল্লেখ করেছেন এবং নিম্নের ভাষায় দুর্বল আখ্যা দিয়েছেনঃ এটি মুরসাল। তার মধ্যে একজন মুবহাম (অজ্ঞাত) ব্যক্তি রয়েছেন যার নাম নেয়া হয়নি। অপর এক সূত্রে মুত্তাসিল হিসাবে বর্ণনা করা হয়েছে।
আমি (আলবানী) বলছিঃ আবু হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীছ হতে এ মুত্তাসিল দুর্বল। যার বিবরণ সামনে আসবে। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীছ হতেও বর্ণনা করা হয়েছে।
` لئن ظفرت بقريش لأمثلن بثلاثين رجلا منهم، فأنزل الله عز وجل في ذلك: (وإن عاقبتهم فعاقبوا) إلى قوله: (يمكرون) `.
ضعيف.
رواه الطبراني (3 / 107 - 108) عن أحمد بن أيوب بن راشد البصري: أخبرنا عبد الأعلى عن محمد بن إسحاق: حدثني محمد بن كعب القرظي والحكم بن عتيبة عن مقسم ومجاهد عن ابن عباس قال: ` لما وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على حمزة فنظر إلى ما به قال: لولا أن تحزن النساء ما غيبته ولتركته حتى يكون في بطون السباع وحواصل الطيور حتى يبعثه الله مما هنالك.
قال: وأحزنه ما [رأى] به فقال ` فذكره. قلت: وهذا سند ضعيف، قال: الهيثمي (6 / 120) : ` وفيه أحمد بن أيوب بن راشد وهو ضعيف `.
قلت: لم أجد من صرح بتضعيفه من الأئمة المتقدمين، ولا من وثقه منهم، نعم أورده ابن حبان في ` الثقات ` وقال: ` ربما أغرب `، وهذا ليس بجرح كما أن إيراده إياه في ` الثقات ` ليس بتوثيق معتمد، كما سبق التنبيه عليه مرارا، فالحق أن الرجل في عداد مجهولي العدالة، ولذلك لم يوثقه الحافظ في ` التقريب ` ولم يضعفه، بل قال فيه ` مقبول ` إشارة إلى ما ذكرته. والله أعلم.
ورواه البيهقي في ` دلائل النبوة ` (ج 1 - غزوة أحد - مخطوط) عن ابن إسحاق قال: حدثني بريدة بن سفيان عن محمد بن كعب مرفوعا. وهذا مع إرساله ضعيف أيضا، وبريدة بن سفيان قال الحافظ: ` ليس بالقوي `. وقد روي هذا الحديث من طريق أخرى عن محمد بن كعب، أخرجه المحاملي في ` الأمالي ` (ج 7 رقم 2) عن عبد العزيز بن عمران:
حدثني أفلح بن سعيد عن محمد بن كعب عن ابن عباس. وهذا سند ضعيف جدا، عبد العزيز قال الحافظ: ` متروك، احترقت كتبه فحدث من حفظه فاشتد غلطه `.
وروي من حديث أبي هريرة نحوه وأتم منه، وهو:
৫৪৯। আমি যদি কুরাইশদের উপর জয়ী হতে পারি তাহলে তাদের ত্রিশজনকে মুসলা করবো। তখন আল্লাহ তা'আলা এ ব্যাপারে নাযিল করলেনঃ `আর যদি তোমরা প্রতিশোধ গ্রহণ কর, তবে ঐ পরিমাণ প্রতিশোধ গ্রহণ করবে ... তাদের চক্রান্তের কারণে মন ছোট করবেন না` - আন-নাহল (১২৬)।
হাদীছটি দুর্বল।
এটি তাবারানী (৩/১০৭-১০৮) আহমাদ ইবনু আইউব বাসরী হতে তিনি আব্দুল আলা হতে তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক হতে ... ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ সনদটি দুর্বল। হায়ছামী (৬/১২০) বলেনঃ তার সনদে আহমাদ ইবনু আইউব ইবনু রাশেদ রয়েছেন, তিনি দুর্বল। বাইহাকী `দালায়েলুন নাবুয়াহ` (১/ উহুদ যুদ্ধ) বর্ণনা করেছেন। কিন্তু মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও দুর্বল। তাতে বুরাইদাহ ইবনু সুফিয়ান রয়েছেন, তার সম্পর্কে হাফিয ইবনু হাজার বলেনঃ তিনি শক্তিশালী নন। অন্য একটি সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে যেটিকে আল-মাহামেলী `আল-আমলী` (৭/নং ২) গ্রন্থে আব্দুল আযীয ইবনু ইমরান হতে বর্ণনা করেছেন। এ সনদটি নিতান্তই দুর্বল। এই আব্দুল আযীয সম্পর্কে হাফিয বলেনঃ তিনি মাতরূক। তার গ্রন্থগুলো পুড়ে গিয়েছিল, ফলে তিনি তার হেফয হতে হাদীছ বর্ণনা করেন। এ কারণে তার বড় ধরনের ভুল সংঘটিত হয়েছে।
` رحمة الله عليك إن كنت ما علمت لوصولا للرحم، فعولا للخيرات، والله لولا حزن من بعدك عليك لسرني أن أتركك حتى يحشرك الله من بطون السباع - أو كلمة نحوها - أما والله على ذلك لأمثلن بسبعين كمثلتك. فنزل جبريل عليه السلام على محمد صلى الله عليه وسلم بهذه السورة وقرأ: (وإن عاقبتهم فعاقبوا بمثل ما عوقبتم به) إلى آخر الآية، فكفر رسول الله صلى الله عليه وسلم (يعني عن يمينه) ، وأمسك عن ذلك `.
ضعيف.
أخرجه أبو بكر الشافعي في ` الفوائد ` (2 / 6 / 1 - 2) والحاكم (3 / 197) والبزاز والطبراني والبيهقي في ` دلائل النبوة ` (ج 1 - غزوة أحد) والواحدي (146 / 1) عن صالح المري عن سليمان التيمي عن أبي عثمان النهدي عن أبي هريرة: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم وقف على حمزة بن عبد المطلب حين استشهد، فنظر إلى منظر لم ينظر إلى منظر أوجع للقلب منه، أو أوجع لقلبه منه، ونظر إليه وقد مثل به فقال: ` فذكره.
وسكت عنه الحاكم وتعقبه الذهبي بقوله: ` قلت: صالح واه `. وقال الحافظ ابن كثير (2 / 592) : ` وهذا إسناد فيه ضعف لأن صالحا هو ابن بشير المري ضعيف عند الأئمة `.
وكذلك ضعفه الهيثمي في ` المجمع ` (6 / 119) . ورواه البيهقي أيضا من طريق يحيى بن عبد الحميد قال: حدثنا قيس عن ابن أبي ليلى عن الحكم عن مقسم عن ابن عباس مرفوعا نحوه وزاد: ` فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: بل نصبر يا رب! `.
وسنده ضعيف، مسلسل بالضعفاء الثلاثة: ابن أبي ليلى فمن دونه! قلت: وقد ثبت بعضه مختصرا من طرق أخرى فأخرج الحاكم (3 / 196) والخطيب في ` التلخيص ` (44 / 1) عن أنس ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مر بحمزة يوم أحد وقد جدع ومثل به فقال: ` لولا أن صفية تجد لتركته حتى يحشره الله من بطون الطير والسباع، فكفنه في نمرة `. وقال: ` صحيح على شرط مسلم ` ووافقه الذهبي وهو كما قالا. ورواه الحاكم (3 / 197 - 198) والبزاز والطبراني من حديث ابن عباس بسند لا بأس به في المتابعات والشواهد. وسبب نزول الآية السابقة في هذه الحادثة صحيح فقد قال أبي بن كعب: ` لما كان يوم أحد أصيب من الأنصار أربعة وستون رجلا، ومن المهاجرين ستة، فمثلوا بهم وفيهم حمزة، فقالت الأنصار:
لئن أصبناهم مثل هذا لنربين عليهم، فلما كان يوم فتح مكة أنزل الله عز وجل:
(وإن عاقبتهم فعاقبوا بمثل ما عوقبتهم به) الآية، فقال رجل: لا قريش
بعد اليوم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` كفوا عن القوم غير أربعة `.
رواه الترمذي (4 / 133) ، والحاكم (2 / 359) وعبد الله بن أحمد في ` زوائد المسند ` (5 / 135) وحسنه الترمذي، وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `، ووافقه الذهبي، وهو كما قالا.
৫৫০। আল্লাহর রহমত আপনার উপর আমি আপনাকে যতটুকু জানি অবশ্যই আপনি রক্তের সম্পর্ক দৃঢ়কারী এবং উত্তম কর্মগুলো বাস্তবায়নকারী। আল্লাহর শপথ আপনার পরে কেউ যদি আপনার জন্য চিন্তিত না হতো; তাহলে অবশ্যই আমাকে খুশি করত আপনাকে পরিত্যক্ত অবস্থায় ছেড়ে দেয়া। যাতে করে আল্লাহ আপনার হাশর করেন পশু-পাখীর পেট হতে (অথবা অনুরূপ কথা বলেছেন)। আল্লাহর কসম আপনাকে যেরূপ মুসলা করেছে অনুরূপভাবে তাদের সত্তরজনকে আমি মুসল করবো। জিবরীল (আঃ) মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এর নিকট এ সূরা (আয়াত) নিয়ে অবতরণ করলেন এবং পাঠ করলেনঃ “আর যদি তোমরা প্রতিশোধ গ্রহণ কর, তবে ঐ পরিমাণ প্রতিশোধ গ্রহণ করবে, যে পরিমাণ তোমাদেরকে কষ্ট দেয়া হয়... (আয়াতের শেষ পর্যন্ত) তাদের চক্রান্তের কারণে মন ছোট করবেন না”। অতঃপর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার কসমের কাফফারা দিলেন এবং তা (বাস্তবায়ন করা) হতে বিরত থাকলেন।
হাদীছটি দুর্বল।
এটি আবু বাকর আশ-শাফে'ঈ `আল-ফাওয়ায়েদ` (২/৬/১-২) গ্রন্থে, হাকিম (৩/১৯৭), বাযযার, তাবারানী, বাইহাকী `দালায়েলুন নবুওয়াহ` (১/উহুদ যুদ্ধ) এবং আল-ওয়াহেদী (১/১৪৬) সালেহ আল মুররী সূত্রে সুলায়মান আত-তায়মী হতে ... বর্ণনা করেছেন।
হাকিম হাদিসটির উপর সিদ্ধান্ত প্রদান হতে চুপ থেকেছেন। এ কারণে হাফিয যাহাবী তার সমালোচনা করে বলেছেনঃ সালেহ দুর্বল। আর হাফিয ইবনু কাসীর (২/৫৯২) বলেছেনঃ এ সনদটিতে দুর্বলতা রয়েছে। কারণ সালেহ হচ্ছেন ইবনু বাসীর আল-মুররী, ইমামদের নিকট তিনি দুর্বল।
অনুরূপভাবে হায়ছামীও তাকে `আল-মাজমা` (৬/১১৯) গ্রন্থে দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন।
বাইহাকী অন্য একটি সূত্রে হাদিসটি বর্ণনা করেছেন যার সনদে পর্যায়ক্রমে তিনজন দুর্বল বর্ণনাকারী রয়েছেন।
` من قلد عالما لقي الله سالما `.
لا أصل له.
وقد سئل عنه السيد رشيد رضا رحمه الله فأجاب في مجلة ` المنار ` (34 / 759) بقوله: ` ليس بحديث `.
৫৫১। যে ব্যাক্তি আলেমের তাকলীদ (দলীল ছাড়াই অন্ধ অনুসরণ) করবে সে আল্লাহ্র সাথে নিরাপদে মিলিত হবে।
এটির কোন ভিত্তি নাই।
এটি সম্পর্কে সাইয়েদ রাশীদ রিযা (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তিনি `আল-মানার` (৩৪/৭৫৯) ম্যাগাজিনে উত্তরে বলেনঃ এটি হাদিস নয়।
بترقيمي) عن رواد بن الجراح عن عبد الملك بن أبي سليمان عن عطاء عن ابن عباس قال: سبعة … الحديث. وقال:
`لم يروه عن عبد الملك إلا رواد`.
قلت: وهو ضعيف؛ لاختلاطه واختلاف العلماء فيه؛ فمنهم من وثقه،
ومنهم من ضعفه، ومنهم من بالغ في تضعيفه؛ كالدارقطني فقال:
`متروك`. ولخص أقوالهم الحافظ ابن حجر، فقال في `التقريب`:
`صدوق، اختلط بآخره فترك، وفي حديثه عن الثوري ضعف شديد`.
قلت: فالعجب منه كيف احتج به لشرعية ثقب أذن الصبي، وقال - عقبه - :
`وهو يستدرك على قول بعض الشارحين: لا مستند لأصحابنا في قولهم: إنه سنة`!
قلت: وكيف يجوز إثبات السنة بمثل هذا الإسناد الواهي؟! ولا سيما وفي متنه جملة مستنكرة، وهي أنه يلطخ رأسه بدم عقيقته؛ فإن هذا التلطيخ كان في الجاهلية، فلما جاء الإسلام أمر النبي صلى الله عليه وسلم أن يجعل مكان الدم خلوقاً، وقد ذكر الحافظ نفسه في `الفتح` بعض الأحاديث الواردة في ذلك (9/ 594) ، وخرجت أنا بعضها في `الإرواء` (4/ 388 - 389) ؛ فليراجعها من شاء.
هذا؛ ولعل الحافظ لم يتيسر له الرجوع إلى سند الحديث؛ فاعتمد على قول شيخه الهيثمي في `المجمع` (4/ 59) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، ورجاله ثقات`!
وهذا مع كونه غير مسلم - لما فيه من إهمال الجرح المفسر بالاختلاط عمداً أو سهواً - ؛ فإنه لا يعني أن الإسناد قوي، كما سبق التنبيه عليه مراراً.
ومن المحتمل أن ذلك كان بسبب العجلة. ومما يشعر بذلك: أنه لم يسق الحديث بتمامه، بل طرفه الأول، ثم موضع الشاهد منه، فقال:
`فذكر السابع منها: وثقب أذنه`. فهذا خطأ ظاهر فإنه الرابع منها، ولا تعليل له إلا العجلة، والله أعلم.
৫৫২। রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রেশমের তৈরি একটি চাটায়ের উপর বসেছিলেন।
হাদিছটির কোন ভিত্তি নাই।
হাফিয যায়লা'ঈ `নাসবুর রায়া` (৪/২২৭) গ্রন্থে এদিকেই ইঙ্গিত করেছেন। হানাফী মাযহাবের `আল-হিদায়া` গ্রন্থের লেখক পুরুষদের জন্য রেশম কাপড়ের উপর বসা জায়েয মর্মে এ হাদিস দ্বারা দলীল গ্রহন করেছেন।
যায়লায়ী বলেনঃ মাযহাবের উপর মুশকিল হয়ে যায় হুযায়ফার হাদিস। তিনি বলেন, রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে স্বর্ণ এবং রূপার পাত্রে পান করতে নিষেধ করেছেন, তাতে খানা খেতেও নিষেধ করেছেন এবং আমাদেরকে পাতলা ও মোটা রেশমী কাপড় পরিধান ও তার উপর বসতে নিষেধ করেছেন। হাদিসটি ইমাম বুখারী বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ রেশমের কাপড়ের উপর বসা হারাম যেরূপ তা পরিধান করা হারাম। এটিই সঠিক, বুখারীর এ হাদিস এবং পুরুষদের উপর তা পরিধান করা হারাম মর্মে বর্ণিত আম হাদিসের কারণে।
রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ তোমরা রেশম পরিধান করো না, কারণ যে তা দুনিয়াতে পরিধান করবে সে আখেরাতে তা পরিধান করতে পারবে না। বুখারী ও মুসলিম।
হাদিসটি আমভাবে রেশমের উপর বসাকেও সম্পৃক্ত করছে। কারণ বসাটাও আভিধানিক ও পারিভাষিক অর্থে এক ধরণের পরিধান। যেমন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেনঃ
قمت إلى حصير لنا قد اسود من طول ما لبس
`আমি আমাদের একটি চাটায়ের দিকে গোলাম যেটি দীর্ঘদিন ব্যবহারের কারণে কালো হয়ে গিয়েছিল।`
একটু লক্ষ্য করুন কিভাবে জাল হাদীস মানুষকে সহীহ হাদীস হতে বিমুখ করে রাখে।
(فَاعْتَبِرُوا يَاأُولِي الأَبْصَارِ) `অতএব হে চক্ষুষ্মান ব্যক্তিগন, তোমরা শিক্ষা গ্রহন।` (সূরা হাশরঃ ২)
` عادي الأرض لله وللرسول، ثم لكم من بعد، فمن أحيا أرضا ميتة فهي له، وليس لمحتجر حق بعد ثلاث سنين `.
منكر بهذا التمام.
أخرجه أبو يوسف صاحب أبي حنيفة في ` كتاب الخراج ` (ص 77) قال: حدثني ليث عن طاووس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره. قلت: وهذا إسناد ضعيف فيه ثلاث علل: الأولى: الإرسال من طاووس، فإنه تابعي. الثانية: ضعف ليث وهو ابن أبي سليم لاختلاطه كما بينه ابن حبان في ` كتاب المجروحين ` (1 / 57 و2 / 231) .
الثالثة: أبو يوسف فيه ضعف من قبل حفظه، قال الفلاس: ` صدوق كثير الخطأ ` وضعفه البخاري وغيره ووثقه ابن حبان وغيره.
قلت: وقد تفرد بقوله في آخر الحديث: ` وليس لمحتجر.... ` فقد أخرجه يحيى بن آدم في ` كتاب الخراج ` (ص 85، 86، 88) والبيهقي في سننه (6 / 143) من طرق كثيرة عن ليث به مرسلا بدون هذه الزيادة، فهي منكرة.
وكذلك أخرجه الشافعي (2 / 204) والبيهقي عن سفيان الثوري عن ابن طاووس مرسلا. ووصله البيهقي عن ابن طاووس عن أبيه عن ابن عباس مرفوعا.
وقال: ` تفرد به معاوية بن هشام مرفوعا موصولا `. قلت: ومعاوية فيه ضعف، والصواب في الحديث مرسل. ثم إن هذه الزيادة رواها أبو يوسف أيضا موقوفا على عمر رضي الله عنه فلعله الصواب. قال أبو يوسف: وحدثني محمد بن إسحاق عن الزهري عن سالم بن عبد الله. ` أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال على المنبر: ` من
أحيا أرضا ميتة فهي له، وليس لمحتجر حق بعد ثلاث سنين ` وذلك أن رجالا كانوا يحتجرون من الأرض ما لا يعملون `. وهذا سند منقطع في موضعين، لكن رواه يحيى بن آدم (ص 90) وأبو عبيد القاسم بن سلام (ص 290) عن سالم بن عبد الله عن أبيه قال: كان الناس يحتجرون على عهد عمر رضي الله عنه فقال: من أحيا أرضا فهي له. قال يحيى: كأنه لم يحلها له بالتحجير حتى يحييها. وهذا سند صحيح إلى عمر، ولكن ليس فيه ` وليس لمحتجر … `.
لكن يظهر أن هذه الجملة ثابتة عن عمر، فقد رواها أبو يوسف عنه من طريق ثانية، ويحيى من طريق ثالثة، وهي
وإن كانت لا تخلومن ضعف فبعضها يقوي بعضا. وجملة القول: أن هذه الزيادة رفعها منكر، والصواب أنها من قول عمر، وأما الجملة الأولى من الحديث فضعيفة لإرسالها. وأما قوله: ` من أحيا أرضا ميتة فهي له ` فهي ثابتة عن النبي صلى الله عليه وسلم من طرق أخرى عند أبي داود وغيره، وللبخاري معناه، وقد خرجتها في ` الإرواء ` (1548) ، وبعضها في ` الأحاديث الصحيحة ` رقم (568) من المجلد الثاني منه، وقد تم طبعه قريبا والحمد لله.
فائدة فقهية:
اعلم أن الإحياء غير التحجير، وقد بين الفرق بينهما يحيى بن آدم أحسن بيان فقال (ص 90) : ` وإحياء الأرض أن يستخرج فيها عينا أو قليبا أو يسوق إليها الماء، وهي أرض لم تزرع، ولم تكن في يد أحد قبله يزرعها أو يستخرجها حتى تصلح للزرع، فهذه لصاحبها أبدا، لا تخرج
من ملكه، وإن عطلها بعد ذلك، لأن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: ` من أحيا أرضا فهي له `، فهذا إذن من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيها للناس، فإن مات فهي لورثته وله أن يبيعها إن شاء ` قال:
` والتحجير، فهو غير الإحياء، قال ابن المبارك: التحجير أن يضرب على الأرض من الأعلام والمنار فهذا الذي قيل فيه إن عطلها ثلاث سنين فهي لمن أحياها بعده `. ويظهر أن هذا الفرق الواضح لم ينتبه له رئيس حزب التحرير الإسلامي فإنه احتج بهذا الحديث المنكر في كتابه ` النظام الاقتصادي في الإسلام ` (ص 20) على أنه يشترط في إحياء الأرض الموات أن يستثمرها مدة ثلاث سنوات من وضع يده عليها، وأن يستمر هذا الإحياء باستغلالها فإن لم يفعل سقط حق ملكيته لها `.
والحديث مع أنه منكر ليس فيه الشرط المذكور، ولا هو في الإحياء كما هو ظاهر بأدنى تأمل، وكم له أولحزبه مثل هذا الاستدلال الباطل، والاحتجاج بالأحاديث المنكرة والأخبار الواهية.
৫৫৩। সাধারন যমীন আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূলের জন্য, তারপর তোমাদের জন্য। অতএব যে ব্যাক্তি কোন মৃত যমীনকে চাষাবাদ করবে তা তার জন্যই। চাষাবাদ না করে তিন বছর দখলে রাখার পর তাতে তার আর কোন হক নেই।
হাদিছটি এ সমাপ্তির দ্বারা মুনকার।
এটিকে ইমাম আবূ হানীফাহ (রাহিমাহুল্লাহ) এর সাথী আবূ ইউসুফ (রাহিমাহুল্লাহ) `কিতাবুল খিরাজ` (পৃঃ ৭৭) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হাদিসটির সনদ তিনটি কারণে দুর্বল।
১। তাউস হতে মুরসাল হিসেবে বর্ণিত হয়েছে। তিনি একজন তাবে'ঈ।
২। তাউস হতে বর্ণনাকারী লাইছ ইবনু আবী সুলায়েম দুর্বল, তার মস্তিষ্ক বিকৃতি ঘটার কারণে যেমনটি ইবনু হিব্বান `কিতাবুল মাজরূহীন` (১/৫৭, ২/২৩১) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।
৩। আরেক বর্ণনাকারী আবূ ইউসূফের মধ্যে হেফযের দিক দিয়ে দুর্বলতা রয়েছে। তার সম্পর্কে ফাল্লাস বলেনঃ তিনি সত্যবাদী বহু ভুলকারী। তাকে ইমাম বুখারী ও অন্য বিদ্ব্যানগন দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন আর ইবনু হিব্বানসহ অন্য বিদ্ব্যানগন নির্ভরযোগ্য আখ্যা দিয়েছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তিনি হাদিসের শেষাংশটি (ليس لمحتجر ) এককভাবে বর্ণনা করেছেন। কারণ ইয়াহইয়া ইবনু আদম `কিতাবুল খিরাজ` (পৃঃ ৮৫,৮৬,৮৮) গ্রন্থে এবং বাইহাকী তার `সুনান` (৬/১৪৩) গ্রন্থে বহু সূত্রে লাইছ হতে মুরসাল হিসাবে উল্লেখিত বর্ধিত শেষাংশটি ছাড়াই বর্ণনা করেছেন। বর্ধিত অংশটুকু মুনকার।
ইমাম শাফেঙ্গ এবং বাইহাকী অন্য সূত্রেও তাউস হতে মুরসাল হিসাবে বর্ণনা করেছেন। বাইহাকী মওসূল হিসাবেও বর্ণনা করেছেন। তবে তাতে মুয়াবিয়া ইবনু হিশাম এককভাবে বর্ণনা করেছেন। এই মুয়াবিয়া দুর্বল। অতএব মওসূল হিসাবে সঠিক নয়।
আবূ ইউসুফ উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নিম্নোক্ত ভাষায় মওকুফ হিসাবেও বর্ণনা করেছেনঃ
من أحيا أرضا ميتة فهي له، وليس لمحتجر حق بعد ثلاث سنين ` وذلك أن رجالا كانوا يحتجرون من الأرض ما لا يعملون
যে ব্যক্তি কোন মৃত যমীনকে চাষাবাদ করবে তা তার জন্যই। চাষাবাদ না করে তিন বছর দখলে রাখার পর তাতে তার আর কোন হক নেই। এটি এ কারণে যে, লোকেরা যমীনে চাষাবাদ না করে নিশানা লাগিয়ে দখলে রাখত।'
তার এ বর্ণনাতে দুই জায়গায় সনদে বিচ্ছিন্নতা রয়েছে। কিন্তু ইয়াহইয়া ইবনু আদম (৯০) এবং আবু ওবায়েদ ইবনু সালাম (পৃঃ ২৯০) নিম্নের ভাষায় বর্ণনা করেছেনঃ
كان الناس يحتجرون على عهد عمر رضي الله عنه فقال: من أحيا أرضا فهي له. قال يحيى: كأنه لم يحلها له بالتحجير حتى يحييها
লোকেরা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যুগে নিশানা লাগিয়ে যমীন দখল করে রাখত। এমতাবস্থায় তিনি বললেনঃ যে ব্যক্তি কোন মৃত যমীনকে চাষাবাদ করবে তা তার জন্যই। ইয়াহইয়া বলেনঃ তিনি যেন চাষাবাদ না করে যমীনকে দখলে রাখাকে হালাল হিসাবে দেখেননি।
এটির সনদটি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত সহীহ। তবে ليس لمحتجر এই বর্ধিত অংশটুকু নেই।
তবে প্রতীয়মান হচ্ছে যে এ বর্ধিত অংশটুকু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে সাব্যস্ত হয়েছে। আবূ ইউসুফ দ্বিতীয় এবং ইয়াহইয়া তৃতীয় সূত্রেও বর্ণনা করেছেন। যদিও সেগুলো দুর্বলতা হতে মুক্ত নয় তবুও একটি আরেকটিকে শক্তি যোগাচ্ছে।
মোটকথাঃ বর্ধিত অংশটুকু মারফু হিসাবে মুনকার। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা হিসাবে সঠিক। তবে আলোচ্য হাদীছটির প্রথম বাক্যটি দুর্বল মুরসাল হওয়ার কারণে। আরمن أحيا أرضا ميتة فهي له এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সাব্যস্ত হয়েছে যেটিকে ইমাম আবু দাউদ সহ অন্য বিদ্বানগণ বর্ণনা করেছেন। ইমাম বুখারীও অনুরূপ অর্থের হাদীছ বর্ণনা করেছেন। দেখুন ইরওয়া হাঃ নং (১৫৪৮)।
` إن حادينا نام فسمعنا حاديكم فملت إليكم، فهل تدرون أنى كان الحداء؟ قالوا: لا والله، قال: إن أباهم مضر خرج إلى بعض رعاته، فوجد إبله قد تفرقت، فأخذ عصا فضرب بها كف غلامه، فعدا الغلام في الوادي وهو يصيح: يا يداه يا يداه! فسمعت الإبل فعطفت عليه، فقال مضر: لواشتق مثل هذا لانتفعت به الإبل
واجتمعت، فاشتق الحداء `.
موضوع.
رواه ابن الجوزي في ` تلبيس إبليس ` (ص 238) من طريق أبي البختري وهب عن طلحة المكي عن بعض علمائهم: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مال ذات ليلة بطريق مكة إلى حاد مع قوم، فسلم عليهم فقال `. فذكره. قلت: وهذا مع إرساله موضوع، والمتهم به أبو البختري هذا، وهو وهب بن وهب المدني القاضي قال ابن معين: ` كان يكذب عدوالله! ` وقال أحمد: ` كان يضع الحديث وضعا `.
وذكر ابن الجوزي في مقدمة ` الموضوعات ` (1 / 47 - ط) أنه من كبار الوضاعين، فالعجب منه كيف يروي له في هذا الكتاب (تلبيس إبليس) الذي أكثر قرائه لا علم لهم بالحديث ورجاله! وقد ساق الذهبي في ترجمة أبي البختري هذا أحاديث كثيرة ثم قال: ` وهذه أحاديث مكذوبة `.
والموضوع في هذا الحديث إنما هو ما عدا الجملة الأولى منه، فإن لها شاهدا مرسلا قويا، فقال ابن سعد في `
الطبقات ` (1 / 2) : أخبرنا الفضل بن دكين أبو نعيم: أخبرنا العلاء بن عبد الكريم عن مجاهد قال:
` كان النبي صلى الله عليه وسلم في سفر فبينا هو يسير بالليل ومعه رجل يسايره إذ سمع حاديا يحدو، وقوم أمامه، فقال لصاحبه، لو أتينا حادي هؤلاء القوم، فقربنا حتى غشينا القوم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ممن القوم؟ قالوا: من مضر، فقال: وأنا من مضر، وني حادينا، فسمعنا حاديكم، فأتيناكم.
ورواه ابن الأعرابي في ` حديث سعدان بن نصر ` (1 / 22 / 1) .
وهذا سند صحيح رجاله كلهم ثقات من رجال مسلم لولا أنه مرسل، ولكنه جاء نحوه من طريق آخر، فقال ابن سعد: أخبرنا عبد الوهاب بن عطاء العجلي: أنبأنا حنظلة بن أبي سفيان الجمحي عن طاووس قال: ` بينما رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر إذ سمع صوت حاد، فسار حتى أتاهم فقال: من القوم؟ قالوا: مضريون، فقال صلى الله عليه وسلم: وأنا مضري، فقالوا: يا رسول الله إنا أول من حدا، بينما رجل في سفر فضرب غلاما له على يده بعصا فانكسرت يده، فجعل الغلام يقول وهو يسير الإبل: وايداه وايداه! وقال: هيبا هيبا، فسارت الإبل `. وهذا مرسل صحيح أيضا. ورواه ابن الأعرابي عن عكرمة مرسلا بسند صحيح أيضا. وهو يبين أن الأصل في قصة الحداء موقوف، فرفعه ذلك الكذاب أبو البختري.
وقد ذكر الحافظ ابن كثير في ` البداية ` (2 / 199) عن علماء التاريخ أنهم قالوا: كان مضر أول من حدا، وذلك لأنه كان حسن الصوت، فسقط يوما عن بعيره، فوثبت يده، فجعل يقول: وايداه وايداه؟ فأعنقت الإبل لذلك. وهذا مخالف لهذا المرسل. والله أعلم.
৫৫৪। আমাদের উট চালক ঘুমিয়ে গেছে। অতঃপর তোমাদের উট চালকের আওয়ায শুনলাম। এ জন্য তোমাদের নিকট আসলাম। তোমরা জান কি উট চালকরা কোথায় ছিল? তারা বললো আল্লাহর কসম, না। তিনি বললেনঃ তাদের পিতা মুযারা তার কোন এক রাখালের নিকট বের হল, সে তার উটগুলোকে বিচ্ছিন্ন অবস্থায় পেল। এর জন্য একটি লাঠি নিয়ে তা দ্বারা তার দাসের হাতে প্রহার করল। এ কারণে তার দাস উপত্যকায় পালিয়ে গিয়ে চিৎকার করে বললঃ হায় আমার হাত! হায় আমার হাত। (এ আওয়ায) একটি উট শুনলো ফলে সে তার উপর দয়া করল। অতঃপর মুযারা বললঃ যদি এ দাসের ন্যায় (ডানে-বামে) দৌড়ে পালাতো তাহলে তার দ্বারা উট উপকৃত হত এবং একত্রিত হয়ে যেত। তখন উট চালকরা (ডানে-বামে) দৌড় দিল।
হাদীছটি জাল।
হাদীছটি ইবনুল জাওয়ী `তালবীসু ইবলীস` (পৃঃ ২৩৮) গ্রন্থে আবুল বুখতার ওয়াহাব সূত্রে তালহা আল-মাক্কী হতে তিনি তাদের কোন আলেম হতে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এটি মুরসাল হওয়া সত্ত্বেও বানোয়াট। এই আবুল বুখতার মিথ্যার দোষে দোষী। তিনি হচ্ছেন ওয়াহাব ইবনু ওয়াহাব আল-মাদানী আল-কাযী। তার সম্পর্কে ইবনু মাঈন বলেনঃ আল্লাহর দুশমন মিথ্যা বলতেন। ইমাম আহমাদ বলেনঃ তিনি হাদীছ জাল করতেন। ইবনুল জাওয়ী তার “আল-মাওযু'আত” (১/৪৭ ত্ব) গ্রন্থের ভূমিকায় বলেছেনঃ তিনি বড় বড় জালকারীদের একজন। ইমাম যাহাবী আবুল বুখতারীর জীবনী বর্ণনা করতে গিয়ে তার বহু হাদীছ উল্লেখ করে বলেছেনঃ এ হাদীছগুলো মিথ্যা।
এ হাদীছটির প্রথম বাক্যটি বাদে বাকী অংশগুলো বানোয়াট। কারণ প্রথম বাক্যটির মুরসাল হিসাবে শক্তিশালী শাহেদ পাওয়া যাচ্ছে। সেটি ইবনু সা’আদ “আত-তাবাকাত` (১/২) গ্রন্থে মুজাহিদ এবং তাউস হতে উল্লেখ করেছেন। ইবনুল আ'রাবী `হাদীছু সা’আদান ইবনু নাসর` (১/২২/১) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।
এ মুরসাল সহীহ। ইবনুল আরাবী ঈকরিম হতেও সহীহ সনদে মুরসাল হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
` من فقه الرجل المسلم أن يصلح معيشته، وليس من حبك الدنيا طلب ما يصلحك `.
ضعيف جدا.
رواه ابن عدي (175 / 1) عن سعيد بن سنان عن أبي الزاهرية عن أبي شجرة عن عبد الله بن عمر مرفوعا، وقال: ` سعيد بن سنان أبو مهدي الحمصي عامة ما يرويه غير محفوظ `.
قلت: وفي ` التقريب `: ` متروك رماه الدارقطني وغيره بالوضع `. قلت: وروي الحديث من طريق آخر بنحوه، وهو:
৫৫৫। মুসলিম ব্যক্তির বুদ্ধিমত্তার পরিচয় হচ্ছে তার জীবন ধারণকে সঠিকভাবে পরিচালনার মাঝে। দুনিয়াকে তোমার ভালবাসার অর্থ এমন নয় যে, এরূপ বস্তুকে চাইবে যা তোমাকে প্রতিষ্ঠিত করবে।
হাদীছটি নিতান্তই দুর্বল।
এটি ইবনু আদী (১/১৭৫) সাঈদ ইবনু সিনান সূত্রে আবুয যাহেরীয়া হতে তিনি আবু শাযারাহ হতে তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
সাঈদ ইবনু সিনান আবু মাহদী আল-হিমসী, তিনি যা কিছু বর্ণনা করেছেন তার অধিকাংশই নিরাপদ নয়।
আমি (আলবানী) বলছিঃ “আত-তাকরীব” গ্রন্থে এসেছেঃ তিনি মাতরূক। দারাকুতনী ও অন্য বিদ্বানগণ তাকে জাল করার দোষে দোষী করেছেন। আমি বলছিঃ হাদীছটি ভিন্ন সূত্রে অনুরূপ অর্থে বর্ণিত হয়েছে।
` من فقه الرجل رفقه في معيشته `.
ضعيف.
رواه أحمد (5 / 194) ومن طريقه الثعلبي في ` تفسيره ` (3 / 146 / 1) وابن عدي (37 / 2) وابن عساكر (13 / 375 / 1) عن أبي بكر بن أبي مريم عن ضمرة بن حبيب عن أبي الدرداء مرفوعا.
وقال ابن عدي: ` أبو بكر بن أبي مريم الغالب على حديثه الغرائب، وقل ما يوافقه عليه الثقات، وهو ممن
لا يحتج به، ولكن يكتب حديثه `. قلت: ثم هو منقطع لأن ضمرة لم يسمع من أبي الدرداء كما أفاده الذهبي، فإن بين وفاتيهما نحومائة سنة. واقتصر الهيثمي (4 / 74) على إعلاله باختلاط ابن أبي مريم. والحديث أورده السيوطي في ` الجامع ` من رواية أحمد والبيهقي عن أبي الدرداء قال شارحه المناوي: ` ثم قال البيهقي تفرد به سعيد بن سنان عن أبي الزاهرية اهـ. قال الذهبي في ` الضعفاء `: وسعيد بن سنان عن أبي الزاهرية متهم، أي بالوضع `.
قلت: وهذا يوهم أن الحديث من هذه الطريق عند أحمد أيضا، وليس كذلك كما سبق فتنبه، ورواه ابن عدي عن سعيد بن سنان بسند آخر عن ابن عمر نحوه وتقدم لفظه قريبا. ورواه ابن الأعرابي في ` المعجم ` (237 / 2) وأبو نعيم في ` الحلية ` (1 / 11) عن فرج بن فضالة: أخبرنا لقمان بن عامر عن أبي الدرداء موقوفا عليه. والفرج بن فضالة ضعيف كما في ` التقريب ` وبقية رجاله ثقات، فلعل هذا هو أصل الحديث موقوف، أخطأ بعض الضعفاء فرفعه، والله أعلم.
ثم وجدت ما يؤيد وقفه، فقال وكيع بن الجراح في ` الزهد ` (2 / 78 / 1) : حدثنا سفيان عن منصور عن سالم بن أبي الجعد ` أن رجلا صعد إلى أبي الدرداء وهو في غرفة له، وهو يلتقط حبا منثورا، فقال أبو الدرداء ` فذكره موقوفا عليه. ورجاله كلهم ثقات لولا أنه مرسل.
وكذلك رواه ابن عساكر (3 / 375 / 1) من طريق المعتمر بن سليمان عن منصور به. ورواه أيضا من طريق إسماعيل بن عياش عن حريز بن عثمان الرحبي عن أبي حبيب الحارث بن محمد عن أبي الدرداء موقوفا.
৫৫৬। ব্যক্তির জ্ঞানের পরিচয় হচ্ছে তার জীবন ধারণের ক্ষেত্রে নম্রতা অবলম্বন করাতে।
হাদীছটি দুর্বল।
এটি ইমাম আহমাদ বর্ণনা করেছেন। আর তার সূত্রে ছা'য়ালাবী তার `তাফসীর` (৩/১৪৬/১) গ্রন্থে, ইবনু আদী (২/৩৭) এবং ইবনু আসাকির (১৩/৩৭৫/১) আবু বকর ইবনু আবী মারিয়াম হতে তিনি যামারাহ ইবনু হাবীব হতে তিনি আবুদ দারদা হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
ইবনু আদী বলেনঃ আবু বাকরের অধিকাংশ হাদীছ গারীব। নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীগণ খুব কমই তার সাথে ঐকমত্য পোষণ করেছেন। তিনি সেই দলের অন্তর্ভুক্ত যাদের দ্বারা দলীল গ্রহণ করা যায় না। তবে তার হাদীছ লিখা যায়।
আমি (আলবানী) বলছিঃ তার পরেও হাদীছটি মুনকাতি। কারণ যামারাহ আবুদ দারদা হতে শুনেননি, যেমনটি হাফিয যাহাবী অবহিত করেছেন। কারণ তাদের দু'জনের মৃত্যুর মাঝে প্রায় একশত বছরের ব্যবধান। হায়ছামী (৪/৭৪) ইবনু আবী মারিয়ামের মস্তিষ্ক বিকৃতি ঘটেছিল শুধুমাত্র এ কারণই দেখিয়েছেন। হাদীছটি সুয়ূতী “আল-জামে” গ্রন্থে আহমাদ এবং বাইহাকীর বর্ণনায় আবুদ দারদা হতে বর্ণনা করেছেন। তার ভাষ্যকার মানবী বলেনঃ বাইহাকী বলেছেনঃ সাঈদ ইবনু সিনান আবুয যাহেরিয়া হতে এককভাবে বর্ণনা করেছেন। হাফিয যাহাবী “আয-যোয়াফা` গ্রন্থে বলেনঃ সাঈদ ইবনু সিনান আবুয যাহেরিয়া হতে জাল করার দোষে দোষী।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ধারণা হতে পারে যে এ সূত্রটিও ইমাম আহমাদ হতে। আসলে কিন্তু সেরূপ নয়। হাদীছটি ইবনু আদী সাঈদ ইবনু সিনান হতে অন্য সূত্রে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অনুরূপ অর্থে বর্ণনা করেছেন। এ ছাড়া ইবনুল আ'রাবী `আল-মুজাম` (২/২৩৭) গ্রন্থে এবং আবু নোয়াইম `আল-হিলইয়্যাহ` (১/১১)-গ্রন্থে ফারাজ ইবনু ফুযালা সূত্রে ... আবুদ দারদা হতে মওকুফ হিসাবে বর্ণনা করেছেন। ফারাজ ইবনু ফুযালা দুর্বল, যেরূপ `আত-তাকরীব` গ্রন্থে এসেছে। তা ছাড়া অন্যান্য বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য। সম্ভবত এ মওকুফটিই হাদীছটির আসল। কোন বর্ণনাকারী ভুল করে মারফু করে ফেলেছে।
ওয়াকী ইবনুল জাররা কর্তৃক `আল-যুহুদ` (৩/৭২/১) গ্রন্থে এবং ইবনু আসাকির (৩/৩৭৫/১) কর্তৃক ভিন্ন সূত্রে আবুদ দারদা হতে বর্ণনাকৃত মওকুফ হাদীছ, মওকুফ হওয়াকেই শক্তিশালী করছে।
` خذوا من القرآن ما شئتم لما شئتم `.
لا أصل له فيما أعلم.
وقال السيد رشيد رضا في ` المنار ` (مجلد 28 / 660) : ` لم أره في شيء من كتب الحديث `.
৫৫৭। তোমরা কুরআন হতে যা ইচ্ছা যে জন্য চাও গ্রহণ কর।
হাদীছটির কোন ভিত্তি নেই।
সাইয়েদ রাশীদ রিযা `আল-মানার` ম্যাগাজিনের (২৮/৬৬০) সংখ্যায় বলেছেনঃ আমি এটিকে হাদীছ গ্রন্থগুলোর কোনটিতেই দেখছি না।
` ليس بكريم من لم يتواجد عند ذكر الحبيب `.
موضوع.
ذكره محمد بن طاهر المقدسي في ` صفوة التصوف ` ومن طريقه أبو حفص عمر السهروردي صاحب ` عوارف المعارف `: أن النبي صلى الله عليه وسلم أنشده أعرابي:
قد لسعت حية الهوى كبدي فلا طبيب لها ولا راقي.
إلا الحبيب الذي شغفت به فعنده رقيتي وترياقي.
فتواجد حتى سقطت البردة عن منكبيه فقال معاوية: ما أحسن لهو كم، فقال: مهلا يا معاوية ليس … ` الحديث. قال ابن تيمية في رسالة ` السماع والرقص ` (ص 169 من مجموعة الرسائل المنيرية ج 3) : ` هذا حديث مكذوب موضوع باتفاق أهل العلم بهذا الشأن، قال: وهذا وأمثاله إنما يرويه من هو أجهل الناس بحال النبي صلى الله عليه وسلم وأصحابه ومن بعدهم بمعرفة الإيمان والإسلام `! قلت: ثم راجعت كتاب ` صفوة التصوف ` للحافظ ابن طاهر المقدسي فلم أجد الحديث فيه، وإنما عزاه الحافظ في ` لسان الميزان ` لكتاب آخر له أسماه ` السماع ` وقد ساق إسناده السهروردي في ` العوارف ` (ص 108 - 109) فإذا هو من طريق أبي بكر عمار بن إسحاق قال: حدثنا سعيد بن عامر عن شعبة عن عبد العزيز بن صهيب عن أنس به.
وقال: ` فهذا الحديث أوردناه مسندا كما سمعناه ووجدناه، وقد تكلم في صحته أصحاب الحديث، وما وجدنا شيئا نقل عن رسول الله صلى الله عليه وسلم يشاكل وجد أهل الزمان وسماعهم واجتماعهم وهيئتهم، إلا هذا، وما أحسنه من حجة للصوفية وأهل الزمان في سماعهم وتمزيقهم الخرق وقسمتها أن لوصح، ويخالج سري أنه غير صحيح، ولم أجد فيه ذوق اجتماع النبي صلى الله عليه وسلم مع أصحابه وما كانوا يعتدونه على ما بلغنا في هذا الحديث، ويأبى القلب قبوله. قلت: والمتهم بهذه القصة عمار بن إسحاق هذا فقد قال الذهبي في ترجمته: ` كأنه واضع هذه الخرافة التي فيها: ` قد لسعت حية الهوى كبدي `. فإن الباقين ثقات `.
৫৫৮। সে ব্যক্তি দয়ালু নয় যাকে বন্ধু কর্তৃক স্মরণ করার সময় পাওয়া যায় না।
হাদীছটি জাল।
এটিকে মুহাম্মাদ ইবনু তাহের আল-মাকদেসী “সাফওয়াতুত তাসাউফ” গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। আর তার সূত্রে `আওয়ারিফুল মায়ারিফ` গ্রন্থের লেখক আবু হাফস উমার সাহরুওয়ারদী বর্ণনা করেছেন।
ইবনু তাইমিয়্যাহ `আস-সিমা ওয়ার রাকস` (পৃঃ ১৬৯ মিন মাজমু'য়াতির রাসায়েলিল মিম্বারিয়াহ খণ্ড ৩ এ) গ্রন্থে বলেনঃ এ হাদীছটি সকল আলেমের ঐকমত্যে জাল ও মিথ্যা। তিনি আরো বলেনঃ এটি ও এর ন্যায় হাদীছ সেই ব্যক্তিই বর্ণনা করবে, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এবং তার সাথী ও তাদের পরবর্তীদের অবস্থা সম্পর্কে ঈমান ও ইসলামকে জানার দ্বারা সর্বাপেক্ষা অজ্ঞ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ আমি `সাফওয়াতুত তাসাউফ” গ্রন্থটি খুজেটি কিন্তু তাতে এ হাদীছটি পায়নি। সাহরুওয়ারদী “আওয়ারিফুল মায়ারিফ` (পৃঃ ১০৮১০৯) গ্রন্থে আবু বাকর আম্মার ইবনু ইসহাক সূত্রে এটির সনদ বর্ণনা করেছেন। কিন্তু এই আম্মার মিথ্যার দোষে দোষী। ইমাম যাহাবী তার জীবনীতে বলেছেনঃ সম্ভবত তিনিই এই খুরাফাত (বিদ'আত) তৈরিকারক। যাতে রয়েছেঃ 'মনের সাপ আমার কলিজায় দংশন করেছে।'
` كان يقرأ في صلاة المغرب ليلة الجمعة (قل يا أيها الكافرون) ، و (قل هو الله أحد) ، ويقرأ في العشاء الآخرة ليلة الجمعة (الجمعة) ، و (المنافقين) `.
ضعيف جدا.
أخرجه ابن حبان (552) والبيهقي (2 / 391) الشطر الأول منه من طريق سعيد بن سماك بن حرب: حدثني أبي سماك بن حرب - قال: ولا أعلم إلا - عن جابر بن سمرة قال: فذكره. وأخرجه أيضا في كتابه ` الثقات ` (2 / 104) في ترجمة سعيد هذا، وقال: ` والمحفوظ عن سماك أن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره `.
قلت: وهذا من تناقض ابن حبان، فإنه من جهة يعله بالإرسال ويبين أنه لا يصح موصولا عن جابر بن سمرة، ومن جهة أخرى يورد الموصول في ` صحيحه `! وعلة الحديث سعيد بن سماك، فقد قال ابن أبي حاتم (2 / 1 / 32) عن أبيه: ` متروك الحديث `، وتوثيق ابن حبان إياه من تساهله الذي عرف به عند المحققين، وقد يغتر به كثير ممن لا تحقيق عندهم، فيصححون أحاديث كثيرة تقليدا له، من ذلك هذا الحديث، فقد جاء في ` البجيرمي ` (2 / 64) : ` ويستحب أيضا قراءة (الجمعة) و (المنافقين) في صلاة عشاء ليلة الجمعة، كما ورد عند ابن حبان بسند صحيح وقد كان السبكي يفعله، فأنكر عليه بأنه ليس في كلام الرافعي.
فرد على المنكر بما مر. أي من الورود وكم من مسائل لم يذكرها الرافعي: فعدم ذكره لها لا يستلزم عدم سنيتها `.
قلت: وهذا الجواب من الوجهة الفقهية صحيح، يدل على تحرر السبكي من الجمود المذهبي، ولكن الحديث ضعيف غير محفوظ بشهادة ابن حبان نفسه، فلا يثبت به الاستحباب فضلا عن السنية، بل إن التزام ذلك من البدع، وهو ما يفعله كثير من أئمة المساجد في دمشق وغيرها من البلدان السورية، ولكنهم جمعوا بين البدعة وإرضاء الناس، فقد تركوا قراءة (المنافقون) أصلا والتزموا قراءة الشطر الثاني من (الجمعة) في الركعتين تخفيفا عن الناس زعموا! وكنت منذ القديم استنكر منهم هذا الالتزام، ولا أعرف مستندهم في ذلك، حتى رأيت كلام البجيرمي هذا، المستند على هذا الحديث، الذي كنت استغربه لعدم وروده في الأمهات الستة وغيرها ولكن ذلك لا يكفي للإنكار، حتى وقفت على إسناده في ` موارد الظمآن ` ومنه نقلت، فتبين لي ضعفه بل وتضعيف ابن حبان نفسه له في كتابه الآخر، فالحمد لله على توفيقه.
ثم إن مما يدل على ضعف الحديث أن الثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان يقرأ بالسورتين الأوليين في سنة المغرب، وليس في فرضه، جاء ذلك عنه صلى الله عليه وسلم من طرق، وقد خرجته في ` صفة الصلاة ` (ص 115 - السابعة) .
৫৫৯। তিনি জুম'আর রাতের মাগরিবের সালাতে কুল ইয়া আইউহাল কাফিরুন এবং ‘কুল হওয়াল্লাহু আহাদ পাঠ করতেন। আর জুম'আর রাতের শেষ ইশায় (ফজরের সালাতে) সূরা জুম'আহ এবং আল-মুনাফিকুন পাঠ করতেন।
হাদীছটি নিতান্তই দুর্বল।
এটি ইবনু হিব্বান (৫৫২) এবং বাইহাকী (২/৩৯১) প্রথম অংশটি সাঈদ ইবনু সাম্মাক ইবনে হারব সূত্রে আবু সাম্মাক ইবনু হারব হতে ... বর্ণনা করেছেন। তিনি (ইবনু হিব্বান) বলেনঃ জাবের ইবনু সামুরাহ ছাড়া অন্য কারো নিকট হতে এটিকে জানি না। ইবনু হিব্বান `আছ-ছিকাত` (২/১০৪) গ্রন্থেও সাঈদের জীবনী আলোচনা করতে গিয়ে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর বলেছেনঃ সাম্মাক সূত্রে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে নিরাপদ।
আমি (আলবানী) বলছিঃ ইবনু হিব্বানের কথায় দ্বন্দ্ব লক্ষণীয়। কারণ তিনি একবার সমস্যা হিসাবে বলছেনঃ এটি মুরসাল, মওসূল হিসাবে সহীহ নয়। আবার বলেছেনঃ এটি মওসূল!
হাদীছটির সমস্যা হচ্ছে সাঈদ ইবনু সাম্মাক। তার সম্পর্কে ইবনু আবী হাতিম (২/১/৩২) তার পিতা হতে নকল করে বলেছেনঃ তিনি মাতরূকুল হাদীছ।
হাদীছটির সনদটি বর্ণিত হয়েছে “মাওয়ারিদুয যাম'আন” গ্রন্থে আর আমি সেখান হতেই নকল করেছি। আমার নিকট দুর্বলাতা সুস্পষ্ট। ইবনু হিব্বান নিজেও হাদীছটিকে অন্য গ্রন্থে দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন। এটি দুর্বল হওয়ার প্রমাণ বহন করছে রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে সাব্যস্ত হওয়া সহীহ হাদীছ। তিনি মাগরিবের সুন্নাতে প্রথম দুটি সূরা পাঠ করতেন। মাগরিবের ফরয সালাতে নয়। এটি তার থেকে বিভিন্ন সূত্রে এসেছে। আমি `সিফাতুস সালাত` (পৃঃ ১১৫) গ্রন্থে তার তাখরীজ করেছি।
الطبعة الجديدة) وفي غيره كثير، وبينت فيها أن البيهقي من المتساهلين، وكلما ازددت علماً واطلاعاً على كلامه على الأحاديث؛ ازددت يقيناً بذلك، مع الاعتراف بسعة حفظه وعلمه، وأنه خير من شيخه الحاكم في مجال النقد بكثير.
لان من الآثار السيئة للتساهل المذكور، وعدم إعطاء الحديث أو راويه حقه من النقد الصحيح؛ أنه قد لا يتيسر لبعض الباحثين الوقوف على إسناد الحديث الذي تساهل بعض المتقدمين في نقده فضعفه، وهو شديد الضعف أو موضوع، فيعتمد الباحث على تضعيفه، ويستشهد به لحديث آخر ضعيف ويقويه! وهذا ما وقع للشيخ المباركفوري رحمه الله؛ فقوى حديث أبي رافع في الأذان في أذن المولود بحديث أم الصبيان، وهو موضوع مخرج برقم (321) ، وعذره أنه اعتمد في أنه ضعيف على حكم البيهقي، ولم يتيسر له الوقوف على إسناده، وهذا مما لا ينجو منه أحد من كبار الحفاظ فضلاً عن أمثالنا من المتأخرين، فوقع في الخطأ الشنيع، وهو تقوية الضعيف بالموضوع الذي لا يجوز باتفاق العلماء!
وقد وقع لي مثله؛ فقد كنت قويت أيضاً في ` الإرواء ` (4/ 400 - 401) حديث أبي رافع بحديث آخر اغتراراً أو ثقة بتضعيف البيهقي اياه، لأني لم أكن يومئذ قد اطلعت على إسناده، فلما وقفت عليه؛ وجدت فيه (محمد بن يونس الكديمي) الكذاب! وغيره! فتراجعت عن التقوية، وبادرت إلى بيان هذه الحقيقة بتخريج الحديث، والكشف عن تساهل البيهقي فيما سبق من هذه ` السلسلة ` برقم (6121) . والله المستعان.
ويبدو أن المعلق على ` مسند أبي يعلى ` قد وقع في مثل ما كنت وقعت فيه، فقوّى الحديث بالحديت الآخر المشار إليه، ولا أستبعد أن يكون تلقى ذلك من ` الإرواء ` أو ` الضعيفة ` (321) ؛ فإنه كثير الاستفادة من كتبي مثل كثير من المؤلفين أو الكاتبين في العصر الحاضر، ولكن دون حمد أو شكر!
৫৬০। তিনি রামাযান মাসে জামা'আত ছাড়াই বিশ রাকাআত এবং বিতরের সালাত পড়তেন।
হাদীছটি জাল।
হাদীছটি ইবনু আবী শাইবাহ `আল-মুসান্নাফ` (২/৯০/২) গ্রন্থে, আব্দু ইবনু হামীদ `আল-মুন্তাখাব মিনাল মুসনাদ` (৭৩/১-২) গ্রন্থে, তাবারানী `আল-মুজামুল কাবীর` (৩/১৪৮/২) এবং “আল-আওসাত” গ্রন্থে যেমনটি ইমাম যাহাবীর `আলমুস্তাকা` (৩/২) গ্রন্থে ও `যাওয়ায়েদুল মু'জামায়িন` (১/১০৯/১) গ্রন্থে এসেছে, ইবনু আদী `আল-কামিল` (১/২) গ্রন্থে, আল-খাতীব “আল-মুওয়াযিযহ” (১/২০৯) গ্রন্থে, আবুল হাসান আন-না'আলী তার `হাদীছ` (১/১২৭) গ্রন্থে, আবু আমর ইবনু মান্দাহ `আল-মুন্তাখাব মিনাল ফাওয়ায়েদ` (২/২৬৮) গ্রন্থে এবং বাইহাকী “আস-সুনানুল কুবরা” (২/৪৯৬) গ্রন্থে (তারা সকলে) আবু শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু উছমান সূত্রে আল-হাকাম হতে তিনি মুকসিম হতে তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফু হিসাবে বর্ণনা করেছেন।
তাবারানী বলেনঃ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এ সনদ ছাড়া ভিন্ন কোন সনদে বর্ণনা করা হয়নি। বাইহাকী বলেনঃ আবু শাইবাহ এককভাবে বর্ণনা করেছেন, তিনি দুর্বল।
আমি (আলবানী) বলছিঃ হায়ছামী `আল-মাজমা` (৩/১৭২) গ্রন্থে অনুরূপ কথাই বলেছেন। অর্থাৎ আবু শাইবাহ দুর্বল। ইবনু হাজার “ফতহুল বারী” (৪/২০৫) গ্রন্থে বলেনঃ এটির সনদটি দুর্বল। হাফিয যায়লাঈ অনুরূপভাবে `নাসবুর রায়া` (২/১৫৩) গ্রন্থে তাকে তার সনদের দিক দিয়ে দুর্বল আখ্যা দিয়েছেন। অতঃপর তিনি ভাষার দিক দিয়ে হাদীছটিকে অস্বীকার করে বলেছেনঃ হাদীছটি সহীহ হাদীছের বিপরীতে এসেছে যেটি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেনঃ
ما كان النبي صلى الله عليه وسلم يزيد في رمضان ولا في غيره على إحدى عشرة ركعة رواه الشيخان
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রামাযান মাসে এবং রামাযান ছাড়া অন্য সময়ে এগার রাকাআতের বেশী সালাত আদায় করতেন না।’ বুখারী ও মুসলিম।
হাফিয ইবনু হাযার অনুরূপ কথাই বলেছেন। তবে তিনি কিছু বেশী বলেছেনঃ অন্যদের চেয়ে আয়েশই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর রাতের বেলার অবস্থা সম্পর্কে বেশী জ্ঞাত ছিলেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ জাবের ইবনু আদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার [আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)]-এর মত হাদীছ বর্ণনা করেছেন। যেটি ইবনু নাসর `কিয়ামুল লাইল` (পৃঃ ৯০, ১১৪) গ্রন্থে, তাবারানী `আল-মুজামুস সাগীর` (পৃঃ ১০৮) গ্রন্থে এবং ইবনু হিব্বান তার সহীহার মধ্যে (নং ৯২০) বর্ণনা করেছেন।
কোন কোন দুর্বল বর্ণনাকারী জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীছকে নষ্ট করে ফেলেছেন। বলেছেনঃ “তিনি চব্বিশ রাকাআত সালাত পড়েছেন এবং তিন রাকাআত বিতর পড়েছেন। এ হাদীছটি সাহমী “তারীখু জুরজান” (৭৫,২৭৬) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলছিঃ এটি সহীহ নয়। কারণ এটির সনদে এমন ব্যক্তি আছেন যার অবস্থা সম্পর্কে জানা যায় না। কেননা মুহাম্মাদ ইবনু হামীদ ও তার শাইখ উমর ইবনু হারূণকে মিথ্যার দোষে দোষী করা হয়েছে। তাদের দু'জনের বর্ণনা গণনার মধ্যেই নিয়ে আসা যায় না। আর যেখানে তাদের বিরোধিতা করা হয়েছে সেখানে তো প্রশ্নই আসে না। যেমন এখানে।
মোটকথাঃ ইমামগণের বক্তব্য এমর্মে এক যে, আবু শাইবার হাদীছ দুর্বল। বরং হাফিয যাহাবী `আল-মীযান` গ্রন্থে এ হাদীছটিকে আবু শাইবার মুনকারগুলোর একটি মুনকার হিসাবে গণ্য করেছেন। ফাকীহ আহমাদ ইবনু হাজার হায়তামী “আল-ফাতাওয়াল কুবরা” গ্রন্থে বলেছেনঃ হাদীছটি খুবই দুর্বল। আমার সিদ্ধান্ত এই যে হাদীছটি নিম্নোক্ত কারণে বানোয়াটঃ
১। হাদীছটি আয়েশা এবং জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সহীহ হাদীছ বিরোধী।
২। বর্ণনাকারী আবু শাইবাহ খুবই দুর্বল। যেমনটি বুঝা যাচ্ছে বাইহাকী ও অন্যদের বক্তব্যে। ইবনু মাঈন তার সম্পর্কে বলেনঃ তিনি নির্ভরযোগ্য নন। জুযজানী বলেনঃ তিনি সাকেত (অগ্রহণযোগ্য)।
শুবা এক ঘটনায় তাকে মিথ্যুক আখ্যা দিয়েছেন। ইমাম বুখারী বলেছেনঃ সাকাতু আনহু (তারা তার ব্যাপারে চুপ থেকেছেন)। (এর ব্যাখ্যা পূর্বে দেয়া হয়েছে, অর্থাৎ যার সম্পর্কে তিনি এরূপ কথা বলেছেন তিনি তার নিকট অত্যন্ত নিম্ন পর্যায়ভুক্ত, যেমনটি হাফিয ইবনু কাসীর `ইখতিসারু উলুমিল হাদীছ` (পৃঃ ১১৮) গ্রন্থে বলেছেন।
৩। আলোচ্য হাদীছটিতে এসেছে রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর রমযানের সালাত জামা'আতহীন ছিল। এটি জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সহীহ হাদীছ বিরোধী এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর অন্য এক হাদীছ বিরোধীঃ রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক মধ্য রাতে বের হলেন অতঃপর তিনি মসজিদে সালাত আদায় করলেন। কতিপয় ব্যক্তিও তার সালাতের সাথে সালাত আদায় করল। বহু লোক হয়ে গেলে, তারা একে অপরের সাথে আলোচনা করল। এ কারণে বহু লোকের সমাগম ঘটলো এবং তারা সকলে তার সাথে সালাত আদায় করল। তারা অন্যদের সাথে আরো কথাবার্তা বলল, ফলে তৃতীয় রাতে মসজিদে লোকের সংখ্যা আরো বেড়ে গেল। রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বের হলেন তিনি সালাত আদায় করলেন। আল-হাদীছ। এটি জাবেরের হাদীছের ন্যায়।
তাতে আরো রয়েছেঃ কিন্তু আমি তোমাদের উপর তা ফরয করে দেয়া হবে এরূপ ভয় করছি, অতঃপর তোমরা তা আদায় করতে অক্ষম হয়ে যাবে।' বুখারী ও মুসলিম হাদীছটি বর্ণনা করেছেন। এ সব কিছুই প্রমাণ করছে যে, আবু শাইবার হাদীছটি বানোয়াট।
ফায়েদাঃ
জাবের এবং আয়েশার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদীছ প্রমাণ করছে যে জামা'আতের সাথে সালাতুত তারাবীহ পড়া শরীয়ত সম্মত এবং তার রাকাআত সংখ্যা হচ্ছে বিতর সহ সবোচ্চ এগার রাকাআত।
উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করা হয়ে থাকে যে, তিনি বিশ রাকাআত পড়ার জন্য নির্দেশ দিয়েছেন তার সনদটি দুর্বল। তিনি যে এগারো রাকাআত পড়ার নির্দেশ দিয়েছেন সেটি সহীহ এবং সহীহ সুন্নাহের সাথে তার মিল রয়েছে। কোন সাহাবা হতেই তার বিপরীত সাব্যস্ত হয়নি।