হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6203)


(بَيْنََا أَنَا نَائِم عِشَاء فِي الْمَسْجِد الْحَرَام إِذْ أَتَانِي آتٍ، فَأَيْقَظَنِي،
فَاسْتَيْقَظْت، فَلَمْ أَرَ شَيْئاً، ثم عدت في النوم، ثم أيقظني … فَإِذَا أَنَا
بِهَيْئَة خَيَال، فَأَتْبَعْته بَصَرِي حَتَّى خَرَجْت مِنْ الْمَسْجِد؛ فَإِذَا أَنَا بِدَابَّةٍ
أَدْنَى شَبَهاً بِدَوَابِّكُمْ هَذِهِ، بِغَالكُمْ هَذِهِ، غَيْر أَنَّهُ مُضْطَرِب الْأُذُنَيْنِ يُقَال
لَهُ: الْبُرَاق وَكَانَتْ الْأَنْبِيَاء صلوات الله عليهم تَرْكَبهُ قَبْلِي …
ثُمَّ أُتِيت بِالْمِعْرَاجِ الَّذِي كَانَتْ تَعْرُج عَلَيْهِ أَرْوَاح بني آدم، فَلَمْ يَرَ الْخَلَائِق
أَحْسَن مِنْ الْمِعْرَاج، أَمَا رَأَيْتم الْمَيِّت حِين يُشَقّ بَصَره طَامِحاً إِلَى
السَّمَاء؟ فَإِنَّمَا يُشَقّ بَصَره طَامِحاً إِلَى السَّمَاء عَجَبه بِالْمِعْرَاجِ …
ثُمَّ صَعِدْت إِلَى السَّمَاء الْخَامِسَة؛ فَإِذَا أَنَا بِهَارُون، وَنِصْف لِحْيَته
بَيْضَاء وَنِصْفهَا سَوْدَاء، تَكَاد لِحْيَته تُصِيب سُرَّته مِنْ طُولهَا …
ثُمَّ صَعِدَتْ إِلَى السَّمَاء السَّادِسَة فَإِذَا أَنَا بِمُوسَى، رَجُل آدَم كَثِير
الشَّعْر لَوْ كَانَ عَلَيْهِ قَمِيصَانِ؛ لَنَفَذَ شَعْره دُون الْقَمِيص (وفي رواية:
خرج شعره منهما!) وَإِذَا هُوَ يَقُول: يَزْعُم النَّاس أَنِّي أَكْرَم عَلَى اللَّه
منْ هَذَا؛ بَلْ هَذَا أَكْرَم عَلَى اللَّه مِنِّي … ) الحديث بطوله في ست صفحات
من نحو قياس صفحات هذا الكتاب.
موضوع.
ولوائح الوضع عليه ظاهرة. أخرجه ابن جرير في `تفسيره ` (15/
10 - 12) ، والبيهقي في `الدلائل ` (2/390 - 396) من طريق أبي هارون العبدي
عن أبي سعيد الخدري عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: … فذكره؛ مصححاً بعض ألفاظه
من `تفسير ابن كثير`، وعزاه لابن أبي حاتم أيضاً، وقال:
`فذكره بسياق طويل حسن أنيق؛ أجود مما ساقه غيره، على غرابته، وما فيه
من النكارة … وأبو هارون العبدي - اسمه: عمارة بن جوين، وهو - مضعف عند
الأئمة`.
قلت: بل اتهمه بعضهم، وحديثه هذا ونحوه يدل على موضع لينهم؛ فقد
أورده ابن حبان في `الضعفاء` (2/177) وقال:
`كان رافضياً، يروي عن أبي سعيد ما ليس من حديثه، لا يحل كتابة حديثه
إلا على جهة التعجب `.
وقال الذهبي في `المغني `:
`تابعي ضعيف. قال حماد بن زيد: كذاب `. وقال الحافظ في `التقريب `:
`متروك، ومنهم من كذبه، شيعي`.
والحديث عزاه السيوطي في `الدر، (4/142) لابن المنذر أيضاً، وابن مردويه،
وابن عساكر، وسكت عنه - كما هي غالب عادته - ؛ الأمر الذي يجعل من لا علم
عنده يقدم على ذكره؛ بل والاحتجاج به، كما فعل الشيخ التويجري في `الرد
على من أجاز تهذيب اللحية` (ص 7 - 8 و15 و51) ، ولقد أصاب في رده على
ذاك الكاتب الذي زعم: `أن اللحية رمز عربي، وليس من الإسلام في شيء! `،
ورسالته تدور حول إبطال هذا الزعم، ولقد كان موفقاً في ذلك، بخلاف عنوانه
للرسالة، فلقد كان مخطئاً فيه من ناحيتين:
الأولى: أنه لا يطابق المعنون عنه؛ لأن تهذيب اللحية غير حلقها بداهة،
وهو لم يرد فيها على الذين يذهبون إلى جواز تهذيبها مع قولهم بحرمة حلقها.
والأخرى: أنه - أعني: العنوان - يشمل الحنفية وغيرهم الذين من مذهبهم
جواز أخذ ما زاد على القبضة؛ بل يشمل ابن عمر وأبا هريرة وغيرهم من السلف
الذين احتج بهم الحنفية؛ وإن لم يسلم بذلك الفاضل المعلق على رسالة: `وجوب
إعفاء اللحية` للشيخ الكاندهلوي؛ فإنه قد خالف السلف، ومنهم إمام السنة
أحمد بن حنبل؛ فقد روى الخلال في `كتاب الترجل `: قال: أخبرني حوب،
قال: سئل أحمد عن الأخذ من اللحية؟ قال:
كان ابن عمر يأخذ منها ما زاد على القبضة. وكأنه ذهب إليه. قلت له: ما
(الإعفاء) ؟ قال: يروى عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال: كان هذا عنده الإعفاء.
أخبرني محمد بن أبي هارون: أن إسحاق حدثهم قال: سألت أحمد عن
الرجل يأخذ من عارضيه؟ قال: يأخذ من اللحية ما فضل عن القبضة. قلت:
فحديث النبي صلى الله عليه وسلم:
`أحفوا الشوارب وأعفوا اللحى`؟ قال: يأخذ من طولها ومن تحت حلقه ورأيت
أبا عبد الله يأخذ من طولها ومن تحت حلقه، وروى ابن هاني مثله في `مسائله `
(2/151/1848) .
قلت: ثم قال الخلال: أخبرني عبيد الله بن حنبل قال: حدثني أبي قال:
قال أبو عبد الله: ويأخذ من عارضيه، ولا يأخذ من الطول، وكان ابن عمر يأخذ
من عارضيه إذا حلق رأسه في حج أو عمرة، لا بأس بذلك.
فأقول: هذا الرواية شاذة؛ إن لم أقل: منكرة عن الإمام أحمد، من ناحيتين:
الأولى: في قول أحمد: `ولا يأخذ من الطول `. فإنه مخالف لرواية حرب
لاسحاق المتقدمتين، ولعل ذلك من عبيد الله بن حنبل؛ فإنه غير معروف بالرواية؛
فإن الخطيب لما ذكره في `التاريخ ` (10/347) لم يزد على أن ذكر ما في هذا
الإسناد، فقال:
`حدث عن أبيه، سوى عنه أبو بكر الخلال `.
فمثله لا يحتج به بما تفرد به، فكيف إذا خالف؟!
والأخرى: في قوله في أثر ابن عمر: وكان يأخذ من عارضيه `؛ فإنه مخالف
لزيادة فِي حَدِيثِ ابن عمر في `الصحيحين `:
`خالفوا المشركين، ووفروا اللحى، وأحفوا الشوارب `.
وهو مخرج في `الإرواء` (1/119) ، وزاد البخاري في رواية (5892 - فتح) .:
`وكان ابن عمر إذا حج أو اعتمر؛ قبض على لحيته، فما فضل؛ أخذ`.
فهذا هو الصحيح عَنْ ابْنِ عُمَرَ، وعن أحمد أيضاً. وله عَنْ ابْنِ عُمَرَ طريق
أخرى، رواها ابن أبي شيبة (8/563) ، وابن سعد (4/178) . وله عنده طرق أخرى.
ثم روى الخلال، ومن قبله ابن أبي شيبة عن أبي زرعة بن جرير قال:
`كان أبو هريرة يقبض على لحيته، ثم يأخذ ما فضل عن القبضة`.
وإسناده صحيح على شرط مسلم.
قلت: والآثار السلفية بهذا الماس كثيرة؛ حتى قال منصور عن إبراهيم:
` كانوا يأخذون من جوانبها، وينظفونها. يعني: اللحية `.

أخرجه ابن أبي شيبة (8/564) ، والبيهقي في `شعب الإيمان ` (5/220/
6438) بإسناد صحيح عن إبراهيم، وهو: ابن يزيد النخعي، وهو تابعي فقيه
جليل، قال الذهبي في `الكاشف `:
`كان عجباً في الورع والخير، متوقياً للشهرة، رأساً في العلم، مات سنة
(96) كهلاً `.
قلت: فالظاهر أنه يعني من أدركهم من الصحابة وكبار التابعين وأجلائهم،
كالأسود بن يزيد - وهو خاله - وشريح القاضي، ومسروق وأبي زرعة - وهو الراوي
لأثر أبي هريرة المذكور آنفاً - وأبي عبيدة بن عبد الله بن مسعود، والآثار في الباب
كثيرة؛ بل إن بعضهم جعل الأخذ من اللحية من تمام تفسير قوله تعالى في
الحُجَّاج: {ثم ليقضوا تفثهم} ، فقال محمد بن كعب القرظي:
`رمي الجمار، وذبح الذبيحة، وأخذ من الشاربين واللحية والأظفار`.

أخرجه ابن جرير بسند جيد عنه.
ثم روى عن مجاهد مثله. وسنده صحيح.
ومجاهد، ومحمد بن كعب من أجلة التابعين المكثرين من الرواية عن ترجمان
القرآن عبد الله بن عباس، والآخذين العلم عنه والتفسير، ولعلهما تلقيا منه تفسير
آية الحج هذه؛ فقد قال عطاء: عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ أنه قال في قوله: {ثم ليقضوا
تفئهم} ، قال:
`التفث: حلق الرأس، وأخذ من الشاربين، ونتف الإبط، وحلق العانة، وقص
الأظفار، والأخذ من العارضين، ورمي الجمار، والموقف بعرفة والمزدلفة `.

أخرجه ابن جرير أيضاً، وإسناده صحيح.
ورواه ابن أبي شيبة من طريق أخرى عن عطاء بن أبي رباح قال:
`كانوا يحبون أن يعفوا اللحية؛ إلا في حج أو عمرة. وكان إبراهيم يأخذ من
عارض لحيته `.
وإسناده صحيح أيضاً.
وإذا عرفت ما تقدم من هذه الآثار المخالفة لحديث الترجمة؛ فالعجب كل
العجب من الشيخ التويجري وأمثاله من المتشددين بغير حق، كيف يتجرأون على
مخالفة هذه الآثار السلفية؟! فيذهبون إلى عدم جواز تهذيب اللحية مطلقاً؛ ولو
عند التحلل من الإحرام، ولا حجة لهم تذكر سوى الوقوف عند عموم حديث:
` … وأعفوا اللحى`، كأنهم عرفوا شيئاً فات أولئك السلف معرفته، وبخاصة
أن فيهم عبد الله ابن عمر الراوي لهذا الحديث؛ كما تقدم، وهم يعلمون أن الراوي
أدرى بمرويه من غيره، وليس هذا من باب العبرة بروايته لا برأيه؛ كما توهم البعض،
فإن هذا فيما إذا كان رأيه مصادماً لروايته، وليس الأمر كذلك هنا كما لا يخفى على
أهل العلم والنهى؛ فإن هؤلاء يعلمون أن العمل بالعمومات التي لم يجر العمل بها
على عمومها هو أصل كل بدعة في الدين، وليس هنا تفصيل القول في ذلك،
فحسبنا أن نذكر بقول العلماء وفي مثل هذا المجال؛ `لو كان خيراً؛ لسبقونا إليه `.
أضف إلى ما تقدم أن من أولئك السلف الأول الذين خالفهم أولئك المتشددون
ابن عباس ترجمان القرآن الذي يحتجون بتفسيره؛ إذا وافق هواهم، بل وجعلوه في
حكم المرفوع؛ ولو لم يصح السند به إليه، كما فعلوا بما روي عنه في تفسير قوله
تعالى: {يدنين عليهن من جلابيبهن} قال: `يبدين عيناً واحدة` (1) ! ثم تراهم
هنا لا يعبأون بتفسيره لآية (التفث) هذه، مع ثبوته عنه وعن جمع من تلامذته،
وقول ابن الجوزي في `زاد المسير` (5/426 - 427) : بأنه أصح الأقوال في تفسير
الآية. والله المستعان.
(1) انظر كتابي `حجاب المرأة المسلمة` ومقدمة الطبعة الجديدة، طبع المكتبة الإسلامية،
وقد سميته فيها بـ `جلباب المرأة المسلمة` لسبب هام ذكرته هناك.
ثم رأيت في `الموطأ، (1/353 - 354) : عن مالك: أنه بلغه عن سالم بن
عبد الله؛ كان إذا أراد أن يحرم؛ دعا بـ (الجَلْمَيْن) ، فقص شاربه، وأخذ من لحيته
قبل أن يركب، وقبل أن يهل محرماً.
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(আমি হারামের মসজিদে এশার সময় ঘুমন্ত ছিলাম। হঠাৎ একজন আগমনকারী আমার কাছে এলেন এবং আমাকে জাগালেন। আমি জেগে উঠলাম, কিন্তু কিছুই দেখতে পেলাম না। এরপর আমি আবার ঘুমিয়ে পড়লাম। অতঃপর তিনি আমাকে আবার জাগালেন... তখন আমি একটি ছায়ার আকৃতি দেখতে পেলাম। আমি আমার দৃষ্টি দিয়ে তাকে অনুসরণ করলাম, যতক্ষণ না আমি মসজিদ থেকে বের হলাম। তখন আমি একটি জন্তু দেখতে পেলাম, যা তোমাদের এই জন্তুগুলোর, তোমাদের এই খচ্চরগুলোর সাথে সামান্য সাদৃশ্যপূর্ণ। তবে তার কান দুটি ছিল অস্থির (বা লম্বা)। তাকে ‘বুরাক’ বলা হতো। আমার পূর্বে নবীগণ (আল্লাহর সালাত ও শান্তি তাদের উপর বর্ষিত হোক) এর উপর আরোহণ করতেন... এরপর আমার কাছে মি'রাজ আনা হলো, যার উপর দিয়ে বনী আদমের রূহসমূহ আরোহণ করে। সৃষ্টিকুল মি'রাজের চেয়ে সুন্দর কিছু দেখেনি। তোমরা কি মৃত ব্যক্তিকে দেখনি, যখন তার চোখ আকাশের দিকে স্থির হয়ে যায়? তার চোখ আকাশের দিকে স্থির হয়ে যায় কেবল মি'রাজের প্রতি তার বিস্ময়ের কারণে... এরপর আমি পঞ্চম আকাশে আরোহণ করলাম। সেখানে আমি হারূনকে দেখতে পেলাম। তার দাড়ির অর্ধেক সাদা এবং অর্ধেক কালো ছিল। তার দাড়ি এত লম্বা ছিল যে তা প্রায় তার নাভি স্পর্শ করছিল... এরপর আমি ষষ্ঠ আকাশে আরোহণ করলাম। সেখানে আমি মূসাকে দেখতে পেলাম। তিনি ছিলেন গমের মতো বর্ণের, ঘন চুলের অধিকারী একজন পুরুষ। যদি তার গায়ে দুটি জামাও থাকত, তবে তার চুল জামার নিচ দিয়েও বেরিয়ে আসত (অন্য বর্ণনায়: তার চুল জামা ভেদ করে বেরিয়ে আসত!)। আর তিনি বলছিলেন: লোকেরা ধারণা করে যে আমি আল্লাহর কাছে এর (মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) চেয়ে বেশি সম্মানিত; বরং ইনিই আমার চেয়ে আল্লাহর কাছে বেশি সম্মানিত...) এই হাদীসটি এই কিতাবের পৃষ্ঠার পরিমাপ অনুযায়ী প্রায় ছয় পৃষ্ঠা জুড়ে বর্ণিত হয়েছে।

**মাওদ্বূ (বানোয়াট)।**

এর উপর জাল হওয়ার লক্ষণসমূহ সুস্পষ্ট। এটি ইবনু জারীর তার ‘তাফসীর’ (১৫/১০-১২)-এ এবং বাইহাকী ‘আদ-দালাইল’ (২/৩৯০-৩৯৬)-এ আবূ হারূন আল-আবদী-এর সূত্রে আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন; ইবনু কাসীর-এর ‘তাফসীর’ থেকে এর কিছু শব্দকে সহীহ সাব্যস্ত করে। তিনি এটিকে ইবনু আবী হাতিম-এর দিকেও সম্পর্কিত করেছেন এবং বলেছেন:

‘তিনি এটিকে একটি দীর্ঘ, সুন্দর ও মার্জিত বিন্যাসে উল্লেখ করেছেন; যা অন্যদের বর্ণনার চেয়েও উত্তম, যদিও এটি গারীব (অপরিচিত) এবং এতে মুনকার (অস্বীকৃত) বিষয়বস্তু রয়েছে... আর আবূ হারূন আল-আবদী—তার নাম হলো: উমারা ইবনু জুওয়াইন, তিনি ইমামদের নিকট দুর্বল হিসেবে গণ্য।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: বরং কেউ কেউ তাকে মিথ্যার অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন। আর তার এই হাদীস এবং এর অনুরূপ হাদীসগুলো তাদের (মুহাদ্দিসদের) দুর্বলতার স্থান নির্দেশ করে। ইবনু হিব্বান তাকে ‘আদ-দুআফা’ (২/১৭৭)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:

‘সে ছিল রাফিযী (শিয়া), সে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এমন কিছু বর্ণনা করত যা তার হাদীস নয়। তার হাদীস লেখা বৈধ নয়, কেবল বিস্ময় প্রকাশের উদ্দেশ্যে ছাড়া।’

আর যাহাবী ‘আল-মুগনী’-তে বলেছেন:

‘দুর্বল তাবেয়ী। হাম্মাদ ইবনু যায়দ বলেছেন: সে মিথ্যাবাদী।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন:

‘মাতরূক (পরিত্যক্ত), কেউ কেউ তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন, সে শিয়া ছিল।’

আর সুয়ূতী ‘আদ-দুর’ (৪/১৪২)-এ হাদীসটিকে ইবনু মুনযির, ইবনু মারদাওয়াইহ এবং ইবনু আসাকির-এর দিকেও সম্পর্কিত করেছেন এবং তিনি এ বিষয়ে নীরব থেকেছেন—যেমনটি তার অধিকাংশ অভ্যাস—যা এমন ব্যক্তিকে উৎসাহিত করে যার জ্ঞান নেই, সে এটিকে উল্লেখ করতে; বরং এটিকে দলীল হিসেবে পেশ করতে, যেমনটি শাইখ আত-তুয়াইজরী তার ‘আর-রাদ্দু আলা মান আজাযা তাহযীব আল-লিহয়াহ’ (দাড়ি ছাঁটা বৈধ মনেকারীদের প্রতিবাদ) (পৃ. ৭-৮, ১৫ ও ৫১)-এ করেছেন। তিনি সেই লেখকের প্রতিবাদে সঠিক ছিলেন, যে দাবি করেছিল: ‘দাড়ি একটি আরব প্রতীক, ইসলামের সাথে এর কোনো সম্পর্ক নেই!’ আর তার রিসালাহটি এই দাবিকে বাতিল করার কেন্দ্রেই আবর্তিত হয়েছে। তিনি এই বিষয়ে সফল ছিলেন, তবে তার রিসালাহর শিরোনামের ক্ষেত্রে তিনি ভুল করেছেন। তিনি দুটি দিক থেকে ভুল করেছেন:

প্রথমত: এটি শিরোনামের বিষয়বস্তুর সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ নয়; কারণ দাড়ি ছাঁটা (তাহযীব) স্পষ্টতই দাড়ি কামানো (হাল্ক)-এর চেয়ে ভিন্ন। আর তিনি এতে তাদের প্রতিবাদ করেননি যারা দাড়ি কামানো হারাম মনে করা সত্ত্বেও ছাঁটা বৈধ মনে করেন।

দ্বিতীয়ত: শিরোনামটি—আমি শিরোনামের কথা বলছি—হানাফী এবং অন্যান্যদের অন্তর্ভুক্ত করে, যাদের মাযহাব হলো এক মুষ্টির অতিরিক্ত দাড়ি কেটে ফেলা বৈধ। বরং এটি ইবনু উমার, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্য সালাফদেরও অন্তর্ভুক্ত করে, যাদের দ্বারা হানাফীরা দলীল পেশ করেন; যদিও শাইখ আল-কান্দাহলভী-এর ‘ওয়াজূব ই’ফা আল-লিহয়াহ’ (দাড়ি লম্বা করার আবশ্যকতা) নামক রিসালাহর সম্মানিত টীকাকার তা মেনে নেননি; কারণ তিনি সালাফদের বিরোধিতা করেছেন, যাদের মধ্যে সুন্নাহর ইমাম আহমাদ ইবনু হাম্বলও রয়েছেন। আল-খাল্লাল ‘কিতাবুত তারাজ্জুল’-এ বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন: আমাকে হাওব খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: আহমাদকে দাড়ি থেকে কেটে ফেলা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল? তিনি বললেন: ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক মুষ্টির অতিরিক্ত অংশ কেটে ফেলতেন। আর মনে হয় তিনিও (আহমাদ) এই মত গ্রহণ করেছেন। আমি তাকে (আহমাদকে) বললাম: ‘আল-ই’ফা’ (লম্বা করা) কী? তিনি বললেন: এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণিত। তিনি বললেন: তার (ইবনু উমার-এর) নিকট এটিই ছিল ‘ই’ফা’ (লম্বা করা)।

মুহাম্মাদ ইবনু আবী হারূন আমাকে খবর দিয়েছেন যে ইসহাক তাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি আহমাদকে এমন ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম যে তার গালের পাশ থেকে (দাড়ি) কেটে ফেলে? তিনি বললেন: সে দাড়ি থেকে এক মুষ্টির অতিরিক্ত অংশ কেটে ফেলবে। আমি বললাম: তাহলে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর হাদীস: ‘তোমরা গোঁফ ছোট করো এবং দাড়ি লম্বা করো (ই’ফা করো)’? তিনি বললেন: সে এর দৈর্ঘ্য থেকে এবং তার গলার নিচ থেকে কেটে ফেলবে। আর আমি আবূ আব্দুল্লাহকে (ইমাম আহমাদকে) দেখেছি যে তিনি তার দাড়ির দৈর্ঘ্য থেকে এবং তার গলার নিচ থেকে কেটে ফেলতেন। ইবনু হানী তার ‘মাসাইল’ (২/১৫১/১৮৪৮)-এ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এরপর আল-খাল্লাল বলেছেন: উবাইদুল্লাহ ইবনু হাম্বল আমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: আমার পিতা আমাকে হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি বলেন: আবূ আব্দুল্লাহ (ইমাম আহমাদ) বলেছেন: সে তার গালের পাশ থেকে কেটে ফেলবে, কিন্তু দৈর্ঘ্য থেকে কাটবে না। আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন হজ বা উমরার জন্য মাথা মুণ্ডন করতেন, তখন তার গালের পাশ থেকে কেটে ফেলতেন। এতে কোনো সমস্যা নেই।

আমি বলি: এই বর্ণনাটি শায (বিরল), যদি আমি ইমাম আহমাদ থেকে মুনকার (অস্বীকৃত) নাও বলি, তবে দুটি দিক থেকে:

প্রথমত: আহমাদ-এর এই উক্তি: ‘আর দৈর্ঘ্য থেকে কাটবে না।’ এটি ইসহাক-এর নিকট হারব-এর পূর্বোক্ত বর্ণনার বিরোধী। আর সম্ভবত এটি উবাইদুল্লাহ ইবনু হাম্বল-এর কারণে হয়েছে; কারণ তিনি বর্ণনার ক্ষেত্রে সুপরিচিত নন। আল-খাতীব যখন তাকে ‘আত-তারীখ’ (১০/৩৪৭)-এ উল্লেখ করেছেন, তখন তিনি এই ইসনাদে যা আছে তার চেয়ে বেশি কিছু উল্লেখ করেননি। তিনি বলেছেন: ‘তিনি তার পিতা থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন, আবূ বকর আল-খাল্লাল তার থেকে বর্ণনা করেছেন।’ তার মতো ব্যক্তির একক বর্ণনার দ্বারা দলীল পেশ করা যায় না, আর যদি তিনি বিরোধিতা করেন তবে তো প্রশ্নই ওঠে না!

দ্বিতীয়ত: ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আছার (উক্তি)-এর ক্ষেত্রে তার এই উক্তি: ‘আর তিনি তার গালের পাশ থেকে কেটে ফেলতেন’; এটি সহীহাইন-এ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের অতিরিক্ত অংশের বিরোধী: ‘তোমরা মুশরিকদের বিরোধিতা করো, দাড়ি লম্বা করো (ওয়াফ্ফিরু) এবং গোঁফ ছোট করো।’ এটি ‘আল-ইরওয়া’ (১/১১৯)-এ সংকলিত হয়েছে। আর বুখারী একটি বর্ণনায় (৫৮৯২ - ফাতহ) অতিরিক্ত যোগ করেছেন: ‘আর ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন হজ বা উমরা করতেন, তখন তিনি তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করতেন, অতঃপর যা অতিরিক্ত থাকত তা কেটে ফেলতেন।’ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এবং আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকেও এটিই সহীহ। ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তার (ইমাম আহমাদ-এর) কাছে অন্য একটি সূত্রও রয়েছে, যা ইবনু আবী শাইবাহ (৮/৫৬৩) এবং ইবনু সা’দ (৪/১৭৮) বর্ণনা করেছেন। তার কাছে এর আরও অন্যান্য সূত্র রয়েছে।

এরপর আল-খাল্লাল এবং তার পূর্বে ইবনু আবী শাইবাহ আবূ যুর’আহ ইবনু জারীর থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ‘আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করতেন, অতঃপর এক মুষ্টির অতিরিক্ত যা থাকত তা কেটে ফেলতেন।’ এর ইসনাদ মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।

আমি (আল-আলবানী) বলি: আর এই বিষয়ে সালাফদের আছার (উক্তি) অনেক। এমনকি মানসূর ইবরাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বলেছেন: ‘তারা এর (দাড়ির) পাশ থেকে কেটে ফেলতেন এবং তা পরিষ্কার করতেন।’ এটি ইবনু আবী শাইবাহ (৮/৫৬৪) এবং বাইহাকী ‘শুআবুল ঈমান’ (৫/২২০/৬৪৩৮)-এ ইবরাহীম থেকে সহীহ ইসনাদে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি হলেন: ইবনু ইয়াযীদ আন-নাখঈ, তিনি একজন মহান ফকীহ তাবেয়ী। যাহাবী ‘আল-কাশেফ’-এ বলেছেন:

‘তিনি তাকওয়া ও কল্যাণে বিস্ময়কর ছিলেন, খ্যাতি এড়িয়ে চলতেন, জ্ঞানে শীর্ষস্থানীয় ছিলেন। তিনি ৯৬ হিজরীতে মধ্যবয়সে মারা যান।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: সুতরাং বাহ্যত মনে হয় যে তিনি (ইবরাহীম আন-নাখঈ) তাদের (সাহাবী ও বড় তাবেয়ী) কথা বুঝিয়েছেন যাদের তিনি পেয়েছেন, যেমন আল-আসওয়াদ ইবনু ইয়াযীদ—যিনি তার মামা—এবং শুরাইহ আল-কাদী, মাসরূক, আবূ যুর’আহ—যিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্বোক্ত আছার-এর বর্ণনাকারী—এবং আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ। আর এই অধ্যায়ে আছার অনেক। বরং কেউ কেউ হাজীদের সম্পর্কে আল্লাহর বাণী: {অতঃপর তারা যেন তাদের অপরিচ্ছন্নতা দূর করে} এর তাফসীরের পূর্ণতার অংশ হিসেবে দাড়ি থেকে কেটে ফেলাকে গণ্য করেছেন। মুহাম্মাদ ইবনু কা’ব আল-কুরাযী বলেছেন:

‘জামারায় পাথর নিক্ষেপ করা, কুরবানী যবেহ করা, গোঁফ, দাড়ি ও নখ কাটা।’

ইবনু জারীর তার থেকে উত্তম (জায়্যিদ) সনদে এটি বর্ণনা করেছেন। এরপর তিনি মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকেও অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ সহীহ।

আর মুজাহিদ এবং মুহাম্মাদ ইবনু কা’ব (রাহিমাহুল্লাহ) হলেন মহান তাবেয়ীগণের অন্তর্ভুক্ত, যারা কুরআনের অনুবাদক আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে প্রচুর বর্ণনা করেছেন এবং তার কাছ থেকে জ্ঞান ও তাফসীর গ্রহণ করেছেন। সম্ভবত তারা তার কাছ থেকেই হজের এই আয়াতের তাফসীর লাভ করেছেন। কারণ আতা (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি আল্লাহর বাণী: {অতঃপর তারা যেন তাদের অপরিচ্ছন্নতা দূর করে} সম্পর্কে বলেছেন:

‘আত-তাফাছ (অপরিচ্ছন্নতা): মাথা মুণ্ডন করা, গোঁফ কাটা, বগলের লোম উপড়ে ফেলা, নাভির নিচের লোম কামানো, নখ কাটা, গালের পাশ থেকে (দাড়ি) কাটা, জামারায় পাথর নিক্ষেপ করা এবং আরাফাহ ও মুযদালিফায় অবস্থান করা।’

এটি ইবনু জারীরও বর্ণনা করেছেন এবং এর ইসনাদ সহীহ।

আর ইবনু আবী শাইবাহ অন্য সূত্রে আতা ইবনু আবী রাবাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন:

‘তারা দাড়ি লম্বা করা পছন্দ করতেন; তবে হজ বা উমরার সময় ছাড়া। আর ইবরাহীম তার দাড়ির গালের পাশ থেকে কেটে ফেলতেন।’

এর ইসনাদও সহীহ।

আর যখন আপনি অনুবাদের হাদীসের বিরোধী এই পূর্বোক্ত আছারগুলো জানতে পারলেন, তখন শাইখ আত-তুয়াইজরী এবং তার মতো অন্যায়ভাবে কঠোরতাকারীদের প্রতি চরম বিস্ময় জাগে, কীভাবে তারা এই সালাফী আছারগুলোর বিরোধিতা করার সাহস করেন?! তারা দাড়ি ছাঁটা (তাহযীব) একেবারেই বৈধ নয় বলে মত দেন; এমনকি ইহরাম থেকে হালাল হওয়ার সময়ও নয়। তাদের কাছে দলীল হিসেবে উল্লেখ করার মতো কিছু নেই, কেবল হাদীসের সাধারণ অর্থের উপর স্থির থাকা ছাড়া: ‘...আর দাড়ি লম্বা করো (ই’ফা করো)’, যেন তারা এমন কিছু জেনেছেন যা সেই সালাফগণ জানতে পারেননি। বিশেষ করে এই হাদীসের বর্ণনাকারী আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের মধ্যে ছিলেন, যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। আর তারা জানেন যে বর্ণনাকারী তার বর্ণিত বিষয় সম্পর্কে অন্যদের চেয়ে বেশি অবগত। আর এটি সেই নীতির অন্তর্ভুক্ত নয় যে, ‘তার (বর্ণনাকারীর) বর্ণনা গ্রহণযোগ্য, তার রায় নয়’; যেমনটি কেউ কেউ ধারণা করেছেন। কারণ এটি তখনই প্রযোজ্য যখন তার রায় তার বর্ণনার সাথে সাংঘর্ষিক হয়। কিন্তু এখানে বিষয়টি এমন নয়, যা জ্ঞান ও প্রজ্ঞার অধিকারীদের কাছে গোপন নয়। কারণ এই লোকেরা জানেন যে, যে সাধারণ বিধানের উপর তার সাধারণ অর্থে আমল করা হয়নি, তার উপর আমল করাই দ্বীনের প্রতিটি বিদ’আতের মূল। এখানে এ বিষয়ে বিস্তারিত আলোচনার সুযোগ নেই। এমন পরিস্থিতিতে আমাদের জন্য আলেমদের এই উক্তিটি স্মরণ করাই যথেষ্ট: ‘যদি এটি কল্যাণকর হতো, তবে তারা (সালাফগণ) আমাদের আগে তা করতেন।’

পূর্বোক্ত আলোচনার সাথে আরও যোগ করুন যে, সেই প্রথম সালাফদের মধ্যে যাদের বিরোধিতা এই কঠোরতাকারীরা করেছেন, তাদের একজন হলেন কুরআনের অনুবাদক ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যার তাফসীর দ্বারা তারা দলীল পেশ করেন; যখন তা তাদের প্রবৃত্তির সাথে মিলে যায়। বরং তারা এটিকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি) এর হুকুমে গণ্য করেন; যদিও তার পর্যন্ত সনদ সহীহ না হয়, যেমনটি তারা করেছেন আল্লাহর বাণী: {তারা যেন তাদের চাদরের কিছু অংশ নিজেদের উপর টেনে দেয়} এর তাফসীর সম্পর্কে তার থেকে যা বর্ণিত হয়েছে: তিনি বলেছেন: ‘তারা একটি চোখ প্রকাশ করবে’ (১)! এরপর আপনি দেখবেন যে, এখানে তারা (আত-তাফাছ) আয়াতের তার এই তাফসীরকে গুরুত্ব দেন না, যদিও তা তার থেকে এবং তার শিষ্যদের একটি দল থেকে প্রমাণিত। আর ইবনুল জাওযী ‘যাদুল মাসীর’ (৫/৪২৬-৪২৭)-এ বলেছেন যে, এটিই আয়াতের তাফসীরের ক্ষেত্রে সবচেয়ে সহীহ উক্তি। আর আল্লাহই সাহায্যকারী।

(১) আমার কিতাব ‘হিজাবুল মারআতিল মুসলিমাহ’ এবং নতুন সংস্করণের ভূমিকা দেখুন, যা আল-মাকতাবা আল-ইসলামিয়াহ কর্তৃক প্রকাশিত। আমি সেখানে এটিকে একটি গুরুত্বপূর্ণ কারণে ‘জিলবাবুল মারআতিল মুসলিমাহ’ নামে নামকরণ করেছি, যা আমি সেখানে উল্লেখ করেছি।

এরপর আমি ‘আল-মুওয়াত্তা’ (১/৩৫৩-৩৫৪)-এ দেখেছি: মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত যে, তার কাছে সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে পৌঁছেছে যে, তিনি যখন ইহরাম বাঁধতে চাইতেন, তখন তিনি (আল-জালমাইন) নামক কাঁচি চাইতেন, অতঃপর তার গোঁফ কাটতেন এবং আরোহণ করার পূর্বে ও ইহরামের তালবিয়া বলার পূর্বে তার দাড়ি থেকে কেটে নিতেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6204)


(السماءُ قبلة الدُعاءِ) .
لم أقف له على أصل؛ إلا ما قاله الحافظ في `نتائج الأفكار` (1/259 -
260) في `آداب الدعاء `:
`قلت: أما الاستقبال؛ فلم أر فيه شيئاً صريحاً يختص به، وقد نقل الروياني
أنه يقول رافعاً بصره إلى السماء، وقد تقدم ذلك فِي حَدِيثِ عمر، وفي حديث
ثوبان: `السماء قبلة الدعاء`، فلعل ذلك مراد من أطلق `.
كذا قال! وحديث ثوبان تقدم عنده (1/245) ، وليس فيه ما ذكر، ولا رأيت
ذلك في كتاب من كتب السنة التي وقفت عليها. بل ظاهر كلام شارح `العقيدة
الطحاوية`: ابن أبي العز (ص 327) وغيره أن هذا الحديث المزعوم هو من قول
بعض المؤولة، أو المعطلة الذين ينكرون علو الله على خلقه، واستواءه على عرشه،
وما فطر عليه الناس من التوجه بقلوبهم في دعائهم جهة العلو، فقال الشارح:
`إن قولكم: إن السماء قبلة. الدعاء لم يقله أحد من سلف الأمة، ولا أنزل
الله به من سلطان … `.
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(السماءُ قبلة الدُعاءِ)
(আসমান হলো দু'আর কিবলাহ)।

আমি এর কোনো মূল (সনদ) খুঁজে পাইনি; তবে হাফিয (ইবনু হাজার আসকালানী) তাঁর ‘নাতাইজু আল-আফকার’ (১/২৫৯-২৬০) গ্রন্থে ‘আদাবু আদ-দু'আ’ (দু'আর শিষ্টাচার) অধ্যায়ে যা বলেছেন:

‘আমি বলি: ইস্তিকবাল (কিবলামুখী হওয়া)-এর ক্ষেত্রে, আমি এমন কোনো সুস্পষ্ট কিছু দেখিনি যা বিশেষভাবে এর সাথে সম্পর্কিত, আর রুইয়ানী বর্ণনা করেছেন যে, সে (দু'আকারী) আসমানের দিকে দৃষ্টি তুলে দু'আ করে, আর এটি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে পূর্বে উল্লেখ হয়েছে, এবং সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে (আছে): ‘আসমান হলো দু'আর কিবলাহ’, সম্ভবত যারা এই কথাটি সাধারণভাবে ব্যবহার করে, তাদের উদ্দেশ্য এটাই।’

তিনি এমনই বলেছেন! অথচ সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি তাঁর কাছে (১/২৪৫) এ পূর্বে উল্লেখ হয়েছে, কিন্তু তাতে তিনি যা উল্লেখ করেছেন তা নেই, আর আমি যে সকল সুন্নাহর কিতাব দেখেছি, সেগুলোর কোনোটিতেই এটি দেখিনি। বরং ‘আল-আক্বীদাহ আত-ত্বাহাবিয়্যাহ’-এর ব্যাখ্যাকার: ইবনু আবিল ইয (পৃষ্ঠা ৩২৭) এবং অন্যান্যদের বক্তব্যের বাহ্যিক অর্থ হলো, এই কথিত হাদীসটি হলো কিছু মুআওয়িলাহ (ব্যাখ্যাকারী) বা মুআত্তিলাহ (আল্লাহর গুণাবলী অস্বীকারকারী)-দের উক্তি, যারা আল্লাহর সৃষ্টির উপরে তাঁর উচ্চতাকে এবং আরশের উপর তাঁর ইস্তিওয়াকে অস্বীকার করে, এবং দু'আর সময় তাদের অন্তর দ্বারা ঊর্ধ্বমুখী হওয়ার যে স্বভাবজাত প্রবণতা মানুষের মধ্যে রয়েছে (তাও অস্বীকার করে)। অতঃপর ব্যাখ্যাকার (ইবনু আবিল ইয) বলেছেন: ‘নিশ্চয়ই তোমাদের এই উক্তি: ‘আসমান হলো দু'আর কিবলাহ’—উম্মাহর সালাফদের (পূর্বসূরিদের) কেউই বলেননি, আর আল্লাহ এর পক্ষে কোনো প্রমাণও নাযিল করেননি...।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6205)


(إِنَّ لِلَّهِ عز وجل سَرَايَا مِنَ الْمَلائِكَةِ تَحِلُّ، وَتَقِفُ عَلَى
مَجَالِسِ الذِّكْرِ فِي الأَرْضِ، فَارْتَعُوا فِي رِيَاضِ الْجَنَّةِ، قَالُوا: وَأَيْنَ
رِيَاضُ الْجَنَّةِ؟ قَالَ: مَجَالِسُ الذِّكْرِ، فَاغْدُوا وَرُوحُوا فِي ذِكْرِ اللَّهِ عز
وجل، وَذَكِّرُوهُ بِأَنْفُسِكُمْ.
مَنْ كَانَ يُحِبُّ أَنْ يَعْلَمَ مَنْزِلَتَهُ عِنْدَ اللَّهِ؛ فَلْيَنْظُرْ كَيْفَ مَنْزِلَةُ اللَّهِ
عِنْدَهُ، فَإِنَّ اللَّهَ يُنْزِلُ الْعَبْدَ مِنْهُ حَيْثُ أَنْزَلَهُ مِنْ نَفْسِهِ) () .
ضعيف.

أخرجه أبو يعلى (3/390/1865 و 4/106/2138) ، ومن طريقه
ابن حبان في (الضعفاء` (2/ 81) ، وكذا البزار (4/5/3064) ، وعبد بن حميد
في `المنتخب من المسند` (54/1105) ، والطبراني في `الأوسط ` (1/139/2674) ،
والحاكم (1/494 - 495) ، والبيهقي في `الشعب` (1/397/528) ، وفي ` الدعوات `
(7/6) من طريق عمر بن عبد الله مولى غُفرة عن أيوب بن خالد بن صفوان
الأنصاري عن جابر بن عبد الله قال: خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: … فذكره،
وزاد بعضهم في أوله: `يا أيها الناس! إن الله … `. وقال الطبراني:
`لا يروى إلا بهذا الإسناد، تفرد به عمر`.
قلت: وهو مختلف فيه، والراجح عند الحفاظ المتأخرين ضعفه؛ تبعاً لابن
معين والنسائي، وغيرهما، ولذلك لما قال الحاكم عقب الحديث:
أصحيح الإسناد`، رده الذهبي بقوله:
`قلت: عمر ضعيف `. وكذا قال الحافظ في `التقريب `.
وقال المنذري في `الترغيب` (2/234) متعقباً على الحاكم:
`في أسانيدهم: عمر مولى غفرة، ويأتي الكلام عليه، وبقية أسانيدهم ثقات
مشهورون محتج بهم، والحديث حسن. والله أعلم`.
كذا قال، وفي آخر الكتاب حكى الأقوال في تضعيفه وتوثيقه، ولم يذكر
قول ابن حبان فيه:
() كتب هنا بهامش الأصل: مضى (5427) . (الناشر) .
`كان ممن يقلب الأخبار، ويروي عن الثقات ما لا يشبه حديث الأثبات؛ لا
يجوز الاحتجاج به، ولا ذكره في الكتب إلا على سبيل الاعتبار`.
ثم إن في قول المنذري في بقية رجال إسنادهم:
`ثقات مشهورون … `.
ففيه نظر؛ لأن أيوب بن خالد - وإن كان من رجال مسلم - ؛ ففيه لين، كما
قال الحافظ في `التقريب `. والله أعلم.
(تنبيه) : قد أورد شارح العقيدة الطحاوية الشطر الثاني من الحديث بلفظ:
`إذا أحب أحدكم أن يعرف كيفية منزلته عند الله … ` الحديث نحوه. فلما
خرجت أحاديث الشرح منذ ثلاثين سنة تخريجاً مختصراً لم أكن قد وقفت على
حديث الترجمة؛ فقلت في `التخريج ` المشار إليه:
`لا أعرفه `.
وهذا كلام سليم جار على منهج علماء الحديث، وليس كذلك قول ذلك
المتشبع بما لم يعط والذي يستفيد من تخريجاتي وتعليقاتي، ثم لا حمداً ولا
شكوراً كما يقال في بعض البلاد! ، بل ما شئت من النقد الجائر، والتتبع للعثرات
التي لا ينجو منها أحد، فانظر إليه كيف قلدني وهو الذي يدعي البحث والتحقيق
في التخريج؟! فقد قال في تعليقه على هذا الحديث في طبعة مؤسسة الرسالة
لشرح العقيدة قال (1/389) :
`ليس بحديث `.
فهذا النفي، لا يصدر إلا من مغرور معجب بعلمه وحفظه للحديث، وهو - كما
يقال - ؛ ليس في العير، ولا في النفير، وفي ظني أنه لا يخفى على مثله أنه لا
يجوز له، ولا لمن هو أعلم منه وأحفظ أن يطلق هذا النفي، وإنما أوقعه فيه تظاهره
بخلاف واقعه، وهو استفادته من كتبي كما يشهد بذلك كل من يعرفه عن
كثب، فبدل أن يقول كما قلت: `لا أعرفه ` أو نحوه مثل: لم أقف عليه؛ كما
يقول العلماء حقاً، الذاكرين لقول الله تعالى: {وما أوتيتم من العلم إلا قليلاً}
[قال كما ذكرت: `ليس بحديث `] () . والله المستعان.
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(নিশ্চয়ই আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লার এমন ফেরেশতাদের দল রয়েছে যারা পৃথিবীতে অবতরণ করে এবং যিকিরের মজলিসসমূহে অবস্থান করে। সুতরাং তোমরা জান্নাতের বাগানসমূহে বিচরণ করো। তারা বলল: জান্নাতের বাগানসমূহ কোথায়? তিনি বললেন: যিকিরের মজলিসসমূহ। অতএব, তোমরা সকাল-সন্ধ্যায় আল্লাহ্ আযযা ওয়া জাল্লার যিকিরে মনোনিবেশ করো এবং তোমাদের নিজেদের মাধ্যমে তাঁকে স্মরণ করো। যে ব্যক্তি আল্লাহ্‌র নিকট তার মর্যাদা জানতে পছন্দ করে, সে যেন দেখে আল্লাহ্‌র মর্যাদা তার নিকট কেমন। কেননা আল্লাহ্ বান্দাকে তার নিকট সেই স্থানেই স্থান দেন, যে স্থানে বান্দা আল্লাহকে তার নিজের নিকট স্থান দেয়।) ()।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা (৩/৩৯০/১৮৬৫ ও ৪/১০৬/২১৩৮), এবং তাঁর সূত্রে ইবনু হিব্বান ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে (২/৮১), অনুরূপভাবে বাযযার (৪/৫/৩০৬৪), এবং আব্দুল ইবনু হুমাইদ ‘আল-মুনতাখাব মিনাল মুসনাদ’ গ্রন্থে (৫৪/১১০৫), এবং ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে (১/১৩৯/২৬৭৪), এবং হাকিম (১/৪৯৪-৪৯৫), এবং বাইহাকী ‘আশ-শু'আব’ গ্রন্থে (১/৩৯৭/৫২৮), এবং ‘আদ-দা'ওয়াত’ গ্রন্থে (৭/৬) উমার ইবনু আব্দুল্লাহ মাওলা গুফরাহ এর সূত্রে আইয়ূব ইবনু খালিদ ইবনু সাফওয়ান আল-আনসারী হতে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের নিকট বের হয়ে আসলেন এবং বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। তাদের কেউ কেউ এর শুরুতে অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: ‘হে লোক সকল! নিশ্চয়ই আল্লাহ্...’। আর ত্বাবারানী বলেছেন: ‘এটি কেবল এই সনদেই বর্ণিত হয়েছে, উমার এতে একক (তাফাররুদ)।’

আমি (আলবানী) বলি: তার (উমার) ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। তবে পরবর্তী হাফিযগণের নিকট প্রাধান্যপ্রাপ্ত মত হলো তার দুর্বলতা; ইবনু মাঈন, নাসাঈ এবং অন্যান্যদের অনুসরণ করে। এই কারণে যখন হাকিম হাদীসটির শেষে বললেন: ‘এর সনদ সহীহ’, তখন যাহাবী তা প্রত্যাখ্যান করে বললেন: ‘আমি বলি: উমার দুর্বল।’ অনুরূপভাবে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থেও বলেছেন।

আর মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (২/২৩৪) হাকিমের মন্তব্যের উপর মন্তব্য করতে গিয়ে বলেছেন: ‘তাদের সনদসমূহে উমার মাওলা গুফরাহ রয়েছেন, তার সম্পর্কে আলোচনা আসবে। আর তাদের সনদের অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (সিকাহ), প্রসিদ্ধ এবং তাদের দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যায়। আর হাদীসটি হাসান। আল্লাহ্ই সর্বাধিক অবগত।’ তিনি এমনই বলেছেন। আর কিতাবের শেষে তিনি তার (উমার) দুর্বলতা ও নির্ভরযোগ্যতা সংক্রান্ত বিভিন্ন উক্তি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তিনি তার সম্পর্কে ইবনু হিব্বানের উক্তি উল্লেখ করেননি:

() মূল কিতাবের পার্শ্বটীকায় এখানে লেখা হয়েছে: গত হয়েছে (৫৪২৭)। (প্রকাশক)।
‘সে এমন ব্যক্তিদের অন্তর্ভুক্ত ছিল যারা সংবাদ উল্টে দিত (পরিবর্তন করত), এবং নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের সূত্রে এমন কিছু বর্ণনা করত যা নির্ভরযোগ্যদের হাদীসের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ নয়। তার দ্বারা প্রমাণ পেশ করা জায়েয নয়, এবং শিক্ষামূলক উদ্দেশ্য ছাড়া কিতাবসমূহে তার উল্লেখ করাও জায়েয নয়।’

অতঃপর, মুনযিরীর তাদের সনদের অবশিষ্ট রাবীদের সম্পর্কে এই উক্তি: ‘নির্ভরযোগ্য (সিকাহ), প্রসিদ্ধ...’ এতেও পর্যালোচনার অবকাশ রয়েছে; কারণ আইয়ূব ইবনু খালিদ—যদিও তিনি মুসলিমের রাবীদের অন্তর্ভুক্ত—তথাপি তার মধ্যে দুর্বলতা (লিন) রয়েছে, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন। আল্লাহ্ই সর্বাধিক অবগত।

(সতর্কতা): ত্বাহাবী আক্বীদার ব্যাখ্যাকার হাদীসটির দ্বিতীয় অংশ এই শব্দে উল্লেখ করেছেন: ‘তোমাদের কেউ যদি আল্লাহ্‌র নিকট তার মর্যাদা কেমন তা জানতে পছন্দ করে...’ হাদীসটি অনুরূপ। যখন আমি ত্রিশ বছর পূর্বে ব্যাখ্যার হাদীসগুলোর সংক্ষিপ্ত তাখরীজ করেছিলাম, তখন আমি এই আলোচ্য হাদীসটির সন্ধান পাইনি; তাই আমি সেই উল্লিখিত ‘তাখরীজ’ গ্রন্থে বলেছিলাম: ‘আমি এটি জানি না।’ এই কথাটি হাদীস বিশারদদের পদ্ধতির সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ এবং সঠিক। কিন্তু সেই ব্যক্তির উক্তিটি এমন নয়, যে যা তাকে দেওয়া হয়নি তা নিয়ে তৃপ্তির ভান করে এবং যে আমার তাখরীজ ও মন্তব্যসমূহ থেকে উপকৃত হয়, অতঃপর কিছু কিছু দেশে যেমন বলা হয়—সে কোনো প্রশংসা বা কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না! বরং সে যা ইচ্ছা তাই করে—অবিচারমূলক সমালোচনা করে এবং এমন ত্রুটি খুঁজে বেড়ায় যা থেকে কেউ রক্ষা পায় না। সুতরাং দেখুন, সে কীভাবে আমার অনুকরণ করেছে, অথচ সে তাখরীজের ক্ষেত্রে গবেষণা ও তাহক্বীক্বের দাবি করে?! সে ‘শরহুল আক্বীদাহ’র মুআসসাসাতুর রিসালাহ সংস্করণে এই হাদীসের উপর তার মন্তব্যে বলেছে (১/৩৮৯): ‘এটি হাদীস নয়।’ এই ধরনের অস্বীকার কেবল সেই অহংকারী ব্যক্তির কাছ থেকেই আসতে পারে যে তার জ্ঞান ও হাদীস মুখস্থ করার ক্ষমতা নিয়ে আত্মমুগ্ধ। আর সে—যেমনটি বলা হয়—‘না কাফেলার মধ্যে আছে, না যুদ্ধের দলে।’ আমার ধারণা, তার মতো ব্যক্তির কাছে এটা অজানা থাকার কথা নয় যে, তার জন্য বা তার চেয়েও অধিক জ্ঞানী ও মুখস্থকারী ব্যক্তির জন্যও এই ধরনের অস্বীকার করা জায়েয নয়। বরং তার বাস্তবতার বিপরীত ভান করাই তাকে এই ভুল অবস্থানে ফেলেছে, আর তা হলো—সে আমার কিতাবাদি থেকে উপকৃত হয়, যেমনটি তাকে কাছ থেকে জানা প্রত্যেকেই সাক্ষ্য দেয়। সুতরাং সে আমার মতো ‘আমি এটি জানি না’ বা অনুরূপ কিছু যেমন: ‘আমি এর সন্ধান পাইনি’ বলার পরিবর্তে—যেমনটি প্রকৃত আলিমগণ বলে থাকেন, যারা আল্লাহ্ তা'আলার এই বাণী স্মরণ করেন: {তোমাদেরকে সামান্য জ্ঞানই দেওয়া হয়েছে} [সে বলেছে, যেমনটি আমি উল্লেখ করেছি: ‘এটি হাদীস নয়’] ()। আল্লাহ্ই সাহায্যকারী।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6206)


(إني كنتُ حكَكْتُ ذَكَري. يعني: فَتَوَضَّأَ صلى الله عليه وسلم!!) .
منكر.

أخرجه أبو عثمان البحيري في `الفوائد` (ق 11/ 1) من طريق يحيى
ابن أبي كثير عن المهاجر بن عكرمة عن الزهري عن عروة بن الزبير عن عائشة:
أن النبي صلى الله عليه وسلم أعاد الوضوء في مجلس؛ فسألوه عن ذلك؛ فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف رجاله ثقات؛ غير المهاجر هذا، فإنه لم يوثقه غير
ابن حبان (5/428) ، ولم يرو عنه من الثقات إلا اثنان يحيى هذا: أحدهما،
والآخر: سويد بن حجير؛ ولهذا قال الخطابي:
`مهاجر هذا: - عند أحمد وغيره من الأئمة - مجهول`. وقال الحافظ:
`مقبول `.
قلت: وقد روي عنه صلى الله عليه وسلم من حديث عصمة بن مالك خلافه؛ إلا أنَّه لا
يصح، وقد تقدم برقم (3883) ، وانظر `المجمع ` (1/244) .
لكن قد ثبت أن النبي صلى الله عليه وسلم أفتى بأنه لا وضوء عليه، فيما رواه قيس بن طلق
عن أبيه رضي الله عنه قال:
() زيادة يقتضيها السياق؛ ليست في أصل الشيخ رحمه الله. (الناشر) .
كنا جلوساً عند النبي صلى الله عليه وسلم، فجاء رجل كأنه بدوي، فقال: يا نبي الله! ما
ترى في مس الرجل ذكره في الصلاة؟ فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:
`وهل هو إلا مضغة - أو قال: بَضعة - منك؟! `.

أخرجه أبو داود، والنسائي، وابن الجارود (17/ 21) ، وابن حبان، والدارقطني
(1/ 149/17) ، والبيهقي، والطيالسي، وابن أبي شيبة (1/ 165) وأحمد،
والطبراني في (الكبير` (8/396) من طرق عن قيس بن طلق عن أبيه … والسياق
لابن الجارود، وعزاه بعضهم لابن خزيمة، وفيه تساهل ظاهر؛ لأنه لم يسق إسناده
ولا لفظه، وإنما أشار إليه إشارة محتجاً به على أن الأمر بالوضوء فِي حَدِيثِ بسرة:
`إذا مس أحدكم ذكره فليتوضأ، للاستحباب، وهو صحيح أيضاً، مخرج مع
حديث طلق في `صحيح أبي داود` (175 و 176 و 177) .
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(নিশ্চয় আমি আমার পুরুষাঙ্গ ঘর্ষণ করেছিলাম। অর্থাৎ: অতঃপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওযু করলেন!!) .
মুনকার (Munkar)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ উসমান আল-বুহাইরী তাঁর ‘আল-ফাওয়াইদ’ গ্রন্থে (ক্বাফ ১১/১) ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর-এর সূত্রে মুহা-জির ইবনু ইকরিমাহ হতে, তিনি যুহরী হতে, তিনি উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর হতে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে: নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক মজলিসে ওযু পুনরায় করলেন; অতঃপর তারা তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল), যদিও এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য; তবে এই মুহা-জির ব্যতীত। কেননা ইবনু হিব্বান (৫/৪২৮) ছাড়া অন্য কেউ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি। আর নির্ভরযোগ্যদের মধ্যে মাত্র দুজন তার থেকে বর্ণনা করেছেন: এই ইয়াহইয়া তাদের একজন, এবং অন্যজন হলেন: সুওয়াইদ ইবনু হুজাইর। এই কারণে খাত্তাবী বলেছেন: ‘এই মুহা-জিরকে – আহমাদ এবং অন্যান্য ইমামদের নিকট – মাজহূল (অজ্ঞাত) মনে করা হয়।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘মাকবূল (গ্রহণযোগ্য)।’

আমি বলি: নিশ্চয়ই তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে ইসমা ইবনু মালিকের হাদীস দ্বারা এর বিপরীত বর্ণিত হয়েছে; তবে তা সহীহ নয়। এটি পূর্বে (৩৮৮৩) নম্বরে গত হয়েছে। আর ‘আল-মাজমা’ (১/২৪৪) দেখুন।

কিন্তু এটি প্রমাণিত যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফতোয়া দিয়েছেন যে, (পুরুষাঙ্গ স্পর্শ করলে) তার উপর ওযু আবশ্যক নয়, যা ক্বাইস ইবনু ত্বাল্ক্ব তাঁর পিতা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন:

() এটি এমন একটি অতিরিক্ত অংশ যা প্রেক্ষাপট দাবি করে; যা শাইখের মূল কিতাবে (রাহিমাহুল্লাহ) নেই। (প্রকাশক)।

আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। অতঃপর একজন লোক আসলেন, যেন তিনি একজন বেদুঈন। তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! নামাযের মধ্যে কোনো ব্যক্তি তার পুরুষাঙ্গ স্পর্শ করলে আপনি কী মনে করেন? তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে বললেন: ‘এটা কি তোমার দেহের একটি টুকরা – অথবা তিনি বললেন: একটি অংশ – ছাড়া আর কিছু?!’

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ, নাসাঈ, ইবনু জারূদ (১৭/২১), ইবনু হিব্বান, দারাকুতনী (১/১৪৯/১৭), বাইহাক্বী, ত্বায়ালিসী, ইবনু আবী শাইবাহ (১/১৬৫), আহমাদ এবং ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে (৮/৩৯৬) ক্বাইস ইবনু ত্বাল্ক্ব তাঁর পিতা হতে... বিভিন্ন সূত্রে। আর এই বর্ণনাটি ইবনু জারূদ-এর। কেউ কেউ এটিকে ইবনু খুযাইমাহ-এর দিকেও সম্পর্কিত করেছেন, কিন্তু এতে স্পষ্ট শিথিলতা রয়েছে; কারণ তিনি এর সনদ বা শব্দ উল্লেখ করেননি, বরং তিনি কেবল এর দিকে ইশারা করেছেন। তিনি এর দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন যে, বুসরাহ-এর হাদীসে ওযুর যে নির্দেশ রয়েছে: ‘তোমাদের কেউ তার পুরুষাঙ্গ স্পর্শ করলে সে যেন ওযু করে,’ তা মুস্তাহাব (পছন্দনীয়) হওয়ার জন্য। আর এটিও সহীহ। এটি ত্বাল্ক্ব-এর হাদীসের সাথে ‘সহীহ আবী দাঊদ’ গ্রন্থে (১৭৫, ১৭৬ ও ১৭৭) সংকলিত হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6207)


(من أراد ان يَقْوى على الصيام؛ فليتسحر، ولْيُقِلَّ، ويشم
طيباً ولا يُفطر على ماء) .
منكر.

أخرجه ابن عدي في `الكامل ` (6/282) ، والبيهقي في `الشعب `
(3/409/3914) من طريق محمد بن يزيد المستملي: ثنا مبشر بن إسماعيل
عن الأوزاعي عن يحيى بن أبي كثير عن أنس مرفوعاً.
أورده ابن عدي في ترجمة المستملي هذا، وقاك فيه:
`يسرق الحديث من الثقات، ويزيد فيها ويضع`. وقال الخطيب وقد ذكر له
حديثاً في فضل أبي حنيفة رحمه الله:
`هذا خبر باطل، ومحمد بن يزيد متروك `.
قلت. وشذ ابن حبان فذكره في كالثقات ` (9/115) وقال:
`ربما أخطأ`.
لكن له طريقان آخران:
الأول: عن محمد بن عيسى الطباع: نا شعيب بن محمد الحريري: نا
الأوزاعي … به. وشعيب هذا لم أعرفه.
ثم هو منقطع كالذي قبله، فإن يحيى بن أبي كثير لم يسمع من أنس بن
مالك؛ وإن كان رآه كما في `التهذيب ` وغيره، ولكنه قد توبع وهو الطريق التالي:
الثاني: يرويه محمد بن الحجاج بن عيسى - يعني: الوراق النيسابوري - :
نا القعنبي: نا سلمة بن وردان عن أنس:
أن النبي صلى الله عليه وسلم رأى رجلاً من أصحابه طليحاً، فقال: `ما لي أراك طليحاً؟ `،
قال: إني أمسيت صائماً، فقال رسول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:
`من تسحر وأكل قبل أن يشرب، ومس شيئاً من الطيب؛ قوي على الصيام `.
أخرجهما البيهقي (3910 و 3911) وقال:
`سلمة بن وردان: غير قوي، وسائر رواته ثقات`.
كذا قال! ومحمد بن الحجاج هذا لم أجد له ترجمة. والله أعلم.
هذا، ولعل الصواب في هذا الحديث الوقف، كما رواه قتادة عن أنس قال:
`ثلاث من أطاقهن أطاق الصيام: من أكل قبل أن يشرب وتسحر … `.

أخرجه البيهقي (3909) وقال:
`هذا موقوف`.
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(যে ব্যক্তি রোযার উপর শক্তি অর্জন করতে চায়, সে যেন সাহরী খায়, কম খায়, সুগন্ধি ব্যবহার করে এবং পানি দ্বারা ইফতার না করে)।
মুনকার (Munkar)।

ইবনু আদী এটিকে ‘আল-কামিল’ (৬/২৮২)-এ এবং বাইহাকী এটিকে ‘আশ-শুআব’ (৩/৪০৯/৩৯১৪)-এ মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ আল-মুস্তামিলী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে মুবাশশির ইবনু ইসমাঈল হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি আওযাঈ থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে সম্বন্ধিত) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

ইবনু আদী এই আল-মুস্তামিলী-এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন এবং তার সম্পর্কে বলেছেন:
‘সে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের থেকে হাদীস চুরি করত, তাতে সংযোজন করত এবং জাল করত।’
আর খতীব (আল-বাগদাদী) বলেছেন, যখন তার জন্য আবূ হানীফা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ফযীলত সম্পর্কিত একটি হাদীস উল্লেখ করা হলো:
‘এই খবরটি বাতিল, আর মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

আমি (আলবানী) বলি: আর ইবনু হিব্বান ব্যতিক্রম করেছেন, তিনি তাকে ‘আছ-ছিকাত’ (৯/১১৫)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘মাঝে মাঝে সে ভুল করত।’

কিন্তু এর আরও দুটি সূত্র রয়েছে:

প্রথমটি: মুহাম্মাদ ইবনু ঈসা আত-তাব্বা‘ থেকে: আমাদেরকে শুআইব ইবনু মুহাম্মাদ আল-হারীরী হাদীস শুনিয়েছেন: আমাদেরকে আওযাঈ হাদীস শুনিয়েছেন... এই সূত্রে। আর এই শুআইবকে আমি চিনি না।

এরপর এটি পূর্বেরটির মতোই মুনকাতি‘ (বিচ্ছিন্ন), কারণ ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাছীর আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে শোনেননি; যদিও তিনি তাকে দেখেছেন, যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ ও অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে। তবে তিনি متابع (অন্য বর্ণনাকারী দ্বারা সমর্থিত) হয়েছেন, আর তা হলো নিম্নোক্ত সূত্রটি:

দ্বিতীয়টি: এটি বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আল-হাজ্জাজ ইবনু ঈসা – অর্থাৎ: আল-ওয়াররাক আন-নায়সাবূরী – : আমাদেরকে আল-কা‘নাবী হাদীস শুনিয়েছেন: আমাদেরকে সালামাহ ইবনু ওয়ারদান হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে:
যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর সাহাবীদের মধ্যে এক ব্যক্তিকে দুর্বল (ক্লান্ত) অবস্থায় দেখলেন। তিনি বললেন: ‘কী ব্যাপার, আমি তোমাকে দুর্বল দেখছি কেন?’ সে বলল: আমি গত রাতে রোযা রেখেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন:
‘যে ব্যক্তি সাহরী খায় এবং পান করার আগে আহার করে, আর কিছু সুগন্ধি স্পর্শ করে; সে রোযার উপর শক্তি অর্জন করে।’

বাইহাকী এই দুটি (৩৯১০ ও ৩৯১১) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘সালামাহ ইবনু ওয়ারদান: শক্তিশালী নন, আর তার অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা নির্ভরযোগ্য।’
তিনি এমনই বলেছেন! আর এই মুহাম্মাদ ইবনু আল-হাজ্জাজ-এর জীবনী আমি খুঁজে পাইনি। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

এই হলো অবস্থা, আর সম্ভবত এই হাদীসটির ক্ষেত্রে সঠিক হলো মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি) হওয়া, যেমনটি কাতাদাহ আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন:
‘তিনটি বিষয়, যে ব্যক্তি তা পালন করে, সে রোযা পালনে সক্ষম হয়: যে পান করার আগে আহার করে এবং সাহরী খায়...।’

বাইহাকী এটিকে (৩৯০৯) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘এটি মাওকূফ।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6208)


(إن لكم في كل جمعة حجة وعمرة، فالحجَّةُ: الهجِيرُ
للجُمُعَةِ، والعُمرة: انتظار العصر بعد الجمعة) .
موضوع.

أخرجه ابن عدي في (الكامل ` (6/38) ، ومن طريقه البيهقي
(3/ 241) ، وفي `شعب الإيمان ` (3/115/3046) ، وأبو عثمان البحيري في
`الفوائد` (ق 25/2) من طريق القاسم بن عبد الله بن مهدي: ثنا أبو مصعب
الزهري: ثنا عبد العزيز بن أبي حازم عن أبيه عن سهل بن سعد الساعدي مرفوعاً.
أورده ابن عدي في ترجمة ابن مهدي هذا - وهو: الإخميمي - وقال:
`لم أر له حديثاً منكراً. فأذكره، وهو عندي لا بأس به `.
كذا قال! وتعقبه ألذهبي بهذا الحديث؛ فقال رداً عليه:
`قلت: قد ذكرت له حديثاً باطلاً؛ فيكفيه `.
وكان الذهبي ساق حديثه هذا، وقال عقبه:
`هذا موضوع باطل، وأبطل منه ما روى عن سخبرة بن عبد الله عن مالك عن
الزهري عن أنس؛ أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا توضأ؛ نضح عانته. ورواه الدارقطني من
طريقه، وقال: أمتهم بوضع الحديث `.
وأقره الحافظ في `اللسان `.
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(নিশ্চয় তোমাদের জন্য প্রত্যেক জুমু'আর দিনে একটি হজ ও একটি উমরাহ রয়েছে। হজ হলো: জুমু'আর জন্য দুপুরে (তাড়াতাড়ি) যাওয়া, আর উমরাহ হলো: জুমু'আর পর আসরের জন্য অপেক্ষা করা।)
মাওদ্বূ (জাল)।

এটি ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৬/৩৮), তাঁর (ইবনু আদী’র) সূত্রে বাইহাকী (৩/২৪১), এবং ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (৩/১১৫/৩০৪৬), এবং আবূ উসমান আল-বুহাইরী ‘আল-ফাওয়াইদ’ গ্রন্থে (ক্বাফ ২৫/২) কাসিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মাহদী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি (কাসিম) বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ মুসআব আয-যুহরী: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল আযীয ইবনু আবী হাযিম তাঁর পিতা হতে, তিনি সাহল ইবনু সা'দ আস-সা'ঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে।

ইবনু আদী এই ইবনু মাহদী (তিনি হলেন আল-ইখমীমী)-এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘আমি তার এমন কোনো মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস দেখিনি যা আমি উল্লেখ করব। আমার মতে সে খারাপ নয় (লা বা'স বিহ)।’

তিনি (ইবনু আদী) এমনটিই বলেছেন! কিন্তু ইমাম যাহাবী এই হাদীসটির মাধ্যমে তাঁর (ইবনু আদী’র) সমালোচনা করেছেন। তিনি (যাহাবী) এর জবাবে বলেছেন: ‘আমি বলি: আমি তার জন্য একটি বাতিল (মিথ্যা) হাদীস উল্লেখ করেছি; এটাই তার জন্য যথেষ্ট।’

আর যাহাবী তার এই হাদীসটি বর্ণনা করার পর বলেছেন: ‘এটি মাওদ্বূ (জাল), বাতিল। আর এর চেয়েও বাতিল হলো যা সাখবারাহ ইবনু আব্দুল্লাহ হতে, তিনি মালিক হতে, তিনি যুহরী হতে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন ওযু করতেন, তখন তিনি তাঁর লজ্জাস্থানে পানি ছিটিয়ে দিতেন। এটি দারাকুতনী তাঁর সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: হাদীস জাল করার ক্ষেত্রে সে (সাখবারাহ) তাদের নেতা।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে এটিকে সমর্থন করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6209)


(لَا يَقْضِى الْقَاضِى إِلَاّ وَهُوَ شَبْعَانُ رَيَّانُ) .
موضوع.

أخرجه الدارقطني في (سننه ` (4/206/14) ، وابن عدي (6/35) ،
والخطيب في `التاريخ` (6/277) ، والبيهقي (10/106) ، وأبو عثمان البحيري
في `الفوائد، (ق 29/1) من طريق القاسم بن عبد الله بن عمر عن عبد الله بن
عبد الرحمن بن أبي طوالة عن أبيه عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً … به.
أورده ابن عدي في ترجمة القاسم هذا وهو: العدوي العمري، وساق له
أحاديث منكرة، وقال في آخر الترجمة:
`وله غير ما ذكرت، وعامة رواياته مما لا يتابع عليه `. وقال البيهقي عقبه:
`تفرد به القاسم العمري، وهو ضعيف `.
كذا قال، وهو تساهل منه؛ فإن الرجل متفق على تركه؛ بل قال الإمام أحمد:
`كذاب؛ كان يضع الحديث، ترك الناس حديثه `.
وكذلك تساهل الحافظ حين قال في `الفتح` (13/127) :
` أخرجه البيهقي بسند ضعيف `!
وكيف لا؟! وهو قال فيه في `التقريب `:
`متروك، رماه أحمد بالكذب `.
ولذلك قال شيخه الهيثمي في `المجمع ` (4/195) :
` رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه القاسم بن عبد الله بن عمر، وهو متروك
كذاب `.
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(বিচারক যেন বিচার না করে, যতক্ষণ না সে তৃপ্ত ও পরিতৃপ্ত হয়।)
মাওদ্বূ (জাল)।

এটি বর্ণনা করেছেন দারাকুতনী তাঁর ‘সুনান’ গ্রন্থে (৪/২০৬/১৪), ইবনু আদী (৬/৩৫), খতীব তাঁর ‘তারীখ’ গ্রন্থে (৬/২৭৭), বাইহাকী (১০/১০৬), এবং আবূ উসমান আল-বুহাইরী ‘আল-ফাওয়াইদ’ গ্রন্থে (ক্বাফ ২৯/১)।
(বর্ণনা করেছেন) কাসিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার-এর সূত্রে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী তাওয়ালাহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে... এই হাদীসটি।

ইবনু আদী এই কাসিম-এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন। তিনি হলেন: আল-আদাবী আল-উমারী। তিনি তার জন্য মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসসমূহ বর্ণনা করেছেন। আর জীবনীটির শেষে তিনি বলেছেন:
‘আমি যা উল্লেখ করেছি, তা ছাড়াও তার আরো বর্ণনা রয়েছে। তার অধিকাংশ বর্ণনা এমন, যার উপর অন্য কেউ অনুসরণ করেনি (অর্থাৎ এককভাবে বর্ণনা করেছে)।’
আর বাইহাকী এর পরপরই বলেছেন:
‘আল-কাসিম আল-উমারী এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন, আর তিনি যঈফ (দুর্বল)।’
তিনি (বাইহাকী) এমনটিই বলেছেন, আর এটি তাঁর পক্ষ থেকে শিথিলতা; কারণ এই ব্যক্তিকে (হাদীস বর্ণনার ক্ষেত্রে) পরিত্যাগ করার ব্যাপারে সবাই একমত। বরং ইমাম আহমাদ বলেছেন:
‘সে মিথ্যাবাদী; সে হাদীস জাল করত, লোকেরা তার হাদীস পরিত্যাগ করেছে।’
অনুরূপভাবে হাফিয (ইবনু হাজার) শিথিলতা করেছেন, যখন তিনি ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (১৩/১২৭) বলেছেন:
‘বাইহাকী এটি যঈফ (দুর্বল) সনদ সহকারে বর্ণনা করেছেন!’
আর তা কীভাবে নয়?! অথচ তিনি নিজেই ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে তার সম্পর্কে বলেছেন:
‘মাতরূক (পরিত্যক্ত), আহমাদ তাকে মিথ্যা বলার অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন।’
আর একারণেই তাঁর শায়খ হাইসামী ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৪/১৯৫) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এতে কাসিম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার রয়েছে, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত) ও মিথ্যাবাদী।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6210)


(اخْتِنوا أولادكم يومَ السابعَ؛ فإنه أطهَرُ، وأسرَعُ نباتاً
للحم، وأَرْوَحُ للقلبِ) .
موضوع.

أخرجه الديلمي في `مسند الفردوس ` (1/46) من طريق عبد الله
ابن أحمد بن عامر: حدثنا أبي: حدثنا علي بن موسى الرضا عن أبيه عن أبيه
عن أبيه عن أبيه عن أبيه عن أبيه عن علي رضي الله عنه مرفوعاً.
قلت: وهذا موضوع، آفته عبد الله بن أحمد هذا، قال الذهبي في `الميزان `:
`روى عن آبائه نسخة موضوعة باطلة، ما تنفك عن وضعه أو وضع أبيه `.
وأقره الحافظ في `اللسان `، وقال عقب الحديث في `الغرائب الملتقطة `:
`ابن عامر متروك `.
قلت: وقد تابعه داود بن سليمان الجرجاني؛ سمعت علي بن موسى الرضا …
به. وزاد الحديث الآتي بعده.

أخرجه أبو عثمان البحيري في `الفوائد` (ق 32/2) .
قلت: وداود هذا حاله كحال ابن عامر هذا أو أسوأ، قال الذهبي:
`كذبه يحيى بن معين، ولم يعرفه أبو حاتم، وبكل حال فهو شيخ كذاب، له
نسخة موضوعة عن علي بن موسى الرضا`.
ثم ساق له أحاديث لوائح الوضع عليها ظاهرة.
والحديث عزاه السيوطي في `الجامع الكبير، لأبي حفص عمر بن عبد الله بن
زاذان في `فوائده ` والديلمي فقط، وسكت عنه كغالب عادته!
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(তোমরা তোমাদের সন্তানদেরকে সপ্তম দিনে খিতান (সুন্নতে খাৎনা) করাও; কেননা তা অধিক পবিত্র, গোশতের জন্য দ্রুত বর্ধনশীল এবং অন্তরের জন্য অধিক প্রশান্তিদায়ক।)
মাওদ্বূ (জাল)।

এটি দায়লামী তাঁর ‘মুসনাদুল ফিরদাউস’ (১/৪৬)-এ আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ ইবনু আমের-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আমার পিতা: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আলী ইবনু মূসা আর-রিদা তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল)। এর ত্রুটি হলো এই আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ। যাহাবী ‘আল-মীযান’-এ বলেছেন: ‘তিনি তাঁর পিতাদের সূত্রে একটি মাওদ্বূ (জাল), বাতিল নুসখা বর্ণনা করেছেন, যা তাঁর জাল করা অথবা তাঁর পিতার জাল করা থেকে মুক্ত নয়।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’-এ তা সমর্থন করেছেন এবং ‘আল-গারায়েব আল-মুলতাকাতাহ’-এ হাদীসটির শেষে বলেছেন: ‘ইবনু আমের মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

আমি বলি: তাকে অনুসরণ করেছে দাঊদ ইবনু সুলাইমান আল-জুরজানী; সে বলেছে: আমি আলী ইবনু মূসা আর-রিদা থেকে শুনেছি... এই সূত্রে। এবং সে এর পরের হাদীসটিও অতিরিক্ত বর্ণনা করেছে।

এটি আবূ উসমান আল-বুহাইরী ‘আল-ফাওয়াইদ’ (ক্বাফ ৩২/২)-এ বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: আর এই দাঊদের অবস্থা এই ইবনু আমেরের অবস্থার মতোই অথবা তার চেয়েও খারাপ। যাহাবী বলেছেন: ‘ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন, আর আবূ হাতিম তাকে চিনতেন না। সর্বাবস্থায় সে একজন চরম মিথ্যাবাদী শায়খ, আলী ইবনু মূসা আর-রিদা থেকে তার একটি মাওদ্বূ (জাল) নুসখা রয়েছে।’ অতঃপর তিনি তার জন্য এমন কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন যার উপর জালের আলামত সুস্পষ্ট।

আর সুয়ূতী ‘আল-জামি‘ আল-কাবীর’-এ হাদীসটিকে শুধু আবূ হাফস উমার ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাযান-এর ‘ফাওয়াইদ’ এবং দায়লামীর দিকে সম্পর্কিত করেছেন, এবং তার সাধারণ অভ্যাস অনুযায়ী এ বিষয়ে নীরব থেকেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6211)


(إنَّ الأرضَ لتَنْجُسُ من بوِل الأَقْلَفِ أربعينَ يوماً) .
موضوع.

أخرجه الديلمي (1/268) وأبو عثمان البحيري من طريق داود بن
سليمان الغازي بإسناده المتقدم عن أهل البيت.
وعرفت أن داود هذا كذاب؛ ولذلك أورده السيوطي في `ذيل الأحاديث
الموضوعة ` (ص 97 - 98) من رواية الديلمي، وأعله بقول الذهبي المتقدم:
`له أحاديث موضوعة … ` ولم يعزه إليه.
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(নিশ্চয়ই অখতনাকৃত ব্যক্তির পেশাবের কারণে চল্লিশ দিন পর্যন্ত মাটি নাপাক হয়ে থাকে।)
মাওদ্বূ।

এটি দায়লামী (১/২৬৮) এবং আবূ উসমান আল-বুহাইরী বর্ণনা করেছেন দাউদ ইবনু সুলাইমান আল-গাযীর সূত্রে, যিনি আহলুল বাইত থেকে তার পূর্বোল্লিখিত সনদসহ বর্ণনা করেছেন।
আর আপনি জানেন যে, এই দাউদ একজন মিথ্যাবাদী (কাযযাব); এই কারণে সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) দায়লামীর বর্ণনা থেকে এটিকে তাঁর ‘যাইলুল আহাদীসিল মাওদ্বূআহ’ (পৃ. ৯৭-৯৮)-এ উল্লেখ করেছেন, এবং তিনি (সুয়ূতী) এটিকে ইমাম যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পূর্বোল্লিখিত উক্তি দ্বারা ত্রুটিযুক্ত (মা'লূল) সাব্যস্ত করেছেন: ‘তার মাওদ্বূ (জাল) হাদীস রয়েছে...’ আর তিনি (সুয়ূতী) এটিকে তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের) দিকে সম্বন্ধযুক্ত করেননি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6212)


(إِنَّ مِنْ سَعَادَةِ الْمَرْءِ اسْتِخَارَتُهُ لِرَبِّهِ، وَرِضَاهُ بِمَا قَضَى، وَإِنَّ
من شَقَاوَةِ الْعَبْدِ تَرَكُهُ الاسْتِخَارَةَ، وَسَخَطُهُ بِمَا قَضَى) .
ضعيف.

أخرجه أبو يعلى في `مسنده` (2/60/701) - والسياق له - ، والبزار
أيضاً (1/359/750) من طريق عمر بن علي بن عطاء بن مقدَّم عن عبد الرحمن
ابن أبي بكر بن عبيد الله عن إسماعيل بن محمد عن أبيه عن جده: أن رسول
اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات رجال الشيخين؛ غير عبد الرحمن
ابن أبي بكر، وهو: المليكي، وهو ممن اتفقوا على تضعيفه، بل ضعفه جداً جمع
من الأئمة، منهم البخاري، فقال في `التاريخ ` (3/1/260) :
`منكر الحديث `. وكذا قال النسائي. وفي رواية عنه:
`ليس بثقة`. وقال ابن حبان في `الضعفاء` (2/52) :
`منكر الحديث جداً؛ ينفرد عن الثقات بما لا يشبه حديث الأثبات، فلا
أدري كثرة الوهم في أخباره منه أو من ابنه؟ على أن أكثر روايته ومدار حديثه يدور
على ابنه، وابنه فاحش الخطأ، فمن هنا اشتبه أمره، ووجب تركه `.
قلت: وثمة علة خفية، وهي تدليس عمر المقدمي هذا، فإنه مع ثقته واحتجاج
الشيخين بحديثه، فمن الصعب جداً الاحتجاج بحديث له خارج `الصحيحين `،
ولو صرَّح بالتحديث؛ لأنه كان مدلساً كما نص عليه جمع من الأئمة، وكان
تدليسه خبيثاً غريباً من نوعه، سماه بعضهم: تدليس السكوت! وقد بينه ابن
سعد فقال في `الطبقات ` (7/291) :
`وكان ثقة، وكان يدلس تدليساً شديداً: يقول: `سمعت ` و`حدثنا`، ثم
يسكت، ثم يقول: `هشام بن عروة`، `الأعمش`! يوهم أنه سمع منهما، وليس
كذلك `. انظر `الباعث الحثيث `.
ولذلك قال ابن أبي حاتم (3/1/ 125) عن أبيه:
`محله الصدق، ولولا تدليسه؛ لحكمنا له - إذا جاء بزيادة - غير أنا نخاف
بأن يكون أخذه عن غير ثقة`.
قلت: وهذا هو الذي أخشاه: أن يكون تلقاه عن راوٍ ضعيف ثم أسقطه، فقد
تقدم في جرح ابن حبان لعبد الرحمن بن أبي بكر شيخ عمر بن علي المقدمي
هذا: أن مدار حديثه على ابنه … .
واسم الابن هذا. محمد بن عبد الرحمن الجدعاني، وهو متروك كما قال
الحافظ في `التقريب `، فلربما كان هذا هو الواسطة بين أبيه وبين المقدمي فدلسه.
والله أعلم.
وبالجملة: فهذه علة ثانية لهذا السند خفيت على بعض إخواننا الناشئين في
هذا العلم، وكان هذا من دواعي تخريج هذا الحديث من هذه الطريق، فقد كنت
خرجته من طريق أخرى ضعيفة أيضاً فيما سبق (4/377/1906) .
ذلك أنني وقفت على بحث للأخ عدنان عرعور بعنوان `صلاة الاستخارة`
في مجلة `المجاهد` (السنة الثالثة/ العدد 27/ رجب سنة 1411) ، ذهب فيه إلى
تحسين الحديث بمجموع الطريقين؛ محتجاً بأن عبد الرحمن بن أبي بكر المليكي هو
في جملة من يكتب حديثه - كما قال ابن عدي - قال:
`فمثل هذا يصلح أن يكون متابعاً لمحمد بن أبي حميد؛ فيكون الحديث
حسناً. والله أعلم `.
قلت: كان يمكن أن يكون الأمر كما قال: لو أن المليكي ليس فيه من الجرح إلا
ما ذكره عن ابن عدي، أما والأمر ليس كذلك؛ فالتحسين مردود بتجريح الإمام
البخاري، ومن ذكرنا معه للمليكي تجريحاً شديداً كما تقدم، فهل يجوز إهدار أقوالهم
والاعتماد على قول ابن عدي فقط مع كونه متأخراً عنهم علماً وطبقة، مع استحضار
أن من كان شديد الضعف لا يتقوى به؟! أم هي الحداثة في هذا العلم الشريف؟
هذا أولاً.
وثانياً: لو سلمنا أن المليكي هذا يصلح للمتابعة، فهل غاب عن بال الأخ أن في
الإسناد إليه علة أخرى، وهي تدليس ابن مقدم الراوي عن المليكي، وأن تدليسه
كان أخبث تدليس عرف في مجال الحديث كما تقدم. فمن الظاهر أن الأخ لم يتنبه
لهذه العلة؛ وإلا لكان كتمانه إياها تدليساً حديثاً نكبره أن يقع فيه، وغالب الظن
أنه غَرَّه في ذلك كونه من رجال `الصحيحين ` كما تقدم، والاحتجاج بمثله ليس مسلماً
على الإطلاق كما هو معلوم من علم المصطلح، وظني أن هذا ليس مجهولاً عند الأخ
الفاضل، وإنما هي الغفلة وعدم الاستحضار لأحوال الرجال ودقائق الأحوال.
ثم قال الأم:
`وفات شيخنا الألباني الطريق الآخر فضعَّف الحديث `!
فأقول: جزاك الله خيراً على هذا التنبيه، ولكن أليس كان من الأولى أن
تلتمس لشيخك - كما تقول - عذراً، كما يقول الأدب السلفي المأثور: `التمس
لأخيك عذراً `؛ فإنك تعلم أن المجلد الذي خرجت الحديث فيه من الطريق الأولى
ألفته قبل طبعه وطبع المسندين اللذين فيهما الطريق الأخرى بسنين عديدة، وأنه
لم يكن من الميسور يومئذٍ الرجوع إليهما دائماً وهما لا يزالان في عالم الخطوطات.
ثم رأيت البزار رواه (751) من طريق آخر عن المليكي فقال: حدثنا محمد
ابن السكن: ثنا عمران بن أبان الواسطي عنه.
وعمران هذا: ضعيف، ومحمد بن السكن: لم أعرفه، ويحتمل أن يكون:
`ابن سكين` وهو: أبو جعفر الكوفي المؤذن، وَهُوَ مَجْهُولٌ كما في `الجرح ` وغيره.
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(নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তির সৌভাগ্যের বিষয় হলো তার রবের নিকট ইস্তিখারা করা এবং তিনি যা ফায়সালা করেন তাতে সন্তুষ্ট থাকা। আর বান্দার দুর্ভাগ্যের বিষয় হলো ইস্তিখারা পরিত্যাগ করা এবং তিনি যা ফায়সালা করেন তাতে অসন্তুষ্ট হওয়া।)

যঈফ (দুর্বল)।

এটি আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/৬০/৭০১) – এবং শব্দগুলো তাঁরই – এবং বাযযারও (১/৩৫৯/৭৫০) বর্ণনা করেছেন উমার ইবনু আলী ইবনু আতা ইবনু মুকাদ্দাম-এর সূত্রে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকর ইবনু উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে: যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ। এর বর্ণনাকারীগণ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবীগণের অন্তর্ভুক্ত এবং তারা নির্ভরযোগ্য; তবে আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকর ব্যতীত। তিনি হলেন: আল-মালীকী, যার দুর্বলতার ব্যাপারে সকলে একমত পোষণ করেছেন। বরং ইমামগণের একটি দল তাকে অত্যন্ত দুর্বল বলেছেন। তাদের মধ্যে ইমাম বুখারীও রয়েছেন, তিনি ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৩/১/২৬০) বলেছেন: ‘মুনকারুল হাদীস’ (হাদীস প্রত্যাখ্যানযোগ্য)। অনুরূপভাবে নাসাঈও বলেছেন। তাঁর থেকে অন্য বর্ণনায় এসেছে: ‘তিনি নির্ভরযোগ্য নন।’ ইবনু হিব্বান ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে (২/৫২) বলেছেন: ‘তিনি অত্যন্ত মুনকারুল হাদীস; তিনি নির্ভরযোগ্য রাবীগণ থেকে এমন সব বিষয় এককভাবে বর্ণনা করেন যা নির্ভরযোগ্যদের হাদীসের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ নয়। আমি জানি না তার বর্ণনায় অধিক ভুল তার পক্ষ থেকে নাকি তার ছেলের পক্ষ থেকে? কারণ তার অধিকাংশ বর্ণনা এবং তার হাদীসের কেন্দ্রবিন্দু তার ছেলের উপর আবর্তিত। আর তার ছেলে মারাত্মক ভুলকারী। এই কারণে তার বিষয়টি সন্দেহজনক এবং তাকে পরিত্যাগ করা আবশ্যক।’

আমি বলি: এখানে একটি গোপন ত্রুটি (ইল্লাতে খাফিয়্যাহ) রয়েছে, আর তা হলো এই উমার আল-মুক্বাদ্দামী-এর তাদলীস (মিশ্রণ)। কারণ, তিনি নির্ভরযোগ্য হওয়া সত্ত্বেও এবং শাইখাইন তাঁর হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করা সত্ত্বেও, ‘সহীহাইন’-এর বাইরে তাঁর কোনো হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করা অত্যন্ত কঠিন, যদিও তিনি ‘হাদ্দাসানা’ (আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন) বলে স্পষ্ট উল্লেখ করেন; কারণ তিনি মুদাল্লিস (মিশ্রণকারী) ছিলেন, যেমনটি ইমামগণের একটি দল স্পষ্ট উল্লেখ করেছেন। আর তাঁর তাদলীস ছিল এক প্রকারের নিকৃষ্ট ও অদ্ভুত তাদলীস, যাকে কেউ কেউ ‘তাদলীসুস সুকূত’ (নীরবতার তাদলীস) নামে অভিহিত করেছেন! ইবনু সা’দ তা স্পষ্ট করেছেন, তিনি ‘আত-তাবাক্বাত’ গ্রন্থে (৭/২৯১) বলেছেন: ‘তিনি নির্ভরযোগ্য ছিলেন, কিন্তু তিনি মারাত্মক তাদলীস করতেন: তিনি বলতেন: ‘আমি শুনেছি’ এবং ‘আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন’, অতঃপর নীরব থাকতেন, তারপর বলতেন: ‘হিশাম ইবনু উরওয়াহ’, ‘আল-আ’মাশ’! তিনি এই ধারণা দিতেন যে তিনি তাদের উভয়ের নিকট থেকে শুনেছেন, কিন্তু বিষয়টি এমন ছিল না। ‘আল-বা’ইসুল হাছীছ’ দেখুন।

এই কারণে ইবনু আবী হাতিম (৩/১/১২৫) তাঁর পিতা থেকে বলেছেন: ‘তাঁর স্থান হলো সত্যবাদিতার, আর যদি তাঁর তাদলীস না থাকত; তবে আমরা তাঁর জন্য ফায়সালা দিতাম – যখন তিনি কোনো অতিরিক্ত বিষয় নিয়ে আসতেন – কিন্তু আমরা ভয় করি যে তিনি হয়তো কোনো অবিশ্বস্ত রাবী থেকে তা গ্রহণ করেছেন।’

আমি বলি: আমি এটাই আশঙ্কা করি: যে তিনি কোনো দুর্বল রাবী থেকে তা গ্রহণ করেছেন অতঃপর তাকে বাদ দিয়েছেন। উমার ইবনু আলী আল-মুক্বাদ্দামী-এর শাইখ আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকর-এর প্রতি ইবনু হিব্বানের জারহ (সমালোচনা)-এ পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে যে, তার হাদীসের কেন্দ্রবিন্দু তার ছেলের উপর আবর্তিত...। আর এই ছেলের নাম হলো: মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান আল-জাদ’আনী, আর তিনি ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত), যেমনটি হাফিয ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন। সম্ভবত ইনিই তার পিতা এবং মুক্বাদ্দামী-এর মাঝে মধ্যস্থতাকারী ছিলেন, অতঃপর তিনি তাদলীস করেছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

মোটের উপর: এটি এই সনদের দ্বিতীয় ত্রুটি, যা এই ইলমে নতুন আমাদের কিছু ভাইয়ের নিকট গোপন ছিল। আর এই কারণেই এই সূত্রে হাদীসটির তাখরীজ (সূত্র উল্লেখ) করার প্রয়োজন হলো। কারণ আমি পূর্বে অন্য একটি দুর্বল সূত্রেও এর তাখরীজ করেছিলাম (৪/৩৭৭/১৯০৬)।

কারণ আমি ভাই আদনান আর’উর-এর একটি প্রবন্ধের উপর অবগত হয়েছি, যার শিরোনাম ছিল ‘সালাতুল ইস্তিখারা’, যা ‘আল-মুজাহিদ’ ম্যাগাজিনে (তৃতীয় বর্ষ/২৭তম সংখ্যা/রজব ১৪১১ হিজরী) প্রকাশিত হয়েছিল। সেখানে তিনি উভয় সূত্রের সমষ্টির ভিত্তিতে হাদীসটিকে ‘হাসান’ বলার দিকে গিয়েছেন; এই বলে যুক্তি পেশ করেছেন যে, আব্দুর রহমান ইবনু আবী বাকর আল-মালীকী তাদের অন্তর্ভুক্ত যাদের হাদীস লেখা হয় – যেমনটি ইবনু আদী বলেছেন – তিনি (আদনান) বলেন: ‘এমন ব্যক্তি মুহাম্মাদ ইবনু আবী হুমাইদ-এর মুতাবা’আত (সমর্থনকারী) হওয়ার উপযুক্ত; ফলে হাদীসটি ‘হাসান’ হবে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।’

আমি বলি: বিষয়টি এমন হতে পারত যেমন তিনি বলেছেন: যদি আল-মালীকী-এর মধ্যে ইবনু আদী যা উল্লেখ করেছেন তা ছাড়া আর কোনো জারহ (সমালোচনা) না থাকত। কিন্তু বিষয়টি এমন নয়; কারণ ইমাম বুখারী এবং আমরা যাদের উল্লেখ করেছি তাদের পক্ষ থেকে আল-মালীকী-এর প্রতি যে কঠোর সমালোচনা (জারহ) করা হয়েছে, তার দ্বারা ‘তাহসীন’ (হাসান বলা) প্রত্যাখ্যাত। তাদের (বুখারী প্রমুখের) বক্তব্যকে কি উপেক্ষা করা এবং শুধুমাত্র ইবনু আদী-এর বক্তব্যের উপর নির্ভর করা বৈধ, অথচ তিনি জ্ঞান ও স্তর উভয় দিক থেকেই তাদের চেয়ে পরবর্তী যুগের, এই বিষয়টি মনে রাখা সত্ত্বেও যে, যে ব্যক্তি মারাত্মক দুর্বল, তার দ্বারা শক্তি সঞ্চয় করা যায় না?! নাকি এটি এই সম্মানিত ইলমে নতুনত্ব? এটি প্রথমত।

দ্বিতীয়ত: যদি আমরা মেনেও নেই যে এই আল-মালীকী মুতাবা’আতের (সমর্থনের) জন্য উপযুক্ত, তবে কি ভাইটির মন থেকে এই বিষয়টি উধাও হয়ে গেছে যে, তাঁর (আল-মালীকী-এর) সনদে আরেকটি ত্রুটি রয়েছে, আর তা হলো আল-মালীকী থেকে বর্ণনাকারী ইবনু মুকাদ্দাম-এর তাদলীস, এবং তাঁর তাদলীস হাদীসের ক্ষেত্রে পরিচিত নিকৃষ্টতম তাদলীস ছিল, যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। স্পষ্টতই ভাইটি এই ত্রুটি সম্পর্কে অবগত হননি; অন্যথায় এটি গোপন করা হতো আধুনিক তাদলীস, যা তিনি করবেন বলে আমরা মনে করি না। প্রবল ধারণা এই যে, পূর্বে যেমন উল্লেখ করা হয়েছে, তিনি ‘সহীহাইন’-এর রাবীগণের অন্তর্ভুক্ত হওয়ায় তিনি এতে বিভ্রান্ত হয়েছেন। আর এমন ব্যক্তির দ্বারা প্রমাণ পেশ করা শর্তহীনভাবে স্বীকৃত নয়, যেমনটি উসূলে হাদীসের ইলমে সুবিদিত। আমার ধারণা, এই সম্মানিত ভাইটির নিকট এটি অজানা নয়, বরং এটি হলো অমনোযোগিতা এবং রাবীগণের অবস্থা ও সূক্ষ্ম বিষয়গুলো স্মরণ না রাখা।

অতঃপর ভাইটি বললেন: ‘আমাদের শাইখ আল-আলবানী অন্য সূত্রটি এড়িয়ে গেছেন, তাই তিনি হাদীসটিকে দুর্বল বলেছেন!’

আমি বলি: এই সতর্ক করার জন্য আল্লাহ আপনাকে উত্তম প্রতিদান দিন, কিন্তু আপনার শাইখের – যেমনটি আপনি বলেন – জন্য কি ওযর (অজুহাত) তালাশ করা অধিক উত্তম ছিল না, যেমনটি সালাফী আদব অনুযায়ী বলা হয়: ‘তোমার ভাইয়ের জন্য ওযর তালাশ করো’; কারণ আপনি জানেন যে, যে খণ্ডে আমি প্রথম সূত্র থেকে হাদীসটির তাখরীজ করেছিলাম, তা আমি রচনা করেছিলাম এর মুদ্রণ এবং যে দুটি মুসনাদে অন্য সূত্রটি রয়েছে সেগুলোর মুদ্রণের বহু বছর আগে। আর সেই সময় সেগুলোর দিকে সর্বদা প্রত্যাবর্তন করা সহজ ছিল না, যখন সেগুলো তখনও পাণ্ডুলিপির জগতে ছিল।

অতঃপর আমি দেখলাম যে বাযযার (৭৫১) আল-মালীকী থেকে অন্য একটি সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: আমাদের নিকট মুহাম্মাদ ইবনুস সাকান বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন: আমাদের নিকট ইমরান ইবনু আবান আল-ওয়াসিতী তাঁর (আল-মালীকী) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এই ইমরান: দুর্বল (যঈফ), এবং মুহাম্মাদ ইবনুস সাকান: আমি তাকে চিনি না। আর সম্ভবত তিনি ‘ইবনু সুকাইন’ হতে পারেন, আর তিনি হলেন: আবূ জা’ফার আল-কূফী আল-মুআযযিন, আর তিনি ‘মাজহূল’ (অজ্ঞাত), যেমনটি ‘আল-জারহ’ এবং অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6213)


(أَدْرَكْتُ (الْقَوَاعِدَ) وَهُنَّ يُصَلِّيَنَ مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم
الفرائضَ) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (25/130/315) ، و`الأوسط `
(4/204/2/8143) عن أبي شهاب عن ابن أبي ليلى عن عبد الكريم عن عبد الله
ابن فلان (وفي الأوسط: ابن الطيب) عن أم سلمة (وفي الكبير: أم سليم) بنت
أبي حكيم قالت: … فذكره. وقال:
`لا يُروى عن أم سلمة بنت [أبي] حكيم إلا بهذا الإسناد`.
قلت: وهو ضعيف، مسلسل بالعلل:
الأولى: أم سلمة هذه؛ فإني لم أعرفها إلا في هذا الحديث؛ والإسناد الواهي
عنها، وإن مما يدلك على ذلك اضطراب رواته في ضبط كنيتها، فقيل: أم سلمة،
وقيل: أم سليم؛ كما رأيت، وقيل: أم سليمان؛ كما يأتي. وذكرها ابن عبد البر
في `الاستيعاب` بهذه الكنى الثلاث ولم يزد! وكذلك الحافظ في `الإصابة`؛
ولكنه ساق لها هذا الحديث فقط برواية الطبراني في `الأوسط` وابن منده بالإسناد
الأول، وقال: `أم سليمان بنت أبي حكيم`. وفي رواية له: وأم سليمان بن أبي
حثمة` من طريق أخرى كما يأتي، في `الكبير` كما في `المجمع` (2/34) فقال:
`وعن سليمان بن أبي حثمة عن أمه قالت:
رأيت النساء القواعد يصلين مع رسول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم في المسجد`.
وقال:
`رواه الطبراني في `الكبير` وفيه عبد الكريم بن أبي الخارق وهو ضعيف `.
قلت: ولم أره في `المعجم الكبير` المطبوع مستعيناً عليه بالفهارس الموضوعة
في آخر كل مجلد من محققه، ثم في فهارسه التي وضعها أخيراً الأخ عدنان
عرعور - وأهدى إلي نسخة منها جزاه الله خيراً - لا في `فهرس الحديث ` ولا في
`فهرس مسانيد الرواة`، فلعله فيما لم يطبع منه بعد. والله أعلم.
هذا، وقد تبع ابن عبد البر ابن الأثير في `أسد الغابة` في إيراد هذه المختلف
في كنيتها بكناها الثلاثة، وزاد فقال:
`لا يوقف على اسمها`.
فكأنه أشار إلى جهالتها وعدم ثبوت صحبتها. والله أعلم.
هذه هي العلة الأولى.
والثانية: عبد الله ابن فلان أو ابن الطيب؛ مجهول لا يعرف في شيء من
كتب الرجال التي عندي.
والثالثة والرابعة: ضعف ابن أبي ليلى وعبد الكريم، وبهما أعله الهيثمي
مفرقاً، والحافظ، فقال في `الإصابة `:
`والسند ضعيف من أجل ابن أبي ليلى؛ وهو: محمد، وشيخه عبد الكريم؛
وهو: ابن أبي الخارق`.
قلت: وأبو شهاب (ووقع في `الإصابة` ابن شهاب) . اسمه: عبدربه بن نافع،
وهو من رجال البخاري، قال في `التقريب`:
`صدوق يهم `.
لكن تابعه أبو محصن حصين بن نمير عند ابن منده، وأبي نعيم كما ذكر في
`الإصابة`، قال الحافظ:
`لا بأس به؛ روى له البخاري `.
ثم رأيته في `المعجم الكبير` (24/317/799 و800) من طريق قيس بن
الربيع وحصين بن نمير كلاهما عن ابن أبي ليلى بسنده المتقدم عن أم سليمان بن
أبي خثمة قالت:
`رأينا النساء … `.
وله شاهد واهٍ بمرة، فقال البزار في `مسنده ` (1/222/446) : حدثنا خالد
ابن يوسف: ثنا أبي عن الأعمش عن أنس بن مالك:
أنه سئل عن العجائز: أكن يشهدن مع رسول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الصلاة؟ قال: نعم؛
والشواب.
ومن هذا الوجه أخرجه الطبراني في `الأوسط ` (1/36/2 - مجمع البحرين)
وقال:
`لم يروه عن الأعمش إلا يوسف `.
قلت: وهو: ابن خالد السمتي البصري، متروك، قال ابن عدي (7/162) :
`قد أجمع على كذبه أهل بلده `. وقال ابن حبان في `الضعفاء` (3/ 131) :
`كان يضع الحديث على الشيوخ، ويقرأ عليهم، ثم يرويها عنهم، لا تحل
الرواية عنه، ولا الاحتجاج به بحال. قال ابن معين: كان يكذب `. وكذبه غيره
أيضاً. وقال الحافظ في `التقريب`:
`تركوه، وكذبه ابن معين، وكان من فقهاء الحنفية`.
وألان القول فيه الهيثمي، فقال بعد أن عزاه للبزار والطبراني:
`وفيه يوسف بن خالد السمتي وهو ضعيف `!
وقلَّده الشيخ الأعظمي في تعليقه على `البزار`! كما هي عادته، ولعل من
العوامل على ذلك العصبية المذهبية، فإنه حنفي مر!
واعلم أنه كان الباعث على تخريج هذا الحديث أموراً:
الأول: تحقيق القول في مرتبته، وبيان حال رجال إسناده، حسبما جرينا في
تخاريجنا كلها في `السلسلتين `.،
الثاني: بيان حال أم سليم بنت أبي حكيم هذه، وأنها لا تثبت لها صحبة،
رغم أنهم ذكروها في الصحابيات!
الثالث: الرد على مؤلفة جاهلة أو كاذبة متعصبة على بنات جنسها، من نمط
تلك الجامعية المسصاة بـ `رغداء بكور الياقتي ` في كتيبها `حجابك أختي المسلمة`
التي ذكرت في مقدمته أن كشف الوجوه من النساء في الشوارع مثل مصافحة
الرجال الأجانب، والاختلاط مع الغرباء!! ضاربة بذلك كل الأدلة الصحيحة من
الكتاب والسنة وأقوال الصحابة والتابعين وأقوال الأئمة المجتهدين المذكورة في
كتابي `حجاب المرأة` عرض الحائط.
أقول: فهذه كتلك المؤلفة التي لم أقف على كتابها، يجمعهما الجهل
بالشرع، والتعصب الأعمى، والهوى الأصم؛ فقد قالت - والعهدة على من أنقل
عنه (1) - : قال:
`وقالت مؤلفة فاضلة (!) :
أورد الهيثمي في `مجمع الزوائد` عدة أحاديث كلها ضعاف، ولكن
مجموعها يقويها، ويجعلها حسنة لغيرها تفيد أن القواعد من النساء فقط كن
يصلين مع رسول الله صلى الله عليه وسلم دون الشابات `.
قلت: وهذا القول من هذه (الفاضلة!) فيه عدة أكاذيب وجهالات:
الأولى: كذبها على الهيثمي؛ فإنه لم يذكر ما ادعته من الإفادة إلا حديثاً
مرفوعاً واحداً هو حديث الترجمة، ولكنها لجهلها توهمت أنه ثلاثة أحاديث؛ لأن
الهيثمي أورده من حديث أم سلمة، وأم سليمان، وأم سُليم، وهي في الحقيقة
حديث واحد اضطرب أحد رواته الضعفاء في إسناده كما تقدم بيانه.
الثانية: قولها: `ولكن مجموعها يقويها … ` يشعر بأنها جاهلة بشرط التقوية،
وهو أن لا يشتد الضعف في مفرداتها، فكيف وليس هنا إلا طريق واحدة وسند
واحد؟!
الثالثة: قولها: `فقط `؛ فهو كذب محض، وجهل مطبق بالأحاديث الأخرى
(1) ذكر الشيخ رحمه الله رقماً لحاشية في الأسفل، ولكنه لم يذكر مصدره. ولعله
يقصد مؤلف كتاب `تحرير المرأة`. (الناشر) .
التي يأتي الإشارة إليها، أما الكذب، فيبينه أن الهيثمي أورد أيضاً حديث أنس
المتقدم وفيه `والشواب `، وإن كنا بينا وهاءه، ولكن المقصود أن ذلك يبطل قولها:
`فقط `.
ومن الغريب حقاً أن حضرة الناقل لهذه الجهالات عنها وصفها بقوله: `مؤلفة
فاضلة`! فمن أين جاء الفضل وهي بهذه المثابة من الجرأة اللا أدبية التي لا تليق
بالرجال الأقوياء، فضلاً عن النساء القوارير! أقول هذا، وإن كان الفاضل المشار
إليه قد رد عليها تقويتها للحديث، ولكن على طريقة الفقهاء المتأخرين فقال:
`الأحاديث الصحيحة في البخاري ومسلم تؤكد حضور الشواب للمسجد. ومن
أولئك: أسماء بنت أبي بكر، وعاتكة بنت زيد (زوج عمر بن الخطاب) وفاطمة بنت
تيس، وأم الفضل، وزبنب امرأة مسعود، والرُّبَيِّع بنت معوِّذ، وغيرهن كثير`.
قلت: وهذا مسلم لا غبار عليه، ولكن كان الأولى به أن يبين ضعف
حديثها على طريقة المحدثين أولاً، على نحو ما فعلنا، ثم أن يصفها بما فيها من
الجهل الذي ينافي الفضل؛ لأن ذلك من علم الجرح والتعديل كما هو معروف
عند العلماء، ولكن يبدو أن الرجل مع فضله وغلبة الصواب على `تحريره ` لا
معرفة له بهذا العلم تصحيحاً وتضعيفاً، وتوثيقاً وتجريحاً، كما بدا لي ذلك من
عدة مواطن من كتابه، كما يدل على ذلك الحديث الآتي بعد حديث، وإن كان
أثنى علي خيراً، وذكر أنه تتلمذ علي زمناً مباركاً في مقدمة كتابه (ص 28) ،
ولكن سرعان ما تغلب عليه غلوه في `تحرير المرأة`؛ فانتقدني (ص 35) تلميحاً لا
تصريحاً؛ لأنني بعد أن أثبت أن وجه المرأة ليس بعورة، قيدت ذلك بأن لا يكون
عليه من الزينة المعروفة اليوم بـ `الميكياج ` من الحمرة والبودرة وغيرها، ونقل
كلامي مبتوراً، سامحه الله.
هذا. ثم ألقي في البال - إنصافاً لتلك المؤلفة الفاضلة (!) - أنها لعلها عنت
بقولها المتقدم: `عدة أحاديث ` حديثاً لابن مسعود أورده الهيثمي أيضاً؛ لأن فيه
لفظ `العجاثز`، فإن كانت عنته؛ فحينئذٍ يكون قولها المذكور سالماً من النقد على
اعتبار أن أقل الجمع اثنان، ولكن يرد عليها أمران آخران:
الأول: أنه لا يفيد ما ادعته من إفادة أن القواعد فقط هن اللاتي كن يصلين
معه صلى الله عليه وسلم، وسترى لفظه تحت الحديث التالي، وهو شاهد ظاهر لما تريد، ولكن لم
يورده الهيثمي؛ لأنه لا أصل له في شيء من كتب السنة مرفوعاً.
والآخر: أنه موقوف ليس له علاقة بـ (العجائز) أو (القواعد) في عهد النبي
صلى الله عليه وسلم، فإذا كان كذلك؛ فهل يجوز إيهام القراء أنه حديث مرفوع إلى النبي صلى الله عليه وسلم؟!
ذلك ما لا أرجو أن يكون مقصوداً من تلك المؤلفة، وإن كان غير مستبعد عن
علمها بهذا الفن؛ فقد وقع في مثله الناقد لها في `تحريره ` إياها! فانظر الحديث
(62151) .
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(আমি (বৃদ্ধা মহিলাদেরকে) এমন অবস্থায় পেয়েছি যে, তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে ফরয সালাত আদায় করতেন।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (২৫/১৩০/৩১৫) এবং ‘আল-আওসাত’ (৪/২০৪/২/৮১৪৩)-এ বর্ণনা করেছেন আবূ শিহাব হতে, তিনি ইবনু আবী লায়লা হতে, তিনি আব্দুল কারীম হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ফুলান (এবং ‘আল-আওসাত’-এ: ইবনুত্ব ত্বাইয়িব) হতে, তিনি উম্মু সালামাহ (এবং ‘আল-কাবীর’-এ: উম্মু সুলাইম) বিনত আবী হাকীম হতে। তিনি বলেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

তিনি (ত্বাবারানী) বলেন:
‘উম্মু সালামাহ বিনত [আবী] হাকীম হতে এই সনদ ছাড়া অন্য কোনো সনদে এটি বর্ণিত হয়নি।’

আমি (আলবানী) বলি: এটি দুর্বল, যা ধারাবাহিক ত্রুটিসমূহে পূর্ণ:

প্রথম ত্রুটি: এই উম্মু সালামাহ; আমি তাকে এই হাদীস ছাড়া অন্য কোথাও চিনি না; আর তার থেকে বর্ণিত সনদটি দুর্বল। এর প্রমাণ হলো, বর্ণনাকারীরা তার কুনিয়াত (উপনাম) নির্ধারণে মতভেদ করেছেন। যেমন আপনি দেখলেন, কেউ বলেছেন: উম্মু সালামাহ, কেউ বলেছেন: উম্মু সুলাইম, আর কেউ বলেছেন: উম্মু সুলাইমান, যেমনটি পরে আসছে। ইবনু আব্দুল বার্র ‘আল-ইসতিয়াব’-এ এই তিনটি কুনিয়াতসহ তাকে উল্লেখ করেছেন এবং এর বেশি কিছু বলেননি! অনুরূপভাবে হাফিয ইবনু হাজারও ‘আল-ইসাবাহ’-তে উল্লেখ করেছেন; তবে তিনি কেবল এই হাদীসটিই তার জন্য ত্বাবারানীর ‘আল-আওসাত’ এবং ইবনু মান্দাহ-এর প্রথম সনদ অনুযায়ী বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘উম্মু সুলাইমান বিনত আবী হাকীম’। তার অন্য এক বর্ণনায় রয়েছে: ‘উম্মু সুলাইমান ইবনু আবী হাসমাহ’ অন্য একটি সূত্রে, যেমনটি আসছে, ‘আল-কাবীর’-এ, যেমনটি ‘আল-মাজমা’ (২/৩৪)-এ রয়েছে। তিনি (হাইসামী) বলেছেন:

‘আর সুলাইমান ইবনু আবী হাসমাহ তার মা হতে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন:
আমি বৃদ্ধা মহিলাদেরকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে মসজিদে সালাত আদায় করতে দেখেছি।’

তিনি (হাইসামী) বলেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’-এ বর্ণনা করেছেন এবং এতে আব্দুল কারীম ইবনু আবিল খারিক রয়েছে, আর সে দুর্বল।’

আমি বলি: আমি মুদ্রিত ‘আল-মু'জামুল কাবীর’-এ এটি পাইনি, যদিও আমি এর মুহাক্কিক কর্তৃক প্রতিটি খণ্ডের শেষে স্থাপিত সূচিপত্র ব্যবহার করেছি, এরপর সম্প্রতি ভাই আদনান আর'উর কর্তৃক প্রণীত সূচিপত্র (যার একটি কপি তিনি আমাকে উপহার দিয়েছেন, আল্লাহ তাকে উত্তম প্রতিদান দিন) ব্যবহার করেছি—তা হাদীসের সূচিপত্রেও নয়, আবার বর্ণনাকারীদের মুসনাদের সূচিপত্রেও নয়। সম্ভবত এটি এখনও অপ্রকাশিত অংশের মধ্যে রয়েছে। আল্লাহই ভালো জানেন।

এই হলো অবস্থা। ইবনু আব্দুল বার্র-কে অনুসরণ করে ইবনুল আসীরও ‘আসাদুল গাবাহ’-তে এই মহিলাকে তার তিনটি ভিন্ন কুনিয়াতসহ উল্লেখ করেছেন, যার কুনিয়াত নিয়ে মতভেদ রয়েছে। তিনি আরও যোগ করে বলেছেন:
‘তার নাম জানা যায় না।’
এর মাধ্যমে যেন তিনি তার জাহালাত (অজ্ঞাত পরিচয়) এবং সাহাবী হওয়া প্রমাণিত না হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন। আল্লাহই ভালো জানেন। এটিই হলো প্রথম ত্রুটি।

দ্বিতীয় ত্রুটি: আব্দুল্লাহ ইবনু ফুলান অথবা ইবনুত্ব ত্বাইয়িব; সে মাজহূল (অজ্ঞাত), আমার কাছে থাকা রিজাল শাস্ত্রের কোনো কিতাবেই তাকে চেনা যায় না।

তৃতীয় ও চতুর্থ ত্রুটি: ইবনু আবী লায়লা এবং আব্দুল কারীমের দুর্বলতা। হাইসামী এবং হাফিয ইবনু হাজার পৃথকভাবে এই দুজনের মাধ্যমেই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। হাফিয ‘আল-ইসাবাহ’-তে বলেছেন:
‘সনদটি ইবনু আবী লায়লার কারণে দুর্বল; আর তিনি হলেন: মুহাম্মাদ, এবং তার শায়খ আব্দুল কারীম; আর তিনি হলেন: ইবনু আবিল খারিক।’

আমি বলি: আর আবূ শিহাব (এবং ‘আল-ইসাবাহ’-তে ইবনু শিহাব এসেছে)। তার নাম: আব্দুরব্বাহ ইবনু নাফি', আর তিনি বুখারীর রিজালদের অন্তর্ভুক্ত। ‘আত-তাকরীব’-এ বলা হয়েছে: ‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন।’ কিন্তু ইবনু মান্দাহ এবং আবূ নু'আইমের নিকট তাকে আবূ মুহসিন হুসাইন ইবনু নুমাইর অনুসরণ করেছেন, যেমনটি ‘আল-ইসাবাহ’-তে উল্লেখ করা হয়েছে। হাফিয বলেন: ‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই; বুখারী তার থেকে বর্ণনা করেছেন।’

এরপর আমি এটি ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (২৪/৩১৭/৭৯৯ ও ৮০০)-এ কায়স ইবনুর রাবী' এবং হুসাইন ইবনু নুমাইর উভয়ের সূত্রে ইবনু আবী লায়লা হতে, তার পূর্বোক্ত সনদসহ উম্মু সুলাইমান বিনত আবী খাসমাহ হতে পেয়েছি। তিনি বলেন:
‘আমরা মহিলাদেরকে দেখেছি...।’

এর একটি অত্যন্ত দুর্বল শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে। বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ (১/২২২/৪৪৬)-এ বলেছেন: আমাদেরকে খালিদ ইবনু ইউসুফ হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে আমার পিতা আল-আ'মাশ হতে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন:
তাকে বৃদ্ধা মহিলাদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল: তারা কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে সালাতে উপস্থিত হতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ; এবং যুবতীরাও।

এই সূত্রেই ত্বাবারানী এটি ‘আল-আওসাত’ (১/৩৬/২ - মাজমাউল বাহরাইন)-এ বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘ইউসুফ ছাড়া অন্য কেউ আল-আ'মাশ হতে এটি বর্ণনা করেননি।’

আমি বলি: আর তিনি হলেন: ইউসুফ ইবনু খালিদ আস-সামতী আল-বাসরী, মাতরূক (পরিত্যক্ত)। ইবনু আদী (৭/১৬২) বলেন: ‘তার শহরের লোকেরা তার মিথ্যা বলার বিষয়ে ঐকমত্য পোষণ করেছেন।’ ইবনু হিব্বান ‘আয-যু'আফা’ (৩/১৩১)-এ বলেন: ‘সে শায়খদের নামে হাদীস জাল করত, তাদের সামনে পড়ত, এরপর তাদের থেকে তা বর্ণনা করত। তার থেকে বর্ণনা করা বা কোনো অবস্থাতেই তাকে দলীল হিসেবে গ্রহণ করা জায়েয নয়। ইবনু মা'ঈন বলেছেন: সে মিথ্যা বলত।’ অন্যরাও তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। হাফিয ‘আত-তাকরীব’-এ বলেন: ‘তারা তাকে পরিত্যাগ করেছেন, ইবনু মা'ঈন তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন, আর সে হানাফী ফকীহদের অন্তর্ভুক্ত ছিল।’ হাইসামী তার সম্পর্কে মন্তব্যকে নরম করেছেন। তিনি বাযযার ও ত্বাবারানীর দিকে হাদীসটি সম্বন্ধিত করার পর বলেছেন: ‘এতে ইউসুফ ইবনু খালিদ আস-সামতী রয়েছে, আর সে দুর্বল!’ শায়খ আল-আ'যামী ‘আল-বাযযার’-এর টীকায় তাকেই অন্ধভাবে অনুসরণ করেছেন! যেমনটি তার অভ্যাস, আর সম্ভবত এর কারণগুলোর মধ্যে মাযহাবগত গোঁড়ামিও রয়েছে, কারণ তিনি কট্টর হানাফী!

জেন রাখুন, এই হাদীসটি তাখরীজ করার পেছনে কয়েকটি কারণ ছিল:

প্রথমত: এর স্তর সম্পর্কে নিশ্চিত বক্তব্য প্রদান এবং এর সনদের রাবীদের অবস্থা বর্ণনা করা, যেমনটি আমরা আমাদের উভয় ‘সিলসিলাহ’-এর সমস্ত তাখরীজে করে থাকি।

দ্বিতীয়ত: এই উম্মু সুলাইম বিনত আবী হাকীমের অবস্থা বর্ণনা করা এবং এই বিষয়টি স্পষ্ট করা যে, তাকে সাহাবী হিসেবে প্রমাণ করা যায় না, যদিও তারা তাকে সাহাবিয়্যাদের মধ্যে উল্লেখ করেছেন!

তৃতীয়ত: একজন অজ্ঞ বা মিথ্যাবাদী লেখিকার জবাব দেওয়া, যে তার স্বজাতির নারীদের প্রতি গোঁড়া, যেমন সেই বিশ্ববিদ্যালয় পড়ুয়া মহিলা যার নাম ‘রাগদা বাকূর আল-ইয়াকেতী’, তার ছোট বই ‘হিফাজুকি উখতি আল-মুসলিমাহ’ (হে আমার মুসলিম বোন, তোমার হিজাব)-এ, যার ভূমিকায় সে উল্লেখ করেছে যে, রাস্তায় মহিলাদের মুখমণ্ডল খোলা রাখা ঠিক যেন গায়র-মাহরাম পুরুষদের সাথে মুসাফাহা করা এবং অপরিচিতদের সাথে অবাধ মেলামেশা করা!! এর মাধ্যমে সে আমার কিতাব ‘হিজাবুল মারআহ’-তে উল্লেখিত কিতাব ও সুন্নাহর সমস্ত সহীহ দলীল, সাহাবী ও তাবেঈদের বক্তব্য এবং মুজতাহিদ ইমামদের বক্তব্যকে প্রত্যাখ্যান করেছে।

আমি বলি: আমি যার কিতাব দেখিনি, সেই লেখিকাও এই (রাগদা বাকূর আল-ইয়াকেতী)-এর মতোই। শরীয়ত সম্পর্কে অজ্ঞতা, অন্ধ গোঁড়ামি এবং বধির প্রবৃত্তি—এই দুটিই তাদের মধ্যে বিদ্যমান। সে (লেখিকা) বলেছে—আর যার থেকে আমি উদ্ধৃত করছি, তার উপরই এর দায়ভার (১)—সে বলেছে:

‘একজন গুণী (!) লেখিকা বলেছেন:
হাইসামী ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’-এ বেশ কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন, যার সবগুলোই দুর্বল, কিন্তু সেগুলোর সমষ্টি তাকে শক্তিশালী করে এবং ‘হাসান লি-গাইরিহি’ (অন্যের কারণে হাসান) স্তরে উন্নীত করে, যা প্রমাণ করে যে, কেবল বৃদ্ধা মহিলারাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে সালাত আদায় করতেন, যুবতীরা নয়।’

আমি বলি: এই (গুণী!) মহিলার এই বক্তব্যে বেশ কিছু মিথ্যা ও অজ্ঞতা রয়েছে:

প্রথমত: হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উপর তার মিথ্যাচার; কারণ তিনি তার দাবিকৃত প্রমাণ হিসেবে এই অনুচ্ছেদের হাদীসটি ছাড়া আর কোনো মারফূ' হাদীস উল্লেখ করেননি। কিন্তু সে তার অজ্ঞতার কারণে ধারণা করেছে যে, এটি তিনটি হাদীস; কারণ হাইসামী এটি উম্মু সালামাহ, উম্মু সুলাইমান এবং উম্মু সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে উল্লেখ করেছেন, অথচ বাস্তবে এটি একটিই হাদীস, যার সনদে দুর্বল রাবীদের একজন মতভেদ করেছেন, যেমনটি পূর্বে ব্যাখ্যা করা হয়েছে।

দ্বিতীয়ত: তার এই উক্তি: ‘কিন্তু সেগুলোর সমষ্টি তাকে শক্তিশালী করে...’—এটি ইঙ্গিত করে যে, সে তাক্ববিয়াহ (শক্তিশালী করার) শর্ত সম্পর্কে অজ্ঞ। শর্ত হলো, এর একক বর্ণনাসমূহে যেন দুর্বলতা তীব্র না হয়। তাহলে এখানে তো কেবল একটিই সূত্র ও একটিই সনদ বিদ্যমান, এমতাবস্থায় কীভাবে তা শক্তিশালী হবে?!

তৃতীয়ত: তার উক্তি: ‘কেবলমাত্র (ফাক্বাত)’; এটি সম্পূর্ণ মিথ্যা এবং অন্যান্য হাদীস (১) সম্পর্কে চরম অজ্ঞতা, যার দিকে পরে ইঙ্গিত করা হবে। মিথ্যার বিষয়টি স্পষ্ট হয় যে, হাইসামী আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্বোক্ত হাদীসটিও উল্লেখ করেছেন, যাতে ‘এবং যুবতীরাও’ কথাটি রয়েছে। যদিও আমরা এর দুর্বলতা ব্যাখ্যা করেছি, তবে উদ্দেশ্য হলো, এটি তার ‘কেবলমাত্র’ উক্তিটিকে বাতিল করে দেয়।

(১) শায়খ (রাহিমাহুল্লাহ) নিচে একটি টীকার নম্বর উল্লেখ করেছেন, কিন্তু এর উৎস উল্লেখ করেননি। সম্ভবত তিনি ‘তাহরীরুল মারআহ’ কিতাবের লেখককে উদ্দেশ্য করেছেন। (প্রকাশক)।

সত্যিই আশ্চর্যের বিষয় হলো, যিনি তার থেকে এই অজ্ঞতাগুলো উদ্ধৃত করেছেন, তিনি তাকে ‘গুণী লেখিকা’ বলে আখ্যায়িত করেছেন! যে মহিলা শক্তিশালী পুরুষদের জন্যও অনুপযোগী এমন অশালীন সাহসিকতা দেখায়, কাঁচের মতো নারীদের ক্ষেত্রে তো প্রশ্নই আসে না, তার মধ্যে গুণ বা ফযল কোথা থেকে এলো! আমি এই কথা বলছি, যদিও সেই উল্লেখিত গুণী ব্যক্তিটি হাদীসটিকে তার শক্তিশালী করার দাবির জবাব দিয়েছেন, তবে তা মুতাআখখিরীন (পরবর্তী যুগের) ফকীহদের পদ্ধতিতে। তিনি বলেছেন:
‘বুখারী ও মুসলিমের সহীহ হাদীসগুলো যুবতী মহিলাদের মসজিদে উপস্থিতিকে নিশ্চিত করে। তাদের মধ্যে রয়েছেন: আসমা বিনত আবী বাকর, আতিকাহ বিনত যায়দ (উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী), ফাতিমাহ বিনত কায়স, উম্মুল ফাদল, যায়নাব মাসঊদের স্ত্রী, আর-রুবাইয়্যি' বিনত মু'আওবিয এবং আরও অনেকে।’

আমি বলি: এটি স্বীকৃত, এতে কোনো সন্দেহ নেই। কিন্তু তার জন্য উচিত ছিল প্রথমে মুহাদ্দিসদের পদ্ধতিতে তার (লেখিকার) হাদীসের দুর্বলতা স্পষ্ট করা, যেমনটি আমরা করেছি। এরপর তার মধ্যে বিদ্যমান অজ্ঞতার কারণে তাকে সেইভাবে বর্ণনা করা, যা গুণের পরিপন্থী; কারণ এটি জারহ ওয়া তা'দীল (দোষারোপ ও নির্ভরযোগ্যতা যাচাই)-এর ইলম, যা আলেমদের নিকট সুপরিচিত। কিন্তু মনে হচ্ছে, লোকটি তার গুণ থাকা সত্ত্বেও এবং তার ‘তাহরীর’ (মুক্তির) বিষয়ে সঠিক মতের প্রাধান্য থাকা সত্ত্বেও, সহীহ-যঈফ নির্ণয়, নির্ভরযোগ্যতা ও দোষারোপের এই ইলম সম্পর্কে তার কোনো জ্ঞান নেই। তার কিতাবের বেশ কয়েকটি স্থানে আমার কাছে এটি স্পষ্ট হয়েছে, যেমনটি এর পরের হাদীসটিও প্রমাণ করে। যদিও তিনি তার কিতাবের ভূমিকায় (পৃ. ২৮) আমার প্রশংসা করেছেন এবং উল্লেখ করেছেন যে, তিনি একটি বরকতময় সময় আমার ছাত্র ছিলেন, কিন্তু ‘নারীর মুক্তি’র বিষয়ে তার বাড়াবাড়ি দ্রুতই তার উপর প্রভাব বিস্তার করেছে; ফলে তিনি আমাকে (পৃ. ৩৫) ইঙ্গিতে সমালোচনা করেছেন, স্পষ্টভাবে নয়; কারণ আমি যখন প্রমাণ করেছি যে, নারীর মুখমণ্ডল আওরাত (গোপনীয় অঙ্গ) নয়, তখন আমি এই শর্ত জুড়ে দিয়েছিলাম যে, তাতে যেন আজকের দিনে পরিচিত ‘মেকআপ’ যেমন—রং, পাউডার ইত্যাদি কোনো সাজসজ্জা না থাকে। আর তিনি আমার কথাটি খণ্ডিতভাবে উদ্ধৃত করেছেন। আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন।

এই হলো অবস্থা। এরপর আমার মনে এলো—সেই গুণী (!) লেখিকার প্রতি ইনসাফ করার জন্য—যে সম্ভবত তার পূর্বোক্ত উক্তি ‘বেশ কিছু হাদীস’ দ্বারা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর একটি হাদীসকে বুঝিয়েছেন, যা হাইসামীও উল্লেখ করেছেন; কারণ তাতে ‘আল-আজায়িয’ (বৃদ্ধা) শব্দটি রয়েছে। যদি তিনি এটিই উদ্দেশ্য করে থাকেন, তাহলে তার উল্লিখিত উক্তিটি সমালোচনামুক্ত হবে এই বিবেচনায় যে, জামা' (বহুবচন) এর সর্বনিম্ন সংখ্যা হলো দুই। কিন্তু তার উপর আরও দুটি বিষয় আরোপিত হয়: প্রথমত: এটি তার দাবিকৃত এই প্রমাণ দেয় না যে, কেবল বৃদ্ধা মহিলারাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে সালাত আদায় করতেন। আপনি এর শব্দগুলো পরবর্তী হাদীসের নিচে দেখতে পাবেন, যা তার কাঙ্ক্ষিত বিষয়ের স্পষ্ট সাক্ষী, কিন্তু হাইসামী এটি উল্লেখ করেননি; কারণ সুন্নাহর কিতাবসমূহে মারফূ' হিসেবে এর কোনো ভিত্তি নেই। আর দ্বিতীয়ত: এটি মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি), নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর যুগে (আল-আজায়িয) বা (আল-কাওয়াইদ) এর সাথে এর কোনো সম্পর্ক নেই। যদি তাই হয়, তবে কি পাঠকদেরকে এই ভ্রম দেওয়া জায়েয যে, এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম পর্যন্ত মারফূ' হাদীস?! আমি আশা করি না যে, সেই লেখিকার উদ্দেশ্য এমনটি ছিল, যদিও এই ফন (শাস্ত্র) সম্পর্কে তার জ্ঞান বিবেচনায় এটি অসম্ভব নয়; কারণ তার সমালোচকও তার ‘তাহরীর’ কিতাবে একই ধরনের ভুল করেছেন! হাদীস (৬২১৪১) দেখুন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6214)


(نهى النساءَ عن الخروح إلى المساجد في جماعة
الرجالِ؛ إلا عجوزاً في مَنْقَلِها. والمنقل: الخُفُّ) .
لا أصل له مرفوعاً. أورده الرافعي في `شرح الوجيز` فقال:
`روي أنه صلى الله عليه وسلم نهى … ` إلخ. فقال الحافظ في `التلخيص ` (2/27) :
`لا أصل له، وبيَّض له المنذري والنووي في الكلام على `المهذب `؛ لكن
أخرج البيهقي بسندٍ فيه المسعودي عن ابن مسعود قال:
`والله الذي لا إله إلا هو، ما صلت امرأة صلاة خيراً لها من صلاة تصليها في
بيتها إلا المسجدين إلا عجوزاً في منقلها`.
وكذا ذكره أبو عبيد في `غريبه ` والجوهري في `الصحاح` عن ابن مسعود.
قلت: قوله: `فيه المسعودي` هذا الإطلاق يوهم خلاف الواقع، ذلك لأن
البيهقي أخرجه (3/ 131) من طريق أبي المنذر إسماعيل بن عمر المسعودي عن
سلمة بن كهيل عن أبي عمرو الشيباني عن عبد الله بن مسعود قال …
فإسماعيل بن عمر المسعودي هذا صدوق كما في `التقريب `؛ فالسند حسن،
وهو غير (المسعودي) عند الإطلاق لأنه عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة بن
عبد الله بن مسعود، وهو صدوق أيضاً؛ ولكنه كان اختلط قبل موته، قال الحافظ:
`وضابطه: أن من سمع منه ببغداد فبعد الاختلاط `.
ثم تنبهت - بفضل الله - لأمر هام، وهو أن في إسناد البيهقي سقطاً بين
إسماعيل بن عمر، والمسعودي، والصواب: `عن المسعودي ` أو نحوه، فإن
إسماعيل بن عمر واسطي ليس مسعودياً، وإنما روى عنه كما في `التهذيب `،
فصح إعلال الحافظ إياه بالمسعودي، وذلك لاختلاطه كما تقدم. ومن طريقه

أخرجه الطبراني أيضاً في `المعجم الكبير` (9/339/6471) .
لكن تابعه حماد عن سلمة بن كهيل … به نحوه؛ إلا أنه قال: `امرأة` مكان
`عجوز`.

أخرجه الطبراني أيضاً (9472) .
وهذا إسناد صحيح على شرط مسلم، وحماد هو: ابن سلمة.
وتابعه مسعر عن سلمة بن كهيل … به باللفظ الأول: `عجوز`. رواه ابن
أبي شيبة في `المصنف ` (2/383 - 384) وسنده صحيح على شرط الشيخين.
وقد توبع سلمة بن كهيل: فقال ابن أبي شيبة في `مصنفه ` أيضاً (2/384) :
حدثنا أبو الأحوص عن سعيد بن مسروق عن أبي عمرو إلشيباني … به بلفظ:
` … إلا امرأة قد أَيِسَت من البعولة`.
وسعيد هذا هو: الثوري والد سفيان، وقد أخرجه عنه عبد الرزاق في `المصنف `
(3/150/5117) ، وعنه الطبراني (9473) ، قال عبد الرزاق: عن الثوري عن
أبيه … به.
واسناده صحيح أيضاً على شرطهما.
ثم أخرجه الطبراني (9474) من طريق زائدة: ثنا سعيد بن منصور … به.
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(তিনি মহিলাদেরকে পুরুষদের জামাআতে মসজিদে যেতে নিষেধ করেছেন; তবে বৃদ্ধা মহিলা তার ‘মানকাল’ (চামড়ার মোজা/জুতা) পরিধান করে যেতে পারবে। আর ‘আল-মানকাল’ হলো: ‘খুফ্ফ’ (চামড়ার মোজা/জুতা))।

মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে এর কোনো ভিত্তি নেই। আর-রাফিঈ এটি তাঁর ‘শারহুল ওয়াজিজ’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘বর্ণিত আছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিষেধ করেছেন...’ ইত্যাদি। অতঃপর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তালখীস’ (২/২৭) গ্রন্থে বলেছেন: ‘এর কোনো ভিত্তি নেই।’ আর মুনযিরী ও নববী ‘আল-মুহাযযাব’-এর আলোচনায় এর জন্য সাদা স্থান (খালি জায়গা) রেখেছিলেন (অর্থাৎ এর সনদ সম্পর্কে মন্তব্য করেননি); কিন্তু বাইহাকী এমন একটি সনদসহ এটি বর্ণনা করেছেন, যাতে মাসঊদী রয়েছেন, যা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন:

‘আল্লাহর কসম, যিনি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, কোনো মহিলার জন্য তার ঘরে আদায় করা সালাতের চেয়ে উত্তম কোনো সালাত নেই, তবে দুই মসজিদ (মক্কা ও মদীনার মসজিদ) ব্যতীত, এবং বৃদ্ধা মহিলা তার ‘মানকাল’ (চামড়ার মোজা/জুতা) পরিধান করে যেতে পারবে।’

অনুরূপভাবে আবূ উবাইদ তাঁর ‘গারীব’ গ্রন্থে এবং জাওহারী তাঁর ‘আস-সিহাহ’ গ্রন্থে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: হাফিযের এই উক্তি: ‘তাতে মাসঊদী রয়েছে’—এই সাধারণীকরণ বাস্তবতার বিপরীত ধারণা দেয়। কারণ বাইহাকী এটি (৩/১৩১) আবূল মুনযির ইসমাঈল ইবনু উমার আল-মাসঊদী-এর সূত্রে সালামাহ ইবনু কুহাইল হতে, তিনি আবূ আমর আশ-শাইবানী হতে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন...

সুতরাং এই ইসমাঈল ইবনু উমার আল-মাসঊদী ‘তাকরীব’ গ্রন্থে যেমন বলা হয়েছে, তিনি ‘সাদূক’ (সত্যবাদী)। অতএব, সনদটি ‘হাসান’ (উত্তম)।

আর তিনি (ইসমাঈল) সেই (মাসঊদী) নন, যাকে সাধারণভাবে (দোষারোপের জন্য) উল্লেখ করা হয়। কারণ তিনি হলেন আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উতবাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ। তিনিও ‘সাদূক’ (সত্যবাদী); কিন্তু মৃত্যুর পূর্বে তিনি স্মৃতিভ্রমের শিকার হয়েছিলেন। হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘এর নিয়ম হলো: যে ব্যক্তি বাগদাদে তাঁর থেকে শুনেছে, সে স্মৃতিভ্রমের পরে শুনেছে।’

অতঃপর আমি—আল্লাহর অনুগ্রহে—একটি গুরুত্বপূর্ণ বিষয়ে অবগত হলাম। আর তা হলো: বাইহাকীর ইসনাদে ইসমাঈল ইবনু উমার এবং মাসঊদীর মাঝে একজন বর্ণনাকারী বাদ পড়েছেন। সঠিক হলো: ‘মাসঊদী হতে’ অথবা অনুরূপ কিছু। কারণ ইসমাঈল ইবনু উমার ওয়াসিতী, তিনি মাসঊদী নন। বরং তিনি তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন, যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে রয়েছে। সুতরাং হাফিয (ইবনু হাজার)-এর মাসঊদী দ্বারা এটিকে দুর্বল সাব্যস্ত করা সঠিক, কারণ পূর্বে যেমন বলা হয়েছে, তিনি স্মৃতিভ্রমের শিকার হয়েছিলেন। আর তাঁর (মাসঊদীর) সূত্রেই তাবারানীও এটি ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ (৯/৩৩৯/৬৪৭২) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।

কিন্তু হাম্মাদ তাঁর অনুসরণ করেছেন, তিনি সালামাহ ইবনু কুহাইল হতে... অনুরূপ বর্ণনা করেছেন; তবে তিনি ‘আজুয’ (বৃদ্ধা) শব্দের স্থলে ‘ইমরাআহ’ (মহিলা) শব্দটি বলেছেন। তাবারানীও এটি (৯৪৭২) বর্ণনা করেছেন।

আর এই সনদটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ। আর হাম্মাদ হলেন: ইবনু সালামাহ।

আর মিস’আর তাঁর অনুসরণ করেছেন, তিনি সালামাহ ইবনু কুহাইল হতে... প্রথম শব্দে (‘আজুয’/বৃদ্ধা) সহ বর্ণনা করেছেন। ইবনু আবী শাইবাহ এটি ‘আল-মুসান্নাফ’ (২/৩৮৩-৩৮৪) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং এর সনদ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ।

আর সালামাহ ইবনু কুহাইল-এরও অনুসরণ করা হয়েছে। ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘মুসান্নাফ’ (২/৩৮৪) গ্রন্থেও বলেছেন: আমাদেরকে আবূল আহওয়াস হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি সাঈদ ইবনু মাসরূক হতে, তিনি আবূ আমর আশ-শাইবানী হতে... এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: ‘...তবে সেই মহিলা ব্যতীত, যে স্বামীর প্রয়োজন থেকে নিরাশ হয়ে গেছে।’

আর এই সাঈদ হলেন: আস-সাওরী, যিনি সুফইয়ানের পিতা। আব্দুর রাযযাক তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ (৩/১৫০/৫১১৭) গ্রন্থে তাঁর থেকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর থেকে তাবারানীও (৯৪৭৩) বর্ণনা করেছেন। আব্দুর রাযযাক বলেছেন: আস-সাওরী তাঁর পিতা হতে... এটি বর্ণনা করেছেন।

আর এর সনদও তাঁদের (শাইখাইন/বুখারী ও মুসলিম) শর্তানুযায়ী সহীহ।

অতঃপর তাবারানী (৯৪৭৪) এটি যায়িদাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: সাঈদ ইবনু মানসূর আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন... এটি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6215)


(إنَّ مُحَرِّمَ الحلالِ كمحَلِّلِ الحرام) .
منكر.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (2/204/2/8128) ، والقضاعي
في `مسند الشهاب ` (2/106/981) ، وابن أبي حاتم في `العلل ` (2/308/2439)
معلقاً من طريق عاصم بن عبد العزيز الأشجعي عن الحارث بن عبد الرحمن بن
أبي ذباب عن عبيد الله بن عبد الله بن عمر عن أبيه: أنه سمع رسول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم
يقول: … فذكره. وقال ابن أبي حاتم:
`سألت أبي عن هذا الحديث؛ فقال: حديث منكر`.
قلت: وعلته عاصم هذا؛ فقد ضعفوه، ولم يوثقه أحد من أئمة الجرح
والتعديل المعروفين، وإنما وثقه معن بن عيسى، وأما البخاري فضعفه جداً بقوله
في ` التاريخ ` (3/2/ 493) :
`فيه نظر`. وأقره العقيلي في `الضعفاء` (3/338) .
وأما الحافظ ألذهبي فاعتمد في `الكاشف، قول النسائي:
`ليس بالقوي `. وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق يهم `.
وأما الهيثمي فقد وهم في قوله في `المجمع ` (1/176) :
`رواه الطبراني في `الأوسط `، ورجاله رجال (الصحيح) `.
فإن عاصماً هذا - مع ضعفه - لم يذكر أحد من مترجميه أنه من رجال
`الصحيح`.
وقلده في ذلك مؤلف `تحرير المرأة` (1/ 50 و 64) ؛ فأخطأ مرتين:
الأولى: هذا الذي ذكرته من ضعف هذا الراوي، وأنه ليس من رجال `الصحيح `.
والأخرى: ظنه أن عبارة الهيثمي هذه - ولو تعّرَّت عن الخطأ - تعني: أن الحديث
صحيح! ولذلك جزم المومى إليه بنسبة الحديث إليه صلى الله عليه وسلم بقوله في الموضع الأول،
وهو ينصح - بحق - الذين يحرمون سفور الوجه … :
`أدْعوهم إلى تبين أحكام الشرع، والحذر مما حذر منه الحديث الشريف: `إن
محرم … `؛ أي: كلاهما معتدٍ على شرع الله `.
قلت: وهو كما قال - جزاه الله خيراً - ، ولكن هل استجاب هو لدعوته ولم
يقع فيما حذر منه غيره؟ والجواب ما تقدم أولاً، ثم في ظنه المذكور ثانياً؛ فإن ذلك
لا يعني التصحيح - كما نبهت عليه مراراً في بعض كتبي - . ولذلك فإني أنصحه
أن لا يعود إلى ما كان عزم عليه من تحقيق أسانيد السيرة النبوية وتمييز الصحيح
فيها من الضعيف - كما ذكر (1/28) - ؛ فإن لهذا العلم رجالاً صاروا كما قيل:
لقد كانوا إذا عُدُّوا قليلاً وقد صاروا أقلَّ من القليلِ
ولذلك فإنك في الوقت الذي تجد في كل علم العشرات بل المئات من
المؤلفين، لا تجد من المؤلفين في تخريج الأحاديث وتمييز صحيحها من ضعيفها إلا
أقل من القليل، وأما في السيرة فهو مما لم يطرق بابه أحد فيما علمت. ولقد كان
قدر لي أنني شرعت في هذا المشروع العظيم وأنا بعيد عن بلدي وكتبي ومَراجعي،
وقطعت فيه شوطأ جيداً؛ نحو الثلث () ، ثم لما تيسر لي العودة إلى بلدي؛ صرفني
عنه مشاريعي العلمية الأخرى، ولسان حالي يقول: {وعسى أن تكرهوا شيئاً وهو
خير لكم} .
ثم إن للحديث طريقاً أخرى أوهى من الأولى: يرويه إبراهيم بن إسماعيل
ابن مجمع عن يحيى بن عباد بن جارية الليثي: أن أباه أخبره، قال: قال لي ابن
عمر رضي الله عنهما: سمعت رسول اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يقول:
`محرم الحلال كمستحل الحرام `.

أخرجه البخاري في `التاريخ ` (3/2/ 1599) ، وابن حبان في `الضعفاء`
(1/103) ، والقضاعي أيضاً (980) .
قلت: وهذا إسناد مظلم، أورده البخاري في ترجمة عباد هذا، ولم يذكر فيه
جرحاً ولا تعديلاً، وكذلك فعل ابن أبي حاتم، وكذلك فعلا بابنه يحيى؛ فهما
في عداد المجهولين، وإن أورد ابن حبان أباه عباداً في `ثقاته ` (5/142) ` فذلك
من تساهله المعروف!
وإبراهيم بن إسماعيل بن مُجَمِّع - وهو: الأنصاري - : مُجْمَع على ضعفه،
() وقد يسر الله لنا طبع الجزء الذي أنجزه المؤلف؛ ولكن بعد وفاته رحمه الله. (الناشر) .
بل ضعفه بعضهم جداً؛ فقال أبو داود:
`ضعيف متروك الحديث، سمعت يحيى يقوله `. وقال أبو زرعة:
`سمعت أبا نعيم يقول: لا يسوى حديثه فلسين`. وقال ابن حبان عقب
الحديث:
`وهذا من قول ابن عمر محفوظ، فأما من حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم فلا `.
والحديث أورده ابن طاهر المقدسي في `تذكرة الموضوعات` (ص 77) ، وأعله
بإبراهيم بن إسماعيل، وقال:
`قال يحيى: ليس بشيء، وقد صح من قول ابن مسعود`.
قلت: أخرجه عبد الرزاق في `المصنف ` (11/292/20573) ، ومن طريقه
الطبراني في `الكبير` (9/191/8852) عن معمر عن أبي إسحاق عن عبد الرحمن
ابن يزيد عن ابن مسعود قال: … فذكره موقوفاً.
ثم أخرجه الطبراني (8853) من طريق إسرائيل عن (أبي إسحاق) قال:
كنت جالساً عند عبد الرحمن بن عبد الله، فأتاه رجل يسأله عن ابنه القاسم؟
فقال: غدا إلى الكناسة يطلب الضباب. فقال: أتأكله؟! فقال عبد الرحمن: ومن
حرمه؟! سمعت عبد الله بن مسعود يقول: … فذكره موقوفاً أيضاً.
قلت: ورجال الإسنادين ثقات، وعبد الرحمن بن يزيد - في الإسناد الأول -
هو: النخعي الكوفي.
وعبد الرحمن بن عبد الله - فيئ الإسناد الآخر - هو: ابن مسعود، قال الحافظ:
`وقد سمع من أبيه؛ لكن شيئاً يسيراً `.
قلت: وأبو إسحاق - هو: عمرو بن عبد الله السبيعي، وقد - سمع من العبدين
المذكوربن؛ فلا أدري أهذا من حفظه أم من اختلاطه؟ فإن كلاً من إسرائيل - وهو:
ابن يونس بن أبي إسحاق السبيعي - ومعمر قد سمعا منه بعد الاختلاط. ثم هو
إلى اختلاطه كان يدلس، ولم يصرح بالتحديث في أي من الإسنادين، فالجزم
بصحته عن ابن مسعود - كما تقدم عن ابن طاهر - فيه وقفة عندي.
ومثله جزم ابن حبان بأنه محفوظ من قول ابن عمر - كما سبق - فيه نظر
أيضاً؛ فإني لم أره عنه إلا مرفوعاً من الطريقين المتقدمين.
وأعجب من ذلك كله جزم ابن عبد البر في `جامع بيان العلم ` (2/66)
بنسبته إلى النبي صلى الله عليه وسلم بقوله:
`وقال صلى الله عليه وسلم: محرم الحلال كمستحل الحرام `.
فلا أدري إذا كان وهماً منه، أو أنه وقف على طريق أخرى له صحيحة …
وهذا ما أستبعده. والله أعلم.
(تنبيه) : لقد أورد الحديث الهيثمي (1/177) من رواية الطبراني عن ابن
مسعود موقوفاً وقال:
`ورجاله رجال الصحيح، وله طريق يأتي في (كتاب الصيد) `.
وهناك (4/38 - 39) أورده من طريق أبي إسحاق قال: كنت جالساً … `.
وقال:
`رواه الطبراني في `الكبير`، ورجاله رجال الصحيح `.
ومن تخريجي المتقدم يتبين لك أن قوله: `وله طريق يأتي … ` … إنما يعني:
طريقاً أخرى عن أبي إسحاق، والمتبادر: عن ابن مسعود. وهذا غير مراد؛ فاقتضى
التنبيه!
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(নিশ্চয় হালালকে হারামকারী, হারামকে হালালকারীর মতো।)
মুনকার।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ (২/২০৪/২/৮১২৮), ক্বাযাঈ তাঁর ‘মুসনাদুশ শিহাব’ (২/১০৬/৯৮১) এবং ইবনু আবী হাতিম তাঁর ‘আল-ইলাল’ (২/৩০৮/২৪৩৯)-এ মু'আল্লাক্বভাবে বর্ণনা করেছেন, আসিম ইবনু আব্দুল আযীয আল-আশজাঈ-এর সূত্রে, তিনি আল-হারিস ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী যুবাব হতে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উমার হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে: যে তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

ইবনু আবী হাতিম বলেন:
‘আমি আমার পিতাকে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন: এটি মুনকার হাদীস।’

আমি (আলবানী) বলি: এর ত্রুটি হলো এই আসিম। তাকে দুর্বল বলা হয়েছে। পরিচিত জারহ ওয়া তা'দীল-এর ইমামদের মধ্যে কেউই তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি। শুধুমাত্র মা'ন ইবনু ঈসা তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। আর ইমাম বুখারী তাঁর ‘আত-তারীখ’ (৩/২/৪৯৩)-এ তাকে অত্যন্ত দুর্বল আখ্যা দিয়ে বলেছেন:
‘তার ব্যাপারে বিবেচনা রয়েছে (فيه نظر)’। উকাইলী ‘আয-যু'আফা’ (৩/৩৩৮)-এ তা সমর্থন করেছেন।

আর হাফিয আয-যাহাবী ‘আল-কাশেফ’-এ নাসায়ী-এর উক্তির উপর নির্ভর করেছেন:
‘সে শক্তিশালী নয় (ليس بالقوي)’। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’-এ বলেছেন:
‘সে সত্যবাদী, তবে ভুল করে (صدوق يهم)’।

আর হাইসামী তাঁর ‘আল-মাজমা’ (১/১৭৬)-এ ভুল করেছেন যখন তিনি বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন এবং এর বর্ণনাকারীগণ (সহীহ)-এর বর্ণনাকারী।’
কারণ এই আসিম—তার দুর্বলতা সত্ত্বেও—তার জীবনীকারদের মধ্যে কেউই উল্লেখ করেননি যে সে ‘সহীহ’-এর বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত।

আর ‘তাহরীরুল মারআহ’ (১/৫০ ও ৬৪)-এর লেখক এই ব্যাপারে তাঁর (হাইসামী) অন্ধ অনুকরণ করেছেন; ফলে তিনি দু'বার ভুল করেছেন:
প্রথমত: এই বর্ণনাকারীর দুর্বলতা এবং সে যে ‘সহীহ’-এর বর্ণনাকারী নয়, যা আমি উল্লেখ করেছি।
দ্বিতীয়ত: তাঁর ধারণা যে হাইসামী-এর এই উক্তি—যদিও তা ভুলমুক্ত হতো—এর অর্থ হলো হাদীসটি সহীহ!
এই কারণে উল্লিখিত ব্যক্তি প্রথম স্থানে হাদীসটিকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে নিশ্চিতভাবে সম্পর্কিত করেছেন এই বলে, যখন তিনি—সঠিকভাবেই—তাদেরকে উপদেশ দিচ্ছিলেন যারা মুখমণ্ডল উন্মুক্ত করা হারাম মনে করে...:
‘আমি তাদেরকে শরীয়তের বিধানাবলী স্পষ্ট করতে এবং সেই সম্মানিত হাদীস যা থেকে সতর্ক করেছে তা থেকে সাবধান থাকতে আহ্বান জানাই: ‘নিশ্চয় হারামকারী...’; অর্থাৎ: উভয়েই আল্লাহর শরীয়তের উপর সীমালঙ্ঘনকারী।’

আমি বলি: তিনি যা বলেছেন তা ঠিক—আল্লাহ তাকে উত্তম প্রতিদান দিন—কিন্তু তিনি কি তার আহ্বানে সাড়া দিয়েছেন এবং যা থেকে অন্যকে সতর্ক করেছেন, তাতে নিজে পতিত হননি? উত্তর হলো, প্রথমে যা বলা হয়েছে, আর দ্বিতীয়ত তার উল্লিখিত ধারণার মধ্যে; কারণ তা সহীহ হওয়া বোঝায় না—যেমনটি আমি আমার কিছু কিতাবে বারবার সতর্ক করেছি। এই কারণে আমি তাকে উপদেশ দিচ্ছি যে, তিনি সীরাতে নববীর সনদসমূহ তাহক্বীক্ব করা এবং তার মধ্যে সহীহকে যঈফ থেকে পার্থক্য করার যে সংকল্প করেছিলেন—যেমনটি তিনি (১/২৮)-এ উল্লেখ করেছেন—তাতে যেন আর ফিরে না যান; কারণ এই ইলমের জন্য এমন লোক রয়েছে যারা এমন হয়ে গেছে যেমন বলা হয়েছে:
‘তারা যখন গণনা করা হতো, তখন ছিল অল্প, আর এখন তারা অল্পের চেয়েও কম হয়ে গেছে।’
এই কারণে আপনি যখন প্রতিটি জ্ঞানে ডজন ডজন বরং শত শত লেখক খুঁজে পান, তখন হাদীসের তাখরীজ এবং তার সহীহকে যঈফ থেকে পার্থক্য করার লেখকদের মধ্যে অল্পের চেয়েও কম সংখ্যক পাবেন। আর সীরাতের ক্ষেত্রে, আমার জানা মতে, কেউ এর দরজায় কড়া নাড়েনি। আমার ভাগ্যে এমন ছিল যে আমি এই মহান প্রকল্পে হাত দিয়েছিলাম যখন আমি আমার দেশ, কিতাবাদি ও রেফারেন্স থেকে দূরে ছিলাম, এবং আমি এতে একটি ভালো পর্যায় অতিক্রম করেছিলাম; প্রায় এক-তৃতীয়াংশ ()। এরপর যখন আমার দেশে ফেরা সহজ হলো; তখন আমার অন্যান্য ইলমী প্রকল্প আমাকে তা থেকে ফিরিয়ে দিল, আর আমার মনের ভাষা বলছিল: {হতে পারে তোমরা কোনো কিছুকে অপছন্দ করছ, অথচ তা তোমাদের জন্য কল্যাণকর}।

এরপর এই হাদীসের আরেকটি সূত্র রয়েছে যা প্রথমটির চেয়েও দুর্বল: এটি বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ইসমাঈল ইবনু মুজাম্মি', ইয়াহইয়া ইবনু আব্বাদ ইবনু জারিয়াহ আল-লাইসী হতে: যে তার পিতা তাকে খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বলেছেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
‘হালালকে হারামকারী, হারামকে হালালকারীর মতো।’

এটি বুখারী তাঁর ‘আত-তারীখ’ (৩/২/১৫৯৯), ইবনু হিব্বান তাঁর ‘আয-যু'আফা’ (১/১০৩) এবং ক্বাযাঈও (৯৮০) বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: এই সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন (মুলিম)। বুখারী এই আব্বাদ-এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন, কিন্তু এতে জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (নির্ভরযোগ্যতা) কিছুই উল্লেখ করেননি। অনুরূপভাবে ইবনু আবী হাতিমও করেছেন। আর তার পুত্র ইয়াহইয়ার ক্ষেত্রেও তারা একই কাজ করেছেন; সুতরাং তারা উভয়েই মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবীদের অন্তর্ভুক্ত। যদিও ইবনু হিব্বান তার পিতা আব্বাদকে তাঁর ‘সিক্বাত’ (৫/১৪২)-এ উল্লেখ করেছেন, তবে তা তাঁর পরিচিত শিথিলতার (তাসাহুল) কারণে!

আর ইবরাহীম ইবনু ইসমাঈল ইবনু মুজাম্মি'—তিনি হলেন আনসারী—তার দুর্বলতার উপর ইজমা' (ঐকমত্য) রয়েছে।
() আল্লাহ তা'আলা লেখকের সম্পন্ন করা অংশটি আমাদের জন্য ছাপানো সহজ করে দিয়েছেন; তবে তাঁর মৃত্যুর পরে (রাহিমাহুল্লাহ)। (প্রকাশক)।
বরং কেউ কেউ তাকে অত্যন্ত দুর্বল বলেছেন; আবূ দাঊদ বলেছেন:
‘যঈফ, মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত হাদীস বর্ণনাকারী), আমি ইয়াহইয়াকে (ইবনু মাঈন) এটি বলতে শুনেছি।’ আবূ যুর'আহ বলেছেন:
‘আমি আবূ নু'আইমকে বলতে শুনেছি: তার হাদীস দু'টি পয়সারও মূল্য রাখে না।’ ইবনু হিব্বান হাদীসটির শেষে বলেছেন:
‘এটি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে সংরক্ষিত (মাহফূয), কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের হাদীস হিসেবে নয়।’

ইবনু ত্বাহির আল-মাক্বদিসী হাদীসটি ‘তাযকিরাতুল মাওদ্বূ'আত’ (পৃ. ৭৭)-এ উল্লেখ করেছেন এবং ইবরাহীম ইবনু ইসমাঈল-এর কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি বলেছেন:
‘ইয়াহইয়া (ইবনু মাঈন) বলেছেন: সে কিছুই নয়। আর এটি ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে।’

আমি বলি: এটি আব্দুর রাযযাক তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ (১১/২৯২/২০৫৭৩)-এ এবং তাঁর সূত্রে ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ (৯/১৯১/৮৮৫২)-এ মা'মার হতে, তিনি আবূ ইসহাক্ব হতে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ হতে, তিনি ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ... অতঃপর তিনি তা মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি) হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

এরপর ত্বাবারানী (৮৮৫৩) ইসরাঈল-এর সূত্রে (আবূ ইসহাক্ব) হতে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহর কাছে বসেছিলাম, তখন এক ব্যক্তি এসে তাকে তার পুত্র ক্বাসিম সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল? তিনি বললেন: সে কান্নাসাহ (আবর্জনার স্তূপ)-এর দিকে গিয়েছে ‘যাব্ব’ (গুইসাপ জাতীয় প্রাণী) খুঁজতে। লোকটি বলল: আপনি কি তা খান?! আব্দুর রহমান বললেন: কে তা হারাম করেছে?! আমি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: ... অতঃপর তিনি তা-ও মাওকূফ হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আমি বলি: উভয় সনদের বর্ণনাকারীগণ সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য), আর আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ—প্রথম সনদে—তিনি হলেন: আন-নাখঈ আল-কূফী। আর আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ—অন্য সনদে—তিনি হলেন: ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্র, হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি তাঁর পিতা থেকে শুনেছেন; তবে সামান্য কিছু।’

আমি বলি: আর আবূ ইসহাক্ব—তিনি হলেন: আমর ইবনু আব্দুল্লাহ আস-সাবীয়ী, আর তিনি উল্লিখিত দুই আব্দুল্লাহ (আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ ও আব্দুর রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ) হতে শুনেছেন; তাই আমি জানি না এটি কি তার স্মৃতিশক্তির কারণে, নাকি তার ইখতিলাত (স্মৃতিভ্রম)-এর কারণে? কারণ ইসরাঈল—তিনি হলেন: ইবনু ইউনুস ইবনু আবী ইসহাক্ব আস-সাবীয়ী—এবং মা'মার উভয়েই তার ইখতিলাতের পরে তার থেকে শুনেছেন। এরপর তিনি ইখতিলাত ছাড়াও তাদলীস করতেন, এবং তিনি উভয় সনদের কোনোটিতেই ‘তাহদীস’ (শ্রবণের স্পষ্ট ঘোষণা) দ্বারা বর্ণনা করেননি। সুতরাং ইবনু ত্বাহির যেমনটি বলেছেন, ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এর সহীহ হওয়ার ব্যাপারে নিশ্চিত হওয়া—আমার মতে—বিবেচনার দাবি রাখে।

অনুরূপভাবে ইবনু হিব্বান নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে এটি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে সংরক্ষিত—যেমনটি পূর্বে বলা হয়েছে—তাতেও বিবেচনা রয়েছে; কারণ আমি তাকে পূর্বোক্ত দুটি সূত্র ছাড়া মারফূ' (নবী সাঃ-এর দিকে সম্পর্কিত) হিসেবে দেখিনি।

এর সবকিছুর চেয়েও আশ্চর্যের বিষয় হলো ইবনু আব্দুল বার্র ‘জামি'উ বায়ানিল ইলম’ (২/৬৬)-এ নিশ্চিতভাবে হাদীসটিকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের দিকে সম্পর্কিত করেছেন এই বলে:
‘আর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হালালকে হারামকারী, হারামকে হালালকারীর মতো।’
আমি জানি না এটি তার পক্ষ থেকে ভুল ছিল, নাকি তিনি এর অন্য কোনো সহীহ সূত্রের সন্ধান পেয়েছিলেন... আর এটি আমি অসম্ভব মনে করি। আল্লাহই ভালো জানেন।

(সতর্কতা): হাইসামী হাদীসটি (১/১৭৭)-এ ত্বাবারানীর সূত্রে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মাওকূফ হিসেবে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী, এবং এর একটি সূত্র ‘কিতাবুস সায়িদ’ (শিকার অধ্যায়)-এ আসবে।’
আর সেখানে (৪/৩৮-৩৯)-এ তিনি আবূ ইসহাক্ব-এর সূত্রে তা উল্লেখ করেছেন, তিনি বলেন: আমি বসেছিলাম...। এবং বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী।’
আমার পূর্বোক্ত তাখরীজ থেকে আপনার কাছে স্পষ্ট হবে যে তাঁর উক্তি: ‘এবং এর একটি সূত্র আসবে...’... এর অর্থ হলো: আবূ ইসহাক্ব হতে আরেকটি সূত্র, এবং যা মনে আসে তা হলো: ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। আর এটি উদ্দেশ্য নয়; তাই সতর্ক করা আবশ্যক হলো!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6216)


(مَا مِنِ امْرَأَةٍ تَنْزِعُ خِمارَها فِي غَيْرِ بَيْتِ زوجِها إِلا كَشفت
السِتْرَ فيمَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ ربِّها) .
منكر.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط ` (1/187/3429) : حدثنا
بكر بن سهل قال: نا عبد الله بن يوسف قال: نا ابن لهيعة عن أبي الأسود عن
عروة عن عائشة:
أنها سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحمام؛ فقال:
` إنه سيكون بعدي حمَّامات، ولا خير في الحمامات للنساء`.
فقالت: يا رسول الله! فإنها تدخله بإزار؟ فقال:
`لا؛ وإن دخلته بإزار ودرع وخمار، وما من امرأة … ` الحديث. وقال:
`لم يروه عن عروة إلا أبو الأسود، تفرد به ابن لهيعة`.
قلت: وهو ضعيف؛ كما قال الهيثمي (1/278) . وبه أعله المنذري في
`الترغيب` (1/90) .
وبكر بن سهل: ضعفه النسائي.
وقد خولف في إسناده عن ابن لهيعة: فقال ابن وهب: أخبرني ابن لهيعة
عن عبيد الله بن أبي جعفر: أن عمر بن الخطاب قال:
لا يحل للمؤمن أن يدخل الحمام إلا بمنديل، ولا مؤمنة إلا من سقم؛ فإني
سمعت عائشة تقول: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول:
` أيما امرأة وضعت خمارها … ` الحديث نحوه.

أخرجه البيهقي في `شعب الإيمان ` (6/159/7776) ، وقال:
`منقطع `.
قلت: يعني: بين عمر وعبيد الله بن أبي جعفر؛ فإن هذا ولد بعد وفاة عمر
بسنين - مات عمر سنة (23) ، ومات عبيد الله سنة (132) وقيل بعد ذلك - .
وروي موصولاً من طريق مُطَّرِح بن يزيد عن عبيد الله بن زحر عن علي بن
يزيد عن القاسم عن أبي أمامة قال: قال عمر بن الخطاب رحمه الله:
لا يحل لامرأة أن تدخل الحمام إلا من سقم؛ فإن عائشة أم المؤمنين حدثتني
قالت: حدثني خليلي عليه السلام على مفرشي هذا قال:
` إذا وضعت المرأة خمارها … ` الحديث.

أخرجه ابن عدي في ترجمة مطرح هذا من `الكامل ` (6/449) وقال:
`عامة رواياته عن عبيد الله بن زحر، والضعف على حديثه بيِّن `. وقال
الذهبي في `الميزان `:
`مجمع على ضعفه `.
واللذان فوقه مشهوران بالضعف.
والحديث علقه ابن الجوزي في `العلل ` (1/344/565) على مطرح هذا،
وقال عقبه:
`لا يصح، مطرح وعلي والقاسم ليس بشيء`.
كذا قال، والقاسم - وهو: أبو عبد الرحمن صاحب أبي أمامة، والمتقرر فيه أنه -
وسط حسن الحديث، فلو أنه ذكر مكانه عبيد الله بن زحر؛ لأصاب.
وقد صح الحديث من طريق أبي المليح عن عائشة رضي الله عنها مرفوعاً نحوه
بلفظ:
` ثيابها ` … مكان: ` خمارها `.
وله شاهد من حديث أم الدرداء مرفوعاً … به.
وإسناد كل منهما صحيح، وهما مخرجان في كتابي `آداب الزفاف `
(ص 140 - 141 - الطبعة الجديدة) .
وروي بإسناد آخر عن أم سلمة، وهو مخرج في `غاية المرام ` (ص 136/195) ،
وبسندٍ حسن عن أم الدرداء رضي الله عنها؛ فراجعه هناك إن شئت.
وبالجملة؛ فالحديث محفوظ بلفظ: `ثيابها`، منكر بلفظ: `خمارها`.
ولذلك خرجته؛ فقد بلغني أن بعض المتنطعات من النساء يمتنعن من وضع الخمار
أمام المسلمات في غير بيتها، فكنت أنكر ذلك؛ لخالفته رخصه الله لهن في مثل
قوله تعالى: {وَلَا يُبْدِينَ زِينَتَهُنَّ إِلَّا لِبُعُولَتِهِنَّ أَوْ آَبَائِهِنَّ … } الآية، إلى أن قال:
{أَوْ نِسَائِهِنَّ} ، فكنت أتساءل عن سبب ذاك التشدد؟! حتى وجدت هذا الحديث
المنكر، ورأيته في رسالة `حجابك أختي المسلمة` … تأليف: (رغداء بكور الياقتي) ،
ويبدو لي من رسالتها أنها متحمسة ومتشددة في موضوع وجه المرأة، وأنها لا علم
عندها بالسنة وفقهها، وأنها تركض وراء الشيخ التويجري وغيره من المتشددين
القائلين بتحريم كشف المرأة لوجهها، ورأيتها قد نقلت (ص 28 - 29) حديث
الترجمة من كتاب `الترغيب` للمنذري؛ دون أن تذكر إعلاله إياه بابن لهيعة!
فهل هذا الفعل يشهد لقولها في مقدمة كُتَيْبها:
`ولقد عنيت فيه أقصى جهدي لأقدم ما هو الصحيح الثابت؛ مستدلة على
ذلك بالآيات الكريمة، والأ حاديث النبوية الصحيحة `؟!
أم هي كغيرها من المؤلفين والمؤلفات ما تعرف الحديث الصحيح إلا بما وافق
الهوى؟! والله المستعان.
واعلم أن المقصود من ترهيب المرأة أن تضع ثيابها في غير بيتها إنما هو التعري
من ثيابها كلها أو بعضها؛ مما لا يجوزلها نزعه أمام النساء المسلمات فضلاً عن
غيرهن، وهو كناية عن نهيهن من دخول حمامات السوق؛ كما يدل على ذلك
المناسبة التي ذكرت عائشة فيها الحديث، فقال أبو المليح:
دخل نسوة من أهل الشام على عائشة رضي الله عنها فقالت: ممن أنتن؟
قلن: من أهل الشام. قالت: لعلكن من الكورة التي تدخل نساؤها الحمام؟ قلن:
نعم. قالت: أما إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
`ما من امرأة تخلع ثيابها في غير بيتها؛ إلا هتكت [ستر] ما بينها وبين الله تعالى`.
(تنبيه) : أورد الرافعي الحديث في `شرح الوجيز` (كتاب الجزية) بلفظ:
`فهي ملعونة`. فقال الحافظ في تخريجه في `التلخيص ` (4/126) :
`الدارمي وأبو داود … من حديث عائشة `.
وهذا وهم عجيب من الحافظ الكبير؛ فإن اللفظ المذكور ليس له أصل عند
المذكورين ولا عند غيرهم من المحدثين … لا من حديث عائشة، ولا من حديث
غيرها - فيما علمت - . فاقتضى التنبيه!
(تنبيه آخر) : وقع في مخطوطة `الأوسط` مكان: (ربها) … (زوجها) . وهذا
خطأ فاحش، غفل عنه الدكتور الطحان في مطبوعة! الأوسط ` (4/174/3310)
التي زعم أنه قام على تحقيقها، وفيها أخطاء كثيرة وكبيرة منها سقوط أحاديث
منها، بل وصفحات، وقد نبهت على شيء من ذلك في غيرما موضع. والله
المستعان.
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(مَا مِنِ امْرَأَةٍ تَنْزِعُ خِمارَها فِي غَيْرِ بَيْتِ زوجِها إِلا كَشفت
السِتْرَ فيمَا بَيْنَهَا وَبَيْنَ ربِّها) .
(যে নারী তার স্বামীর ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও তার ওড়না (খিমার) খুলে ফেলে, সে তার ও তার রবের মধ্যকার পর্দা উন্মোচন করে দেয়।)
মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ (১/১৮৭/৩৪২৯)-এ বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন বকর ইবনু সাহল, তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ইউসুফ, তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু লাহী‘আহ, তিনি আবুল আসওয়াদ থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।
যে তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে হাম্মাম (গোসলখানা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলেন। তখন তিনি বললেন: ‘আমার পরে হাম্মাম তৈরি হবে, আর নারীদের জন্য হাম্মামে কোনো কল্যাণ নেই।’ তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা তো ইযার (লুঙ্গি/তাহবন্দ) পরে প্রবেশ করে? তিনি বললেন: ‘না; যদিও তারা ইযার, জামা (দির') এবং ওড়না (খিমার) পরে প্রবেশ করে, আর যে নারী...’ (সম্পূর্ণ) হাদীস। আর তিনি (ত্বাবারানী) বলেছেন: ‘উরওয়াহ থেকে আবুল আসওয়াদ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর ইবনু লাহী‘আহ এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আলবানী) বলি: আর তিনি (ইবনু লাহী‘আহ) যঈফ (দুর্বল); যেমনটি হাইসামী (১/২৭৮)-এ বলেছেন। আর এর মাধ্যমেই মুনযিরী তাঁর ‘আত-তারগীব’ (১/৯০)-এ এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মা'লুল) বলেছেন। আর বকর ইবনু সাহল: তাকে নাসাঈ যঈফ বলেছেন।
আর ইবনু লাহী‘আহ থেকে এর ইসনাদে মতপার্থক্য করা হয়েছে: ইবনু ওয়াহব বলেছেন: আমাকে ইবনু লাহী‘আহ জানিয়েছেন, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী জা'ফর থেকে (বর্ণনা করেন): নিশ্চয় উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: কোনো মু'মিনের জন্য রুমাল (মিন্দীল) ছাড়া হাম্মামে প্রবেশ করা বৈধ নয়, আর কোনো মু'মিন নারীর জন্য অসুস্থতা ছাড়া (প্রবেশ করা বৈধ নয়); কারণ আমি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: ‘যে কোনো নারী তার ওড়না খুলে ফেলে...’ হাদীসটি এর কাছাকাছি।

এটি বাইহাকী ‘শু'আবুল ঈমান’ (৬/১৫৯/৭৭৭৬)-এ বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি মুনকাতি' (বিচ্ছিন্ন)।’
আমি বলি: অর্থাৎ: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী জা'ফরের মাঝে (বিচ্ছিন্নতা); কারণ ইনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মৃত্যুর বহু বছর পরে জন্মগ্রহণ করেছেন – উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ২৩ সনে মারা যান, আর উবাইদুল্লাহ ১৩২ সনে মারা যান, অথবা বলা হয় এর পরেও।
আর এটি মুত্তারিহ ইবনু ইয়াযীদ-এর সূত্রে মাওসূল (সংযুক্ত) হিসেবে বর্ণিত হয়েছে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু যাহর থেকে, তিনি আলী ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি কাসিম থেকে, তিনি আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: অসুস্থতা ছাড়া কোনো নারীর জন্য হাম্মামে প্রবেশ করা বৈধ নয়; কারণ উম্মুল মু'মিনীন আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার এই বিছানায় আমার বন্ধু (খলীল) আলাইহিস সালাম আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: ‘যখন কোনো নারী তার ওড়না খুলে ফেলে...’ হাদীস।

এটি ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ (৬/৪৪৯)-এ এই মুত্তারিহ-এর জীবনীতে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘তার অধিকাংশ বর্ণনা উবাইদুল্লাহ ইবনু যাহর থেকে, আর তার হাদীসের দুর্বলতা সুস্পষ্ট।’ আর যাহাবী ‘আল-মীযান’-এ বলেছেন: ‘তার দুর্বলতার উপর ঐকমত্য রয়েছে।’ আর তার উপরের দুজনও দুর্বলতার জন্য প্রসিদ্ধ।
আর ইবনুল জাওযী ‘আল-ইলাল’ (১/৩৪৪/৫৬৫)-এ এই মুত্তারিহ-এর উপর হাদীসটিকে ঝুলিয়ে দিয়েছেন (তা'লীক করেছেন), এবং এর পরে বলেছেন: ‘এটি সহীহ নয়, মুত্তারিহ, আলী এবং কাসিম কেউই কিছু নয় (গ্রহণযোগ্য নয়)।’
তিনি এমনই বলেছেন, কিন্তু কাসিম – আর তিনি হলেন: আবূ আব্দুর রহমান, আবূ উমামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথী, আর তার ব্যাপারে যা প্রতিষ্ঠিত তা হলো যে তিনি – মধ্যম মানের, যার হাদীস হাসান (উত্তম)। যদি তিনি তার স্থানে উবাইদুল্লাহ ইবনু যাহর-এর কথা উল্লেখ করতেন; তবে তিনি সঠিক হতেন।
আর হাদীসটি আবূল মালীহ-এর সূত্রে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে এর কাছাকাছি শব্দে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে, তবে ‘খিমারুহা’ (তার ওড়না)-এর স্থানে ‘সিয়াবুহা’ (তার কাপড়) শব্দে। আর উম্মুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকেও এর একটি শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) মারফূ' হিসেবে রয়েছে...। আর উভয়ের ইসনাদই সহীহ, এবং উভয়টিই আমার কিতাব ‘আদাবুয যিফাফ’ (নতুন সংস্করণ, পৃ. ১৪০-১৪১)-এ সংকলিত হয়েছে।
আর উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি ইসনাদে বর্ণিত হয়েছে, যা ‘গায়াতুল মারাম’ (পৃ. ১৩৬/১৯৫)-এ সংকলিত হয়েছে, এবং উম্মুদ্ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাসান (উত্তম) সানাদে বর্ণিত হয়েছে; আপনি চাইলে সেখানে তা দেখে নিতে পারেন।
মোটকথা; হাদীসটি ‘সিয়াবুহা’ (তার কাপড়) শব্দে মাহফূয (সংরক্ষিত/গ্রহণযোগ্য), আর ‘খিমারুহা’ (তার ওড়না) শব্দে মুনকার (অস্বীকৃত)।
আর এই কারণেই আমি এটি সংকলন করেছি; কারণ আমার নিকট পৌঁছেছে যে, কিছু বাড়াবাড়িকারী নারী তাদের ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও মুসলিম নারীদের সামনে ওড়না খুলতে অস্বীকার করে, তাই আমি এটিকে প্রত্যাখ্যান করতাম; কারণ এটি আল্লাহ তাদের জন্য যে ছাড় দিয়েছেন তার বিরোধী, যেমন আল্লাহর বাণী: {আর তারা যেন তাদের স্বামী, পিতা...} আয়াতটি, যেখানে তিনি বলেছেন: {অথবা তাদের নারীদের সামনে}। তাই আমি এই কঠোরতার কারণ কী তা নিয়ে প্রশ্ন করতাম?! অবশেষে আমি এই মুনকার হাদীসটি পেলাম, এবং আমি এটি ‘হিজাবুকি উখতি আল-মুসলিমাহ’ (হে আমার মুসলিম বোন, তোমার হিজাব) নামক পুস্তিকায় দেখলাম... যার রচয়িতা: (রাগদা বাক্কুর আল-ইয়াকেতী)। আর তার পুস্তিকা থেকে আমার নিকট প্রতীয়মান হয় যে, তিনি নারীর মুখমণ্ডল (পর্দা) বিষয়ে উৎসাহী ও কঠোর, এবং সুন্নাহ ও এর ফিকহ সম্পর্কে তার কোনো জ্ঞান নেই, আর তিনি শাইখুত তুয়াইজীরী এবং অন্যান্য কঠোরপন্থীদের পিছনে ছুটছেন যারা নারীর মুখমণ্ডল উন্মুক্ত করা হারাম বলেন। আমি দেখেছি যে তিনি (পৃ. ২৮-২৯) মুনযিরীর ‘আত-তারগীব’ কিতাব থেকে আলোচ্য হাদীসটি উদ্ধৃত করেছেন; অথচ ইবনু লাহী‘আহ-এর কারণে মুনযিরী যে এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মা'লুল) বলেছেন, তা তিনি উল্লেখ করেননি! তাহলে এই কাজটি কি তার পুস্তিকার ভূমিকায় করা এই উক্তির সাক্ষ্য দেয়: ‘আমি এতে আমার সর্বাত্মক চেষ্টা করেছি যেন সহীহ ও প্রমাণিত বিষয় উপস্থাপন করতে পারি; এর উপর দলীল হিসেবে সম্মানিত আয়াতসমূহ এবং সহীহ নবুওয়াতী হাদীসসমূহ পেশ করেছি’?! নাকি তিনি অন্যান্য লেখক-লেখিকাদের মতোই, যারা প্রবৃত্তির অনুকূল হাদীস ছাড়া সহীহ হাদীস চেনেন না?! সাহায্যকারী একমাত্র আল্লাহ।
আর জেনে রাখুন যে, নারীর জন্য তার ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও কাপড় খুলে ফেলার যে ভীতি প্রদর্শন করা হয়েছে, তার উদ্দেশ্য হলো সম্পূর্ণ বা আংশিকভাবে কাপড় খুলে ফেলা; যা মুসলিম নারীদের সামনেও খোলা তার জন্য বৈধ নয়, অন্যদের সামনে তো নয়ই। আর এটি বাজারের হাম্মামগুলোতে তাদের প্রবেশ করতে নিষেধ করার একটি ইঙ্গিত; যেমনটি সেই প্রেক্ষাপট দ্বারা প্রমাণিত হয় যেখানে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাদীসটি উল্লেখ করেছেন। আবূল মালীহ বলেন: শামের কিছু নারী আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট প্রবেশ করলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তোমরা কারা? তারা বলল: আমরা শামের অধিবাসী। তিনি বললেন: সম্ভবত তোমরা সেই অঞ্চলের, যেখানকার নারীরা হাম্মামে প্রবেশ করে? তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: ‘যে নারী তার ঘর ব্যতীত অন্য কোথাও তার কাপড় খুলে ফেলে; সে তার ও আল্লাহ তা'আলার মধ্যকার [পর্দা] ছিন্ন করে দেয়।’
(সতর্কতা): রাফি'ঈ হাদীসটি ‘শারহুল ওয়াজিজ’ (কিতাবুল জিযিয়াহ)-এ এই শব্দে উল্লেখ করেছেন: ‘সে অভিশাপগ্রস্ত (মাল'ঊনাহ)।’ তখন হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর ‘আত-তালখীস’ (৪/১২৬)-এ এর তাখরীজ করতে গিয়ে বলেছেন: ‘দারিমী এবং আবূ দাঊদ... আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে।’ আর এটি মহান হাফিয (ইবনু হাজার)-এর পক্ষ থেকে এক বিস্ময়কর ভুল; কারণ উল্লিখিত শব্দটির কোনো ভিত্তি উল্লিখিত মুহাদ্দিসগণের নিকট নেই, আর আমার জানা মতে অন্য কোনো মুহাদ্দিসের নিকটও নেই... না আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে, না অন্য কারো হাদীস থেকে। তাই সতর্ক করা আবশ্যক হলো!
(অন্য একটি সতর্কতা): ‘আল-আওসাত্ব’-এর পাণ্ডুলিপিতে (রব্বিহা) (তার রবের) শব্দের স্থানে (যাওজিহা) (তার স্বামীর) শব্দটি এসেছে। আর এটি একটি মারাত্মক ভুল, যা ডক্টর ত্বাহহান তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’ (৪/১৭৪/৩৩১০)-এর মুদ্রিত সংস্করণে উপেক্ষা করেছেন, যদিও তিনি এর তাহকীক (সম্পাদনা) করেছেন বলে দাবি করেন। আর এতে অনেক বড় বড় ভুল রয়েছে, যার মধ্যে কিছু হাদীস, এমনকি কিছু পৃষ্ঠা বাদ পড়ে যাওয়াও অন্তর্ভুক্ত। আমি একাধিক স্থানে এর কিছু বিষয় সম্পর্কে সতর্ক করেছি। সাহায্যকারী একমাত্র আল্লাহ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6217)


(مَنْ نام قبل العِشاءِ؛ فلا أنامَ اللهُ عينَه) .
ضعيف.

أخرجه البزار (1/192/378 - الكشف) : حدثنا أحمد بن الوليد
البزار: ثنا عبد العزيز بن عبد الله المدني؛ ثنا محمد بن عبد الله بن عبيد بن عمير
عن ابن أبي مليكة عن عروة عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره،
قالت عائشة:
ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم نام قبلها، ولا تحدث بعدها. وقال:
`لا نعلم روى ابن أبي مليكة عن عروة عن عائشة إلا هذا`.
قلت: لكن السند إليه لا يصح؛ محمد بن عبد الله بن عبيد بن عمير: متفق
على تضعيفه، بل وهاه بعضهم؛ فقال البخاري:
` منكر الحديث `. وقال النسائي والدارقطني:
` متروك`. وقال النسائي مرة:
`ليس بثقة، ولا يكتب حديثه `.
والحديث أورده الهيثمي (1/ 314) بلفظ:
` … فلا نامت عينه`. وقال:
`رواه البزار، وفيه محمد بن عبد الله بن عبيد بن عمير، وهو ضعيف`!
وأحمد بن الوليد البزار: لم أعرفه، وفي `تاريخ بغداد` جَمْع بهذا الاسم
والأب؛ فراجع.
قلت: ووجدت له طريقاً أخرى يرويه عبيد الله بن موسى قال: حدثنا عمر بن
واصل أبو يزيد عن أبيه عن عائشة مرفوعاً مختصراً بلفظ:
أمن نام قبل العشاء، فلا نام `.

أخرجه الدولابي في `الكنى` (2/163) .
وعمر بن واصل أبو يزيد - كذا وقع فيه، وفي `الجرح والتعديل ` (3/1/140) :
`عمر بن واصل أبو واصل الجُبلاني: - روى عن أبي صادق، وروى عن أبيه
عن عائشة. روى عنه مروان الفزاري ووكيع وعبيد الله بن موسى وأبو نعيم. سألت
أبي عنه فقال: هو ضعيف الحديث`.
فالظاهر أنه هذا.
وأبوه واصل: لم أجد له ترجمة.
ثم رأيته في `كامل ابن عدي، (6/341) من طريق موسى بن عمير عن أبي
الزناد عن الأعرج عن أبي هريرة مرفوعاً بلفظ:
`لا أنام الله عيناً نامت قبل أن تصلي العشاء الآخرة! .
لكن موسى بن عمير وهو القرشي الأعمى: قال الحافظ في `التقريب`:
`متروك، وقد كذبه أبو حاتم `.
وأما قول عائشة الموقوف عليها فقد ثبت من طريق أخرى عنها عند ابن ماجه
وغيره.
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(مَنْ نام قبل العِشاءِ؛ فلا أنامَ اللهُ عينَه) .
(যে ব্যক্তি এশার আগে ঘুমালো; আল্লাহ যেন তার চোখকে ঘুম না দেন।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন বাযযার (১/১৯২/৩৭৮ - আল-কাশফ)-এ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু আল-ওয়ালীদ আল-বাযযার: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল আযীয ইবনু আব্দুল্লাহ আল-মাদানী; আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদ ইবনু উমাইর, ইবনু আবী মুলাইকার সূত্রে, উরওয়াহর সূত্রে, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে এর (এশার) আগে ঘুমাতে দেখিনি, আর এর পরে কথা বলতেও দেখিনি।
আর তিনি (বাযযার) বলেন:
‘আমরা জানি না যে ইবনু আবী মুলাইকা, উরওয়াহর সূত্রে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি ছাড়া আর কোনো হাদীস বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: কিন্তু তার (মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহর) পর্যন্ত সনদ সহীহ নয়; মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদ ইবনু উমাইর: তার দুর্বলতার (তাদ্ব'ঈফ) উপর সকলে একমত, বরং কেউ কেউ তাকে অত্যন্ত দুর্বল (ওয়াহাহ) বলেছেন; আল-বুখারী বলেছেন:
‘মুনকারুল হাদীস (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত)’। আর আন-নাসাঈ ও আদ-দারাকুতনী বলেছেন:
‘মাতরূক (পরিত্যক্ত)’। আর নাসাঈ একবার বলেছেন:
‘সে বিশ্বস্ত নয়, আর তার হাদীস লেখা হবে না।’
আর হাদীসটি আল-হাইসামী (১/৩১৪) এই শব্দে উল্লেখ করেছেন:
‘... ফালা নামাত আইনুহ (আল্লাহ যেন তার চোখকে ঘুম না দেন)’। আর তিনি (হাইসামী) বলেছেন:
‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এতে মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু উবাইদ ইবনু উমাইর রয়েছে, আর সে যঈফ (দুর্বল)!’
আর আহমাদ ইবনু আল-ওয়ালীদ আল-বাযযার: আমি তাকে চিনতে পারিনি, আর ‘তারীখু বাগদাদ’-এ এই নাম ও পিতার নামে একটি দল রয়েছে; সুতরাং যাচাই করুন।
আমি (আল-আলবানী) বলি: আর আমি এর জন্য আরেকটি সূত্র খুঁজে পেয়েছি, যা উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন উমার ইবনু ওয়াসিল আবূ ইয়াযীদ, তার পিতার সূত্রে, আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ (নবী পর্যন্ত উন্নীত) ও সংক্ষিপ্তভাবে এই শব্দে:
‘যে ব্যক্তি এশার আগে ঘুমালো, সে যেন ঘুম না পায়।’

এটি বর্ণনা করেছেন আদ-দাওলাবী ‘আল-কুনা’ (২/১৬৩)-তে।
আর উমার ইবনু ওয়াসিল আবূ ইয়াযীদ - এভাবেই এতে (দাওলাবীর বর্ণনায়) এসেছে, আর ‘আল-জারহু ওয়াত-তা‘দীল’ (৩/১/১৪০)-এ রয়েছে: ‘উমার ইবনু ওয়াসিল আবূ ওয়াসিল আল-জুবলানী: - আবূ সাদিক থেকে বর্ণনা করেছেন, আর তার পিতার সূত্রে আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তার থেকে মারওয়ান আল-ফাযারী, ওয়াকী‘, উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা এবং আবূ নু‘আইম বর্ণনা করেছেন। আমি আমার পিতাকে (আবূ হাতিমকে) তার সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলে তিনি বললেন: সে দুর্বলুল হাদীস (দুর্বল বর্ণনাকারী)।’
সুতরাং স্পষ্টত সে এই ব্যক্তিই।
আর তার পিতা ওয়াসিল: আমি তার জীবনী খুঁজে পাইনি।
অতঃপর আমি এটি ইবনু আদী-এর ‘আল-কামিল’ (৬/৩৪১)-এ মূসা ইবনু উমাইরের সূত্রে, আবূয-যিনাদের সূত্রে, আল-আ‘রাজ-এর সূত্রে, আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে এই শব্দে দেখেছি:
‘আল্লাহ যেন সেই চোখকে ঘুম না দেন, যে চোখ শেষ এশার সালাত আদায়ের আগে ঘুমিয়ে পড়েছে!’
কিন্তু মূসা ইবনু উমাইর, আর সে হলো আল-কুরাশী আল-আ‘মা (অন্ধ): হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন:
‘মাতরূক (পরিত্যক্ত), আর আবূ হাতিম তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন।’
আর আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাওকূফ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) উক্তিটি, তা অন্য সূত্রে ইবনু মাজাহ ও অন্যান্যদের নিকট তার থেকে প্রমাণিত হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6218)


(يا نور السموات والارض! يا زَيْنَ السموات والارض!
يا جمالَ السموات والارض! يا عماد السموات والارض! يا بديع
السموات والارض! … ) . إلخ الد عاء.
منكر.

أخرجه الدولابي في `الكنى` (2/17) : حدثنا ابن أبي مريم قال:
حدثنا السري بن يحيى قال: حدثني أبو شجاع عن أبي طيبة الجرجاني عن
عبد الله بن عمر:
أن جبرئيل أتى النبي صلى الله عليه وسلم فعلمه هذا الدعاء … فذكره.
وأخرجه الطبراني في `الدعاء` (3/1480/1459) : حدثنا يحيى بن عثمان
ابن صالح: ثنا سعيد بن أبي مريم … به مختصراً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات؛ غير أبي طيبة هذا - واسمه: عبد الله
ابن مسلم المروزي - : قال أبو حاتم:
`يكتب حديثه، ولا يحتج به `.
ولم يوثقه أحد غير ابن حبان، ومع ذلك فقد أشار إلى ضعف حفظه بقوله
(7/49) :
`يخطئ ويخالف `.
ثم إنه لم يدرك ابن عمر؛ بينهما واسطتان أو أكثر، وقد أشار إلى ذلك الحافظ
بقوله فيه في `التقريب `:
`صدوق يهم، من الثامنة `.
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(হে আসমান ও যমীনের নূর! হে আসমান ও যমীনের সৌন্দর্য! হে আসমান ও যমীনের শোভা! হে আসমান ও যমীনের খুঁটি! হে আসমান ও যমীনের স্রষ্টা!...)। ইত্যাদি দু'আ।

মুনকার (Munkar)।

এটি আদ-দুলাবী তাঁর ‘আল-কুনা’ গ্রন্থে (২/১৭) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী মারইয়াম, তিনি বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আস-সারী ইবনু ইয়াহইয়া, তিনি বলেন: আমার নিকট বর্ণনা করেছেন আবূ শুজা' তিনি আবূ তাইবাহ আল-জুরজানী থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।

যে জিবরীল (আঃ) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে এই দু'আটি শিক্ষা দেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আর এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আদ-দু'আ’ গ্রন্থে (৩/১৪৮০/১৪৫৯) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু উসমান ইবনু সালিহ: সাঈদ ইবনু আবী মারইয়াম আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন... সংক্ষেপে এটি দ্বারা।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য; তবে এই আবূ তাইবাহ ব্যতীত—যার নাম: আব্দুল্লাহ ইবনু মুসলিম আল-মারওয়াযী—:

আবূ হাতিম বলেছেন: ‘তার হাদীস লেখা যেতে পারে, কিন্তু তা দ্বারা দলীল পেশ করা যাবে না।’

ইবনু হিব্বান ছাড়া আর কেউ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি। এতদসত্ত্বেও তিনি তার দুর্বল স্মৃতিশক্তির দিকে ইঙ্গিত করে বলেছেন (৭/৪৯): ‘সে ভুল করে এবং বিরোধিতা করে।’

উপরন্তু, সে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাক্ষাৎ পায়নি; তাদের দুজনের মাঝে দুজন বা তারও বেশি বর্ণনাকারী অনুপস্থিত।

আর হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে তার সম্পর্কে এই দিকে ইঙ্গিত করে বলেছেন: ‘সে সত্যবাদী, তবে ভুল করে (ভ্রম করে), অষ্টম স্তরের বর্ণনাকারী।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6219)


(والذي تفسي بيده؟! لأَنْ يولدَ لي ولدٌ في الإسلام فأحتسبه
أحبُّ إليَّ من الدنيا وما فيها) .
موضوع.

أخرجه ابن عساكر في `التاريخ ` (19/623) من طريق البغوي:
حدثني محمد بن الهيثم القاضي: نا أبو توبة عن مسلمة بن علي الخشني عن
يزيد بن أبي مريم الأنصاري عن أمه عن يحيى ابن الحنظلية - وكان ممن بايع رسول
الله صلى الله عليه وسلم تحت الشجرة - وكان عقيماً لا يولد له؛ فقال: … فذكره؛ موقوفاً عليه؛
لم يرفعه.
وهكذا أورده ابن الأثير في `أسد الغابة` في ترجمة يحيى هذا موقوفاً من
طريق يزيد بن أبي مريم، إلا أنه وقع فيه: (عن أبيه) … مكان: (عن أمه) . وقال:
`أخرجه ابن منده وأبو نعيم `.
ولذلك أورده الحافظ في `الإصابة ` من رواية البغوي في `الصحابة `، ثم قال
الحافظ:
`وسنده ضعيف `!
كذا قال! وفيه تسامح كبير في التعبير، فإن الخشني هذا حاله أسوأ مما يشعر
تعبيره هذا؛ فقد قال الحافظ نفسه في ترجمته من `التقريب `:
`متروك`. ونحوه قول الذهبي في `الكاشف ` و`المغني `:
`تركوه `.
قلت: وقد تقدمت له أحاديث كثيرة موضوعة تدل على سوء حاله؛ فراجع
فهارس المجلدات الأربعة المطبوعة حتى الآن () .
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(যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! ইসলামে আমার জন্য একটি সন্তান জন্ম নিক এবং আমি তার (মৃত্যুতে) আল্লাহর কাছে সওয়াব প্রত্যাশা করি—এটা আমার কাছে দুনিয়া ও তার মধ্যে যা কিছু আছে তার চেয়েও অধিক প্রিয়।)
মাওদ্বূ (বানোয়াট)।

এটি ইবনু আসাকির তাঁর ‘আত-তারীখ’ (১৯/৬২৩) গ্রন্থে বাগাওয়ী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাকে মুহাম্মাদ ইবনুল হাইসাম আল-কাদী বর্ণনা করেছেন: আবূ তাওবাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি মাসলামাহ ইবনু আলী আল-খুশানী থেকে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবী মারইয়াম আল-আনসারী থেকে, তিনি তাঁর মা থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনুল হানযালিয়াহ থেকে—আর তিনি ছিলেন সেই ব্যক্তিদের অন্তর্ভুক্ত, যারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর হাতে গাছের নিচে বাইয়াত গ্রহণ করেছিলেন—আর তিনি ছিলেন বন্ধ্যা, তাঁর কোনো সন্তান জন্ম নিত না; অতঃপর তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন; এটি তাঁর (ইয়াহইয়া ইবনুল হানযালিয়াহ-এর) উপর মাওকূফ (তাঁর নিজস্ব উক্তি) হিসেবে বর্ণিত, মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি হিসেবে) নয়।

অনুরূপভাবে ইবনুল আসীর তাঁর ‘উসদুল গাবাহ’ গ্রন্থে এই ইয়াহইয়া-এর জীবনীতে ইয়াযীদ ইবনু আবী মারইয়াম-এর সূত্রে মাওকূফ হিসেবে এটি উল্লেখ করেছেন। তবে সেখানে (عن أمه) এর স্থলে (عن أبيه) এসেছে। তিনি (ইবনুল আসীর) বলেছেন: ‘এটি ইবনু মান্দাহ এবং আবূ নুআইম বর্ণনা করেছেন।’

এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) বাগাওয়ী-এর সূত্রে ‘আস-সাহাবাহ’ (সাহাবীগণের জীবনী) গ্রন্থে ‘আল-ইসাবাহ’ কিতাবে এটি উল্লেখ করেছেন। অতঃপর হাফিয বলেছেন:
‘এর সনদ যঈফ (দুর্বল)!’

তিনি (হাফিয ইবনু হাজার) এমনটিই বলেছেন! কিন্তু এই অভিব্যক্তিতে বিরাট শিথিলতা রয়েছে। কারণ এই আল-খুশানী-এর অবস্থা তাঁর এই অভিব্যক্তি যা প্রকাশ করে তার চেয়েও খারাপ। কেননা হাফিয নিজেই তাঁর ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে তাঁর (আল-খুশানী-এর) জীবনীতে বলেছেন:
‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।
অনুরূপভাবে যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ ও ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তারা তাকে পরিত্যাগ করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: তার (আল-খুশানী-এর) বহু মাওদ্বূ (বানোয়াট) হাদীস পূর্বে অতিবাহিত হয়েছে, যা তার খারাপ অবস্থার প্রমাণ দেয়। সুতরাং আপনি এ পর্যন্ত মুদ্রিত চারটি খণ্ডের সূচিপত্র দেখুন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6220)


(نهى عن أكلِ أُذُنَيِّ القلْبِ) .
منكر.

أخرجه أبو داود في `المراسيل ` (326/467) - عن مسدد - ، وابن عدي
في `الكامل ` (4/215/) - عن إسحاق بن أبي إسرائيل - كلاهما عن عبد الله بن
يحيى بن أبي كثير عن أبيه عن رجل من الأنصار: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى …
الحديث.
أورده ابن عدي في ترجمة عبد الله هذا مع أحاديث أخرى له، ثم قال:
`ولا أعرف في هذه الأحاديث ما أنكره إلا هذا، ولم أجد للمتقدمين فيه
كلاماً، وقد أثنى عليه إسحاق بن أبي إسرائيل؛ فقال: كان من خيار الناس وأهل
الورع والدين، ما رأيت باليمامة خيراً منه. وأرجو أنه لا بأس به`.
قلت: قال ابن أبي حاتم في ترجمته:
`قال أحمد: ثقة لا بأس به. وقال أبي: صدوق`.
وذكره ابن حبان في `الثقات ` (8/334) . وفي `التهذيب`:
`قال البخاري: أثنى عليه مسدد؛ لقيه باليمامة`.
قلت: فالرجل ثقة، وحسبه أن الشيخين احتجا به؛ فالنكارة ليست منه،
() ثم طُبع المجلد الخامس، وتلته المجلدات (6 - 13) بعد وفاة الشيخ رحمه الله، ويليها
المجلد الرابع عشر والأخير - وهو تحت الطبع - . يسّر الله إتمامه. (الناشر) .
وإنما من الرجل الأنصاري؛ فإنه مجهول، فإنه ليس بصحابي - كما يأتي عن ابن
القطان - ، لكن أسنده بعضهم فقال ابن عدي: ثنا محمد بن أحمد بن بخيت:
ثنا إبراهيم بن جابر: ثنا يحيى بن إسحاق البجلي: ثنا عبد الله بن يحيى بن أبي
كثير عن أبيه عن أبي سلمة عن أبي هريرة … به.
قلت: فقد خالفهما يحيى بن إسحاق البجلي - وهو: السيلحيني - وهو ثقة من
رجال مسلم، وكان من الممكن عندي إعلال روايته بالشذوذ؛ لخالفته لمسدد - وهو:
ابن مسرهد - ، وهو ثقة حافظ من شيوخ البخاري. ولمتابعة إسحاق بن أبي إسرائيل:
إبراهيم بن كامجرا المروزي، قال ابن القطان في `الوهم والإيهام ` (1/22/2) :
`وكان ثقة؛ وله شأن، وترك الناس حديثه لرأي وقع له، فأظهره في القرآن من
الوقف؛ فترك وحيداً وهجر، وقد كان الناس إليه عنقاً واحدة، ولم يكن متهماً `.
قلت: حسبه فيما نحن فيه ثقته - ولا سيما وقد تابعه مسدد - ، وأما تركه
من أجل رأي أخطأ فيه، أو أجبر عليه؛ فأراه خلاف علم المصطلح، وما جرى عليه
العلماء والأئمة في كتب السنة من الاحتجاج بالثقات من الخوارج والمرجئة
والمعتزلة، ومن أولئك الأئمة الشيخان وغيرهما، ألا ترى أن علياً بن المديني من
شيوخ البخاري وكان قد استجاب للقول بخلق القرآن خوف القتل؟ ومع ذلك فهو
لا يزال إماماً في الجرح والتعديل ومعرفة العلل، متميزاً في `ذلك على غيره - كما
هو معروف عند العلماء - .
ولقد رأيت الحافظ الذهبي رحمه الله قد أنصف إسحاق هذا في ترجمته إياه
في `السير` فقال في آخرها (11 477 - 478) :
`قلت: أداه ورعه وجموده إلى الوقف، لا أنه كان يتجهم؛ كلا `. ثم روى
عنه أنه قال:
`لم أقل على الشك، ولكني سكت؛ كما سكت القوم قبلي `.
قلت: فهو على هذا سلفي المنهج؛ فهو مأجور إن شاء الله تعالى، وغاية ما
يمكن أن يقال في مثله؛ أنه أخطأ في وقفه وجموده؛ لعدم انتباهه إلى أن الوقوف
ينفع فيما لو لم يجهر المبتدعة بالقول بخلق القرآن، ففي هذه الحالة لا بد من إنكار
ذلك؛ لأنه على الأقل مخالف لما كان عليه السلف. والله أعلم.
ثم قال الحافظ الذهبي:
`الإنصاف فيمن هذا حاله أن يكون باقيأ على عدالته `.
فهذا هو الحق إن شاء الله تعالى.
فأقول: إذا عرفت ما تقدم من اتفاق هذا الثقة مع الثقة الآخر - مسدد بن
مسرهد - على رواية الحديث عن عبد الله بن أبي يحيى عن أبيه عن الأنصاري
مرسلاً أو معضلاً، ومخالفة يحيى بن إسحاق البجلي إياهما في روايته الحديث
عن عبد الله بن يحيى عن أبيه عن أبي سلمة عن أبي هريرة مرفوعاً.
فأقول: كان من الممكن أن أعتبر هذه المخالفة شنذوذاً من البجلي هذا؛ لكن
يمنعني من ذلك أن دونه اثنين من رجال الإسناد:
الأول: إبراهيم بن جابر: ولم أجد له ترجمة إلا في `الجرح والتعديل ` لابن
أبي حاتم، ولم يذكر فيه توثيقاً، إلا أنه قال:
`روى عنه أبي وأبو زرعة رحمهم الله `.
والآخر: شيخ ابن عدي محمد بن أحمد بن بخيت: ولم أعرفه. فيمكن أن
يكون المخالف هذا أو الذي قبله. والله أعلم.
فهذا الإعلال أولى عندي من إعلال ابن القطان بإسحاق بن أبي إسرائيل
- كما تقدم - ، وضعف الحديث في المكان المشار إليه آنفاً بسببه؛ فقال هناك - بعد
تجريحه بإسحاق لوقفه في القرآن - :
`وسأعود إلى ذكر هذا الحديث في باب الأحاديث التي أتبعَها كلاماً يقتضي
صحتها، وليست بصحيحة إن شاء الله تعالى`.
وفي الباب المشار إليه أفاد أن عبد الحق الإشبيلي ذكر الحديث من رواية ابن
عدي من الطريقين المذكورتين: المرسلة والمسندة، وذكر كلام ابن عدي وأحمد
وأبي حاتم في توثيق عبد الله بن يحيى، وقال ابن القطان عقبه (2/65/1 - 2) :
` ويظهر أن الحديث عنده لا عيب فيه، وذلك أنه اعتمد توثيق عبد الله بن
يحيى، وأعرض عما سواه `.
ثم أخذ عليه خطأ وقع له في اسم أحد رواته. وبعد هذا بياض في النسخة
المصورة، ويظهر لي أنه ينتقد فيه سكوت عبد الحق عن الطريق المرسلة عن رجل
من الأنصار، لا يعرف أنه من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وذلك لا يعرف إلا من قوله - ولم
يقل ذلك - ؛ فقال ما نصه (65/2) :
`فإن هذا الأنصاري لم يقل أنه رأى النبي صلى الله عليه وسلم، ولا أنه سمع منه، ولعله
تابعي، وحاله مجهولة. وهذا هو الذي يغلب على الظن فيه؛ فإن يحيى بن أبي
كثير لم يرو عن صاحب، إلا أنه رأى أنس بن مالك، ولم يسمع منه، وإنما يرسل
عنه. وأبو داود رحمه الله قد أورد هذا الحديث في `المراسيل` من أجل هذا الذي
قلناه؛ فإن الإسناد الذي ساقه معضل إلى هذا الرجل (ثم ساق إسناده، ثم قال:)
وأبو محمد لم يعرض للحديث من هذه الجهة، وإلى ذلك فإن إسحاق بن أبي
إسرائيل - وإن كان من أهل الصدق، وممن كان الناس إليه عنقاً واحدة - … ` إلى
آخر كلامه المتقدم. وقد عرفت الجواب عنه.
وخلاصة البحث في هذا الحديث: أن من وصله عن أبي هريرة فقد وهم،
وأن المحفوظ فيه: عن الرجل الأنصاري، وَهُوَ مَجْهُولٌ مرسل إن كان تابعياً، ومنقطع
إن كان صحابياً؛ لأن يحيى بن أبي كثير لم يسمع من أحد من الصحابة. ثم هو
إلى ذلك قد رمي بالتدليس. والله سبحانه وتعالى أعلم.
وفيما تقدم من كلام ابن القطان على رواية يحيى بن أبي كثير عن الرجل
الأنصاري - أنه لا يلزم أن يكون الأنصاري صحابياً - ما يؤيد ما كنت ذهبتُ إليه من
تضعيف أحاديث ثابت بن الحارث الأنصاري من رواية الحارث بن يزيد الحضرمي،
وأن الحارث هذا - وإن كان تابعياً - ؛ فلا يلزم أن تكون روايته عنه تستلزم أن يكون
الأنصاري من الصحابة؛ فانظر الأحاديث المتقدمة (6092 و6116 و6117) .
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(তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কলিজার দুটি কান খেতে নিষেধ করেছেন।)
মুনকার।

এটি আবূ দাঊদ তাঁর ‘আল-মারাসীল’ (৩২৬/৪৬৭) গ্রন্থে - মুসাদ্দাদ হতে, এবং ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ (৪/২১৫/) গ্রন্থে - ইসহাক ইবনু আবী ইসরাঈল হতে বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়েই আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আনসারী এক ব্যক্তি হতে বর্ণনা করেছেন যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নিষেধ করেছেন... হাদীসটি।

ইবনু আদী আব্দুল্লাহর এই জীবনীতে তার অন্যান্য হাদীসের সাথে এটিও উল্লেখ করেছেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘আমি এই হাদীসগুলোর মধ্যে এটি ছাড়া আর কোনো মুনকার হাদীস জানি না। আর আমি পূর্ববর্তী আলেমদের এ বিষয়ে কোনো মন্তব্য পাইনি। ইসহাক ইবনু আবী ইসরাঈল তার প্রশংসা করেছেন এবং বলেছেন: তিনি ছিলেন উত্তম লোক, পরহেযগার ও দ্বীনদারদের অন্তর্ভুক্ত। আমি ইয়ামামাতে তার চেয়ে উত্তম কাউকে দেখিনি। আমি আশা করি যে, তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’

আমি (আলবানী) বলি: ইবনু আবী হাতিম তার জীবনীতে বলেছেন: ‘আহমাদ (ইবনু হাম্বল) বলেছেন: তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই। আর আমার পিতা (আবূ হাতিম) বলেছেন: তিনি সাদূক (সত্যবাদী)।’ ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিকাত’ (৮/৩৩৪) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। আর ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে আছে: ‘আল-বুখারী বলেছেন: মুসাদ্দাদ তার প্রশংসা করেছেন; তিনি ইয়ামামাতে তার সাথে সাক্ষাৎ করেছিলেন।’

আমি বলি: সুতরাং লোকটি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। তার জন্য এতটুকুই যথেষ্ট যে, শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম) তার দ্বারা দলীল গ্রহণ করেছেন। সুতরাং মুনকার হওয়ার কারণ তার থেকে নয়,
() অতঃপর পঞ্চম খণ্ড প্রকাশিত হয়, আর শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মৃত্যুর পর ৬ থেকে ১৩ খণ্ড প্রকাশিত হয়। এর পরে চৌদ্দতম ও শেষ খণ্ডটি - যা বর্তমানে মুদ্রণাধীন - আসবে। আল্লাহ এর সমাপ্তি সহজ করুন। (প্রকাশক)।
বরং (মুনকার হওয়ার কারণ) আনসারী ব্যক্তিটির থেকে; কারণ সে মাজহূল (অজ্ঞাত)। সে সাহাবী নয় - যেমনটি ইবনু আল-কাত্তান থেকে আসছে - , কিন্তু তাদের কেউ কেউ এটিকে মারফূ’ (মুসনাদ) করেছেন। ইবনু আদী বলেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনু বাখীত: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু জাবির: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু ইসহাক আল-বাজালী: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি আবূ সালামাহ হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে... হাদীসটি।

আমি বলি: ইয়াহইয়া ইবনু ইসহাক আল-বাজালী - যিনি আস-সায়লাহিনী - তিনি তাদের উভয়ের বিরোধিতা করেছেন। তিনি মুসলিমের রাবীদের অন্তর্ভুক্ত একজন সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) রাবী। আমার মতে, তার বর্ণনাকে শাদ্দ (শাযূয) হিসেবে ত্রুটিযুক্ত করা সম্ভব ছিল; কারণ তিনি মুসাদ্দাদের - যিনি ইবনু মুসারহাদ - বিরোধিতা করেছেন। মুসাদ্দাদ বুখারীর শাইখদের অন্তর্ভুক্ত একজন সিকাহ হাফিয। আর ইসহাক ইবনু আবী ইসরাঈলের অনুসরণ করেছেন ইবরাহীম ইবনু কামজিরাহ আল-মারওয়াযী। ইবনু আল-কাত্তান ‘আল-ওয়াহম ওয়াল-ঈহাম’ (১/২২/২) গ্রন্থে বলেছেন: ‘তিনি সিকাহ ছিলেন; তার গুরুত্ব ছিল। কিন্তু তার একটি মতের কারণে লোকেরা তার হাদীস বর্জন করেছে, যা তিনি কুরআনের বিষয়ে ‘ওয়াকফ’ (থামানো/নিরপেক্ষতা) এর ক্ষেত্রে প্রকাশ করেছিলেন। ফলে তাকে একা ছেড়ে দেওয়া হয় এবং বর্জন করা হয়। অথচ লোকেরা তার দিকে একযোগে ঝুঁকেছিল, এবং তিনি অভিযুক্ত ছিলেন না।’

আমি বলি: আমরা যে বিষয়ে আছি, তাতে তার নির্ভরযোগ্যতাই যথেষ্ট - বিশেষত যখন মুসাদ্দাদও তার অনুসরণ করেছেন। আর যে মতের কারণে তিনি ভুল করেছেন বা যার জন্য তিনি বাধ্য হয়েছেন, সে কারণে তাকে বর্জন করা - আমার মতে - মুস্তালাহুল হাদীসের (হাদীস শাস্ত্রের মূলনীতি) পরিপন্থী। সুন্নাহর কিতাবসমূহে আলেম ও ইমামগণ খারেজী, মুরজিয়া ও মু’তাযিলাদের মধ্যে যারা সিকাহ, তাদের দ্বারা দলীল গ্রহণ করেছেন। সেই ইমামদের মধ্যে শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্যরাও রয়েছেন। আপনি কি দেখেন না যে, আলী ইবনু আল-মাদীনী বুখারীর শাইখদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন এবং হত্যার ভয়ে তিনি ‘কুরআন সৃষ্ট’ হওয়ার মতবাদ মেনে নিয়েছিলেন? তা সত্ত্বেও তিনি জারহ ওয়া তা’দীল এবং ইল্লত (ত্রুটি) জানার ক্ষেত্রে এখনও ইমাম হিসেবে আছেন, এবং এ বিষয়ে অন্যদের চেয়ে তিনি স্বতন্ত্র - যেমনটি আলেমদের কাছে সুপরিচিত।

আমি দেখেছি যে, হাফিয আয-যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আস-সিয়ার’ গ্রন্থে তার জীবনীতে ইসহাকের প্রতি ইনসাফ করেছেন। তিনি এর শেষে (১১/৪৭৭-৪৭৮) বলেছেন: ‘আমি বলি: তার পরহেযগারী ও কঠোরতা তাকে ‘ওয়াকফ’ (নিরপেক্ষতা)-এর দিকে নিয়ে গিয়েছিল, এর অর্থ এই নয় যে তিনি জাহমী ছিলেন; কক্ষনো না।’ অতঃপর তিনি তার থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেছেন: ‘আমি সন্দেহের ভিত্তিতে বলিনি, বরং আমি নীরব ছিলাম; যেমন আমার পূর্বের লোকেরা নীরব ছিলেন।’ আমি বলি: এই হিসেবে তিনি সালাফী মানহাজের উপর ছিলেন; সুতরাং ইনশাআল্লাহ তিনি প্রতিদান পাবেন। তার মতো ব্যক্তির ক্ষেত্রে সর্বোচ্চ যা বলা যেতে পারে তা হলো: তিনি তার ওয়াকফ (নিরপেক্ষতা) ও কঠোরতার ক্ষেত্রে ভুল করেছেন; কারণ তিনি এই দিকে মনোযোগ দেননি যে, বিদ’আতীরা যদি ‘কুরআন সৃষ্ট’ হওয়ার কথা প্রকাশ্যে ঘোষণা না করত, তবে নীরবতা উপকারী হতো। কিন্তু এই পরিস্থিতিতে তা অস্বীকার করা অপরিহার্য; কারণ এটি অন্তত সালাফদের নীতির পরিপন্থী। আল্লাহই ভালো জানেন।

অতঃপর হাফিয আয-যাহাবী বলেন: ‘যার অবস্থা এমন, তার ক্ষেত্রে ইনসাফ হলো এই যে, তার আদালত (নির্ভরযোগ্যতা) বহাল থাকবে।’ ইনশাআল্লাহ এটাই সত্য।

আমি বলি: যখন আপনি জানতে পারলেন যে, এই সিকাহ রাবী অন্য সিকাহ রাবী - মুসাদ্দাদ ইবনু মুসারহাদ - এর সাথে একমত হয়ে আব্দুল্লাহ ইবনু আবী ইয়াহইয়া হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি আনসারী ব্যক্তি হতে হাদীসটি মুরসাল বা মু’দাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন, এবং ইয়াহইয়া ইবনু ইসহাক আল-বাজালী তাদের উভয়ের বিরোধিতা করে আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াহইয়া হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি আবূ সালামাহ হতে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আমি বলি: এই বাজালী কর্তৃক এই বিরোধিতাটিকে শাদ্দ (শাযূয) হিসেবে গণ্য করা আমার পক্ষে সম্ভব ছিল; কিন্তু আমাকে তা থেকে বিরত রাখছে এই যে, তার নিচে ইসনাদের দুজন রাবী রয়েছেন:

প্রথমজন: ইবরাহীম ইবনু জাবির: আমি ইবনু আবী হাতিমের ‘আল-জারহ ওয়াত-তা’দীল’ ছাড়া তার কোনো জীবনী পাইনি, এবং তাতে কোনো তাউসীক (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করা হয়নি, তবে তিনি বলেছেন: ‘আমার পিতা এবং আবূ যুর’আহ (রাহিমাহুল্লাহ) তার থেকে বর্ণনা করেছেন।’ আর অন্যজন: ইবনু আদীর শাইখ মুহাম্মাদ ইবনু আহমাদ ইবনু বাখীত: আমি তাকে চিনি না। সুতরাং এই বিরোধিতাকারী সে হতে পারে অথবা তার পূর্বের জন হতে পারে। আল্লাহই ভালো জানেন।

সুতরাং আমার কাছে এই ত্রুটি (ইল্লাল) আরোপ করা ইবনু আল-কাত্তানের ইসহাক ইবনু আবী ইসরাঈলের উপর ত্রুটি আরোপ করার চেয়ে উত্তম - যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে - এবং পূর্বে উল্লেখিত স্থানে তার কারণে হাদীসটিকে যঈফ বলা হয়েছে; তিনি সেখানে - কুরআনের বিষয়ে ইসহাকের ওয়াকফের কারণে তাকে জারহ (ত্রুটিযুক্ত) করার পর - বলেছেন: ‘আমি এই হাদীসটির উল্লেখ সেই অধ্যায়ে আবার করব, যেখানে আমি এমন হাদীসগুলোর কথা উল্লেখ করেছি যার পরে এমন মন্তব্য করা হয়েছে যা সেগুলোর সহীহ হওয়াকে আবশ্যক করে, অথচ ইনশাআল্লাহ সেগুলো সহীহ নয়।’

আর উল্লেখিত অধ্যায়ে তিনি (ইবনু আল-কাত্তান) জানিয়েছেন যে, আব্দুল হক আল-ইশবীলী ইবনু আদীর বর্ণনা থেকে হাদীসটি দুটি উল্লিখিত সনদে উল্লেখ করেছেন: মুরসাল এবং মুসনাদ। এবং তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াহইয়ার নির্ভরযোগ্যতা সম্পর্কে ইবনু আদী, আহমাদ ও আবূ হাতিমের মন্তব্য উল্লেখ করেছেন। ইবনু আল-কাত্তান এর পরে (২/৬৫/১-২) বলেছেন: ‘মনে হচ্ছে তার (আব্দুল হকের) কাছে হাদীসটিতে কোনো ত্রুটি নেই, কারণ তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াহইয়ার নির্ভরযোগ্যতার উপর নির্ভর করেছেন এবং অন্য সব উপেক্ষা করেছেন।’ অতঃপর তিনি তার (আব্দুল হকের) একজন রাবীর নামে যে ভুল হয়েছিল, সে জন্য তাকে ধরেছেন। এর পরে ফটোকপি করা পাণ্ডুলিপিতে একটি ফাঁকা জায়গা রয়েছে, এবং আমার কাছে মনে হয় যে, তিনি এতে আব্দুল হকের নীরবতার সমালোচনা করছেন আনসারী এক ব্যক্তি হতে বর্ণিত মুরসাল সনদটি সম্পর্কে, যাকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবী হিসেবে জানা যায় না। আর তা তার (আব্দুল হকের) বক্তব্য ছাড়া জানা যায় না - অথচ তিনি তা বলেননি - ; অতঃপর তিনি যা বলেছেন তার পাঠ হলো (৬৫/২):

‘কারণ এই আনসারী ব্যক্তিটি বলেনি যে, সে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে দেখেছে, বা তার থেকে শুনেছে। সম্ভবত সে একজন তাবেয়ী, এবং তার অবস্থা মাজহূল (অজ্ঞাত)। আর তার সম্পর্কে এটাই প্রবল ধারণা; কারণ ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর কোনো সাহাবী থেকে বর্ণনা করেননি, তবে তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছিলেন, কিন্তু তার থেকে শোনেননি, বরং তিনি তার থেকে ইরসাল (মুরসাল) করেন। আর আবূ দাঊদ (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসটিকে ‘আল-মারাসীল’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন আমরা যা বললাম তার কারণেই; কারণ তিনি যে সনদটি বর্ণনা করেছেন তা এই ব্যক্তি পর্যন্ত মু’দাল (বিচ্ছিন্ন)। (অতঃপর তিনি তার সনদ বর্ণনা করেন, অতঃপর বলেন:) আর আবূ মুহাম্মাদ (আব্দুল হক) এই দিক থেকে হাদীসটির আলোচনা করেননি। উপরন্তু, ইসহাক ইবনু আবী ইসরাঈল - যদিও তিনি সত্যবাদীদের অন্তর্ভুক্ত এবং যার দিকে লোকেরা একযোগে ঝুঁকেছিল - ...’ তার পূর্বের বক্তব্যের শেষ পর্যন্ত। আর আপনি এর জবাব জেনেছেন।

এই হাদীসটির গবেষণার সারসংক্ষেপ হলো: যে ব্যক্তি এটিকে আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মাওসূলা (সংযুক্ত) করেছে, সে ভুল করেছে। আর এতে যা মাহফূয (সংরক্ষিত) তা হলো: আনসারী ব্যক্তি হতে (বর্ণনা), আর সে মাজহূল (অজ্ঞাত)। এটি মুরসাল, যদি সে তাবেয়ী হয়, আর মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন), যদি সে সাহাবী হয়; কারণ ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর কোনো সাহাবী থেকে শোনেননি। উপরন্তু, তাকে তাদলীসের (সনদ গোপন করার) অভিযোগে অভিযুক্ত করা হয়েছে। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলাই সর্বাধিক অবগত।

ইয়াহইয়া ইবনু আবী কাসীর কর্তৃক আনসারী ব্যক্তি হতে বর্ণনা সম্পর্কে ইবনু আল-কাত্তানের পূর্বের বক্তব্যে - যে আনসারী ব্যক্তিটি সাহাবী হওয়া আবশ্যক নয় - তা আমার সেই মতকে সমর্থন করে, যেখানে আমি আল-হারিস ইবনু ইয়াযীদ আল-হাদরামীর বর্ণনা থেকে সাবিত ইবনু আল-হারিস আল-আনসারীর হাদীসগুলোকে যঈফ বলেছিলাম। আর এই আল-হারিস - যদিও তিনি তাবেয়ী - ; তবুও তার থেকে তার বর্ণনা আনসারী ব্যক্তিটিকে সাহাবী হওয়া আবশ্যক করে না। সুতরাং পূর্বের হাদীসগুলো (৬০৯২, ৬১১৬ ও ৬১১৭) দেখুন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6221)


(يقول الله: أنا اللهُ لا إله إلا أنا كَلِمَتي، من قالها؛ أدخلتُه
جنتي، ومن أدخلته جنتي؛ فقد أمِنَ، والقرآن كلامي، ومني خَرَجَ) .
موضوع.

أخرجه الخطيب في `تاريخ بغدادي (11/225) من طريق أبي حفص
عمر بن محمد بن عيسى السُّذابي: حدثنا الحسن بن عرفة: حدثنا يزيد بن
هارون: حدثنا حماد بن سلمة عن قتادة عن عكرمة عَنْ اِبْنِ عَبَّاسٍ عن النبي صلى الله عليه وسلم
عن جبريل عن الله تعالى قال: … فذكره.
أورده في ترجمة السذابي هذا، وقال:
` وفي بعض حديثه نكرة`.
قلت: ومن فوقه كلهم ثقات؛ فكأنه لذلك قال الذهبي:
`هذا موضوع `. وأقره الحافظ في `اللسان`.
والحديث أورده السيوطي في `الجامع الكبير` من رواية الخطيب ساكتاً عليه
فأساء! لأن الخطيب قد استنكره - كما رأيت - . فهذا من مئات الأدلة التي تدل
الباحث على أن السيوطي في كتابه هذا إنما أراد التقميش، وليس التحقيق
والتفتيش، وقلَّده في ذلك الشيخ محمد المدني في كتابه `الإتحافات السنية في
الأحاديث القدسية`، فقد أورد الحديث فيه (ص 36/231) ساكتاً عليه أيضاً!
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(আল্লাহ বলেন: আমি আল্লাহ, আমি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, এটি আমার কালিমা (বাণী)। যে ব্যক্তি তা বলবে, আমি তাকে আমার জান্নাতে প্রবেশ করাবো। আর যাকে আমি আমার জান্নাতে প্রবেশ করাবো, সে নিরাপদ হয়ে গেল। আর কুরআন আমার কালাম (কথা), এবং তা আমার নিকট থেকেই বের হয়েছে।)
মাওদ্বূ' (জাল)।

এটি আল-খাতীব তাঁর ‘তারীখে বাগদাদ’ (১১/২২৫) গ্রন্থে আবূ হাফস উমার ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু ঈসা আস-সুযাবী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে আল-হাসান ইবনু আরাফাহ হাদীস বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে ইয়াযীদ ইবনু হারূন হাদীস বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি কাতাদাহ হতে, তিনি ইকরিমাহ হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হতে, তিনি জিবরীল (আঃ) হতে, তিনি আল্লাহ তা‘আলা হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

তিনি (খাতীব) এটি এই সুযাবী-এর জীবনীতে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তার কিছু হাদীসে মুনকার (অস্বীকৃত) বিষয় রয়েছে।’

আমি (আলবানী) বলি: তার উপরের সকল রাবীই নির্ভরযোগ্য (সিকাহ); সম্ভবত একারণেই আয-যাহাবী বলেছেন: ‘এটি মাওদ্বূ' (জাল)।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’-এ তা সমর্থন করেছেন।

আর হাদীসটি আস-সুয়ূতী আল-খাতীবের সূত্রে ‘আল-জামি‘উল কাবীর’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং এ বিষয়ে নীরবতা অবলম্বন করে ভুল করেছেন! কারণ আল-খাতীব নিজেই এটিকে মুনকার (অস্বীকৃত) বলেছেন—যেমনটি আপনি দেখলেন। এটি সেই শত শত দলিলের মধ্যে একটি যা গবেষককে প্রমাণ করে যে, আস-সুয়ূতী তার এই কিতাবে কেবল সংগ্রহ (আল-তাক্বমীশ) করতে চেয়েছিলেন, যাচাই-বাছাই (তাহক্বীক্ব) বা অনুসন্ধান (তাফতীশ) নয়।

আর এই ক্ষেত্রে শাইখ মুহাম্মাদ আল-মাদানী তার ‘আল-ইতহাফাতুস সুন্নিয়্যাহ ফিল আহাদীসিল কুদসিয়্যাহ’ গ্রন্থে তাকে (সুয়ূতীকে) অনুসরণ করেছেন। তিনি সেখানেও (পৃ. ৩৬/২৩১) হাদীসটি উল্লেখ করেছেন এবং এ বিষয়ে নীরবতা অবলম্বন করেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6222)


(إنَّ بمكةَ أربعةَ نَفَرٍ من قريشٍ، أَرْبَأُ بهم عن الشركِ، وأرغبُ
لهم في الإسلامِ: عَتَّابُ بنُ أُسَيْدٍ، وجُبَيْرُ بنُ مُطعِمٍ، وحكيمُ بنُ
حزامٍ، وسُهَيْلُ بن عمرٍو)
منكر.

أخرجه الزبير بن بكار في `جمهرة نسب قريش وأخبارها` (362/638) ،
ومن طريقه الحاكم في `المستدرك، (3/595) ، وابن عساكر في `تاريخ دمشق `
(5/253 - 254) عنه قال: حدثني حسين بن سعيد بن هاشم بن سعد من بني
قيس بن ثعلبة قال: حدثني يحيى بن سعيد بن سالم القداح عن أبيه عن ابن
جريج عن عطاء قال: لا أحسبه الا رفعه إلى ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم
ليلة قربه [من] مكة في غزوة الفتح: … فذكره.
قلت: وهذا اسناد ضعيف؛ مسلسل بالعلل:
الأولى: حسين بن سعيد هذا: فإني لم أجد له ترجمة فيما بين يدي من
الكتب.
الثانية: يحيى بن سعيد بن سالم: أورده العقيلي في الضعفاء` (4/404) وقال:
`في حديثه مناكير`.
وأقره الذهبي في `الميزان`، وسقط هذا القول من `اللسان `، وذكر عن
الدارقطني أنه قال:
`ليس بالقوي `.
الثالثة: سعيد بن سالم القداح: مختلف فيه، وأورده الذهبي في `المغني`، وقال:
`صدوق، قال عثمان الدارمي: ليس بذاك `. وقال الحافظ في `التقريب `:
`صدوق يهم `.
الرابعة: عنعنة ابن جريج؛ فإنه معروف بالتدليس.
الخامسة: شَكُّ عطاء في رفعه.
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(নিশ্চয় মক্কায় কুরাইশদের মধ্য থেকে চারজন লোক রয়েছে, যাদেরকে আমি শির্ক থেকে দূরে রাখি এবং তাদের জন্য ইসলামের প্রতি আগ্রহ পোষণ করি: আত্তাব ইবনু উসাইদ, জুবাইর ইবনু মুত'ইম, হাকীম ইবনু হিযাম এবং সুহাইল ইবনু আমর।)
মুনকার।

এটি যুবাঈর ইবনু বাক্কার তাঁর ‘জামহারাতু নাসাবিল কুরাইশ ওয়া আখবারুহা’ (৬৩৮/৩৬২) গ্রন্থে, এবং তাঁর সূত্রে হাকিম তাঁর ‘আল-মুসতাদরাক’ (৩/৫৯৫) গ্রন্থে, এবং ইবনু আসাকির তাঁর ‘তারীখু দিমাশক’ (৫/২৫৩-২৫৪) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।

তাঁর (যুবাঈর ইবনু বাক্কার) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন হুসাইন ইবনু সাঈদ ইবনু হাশিম ইবনু সা'দ, বানু কাইস ইবনু সা'লাবাহ গোত্রের একজন। তিনি বলেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ ইবনু সালিম আল-কাদ্দাহ, তাঁর পিতা থেকে, তিনি ইবনু জুরাইজ থেকে, তিনি আতা থেকে। আতা বলেন: আমি মনে করি না যে তিনি এটিকে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করেছেন, তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মক্কা বিজয়ের রাতে যখন মক্কার নিকটবর্তী হলেন, তখন বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); এটি ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত (মুসালসাল বিল-ইলাল):

প্রথমত: এই হুসাইন ইবনু সাঈদ: আমার কাছে থাকা কিতাবসমূহে আমি তার জীবনী (তারজামা) খুঁজে পাইনি।

দ্বিতীয়ত: ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ ইবনু সালিম: উকাইলী তাকে ‘আয-যুআফা’ (৪/৪০৪) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তার হাদীসে মুনকার (অস্বীকৃত) বিষয় রয়েছে।’ যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে তা সমর্থন করেছেন। এই উক্তিটি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থ থেকে বাদ পড়েছে। আর দারাকুতনী থেকে উল্লেখ করা হয়েছে যে, তিনি বলেছেন: ‘সে শক্তিশালী নয়।’

তৃতীয়ত: সাঈদ ইবনু সালিম আল-কাদ্দাহ: তার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। যাহাবী তাকে ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘সে সত্যবাদী (সাদূক), উসমান আদ-দারিমী বলেছেন: সে তেমন নয়।’ আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সে সত্যবাদী, তবে ভুল করে (ইউহিম্মু)।’

চতুর্থত: ইবনু জুরাইজের ‘আনআনাহ’ (আন শব্দ ব্যবহার করে বর্ণনা); কারণ তিনি তাদলীসের (দোষ গোপন করে বর্ণনা) জন্য পরিচিত।

পঞ্চমত: আতা কর্তৃক হাদীসটিকে মারফূ' করার ব্যাপারে সন্দেহ পোষণ করা।