হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6563)


(السّقط يثقل الله به الميزان، ويكون شافعاً لأبويه يوم القيامة) .
موضوع.

أخرجه الديلمي في `مسند الفردوس` (2/118/2) من طريق أبي نعيم معلقاً بسنده عن الخضر بن أبان: حدثنا أبو هدبة عن أنس بن مالك مرفوعاً.
قلت: وهذا موضوع، آفته أبو هدبة - واسمه: (إبراهيم) - ، كذبه أبو حاتم وغيره، وقال ابن حبان (1/114 - 115) :
`دجال من الدجاجلة، وكان رقاصاً بالبصرة، يدعى الأعراس، فيرقص فيها، فلما كبر، جعل يروي عن أنس، ويضع عليه`.
ولذلك أورد السيوطي الحديث في `ذيل الأحاديث الموضوعة` (ص 200) ، وابن عراق في `تنزيه الشريعة` (2/217) .
وقد روي عن أبي هدبة بلفظ آخر مضى برقم (3322) .




(গর্ভচ্যুত সন্তান দ্বারা আল্লাহ্ মীযানকে ভারী করবেন এবং কিয়ামতের দিন সে তার পিতা-মাতার জন্য সুপারিশকারী হবে।)

মাওদ্বূ (জাল)।

এটি দায়লামী তাঁর ‘মুসনাদুল ফিরদাউস’ গ্রন্থে (২/১১৮/২) আবূ নুআইম-এর সূত্রে মু'আল্লাকভাবে তাঁর সনদসহ খিদর ইবনু আব্বান হতে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে আবূ হুদবাহ আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (জাল)। এর ত্রুটি হলো আবূ হুদবাহ – যার নাম (ইবরাহীম) –। আবূ হাতিম ও অন্যান্যরা তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। আর ইবনু হিব্বান (১/১১৪-১১৫) বলেছেন:
‘সে দাজ্জালদের মধ্যে একজন দাজ্জাল। সে বসরায় নর্তক ছিল। তাকে বিবাহ অনুষ্ঠানে ডাকা হতো এবং সে সেখানে নাচত। যখন সে বৃদ্ধ হলো, তখন সে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে হাদীস বর্ণনা করতে শুরু করল এবং তাঁর নামে জাল হাদীস তৈরি করত।’

এই কারণে সুয়ূতী হাদীসটিকে ‘যাইলুল আহাদীসিল মাওদ্বূ'আহ’ (পৃ. ২০০)-তে এবং ইবনু ইরাক ‘তানযীহুশ শারী'আহ’ (২/২১৭)-তে উল্লেখ করেছেন।

আবূ হুদবাহ হতে অন্য শব্দে এটি বর্ণিত হয়েছে, যা পূর্বে ৩৩২২ নং-এ অতিবাহিত হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6564)


(في آخر الزمان تأتي المرأة حَجلتها، فتجد زوجها قد مسخ قرداً، لأنه لم يؤمن بالقدر) .
منكر.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط` (2/148/2) من طريق حماد بن بحر التستري: ثنا بشار بن قيراط عن أبي مصلح عن عمرو بن دينار عن أبي سعيد الخدري مرفوعاً. وقال:
`لم يروه عن عمرو بن دينار إلا أبو مصلح، تفرد به بشار`.
قلت: وهو متفق على تضعيفه، بل كذبه أبو زرعة. وبه أعله الهيثمي، فقال (7/206) :
`رواه الطبراني في `الأوسط`، وفيه بشار بن قيراط، وهو ضعيف`.
وشيخه أبو مصلح - اسمه: نصر بن مشارس - ، قال الحافظ:
`لين الحديث`.
وحماد بن بحر التستري، الظاهر أنه الرازي المترجم في `الجرح والتعديل`، وروى عن أبيه أنه قال:
`لا أعرفه، شيخ مجهول`.
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(শেষ যামানায় কোনো নারী তার বাসর ঘরে এসে দেখবে যে তার স্বামীকে বানরে রূপান্তরিত করা হয়েছে, কারণ সে তাকদীরের (ভাগ্যের) উপর ঈমান আনেনি)।
মুনকার।

এটি বর্ণনা করেছেন তাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (২/১৪৮/২) হাম্মাদ ইবনু বাহর আত-তুসতারী-এর সূত্রে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন বাশ্শার ইবনু ক্বীরাত্ব, তিনি আবূ মুসলিহ থেকে, তিনি আমর ইবনু দীনার থেকে, তিনি আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে। আর তিনি (তাবারানী) বলেছেন:
‘আমর ইবনু দীনার থেকে আবূ মুসলিহ ব্যতীত অন্য কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর বাশ্শার এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: তার (বাশ্শার ইবনু ক্বীরাত্ব-এর) দুর্বলতার ব্যাপারে সকলে একমত, বরং আবূ যুর’আহ তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। আর এর মাধ্যমেই হাইসামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি (হাইসামী) বলেন (৭/২০৬):
‘এটি তাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এতে বাশ্শার ইবনু ক্বীরাত্ব রয়েছে, আর সে যঈফ (দুর্বল)।’

আর তার শাইখ আবূ মুসলিহ – যার নাম: নাসর ইবনু মুশারিস – তার সম্পর্কে হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে নরম (দুর্বল)।’

আর হাম্মাদ ইবনু বাহর আত-তুসতারী, বাহ্যত সে হলো আর-রাযী, যার জীবনী ‘আল-জারহ ওয়াত-তা’দীল’ গ্রন্থে উল্লেখ আছে। আর তিনি (আল-আলবানী) তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বলেছেন:
‘আমি তাকে চিনি না, সে একজন মাজহূল (অজ্ঞাত) শাইখ।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6565)


(أعتق أو أمسك. قاله لمن صكّ وجه جاريته الراعية، وقد انتزع السبع ضرع شاة صفي) .
منكر بزيادة: `أو أمسك`.

أخرجه عبد الرزاق في `المصنف` (9/175 - 176) عن ابن جريج قال: أخبرني عطاء:
أن رجلا كانت له جارية في غنم ترعاها، وكانت شاة صفي، يعني غزيرة في غنمه تلك، فأراد أن يعطيها نبي الله صلى الله عليه وسلم: فجاء السبع فانتزع ضرعها، فغضب الرجل فصك وجه جاريته، فجاء نبي الله صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، وذكر أنها كانت عليه رقبة مؤمنة وافية، قد هم أن يجعلها إياها حين صكها، فقال له
النبي صلى الله عليه وسلم:
ايتني بها! فسألها النبي صلى الله عليه وسلم:
أتشهدين أن لا إله إلا الله؟
قالت: نعم.
وأن محمدا عبد الله ورسوله؟
قالت: نعم.
وأن الموت والبعث حق؟
قالت: نعم.
وأن الجنة والنار حق؟
قالت: نعم.فلما فرغ قال:
` أعتق أو أمسك؟ `.
قلت:أثبت هذا؟ قال: نعم، وزعموا. وحدثنيه أبو الزبير، فولدت بعد ذلك
في قريش.
قلت: وهذا إسناد مرسل، ضعيف الإسناد، منكر المتن.
أما الإسناد ففيه:
أولاً: هو من رواية إسحاق الدبري عن عبد الرزاق، وفيها مناكير، كما ذكر
الذهبي وغيره. انظر `الميزان` و `المغني` و `اللسان`.
ثانياً: عطاء شيخ ابن جريج فيه، قد ذكر المزي في `التهذيب` أنه روى عن (عطاء بن أبي رباح) ، وهو ثقة مشهور. وعن (عطاء بن السائب) ، وهو ثقة
مختلط، و (عطاء بن أبي مسلم الخراساني) ، وهو صدوق يهم كثيراً، ويرسل كثيراً ويدلس. فأيهم صاحب هذا الحديث يا ترى؟
الذي يبدو لي - والله أعلم - أن مثل هذا الحديث المنكر لا يليق أن ينسب إلى الأول منهم، لثقته وفضله، ما دام أنه يحتمل أن يلصق باللذين دونه. ثم إن الأولى به منهما إنما هو الثالث: (عطاء الخراساني) ، لأني رأيت من الأئمة من
غمز في رواية ابن جريج عنه، فقد جاء في `تهذيب التهذيب`:
`قال أبو بكر بن أبي خيثمة: رأيت في كتاب علي بن المديني: سألت يحيى بن سعيد عن حديث ابن جريج عن عطاء الخراساني؟ فقال: ضعيف. قلت ليحيى: انه يقول: اخبرني؟ قال: لا شئ،كله ضعيف، إنما هو كتاب دفعه إليه`.
قلت: وهذا يشبه روايته عن الزهري مع أنه لم يسمع منه، ففي `التهذيب` (6/405 - 406) :
`وقال قريش بن أنس عن ابن جريج: لم أسمع من الزهري شيئاً، إنما أعطاني جزءاً فكتبته، وأجاز لي`.
وعلقه الذهبي في `السير` (6/332) على ابن جريج بصيغة الجزم. وذكر عن ابن معين أنه قال:
`ابن جريج، ليس بشيء في الزهري`.
وقد وجّه ذلك الذهبي بقوله (6/331) :
`قلت: وكان ابن جريج يروي الرواية بالإجازة، وبالمناولة، ويتوسع في ذلك، ومن ثم دخل عليه الداخل في رواياته عن الزهري، لأنه حمل عنه مناولة، وهذه
الأشياء يدخلها التصحيف، ولا سيما في ذلك العصر لم يكن يحدث في الخط بعدُ شكل ولا نقط`.
هذا، فإذا ترجح أنه: (عطاء الخراساني) ، فيكون مرسلاً ضعيفاً، لضعف مرسله، وإلا، فهو على كل حال ضعيف، لما عرفت من حال رواية الدبري عن عبد الرزاق.
وأما كونه منكر المتن فذلك ظاهر جداً من الزيادات التي جائت فيه، وإليك بيانها:
أولاً: قوله: `أو أمسك`، فإنه منكر، بل باطل، فقد صحي الحديث عن جمع من الصحابة بلفظ: `أعتقها، فإنها مؤمنة`. وقد خرجته في `الصحيحة` في المجلد السابع برقم (3161) ، وأصحها حديث معاوية بن الحكم السلمي (1) من رواية مسلم وأصحاب `الصحاح` من بعده من رواية هلال بن أبي ميمونة عن عطاء بن يسار عنه.
وهو حديث الجارية المعروف بجوابها لسؤال النبي صلى الله عليه وسلم إياها حين سألها: ` أين الله؟ ` فأجابت بقولها: في السماء. فقال صلى الله عليه وسلم لسيدها: `أعتقها، فإنها مؤمنة`.
وقد رددت فيها على يعض المبتدعة المعاصرين الذين صرحوا بتضعيف هذا الحديث، كالشيخ عبد الله الغماري ومقلديه، بل إن بعضهم غلا، فصرح ببطلانه!
ففي بحث مبسط، أرجو أن ييسر لنا نشره قريباً () .
ثانياً وثالثاً: ليس في تلك الأحاديث جملة: (الشاة الصفي، وانتزع السبع
(1) وقد سقطت لفظة بتمامه وخرجته أيضاً في `الإرواء` (2/112 - 113) .
() وقد طبع المجلد السابع بعد وفاة الشيخ رحمه الله تعالى، وهو في ثلاثة أقسام. (الناشر) .
منها الضرع) ، ولا جملة: (الهم) . مما يرجح أن الرواي لم يحفظ القصة، وزاد فيها على الثقات، مما يرجح أنه عطاء الخراساني - كما تقدم - . وهذا، إن سلم من الدبري!
ومع هذا كله، فقد حاول غماري حدث أن يجعل روايى ابن جريج هذه علة قادحة في صحة حديث معاوية بن الحكم المتفق على صحته عند العلماء بعلة الشذوذ، ومخالفة رواية هلال بن أبي ميمونة لرواية ابن جريج هذه! فقد أرسل إليَّّ أحد الطلاب في دمشق خطاباً بتاريخ (1/8/1415) مفاده أنه ظهر فيهم طالب علم تونسي، تبين لهم بعد لأيٍ أنه من تلامذة الشيخ عبد الله الغماري، لكثرة كلامه السيىء في أهل السنة! وطعنه في الأحاديث الصحيحة عندهم - ، كحديث معاوية هذا - ! وتبين من رسالته أن الغماري الحدث سلم سبيل شيخه في المكابرة وقلب الحقائق، وإلا، فهو جاهل لا يدري ما ينطق به فمه، أو يجري به قلمه! وأحلاهما مر! فقد استدل بحديث ابن جريج هذا على بطلان حديث معاوية رضي الله عنه بقوله:
`وابن جريج إمام، فلا يعارضه مثل هلال، وإن تابعه من قيل فيه: صدوق`!
وهذا التعليل - وحده - يدل على حداثة التونسي هذا في هذا العلم الشريف وجهله به، أو أنه كشيخه في المكابرة في قلب الحقائق العلمية وإنكارها، وتفصيل ذلك فيما يلي:
أولاً: لقد نصب الخلاف بين رواية ابن جريج ورواية هلال، موهماً الطلاب أن شيخهما واحد هو: (عطاء بن يسار) ، وبنى على ذلك أن رواية ابن جريج المرسلة أرجح لإمامته!
وجوابي عليه: أن هذا تدليس خبيث، أو جهل فاضح، لأن (عطاء بن يسار)
ليس من شيوخ ابن جريج عند أحد من أهل العلم، وإنما شيخه أحد الثلاثة الذين تقدم ذكرهم، وعلى الراجح هو: (عطاء الخراساني) المضعّف، فلا تعارض بين رواية ابن جريج ورواية هلال، لأن كلاً منهما روى ما لم يرو الآخر، وقد قال الإمام الشافعي رحمه الله:
`ليس الحديث الشاذ أن يروي الثقة ما لم يرو الثقات، وإنما هو أن يروي ما خالف الثقات`.
هذا يقال أولاً.
وثانياً: هب أن شيخهما واحد، وأنه لا بد من الترجيح، فترجيحه مبني على جهله أو تجاهله الكلام الذي في رواية الدبري عن عبد الرزاق - كما تقدم!
وثالثاً: لنفترض أن الرواية عن ابن جريج صحيحة، ولكنها خالية عن متابع أو شاهد، بخلاف رواية هلال، فلها شواهد كثيرة - كما تقدمت الإشارة إلى ذلك - ، بل إن الغماري الصغير قد صرح - كما رأيت - بأن هلالاً له متابع صدوق، فترجيح رواية الثقة على ثقتين - بل على ثقات - هو قلب للحقائق العلمية التي عرف بها
الغماريون تقليداً لشيخهم. والله المستعان.
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(তাকে মুক্ত করে দাও অথবা তাকে রেখে দাও। এই কথাটি তিনি এমন ব্যক্তিকে বলেছিলেন যে তার রাখাল দাসীর মুখে চপেটাঘাত করেছিল, যখন একটি হিংস্র প্রাণী একটি দুধেল ছাগীর স্তন ছিঁড়ে নিয়েছিল।)
মুনকার (অস্বীকৃত/অগ্রহণযোগ্য) এই অতিরিক্ত শব্দটির কারণে: ‘অথবা তাকে রেখে দাও’ (আও আমসিক)।

এটি বর্ণনা করেছেন আব্দুর রাযযাক তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (৯/১৭৫-১৭৬) ইবনু জুরাইজ থেকে। তিনি বলেন: আমাকে আতা (রাহিমাহুল্লাহ) অবহিত করেছেন:
এক ব্যক্তির একটি দাসী ছিল, যে তার ছাগল চরাতো। তার ছাগলের মধ্যে একটি দুধেল ছাগী ছিল, অর্থাৎ প্রচুর দুধ দিত। সে ছাগীটি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দিতে চেয়েছিল। তখন একটি হিংস্র প্রাণী এসে তার স্তন ছিঁড়ে নিয়ে গেল। লোকটি রাগান্বিত হয়ে দাসীটির মুখে চপেটাঘাত করল। অতঃপর সে আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বিষয়টি উল্লেখ করল। সে আরও উল্লেখ করল যে, তার উপর একটি পূর্ণাঙ্গ মুমিন দাস মুক্ত করার দায়িত্ব ছিল, আর চপেটাঘাত করার সময় সে দাসীটিকে মুক্ত করার ইচ্ছা করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন:
তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো! অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন:
তুমি কি সাক্ষ্য দাও যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই?
সে বলল: হ্যাঁ।
আর মুহাম্মাদ আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল?
সে বলল: হ্যাঁ।
আর মৃত্যু ও পুনরুত্থান সত্য?
সে বলল: হ্যাঁ।
আর জান্নাত ও জাহান্নাম সত্য?
সে বলল: হ্যাঁ।
যখন তিনি শেষ করলেন, তখন বললেন:
‘তাকে মুক্ত করে দাও, নাকি তাকে রেখে দাও?’ (আ’তিক আও আমসিক?)
আমি (ইবনু জুরাইজ) বললাম: আপনি কি এটি নিশ্চিত করেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এবং তারা ধারণা করত। আর আবূয যুবাইর আমাকে এটি বর্ণনা করেছেন। এরপর সে (দাসীটি) কুরাইশদের মধ্যে সন্তান প্রসব করেছিল।

আমি (আলবানী) বলছি: এই সনদটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন), সনদটি যঈফ (দুর্বল), এবং মতনটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
সনদের ক্ষেত্রে:
প্রথমত: এটি ইসহাক আদ-দাবরী কর্তৃক আব্দুর রাযযাক থেকে বর্ণিত। আর এতে মুনকার (অস্বীকৃত) বর্ণনা রয়েছে, যেমনটি যাহাবী ও অন্যান্যরা উল্লেখ করেছেন। দেখুন: ‘আল-মীযান’, ‘আল-মুগনী’ এবং ‘আল-লিসান’।
দ্বিতীয়ত: এতে ইবনু জুরাইজের শায়খ আতা (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে, আল-মিযযী ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি (আতা ইবনু আবী রাবাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন, যিনি নির্ভরযোগ্য ও প্রসিদ্ধ। এবং (আতা ইবনুস সাইব) থেকে, যিনি নির্ভরযোগ্য কিন্তু মুখতালাত (স্মৃতিবিভ্রাটগ্রস্ত)। এবং (আতা ইবনু আবী মুসলিম আল-খুরাসানী) থেকে, যিনি সত্যবাদী কিন্তু প্রচুর ভুল করেন, প্রচুর মুরসাল বর্ণনা করেন এবং তাদলীস (দোষ গোপন) করেন। তাহলে এই হাদীসের বর্ণনাকারী তাদের মধ্যে কে?
আমার কাছে যা প্রতীয়মান হয়—আল্লাহই ভালো জানেন—এই ধরনের মুনকার হাদীস তাদের প্রথমজনের দিকে সম্পর্কিত করা উচিত নয়, কারণ তিনি নির্ভরযোগ্য ও মর্যাদাবান। যখন এটি তার চেয়ে নিম্নমানের দুজনের সাথে যুক্ত হওয়ার সম্ভাবনা রাখে। অতঃপর তাদের দুজনের মধ্যে তৃতীয়জনই এর জন্য অধিক উপযুক্ত: (আতা আল-খুরাসানী), কারণ আমি ইমামদের মধ্যে এমন কাউকে দেখেছি যিনি তার থেকে ইবনু জুরাইজের বর্ণনার সমালোচনা করেছেন। যেমন ‘তাহযীবুত তাহযীব’ গ্রন্থে এসেছে:
‘আবূ বকর ইবনু আবী খাইসামাহ বলেছেন: আমি আলী ইবনুল মাদীনীর কিতাবে দেখেছি: আমি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদকে ইবনু জুরাইজ কর্তৃক আতা আল-খুরাসানী থেকে বর্ণিত হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম? তিনি বললেন: যঈফ (দুর্বল)। আমি ইয়াহইয়াকে বললাম: তিনি তো বলেন: ‘আমাকে অবহিত করেছেন’? তিনি বললেন: কিছুই না, পুরোটাই দুর্বল। এটি কেবল একটি কিতাব যা তিনি তাকে দিয়েছিলেন।’
আমি (আলবানী) বলছি: এটি যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে তার বর্ণনার মতোই, যদিও তিনি তার থেকে শোনেননি। ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে (৬/৪০৫-৪০৬) রয়েছে:
‘কুরাইশ ইবনু আনাস ইবনু জুরাইজ থেকে বলেছেন: আমি যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কাছ থেকে কিছুই শুনিনি। তিনি কেবল আমাকে একটি অংশ দিয়েছিলেন, যা আমি লিখেছিলাম এবং তিনি আমাকে (বর্ণনার) অনুমতি দিয়েছিলেন।’
আর যাহাবী ‘আস-সিয়ার’ গ্রন্থে (৬/৩৩২) ইবনু জুরাইজ সম্পর্কে নিশ্চিতভাবে এটি উল্লেখ করেছেন। এবং ইবনু মাঈন থেকে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি বলেছেন: ‘যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে ইবনু জুরাইজ কিছুই নন।’
আর যাহাবী (৬/৩৩১) তাঁর এই কথা দ্বারা এর ব্যাখ্যা দিয়েছেন: ‘আমি (যাহাবী) বলছি: ইবনু জুরাইজ ইজাযাহ (অনুমতি) এবং মুনাওয়ালাহ (হস্তান্তর) পদ্ধতিতে বর্ণনা করতেন এবং এতে তিনি উদারতা দেখাতেন। আর এ কারণেই যুহরী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে তাঁর বর্ণনায় ত্রুটি প্রবেশ করেছে, কারণ তিনি তার থেকে মুনাওয়ালাহ পদ্ধতিতে গ্রহণ করেছিলেন। আর এই বিষয়গুলোতে ভুল হওয়ার সম্ভাবনা থাকে, বিশেষ করে সেই যুগে লেখায় কোনো স্বরচিহ্ন বা নুকতা (ফোটা) ব্যবহার করা হতো না।’
এই হলো অবস্থা। যদি এটি (আতা আল-খুরাসানী) বলে প্রাধান্য পায়, তবে এটি মুরসাল যঈফ হবে, কারণ এর মুরসিল (প্রেরণকারী) দুর্বল। অন্যথায়, এটি সর্বাবস্থায় দুর্বল, কারণ আব্দুর রাযযাক থেকে দাবরীর বর্ণনার অবস্থা আপনি জেনেছেন।
আর মতনটি মুনকার হওয়ার বিষয়টি এতে আসা অতিরিক্ত অংশগুলো থেকে খুবই স্পষ্ট। নিচে তার ব্যাখ্যা দেওয়া হলো:
প্রথমত: তাঁর উক্তি: ‘অথবা তাকে রেখে দাও’ (আও আমসিক), এটি মুনকার, বরং বাতিল। কারণ বহু সংখ্যক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ হাদীসটি এই শব্দে বর্ণিত হয়েছে: ‘তাকে মুক্ত করে দাও, কারণ সে মুমিন।’ আমি এটি ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থের সপ্তম খণ্ডে (হাদীস নং ৩১৬১)-এ সংকলন করেছি। আর সেগুলোর মধ্যে সবচেয়ে সহীহ হলো মু‘আবিয়াহ ইবনুল হাকাম আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস (১), যা মুসলিম ও তার পরবর্তী ‘সহীহ’ গ্রন্থসমূহের সংকলকগণ হিলাল ইবনু আবী মাইমূনাহ কর্তৃক আতা ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি তার থেকে বর্ণনা করেছেন।
এটি সেই দাসীর সুপরিচিত হাদীস, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করেছিলেন: ‘আল্লাহ কোথায়?’ তখন সে উত্তরে বলেছিল: আসমানে। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার মনিবকে বললেন: ‘তাকে মুক্ত করে দাও, কারণ সে মুমিন।’
আমি এতে সেই সমসাময়িক কিছু বিদ‘আতী ব্যক্তির খণ্ডন করেছি, যারা এই হাদীসটিকে যঈফ বলে ঘোষণা করেছে, যেমন শাইখ আব্দুল্লাহ আল-গুমারী ও তার অনুসারীরা। বরং তাদের কেউ কেউ বাড়াবাড়ি করে এটিকে বাতিল বলে ঘোষণা করেছে! একটি সংক্ষিপ্ত গবেষণামূলক প্রবন্ধে, যা আমরা শীঘ্রই প্রকাশ করতে পারব বলে আশা করি ()।
দ্বিতীয়ত ও তৃতীয়ত: সেই হাদীসগুলোতে (দুধেল ছাগী এবং হিংস্র প্রাণী কর্তৃক তার স্তন ছিঁড়ে নেওয়া) বাক্যটি নেই, আর (ইচ্ছার) বাক্যটিও নেই। যা এই বিষয়টিকে প্রাধান্য দেয় যে, বর্ণনাকারী ঘটনাটি মুখস্থ রাখতে পারেননি এবং নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের উপর অতিরিক্ত অংশ যোগ করেছেন, যা এই বিষয়টিকে প্রাধান্য দেয় যে তিনি আতা আল-খুরাসানী—যেমনটি পূর্বে বলা হয়েছে। আর এটি যদি দাবরীর ত্রুটি থেকে মুক্তও থাকে (তবুও)।
(১) একটি শব্দ সম্পূর্ণভাবে বাদ পড়ে গেছে। আমি এটি ‘আল-ইরওয়া’ গ্রন্থেও (২/১১২-১১৩) সংকলন করেছি।
() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মৃত্যুর পর সপ্তম খণ্ডটি প্রকাশিত হয়েছে, যা তিনটি অংশে বিভক্ত। (প্রকাশক)।
এতদসত্ত্বেও, একজন নতুন গুমারী (অনুসারী) ইবনু জুরাইজের এই বর্ণনাটিকে শায (বিরল) হওয়ার ত্রুটির কারণে এবং হিলাল ইবনু আবী মাইমূনাহর বর্ণনা ইবনু জুরাইজের এই বর্ণনার বিপরীত হওয়ার কারণে মু‘আবিয়াহ ইবনুল হাকামের হাদীসের সহীহ হওয়ার ক্ষেত্রে একটি ক্ষতিকর ত্রুটি হিসেবে দাঁড় করানোর চেষ্টা করেছে, যে হাদীসটির সহীহ হওয়ার ব্যাপারে উলামায়ে কিরাম একমত। দামেস্কের একজন ছাত্র ১৪১৫ হিজরীর ১/৮ তারিখে আমার কাছে একটি চিঠি পাঠিয়েছিল, যার সারমর্ম হলো: তাদের মধ্যে একজন তিউনিসীয় ছাত্রের আবির্ভাব হয়েছে, যাকে তারা অনেক চেষ্টার পর শাইখ আব্দুল্লাহ আল-গুমারীর শিষ্য বলে জানতে পেরেছে, কারণ সে আহলুস সুন্নাহ সম্পর্কে প্রচুর খারাপ কথা বলত! এবং তাদের কাছে সহীহ হাদীসসমূহের—যেমন মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীস—সমালোচনা করত! তার চিঠি থেকে জানা যায় যে, এই নতুন গুমারী (অনুসারী) তার শাইখের অহংকার ও সত্যকে উল্টে দেওয়ার পথ অনুসরণ করেছে। অন্যথায়, সে একজন অজ্ঞ ব্যক্তি, যে জানে না তার মুখ দিয়ে কী বের হচ্ছে বা তার কলম কী লিখছে! দুটোর মধ্যে মিষ্টিটিও তিক্ত! সে ইবনু জুরাইজের এই হাদীস দ্বারা মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস বাতিল হওয়ার প্রমাণ দিয়েছে এই বলে:
‘আর ইবনু জুরাইজ একজন ইমাম, তাই হিলালের মতো কেউ তার বিরোধিতা করতে পারে না, যদিও তাকে এমন কেউ অনুসরণ করে যাকে ‘সত্যবাদী’ বলা হয়েছে!’
আর এই কারণ প্রদর্শন—একাই—প্রমাণ করে যে, এই তিউনিসীয় ব্যক্তি এই সম্মানিত জ্ঞানে নতুন এবং এ সম্পর্কে অজ্ঞ, অথবা সে তার শাইখের মতোই বৈজ্ঞানিক সত্যকে উল্টে দেওয়া ও অস্বীকার করার ক্ষেত্রে অহংকারী। এর বিস্তারিত ব্যাখ্যা নিচে দেওয়া হলো:
প্রথমত: সে ইবনু জুরাইজের বর্ণনা ও হিলালের বর্ণনার মধ্যে মতপার্থক্য সৃষ্টি করেছে, ছাত্রদেরকে এই ভ্রম দিয়েছে যে তাদের উভয়ের শাইখ একজনই, তিনি হলেন: (আতা ইবনু ইয়াসার)। এবং এর উপর ভিত্তি করে সে বলেছে যে, ইবনু জুরাইজের মুরসাল বর্ণনাটি তার ইমাম হওয়ার কারণে অধিক শক্তিশালী!
এর জবাবে আমার বক্তব্য হলো: এটি একটি জঘন্য তাদলীস (দোষ গোপন) অথবা চরম অজ্ঞতা, কারণ (আতা ইবনু ইয়াসার) কোনো জ্ঞানীর মতেই ইবনু জুরাইজের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত নন। বরং তার শাইখ হলেন পূর্বে উল্লিখিত তিনজনের মধ্যে একজন, এবং প্রাধান্যপ্রাপ্ত মত অনুযায়ী তিনি হলেন: (আতা আল-খুরাসানী) যিনি দুর্বল। সুতরাং ইবনু জুরাইজের বর্ণনা ও হিলালের বর্ণনার মধ্যে কোনো বিরোধ নেই, কারণ তাদের প্রত্যেকেই এমন কিছু বর্ণনা করেছেন যা অন্যজন বর্ণনা করেননি। আর ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘শায (বিরল) হাদীস তা নয় যে, কোনো নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী এমন কিছু বর্ণনা করবে যা অন্য নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীরা বর্ণনা করেননি। বরং শায হলো তা, যা নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের বিপরীত বর্ণনা করা হয়।’
এই কথাটি প্রথমে বলা হলো।
দ্বিতীয়ত: ধরে নিলাম তাদের উভয়ের শাইখ একজনই এবং অবশ্যই প্রাধান্য দিতে হবে, তাহলে তার প্রাধান্য দেওয়াটা আব্দুর রাযযাক থেকে দাবরীর বর্ণনার মধ্যে যে আলোচনা রয়েছে—যেমনটি পূর্বে বলা হয়েছে—সে সম্পর্কে তার অজ্ঞতা বা উপেক্ষা করার উপর ভিত্তি করে তৈরি হয়েছে!
তৃতীয়ত: ধরে নিই যে ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণিত বর্ণনাটি সহীহ, কিন্তু এতে কোনো মুতাবা‘আত (সমর্থন) বা শাহেদ (সাক্ষ্য) নেই। পক্ষান্তরে হিলালের বর্ণনার বহু শাহেদ রয়েছে—যেমনটি পূর্বে ইঙ্গিত করা হয়েছে—বরং ছোট গুমারী (অনুসারী) নিজেই—যেমনটি আপনি দেখেছেন—স্বীকার করেছে যে হিলালের একজন সত্যবাদী মুতাবা‘আতকারী রয়েছে। সুতরাং একজন নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীর বর্ণনাকে দুজন নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীর—বরং বহু নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীর—উপর প্রাধান্য দেওয়া হলো বৈজ্ঞানিক সত্যকে উল্টে দেওয়া, যা গুমারী অনুসারীরা তাদের শাইখের অন্ধ অনুকরণের মাধ্যমে পরিচিত। আর আল্লাহই সাহায্যকারী।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6566)


(ليس من خلق الله أكثر من الملائكة، ما من شجرة تنبت إلا وملك موكل بها) .
ضعيف.

أخرجه ابن عدي في `الكامل` (3/238) ، وأبو الشيخ في `العظمة` (2/744 - 745) من طريق عبد الغفار بن حسن أبي حازم عن إسرائيل عن أبي يحيى عن مجاهد عن ابن عباس مرفوعاً.
أورده ابن عدي في ترجمة أبي يحيى هذا - وهو: القتات - ، وذكر الخلاف في اسمه، وحكى أقوال الأئمة فيه، وختم ترجمته بقوله:
`وفي حديثه بعض ما فيه، إلا أنه يكتب حديثه`. ولذا قال الحافظ:
`لين الحديث`.
وعبد الغفار بن حسن، ذكره ابن حبان في `الثقات` (8/421) ، وقال ابن أبي حاتم عن أبيه:
`لا بأس به`. وقال الجوزجاني:
`لا يعتبر به`. وقال الأزدي:
`كذاب`!
والشطر الأول من الحديث أخرجه البزار (2/449/2085) من حديث عبد الله بن عمرو موقوفاً عليه. وإسناده صحيح، كما قال الحافظ في `مختصر الزوائد` (2/261 - 262) ، وقال الهيثمي (8/135) :
`رواه البزار، ورجاله رجال الصحيح`.
قلت: فلعل هذا هو أصل الحديث موقوف، رفعه بعض الضعاء. والله أعلم.
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(আল্লাহর সৃষ্টির মধ্যে ফেরেশতাদের চেয়ে বেশি আর কেউ নেই। এমন কোনো বৃক্ষ নেই যা অঙ্কুরিত হয়, কিন্তু তার জন্য একজন ফেরেশতা নিযুক্ত রয়েছে।)
যঈফ (দুর্বল)।

ইবনু আদী এটি বর্ণনা করেছেন ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (৩/২৩৮), এবং আবূশ শাইখ ‘আল-আযামাহ’ গ্রন্থে (২/৭৪৪ - ৭৪৫) আব্দুল গাফফার ইবনু হাসান আবূ হাযিম-এর সূত্রে ইসরাঈল হতে, তিনি আবূ ইয়াহইয়া হতে, তিনি মুজাহিদ হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে।
ইবনু আদী এই আবূ ইয়াহইয়া - যিনি হলেন আল-কাত্তাত - এর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন। তিনি তার নাম নিয়ে মতভেদ উল্লেখ করেছেন এবং তার সম্পর্কে ইমামগণের বক্তব্য বর্ণনা করেছেন। তিনি তার জীবনী শেষ করেছেন এই বলে: ‘তার হাদীসে কিছু দুর্বলতা আছে, তবে তার হাদীস লেখা যেতে পারে।’ এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘হাদীসে নরম (দুর্বল)।’
আর আব্দুল গাফফার ইবনু হাসান-কে ইবনু হিব্বান ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে (৮/৪২১) উল্লেখ করেছেন। ইবনু আবী হাতিম তার পিতা হতে বর্ণনা করেছেন: ‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’ আর আল-জাওযাজানী বলেছেন: ‘তাকে গ্রহণযোগ্য মনে করা হয় না।’ আর আল-আযদী বলেছেন: ‘সে মিথ্যাবাদী!’
আর হাদীসের প্রথম অংশটি আল-বাযযার (২/৪৪৯/২০৮৫) আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হতে মাওকূফ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ সহীহ, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘মুখতাসারুয যাওয়ায়িদ’ গ্রন্থে (২/২৬১ - ২৬২) বলেছেন। আর আল-হাইসামী (৮/১৩৫) বলেছেন: ‘এটি আল-বাযযার বর্ণনা করেছেন এবং এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: সম্ভবত এটিই হাদীসের মূল, যা মাওকূফ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) ছিল, কিন্তু কিছু দুর্বল বর্ণনাকারী এটিকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করে দিয়েছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6567)


(اللهم! أركسهما في الفتنة ركساً، ودُعَّهما إلى النار دعّاً) .
منكر.

أخرجه أحمد (4/421) ، والبزار (2/453/2093) ، وأبو يعلى - كما في `المطالب العالية` (4225) - ، ومن طريقه ابن حبان في `الضعفاء`
(3/101) ، وعنه ابن الجوزي في `الموضوعات` (2/28) من طريق يزيد بن أبي زياد عن سليمان بن عمرو بن الأحوص [عن أبي هلال العكي] عن أبي برزة قال:
كنا مع النبي صلى الله عليه وسلم فسمع صوت غناء، فقال:
`انظروا ما هذا؟ `.
فصعدت فنظرت، فإذا معاوية وعمرو يغنيان، فجئت فأخبرت النبي صلى الله عليه وسلم فقال:....فذكره، والسياق لابن حبان، وليس عنده: (أبو هلال العكي) ، وبه
أعله البزار، فقال عقبه:
`أبو هلال العكي، غير معروف`.
وأعله ابن الجوزي بعلة أخرى، فقال:
`حديث لا يصح، ويزيد بن أبي زياد، كان يلقن في آخر عمره فيلقن، قال علي ويحيى: لا يحتج بحديثه. وقال ابن المبارك: ارم به. وقال ابن عدي: كل رواياته لا يتابع عليها`.
وتعقبه السيوطي في `اللآلي` (1/427) بقوله:
`هذا لا يقتضي الوضع … وله شاهد من حديث ابن عباس....`.
ثم ساقه من رواية الطبراني، ولا يصح الاستشهاد به، لشدة ضعفه، أخرجه في `المعجم الكبير` (11/38/10970) من طريق عيسى بن سوادة النخعي عن ليث عن طاوس عن ابن عباس قال: سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم صوت رجلين … الحديث.
قال الهيثمي في `المجمع` (8/121) :
`رواه الطبراني. وفيه عيسى بن سوادة النخعي، وهو كذاب`.
ولعله خفي على السيوطي حاله، لأنه وقع عنده محرفاً إلى (عيسى بن الأسود النخعي) .
أقول هذا من باب: (التمس لأخيك عذراً) ، وإلا، فالسيوطي متساهل معروف بذلك، ومنه أنه ساق عقبه من رواية ابن قانع في `معجمه` من طريق سعيد (كذا) أبي العباس التيمي: حدثنا سيف بن عمر: حدثني أبو عمر مولى إبراهيم بن طلحة عن زيد بن أسلم عن صالح شقران قال:
بينما نحن ليلة في سفر … الحديث نحوه، لكن فيه:
`فإذا هو معاوية بن رافع، وعمرو بن رفاعة بن التابوت.....`. وزاده في آخره:
`فمات عمرو بن رفاعة قبل أن يقدم النبي صلى الله عليه وسلم من السفر`.
وختم السيوطي كلامه على الحديث بقوله:
`فهذه الرواية أزالت الإشكال، وبينت أن الوهم وقع في الحديث الأول في لفظة واحدة وهي قوله: (ابن العاص) … وإنما هو: (ابن رفاعة) ، أحد المنافقين، وكذلك معاوية بن رافع أحد المنافقين. والله أعلم!
قلت: يقال له: (أثبت العرش ثم انقش) ، فهذه الرواية في الضعف الشديد مثل حديث ابن عباس، يكفي أن فيها: (سيف بن عمر) - وهو: التميمي صاحب `الفتوح` - ، قال الذهبي في `المغني`:
`متروك باتفاق`.
والرواي عنه (سعيد) محرف … صوابه: (شعيب) - هو: ابن إبراهيم - ، ففي ترجمته ساق حديثه هذا ابن عدي في `الكامل` (4/4) وقال:
`ليس بذلك المعروف، ومقدار ما يرويه من الحديث فيه بعض النكرة`. وقال الذهبي:
`هو رواية كتب (سيف) ، فيه جهالة`.
واغتر بكلام السيوطي الشيخ الأعظمي، فقال في تعليقه على `كشف الأستار`:
`والصواب أن الحديث حسن، وأن اللذين كانا ينشدان: معاوية بن رافع وعمرو بن رفاعة، وهما منافقان....`.
وجهل أو تجاهل مانقله ابن الجوزي وغيره عن الأئمة من جرحه، وقول الذهبي في حديثه هذا:
`غريب منكر`.
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(হে আল্লাহ! আপনি তাদের দু'জনকে ফিতনার মধ্যে সম্পূর্ণরূপে নিক্ষেপ করুন এবং তাদের দু'জনকে জাহান্নামের দিকে সজোরে ঠেলে দিন)।
মুনকার।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (৪/৪২১), বাযযার (২/৪৫৩/২০৯৩), এবং আবূ ইয়া'লা—যেমনটি ‘আল-মাতালিবুল আলিয়াহ’ (৪২২৫)-এ রয়েছে—এবং তাঁর (আবূ ইয়া'লার) সূত্রে ইবনু হিব্বান ‘আয-যু'আফা’ (৩/১০১)-এ, এবং তাঁর (ইবনু হিব্বানের) সূত্রে ইবনুল জাওযী ‘আল-মাওদ্বূ'আত’ (২/২৮)-এ ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ-এর সূত্রে সুলাইমান ইবনু আমর ইবনুল আহওয়াস [আবূ হিলাল আল-আক্কী থেকে] আবূ বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন:
আমরা নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তখন তিনি গানের শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: ‘দেখো তো এটা কী?’ আমি উপরে উঠলাম এবং দেখলাম, মু'আবিয়াহ ও আমর গান গাইছে। আমি এসে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জানালাম। তখন তিনি বললেন:.... (উপরে উল্লেখিত দু'আটি) বললেন। বর্ণনাভঙ্গিটি ইবনু হিব্বানের। আর তাঁর (ইবনু হিব্বানের) নিকট (আবূ হিলাল আল-আক্কী) শব্দটি নেই। আর এর মাধ্যমেই বাযযার এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি এর পরপরই বলেছেন:
‘আবূ হিলাল আল-আক্কী, অপরিচিত (গায়রে মা'রূফ)।’
আর ইবনুল জাওযী এটিকে অন্য একটি ত্রুটির কারণে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি বলেছেন:
‘হাদীসটি সহীহ নয়। আর ইয়াযীদ ইবনু আবী যিয়াদ তার জীবনের শেষ দিকে তালকীন (ভুল ধরিয়ে দেওয়া) গ্রহণ করতেন এবং তাকে তালকীন দেওয়া হতো। আলী ও ইয়াহইয়া বলেছেন: তার হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যাবে না। ইবনুল মুবারক বলেছেন: এটি ছুঁড়ে ফেলে দাও। ইবনু আদী বলেছেন: তার সকল বর্ণনার উপর অনুসরণ করা হয় না।’
আর সুয়ূতী ‘আল-লাআলী’ (১/৪২৭)-এ তার (ইবনুল জাওযীর) সমালোচনা করে বলেছেন:
‘এটি মাওদ্বূ' (জাল) হওয়াকে আবশ্যক করে না... আর এর পক্ষে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে....।’
অতঃপর তিনি (সুয়ূতী) এটি ত্বাবারানীর বর্ণনা থেকে উল্লেখ করেছেন। কিন্তু এর দ্বারা প্রমাণ পেশ করা সহীহ নয়, কারণ এটি অত্যন্ত যঈফ (দুর্বল)। তিনি (ত্বাবারানী) এটি ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১১/৩৮/১০৯৭০)-এ ঈসা ইবনু সুওয়াদাহ আন-নাখঈ-এর সূত্রে লাইস থেকে, তিনি তাউস থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি (ইবনু আব্বাস) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'জন লোকের শব্দ শুনতে পেলেন... হাদীসটি।
হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৮/১২১)-এ বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন। আর এতে ঈসা ইবনু সুওয়াদাহ আন-নাখঈ রয়েছে, আর সে হলো কাযযাব (মহা মিথ্যাবাদী)।’
সম্ভবত সুয়ূতীর নিকট তার (ঈসা ইবনু সুওয়াদাহ-এর) অবস্থা গোপন ছিল, কারণ তার নিকট এটি বিকৃত হয়ে (ঈসা ইবনুল আসওয়াদ আন-নাখঈ) রূপে এসেছে। আমি এই কথাটি এই দৃষ্টিকোণ থেকে বলছি যে: (তোমার ভাইয়ের জন্য ওযর তালাশ করো), অন্যথায় সুয়ূতী একজন পরিচিত মুতাসাহিল (শিথিলতাকারী)।
এর প্রমাণ হলো, তিনি (সুয়ূতী) এর পরপরই ইবনু কানি'র ‘মু'জাম’-এর বর্ণনা থেকে সাঈদ (এভাবেই রয়েছে) আবুল আব্বাস আত-তাইমী-এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন: আমাদের নিকট সাইফ ইবনু উমার হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমার নিকট আবূ উমার মাওলা ইবরাহীম ইবনু তালহা হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি যায়দ ইবনু আসলাম থেকে, তিনি সালিহ শুকরান থেকে। তিনি বলেন: এক রাতে আমরা সফরে ছিলাম... হাদীসটি অনুরূপ, কিন্তু এতে রয়েছে:
‘তখন সে ছিল মু'আবিয়াহ ইবনু রাফি' এবং আমর ইবনু রিফা'আহ ইবনু আত-তাবূত.....।’ আর এর শেষে তিনি (সুয়ূতী) যোগ করেছেন:
‘নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সফর থেকে ফিরে আসার আগেই আমর ইবনু রিফা'আহ মারা যান।’
আর সুয়ূতী হাদীসটির উপর তার আলোচনা শেষ করেছেন এই বলে:
‘এই বর্ণনাটি সমস্যা দূর করে দিয়েছে এবং স্পষ্ট করেছে যে, প্রথম হাদীসে একটি মাত্র শব্দে ভুল হয়েছে, আর তা হলো তার (বর্ণনাকারীর) কথা: (ইবনুল আস)... বরং সে হলো: (ইবনু রিফা'আহ), সে ছিল মুনাফিকদের একজন। অনুরূপভাবে মু'আবিয়াহ ইবনু রাফি'ও ছিল মুনাফিকদের একজন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত!’
আমি (আলবানী) বলি: তাকে বলা হবে: (প্রথমে আরশকে মজবুত করো, তারপর নকশা আঁকো)। এই বর্ণনাটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের মতোই অত্যন্ত দুর্বল। এর মধ্যে (সাইফ ইবনু উমার) রয়েছে—আর সে হলো: আত-তামীমী, ‘আল-ফুতূহ’-এর লেখক—এটাই যথেষ্ট। যাহাবী ‘আল-মুগনী’-তে বলেছেন:
‘সর্বসম্মতিক্রমে মাতরূক (পরিত্যাজ্য)।’
আর তার থেকে বর্ণনাকারী (সাঈদ) বিকৃত হয়েছে... এর সঠিক রূপ হলো: (শু'আইব)—তিনি হলেন: ইবনু ইবরাহীম—কারণ তার জীবনীতে ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ (৪/৪)-এ তার এই হাদীসটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘সে তেমন পরিচিত নয়, আর সে যে পরিমাণ হাদীস বর্ণনা করে, তাতে কিছু মুনকারত্ব (অস্বীকৃতি) রয়েছে।’ আর যাহাবী বলেছেন:
‘সে (সাইফ)-এর কিতাবসমূহের বর্ণনাকারী, তার মধ্যে জাহালাত (অজ্ঞাত অবস্থা) রয়েছে।’
আর শাইখ আল-আ'যামী সুয়ূতীর কথায় প্রতারিত হয়েছেন। তিনি ‘কাশফুল আসতার’-এর টীকায় বলেছেন:
‘সঠিক হলো এই যে, হাদীসটি হাসান, আর যে দু'জন গান গাইছিল তারা হলো: মু'আবিয়াহ ইবনু রাফি' এবং আমর ইবনু রিফা'আহ, আর তারা দু'জন ছিল মুনাফিক....।’
আর তিনি (আল-আ'যামী) ইবনুল জাওযী ও অন্যান্য ইমামগণ কর্তৃক বর্ণিত জারহ (দোষারোপ)-কে উপেক্ষা করেছেন বা না জানার ভান করেছেন, এবং এই হাদীস সম্পর্কে যাহাবীর এই উক্তিকে:
‘গরীব মুনকার (অপরিচিত ও অস্বীকৃত)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6568)


(لو أدركني هذا، لأسلم. يعني: سويد بن عامرٍ المصطلقي) .
منكر.

أخرجه البزار (3/4/2105) ، والدولابي في `الكنى` (1/89) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (19/432/1049) من طريق يعقوب بن محمد الزهري: ثنا يزيد بن عمرو بن مسلم الخزاعي: حدثني أبي عن أبيه قال:
كنت عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأنشده قول سويد بن عامر المصطلقي:
لا تأمننَّ وإن أمسيت في حرم إن المنايا بجنبي كل إنسان
واسلك طريقك [تمش] غير مختشع حتى تلاقي ما يمني لم الماني
وكل ذي صاحب يوماً مفارقه وكل زاد وإن أبقيته فامي
والخير والشر مقرونان في قرنٍ كل ذاك يأتيك الجديدان
فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:.... (فذكر الحديث) ، فبكى أبي، فقلت: يا أبتاه! ما يبكيك من مشرك مات في الجاهلية؟ فقال أبي: ما رأيت من مشرك خيراً من سويد.
وعزاه الحافظ في `الإصابة` لابن السكن - أيضاً - وابن شاهين وابن الأعرابي وابن مندة من هذا الوجه، وقال:
`وأشار ابن السكن إلى أن يعقوب بن محمد تفرد به`.
قلت: وسكت عنه، وكأنه لشهرة ضعفه، وقد قال في `التقريب`:
`مشهور، قوَّاه أبو حاتم مع تعنته في الرجال، وضعفه أبو زرعة وغيره، وهو الحق، ما هو بحجة`.
قلت: وشيخه يزيد بن عمرو بن مسلم الخزاعي وأبوه، لم أجد من ترجمهما.
وقال الهيثمي في `المجمع` (8/126) :
`رواه الطبراني والبزار عن يعقوب بن محمد الزهري عن شيخ مجهول، وهو مردود بلا خلاف`.
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(যদি সে আমাকে পেত, তবে সে ইসলাম গ্রহণ করত। অর্থাৎ: সুওয়াইদ ইবনু আমির আল-মুসতালাকী।)
মুনকার (Munkar)।

এটি বর্ণনা করেছেন বাযযার (৩/৪/২১০৫), আদ-দুলাবী তাঁর ‘আল-কুনা’ গ্রন্থে (১/৮৯), এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১৯/৪৩২/১০৪৯) ইয়াকূব ইবনু মুহাম্মাদ আয-যুহরী-এর সূত্রে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াযীদ ইবনু আমর ইবনু মুসলিম আল-খুযাঈ: তিনি বলেন, আমার নিকট বর্ণনা করেছেন আমার পিতা তাঁর পিতা থেকে, যিনি বলেন:
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট ছিলাম। তখন আমি তাঁকে সুওয়াইদ ইবনু আমির আল-মুসতালাকী-এর কবিতা আবৃত্তি করে শোনালাম:
তুমি নিরাপদ মনে করো না, যদিও তুমি পবিত্র স্থানে সন্ধ্যা যাপন করো, নিশ্চয়ই মৃত্যু প্রত্যেক মানুষের পাশে পাশে থাকে।
আর তুমি তোমার পথে চলো [হাঁটো] বিনয়ী না হয়ে, যতক্ষণ না তুমি সেই ভাগ্যলিপির সম্মুখীন হও যা ভাগ্যবিধাতা লিখে রেখেছেন।
আর প্রত্যেক সঙ্গী একদিন তার সাথীকে ছেড়ে যাবে, আর প্রত্যেক পাথেয়, যদিও তুমি তা রেখে দাও, তবুও তা ক্ষণস্থায়ী।
আর কল্যাণ ও অকল্যাণ একই রজ্জুতে বাঁধা, এই সব কিছুই তোমার নিকট নতুন রূপে আসবে।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন:.... (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন), তখন আমার পিতা কেঁদে ফেললেন। আমি বললাম: হে আমার আব্বা! জাহিলিয়্যাতে মৃত্যুবরণকারী একজন মুশরিকের জন্য আপনি কেন কাঁদছেন? তখন আমার পিতা বললেন: আমি সুওয়াইদের চেয়ে উত্তম কোনো মুশরিক দেখিনি।

হাফিয ইবনু হাজার আসকালানী ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে ইবনুস সাকান, ইবনু শাহীন, ইবনুল আ'রাবী এবং ইবনু মান্দাহ-এর দিকেও এই সূত্রেই এর উদ্ধৃতি দিয়েছেন এবং বলেছেন:
‘ইবনুস সাকান ইঙ্গিত করেছেন যে, ইয়াকূব ইবনু মুহাম্মাদ এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: তিনি (হাফিয) এ ব্যাপারে নীরবতা অবলম্বন করেছেন, সম্ভবত তার (ইয়াকূব ইবনু মুহাম্মাদ-এর) দুর্বলতা সুপরিচিত হওয়ার কারণে। আর তিনি (হাফিয) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তিনি (ইয়াকূব ইবনু মুহাম্মাদ) প্রসিদ্ধ, আবূ হাতিম তাকে শক্তিশালী বলেছেন, যদিও তিনি রিজাল (বর্ণনাকারী)-এর ক্ষেত্রে কঠোর ছিলেন। আর আবূ যুর'আহ ও অন্যান্যরা তাকে দুর্বল বলেছেন, আর এটাই সঠিক। তিনি দলীল হিসেবে গ্রহণযোগ্য নন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: আর তার শাইখ ইয়াযীদ ইবনু আমর ইবনু মুসলিম আল-খুযাঈ এবং তার পিতা—আমি তাদের জীবনী খুঁজে পাইনি।
আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৮/১২৬) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ও বাযযার বর্ণনা করেছেন ইয়াকূব ইবনু মুহাম্মাদ আয-যুহরী থেকে একজন মাজহূল (অজ্ঞাত) শাইখ-এর সূত্রে, আর এটি সর্বসম্মতিক্রমে প্রত্যাখ্যাত।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6569)


(كان لا يفسَّرُ شيئاً من القرآن برأيه إلا آيا بعددٍ، علَّمهنّ إياه جبريل) .
ضعيف.

أخرجه أبو يعلى في `مسنده` (8/23/172) من طريق معن القزاز عن فلان ابن محمد بن خالد عن هشام بن عروة عن أبيه عن عائشة مرفوعاً.
وأخرجه البزار (3/39/2185) من طريق محمد بن خالد بن عَثمة: ثنا حفص - أظنه: ابن عبد الله - عن هشام به.
قلت: كذا وقع عندهما، لم ينضبط اسم الراوي عن هشام.
ولذا قال الهيثمي (6/303) :
`رواه أبو يعلى والبزار بنحوه، وفيه راوٍ لم يتحرر اسمه عند واحد منهما، وبقية رجاله رجال الصحيح`.
قلت: قد تحرر اسمه عند غيرهما، فأخرجه ابن جرير في `التفسير` (1/29) من طريق محمد بن يزيد الطرسوسي قال: أخبرنا معن عن جعفر بن خالد به.
وأخرجه من طريق ابن عثمة قال: حدثني جعفر بن محمد الزبيدي قال:
حدثني هشام بن عروة.... فاتفقت هاتان الروايتان على تسمية الرواي عن هشام بـ: (جعفر) ، واختلفتا
في اسم الأب، فمعن سماه: (خالداً) ، وابن عثمة سماه: (محمداً) ، والخطب في هذا سهل، فالأول نسبه لجده، وقد بين ذلك الإمام البخاري فقال في `التاريخ
الكبير` (1/2/189 - 190) :
`جعفر بن خالد بن الزبير بن العوام القرشي الأسدي. قال لي خالد بن مخلد: حدثنا جعفر بن محمد بن خالد بن الزبير....وقال معن: جعفر بن خالد`.
ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً، وكذلك سكت عنه ابن أبي حاتم، بعد أن ذكره برواية الثلاثة: معن بن عيسى، وخالد بن مخلد، وابن عثمة.
وأما ابن حبان فذكره في `الثقات` (6/133) برواية خالد بن مخلد.
وخالفه البخاري فذكره في `الضعفاء`، كما في `المغني` للذهبي، وقال:
`لا يتابع في حديثه`، كما في `الميزان`، وقال:
`قال الأزدي: منكر الحديث`.
وأقره الحافظ في `اللسان`، وزاد عليه ابن حبان في `الثقات`.
وفاتهما قول الطبري - بعد أن بين معنى الحديث وتأويله - (1/30) :
`هذا مع ما في الخبر من العلة التي في إسناده التي لا يجور معها الاحتجاج به لأحد عَلِم صحيح سند الآثار وفاسدها في الدين، لأن راويه ممن لا يعرف في أهل الآثار، وهو: جعفر بن محمد الزبيري`.
وتبعه الحافظ ابن كثير في مقدمة `تفسيره` (1/6) :
`حديث منكر غريب`.
ثم أعله بـ: (جعفر بن محمد الزبيري) ، وقول البخاري المذكور في `الميزان`، وقول الأزدي، وقال:
` وتكلم عليه الإمام أبو جعفر بما حاصله: أن هذه الأبيات مما لا يعلم إلا بالتوقيف عن الله تعالى مما وقفه عليها جبريل. وهذا تأويل صحيح، لو صح الحديث … `.
وأما الشيخ أحمد شاكر فمال رحمه الله إلى تقويته متشبثاً:
أولاً: بأن البخاري لم يذكره في `الضعفاء`.
ُثانياً: ذكر البخاري إياه في `التاريخ` دون جرح أمارةُ توثيق عنده.
ثالثاً: توثيق ابن حبان إياه. قال:
`وهذان - يعني: الآخرين - كافيان في الاحتجاج بروايته`!
قلت: توثيق ابن حبان تساهله معروف، وقد تكلمنا عليه مراراً، والشيخ رحمه الله واسع الخطو في الاعتداد به.
وما ذكره عن عدم جرح البخاري فليس على إطلاقه، لا سيما بالنسبة لكتابه الذي لا نعرفه إلا فيما ينقله العلماء: `الضعفاء الكبير`، وها هو المثال بين يديك، فهذا جعفر، قد أورده في `الضعفاء` - كما تقدم نقله عن الذهبي - ،
والظاهر أن الشيخ لم يقف عليه. ولكن ليس مثل هذا التضعيف مخصصاً بـ `الضعفاء الكبير`، ففي `الضعفاء الصغير` نحوه، ويحضرني الآن مثال واحد، فقد أورده فيه (276/351 - هندية) ، كما أورده في `التاريخ` أيضاً (4/
1/337) ، وهو ثقة. وقد قال فيه أبو حاتم:
`أدخله البخاري في `الضعفاء`، فيحول عنه`.
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(তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরআনের কোনো কিছুর ব্যাখ্যা নিজ রায় দ্বারা করতেন না, তবে নির্দিষ্ট সংখ্যক কিছু আয়াত ব্যতীত, যা জিবরীল (আঃ) তাঁকে শিক্ষা দিয়েছিলেন।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৮/২৩/১৭২) মা'ন আল-কায্যায-এর সূত্রে, তিনি অমুক ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু খালিদ থেকে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।
আর এটি বাযযার (৩/৩৯/২১৮৫) মুহাম্মাদ ইবনু খালিদ ইবনু আছমাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদের নিকট হাফস - আমার ধারণা, তিনি ইবনু আব্দুল্লাহ - বর্ণনা করেছেন, তিনি হিশাম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: তাদের উভয়ের নিকট এভাবেই এসেছে, হিশাম থেকে বর্ণনাকারীর নাম সঠিকভাবে সংরক্ষিত হয়নি।
এ কারণেই হাইছামী (৬/৩০৩) বলেছেন:
‘এটি আবূ ইয়া'লা ও বাযযার অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন। এতে এমন একজন বর্ণনাকারী আছেন যার নাম তাদের কারো নিকটই সুনিশ্চিত হয়নি, তবে এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা সহীহ-এর বর্ণনাকারী।’
আমি (আলবানী) বলি: তাদের ব্যতীত অন্যদের নিকট তার নাম সুনিশ্চিত হয়েছে। ইবনু জারীর তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (১/২৯) মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াযীদ আত-তারসূসী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের মা'ন খবর দিয়েছেন, তিনি জা'ফার ইবনু খালিদ থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
আর তিনি (ইবনু জারীর) ইবনু আছমাহ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাকে জা'ফার ইবনু মুহাম্মাদ আয-যুবাইদী বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাকে হিশাম ইবনু উরওয়াহ বর্ণনা করেছেন....
সুতরাং এই দুটি বর্ণনা হিশাম থেকে বর্ণনাকারীর নাম (জা'ফার) হওয়ার ব্যাপারে একমত হয়েছে, কিন্তু তারা পিতার নাম নিয়ে মতভেদ করেছে। মা'ন তাঁর নাম দিয়েছেন: (খালিদ), আর ইবনু আছমাহ তাঁর নাম দিয়েছেন: (মুহাম্মাদ)। এই বিষয়টি সহজ, কারণ প্রথমজন তাঁকে তাঁর দাদার দিকে সম্পর্কিত করেছেন। ইমাম বুখারী ‘আত-তারীখুল কাবীর’ গ্রন্থে (১/২/১৮৯-১৯০) তা স্পষ্ট করেছেন, তিনি বলেছেন:
‘জা'ফার ইবনু খালিদ ইবনুয যুবাইর ইবনুল 'আওয়াম আল-কুরাশী আল-আসাদী। খালিদ ইবনু মাখলাদ আমাকে বলেছেন: আমাদের নিকট জা'ফার ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু খালিদ ইবনুয যুবাইর বর্ণনা করেছেন.... আর মা'ন বলেছেন: জা'ফার ইবনু খালিদ।’
তিনি (বুখারী) তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি। অনুরূপভাবে ইবনু আবী হাতিমও তাঁর সম্পর্কে নীরবতা অবলম্বন করেছেন, যখন তিনি তাঁকে তিনজনের বর্ণনার মাধ্যমে উল্লেখ করেছেন: মা'ন ইবনু ঈসা, খালিদ ইবনু মাখলাদ এবং ইবনু আছমাহ।
আর ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আছ-ছিক্বাত’ (৬/১৩৩) গ্রন্থে খালিদ ইবনু মাখলাদ-এর বর্ণনার মাধ্যমে উল্লেখ করেছেন।
কিন্তু বুখারী তাঁর বিরোধিতা করেছেন এবং তাঁকে ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, যেমনটি যাহাবী-এর ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে রয়েছে। আর তিনি (বুখারী) বলেছেন: ‘তাঁর হাদীস অনুসরণ করা হয় না’ (অর্থাৎ তিনি মুনকার হাদীস বর্ণনা করেন), যেমনটি ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে রয়েছে। আর তিনি (যাহাবী) বলেছেন: ‘আল-আযদী বলেছেন: তিনি মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীসের বর্ণনাকারী)।’
হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তা সমর্থন করেছেন, যদিও ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আছ-ছিক্বাত’ গ্রন্থে অন্তর্ভুক্ত করেছেন।
তাদের (পূর্বোক্তদের) দৃষ্টি এড়িয়ে গেছে ত্বাবারী-এর উক্তি - হাদীসের অর্থ ও ব্যাখ্যা স্পষ্ট করার পর - (১/৩০):
‘এই হাদীসের সনদে এমন ত্রুটি রয়েছে যার কারণে দ্বীনের ক্ষেত্রে সহীহ ও ফাসিদ (ত্রুটিপূর্ণ) সনদের জ্ঞান রাখে এমন কারো জন্য এটি দ্বারা প্রমাণ পেশ করা বৈধ নয়। কারণ এর বর্ণনাকারী হলেন: জা'ফার ইবনু মুহাম্মাদ আয-যুবাইরী, যিনি হাদীস বিশারদদের মধ্যে পরিচিত নন।’
আর হাফিয ইবনু কাছীর তাঁর ‘তাফসীর’-এর ভূমিকায় (১/৬) তাঁকে অনুসরণ করেছেন: ‘এটি মুনকার গারীব হাদীস।’
অতঃপর তিনি (ইবনু কাছীর) এটিকে (জা'ফার ইবনু মুহাম্মাদ আয-যুবাইরী)-এর কারণে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন এবং ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে উল্লিখিত বুখারী-এর উক্তি ও আযদী-এর উক্তি উল্লেখ করেছেন। তিনি (ইবনু কাছীর) বলেছেন: ‘ইমাম আবূ জা'ফার (ত্বাবারী) এ বিষয়ে আলোচনা করেছেন, যার সারমর্ম হলো: এই আয়াতগুলো এমন বিষয় যা আল্লাহ তা'আলার পক্ষ থেকে ওয়াহী (নির্দেশনা) ব্যতীত জানা যায় না, যা জিবরীল (আঃ) তাঁকে অবহিত করেছিলেন। এই ব্যাখ্যাটি সঠিক, যদি হাদীসটি সহীহ হতো...।’
আর শাইখ আহমাদ শাকির (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে শক্তিশালী করার দিকে ঝুঁকেছিলেন, এই যুক্তিতে যে:
প্রথমত: বুখারী তাঁকে ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেননি।
দ্বিতীয়ত: বুখারী তাঁকে ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে কোনো জারহ (দোষারোপ) ছাড়াই উল্লেখ করেছেন, যা তাঁর নিকট নির্ভরযোগ্যতার একটি চিহ্ন।
তৃতীয়ত: ইবনু হিব্বান তাঁকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। তিনি (আহমাদ শাকির) বলেছেন: ‘এই দুটি (অর্থাৎ শেষোক্ত দুটি) তাঁর বর্ণনা দ্বারা প্রমাণ পেশ করার জন্য যথেষ্ট!’
আমি (আলবানী) বলি: ইবনু হিব্বান-এর নির্ভরযোগ্যতা প্রদান (তাওছীক্ব) যে শিথিল, তা সুবিদিত। আমরা এ বিষয়ে বহুবার আলোচনা করেছি। আর শাইখ (আহমাদ শাকির) (রাহিমাহুল্লাহ) এটি গ্রহণ করার ক্ষেত্রে উদার ছিলেন।
আর বুখারী-এর জারহ না করার বিষয়ে তিনি যা উল্লেখ করেছেন, তা সাধারণভাবে প্রযোজ্য নয়, বিশেষত তাঁর সেই কিতাবের ক্ষেত্রে যা আমরা কেবল উলামাদের উদ্ধৃতির মাধ্যমেই জানি: ‘আয-যু'আফাউল কাবীর’। এই উদাহরণটি আপনার সামনেই রয়েছে: এই জা'ফারকে তিনি ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন - যেমনটি পূর্বে যাহাবী থেকে উদ্ধৃত হয়েছে -।
স্পষ্টতই শাইখ (আহমাদ শাকির) এটি জানতে পারেননি। তবে এই ধরনের দুর্বলতা কেবল ‘আয-যু'আফাউল কাবীর’-এর জন্য নির্দিষ্ট নয়, ‘আয-যু'আফাউস সাগীর’-এও অনুরূপ রয়েছে। এই মুহূর্তে আমার একটি উদাহরণ মনে পড়ছে, তিনি (বুখারী) তাতে (২৭৬/৩৫১ - হিন্দীয়া) তাঁকে উল্লেখ করেছেন, যেমনটি তিনি ‘আত-তারীখ’-এও (৪/১/৩৩৭) উল্লেখ করেছেন, অথচ তিনি (ঐ বর্ণনাকারী) ছিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)। আর আবূ হাতিম তাঁর সম্পর্কে বলেছেন: ‘বুখারী তাঁকে ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে অন্তর্ভুক্ত করেছেন, সুতরাং তাঁর থেকে মুখ ফিরিয়ে নেওয়া হবে।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6570)


(لما نزلت هذه الآية: {وآتِ ذا القُربى حقَّه} ، دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم فاطمة فأعطاها فدك) .
موضوع.

أخرجه البزار (3/55/2223) من طريق أبي يحيى التيمي:
ثنا فضيل بن مرزوق عن عطية عن أبي سعيد قال:....فذكره، وقال:
` لا نعلم رواه إلا أبو سعيد، ولا حدث به عن عطية إلا فضيل. ورواه عن فضيل أبو يحيى، وحميد بن حماد وابن أبي الخوار`.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، عطية - وهو: العوفي - ، ضعيف مدلس تدليساً خبيثاً، كما كنت بينته في المجلد الأول تحت الحديث (24) .
وأبو يحيى التيمي - اسمه: (إسماعيل بن إبراهيم الأحول) - : شيعي، قال الذهبي في `المغني`:
`مجمع على ضعفه`.
لكنه قد توبع من حميد، كما ذكر البزار وغيره - كما يأتي - ، ووقع في `كشف الأستار`: (حميد بن حماد وابن أبي الخوار) ، وأنا أظن أن الواو في: (وابن) مقحمة من بعض النساخ، فإنه (حميد بن حماد بن أبي الخوار) - كما في
`التهذيب` وغيره من كتب الرجال - ، وهو ضعيف، ومن الغريب أن هذا الإقحام نفسه وقع في `مختصر الزوائد` المطبوع (2/90) ، وجاء عقبه قول الحافظ:
`قلت: هما ضعيفان`.
وهذا مما يؤكد الإقحام، لأنه يعني أبا يحيى وحميداً هذا، وإلا، كانوا ثلاثة فتأمل. وعلى الصواب وقع في `تفسير ابن كثير` (3/36) .
وتابعهما سعيد بن خيثم، وهو صدوق، لكن الطريق إليه ليَّن، فقال أبو يعلى في `مسنده` (1075 و 1409) : قرأن على الحسين بن يزيد الطحان هذا الحديث فقال: هو ما قرأن على سعيد بن خيثم عن فضيل به.
والطحان هذا، ليَّن الحديث - كما في `التقريب` - .
وتابعه علي بن عابس عن فضيل به.

أخرجه ابن عدي (5/190) في ترجمة علي هذا وقال:
`يروي أحاديث غرائب، وهو مع ضعفه يكتب حديثه`.
وقال الذهبي في `الميزان` عقب حديثه هذا:
`قلت: هذا باطل، ولو كان وقع ذلك، لما جاءت فاطمة رضي الله عنها تطلب شيئاً هو في حوزتها وملكها، وفيه غير علي من الضعفاء`، كأنه يشير إلى: (عطية) .
وقال الحافظ ابن كثير - بعد أن ساقه من طريق البزار - :
`وهذا الحديث مشكل - لو صح إسناده - ، لأن الآية مكية، و (فدك) إنما فتحت مع خيبر سنة سبع من الهجرة، فكيف يلتئم هذا مع هذا؟ فهو إذن حديث منكر، والأشبه أنه من وضع الرافضة. والله أعلم`.
قلت: وفي كلام الذهبي المتقدم إشارة إلى قصة مجيء فاطمة رضي الله عنها بعد وفاة أبيها صلى الله عليه وسلم إلى أبي بكر الصديق رضي الله عنه تسأله نصيبها مما ترك صلى الله عليه وسلم من خيبر و (فدك) ، واحتج رضي الله عنه بقوله صلى الله عليه وسلم:
`لا نورث، ما تركنا صدقة`.
متفق عليه من حديث عائشة رضي الله عنها، وفي معناه أحاديث، فانظر `الصحيحة` (2038) ، و `مختصر الشمائل` (336 - 342) .
(تنبيه) : لم يعز الهيثمي هذا الحديث في `المجمع` للبزار، وإنما قال (7/49) :
`رواه الطبراني، وفيه عطية العوفي، وهو ضعيف متروك`.
وأنا أظن أن عزوه للطبراني وهم، فإني لم أره في `المعجم الكبير` - وهو المراد عند الإطلاق - ، ولا عزاه إليه أحد كالسيوطي في `الدر` (4/177) ، ولعله أراد أن يقول: `البزار` فسبقه القلم فقال: `الطبراني`! أو: هو من أوهام
النساخ.
وقد عزاه السيوطي للبزار وأبي يعلى وابن أبي حاتم وابن مردويه عن أبي سعيد. ولابن مردويه عن ابن عباس. ولهل ذكر ابن عباس من تخاليطه (عطية) أو من بعض الضعفاء دونه. والله أعلم.
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(যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর আত্মীয়-স্বজনকে তার হক দিয়ে দাও}, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং তাকে ফাদাক প্রদান করলেন।)
মাওদ্বূ (Fabricated/বানোয়াট)।

এটি আল-বাযযার (৩/৫৫/২২২৩) আবূ ইয়াহইয়া আত-তায়মীর সূত্রে বর্ণনা করেছেন:
আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ফুযাইল ইবনু মারযূক, তিনি আতিয়্যাহ হতে, তিনি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে। তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন এবং বললেন:
‘আমরা জানি না যে, আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত অন্য কেউ এটি বর্ণনা করেছেন, আর আতিয়্যাহ হতে ফুযাইল ব্যতীত অন্য কেউ এটি বর্ণনা করেননি। আর ফুযাইল হতে এটি আবূ ইয়াহইয়া, হুমাইদ ইবনু হাম্মাদ এবং ইবনু আবী আল-খাওওয়ার বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। আতিয়্যাহ – তিনি হলেন আল-আওফী – তিনি যঈফ (দুর্বল) এবং খাবীস (নিকৃষ্ট) ধরনের তাদলীসকারী (হাদীস বর্ণনায় ত্রুটি গোপনকারী), যেমনটি আমি প্রথম খণ্ডে ২৪ নং হাদীসের অধীনে স্পষ্ট করেছি।
আর আবূ ইয়াহইয়া আত-তায়মী – তার নাম হলো: (ইসমাঈল ইবনু ইবরাহীম আল-আহওয়াল) – তিনি শিয়া। ইমাম যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তার দুর্বলতার ব্যাপারে ইজমা (ঐকমত্য) রয়েছে।’

কিন্তু হুমাইদ তার মুতাবা‘আত (সমর্থন) করেছেন, যেমনটি আল-বাযযার এবং অন্যান্যরা উল্লেখ করেছেন – যা সামনে আসছে। আর ‘কাশফুল আসতার’ গ্রন্থে এসেছে: (হুমাইদ ইবনু হাম্মাদ এবং ইবনু আবী আল-খাওওয়ার)। আমি মনে করি যে, (ওয়া ইবনু) এর মধ্যে থাকা ‘ওয়াও’ (এবং) অক্ষরটি কোনো কোনো লিপিকারের পক্ষ থেকে অতিরিক্ত সংযোজিত হয়েছে। কারণ তিনি হলেন (হুমাইদ ইবনু হাম্মাদ ইবনু আবী আল-খাওওয়ার) – যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ এবং অন্যান্য রিজাল (রাবী বিষয়ক) গ্রন্থে রয়েছে – আর তিনি যঈফ (দুর্বল)। আশ্চর্যের বিষয় হলো, এই অতিরিক্ত সংযোজনটি মুদ্রিত ‘মুখতাসারুয যাওয়ায়িদ’ (২/৯০) গ্রন্থেও ঘটেছে, এবং এর পরপরই হাফিযের এই উক্তিটি এসেছে:
‘আমি বলি: তারা দু’জনই যঈফ।’
এটি অতিরিক্ত সংযোজনের বিষয়টিকেই নিশ্চিত করে, কারণ তিনি আবূ ইয়াহইয়া এবং এই হুমাইদকেই বুঝিয়েছেন। অন্যথায়, তারা তিনজন হয়ে যেতেন, সুতরাং চিন্তা করুন। আর সঠিকভাবেই এটি ‘তাফসীর ইবনু কাসীর’ (৩/৩৬) গ্রন্থে এসেছে।

সাঈদ ইবনু খাইছামও তাদের মুতাবা‘আত করেছেন, আর তিনি সাদূক (সত্যবাদী), কিন্তু তার নিকট পৌঁছার সনদটি দুর্বল (লায়্যিন)। আবূ ইয়া‘লা তার ‘মুসনাদ’ (১০৭৫ ও ১৪০৯) গ্রন্থে বলেছেন: আমরা হুসাইন ইবনু ইয়াযীদ আত-তাহহানের নিকট এই হাদীসটি পাঠ করলাম, তখন তিনি বললেন: এটিই সেই হাদীস যা আমরা সাঈদ ইবনু খাইছামের নিকট ফুযাইল হতে পাঠ করেছি।
আর এই আত-তাহহান, তার হাদীস দুর্বল (লায়্যিনুল হাদীস) – যেমনটি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে।
আলী ইবনু আবিসও ফুযাইল হতে এই হাদীসটির মুতাবা‘আত করেছেন।

এটি ইবনু আদী (৫/১৯০) এই আলী’র জীবনীতে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘তিনি গারীব (অদ্ভুত) হাদীসসমূহ বর্ণনা করেন, আর তার দুর্বলতা সত্ত্বেও তার হাদীস লেখা যায়।’

ইমাম যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তার এই হাদীসের পরে ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘আমি বলি: এটি বাতিল (অসার)। যদি এমনটি ঘটতো, তাহলে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এমন কিছু চাইতে আসতেন না যা তার দখলে ও মালিকানায় ছিল। আর এতে আলী ব্যতীতও অন্যান্য দুর্বল রাবী রয়েছে,’ – যেন তিনি (আতিয়্যাহ)-এর দিকে ইঙ্গিত করছেন।

হাফিয ইবনু কাসীর (রাহিমাহুল্লাহ) – আল-বাযযারের সূত্রে এটি বর্ণনা করার পর – বলেছেন:
‘এই হাদীসটি সমস্যাযুক্ত – যদি এর সনদ সহীহও হতো – কারণ আয়াতটি মাক্কী (মক্কায় নাযিলকৃত), আর (ফাদাক) খায়বারের সাথে হিজরতের সপ্তম বছরে বিজিত হয়েছিল। তাহলে কিভাবে একটির সাথে অন্যটি সামঞ্জস্যপূর্ণ হতে পারে? সুতরাং এটি একটি মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস, আর সম্ভবত এটি রাফিযীদের (শিয়াদের) বানানো। আল্লাহই ভালো জানেন।’

আমি (আলবানী) বলি: ইমাম যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পূর্বোক্ত বক্তব্যে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর তার পিতা (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মৃত্যুর পর আবূ বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে খায়বার ও (ফাদাক) থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা রেখে গেছেন, তার অংশ চাওয়ার ঘটনার দিকে ইঙ্গিত রয়েছে। আর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তি দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছিলেন:
‘আমরা উত্তরাধিকারী হই না, আমরা যা রেখে যাই তা সাদাকাহ (দান)। ’
এটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হতে মুত্তাফাকুন আলাইহি (সহীহ বুখারী ও মুসলিম সম্মত)। এই অর্থে আরো হাদীস রয়েছে, সুতরাং ‘আস-সহীহাহ’ (২০৩৮) এবং ‘মুখতাসারুশ শামাইল’ (৩৩৬-৩৪২) দেখুন।

(সতর্কতা): আল-হাইছামী এই হাদীসটিকে ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে আল-বাযযারের দিকে সম্পর্কিত করেননি, বরং তিনি (৭/৪৯) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এতে আতিয়্যাহ আল-আওফী রয়েছেন, আর তিনি যঈফ (দুর্বল) ও মাতরূক (পরিত্যক্ত)। ’
আমি মনে করি যে, ত্বাবারানীর দিকে তার এই সম্পর্কীকরণটি ভুল। কারণ আমি এটিকে ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ – যা সাধারণভাবে উদ্দেশ্য করা হয় – তাতে দেখিনি, আর আস-সুয়ূতী ‘আদ-দুরর’ (৪/১৭৭) গ্রন্থেও এটিকে তার (ত্বাবারানীর) দিকে সম্পর্কিত করেননি। সম্ভবত তিনি ‘আল-বাযযার’ বলতে চেয়েছিলেন, কিন্তু কলম ফসকে গিয়ে ‘ত্বাবারানী’ বলে ফেলেছেন! অথবা এটি লিপিকারদের ভুলের অন্তর্ভুক্ত।
আস-সুয়ূতী এটিকে আল-বাযযার, আবূ ইয়া‘লা, ইবনু আবী হাতিম এবং ইবনু মারদাওয়াইহ হতে আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে সম্পর্কিত করেছেন। আর ইবনু মারদাওয়াইহ হতে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রেও সম্পর্কিত করেছেন। সম্ভবত ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উল্লেখটি (আতিয়্যাহ)-এর ভুল মিশ্রণের অন্তর্ভুক্ত, অথবা তার চেয়ে নিম্নমানের কোনো দুর্বল রাবীর ভুল। আল্লাহই ভালো জানেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6571)


(في قول الله: {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} قال: لو أن رجلاً همَّ فيه (يعني: المسجد الحرام) بسيئة وهو بـ (عدن أبين) ، لأذاقه الله عذاباً أليماً) .
موقوف.

أخرجه أحمد (1/428 و 451) ، والبزار (3/60/2236 - الكشف) ، وأبو يعلى (9/5384) ، والطيري (17/104) ، والحاكم (2/388) من طريق يزيد بن هارون: أبنا شعبة عن السدي عن مرة عن عبد الله - قال
شعبة: رفعه، وأنا لا أرفعه.
كذا قالوا جميعاً، إلا الحاكم فليس عنده: ` وأنا لا أرفعه`. وقال:
`صحيح على شرط مسلم`. ووافقه الذهبي.
وقال ابن كثير عقب عزوه إياه لابن أبي حاتم وأحمد:
`قلت: هذا الإسناد صحيح على شرط البخاري، ووقفه أشبه من رفعه، ولهذا صمم شعبة على وقفه من كلام ابن مسعود، وكذلك رواه أسباط وسفيان الثوري عن السدي عن مرة عن ابن مسعود موقوفاً. والله أعلم`.
قلت: رواية الثوري أسندها الطبري والحاكم من طريقين عنه به موقوفاً. ولفظ الطبري:
` ما من رجل يهم بسيئة، فتكتب عليه، ولو أن رجلاً بـ (عدن أبين) همّ أن يقتل رجلاً بهذا البيت، لأذاقه الله من العذاب الأليم`.
وذكره السيوطي في `الدر` (4/351) من رواية سعيد بن منصور والطبراني عن ابن مسعود موقوفاً بلفظ:
`من هم بخطيئة لم يعملها في سوى البيت، لم تكتب عليه حتى يعملها، ومن هم بخطيئة في البيت، لم يمته الله من الدنيا حتى يذيقه من عذاب أليم`.
وسكت السيوطي عنه، فما أحسن! فإنه عند الطبراني (9/253/9078) من طريق الحكم بن ظُهير عن السدي به.
وابن ظهير هذا، متروك - كما قال الهيثمي (7/70) ، والحافظ في `التقريب` - ،
فالعمدة على رواية الثوري المتقدمة. ولا سيما وقد تابعه أسباط - وهو: ابن نصر الهمداني - ، وهو صدوق كثير الخطأ من رجال مسلم، فيستشهد به، ولكني لم أجد الآن من أسنده عنه، ومهما يكن من أمر، فما قاله ابن كثير: إن الوقف أشبه. هو المختار، وقد أشار إلى ذلك الحافظ في `الفتح` (11/328) .
وأما قول ابن كثير في الإسناد المرفوع:
` إنه على شرط البخاري`!
فهو خطأ، لعله سبق قلم منه، وإن سكت عليه الشيخ أحمد شارك رحمه الله (6/65 - 66) ، والصواب أنه على شرط مسلم - كما قال الحاكم - لولا الوقف، فإن: (السدي) - وهو: الكبير، واسمه: إسماعيل بن عبد الرحمن - ، لم يخرج له
البخاري، على أنه قد ضعف، وأوده الذهبي في `المتكلم فيهم بما لا يوجب الرد`، وقال (69/36) :
`روى له مسلم متابعة، وثقه بعضهم، وقال أبو حاتم: لا يحتج به (1) ، وقال أبو زرعة: لين`. وقال الحافظ في `التقريب`:
`صدوق يهم`.
إذا عرفت ما سلف، فقد تعقب الشيخ أحمد كلام ابن كثير المتقدم بقوله:
وهذا تحكم من شعبة ثم من ابن كثير، وكلمة يزيد بن هارون التي رواها ابن أبي حاتم كلمة حكيمة، وإشارة دقيقة، يريد أن شعبة قد حكى رفعه عن شيخه، فهو قد رفعه رواية، وإن وقفه رأياً، والرفع زيادة من ثقة، فتقبل، ونحن نأخذ عن
() الأصل: `بقوله`، والتصحيح من `الجرح والتعديل` (1/1/185) ، و `المغني`.
الرواي روايته، ولا نتقيد برأيه، وأما أن غير شعبة رواه موقوفاً، فلا يكون علة للمرفوع، والرفع زيادة ثقة، كما قلنا`.
قلت: وهذا كلام وجيه من عالم تحرير، إلا أن قوله: `والرفع زيادة من ثقة فتقبل` ليس على إطلاقه عند الحفاظ النقاد - كما هو محقق في علم المصطلح - ، وإن كان الشيخ رحمه الله مال في تعليقه على `اختصار علوم الحديث` لابن كثير (ص 67 - 68) أنها مقبولة على الإطلاق، ولا يخفى على المحققين في هذا العلم الشريف ما في ذلك من تعطيل نوع هام من علوم الحديث، وهو (الحديث الشاذ) الذي ذكروا في تعريفه قول الإمام الشافعي:
` هو أن يروي الثقة حديثاً يخالف ما روى الناس، وليس من ذلك أن يروي ما لم يروه غيره`.
وعلى هذا قامت كتب (العلل) مثل: كتاب ابن أبي حاتم، وكتاب الدارقطني وغيرهما من الحفاظ، فكم من أحاديث رواها الثقات أعلوها بمخالفتهم لم هو أحفظ أو أوثق أو أكثر عدداً! وهذا مما لا مناص منه لكل باحث عارف نقاد، وكأن الشيخ رحمه الله شعر بهذا في نهاية تعليقه المشار إليه، فختمه بقوله:
`نعم، قد يتبين للناظر المحقق من الأدلة والقرائن القوية أن الزيادة التي زادها الرواي الثقة زيادة شاذة، أخطأ فيها، فهذا له حكمه، وهو من النادر الذي لا تبنى عليه القواعد`!
قلت: ولذلك، فإني أقول:
إن زيادة الرفع هنا شاذة غير مقبولة، للأسباب التالية:
الأول: أن شعبة الذي روى الرفع عن شيخه (السدي) ، لو أنه شك صراحة في الرفع، لكان ذلك من دواعي التوقف في قبول الرفع، فكيف وهو يقول: `وأنا لا أرفعه`؟! فينبغي على الباحث المحقق أن يقف قليلاً، ويتسائل عن السبب الذي حمل شعبة عليه، فإن مما لا شك فيه عارف بفضل شعبة وإمامته في هذا العلم أنه ما كان ليقول ذلك، لولا أنه بدا له شيء من الشك في رفع شيخه للحديث، فأوقفه هو من عنده، خشية أن يقول على رسول الله صلى الله عليه وسلم ما لم يقل، ولعل من ذلك الضعف الذي في شيخه - كما سبق الإشارة إليه - .
الثاني: لو أن شعبة لم يوقفه، وروى الحديث عن شيخه مرفوعاً على الجادة ثم خالفه سفيان الثوري فأوقفه - كما تقدم - ، لكان الوقف هو الراجح، لأن سفيان أحفظ من شعبة اتفاقاً، وباعتراف شعبة نفسه، فكيف وقد أوقفه أسباط بن نصر أيضاً؟ فكيف وقد جزم به شعبة؟!
الثالث: مخالفة الرفع لعموم الأحاديث القاطعة بأنه لا مؤاخذة على الهم بالسيئة، وإنما على العمل بها، وهي كثيرة معروفة، منها قوله صلى الله عليه وسلم: `إن الله تجاوز عن أمتي ما حدثت به أنفسها، ما لم تتكلم أو تعمل به`.
متفق عليه، وهو مخرج في `الإرواء` (2062) .
ولذلك اختار الإمام الطبري في تفسير الآية أن المراد بها المعصية، فقال بعد أن ساق الأقوال في تفسيرها، ومنها حديث ابن مسعود مرفوعاً وموقوفاً:
`فتأويل الكلام: ومن يرد في المسجد الحرام بأن يميل بظلم، فيعصي الله فيه، نذقه يوم القيامة من عذاب موجع له`.
فقوله: `فيعصي الله فيه`..فيه إشارة قوية إلى عدم اعتداده بالمرفوع من
الحديث، فهو موافق لتصريح ابن كثير المتقدم بأن وقفه أشبه. وهذا هو الذي بدا لي في هذا التخريج. والله ولي التوفيق، وهو الهادي إلى أقوم طريق.
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(আল্লাহর বাণী: {وَمَنْ يُرِدْ فِيهِ بِإِلْحَادٍ بِظُلْمٍ نُذِقْهُ مِنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ} [অর্থ: আর যে ব্যক্তি সেখানে (হারাম শরীফে) যুলুমের মাধ্যমে বক্রতা অবলম্বন করতে চাইবে, আমি তাকে আস্বাদন করাবো কঠিন শাস্তি] সম্পর্কে তিনি বলেন: যদি কোনো ব্যক্তি তাতে (অর্থাৎ: মাসজিদুল হারামে) কোনো পাপের ইচ্ছা করে, আর সে (আদন আবইয়ান)-এও থাকে, তবুও আল্লাহ তাকে কঠিন শাস্তি আস্বাদন করাবেন।)
মাওকূফ।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (১/৪২৮ ও ৪৫১), বাযযার (৩/৬০/২২৩৬ - আল-কাশফ), আবূ ইয়া'লা (৯/৫৩৮৪), ত্বাবারী (১৭/১০৪), এবং হাকিম (২/৩৮৮) ইয়াযীদ ইবনু হারূন-এর সূত্রে: তিনি শু'বাহ থেকে, তিনি আস-সুদ্দী থেকে, তিনি মুররাহ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন— শু'বাহ বলেন: তিনি এটিকে মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) করেছেন, কিন্তু আমি এটিকে মারফূ' করি না।
তারা সবাই এভাবেই বলেছেন, তবে হাকিম-এর বর্ণনায় `وأنا لا أرفعه` (আমি এটিকে মারফূ' করি না) অংশটি নেই। তিনি (হাকিম) বলেন: 'এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।' যাহাবীও তার সাথে একমত পোষণ করেছেন।
ইবনু আবী হাতিম ও আহমাদ-এর দিকে এর উদ্ধৃতি দেওয়ার পর ইবনু কাসীর বলেন:
'আমি বলি: এই ইসনাদটি বুখারীর শর্তানুযায়ী সহীহ, তবে এটিকে মারফূ' করার চেয়ে মাওকূফ (আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি হিসেবে) হওয়াটাই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ। এই কারণেই শু'বাহ এটিকে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি হিসেবে মাওকূফ হওয়ার উপর দৃঢ় ছিলেন। অনুরূপভাবে আসবাত এবং সুফইয়ান আস-সাওরীও আস-সুদ্দী থেকে, তিনি মুররাহ থেকে, তিনি ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।'
আমি (আলবানী) বলি: সাওরী-এর বর্ণনাটি ত্বাবারী ও হাকিম তার থেকে দুটি সূত্রে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। ত্বাবারীর শব্দগুলো হলো:
'এমন কোনো ব্যক্তি নেই যে পাপের ইচ্ছা করে, আর তা তার উপর লেখা হয়, কিন্তু যদি কোনো ব্যক্তি (আদন আবইয়ান)-এ থেকেও এই ঘরের (কা'বার) মধ্যে কোনো ব্যক্তিকে হত্যা করার ইচ্ছা করে, তবে আল্লাহ তাকে কঠিন শাস্তি আস্বাদন করাবেন।'
সুয়ূতী এটিকে 'আদ-দুর্র' (৪/৩৫১)-এ সাঈদ ইবনু মানসূর ও ত্বাবারানীর সূত্রে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ হিসেবে এই শব্দে উল্লেখ করেছেন:
'যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহ ব্যতীত অন্য কোথাও কোনো পাপের ইচ্ছা করে কিন্তু তা করে না, তা তার উপর লেখা হয় না যতক্ষণ না সে তা করে। আর যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহর মধ্যে কোনো পাপের ইচ্ছা করে, আল্লাহ তাকে দুনিয়া থেকে মৃত্যু দেন না যতক্ষণ না তিনি তাকে কঠিন শাস্তি আস্বাদন করান।'
সুয়ূতী এ সম্পর্কে নীরবতা অবলম্বন করেছেন, যা কতই না উত্তম! কারণ এটি ত্বাবারানীর (৯/২৫৩/৯০৭৮) নিকট আল-হাকাম ইবনু যুহাইর-এর সূত্রে আস-সুদ্দী থেকে বর্ণিত। আর এই ইবনু যুহাইর 'মাতরূক' (পরিত্যক্ত) - যেমনটি বলেছেন হাইসামী (৭/৭০) এবং হাফিয 'আত-তাকরীব'-এ।
সুতরাং, পূর্বোক্ত সাওরী-এর বর্ণনাটিই নির্ভরযোগ্য। বিশেষত যখন আসবাত— যিনি ইবনু নাসর আল-হামদানী— তাকে সমর্থন করেছেন। তিনি মুসলিমের রিজালদের অন্তর্ভুক্ত 'সাদূকুন কাসীরুল খাতা' (সত্যবাদী তবে প্রচুর ভুলকারী), তাই তার দ্বারা শাহেদ (সমর্থক) পেশ করা যেতে পারে। তবে আমি এখন তার থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা খুঁজে পাইনি। যাই হোক না কেন, ইবনু কাসীর যা বলেছেন যে, 'মাওকূফ হওয়াটাই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ', সেটিই মনোনীত (আল-মুখতার)। হাফিয 'আল-ফাতহ' (১১/৩২৮)-এও সেদিকে ইঙ্গিত করেছেন।
আর মারফূ' ইসনাদ সম্পর্কে ইবনু কাসীরের এই উক্তি যে, 'এটি বুখারীর শর্তানুযায়ী!'— এটি ভুল। সম্ভবত এটি তার কলমের ভুল (সাবকু ক্বালাম) ছিল, যদিও শাইখ আহমাদ শাকির (রাহিমাহুল্লাহ) (৬/৬৫-৬৬) এ বিষয়ে নীরব ছিলেন। সঠিক হলো যে, এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী— যেমনটি হাকিম বলেছেন— যদি না মাওকূফ হতো। কারণ (আস-সুদ্দী)— যিনি হলেন আল-কাবীর (বড়), তার নাম ইসমাঈল ইবনু আব্দুর রহমান— বুখারী তার থেকে কোনো হাদীস বর্ণনা করেননি। উপরন্তু, তাকে দুর্বলও বলা হয়েছে। যাহাবী তাকে 'আল-মুতাকাল্লাম ফীহিম বিমা লা ইউজিবুর রদ্দ' (যাদের সম্পর্কে এমন কথা বলা হয়েছে যা তাদের প্রত্যাখ্যান আবশ্যক করে না)-এর অন্তর্ভুক্ত করেছেন এবং বলেছেন (৬৯/৩৬): 'মুসলিম তার থেকে মুতাবা'আত (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। কেউ কেউ তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন। আবূ হাতিম বলেছেন: তার দ্বারা প্রমাণ পেশ করা যাবে না (১)। আর আবূ যুর'আহ বলেছেন: তিনি নরম (দুর্বল)।' হাফিয 'আত-তাকরীব'-এ বলেছেন: 'সাদূকুন ইয়াহুম্মু' (সত্যবাদী তবে ভুল করেন)।
যখন আপনি পূর্বের বিষয়গুলো জানতে পারলেন, তখন শাইখ আহমাদ (শাকির) ইবনু কাসীরের পূর্বোক্ত বক্তব্যের সমালোচনা করে বলেন:
'এটি শু'বাহর পক্ষ থেকে, অতঃপর ইবনু কাসীরের পক্ষ থেকে এক ধরনের স্বেচ্ছাচারিতা। ইবনু আবী হাতিম ইয়াযীদ ইবনু হারূন থেকে যে কথাটি বর্ণনা করেছেন, তা একটি প্রজ্ঞাপূর্ণ কথা এবং সূক্ষ্ম ইঙ্গিত। তিনি বোঝাতে চেয়েছেন যে, শু'বাহ তার শাইখ থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন, সুতরাং তিনি বর্ণনাগতভাবে এটিকে মারফূ' করেছেন, যদিও মত হিসেবে এটিকে মাওকূফ করেছেন। আর 'আর-রাফ' (মারফূ' করা) হলো বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকে অতিরিক্ত সংযোজন, তাই তা গ্রহণযোগ্য। আমরা বর্ণনাকারীর বর্ণনা গ্রহণ করব, তার মতের দ্বারা সীমাবদ্ধ থাকব না। আর শু'বাহ ব্যতীত অন্য কেউ এটিকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন— এটি মারফূ' হওয়ার জন্য ত্রুটি (ইল্লাহ) হতে পারে না। যেমনটি আমরা বলেছি, 'আর-রাফ' হলো বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীর অতিরিক্ত সংযোজন।'
(১) মূল পাণ্ডুলিপিতে ছিল: `بقوله` (বিক্বাওলিহি), আর 'আল-জারহ ওয়াত-তা'দীল' (১/১/১৮৫) এবং 'আল-মুগনী' থেকে সংশোধন করা হয়েছে।
আমি (আলবানী) বলি: একজন স্বাধীনচেতা আলেমের পক্ষ থেকে এটি একটি যুক্তিযুক্ত কথা, তবে তার এই উক্তি যে, 'আর 'আর-রাফ' হলো বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীর অতিরিক্ত সংযোজন, তাই তা গ্রহণযোগ্য'— মুহাদ্দিসীন সমালোচকদের নিকট এটি শর্তহীনভাবে প্রযোজ্য নয়— যেমনটি উসূলুল হাদীসের জ্ঞানে প্রমাণিত। যদিও শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু কাসীরের 'ইখতিসার উলূমিল হাদীস'-এর টীকায় (পৃ. ৬৭-৬৮) এই দিকে ঝুঁকেছেন যে, এটি শর্তহীনভাবে গ্রহণযোগ্য। কিন্তু এই সম্মানিত জ্ঞানের গবেষকদের নিকট এটি গোপন নয় যে, এর মধ্যে হাদীস শাস্ত্রের একটি গুরুত্বপূর্ণ প্রকারকে অকার্যকর করে দেওয়া হয়, আর তা হলো (শায হাদীস)। যার সংজ্ঞায় তারা ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উক্তি উল্লেখ করেছেন:
'তা হলো এই যে, কোনো বিশ্বস্ত বর্ণনাকারী এমন হাদীস বর্ণনা করবে যা অন্যরা যা বর্ণনা করেছে তার বিপরীত, তবে এমন বর্ণনা নয় যা অন্য কেউ বর্ণনা করেনি।'
আর এর উপর ভিত্তি করেই (আল-ইলাল) ত্রুটি সংক্রান্ত গ্রন্থসমূহ প্রতিষ্ঠিত হয়েছে, যেমন: ইবনু আবী হাতিম-এর কিতাব, দারাকুতনী-এর কিতাব এবং অন্যান্য হাফিযদের কিতাব। কতই না হাদীস রয়েছে যা বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীরা বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তারা সেগুলোকে ত্রুটিযুক্ত করেছেন, কারণ তারা তাদের চেয়ে অধিক হাফিয, অধিক বিশ্বস্ত বা সংখ্যায় অধিক বর্ণনাকারীর বিরোধিতা করেছেন! এটি এমন বিষয় যা প্রতিটি জ্ঞানী ও সমালোচক গবেষকের জন্য অপরিহার্য। আর মনে হয় শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) তার উল্লিখিত টীকার শেষে এটি উপলব্ধি করতে পেরেছিলেন, তাই তিনি তা এই কথা দিয়ে শেষ করেছেন:
'হ্যাঁ, শক্তিশালী প্রমাণ ও ইঙ্গিত দ্বারা গবেষক পর্যবেক্ষকের নিকট স্পষ্ট হতে পারে যে, বিশ্বস্ত বর্ণনাকারী যে অতিরিক্ত সংযোজন করেছেন, তা একটি শায (বিরল) সংযোজন, যেখানে তিনি ভুল করেছেন। এর বিধান ভিন্ন, আর এটি বিরল ঘটনা, যার উপর ভিত্তি করে মূলনীতি তৈরি করা যায় না!'
আমি (আলবানী) বলি: এই কারণে আমি বলছি:
নিশ্চয়ই এখানে 'আর-রাফ' (মারফূ' হিসেবে উন্নীত করার) অতিরিক্ত সংযোজনটি শায (বিরল) এবং অগ্রহণযোগ্য। এর কারণগুলো নিম্নরূপ:
প্রথমত: শু'বাহ, যিনি তার শাইখ (আস-সুদ্দী) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন, যদি তিনি স্পষ্টভাবে মারফূ' হওয়ার ব্যাপারে সন্দেহ করতেন, তবে তা মারফূ' গ্রহণ না করার কারণ হতো। তাহলে তিনি যখন বলছেন: 'আর আমি এটিকে মারফূ' করি না'— তখন কী হবে?! সুতরাং গবেষক পর্যবেক্ষকের উচিত সামান্য থেমে যাওয়া এবং শু'বাহকে কিসের কারণে এটি করতে বাধ্য করেছে, তা নিয়ে প্রশ্ন করা। এই জ্ঞানের ক্ষেত্রে শু'বাহর মর্যাদা ও ইমামত সম্পর্কে যিনি জানেন, তার নিকট এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, তিনি এমনটি বলতেন না, যদি না তার শাইখের হাদীসটিকে মারফূ' করার ব্যাপারে তার মনে কোনো সন্দেহ দেখা দিত। তাই তিনি নিজ থেকে এটিকে মাওকূফ করে দিয়েছেন, এই ভয়ে যে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যা বলেননি, তা যেন তাঁর উপর আরোপ না করেন। সম্ভবত এর কারণগুলোর মধ্যে একটি হলো তার শাইখের মধ্যে থাকা দুর্বলতা— যেমনটি পূর্বে ইঙ্গিত করা হয়েছে।
দ্বিতীয়ত: যদি শু'বাহ এটিকে মাওকূফ না করতেন এবং তার শাইখ থেকে স্বাভাবিকভাবে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করতেন, অতঃপর সুফইয়ান আস-সাওরী তার বিরোধিতা করে এটিকে মাওকূফ করতেন— যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে— তবে মাওকূফ হওয়াটাই প্রাধান্য পেত। কারণ সর্বসম্মতিক্রমে এবং শু'বাহর নিজের স্বীকারোক্তি অনুযায়ী সুফইয়ান শু'বাহর চেয়ে অধিক হাফিয। তাহলে আসবাত ইবনু নাসরও যখন এটিকে মাওকূফ করেছেন, তখন কী হবে? আর শু'বাহ যখন নিজেই এর উপর দৃঢ় ছিলেন, তখন কী হবে?!
তৃতীয়ত: মারফূ' হওয়াটি সেই সাধারণ হাদীসগুলোর পরিপন্থী, যা স্পষ্টভাবে প্রমাণ করে যে, পাপের ইচ্ছা করার জন্য কোনো ধরপাকড় নেই, বরং তা করার উপরই ধরপাকড়। এই হাদীসগুলো অনেক এবং সুপরিচিত। এর মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর এই উক্তিটি রয়েছে: 'নিশ্চয়ই আল্লাহ আমার উম্মতের জন্য তাদের মনের কথা ক্ষমা করে দিয়েছেন, যতক্ষণ না তারা তা নিয়ে কথা বলে বা কাজ করে।' এটি মুত্তাফাকুন আলাইহি (সহীহ বুখারী ও মুসলিম সম্মত), এবং এটি 'আল-ইরওয়া' (২০৬২)-তে সংকলিত হয়েছে।
এই কারণে ইমাম ত্বাবারী আয়াতের তাফসীরে এই মতটি গ্রহণ করেছেন যে, এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো পাপ (মা'সিয়াহ)। তিনি এর তাফসীর সংক্রান্ত উক্তিগুলো উল্লেখ করার পর, যার মধ্যে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মারফূ' ও মাওকূফ হাদীসটিও ছিল, বলেন:
'সুতরাং বক্তব্যের ব্যাখ্যা হলো: আর যে ব্যক্তি মাসজিদুল হারামে যুলুমের মাধ্যমে বক্রতা অবলম্বন করতে চাইবে, অর্থাৎ তাতে আল্লাহর অবাধ্যতা করবে, আমি তাকে কিয়ামতের দিন যন্ত্রণাদায়ক শাস্তি আস্বাদন করাবো।'
তার এই উক্তি: 'অর্থাৎ তাতে আল্লাহর অবাধ্যতা করবে'— এটি হাদীসের মারফূ' অংশটিকে তিনি ধর্তব্যের মধ্যে আনেননি তার একটি শক্তিশালী ইঙ্গিত। সুতরাং এটি ইবনু কাসীরের পূর্বোক্ত ঘোষণার সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ যে, মাওকূফ হওয়াটাই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ। এই তাখরীজে আমার নিকট এটাই স্পষ্ট হয়েছে। আল্লাহই তাওফীকদাতা এবং তিনিই সরলতম পথের দিশারী।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6572)


(لو وججت أنها في قلب كل إنسان من أمتي. يعني: {يس} ،
وفي رواية: {تبارك الذي بيده الملك} .
ضعيف.

أخرجه البزار (2/87/2305) : حدثنا سلمة بن شبيب: ثنا إبراهيم بن الحكم بن أبان عن أبيه عن عكرمة عن ابن عباس قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:....فذكره بالرواية الأولى.
وأخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (11/241/11616) : حدثنا محمد بن الحسين بن عجلان: ثنا سلمة بن شبيب بالرواية الأخرى.
وقال البزار:
`لا نعلمه يروى إلا عن ابن عباس بهذا الإسناد، و (إبراهيم) لم يتابع على أحاديثه، على أنه قد حدق عنه أهل العلم`.
قلت: قال الذهبي في `المغني`:
`تركوه، وقلَّ من مشّاه على ضعفه`.
قلت: وقد توبع من مثله، فقال حفص بن عمر العدني: حدثني الحكم بن أبان بالرواية الثانية.

أخرجه الحاكم (1/565) ، وقال:
`إسناد صحيح`! ورده الذهبي بقوله:
`قلت: حفص واهٍ`.
والحديث أورده السيوطي في `الدر` (5/256) من رواية البزار بالرواية الأولى و (6/246) من رواية عبد بن حميد في `مسنده` والطبراني والحاكم وابن مردويه بالرواية الأخرى.
ولم يذكر منهما ابن كثير إلا هذه. وقال (3/395) :
`هذا حديث غريب، وإبراهيم ضعيف`.
وكذلك فعل الهيثمي في `المجمع` خلافاً لقاعدته، فقال (7/127) :
`رواه الطبراني، وفيه إبراهيم بن الحكم بن أبان وهو ضعيف`.
فلم يتعرض لذكر رواية البزار البتة، لا هنا، ولا في تفسير سورة {يس} ! فقد فاتته، ولذلك لم يعلق الشيخ حبيب الأعظمي على `كشف الأستار` بشيء، لأنه لم يجد كلام الهيثمي عليه لينقله، وذلك مبلغ تحقيقه المزعوم!
وقد يلاحظ القراء معي أن البزار تفرد بذكر سورة {يس} مكان سورة {تبارك} ، دون سائر الحفاظ الذين خرجوه، فأخشى أن يكون ذلك من أوهامه التي أشاروا إليها في ترجمته، ومن أولئك الحفاظ عبد بن حميد - كما تقدم في
تخريج السيوطي - ، فقال ابن حميد في `مسنده` (1/525/601) : حدثنا إبراهيم ابن الحكم به، وزاد في أوله:
أن ابن عباس قال لرجل: ألا أطرفك بحديث تفرح به؟ قال الرجل: بلى يا ابن عباس! رحمك الله، قال:
اقرأ: {تبارك الذي بيده الملك} ، واحفظها، وعلمها أهلك وجميع ولدك،
وصبيان بنيك، وجيرانك، فإنها المنجية، وهي المجادلة التي تجادل وتخاصم يوم القيامة عند ربها لقارئها، وتطلب له إلى ربها أن ينجيه من النار إذ كانت في جوفه، وينجي الله بها صاحبها من عذاب القبر. قال إبراهيم: قال أبي … (فذكر
الحديث) .
ولاحظوا أيضاً أن مدار رواية البزار على شيخه (سلمة بن شبيب) - وهو ثقة من شيوخ مسلم - ، وتابعه عنه شيخ الطبراني (محمد بن الحسين بن عجلان) ، لكن خالفه في تسمية السورة - كما رأيت، وهو ثقة أيضاًَ، كما قال الخطيب في ترجمته في `التاريخ` (2/227) - ، فروايته أرجح، لموافقتها لرواية الآخرين.
و (عجلان) … جده الأعلى، فإنه: (محمد بن الحسين بن إبراهيم بن زياد ابن عجلان أبو شيخ الأصبهاني) ، هكذا ساق نسبه الخطيب، وكذا أبو نعيم في `أخبار أصبهان` (2/227) ، وذكروا أن وفاته كانت سنة (ست وثمانين
ومئتين) ، ووقعت في كتاب ` شيوخ الطبراني` للشيخ الفاضل صاحبنا حماد الأنصاري (277/538) سنة (276) هكذا بالرقم.. فيصحح، كما فاته توثيق الخطيب … فيستدرك، لأنه مهم.
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(যদি আমি চাইতাম যে, তা আমার উম্মতের প্রত্যেক মানুষের হৃদয়ে থাকুক। অর্থাৎ: {ইয়াসীন}, এবং অন্য এক বর্ণনায়: {তাবা-রাকাল্লাযী বিয়াদিহিল মুলক}।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন বাযযার (২/৮৭/২৩০৫): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সালামাহ ইবনু শাবীব: তিনি বলেন, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনুল হাকাম ইবনু আবান তার পিতা থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:.... অতঃপর তিনি প্রথম বর্ণনাটি উল্লেখ করেন।

আর এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১১/২৪১/১১৬১৬): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনুল হুসাইন ইবনু আজলান: তিনি বলেন, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সালামাহ ইবনু শাবীব অন্য বর্ণনাটি সহকারে।

আর বাযযার বলেছেন:
‘আমরা জানি না যে, এটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত এই ইসনাদ (বর্ণনাসূত্র) দ্বারা বর্ণিত হয়েছে। আর (ইবরাহীম)-এর হাদীসসমূহের ক্ষেত্রে তার অনুসরণ করা হয়নি, যদিও আহলুল ইলম (জ্ঞানীগণ) তার থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: ইমাম যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘তারা তাকে বর্জন করেছেন, এবং তার দুর্বলতা সত্ত্বেও খুব কম লোকই তাকে গ্রহণ করেছেন।’

আমি বলি: আর তার মতো ব্যক্তি দ্বারা তার অনুসরণ করা হয়েছে। হাফস ইবনু উমার আল-আদানী বলেছেন: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আল-হাকাম ইবনু আবান দ্বিতীয় বর্ণনাটি সহকারে।

এটি বর্ণনা করেছেন হাকিম (১/৫৬৫), এবং তিনি বলেছেন:
‘ইসনাদ সহীহ (বিশুদ্ধ)!’ আর যাহাবী তার এই উক্তি দ্বারা তা প্রত্যাখ্যান করেছেন:
‘আমি বলি: হাফস দুর্বল (ওয়াহী)।’

আর হাদীসটি সুয়ূতী ‘আদ-দুরর’ গ্রন্থে (৫/২৫৬) বাযযারের বর্ণনা থেকে প্রথম বর্ণনাটি সহকারে এবং (৬/২৪৬) ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে ‘আব্দ ইবনু হুমাইদ, ত্বাবারানী, হাকিম এবং ইবনু মারদাওয়াইহ-এর বর্ণনা থেকে অন্য বর্ণনাটি সহকারে উল্লেখ করেছেন। আর ইবনু কাছীর এই দুটির মধ্যে শুধু এটিই উল্লেখ করেছেন। এবং তিনি (৩/৩৯৫) বলেছেন:
‘এই হাদীসটি গারীব (অপরিচিত), আর ইবরাহীম দুর্বল (যঈফ)।’

অনুরূপভাবে হাইছামী তাঁর ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে তাঁর নীতির বিপরীতে কাজ করেছেন। তিনি (৭/১২৭) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এতে ইবরাহীম ইবনুল হাকাম ইবনু আবান রয়েছে এবং সে দুর্বল (যঈফ)।’
তিনি বাযযারের বর্ণনার উল্লেখ একেবারেই করেননি, না এখানে, না সূরা {ইয়াসীন}-এর তাফসীরে! এটি তার হাতছাড়া হয়ে গেছে। এই কারণে শাইখ হাবীব আল-আ’যামী ‘কাশফুল আসতার’ গ্রন্থে কোনো মন্তব্য করেননি, কারণ তিনি হাইছামীর বক্তব্য পাননি যা তিনি উদ্ধৃত করতে পারতেন। আর এটাই হলো তার তথাকথিত তাহক্বীক্বের (গবেষণার) সীমা!

পাঠকরা আমার সাথে লক্ষ্য করতে পারেন যে, বাযযার সূরা {তাবা-রাক}-এর স্থানে সূরা {ইয়াসীন}-এর উল্লেখ করার ক্ষেত্রে একক হয়ে গেছেন, অন্যান্য হাফিযগণ যারা এটি তাখরীজ করেছেন তাদের থেকে ভিন্নভাবে। আমি আশঙ্কা করি যে, এটি তার সেই ভুলগুলোর অন্তর্ভুক্ত হতে পারে যা তার জীবনীতে তারা উল্লেখ করেছেন। আর সেই হাফিযদের মধ্যে রয়েছেন ‘আব্দ ইবনু হুমাইদ – যেমনটি সুয়ূতীর তাখরীজে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে –। ইবনু হুমাইদ তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (১/৫২৫/৬০৯) বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনুল হাকাম এটি সহকারে, এবং এর শুরুতে অতিরিক্ত যোগ করেছেন:
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এক ব্যক্তিকে বললেন: আমি কি তোমাকে এমন একটি হাদীস উপহার দেবো না যা শুনে তুমি আনন্দিত হবে? লোকটি বলল: অবশ্যই, হে ইবনু আব্বাস! আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন। তিনি বললেন:
তুমি পড়ো: {তাবা-রাকাল্লাযী বিয়াদিহিল মুলক}, আর তা মুখস্থ করো, এবং তোমার পরিবার, তোমার সকল সন্তান, তোমার নাতি-নাতনি এবং তোমার প্রতিবেশীদেরকে তা শিক্ষা দাও। কারণ এটিই হলো মুক্তিদানকারী, আর এটিই হলো সেই তর্ককারী যা কিয়ামতের দিন তার পাঠকের জন্য তার রবের নিকট তর্ক করবে ও ঝগড়া করবে, এবং তার রবের নিকট তার জন্য প্রার্থনা করবে যেন তিনি তাকে আগুন থেকে মুক্তি দেন, যখন তা তার (পাঠকের) অভ্যন্তরে ছিল। আর আল্লাহ এর দ্বারা তার সাথীকে কবরের আযাব থেকে মুক্তি দেবেন। ইবরাহীম বলেন: আমার পিতা বলেছেন... (অতঃপর হাদীসটি উল্লেখ করেন)।

আপনারাও লক্ষ্য করুন যে, বাযযারের বর্ণনার কেন্দ্রবিন্দু হলো তার শাইখ (সালামাহ ইবনু শাবীব)-এর উপর – আর তিনি মুসলিমের শাইখদের অন্তর্ভুক্ত একজন নির্ভরযোগ্য রাবী –। আর ত্বাবারানীর শাইখ (মুহাম্মাদ ইবনুল হুসাইন ইবনু আজলান) তার অনুসরণ করেছেন, কিন্তু তিনি সূরার নাম উল্লেখ করার ক্ষেত্রে তার বিরোধিতা করেছেন – যেমনটি আপনি দেখেছেন, আর তিনিও নির্ভরযোগ্য, যেমনটি খতীব তাঁর জীবনীতে ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (২/২২৭) বলেছেন –। সুতরাং তার বর্ণনাটিই অধিকতর শক্তিশালী, কারণ তা অন্যদের বর্ণনার সাথে মিলে যায়।

আর (আজলান)... তার ঊর্ধ্বতন দাদা। কারণ তিনি হলেন: (মুহাম্মাদ ইবনুল হুসাইন ইবনু ইবরাহীম ইবনু যিয়াদ ইবনু আজলান আবূ শাইখ আল-আসফাহানী)। খতীব এভাবেই তার বংশধারা উল্লেখ করেছেন, অনুরূপভাবে আবূ নু’আইমও ‘আখবারু আসফাহান’ গ্রন্থে (২/২২৭) উল্লেখ করেছেন। আর তারা উল্লেখ করেছেন যে, তার মৃত্যু হয়েছিল (দু’শত ছিয়াশি) হিজরী সনে। আর আমাদের সম্মানিত সাথী শাইখ হাম্মাদ আল-আনসারীর ‘শুয়ূখুত ত্বাবারানী’ গ্রন্থে (২৭৭/৫৩৮) তা (২৭৬) হিজরী সন এভাবে সংখ্যায় এসেছে... সুতরাং তা সংশোধন করা হবে, যেমন খতীবের নির্ভরযোগ্যতা প্রদান তার হাতছাড়া হয়ে গেছে... সুতরাং তা সংশোধন করা উচিত, কারণ এটি গুরুত্বপূর্ণ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6573)


(كَانَ سُلَيمانُ نبيُّ اللهِ إذَا صَلَّى، رأى شجرة نابتة بين يديه، فيقول لها ما اسمك؟ فتقول كذا، فيقول لأي شيء أنت؟ فإن كانت تُغْرَسُ، غُرسَت، وإن كان لدواءٍ كُتبتْ.
فبينما هو يصلي ذاتَ يَومٍ، إذ رأى شجرةً بين يديه، فقال لها: ما اسمك؟ قالت: (الخرنوب) ، قال: لأي شيء أنت؟ قالت: لخراب هذا البيت، فقال سليمان: اللهم عمِّ على الجن موتي؛ حتى يعلم الإنس
أن الجن لا يعلمون الغيب، فنَحَتَها عصا، فتوكَّأ عليها حولا ميتًا، والجن تعمل، فأكلتها الأرضة، فسقط، (فتبينت الإنس أن الجن لو كانوا يعلمون الغيب ما لبثوا حولا في العذاب المهين) . قال: وكان ابن عباس يقرأها كذلك. قال: فشكرت الجن للأرضة، فكانت تأتيها بالماء) .
ضعيف.

أخرجه ابن جرير الطبري في `التفسير` (22/51) والحاكم (4/197 و 402) ، والبزار (3/106/2355) ، والطبراني في `المعجم الكبير` (11/451 - 452) من طريق إبراهيم بن طهمان عن عطاء بن السائب عن سعيد بن
جبير عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: … فذكره. وقال الحاكم في الموضعين:
`صحيح الإسناد`. ووافقه الذهبي.
وأما ابن كثير فقال في `التفسير` (3/529) :
`حديث مرفوع غريب، وفي صحته نظر`.
قلت: وعلته: (عطاء بن السائب) ، فإنه كان اختلط، وإبراهيم بن طهمان لم يذكر في جملة الذين سمعوا منه قبل الاختلاط. ثم قال ابن كثير:
`وهكذا رواه ابن أبي حاتم من حديث إبراهيم بن طهمان به. ورفعُه في غرابة ونكارة، والأقرب أن يكون موقوفاً، وعطاء بن أبي مسلم الخراساني (كذا، ولعله سبق قلم، أو خطأ من الناسخ) ، له غرابات، وفي بعض حديثه نكارة`.
قلت: والوقف الذي استغربه ابن كثير هو الصحيح عن ابن عباس، فقد جاء عن ثقتين آخرين عن عطاء بن السائب عن سعيد بن جبير عنه.
أحدهما: جرير - وهو: ابن عبد الحميد - عنه مختصراً، وليس فيه قراءة ابن
عباس للآية.

أخرجه الحاكم (2/423) ، وقال:
`صحيح الإسناد`. ووافقه الذهبي. وهو كما قالا، إن جرير سمعه منه قبل الاختلاط.
والآخر: سفيان بن عيينة عن عطاء به.

أخرجه البزار (2356) : حدثنا أحمد بن أبان: ثنا سفيان بن عيينة …
قلت: وهذا إسناد صحيح، فقد ذكروا في ترجمة (عطاء) أن ابن عيينة سمع منه قبل الاختلاط وبعده، ولكنه اتقاه في الاختلاط واعتزله، ولذلك قال أحمد:
`سماعه من مقارب`.
وإنما مما يرجح الوقف أن عطاء بن السائب قد تابعه على وقفه سلمة بن كهيل عن سعيد بن جبير عن ابن عباس به، دون الآية أيضاً.

أخرجه الحسين المروزي في زياداته على `زهد ابن المبارك` (ص 378/1072) .
قلت: وإسناده جيد، رجاله ثقات رجال مسلم، غير عبد الجبار بن عباس الهمداني، وهو صدوق.
وكذلك رواه أسباط عن السدي - في خبر ذكره - عن أبي مالك وعن أبي صالح عن ابن عباس، وعن مرة الهمداني عن ابن مسعود، وعن أناس من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:....فذكره.
قلت: وأسباط - هو ابن نصر الهمداني، وهو - ، صدوق كثير الخطأ، يغرب - كما في `التقريب` - . وحديثه ليس صريحاً في الرفع، بل إن ظاهره الوقف.
والله سبحانه وتعالى أعلم.
ومع عدم ثبوت القراءة المذكورة في الحديث عن ابن عباس، لا مرفوعاً ولا موقوفاً، فهي مع ذلك مخالفة لنصها المتواتر في المصحف {فلما خر تبينت الجن أن لو كانوا يعلمون الغيب ما لبثوا في العذاب المهين} . [سبأ: 14] .
ولذلك جزم بعض المحققين من علماء التفسير بشذوذها، مثل: أبي حيان التوحيدي (7/268) ، والآلوسي (22/123) ، وابن كثير - وقد سبق كلامه - ، وخالف الإمام القرطبي، فقال في `تفسيره` (14/279) بصحتها!
وفي الختام: لا بد لي من التنبيه على خطأين اثنين:
أحدهما: أن ناسخ أو طابع `كشف الأستار` ساق الآية في حديث ابن عباس بنصها الوارد في المصحف، إلا في الكلمة الأولى منها: (فتبينت) ، وصوابها: {فلما خرَّ تبينت} وهذا خطأ، وفي اعتقادي أن الذي حمله على
ذلك إنما هو ظنه أن الرواي أخطأ في تلاوتها، فصححها دون أن ينتبه أنه أفسد الحديث، لأن هذا التصحيح لا يتناسب مع قوله في الحديث: `وكان ابن عباس يقرأها كذلك`، فقراءته حسب الرواية على وجه آخر غير ما في المصحف، على أن الذي في المصحف: {تبينت} … ليس: {فتبينت} - كما ذكرت - ، وغفل عن ذلك محققه الشيخ حبيب الرحمن الأعظمي فقال:
`نظم القرآن في المصحف كما هنا`!! ثم ساق الآية كما جاءت في الحديث نقلاً عن `الزوائد` (8/208) . ويعني: `مجمع الزوائد`.
والخطأ الآخر: أن الشيخ الأعظمي علق على رواية إبراهيم بن طهمان المرفوعة بقوله: `أخرجه ابن المبارك … عن ابن عباس مرفوعاً (ص 378) `!
وهذا خطأ، فإنما أخرجه موقوفاً - كما سبق - .
ثم أكد الخطأ بتعليقه على رواية سفيان بن عيينة الموقوفة بقوله:
`قال الهيثمي: رواه الطبراني والبزار بنحوه مرفوعاً وموقوفاً، وفيه عطاء، قد اختلط، وبقية رجالهما رجال الصحيح (8/207) ، قلت: تابع عطاءً سلمةُ بن كهيل عند ابن المبارك`.
قلت: سلمة بن كهيل روايته موقوفة فقط - ، كما تقدم، وسبقت الإشارة إليه آنفاً - ، وتعقيب الشيخ على كلام الهيثمي يوهم أنه رواها مرفوعاً وموقوفاً! فتأمل.
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(আল্লাহর নবী সুলাইমান (আঃ) যখন সালাত আদায় করতেন, তখন তিনি তাঁর সামনে একটি গাছ দেখতে পেতেন। তিনি সেটিকে জিজ্ঞেস করতেন, তোমার নাম কী? সেটি বলত, অমুক। তিনি জিজ্ঞেস করতেন, তুমি কীসের জন্য? যদি সেটি রোপণের জন্য হতো, তবে তা রোপণ করা হতো। আর যদি ঔষধের জন্য হতো, তবে তা লিখে রাখা হতো।
একদিন তিনি সালাত আদায় করছিলেন, এমন সময় তিনি তাঁর সামনে একটি গাছ দেখতে পেলেন। তিনি সেটিকে জিজ্ঞেস করলেন: তোমার নাম কী? সেটি বলল: (আল-খারনূব)। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: তুমি কীসের জন্য? সেটি বলল: এই ঘরের (বায়তুল মুকাদ্দাস) ধ্বংসের জন্য। তখন সুলাইমান (আঃ) বললেন: হে আল্লাহ! আমার মৃত্যুকে জিনদের উপর গোপন করে দাও, যাতে মানুষ জানতে পারে যে, জিনরা গায়েব জানে না। অতঃপর তিনি সেটিকে লাঠি হিসেবে কেটে নিলেন এবং তার উপর ভর করে এক বছর মৃত অবস্থায় দাঁড়িয়ে রইলেন, আর জিনরা কাজ করতে থাকল। অতঃপর উইপোকা সেটি খেয়ে ফেলল এবং তিনি পড়ে গেলেন। (তখন মানুষ জানতে পারল যে, জিনরা যদি গায়েব জানত, তবে তারা এক বছর ধরে এই অপমানজনক শাস্তিতে থাকত না)। বর্ণনাকারী বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াতটি এভাবেই পড়তেন। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর জিনরা উইপোকাকে ধন্যবাদ জানাল এবং তারা উইপোকার জন্য পানি নিয়ে আসত)।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ইবনু জারীর আত-তাবারী তাঁর ‘আত-তাফসীর’ গ্রন্থে (২২/৫১), আল-হাকিম (৪/১৯৭ ও ৪০২), আল-বাযযার (৩/১০৬/২৩৫৫), এবং আত-তাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১১/৪৫১-৪৫২) ইবরাহীম ইবনু তাহমান-এর সূত্রে আতা ইবনুস সা-ইব হতে, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। আল-হাকিম উভয় স্থানে বলেছেন: ‘সহীহুল ইসনাদ’ (সহীহ সনদ)। আর আয-যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন।
আর ইবনু কাসীর তাঁর ‘আত-তাফসীর’ গ্রন্থে (৩/৫২৯) বলেছেন:
‘এটি মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) গারীব (অপরিচিত) হাদীস, এবং এর সহীহ হওয়ার ব্যাপারে সন্দেহ আছে।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: এর ত্রুটি হলো: (আতা ইবনুস সা-ইব)। কারণ তিনি স্মৃতিবিভ্রাটে ভুগেছিলেন (ইখতিলাত)। আর ইবরাহীম ইবনু তাহমান তাদের অন্তর্ভুক্ত নন যারা তাঁর থেকে ইখতিলাতের পূর্বে শুনেছেন বলে উল্লেখ করা হয়েছে। অতঃপর ইবনু কাসীর বলেছেন:
‘এভাবেই ইবনু আবী হাতিম এটি ইবরাহীম ইবনু তাহমানের হাদীস সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এর মারফূ’ হওয়াতে গারাবাত (অপরিচিতি) ও নাকারাত (অস্বাভাবিকতা) রয়েছে। অধিকতর সঠিক হলো এটি মাওকূফ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) হওয়া। আর আতা ইবনু আবী মুসলিম আল-খুরাসানী (এভাবেই লেখা আছে, সম্ভবত এটি কলমের ভুল বা লিপিকারের ভুল), তাঁর কিছু গারাবাত রয়েছে এবং তাঁর কিছু হাদীসে নাকারাত রয়েছে।’
আমি বলি: ইবনু কাসীর যে মাওকূফ বর্ণনাটিকে অস্বাভাবিক মনে করেছেন, সেটিই ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ। কারণ এটি আতা ইবনুস সা-ইব হতে, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর হতে, তাঁর থেকে অন্য দুজন নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী কর্তৃক বর্ণিত হয়েছে।
তাদের একজন: জারীর – আর তিনি হলেন: ইবনু আব্দুল হামীদ – তাঁর থেকে সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন, এবং এতে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আয়াত পাঠের বিষয়টি নেই।
এটি আল-হাকিম (২/৪২৩) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন:
‘সহীহুল ইসনাদ’। আর আয-যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন। তারা উভয়ে যেমন বলেছেন, এটি তেমনই, কারণ জারীর তাঁর থেকে ইখতিলাতের পূর্বে শুনেছিলেন।
আর অন্যজন: সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ আতা হতে এটি বর্ণনা করেছেন।
এটি আল-বাযযার (২৩৫৬) বর্ণনা করেছেন: আহমাদ ইবনু আবান আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন: সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন...।
আমি বলি: এই সনদটি সহীহ। কারণ (আতা)-এর জীবনীতে উল্লেখ করা হয়েছে যে, ইবনু উয়াইনাহ তাঁর থেকে ইখতিলাতের পূর্বে এবং পরেও শুনেছেন, কিন্তু ইখতিলাতের সময় তিনি তাঁকে এড়িয়ে চলতেন এবং তাঁর থেকে দূরে থাকতেন। এই কারণে আহমাদ (ইবনু হাম্বল) বলেছেন: ‘তাঁর থেকে তাঁর শ্রবণ কাছাকাছি (গ্রহণযোগ্য)।’
আর মাওকূফ বর্ণনাটিকে যা শক্তিশালী করে, তা হলো এই যে, আতা ইবনুস সা-ইব-এর এই মাওকূফ বর্ণনার ক্ষেত্রে সালামাহ ইবনু কুহাইল তাঁর অনুসরণ করেছেন, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এটি বর্ণনা করেছেন, এতেও আয়াতটির অংশটি নেই।
এটি আল-হুসাইন আল-মারওয়াযী তাঁর ‘যুহদ ইবনুল মুবারক’-এর অতিরিক্ত অংশে (পৃষ্ঠা ৩৭৮/১০৭২) বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: এর সনদ জায়্যিদ (উত্তম)। এর বর্ণনাকারীরা মুসলিম-এর সহীহ-এর বর্ণনাকারী, তবে আব্দুল জাব্বার ইবনু আব্বাস আল-হামদানী ব্যতীত, আর তিনি সাদূক (সত্যবাদী)।
অনুরূপভাবে আসবাত এটি আস-সুদ্দী হতে – তিনি যে খবরটি উল্লেখ করেছেন তাতে – আবূ মালিক হতে এবং আবূ সালিহ হতে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, এবং মুররাহ আল-হামদানী হতে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীগণের একদল হতে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
আমি বলি: আর আসবাত – তিনি হলেন ইবনু নাসর আল-হামদানী, আর তিনি – সাদূক (সত্যবাদী) কিন্তু অনেক ভুল করেন, তিনি গারীব (অপরিচিত) বর্ণনা করেন – যেমনটি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে। আর তাঁর হাদীস মারফূ’ হওয়ার ক্ষেত্রে স্পষ্ট নয়, বরং এর বাহ্যিক রূপ মাওকূফ-এর। আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা সর্বাধিক অবগত।
আর হাদীসে উল্লিখিত ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত কিরাআতটি মারফূ’ বা মাওকূফ কোনোভাবেই প্রমাণিত না হওয়া সত্ত্বেও, এটি মুসহাফে (কুরআনে) এর মুতাওয়াতির (অবিচ্ছিন্নভাবে বর্ণিত) পাঠের বিপরীত: {অতঃপর যখন সুলাইমান পড়ে গেলেন, তখন জিনেরা বুঝতে পারল যে, যদি তারা গায়েব জানত, তবে তারা এই অপমানজনক শাস্তিতে দীর্ঘকাল থাকত না}। [সূরা সাবা: ১৪]।
এই কারণে তাফসীর শাস্ত্রের কিছু মুহাক্কিক (গবেষক) আলেম এটিকে শায (অস্বাভাবিক/বিরল) বলে নিশ্চিত করেছেন, যেমন: আবূ হাইয়ান আত-তাওহীদী (৭/২৬৮), আল-আলূসী (২২/১২৩), এবং ইবনু কাসীর – যাঁর বক্তব্য পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে –। তবে ইমাম আল-কুরতুবী এর বিরোধিতা করেছেন এবং তাঁর ‘তাফসীর’ গ্রন্থে (১৪/২৭৯) এটিকে সহীহ বলেছেন!
পরিশেষে: আমাকে অবশ্যই দুটি ভুল সম্পর্কে সতর্ক করতে হবে:
প্রথমটি: ‘কাশফুল আসতার’-এর লিপিকার বা মুদ্রণকারী ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে আয়াতটিকে মুসহাফে বর্ণিত পাঠের অনুরূপভাবে উল্লেখ করেছেন, তবে এর প্রথম শব্দটি ব্যতীত: (فتبينت) [ফাতাবাইয়ানাত], অথচ এর সঠিক রূপ হলো: {فلما خرَّ تبينت} [ফালাম্মা খাররা তাবাইয়ানাত]। আর এটি একটি ভুল। আমার বিশ্বাস, এর কারণ হলো: তিনি ধারণা করেছেন যে, বর্ণনাকারী এর তিলাওয়াতে ভুল করেছেন, তাই তিনি তা সংশোধন করেছেন, কিন্তু তিনি খেয়াল করেননি যে, তিনি হাদীসটিকে নষ্ট করে দিয়েছেন। কারণ এই সংশোধন হাদীসের এই উক্তির সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ নয়: ‘আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি এভাবেই পড়তেন।’ সুতরাং, বর্ণনা অনুযায়ী তাঁর কিরাআত মুসহাফে যা আছে তার থেকে ভিন্ন। তাছাড়া, মুসহাফে যা আছে তা হলো: {تبينت} [তাবাইয়ানাত]... {فتبينت} [ফাতাবাইয়ানাত] নয় – যেমনটি আমি উল্লেখ করেছি –। আর এর মুহাক্কিক শাইখ হাবীবুর রহমান আল-আ’যামী এ বিষয়ে গাফেল ছিলেন এবং বলেছেন: ‘মুসহাফে কুরআনের বিন্যাস এখানে যেমন আছে তেমনই’!! অতঃপর তিনি ‘আয-যাওয়াইদ’ (৮/২০৮) থেকে উদ্ধৃত করে হাদীসে যেমন এসেছে তেমনই আয়াতটি উল্লেখ করেছেন। আর তিনি ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’ বুঝিয়েছেন।
আর অন্য ভুলটি হলো: শাইখ আল-আ’যামী ইবরাহীম ইবনু তাহমানের মারফূ’ বর্ণনাটির উপর মন্তব্য করে বলেছেন: ‘ইবনুল মুবারক... ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন (পৃষ্ঠা ৩৭৮)’!
এটি ভুল। কারণ তিনি এটি মাওকূফ হিসেবেই বর্ণনা করেছেন – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে –।
অতঃপর তিনি সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহ-এর মাওকূফ বর্ণনাটির উপর মন্তব্য করে ভুলটিকে আরও জোরালো করেছেন, যেখানে তিনি বলেছেন: ‘আল-হাইসামী বলেছেন: আত-তাবারানী ও আল-বাযযার অনুরূপভাবে মারফূ’ ও মাওকূফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। এতে আতা রয়েছেন, যিনি ইখতিলাতে ভুগেছিলেন, তবে তাদের অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা সহীহ-এর বর্ণনাকারী (৮/২০৭)। আমি (আল-আ’যামী) বলি: ইবনুল মুবারকের নিকট আতা-কে সালামাহ ইবনু কুহাইল অনুসরণ করেছেন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: সালামাহ ইবনু কুহাইল-এর বর্ণনা কেবল মাওকূফ – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে এবং ইতোপূর্বে এর প্রতি ইঙ্গিত করা হয়েছে –। আর আল-হাইসামী-এর বক্তব্যের উপর শাইখের এই মন্তব্যটি এই ভ্রম সৃষ্টি করে যে, তিনি (সালামাহ) এটি মারফূ’ ও মাওকূফ উভয়ভাবেই বর্ণনা করেছেন! সুতরাং, চিন্তা করুন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6574)


(لما أوحيَ إليّ - أو: نبّئتُ، او كلمة نحوها - ، جعلت لا أمرُ بحجرٍ لا شجرٍ إلا قال: السلام عليك يا رسول الله!) .
منكر أوله.

أخرجه البزار (3/166 - 167) : حدثنا عبد الله بن شبيب:
ثنا أيوب بن سليمان بن بلال: ثنا ابن أبي أويس - يعني: أبا بكر - عن سليمان ابن بلال عن يحيى بن سعيد عن الزهري عن عروة عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، قال الهيثمي في `المجمع` (8/260) :
`رواه الطبراني عن شيخه عبد الله بن شبيب، وهو ضعيف`.
فأقول: لقد أخطأ فيه (ابن شبيب) هذا إسناداً ومتناً.
أما الإسناد: فقد رواه زيج بن الحريش: ثنا يحيى بن سعيد عن شعبة عن سماك بن حرب عن جابر بن سمرة مرفوعاً بلفظ:
`إني لأعرف حجراً كان يسلّم عليَّ قبل أن أُبعث`.

أخرجه الطبراني في `المعجم الكبير` (2/244/1907) ، و `الأوسط` (2206 - بترقيمي) ، و `الصغير` (رقم 185 - الروض) ، ومن طريقه أبو نعيم في `أخبار أصفهان` (1/108) و `دلائل النبوة` (ص 341) قال: ثنا أحمد
ابن محمد بن سعيد المعيني الأصبهاني: ثنا زيد بن الحريش به. وقال الطبراني:
`لم يروه عن شعبة إلا يحيى بن سعيد، ولا رواه عن يحيى إلا زيد بن الحريش، - زاد في `الصغير`: - ولا كتبناه إلا عن المعيني`.
قلت: وهو ثقة - كما قال أبو نعيم - ، ومن فوقه ثقات رجال مسلم، غير (زيد ابن الحريش) ، وقد وثقه ابن حبان (8/251) وقال:
`حدثنا عنه عبد الله بن أحمد بن موسى القاضي عبدان. ربما أخطأ`.
قلت: عبدان حافظ ثقة معروف، وقد روى عنه (المعيني) هذا - كما ترى - ، كما روى عنه (إبراهيم بن يوسف الهِسنجاني) - كما ذكر ابن أبي حاتم - ، وإبراهيم قال في `السير` (14/116) : [الإمام الحافظ المجوَّد] ، فهؤلاء ثلاثة من الثقات رووا عنه مع توثيق ابن حبان، فلا التفات بعد ذلك إلى قول ابن القطان، فيه:
`مجهول الحال` - كما حكاه في `اللسان` - ، فالإسناد جيد.
وأما المتن: فقد صدَّره بقوله: `لما أوحي إلي`، وإنما كان ذلك قبل الوحي،
كما حدث في حديث (ابن الحريش) : `قبل أن أبعث`، وكذلك رواه إبراهيم بن طهمان: ثني سماك بن حرب به.
رواه مسلم (7/58) ، وابن حبان (6448) وغيرهما. وهو مخرج في `الروض النضير` من طريق يحيى بن أبي بكير: ثنا إبراهيم بن طهمان به.
ويحيى ثقة من رجال الشيخين، وقد خالفه من هو دونه ثقة وحفظاً، فقال أبو حذيفة: ثنا إبراهيم بن طهمان به، إلا أنه قال:
`حين بعثت`!

أخرجه الطبراني (1995) .
وأبو حذيفة - واسمه: موسى بن مسعود النهدي - : قال الحافظ:
`صدوق سيىء الحفظ، وكان يصحف، وحديثه عند البخاري متابعة`.
وله في `المغني` ترجمة سيئة.
وخالف إبراهيم بن طهمان ضعيفان: سليمان بن معاذ، وشريك.
أما الأول: فقال الطيالسي في `مسنده` (106/781) : حدثنا سليمان ابن معاذ عن سماك بلفظ:
`ليالي بعثت`.
ومن طريق الطيالسي أخرجه الترمذي (3628) ، وأحمد (5/105) ، والطبراني (2028) ، وأبو نعيم (340) ، والبيهقي في `الدلائل` (2/153) ، كلهم عنه.
وسليمان بن معاذ - هو: ابن قرم - : قال الحافظ:
`سيىء الحفظ`.
أما رواية شريك: فهي مثل رواية سليمان سنداً ومتناً.
أخرجها الطبراني (1961) .
وشريك - هو: ابن عبد الله القاضي، وهو - : معروف بسوء الحفظ، ولذلك فلا يحتج بحديث أمثاله، وبخاصة عند مخالفة الثقات - كما هنا - .
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(যখন আমার প্রতি ওহী নাযিল হলো – অথবা: আমাকে নবুওয়াত দেওয়া হলো, অথবা এর কাছাকাছি কোনো শব্দ – তখন আমি কোনো পাথর বা গাছের পাশ দিয়ে অতিক্রম করতাম না, যা বলতো না: আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক, হে আল্লাহর রাসূল!)।
এর প্রথম অংশ মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি বর্ণনা করেছেন বাযযার (৩/১৬৬ - ১৬৭): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু শাবীব:
আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আইয়ূব ইবনু সুলাইমান ইবনু বিলাাল: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী উওয়াইস – অর্থাৎ: আবূ বাকর – সুলাইমান ইবনু বিলাাল থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আয-যুহরী থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৮/২৬০)-তে বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী তার শায়খ আব্দুল্লাহ ইবনু শাবীব থেকে বর্ণনা করেছেন, আর সে যঈফ।’

আমি বলি: (ইবনু শাবীব) সনদ ও মতন উভয় ক্ষেত্রেই ভুল করেছেন।
সনদের ক্ষেত্রে: এটি বর্ণনা করেছেন যায়দ ইবনুল হুরয়শ: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ, তিনি শু‘বাহ থেকে, তিনি সিমাক ইবনু হারব থেকে, তিনি জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে এই শব্দে:
‘আমি অবশ্যই এমন একটি পাথরকে চিনি, যা আমাকে নবুওয়াত দেওয়ার পূর্বে আমাকে সালাম দিতো।’

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী ‘আল-মু‘জামুল কাবীর’ (২/২৪৪/১৯০৭), ‘আল-আওসাত’ (২২০৬ – আমার সংখ্যায়ন অনুযায়ী), এবং ‘আস-সাগীর’ (নং ১৮৫ – আর-রওদ)-এ। আর তার (ত্বাবারানীর) সূত্রেই আবূ নু‘আইম ‘আখবারু ইসফাহান’ (১/১০৮) এবং ‘দালাইলুন নুবুওয়াহ’ (পৃ. ৩৪১)-এ বর্ণনা করেছেন। তিনি (আবূ নু‘আইম) বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু সাঈদ আল-মু‘আইনী আল-আসফাহানী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন যায়দ ইবনুল হুরয়শ এই সূত্রে। আর ত্বাবারানী বলেছেন:
‘শু‘বাহ থেকে ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর ইয়াহইয়া থেকে যায়দ ইবনুল হুরয়শ ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি, – ‘আস-সাগীর’-এ অতিরিক্ত বলেছেন: – আর আমরা আল-মু‘আইনী ছাড়া আর কারো নিকট থেকে এটি লিখিনি।’

আমি বলি: তিনি (আল-মু‘আইনী) সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) – যেমনটি আবূ নু‘আইম বলেছেন – আর তার উপরের বর্ণনাকারীরা মুসলিমের (সহীহ মুসলিমের) রাবী, (যায়দ ইবনুল হুরয়শ) ছাড়া। আর তাকে ইবনু হিব্বান (৮/২৫১) সিকাহ বলেছেন এবং বলেছেন:
‘আমাদের নিকট তার থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ ইবনু মূসা আল-ক্বাদী ‘আবদান। তিনি মাঝে মাঝে ভুল করতেন।’
আমি বলি: ‘আবদান একজন হাফিয, সিকাহ এবং সুপরিচিত। আর এই (আল-মু‘আইনী) তার থেকে বর্ণনা করেছেন – যেমনটি আপনি দেখছেন – যেমন তার থেকে বর্ণনা করেছেন (ইবরাহীম ইবনু ইউসুফ আল-হিসিনজানী) – যেমনটি ইবনু আবী হাতিম উল্লেখ করেছেন – আর ইবরাহীম ‘আস-সিয়ার’ (১৪/১১৬)-এ বলেছেন: [আল-ইমাম, আল-হাফিয, আল-মুজাওওয়াদ]। সুতরাং, ইবনু হিব্বানের তাউসিক (নির্ভরযোগ্য ঘোষণা) সহ এই তিনজন সিকাহ রাবী তার থেকে বর্ণনা করেছেন। এরপর ইবনুল কাত্তানের এই উক্তির দিকে মনোযোগ দেওয়ার প্রয়োজন নেই, যা তিনি তার সম্পর্কে বলেছেন:
‘মাজহূলুল হাল’ (অজ্ঞাত অবস্থা) – যেমনটি ‘আল-লিসান’-এ উল্লেখ করা হয়েছে – সুতরাং, সনদটি জাইয়িদ (উত্তম)।

আর মতনের ক্ষেত্রে: তিনি এটিকে এই কথা দিয়ে শুরু করেছেন: ‘যখন আমার প্রতি ওহী নাযিল হলো’, অথচ এটি ওহী নাযিলের পূর্বের ঘটনা ছিল, যেমনটি (ইবনুল হুরয়শের) হাদীসে এসেছে: ‘আমাকে নবুওয়াত দেওয়ার পূর্বে’। অনুরূপভাবে এটি বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ত্বাহমান: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সিমাক ইবনু হারব এই সূত্রে।

এটি বর্ণনা করেছেন মুসলিম (৭/৫৮), ইবনু হিব্বান (৬৪৪৮) এবং অন্যান্যরা। আর এটি ‘আর-রওদুন নাদ্বীর’-এ ইয়াহইয়া ইবনু আবী বুকাইরের সূত্রে সংকলিত হয়েছে: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ত্বাহমান এই সূত্রে। আর ইয়াহইয়া শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবীদের অন্তর্ভুক্ত, তিনি সিকাহ। আর তার চেয়ে বিশ্বস্ততা ও স্মরণশক্তির দিক থেকে দুর্বল একজন তার বিরোধিতা করেছেন। আবূ হুযাইফাহ বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইবরাহীম ইবনু ত্বাহমান এই সূত্রে, তবে তিনি বলেছেন:
‘যখন আমাকে নবুওয়াত দেওয়া হলো!’

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী (১৯৯৫)।
আর আবূ হুযাইফাহ – তার নাম: মূসা ইবনু মাসঊদ আন-নাহদী – : হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি সাদূক (সত্যবাদী), কিন্তু তার স্মরণশক্তি খারাপ ছিল, এবং তিনি ভুল পাঠ করতেন। বুখারীর নিকট তার হাদীস মুতাবা‘আত (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবে রয়েছে।’ ‘আল-মুগনী’তে তার সম্পর্কে খারাপ জীবনী রয়েছে।

আর ইবরাহীম ইবনু ত্বাহমানের বিরোধিতা করেছেন দুজন যঈফ রাবী: সুলাইমান ইবনু মু‘আয এবং শারীক।
প্রথমজনের ক্ষেত্রে: ত্বায়ালিসী তার ‘মুসনাদ’ (১০৬/৭৮১)-এ বলেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনু মু‘আয, তিনি সিমাক থেকে এই শব্দে:
‘যে রাতে আমাকে নবুওয়াত দেওয়া হলো।’

আর ত্বায়ালিসীর সূত্রেই এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (৩৬২৮), আহমাদ (৫/১০৫), ত্বাবারানী (২০২৮), আবূ নু‘আইম (৩৪০), এবং বাইহাক্বী ‘আদ-দালাইল’ (২/১৫৩)-এ। তারা সকলেই তার (সুলাইমানের) থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর সুলাইমান ইবনু মু‘আয – তিনি হলেন: ইবনু ক্বারম – : হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন:
‘তিনি দুর্বল স্মরণশক্তির অধিকারী।’

আর শারীকের বর্ণনা: এটি সনদ ও মতন উভয় দিক থেকে সুলাইমানের বর্ণনার মতোই।
এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী (১৯৬১)।
আর শারীক – তিনি হলেন: ইবনু আব্দুল্লাহ আল-ক্বাদী, আর তিনি – : দুর্বল স্মরণশক্তির জন্য সুপরিচিত। এই কারণে তার মতো ব্যক্তির হাদীস দ্বারা দলীল পেশ করা যায় না, বিশেষত যখন তিনি সিকাহ রাবীদের বিরোধিতা করেন – যেমনটি এখানে ঘটেছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6575)


(اللهم! ائتني بأحب خلقك إليك، يأكل معي من هذا الطير. فجاء أبو بكر فردَّه، وجاء عمر فردَّه، وجاء علي فأذن له) .
منكر.

أخرجه النسائي في ` السنن الكبرى` (5/107/8398 -
الخصائص) ، وابن الجوزي في `العلل المتناهية` (1/226/362) من طريق مسهر بن عبد الملك عن عيسى بن عمر عن السدي عن أنس بن مالك:
أن النبي صلى الله عليه وسلم كان عنده طائر، فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات، غير (مسهر بن عبد الله) ، وهو مختلف فيه، أورده الذهبي في `المغني` وقال:
`ليس بالقوي. قال البخاري: فيه بعض النظر`. وقال الحافظ في `التقريب`:
`ليّن الحديث`.
وبقول البخاري المذكور أعله ابن الجوزي. لكن له متابع، فقال الترمذي
(3823) : حدثنا سفيان بن وكيع: أخبرنا عبيد الله بن موسى عن عيسى بن عمر به، دون ذكر أبي بكر وعمر، وقال:
`حديث حسن (1) غريب، لا نعرفه من حديث السدي إلا من هذا الوجه`.
قلت: سفيان بن وكيع: قال الذهبي في `المغني`:
`ضُعف. وقال أبو زرعة: كان يتهم بالكذب`.
قلت: لكنه قد توبع، فقد رواه ابن الجوزي (363) بإسناده من طريق الدارقطني: نا محمد بن مخلد: نا حاتم بن الليث قال: نا عبيد الله بن موسى به.
وهذا إسناد رجاله كلهم ثقات، إلا ما في (السدي) من الخلاف - وهو (السدي الكبير) ، واسمه: إسماعيل بن عبد الرحمن - ، وبه أعله ابن الجوزي فقال:
`وهذا لا يصح، لأن إسماعيل السدي قد ضعفه عبد الرحمن بن مهدي ويحيى بن معين`.
وأقول - وبالله أستعين - :
لعل إعلاله بـ (عبيد الله بن موسى) - وهو: ابن أبي المختار العبسي - أولى، وذلك لسببين اثنين:
أحدهما: أن (عبيد الله) - وإن كان ثقة ومن رجال الشيخين، - ففيه كلام كثير - كما تراه في `التهذيب` وغيره - ، وكان له تخاليط، ومنكرات، مع غلو في التشيع، قال ابن سعد في `الطبقات` (6/400) :
(1) كذا في طبعة الدعاس، ولم يثبت التحسين في طبعات أخرى.
`كان ثقة صدوقاً إن شاء الله، كثير الحديث، حسن الهيئة، وكان يتشيع، ويروي أحاديث في التشيع منكرة، فضعف بذلك عند كثير من الناس`. وفي `التهذيب`:
`قال أبو الحسن الميموني: وذُكر عنده - يعني: أحمد بن حنبل - (عبيد الله ابن موسى) ، فرأيته كالمنكر له. قال:
`كان صاحب تخليط، وحدث بأحاديث سوء، أخرج تلك البلايا فحدث بها`.
قيل له: فابن فضيل؟ قال: لم يكن مثله، كان أستر منه، وأما هو فأخرج تلك الأحاديث الردية`.
قلت: ولعل هذا منها - فيما يشير الإمام - ، وذكر له في `العلل` (1/556/1327 - تحقيق وصي الله) حديثاًَ، وعقب عليه بقوله:
`أراه دخل لـ (عبيد الله بن موسى) إسناد حديث في إسناده حديث`.
قلت: وحديث الترجمة من هذا القبيل في نقدي، لما سأذكره قريباً.
والآخر - من السببين - : أن (عبيد الله) اضطرب في إسناد الحديث، فمرة رواه عن عيسى بن عمر عن إسماعيل السدي - كما تقدم - ومرة قال: ثنا إسماعيل بن سلمان الأزرق عن أنس به مطولاً.

أخرجه البزار (3/193 - 194 - كشف الأستار) : حدثنا أحمد بن عثمان ابن حكيم: ثنا عبيد الله بن موسى به. وعلقه البخاري (1/1/358) . وقال البزار:
`قد روي عن أنس من وجوه، وكل من رواه عن أنس فليس بالقوي،
وإسماعيل كوفي حدث عن أنس بحديثين`.
وقال الهيثمي في `مجمع الزوائد` (9/126) :
`رواه البزار، وفيه إسماعيل بن سلمان وهو متروك`.
قلت: فأنا أخشى أن يكون قول (عبيد الله بن موسى) في الإسناد المتقدم:
`إسماعيل السدي` من تخاليطه التي أشار إليها الإمام أحمد … جعله مكان:
(إسماعيل بن سلمان) المتروك، فإن إسناد البزار إليه بذلك صحيح، فالحديث إنما هو حديث ابن سلمان هذا المتروك، وليس حديث (إسماعيل السدي) الثقة، ولعل في قول البزار المتقدم:
`وكل من رواه عن أنس فليس بالقوي` - إشارة إلى ذلك - . ومثله قول أبي يعلى الخليلي في `الإرشاد` (1/420) :
`حديث الطير، وضعه كذاب على مالك يقال له: (صخر الحاجبي) من أهل مرو … وما روى حديث الطير ثقة، رواه الضعفاء، مثل: (إسماعيل بن سلمان الأزرق) وأشباهه، ويرده جميع أهل الحديث`.
قلت: وعلى رأسهم الإمام البخاري، فقد أورده في `التاريخ` (1/2/2 - 3) من طريق عثمان الطويل عن أنس به، مثل رواية الترمذي، وقال:
`ولا يعرف لعثمان سماع من أنس`.
قلت: وفي الطريق إليه (أحمد بن يزيد بن إبراهيم أبو الحسن الحراني) ، روى له البخاري متابعة، وضعفه أبو حاتم.
ثم رواه من طريق عبد الملك بن أبي سليمان عن أنس بهذا. وقال:
`مرسل`. يعني: منقطع بين عبد الملك وأنس.
قلت: ولعل هذا هو أصل الحديث: الانقطاع، لا يدري الرواي له عن أنس، ثم سرقه بعض الوضاعين - من الشيعة والضعفاء والمجهولين منهم، أو المتعاطفين معهم - ، فركبوا عليه أسانيد كثيرة، يدلك على ذلك قول الحاكم في `المتسدرك` (3/131) :
`وقد رواه عن أنس جماعة من أصحابه زيادة على ثلاثين نفساً`.
ثمل لم يستطع أن يسوق منها إلا طريقين فقط، غير سالمين من الطعن، صحح احدهما على شرط الشيخين! وسكت عن الآخر، فتعقبه الذهبي في هذا بقوله:
`قلت: إبراهيم بن ثابت ساقط` (1) . وقال في الأول:
`قلت: ابن عياض لا أعرفه، ولقد كنت زماناً طويلاً أظن أن حديث الطير لم يجسر الحاكم أن يودعه في `مستدركه`، فلما علقت هذا الكتاب، رأيت الهول من الموضوعات التي فيه، فإذا حديث الطير بالنسبة إليها سماء`!
وتجد مصداق ما ذكرته آنفاً من تركيب الأسانيد عليه ممن أشرنا إليهم - من الوضاعين وغيرهم - في الطرق التي خرجها ابن الجوزي، وقد بلغت في عده ستة عشر طريقاً، وهي في الواقع خمسة عشر، لأن الطريق الرابع عشر والخامس عشر مدارهما على مسلم أبي عبد الله في الأول منهما، وهو: مسلم الملائي في الآخر.
(1) وقال العقيلي (1/46) في حديث إبراهيم هذا:
`وليس له من حديث ثابت أصل، وتابعه معلى بن عبد الرحمن، وهو يكذب، ولم يأت به ثقة. وهذا الباب الرواية فيها لين وضعف، لا نعلم فيه شيء ثابث (!) ، وهكذا قال البخاري`.
وللفائدة أقول:
وقد بيض للطريق العاشر، وفيه (أحمد بن سعيد بن فرقد الجُدّي) : نا أبو حُمة محمد بن يوسف اليمامي: نا أبو قرة موسى بن طارق بسنده عن أنس.
والظاهر أنه لم يعرف (أحمد بن سعيد) هذا، وحق له ذلك، فإن الذهبي لما أورده في `الميزان`، لم يزد على قوله:
`وعنه الطبراني. فذكر حديث الطير بإسناد الصحيح، فهو المتهم به`.
قلت: لم أقف على إسناده، ولعله في بعض كتبه التي لم نطلع عليها، مثل:
`كتاب فضائل علي رضي الله عنه`، أو: `كتاب دلائل النبوة`.
وعزاه الحافظ في `اللسان` للحاكم عنه بإسناده المذكور أعلاه - ولم أره في `المستدرك` - وقال:
`وأحمد بن سعيد معروف من شيوخ الطبراني، وأظنه دخل عليه إسناد في إسناد`.
قلت: لكن أحمد هذا ليس من مشهوري شيوخ الطبراني، فإنه لم يرو له في `المعجم الأوسط` (1/94/1/1727، 1728 - بترقيمي) إلا حديثين بإسناد واحد، وهو المذكور آنفاً، لكن عن موسى بن عقبة عن عبيد الله بن عمر
عن نافع عن ابن عمر، وأحدهما في `المعجم الصغير` برقم (




(হে আল্লাহ! তোমার সৃষ্টির মধ্যে তোমার কাছে সর্বাধিক প্রিয় ব্যক্তিকে আমার কাছে নিয়ে আসো, যেন সে আমার সাথে এই পাখি থেকে আহার করে। অতঃপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, কিন্তু তিনি তাকে ফিরিয়ে দিলেন। অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, কিন্তু তিনি তাকেও ফিরিয়ে দিলেন। অতঃপর আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, তখন তিনি তাকে অনুমতি দিলেন।)
মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি নাসাঈ তাঁর ‘আস-সুনানুল কুবরা’ (৫/১০৭/৮৩৯৮ - আল-খাসাইস)-এ এবং ইবনুল জাওযী তাঁর ‘আল-ইলালুল মুতানাহিয়্যাহ’ (১/২২৬/৩৬২)-তে মুসহির ইবনু আব্দুল মালিক সূত্রে, তিনি ঈসা ইবনু উমার সূত্রে, তিনি আস-সুদ্দী সূত্রে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন:
যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে একটি পাখি ছিল, তখন তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে (মুসহির ইবনু আব্দুল্লাহ) ব্যতীত। তার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। যাহাবী তাকে ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন: ‘সে শক্তিশালী নয়। বুখারী বলেছেন: তার ব্যাপারে কিছু আপত্তি আছে।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তার হাদীসে দুর্বলতা আছে (লাইয়্যিনুল হাদীস)।’

ইবনুল জাওযী বুখারীর উপরোক্ত উক্তি দ্বারা এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্লাল) করেছেন। তবে এর একজন মুতাবি’ (সমর্থক বর্ণনাকারী) আছে। যেমন তিরমিযী (৩৮২৩) বলেছেন: আমাদের কাছে সুফিয়ান ইবনু ওয়াকী’ হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদের উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা খবর দিয়েছেন, তিনি ঈসা ইবনু উমার সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন, তবে আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উল্লেখ ছাড়াই। তিনি (তিরমিযী) বলেছেন: ‘হাদীসটি হাসান (১) গারীব। আমরা সুদ্দী-এর হাদীস হিসেবে এই সূত্র ছাড়া অন্য কোনো সূত্র জানি না।’

আমি বলি: সুফিয়ান ইবনু ওয়াকী’ সম্পর্কে যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তাকে দুর্বল বলা হয়েছে। আবূ যুর’আ বলেছেন: সে মিথ্যার অভিযোগে অভিযুক্ত ছিল।’

আমি বলি: কিন্তু তার মুতাবা’আত (সমর্থন) করা হয়েছে। ইবনুল জাওযী (৩৬৩) দারাকুতনী-এর সূত্রে তার সনদসহ এটি বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে মুহাম্মাদ ইবনু মাখলাদ হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাতিম ইবনু আল-লাইস বলেছেন: আমাদের কাছে উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা এটি বর্ণনা করেছেন। এই সনদের সকল বর্ণনাকারীই সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে (আস-সুদ্দী)-এর ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে—আর তিনি হলেন (আস-সুদ্দী আল-কাবীর), তার নাম ইসমাঈল ইবনু আব্দুর রহমান। ইবনুল জাওযী এই কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি সহীহ নয়, কারণ ইসমাঈল আস-সুদ্দী-কে আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী এবং ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন দুর্বল বলেছেন।’

আমি বলি—এবং আল্লাহর কাছেই সাহায্য চাই—: সম্ভবত এটিকে (উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা)-এর কারণে ত্রুটিযুক্ত করা অধিক উত্তম। আর তিনি হলেন: ইবনু আবিল মুখতার আল-আবসী। এর দুটি কারণ রয়েছে:

প্রথমত: (উবাইদুল্লাহ) যদিও সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) এবং শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত, তবুও তার ব্যাপারে অনেক কথা রয়েছে—যেমনটি আপনি ‘আত-তাহযীব’ ও অন্যান্য গ্রন্থে দেখতে পাবেন—। তার ভুলভ্রান্তি (তাখালীত) ও মুনকার (অস্বীকৃত) বর্ণনা ছিল, পাশাপাশি শিয়া মতবাদের প্রতি তার বাড়াবাড়ি ছিল। ইবনু সা’দ ‘আত-তাবাকাত’ (৬/৪০০)-এ বলেছেন:
(১) আদ-দা’আস-এর সংস্করণে এমনই আছে, তবে অন্যান্য সংস্করণে ‘হাসান’ শব্দটি প্রমাণিত নয়।
‘সে ইনশাআল্লাহ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) ও সত্যবাদী ছিল, প্রচুর হাদীস বর্ণনা করত, তার বাহ্যিক রূপ ভালো ছিল। তবে সে শিয়া মতাবলম্বী ছিল এবং শিয়া মতবাদের পক্ষে মুনকার হাদীস বর্ণনা করত। ফলে বহু মানুষের কাছে সে দুর্বল হয়ে যায়।’ ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে আছে: আবুল হাসান আল-মায়মূনী বলেছেন: তার (অর্থাৎ আহমাদ ইবনু হাম্বাল-এর) কাছে (উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা)-এর কথা উল্লেখ করা হলে, আমি তাকে তার প্রতি আপত্তি জানাতে দেখলাম। তিনি বললেন: ‘সে ছিল ভুলভ্রান্তির অধিকারী (সাহিবু তাখলীত)। সে খারাপ হাদীস বর্ণনা করত। সে ঐসব বিপদ (খারাপ হাদীস) বের করে এনে বর্ণনা করত।’ তাকে জিজ্ঞেস করা হলো: ইবনু ফুযাইল কেমন? তিনি বললেন: সে তার মতো ছিল না, সে তার চেয়ে বেশি গোপনকারী ছিল। কিন্তু সে (উবাইদুল্লাহ) ঐসব খারাপ হাদীস প্রকাশ করে দিত।’

আমি বলি: সম্ভবত ইমাম (আহমাদ) যা ইঙ্গিত করেছেন, এটিও সেইগুলোর অন্তর্ভুক্ত। তিনি (আহমাদ) ‘আল-ইলাল’ (১/৫৫৬/১৩২৭ - তাহক্বীক্ব: ওয়াসীয়ুল্লাহ) গ্রন্থে তার জন্য একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন এবং এর উপর মন্তব্য করে বলেছেন: ‘আমি মনে করি, (উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা)-এর জন্য একটি হাদীসের সনদ অন্য একটি হাদীসের সনদে প্রবেশ করেছে।’ আমি বলি: আমার মতে, আলোচ্য হাদীসটিও এই প্রকারের, যা আমি শীঘ্রই উল্লেখ করব।

দ্বিতীয় কারণটি হলো: (উবাইদুল্লাহ) হাদীসের সনদে ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা) করেছেন। একবার তিনি এটি ঈসা ইবনু উমার সূত্রে, তিনি ইসমাঈল আস-সুদ্দী সূত্রে বর্ণনা করেছেন—যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে—। আর আরেকবার তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে ইসমাঈল ইবনু সালমান আল-আযরাক্ব হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি বিস্তারিতভাবে বর্ণনা করেছেন।

এটি বাযযার (৩/১৯৩-১৯৪ - কাশফুল আসতার)-এ বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে আহমাদ ইবনু উসমান ইবনু হাকীম হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা এটি বর্ণনা করেছেন। বুখারীও এটি তা’লীক্ব (১/১/৩৫৮) করেছেন। বাযযার বলেছেন: ‘এটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বিভিন্ন সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, কিন্তু যারা আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, তাদের কেউই শক্তিশালী নন। আর ইসমাঈল একজন কূফী, সে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে দুটি হাদীস বর্ণনা করেছে।’

হাইসামী ‘মাজমাউয যাওয়ায়িদ’ (৯/১২৬)-এ বলেছেন: ‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এতে ইসমাঈল ইবনু সালমান রয়েছে, যে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

আমি বলি: আমি আশঙ্কা করি যে, উবাইদুল্লাহ ইবনু মূসা-এর পূর্বোক্ত সনদে ‘ইসমাঈল আস-সুদ্দী’ বলাটা ইমাম আহমাদ যার প্রতি ইঙ্গিত করেছেন, তার সেই ভুলভ্রান্তিগুলোর (তাখালীত) অন্তর্ভুক্ত... তিনি এটিকে মাতরূক (পরিত্যক্ত) বর্ণনাকারী (ইসমাঈল ইবনু সালমান)-এর স্থানে বসিয়ে দিয়েছেন। কারণ বাযযারের সনদ তার (উবাইদুল্লাহর) কাছে এই সূত্রে সহীহ। সুতরাং হাদীসটি মূলত এই ইবনু সালমান আল-মাতরূক-এর হাদীস, সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বর্ণনাকারী (ইসমাঈল আস-সুদ্দী)-এর হাদীস নয়। সম্ভবত বাযযারের পূর্বোক্ত উক্তি: ‘যারা আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, তাদের কেউই শক্তিশালী নন’—এই দিকেই ইঙ্গিত করে।

অনুরূপভাবে আবূ ইয়া’লা আল-খালীলী ‘আল-ইরশাদ’ (১/৪২০)-এ বলেছেন: ‘হাদীসুত্ব ত্বাইর (পাখির হাদীস) মারও-এর অধিবাসী সাখর আল-হাজিবী নামক এক মিথ্যুক মালিক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নামে জাল করেছে... হাদীসুত্ব ত্বাইর কোনো সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) ব্যক্তি বর্ণনা করেননি। এটি দুর্বল বর্ণনাকারীরা বর্ণনা করেছে, যেমন: (ইসমাঈল ইবনু সালমান আল-আযরাক্ব) এবং তার মতো লোকেরা। সকল আহলুল হাদীস এটিকে প্রত্যাখ্যান করেছেন।’

আমি বলি: আর তাদের শীর্ষে রয়েছেন ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ)। তিনি এটি ‘আত-তারীখ’ (১/২/২-৩)-এ উসমান আত-ত্বাভীল সূত্রে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে, তিরমিযীর বর্ণনার মতোই উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘উসমানের আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনার কথা জানা যায় না।’ আমি বলি: এই সনদে তার (বুখারীর) কাছে পৌঁছানোর পথে (আহমাদ ইবনু ইয়াযীদ ইবনু ইবরাহীম আবুল হাসান আল-হাররানী) রয়েছেন। বুখারী তার মুতাবা’আত বর্ণনা করেছেন, কিন্তু আবূ হাতিম তাকে দুর্বল বলেছেন।

অতঃপর তিনি এটি আব্দুল মালিক ইবনু আবী সুলাইমান সূত্রে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এবং বলেছেন: ‘মুরসাল (বিচ্ছিন্ন)।’ অর্থাৎ আব্দুল মালিক ও আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে।

আমি বলি: সম্ভবত এটাই হাদীসটির মূল: ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা)। বর্ণনাকারী আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি শোনেননি। অতঃপর কিছু জালকারী—তাদের মধ্যে শিয়া, দুর্বল ও মাজহূল (অজ্ঞাত) বর্ণনাকারী অথবা তাদের প্রতি সহানুভূতিশীল ব্যক্তিরা—এটি চুরি করে নিয়েছে এবং এর উপর বহু সনদ জুড়ে দিয়েছে। হাকেম ‘আল-মুসতাদরাক’ (৩/১৩১)-এ যা বলেছেন, তা আপনাকে এই বিষয়ে পথ দেখাবে: ‘আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ত্রিশজনেরও বেশি সংখ্যক সাথী এটি তার থেকে বর্ণনা করেছেন।’

অতঃপর তিনি (হাকেম) এর মধ্যে মাত্র দুটি সূত্র ছাড়া আর কোনো সূত্র পেশ করতে পারেননি, যা ত্রুটিমুক্ত নয়। তিনি সেগুলোর একটিকে শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ বলেছেন! আর অন্যটি সম্পর্কে নীরব থেকেছেন। যাহাবী এই বিষয়ে তার (হাকেমের) সমালোচনা করে বলেছেন: ‘আমি বলি: ইবরাহীম ইবনু সাবিত ساقط (পরিত্যক্ত) (১)।’ আর প্রথমটি সম্পর্কে বলেছেন: ‘আমি বলি: ইবনু আইয়াযকে আমি চিনি না। আমি দীর্ঘকাল ধরে মনে করতাম যে, হাকেম ‘মুসতাদরাক’-এ হাদীসুত্ব ত্বাইর অন্তর্ভুক্ত করার সাহস করেননি। কিন্তু যখন আমি এই কিতাবের উপর টীকা লিখলাম, তখন এর মধ্যে থাকা মাওদ্বূ’ (জাল) হাদীসগুলোর ভয়াবহতা দেখলাম। সেগুলোর তুলনায় হাদীসুত্ব ত্বাইর যেন আকাশ!’

(১) উকাইলী (১/৪৬) এই ইবরাহীমের হাদীস সম্পর্কে বলেছেন: ‘সাবিত-এর হাদীস হিসেবে এর কোনো ভিত্তি নেই। মু’আল্লা ইবনু আব্দুর রহমান তার মুতাবা’আত করেছে, আর সে মিথ্যাবাদী। কোনো সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) ব্যক্তি এটি বর্ণনা করেননি। এই অধ্যায়ের বর্ণনায় দুর্বলতা ও নমনীয়তা রয়েছে। আমরা এতে কোনো প্রমাণিত বিষয় জানি না (!)। বুখারীও এমনই বলেছেন।’

আমি পূর্বে জালকারী ও অন্যান্য যাদের প্রতি ইঙ্গিত করেছি, তাদের দ্বারা এর উপর সনদ জুড়ে দেওয়ার সত্যতা আপনি ইবনুল জাওযী কর্তৃক সংকলিত সূত্রগুলোতে পাবেন। তিনি গণনা করে ষোলটি সূত্র উল্লেখ করেছেন, কিন্তু বাস্তবে তা পনেরোটি, কারণ চৌদ্দ ও পনেরো নম্বর সূত্রের মাদার (কেন্দ্র) হলো মুসলিম আবূ আব্দুল্লাহ, যিনি প্রথমটিতে আছেন, আর শেষটিতে তিনি মুসলিম আল-মাল্লাঈ।

উপকারের জন্য আমি বলি: দশম সূত্রটির জন্য সাদা জায়গা (খালি) রাখা হয়েছে। এতে রয়েছেন (আহমাদ ইবনু সাঈদ ইবনু ফারক্বাদ আল-জুদ্দী): আমাদের কাছে আবূ হুম্মাহ মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ আল-ইয়ামামী হাদীস বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে আবূ কুররাহ মূসা ইবনু তারিক্ব তার সনদসহ আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। স্পষ্টতই তিনি এই (আহমাদ ইবনু সাঈদ)-কে চিনতে পারেননি, আর এটাই স্বাভাবিক। কারণ যাহাবী যখন তাকে ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, তখন এর বেশি কিছু বলেননি: ‘তার থেকে ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি সহীহ সনদে হাদীসুত্ব ত্বাইর উল্লেখ করেছেন, সুতরাং সে-ই এর অভিযুক্ত।’

আমি বলি: আমি তার সনদের সন্ধান পাইনি। সম্ভবত এটি তার এমন কিছু গ্রন্থে রয়েছে যা আমরা দেখতে পাইনি, যেমন: ‘কিতাবু ফাদ্বা-ইলিল আলী রাদিয়াল্লাহু আনহু’ অথবা ‘কিতাবু দালা-ইলিন নুবুওয়াহ’। হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে হাকেম-এর সূত্রে তার থেকে উপরোক্ত সনদসহ এটি বর্ণনা করেছেন—যদিও আমি এটি ‘আল-মুসতাদরাক’-এ দেখিনি—এবং বলেছেন: ‘আহমাদ ইবনু সাঈদ ত্বাবারানীর পরিচিত শাইখদের অন্তর্ভুক্ত, আর আমি মনে করি তার কাছে একটি সনদ অন্য সনদে প্রবেশ করেছে।’ আমি বলি: কিন্তু এই আহমাদ ত্বাবারানীর প্রসিদ্ধ শাইখদের অন্তর্ভুক্ত নন। কারণ তিনি ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (১/৯৪/১/১৭২৭, ১৭২৮ - আমার সংখ্যায়ন অনুযায়ী)-এ তার থেকে মাত্র দুটি হাদীস বর্ণনা করেছেন, যা একই সনদে বর্ণিত, আর তা হলো পূর্বে উল্লেখিত সনদ, তবে মূসা ইবনু উক্ববাহ সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার সূত্রে, তিনি নাফি’ সূত্রে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে। আর সেগুলোর একটি ‘আল-মু’জামুস সাগীর’-এ ("









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6576)


(إذا رأيتم الرجل أصفر الوجه من غير مرض ولا عبادة، فذاك من غشّ الإسلام في قلبه) .
موضوع.

أخرجه أبو نعيم في `كتاب الطب` (باب استعمال الفراسة … ) (ق 16/2) من طريق حماد بن المبارك: ثنا السري بن إسماعيل عن الأوزاعي عن رجل عن أنس بن مالك مرفوعاً.
قلت: وهذا موضوع، آفته: (السري بن إسماعيل) ، وهو متروك بالاتفاق، بل كذبه القطان - كما في `المغني` - .
وفوقه الرجل الذي لم يسم، فهذه على أخرى، ولكنها دون الأولى، ومثلها الراوي عن السري (حماد بن المبارك) ، فإنه مجهول - كما قال أبو حاتم، وتبعه الذهبي والعسقلاني - ، وهو: أبو جعفر الأزدي السجستاني - فيما يظهر - . والله أعلم.
وقد روي الحديث بإسناد آخر عن ابن عباس بنحوه، هو مثل هذا أو أسوأ منه - كما تقدم بيانه برقم (2067) - ، ومع ذلك بيض له جماعة من الحفاظ والعلماء، فلم يتكلموا على إسناده بشيء - كما فصلت هناط - . ونحو ذلك وقع لهم في
حديث أنس هذا، فقال السخاوي في `المقاصد` (ص 24) - بعد أن ساق متنه - :
`وقال شيخنا: إنه لم يقف له على أصل عنه، وإن ذكره ابن القيم في `الطب النبوي` فذاك بغير سند`.
ثم تعقبه السخاوي بقوله:
`قلت: ذكره أبو نعيم في `الطب` من حديث حماد بن المبارك عن السري ابن إسماعيل … ` إلخ.
ومن العجيب أن السخاوي سكت عن إسناده ولم يتكلم عليه بشيء! فكأنه قنع بظهور ضعفه بالرجل الذي لم يسم! وهذا لا يتناسب مع المعروف من حفظه وتحقيقه ونقده، ولك لا، وهو الحافظ تلميذ الحافظ العسقلاني؟! فما كان ينبغي أن يخفى على مثله حال (السري بن إسماعيل) ، ويسكت عنه!
وهذا ما أصاب المعلق على `المقاصد`، وهو الشيخ عبد الله الغماري، فإنه علق على (حماد بن المبارك) فقط وقال:
`وهو مجهول`.
وهذا مما لا يستغرب منه، فإنه ليس بـ: (الحافظ … ) - كما يدعي في بعض كتبه - !
وأما المناوي، فقارب الصواب بقوله في `فيض القدير`:
`أخرجه أبو نعيم في `الطب` بسند واهٍ عن أنس`.
وأما الشيخ أحمد الغماري في `المداوي` (1/222 - 223، 380) ، فشغله
نقده للمناوي، وبيان بعض أوهامه عن بيان مرتبة هذا الحديث، وحديث ابن عباس المشار إليه آنفاً!
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(যখন তোমরা কোনো ব্যক্তিকে রোগ বা ইবাদত ব্যতীত হলুদ চেহারার দেখবে, তখন তা তার অন্তরে ইসলামের প্রতি প্রতারণা (বিশ্বাসঘাতকতা) থাকার কারণে।)
মাওদ্বূ (বানোয়াট)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ নুআইম তাঁর ‘কিতাবুত তিব্ব’ (Kitab At-Tibb)-এ (باب استعمال الفراسة … ) (খন্ড ১৬/২) হাম্মাদ ইবনুল মুবারকের সূত্রে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আস-সারী ইবনু ইসমাঈল, তিনি আল-আওযাঈ থেকে, তিনি এক ব্যক্তি থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এটি মাওদ্বূ (বানোয়াট)। এর ত্রুটি হলো: (আস-সারী ইবনু ইসমাঈল)। সে সর্বসম্মতিক্রমে মাতরূক (পরিত্যক্ত রাবী)। বরং আল-কাত্তান তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন – যেমনটি ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে রয়েছে।

আর তার উপরে রয়েছে এমন এক ব্যক্তি যার নাম উল্লেখ করা হয়নি। এটি আরেকটি ত্রুটি, তবে তা প্রথমটির চেয়ে কম গুরুতর। আর তার মতোই হলো আস-সারী থেকে বর্ণনাকারী (হাম্মাদ ইবনুল মুবারক)। কেননা সে মাজহূল (অজ্ঞাত রাবী) – যেমনটি আবূ হাতিম বলেছেন এবং যাহাবী ও আল-আসকালানী তাকে অনুসরণ করেছেন। দৃশ্যত সে হলো: আবূ জা’ফার আল-আযদী আস-সিজিস্তানী। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

এই হাদীসটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ অর্থে অন্য একটি ইসনাদে বর্ণিত হয়েছে, যা এর মতোই অথবা এর চেয়েও খারাপ – যেমনটি পূর্বে (২০৬৭) নম্বরে এর ব্যাখ্যা দেওয়া হয়েছে। এতদসত্ত্বেও হাফিয ও আলিমদের একটি দল এটিকে সাদা খাতা (দোষমুক্ত) রেখেছেন, তারা এর ইসনাদ সম্পর্কে কোনো মন্তব্য করেননি – যেমনটি আমি সেখানে বিস্তারিত বলেছি।

আর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসের ক্ষেত্রেও তাদের সাথে অনুরূপ ঘটনা ঘটেছে। আস-সাখাবী ‘আল-মাকাসিদ’ (পৃ. ২৪)-এ – এর মতন উল্লেখ করার পর – বলেছেন: ‘আমাদের শায়খ বলেছেন: তিনি এর কোনো মূল ভিত্তি খুঁজে পাননি, যদিও ইবনুল কায়্যিম এটিকে ‘আত-তিব্বুন নাবাবী’তে উল্লেখ করেছেন, তবে তা সনদবিহীনভাবে।’

অতঃপর আস-সাখাবী তার মন্তব্যকে অনুসরণ করে বলেছেন: ‘আমি বলি: আবূ নুআইম এটিকে ‘আত-তিব্ব’ গ্রন্থে হাম্মাদ ইবনুল মুবারক থেকে, তিনি আস-সারী ইবনু ইসমাঈল থেকে বর্ণিত হাদীস হিসেবে উল্লেখ করেছেন... ইত্যাদি।’

আশ্চর্যের বিষয় হলো, আস-সাখাবী এর ইসনাদ সম্পর্কে নীরব থেকেছেন এবং কোনো মন্তব্য করেননি! যেন তিনি নাম উল্লেখ না করা ব্যক্তির কারণে এর প্রকাশ্য দুর্বলতাতেই সন্তুষ্ট ছিলেন! এটি তার পরিচিত মুখস্থবিদ্যা, তাহকীক (গবেষণা) এবং সমালোচনার সাথে মানানসই নয়। তিনি তো হাফিয, হাফিয আল-আসকালানীর ছাত্র! (আস-সারী ইবনু ইসমাঈল)-এর অবস্থা তার মতো ব্যক্তির কাছে গোপন থাকা এবং এ বিষয়ে নীরব থাকা উচিত ছিল না!

‘আল-মাকাসিদ’-এর টীকাকার শায়খ আব্দুল্লাহ আল-গুম্মারীর ক্ষেত্রেও একই ঘটনা ঘটেছে। তিনি কেবল (হাম্মাদ ইবনুল মুবারক)-এর উপর মন্তব্য করেছেন এবং বলেছেন: ‘সে মাজহূল (অজ্ঞাত রাবী)।’ তার কাছ থেকে এটি অপ্রত্যাশিত নয়, কারণ সে (হাফিয...) নয় – যেমনটি সে তার কিছু কিতাবে দাবি করে থাকে!

আর আল-মুনাভী, তিনি ‘ফায়দুল কাদীর’ গ্রন্থে তার এই উক্তির মাধ্যমে সঠিকের কাছাকাছি পৌঁছেছেন: ‘আবূ নুআইম এটিকে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে দুর্বল (ওয়াহী) সনদ সহকারে ‘আত-তিব্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।’

আর শায়খ আহমাদ আল-গুম্মারী ‘আল-মুদাবী’ (১/২২২-২২৩, ৩৮০)-তে আল-মুনাভীর সমালোচনা এবং তার কিছু ভুল তুলে ধরার কাজে এতই ব্যস্ত ছিলেন যে, তিনি এই হাদীস এবং পূর্বে উল্লেখিত ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের স্তর (মর্যাদা) বর্ণনা করা থেকে বিরত থেকেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6577)


(المجالِسُ ثلاثة: سالمٌُ، وغانمٌ، وشاجبٌ. فالغانم: الذي يُكثر ذكر الله في مجسله. والسالم: الذي يسكتُ، لا له ولا عليه. والشاجب: الذي يكون كلامه وعمله في معصية الله عز وجب) .
ضعيف جداً.

أخرجه الأصبهاني في `الترغيب والترهيب` (2/563/1345) من طريق يحيى بن عبيد الله قال: سمعت أبي قال: سمعت أبا هريرة رضي الله عنه يقول: قال النبي صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
ومن هذا الوجه رواه مسدد - كما في `المطالب العالية` (ق 122/2) - .
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً، يحيى هذا - هو: ابن عبيد الله بن عبد الله ابن موهب المدني - قال ابن حبان في `الضعفاء` (3/121) :
`كان من خيار عباد الله، يروي عن أبيه ما لا أصل له، وأبوه ثقة، فلما كثّر روايته عن أبيه ما ليس من حديثه، سقط من حد الاحتجاج به، وكان سيء الصلاة، وكان ابن عيينة شديد الحمل عليه`.
قلت: وأبوه وثقه ابن حبان أيضاً في `الثقات`، وتفرج بذلك، وقال الشافعي وغيره:
`لا نعرفه`. ولهذه قال الحافظ في `التقريب`:
`مقبول`.
وللحديث طريق أخرى: يرويه موسى الجهني عن مهراق مؤذن سعيد بن جبير قال: سمعت أبا هريرة في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:.... فذكره نحوه.

أخرجه البيهقي في `شعب الإيمان` (7/417/10814) .
قلت: ورجاله ثقات، غير (مخراق) هذا، ذكره البخاري وابن أبي حاتم في كتابيهما من رواية موسى الجهني عنه، ولم يذكرا فيه جرحاً ولا تعديلاً، وأما ابن حبان فذكره من هذا الوجه أيضاً في `الثقات` (5/461) ! وقال:
`شيخ`!
قلت: فهو مجهول. والله أعلم.
ورواه العلاء بن زيدل عن أنس بن مالك مرفوعاً نحوه.

أخرجه ابن حبان في ترجمة (العلاء) هذا (2/180) ، ثم قال:
`شيخ يروي عن أنس بن مالك بنسخة موضوعة، لا يحل ذكره في الكتب إلا على سبيل التعجب`.
ثم ساق له أحاديث - هذا أحدها - ، وقال:
`كلها موضوعة مقلوبة`.
وذكره ابن طاهر المقدسي في `تذكرة الموضوعات` وقال (ص 119) :
`فيه العلاء بن زيدل، له نسخة موضوعة، وهو متروك الحديث`.
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(মজলিস বা বৈঠক তিন প্রকার: সালীম (নিরাপদ), গানীম (লাভজনক), এবং শাজিব (ধ্বংসাত্মক)। গানীম হলো: যে তার মজলিসে আল্লাহর যিকির বেশি করে। সালীম হলো: যে চুপ থাকে, তার পক্ষেও কিছু নেই, বিপক্ষেও কিছু নেই। আর শাজিব হলো: যার কথা ও কাজ আল্লাহর অবাধ্যতার মধ্যে থাকে।)

খুবই যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আল-আসবাহানী তাঁর ‘আত-তারগীব ওয়াত-তারহীব’ গ্রন্থে (২/৫৬৩/১৩৪৫) ইয়াহইয়া ইবনু উবাইদুল্লাহর সূত্রে। তিনি বলেন: আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, তিনি বলেন: আমি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।

আর এই সূত্রেই এটি বর্ণনা করেছেন মুসাদ্দাদ – যেমনটি ‘আল-মাতালিবুল আলিয়াহ’ গ্রন্থে রয়েছে (ক্বাফ ১১২/২)।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই যঈফ (দুর্বল)। এই ইয়াহইয়া – তিনি হলেন: ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মাওহিব আল-মাদানী। ইবনু হিব্বান ‘আয-যুআফা’ গ্রন্থে (৩/১২১) বলেছেন:

‘তিনি আল্লাহর উত্তম বান্দাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন। তিনি তার পিতা থেকে এমন সব বর্ণনা করতেন যার কোনো ভিত্তি নেই, যদিও তার পিতা সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)। যখন তিনি তার পিতা থেকে এমন অনেক কিছু বর্ণনা করতে শুরু করলেন যা তার হাদীস নয়, তখন তিনি দলীল হিসেবে পেশ করার সীমা থেকে বাদ পড়ে গেলেন। তিনি সালাতে খারাপ ছিলেন এবং ইবনু উয়াইনাহ তার উপর কঠোর সমালোচনা করতেন।’

আমি বলি: আর তার পিতাকেও ইবনু হিব্বান ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বলেছেন, এবং তিনি এর মাধ্যমে স্বস্তি পেয়েছেন। তবে শাফিঈ ও অন্যান্যরা বলেছেন: ‘আমরা তাকে চিনি না।’ এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘মাকবূল’ (গ্রহণযোগ্য)।

আর এই হাদীসের আরেকটি সূত্র রয়েছে: এটি বর্ণনা করেছেন মূসা আল-জুহানী, সাইদ ইবনু জুবাইরের মুয়াযযিন মিহরাক্ব থেকে। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের মসজিদে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: .... অতঃপর তিনি অনুরূপ বর্ণনা করেন।

এটি বর্ণনা করেছেন বাইহাক্বী ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (৭/৪১৭/১০৮১৪)।

আমি বলি: এর বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে এই (মিখরাক্ব) ব্যতীত। বুখারী ও ইবনু আবী হাতিম তাদের কিতাবদ্বয়ে মূসা আল-জুহানীর সূত্রে তার কথা উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তার সম্পর্কে কোনো জারহ (সমালোচনা) বা তা’দীল (প্রশংসা) উল্লেখ করেননি। আর ইবনু হিব্বান এই সূত্রেই তাকে ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে (৫/৪৬১) উল্লেখ করেছেন! এবং বলেছেন: ‘শাইখ’! আমি বলি: সুতরাং তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)। আল্লাহই ভালো জানেন।

আর এটি বর্ণনা করেছেন আল-আলা ইবনু যাইদাল, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে অনুরূপ।

এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু হিব্বান এই (আল-আলা)-এর জীবনীতে (২/১৮০)। অতঃপর তিনি বলেন:

‘তিনি একজন শাইখ, যিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একটি মাওদ্বূ’ (জাল) পান্ডুলিপি বর্ণনা করেন। বিস্ময় প্রকাশের উদ্দেশ্য ছাড়া কিতাবসমূহে তার উল্লেখ করা বৈধ নয়।’

অতঃপর তিনি তার জন্য কিছু হাদীস উল্লেখ করেন – এটি তার মধ্যে একটি – এবং বলেন: ‘এগুলো সবই মাওদ্বূ’ (জাল) ও মাক্বলূবাহ (উল্টে দেওয়া হয়েছে)।’

আর ইবনু তাহির আল-মাক্বদিসী তাকে ‘তাযকিরাতুল মাওদ্বূআত’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন (পৃষ্ঠা ১১৯): ‘এতে আল-আলা ইবনু যাইদাল রয়েছে, তার একটি মাওদ্বূ’ পান্ডুলিপি আছে, আর সে মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত বর্ণনাকারী)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6578)


(فضل العالم على العابد سبعون درجة، ما بين كل درجتين حضر الفرس سبعين عاما، وذلك، لأن الشيطان يضع البدع للناس فيبصرها العالم، فينهى عنها، والعابد مقبل على عبادة ربه، ولا يتوجه لها، ولا يعرفها) .
منكر جداً بهذا التمام.

أخرجه الأصبهاني في `الترغيب` (2/867/2116) من طريق القاسم بن الحكم عن سلام عن خارجة بن مصعب عن زيد ابن أسلم عن عبد الرحمن عن عبد الله بن عمر رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد واهٍ جداً، آفته خارجة أو سلام - وهو: ابن سلم الطويل - ، فإنهما متروكان. وخارجة، قال فيه ابن حبان في `الضعفاء` (1/288) :
`كان يدلس عن غياث بن إبراهيم وغيره، ويروي ما سمع منهم مما وضعوه على الثقات من الثقات الذين رآهم، فمن هنا وقع في حديثه الموضوعات عن الأثبات، لا يحل الاحتجاج بخبره`.
وقال في (سلام) (1/339) :
`يروي عن الثقات الموضوعات، كأنه كان المتعمد لها`. وقال الحافظ في كل منهما:
`متروك`. وزاد خارجة:
`وكان يدلس عن الكذابين، ويقال: إن ابن معين كذبه`.
والحديث أورده المنذري في `ترغيبه` (1/60) من رواية الأصبهاني، ثم
أشار إلى تضعيفه، ولكنه قال:
`وعجز الحديث يشبه المدرج`.
وأرى أن ادعاء الإدراج إنما يحسن في حديث الثقة الذي يغلب على الظن أنه لم يحدث بالمدرج في حديثه. أما في غير الثقة - كما هنا - ، فالأولى كان أن يقال: (يشبه الموضوع) ، لأنه ليس بعيداً عن أن يكون المتعمد له. والله أعلم.
والحديث تقدم مختصراً برقم (2140) .
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(আবিদের (ইবাদতকারী) উপর আলেমের (জ্ঞানীর) মর্যাদা সত্তর গুণ, প্রতিটি স্তরের মাঝে ব্যবধান হলো সত্তর বছর ধরে ঘোড়া দৌড়ানোর দূরত্বের সমান, আর তা এই কারণে যে, শয়তান মানুষের জন্য বিদআত তৈরি করে, তখন আলেম তা দেখতে পান এবং তা থেকে নিষেধ করেন, কিন্তু আবিদ তার রবের ইবাদতে মগ্ন থাকে, সেদিকে মনোযোগ দেয় না এবং তা জানতেও পারে না।)
এই পূর্ণতার সাথে হাদীসটি অত্যন্ত মুনকার (Munkar Jiddan)।

এটি আসবাহানী তাঁর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে সংকলন করেছেন (২/৮৬৭/২১১৬) কাসিম ইবনুল হাকাম-এর সূত্রে, তিনি সালাম থেকে, তিনি খারিজাহ ইবনু মুসআব থেকে, তিনি যায়দ ইবনু আসলাম থেকে, তিনি আবদুর রহমান থেকে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি অত্যন্ত দুর্বল (ওয়াহী জিদ্দান), এর ত্রুটি হলো খারিজাহ অথবা সালাম – যিনি হলেন ইবনু সালম আত-তাওয়ীল – কারণ তারা উভয়েই মাতরূক (পরিত্যক্ত)।

আর খারিজাহ সম্পর্কে ইবনু হিব্বান তাঁর ‘আদ-দুআফা’ গ্রন্থে (১/২৮৮) বলেছেন:
‘সে গিয়াস ইবনু ইবরাহীম ও অন্যান্যদের থেকে তাদলীস করত, এবং সে তাদের কাছ থেকে যা শুনত তা বর্ণনা করত, যা তারা নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের নামে তৈরি করত। এই কারণে তার হাদীসে নির্ভরযোগ্যদের সূত্রে মাওদ্বূ (জাল) বর্ণনা পাওয়া যায়। তার বর্ণনা দ্বারা দলীল পেশ করা বৈধ নয়।’

আর তিনি (সালাম) সম্পর্কে (১/৩৩৯) বলেছেন:
‘সে নির্ভরযোগ্যদের সূত্রে মাওদ্বূ (জাল) হাদীস বর্ণনা করত, মনে হতো যেন সে নিজেই ইচ্ছাকৃতভাবে তা করত।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) তাদের উভয়ের সম্পর্কে বলেছেন: ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।
আর খারিজাহ সম্পর্কে অতিরিক্ত বলেছেন: ‘সে মিথ্যাবাদীদের থেকে তাদলীস করত, এবং বলা হয় যে ইবনু মাঈন তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন।’

আর মুনযিরী হাদীসটি তাঁর ‘তারগীব’ গ্রন্থে (১/৬০) আসবাহানীর বর্ণনা সূত্রে উল্লেখ করেছেন, অতঃপর তিনি এর দুর্বলতার দিকে ইঙ্গিত করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: ‘হাদীসের শেষাংশটি মুদরাজ (সন্নিবেশিত) হওয়ার মতো।’

আর আমি মনে করি যে, ইদরাজ (সন্নিবেশ) এর দাবি কেবল সেই নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীর হাদীসের ক্ষেত্রেই শোভা পায়, যার সম্পর্কে প্রবল ধারণা থাকে যে সে তার হাদীসে মুদরাজ অংশটি বর্ণনা করেনি। কিন্তু অনির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীর ক্ষেত্রে – যেমন এখানে – বরং উত্তম ছিল এই বলা যে: (এটি মাওদ্বূ (জাল) হওয়ার মতো), কারণ সে নিজেই ইচ্ছাকৃতভাবে তা তৈরি করেছে এমন হওয়া অসম্ভব নয়। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

হাদীসটি সংক্ষিপ্ত আকারে পূর্বে ২১৪০ নং-এ উল্লেখ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6579)


(كانت ليلتي من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فانسلَّ، فظننت أنما انسل إلى بعض نسائه، فخرجتُ غيري، فإذا أنا به ساجدٌ كالثوب الطريح، فسمعته يقول:
سجد لك سوادي وخيالي، وآمن بك فؤادي، ربَّ! هذه يدي وما جنبيت به على نفسي، يا عظيمُ! ترجى لكل عظيم، فأغفر الذنبي العظيم. قالت: فرفع رأسه فقال:
ما أخرجك؟ قالت: ظنٌّ ظننتُه! قال:
إن بعض الظن إثمٌ، واستغفري الله! إن جبريل أتاني فأمرني أن أقول هذه الكلمات التي سمعت، فقوليها في سجودك، فإنه من قالها، لم يرفع رأسه حتى يُغفر - أظنه قال: - له) .
منكر جداً.

أخرجه أبو يعلى (8/121 - 122) ، والعقيلي في `الضعفاء`
(4/116) ، وابن عدي (6/240) من طريق محمد بن عثيم أبي ذر قال:
حدثني عثيم عن عثمان بن عطاء الخراساني عن أبيه عن عائشة قالت: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً، مسلسل بالعلل:
الأولى: محمد بن عثيم: وفي ترجمته ساقه العقيلي من مناكيره، وروى عن ابن معين أنه قال فيه:
`كذاب`. وعن البخاري أنه قال:
`منكر الحديث`. وضعفه آخرون.
الثانية: أبوه (عثيم) : والظاهر أنه الذي في `التهذيب`: (عثيم بن كثير ابن كليب الحضرمي) ، ولكنهم لم يذكروا في الرواة عنه ابنه محمداً هذا، وهم ثلاثة ليس فيهم موثق، غير عبد الله بن منيب، ولذلك قال الحافظ:
`مجهول`. وقال الذهبي:
`لا يدرى من هو؟ `.
وأما ابن حبان فذكره في `الثقات` (7/303) !
وقد أشار الذهبي في `الكاشف` إلى تليين توثيقه.
الثالثة: عثمان بن عطاء: ضعيف، ضعفه الدارقطني وغيره.
الرابعة: أبوه عطاء - وهو: ابن أبي مسلم الخاراساني - ، لم يسمع من عائشة رضي الله عنها، على انه مدلس.
وله عنها طريق أخرى: فقال الطبراني في `الدعاء` (2/1071 - 1072) :
حدثنا بكر بن سهل: ثنا عمرو بن هاشم البيروتي: ثنا سليمان بن أبي كريمة عن هشام بن عروة عن أبيه عنها مطولاً وفي آخره ذكر ليلة النصف من شعبان.
ومن هذا الوجه رواه ابن الجوزي في `العلل` (2/67 - 68) وقال:
` لا يصح. قال ابن عدي: أحاديث سليمان بن أبي كريمة مناكير`.
وأقره الحافظ في `التلخيص` (1/254) .
وبكر بن سهل: قال الذهبي:
`حمل الناس عليه، وهو مقارب الحال. قال النسائي: ضعيف`. وفي `اللسان`:
`وقال مسلمة بن قاسم: تكلم الناس فيه، ووضعوه من أجل الحديث الذي حدث به عن … (ساق إسناده) عن مسلمة بن مخلد رفعه: (أعروا النساء يلزمن الحجال) `، وقد مضى تخريجه برقم (2827) .
وإن مما يؤكد نكارة هذا الحديث ما أشار إليه العقيلي بقوله عقبه:
`يروى من غير هذا الوجه بخلاف هذا اللفظ`.
ويعني: ما رواه أبو هريرة عنها قالت:
فقدت رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فلمست المسجد، فإذا هو ساجد، وقدماه
منصوبتان، وهو يقول:
`اللهم! إني أعوذ برضاك من سخطك … `. الحديث.

أخرجه مسلم وغيره من أصحاب `الصحاح` و `السنن` وغيرهم، وهو مخرج في `صفة الصلاة` (147/12) ، و `صحيح أبي داود` (823) .
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(এটি ছিল রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে আমার রাত। তিনি চুপিচুপি সরে গেলেন। আমি ধারণা করলাম যে তিনি হয়তো তাঁর অন্য কোনো স্ত্রীর কাছে গেছেন। তাই আমি ঈর্ষান্বিত হয়ে বেরিয়ে পড়লাম। হঠাৎ আমি তাঁকে দেখলাম যে তিনি একটি ফেলে রাখা কাপড়ের মতো সিজদায় পড়ে আছেন। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম:
"আমার শরীর ও আমার কল্পনা আপনার জন্য সিজদা করেছে, আর আমার হৃদয় আপনার প্রতি ঈমান এনেছে। হে রব! এই আমার হাত এবং এর দ্বারা আমি আমার নিজের উপর যা কিছু করেছি (তাও আপনার কাছে পেশ করছি)। হে মহান সত্তা! আপনি প্রতিটি মহান বিষয়ের জন্য আকাঙ্ক্ষিত, সুতরাং আমার মহান পাপ ক্ষমা করে দিন।" তিনি (আয়েশা) বলেন: অতঃপর তিনি মাথা তুললেন এবং বললেন:
"তোমাকে কী বের করে এনেছে?" তিনি বললেন: "একটি ধারণা যা আমি করেছিলাম!" তিনি বললেন:
"নিশ্চয় কিছু কিছু ধারণা পাপ, আর আল্লাহর কাছে ক্ষমা চাও! নিশ্চয় জিবরীল আমার কাছে এসেছিলেন এবং আমাকে এই কথাগুলো বলতে আদেশ করেছেন যা তুমি শুনেছ। সুতরাং তুমিও তোমার সিজদায় এগুলো বলো। কারণ যে ব্যক্তি এগুলো বলবে, সে মাথা তোলার আগেই তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হবে – আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: – তাকে)।
খুবই মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা (৮/১২২-১২২), আল-উকাইলী তাঁর ‘আদ-দু'আফা’ গ্রন্থে (৪/১১৬), এবং ইবনু আদী (৬/২৪০) মুহাম্মাদ ইবনু উসাইম আবী যার-এর সূত্রে। তিনি বলেন: আমাকে উসাইম বর্ণনা করেছেন উসমান ইবনু আতা আল-খুরাসানী থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই যঈফ (দুর্বল), যা ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত:
প্রথমত: মুহাম্মাদ ইবনু উসাইম: তার জীবনীতে আল-উকাইলী তার মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসগুলো উল্লেখ করেছেন। ইবনু মাঈন থেকে বর্ণিত আছে যে তিনি তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘সে মিথ্যাবাদী (কাযযাব)’। আর বুখারী থেকে বর্ণিত আছে যে তিনি বলেছেন: ‘মুনকারুল হাদীস’। অন্যান্যরাও তাকে দুর্বল বলেছেন।
দ্বিতীয়ত: তার পিতা (উসাইম): স্পষ্টতই তিনি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে উল্লিখিত ব্যক্তি: (উসাইম ইবনু কাছীর ইবনু কুলাইব আল-হাদরামী)। কিন্তু তারা তার বর্ণনাকারীদের মধ্যে তার এই পুত্র মুহাম্মাদের কথা উল্লেখ করেননি। তারা তিনজন, যাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনু মুনীব ছাড়া আর কেউ নির্ভরযোগ্য নন। এই কারণে আল-হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘মাজহুল (অজ্ঞাত)’। আর আয-যাহাবী বলেছেন: ‘সে কে, তা জানা যায় না?’। তবে ইবনু হিব্বান তাকে ‘আছ-ছিকাত’ (৭/৩০৩) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন! আর আয-যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে তার নির্ভরযোগ্যতাকে শিথিল করার ইঙ্গিত দিয়েছেন।
তৃতীয়ত: উসমান ইবনু আতা: যঈফ (দুর্বল)। তাকে দারাকুতনী ও অন্যান্যরা দুর্বল বলেছেন।
চতুর্থত: তার পিতা আতা – আর তিনি হলেন: ইবনু আবী মুসলিম আল-খুরাসানী – তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি, উপরন্তু তিনি একজন মুদাল্লিস (হাদীস গোপনকারী)।

তার (আয়েশা রাঃ) থেকে এর আরেকটি সূত্র রয়েছে: আত-তাবারানী ‘আদ-দু'আ’ গ্রন্থে (২/১০৭১-১০৭২) বলেছেন: আমাদের কাছে বকর ইবনু সাহল বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে আমর ইবনু হাশিম আল-বায়রূতী বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে সুলাইমান ইবনু আবী কারীমা বর্ণনা করেছেন হিশাম ইবনু উরওয়াহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, দীর্ঘাকারে। আর এর শেষে শা'বানের মধ্য রজনীর উল্লেখ রয়েছে।
এই সূত্রেই ইবনু আল-জাওযী ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/৬৭-৬৮) এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি সহীহ নয়। ইবনু আদী বলেছেন: সুলাইমান ইবনু আবী কারীমার হাদীসগুলো মুনকার।’ আল-হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তালখীস’ গ্রন্থে (১/২৫৪) এটিকে সমর্থন করেছেন।
আর বকর ইবনু সাহল সম্পর্কে আয-যাহাবী বলেছেন: ‘মানুষ তার উপর দোষারোপ করেছে, যদিও সে মোটামুটি ভালো অবস্থার ছিল। আন-নাসাঈ বলেছেন: যঈফ (দুর্বল)।’ ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে রয়েছে: ‘মাসলামাহ ইবনু কাসিম বলেছেন: মানুষ তার সম্পর্কে কথা বলেছে এবং তাকে বাদ দিয়েছে এই হাদীসটির কারণে যা সে বর্ণনা করেছে... (তিনি তার সনদ উল্লেখ করেছেন) মাসলামাহ ইবনু মাখলাদ থেকে মারফূ' হিসেবে: (নারীদেরকে উলঙ্গ করো যাতে তারা ঘরের কোণে লেগে থাকে)।’ এর তাখরীজ পূর্বে ২৮২৭ নং-এ চলে গেছে।

আর এই হাদীসটির মুনকার (অস্বীকৃত) হওয়ার বিষয়টি যা নিশ্চিত করে, তা হলো আল-উকাইলীর তার পরে করা ইঙ্গিতপূর্ণ মন্তব্য: ‘এটি এই শব্দ ছাড়া অন্য সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।’
তিনি বোঝাতে চেয়েছেন: যা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি (আয়েশা রাঃ) বলেন: এক রাতে আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে খুঁজে পেলাম না। আমি মসজিদে হাত দিয়ে অনুভব করলাম, হঠাৎ দেখি তিনি সিজদায় আছেন এবং তাঁর পা দুটি খাড়া করা, আর তিনি বলছেন:
‘হে আল্লাহ! আমি আপনার সন্তুষ্টির মাধ্যমে আপনার অসন্তুষ্টি থেকে আশ্রয় চাই...’ হাদীসটি।
এটি মুসলিম এবং অন্যান্য ‘আস-সিহাহ’ ও ‘আস-সুনান’ গ্রন্থের সংকলকগণ এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। এটি ‘সিফাতুস সালাত’ (১৪৭/১২) এবং ‘সহীহ আবী দাউদ’ (৮২৩) গ্রন্থে তাখরীজ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6580)


(إن الله يوحي إلى الحفظة: لا تكتبوا على صُوَّام عبادي بعد العصر سيئة) .
باطل.

أخرجه الخطيب في `التاريخ` (6/124) ، والديلمي في `مسند الفردوس` (1/128/2 - الغرائب الملتقطة) من طريق إبراهيم بن عبد الله بن محمد بن أيوب المخزمي بسنده عن جعفر بن سليمان عن مالك بن دينار عن أنس مرفوعاً. وقال الخطيب:
`قال الدارقطني: وهذا باطل، والإسناد كلهم ثقات، - يعني: غير - المخزمي:
ليس بثقة، حدث عن قوم ثقات بأحاديث باطلة`.
ولخص هذا الحافظ، فقال في `الغرائب`:
`هذا الحديث باطل، وإبراهيم ليس بثقة`.




(নিশ্চয় আল্লাহ্ হিফাযতকারী ফেরেশতাদের নিকট ওহী প্রেরণ করেন: তোমরা আমার সওম পালনকারী বান্দাদের উপর আসরের পর কোনো পাপ লিখো না।)

বাত্বিল।

এটি আল-খাতীব তাঁর ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৬/১২৪), এবং আদ-দাইলামী তাঁর ‘মুসনাদুল ফিরদাউস’ গ্রন্থে (১/১২৮/২ - আল-গারাইব আল-মুলতাকাতাহ) সংকলন করেছেন।

ইবরাহীম ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আইয়্যুব আল-মাখযূমী-এর সূত্রে, তিনি তাঁর সনদসহ জা‘ফার ইবনু সুলাইমান হতে, তিনি মালিক ইবনু দীনার হতে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আর আল-খাতীব বলেছেন:
‘দারাকুতনী বলেছেন: এটি বাত্বিল (মিথ্যা)। আর ইসনাদের সকলেই সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), - অর্থাৎ: আল-মাখযূমী ব্যতীত: সে সিকাহ নয়। সে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের সূত্রে বাত্বিল হাদীস বর্ণনা করেছে।’

আর হাফিয (ইবনু হাজার) এটি সংক্ষিপ্ত করেছেন এবং ‘আল-গারাইব’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘এই হাদীসটি বাত্বিল, আর ইবরাহীম সিকাহ নয়।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6581)


(ألا من اشتاق إلى الله، فليسمع كلام الله، فإن مثل القرآن كمثل جِراب مسكٍ، أيَّ وقت فتحته فاحَ ريحه) .
ضعيف.

أخرجه الديلمي (1/171/2) من طريق محمد بن أنس أبي بكر: حدثنا موسى بن إسحاق: حدثنا منجاب بن الحارث: حدثنا حماد بن سلمة عن محمد بن عمرو عن أبي سلمة عن أبي هريرة مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، محمد بن أنس أبو بكر: لم أعرفه، وكذا بعض من دونه، ومن فوقه ثقات من رجال `التهذيب`، غير (موسى بن إسحاق) - وهو: ابن موسى الأنصاري الخطمي - : قال ابن أبي حاتم (8/135) :
194
`كتبت عنه، وهو ثقة صدوق`.
والحديث ذكره الحافظ ابن رجب الحنبلي في رسالته: `نزهة الأسماع في مسألة السماع` (ص 85) ساكتاً عنه، فاقتضى تخريجه والنظر في إسناده.
والشطر الثاني منه له طريق أخرى عن أبي هريرة في حديث له في بعض السنن، وفيه مجهول، وقد خرجته في `المشكاة` (2143/ التحقيق الثاني) .
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(সাবধান! যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে সাক্ষাতের আকাঙ্ক্ষা করে, সে যেন আল্লাহর কালাম (কুরআন) শ্রবণ করে। কেননা কুরআনের উপমা হলো কস্তুরীর থলের মতো; যখনই তুমি তা খুলবে, তখনই তার সুগন্ধি ছড়িয়ে পড়বে।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি দায়লামী (১/১৭১/২) মুহাম্মাদ ইবনু আনাস আবূ বাকর-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে মূসা ইবনু ইসহাক হাদীস বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে মিনজাব ইবনু আল-হারিস হাদীস বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে হাম্মাদ ইবনু সালামাহ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু আমর থেকে, তিনি আবূ সালামাহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। মুহাম্মাদ ইবনু আনাস আবূ বাকর: আমি তাকে চিনতে পারিনি। অনুরূপভাবে তার নিচের স্তরের বর্ণনাকারীদের কেউ কেউও (অজ্ঞাত)। আর তার উপরের স্তরের বর্ণনাকারীরা ‘আত-তাহযীব’-এর রাবীগণের অন্তর্ভুক্ত এবং তারা সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে (মূসা ইবনু ইসহাক) ব্যতীত – আর তিনি হলেন: ইবনু মূসা আল-আনসারী আল-খাতমী – : ইবনু আবী হাতিম (৮/১৩৫) বলেন:
১৯৪
‘আমি তার থেকে লিখেছি, আর তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), সাদূক (সত্যবাদী)।’

আর এই হাদীসটি হাফিয ইবনু রাজাব আল-হাম্বালী তাঁর রিসালাহ: ‘নুযহাতুল আসমা’ ফী মাসআলাতিস সামা’ (পৃ. ৮৫)-এ উল্লেখ করেছেন এবং এ ব্যাপারে নীরবতা অবলম্বন করেছেন। তাই এর তাখরীজ করা এবং এর সনদ পরীক্ষা করা আবশ্যক ছিল।

আর এর দ্বিতীয় অংশটির জন্য আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কিছু সুনান গ্রন্থে বর্ণিত একটি হাদীসে অন্য একটি সূত্র রয়েছে, যার মধ্যে একজন মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবী আছে। আমি এটি ‘আল-মিশকাত’ (২১৪৩/ দ্বিতীয় তাহকীক)-এ তাখরীজ করেছি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6582)


(من قرأ القرآن فأعربه، كان له بكل حرف أربعون حسنة، ومن أعرب بعضاً، ولحن في بعض، كان له بكل حرف عشرون حسنة، ومن لم يعرب منه شيئاً، كان له بكل حرف عشر حسنات) .
موضوع.

أخرجه ابن عدي في `الكامل` (7/41) ، والبيهقي في `شعب الإيمان` (2/228/2296) ، وأبو الحسن بن لؤلؤ في `حديث حمزة بن محمد الكاتب` (ق 1/2) ، والشجري في `الأمالي` (1/111) ، والضياء في `المنتقى من مسموعاته بمرو` (ق 37 - 38) ، كلهم من طريق نعيم بن حماد: نا نوح بن أبي مريم عن زيد العمي عن سعيد بن المسيب عن عمر بن الخطاب مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد موضوع، آفته (نوح بن أبي مريم) ، وهو: كذاب معروف بذلك، وشيخه والراوي عنه ضعيفان، كما يأتي بيان أكثره من كلام السيوطي، وقد عزاه في `الجامع الكبير` لأبي عثمان الصابوني في `المئتين` والبيهقي في
`الشعب`، وقال في كتابه `الحاوي للفتاوي` (2/96) :
`وهذا إسناد ضعيف (!) من وجوه:
أحدها: أن سعيد بن المسيب: لم يدرك عمر، فهو منقطع.
الثاني: أن زيد العمي: ليس بالقوي.
الثالث: أن نوح بن أبي مريم هو: أبو عصمة الجامع الكذاب المعروف بالوضع، والظاهر ان هذا الحديث مما صنعت يداه. وقد ذكره الذهبي في ترجمته، وعده من مناكيره.
وقد رواه الطبراني في `الأوسط` على كيفية أخرى مخالفة في السند والصحابي والمتن، وهو دليل ضعف الحديث ونكارته واضطرابه`.
قلت: ثم ساق باللفظ التالي:
`من قرأ القرآن على أي حرف كان، كتب الله له عشر حسنات، ومحا عنه عشر سيئات، ورفع له عشر درجات.
ومن قرأه فأعرب بعضه، ولحن بعضاً، كتب له عشرون حسنة، ومحي عنه عشرون سيئة، ورفع له عشرون درجة.
ومن قرأه وأعربه كله، كتب له أربعون حسنة، ومحي عنه أربعون سيئة، ورفع له أربعون درجة`.
قلت: وهذا موضوع أيضاً، رواه عبد الرحيم بن زيد العمي عن أبيه عن عروة ابن الزبير عن عائشة مرفوعاً.

أخرجه الطبراني في `المعجم الأوسط` (1/484/4917 - ط) وقال:
`لم يروه عن عروة إلا زيد العمي، تفرد به عبد الرحيم (1) بن زيد`.
قلت: وهو متروك - كما قال الهيثمي في `المجمع`، ثم السيوطي في `الحاوي` - ، وقد قال فيه ابن معين:
`كذاب خبيث`. وقال أبو حاتم:
`كان يفسد أباه، يحدث عنه بالطامات`. وفي `المغني` للذهبي:
`قال البخاري: تركوه`.
وأبوه زيد: ضعيف - كما تقدم في كلام السيوطي - .
(فائدة) : قال الراغب الأصبهاني في `المفردات` (ص 449) :
` (اللحن) : صرف الكلام عن سننه الجاري عليه، إما بإزالة الإعراب أو التصحيف، وهو المذموم، وذلك أكثر استعمالاً.
وإما بإزالته عن التصريح، وصرفه بمعناه إلى تعريض وفحوى، وهو محمود عنه أكثر الأدباء من حيث البلاغة، وإياه قصد الشاعر بقوله:
وخير الحديث ما كان لحنا وإياه قصد قوله تعالى {ولَتعرِفَنَّهم في لحن القول} ، ومنه قيل للفطن بما يقتضي فحوى الكلام: (لحن) ، وفي الحديث: `لعل بعضكم ألحن بحجته من بعض (2) `، أي: ألسن وأفصح وأبين كلاماً وأقدر على الحجة`.
(1) الأصل (عبد الرحمن) وهو خطأ مطبعي، مخالف لأصله والمتقدم في إسناده.
(2) هو قطعة من حديث متفق عليه من حديث أم سلمة، مخرج في `الصحيحة` برقم (455) .
قلت: والظاهر أن المراد بـ (اللحن) في الحديث - على وهائه! - المعنى الأول، وهو إزالة الإعراب، لإنه جاء فيه مقابل (الإعراب) ، وقد قال الشيخ أبو الربيع سليمان بن سبع في كتابه `شفاء الصدور` (ج 4/17/2) :
`معنى قوله: `ولم يعرب منه شيئاً`، أي: أرسله إرسالاً، ولم يقف عند رؤوس الآي، ويمر عليها، ولا يعطي الحروف حقها من الإعراب، لشدة هذه، ولم يرد أنه يلحن حتى يغير المعاني`.
قلت: وإن مما [لا] شك فيه أن إعراب القرآن وقراءته - كما ذكر - من الوقوف على رؤوس الآي - كما هو السنة - ، وإعطاء الحروف حقها، وإخراجها من مخارجها - حسبما هو مقرر في علم التلاوة والتجويد - أمر مهم، وبخاصة بالنسبة للأعاجم، وبعض العرب، كحرف الضاد مثلاً، فأولئك ينطقوها (ظاء) ، والبعض في الشام
ومصر مثلاً ينطقوها (دالاً) مفخمة، دون رخاوة واستطالة، والحق بين هؤلاء وهؤلاء، كما قال ابن الجزري في أرجوزته:
والضاد باستطالة ومخرج ميز عن الظاء وكلها تحبي
وقد صح عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:
لأن أقرأ آية بإعراب أحب إلي من أن أقرأ كذا وكذا آية بغير إعراب.

أخرجه ابن أبي شيبة في `المصنف` (10/457/9967) بسند صحيح، رجاله كلهم ثقات.
وقد روي الحديث من طريق أخرى عن عائشة رضي الله عنها بلفظ مختصر، ولا يصح أيضاً، وهو الآتي:
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(যে ব্যক্তি কুরআন পাঠ করল এবং তা বিশুদ্ধভাবে (ই'রাবসহ) পড়ল, তার জন্য প্রতিটি হরফের বিনিময়ে চল্লিশটি নেকি রয়েছে। আর যে ব্যক্তি কিছু অংশ বিশুদ্ধভাবে পড়ল এবং কিছু অংশে ভুল (লাহন) করল, তার জন্য প্রতিটি হরফের বিনিময়ে বিশটি নেকি রয়েছে। আর যে ব্যক্তি এর কোনো অংশই বিশুদ্ধভাবে পড়ল না, তার জন্য প্রতিটি হরফের বিনিময়ে দশটি নেকি রয়েছে।)
মাওদ্বূ‘ (জাল)।

এটি ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ (৭/৪১), বাইহাকী তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ (২/২২৮/২২৯৬), আবুল হাসান ইবনু লু’লু’ তাঁর ‘হাদীসু হামযাহ ইবনু মুহাম্মাদ আল-কাতিব’ (ক্ব ১/২), আশ-শাজারী তাঁর ‘আল-আমালী’ (১/১১১) এবং যিয়া তাঁর ‘আল-মুনতাক্বা মিন মাসমূ‘আতিহি বিমারও’ (ক্ব ৩৭-৩৮)-এ বর্ণনা করেছেন। তাদের সকলেই নু‘আইম ইবনু হাম্মাদ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে নূহ ইবনু আবী মারইয়াম বর্ণনা করেছেন, তিনি যায়িদ আল-‘আমী থেকে, তিনি সা‘ঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি মাওদ্বূ‘ (জাল)। এর ত্রুটি হলো (নূহ ইবনু আবী মারইয়াম)। সে একজন সুপরিচিত মিথ্যুক (কায্‌যাব)। তার শায়খ এবং তার থেকে বর্ণনাকারী উভয়েই যঈফ (দুর্বল), যেমনটি সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্যে এর অধিকাংশের বর্ণনা আসছে। তিনি (সুয়ূতী) ‘আল-জামি‘উল কাবীর’-এ এটিকে আবূ উসমান আস-সাবূনী-এর ‘আল-মিয়াতাইন’ এবং বাইহাকী-এর ‘আশ-শু‘আব’-এর দিকে সম্পর্কিত করেছেন। আর তিনি তাঁর গ্রন্থ ‘আল-হাওয়ী লিল ফাতাওয়া’ (২/৯৬)-তে বলেছেন:

‘এই সনদটি কয়েকটি দিক থেকে যঈফ (দুর্বল) (!):
প্রথমত: সা‘ঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাননি, সুতরাং এটি মুনক্বাতি‘ (বিচ্ছিন্ন)।
দ্বিতীয়ত: যায়িদ আল-‘আমী শক্তিশালী নন।
তৃতীয়ত: নূহ ইবনু আবী মারইয়াম হলো আবূ ‘ইসমা আল-জামি‘ আল-কায্‌যাব (মিথ্যাবাদী), যে জাল করার জন্য সুপরিচিত। বাহ্যত এই হাদীসটি তার হাতে তৈরি করা। যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তার জীবনীতে এর উল্লেখ করেছেন এবং এটিকে তার মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসসমূহের অন্তর্ভুক্ত করেছেন।

ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে ‘আল-আওসাত্ব’-এ ভিন্ন পদ্ধতিতে বর্ণনা করেছেন, যা সনদ, সাহাবী এবং মতন (মূল পাঠ)-এর দিক থেকে ভিন্ন। আর এটি হাদীসটির দুর্বলতা, মুনকার হওয়া এবং ইযতিরাব (অস্থিরতা)-এর প্রমাণ।

আমি (আলবানী) বলি: অতঃপর তিনি (সুয়ূতী) নিম্নোক্ত শব্দে বর্ণনা করেছেন:

‘যে ব্যক্তি কুরআন পাঠ করল, তা যেভাবেই হোক না কেন, আল্লাহ তার জন্য দশটি নেকি লিখবেন, তার থেকে দশটি পাপ মুছে দেবেন এবং তার দশটি মর্যাদা বৃদ্ধি করবেন।
আর যে ব্যক্তি তা পাঠ করল এবং কিছু অংশ বিশুদ্ধভাবে পড়ল, আর কিছু অংশে ভুল (লাহন) করল, তার জন্য বিশটি নেকি লেখা হবে, তার থেকে বিশটি পাপ মুছে দেওয়া হবে এবং তার বিশটি মর্যাদা বৃদ্ধি করা হবে।
আর যে ব্যক্তি তা পাঠ করল এবং পুরোটাই বিশুদ্ধভাবে পড়ল, তার জন্য চল্লিশটি নেকি লেখা হবে, তার থেকে চল্লিশটি পাপ মুছে দেওয়া হবে এবং তার চল্লিশটি মর্যাদা বৃদ্ধি করা হবে।’

আমি (আলবানী) বলি: এটিও মাওদ্বূ‘ (জাল)। এটি ‘আব্দুর রহীম ইবনু যায়িদ আল-‘আমী তার পিতা থেকে, তিনি ‘উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে, তিনি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু‘জামুল আওসাত্ব’ (১/৪৮৪/৪৯১৭ - তা.)-এ বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘উরওয়াহ থেকে যায়িদ আল-‘আমী ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি। আর ‘আব্দুর রহীম (১) ইবনু যায়িদ এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: সে মাতরূক (পরিত্যক্ত) - যেমনটি হাইসামী ‘আল-মাজমা‘-তে এবং অতঃপর সুয়ূতী ‘আল-হাওয়ী’-তে বলেছেন। ইবনু মা‘ঈন তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘সে একজন খবীস (দুষ্ট) মিথ্যুক।’ আবূ হাতিম বলেছেন: ‘সে তার পিতাকে নষ্ট করত, তার থেকে মারাত্মক ভুল (ত্বাম্মাত) বর্ণনা করত।’ যাহাবী-এর ‘আল-মুগনী’-তে আছে: ‘বুখারী বলেছেন: তারা তাকে পরিত্যাগ করেছেন।’
আর তার পিতা যায়িদ: যঈফ (দুর্বল) - যেমনটি সুয়ূতী-এর বক্তব্যে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।

(ফায়িদাহ/উপকারিতা): রাগিব আল-ইসফাহানী ‘আল-মুফরাদাত’ (পৃ. ৪৪৯)-এ বলেছেন: ‘(আল-লাহন): কথাকে তার স্বাভাবিক গতিপথ থেকে সরিয়ে দেওয়া। হয় ই‘রাব (ব্যাকরণগত বিশুদ্ধতা) দূর করার মাধ্যমে অথবা ভুল পাঠের (তাসহীফ) মাধ্যমে, আর এটি নিন্দনীয়, এবং এর ব্যবহারই বেশি।
অথবা স্পষ্টতা থেকে সরিয়ে দিয়ে, এর অর্থকে ইঙ্গিত ও মর্মার্থের দিকে ঘুরিয়ে দেওয়া, আর এটি বালাগাত (অলঙ্কারশাস্ত্র)-এর দিক থেকে অধিকাংশ সাহিত্যিকের কাছে প্রশংসিত। কবি তার এই উক্তি দ্বারা এটিই উদ্দেশ্য করেছেন:
“উত্তম কথা সেটাই যা লাহন (ইঙ্গিতপূর্ণ) হয়।”
আর আল্লাহ তা‘আলার এই বাণী দ্বারাও এটিই উদ্দেশ্য করা হয়েছে: {আর আপনি অবশ্যই তাদেরকে কথার ভঙ্গিতে (লাহনিল ক্বাওল) চিনতে পারবেন}। আর এ থেকেই কথার মর্মার্থ বুঝতে সক্ষম ব্যক্তিকে (লাহন) বলা হয়। হাদীসে এসেছে: ‘হয়তো তোমাদের কেউ কেউ তার যুক্তিতে অন্যের চেয়ে অধিক লাহন (বাগ্মী) হবে (২)’, অর্থাৎ: অধিক বাকপটু, অধিক স্পষ্টভাষী, অধিক সুস্পষ্ট বক্তা এবং যুক্তিতে অধিক সক্ষম হবে।’

(১) মূল কিতাবে (আব্দুর রহমান) রয়েছে, যা একটি মুদ্রণজনিত ভুল। এটি মূল কিতাবের এবং এর সনদে পূর্বে উল্লিখিত বর্ণনার বিপরীত।
(২) এটি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের একটি অংশ, যা মুত্তাফাকুন ‘আলাইহি এবং ‘আস-সাহীহাহ’-তে (৪৫৫) নম্বরে সংকলিত হয়েছে।

আমি (আলবানী) বলি: বাহ্যত হাদীসে (আল-লাহন) দ্বারা - এর দুর্বলতা সত্ত্বেও! - প্রথম অর্থটিই উদ্দেশ্য, আর তা হলো ই‘রাব (ব্যাকরণগত বিশুদ্ধতা) দূর করা, কারণ এটি (আল-ই‘রাব)-এর বিপরীতে এসেছে। শায়খ আবূর রাবী‘ সুলাইমান ইবনু সাব‘ তাঁর গ্রন্থ ‘শিফাউস সুদূর’ (৪/১৭/২)-এ বলেছেন: ‘তাঁর উক্তি: ‘আর এর কোনো অংশই বিশুদ্ধভাবে পড়ল না’ এর অর্থ হলো: সে দ্রুতগতিতে পাঠ করে গেল, আয়াতের শেষাংশে থামল না এবং তা অতিক্রম করে গেল, আর অক্ষরগুলোকে ই‘রাব-এর দিক থেকে তার হক্ব আদায় করল না, এর কঠোরতার কারণে। এর উদ্দেশ্য এমন ভুল করা নয় যার দ্বারা অর্থের পরিবর্তন ঘটে।’

আমি (আলবানী) বলি: এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, কুরআনের ই‘রাব এবং এর ক্বিরাআত - যেমনটি উল্লেখ করা হয়েছে - আয়াতের শেষাংশে থামা - যেমনটি সুন্নাত - এবং অক্ষরগুলোকে তার হক্ব আদায় করে মাখরাজ (উচ্চারণস্থল) থেকে বের করা - যেমনটি তিলাওয়াত ও তাজবীদের জ্ঞানে নির্ধারিত - একটি গুরুত্বপূর্ণ বিষয়। বিশেষ করে অনারবদের জন্য এবং কিছু আরবদের জন্য, যেমন ‘দ্বাদ’ (ض) অক্ষরটি। তারা সেটিকে (য্বা) (ظ) হিসেবে উচ্চারণ করে, আর সিরিয়া ও মিসরের কিছু লোক সেটিকে (দাল) (د) হিসেবে উচ্চারণ করে, যা মোটা করে পড়া হয়, কিন্তু তাতে রিখাওয়াহ (নমনীয়তা) ও ইসতিত্বালাহ (দীর্ঘতা) থাকে না। আর হক্ব (সঠিক উচ্চারণ) এই দুইয়ের মাঝামাঝি, যেমনটি ইবনুল জাযারী তাঁর আরজূযাহতে বলেছেন:

“আর ‘দ্বাদ’কে ইসতিত্বালাহ ও মাখরাজ দ্বারা
‘য্বা’ থেকে আলাদা করো, আর সবগুলোকে (সঠিকভাবে) ভালোবাসো।”

আর নবী সাল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীদের মধ্যে এক ব্যক্তি থেকে সহীহভাবে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি বলেছেন:
‘আমি যদি একটি আয়াত ই‘রাবসহ (বিশুদ্ধভাবে) পাঠ করি, তবে তা আমার কাছে এত এত আয়াত ই‘রাব ছাড়া পাঠ করার চেয়ে অধিক প্রিয়।’

এটি ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ (১০/৪৫৭/৯৯৬৭)-এ সহীহ সনদে বর্ণনা করেছেন, যার সকল বর্ণনাকারী সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)।

আর হাদীসটি ‘আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সংক্ষিপ্ত শব্দে অন্য একটি সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে, তবে সেটিও সহীহ নয়। আর তা হলো নিম্নোক্ত:
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