হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6643)


(غَمْسُهُ يَدَهُ فِي الْعَدُوّ حَاسِرًا. قاله صلى الله عليه وسلم لمن قَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ مَا يُضْحِكُ الرّبّ مِنْ عَبْدِهِ؟؛) .
منكر.

أخرجه ابن إسحاق في ` السيرة ` (2/ 268) : حدثني عاصم بن عمر بن قتادة:
أن عوف بن الحارث - وهو: ابن عفراء - قال: يا رسول الله! ما يضحك.. إلخ، فنزع درعاً كانت عليه فقذفها، ثم أخذ سيفه فقاتل حتى قتل، رحمه الله.
ورواه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (5/ 338) : حدثنا يزيد بن هارون: أنا محمد بن إسحاق عن عاصم بن عمر بن قتادة قال: قال معاذ بن عفراء..
كذا قال (معاذ بن عفراء) ، وهو خطأ، والظاهر أنه سقط منه: ` الحارث، وهو أخو … `.
وأخرجه أبو نعيم في ` المعرفة ` (2/ 129/ 1) من طريق إبراهيم بن سعد عن محمد بن إسحاق به معنعناً مثل رواية ` السيرة `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات، وفيه علتان، إحداهما ظاهرة وهي الإرسال؛ فإن (عاصم بن عمر) تابعي لم يدرك القصة، فالله أعلم بمن أخبره بها.
والأخرى ظاهرة أيضاً في رواية (يزيد بن هارون) و (إبراهيم بن سعد) ، وهي عنعنة ابن إسحاق؛ فقد كان مدلساً معروفاً بذلك، إلا أنه قد صرح بالتحديث في رواية `السيرة `، لكنها من رواية (زياد بن عبد الله البكائي) عنه، وهو مختلف فيه، وثبته بعضهم في روايته عن ابن إسحاق في (المغازي) ، وهذه منها، فهو حجة فيها لولا المخالفة للثقتين المذكورين، فإن سلمت من التدليس؛ فما هي بسالمة من الإرسال. والله أعلم.
وإذا ثبت ضعف إسناد الحديث، فقد جاء دور بيان نكارة متنه، فإن قوله:
` حاسراً ` يعني: ليس على بدنه درع ولا مغفر - كما في ` النهاية ` - ، فمن المستبعد جداً أن يحضر النبي صلى الله عليه وسلم من كان عليه درع أن ينزعها؛ وأن يقاتل العدو حاسراً، فإن هذا ينافي كل المنافاة مبدأ الأخذ بأسباب الوقاية الممكنة، والإعداد المأمور به في الآية الكريمة: {وأعدوا لهم ما استطعتم من قوة} ، كما ينافي سنة
النبي صلى الله عليه وسلم وسيرته العملية في الجهاد، وقتاله للأعداء، مع كونه أشد الناس شجاعة وتوكلاً على الله، فقد صح عنه أنه كان يضع البيضة (الخوذة) على رأسه. (البخاري: 2 0 29) وأنه هشمت على رأسه يوم أحد. (البخاري: 2911) ، كما صح (فيه: 2901) أنه تترس بالترس، وأنه تدرع بالدرع يوم أحد. (2915) بل ثبت في ` السنن` أنه تظاهر فيه بين درعين. (صحيح أبي داود: 2332) ،
ودخل مكة يوم الفتح وعليه مغفر. متفق عليه (مختصر الشمائل: رقم 91) .
وليس هذا فقط؛ بل صح عنه صلى الله عليه وسلم أنه استعار من صفوان بن أمية مئة درع وما يصلحها من عدتها. (الإرواء: 5/ 345) . وهذا من اهتمامه بالأخذ بالأسباب، والمحافظة على حياة المجاهدين معه صلى الله عليه وسلم.
فليس من المعقول - إذن - أن يصدر منه صلى الله عليه وسلم الحض على مخالفة هديه صلى الله عليه وسلم،
وهو القائل:
`وخير الهدى هدى محمد `. رواه مسلم.
فثبت بما تقدم أن متن الحديث منكر، وهو ظاهر جداً.
وفي القصة نكارة أخرى، وهي قذف عوف رضي الله عنه للدرع؛ فإنه يدخل في باب إضاعة المال المنهي عنه في حديث المغيرة رضي الله عنه في ` الصحيحين ` وغيرهما، وما كان للنبي، ولا أن يقر ذلك؛ بله أن يحض على ما ينتج، أو يكون سبباً لذلك.
نعم؛ يمكن أن يقع نحوه من بعض الجاهدين باجتهاد منه مأجور أجراً واحداً، أولغلبة حب الاستشهاد في سبيل الله، والنكاية في أعداء الله؛ كما جاء في قصة استشهاد جعفر بن أبي طالب رضي الله عنه في غزوة (مؤتة) ، حين اقتحم
عن فرسه وعقرها، ثم قاتل حتى قتل رضي الله عنه. (صحيح أبي داود: 2318) ، فهذا مغتفر منه؛ لأنه كان عن اجتهاد منه؛ كما قال الحافظ في ` الفتح ` (6/97) ، واستدل على ذلك بقوله:
`والأصل عدم جواز إتلاف المال؛ لأنه يفعل شيئاً محققاً في أمر غير محقق `.
قلت: وهذا هو العلم والفقه الصحيح، وقد أشار إلى ذلك الإمام البخاري بقوله في ` صحيحه `: (باب: من لم ير كسر السلاح عند الموت`. وإن مما لا شك فيه أن القذف المذكور في القصة يدخل في هذا الباب وفي الأصل المتقدم عن الحافظ؛ كما هو جلي ظاهر.
هذا؛ ولقد كان من البواعث على تخريج هذا الحديث أنني قرأت في ` جريدة
السبيل ` (العدد 121 - السنة الثالثة) مقالاً كتبه دكتور في الجامعة، ساق هذا
الحديث مستدلاً به على بعضِ المسائل، قائلاً:
`وإنما جعل النبي صلى الله عليه وسلم الدخول في مواجهة العدو للقتل من أرفع أنواع الجهاد
عندما قال صلى الله عليه وسلم للرجل الذي سأله قائلاً:
ما الذي يضحك الرب من عبده؟ فقال صلى الله عليه وسلم:
أن يغمس يده في العدو حاسراً حافراً (كذا) .
أي: أن يتوجه إلى العدو من غير درع يقيه السهام والرماح `.
قلت: لما قرأت هذا الحديث استغربته؛ لعدم وروده في دواوين السنة المشهورة، ولأن ظاهره مخالف للأدلة القاضية بوجوب الأخذ بوسائل القوة في الجهاد - كما تقدم - ، ولكني لما كنت أرى أن هذا لا يكفي في رد الحديث وتضعيفه؛ لاحتمال أن يكون ثابتاً في بعض كتب الحديث، وأن يكون له وجه من المعنى غير ظاهر لنا، كما أنه لا يكفي أن يحكم على الحديث بالصحة لمجرد صحة معناه؛ بل لا بد في كل من الحالتين من الرجوع إلى علم الحديث وقواعده، والبحث عن إسناده؛ خلافاً لبعض الكتاب المعاصرين العقلانيين الذين يصححون ويضعفون بعقولهم
وأهوائهم؛ كما فعلوا بحديث البخاري:
` ليكونن في أمتي أقوام يستحلون الحِرَ [والخمر] والحرير والمعازف.. ` الحديث، وبغيره.
ومنذ أيام قريبة قيض لي أن أرى في التلفاز والمذيع يعلن عن وفاة شيخ مصري مشهور، صورة ذاك الشيخ وهو يلقي كلمة في بعض المؤتمرات؛ يقول فيها: وقد صح - أو قال: ثبت - عندي أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
` أحِبُّوا الله لما يغذوكم من نعمه … `. ثم رأيته بكى واضطرب، فقطع البث.
وكان هو قد بيَّن وجهة نظره في تصحيح الحديث في مقدمة كتاب له في ` السيرة `: أنه يكفي عنده أن يكون معناه ` متفقاً مع آية من كتاب الله أو أثر من سنة صحيحة `! وقد كنت رددت عليه في بعض لقاءاتي معه: أن هذا لا يكفي عند أهل العلم في تصحيح المتن، ونسبته إلى النبي صلى الله عليه وسلم، خشية الوقوع في وعيد
قوله صلى الله عليه وسلم: ` من قال عليَّ ما لم أقل؛ فليتبوأ مقعده من النار `.
ورجوت منه أن يعيد النظر في موقفه هذا، فوعد خيراً، ولكنه لم يفعل؛ بل إنه استمر على ما عاش عليه. غفر الله له!
من أجل ذلك بادرت إلى البحث عن الحديث، والنظر في سنده؛ لنكون على بينة من أمره، فكان ما رأيت من الضعف في سنده، والنكارة في متنه، ومخالفته لهدي النبي صلى الله عليه وسلم.
ويرى القراء أن الدكتور الفاضل لم يذكر جملة: ` فنزع درعاً كانت عليه فقذفها `، فلا أدري أسقطت من قلمه أو حافظته، أو أنه لاحظ ما تقدم بيانه من النكارة؛ فلم يستجز روايتها، وفي جريدة سيّارةٍ.
وعلى كل حال؛ فهنا سؤال يطرح نفسه - كما يقول بعضهم اليوم - : هل يجوز رواية مثل هذا الحدث المنكر سنداً ومتناً، ونشره على الناس دون أي تنبيه على ضعفه، وعزوه لمصدر من كتب السنة التي تروي الأحاديث بأسانيدها ليتيسر لطالب العلم الرجوع إليها إذا أراد التثبت منها؛ لا سيما وفي آخره لفظ: `حافراً `، وليس
له ذكر في شيء من المصادر الثلاثة المتقدمة، ولا فهمت له معنى مناسباً هنا. وأقول الآن: لعل أصل الحديث ما رواه الإمام أحمد في ` مسنده ` (5/
287) بإسناد صحيح عن نعيم بن هَمّار: أن رجلاً سأل النبي صلى الله عليه وسلم: أي الشهداء أفضل؟ قال:
` الذين إن يلقوا في الصف لا يلفتون وجوههم حتى يقتلوا، أولئك ينطلقون في الغرف العلى من الجنة، ويضحك إليهم ربهم، وإذا ضحك ربك إلى عبد في الدنيا؛ فلا حساب عليه`.
وقد سبق تخريجه في ` سلسلة الأحاديث الصحيحة ` برقم (2558) من المجلد السادس، وهو تحت الطبع، وهو وشيك الصدور إن شاء الله تعالى () .
قلت: فهذا يغني عن حديث الترجمة الضعيف، ويقوم مقامه في الاستدلال لمواجهة الأعداء للقتل بنية الجهاد في سبيل الله، والنكاية بهم؛ دون أن يكون فيه نكارة ما.
ونحوه قصة عمير بن الحُمام الأنصاري في غزوة بدر من حديث أنس بن مالك قال: … فدنا المشركون، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` قوموا إلى جنة عرضها السماوات والأرض `.
قال عمير: يا رسول الله! جنة عرضها السماوات والأرض؛ قال:
قال: بخٍ بخٍ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
` ما يحملك على قولك: بخٍ بخٍ؟ `.
() صدر في حياة الشيخ رحمه الله وبإشرافه، والسابع منها - وهو الأخير - طبع بعد وفاته بأقسامه الثلاثة. (الناشر) .
قال: لا والله يا رسول الله! إلا رجاء أن أكون من أهلها. فأخرج تمرات من قَرنه، فجعل جمل منهن، ثم قال: ليّن أنا حَيِيتُ حتى آكل تمراتي هذه، إنها لحياة طويلة! قال: فرمى بما كان معه من التمر، ثم قاتلهم حتى قتل رضي الله عنه.

أخرجه مسلم (6/ 44) .
فهذا ليس انتحاراً يأساً من الحياة، وانما هو استشهاد في سبيل الله، وشوقاً إلى لقائه في جنة عرضها السماوات والأرض.
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(শত্রুর মধ্যে বর্মহীন অবস্থায় তার হাত ডুবিয়ে দেওয়া। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ ব্যক্তিকে এ কথা বলেছিলেন, যে জিজ্ঞেস করেছিল: হে আল্লাহর রাসূল! বান্দার কোন কাজ দেখে রব হাসেন?)।
মুনকার।

ইবনু ইসহাক এটি ‘আস-সীরাহ’ (২/২৬৮)-তে বর্ণনা করেছেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আসিম ইবনু উমার ইবনু কাতাদাহ: যে আওফ ইবনুল হারিস – আর তিনি হলেন ইবনু আফরা – বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! কী হাসায়... ইত্যাদি। অতঃপর তিনি তার পরিহিত বর্মটি খুলে ফেলে দিলেন, তারপর তার তরবারি নিয়ে যুদ্ধ করলেন যতক্ষণ না তিনি শহীদ হলেন, আল্লাহ তার উপর রহম করুন।

আর ইবনু আবী শাইবাহ এটি ‘আল-মুসান্নাফ’ (৫/৩৩৮)-এ বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াযীদ ইবনু হারূন: আমাদেরকে (হাদীস বর্ণনা করেছেন) মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক, আসিম ইবনু উমার ইবনু কাতাদাহ হতে, তিনি বলেন: মু’আয ইবনু আফরা বললেন...। এভাবেই তিনি (মু’আয ইবনু আফরা) বলেছেন, যা ভুল। বাহ্যত মনে হয়, তার থেকে ‘আল-হারিস, আর তিনি হলেন ভাই...’ অংশটি বাদ পড়েছে।

আর আবূ নুআইম এটি ‘আল-মা’রিফাহ’ (২/১২৯/১)-তে ইবরাহীম ইবনু সা’দ-এর সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক হতে ‘আনআনা’ (عنعنة) সহকারে ‘আস-সীরাহ’-এর বর্ণনার মতোই বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) হওয়া সত্ত্বেও এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাত) রয়েছে। এর মধ্যে একটি স্পষ্ট, আর তা হলো ইরসাল (মুরসাল হওয়া); কারণ (আসিম ইবনু উমার) একজন তাবেঈ, তিনি ঘটনাটি পাননি। সুতরাং কে তাকে এটি জানিয়েছেন, তা আল্লাহই ভালো জানেন।

আর দ্বিতীয় ত্রুটিটিও (ইয়াযীদ ইবনু হারূন) এবং (ইবরাহীম ইবনু সা’দ)-এর বর্ণনায় স্পষ্ট, আর তা হলো ইবনু ইসহাক-এর ‘আনআনা’ (عنعنة); কারণ তিনি একজন সুপরিচিত মুদাল্লিস ছিলেন। তবে তিনি ‘আস-সীরাহ’-এর বর্ণনায় ‘তাহদীস’ (হাদীস শোনার কথা) স্পষ্ট করেছেন, কিন্তু এটি তার থেকে (যিয়াদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-বাক্কায়ী)-এর বর্ণনা, আর তার ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। কেউ কেউ তাকে (আল-মাগাযী)-এর ক্ষেত্রে ইবনু ইসহাক হতে বর্ণনায় নির্ভরযোগ্য বলেছেন, আর এটিও তার অন্তর্ভুক্ত। সুতরাং উল্লিখিত দুজন সিকাহ (নির্ভরযোগ্য)-এর বিপরীত না হলে এটি (এই বর্ণনা) প্রমাণ হিসেবে গণ্য হতো। যদি এটি তাদলীস (تدليس) থেকে মুক্তও হয়, তবে ইরসাল (إرسال) থেকে মুক্ত নয়। আর আল্লাহই ভালো জানেন।

আর যখন হাদীসের সনদ দুর্বল প্রমাণিত হলো, তখন এর মতন (মূল বক্তব্য)-এর মুনকার (আপত্তিকর) হওয়ার বিষয়টি ব্যাখ্যার পালা এসেছে। কেননা তার উক্তি: ‘حاسراً’ (বর্মহীন) এর অর্থ হলো: তার শরীরে কোনো বর্ম বা শিরস্ত্রাণ নেই – যেমনটি ‘আন-নিহায়াহ’ গ্রন্থে রয়েছে। সুতরাং এটা অত্যন্ত অসম্ভব যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উপস্থিত থেকে যার শরীরে বর্ম ছিল, তাকে তা খুলে ফেলতে বলবেন; এবং বর্মহীন অবস্থায় শত্রুর সাথে যুদ্ধ করতে বলবেন। কারণ এটি সম্ভাব্য প্রতিরক্ষার উপায় অবলম্বন করার নীতির সম্পূর্ণ বিরোধী, যা আল্লাহ তাআলার এই আয়াতে নির্দেশিত প্রস্তুতির সাথে সাংঘর্ষিক: {আর তোমরা তাদের মুকাবিলার জন্য তোমাদের সাধ্যমত শক্তি সঞ্চয় করো}। যেমন এটি জিহাদের ক্ষেত্রে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত ও কর্মপদ্ধতিরও বিরোধী, শত্রুদের সাথে তার যুদ্ধ করার পদ্ধতিরও বিরোধী, যদিও তিনি ছিলেন মানুষের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সাহসী এবং আল্লাহর উপর নির্ভরশীল। তার থেকে সহীহ সূত্রে প্রমাণিত যে, তিনি তার মাথায় ‘বাইদাহ’ (শিরস্ত্রাণ/হেলমেট) পরিধান করতেন। (বুখারী: ২৯০২) এবং উহুদের দিন তা তার মাথায় ভেঙে গিয়েছিল। (বুখারী: ২৯১১)। যেমন সহীহ সূত্রে প্রমাণিত (তাতে: ২৯০১) যে, তিনি ঢাল ব্যবহার করতেন, এবং উহুদের দিন তিনি বর্ম পরিধান করেছিলেন। (২৯১৫)। বরং ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে প্রমাণিত যে, তিনি উহুদের দিন দুটি বর্মের মাঝে নিজেকে আবৃত করেছিলেন। (সহীহ আবী দাঊদ: ২৩৩২)। আর মক্কা বিজয়ের দিন তিনি মাথায় শিরস্ত্রাণ পরিহিত অবস্থায় প্রবেশ করেছিলেন। মুত্তাফাকুন আলাইহি (মুখতাসারুশ শামাইল: নং ৯১)।

শুধু তাই নয়; বরং তার (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে সহীহ সূত্রে প্রমাণিত যে, তিনি সাফওয়ান ইবনু উমাইয়্যার কাছ থেকে একশটি বর্ম এবং তার উপযোগী সরঞ্জাম ধার নিয়েছিলেন। (আল-ইরওয়া: ৫/৩৪৫)। আর এটি ছিল উপায় অবলম্বনের প্রতি তার গুরুত্ব দেওয়া এবং তার সাথে থাকা মুজাহিদদের জীবন রক্ষার প্রতি তার মনোযোগের অংশ।

সুতরাং এটা যুক্তিসঙ্গত নয় যে, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার নিজের পদ্ধতির বিরোধিতা করার জন্য উৎসাহিত করবেন, অথচ তিনিই বলেছেন: ‘আর সর্বোত্তম পথ হলো মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পথ।’ এটি মুসলিম বর্ণনা করেছেন।

সুতরাং যা কিছু পূর্বে বলা হলো, তার দ্বারা প্রমাণিত হয় যে, হাদীসের মতন (মূল বক্তব্য) মুনকার (আপত্তিকর), আর এটি খুবই স্পষ্ট।

আর এই ঘটনায় আরেকটি মুনকার (আপত্তিকর) দিক রয়েছে, আর তা হলো আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্মটি ফেলে দেওয়া; কারণ এটি সম্পদ নষ্ট করার অন্তর্ভুক্ত, যা মুগীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে ‘সহীহাইন’ এবং অন্যান্য গ্রন্থে নিষেধ করা হয়েছে। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য এটা শোভনীয় ছিল না যে, তিনি এর অনুমোদন দেবেন; বরং তিনি এমন কিছুর জন্য উৎসাহিত করবেন যা এর ফলস্বরূপ আসে, অথবা এর কারণ হয়।

হ্যাঁ; কিছু মুজাহিদের পক্ষ থেকে এমন কিছু ঘটতে পারে তাদের নিজস্ব ইজতিহাদের কারণে, যার জন্য তারা একটি সওয়াব পাবেন, অথবা আল্লাহর পথে শাহাদাতের প্রবল আকাঙ্ক্ষা এবং আল্লাহর শত্রুদের উপর আঘাত হানার কারণে; যেমনটি (মু’তাহ) যুদ্ধে জা’ফার ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহাদাতের ঘটনায় এসেছে, যখন তিনি তার ঘোড়া থেকে লাফিয়ে নেমে সেটিকে আঘাত করে অকেজো করে দেন, অতঃপর যুদ্ধ করতে থাকেন যতক্ষণ না তিনি শহীদ হন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। (সহীহ আবী দাঊদ: ২৩১৮)। এটি তার জন্য ক্ষমাযোগ্য; কারণ এটি ছিল তার নিজস্ব ইজতিহাদ (গবেষণামূলক সিদ্ধান্ত) থেকে, যেমনটি হাফিয ‘আল-ফাতহ’ (৬/৯৭)-এ বলেছেন। আর তিনি এর পক্ষে প্রমাণ হিসেবে তার এই উক্তি পেশ করেন: ‘মূলনীতি হলো সম্পদ নষ্ট করা বৈধ নয়; কারণ সে একটি নিশ্চিত জিনিসকে এমন একটি কাজে ব্যবহার করছে যা নিশ্চিত নয়।’

আমি (আলবানী) বলি: আর এটাই হলো সঠিক জ্ঞান ও ফিকহ। ইমাম বুখারী তার ‘সহীহ’ গ্রন্থে এই দিকে ইঙ্গিত করেছেন তার এই উক্তি দ্বারা: (পরিচ্ছেদ: যে ব্যক্তি মৃত্যুর সময় অস্ত্র ভেঙে ফেলাকে সঠিক মনে করেননি)। আর এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, এই ঘটনায় উল্লিখিত বর্ম ফেলে দেওয়া হাফিয কর্তৃক উল্লিখিত এই মূলনীতি এবং এই পরিচ্ছেদের অন্তর্ভুক্ত, যেমনটি স্পষ্ট ও প্রতীয়মান।

এই হলো অবস্থা; আর এই হাদীসটি তাহরীজ (সনদ ও মতন যাচাই) করার অন্যতম কারণ ছিল যে, আমি ‘জারীদাতুস সাবীল’ (১২২ নং সংখ্যা – তৃতীয় বর্ষ)-এ একজন বিশ্ববিদ্যালয়ের ডক্টরের লেখা একটি প্রবন্ধ পড়েছিলাম, যেখানে তিনি কিছু মাসআলার পক্ষে প্রমাণ হিসেবে এই হাদীসটি পেশ করে বলেছিলেন: ‘নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শত্রুর মুখোমুখি হয়ে নিহত হওয়াকে জিহাদের সর্বোচ্চ প্রকারের অন্তর্ভুক্ত করেছেন, যখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঐ ব্যক্তিকে বললেন, যে তাকে জিজ্ঞেস করেছিল: বান্দার কোন কাজ দেখে রব হাসেন? তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: সে যেন বর্মহীন, খালি পায়ে (এভাবেই লেখা ছিল) শত্রুর মধ্যে তার হাত ডুবিয়ে দেয়। অর্থাৎ: সে যেন এমন বর্ম ছাড়া শত্রুর দিকে অগ্রসর হয় যা তাকে তীর ও বর্শা থেকে রক্ষা করবে।’

আমি (আলবানী) বলি: যখন আমি এই হাদীসটি পড়লাম, তখন এটি আমার কাছে অপরিচিত মনে হলো; কারণ এটি প্রসিদ্ধ সুন্নাহ গ্রন্থগুলোতে আসেনি, এবং এর বাহ্যিক অর্থ জিহাদে শক্তি ব্যবহারের উপায় অবলম্বন করার আবশ্যকতা সংক্রান্ত দলিলের বিরোধী – যেমনটি পূর্বে আলোচনা করা হয়েছে। কিন্তু আমি যখন দেখলাম যে, শুধু এই কারণে হাদীসটিকে প্রত্যাখ্যান করা বা দুর্বল বলা যথেষ্ট নয়; কারণ এটি হয়তো কিছু হাদীস গ্রন্থে প্রমাণিত থাকতে পারে, এবং এর এমন কোনো অর্থ থাকতে পারে যা আমাদের কাছে স্পষ্ট নয়। যেমন, শুধু অর্থের বিশুদ্ধতার কারণে হাদীসকে সহীহ বলে দেওয়াও যথেষ্ট নয়; বরং উভয় ক্ষেত্রেই হাদীস শাস্ত্র ও এর মূলনীতিতে ফিরে যাওয়া এবং এর সনদ অনুসন্ধান করা আবশ্যক; যা কিছু সমসাময়িক যুক্তিবাদী লেখকের বিপরীত, যারা তাদের বুদ্ধি ও খেয়ালখুশি মতো হাদীসকে সহীহ বা যঈফ বলে দেন; যেমনটি তারা বুখারীর এই হাদীসের ক্ষেত্রে করেছেন: ‘আমার উম্মতের মধ্যে এমন কিছু লোক আসবে যারা যেনা [এবং মদ], রেশম ও বাদ্যযন্ত্রকে হালাল মনে করবে...’ হাদীসটি এবং অন্যান্য হাদীসের ক্ষেত্রেও।

আর কিছুদিন আগে আমার সুযোগ হয়েছিল টেলিভিশনে দেখার যে, একজন ঘোষক একজন প্রসিদ্ধ মিসরীয় শাইখের মৃত্যুর ঘোষণা দিচ্ছেন, আর সেই শাইখের ছবি দেখানো হচ্ছিল যখন তিনি একটি সম্মেলনে বক্তব্য রাখছিলেন; সেখানে তিনি বলছিলেন: আমার কাছে সহীহ প্রমাণিত – অথবা তিনি বলেছিলেন: সাব্যস্ত – যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘তোমরা আল্লাহকে ভালোবাসো, কারণ তিনি তোমাদেরকে তার নি’আমত দ্বারা প্রতিপালন করেন...’। অতঃপর আমি দেখলাম তিনি কাঁদছেন এবং অস্থির হয়ে পড়লেন, ফলে সম্প্রচার বন্ধ হয়ে গেল।

আর তিনি ‘আস-সীরাহ’ বিষয়ক তার একটি কিতাবের ভূমিকায় হাদীস সহীহ হওয়ার ব্যাপারে তার দৃষ্টিভঙ্গি স্পষ্ট করেছিলেন: যে তার মতে হাদীসের অর্থ ‘আল্লাহর কিতাবের কোনো আয়াতের সাথে অথবা সহীহ সুন্নাহর কোনো বর্ণনার সাথে সামঞ্জস্যপূর্ণ’ হলেই যথেষ্ট! আমি তার সাথে আমার কিছু সাক্ষাতে এর প্রতিবাদ করেছিলাম: যে আহলে ইলমদের (জ্ঞানীদের) নিকট মতনকে সহীহ সাব্যস্ত করার জন্য এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে এটিকে সম্বন্ধিত করার জন্য এটি যথেষ্ট নয়, এই ভয়ে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই সতর্কবাণীর অন্তর্ভুক্ত হতে হবে: ‘যে ব্যক্তি আমার উপর এমন কথা আরোপ করে যা আমি বলিনি; সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়।’

আর আমি তাকে অনুরোধ করেছিলাম যে, তিনি যেন তার এই অবস্থানটি পুনর্বিবেচনা করেন, তখন তিনি ভালো কিছুর ওয়াদা করেছিলেন, কিন্তু তিনি তা করেননি; বরং তিনি যে পথে জীবন যাপন করেছেন, তাতেই অবিচল ছিলেন। আল্লাহ তাকে ক্ষমা করুন!

এই কারণেই আমি দ্রুত হাদীসটি অনুসন্ধান করতে এবং এর সনদ যাচাই করতে উদ্যোগী হয়েছিলাম; যাতে আমরা এর ব্যাপারে স্পষ্ট ধারণা লাভ করতে পারি। ফলে আমি এর সনদে দুর্বলতা, মতনে মুনকার হওয়া এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পদ্ধতির সাথে এর বিরোধিতার বিষয়টি দেখতে পেলাম।

পাঠকগণ দেখতে পাচ্ছেন যে, সম্মানিত ডক্টর সাহেব এই বাক্যটি উল্লেখ করেননি: ‘অতঃপর তিনি তার পরিহিত বর্মটি খুলে ফেলে দিলেন।’ আমি জানি না এটি তার কলম থেকে বা স্মৃতি থেকে বাদ পড়েছে, নাকি তিনি পূর্বে বর্ণিত মুনকার দিকটি লক্ষ্য করেছিলেন; ফলে তিনি চলমান একটি পত্রিকায় এটি বর্ণনা করাকে সঙ্গত মনে করেননি।

যাই হোক; এখানে একটি প্রশ্ন উত্থাপিত হয় – যেমনটি আজকাল কেউ কেউ বলে থাকেন –: সনদ ও মতন উভয় দিক থেকে মুনকার এমন ঘটনা বর্ণনা করা কি বৈধ, এবং এর দুর্বলতা সম্পর্কে কোনো সতর্কবাণী ছাড়াই মানুষের মধ্যে তা প্রচার করা কি বৈধ, আর এটিকে সুন্নাহর এমন কোনো গ্রন্থের দিকে সম্বন্ধিত করা কি বৈধ, যা হাদীসগুলোকে তার সনদসহ বর্ণনা করে, যাতে ইলমের ছাত্ররা নিশ্চিত হওয়ার জন্য সেদিকে ফিরে যেতে পারে? বিশেষত এর শেষে ‘حافراً’ (খালি পায়ে) শব্দটি রয়েছে, যা পূর্বে উল্লিখিত তিনটি উৎসের কোনোটিতেই উল্লেখ নেই, আর আমি এখানে এর কোনো উপযুক্ত অর্থও বুঝতে পারিনি।

আর আমি এখন বলছি: সম্ভবত এই হাদীসের মূল হলো যা ইমাম আহমাদ তার ‘মুসনাদ’ (৫/২৮৭)-এ সহীহ সনদে নুআইম ইবনু হাম্মার হতে বর্ণনা করেছেন: যে এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলেন: শহীদদের মধ্যে কে শ্রেষ্ঠ? তিনি বললেন: ‘যারা যখন সারিতে মুখোমুখি হয়, তখন নিহত না হওয়া পর্যন্ত তারা তাদের মুখ ফেরায় না। তারাই জান্নাতের সুউচ্চ কক্ষসমূহে প্রবেশ করবে, আর তাদের দেখে তাদের রব হাসেন। আর যখন তোমার রব দুনিয়াতে কোনো বান্দার দিকে হাসেন; তখন তার কোনো হিসাব হবে না।’ এর তাহরীজ পূর্বে ‘সিলসিলাতুল আহাদীসিস সহীহাহ’-এর ৬ষ্ঠ খণ্ডের ২৫৫৮ নং-এ করা হয়েছে, যা মুদ্রণাধীন ছিল এবং ইনশাআল্লাহ শীঘ্রই প্রকাশিত হবে ()।

আমি (আলবানী) বলি: সুতরাং এই হাদীসটি দুর্বল ‘হাদীসুত্তারজামা’ (আলোচ্য হাদীস)-এর প্রয়োজন মেটায় এবং আল্লাহর পথে জিহাদের নিয়তে শত্রুদের মুখোমুখি হয়ে নিহত হওয়া এবং তাদের উপর আঘাত হানার পক্ষে প্রমাণ হিসেবে এর স্থান দখল করে, যাতে কোনো মুনকার (আপত্তিকর) দিক নেই।

আর এর অনুরূপ হলো বদর যুদ্ধের সময় উমাইর ইবনুল হুমাম আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ঘটনা, যা আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: ... অতঃপর মুশরিকরা কাছে এলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমরা এমন জান্নাতের দিকে এগিয়ে যাও, যার প্রশস্ততা আসমান ও যমীনের সমান।’ উমাইর বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! জান্নাত যার প্রশস্ততা আসমান ও যমীনের সমান? তিনি বললেন: তিনি বললেন: বাহ! বাহ! তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমার ‘বাহ! বাহ!’ বলার কারণ কী?’ () শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর জীবদ্দশায় এবং তার তত্ত্বাবধানে এটি প্রকাশিত হয়েছিল, আর এর সপ্তম খণ্ড – যা সর্বশেষ – তার মৃত্যুর পর এর তিনটি অংশ প্রকাশিত হয়েছে। (প্রকাশক)।

তিনি বললেন: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! শুধু এই আশায় যে, আমি যেন এর অধিবাসীদের অন্তর্ভুক্ত হতে পারি। অতঃপর তিনি তার থলে থেকে কিছু খেজুর বের করলেন, এবং তা থেকে কিছু খেলেন, তারপর বললেন: আমি যদি এই খেজুরগুলো খাওয়া শেষ না হওয়া পর্যন্ত বেঁচে থাকি, তবে তা হবে দীর্ঘ জীবন! বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি তার সাথে থাকা খেজুরগুলো ফেলে দিলেন, তারপর তাদের সাথে যুদ্ধ করলেন যতক্ষণ না তিনি শহীদ হলেন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। এটি মুসলিম (৬/৪৪) বর্ণনা করেছেন।

সুতরাং এটি জীবন থেকে হতাশ হয়ে আত্মহত্যা নয়, বরং এটি আল্লাহর পথে শাহাদাত এবং আসমান ও যমীনের সমান প্রশস্ত জান্নাতে তার সাথে সাক্ষাতের তীব্র আকাঙ্ক্ষা।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6644)


(تَدْرُونَ لِمَ أَمَّنْتُ؟ قَالُوا: اللَّهُ وَرَسُولُهُ أَعْلَمُ ، قَالَ: جَاءَنِي جِبْرِيلُ عليه السلام ، فَأَخْبَرَنِي: أَنَّهُ مَنْ ذُكِرْتَ عِنْدَهُ فَلَمْ يُصَلِّ عَلَيْكَ دَخَلَ النَّارَ، فَأَبْعَدَهُ اللَّهُ وَأَسْحَقَهُ ، فَقُلْتُ: آمِينَ.
وَمَنْ أَدْرَكَ وَالِدَيْهِ أَوْ أَحَدَهُمَا ، فَلَمْ يَبَرَّهُمَا دَخَلَ النَّارَ، فَأَبْعَدَهُ اللَّهُ وَأَسْحَقَهُ ، فَقُلْتُ: آمِينَ. وَمَنْ أَدْرَكَ رَمَضَانَ فَلَمْ يُغْفَرْ لَهُ دَخَلَ النَّارَ ، فَأَبْعَدَهُ اللَّهُ وَأَسْحَقَهُ، فَقُلْتُ: آمِينَ) .
ضعيف جداً.

أخرجه الطبرإني في ` المعجم الكبير ` (12/ 84/ 12551) عن إسحاق بن عبد الله بن كيسان عن أبيه عن سعيد بن جبيرعن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم ارتقى على المنبر فأمّن ثلاث مرات ثم قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً، وفيه علتان:
الأولى: عبد الله بن كيسان، وهو المروزي؛ ضعفوه، ولم يوثقه كير ابن حبان (7/ 33 و 52) ، ومع ذلك فإنه قال فيه:
` يخطئ `! ولذلك قال الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق يخطيء كثيراً `.
الأخرى: ابنه إسحاق ضعيف؛ جداً، لم يوثقه أحد؛ بل قال البخاري في ترجمة أبيه (3/ 178/1) :
` له ابن يسمى (إسحاق) ؛ منكر الحديث `.
ونقل الذهبي في ` المغني ` مثله عن أبي أحمد الحاكم.
وقال ابن حبان في الموضع الأول من ترجمة أبيه:
` يتقى حديثه من رواية ابنه عنه `.
وأشار الحافظ في ` اللسان ` إلى أن له حديثاً في `المختارة` في نزول: {إذا جاء نصر الله والفتح} ، قال:
` فتعقبه الصدر الياسوفي فيما رأيت بخطه فقال: هو من رواية إسحاق عن أبيه، وفيهما الضعف الشديد `.
قلت: وهذا الحديث مما يشهد لضعفه الشديد، وقول البخاري فيه: ` منكر الحديث `، وذلك قوله فيه: ` وأسحقه `، فإنها منكرة جداً؛ لأن الحديث قد صح من طرق عند ابن حبان والحاكم وغيرهما عن كعب بن عجرة ومالك بن الحويرث وأبي هريرة بنحوه؛ دون هذه الزيادة المنكرة؛ ولذلك فقد تساهل المنذري بقوله في ` الترغيب ` (2/ 283) :
` رواه الطبراني بإسناد ليَّن `!
ومثله أو أسوأ منه قول الهيثمي (10/ 165) :
` رواه الطبراني، وفيه إسحاق بن عبد الله بن كيسان، وفيه ضعف `.
فهذا لو قيل في أبيه (عبد الله) ؛ لكان فيه تساهل؛ لأن قوله: `فيه ضعف` يشعر بأن الضعف يسير، بحيث يصح أن يقال مثله في راوي الحديث الحسن، فكيف و (عبد الله) ليس كذلك؛! لأنه لم يوثقه أحد إلا من عرف بتساهله في التوثيق، فكيف والهيثمي قال هذا التضعيف اليسير فيمن اتفقوا على تضعيفه، ومنهم ابن حبان نفسه المتساهل في توثيق أبيه؛ فأخشى ما أخشاه أنه أراد بهذا التضعيف الأب دون الابن. والله أعلم.
(تنبيه) : عرفت مما سبق أن (عبد الله) هذا لم يوثقه غير ابن حبان؛ فلا يغرنك ما جاء في التعليق على قول الحافظ في ` الكاشف `:` ضعفه أبو حاتم `:
`ووثقه أبو داود، والحاكم أبو أحمد، وابن حبان `.
فإنه سبق قلم من المعلقين الفاضلين، أو خطأ مطبعي؛ فإن محله على الترجمة التي قبل هذه.
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(তোমরা কি জানো আমি কেন ‘আমীন’ বললাম? তারা বললেন: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অধিক অবগত। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আমার কাছে জিবরীল (আলাইহিস সালাম) এলেন এবং আমাকে জানালেন: যার কাছে আপনার নাম উল্লেখ করা হলো, কিন্তু সে আপনার উপর দরূদ পড়লো না, সে জাহান্নামে প্রবেশ করলো। আল্লাহ তাকে দূরে সরিয়ে দিলেন এবং ধ্বংস করলেন। তখন আমি বললাম: আমীন।
আর যে ব্যক্তি তার পিতা-মাতা উভয়কে অথবা তাদের একজনকে পেলো, কিন্তু তাদের সাথে সদ্ব্যবহার করলো না, সে জাহান্নামে প্রবেশ করলো। আল্লাহ তাকে দূরে সরিয়ে দিলেন এবং ধ্বংস করলেন। তখন আমি বললাম: আমীন। আর যে ব্যক্তি রমযান মাস পেলো, কিন্তু তাকে ক্ষমা করা হলো না, সে জাহান্নামে প্রবেশ করলো। আল্লাহ তাকে দূরে সরিয়ে দিলেন এবং ধ্বংস করলেন। তখন আমি বললাম: আমীন।)

যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ (১২/৮৪/১২৫৫১)-এ ইসহাক ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু কায়সান হতে, তিনি তার পিতা হতে, তিনি সাঈদ ইবনু জুবাইর হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং তিনবার ‘আমীন’ বললেন, অতঃপর বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)। এতে দুটি ত্রুটি (ইল্লাত) রয়েছে:

প্রথমটি: আব্দুল্লাহ ইবনু কায়সান, তিনি হলেন মারওয়াযী; মুহাদ্দিসগণ তাকে দুর্বল বলেছেন। ইবনু হিব্বান (৭/৩৩ ও ৫২) তাকে নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ) বলেননি। এতদসত্ত্বেও তিনি তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘সে ভুল করে!’ এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন: ‘সে সত্যবাদী, কিন্তু প্রচুর ভুল করে।’

অন্যটি: তার পুত্র ইসহাক; সে যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)। তাকে কেউ নির্ভরযোগ্য বলেননি; বরং বুখারী তার পিতার জীবনীতে (৩/১৭৮/১) বলেছেন: ‘তার একজন পুত্র আছে যার নাম (ইসহাক); সে মুনকারুল হাদীস (অস্বীকার্য হাদীস বর্ণনাকারী)।’ যাহাবী ‘আল-মুগনী’-তে আবূ আহমাদ আল-হাকিম হতে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। ইবনু হিব্বান তার পিতার জীবনীর প্রথম স্থানে বলেছেন: ‘তার পুত্র কর্তৃক তার থেকে বর্ণিত হাদীস থেকে বেঁচে থাকা উচিত।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’-এ ইঙ্গিত করেছেন যে, তার ‘আল-মুখতারা’ গ্রন্থে {إِذَا جَاءَ نَصْرُ اللَّهِ وَالْفَتْحُ} (যখন আল্লাহর সাহায্য ও বিজয় আসবে) নাযিল হওয়া সম্পর্কে একটি হাদীস রয়েছে। তিনি (হাফিয) বলেন: ‘আমি তার (সদর আল-ইয়াসূফী) হস্তাক্ষরে দেখেছি যে, তিনি এর সমালোচনা করে বলেছেন: এটি ইসহাক কর্তৃক তার পিতা থেকে বর্ণিত, আর তাদের উভয়ের মধ্যেই রয়েছে কঠিন দুর্বলতা।’

আমি (আলবানী) বলি: এই হাদীসটি তার কঠিন দুর্বলতার সাক্ষ্য দেয়, এবং বুখারীর তাকে ‘মুনকারুল হাদীস’ বলার কারণ হলো, এতে তার এই উক্তিটি রয়েছে: ‘ওয়া আসহাকাহু’ (এবং আল্লাহ তাকে ধ্বংস করলেন), যা খুবই মুনকার (অস্বীকার্য); কারণ এই হাদীসটি ইবনু হিব্বান, হাকিম এবং অন্যান্যদের নিকট কা’ব ইবনু উজরাহ, মালিক ইবনুল হুয়াইরিস এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে অনুরূপভাবে সহীহ সূত্রে বর্ণিত হয়েছে; কিন্তু এই মুনকার অতিরিক্ত অংশটি ছাড়া। এই কারণে মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (২/২৮৩)-এ তার এই উক্তি দ্বারা শিথিলতা করেছেন: ‘এটি ত্ববারানী লীন (নমনীয়) সনদ দ্বারা বর্ণনা করেছেন!’ আর এর অনুরূপ বা এর চেয়েও খারাপ হলো হাইছামী’র উক্তি (১০/১৬৫): ‘এটি ত্ববারানী বর্ণনা করেছেন, এতে ইসহাক ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু কায়সান রয়েছে, আর এতে দুর্বলতা আছে।’

এই কথাটি যদি তার পিতা (আব্দুল্লাহ) সম্পর্কে বলা হতো, তবুও তাতে শিথিলতা থাকতো; কারণ তার উক্তি: ‘এতে দুর্বলতা আছে’ এই অনুভূতি দেয় যে দুর্বলতা সামান্য, যা এমন বর্ণনাকারীর ক্ষেত্রে বলা যায় যার হাদীস ‘হাসান’ পর্যায়ের। তাহলে (আব্দুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে তা কেমন করে বলা যায়?! কারণ তাকে কেউ নির্ভরযোগ্য বলেননি, কেবল সেই ব্যক্তি ছাড়া যিনি নির্ভরযোগ্যতা প্রদানে শিথিলতার জন্য পরিচিত। তাহলে হাইছামী কেমন করে এই সামান্য দুর্বলতা এমন ব্যক্তির ক্ষেত্রে বললেন যার দুর্বলতার উপর সকলে একমত, এমনকি ইবনু হিব্বান নিজেও, যিনি তার পিতাকে নির্ভরযোগ্য বলার ক্ষেত্রে শিথিলতা করেছেন? আমি সবচেয়ে বেশি যা আশঙ্কা করি তা হলো, তিনি এই দুর্বলতা দ্বারা পুত্রকে নয় বরং পিতাকে উদ্দেশ্য করেছেন। আল্লাহই অধিক অবগত।

(তানবীহ/সতর্কতা): পূর্বের আলোচনা থেকে আপনি জানতে পেরেছেন যে, এই (আব্দুল্লাহ)-কে ইবনু হিব্বান ছাড়া আর কেউ নির্ভরযোগ্য বলেননি; সুতরাং ‘আল-কাশেফ’-এ হাফিয (ইবনু হাজার)-এর এই উক্তির উপর টীকায় যা এসেছে, তা যেন আপনাকে ধোঁকায় না ফেলে: ‘তাকে আবূ হাতিম দুর্বল বলেছেন’: ‘আর তাকে আবূ দাঊদ, হাকিম আবূ আহমাদ এবং ইবনু হিব্বান নির্ভরযোগ্য বলেছেন।’ কারণ এটি সম্মানিত টীকাকারদের কলমের ভুল অথবা মুদ্রণ ত্রুটি; কেননা এর স্থান হলো এর পূর্বের জীবনীর উপর।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6645)


(طلبُ الحلالِ فريضةٌ بعدَ الفريضةِ) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (0 1/ 0 9/ 9993) ، وأبو نعيم في `أخبار أصبهان ` (2/ 339) ، والبيهقي في ` الشعب ` (6/ 0 2 4/ 1 874) عن يحيى بن يحيى النيسابوري: ثنا عباد بن كثيرعن سفيان عن منصور عن إبراهيم عن علقمة عن عبد الله مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد واهٍ، رجاله ثقات؛ غير (عباد بن كثير) ، وهما اثنان، أحدهما: ثقفي بصري مكي، والآخر: فلسطيني رملي، والأول متروك متفق على تضعيفه، والأخر ضعيف وثق، وكنت متردداً في تحديد المراد منهما؛ لأن في كل منهما قرينة تساعد على تعيينه لا توجد في الآخر، فالأول ذكروا في شيوخه سفيان الثوري، ولم يذكروا في الرواة عنه يحيى النيسابوري، والآخر على العكس من ذلك، ذكروا في الرواة عنه يحيى النيسابوري، ولم يذكروا في شيوخه سفيان الثوري. انظر ` تهذيب المزي `.
ثم وجدت ما يزيل التردد، ويبين أن المراد هو الرملي في كلام ابن حبان، حيث قال في ` الضعفاء ` (2/ 169 - 170) :
` عباد بن كثير الرملي، يروي عن سفياق الثوري. روى عنه يحيى بن يحيى، كان يحيى بن معين يوثقه، وهو عندي لا شيء في الحديث؛ لأنه روى عن سفيان الثوري … (فذكر الحديث) . ومن روى مثل هذا الحديث عن الثوري بهذا
الإسناد؛ بطل الاحتجاج بخبره فيما يروي ما لا يشبه حديث الأثبات.
والدليل على أن (عباد بن كثير الرملي) ليسى بـ (عباد بن كثير) الذي كان بمكة أن يحيى بن يحيى روى عنه، ويحيى لم يلحق الثوري، و (عباد بن كثير المكي) مات قبل الثوري، ولم يشهد الثوري جنازته، ويحيى بن يحيى في ذلك الوقت كان طفلاً صغيراً، فهذا دليل على أنهما اثنان ليسا بواحد، مات الثوري سنة إحدى وستين `.
قلت: فتعين أنه (عباد بن كثير الرملي) ، وقد ضعفه الجمهور، وذكره الذهبي في ` المغني `، وقال:
`قال النسائي: ليس بثقة `. وقال البيهقي عقب الحديث:
`قال أبو عبد الله (يعني: الحاكم) : تفرد به عباد بن كثير عن الثوري، وبلغني عن محمد بن يحيى أنه قال: لم أكره ليحيى بن يحيى شيئاً قط غيررواية هذا الحديث `.
ولم يتنبه الهيثمي لهذا التحرير؛ فقال (10/ 291) :
` … وفيه عباد بن كثير الثقفي وهو متروك `.
وأما المنذري فاكتفى (3/ 12) بالإشارة إلى تضعيفه! وصرح العراقي في ` تخريج الإحياء` (1/ 221) بضعف سنده.
قلت: وقد روي بلفظ:
` طلب الحلال واجب على كل مسلم `.
وهو ضعيف أيضاً، وقد مضى برقم (3826) .
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(হালাল উপার্জন করা ফরযের পরে আরেকটি ফরয)।
মুনকার।

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১০/৯০/৯৯৯৩), আবূ নু'আইম তাঁর ‘আখবারু ইসফাহান’ গ্রন্থে (২/৩৩৯), এবং বাইহাকী তাঁর ‘আশ-শু'আব’ গ্রন্থে (৬/২০৪/৮৭৪১) ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া আন-নিসাপুরী হতে: তিনি বলেন, আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইব্বাদ ইবনু কাছীর, তিনি সুফিয়ান হতে, তিনি মানসূর হতে, তিনি ইবরাহীম হতে, তিনি আলক্বামাহ হতে, তিনি আব্দুল্লাহ (ইবনু মাসঊদ) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ' সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল (ওয়াহী)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ), তবে (ইব্বাদ ইবনু কাছীর) ব্যতীত। এই নামে দুজন বর্ণনাকারী আছেন। তাদের একজন হলেন: ছাক্বাফী, বাসরী, মাক্কী (মক্কার অধিবাসী), আর অন্যজন হলেন: ফিলিস্তীনী, রামালী (রামলার অধিবাসী)। প্রথমজন মাতরূক (পরিত্যক্ত), তার দুর্বলতার ব্যাপারে সকলে একমত। আর অন্যজন দুর্বল, তবে তাকে নির্ভরযোগ্যও বলা হয়েছে। আমি তাদের দুজনের মধ্যে কাকে উদ্দেশ্য করা হয়েছে তা নির্ধারণ করতে দ্বিধাগ্রস্ত ছিলাম; কারণ তাদের প্রত্যেকের মধ্যেই এমন একটি করে প্রমাণ রয়েছে যা তাকে নির্দিষ্ট করতে সাহায্য করে, যা অন্যজনের মধ্যে নেই। প্রথমজনের শাইখদের (শিক্ষকদের) মধ্যে সুফিয়ান আছ-ছাওরীর নাম উল্লেখ করা হয়েছে, কিন্তু তার থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যে ইয়াহইয়া আন-নিসাপুরীর নাম উল্লেখ করা হয়নি। আর অন্যজনের ক্ষেত্রে এর বিপরীত: তার থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যে ইয়াহইয়া আন-নিসাপুরীর নাম উল্লেখ করা হয়েছে, কিন্তু তার শাইখদের মধ্যে সুফিয়ান আছ-ছাওরীর নাম উল্লেখ করা হয়নি। দেখুন: ‘তাহযীবুল মিযযী’।

অতঃপর আমি এমন কিছু পেলাম যা আমার দ্বিধা দূর করে দেয় এবং ইবনু হিব্বানের বক্তব্যে স্পষ্ট হয় যে উদ্দেশ্যকৃত ব্যক্তি হলেন রামালী। তিনি ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে (২/১৬৯-১৭০) বলেছেন: ‘ইব্বাদ ইবনু কাছীর আর-রামালী, তিনি সুফিয়ান আছ-ছাওরী হতে বর্ণনা করেন। তার থেকে ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া বর্ণনা করেছেন। ইয়াহইয়া ইবনু মা'ঈন তাকে নির্ভরযোগ্য বলতেন, কিন্তু হাদীছের ক্ষেত্রে সে আমার নিকট কিছুই নয়; কারণ সে সুফিয়ান আছ-ছাওরী হতে বর্ণনা করেছে... (অতঃপর তিনি হাদীছটি উল্লেখ করেন)। আর যে ব্যক্তি এই সনদে ছাওরী হতে এমন হাদীছ বর্ণনা করে; নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের হাদীছের সাথে সাদৃশ্যপূর্ণ নয় এমন হাদীছ বর্ণনার ক্ষেত্রে তার খবর দ্বারা প্রমাণ পেশ করা বাতিল হয়ে যায়।

আর এর প্রমাণ যে (ইব্বাদ ইবনু কাছীর আর-রামালী) সেই (ইব্বাদ ইবনু কাছীর) নয় যে মক্কায় ছিল, তা হলো এই যে, ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া তার থেকে বর্ণনা করেছেন, অথচ ইয়াহইয়া ছাওরীর সাক্ষাৎ পাননি। আর (ইব্বাদ ইবনু কাছীর আল-মাক্কী) ছাওরীর আগেই মারা যান এবং ছাওরী তার জানাযায় উপস্থিত হননি। আর ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া সেই সময় ছোট শিশু ছিলেন। এটি প্রমাণ করে যে তারা দুজন, একজন নন। ছাওরী একষট্টি (১৬১ হিঃ) সনে মারা যান।

আমি বলি: সুতরাং এটি নিশ্চিত যে তিনি (ইব্বাদ ইবনু কাছীর আর-রামালী)। আর জমহূর (অধিকাংশ মুহাদ্দিস) তাকে দুর্বল বলেছেন। যাহাবী তাকে ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘নাসাঈ বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য নয়।’ আর বাইহাকী হাদীছটির পরে বলেছেন: ‘আবূ আব্দুল্লাহ (অর্থাৎ: আল-হাকিম) বলেছেন: ইব্বাদ ইবনু কাছীর এই হাদীছটি ছাওরী হতে এককভাবে বর্ণনা করেছেন। আর আমার নিকট মুহাম্মাদ ইবনু ইয়াহইয়া হতে এই মর্মে খবর পৌঁছেছে যে, তিনি বলেছেন: ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়ার কোনো কিছুই আমার নিকট অপছন্দনীয় ছিল না, এই হাদীছটি বর্ণনা করা ব্যতীত।’

আর হাইছামী এই সূক্ষ্ম গবেষণার প্রতি মনোযোগ দেননি; তাই তিনি (১০/২৯১) বলেছেন: ‘... আর এতে ইব্বাদ ইবনু কাছীর আছ-ছাক্বাফী আছেন, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

আর মুনযিরী (৩/১২) কেবল তার দুর্বলতার দিকে ইঙ্গিত করেই ক্ষান্ত হয়েছেন! আর ইরাক্বী ‘তাখরীজুল ইহয়া’ গ্রন্থে (১/২২১) এর সনদ দুর্বল হওয়ার কথা স্পষ্টভাবে বলেছেন।

আমি বলি: এটি অন্য শব্দে বর্ণিত হয়েছে: ‘হালাল উপার্জন করা প্রত্যেক মুসলিমের উপর ওয়াজিব।’ এটিও যঈফ (দুর্বল), যা ইতিপূর্বে ৩৮২৬ নং-এ অতিবাহিত হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6646)


(مَنْ دَخَلَ فِي شَيْءٍ مِنْ أَسْعَارِ الْمُسْلِمِينَ لِيُغْلِيَهُ عَلَيْهِمْ، فَإِنَّ حَقًّا عَلَى اللَّهِ تبارك وتعالى أَنْ يُقْعِدَهُ بِعُظْمٍ مِنْ النَّارِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ) () .
ضعيف.

أخرجه الطيالسي في ` مسنده ` (125/ 928) ، ومن طريقه الدولابي في ` الكنى ` (2/ 124) ، وأحمد (5/ 27) - والسياق له - ، والحاكم (2/ 12 - 13) ، والبيهقي في `السن ` (6/ 35) عن الطيالسي أيضاً،
() أملى الشيخ رحمه الله على حاشية تخريج هذا الحديث: ` أسد الغابة ` (4/ 457) ،
ولعلها ملاحظة لنفسه، والله أعلم. (الناشر) .
و ` شعب الإيمان` (7/ 525/ 11214) ، والروياني في ` مسنده` (2/ 328، 329/1295/1300) ، والطبراني في ` المعجم الكبير` (0 2/ 209 - 210/479 - 481) ، و `الأوسط ` (9/ 296/ 8646) من طرق عن زيد بن مرة أبي المعلى عن الحسن قال:
ثَقُلَ معقل بن يسار، فدخل إليه عبيد الله بن زياد يعوده، فقال: هل تعلم يا معقل أني سفكت دماً؛ قال: ما علمت. قال: هل تعلم أني دخلت في شيء من أسعار المسلمين؟ قال: ما علمت. قال: أجلسوني، ثم قال: اسمع يا عبيد الله!
حتى أحدثك شيئاً لم أسمعه من رسول الله صلى الله عليه وسلم مرة ولا مرتين، سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: … (فذكره) ، قال: أنت سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؛ قال:
نعم؛ غير مرة ولا مرتين. وقال الحاكم:
` ليس من شرط هذا الكتاب `.
يشير إلى أنه ضعيف. وأقره الذهبي في ` تلخيصه`، وأكده بقوله:
` لا أعرف زيداً هذا`.
وتبعه ابن الملقن في ` مختصر الاستدراك ` (1/ 513) ، وتبعه المعلق عليه، واستشهد بي! فقد كنت قد خرجت الحديث تخريجاً مختصراً في ` غاية المرام` (197/ 328) ، لم تتيسر لي يومئذ ما تيسر لي الأن من المصادر والمراجع،
والحمد لله، فكان لا بد من الاعتماد على من تقدم من الحفاظ، وبخاصة منهم الذهبي النقاد.
ثم تبين لي أن الرجل ثقة، وتعجبت كل العجب من تتابع الحفاظ على عدم معرفتهم إياه؛ مع أنه مترجم في كتب التراجم القديمة التي هي المرجع في كثير من
الترجمات الواردة في كتب الحفاظ المتأخرين كالذهبي، والمزي، والعسقلاني
وغيرهم، فأقول:
ا - قال البخاري في ` التاريخ ` (2/ 1/ 405) :
`زيد بن مرة - هو: ابن أبي ليلى أبو المعلى، مولى بني العدوية البصري - ، سمع الحسن، ورأى أنساً، روى عنه معتمر بن سليمان وأبو داود`.
2 - وكذا في ` الجرح والتعديل ` (1/ 2/ 573) ، وزاد عطفاً على: `وأبو داود `، فقال:
` وعبد الصمد بن عبد الوارث `.
قلت: وعبد الصمد هذا، هو شيخ أحمد في هذا الحديث.
3 - ابن حبان؛ فقد ذكره في طبقة التابعين من ` الثقات ` (6/ 318) ،
وقال:
` يروي عن الحسن، روى عنه المعتمر وأبو داود `.
قلت: فهؤلاء ثلاثة ثقات، ومعهم ثلاثة آخرون ذكرتهم في `تيسير الانتفاع ` اثنان منهما ثقتان أيضاً، فلا جرم أنه وثقه أبو داود الطيالسي وابن معين وقال أبو حاتم - :
` صالح الحديث `.
ومع ذلك لم يعرفه من سبقت الإشارة إليه، وهم:
1 - الحافظ المنذري؛ قال في ` الترغيب ` (3/ 27) بعدما عزاه لأحمد والطبراني والحاكم:
` رووه كلهم عن زيد بن مرة عن الحسن، وقال الحاكم ة سمعه معتمر بن سليمان وغيره من زيد. قال الحافظ: ومَن زيد بن مرة؛ فرواته كلهم ثقات معروفون غيره، فإني لا أعرفه، ولم أقف له على ترجمة `!
2 - الحافظ الذهبي، وقد سبق كلامه.
3 - الحافظ الهيثمي (4/ 151) ؛ [قال] :
`وفيه زيد بن مرة أبو المعلى، ولم أجد من ترجمه، وبقية رجاله رجال (الصحيح) `.
4 - الحافظ ابن حجر؛ فإنه استدرك ترجمته في ` اللسان ` على ` الميزان ` (2/ 511) ، ونقل كلام المنذري المتقدم وأقره!
فيستغرب منه أن يخفى عليه حاله أكثر من غيره؛ لسعة دائرة حفظه، ولذلك لم يترجم له في ` تعجيل المنفعة ` - وهو على شرطه - ؛ لرواية أحمد له!
5 - ومثله العلامة سراج الدين ابن الملقن؛ لإقراره الحافظ الذهبي في قوله المتقدم: ` لا أعرف زيداً هذا `!
ويتلخص مما تقدم: أن الصواب أن يقال في ` تخريج الحديث `:
` ورجاله ثقات رجال (الصحيح) ؛ غير زيد بن مرة؛ وهو ثقة `.
وإذا كان الأمر كذلك، فهل يصح الحديث بذلك؟
فأقول: لا؛ لأن الحسن البصري معروف بالتدليس؛ مع ثقته وفضله وزهده، ولذلك؛ فحديثه الذي لم يصرح فيه بالتحديث معلول، وهذا منه؛ فإنه علقه فقال:
` قال: ثقل معقل بن يسار.. `. فصورته صورة المرسل، وقد قال بعض الحفاظ:
` مراسيل الحسن البصري كالريح `.
(تنبيه) : (زيد) المتقدم وقع في ` المسند ` (يزيد) بزيادة الياء في أوله!
وهو خطأ من بعض النساخ، ويبدو أنه خطأ قديم؛ فإني رأيته كذلك في ` جامع
المسانيد` لابن كثير (11/ 688) . وعلى الصواب وقع في ` أطراف المسند `
للحافظ ابن حجر (5/ 356/ 8 1 73) ، فلا أدري أهكذا في نسخته من ` المسند `،
أم أصلحه هو؟ والظاهر الأول، ويؤيده أنه كذلك عند شيخه الهيثمي - كما تقدم - ،
وقد عزاه لأحمد والطبراني. والله أعلم.
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(যে ব্যক্তি মুসলমানদের বাজারদরের কোনো বিষয়ে প্রবেশ করে (হস্তক্ষেপ করে) তাদের উপর মূল্য বৃদ্ধি করার জন্য, তবে আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার উপর হক্ব হলো যে, কিয়ামতের দিন তিনি তাকে আগুনের এক বিশাল অংশে বসিয়ে দেবেন।) ()।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বায়ালিসী তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (১২৫/৯২৮), এবং তাঁর (ত্বায়ালিসীর) সূত্রে দাওলাবী ‘আল-কুনা’ গ্রন্থে (২/১২৪), এবং আহমাদ (৫/২৭) – আর এই বর্ণনাটি তাঁরই – এবং হাকিম (২/১২-১৩), এবং বাইহাক্বী ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে (৬/৩৫) ত্বায়ালিসীর সূত্রেও।
() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসের তাখরীজের টীকায় লিপিবদ্ধ করেছেন: ‘আসাদুল গাবাহ’ (৪/৪৫৭)। সম্ভবত এটি তাঁর নিজের জন্য একটি নোট ছিল, আল্লাহই ভালো জানেন। (প্রকাশক)।
এবং ‘শুআবুল ঈমান’ (৭/৫২৫/১১২১৪), এবং রুয়ানী তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/৩২৮, ৩২৯/১২৯৫/১৩০০), এবং ত্বাবারানী ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (২০/২০৯-২১০/৪৭৯-৪৮১), এবং ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৯/২৯৬/৮৬৪৬) বিভিন্ন সূত্রে যায়দ ইবনু মুররাহ আবুল মুআল্লাহ হতে, তিনি হাসান (আল-বাসরী) হতে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন:
মা’ক্বিল ইবনু ইয়াসার অসুস্থ হয়ে পড়লেন। তখন উবাইদুল্লাহ ইবনু যিয়াদ তাঁকে দেখতে গেলেন। তিনি (উবাইদুল্লাহ) বললেন: হে মা’ক্বিল! আপনি কি জানেন যে আমি রক্তপাত ঘটিয়েছি? তিনি বললেন: আমি জানি না। তিনি বললেন: আপনি কি জানেন যে আমি মুসলমানদের বাজারদরের কোনো বিষয়ে হস্তক্ষেপ করেছি? তিনি বললেন: আমি জানি না। তিনি বললেন: আমাকে বসিয়ে দাও। অতঃপর বললেন: হে উবাইদুল্লাহ! শোনো! আমি তোমাকে এমন একটি বিষয় বলব যা আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে একবার বা দুইবার শুনিনি। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: ... (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন)। তিনি (উবাইদুল্লাহ) বললেন: আপনি কি এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের নিকট থেকে শুনেছেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, একবার বা দুইবার নয়।
আর হাকিম বলেছেন: ‘এটি এই কিতাবের শর্তের অন্তর্ভুক্ত নয়।’ তিনি ইঙ্গিত করেছেন যে এটি যঈফ। আর যাহাবী তাঁর ‘তালখীস’ গ্রন্থে তা সমর্থন করেছেন এবং তাঁর এই কথা দ্বারা তা নিশ্চিত করেছেন: ‘আমি এই যায়দকে চিনি না।’
আর ইবনুল মুলাক্কিন ‘মুখতাসারুল ইসতিদরাক’ গ্রন্থে (১/৫১৩) তাঁর (যাহাবীর) অনুসরণ করেছেন, এবং এর উপর মন্তব্যকারীও তাঁর অনুসরণ করেছেন, আর আমার উদ্ধৃতি দিয়েছেন! আমি তো এই হাদীসটির একটি সংক্ষিপ্ত তাখরীজ ‘গায়াতুল মারাম’ গ্রন্থে (১৯৭/৩২৮) করেছিলাম, কিন্তু সেদিন আমার জন্য সেই উৎস ও তথ্যসূত্র সহজলভ্য ছিল না যা এখন আমার জন্য সহজলভ্য হয়েছে, আলহামদুলিল্লাহ। তাই পূর্ববর্তী হাফিযদের উপর নির্ভর করা অপরিহার্য ছিল, বিশেষ করে সমালোচক যাহাবীর উপর।
অতঃপর আমার কাছে স্পষ্ট হলো যে, লোকটি সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)। আর হাফিযগণ যে ধারাবাহিকভাবে তাঁকে চিনতে পারেননি, তাতে আমি অত্যন্ত বিস্মিত হয়েছি; অথচ তিনি প্রাচীন জীবনী গ্রন্থগুলোতে স্থান পেয়েছেন, যা যাহাবী, মিযযী, আসক্বালানী প্রমুখ পরবর্তী হাফিযদের কিতাবে বর্ণিত বহু জীবনীর মূল উৎস। তাই আমি বলছি:
১- বুখারী ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (২/১/৪০৫) বলেছেন: ‘যায়দ ইবনু মুররাহ – তিনি হলেন: ইবনু আবী লায়লা আবুল মুআল্লাহ, বনী আল-আদাবিয়্যাহ আল-বাসরীর মাওলা – তিনি হাসান (আল-বাসরী) হতে শুনেছেন এবং আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছেন। তাঁর থেকে মু’তামির ইবনু সুলাইমান ও আবূ দাঊদ বর্ণনা করেছেন।’
২- অনুরূপভাবে ‘আল-জারহ ওয়াত-তা’দীল’ গ্রন্থেও (১/২/৫৭৩) (তাঁর জীবনী আছে), আর ‘আবূ দাঊদ’-এর সাথে অতিরিক্ত যোগ করে বলেছেন: ‘এবং আব্দুল সামাদ ইবনু আব্দুল ওয়ারিস।’ আমি (আল-আলবানী) বলছি: আর এই আব্দুল সামাদই এই হাদীসে আহমাদ (ইবনু হাম্বল)-এর শাইখ।
৩- ইবনু হিব্বান; তিনি তাঁকে ‘আস-সিক্বাত’ (নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীগণ) গ্রন্থের তাবেঈনদের স্তরে উল্লেখ করেছেন (৬/৩১৮), এবং বলেছেন: ‘তিনি হাসান (আল-বাসরী) হতে বর্ণনা করেন, তাঁর থেকে মু’তামির ও আবূ দাঊদ বর্ণনা করেছেন।’ আমি (আল-আলবানী) বলছি: এই তিনজন সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য), আর তাদের সাথে আরও তিনজন আছেন যাদেরকে আমি ‘তাইসীরুল ইনতিফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছি, যাদের মধ্যে দুজনও সিক্বাহ। সুতরাং এতে কোনো সন্দেহ নেই যে আবূ দাঊদ আত-ত্বায়ালিসী ও ইবনু মাঈন তাঁকে সিক্বাহ বলেছেন। আর আবূ হাতিম বলেছেন: ‘সালেহুল হাদীস’ (হাদীসের ক্ষেত্রে ভালো)।
এতদসত্ত্বেও পূর্বে যাদের প্রতি ইঙ্গিত করা হয়েছে, তারা তাঁকে চিনতে পারেননি। তারা হলেন:
১- হাফিয মুনযিরী; তিনি ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (৩/২৭) আহমাদ, ত্বাবারানী ও হাকিমের দিকে হাদীসটি সম্বন্ধযুক্ত করার পর বলেছেন: ‘তারা সবাই যায়দ ইবনু মুররাহ হতে, তিনি হাসান (আল-বাসরী) হতে বর্ণনা করেছেন। আর হাকিম বলেছেন: মু’তামির ইবনু সুলাইমান ও অন্যান্যরা যায়দ হতে শুনেছেন। হাফিয (মুনযিরী) বলেন: যায়দ ইবনু মুররাহ কে? তাঁর বর্ণনাকারীরা সবাই পরিচিত সিক্বাহ, তিনি ছাড়া। কারণ আমি তাঁকে চিনি না এবং তাঁর কোনো জীবনী খুঁজে পাইনি!’
২- হাফিয যাহাবী, তাঁর বক্তব্য পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।
৩- হাফিয হাইসামী (৪/১৫১); [তিনি] বলেছেন: ‘আর এতে যায়দ ইবনু মুররাহ আবুল মুআল্লাহ আছেন, আমি তাঁর জীবনী খুঁজে পাইনি। আর বাকি বর্ণনাকারীরা (সহীহ)-এর বর্ণনাকারী।’
৪- হাফিয ইবনু হাজার; কারণ তিনি ‘আল-মীযান’ গ্রন্থের উপর ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে (২/৫১১) তাঁর জীবনী সংযোজন করেছেন, এবং মুনযিরীর পূর্বোক্ত বক্তব্য উদ্ধৃত করে তা সমর্থন করেছেন! তাঁর মতো ব্যক্তির ক্ষেত্রে তাঁর অবস্থা গোপন থাকাটা অন্যদের চেয়ে বেশি বিস্ময়কর; কারণ তাঁর স্মৃতিশক্তির পরিধি ছিল ব্যাপক। এই কারণেই তিনি ‘তা’জীলুল মানফা’আহ’ গ্রন্থে তাঁর জীবনী উল্লেখ করেননি – যদিও তা তাঁর শর্তের অন্তর্ভুক্ত ছিল – আহমাদ তাঁর থেকে বর্ণনা করার কারণে!
৫- এবং তাঁরই মতো আল্লামা সিরাজুদ্দীন ইবনুল মুলাক্কিন; কারণ তিনি হাফিয যাহাবীর পূর্বোক্ত বক্তব্য: ‘আমি এই যায়দকে চিনি না!’ – তা সমর্থন করেছেন!
উপরোক্ত আলোচনা থেকে সারসংক্ষেপ হলো: হাদীসের তাখরীজে সঠিক কথা হলো এই যে, বলা হবে: ‘এর বর্ণনাকারীরা সিক্বাহ এবং (সহীহ)-এর বর্ণনাকারী; যায়দ ইবনু মুররাহ ছাড়া; আর তিনি সিক্বাহ।’
আর যদি বিষয়টি এমন হয়, তবে কি এর দ্বারা হাদীসটি সহীহ হবে? আমি বলছি: না; কারণ হাসান আল-বাসরী তাঁর নির্ভরযোগ্যতা, মর্যাদা ও দুনিয়াবিমুখতা সত্ত্বেও তাদলীসের জন্য পরিচিত। এই কারণে, তাঁর যে হাদীসে তিনি সরাসরি শোনার কথা স্পষ্ট করেননি, তা ত্রুটিযুক্ত (মা’লূল)। আর এটি সেই ধরনের হাদীস; কারণ তিনি এটিকে এভাবে ঝুলিয়ে বর্ণনা করেছেন: ‘তিনি বললেন: মা’ক্বিল ইবনু ইয়াসার অসুস্থ হয়ে পড়লেন...।’ সুতরাং এর রূপটি মুরসাল-এর রূপের মতো। আর কিছু হাফিয বলেছেন: ‘হাসান আল-বাসরীর মুরসাল বর্ণনাগুলো বাতাসের মতো (অগ্রহণযোগ্য)।’
(সতর্কতা): পূর্বে উল্লেখিত (যায়দ) নামটি ‘আল-মুসনাদ’ গ্রন্থে (ইয়াযীদ) হিসেবে এসেছে, যার শুরুতে অতিরিক্ত ‘ইয়া’ রয়েছে! এটি কিছু লিপিকারের ভুল। আর মনে হচ্ছে এটি একটি পুরাতন ভুল; কারণ আমি ইবনু কাসীরের ‘জামি’উল মাসানীদ’ গ্রন্থেও (১১/৬৮৮) এটি এভাবেই দেখেছি। আর হাফিয ইবনু হাজারের ‘আত্বরাফুল মুসনাদ’ গ্রন্থে (৫/৩৫৬/৭১৭৩) এটি সঠিকভাবেই এসেছে। তাই আমি জানি না যে ‘আল-মুসনাদ’-এর তাঁর (ইবনু হাজারের) কপিতে কি এটি এভাবেই ছিল, নাকি তিনি নিজেই এটি সংশোধন করেছেন? প্রথমটিই অধিক স্পষ্ট, আর এর সমর্থন করে যে তাঁর শাইখ হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকটও এটি তেমনই ছিল – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে – আর তিনি এটিকে আহমাদ ও ত্বাবারানীর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করেছেন। আল্লাহই ভালো জানেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6647)


(من انصرف غَرِيمه وهو راضٍ عنه؛ صلَّت عليه دوابُ الأرض، ونونُ الماء. ومن انصرف غَرِيمه وهو ساخطٌ؛ كُتب عليه في كل يوم وليلةٍ وجمعةٍ وشهر ظلمٌ) () .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (24/ 233/ 591، 635) من طريق بقية بن الوليد عن ابن أبي الجون عن أبي سعد عن معاوية بن إسحاق عن خولة قال: … فذكره مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد مسلسل بالعلل:
الأولى: الانقطاع بين خولة (وهي بنت قيس الأنصارية امرأة حمزة بن عبد المطلب) و (معاوية بن إسحاق) ؛ فإن عامة رواياته عن التابعين، ولذلك أورده
() كتب الشيخ رحمه الله بخطه بهامش الأصل: ` انظر الرقم (6466) `. (الناشر) .
ابن حبان في طبقة (أتباع التابعين) (7/ 467) ، والحافظ في (الطبقة السادسة) .
الثانية: أبو سعد هذا - هو: سعيد بن المرزبان، وهو - ضعيف مدلس - كما في ` التقريب ` وغيره - .
الثالثة: ابن أبي الجون، لم أعرفه، وقد فتشت عنه ما ساعدني نشاطي ووقتي، فلم أجده، ويغلب على الظن أنه من شيوخ بقية المجهولين.
الرابعة: بقية بن الوليد، مدلس معروف، وقد عنعن.
قلت: ومع كل هذه العلل الظاهرة قنع الهيثمي بواحدة منها؛ فقال (4/ 131) :
` رواه الطبراني في ` الكبير `، وفيه أبو سعد البقال، وهو ضعيف `!
وأشار المنذري في ` الترغيب ` إلى تضعيف الحديث (3/ 38) - ثم رواه الطبراني (رقم 592) ، وفي ` الأ وسط ` أيضاً (6/ 15 - 16/5025) من طريق حبان بن علي عن سعد بن طريف عن موسى بن طلحة عن
خولة امرأة حمزة به نحوه.
وهذا فيه علتان:
الأولى: سعد بن طريف؛ قال الحافظ:
` متروك، رماه ابن حبان بالوضع `.
والأخرى: حِبان بن علي؛ وهو ضعيف.
(تنبيه) : كان في أول الحديث قوله صلى الله عليه وسلم:
` ما قدس الله أمة لا يأخذ ضعيفها الحق من قويها غير متعتع`.
فما رأيت أن أذكره مع هذا الحديث الواهي لثبوته من طرق أخرى، منها:
عن أبي سعيد الخدري: عند ابن ماجه (2426) في قصة ذكرت فيها خولة بنت قيس.
وإسناده صحيح. وأخرجه ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (6/ 592/3147) دون القصة، ومن طريقه أبو يعلى في ` مسنده ` (2/ 344/ 1091) .
وجاء في قصة أخرى من حديث ابن مسعود قال:
لما قدم النبي صلى الله عليه وسلم المدينة أقطع الدور، وأقطع ابن مسعود فيمن أقطع، فقال له أصحابه: يا رسول الله! نَكّبه عنا! قال:
` فلم بعثني الله إذن؟! إن الله لا يقدس أمة لا يعطون الضعيف منهم حقه `.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير` (10/ 274/ 0534 1) وفي ` الأوسط `
(5/ 498/ 4946) من طريق يحيى بن جعدة بن هبيرة عنه.
قلت: ورجاله ثقات - كما قال الهيثمي (4/ 197) - ، لكن يحيى هذا لم يدرك ابن مسعود - كما قال الحربي وأبو حاتم - ، ولولا ذاك؛ لكان صحيح الإسناد، فقول المنذري في ` الترغيب ` (3/ 40) :
` بإسناد جيد `؛ غير جيد. ورواه البيهقي (6/ 145) عن يحيى مرسلاً.
ثم روى له شاهداً من حديث بريدة مرفوعاً.

أخرجه (6/ 95) من طريق حامد بن أبي حامد بسنده عنه.
وحامد هذا - هو: ابن محمود المروزي - ؛ لم أعرفه، ومن فوقه ثقات.
ثم أخرج له شاهداً آخر من طريق شيخ يحدث عن أبي سفيان بن الحارث بن عبد المطلب عن النبي صلى الله عليه وسلم نحوه.
وأخرجه الحاكم (3/ 256) . وسمى الشيخ في رواية (عبد الله بن أبي سفيان) وقال:
` لم يسمع عبد الله بن أبي سفيان عن أبيه `.
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(যে ব্যক্তি তার ঋণদাতার কাছ থেকে এমন অবস্থায় ফিরে আসে যে সে (ঋণদাতা) তার প্রতি সন্তুষ্ট; তার জন্য যমীনের সকল প্রাণী এবং পানির মাছেরা (নূন) দু'আ করে। আর যে ব্যক্তি তার ঋণদাতার কাছ থেকে এমন অবস্থায় ফিরে আসে যে সে (ঋণদাতা) অসন্তুষ্ট; তার উপর প্রতিদিন, প্রতি রাতে, প্রতি জুমু'আয় এবং প্রতি মাসে যুলুম (অবিচার) লেখা হয়) ()।
মুনকার।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (২৪/২৩৩/৫৯১, ৬৩৫) বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ-এর সূত্রে, তিনি ইবনু আবিল জাওন থেকে, তিনি আবূ সা'দ থেকে, তিনি মু'আবিয়াহ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি খাওলাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ... অতঃপর তিনি এটিকে মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে উল্লেখ করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি ত্রুটিসমূহের একটি ধারাবাহিকতা (مسلسل بالعلل):

প্রথমত: খাওলাহ (তিনি হলেন হামযাহ ইবনু আব্দুল মুত্তালিবের স্ত্রী খাওলাহ বিনতু ক্বায়স আল-আনসারিয়্যাহ) এবং (মু'আবিয়াহ ইবনু ইসহাক)-এর মাঝে ইনক্বিত্বা' (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে। কারণ তার অধিকাংশ বর্ণনা তাবেঈনদের থেকে। এই কারণে ইবনু হিব্বান তাকে (৭/৪৬৭) ‘আতবাউত তাবেঈন’ (তাবেঈনদের অনুসারী) স্তরে এবং হাফিয (ইবনু হাজার) তাকে ‘ষষ্ঠ স্তর’-এ উল্লেখ করেছেন।

() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) মূল কিতাবের টীকায় নিজ হাতে লিখেছেন: ‘৬৪৬৬ নম্বরটি দেখুন।’ (প্রকাশক)।

দ্বিতীয়ত: এই আবূ সা'দ - তিনি হলেন: সা'ঈদ ইবনুল মারযুবান, আর তিনি - যঈফ (দুর্বল) ও মুদাল্লিস - যেমনটি ‘আত-তাক্বরীব’ এবং অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে।

তৃতীয়ত: ইবনু আবিল জাওন, আমি তাকে চিনি না। আমার কর্মতৎপরতা ও সময় যতটুকু সাহায্য করেছে, আমি তাকে খুঁজেছি, কিন্তু পাইনি। প্রবল ধারণা এই যে, তিনি বাক্বিয়্যাহ-এর মাজহূল (অজ্ঞাত) শাইখদের অন্তর্ভুক্ত।

চতুর্থত: বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ, তিনি একজন পরিচিত মুদাল্লিস, আর তিনি 'আনআনা' (عنعن - অস্পষ্টভাবে) বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: এই সকল সুস্পষ্ট ত্রুটি থাকা সত্ত্বেও হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) সেগুলোর মধ্যে একটিতেই সন্তুষ্ট ছিলেন; তিনি (৪/১৩১) বলেছেন: ‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এতে আবূ সা'দ আল-বাক্কাল রয়েছেন, আর তিনি যঈফ।’

আর মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে হাদীসটিকে যঈফ (দুর্বল) বলে ইঙ্গিত করেছেন (৩/৩৮)। - অতঃপর ত্ববারানী এটি (নং ৫৯২) এবং ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থেও (৬/১৫-১৬/৫০২৫) হিব্বান ইবনু আলী-এর সূত্রে, তিনি সা'দ ইবনু ত্বারীফ থেকে, তিনি মূসা ইবনু ত্বালহাহ থেকে, তিনি হামযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী খাওলাহ থেকে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন।

আর এতে দুটি ত্রুটি রয়েছে:

প্রথমত: সা'দ ইবনু ত্বারীফ; হাফিয (ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত), ইবনু হিব্বান তাকে জালকারী (মাওদ্বূকারী) বলে অভিযুক্ত করেছেন।’

আর অন্যটি: হিব্বান ইবনু আলী; আর তিনি যঈফ (দুর্বল)।

(সতর্কীকরণ): হাদীসটির শুরুতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই বাণীটি ছিল:
‘আল্লাহ সেই উম্মতকে পবিত্র করেন না, যার দুর্বল ব্যক্তি তার সবল ব্যক্তির কাছ থেকে কোনো প্রকার বাধা বা কষ্ট ছাড়াই তার হক্ব আদায় করে নিতে পারে না।’

আমি এই ওয়াহী (অত্যন্ত দুর্বল) হাদীসের সাথে এটিকে উল্লেখ করা সমীচীন মনে করিনি, কারণ এটি অন্যান্য সূত্রে প্রমাণিত, সেগুলোর মধ্যে রয়েছে:

আবূ সা'ঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে: ইবনু মাজাহ (২৪২৬)-এ একটি ক্বিসসা (ঘটনা) রয়েছে, যেখানে খাওলাহ বিনতু ক্বায়স-এর কথা উল্লেখ করা হয়েছে। আর এর সনদ সহীহ। আর ইবনু আবী শাইবাহ ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (৬/৫৯২/৩১৪৭) ঘটনাটি ছাড়া এটি বর্ণনা করেছেন, এবং তাঁর (ইবনু আবী শাইবাহ-এর) সূত্রে আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/৩৪৪/১০৯১) এটি বর্ণনা করেছেন।

আর অন্য একটি ঘটনায় ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে এসেছে, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাদীনায় আগমন করলেন, তখন তিনি ঘর-বাড়ি বণ্টন করে দিলেন, আর যাদেরকে বণ্টন করলেন তাদের মধ্যে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও বণ্টন করলেন। তখন তাঁর (ইবনু মাসঊদ-এর) সাথীরা তাঁকে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! তাকে আমাদের থেকে দূরে রাখুন! তিনি বললেন: ‘তাহলে আল্লাহ আমাকে কেন প্রেরণ করলেন?! নিশ্চয়ই আল্লাহ সেই উম্মতকে পবিত্র করেন না, যাদের দুর্বলরা তাদের হক্ব (অধিকার) পায় না।’

এটি ত্ববারানী ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১০/২৭৪/১০৫৩৪) এবং ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৫/৪৯৮/৪৯৪৬) ইয়াহইয়া ইবনু জা'দাহ ইবনু হুবাইরাহ-এর সূত্রে, তাঁর (ইবনু মাসঊদ-এর) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আমি বলি: এর বর্ণনাকারীগণ সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য) - যেমনটি হাইসামী (৪/১৯৭) বলেছেন - কিন্তু এই ইয়াহইয়া ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পাননি (তাঁর থেকে শোনেননি) - যেমনটি হারবী ও আবূ হাতিম বলেছেন - যদি এই ত্রুটি না থাকত; তবে এর সনদ সহীহ হতো। সুতরাং ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে মুনযিরী (৩/৪০)-এর এই উক্তি: ‘এর সনদ জাইয়িদ (উত্তম)’; তা জাইয়িদ নয়। আর বাইহাক্বী (৬/১৪৫) ইয়াহইয়া থেকে এটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

অতঃপর তিনি (আলবানী) এর জন্য বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে মারফূ' হিসেবে একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) বর্ণনা করেছেন।

এটি (৬/৯৫) হামিদ ইবনু আবী হামিদের সূত্রে, তাঁর (বুরাইদাহ-এর) থেকে তাঁর সনদসহ বর্ণনা করেছেন। আর এই হামিদ - তিনি হলেন: ইবনু মাহমূদ আল-মারওয়াযী - ; আমি তাকে চিনি না, আর তার উপরের বর্ণনাকারীগণ সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)।

অতঃপর তিনি এর জন্য অন্য একটি শাহেদ বর্ণনা করেছেন এমন এক শাইখের সূত্রে, যিনি আবূ সুফিয়ান ইবনুল হারিস ইবনু আব্দুল মুত্তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

আর এটি হাকেম (৩/২৫৬) বর্ণনা করেছেন। আর শাইখ (আলবানী) এক বর্ণনায় শাইখটির নাম দিয়েছেন (আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সুফিয়ান) এবং বলেছেন: ‘আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সুফিয়ান তাঁর পিতা থেকে শোনেননি।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6648)


(من أخذ من طريق المسلمين شِبراً؛ جاء يوم القيامة يحملُه من سبعِ أرضِين) .
منكر بذكر: (الطريق) .

أخرجه أبو يعلى في ` مسنده الكبير ` - كما في ` المطالب العالية المسندة ` (ق 82/ 1) - من طريق عون بن كهمس، والطبراني في ` المعجم الكبير ` (3/ 241/ 3172) ، وفي ` الصغير` (رقم 295 - الروض) ، ومن طريقه الخطيب في ` التاريخ ` (14/ 440) ، وابن عدي في ` الكامل ` (6/ 247 - 248) من طريق محمد بن عقبة السدوسي: ثنا محمد بن حمران كلاهما عن عطية بن سعد الدَّعاء عن الحكم بن الحارث السلمي مرفوعاً.
قلت: أعله الهيثمي بقوله في ` المجمع ` (4/ 176) :
`رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الصغير `، وفيه محمد بن عقبة السدوسي، وثقه ابن حبان، وضعفه أبو حاتم، وتركه أبو زرعة `.
وأشار المنذري (3/ 54) إلى إعلاله!.
قلت: لكنه قد توبع من الطريق الأول، وعون بن كهمس فيه ثقة - كما حققته في ترجمته من` تيسير الانتفاع ` - ، فلم يبق إعلاله إلابـ (عطية بن سعد الدعاء) ، وهو مجهول الحال، لا يعرف الا من الطريقين المذكودين، وقد ذكره ابن حبان في `الثقات ` (5/ 263) ولم يعرفه الهيثمي - كما سأذكر قوله في الحديث الآتي بعده - . وعلى هذا فقول الحافظ في ` الفتح ` (5/ 104) :
` ولأبي يعلى بإسناد حسن عن الحكم بن الحارث السلمي … `.
فهو غير حسن، لا سيما وذكر الطريق فيه لم يرد في شيء من الأحاديث الصحيحة التي شرحها من ` صحيح البخاري `، ولا في غيرها مما خرجه المنذري. والله أعلم.
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(যে ব্যক্তি মুসলমানদের রাস্তা থেকে এক বিঘত পরিমাণও গ্রহণ করবে; সে কিয়ামতের দিন সাত জমিন থেকে তা বহন করে নিয়ে আসবে)।
মুনকার (অস্বীকৃত), (রাস্তা/পথ) শব্দটি উল্লেখ থাকার কারণে।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘মুসনাদে কাবীর’-এ – যেমনটি ‘আল-মাতালিবুল আলিয়াহ আল-মুসনাদাহ’ (ক্বাফ ৮২/১)-এ রয়েছে – আওন ইবনু কাহমাস-এর সূত্রে, এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (৩/২৪১/৩১৭২)-এ, এবং ‘আস-সাগীর’ (নং ২৯৫ – আর-রওদ্ব)-এ, এবং তাঁর (ত্বাবারানীর) সূত্রেই খত্বীব তাঁর ‘আত-তারীখ’ (১৪/৪৪০)-এ, এবং ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ (৬/২৪৭-২৪৮)-এ মুহাম্মাদ ইবনু উক্ববাহ আস-সাদূসী-এর সূত্রে: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু হুমরান, তারা উভয়ে আত্বিয়াহ ইবনু সা'দ আদ-দা'আ থেকে, তিনি আল-হাকাম ইবনু আল-হারিস আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: হাইসামী তাঁর ‘আল-মাজমা’ (৪/১৭৬)-এ এই বলে এর ত্রুটি বর্ণনা করেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ ও ‘আস-সাগীর’-এ বর্ণনা করেছেন, এতে মুহাম্মাদ ইবনু উক্ববাহ আস-সাদূসী রয়েছেন, তাঁকে ইবনু হিব্বান বিশ্বস্ত বলেছেন, আর আবূ হাতিম দুর্বল বলেছেন, এবং আবূ যুর'আহ তাঁকে পরিত্যাগ করেছেন।’
আর মুনযিরী (৩/৫৪) এর ত্রুটির দিকে ইঙ্গিত করেছেন!

আমি বলি: কিন্তু প্রথম সূত্র দ্বারা এর মুতাবা'আত (সমর্থন) পাওয়া যায়। আর আওন ইবনু কাহমাস বিশ্বস্ত – যেমনটি আমি তাঁর জীবনীতে ‘তাইসীরুল ইনতিফা’ গ্রন্থে প্রমাণ করেছি – সুতরাং এর ত্রুটি কেবল (আত্বিয়াহ ইবনু সা'দ আদ-দা'আ)-এর মধ্যেই সীমাবদ্ধ থাকে। আর তিনি হলেন মাজহূলুল হাল (যার অবস্থা অজ্ঞাত), উল্লিখিত দুটি সূত্র ছাড়া তাঁকে জানা যায় না। ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আস-সিক্বাত’ (৫/২৬৩)-এ উল্লেখ করেছেন, কিন্তু হাইসামী তাঁকে চিনতে পারেননি – যেমনটি আমি এর পরবর্তী হাদীসে তাঁর বক্তব্য উল্লেখ করব।

আর এই ভিত্তিতে, হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-ফাতহ’ (৫/১০৪)-এ এই বক্তব্য:
‘আর আবূ ইয়া'লা আল-হাকাম ইবনু আল-হারিস আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাসান সানাদে বর্ণনা করেছেন...’
– এটি হাসান নয়। বিশেষত, এতে ‘রাস্তা/পথ’ (الطريق) শব্দটি উল্লেখ থাকা সহীহ বুখারীর কোনো সহীহ হাদীসে আসেনি, যার ব্যাখ্যা তিনি করেছেন, আর না মুনযিরী কর্তৃক বর্ণিত অন্য কোনো হাদীসে এসেছে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6649)


(إذا دفنتموني، ورششتم على قبري الماء؛ فقوموا على قبري، واستقبلوا القبلة، وادعوا لي) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (3171) من طريقين عن محمد بن حُمران عن عطية الدّعاء عن الحكم بن الحارث السلمي أنه غزا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث غزوات، قال: قال لنا: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لما سبق بيانه من جهالة حال عطية الدعاء في الحديث الذي قبله. وقال الهيثمي (3/ 44) :
` رواه الطبراني في ` الكبير `، وفيه عطية الدعاء، ولم أعرفه `.
ومحمد بن حمران؛ صدوق فيه لين؛ كما في ` التقريب `.
وقال الذهبي في ` الكاشف `:
`قال (س) : ليس بالقوي `.
(فائدة) : اختلفوا في ضبط (الدعاء) اختلافاً كثيراً، والراجح ما أثبته هنا، وفي الذي قبله، وبيانه في ` التيسير `.
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(যখন তোমরা আমাকে দাফন করবে এবং আমার কবরের উপর পানি ছিটাবে; তখন তোমরা আমার কবরের পাশে দাঁড়াবে, কিবলামুখী হবে এবং আমার জন্য দু'আ করবে)।
মুনকার।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (৩১৭২) গ্রন্থে দুটি সূত্রে মুহাম্মাদ ইবনু হুমরান হতে, তিনি আত্বিয়্যা আদ-দু'আ হতে, তিনি আল-হাকাম ইবনু আল-হারিস আস-সুলামী হতে বর্ণনা করেছেন, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে তিনটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন। তিনি বলেন: তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) আমাদেরকে বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); কারণ এর পূর্বের হাদীছে আত্বিয়্যা আদ-দু'আর অবস্থা অজ্ঞাত থাকার যে ব্যাখ্যা পূর্বে দেওয়া হয়েছে। আর হাইসামী (৩/৪৪) বলেন:
‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, এতে আত্বিয়্যা আদ-দু'আ রয়েছে, আমি তাকে চিনি না।’
আর মুহাম্মাদ ইবনু হুমরান; তিনি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে যেমন বলা হয়েছে, সত্যবাদী তবে তার মধ্যে কিছুটা দুর্বলতা (লিন) আছে।
আর যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে বলেন:
‘তিনি (নাসাঈ) বলেছেন: সে শক্তিশালী নয়।’

(ফায়দা): (আদ-দু'আ) শব্দটির উচ্চারণে (ضبط) তারা অনেক মতভেদ করেছেন। তবে এখানে এবং এর পূর্বের হাদীছে আমি যা সাব্যস্ত করেছি, তাই অধিকতর বিশুদ্ধ। এর ব্যাখ্যা ‘আত-তাইসীর’ গ্রন্থে রয়েছে।
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6650)


(مَنْ أَشْرِبَ قَلْبَهُ حُبَّ الدُّنْيَا الْتَاطَ مِنْهَا بِثَلاثٍ: شَقَاءٍ لا يَنْفَدُ عَنَاهُ، وَحِرْصٍ لا يَبْلُغُ غِنَاهُ، وَأَمَلٍ لا يَبْلُغُ مُنْتَهَاهُ، فَالدُّنْيَا طَالِبَةٌ وَمَطْلُوبَةٌ، فَمَنْ طَلَبَ الدُّنْيَا طَلَبَتْهُ الآخِرَةُ حَتَّى يَأْتِيَهُ الْمَوْتُ فَيَأْخُذَهُ، وَمَنْ طَلَبَ الآخِرَةَ طَلَبَتْهُ الدُّنْيَا حَتَّى يَسْتَوْفِيَ مِنْهَا رِزْقَهُ) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (10/ 201/ 10328) ، ومن طريقه أبو نعيم في ` الحلية` (8/ 119 - 125) ، وكذا الشجري في ` الأمالي ` (2/ 163) قال: حدثنا جبرون بن عيسى المقري بمصر: ثنا يحيى بن سليمان الحُفري المغربي: ثنا فضيل بن عياض عن الأعمش عن حبيب بن أبي ثابت عن أبي عبد الرحمن السلمي عن عبد الله بن مسعود مرفوعاً. وقال أبو نعيم:
`غريب من حديث فضيل والأعمش وحبيب، لم نكتبه إلا من حديث جبرون عن يحيى`.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مسلسل بالعلل:
عنعنة الأعمش وحبيب بن أبي ثابت.
ويحيى بن سليمان الحُفري المغربي فيه مقال؛ كما قال أبو نعيم في حديث
آخر بهذا الإسناد، كنت خرجته شاهداً في ` الصحيحة ` يرقم (343) ، والراوي عنه (جبرون) لم يوثقه أحد، وقد ذكره الأمير ابن ماكولا في `الإكمال ` (3/208) وقال:
` توفي سنة (294) `. ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً.
وقد روى له الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (4/ 236 - 238) حديثين عن (الحفري) هذا، أحدهما في ` المعجم الصغير ` أيضاً (ص 68 - هندية) ، و (21 - الروض) ، وروى له في ` الكبير ` ستة أحاديث عن شيخه (الحفري) أحدها الشاهد المشار إليه آنفاً كلها عن ابن عباس (1 1/ 267 - 269) ، وفي
الشاهد المذكور جمع بين النسبتين بشيخه المذكور؛ فقال:
` يحيى بن سليمان الحفري القرشي `.
وقد غفل عن هذا الجمع الحافظ الذهبي، ثم الحافظ الهيثمي تقليداً له، فقال عقب الحديت (10/ 249) :
` ولم أعرف (جبرون) . وأما (يحيى) ؛ فقد ذكر الذهبي في ` الميزان ` في آخر ترجمة (يحيى بن سليمان الجعفي) ؛ فقال:
فأما سميه (يحيى بن سليمان الحفري) ؛ فما علمت به بأساً.
ثم ذكر بعده (يحيى بن سليمان القرشي) ، قال أبو نعيم: فيه مقال. وذكره ابن الجوزي `.
قال الهيثمي عقبه:
` فإن كانا اثنين؛ فـ (الحفري) ثقة، والحديث صحيح على شرط الخُطبة.
والله أعلم. وبقية رجاله رجال (الصحيح) `.
قلت: يشيربـ ` شرط الخطبة ` إلى قوله في خطبة الكتاب:
` ومن كان من مشايخ الطبراني في ` الميزان ` نبهت على ضعفه، ومن لم يكن في ` الميزان ` ألحقته بالثقات الذين بعده `!
فأقول: يرد على هذا التعقيب والشرط المذكور أمور:
أولاً: لم أفهم مرجع الضمير في قوله: ` الذين بعده `، والكلام واضح دونه، فلعله مدرج من بعض النساخ.
ثانياً: لا يصح عندي الإطلاق المذكور في كل شيوخ الطبراني؛ بل أوى تقييد ذلك بالشيوخ الذين أكثر الرواية عنهم؛ فإنه يدل على شهرتهم واعتنائهم بهذا العلم، وإن مما لا شك فيه أن معرفة هذا النوع منهم يتطلب تتبعاً خاصاً، لا يتيسر ذلك إلا لمن تيسرت له سبل البحث من المتخصصين فيه، فمن يسر الله له ذلك، ووجد فيه الشرط المذكور أمكنه الاعتماد عليه، وإلا بقي على الجهالة الحالية على الأقل، و (جبرون) المذكور من هذا القبيل.
ثالثاً: يضاف إلى الشرط المذكور؛ أن يكون الإسناد فوقه سالماً من ضعف أو علة؛ لأنه في حالة عدم السلامة لا يزول احتمال أن يكون الضعف من الشيخ، وحينئذ لا يعتمد عليه، وهذا هو حال هذا الإسناد، فإن فيه العلل المتقدمة، وبخاصة (الحُفري) هذا، ففيه المقال المتقدم عن أبي نعيم.
رابعاً: استرواح الهيثمي إلى تفريق الذهبي بين (الحفري) و (القرشي) إنما هو اجتهاد منه لا دليل عليه، فلا يصح الركون إليه، وكيف يمكن توثيق مثله
والذهبي نفسه لم يسم شيخا له غير (عباد بن عبد الصمد) ؟! وهوضعيف جداً؛ كما قال أبو حاتم وغيره، وروى له الطبراني عنه حديثين منكرين جداً، خرجت أحدهما فيما تقدم برقم (5183) ، والآخر في `الروض النضير ` رقم (21) وإنما يمكن التوثيق إذا توفر الشرطان المذكوران في (ثانياً) و (ثالثاً) ، وكان المتن
معروفاً، وليس منكراً كهذا.
خامساً: يبطل التفريق المذكور جمع (جبرون) - في (يحيى) هذا - بين النسبتين (الحفري القرشي) ؛ - كما تقدم - ، وهذا ظاهر جداً، وكأنه لذلك أعرض الحافظ في ` اللسان ` عن ذكر تفريق الذهبي المذكور، بل أشار في كتابه ` تبصير المنتبه ` إلى الرد عليه مفيداً أنهما واحد فقال (1/ 340) :
` وبحاء مهملة مضمومة (يحيى بن سليمان الحفري المغربي) نسب إلى موضع بالقيروان يقال له: ` الحفرة `، روى عن الفضيل بن عياض، وعباد بن عبد الصمد، وعنه جبرون بن عيسى `.
وهذا أخذه الحافظ بالحرف الواحد من ` الإكمال` لابن ماكولا (2/ 244) ، والشاهد منه أنهما جعلا الراوي عن ` الفضيل ` هو نفس الراوي عن (عباد) خلافاً للذهبي، فهذا يؤكد ما ذهبنا إليه من أنه واحد، وأنه ممن فيه بأس.
ومن تناقض الحافظ العراقي؛ أنه قال في حديث الترجمة، وقد ذكره الغزالي في ` الإحياء ` (4/ 223) :
` أخرجه الطبراني من حديث ابن مسعود بسند حسن`!
وهذا يناقض تصريحه بضعف إسناد حديث ابن عباس الشاهد الذي سبقت الإشارة إليه - كما كنت نقلته هناك عنه - .
ولِـ (جبرون) هذا عن يحيى المذكور حديث آخر منكر، وهو الآتي:
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যে ব্যক্তির অন্তর দুনিয়ার ভালোবাসা পান করে, সে তিনটি জিনিসের সাথে জড়িয়ে যায়: এমন কষ্ট যার ক্লান্তি শেষ হয় না, এমন লোভ যার প্রাচুর্য লাভ করা যায় না, এবং এমন আশা যার শেষ সীমায় পৌঁছা যায় না। সুতরাং দুনিয়া হলো অন্বেষণকারী এবং অন্বেষিত। যে ব্যক্তি দুনিয়াকে অন্বেষণ করে, আখিরাত তাকে অন্বেষণ করে, যতক্ষণ না তার মৃত্যু আসে এবং তাকে ধরে ফেলে। আর যে ব্যক্তি আখিরাতকে অন্বেষণ করে, দুনিয়া তাকে অন্বেষণ করে, যতক্ষণ না সে তার রিযিক পূর্ণরূপে গ্রহণ করে নেয়।

যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ (১০/২০১/১০৩২৮)-এ সংকলন করেছেন। তাঁর (ত্বাবারানীর) সূত্রে আবূ নুআইম ‘আল-হিলইয়াহ’ (৮/১১৯-১২৫)-এ এবং অনুরূপভাবে আশ-শাজারী ‘আল-আমালী’ (২/১৬৩)-এ সংকলন করেছেন। তাঁরা বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মিসরের জাবরূন ইবনু ঈসা আল-মুকরী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হুফরী আল-মাগরিবী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ফুদ্বাইল ইবনু ইয়ায, আল-আ’মাশ থেকে, তিনি হাবীব ইবনু আবী সাবিত থেকে, তিনি আবূ আব্দুর রহমান আস-সুলামী থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) সূত্রে।

আর আবূ নুআইম বলেছেন:
‘ফুদ্বাইল, আল-আ’মাশ এবং হাবীবের সূত্রে এটি গারীব (বিরল)। আমরা এটি ইয়াহইয়া থেকে জাবরূনের হাদীস ছাড়া লিখিনি।’

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল, যা নিম্নোক্ত ত্রুটিসমূহের কারণে ধারাবাহিক:
আল-আ’মাশ এবং হাবীব ইবনু আবী সাবিতের ‘আনআনা’ (অস্পষ্ট বর্ণনা)।
আর ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হুফরী আল-মাগরিবী সম্পর্কে সমালোচনা রয়েছে; যেমনটি আবূ নুআইম এই সনদে বর্ণিত অন্য একটি হাদীসে বলেছেন, যা আমি ‘আস-সহীহাহ’ (হাদীস নং ৩৪৩)-এ শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবে উল্লেখ করেছিলাম। আর তাঁর থেকে বর্ণনাকারী (জাবরূন)-কে কেউ নির্ভরযোগ্য বলেননি। আমীর ইবনু মাকূলাহ তাঁকে ‘আল-ইকমাল’ (৩/২০৮)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘তিনি ২৯৪ হিজরীতে মারা যান।’ তিনি তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (সমালোচনা) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।

ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (৪/২৩৬-২৩৮)-এ এই (আল-হুফরী) থেকে তাঁর জন্য দুটি হাদীস বর্ণনা করেছেন, যার একটি ‘আল-মু’জামুস সাগীর’-এও রয়েছে (পৃ. ৬৮ – হিন্দী সংস্করণ) এবং (২১ – আর-রওদ্ব)। আর তিনি ‘আল-কাবীর’-এ তাঁর শাইখ (আল-হুফরী) থেকে ছয়টি হাদীস বর্ণনা করেছেন, যার মধ্যে একটি হলো পূর্বে উল্লেখিত শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা)। সবগুলোই ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে (১১/২৬৭-২৬৯)। আর উল্লিখিত শাহিদে তিনি তাঁর শাইখের ক্ষেত্রে দুটি নিসবাহ (উপাধি) একত্রিত করেছেন; তিনি বলেছেন:
‘ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হুফরী আল-কুরাশী’।

হাফিয আয-যাহাবী এই একত্রীকরণ সম্পর্কে উদাসীন ছিলেন, এরপর তাঁর অনুকরণে হাফিয আল-হাইসামীও উদাসীন ছিলেন। তিনি হাদীসটির পরে (১০/২৪৯) বলেছেন:
‘আমি (জাবরূন)-কে চিনি না। আর (ইয়াহইয়া)-এর ক্ষেত্রে; আয-যাহাবী ‘আল-মীযান’-এ ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-জু’ফী-এর জীবনী শেষে উল্লেখ করেছেন; তিনি বলেছেন:
‘আর তাঁর সমনামীয় (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হুফরী)-এর ক্ষেত্রে; আমি তাঁর মধ্যে কোনো সমস্যা দেখিনি।’
এরপর তিনি তাঁর পরে (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-কুরাশী)-কে উল্লেখ করেছেন, আবূ নুআইম বলেছেন: তাঁর সম্পর্কে সমালোচনা রয়েছে। আর ইবনু আল-জাওযী তাঁকে উল্লেখ করেছেন।’
আল-হাইসামী এর পরে বলেছেন:
‘যদি তারা দুজন হন; তবে (আল-হুফরী) নির্ভরযোগ্য (সিকাহ), এবং হাদীসটি ‘খুতবাহ’ (গ্রন্থের ভূমিকা)-এর শর্ত অনুযায়ী সহীহ। আল্লাহই ভালো জানেন। আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা ‘সহীহ’ গ্রন্থের বর্ণনাকারী।’

আমি বলি: তিনি ‘খুতবাহ’ (ভূমিকা)-এর শর্ত দ্বারা তাঁর গ্রন্থের ভূমিকায় করা উক্তিকে ইঙ্গিত করছেন:
‘ত্বাবারানীর শাইখদের মধ্যে যারা ‘আল-মীযান’-এ আছেন, আমি তাদের দুর্বলতা সম্পর্কে সতর্ক করেছি, আর যারা ‘আল-মীযান’-এ নেই, আমি তাদের পরবর্তী নির্ভরযোগ্যদের সাথে যুক্ত করেছি!’
আমি বলি: এই মন্তব্য এবং উল্লিখিত শর্তের উপর কয়েকটি বিষয় আপত্তি তোলে:

প্রথমত: আমি তাঁর উক্তি: ‘الذين بعده’ (যারা তাঁর পরে) এর সর্বনামের প্রত্যাবর্তনস্থল বুঝতে পারিনি, এটি ছাড়া বক্তব্য স্পষ্ট, সম্ভবত এটি কোনো কোনো লিপিকারের সংযোজন (মুদরাজ)।

দ্বিতীয়ত: ত্বাবারানীর সকল শাইখের ক্ষেত্রে উল্লিখিত সাধারণীকরণ আমার নিকট সঠিক নয়; বরং আমি মনে করি এটিকে সেই শাইখদের মধ্যে সীমাবদ্ধ করা উচিত যাদের থেকে তিনি বেশি বর্ণনা করেছেন; কারণ এটি তাদের প্রসিদ্ধি এবং এই ইলমের প্রতি তাদের মনোযোগ নির্দেশ করে। এতে কোনো সন্দেহ নেই যে, এই ধরনের শাইখদের পরিচয় জানতে বিশেষ অনুসন্ধানের প্রয়োজন, যা কেবল সেই বিশেষজ্ঞরাই করতে পারেন যাদের জন্য গবেষণার পথ সহজ হয়েছে। সুতরাং আল্লাহ যার জন্য এটি সহজ করেছেন এবং যিনি এতে উল্লিখিত শর্ত খুঁজে পেয়েছেন, তিনি এর উপর নির্ভর করতে পারেন। অন্যথায়, কমপক্ষে বর্তমানের মতো অজ্ঞাতই থেকে যাবে। আর উল্লিখিত (জাবরূন) এই প্রকারের অন্তর্ভুক্ত।

তৃতীয়ত: উল্লিখিত শর্তের সাথে আরও যোগ করা উচিত যে, এর উপরের সনদ দুর্বলতা বা ত্রুটিমুক্ত হতে হবে; কারণ ত্রুটিমুক্ত না হলে শাইখের পক্ষ থেকে দুর্বলতা আসার সম্ভাবনা দূর হয় না, এবং তখন এর উপর নির্ভর করা যায় না। আর এই সনদটির অবস্থা এমনই, কারণ এতে পূর্বোক্ত ত্রুটিসমূহ রয়েছে, বিশেষ করে এই (আল-হুফরী)-এর ক্ষেত্রে, তাঁর সম্পর্কে আবূ নুআইম থেকে পূর্বোক্ত সমালোচনা রয়েছে।

চতুর্থত: আল-হাইসামী কর্তৃক আয-যাহাবীর (আল-হুফরী) এবং (আল-কুরাশী)-এর মধ্যে পার্থক্য করার দিকে স্বস্তি অনুভব করা তাঁর পক্ষ থেকে একটি ইজতিহাদ মাত্র, যার কোনো প্রমাণ নেই। সুতরাং এর উপর নির্ভর করা সঠিক নয়। আর কীভাবে তাঁর মতো ব্যক্তিকে নির্ভরযোগ্য বলা যেতে পারে, যখন আয-যাহাবী নিজেই তাঁর (আল-হুফরী) জন্য (আব্বাদ ইবনু আব্দিস সামাদ) ছাড়া অন্য কোনো শাইখের নাম উল্লেখ করেননি?! আর তিনি (আব্বাদ) অত্যন্ত দুর্বল; যেমনটি আবূ হাতিম ও অন্যান্যরা বলেছেন। আর ত্বাবারানী তাঁর থেকে দুটি অত্যন্ত মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেছেন, যার একটি আমি পূর্বে ৫১৮৩ নং-এ উল্লেখ করেছি, এবং অন্যটি ‘আর-রওদ্বুন নাদ্বীর’ নং (২১)-এ। নির্ভরযোগ্যতা কেবল তখনই সম্ভব যখন (দ্বিতীয়) ও (তৃতীয়)-এ উল্লিখিত দুটি শর্ত পূরণ হয়, এবং মতন (হাদীসের মূল পাঠ) পরিচিত হয়, এর মতো মুনকার না হয়।

পঞ্চমত: উল্লিখিত পার্থক্যকে বাতিল করে দেয় (জাবরূন) কর্তৃক – এই (ইয়াহইয়া)-এর ক্ষেত্রে – দুটি নিসবাহ (আল-হুফরী আল-কুরাশী)-কে একত্রিত করা; – যেমনটি পূর্বে বলা হয়েছে –। আর এটি খুবই স্পষ্ট। সম্ভবত একারণেই হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’-এ আয-যাহাবীর উল্লিখিত পার্থক্য উল্লেখ করা থেকে বিরত থেকেছেন, বরং তিনি তাঁর গ্রন্থ ‘তাবসীরুল মুনতাবিহ’-এ এর খণ্ডনের দিকে ইঙ্গিত করেছেন এবং জানিয়েছেন যে তারা একজনই। তিনি (১/৩৪০)-এ বলেছেন:
‘এবং যবরযুক্ত হা (ح) দ্বারা (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হুফরী আল-মাগরিবী) কাইরাওয়ানের একটি স্থানের সাথে সম্পর্কিত, যাকে ‘আল-হুফরাহ’ বলা হয়। তিনি ফুদ্বাইল ইবনু ইয়ায এবং আব্বাদ ইবনু আব্দিস সামাদ থেকে বর্ণনা করেছেন, আর তাঁর থেকে জাবরূন ইবনু ঈসা বর্ণনা করেছেন।’
হাফিয (ইবনু হাজার) ইবনু মাকূলাহ-এর ‘আল-ইকমাল’ (২/২৪৪) থেকে হুবহু এটি গ্রহণ করেছেন। এর প্রমাণ হলো যে, তারা দুজনেই (ইবনু মাকূলাহ ও ইবনু হাজার) ‘ফুদ্বাইল’ থেকে বর্ণনাকারীকে (আব্বাদ) থেকে বর্ণনাকারী হিসেবেই গণ্য করেছেন, যা আয-যাহাবীর মতের বিপরীত। এটি আমাদের মতকে নিশ্চিত করে যে তিনি একজনই এবং তিনি তাদের অন্তর্ভুক্ত যাদের মধ্যে সমস্যা রয়েছে।

আর হাফিয আল-ইরাকীর স্ববিরোধিতার মধ্যে এটিও যে, তিনি আলোচ্য হাদীস সম্পর্কে বলেছেন, যা গাযালী ‘আল-ইহয়া’ (৪/২২৩)-এ উল্লেখ করেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে হাসান (উত্তম) সনদে সংকলন করেছেন!’
এটি তাঁর সেই বক্তব্যের বিপরীত, যেখানে তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাহিদ (সমর্থক বর্ণনা)-এর সনদকে দুর্বল বলে স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন – যেমনটি আমি সেখানে তাঁর থেকে উদ্ধৃত করেছিলাম –।

আর এই (জাবরূন)-এর উল্লিখিত ইয়াহইয়া থেকে আরেকটি মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস রয়েছে, যা আসছে:
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6651)


(بعثتُ لخرابِ الدُّنيا، ولم أبعث بِعمارتها) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (22/ 1 30 - 302/ 765) ، وعنه أبو نعيم في `الحلية ` (8/ 130) ! حدثنا جبرون بن عيسى المغربي: ثنا يحيى بن سليمان الحفري المغربي: ثنا فضيل بن عياض عن سفيان الثوري عن
عون بن أبي جحيفة عن أبيه:
أن معاوية بن أبي سفيان ضرب على الناس بعثاً؛ فخرجوا فرجع أبو الدحداح، فقال له معاوية: ألم تكن خرجت مع الناس؟ فقال: بلى، ولكني سمعت من رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثاً، فأحببت أن أضعه عندك؛ مخافة أن لا تلقاني: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:
` يا أيها الناس! من ولي منكم عملاً، فحجب بابه عن ذي حاجة المسلمين؛ حجبه الله أن يلج باب الجنة، ومن كانت همته الدنيا؛حرم الله عليه جواري، فإني بعثت.. ` الحديث.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ لجهالة (جبرون) ، وشيخه (يحيى الجفري) ؛ فيه ضعف - كما تقدم بيانه في الحديث الذي قبله - . وقال أبو نعيم:
`غريب لم نكتبه إلا من. حديث الجفري `. وقال المنذرى في ` الترغيب ` (3/ 142) :
` رواه الطبراني، ورواته ثقات؛ إلا شيخه (جبرون بن عيسى) ؛ فإني لم أقف فيه على جرح ولا تعديل. والله أعلم!.
كذا قال! و (يحيى بن سليمان الجفري) لم يوثقه أحد حتى ولا ابن حبان، بل ضعفه أبو نعيم - كما تقدم - في الحديث الذي قبله، ولذلك لم يوثقه الهيثمي، بل إنه لم يعرفه - خلافاً لما تقدم عنه في الحديث الذي قبله - ؛ فقال في تخريجه (5/211) :
` رواه الطبراني عن شيخه جبرون بن عيسى عن يحيى بن سليمان الجفري،
ولم أعرفهما، وبقية رجاله رجال الصحيح `!
قلت: وأنا أظن أنه التبس على المنذري بـ (يحيى بن سليمان الجعفي) وهو من شيوخ البخاري، وهو غير (الجفري) هذا؛ كما نص عليه الذهبي، وجرى عليه الحافظ في ` تهذيبه ` و` تقريبه `.
وأما سائر الحديث؛ فهو ثابت بنحوه، فجملة الولاية والحجب، لها بعض الشواهد قبل هذا في ` الترغيب `، وجملة الدنيا يأتي في ` الترغيب ` (4/ 82) من حديث زيد بن ثابت وأنس بن مالك ما يغني عنه؛ دون جملة الخراب.
(تنبيه) : (الجفري) هكذا وقع في هذا الإسناد بالجيم، وتقدم آنفاً عن ` الإكمال ` و` التبصير ` ضبطه بالحاء المهملة. لكن يبدوأن ضبطه بالجيم له وجه أيضاً، فانظر التعليق على ` الإكمال `.
ومن جهل المعلقين الثلاثة، وإقدامهم على التكلم بغير علم: قولهم في تعليقهم على ` الترغيب ` (3/ 117) :
`حسن بشواهده (!) قال الهيثمي.. `!
هكذا أطلقوا التحسين بالشواهد دون أن يبينوا - كعادتهم - وبخاصة ما يتعلق
بحديث الترجمة؛ فإنه منكر، لا شاهد له. والله المستعان.
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(আমাকে দুনিয়া ধ্বংসের জন্য প্রেরণ করা হয়েছে, এর আবাদের জন্য প্রেরণ করা হয়নি।)
মুনকার।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (২২/১৩০ - ৩০২/৭৬৫)-এ এবং তাঁর সূত্রে আবূ নু'আইম ‘আল-হিলইয়াহ’ (৮/১৩০)-এ বর্ণনা করেছেন। আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন জাবরূন ইবনু ঈসা আল-মাগরিবী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-হাফরী আল-মাগরিবী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ফুযাইল ইবনু আইয়ায, তিনি সুফিয়ান আস-সাওরী থেকে, তিনি আওন ইবনু আবী জুহাইফাহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে:
মু'আবিয়াহ ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) লোকদের উপর একটি সামরিক অভিযান (বা'স) চাপিয়ে দিলেন। তারা বেরিয়ে গেল। অতঃপর আবূদ দাহদাহ ফিরে এলেন। মু'আবিয়াহ তাকে বললেন: আপনি কি লোকদের সাথে বের হননি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, কিন্তু আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে একটি হাদীস শুনেছি, তাই আমি ভয় পেলাম যে আপনি হয়তো আমার সাথে আর সাক্ষাৎ নাও করতে পারেন, তাই আমি এটি আপনার কাছে রাখতে পছন্দ করলাম। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি:
‘হে লোক সকল! তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি কোনো কাজের দায়িত্ব গ্রহণ করে, অতঃপর সে মুসলিমদের প্রয়োজন সম্পন্নকারী ব্যক্তির জন্য তার দরজা বন্ধ করে দেয়; আল্লাহ তাকে জান্নাতের দরজা প্রবেশ করা থেকে বিরত রাখবেন। আর যার মনোযোগ (বা লক্ষ্য) দুনিয়া হয়; আল্লাহ তার উপর আমার সান্নিধ্য হারাম করে দেন। কেননা আমাকে প্রেরণ করা হয়েছে...’ (সম্পূর্ণ) হাদীসটি।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); কারণ (জাবরূন) অজ্ঞাত (জাহালাত), আর তার শায়খ (ইয়াহইয়া আল-জাফরী)-এর মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে—যেমনটি এর পূর্বের হাদীসে এর বর্ণনা অতিবাহিত হয়েছে। আর আবূ নু'আইম বলেছেন: ‘এটি গারীব (বিরল), আমরা এটি আল-জাফরী-এর হাদীস ছাড়া লিখিনি।’

আর মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৩/১৪২)-এ বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীগণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য); তবে তার শায়খ (জাবরূন ইবনু ঈসা) ব্যতীত; কারণ আমি তার ব্যাপারে জারহ (দোষারোপ) বা তা'দীল (নির্ভরযোগ্যতা) কিছুই পাইনি। আল্লাহই ভালো জানেন!’

তিনি (মুনযিরী) এমনই বলেছেন! অথচ (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-জাফরী)-কে ইবনু হিব্বানও নির্ভরযোগ্য বলেননি, বরং আবূ নু'আইম তাকে দুর্বল বলেছেন—যেমনটি এর পূর্বের হাদীসে অতিবাহিত হয়েছে। এই কারণে হাইসামীও তাকে নির্ভরযোগ্য বলেননি, বরং তিনি তাকে চিনতেই পারেননি—যা এর পূর্বের হাদীসে তার থেকে যা অতিবাহিত হয়েছে তার বিপরীত—তাই তিনি তার তাখরীজ (৫/২১১)-এ বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী তার শায়খ জাবরূন ইবনু ঈসা থেকে, তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-জাফরী থেকে বর্ণনা করেছেন। আমি তাদের দু'জনকেই চিনি না, আর বাকি বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: আমি মনে করি যে মুনযিরীর নিকট (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমান আল-জা'ফী)-এর সাথে বিষয়টি মিশ্রিত হয়ে গেছে, যিনি বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শায়খদের অন্তর্ভুক্ত, আর তিনি এই (আল-জাফরী) নন; যেমনটি যাহাবী স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন এবং হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর ‘তাহযীব’ ও ‘তাকরীব’-এ এর উপরই চলেছেন।

আর হাদীসের বাকি অংশ; তা অনুরূপভাবে প্রমাণিত। সুতরাং ‘দায়িত্ব ও বাধা’ সংক্রান্ত বাক্যটির কিছু শাওয়াহিদ (সমর্থক বর্ণনা) এর পূর্বে ‘আত-তারগীব’-এ রয়েছে। আর ‘দুনিয়া’ সংক্রান্ত বাক্যটির জন্য যায়িদ ইবনু সাবিত ও আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে ‘আত-তারগীব’ (৪/৮২)-এ এমন কিছু আসবে যা এর জন্য যথেষ্ট হবে; তবে ‘ধ্বংস’ সংক্রান্ত বাক্যটি ছাড়া।

(সতর্কতা): (আল-জাফরী) এই সনদে ‘জীম’ (ج) অক্ষর দিয়ে এসেছে, আর এর পূর্বে ‘আল-ইকমাল’ ও ‘আত-তাবসীর’ থেকে এর উচ্চারণ ‘হা’ (ح) অক্ষর দিয়ে এসেছে। কিন্তু মনে হচ্ছে যে ‘জীম’ দিয়ে এর উচ্চারণও একটি দিক হতে পারে, সুতরাং ‘আল-ইকমাল’-এর টীকা দেখুন।

আর তিনজন টীকাকারদের অজ্ঞতা এবং জ্ঞান ছাড়া কথা বলার দুঃসাহসের মধ্যে রয়েছে ‘আত-তারগীব’ (৩/১১৭)-এর টীকায় তাদের এই উক্তি: ‘এর শাওয়াহিদ (সমর্থক বর্ণনা) দ্বারা হাসান (!) হাইসামী বলেছেন...!’ তারা তাদের অভ্যাস অনুযায়ী ব্যাখ্যা না দিয়েই শাওয়াহিদ দ্বারা হাসানে উন্নীত করার কথা এভাবে সাধারণভাবে বলে দিয়েছেন—বিশেষ করে যা এই অনুচ্ছেদের হাদীসের সাথে সম্পর্কিত; কারণ এটি মুনকার (অস্বীকৃত), এর কোনো শাওয়াহিদ নেই। সাহায্যকারী একমাত্র আল্লাহ।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6652)


(مَنْ وَلِيَ مِنْ أَمْرِ الْمُسْلِمِينَ شَيْئًا، فَأَمَّرَ عَلَيْهِمْ أَحَدًا مُحَابَاةً، فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ،لَا يَقْبَلُ اللَّهُ مِنْهُ صَرْفًا وَلَا عَدْلًا حَتَّى يُدْخِلَهُ جَهَنَّمَ. وَمَنْ أَعْطَى أَحَدًا حِمَى اللَّهِ، فَقَدْ انْتَهَكَ فِي حِمَى اللَّهِ شَيْئًا بِغَيْرِ حَقِّهِ، فَعَلَيْهِ لَعْنَةُ اللَّهِ - أَوْ قَالَ: تَبَرَّأَتْ مِنْهُ ذِمَّةُ اللَّهِ عز وجل) .
ضعيف جداً.

أخرجه أحمد (1/ 6) من طريق بقية بن الوليد قال:
حدثني شيخ من قريش عن رجاء بن حيوة عن جنادة بن أبي أمية عن يزيد بن أبي سفيان قال: قال أبو بكر رضي الله عنه حين بعثني إلى الشام - :
يا يزيد! إن لك قرابة، عسيت أن تؤثرهم بالإمارة، وذلك أخوف ما أخاف عليك؛ فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد رجاله ثقات؛ غير شيخ بقية الذي لم يسم، وقد جاء مسمى من طريق موسى بن أيمن عن بكربن خنيس عن رجاء بن حيوة به؛ دون الشطر الثاني منه.

أخرجه الحاكم (4/ 93) وقال:
` صحيح الإسناد `! ورده الذهبي بقوله:
`قلت: بكر؛ قال الدارقطني: متروك `.
وقد روى من طريق آخر أشد ضعفاً عن جنادة: أخرجه أبو بكر المروزي في ` مسند أبي بكر الصديق ` (200 - 201/ 132) بسنده الصحيح عن الوليد بن
الفضل العنزي قال: حدثنا القاسم بن أبي الوليد التميمي عن عمرو بن واقد القرشي عن موسى بن يسار عن مكحول عن جنادة بن أبي أمية به. إلا أنه قال مكان جملة اللعن الأولى:
` لم يرح رائحة الجنة `.
وهذا إسناد واهٍ بمرة؛ عمرو بن واقد: متروك متهم بالكذب.
والقاسم بن أبي الوليد التميمي؛ كذا وقع فيه (أبي الوليد) ، والصواب (الوليد) بإسقاط أداة الكنية - كما في `التهذيب ` وغيره - ، وهو ثقة؛ لكن قال ابن حبان في ` الثقات ` (7/ 334) :
` يخطئ ويخالف `.
والوليد بن الفضل العنزي؛ متروك أيضاً متهم بالوضع؛ قال ابن حبان (3/ 82) :
`روى المناكير التي لا يشك من تبحّر في هذه الصناعة أنها موضوعة`. وقال
الحاكم وأبو نعيم وأبو سعيد النقاش:
`روى عن الكوفيين الموضوعات `.
(تنبيه) : أورد الشطر الأول من الحديث المنذري في ` الترغيب `! 3/ 142)
وقال:
` رواه الحاكم وقال: صحيح الإسناد. (قال الحافظ المنذري) : فيه بكر بن خنيس، يأتي الكلام عليه، ورواه أحمد باختصار، وفي إسناده رجل لم يسم `.
قلت: قوله: ` باختصار ` خطأ واضح، والصواب أن يقال: ` بزيادة`؛ لأن الشطر الثاني من الحديث ليس في رواية الحاكم، وقد غفل عن هذا الخطأ وهي العادة عند المعلقين الثلاثة على ` الترغيب ` (3/ 119) ؛ مع أنهم عزوه للمكان المشار إليه من ` المسند `!
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যে ব্যক্তি মুসলিমদের কোনো কাজের দায়িত্ব গ্রহণ করল, অতঃপর পক্ষপাতিত্ব করে তাদের উপর কাউকে শাসক নিযুক্ত করল, তার উপর আল্লাহর লা'নত (অভিসম্পাত)। আল্লাহ তার থেকে কোনো ফরয বা নফল ইবাদত কবুল করবেন না, যতক্ষণ না তাকে জাহান্নামে প্রবেশ করান। আর যে ব্যক্তি কাউকে আল্লাহর সংরক্ষিত এলাকা (হিমা) প্রদান করল, সে আল্লাহর সংরক্ষিত এলাকায় অন্যায়ভাবে কোনো কিছু লঙ্ঘন করল, তার উপর আল্লাহর লা'নত (অভিসম্পাত) – অথবা তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তার থেকে মহান আল্লাহর যিম্মাদারী (দায়িত্ব) মুক্ত হয়ে গেল।

খুবই যঈফ (দুর্বল জিদ্দান)।

এটি আহমাদ (১/৬) বাক্বিয়্যাহ ইবনুল ওয়ালীদ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাকে কুরাইশের একজন শায়খ (শিক্ষক) বর্ণনা করেছেন, তিনি রাজা ইবনু হাইওয়াহ থেকে, তিনি জুনাদাহ ইবনু আবী উমাইয়াহ থেকে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবী সুফিয়ান থেকে। ইয়াযীদ বলেন: আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন আমাকে শামের দিকে প্রেরণ করেন, তখন তিনি বললেন: হে ইয়াযীদ! তোমার আত্মীয়-স্বজন আছে। সম্ভবত তুমি তাদেরকে নেতৃত্ব দিয়ে অগ্রাধিকার দেবে। আর এটাই তোমার ব্যাপারে আমার সবচেয়ে বড় ভয়। কেননা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই ইসনাদের বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ); তবে বাক্বিয়্যাহ-এর শায়খ (শিক্ষক)-এর নাম উল্লেখ করা হয়নি। আর এটি মূসা ইবনু আইমান-এর সূত্রে বাকর ইবনু খুনাইস থেকে, তিনি রাজা ইবনু হাইওয়াহ থেকে বর্ণিত হয়েছে; তবে এর দ্বিতীয় অংশটি (শতর) তাতে নেই।

এটি আল-হাকিম (৪/৯৩) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘সহীহুল ইসনাদ’ (সহীহ সনদ)! আর ইমাম যাহাবী তার এই কথা বলে তা প্রত্যাখ্যান করেছেন: ‘আমি বলি: বাকর (ইবনু খুনাইস); দারাকুতনী বলেছেন: মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

আর এটি জুনাদাহ থেকে অন্য একটি সূত্রে বর্ণিত হয়েছে, যা আরও বেশি দুর্বল: এটি আবূ বাকর আল-মারওয়াযী তার ‘মুসনাদু আবী বাকর আস-সিদ্দীক’ (২০০-২০১/১৩২)-এ তার সহীহ সনদে আল-ওয়ালীদ ইবনুল ফাদল আল-আনযী থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন আল-কাসিম ইবনু আবী আল-ওয়ালীদ আত-তামীমী, তিনি আমর ইবনু ওয়াক্বিদ আল-কুরাশী থেকে, তিনি মূসা ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি মাকহূল থেকে, তিনি জুনাদাহ ইবনু আবী উমাইয়াহ থেকে। তবে তিনি প্রথম লা'নতের বাক্যের স্থলে বলেছেন: ‘সে জান্নাতের সুগন্ধও পাবে না।’

আর এই ইসনাদটি একেবারেই দুর্বল (ওয়াহী); আমর ইবনু ওয়াক্বিদ: মাতরূক (পরিত্যক্ত) এবং মিথ্যার অভিযোগে অভিযুক্ত।

আর আল-কাসিম ইবনু আবী আল-ওয়ালীদ আত-তামীমী; এতে (আবীল ওয়ালীদ) এভাবে এসেছে, কিন্তু সঠিক হলো (আল-ওয়ালীদ) কুনয়াহ-এর সরঞ্জাম বাদ দিয়ে – যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ ও অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে – আর তিনি নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ); কিন্তু ইবনু হিব্বান ‘আস-সিক্বাত’ (৭/৩৩৪)-এ বলেছেন: ‘তিনি ভুল করেন এবং বিরোধিতা করেন।’

আর আল-ওয়ালীদ ইবনুল ফাদল আল-আনযী; তিনিও মাতরূক (পরিত্যক্ত) এবং জাল (মাওদ্বূ) হাদীস রচনার অভিযোগে অভিযুক্ত। ইবনু হিব্বান (৩/৮২) বলেছেন: ‘তিনি এমন মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেছেন, যা এই শিল্পে (হাদীস শাস্ত্রে) অভিজ্ঞ ব্যক্তিরা নিঃসন্দেহে জাল (মাওদ্বূ) বলে মনে করেন।’ আর আল-হাকিম, আবূ নুআইম এবং আবূ সাঈদ আন-নাক্কাস বলেছেন: ‘তিনি কূফাবাসীদের থেকে জাল হাদীস বর্ণনা করেছেন।’

(সতর্কতা): আল-মুনযিরী হাদীসের প্রথম অংশটি ‘আত-তারগীব’ (৩/১৪২)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি আল-হাকিম বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: সহীহুল ইসনাদ। (আল-হাফিয আল-মুনযিরী বলেন): এতে বাকর ইবনু খুনাইস রয়েছে, তার সম্পর্কে আলোচনা আসবে। আর আহমাদ এটি সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন, এবং এর ইসনাদে একজন বর্ণনাকারীর নাম উল্লেখ করা হয়নি।’

আমি (আলবানী) বলি: তার এই কথা: ‘সংক্ষেপে’ একটি সুস্পষ্ট ভুল। সঠিক হলো বলা: ‘বাড়তি অংশসহ’; কারণ হাদীসের দ্বিতীয় অংশটি আল-হাকিমের বর্ণনায় নেই। আর এই ভুলটি সম্পর্কে তারা উদাসীন ছিলেন, যা ‘আত-তারগীব’-এর উপর মন্তব্যকারী তিনজন টীকাকার (৩/১১৯)-এর সাধারণ অভ্যাস; যদিও তারা এটিকে ‘আল-মুসনাদ’-এর উল্লেখিত স্থানের দিকে সম্পর্কিত করেছেন!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6653)


(ايّاكم والخيانة؛ فإئها بئست ِالبطانةِ، وإياكم … ) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (22/ 204/ 538) ، و `الأوسط ` (1/ 368/ 633) من طريق عبد الله بن عبد الرحمن بن مليحة عن عكرمة بن عمار عن الهرماس بن زياد قال:
رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب على ناقته، فقال: … فذكره، وتمام الحديث:
` وإياكم والظلم؛ فإنه ظلمات يوم القيامة، وإياكم والشح؛ فإنما أهلك من كان قبلكم الشح، حتى سفكوا دماءهم، وقطعوا أرحامهم`.
وقال الطبراني:
` لا يروى عن الهرماس إلا بهذا الإسناد `.
قلت: وهو ضعيف؛ عبد الله بن عبد الرحمن بن مليحة؛ قال الحاكم:
`الغالب على رواياته المناكير `.
وخطأه عبد الرحمن بن مهدي في حديثين - كما ذكر الحافظ في ` اللسان ` - .
قلت: ولعل أحدهما هذا الحديث؛ فقد خالفه أبو الوليد الطيالسي فقال:
أخبرنا عكرمة بن عمار: أخبرنا الهرماس بن زياد قال:
انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبي مردفي وراءه على جمل له، وأنا صبي صغير، فرأيت النبي صلى الله عليه وسلم يخطب الناس على ناقته العضباء يوم الأضحى بمنى.

أخرجه ابن سعد في ` الطبقات` (2/ 185 - 186) : أخبرنا هشام أبو الوليد الطيالسي به.
قلت: وهذا إسناد جيد على شرط مسلم، وصححه الحافظ في ترجمة (الهرماس) هذا من `الإصابة`، ورواه أبو داود وابن حبان وغيرهما وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (1707) من طرق أخرى عن عكرمة بن عمار به.
قلت: فمخالفة ابن مليحة لهؤلاء في زيادته عليهم هذه الخطبة تدل على نكارتها.
وأيضاً، فقد جاءت هذه الخطبة عن جمع من الصحابة منهم: جابر، وأبو هريرة، وابن عمرو، وليس فيها حديث الترجمة، ولذلك خرجته هنا دون سائره، وهو مخرج عن المذكورين في `الصحيحة ` (858) .
وإذا عرفت هذا، فالعجب من الحافظ المنذري، فإنه مع تصديره الحديث بقوله: ` وروي … ` مشيراً إلى تضعيفه قال في تخريجه (3/ 144) :
` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، وله شواهد كثيرة!!
فإن الشواهد التي أشار إليها تنافي أولاً: تصديره المذكور، وهي ثانياً: ليس فيها جملة الخيانة، فشهادتها قاصرة، فكان عليه البيان، لكي لا يغتر به من لا علم عنده، كما فعل المعلقون الثلاثة عليه؛ فإنهم قالوا - أيضاً تقليداً كعادتهم - :
`ولمتنه شواهد `!
بل إنهم أوهموا أنه من قول الهيثمي، وكذبوا!
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(তোমরা খেয়ানত থেকে বেঁচে থাকো; কারণ তা নিকৃষ্ট সঙ্গী, আর তোমরা বেঁচে থাকো...)।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (২২/২০৪/৫৩৮) এবং ‘আল-আওসাত’ (১/৩৬৮/৬৩৩)-এ আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু মালীহা সূত্রে ইকরিমা ইবনু আম্মার হতে, তিনি আল-হিরমাস ইবনু যিয়াদ হতে বর্ণনা করেছেন। তিনি (হিরমাস) বলেন:
আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তাঁর উটনীর উপর খুতবা দিতে দেখেছি। অতঃপর তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। হাদীসটির পূর্ণাঙ্গ পাঠ হলো:
‘আর তোমরা যুলুম থেকে বেঁচে থাকো; কারণ তা কিয়ামতের দিন ঘোর অন্ধকার হবে। আর তোমরা কৃপণতা (শূহ্) থেকে বেঁচে থাকো; কারণ তোমাদের পূর্ববর্তীদেরকে এই কৃপণতাই ধ্বংস করেছে, এমনকি তারা তাদের রক্তপাত ঘটিয়েছে এবং তাদের আত্মীয়তার বন্ধন ছিন্ন করেছে।’
আর ত্ববারানী বলেছেন:
‘আল-হিরমাস হতে এই ইসনাদ (সূত্র) ছাড়া অন্য কোনো সূত্রে এটি বর্ণিত হয়নি।’
আমি (আলবানী) বলি: আর এটি যঈফ (দুর্বল)। (কারণ) আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু মালীহা সম্পর্কে হাকিম বলেছেন:
‘তার বর্ণনাসমূহের উপর মুনকার (অস্বীকৃত) হওয়ার প্রভাব বেশি।’
আর আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী তাকে দুটি হাদীসের ক্ষেত্রে ভুল আখ্যা দিয়েছেন—যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন।
আমি বলি: সম্ভবত এই হাদীসটি তাদের মধ্যে একটি। কারণ আবূল ওয়ালীদ আত-ত্বায়ালিসী তার (ইবনু মালীহার) বিরোধিতা করেছেন। তিনি বলেছেন:
আমাদেরকে ইকরিমা ইবনু আম্মার সংবাদ দিয়েছেন: আমাদেরকে আল-হিরমাস ইবনু যিয়াদ সংবাদ দিয়েছেন। তিনি বলেন:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফিরে যাচ্ছিলেন, আর আমার পিতা তাঁর উটের উপর আমার পিছনে আরোহণ করেছিলেন, আর আমি ছিলাম ছোট শিশু। অতঃপর আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে ঈদুল আযহার দিন মিনায় তাঁর ‘আল-আদ্ববা’ নামক উটনীর উপর লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিতে দেখেছি।

এটি ইবনু সা’দ ‘আত-ত্বাবাকাত’ (২/১৮৫-১৮৬)-এ হিশাম আবূল ওয়ালীদ আত-ত্বায়ালিসী হতে এই সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: আর এই ইসনাদটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী ‘জাইয়িদ’ (উত্তম)। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে এই (আল-হিরমাস)-এর জীবনীতে এটিকে সহীহ বলেছেন। আর এটি আবূ দাঊদ, ইবনু হিব্বান এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। আর এটি ‘সহীহ আবী দাঊদ’ (১৭০৭)-এ ইকরিমা ইবনু আম্মার হতে অন্য সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে।
আমি বলি: সুতরাং ইবনু মালীহা কর্তৃক তাদের (অন্যান্য বর্ণনাকারীদের) বিপরীতে এই খুতবাটি অতিরিক্ত বর্ণনা করা এর মুনকার (অস্বীকৃত) হওয়ার প্রমাণ বহন করে।
এছাড়াও, এই খুতবাটি সাহাবীগণের একটি দল হতে বর্ণিত হয়েছে, তাদের মধ্যে রয়েছেন: জাবির, আবূ হুরাইরাহ এবং ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। কিন্তু তাতে আলোচ্য হাদীসের অংশটি নেই। এই কারণে আমি এর বাকি অংশ বাদ দিয়ে শুধু এই অংশটি এখানে উল্লেখ করেছি। আর উল্লিখিত সাহাবীগণ হতে এটি ‘আস-সহীহাহ’ (৮৫৮)-তে সংকলিত হয়েছে।
আর যখন আপনি এটি জানতে পারলেন, তখন হাফিয মুনযিরীর ব্যাপারে আশ্চর্য হতে হয়। কারণ তিনি হাদীসটির শুরুতে ‘আর বর্ণিত হয়েছে...’ বলে এটিকে দুর্বল হওয়ার ইঙ্গিত দেওয়া সত্ত্বেও, তিনি তার তাখরীজে (৩/১৪৪) বলেছেন:
‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’ ও ‘আল-আওসাত’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এর বহু শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে!!’
কারণ তিনি যে শাহেদগুলোর দিকে ইঙ্গিত করেছেন, তা প্রথমত: তার উল্লিখিত শুরুর বক্তব্যের বিরোধী। আর দ্বিতীয়ত: সেগুলোতে খেয়ানতের বাক্যটি নেই। সুতরাং তার শাহেদ (সমর্থন) অসম্পূর্ণ। তাই তার উচিত ছিল বিষয়টি স্পষ্ট করে দেওয়া, যাতে জ্ঞানহীন ব্যক্তিরা এর দ্বারা প্রতারিত না হয়, যেমনটি এর উপর মন্তব্যকারী তিনজন করেছেন। কারণ তারা—তাদের অভ্যাস অনুযায়ী অন্ধ অনুকরণ করে—বলেছেন:
‘আর এর মতন (মূল পাঠ)-এর শাহেদ রয়েছে!’
বরং তারা এই ধারণা দিয়েছে যে, এটি হাইসামীর বক্তব্য, আর তারা মিথ্যা বলেছে!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6654)


(من تحبّبَ إلى الناس بما يحبّونه، وبارزَ الله [بما يكرة] ؛ لقيَ الله تعالى وهو عليه غضبان) () .
موضوع.
روي من حديث عصمة بن مالك الخطمي، وأبي هريرة السدوسي.
1 - أما حديث عصمة؛ فقال الطبراني في ` المعجم الكبير ` (17/ 186/499) : حدثنا أحمد بن رشدين: ثنا إبراهيم بن منقذ: ثنا إدريس بن يحيى: ثنا الفضل بن المختار عن عبيد الله بن موهب عنه مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف بمرة، مسلسل بالعلل، بعضها أوهى من بعض:
الأولى: عبيد الله بن موهب، نسب لجده، وهو (عبيد الله بن عبد الله بن موهب أبو يحيى التيمي) ، قال أحمد:
` لا يعرف،. ولم يوثقه غير ابن حبان (5/ 72) .
الثانية: الفضل بن المختار. قال أبو حاتم:
` أحاديثه منكرة، يحدث بالأباطيل،. وقال ابن عدي:
` أحاديثه منكرة، عامتها لا يتابع عليها `.
قلت: ولذلك قال الحافظ في ترجمة (عصمة) من `الإصابة `:
` ضعيف جداً `. فهو الآفة.
() كتب الشيخ رحمه الله بخطه فوق هذا المتن: ` تقدم برقم (22645، 3987) ،. (الناشر) .
الثالثة: إبراهيم بن منقذ، لم أجد له ترجمة.
الرابعة: أحمد بن رِشدين، قال ابن عدي:
`كذبوه، وأنكرت عليه أشياءه؛ كما في `الميزان `، وساق له حديثاً من أباطيله.
والحديث أعله الهيثمي (15/ 224) بالعلة الثانية فقط! فقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` وفيه الفضل بن المختار، وهو ضعيف`!
كذا قال! وهو تقصير آخر، فحاله أسوأ مما ذكرت - كما عرفت - .
وقوله: ` الأوسط ` سبق قلم أو خطأ مطبعي؛ فإنه ليس في ` الأوسط ` من حديث (عصمة) ، وإنما من حديث أبي هريرة - كما يأتي - .
وعصمة نفسه غير معروف بالرواية عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولذلك قال الحافظ في ` الإصابة `:
` له أحاديث أخرجها الدارقطني والطبراني وغيرهما، مدارها على (الفضل ابن مختار) ، وهو ضعيف جداً `.
قلت: وعددها في ` المعجم الكبير ` (7 1/ 78 1 - 86 1) اثنان وثلاثون حديثاً، هذا أحدها، وأغلبها مناكير، وقد خرجت بعضها فيما تقدم (2366 و 3883 و 3985) ، وأخرج واحداً منها ابن الجوزي في `العلل المتناهية` (2/157 - 158) ، وأعله بما تقدم من كلام أبي حاتم وابن عدي.
2 - وأما حديث أبي هريرة؛ فيرويه سليمان بن داود الشاذكوني قال: حدثنا
محمد بن سليمان بن مَسمُول المخزومي قال: حدثنا مطيع بن عبد الرحمن عن أبيه عنه به. والزيادة منه، ووقع فيه `بما يكرهون`!

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (3/ 0 39/ 2838) وقال:
` لا يروى إلا بهذا الإسناد، تفرد به محمد بن سليمان `.
قلت: قال ابن عدي:
`عامة ما يرويه لا يتابع عليه متناً وإسناداً `.
ثم ساق له حديثين منكرين سبق تخريج أحدهما برقم (2047) ، والآخر مخرج في `الإرواء` (8/ 282/ 2667) .
لكن الشاذكوني أسوأ منه؛ قال الذهبي في `المغني `:
`رماه ابن معين بالكذب. وقال البخاري: فيه نظر`.
وبه أعله الهيثمي؛ فقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه سليمان بن داود الشاذكوني، وهو متروك `.
(تنبيه) : الحديث الأول عن (عصمة) وقع في ` المجمع `: (عبد الله بن عصمة بن فاتك) ، وهو خطأ، وليس خطأ مطبعياً - إلا قوله: (فاتك) - فإنه قلد في ذلك المنذري، فإنه كذلك ذكره في ` الترغيب ` (3/ 154) ، وهو من أوهامه الكثيرة التي فاتت الحافظ الناجي أن ينبه عليها؛ فإن (عبد الله) لا ذكرله في السند.
وأما (فاتك) فأظنه خطأ مطبعياً، وقد اغتر به المعلقون الثلاثة على ` الترغيب ` فاعتمدوه! وذكروا في التعليق أن في نسخة: (مالك) ! ذلك مبلغهم من العلم.
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(যে ব্যক্তি মানুষের কাছে তাদের পছন্দনীয় কাজের মাধ্যমে প্রিয় হয়, আর আল্লাহকে [যা তিনি অপছন্দ করেন] তা নিয়ে প্রকাশ্যভাবে চ্যালেঞ্জ করে; সে আল্লাহর সাথে এমন অবস্থায় সাক্ষাৎ করবে যে তিনি তার উপর ক্রুদ্ধ।) ()।
মাওদ্বূ (জাল)।
এটি ইসমা ইবনে মালিক আল-খাতামী এবং আবূ হুরায়রা আস-সাদূসীর সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।

১ - ইসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস প্রসঙ্গে: ইমাম ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১৭/১৮৬/৪৯৯)-এ বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনে রুশদাইন: তিনি বলেছেন ইবরাহীম ইবনে মুনকিয: তিনি বলেছেন ইদরীস ইবনে ইয়াহইয়া: তিনি বলেছেন আল-ফাদল ইবনুল মুখতার, উবাইদুল্লাহ ইবনে মাওহাবের সূত্রে, তাঁর (ইসমা)-এর থেকে মারফূ' হিসেবে।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি একেবারেই যঈফ (দুর্বল), যা ত্রুটিসমূহের (ইল্লত) একটি ধারাবাহিকতা, যার কিছু কিছু অন্যগুলোর চেয়েও বেশি দুর্বল:

প্রথমটি: উবাইদুল্লাহ ইবনে মাওহাব, যিনি তাঁর দাদার দিকে সম্পর্কিত। তিনি হলেন (উবাইদুল্লাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে মাওহাব আবূ ইয়াহইয়া আত-তাইমী)। আহমাদ (ইবনে হাম্বল) বলেছেন: ‘তিনি পরিচিত নন।’ ইবনে হিব্বান (৫/৭২) ছাড়া আর কেউ তাঁকে বিশ্বস্ত বলেননি।

দ্বিতীয়টি: আল-ফাদল ইবনুল মুখতার। আবূ হাতিম বলেছেন: ‘তাঁর হাদীসগুলো মুনকার (অস্বীকৃত), তিনি বাতিল (মিথ্যা) বিষয় বর্ণনা করেন।’ আর ইবনে আদী বলেছেন: ‘তাঁর হাদীসগুলো মুনকার, সেগুলোর অধিকাংশের ক্ষেত্রে তিনি অনুসরণীয় নন।’

আমি বলি: এই কারণেই হাফিয (ইবনে হাজার) ‘আল-ইসাবাহ’ গ্রন্থে (ইসমা)-এর জীবনীতে বলেছেন: ‘খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।’ সুতরাং তিনিই (আল-ফাদল) ত্রুটির মূল।

() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনটির উপরে নিজ হাতে লিখেছেন: ‘এটি পূর্বে (২২৬৪৫, ৩৯৮৭) নম্বরে উল্লেখ করা হয়েছে।’ (প্রকাশক)।

তৃতীয়টি: ইবরাহীম ইবনে মুনকিয, আমি তাঁর জীবনী খুঁজে পাইনি।

চতুর্থটি: আহমাদ ইবনে রুশদাইন। ইবনে আদী বলেছেন: ‘তারা তাঁকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করেছেন, এবং তাঁর কিছু বিষয়কে অস্বীকার করা হয়েছে; যেমনটি ‘আল-মীযান’-এ রয়েছে।’ এবং তিনি (ইবনে আদী) তাঁর বাতিল হাদীসগুলোর মধ্যে থেকে একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন।

আর এই হাদীসটিকে হাইসামী (১৫/২২৪) শুধুমাত্র দ্বিতীয় ত্রুটিটির কারণে দুর্বল বলেছেন! তিনি বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন এবং এতে আল-ফাদল ইবনুল মুখতার রয়েছেন, আর তিনি যঈফ!’ তিনি এমনটিই বলেছেন! এটি আরেকটি ত্রুটি, কারণ তার অবস্থা - যেমনটি আপনি জেনেছেন - যা তিনি উল্লেখ করেছেন তার চেয়েও খারাপ।

আর তাঁর ‘আল-আওসাত্ব’ উক্তিটি হয় কলমের ভুল অথবা মুদ্রণ ত্রুটি; কারণ (ইসমা)-এর সূত্রে এটি ‘আল-আওসাত্ব’-এ নেই, বরং এটি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে রয়েছে - যেমনটি পরে আসছে।

আর ইসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজেও নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে হাদীস বর্ণনার জন্য পরিচিত নন। এই কারণেই হাফিয (ইবনে হাজার) ‘আল-ইসাবাহ’-এ বলেছেন: ‘তাঁর কিছু হাদীস রয়েছে যা দারাকুতনী, ত্বাবারানী এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন, সেগুলোর কেন্দ্রবিন্দু হলো (আল-ফাদল ইবনে মুখতার), আর তিনি খুবই দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।’

আমি বলি: ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১৭/১৭৮-১৮৬)-এ সেগুলোর সংখ্যা বত্রিশটি হাদীস, এটি সেগুলোর মধ্যে একটি। আর সেগুলোর অধিকাংশই মুনকার। আমি পূর্বে সেগুলোর কিছু কিছু তাখরীজ করেছি (২৩৬৬, ৩৮৮৩ এবং ৩৯৮৫)। আর ইবনুল জাওযী সেগুলোর মধ্যে একটি ‘আল-ইলাল আল-মুতানাহিয়াহ’ (২/১৫৭-১৫৮)-এ তাখরীজ করেছেন, এবং তিনি আবূ হাতিম ও ইবনে আদীর পূর্বোক্ত বক্তব্যের মাধ্যমে সেটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্লাল) বলেছেন।

২ - আর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস প্রসঙ্গে: এটি বর্ণনা করেছেন সুলাইমান ইবনে দাউদ আশ-শাযাকূনী, তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান ইবনে মাসমুল আল-মাখযূমী, তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুতী' ইবনে আব্দুর রহমান, তাঁর পিতার সূত্রে, তাঁর (আবূ হুরায়রা)-এর থেকে। আর অতিরিক্ত অংশটি তাঁর (মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান)-এর থেকে এসেছে, এবং এতে ‘যা তারা অপছন্দ করে’ (بما يكرهون) কথাটি এসেছে!

এটি ত্বাবারানী ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ (৩/৩৯০/২৮৩৮)-এ তাখরীজ করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি শুধুমাত্র এই সনদেই বর্ণিত হয়েছে, মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান এতে একক (তাফাররুদ)।’

আমি বলি: ইবনে আদী বলেছেন: ‘তিনি যা বর্ণনা করেন তার অধিকাংশের ক্ষেত্রে মাতন (মূলপাঠ) এবং সনদ উভয় দিক থেকেই তিনি অনুসরণীয় নন।’ এরপর তিনি তাঁর জন্য দুটি মুনকার হাদীস উল্লেখ করেছেন, যার একটির তাখরীজ পূর্বে (২০৪৭) নম্বরে করা হয়েছে, এবং অন্যটি ‘আল-ইরওয়া’ (৮/২৮২/২৬৬৭)-তে তাখরীজ করা হয়েছে।

কিন্তু আশ-শাযাকূনী তাঁর (মুহাম্মাদ ইবনে সুলাইমান) চেয়েও খারাপ; যাহাবী ‘আল-মুগনী’-তে বলেছেন: ‘ইবনে মাঈন তাঁকে মিথ্যা বলার অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন। আর বুখারী বলেছেন: তাঁর ব্যাপারে বিবেচনা (নযর) রয়েছে।’

আর এই কারণেই হাইসামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন; তিনি বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, এবং এতে সুলাইমান ইবনে দাউদ আশ-শাযাকূনী রয়েছেন, আর তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

(সতর্কীকরণ): (ইসমা)-এর সূত্রে বর্ণিত প্রথম হাদীসটি ‘আল-মাজমা’-এ (আব্দুল্লাহ ইবনে ইসমা ইবনে ফাতিক) হিসেবে এসেছে, যা ভুল। আর এটি মুদ্রণ ত্রুটি নয় - তবে তাঁর (ফাতিক) উক্তিটি ছাড়া - কারণ তিনি এই ক্ষেত্রে মুনযিরীকে অনুসরণ করেছেন। মুনযিরীও ‘আত-তারগীব’ (৩/১৫৪)-এ একইভাবে উল্লেখ করেছেন। এটি তাঁর (মুনযিরীর) বহু ভুলের মধ্যে একটি, যা হাফিয আন-নাজী উল্লেখ করতে ভুলে গেছেন; কারণ সনদে (আব্দুল্লাহ)-এর কোনো উল্লেখ নেই।

আর (ফাতিক) প্রসঙ্গে, আমি মনে করি এটি মুদ্রণ ত্রুটি। ‘আত-তারগীব’-এর তিনজন টীকাকার এতে বিভ্রান্ত হয়েছেন এবং এটিকে গ্রহণ করেছেন! আর টীকায় উল্লেখ করেছেন যে, একটি নুসখায় (মালিক) রয়েছে! এটাই তাদের জ্ঞানের পরিধি।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6655)


(من شَهِدَ على مسلم شهادةً ليس لها بأهلٍ؛ فليتبوأ مقعدَه من النّار) .
ضعيف.

أخرجه أحمد (2/ 509) من طريق جهير بن يزيد العبدي عن خداش بن عياش قال:
كنت في حلقة بالكوفة، فإذا رجل يحدث قال: كنا جلوساً مع أبي هريرة، فقال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: … فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه ابن أبي الدنيا في ` الصمت ` (143/ 258) ، و` الغيبة والنميمة ` (111/ 123) ، والخطيب في ` التاريخ ` (5/ 69) .
وأعله المنذري في ` الترغيب ` (3/ 166) بتابعيه الذي لم يسم. وتبعه العراقي في `تخريج الإحياء ` (3/ 155) ، والهيثمي في `المجمع ` (4/ 200) ،
وقد سقط من إسناد ابن أبي الدنيا؛ كما نبه عليه. العراقي.
وخداش بن عياش: ليس بالمشهور، ولم يوثقه غير ابن حبان (6/ 276) ،
وقال الترمذي في حديث له (2767) :
`لا نعرفه `.
واعتمده الذهبي في ` المغني `، وأشار إلى تليين توثيقه في ` المغني `. ونحوه قول الحافظ في ` التقريب `:
` ليّن الحديث `.
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(যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের বিরুদ্ধে এমন সাক্ষ্য দেয়, যার সে যোগ্য নয়; সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়।)

যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (২/৫০৯) জুহাইর ইবনু ইয়াযীদ আল-আবদী-এর সূত্রে, তিনি খাদাশ ইবনু আইয়াশ থেকে, তিনি বলেন:
আমি কূফায় একটি মজলিসে ছিলাম। হঠাৎ এক ব্যক্তি হাদীস বর্ণনা করতে শুরু করল, সে বলল: আমরা আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসেছিলাম। তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: ... অতঃপর তিনি তা (হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

এই সূত্রেই এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু আবীদ্ দুন্ইয়া তাঁর ‘আস-সামত’ গ্রন্থে (১৪৩/২৫৮), এবং ‘আল-গীবাহ ওয়ান-নামীমাহ’ গ্রন্থে (১১১/১২৩), এবং খতীব তাঁর ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (৫/৬৯)।

আর মুনযিরী তাঁর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (৩/১৬৬) এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্ল) বলেছেন, এর তাবেয়ী (বর্ণনাকারী) অজ্ঞাত থাকার কারণে, যার নাম উল্লেখ করা হয়নি। আর তাঁর অনুসরণ করেছেন ইরাকী তাঁর ‘তাখরীজুল ইহয়া’ গ্রন্থে (৩/১৫৫), এবং হাইসামী তাঁর ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (৪/২০০)।

আর ইবনু আবীদ্ দুন্ইয়া-এর ইসনাদ (সনদ) থেকে একজন বর্ণনাকারী বাদ পড়েছেন; যেমনটি ইরাকী (রাহিমাহুল্লাহ) সতর্ক করেছেন।

আর খাদাশ ইবনু আইয়াশ: তিনি প্রসিদ্ধ নন, আর ইবনু হিব্বান (৬/২৭৬) ছাড়া অন্য কেউ তাঁকে নির্ভরযোগ্য (তাওসীক) বলেননি।

আর তিরমিযী তাঁর একটি হাদীস (২৭৬৭) সম্পর্কে বলেছেন: ‘আমরা তাঁকে চিনি না।’

আর যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে এর উপর নির্ভর করেছেন, এবং ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে তাঁর নির্ভরযোগ্যতাকে দুর্বল করার দিকে ইঙ্গিত করেছেন। আর এর কাছাকাছি হলো হাফিয (ইবনু হাজার আসকালানী)-এর উক্তি ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে: ‘তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল (লাইয়্যিনুল হাদীস)।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6656)


(أشرفت الملائكة على الدنيا، فرأت بني آدم يعصون، فقالوا: يا رب! ما أجهل هؤلاء! ما أقل معرفة هؤلاء بعظمتك! فقال الله تعالى: لو كنتم في مِسلاخِهم لعصيتُموني. قالوا: كيف يكون هذا ونحن نسبح بحمدك، ونقدس لك؟! قال: فاختاروا منكم ملكين، قال: فاختاروا هاروت، وماروت، ثم أهبطا إلى الدنيا، وركبت فيهما شهوات بني آدم، ومثلت لهما امرأة فما عصما حتى واقعا المعصية، فقال الله عز وجل لهما: فاختارا عذاب الدنيا، أو عذاب الآخرة؟ فنظر أحدهما إلى صاحبه، فقال: ما تقول؟ قال: أقول إن عذاب الدنيا ينقطع، وإن عذاب الآخرة لا ينقطع، فاختارا عذاب الدنيا فهما اللذان ذكرهما الله عز وجل في كتابه: {وما أنزل على الملكين ببابل هاروت وماروت} ) .
منكر.

أخرجه البيهقي في ` شعب الإيمان ` (1/ 180 - 181) من طريق محمد بن يونس بن موسى: ثنا عبد الله بن رجاء: ثنا سعيد بن سلمة عن موسى بن جبير عن موسى بن عقبة عن سالم عن ابن عمر مرفوعاً. وقال:
` ورويناه من وجه آخر عن مجاهد عن ابن عمر موقوفاً عليه، وهو أصح، فإن ابن عمر أخذه عن كعب `.
ثم ساقه بإسناده الصحيح عن سفيان عن موسى بن عقبة عن سالم بن عبد الله عن ابن عمر عن كعب قال: … فذكر نحوه، وقال:
` وهذا أشبه أن يكون محفوظاً`.
قلت: وهو في ` تفسير عبد الرزاق ` (1/ 53 - 54) : نا الثوري عن موسى ابن عقبة به.
وهذا إسناد صحيح عن كعب، فهو يجعل رواية موسى بن جبير عن موسى ابن عقبة.. عن ابن عمر مرفوعاً؛ منكراً، وقد كنا قدمنا تحقيق ذلك في المجلد الأول برقم (170) ، وإنما أعدت تخريجه هنا من طريق سعيد بن سلمة - وهو: أبو عمرو السدوسي - لأتني كنت نقلته هناك عن ابن كثير من تخريج ابن منده، وقلت ثمة:
` سكت عن علته ابن كثير، ولكنه قال: غريب. أي: ضعيف. وفي ` التقريب `: موسى بن سرجس مستور. قلت: ولا يبعد أنه هو الأول، اختلف الرواة في اسم أبيه، فسماه بعضهم: (جبيراً) ، وبعضهم (سرجساً) ، وكلاهما
حجازي. والله أعلم `.
هذا ما كنت قلته هناك، مخرجاً إياه من طريق زهير بن محمد عن موسى بن جبيرعن نافع عن ابن عمر. ثم من طريق سعيد بن سلمة عن موسى بن سرجس، وقلت عقبه ما ذكرته آنفاً من سكوت ابن كثير عنه. والآن؛ وقد وقفت
على رواية البيهقي هذه من الطريق المذكور عن سعيد بن سلمة عن موسى بن جبير، بادرت إلى تخريجها؛ لأنها تؤيد ما كنت استقربته هناك أن موسى بن سرجس هو موسى بن جبير، وأن هذا الاختلاف في اسم أبيه إنما هو من بعض
الرواة.
على أن في هذه الطريق من لا ينبغي السكوت عنه، وهو (محمد بن يونس ابن موسى) - وهو: الكديمي - ، قال الذهبي في ` المغني `:
`هالك، قال ابن حبان وغيره: كان يضع الحديث على الثقات `.
فالعجب من البيهقي كيف سكت عنه؟! بل وأوهم القراء صحته، بقوله في الوجه الآخر الذي ذكره عن مجاهد عن ابن عمر موقوفاً:
`وهو أصح `.
فكان الصواب أن يقول: ` وهو الصحيح `؛ لأن مقابله ضعيف غير صحيح - كما هو ظاهر - ، كما كان عليه أن يبين علة هذا الضعيف المرفوع من جهة إسناده، وليس من جهة معارضته للوجه الأخرعن ابن عمر.
هذا ما دعاني إلى إعادة تخريجي مرة أخرى، وفي ذلك فائدة تذكر إن شاء الله تعالى.
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(ফেরেশতাগণ দুনিয়ার উপর দৃষ্টিপাত করলেন, অতঃপর দেখলেন যে আদম সন্তানরা পাপ করছে। তখন তারা বললেন: হে আমাদের রব! এরা কতই না অজ্ঞ! আপনার মহত্ত্ব সম্পর্কে এদের জ্ঞান কতই না কম! তখন আল্লাহ তাআলা বললেন: যদি তোমরা তাদের চামড়ার আবরণে থাকতে, তবে তোমরাও আমার অবাধ্য হতে। তারা বললেন: এটা কীভাবে হতে পারে, অথচ আমরা আপনার প্রশংসার সাথে তাসবীহ পাঠ করি এবং আপনার পবিত্রতা ঘোষণা করি?! তিনি বললেন: তাহলে তোমাদের মধ্য থেকে দু’জন ফেরেশতা নির্বাচন করো। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তারা হারূত ও মারূতকে নির্বাচন করলেন। অতঃপর তাদের দু’জনকে দুনিয়াতে নামিয়ে দেওয়া হলো এবং তাদের মধ্যে আদম সন্তানের কামনা-বাসনা স্থাপন করা হলো। আর তাদের সামনে একজন নারীর রূপ দেওয়া হলো। তারা দু’জন পাপ থেকে বাঁচতে পারলেন না, অবশেষে তারা পাপে লিপ্ত হলেন। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল তাদের দু’জনকে বললেন: তোমরা দুনিয়ার আযাব অথবা আখিরাতের আযাব—এর মধ্য থেকে একটি বেছে নাও। তখন তাদের একজন তার সঙ্গীর দিকে তাকালেন এবং বললেন: তুমি কী বলো? তিনি বললেন: আমি বলি যে, দুনিয়ার আযাব বিচ্ছিন্ন হয়ে যাবে (শেষ হয়ে যাবে), আর আখিরাতের আযাব বিচ্ছিন্ন হবে না (শেষ হবে না)। অতঃপর তারা দুনিয়ার আযাব বেছে নিলেন। আর এরাই হলো সেই দু’জন, যাদের কথা আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল তাঁর কিতাবে উল্লেখ করেছেন: {এবং যা বাবেলের দুই ফেরেশতা হারূত ও মারূতের উপর নাযিল করা হয়েছিল}।)

মুনকার (অস্বীকৃত/প্রত্যাখ্যাত)।

বাইহাকী এটি তাঁর ‘শুআবুল ঈমান’ গ্রন্থে (১/১৮০-১৮১) মুহাম্মাদ ইবনু ইউনুস ইবনু মূসা সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু রাজা: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সাঈদ ইবনু সালামাহ, তিনি মূসা ইবনু জুবাইর থেকে, তিনি মূসা ইবনু উকবাহ থেকে, তিনি সালিম থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে।

তিনি (বাইহাকী) বলেছেন:
‘আমরা এটি অন্য সূত্রে মুজাহিদ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ (সাহাবী পর্যন্ত সীমাবদ্ধ) হিসেবে বর্ণনা করেছি, আর এটিই অধিক সহীহ (বিশুদ্ধ)। কেননা ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি কা’ব (আহবার) থেকে গ্রহণ করেছেন।’

অতঃপর তিনি তাঁর সহীহ (বিশুদ্ধ) ইসনাদ (সনদ) সহকারে সুফিয়ান থেকে, তিনি মূসা ইবনু উকবাহ থেকে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি কা’ব (আহবার) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: ... অতঃপর অনুরূপ বর্ণনা উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘এটিই মাহফূয (সংরক্ষিত) হওয়ার অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: এটি ‘তাফসীর আব্দুল রাযযাক’ গ্রন্থেও (১/৫৩-৫৪) রয়েছে: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আস-সাওরী, তিনি মূসা ইবনু উকবাহ থেকে এই সূত্রে।

আর এটি কা’ব (আহবার) থেকে বর্ণিত সহীহ (বিশুদ্ধ) ইসনাদ। সুতরাং এটি মূসা ইবনু জুবাইর-এর বর্ণনাকে—যা মূসা ইবনু উকবাহ... ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণিত—মুনকার (প্রত্যাখ্যাত) সাব্যস্ত করে। আমরা প্রথম খণ্ডে (হাদীস নং ১৭০)-এ এর তাহকীক (বিশ্লেষণ) পূর্বে পেশ করেছি। আমি এখানে সাঈদ ইবনু সালামাহ—যিনি আবূ আমর আস-সাদূসী—এর সূত্রে এর তাখরীজ (সূত্র উল্লেখ) পুনরায় করেছি, কারণ আমি সেখানে ইবনু মানদাহ-এর তাখরীজ থেকে ইবনু কাসীর-এর সূত্রে এটি উদ্ধৃত করেছিলাম এবং সেখানে বলেছিলাম:
‘ইবনু কাসীর এর ত্রুটি (ইল্লাত) সম্পর্কে নীরব ছিলেন, তবে তিনি এটিকে ‘গারীব’ (অপরিচিত) বলেছেন। অর্থাৎ: যঈফ (দুর্বল)। আর ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে রয়েছে: মূসা ইবনু সারজিস ‘মাস্তূর’ (অজ্ঞাত)। আমি (আল-আলবানী) বলছি: সে যে প্রথম ব্যক্তি (মূসা ইবনু জুবাইর) নয়, এমনটা অসম্ভব নয়। বর্ণনাকারীরা তার পিতার নাম নিয়ে মতভেদ করেছেন। কেউ কেউ তার নাম দিয়েছেন: (জুবাইর), আর কেউ কেউ (সারজিস)। আর উভয়েই হিজাযী। আল্লাহই ভালো জানেন।’

এটিই আমি সেখানে বলেছিলাম, যখন আমি এটি যুহাইর ইবনু মুহাম্মাদ সূত্রে, তিনি মূসা ইবনু জুবাইর থেকে, তিনি নাফি’ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাখরীজ করেছিলাম। অতঃপর সাঈদ ইবনু সালামাহ সূত্রে, তিনি মূসা ইবনু সারজিস থেকে (তাখরীজ করেছিলাম), এবং এর পরপরই আমি ইবনু কাসীর-এর নীরবতা সম্পর্কে যা উল্লেখ করেছি, তা বলেছিলাম। আর এখন; আমি যখন বাইহাকী-এর এই বর্ণনাটি সাঈদ ইবনু সালামাহ থেকে, তিনি মূসা ইবনু জুবাইর থেকে বর্ণিত উল্লিখিত সূত্রে পেলাম, তখন আমি দ্রুত এর তাখরীজ করলাম; কারণ এটি আমার পূর্বের ধারণাকে সমর্থন করে যে, মূসা ইবনু সারজিসই হলেন মূসা ইবনু জুবাইর, এবং তার পিতার নামের এই ভিন্নতা কেবল কিছু বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকে হয়েছে।

তবে এই সূত্রে এমন একজন বর্ণনাকারী আছেন, যার ব্যাপারে নীরব থাকা উচিত নয়। তিনি হলেন (মুহাম্মাদ ইবনু ইউনুস ইবনু মূসা)—যিনি আল-কুদাইমী নামে পরিচিত। যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘সে ধ্বংসপ্রাপ্ত (হালিক)। ইবনু হিব্বান ও অন্যান্যরা বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের নামে হাদীস জাল করত।’

সুতরাং বাইহাকী কীভাবে তার ব্যাপারে নীরব থাকলেন, তা আশ্চর্যের বিষয়?! বরং তিনি মুজাহিদ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ হিসেবে বর্ণিত অন্য সূত্রটি সম্পর্কে তাঁর এই উক্তি দ্বারা পাঠকদেরকে এর বিশুদ্ধতা সম্পর্কে ভুল ধারণা দিয়েছেন:
‘আর এটিই অধিক সহীহ (বিশুদ্ধ)।’

সঠিক ছিল যে, তিনি বলতেন: ‘আর এটিই সহীহ (বিশুদ্ধ)।’ কারণ এর বিপরীতটি যঈফ (দুর্বল) ও সহীহ নয়—যেমনটা স্পষ্ট—। যেমনভাবে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত অন্য সূত্রের সাথে এর বিরোধিতার দিক থেকে নয়, বরং এর ইসনাদের দিক থেকে এই যঈফ মারফূ’ হাদীসটির ত্রুটি (ইল্লাত) তার (বাইহাকীর) স্পষ্ট করে দেওয়া উচিত ছিল।

এটাই আমাকে আমার তাখরীজ পুনরায় করার জন্য উৎসাহিত করেছে, আর এতে ইনশাআল্লাহ স্মরণ রাখার মতো একটি ফায়দা (উপকারিতা) রয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6657)


(من شرب خمراً؛ أخرجَ الله نورَ الإيمانِ من جوفه) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (1/ 227/ 343) : حدثنا أحمد بن رشدين قال: حدثني أبي عن أبيه عن جده رشدين قال: حدثني أبو عيسى المؤذن محمد بن عبد الرحمن عن أبي مرزوق التجيبي عن سهل بن علقمة
النسائي عن أبي عثمان عن أبي هريرة مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف مسلسل بالعلل، وأجمَلَ القول في ذلك الهيثمي؛ فقال (5/ 72) :
`رواه الطبراني في ` الأوسط` وفيه من لم أعرفهم `.
وبيان ذلك كالتالي:
أولاً: أحمد بن رشدين - هو: (أحمد بن محمد بن الحجاج بن رِشدين بن سعد أبو جعفر المصري) - ، قال الذهبي في ` المغني `:
` قال ابن عدي: يكتب حديثه مع ضعفه `. وقد كذبه بعضهم، ووثقه آخرون.
ثانياً: أبوه محمد بن الحجاج: قال العقيلي:
`في حديثه نظر `.
وضعفه ابن عدي - كما يأتي - .
ثالثاً: الحجاج بن رشدين: ضعفه ابن عدي - كما يأتي - .
رابعاً: رشدين بن سعد: ضعيف أيضاً - كما في ` التقريب ` وغيره - ويبدو أنه هو وذريته أهل بيت توارثوا الضعف فرداً فرداً، قال ابن عدي:
` كأن بيت رشدين خصوا بالضعف، رشدين ضعيف، وابنه حجاج ضعيف، وللحجاج ابن يقال له: محمد، ضعيف `.
خامساً: أبو عيسى المؤذن محمد بن عبد الرحمن: أورده البخاري وابن أبي حاتم في كتابيهما من رواية جمع من الثقات، وذكره ابن حبان فيهم (7/ 389) ، وفات هذا التوثيق على الحال؛ فلم يذكره في ترجمته من ` اللسان `؛ بل ذكر عن ابن أبي حاتم أنه نقل عن أبيه أنه:
`مجهول `.
قلت: ولا يوجد هذ! في التسخة المطبوعة من ` الجرح `، فهل سقط من الطابع، أو هو في كتاب آخر، أو هو وهم من الحافظ أو الناسخ؟ ذلك مما لم يتبين لي.
وذكر أيضاً عن الأزدي أنه قال:
` مجهول لا يحتج بحديثه `.
قلت: هذا بعيد جداً، وقد روى عنه الليث بن سعد ومن ذكرنا معه.
وبالجملة: فهذه علة غير قادحة؛ لأن أبا عيسى هذا محله الصدق؛ إن شاء الله تعالى.
سادساً: سهل بن علقمة النسائي: لم أجد له ترجمة في شيء من المصادر التي عندي. والله أعلم.
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(যে ব্যক্তি মদ পান করে; আল্লাহ তার অন্তর থেকে ঈমানের নূর বের করে নেন)।
মুনকার (Munkar)।

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (১/২২৭/৩৪৩): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু রুশদাইন, তিনি বলেন: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আমার পিতা, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা রুশদাইন থেকে, তিনি বলেন: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ ঈসা আল-মুআযযিন মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান, তিনি আবূ মারযূক আত-তুজাইবী থেকে, তিনি সাহল ইবনু আলক্বামাহ আন-নাসাঈ থেকে, তিনি আবূ উসমান থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি দুর্বল (যঈফ), যা ত্রুটিসমূহের (ইল্লত) ধারাবাহিকতায় যুক্ত। এই বিষয়ে হাইসামী সংক্ষেপে বলেছেন; তিনি বলেন (৫/৭২):
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং এতে এমন বর্ণনাকারী রয়েছে যাদেরকে আমি চিনি না।’

আর এর ব্যাখ্যা নিম্নরূপ:

প্রথমত: আহমাদ ইবনু রুশদাইন – তিনি হলেন: (আহমাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু হাজ্জাজ ইবনু রুশদাইন ইবনু সা'দ আবূ জা'ফার আল-মিসরী) – ইমাম যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেন:
‘ইবনু আদী বলেছেন: তার দুর্বলতা সত্ত্বেও তার হাদীস লেখা যেতে পারে।’ কেউ কেউ তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন, আবার অন্যরা তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন।

দ্বিতীয়ত: তার পিতা মুহাম্মাদ ইবনু হাজ্জাজ: উকাইলী বলেন:
‘তার হাদীসে আপত্তি রয়েছে।’ ইবনু আদী তাকে দুর্বল বলেছেন – যেমনটি পরে আসছে।

তৃতীয়ত: আল-হাজ্জাজ ইবনু রুশদাইন: ইবনু আদী তাকে দুর্বল বলেছেন – যেমনটি পরে আসছে।

চতুর্থত: রুশদাইন ইবনু সা'দ: তিনিও দুর্বল (যঈফ) – যেমনটি ‘আত-তাক্বরীব’ ও অন্যান্য গ্রন্থে রয়েছে – এবং মনে হয় যে, তিনি ও তার বংশধর এমন একটি পরিবার যারা দুর্বলতা (যঈফ) উত্তরাধিকার সূত্রে লাভ করেছেন, ব্যক্তি থেকে ব্যক্তিতে। ইবনু আদী বলেন:
‘যেন রুশদাইনের পরিবারকে দুর্বলতার জন্য নির্দিষ্ট করা হয়েছে। রুশদাইন দুর্বল, তার পুত্র হাজ্জাজ দুর্বল, আর হাজ্জাজের একজন পুত্র আছে যার নাম মুহাম্মাদ, সেও দুর্বল।’

পঞ্চমত: আবূ ঈসা আল-মুআযযিন মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান: ইমাম বুখারী ও ইবনু আবী হাতিম তাদের কিতাবদ্বয়ে তাকে একদল নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ) বর্ণনাকারীর সূত্রে উল্লেখ করেছেন। ইবনু হিব্বান তাকে তাদের মধ্যে উল্লেখ করেছেন (৭/৩৮৯)। এই নির্ভরযোগ্যতা (তাওসীক্ব) আল-হাফিযের (ইবনু হাজার) দৃষ্টি এড়িয়ে গেছে; তাই তিনি ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তার জীবনীতে তাকে উল্লেখ করেননি; বরং তিনি ইবনু আবী হাতিম থেকে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি তার পিতা থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি:
‘মাজহূল (অজ্ঞাত)’।

আমি (আলবানী) বলি: এই কথাটি ‘আল-জারহ’ গ্রন্থের মুদ্রিত কপিতে পাওয়া যায় না। এটি কি মুদ্রকের ভুলে বাদ পড়েছে, নাকি এটি অন্য কোনো কিতাবে আছে, নাকি এটি আল-হাফিয (ইবনু হাজার) বা লিপিকারের ভুল? এটি আমার নিকট স্পষ্ট হয়নি।

তিনি (আল-হাফিয) আযদী থেকেও উল্লেখ করেছেন যে, তিনি বলেছেন:
‘মাজহূল (অজ্ঞাত), তার হাদীস দ্বারা দলীল পেশ করা যায় না।’

আমি (আলবানী) বলি: এটি খুবই অসম্ভব; কারণ লায়স ইবনু সা'দ এবং আমরা যাদের উল্লেখ করেছি তারা তার থেকে বর্ণনা করেছেন।

মোটকথা: এই ত্রুটিটি ক্ষতিকর নয়; কারণ এই আবূ ঈসা ইনশাআল্লাহ সত্যবাদী হওয়ার স্থানে রয়েছেন।

ষষ্ঠত: সাহল ইবনু আলক্বামাহ আন-নাসাঈ: আমার নিকট বিদ্যমান কোনো উৎসে আমি তার জীবনী খুঁজে পাইনি। আল্লাহই ভালো জানেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6658)


(من شربَ بصقةَ خمرٍ؛ فاجلدُوه ثمانينَ) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (13/ 49/ 120) من طريق هشام بن يوسف قال: حدثني عبد الرحمن بن صخرعن جميل بن كريب عن عبد الله بن يزيد عن عبد الله بن عمرو مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ عبد الرحمن بن صخر شبه مجهول. أورده ابن حبان في ` الثقات ` (8/ 376) من رواية ابنه عنه - عبد السلام - فقط، وتبعوه في ` التهذيب ` وفروعه، ولذا قال الحافظ في ` التقريب `:
` مجهول `.
وجميل بن كريب: لم أعرفه، والظاهر أنه مجهول؛ فإنهم لم ينكروه في شيوخ (عبد الرحمن بن صخر) ، ولا في الرواة عن عبد الله بن يزيد - وهو أبو عبد الرحمن الحبلي - وبه أعله الهيثمي؛ فقال في ` المجمع ` (6/ 279) :
` رواه الطبراني، وفيه حميد (كذا) بن كريب، ولم أعرفه!.
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(যে ব্যক্তি এক ঢোক মদ পান করবে, তাকে আশিটি বেত্রাঘাত করো)।
মুনকার।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১৩/ ৪৯/ ১২০) গ্রন্থে হিশাম ইবনু ইউসুফের সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনু সাখর, তিনি জামীল ইবনু কুরাইব থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); আব্দুর রহমান ইবনু সাখর প্রায়-অজ্ঞাত (শাবহু মাজহূল)। ইবনু হিব্বান তাকে ‘আছ-ছিক্বাত’ (৮/ ৩৭৬) গ্রন্থে শুধুমাত্র তার পুত্র আব্দুস সালামের সূত্রে তার থেকে বর্ণনা করেছেন। আর ‘আত-তাহযীব’ এবং এর শাখা গ্রন্থসমূহেও তারা তাকে অনুসরণ করেছেন। এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘মাজহূল’ (অজ্ঞাত)।

আর জামীল ইবনু কুরাইব: আমি তাকে চিনি না, এবং স্পষ্টতই তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত); কারণ তারা (মুহাদ্দিসগণ) তাকে (আব্দুর রহমান ইবনু সাখরের) শাইখদের মধ্যে অথবা আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ (যিনি আবূ আব্দুর রহমান আল-হুবালী) থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যে অস্বীকার করেননি।

আর এর মাধ্যমেই হাইছামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্লা) বলেছেন; তিনি ‘আল-মাজমা’ (৬/ ২৭৯) গ্রন্থে বলেছেন: ‘এটি ত্ববারানী বর্ণনা করেছেন, আর এতে হুমাইদ (এরূপই) ইবনু কুরাইব রয়েছেন, আমি তাকে চিনি না!’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6659)


(ثلاثة لا يُقبل لهم شهادة أن لا إله الا الله: الراكب وا لمركوب، وا لراكبة وا لمركوبة، وا لإ مامُ الجائر) () .
موضوع.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأ وسط ` (4/ 1 9/ 28 31) : حدثنا بكرف قال: حدثنا أبو عطاء بلال بن عمرو عن صالح بن أبي صالح عن عمر بن راشد عن عبد الرحمن بن حرملة عن سعيد بن المسيب عن أبي هريرة
مرفوعاً. وقال:
` لم يروه عن ابن حرملة إلا عمر بن راشد، ولا عن عمر إلا صالح بن أبي صالح، تفرد به أبو عطاء `.
قلت: لم أجد له ترجمة؛ لا في `الأسماء` ولا في `الكنى`.
ومثله شيخه صالح بن أبي صالح؛ لم أعرفه.
وشيخ هذا (عمر بن راشد) هو المدني الجاري، قال الحافظ الذهبي في `المغني `:
` قال أبو حاتم: وجدت حديثه كذباً وزوراً، وهو (عمر بن راشد مولى بني أمية) الذي تكلم فيه ابن عدي، يقال له: (الجاري) كان ينزل (الجار) `.
قلت: ساق له ابن عدي في `الكامل ` (5/ 17 - 18) عدة أحاديث منكرة، وقال في خاتمة الترجمة:
` ليس بالمعروف، وهذه الأحاديث التي أمليتها كلها مما لا يتابعه الثقات عليها`.
() كتب الشيخ رحمه الله فوق هذا المتن:` مضى برقم (5363) ، وهنا فائدة زائدة،. (الناشر) .
قلت: فهو الآفة؛ إن سلم ممن دونه.
وبكر شيخ الطبراني هو: ابن سهل الدمياطي، وقد قال الذهبي في `المغني `:
(حمل الناس عنه، وهو مقارب الحال، قال النسائي: ضعيف،. وأشار المنذري في ` الترغيب ` (3/ 200) ، وقال:
`حديث غريب جداً، رواه الطبراني في ` الأ وسط) `. وكذا عزاه إليه الهيثمي، وقال (6/ 272) :
` وفيه عمر بن راشد المدني الحارثي (كذا) ، وهو كذاب!.
ثم إنني أقول: هذا الحديث عندي موضوع باطل، ظاهر البطلان؛ لأنه مخالف كما عليه أهل السنة: أن الشهادة لا يبطلها الإخلال بشيء من أعمال الجوارح الواجبة؛ لقوله تعالى: {إن الله لا يغفرأن يشرك به ويغفر ما دون ذلك لمن يشاء} ، إلى غير ذلك من النصوص الثابتة التي يرد بها العلماء على أهل الأهواء؛ كالإباضية والخوارج، ومن جرى مجراهم، وضل ضلالهم من جهلة العصر الحاضر. فالعجب كيف خلت منه كتب الموضوعات، مثل `موضوعات ابن الجوزي `، و ` اللآلي المصنوعة في الأحاديث الموضوعة` للسيوطي، و `ذيل الموضوعات ` له؛ فضلاً عن ` العلل المتناهية ` لابن الجوزي، وغيرها.
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(তিন ব্যক্তির জন্য ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’-এর সাক্ষ্য কবুল করা হবে না: আরোহী ও যার উপর আরোহণ করা হয়েছে, আরোহিণী ও যার উপর আরোহণ করা হয়েছে, এবং অত্যাচারী শাসক।) ()।
মাওদ্বূ (জাল)।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু’জাম আল-আওসাত’ (৪/১৯/২৮৩১)-এ সংকলন করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন বাকর, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আত্বা বিল্লাল ইবনু আমর, তিনি সালিহ ইবনু আবী সালিহ থেকে, তিনি উমার ইবনু রাশিদ থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু হারমালাহ থেকে, তিনি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে। আর তিনি (ত্ববারানী) বলেছেন:
‘ইবনু হারমালাহ থেকে উমার ইবনু রাশিদ ছাড়া কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর উমার থেকে সালিহ ইবনু আবী সালিহ ছাড়া কেউ বর্ণনা করেননি, আর আবূ আত্বা এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: আমি তার (আবূ আত্বা) জীবনী পাইনি; না ‘আল-আসমা’ (নামের কিতাব)-এ, না ‘আল-কুনা’ (উপনামের কিতাব)-এ।
অনুরূপ তার শাইখ সালিহ ইবনু আবী সালিহ; আমি তাকেও চিনি না।
আর তার (সালিহ ইবনু আবী সালিহ-এর) শাইখ (উমার ইবনু রাশিদ) হলেন আল-মাদানী আল-জারী। হাফিয আয-যাহাবী ‘আল-মুগনী’তে বলেছেন:
‘আবূ হাতিম বলেছেন: আমি তার হাদীস মিথ্যা ও বানোয়াট পেয়েছি। আর তিনি হলেন (উমার ইবনু রাশিদ মাওলা বানী উমাইয়্যাহ) যার ব্যাপারে ইবনু আদী সমালোচনা করেছেন। তাকে (আল-জারী) বলা হয়, তিনি (আল-জার) নামক স্থানে বসবাস করতেন।’
আমি বলি: ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ (৫/১৭-১৮)-এ তার (উমার ইবনু রাশিদ-এর) বেশ কিছু মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস উল্লেখ করেছেন এবং জীবনীর শেষে বলেছেন:
‘তিনি পরিচিত নন, আর আমি যে হাদীসগুলো উল্লেখ করেছি, তার সবগুলোর ব্যাপারে নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীরা তার অনুসরণ করেননি।’
() শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই মাতনটির উপরে লিখেছেন: ‘এটি ৫৩৬৩ নং-এ অতিবাহিত হয়েছে, আর এখানে একটি অতিরিক্ত ফায়দা (উপকারিতা) রয়েছে।’ (প্রকাশক)।
আমি বলি: সুতরাং সে-ই (উমার ইবনু রাশিদ) হলো ত্রুটি; যদি তার নিম্নস্তরের বর্ণনাকারীরা নিরাপদ থাকে।
আর ত্ববারানীর শাইখ বাকর হলেন: ইবনু সাহল আদ-দিমইয়াতী। আর আয-যাহাবী ‘আল-মুগনী’তে বলেছেন:
(মানুষ তার থেকে হাদীস গ্রহণ করেছে, আর তিনি মুকারিবুল হাল (মোটামুটি অবস্থা সম্পন্ন)। আন-নাসাঈ বলেছেন: যঈফ (দুর্বল)।
আর আল-মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৩/২০০)-এ ইঙ্গিত করেছেন এবং বলেছেন:
‘এটি অত্যন্ত গারীব (বিচ্ছিন্ন) হাদীস, এটি ত্ববারানী ‘আল-আওসাত’-এ বর্ণনা করেছেন।’ অনুরূপভাবে আল-হাইছামীও এটি তাঁর দিকে সম্পর্কিত করেছেন এবং বলেছেন (৬/২৭২):
‘আর এতে উমার ইবনু রাশিদ আল-মাদানী আল-হারিছী (এরূপই) রয়েছে, আর সে হলো কাযযাব (মহা মিথ্যাবাদী)!।’
অতঃপর আমি বলি: এই হাদীসটি আমার নিকট মাওদ্বূ (জাল) ও বাতিল, যার বাতিল হওয়া সুস্পষ্ট; কারণ এটি আহলুস সুন্নাহর মতাদর্শের বিরোধী। আহলুস সুন্নাহর মত হলো: অঙ্গ-প্রত্যঙ্গের কোনো ওয়াজিব আমল পালনে ত্রুটি করার কারণে শাহাদাহ (ঈমানের সাক্ষ্য) বাতিল হয়ে যায় না; কেননা আল্লাহ তা‘আলার বাণী: {নিশ্চয় আল্লাহ তাঁর সাথে শরীক করা ক্ষমা করেন না, আর এর নিম্ন পর্যায়ের পাপ যাকে ইচ্ছা ক্ষমা করে দেন} [সূরা নিসা: ৪৮], এবং এ ধরনের অন্যান্য সুপ্রতিষ্ঠিত দলীল রয়েছে, যা দ্বারা আলিমগণ বিদ‘আতী ফিরকাসমূহের—যেমন ইবাযিয়্যাহ ও খাওয়াজির এবং যারা তাদের পথ অনুসরণ করেছে ও বর্তমান যুগের মূর্খদের মধ্য থেকে তাদের মতো ভ্রষ্ট হয়েছে—তাদের প্রতিবাদ করেন। তাই আশ্চর্যের বিষয় হলো, এটি কিভাবে ইবনুল জাওযীর ‘মাওদ্বূ‘আত’, সুয়ূতীর ‘আল-লাআলী আল-মাসনূ‘আহ ফিল আহাদীছ আল-মাওদ্বূ‘আহ’ এবং তার ‘যাইলুল মাওদ্বূ‘আত’-এর মতো জাল হাদীসের কিতাবগুলো থেকে বাদ পড়লো; ইবনুল জাওযীর ‘আল-ইলাল আল-মুতানাহিয়্যাহ’ এবং অন্যান্য কিতাবের কথা তো বাদই দিলাম।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6660)


(ألا أدلك على أكرم أخلاق الدنيا والآخرة؟ أن تصل من قطعك، وأن تعطي من حرمك، وأن تعفو عمن ظلمك) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (6/ 264/ 5563) :
حدثنا محمد بن عبد الله الحضرمي قال: حدثنا نعيم بن يعقوب بن أبي المتئد
أبو المتئد قال: سمعت أبي يذكر عن أبي إسحاق عن الحارث عن علي قال: قال لي النبي صلى الله عليه وسلم: … فذكره.
وأخرجه العقيلي في ` الضعفاء` (4/ 295) : حدثنا محمد بن إسماعيل قال: حدثنا سلمة بن شبيب قال: حدثنا نعيم بن يعقوب ابن أخت سفيان بن عيينة قال: حدثني أبي نحوه. وقال الطبراني:
`لم يروه عن أبي إسحاق إلا يعقوب بن أبي المتئد، تفرد به نعيم بن يعقوب`.
قلت: وفي ترجمته أورده العقيلي، وقال:
` لا يتابع على حديثه `.
وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (9/ 219) برواية الحضرمي عنه، وقد تابعه سلمة بن شبيب؛ كما رأيت، وله عنه راو ثالث، وهو يزيد بن عبد الرحمن بن مصعب المعني؛ كما في ` الجرح والتعديل `، ولم يذكر له غيره، ولا عدله ولا جرحه، ولكني رأيته في ` العلل ` (2/ 212) قال:
` سألت أبي عن حديث رواه نعيم بن يعقوب بن أبي المتئد عن أبيه … `؛
فساقه بتمامه وقال:
` قال أبي: هذا خطأ، إنما هو أبو إسحاق عن ابن أبي حسين عن النبي صلى الله عليه وسلم
مرسل. ونعيم هذا لا أعرفه `.
قلت: ` أورده الحافظ في ` اللسان `، وذكر فيه الحديث وقول العقيلي المتقدم، وتوثيق ابن حبان إياه، ولم يزد!
ويعقول! بن أبي المتئد: لم أجد له ترجمة، فلعله هو العلة.
وأما المنذري: فأشار في ` الترغيب ` (3/ 209) إلى إعلاله بـ (الحارث) فقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط ` من رواية الحارث الأعور عنه `. وصرح بذلك الهيثمي فقال (8/ 189) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه الحارث، وهو ضعيف`.
ثم وجدت ما ينفي إعلال العقيلي الحديث بـ (نعيم) وقوله: ` لا يتابع عليه`، فقد تابعه سعيد بن محمد الجرمي: ثنا يعقوب بن أبي المتئد به.

أخرجه البيهقي في ` السنن الكبرى ` (10/ 235) .
وسعيد بن محمد الجَرمي ثقة من شيوخ الشيخين، وذكر الحافظ المزي أنه روى عن (يعقوب بن أبي المتئد خال سفيان بن عيينة) .
ثم رأيت المرسل الذي تقدم نقله مرسلاً عن ` علل ابن أبي حاتم، قد أسنده عبد الرزاق في ` مصنفه ` (1 1/ 72 1/ 237 0 2) ، ومن طريقه البيهقي في ` الشعب ` (6/ 2 31/ 0 0 83) عن معمر، وابن أبي شيبة في ` المصنف ` (14/ 43/ 17501) ، وابن أبي الدنيا في ` مكارم الأخلاق` (6/ 26) عن أبي الأحوص؛ كلاهما عن أبي إسحاق عن عبد الله بن أبي حسين به مرسلاً، وقال البيهقي:
` هذا مرسل حسين `.
ورأيت قد وصله بعض الضعفاء ` فقال محمد بن سليمان (لُوَين) : ثنا محمد بن جابر عن أبي إسحاق عن [ابن] أبي الحسين عن كعب بن عجرة
قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. قال! لوين) : يقال - والله أعلم - : عبد الله ابن أبي الحسين يكنى (أبا الحسين) .

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير `! 19/ 155/ 343) .
ومحمد بن جابر، هو اليمامي السُّحيمي، قال الذهبي في ` المغني `:
`قال البخاري: ليس بالقوي عندهم. وقال أحمد: له مناكير. وقال ابن معين: عمي واختلط. وقال أبو حاتم: هو أمثل من ابن لهيعة`.
ولخص هذه الكلمات في `الكاشف` فقال:
` سيئ الحفظ `.
ونحوه قول الحافظ في ` التقريب `:
` صدوق ذهبت كتبه؛ فساء حفظه، وخلط كثيراًوعمي؛ فصار يلقن، ورجحه أبو حاتم على ابن لهيعة `.
قلت: ومما ذكرنا من هذه الأقوال عن هؤلاء الأئمة الجبال يظهر أن الهيثمي غلا - على خلاف عادته - حين قال (8/ 189) :
` رواه الطبراني، وفيه محمد بن جابر السحيمي، وهو متروك `.
نعم؛ لا أشك في وهمه في إسناده عن كعب؛ لمخالفته الثقات - كما تقدم - ، على أنهم لم يذكروا لابن أبي حسين رواية عن أحد من الصحابة؛ إلا عن عامر ابن وائلة، وقد تأخرت وفاته إلى سنة (110) . وذكر بعضهم أنه لم يسمع من عثمان،، وكعب مات بعد الخمسين، فالظاهر أنه لم يسمع منه. والله أعلم.
وقد يشهد للحديث رواية علي بن يزيد عن القاسم عن أبي أمامة عن عقبة ابن عامر مرفوعاً.
` يا عقبة! ألا أخبرك بأفضل أخلاق أهل الدنيا والآخرة؟ ` … فذكرهن.

أخرجه ابن أبي الدنيا (5/ 19) ، والطبراني في ` المعجم الكبير` (17/269/ 739) ، وفي ` مكارم الأخلاق` (56/ 56) ، ورواه أحمد (4/ 148) بنحوه.
وعلي بن يزيد - هو: الألهاني - ، قال في ` المغني `:
`ضعفوه، وتركه الدارقطني `.
وروي نحوه عن عطاء مرسلاً. وتقدم برقم (5912) .
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(আমি কি তোমাকে দুনিয়া ও আখিরাতের সর্বোত্তম চরিত্রের সন্ধান দেব না? (তা হলো) যে তোমার সাথে সম্পর্ক ছিন্ন করে, তুমি তার সাথে সম্পর্ক স্থাপন করবে; যে তোমাকে বঞ্চিত করে, তুমি তাকে দান করবে; এবং যে তোমার প্রতি যুলম করে, তুমি তাকে ক্ষমা করে দেবে।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৬/২৬৪/৫৫৬৩) বর্ণনা করেছেন:
মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-হাদরামী আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: নু'আইম ইবনু ইয়া'কূব ইবনু আবিল মুতা'ইদ আবূল মুতা'ইদ আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি আমার পিতাকে আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আল-হারিস থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি। তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আর উকাইলী এটি তাঁর ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে (৪/২৯৫) বর্ণনা করেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: সালামাহ ইবনু শাবীব আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: নু'আইম ইবনু ইয়া'কূব, যিনি সুফইয়ান ইবনু উয়াইনাহর ভাগ্নে, আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমার পিতা আমার নিকট অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

আর ত্বাবারানী বলেছেন: ‘আবূ ইসহাক থেকে ইয়া'কূব ইবনু আবিল মুতা'ইদ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি। নু'আইম ইবনু ইয়া'কূব এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: উকাইলী তাঁর জীবনীতে এটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তাঁর হাদীসের উপর অন্য কেউ অনুসরণ করেনি।’

ইবনু হিব্বান ‘আছ-ছিকাত’ গ্রন্থে (৯/২১৯) আল-হাদরামীর সূত্রে তাঁর (নু'আইমের) বর্ণনা উল্লেখ করেছেন। আর সালামাহ ইবনু শাবীব তাঁর অনুসরণ করেছেন; যেমনটি আপনি দেখেছেন। তাঁর থেকে তৃতীয় একজন বর্ণনাকারীও আছেন, তিনি হলেন ইয়াযীদ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু মুস'আব আল-মা'নী; যেমনটি ‘আল-জারহ ওয়াত তা'দীল’ গ্রন্থে রয়েছে। তিনি তাঁর (ইয়াযীদের) সম্পর্কে অন্য কিছু উল্লেখ করেননি, না তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন, না দুর্বল বলেছেন। কিন্তু আমি তাঁকে ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/২১২) দেখেছি, তিনি বলেছেন:
‘আমি আমার পিতাকে নু'আইম ইবনু ইয়া'কূব ইবনু আবিল মুতা'ইদ তাঁর পিতা থেকে বর্ণিত হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম...’; অতঃপর তিনি তা সম্পূর্ণ উল্লেখ করলেন এবং বললেন: ‘আমার পিতা বলেছেন: এটি ভুল। এটি মূলত আবূ ইসহাক, ইবনু আবী হুসাইন থেকে, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর এই নু'আইমকে আমি চিনি না।’

আমি (আলবানী) বলি: হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তাঁকে উল্লেখ করেছেন এবং তাতে হাদীসটি, উকাইলীর পূর্বোক্ত মন্তব্য এবং ইবনু হিব্বানের তাঁকে বিশ্বস্ত বলার বিষয়টি উল্লেখ করেছেন, কিন্তু এর বেশি কিছু যোগ করেননি!

আর ইয়া'কূল! ইবনু আবিল মুতা'ইদ: আমি তাঁর জীবনী খুঁজে পাইনি, সম্ভবত তিনিই ত্রুটির কারণ।

আর মুনযিরী: তিনি ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (৩/২০৯) (আল-হারিস)-এর কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলে ইঙ্গিত করেছেন এবং বলেছেন: ‘ত্বাবারানী এটি ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে আল-হারিস আল-আ'ওয়ারের সূত্রে তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন।’ আর হাইছামী তা স্পষ্টভাবে বলেছেন (৮/১৮৯): ‘ত্বাবারানী এটি ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এতে আল-হারিস রয়েছেন, যিনি যঈফ (দুর্বল)।’

অতঃপর আমি এমন কিছু পেলাম যা নু'আইমের কারণে উকাইলীর হাদীসকে ত্রুটিযুক্ত করার এবং তাঁর এই উক্তি: ‘তাঁর উপর অন্য কেউ অনুসরণ করেনি’—এই বক্তব্যকে নাকচ করে দেয়। কেননা সাঈদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-জারমী তাঁর অনুসরণ করেছেন: ইয়া'কূব ইবনু আবিল মুতা'ইদ আমাদের নিকট তা বর্ণনা করেছেন।

বাইহাকী এটি ‘আস-সুনানুল কুবরা’ গ্রন্থে (১০/২৩৫) বর্ণনা করেছেন।

আর সাঈদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-জারমী হলেন ছিকাহ (বিশ্বস্ত), যিনি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শাইখদের অন্তর্ভুক্ত। আর হাফিয আল-মিযযী উল্লেখ করেছেন যে, তিনি (সুফইয়ান ইবনু উয়াইনাহর মামা) ইয়া'কূব ইবনু আবিল মুতা'ইদ থেকে বর্ণনা করেছেন।

অতঃপর আমি সেই মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ) হাদীসটি দেখলাম, যা পূর্বে ‘ইলাল ইবনু আবী হাতিম’ থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণিত হয়েছে, তা আব্দুর রাযযাক তাঁর ‘মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (১১/১৭২/২৩৭০২) সনদসহ বর্ণনা করেছেন, এবং তাঁর সূত্রে বাইহাকী ‘আশ-শু'আব’ গ্রন্থে (৬/২৩১/৮৩০০) মা'মার থেকে, এবং ইবনু আবী শাইবাহ ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (১৪/৪৩/১৭৫০১), এবং ইবনু আবীদ দুনিয়া ‘মাকারিমুল আখলাক’ গ্রন্থে (৬/২৬) আবূল আহওয়াস থেকে বর্ণনা করেছেন; উভয়ই আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আবী হুসাইন থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর বাইহাকী বলেছেন: ‘এটি হুসাইনের মুরসাল।’

আর আমি দেখলাম যে কিছু দুর্বল বর্ণনাকারী এটিকে মওসূল (সংযুক্ত সনদ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। মুহাম্মাদ ইবনু সুলাইমান (লুওয়াইন) বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু জাবির আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি [ইবনু] আবী হুসাইন থেকে, তিনি কা'ব ইবনু উজরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। (লুওয়াইন) বলেছেন: বলা হয়—আল্লাহই ভালো জানেন—আব্দুল্লাহ ইবনু আবী হুসাইনের কুনিয়াত (উপনাম) হলো (আবূল হুসাইন)।

ত্বাবারানী এটি ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১৯/১৫৫/৩৪৩০) বর্ণনা করেছেন।

আর মুহাম্মাদ ইবনু জাবির হলেন আল-ইয়ামামী আস-সুহাইমী। যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘বুখারী বলেছেন: তাদের নিকট তিনি শক্তিশালী নন। আহমাদ বলেছেন: তাঁর মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস রয়েছে। ইবনু মা'ঈন বলেছেন: তিনি অন্ধ হয়ে গিয়েছিলেন এবং ইখতিলাত (স্মৃতিবিভ্রাট) ঘটেছিল। আবূ হাতিম বলেছেন: তিনি ইবনু লাহী'আহ থেকে উত্তম।’

আর তিনি (যাহাবী) এই কথাগুলো ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে সংক্ষিপ্ত করে বলেছেন: ‘স্মৃতিশক্তি দুর্বল।’

আর অনুরূপ কথা হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘তিনি সত্যবাদী, তাঁর কিতাবগুলো হারিয়ে গিয়েছিল; ফলে তাঁর স্মৃতিশক্তি খারাপ হয়ে যায়, তিনি প্রচুর ইখতিলাত করেন এবং অন্ধ হয়ে যান; ফলে তাঁকে তালকীন (ভুল ধরিয়ে দেওয়া) করা হতো। আবূ হাতিম তাঁকে ইবনু লাহী'আহর উপর প্রাধান্য দিয়েছেন।’

আমি (আলবানী) বলি: এই পর্বতসম ইমামদের থেকে আমরা যে উক্তিগুলো উল্লেখ করলাম, তা থেকে প্রতীয়মান হয় যে, হাইছামী তাঁর অভ্যাসের বিপরীতে গিয়ে বাড়াবাড়ি করেছেন, যখন তিনি (৮/১৮৯) বলেছেন: ‘ত্বাবারানী এটি বর্ণনা করেছেন, আর এতে মুহাম্মাদ ইবনু জাবির আস-সুহাইমী রয়েছেন, আর তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’

হ্যাঁ; কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাঁর সনদে ভুল হওয়ার ব্যাপারে আমার কোনো সন্দেহ নেই; কারণ তিনি ছিকাহ (বিশ্বস্ত) বর্ণনাকারীদের বিরোধিতা করেছেন—যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। তাছাড়া, তারা ইবনু আবী হুসাইনের জন্য কোনো সাহাবী থেকে বর্ণনা উল্লেখ করেননি; শুধু আমির ইবনু ওয়ায়িলাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যতীত, যাঁর মৃত্যু ১১০ হিজরী পর্যন্ত বিলম্বিত হয়েছিল। আর কেউ কেউ উল্লেখ করেছেন যে, তিনি উছমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি, আর কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পঞ্চাশ হিজরীর পরে মারা যান। সুতরাং বাহ্যত তিনি তাঁর থেকে শোনেননি। আল্লাহই ভালো জানেন।

আর এই হাদীসের পক্ষে আলী ইবনু ইয়াযীদ, আল-কাসিম থেকে, তিনি আবূ উমামাহ থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) সূত্রে বর্ণিত হাদীসটি সাক্ষ্য দিতে পারে। (তা হলো): ‘হে উকবাহ! আমি কি তোমাকে দুনিয়া ও আখিরাতের সর্বোত্তম চরিত্রের কথা বলব না?’ ... অতঃপর তিনি সেগুলো উল্লেখ করলেন।

ইবনু আবীদ দুনিয়া (৫/১৯), ত্বাবারানী ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (১৭/২৬৯/৭৩৯) এবং ‘মাকারিমুল আখলাক’ গ্রন্থে (৫৬/৫৬) এটি বর্ণনা করেছেন। আর আহমাদ (৪/১৪৮) অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

আর আলী ইবনু ইয়াযীদ—তিনি হলেন আল-আলহানী—‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলা হয়েছে: ‘তারা তাঁকে দুর্বল বলেছেন, আর দারাকুতনী তাঁকে পরিত্যাগ করেছেন।’

আর অনুরূপ হাদীস আত্বা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণিত হয়েছে। আর তা ৫৯১২ নং-এ পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6661)


(تجافوا - وفي رواية: تجاوزوا - عن ذنبِ السَخيّ، فإن الله آخٌذ بيِده كلما عَثُر) .
ضعيف.
روي عن عبد الله بن مسعود، وعبد الله بن عباس.
1 - أما حديث ابن مسعود؛ فيروى من طريقين واهيين عن الأعمش عن إبراهيم عن علقمة عنه.
أما الطريق الأولى؛ فيرويها بشر بن عبيد الدارسي، قال: حدثنا محمد بن حميد العتكي عنه.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (2/ 114 - 115/ 1121) ، وعنه أبو نعيم في `الحلية ` (5/ 58 - 59) ، وقال الطبراني:
` لم يروه عن الأعمش إلا محمد بن حميد، تفرد به بشر `.
قلت: روى عنه جماعة من الثقات منهم أبو حاتم، وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (8/ 141) فما أبعد، وكذبه الأزدي، وجرحه ابن عدي بما لا ينهض؛ كما حققته في ` تيسير الانتفاع `، فقول الهيثمي في ` المجمع ` (6/ 282) :
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه عبيد الله (!) الدارسي؛ وهو ضعيف `.
قلت: فهو مما لا يعتمد عليه، وإنما علة هذه الطريق في نقدي (محمد بن حميد العتكي) ؛ فإني لم أجد له ترجمة، فالظاهر أنه من شيوخ (بشر) . المجاهيل الذين أشار إليهم ابن عدي في ترجمته.
وقول الطبراني: ` لم يروه عن الأعمش إلا محمد بن حميد `، يخالفه ما يأ تي، فأقول:
وأما الطريق الأ خرى؛ فيرويها عبد الرحمن بن حماد البصري، قال: ثنا الأعمش به.
هكذا أخرجه أبو نعيم (4/ 108) من طريق إبراهيم بن حماد الأزدي، والبيهقي في ` الشعب ` (7/433/ 867 0 1) (1) ، والأصبهاني في ` الترغيب ` (2/ 636/ 1 52 1) من طريق أبي خالد يزيد بن محمد العقيلي، كلاهما قالا: ثنا عبد الرحمن البصري به. وقال أبو نعيم:
` غريب من حديث الأعمش، لم نكتبه إلا من هذا الوجه `.
(1) وسقط من روايته ` عن علقمة`، ولذلك قال عقبه: ` هكذا جاء منقطعاً بين إبراهيم وابن مسعود `.
قلت: هكذا وقع في رواية الأزدي والعقيلي: (عبد الرحمن بن حماد) ، ولم أجد لهما ترجمة؛ فكأنهما مجهولان، وقال البيهقي:
` وقيل: عبد الرحيم بن حماد عن الأعمش … ` إلخ.
ثم ساق إسناده من طريق إبراهيم بن أحمد بن النعمان: نا عبد الرحيم بن حماد البصري … فذكره. وهذا إسناد مجهول ضعيف، وعبد الرحيم ينفرد به، واختلف عليه في إسناده.
قلت: وعبد الرحيم هذا؛ قال العقيلي في ` الضعفاء ` (3/ 82) .
` روى عن الأعمش مناكير، وما لا أصل له من حديث الأعمش `.
قلت: وقد مضى له حديث آخر في المجلد الثاني عشر برقم (5759) . وثالث في المجلد السابع برقم (3009) ، وقال فيه أبو نعيم:
` متروك الحديث `.
وهذه فائدة لا تجدها في كتب الرجال.
وأما ابن حبان فلم يعرفه؛ فذكره في ` الثقات ` (8/ 413) !
2 - وأما حديث ابن عباس؛ فيرويه تميم بن عمران القرشي عن محمد بن عقبة المكى عن فضيل بن عياض عن ليث عن مجاهد عنه.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (6/ 332/ 6 0 57) ، والبيهقي (10869) ، وقال الطبراني.
`لا يروى عن ابن عباس إلا بهذا الإسناد، تفرد به محمد بن عبيد الله الجدعاني `.
قلت: ولم أعرفه، وكذا شيخه (تميم) وشيخ هذا؛ ولكنه لم يتفرد به، بل تابعه أبو الفيض ذو النون بن إبراهيم المصري قال: حدثنا فضيل بن عياض به.

أخرجه أبو نعيم في ` الحلية ` (10/ 4) ، والخطيب في ` التاريخ ` (8/334 - 335) .
وذو النون هذا هو الزاهد العارف؛ تكلم فيه الدارقطني، انظر ` الميزان ` و `اللسان `. وعلة الحديث ليث - وهو: ابن أبي سليم الحمصي - ؛ وكان اختلط، وقال البيهقي في إسناد الجدعاني:
` في هذا الإسناد مجاهيل `. وقال الهيثمي:
` رواه الطبراني في ` الأوسط`، وفيه جماعة لم أعرفهم.
قلت: والأولى إعلاله بالليث؛ لما ذكرت من المتابعة. والله سبحانه وتعالى أعلم.
والحديث ذكره المنذري في ` الترغيب ` (3/ 249/ 26) من حديث ابن مسعود، وأشار لضعفه، وقال:
` رواه أبن أبي الدنيا والأصبهاني. ورواه أبو الشيخ من حديث ابن عباس `.
ولعل أصل الحديث: ما رواه الطبراني في ` الأوسط ` (7558) من طريق أخرى يستشهد بها عن ابن مسعود مرفوعاً بلفظ:
`أقيلوا ذوي الهيئات زلاتهم `.
وله شاهد من حديث عائشة رضي الله عنها بإسناد قوي؛ ولذلك خرجتهما في ` الصحيحة ` (638) .
وروي بلفظ:
` أقيلوا السخي زلته … ` الحديث، وقد مضى تخريجه برقم (2870) .
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(দানশীল ব্যক্তির পাপ এড়িয়ে যাও – অন্য বর্ণনায়: ক্ষমা করে দাও – কারণ যখনই সে হোঁচট খায়, আল্লাহ তার হাত ধরে নেন।)
যঈফ (দুর্বল)।
এটি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে।

১ - ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি; আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি ইবরাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি আলক্বামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি তাঁর (ইবনু মাসঊদ) হতে দুটি দুর্বল (ওয়াহী) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।

প্রথম সূত্রটি হলো: বিশর ইবনু উবাইদ আদ-দারিসী এটি বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে মুহাম্মাদ ইবনু হুমাইদ আল-আতিকী তাঁর (আল-আ'মাশ) হতে হাদীস বর্ণনা করেছেন।

এটি ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (২/১১৪-১১৫/১১২১)-এ এবং তাঁর সূত্রে আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-হিলইয়াহ’ (৫/৫৮-৫৯)-এ বর্ণনা করেছেন। আর ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘মুহাম্মাদ ইবনু হুমাইদ ব্যতীত অন্য কেউ আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে এটি বর্ণনা করেননি। বিশর (রাহিমাহুল্লাহ) এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলছি: তার (বিশরের) থেকে একদল নির্ভরযোগ্য রাবী বর্ণনা করেছেন, তাদের মধ্যে আবূ হাতিম (রাহিমাহুল্লাহ) অন্যতম। ইবনু হিব্বান (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে ‘আছ-ছিক্বাত’ (৮/১৪১)-এ উল্লেখ করেছেন, যা (দুর্বলতা থেকে) অনেক দূরে। তবে আল-আযদী (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন, আর ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে এমনভাবে জারহ (দুর্বল) করেছেন যা ধোপে টেকে না; যেমনটি আমি ‘তাইসীরুল ইনতিফা’ গ্রন্থে তাহক্বীক্ব করেছি। সুতরাং হাইছামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আল-মাজমা’ (৬/২৮২)-এর বক্তব্য:
‘এটি ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, এতে উবাইদুল্লাহ (!) আদ-দারিসী রয়েছে; আর সে যঈফ (দুর্বল)।’

আমি (আলবানী) বলছি: এটি এমন কিছু যার উপর নির্ভর করা যায় না। আর আমার মতে এই সূত্রের ত্রুটি হলো (মুহাম্মাদ ইবনু হুমাইদ আল-আতিকী); কারণ আমি তার জীবনী খুঁজে পাইনি। তাই স্পষ্টতই সে (বিশরের) অজ্ঞাত (মাজহূল) শায়খদের অন্তর্ভুক্ত, যাদের প্রতি ইবনু আদী (রাহিমাহুল্লাহ) তার জীবনীতে ইঙ্গিত করেছেন।

আর ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য: ‘মুহাম্মাদ ইবনু হুমাইদ ব্যতীত অন্য কেউ আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে এটি বর্ণনা করেননি’, যা পরবর্তীতে আসছে তার বিপরীত। তাই আমি বলছি:
আর অন্য সূত্রটি হলো: আব্দুর রহমান ইবনু হাম্মাদ আল-বাসরী এটি বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন।

এভাবেই আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) (৪/১০৮)-এ ইবরাহীম ইবনু হাম্মাদ আল-আযদী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে, এবং বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আশ-শু’আব’ (৭/৪৩৩/১০৮৬৭) (১)-এ, এবং আল-আসবাহানী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আত-তারগীব’ (২/৬৩৬/১৫২১)-এ আবূ খালিদ ইয়াযীদ ইবনু মুহাম্মাদ আল-উক্বাইলী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। তারা উভয়েই বলেছেন: আমাদেরকে আব্দুর রহমান আল-বাসরী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন। আর আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘এটি আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাদীসের মধ্যে গারীব (অপরিচিত), আমরা এই সূত্র ব্যতীত এটি লিখিনি।’

(১) তার বর্ণনায় ‘আন আলক্বামাহ’ অংশটি বাদ পড়েছে, আর একারণেই তিনি এর পরে বলেছেন: ‘এভাবেই ইবরাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) ও ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে মুনক্বাতি’ (বিচ্ছিন্ন) হিসেবে এসেছে।’

আমি (আলবানী) বলছি: আল-আযদী (রাহিমাহুল্লাহ) ও আল-উক্বাইলী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনায় এভাবেই (আব্দুর রহমান ইবনু হাম্মাদ) এসেছে, আর আমি তাদের উভয়ের জীবনী খুঁজে পাইনি; তাই মনে হচ্ছে তারা উভয়েই মাজহূল (অজ্ঞাত)। আর বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘বলা হয়েছে: আব্দুর রহীম ইবনু হাম্মাদ আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে...’ ইত্যাদি।

অতঃপর তিনি ইবরাহীম ইবনু আহমাদ ইবনু নু’মান (রাহিমাহুল্লাহ)-এর সূত্রে তার ইসনাদ বর্ণনা করেছেন: আমাদেরকে আব্দুর রহীম ইবনু হাম্মাদ আল-বাসরী (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীস বর্ণনা করেছেন... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। আর এই ইসনাদটি মাজহূল (অজ্ঞাত) ও যঈফ (দুর্বল)। আর আব্দুর রহীম (রাহিমাহুল্লাহ) এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন, এবং তার উপর এর ইসনাদ নিয়ে মতভেদ করা হয়েছে।

আমি (আলবানী) বলছি: আর এই আব্দুর রহীম (রাহিমাহুল্লাহ) সম্পর্কে আল-উক্বাইলী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আয-যু’আফা’ (৩/৮২)-এ বলেছেন:
‘সে আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস এবং আল-আ'মাশ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর এমন হাদীস বর্ণনা করেছে যার কোনো ভিত্তি নেই।’

আমি (আলবানী) বলছি: তার আরেকটি হাদীস দ্বাদশ খণ্ডে (৫৭৫৯) নম্বরে গত হয়েছে। আর তৃতীয়টি সপ্তম খণ্ডে (৩০০৯) নম্বরে গত হয়েছে, আর তাতে আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘সে মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত রাবী)’। এই ফায়দাটি আপনি রিজাল শাস্ত্রের কিতাবসমূহে পাবেন না।

আর ইবনু হিব্বান (রাহিমাহুল্লাহ) তাকে চিনতে পারেননি; তাই তিনি তাকে ‘আছ-ছিক্বাত’ (৮/৪১৩)-এ উল্লেখ করেছেন!

২ - আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হলো: তামীম ইবনু ইমরান আল-কুরাশী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি মুহাম্মাদ ইবনু উক্ববাহ আল-মাক্কী (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি ফুযাইল ইবনু আইয়ায (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি লাইছ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি মুজাহিদ (রাহিমাহুল্লাহ) হতে, তিনি তাঁর (ইবনু আব্বাস) হতে বর্ণনা করেছেন।

এটি ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’ (৬/৩৩২/৫৭০৬)-এ এবং বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) (১০৮৬৯)-এ বর্ণনা করেছেন। আর ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে এই ইসনাদ ব্যতীত অন্য কোনো সূত্রে এটি বর্ণিত হয়নি। মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ আল-জাদ’আনী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলছি: আমি তাকে চিনতে পারিনি, অনুরূপভাবে তার শায়খ (তামীম)-কেও না, এবং তার শায়খের শায়খকেও না; তবে সে এককভাবে বর্ণনা করেনি, বরং আবূল ফাইয যুন-নূন ইবনু ইবরাহীম আল-মিসরী (রাহিমাহুল্লাহ) তার অনুসরণ করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে ফুযাইল ইবনু আইয়ায (রাহিমাহুল্লাহ) এটি বর্ণনা করেছেন।

এটি আবূ নু’আইম (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-হিলইয়াহ’ (১০/৪)-এ এবং খত্বীব (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আত-তারীখ’ (৮/৩৩৪-৩৩৫)-এ বর্ণনা করেছেন।

আর এই যুন-নূন (রাহিমাহুল্লাহ) হলেন সেই আরিফ (আল্লাহর পরিচয় লাভকারী) যাহেদ (পরহেযগার); যার সম্পর্কে দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) সমালোচনা করেছেন। ‘আল-মীযান’ ও ‘আল-লিসান’ দেখুন। আর হাদীসটির ত্রুটি হলো লাইছ (রাহিমাহুল্লাহ) – আর তিনি হলেন: ইবনু আবী সুলাইম আল-হিমসী –; তিনি ইখতিলাত (স্মৃতিবিভ্রাট) করতেন। আর বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) আল-জাদ’আনী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ইসনাদ সম্পর্কে বলেছেন:
‘এই ইসনাদে মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবী রয়েছে।’ আর হাইছামী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, এতে এমন একদল রাবী রয়েছে যাদেরকে আমি চিনতে পারিনি।’

আমি (আলবানী) বলছি: আর উত্তম হলো লাইছ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত করা; কারণ আমি মুতাবা’আত (অনুসরণ) উল্লেখ করেছি। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলা সর্বাধিক অবগত।

আর এই হাদীসটি মুনযিরী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আত-তারগীব’ (৩/২৪৯/২৬)-এ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে উল্লেখ করেছেন, এবং এর দুর্বলতার প্রতি ইঙ্গিত করেছেন। আর তিনি বলেছেন:
‘এটি ইবনু আবীদ্ দুন্ইয়া (রাহিমাহুল্লাহ) ও আল-আসবাহানী (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন। আর আবূশ শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে বর্ণনা করেছেন।’

আর সম্ভবত হাদীসটির মূল হলো: যা ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-আওসাত্ব’ (৭৫৫৮)-এ অন্য একটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন যা দ্বারা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে এই শব্দে শাহেদ (সমর্থক) গ্রহণ করা যায়:
‘তোমরা সম্ভ্রান্ত ব্যক্তিদের ভুল-ত্রুটি এড়িয়ে যাও।’

আর এর একটি শক্তিশালী ইসনাদযুক্ত শাহেদ (সমর্থক) আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হতে রয়েছে; আর একারণেই আমি উভয়টিকে ‘আস-সহীহাহ’ (৬৩৮)-এ তাখরীজ করেছি।

আর এটি এই শব্দেও বর্ণিত হয়েছে:
‘তোমরা দানশীল ব্যক্তির ভুল ক্ষমা করে দাও...’ হাদীসটি। আর এর তাখরীজ (২৮৭০) নম্বরে গত হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6662)


(إذا جمع الله بين الخلائق يوم القيامة، نادى منادٍ: أين أهل الفضل؟
قال: فيقوم ناس، وهم يسيرٌ، فينطلقون سراعاً إلى الجنة، فتتلقاهم الملائكة، فيقولون: وما فضلكم؟ فيقولون: كنا إذا ظُلمنا صبرنا، وإذا أسيء إلينا، حلمنا. فيقال لهم: ادخلوا الجنة، {فنعم أجر العاملين} ) .
ضعيف جداً.

أخرجه الأصبهاني في ` الترغيب والترهيب ` (972/ 2374) من طريق أبي المطرف مفيرة الشامي عن العرزمي عن عمرو بن شعيب عن أبيه عن جده مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً؛ آفته (العرزمي) هذا، وهو متروك بالاتفاق، واسمه (محمد بن عبيد الله بن أبي سليمان العرزمى) ؛ ولأنه لم يسم في الإسناد، لم يعرفه المعلقون الئلائة على ` الترغيب ` للمنذري (3/ 405) ،
ولذلك أعلوه بالراوي عنه، فقالوا:
`وفيه مغيرة بن بكار الشامي مجهول `.
وهذا الإعلال وإن كان في واقعه صحيحاً؛ لأنه قول ابن أبي حاتم (8/ 219)
عن أبيه، ووافقه الذهبي والعسقلاني، فهو في الوقت نفسه يدل على جهل هؤلاء المعلقين بهذا العلم؛ لأنه لا يجوز فيه النزول بالإعلال، وفي العلو علة أخرى، ولا سيما إذا كانت أقوى من العلة الدنيا، - كما هو الشأن هنا - ؛ ولكنها الجهالة، وادعاء العلم والتحقيق الذي يعبر عنه بعضهم بالتزبب قبل التحصرم! والله المستعان.
وقد أشار المنذري إلى تضعيف الحديث بقوله:
` وروي عن عمرو بن شعيب … `.
ولقد كثت أتمنى له أن يفصح عن علته الأقوى؛ حتى لا يتشبث بما دونها من لا علم عنده.
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(যখন আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন সকল সৃষ্টিকে একত্রিত করবেন, তখন একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা দেবেন: ফযীলতপ্রাপ্ত লোকেরা কোথায়?
তিনি (নবী সাঃ) বললেন: তখন কিছু লোক দাঁড়াবে, আর তারা হবে সংখ্যায় কম। তারা দ্রুত জান্নাতের দিকে চলতে থাকবে। তখন ফেরেশতারা তাদের সাথে সাক্ষাৎ করে বলবেন: তোমাদের ফযীলত কী ছিল? তারা বলবে: আমরা যখন নির্যাতিত হতাম, তখন ধৈর্য ধারণ করতাম, আর যখন আমাদের সাথে খারাপ ব্যবহার করা হতো, তখন আমরা সহনশীলতা দেখাতাম। তখন তাদের বলা হবে: তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করো, {সুতরাং কর্মশীলদের পুরস্কার কতই না উত্তম!} )
খুবই যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন আল-আসবাহানী তাঁর ‘আত-তারগীব ওয়াত-তারহীব’ গ্রন্থে (৯৭২/ ২৩৭৪) আবূ আল-মুতরিফ মুগীরাহ আশ-শামী হতে, তিনি আল-আরযামী হতে, তিনি আমর ইবনু শুআইব হতে, তিনি তাঁর পিতা হতে, তিনি তাঁর দাদা হতে মারফূ’ সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই যঈফ (দুর্বল); এর ত্রুটি হলো এই (আল-আরযামী)। আর তিনি সর্বসম্মতিক্রমে মাতরূক (পরিত্যক্ত রাবী)। তাঁর নাম হলো (মুহাম্মাদ ইবনু উবাইদুল্লাহ ইবনু আবী সুলাইমান আল-আরযামী); আর যেহেতু সনদে তাঁর নাম উল্লেখ করা হয়নি, তাই মুনযিরীর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থের (৩/ ৪০৫) তিনজন টীকাকার তাঁকে চিনতে পারেননি। এই কারণে তারা তাঁর (আরযামীর) পরিবর্তে তাঁর থেকে বর্ণনাকারী রাবীকে ত্রুটিযুক্ত করেছেন এবং বলেছেন:
‘এতে মুগীরাহ ইবনু বাক্কার আশ-শামী রয়েছেন, যিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)।’
এই ত্রুটিযুক্তকরণ যদিও বাস্তবে সঠিক; কারণ এটি ইবনু আবী হাতিম (৮/ ২১৯) তাঁর পিতা হতে বর্ণনা করেছেন এবং যাহাবী ও আসকালানীও এর সাথে একমত পোষণ করেছেন, তবুও এটি একই সাথে এই ইলম (জ্ঞান) সম্পর্কে উক্ত টীকাকারদের অজ্ঞতার প্রমাণ বহন করে; কারণ ত্রুটিযুক্তকরণের ক্ষেত্রে নিচে নেমে আসা জায়েয নয়, যখন উপরে অন্য একটি ত্রুটি বিদ্যমান থাকে, বিশেষত যদি তা নিচের ত্রুটি অপেক্ষা শক্তিশালী হয় – যেমনটি এখানে ঘটেছে – কিন্তু এটি হলো অজ্ঞতা এবং ইলম ও তাহক্বীক্বের দাবি, যা সম্পর্কে কেউ কেউ ‘আঙ্গুর হওয়ার আগে কিশমিশ হওয়ার চেষ্টা’ বলে মন্তব্য করে! আর আল্লাহই সাহায্যকারী।

আর মুনযিরী (রাহিমাহুল্লাহ) হাদীসটিকে দুর্বল করার ইঙ্গিত দিয়েছেন তাঁর এই উক্তির মাধ্যমে:
‘আর আমর ইবনু শুআইব হতে বর্ণিত হয়েছে...’।
আমি তাঁর (মুনযিরীর) জন্য কামনা করেছিলাম যে, তিনি যেন এর সবচেয়ে শক্তিশালী ত্রুটিটি স্পষ্ট করে দেন; যাতে করে জ্ঞানহীন ব্যক্তিরা এর চেয়ে দুর্বল ত্রুটি নিয়ে আঁকড়ে না ধরে।