হাদীস বিএন


সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ





সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6763)


(قَالَ اللَّهُ: ثَلَاثَةٌ أَنَا خَصْمُهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، [ومن كنت خصمه، خصمته] : رَجُلٌ أَعْطَى بِي ثُمَّ غَدَرَ، وَرَجُلٌ بَاعَ حُرًّا فَأَكَلَ ثَمَنَهُ، وَرَجُلٌ اسْتَأْجَرَ أَجِيرًا، فَاسْتَوْفَى مِنْهُ، وَلَمْ يُعْطِ (وفي رواية: ولم يُوفه) أَجْرَهُ) .
ضعيف.

أخرجه البخاري (2227، 2270) ، ومن طريقه البغوي في ` شرح السنة ` (8/ 265/ 2186) ، وابن ماجه (2442) ، وابن حبان (7295) ، وابن الجارود (579) ، والطحاوي في ` مشكل الآثار ` (4/ 42 1) ، والبيهقي في ` السنن ` (6/ 14، 121) ، وأحمد (2/ 358) ، وأبو يعلى (11/ 444/6571) ، والطبراني في ` المعجم الصغير ` (184 - هند) من طرق عن يحيى بن سليم عن إسماعيل بن أمية عن سعيد بن أبي سعيد [عن أبيه] عن أبي هريرة مرفوعاً. وقال الطبراني:
` لم يروه عن المقبري إلا إسماعيل ين أمية، تفرد به يحيى بن سليم `.
قلت: وهو مختلف فيه، وقد كنت ذكرت شيئاً من أقوالهم فيه تحت هذا الحديث حين كنت خرجته قديماً في ` إرواء الغليل ` (5/ 308 - 311) ، ومِلت
هناك إلى تضعيفه، وذكرت خلاصة منه فيما علقته على كتابي ` مختصر صحيح البخاري ` (2/ 73/ 1050) ، وإن مما حملني على ذلك؛ أني رأيتهم قد نقلوا عن البخاري نفسه أنه قال في يحيى بن سليم - وهو: الطائفي - :
` ما حدث الحميدي عن يحيى بن سليم فهوصحيح `.
وليس هذا من رواية الحميدي عنه، لا عند البخاري، ولا في شيء من المصادر المتقدمة.
ثم إنني ازددت ثقة بضعفه حين انتبهت لاضطراب يحيى في روايته إسناداً ومتناً:
أ - أما الإسناد؛ فرواه الجماعة - كما تقدم - … عن سعيد بن أبي سعيد المقبري عن أبي هريرة.
وقال أبو جعفر النفيلي: … عن سعيد عن أبيه عن أبي هريرة.

أخرجه ابن الجارود، والبيهقي في رواية. ونقل عنه الحافظ في ` الفتح ` (4 / 418) أنه قال:
` والمحفوظ قول الجماعة `.
قلت: لم أطمئن لهذا الحكم لضعف الطائفي، وثقة النفيلي - وهو: (عبد الله ابن محمد) - ، بل هو فوق الثقة، فقد بالغوا في الثناء عليه وعلى حفظه، فقال الذهبي في ` الكاشف `:
` قال أبو داود: ما رأيت أحفظ منه، وكان أحمد يعظمه. وقال ابن وارة: هو من أركان الدين `. وقال الحافظ في ` التقريب `:
` ثقة حافظ `.
فأقول: فمن الواضح جداً أنه إذا دار الأمر بين توهيم الثقة المختلف فيه، وتوهيم الثقة الحافظ المتفق على توثيقه؛ فإن مما لا مرية فيه أن توهيم الأول منهما هو الصواب، ولا سيما إذا كان الراجح أنه ضعيف من قبل حفظه؛ ولذلك قال الحافظ في ` تقريبه `:
` صدوق سيئ الحفظ `. فكيف يصح توهيم جبل الحفظ، وشيخه سيئ الحفظ؟! هذا لا يستقيم أبداً. بل الصواب أن يقال: إن الشيخ كان تارة يذكر في الإسناد: ` عن أبيه ` فحفظه عنه أبو جعفر النفيلى، وتارة لا يذكره فحفظه
الجماعة، وكل حدث بما سمع.
ويؤيد هذا ما يأتي:
ب - أما المتن، فقد اضطرب في حرفين منه:
الأول: فقال مرة: ` لم يعطه `، وهو رواية البخاري فى الموضعين عن شيخين له عنه. وقال الآخرون: ` ولم يوفه `.
فهل يقال: هذا هو المحفوظ؛ لأنه رواية الجماعة، ويوهم شيخا البخاري، أم يقال: كل حفظ ما سمع من الطائفي، وإنما هذا هو الذي كان يضطرب في لفطه، فيقول هذا مرة، وهذا مرة. نعم.
فهذا هوالحق ما به خفاء … فدعني عن بنيات الطريق.
ويؤيده الأمر الآتي، وهو:
الآخر: لم يذكر البخاري وأحمد زيادة: ` ومن كنت خصمه؛ خصمته `،
وهي في رواية ابن حبان، وابن الجارود، وابن ماجه، والبيهقي، وأبي يعلى، والطبراني، والبغوي في رواية له. وهي عند ابن خزيمة أيضاً، كما ذكر الحافظ في ` الفتح `، أخرجوها من طرق عن الطائفي.
ثم استدركت فقلت: هناك اضطراب في جملة أخرى، وهي أن الحديث عند الجماعة حديث قدسي: ` قال الله `. لكن هذا القول لم يثبت عند ابن حبان، وا ن ماجه، وأبي يعلى، والطبراني، فقالوا:
` قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ثلاثة أنا خصمهم يوم القيامة، ومن كنت … ` الحديث. فجعلوه حديثاً نبوياً، وهذا أقرب عندي من حيث التعبير، وأسلوب الكلام. واللة أعلم.
وثمة تنبيهات:
أولاً: عزا المنذري الحديث في ` الترغيب ` (3/ 57/ 1 و 63/ 2) للبخاري وابن ماجه بالزيادة؛ فأوهم أنها عند البخاري أيضاً، فتعقبه الحافظ إبراهيم الناجي في ` عجالة الإملاء ` بقوله (168/ 1) :
` ولا ريب أن هذه الزيادة ليست عند البخاري، إنما هي عند ابن ماجه وابن خزيمة وابن حبان والإسماعيلي، وعزاها النووي في ` شرح المهذب ` إلى أبي يعلى الموصلي فقط، وذكر أنها عنده بإسناد ضعيف `.
قلت: وكذلك وقع في هذا العزو المتكر المعلق على ` مسند أبي يعلى ` (11/ 445) ؛ فإنه لما خرج الحديث للبخاري وابن ماجه وغيرهما؛ `لم يبين الفرق بين روايتيهما، ومثله مما يقع فيه كثيراً هو وغيره من الناشئين في هذا العلم.
ثانياً: لقد فرق النووي في ` شرح المهذب ` (9/ 242) بين أصل الحديث بدون الزيادة؛ فعزاه للبخاري، وبين الزيادة المتقدمة؛ فعزاها لأبي يعلى وحده بإسناد ضعيف. ولم يبين سبب ضعفه لا هو ولا الناجي، لانما هو توهمه أنه تفرد به (سويد بن سعيد) شيخ أبي يعلى! ففاته أنه عند ابن ماجه عن سويد أيضاً، وأنه عند ابن حبان وابن الجارود وغيرهما ممن قرن معهما قبيل الاستدراك، فعلتها علة المزيد عليه وهو (يحيى بن سليم الطائفي) .
ثالثاً: تقدم تصريح الطبراني بتفرد (يحيى) هذا بالحديث، ففيه رد لقول الحافظ في ` مقدمة الفتح `: إن له أصلاً عند البخاري من غير هذا الوجه! وقد رددت عليه هذا ووهماً آخر له في ` الإرواء ` فلا داعي للإعادة، فمن شاء؛ رجع اليه.
رابعاً: أورد المنذري الحديث في مكان ثالث من ` الترغيب ` (4/ 44/ 16) برواية البخاري ولفظه؛ إلا أنه قال:
` فاستوفى منه العمل، ولم يوفه أجره `.
فتعقبه الناجي (ق 202/ 1) بأن لفظ: ` العمل ` ليس عند البخاري.
قلت: ولا عند أحد ممن ذكرنا من المخرجين، وإنما هو مقحم من بعض النساخ، وربما كان على حاشية النسخة كتبت لبيان المراد، فتوهمها بعض النساخ من المتن، فضمها اليه!
وفي النص المذكور خطأ آخر، وهو قوله: ` يوفه `، فهذا لفظ ابن ماجه وغيره، ولفظ البخاري: ` يعطه ` - كما تقدم - . والله سبحانه وتعالى أعلم.
خامساً: من جهل المعلقين الثلاثة على ` الترغيب ` بالفقه أنهم جعلوا حديث الترجمة شاهداً لحديث: ` أعطوا الأجير أجره قبل أن يجف عرقه `! ولا
يخفى الفرق بينهما، فالأول: فيه الأمر بدلالة المفهوم على إعطاء الأجيرأجره كاملاً وافياً غير منقوص، والآخر: فيه الأمر الصريح بالتعجيل بدفع الأجر؛ كما هو ظاهرلكل بصير.
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(আল্লাহ্‌ বলেছেন: তিন প্রকার লোক, কিয়ামতের দিন আমি তাদের প্রতিপক্ষ হব। [আর আমি যার প্রতিপক্ষ হব, তাকে আমি পরাজিত করব]: ১. যে ব্যক্তি আমার নামে ওয়াদা করে তা ভঙ্গ করে, ২. যে ব্যক্তি কোনো স্বাধীন মানুষকে বিক্রি করে তার মূল্য ভক্ষণ করে, এবং ৩. যে ব্যক্তি কোনো শ্রমিককে কাজে লাগিয়ে তার থেকে পূর্ণ কাজ আদায় করে নেয়, কিন্তু তাকে তার মজুরি প্রদান করে না। (অন্য বর্ণনায়: তাকে তার মজুরি পূর্ণভাবে দেয় না)।)
যঈফ (দুর্বল)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (২২২৭, ২২৭০), এবং তাঁর (বুখারীর) সূত্রে বাগাবী তাঁর ‘শারহুস সুন্নাহ’ গ্রন্থে (৮/২৬৫/২১৮৬), ইবনু মাজাহ (২৪৪২), ইবনু হিব্বান (৭২৯৫), ইবনু জারূদ (৫৭৯), ত্বাহাবী তাঁর ‘মুশকিলুল আসার’ গ্রন্থে (৪/৪২১), বাইহাকী তাঁর ‘আস-সুনান’ গ্রন্থে (৬/১৪, ১২১), আহমাদ (২/৩৫৮), আবূ ইয়া'লা (১১/৪৪৪/৬৫৭১), এবং ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুস সাগীর’ গ্রন্থে (১৮৪ - হিন্দ)।

(এঁরা) বিভিন্ন সূত্রে ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু উমাইয়াহ থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ [তাঁর পিতা থেকে] তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

ত্বাবারানী বলেছেন: ‘মাকবুরী থেকে ইসমাঈল ইবনু উমাইয়াহ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি, আর ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: তাঁর (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইমের) ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। আমি এই হাদীসটির অধীনে তাদের কিছু বক্তব্য উল্লেখ করেছিলাম যখন আমি পূর্বে এটিকে ‘ইরওয়াউল গালীল’ গ্রন্থে (৫/৩০৮-৩১১) তাখরীজ করেছিলাম, এবং সেখানে আমি এটিকে যঈফ (দুর্বল) বলার দিকে ঝুঁকেছিলাম। আমি এর একটি সারসংক্ষেপ আমার কিতাব ‘মুখতাসার সহীহুল বুখারী’ (২/৭৩/১০৫০)-এর টীকায় উল্লেখ করেছি। আমাকে এই সিদ্ধান্তে উপনীত হওয়ার কারণগুলোর মধ্যে একটি হলো; আমি দেখেছি যে তারা বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে নিজেই বর্ণনা করেছেন যে তিনি ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম—যিনি ত্বাইফী—সম্পর্কে বলেছেন: ‘আল-হুমাইদী ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম থেকে যা বর্ণনা করেছেন, তা সহীহ।’ কিন্তু এই বর্ণনাটি বুখারীর নিকট বা পূর্বোক্ত কোনো উৎসে আল-হুমাইদী কর্তৃক তাঁর থেকে বর্ণিত নয়।

এরপর আমি যখন ইয়াহইয়ার বর্ণনায় সনদ ও মতন উভয় ক্ষেত্রেই ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা/অস্থিরতা) লক্ষ্য করলাম, তখন এর দুর্বলতা সম্পর্কে আমার আস্থা আরও বেড়ে গেল:

ক - সনদের ক্ষেত্রে; যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে—জামাআত (অধিকাংশ বর্ণনাকারী) এটি বর্ণনা করেছেন সাঈদ ইবনু আবী সাঈদ আল-মাকবুরী থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।

আর আবূ জা'ফর আন-নুফাইলী বলেছেন: ... সাঈদ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।

এটি ইবনু জারূদ এবং বাইহাকী একটি বর্ণনায় উল্লেখ করেছেন। হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (৪/৪১৮) তাঁর থেকে উদ্ধৃত করেছেন যে তিনি বলেছেন: ‘এবং মাহফূয (সংরক্ষিত/সঠিক) হলো জামাআতের (অধিকাংশের) বক্তব্য।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: আমি এই রায়ের উপর সন্তুষ্ট হতে পারিনি, কারণ ত্বাইফী (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম) দুর্বল, আর নুফাইলী—যিনি (আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ)—তিনি সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), বরং তিনি সিকাহ-এর ঊর্ধ্বে। লোকেরা তাঁর এবং তাঁর স্মৃতিশক্তির অত্যধিক প্রশংসা করেছেন। যাহাবী ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘আবূ দাঊদ বলেছেন: আমি তাঁর চেয়ে বড় হাফিয (স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন) দেখিনি, আর আহমাদ তাঁকে অত্যন্ত সম্মান করতেন। ইবনু ওয়ারা বলেছেন: তিনি দ্বীনের স্তম্ভসমূহের একজন।’ আর হাফিয ইবনু হাজার ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), হাফিয।’

সুতরাং আমি বলি: এটা খুবই স্পষ্ট যে, যখন এমন কোনো বিষয় আসে যেখানে মতভেদপূর্ণ সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) বর্ণনাকারীকে ভুল বলা হবে, নাকি সর্বসম্মতভাবে নির্ভরযোগ্য হাফিয (স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন) বর্ণনাকারীকে ভুল বলা হবে; তখন নিঃসন্দেহে প্রথমোক্ত জনকেই ভুল বলা সঠিক। বিশেষত যখন প্রবল মত হলো যে তিনি তাঁর স্মৃতিশক্তির দিক থেকে দুর্বল; এই কারণেই হাফিয ইবনু হাজার তাঁর ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সাদূক (সত্যবাদী), কিন্তু দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী।’ তাহলে কীভাবে স্মৃতিশক্তির পাহাড়তুল্য একজন বর্ণনাকারীকে ভুল বলা যেতে পারে, অথচ তাঁর শাইখ (শিক্ষক) দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী?! এটা কখনোই সঠিক হতে পারে না। বরং সঠিক কথা হলো: শাইখ (ত্বাইফী) কখনো সনদে ‘তাঁর পিতা থেকে’ উল্লেখ করতেন, যা আবূ জা'ফর আন-নুফাইলী মুখস্থ করেছিলেন, আর কখনো তা উল্লেখ করতেন না, যা জামাআত (অধিকাংশ) মুখস্থ করেছিলেন। প্রত্যেকেই যা শুনেছেন, তা বর্ণনা করেছেন। নিচের বিষয়টি এটিকে সমর্থন করে:

খ - আর মতনের ক্ষেত্রে, তিনি এর দুটি শব্দে ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা) করেছেন:

প্রথমটি: তিনি একবার বলেছেন: ‘তাকে প্রদান করেনি’ (لم يعطه), যা বুখারীর দুটি স্থানে তাঁর (ত্বাইফীর) থেকে তাঁর দুজন শাইখের মাধ্যমে বর্ণিত। আর অন্যরা বলেছেন: ‘তাকে পূর্ণভাবে দেয়নি’ (ولم يوفه)।

এখন কি বলা হবে যে, এটিই মাহফূয (সংরক্ষিত/সঠিক); কারণ এটি জামাআতের বর্ণনা, আর বুখারীর দুজন শাইখকে ভুল বলা হবে? নাকি বলা হবে যে, প্রত্যেকেই ত্বাইফীর কাছ থেকে যা শুনেছেন, তা মুখস্থ করেছেন, আর ত্বাইফী নিজেই তাঁর শব্দে অস্থিরতা দেখাতেন, একবার এটা বলতেন, আরেকবার ওটা বলতেন? হ্যাঁ। এটাই সত্য, এতে কোনো গোপনীয়তা নেই... সুতরাং আমাকে অপ্রয়োজনীয় পথ থেকে দূরে রাখুন। নিচের বিষয়টি এটিকে সমর্থন করে, আর তা হলো:

অন্যটি: বুখারী ও আহমাদ এই অতিরিক্ত অংশটি উল্লেখ করেননি: ‘আর আমি যার প্রতিপক্ষ হব, তাকে আমি পরাজিত করব’ (ومن كنت خصمه؛ خصمته)। অথচ এটি ইবনু হিব্বান, ইবনু জারূদ, ইবনু মাজাহ, বাইহাকী, আবূ ইয়া'লা, ত্বাবারানী এবং বাগাবীর একটি বর্ণনায় রয়েছে। হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে যেমন উল্লেখ করেছেন, এটি ইবনু খুযাইমাহর নিকটও রয়েছে। তাঁরা সকলেই ত্বাইফী থেকে বিভিন্ন সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।

এরপর আমি সংশোধন করে বললাম: অন্য একটি বাক্যেও ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা) রয়েছে, আর তা হলো—জামাআতের নিকট হাদীসটি হাদীসে কুদসী: ‘আল্লাহ্‌ বলেছেন’ (قال الله)। কিন্তু এই উক্তিটি ইবনু হিব্বান, ইবনু মাজাহ, আবূ ইয়া'লা এবং ত্বাবারানীর নিকট প্রমাণিত হয়নি। তাঁরা বলেছেন: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: তিন প্রকার লোক, কিয়ামতের দিন আমি তাদের প্রতিপক্ষ হব, আর আমি যার প্রতিপক্ষ হব...’ হাদীসটি। সুতরাং তাঁরা এটিকে হাদীসে নববী বানিয়েছেন। আমার নিকট এটিই অভিব্যক্তির দিক থেকে এবং কথার শৈলীর দিক থেকে অধিকতর নিকটবর্তী। আর আল্লাহ্‌ই সর্বাধিক অবগত।

এবং এখানে কিছু সতর্কতা রয়েছে:

প্রথমত: মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (৩/৫৭/১ এবং ৬৩/২) অতিরিক্ত অংশসহ হাদীসটিকে বুখারী ও ইবনু মাজাহর দিকে সম্পর্কিত করেছেন; ফলে তিনি এই ধারণা দিয়েছেন যে এটি বুখারীর নিকটও রয়েছে। হাফিয ইবরাহীম আন-নাজী তাঁর ‘উজালতুল ইমলা’ গ্রন্থে (১৬৮/১) এই বলে তাঁর সমালোচনা করেছেন: ‘নিঃসন্দেহে এই অতিরিক্ত অংশটি বুখারীর নিকট নেই, বরং এটি ইবনু মাজাহ, ইবনু খুযাইমাহ, ইবনু হিব্বান এবং ইসমাঈলীর নিকট রয়েছে। আর আন-নাবাবী ‘শারহুল মুহাযযাব’ গ্রন্থে এটিকে শুধুমাত্র আবূ ইয়া'লা আল-মাওসিলীর দিকে সম্পর্কিত করেছেন এবং উল্লেখ করেছেন যে তাঁর নিকট এটি দুর্বল সনদে রয়েছে।’ আমি (আল-আলবানী) বলি: আবূ ইয়া'লার ‘মুসনাদ’ (১১/৪৪৫)-এর টীকায় বারবার এই সম্পর্কিতকরণেও একই ভুল ঘটেছে; কারণ যখন তিনি বুখারী, ইবনু মাজাহ এবং অন্যদের জন্য হাদীসটি তাখরীজ করেছেন; তখন তিনি তাঁদের দুজনের বর্ণনার মধ্যে পার্থক্য স্পষ্ট করেননি। এই ইলমের ক্ষেত্রে তাঁর এবং তাঁর মতো নতুনদের দ্বারা প্রায়শই এমন ভুল ঘটে থাকে।

দ্বিতীয়ত: আন-নাবাবী ‘শারহুল মুহাযযাব’ গ্রন্থে (৯/২৪২) অতিরিক্ত অংশ ছাড়া মূল হাদীসটিকে বুখারীর দিকে সম্পর্কিত করে এবং পূর্বোক্ত অতিরিক্ত অংশটিকে আবূ ইয়া'লার দিকে দুর্বল সনদসহ সম্পর্কিত করে উভয়ের মধ্যে পার্থক্য করেছেন। তিনি বা আন-নাজী কেউই এর দুর্বলতার কারণ স্পষ্ট করেননি। কারণ হলো, তিনি (নাবাবী) ধারণা করেছিলেন যে আবূ ইয়া'লার শাইখ (সুওয়াইদ ইবনু সাঈদ) এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন! কিন্তু তিনি ভুলে গেছেন যে এটি ইবনু মাজাহর নিকটও সুওয়াইদ থেকে বর্ণিত হয়েছে, এবং ইবনু হিব্বান ও ইবনু জারূদ এবং অন্যান্যদের নিকটও রয়েছে যাদেরকে সংশোধনের পূর্বে তাদের সাথে যুক্ত করা হয়েছিল। সুতরাং এর দুর্বলতা হলো সেই একই দুর্বলতা যা মূল হাদীসের ক্ষেত্রেও রয়েছে, আর তা হলো (ইয়াহইয়া ইবনু সুলাইম আত-ত্বাইফী)।

তৃতীয়ত: ত্বাবারানীর এই হাদীসটি (ইয়াহইয়া) কর্তৃক এককভাবে বর্ণিত হওয়ার স্পষ্ট ঘোষণা পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। এতে হাফিয ইবনু হাজার ‘ফাতহুল বারী’র ভূমিকায় যে বক্তব্য দিয়েছেন—যে বুখারীর নিকট এই সূত্র ছাড়া অন্য সূত্রে এর মূল রয়েছে—তার খণ্ডন রয়েছে! আমি ‘আল-ইরওয়া’ গ্রন্থে তাঁর এই ভুল এবং তাঁর আরেকটি ভুলের খণ্ডন করেছি, তাই পুনরাবৃত্তির প্রয়োজন নেই। যে কেউ চাইলে সেখানে ফিরে যেতে পারে।

চতুর্থত: মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থের তৃতীয় স্থানে (৪/৪৪/১৬) বুখারীর বর্ণনা ও শব্দে হাদীসটি উল্লেখ করেছেন; তবে তিনি বলেছেন: ‘তার থেকে কাজ পূর্ণভাবে আদায় করে নেয়, কিন্তু তাকে তার মজুরি পূর্ণভাবে দেয় না’ (فاستوفى منه العمل، ولم يوفه أجره)। আন-নাজী (ক ২০২/১) এই বলে তাঁর সমালোচনা করেছেন যে ‘কাজ’ (العمل) শব্দটি বুখারীর নিকট নেই। আমি (আল-আলবানী) বলি: আর আমরা যে সকল মুখাররিজদের (হাদীস সংকলকদের) উল্লেখ করেছি, তাদের কারো নিকটও এটি নেই। বরং এটি কোনো কোনো লিপিকারের দ্বারা অনুপ্রবেশ করানো হয়েছে। সম্ভবত এটি পাণ্ডুলিপির পার্শ্বে উদ্দেশ্য স্পষ্ট করার জন্য লেখা হয়েছিল, আর কিছু লিপিকার এটিকে মতনের অংশ মনে করে এর সাথে যুক্ত করে দিয়েছে! উল্লিখিত পাঠে আরেকটি ভুল রয়েছে, আর তা হলো তাঁর উক্তি: ‘তাকে পূর্ণভাবে দেয়নি’ (يوفه), এটি ইবনু মাজাহ ও অন্যদের শব্দ, আর বুখারীর শব্দ হলো: ‘তাকে প্রদান করেনি’ (يعطه)—যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। আর আল্লাহ্‌ সুবহানাহু ওয়া তা'আলা সর্বাধিক অবগত।

পঞ্চমত: ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থের তিনজন টীকাকার ফিকহ সম্পর্কে অজ্ঞতার কারণে এই শিরোনামের হাদীসটিকে এই হাদীসের শাহেদ (সমর্থক) বানিয়েছেন: ‘শ্রমিকের ঘাম শুকিয়ে যাওয়ার আগেই তাকে তার মজুরি দিয়ে দাও!’ অথচ উভয়ের মধ্যে পার্থক্য গোপন নয়। প্রথমটিতে: (মজুরি না দেওয়ার শাস্তির) মাফহূম (ধারণাগত অর্থ)-এর দালালাত (প্রমাণ) দ্বারা শ্রমিককে তার মজুরি পূর্ণ ও অখণ্ডিতভাবে দেওয়ার নির্দেশ রয়েছে। আর শেষোক্তটিতে: মজুরি দ্রুত পরিশোধ করার স্পষ্ট নির্দেশ রয়েছে; যা প্রত্যেক চক্ষুষ্মান ব্যক্তির নিকট স্পষ্ট।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6764)


(لا ينفع حذر من قدر، والدعاء ينفع مالم ينزل القضاء، وإن البلاء والدعاء ليلتقيان بين السماء والأرض، فيعتلجان إلى يوم القيامة) .
ضعيف جداً () .

أخرجه البزار في ` مسنده ` (2/ 29/ 2164) من طريق إبراهيم بن خُثيم بن عراك بن مالك عن أبيه عن جده عن أبي هريرة مرفوعاً. وقال:
` لا نعلمه عن أبي هريرة إلا بهذا الإسناد `.
قلت: وهو ضعيف جداً؛ إبراهيم بن خثيم: قال النسائي:
` متروك `. وقال أن زرعة.
` منكر الحديث`.
وبه أعله الهيثمي، فقال (7/ 209 و 10/ 146) :
`رواه البزار، وفيه إبراهيم بن خثيم، وهو متروك `.
ثم رواه البزار (2165) ، والحاكم (1/ 492) ، والطبراني في ` الأوسط ` (3/ 242/ 2519) ، و ` الدعاء ` (2/ 2/ 0 80/ 33) ، والخطيب (8/ 453)
() هذا ما حكم به الشيخ رحمه الله أخيراً على هذا الحديث، وكان قد حسنه - قديماً - ؛ انظر `صحيح الجامع ` برقم (7739) . (الناشر) .
من طريق زكريا بن منظور: حدثني عطاف عن هشام عن أبيه عن عائشة مرفوعاً بلفظ:
`لا يغني حذر من قدر، والدعاء ينفع مما نزل، ومما لم ينزل، وان البلاء ينزل فيلقاه الدعاء فيعتلجان إلى يوم القيامة `.
وقال البزار:
` لا نعلمه عن النبي صلى الله عليه وسلم إلا بهذا الإسناد `.
كذا قال! وكأنه نسي، فقد علمه بالإسناد المتقدم عنه له؛ وان كان واهياً، وأظن أن هذا مثله في الوهن، وعلته (زكريا بن منظور) ، وان قال الحاكم عقبه:
`صحيح الإسناد `؛ فقد رده الذهبي بقوله في ` التلخيص `:
` قلت: زكريا مجمع على ضعفه`.
كذا قال! وهو مردود بقول الهيثمي:
` وثقه أحمد بن صالح المصري، وضعفه الجمهور `.
قلت: ووثقه ابن معين في رواية؛ كما في ` التهذيب `. وقال الذهبي في `المغني `:
`ضعفه جماعة، وقال ابن معين: ليس بثقة `. وأما في ` الكاشف ` فاكتفى بقوله:
` لينه أحمد `. ونحوه قول الحافظ في، ` التقريب `:
` ضعيف `.
وأما في ` التلخيص الحبير `؛ فقال عقب الحديث - وقد عزاه للبزار والحاكم - :
` وفي إسناده زكريا بن منظور، وهو متروك `.
وذكر له ابن عدي في ` الكامل ` أحاديث هذا أحدها، ثم قال (3/ 213) :
` ليس له أحاديث أنكر مما ذكرت، وله غيرها غرائب، وهو ضعيف - كما ذكروا - ، إلا أنه يكتب حديثه `.
وقال ابن الجوزي في ` العلل ` (2/ 360) :
` حديث لا يصح، قال يحيى: زكريا ليس بثقة. وقال الدارقطني: متروك `.
(تنبيه) : قوله: ` لا يغني حذر من قدر ` قد صح موقوفاً على ابن عباس، وهو مخرج في ` الضعيفة ` تحت الحديث (5448) .
وقوله صلى الله عليه وسلم: ` الدعاء يرد القضاء `، قد ثبت مرفوعاً عن ثوبان، وهو مخرج في الصحيحة ` (154) .
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(তাকদীর থেকে সতর্কতা কোনো উপকার করে না। আর দু'আ ততক্ষণ পর্যন্ত উপকার করে যতক্ষণ না ফায়সালা (বিপদ) নেমে আসে। আর নিশ্চয়ই বিপদ ও দু'আ আসমান ও যমীনের মাঝে মিলিত হয়, অতঃপর তারা কিয়ামত দিবস পর্যন্ত পরস্পর লড়াই করতে থাকে।)
খুবই যঈফ (দুর্বল) ()।

এটি বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (২/২৯/২১৬৪) ইবরাহীম ইবনু খুসাইম ইবনু ইরাক ইবনু মালিকের সূত্রে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর তিনি (বাযযার) বলেছেন:
‘আমরা আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই সনদ ছাড়া অন্য কোনো সূত্রে এটি জানি না।’
আমি (আলবানী) বলছি: আর এটি খুবই যঈফ (দুর্বল)। ইবরাহীম ইবনু খুসাইম সম্পর্কে নাসায়ী বলেছেন: ‘মাতরূক (পরিত্যক্ত)’। আর আবূ যুর’আ বলেছেন: ‘মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীস বর্ণনাকারী)’।
আর এর মাধ্যমেই হাইসামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি বলেছেন (৭/২০৯ ও ১০/১৪৬):
‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এতে ইবরাহীম ইবনু খুসাইম রয়েছে, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
অতঃপর এটি বাযযার (২১৬৫), হাকিম (১/৪৯২), তাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত’ (৩/২৪২/২৫১৯) এবং ‘আদ-দু’আ’ (২/২/০ ৮০/৩৩) গ্রন্থে এবং খতীব (৮/৪৫৩) বর্ণনা করেছেন।
() এটিই হলো সেই হুকুম যা শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসটির উপর শেষ পর্যন্ত দিয়েছেন। তিনি পূর্বে এটিকে হাসান বলেছিলেন; দেখুন ‘সহীহুল জামি’ হা/নং (৭৭৩৯)। (প্রকাশক)।
যাকারিয়া ইবনু মানযূরের সূত্রে: তিনি বলেন, আমাকে আত্তাফ হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি হিশাম থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে এই শব্দে:
‘তাকদীর থেকে সতর্কতা কোনো উপকার করে না। আর দু’আ যা নেমে এসেছে এবং যা নেমে আসেনি উভয় ক্ষেত্রেই উপকার করে। আর নিশ্চয়ই বিপদ নেমে আসে, অতঃপর দু’আ তার সাথে মিলিত হয়, অতঃপর তারা কিয়ামত দিবস পর্যন্ত পরস্পর লড়াই করতে থাকে।’
আর বাযযার বলেছেন:
‘আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এই সনদ ছাড়া অন্য কোনো সূত্রে এটি জানি না।’
তিনি এমনই বলেছেন! যেন তিনি ভুলে গেছেন। কেননা তিনি এর পূর্বেও এর সনদ জেনেছেন; যদিও তা দুর্বল ছিল। আমি মনে করি দুর্বলতার দিক থেকে এটিও সেটির মতোই। আর এর ত্রুটি হলো (যাকারিয়া ইবনু মানযূর)।
যদিও হাকিম এর পরে বলেছেন: ‘সহীহুল ইসনাদ (সহীহ সনদ)’, কিন্তু যাহাবী তাঁর ‘আত-তালখীস’ গ্রন্থে এই বলে তা প্রত্যাখ্যান করেছেন: ‘আমি (যাহাবী) বলছি: যাকারিয়ার দুর্বলতার উপর ইজমা (ঐকমত্য) রয়েছে।’
তিনি এমনই বলেছেন! আর হাইসামী-এর এই উক্তি দ্বারা এটি প্রত্যাখ্যাত: ‘আহমাদ ইবনু সালিহ আল-মিসরী তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন, আর জুমহূর (অধিকাংশ মুহাদ্দিস) তাকে দুর্বল বলেছেন।’
আমি (আলবানী) বলছি: আর ইবনু মাঈনও এক বর্ণনায় তাকে বিশ্বস্ত বলেছেন; যেমনটি ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে রয়েছে। আর যাহাবী ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘একটি দল তাকে দুর্বল বলেছেন, আর ইবনু মাঈন বলেছেন: সে বিশ্বস্ত নয়।’
আর ‘আল-কাশেফ’ গ্রন্থে তিনি শুধু এই কথাটি উল্লেখ করেছেন: ‘আহমাদ তাকে নরম (দুর্বল) বলেছেন।’ আর এর কাছাকাছি হলো হাফিযের ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থের উক্তি: ‘যঈফ (দুর্বল)।’
আর ‘আত-তালখীসুল হাবীর’ গ্রন্থে; তিনি হাদীসটির পরে - যা তিনি বাযযার ও হাকিমের দিকে সম্পর্কিত করেছেন - বলেছেন: ‘আর এর সনদে যাকারিয়া ইবনু মানযূর রয়েছে, আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
আর ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে তার জন্য কিছু হাদীস উল্লেখ করেছেন, এটি তার মধ্যে একটি। অতঃপর তিনি (৩/২১৩) বলেছেন: ‘আমি যা উল্লেখ করেছি তার চেয়ে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস তার নেই, আর তার অন্যান্য গারীব (অদ্ভুত) হাদীসও রয়েছে। আর সে দুর্বল - যেমনটি তারা উল্লেখ করেছেন - তবে তার হাদীস লেখা যেতে পারে।’
আর ইবনুল জাওযী ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে (২/৩৬০) বলেছেন: ‘হাদীসটি সহীহ নয়। ইয়াহইয়া বলেছেন: যাকারিয়া বিশ্বস্ত নয়। আর দারাকুতনী বলেছেন: মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’
(সতর্কতা): তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাণী: ‘তাকদীর থেকে সতর্কতা কোনো উপকার করে না’ - এটি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি) হিসেবে সহীহ প্রমাণিত হয়েছে, আর এটি ‘আয-যঈফাহ’ গ্রন্থে (৫৪৪৮) নং হাদীসের অধীনে উল্লেখ করা হয়েছে।
আর তাঁর সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর বাণী: ‘দু’আ ফায়সালাকে (বিপদকে) প্রতিহত করে’, এটি সাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে প্রমাণিত হয়েছে, আর এটি ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (১৫৪) নং হাদীসের অধীনে উল্লেখ করা হয়েছে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6765)


(إن نساء بني إسرائيل كن يجعلن هذا في رؤوسهن فلُعِنّ، وحُرَّمَ عليهن المساجد. يعني: قُصَّة) .
ضعيف.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (10/ 360/ 10718) ، و `الأوسط ` (1/ 232/ 256) من طريق سعيد بن عفير قال: حدثنا ابن لهيعة عن أبي الأسود عن عروة بن الزبير عن أبن عباس:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج بقُصة فقال: … فذكره، وقال:
` لم يروه عن عروة عن ابن عباس، إلا أبو الأسود، تفرد به ابن لهيعة ` -
قلت: وهو ضعيف؛ لما عرض له من سوء الحفظ - كما هو معروف - ، وسائر رواته ثقات. وقال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (5/ 169) :
` رواه الطبراني في ` الكبير ` و ` الأوسط `، وفيه ابن لهيعة، وحديثه حسن، وفيه ضعف، وبقية رجاله ثقات `.
(تنبيه) : زعم الدكتور المعلق على` الأوسط ` فقال:
`والحديث قد أخرجه البخاري ومسلم بمعناه من حديث معاوية بن أبي سفيان `.
قلت: لفظ حديث معاوية:
` إنما هلكت بنو إسرائيل حين اتخذ هذه نساؤهم `.
وهو مخرج في ` غاية المرام ` (79 - 80/ 100) برواية الشيخين وغيرهما، وليس فيه - كما ترى - جملة المساجد، لا لفظاً ولا معنى، فقول الدكتور:` بمعناه ` خطأ ظاهر. والله المستعان.
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(নিশ্চয় বনী ইসরাঈলের নারীরা তাদের মাথায় এটা (অর্থাৎ ক্বুসসাহ) ব্যবহার করত, ফলে তারা অভিশাপগ্রস্ত হয়েছিল এবং তাদের জন্য মসজিদসমূহ হারাম করে দেওয়া হয়েছিল। উদ্দেশ্য: ক্বুসসাহ (চুল বা কাপড়ের গোছা))।
যঈফ (দুর্বল)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১০/৩৬০/১০৭১৮) এবং ‘আল-আওসাত্ব’ (১/২৩২/২৫৬)-এ সাঈদ ইবনু উফাইর-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদেরকে ইবনু লাহী'আহ হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূল আসওয়াদ থেকে, তিনি উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে:
যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি ক্বুসসাহ (চুল বা কাপড়ের গোছা) নিয়ে বের হলেন এবং বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন এবং বললেন:
‘আবূল আসওয়াদ ব্যতীত অন্য কেউ উরওয়াহ থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেননি। আর ইবনু লাহী'আহ এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’ -
আমি (আলবানী) বলি: আর তিনি (ইবনু লাহী'আহ) দুর্বল; কারণ তাঁর স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা দেখা দিয়েছিল - যেমনটি সুবিদিত - । তবে এর অন্যান্য বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ)। আর হাইছামী ‘মাজমা‘উয যাওয়ায়েদ’ (৫/১৬৯)-এ বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-কাবীর’ ও ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন। এতে ইবনু লাহী'আহ আছেন, আর তাঁর হাদীস হাসান, তবে এতে দুর্বলতা আছে। আর এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিক্বাহ)।’
(সতর্কতা): ‘আল-আওসাত্ব’-এর টীকাকার ডক্টর দাবি করেছেন এবং বলেছেন:
‘আর এই হাদীসটি বুখারী ও মুসলিম মু‘আবিয়াহ ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে এর অর্থানুসারে বর্ণনা করেছেন।’
আমি (আলবানী) বলি: মু‘আবিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের শব্দ হলো:
‘বনী ইসরাঈল তখনই ধ্বংস হয়েছিল যখন তাদের নারীরা এটা (চুল বা কাপড়ের গোছা) ব্যবহার করেছিল।’
আর এটি ‘গায়াতুল মারাম’ (৭৯-৮০/১০০)-এ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম) এবং অন্যান্যদের বর্ণনায় সংকলিত হয়েছে। আর এতে - যেমনটি আপনি দেখছেন - মসজিদের বাক্যটি নেই, না শাব্দিকভাবে, না অর্থগতভাবে। সুতরাং ডক্টরের ‘এর অর্থানুসারে’ কথাটি সুস্পষ্ট ভুল। আর আল্লাহই সাহায্যকারী।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6766)


(إن ملائكة الله يعرفون بني آدم - أحسبُه قال: ويعرفون أعمالهم - فإذا نظروا إلى عبد يعمل بطاعة الله؛ ذكروه بينهم وسمّوه، وقالوا: أفلح الليلة فلان، نجا الليلة فلان، وإذا نظروا إلى عبد يعمل
بمعصية الله؛ ذكروه بينهم وسمّوه، وقالوا: هلك فلان الليلة) .
ضعيف جداً.

أخرجه البزار في ` مسنده ` (4/ 67/ 4 1 32 - كشف الأستار) قال: حدثنا إسحاق بن سليمان البغدادي الفلوسي قال: ثنا بيان بن حمران:
ثنا سلام عن منصور بن زاذان عن محمد عن أبي هريرة مرفوعاً، وقال:
` وسلام هذا، أحسبه (سلاّم المدائني) ، وهو لين الحديث `.
وأقول: أما أنه (سلام المدائني) فنعم - وهو: الخراساني الطويل - ، وأما أنه ` لين الحديث `، ففيه تسامح كبير؛ وإن أقره ابن كثير في ` البداية ` (1/ 51) ، فقد تعقبه الحافظ ابن حجر في ` مختصر زوائد مسند البزار ` فقال (2/ 451) :
` قلت: بل متروك `. وكذا قال الذهبي في ` المغني `، واتهمه ابن حبان (1/ 339) بالوضع.
والظاهر أن الهيثمي لم يعرفه؛ فقال في ` المجمع ` (10/ 227) :
` رواه البزار، وفيه من لم أعرفهم `!
أقول هذا؛ لأنه لو عرفه؛ لأعله به، ولأغناه ذلك عن إعلاله بجهالة من لم يعرفهم، وليس فيه من يليق أن يقال ما قال سوى (بيان بن حمران) ، والراوي عنه (الفلوسي) ؛ فإني لم أجد لهما ترجمة، ومع أن (الفلوسي) هذا من شرط الخطيب في ` تاريخ بغداد ` فلم أره فيه، ولا أورد نسبته هذه السمعاني في ` الأنساب `، ولا ابن الأثير في ` اللباب `، ولا الفيروز أبادي في ` قاموسه `، ولا شارحه في ` تاجه `. والله أعلم.
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(নিশ্চয় আল্লাহর ফেরেশতাগণ বনী আদমকে চেনেন – আমার ধারণা, তিনি বলেছেন: এবং তাদের আমলসমূহও চেনেন – অতঃপর যখন তারা কোনো বান্দাকে আল্লাহর আনুগত্যের কাজ করতে দেখেন; তখন তারা নিজেদের মধ্যে তার আলোচনা করেন এবং তার নাম ধরে ডাকেন, আর বলেন: অমুক ব্যক্তি আজ রাতে সফল হয়েছে, অমুক ব্যক্তি আজ রাতে মুক্তি পেয়েছে। আর যখন তারা কোনো বান্দাকে আল্লাহর অবাধ্যতার কাজ করতে দেখেন; তখন তারা নিজেদের মধ্যে তার আলোচনা করেন এবং তার নাম ধরে ডাকেন, আর বলেন: অমুক ব্যক্তি আজ রাতে ধ্বংস হয়েছে।)

খুবই যঈফ (দুর্বল)।

এটি বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৪/৬৭/৪১৩২ – কাশফুল আসতার) সংকলন করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন ইসহাক ইবনু সুলাইমান আল-বাগদাদী আল-ফুলূসী, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন বায়ান ইবনু হুমরান: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সালাম, মানসূর ইবনু যাযান থেকে, তিনি মুহাম্মাদ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে। আর তিনি (বাযযার) বলেন:
‘আর এই সালাম, আমার ধারণা তিনি (সালাম আল-মাদাঈনী), আর তিনি ‘লাইয়্যিনুল হাদীস’ (দুর্বল প্রকৃতির বর্ণনাকারী)।’

আমি (আলবানী) বলছি: তিনি যে (সালাম আল-মাদাঈনী) – যিনি হলেন আল-খুরাসানী আত-তাওয়ীল – তা ঠিক। কিন্তু তিনি যে ‘লাইয়্যিনুল হাদীস’ (দুর্বল প্রকৃতির বর্ণনাকারী), এতে অনেক বড় শিথিলতা রয়েছে। যদিও ইবনু কাসীর ‘আল-বিদায়াহ’ (১/৫১)-তে তা স্বীকার করেছেন, কিন্তু হাফিয ইবনু হাজার ‘মুখতাসার যাওয়ায়েদ মুসনাদিল বাযযার’ গ্রন্থে (২/৪৫১) তাঁর সমালোচনা করে বলেছেন: ‘আমি বলছি: বরং সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)।’ অনুরূপভাবে যাহাবীও ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন। আর ইবনু হিব্বান (১/৩৩৯) তাকে জাল (মাওদ্বূ) হাদীস রচনার দায়ে অভিযুক্ত করেছেন।

আর স্পষ্টতই হাইসামী তাকে চিনতে পারেননি; তাই তিনি ‘আল-মাজমা’ (১০/২২৭) গ্রন্থে বলেছেন: ‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন, আর এতে এমন বর্ণনাকারী রয়েছে যাদেরকে আমি চিনি না!’

আমি এই কথা বলছি; কারণ যদি তিনি (হায়সামী) তাকে চিনতেন, তবে তার মাধ্যমেই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত করতেন, আর যাদেরকে তিনি চেনেন না তাদের অজ্ঞাততার কারণে ত্রুটিযুক্ত করার প্রয়োজন হতো না। আর এই সনদে (বায়ান ইবনু হুমরান) এবং তার থেকে বর্ণনাকারী (আল-ফুলূসী) ছাড়া এমন কেউ নেই যার সম্পর্কে তিনি (হায়সামী) এমন কথা বলতে পারেন। কারণ আমি তাদের দুজনের জীবনী খুঁজে পাইনি। যদিও এই (আল-ফুলূসী) খতীবের ‘তারীখে বাগদাদ’ গ্রন্থের শর্তের অন্তর্ভুক্ত, তবুও আমি তাকে সেখানে দেখিনি। আর আস-সাম‘আনী তাঁর ‘আল-আনসাব’ গ্রন্থে, ইবনুল আসীর তাঁর ‘আল-লুবাব’ গ্রন্থে, ফিরোযাবাদী তাঁর ‘ক্বামূস’ গ্রন্থে, কিংবা এর ব্যাখ্যাকার তাঁর ‘তাজ’ গ্রন্থে এই নিসবাত (উপাধি) উল্লেখ করেননি। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6767)


(أكمل المؤمنين إيماناً، أحاسنُهم أخلاقاً. وإن المرء ليكون. مؤمناً، وإن في خُلُقه شيئاً، فينقص ذلك من إيمانه) .
منكر بزيادة الشطر الثاني.

أخرجه ابن نصر في ` تعظيم قدر الصلاة ` (1/442/ 454) من طريق ابن لهيعة: حدثني عيسى بن سِيلان عن أبي هريرة مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ عيسى بن سيلان: أورده البخاري في ` التاريخ `، وابن أبي حاتم في ` كتابه `، ولم يذكرا فيه جرحاً ولا تعديلاً. وذكر الحافظ في ` التهذيب ` (2/ 40) :
` وقال الدارقطني في (ابن سيلان) : قيل: اسمه (عيسى) ، وقيل:
(عبد ربه) ، حديثه يعتبر به. وقال ابن يونس:
عيسى بن سيلان، مكي سكن مصر، روى عن أبي هريرة، روى عنه زيد بن أسلم، وحيوة بن شريح، والليث، وابن لهيعة `.
وفاته أنه ذكره ابن حبان في ` الثقات ` (7/ 231) من رواية عبد الله بن الوليد عنه.
قلت: فإن كان حفظه؛ فهو من تخاليط ابن لهيعة؛ لسوء حفظه الذي كان طرأ عليه، فقد جاء الحديث من طرق ثلاث عن أبي هريرة مرفوعاً دون هذه الزيادة المنكرة، وروي كذلك عن عائشة رضي الله عنها، وهي مخرجة في ` الصحيحة ` (284) .
ولقد كان من تلك الطرق الثلاث، طريق محمد بن عمرو: حدثنا أبو سلمة عن أبي هريرة مرفوعاً بالشطر الأول منه وزيادة:
` وخياركم خياركم لنسائهم `.
وبينت هناك أن إسناده حسن للضعف اليسير الذي في محمد بن عمرو.
ثم وقفت على متابع قوي له، فأحببت أن أقيده هنا؛ ليزداد الحديث الصحيح به قوة على قوة، ويزداد بذلك نكارة حديث الترجمة على نكارة، ألا وهو حصين
- وهو: ابن عبد الرحمن السلمي - عن أبي سلمة به.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (5/ 212/ 4417) : حدثنا عبد الله بن العباس الطيالسي قال: حدثنا عبد الرحيم بن محمد بن زيد السكري (1) ، قال: حدثنا عباد بن العوام عن حصين به.
قلت: وهذا إسناد صحيح، أكثر رجاله من رجال الشيخين؛ عباد فمن فوقه، وقد قال الطبراني عقبه:
` لم يروه عن حصين إلا عباد، تفرد به عبد الرحيم بن محمد السكري `.
قلت: وهو ثقة - كما رواه الخطيب في ` التاريخ ` (11/ 86) عن الدارقطني - .
وعبد الله بن العباس الطيالسي: ترجمه الخطيب (10/ 36 - 37) برواية جماعة من الحفاظ عنه، وقال:
` وكان ثقة `.
ثم روى عن الدارقطني أنه قال:
` لا بأس به `. مات سنة (308) .
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(ঈমানের দিক থেকে মুমিনদের মধ্যে সেই ব্যক্তিই পূর্ণাঙ্গ, যার চরিত্র উত্তম। আর নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি মুমিন হতে পারে, কিন্তু তার চরিত্রে কিছু ত্রুটি থাকে, ফলে তা তার ঈমান থেকে হ্রাস করে দেয়।)
মুনকার (অস্বীকৃত), দ্বিতীয় অংশটির অতিরিক্ত সংযোজনের কারণে।

ইবনু নাসর এটি বর্ণনা করেছেন ‘তা'যীম ক্বদরিস সালাত’ গ্রন্থে (১/৪৪২/৪৫৪), ইবনু লাহী‘আহর সূত্রে: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন ঈসা ইবনু সীলান, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); ঈসা ইবনু সীলানকে ইমাম বুখারী ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে এবং ইবনু আবী হাতিম তাঁর ‘কিতাব’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তারা তার সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা‘দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে (২/৪০) উল্লেখ করেছেন:
‘আর দারাকুতনী (ইবনু সীলান) সম্পর্কে বলেছেন: বলা হয়, তার নাম (ঈসা), আবার বলা হয়: (আব্দু রাব্বিহ), তার হাদীস বিবেচনাযোগ্য। আর ইবনু ইউনুস বলেছেন:
ঈসা ইবনু সীলান, মাক্কী (মক্কার অধিবাসী), মিসরে বসবাস করতেন। তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তার থেকে বর্ণনা করেছেন যায়দ ইবনু আসলাম, হাইওয়াহ ইবনু শুরাইহ, আল-লাইস এবং ইবনু লাহী‘আহ।’
তার (হাফিযের) বাদ পড়েছে যে, ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিক্বাত’ গ্রন্থে (৭/২৩১) উল্লেখ করেছেন, আব্দুল্লাহ ইবনু আল-ওয়ালীদ-এর তার থেকে বর্ণনার সূত্রে।

আমি বলি: যদি সে (ঈসা ইবনু সীলান) স্মরণ রাখতে সক্ষমও হয়; তবে এটি ইবনু লাহী‘আহর ভুলগুলোর অন্তর্ভুক্ত; কারণ তার স্মরণশক্তির দুর্বলতা ছিল যা তার উপর চেপে বসেছিল। এই মুনকার (অস্বীকৃত) অতিরিক্ত অংশটি ব্যতীত হাদীসটি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে তিনটি সূত্রে এসেছে। অনুরূপভাবে তা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে, যা ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে (২৮৪) সংকলিত হয়েছে।

আর সেই তিনটি সূত্রের মধ্যে একটি ছিল মুহাম্মাদ ইবনু আমর-এর সূত্র: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ সালামাহ, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে এর প্রথম অংশ এবং এই অতিরিক্ত অংশসহ:
‘আর তোমাদের মধ্যে উত্তম ব্যক্তি সেই, যে তার স্ত্রীদের জন্য উত্তম।’
আর আমি সেখানে স্পষ্ট করে দিয়েছি যে, মুহাম্মাদ ইবনু আমর-এর মধ্যে সামান্য দুর্বলতা থাকার কারণে এর সনদটি হাসান (উত্তম)।

অতঃপর আমি তার জন্য একটি শক্তিশালী মুতাবা‘ (সমর্থক বর্ণনা) খুঁজে পেয়েছি, তাই আমি এখানে তা লিপিবদ্ধ করতে পছন্দ করলাম; যাতে সহীহ হাদীসটি এর মাধ্যমে আরও শক্তিশালী হয় এবং এর ফলে আলোচ্য হাদীসটির মুনকার হওয়া আরও বৃদ্ধি পায়। আর তিনি হলেন হুসাইন – তিনি হলেন: ইবনু আব্দুর রহমান আস-সুলামী – আবূ সালামাহ থেকে এই সূত্রে।

এটি ত্ববারানী ‘আল-মু‘জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৫/২১২/৪৪০৭) বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু আল-আব্বাস আত-ত্বায়ালিসী, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহীম ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু যায়দ আস-সুক্কারী (১), তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্বাদ ইবনু আল-আওয়াম, তিনি হুসাইন থেকে এই সূত্রে।

আমি বলি: আর এই সনদটি সহীহ (বিশুদ্ধ), এর অধিকাংশ বর্ণনাকারী শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর বর্ণনাকারী; আব্বাদ এবং তার উপরের সবাই। আর ত্ববারানী এর পরে বলেছেন:
‘হুসাইন থেকে আব্বাদ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি। আব্দুর রহীম ইবনু মুহাম্মাদ আস-সুক্কারী এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’
আমি বলি: আর তিনি (আস-সুক্কারী) সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য) – যেমনটি খত্বীব ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে (১১/৮৬) দারাকুতনী থেকে বর্ণনা করেছেন। আর আব্দুল্লাহ ইবনু আল-আব্বাস আত-ত্বায়ালিসী: খত্বীব তার জীবনী (১০/৩৬-৩৭) বর্ণনা করেছেন তার থেকে হাফিযদের একটি দলের বর্ণনার মাধ্যমে, এবং বলেছেন:
‘আর তিনি ছিলেন সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)।’
অতঃপর তিনি দারাকুতনী থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেছেন: ‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’ তিনি (৩০৮) হিজরীতে মৃত্যুবরণ করেন।
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সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6768)


(لا تقولوا: (رمضان) ؛ فإن (رمضان) اسم من أسماء الله تعالى، ولكن قولوا: شهر رمضان) .
باطل.

أخرجه ابن عدي في ` الكامل ` (7/ 53) ، والبيهقي في ` السنن
(1) الأصل (زياد السكونى) وهو خطأ من الناسخ، والتصحيح من ` تاريخ بغداد `.
الكبرى ` (4/ 201) ، والديلمي في ` مسند الفردوس ` (3/ 159) من طريق أبي معشر عن سعيد المقبري عن أبي هريرة مرفوعاً. وقال البيهقي:
` وأبو معشر هو نجيح السندي، ضعفه يحيى بن معين، وكان يحيى القطان لا يحدث عنه، وكان عبد الرحمن بن مهدي يحدث عنه، والله أعلم، وقد قيل: عن أبي معشرعن محمد بن كعب من قوله، وهو أشبه `.
ثم ساق إسناده إلى أبي معشر به، وقال:
` وروي ذاك عن مجاهد والحسن البصري، والطريق إليهما ضعيف `.
وأقول: كل ذلك منكر جداً؛ لأن أسماء الله توقيفية، وهؤلاء الأئمة أجل من أن يقولوا ذلك؛ ولهذا فإني أشك في ثبوت مثله عن أحد من السلف، فقول ابن أبي حاتم عن أبيه في كتابه ` العلل ` (1/ 250) :
` هذا خطأ، إنما هو قول أبي هريرة`! ففيه شيء لا أدري ما هو؟
ثم رأيت ما كشف لي عن العلة، وهي أن مدار الموقوف على أبي هريرة على أبي معشر أيضاً، فقال ابن أبي حاتم في ` تفسير سورة البقرة ` (1/ 118/ 1) :
حدثنا أبي: ثنا محمد بن بكار بن الريان: ثنا أبو معشر عن محمد بن كعب وسعيد عن أبي هريرة: قالا لا تقولوا … الحديث، هكذا ذكره موقوفاً. وكذلك ذكره ابن كثير في` التفسير ` (1/ 216) من رواية ابن أبي حاتم. وهذا مما يؤكد نكارته وعدم حفظ أبي معشر إياه، فتارة يرويه عن سعيد عن أبي هريرة مرفوعاً، وتارة موقوفاً عليه، وأخرى يجعله من قول محمد بن كعب.
والمقصود؛ أن رواية ابن أبي حاتم هذه قد كشفت لي ما كان خافياً، وهو أن
قول أبي حاتم المتقدم:
` إنما هو من قول أبي هريرة ` تساهل منه غير معروف عنه، ما دام أن راويه هو أبو معشر نفسه، وهو مما اتفقوا على ضعفه، وقد عقب عليه ابن كثير بقوله:
` هو نجيح بن عبد الرحمن المدني إمام المغازي والسير، ولكن فيه ضعف، وقد أنكره عليه الحافظ ابن عدي، وهو جدير بالإنكار؛ فإنه متروك، وقد وهم في رفع الحديث (!) ، وقد انتصر البخاري رحمه الله في كتابه لهذا، فقال: ` باب يقال:
رمضان ` وساق أحاديث في ذلك منها: من صام رمضان إيماناً واحتساباً؛ غفر له ما تقدم من ذنبه. ونحو ذلك `.
قلت: وقد أنكره أيضاً الذهبي، فذكره في جملة ما أنكر على أبي معشر، وصرح الحافظ في ` الفتح ` (4/ 113) بأنه:
` حديث ضعيف `. والصواب قول ابن الجوزي في ` الموضوعات ` (2/187) :
` هذا حديث موضوع لا أصل له، وأبو معشر: كان يحيى بن سعيد يضعفه ولا يحدث عنه، ويضحك، إذا ذكره، وقال يحيى بن معين:` إسناده ليس بشيء`.
قلت: ولم يذكرأحد في أسماء الله (رمضان) ، ولا يجوز أن يسمى به إجماعاً، وفي` الصحيحين ` من حديث أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال: إذا دخل رمضان؛ فتحت أبواب الجنة `.
وقد روى ناشب بن عمرو بإسناد له عن ابن عمر مرفوعاً نحوه.

أخرجه تمام في ` الفوائد ` (2/ 162/ 551 - الروض البسام) بإسناده عنه.
وهو منكر الحديث - كما قال البخاري - .
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(তোমরা ‘রামাদান’ বলো না; কারণ ‘রামাদান’ আল্লাহ তাআলার নামসমূহের মধ্যে একটি নাম। বরং তোমরা ‘শাহরু রামাদান’ (রামাদান মাস) বলো।)
বাতিল।

ইবনু আদী এটিকে ‘আল-কামিল’ (৭/৫৩)-এ, বাইহাকী ‘আস-সুনানুল কুবরা’ (৪/২০১)-এ, এবং দাইলামী ‘মুসনাদুল ফিরদাউস’ (৩/১৫৯)-এ আবূ মা’শার হতে, তিনি সাঈদ আল-মাকবুরী হতে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

(১) মূল কিতাবে (যিয়াদ আস-সাকুনী) রয়েছে, যা লিপিকারের ভুল। ‘তারীখে বাগদাদ’ হতে তা সংশোধন করা হয়েছে।

আর বাইহাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘আবূ মা’শার হলেন নুজাইহ আস-সিন্দী। ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন তাকে যঈফ (দুর্বল) বলেছেন। ইয়াহইয়া আল-কাত্তান তার থেকে হাদীস বর্ণনা করতেন না। আর আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী তার থেকে বর্ণনা করতেন। আল্লাহই ভালো জানেন। আর বলা হয়েছে যে, এটি আবূ মা’শার হতে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু কা’ব হতে তাঁর নিজস্ব উক্তি হিসেবে বর্ণনা করেছেন, আর এটিই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ।’

অতঃপর তিনি আবূ মা’শার পর্যন্ত তার সনদ উল্লেখ করে বলেছেন: ‘আর এটি মুজাহিদ ও হাসান আল-বাসরী হতেও বর্ণিত হয়েছে, কিন্তু তাদের উভয়ের দিকে যাওয়ার পথ যঈফ (দুর্বল)।’

আমি (আলবানী) বলছি: এই সব কিছুই অত্যন্ত মুনকার (প্রত্যাখ্যাত); কারণ আল্লাহর নামসমূহ হলো তাওকীফী (কুরআন ও সুন্নাহ দ্বারা নির্ধারিত)। আর এই ইমামগণ এমন কথা বলার চেয়ে অনেক মহান। এই কারণে আমি সন্দেহ করি যে, সালাফদের কারো থেকে এর অনুরূপ কিছু প্রমাণিত হয়েছে কি না। সুতরাং ইবনু আবী হাতিম তার পিতা হতে তার কিতাব ‘আল-ইলাল’ (১/২৫০)-এ যে উক্তি করেছেন: ‘এটি ভুল, এটি তো আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি!’—এর মধ্যে এমন কিছু আছে যা আমি জানি না।

অতঃপর আমি এমন কিছু দেখলাম যা আমার কাছে ত্রুটি (ইল্লাহ) উন্মোচন করে দিয়েছে। আর তা হলো, আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর মাওকূফ (স্থগিত) বর্ণনাটির কেন্দ্রবিন্দুও আবূ মা’শার। সুতরাং ইবনু আবী হাতিম ‘তাফসীরু সূরাতিল বাক্বারাহ’ (১/১১৮/১)-এ বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আমার পিতা: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু বাক্কার ইবনু আর-রাইয়ান: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ মা’শার, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু কা’ব ও সাঈদ হতে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে: তারা উভয়ে বলেছেন: তোমরা বলো না... হাদীসটি। এভাবে তিনি এটিকে মাওকূফ হিসেবে উল্লেখ করেছেন। অনুরূপভাবে ইবনু কাসীরও ‘তাফসীর’ (১/২১৬)-এ ইবনু আবী হাতিমের বর্ণনা হতে এটি উল্লেখ করেছেন। আর এটিই এর মুনকার হওয়া এবং আবূ মা’শারের দুর্বল স্মৃতিশক্তির বিষয়টি নিশ্চিত করে। কারণ, তিনি কখনও এটিকে সাঈদ হতে, তিনি আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেন, আবার কখনও এটিকে তাঁর (আবূ হুরাইরাহ) উপর মাওকূফ করেন, এবং অন্য সময় এটিকে মুহাম্মাদ ইবনু কা’বের উক্তি হিসেবে গণ্য করেন।

উদ্দেশ্য হলো; ইবনু আবী হাতিমের এই বর্ণনাটি আমার কাছে যা গোপন ছিল তা উন্মোচন করে দিয়েছে। আর তা হলো, আবূ হাতিমের পূর্বোক্ত উক্তি: ‘এটি তো আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি’—এটি তার পক্ষ থেকে এমন শিথিলতা যা তার ক্ষেত্রে পরিচিত নয়। কারণ, এর বর্ণনাকারী হলেন সেই আবূ মা’শার নিজেই, যার দুর্বলতার উপর সকলে একমত পোষণ করেছেন।

আর ইবনু কাসীর (রাহিমাহুল্লাহ) এর উপর মন্তব্য করে বলেছেন: ‘তিনি হলেন নুজাইহ ইবনু আব্দুর রহমান আল-মাদানী, মাগাযী ও সীরাতের ইমাম, কিন্তু তার মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে। হাফিয ইবনু আদী তার এই বর্ণনাকে প্রত্যাখ্যান করেছেন। আর এটি প্রত্যাখ্যানের যোগ্য; কারণ তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত)। আর তিনি হাদীসটিকে মারফূ’ করার ক্ষেত্রে ভুল করেছেন (!)। আর ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) তার কিতাবে এর পক্ষে সমর্থন দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: ‘পরিচ্ছেদ: ‘রামাদান’ বলা যায়’ এবং এ বিষয়ে তিনি কয়েকটি হাদীস উল্লেখ করেছেন, তন্মধ্যে একটি হলো: যে ব্যক্তি ঈমান ও ইহতিসাবের সাথে রামাদানের সওম পালন করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে। এবং এর অনুরূপ অন্যান্য হাদীস।’

আমি (আলবানী) বলছি: যাহাবীও এটিকে প্রত্যাখ্যান করেছেন। তিনি আবূ মা’শারের উপর যে সকল বিষয় প্রত্যাখ্যান করা হয়েছে, সেগুলোর মধ্যে এটিকে উল্লেখ করেছেন। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ (৪/১১৩)-এ স্পষ্টভাবে বলেছেন যে, এটি ‘যঈফ হাদীস’। আর সঠিক হলো ইবনু আল-জাওযীর ‘আল-মাওদ্বূ’আত’ (২/১৮৭)-এর উক্তি: ‘এটি একটি মাওদ্বূ’ (জাল) হাদীস, এর কোনো ভিত্তি নেই। আর আবূ মা’শার: ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ তাকে দুর্বল বলতেন এবং তার থেকে হাদীস বর্ণনা করতেন না, আর যখন তার কথা উল্লেখ করা হতো, তখন তিনি হাসতেন। আর ইয়াহইয়া ইবনু মাঈন বলেছেন: ‘এর সনদ কোনো কিছুই নয়।’

আমি (আলবানী) বলছি: আল্লাহর নামসমূহের মধ্যে কেউ ‘রামাদান’ উল্লেখ করেননি, আর ইজমা’ (ঐকমত্য) অনুযায়ী এই নামে আল্লাহকে ডাকা জায়েয নয়। আর ‘সহীহাইন’ (বুখারী ও মুসলিম)-এ আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের হাদীস রয়েছে যে, তিনি বলেছেন: ‘যখন রামাদান প্রবেশ করে, তখন জান্নাতের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়।’

আর নাশিব ইবনু আমর তার একটি সনদসহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ সূত্রে এর অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

তাম্মাম এটিকে ‘আল-ফাওয়াইদ’ (২/১৬২/৫৫১ – আর-রাওদ্বুল বাসসাম)-এ তার সনদসহ তার থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর তিনি (নাশিব) ‘মুনকারুল হাদীস’ (প্রত্যাখ্যাত হাদীসের বর্ণনাকারী) – যেমনটি ইমাম বুখারী বলেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6769)


(يقول الله عز وجل: أنا خلقت العباد بعلمي، فمن أردت به خيرا منحته خلقا حسنا، ومن أردت به شرا، منحته خلقا سيئا) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` مكارم الأخلاق ` (37/ 7) قال: ثنا محمد ابن عبد الله الحضرمي: ثنا محمد بن يوسف الأنباري: ثنا أبي عن يحيى بن أبي أنس المكي عن ابن جريج عن عطاء عن ابن عمرمرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف:
1 - يحيى بن أبي أنس المكي: لم أجد له ذكراً في كتب الرجال التي عندى، ولا في الرواة عن ابن جريج، وذلك يدل على أنه مجهول، لاسيما وقد تفرد برواية هذا الحديث الغريب من بين الأحاديث القدسية، وقد روي نحوه من
قوله صلى الله عليه وسلم بإسناد ضعيف جداً، وقد مضى برقم (3244) .
2 - محمد بن يوسف الأنبار: مثله في الجهالة؛ إلا أن البخاري قد أورده في ` التاريخ ` مختصراً جداً، فقال (3/ 393) :
` محمد بن يوسف الأنباري؛ حدث عن أبي النضر هاشم بن القاسم، روى عنه محمد بن عبد الله مُطَيّن الكوفي`.
وأما أبوه يوسف، فالظاهر أنه المترجم في ` التاريخ ` أيضاً (14/ 298) ، و ` التهذيب `:
` يوسف بن بهلول التميمي، أبو يعقوب الأنباري، نزيل الكوفة … `.
روى عنه جمع منهم البخاري في ` الصحيح `، ولم يذكروا فيهم ابنه (محمد) هذا، مما يدل على جهالته أيضاً. والله أعلم.
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(আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা বলেন: আমি আমার জ্ঞান দ্বারা বান্দাদের সৃষ্টি করেছি। সুতরাং আমি যার জন্য কল্যাণ চাই, তাকে উত্তম চরিত্র দান করি। আর যার জন্য অকল্যাণ চাই, তাকে মন্দ চরিত্র দান করি।)
মুনকার।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘মাকারিমুল আখলাক্ব’ (৩৭/৭) গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-হাদ্বরামী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ আল-আম্বারী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আমার পিতা ইয়াহইয়া ইবনু আবী আনাস আল-মাক্কী থেকে, তিনি ইবনু জুরাইজ থেকে, তিনি আত্বা থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল):

১ - ইয়াহইয়া ইবনু আবী আনাস আল-মাক্কী: আমার নিকট বিদ্যমান রিজাল শাস্ত্রের কিতাবসমূহে আমি তার কোনো উল্লেখ পাইনি, এমনকি ইবনু জুরাইজ থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যেও তার নাম নেই। এটি প্রমাণ করে যে সে মাজহূল (অজ্ঞাত)। বিশেষত, এই ক্বুদসী হাদীসগুলোর মধ্যে সে একাই এই গারীব (অদ্ভুত) হাদীসটি বর্ণনা করেছে। এর কাছাকাছি একটি বর্ণনা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের উক্তি হিসেবে অত্যন্ত যঈফ (দুর্বল) সনদে বর্ণিত হয়েছে, যা ইতিপূর্বে (৩২৪৪) নম্বরে চলে গেছে।

২ - মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ আল-আম্বারী: সেও তার মতোই মাজহূল (অজ্ঞাত)। তবে বুখারী তাকে ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে অত্যন্ত সংক্ষেপে উল্লেখ করেছেন। তিনি (৩/৩৯৩) এ বলেছেন:
‘মুহাম্মাদ ইবনু ইউসুফ আল-আম্বারী; তিনি আবুন নাদ্ব্র হাশিম ইবনুল ক্বাসিম থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন। তার থেকে মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ মুত্বায়্যিন আল-কূফী বর্ণনা করেছেন।’

আর তার পিতা ইউসুফের ক্ষেত্রে, স্পষ্টতই তিনি সেই ব্যক্তি যার জীবনী ‘আত-তারীখ’ (১৪/২৯৮) এবং ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে উল্লেখ করা হয়েছে:
‘ইউসুফ ইবনু বাহলূল আত-তামীমী, আবূ ইয়া’কূব আল-আম্বারী, কূফার বাসিন্দা...।’
তার থেকে একটি দল বর্ণনা করেছেন, যাদের মধ্যে বুখারীও ‘সহীহ’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। কিন্তু তারা তাদের মধ্যে তার এই পুত্র (মুহাম্মাদ)-এর উল্লেখ করেননি, যা তারও (মুহাম্মাদের) মাজহূল হওয়ার প্রমাণ দেয়। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6770)


(لا يحل لمسلم أن يهجر أخاه فوق ثلاث، يلتقيانِ؛ فيعرضُ هذا، ويعرضُ هذا، والذي يبدأ بالسلام يسبق إلى الجنة) .
منكر بزيادة: (السبق) .

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (8/ 425/
7870) قال: حدثنا محمود قال: حدثنا وهب قال: حدثنا خالد عن عبد الله بن عمر عن الزهري عن أنس بن مالك مرفوعاً.
قلت: وهذ! إسناد ضعيف؛ رجاله كلهم ثقات، رجال مسلم؛ غير محمود - وهو: ابن محمد الواسطي - ، وهو محدث كبير، كما قال الذهبي في ` التاريخ `، وقد ترجمه الشيخ الأنصاري في كتابه (ص 325) ، إلا أن (عبد الله بن عمر) وهو العمري المكبر، لم يخرج له مسلم إلا متابعة؛ وذلك؛ لأن في حفظه ضعفاً، وروايته لهذا الحديث بالزيادة المشار إليها آنفآ تؤكد ضعفه؛ فقد رواه مالك، وعنه الشيخان وغيرهما عن الزهري به دونها. ورواه وغيره من طرق أخرى عن الزهري به كذلك.
بل قد جاء الحديث عن جمع من الصحابة دونها، بلغ عددهم في تخريجي له في ` الإرواء ` (7/ 92 - 96) ثمانية، دون حديث أنس، وقد أشار إلى نكارته الحافظ الطبراني بقوله عقب الحديث:
` لم يقل أحد روى هذا الحديث عن الزهري: ` والذي يبدأ بالسلام يسبق إلى الجنة `؛ إلا عبد الله بن عمر `.
والمحفوظ في حديث أبي أيوب الأنصاري عند الشيخين وغيرهما:
` وخيرهما الذي يبدأ بالسلام `.
فالظاهر أن (العمري) أراد هذا فغلبه سوء حفظه، فجاء بتلك الزيادة التي لا أصل لها، فالعجب من ثلاثة من الحفاظ:
أولهم: الحافظ المنذري، فإنه أورده في ` الترغيب ` (3/ 280/ 1) برواية الشيخين، ثم قال:
` ورواه الطبراني، وزاد فيه … ` فذكرها، وسكت عنها!
ثانيهم: الحافظ الهيثمي؛ فإنه أورده في ` المجمع ` (8/ 67) وقال:
` رواه الطبراني في ` الأوسط `، وفيه من لم أعرفهم `!
وليس فيه من لا يعرف؛ كما عرفت.
ثالثهم: الحافظ العسقلاني؛ فإنه قال في ` الفتح ` (10/ 495) :
` زاد الطبري من طريق أخرى عن الزهري: يسبق إلى الجنة `.
قلت: فسكت أيضاً عنه، وما أظنه إلا من طريق العمري، وقول الطبراني صريح في ذلك. والله أعلم.
ومثل هذه الزيادة في النكارة عندي ما رواه عبد الله بن عبد العزيز الليثي في حديث أبي أيوب المشار إليه، فإنه قال: عن ابن شهاب عن عطاء بن يزيد الليثي عنه مرفوعاً نحوه إلا أنه قال مكان جملة: ` وخيرهما … `:
` فإن تكلما، وإلا؛ أعرض الله عز وجل عنهما حتى يتكلما`.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير` (4/ 73 1/ 3957 و 3974) .
وعبد الله بن عبد العزيز الليثي: قال الحافظ في ` التقريب `:
` ضعيف، واختلط بأخرة `.
قلت: وهذا - دون شك أو ريب - من تخاليطه؛ فقد خالف جماعة الثقات الذين رووه عن ابن شهاب باللفظ المتقدم، وقد ساقه الطبراني من طرق عنه (




(কোনো মুসলিমের জন্য তার ভাইকে তিন দিনের বেশি সময় ধরে পরিত্যাগ করা (সম্পর্ক ছিন্ন করা) বৈধ নয়। তারা উভয়ে সাক্ষাৎ করে; তখন এও মুখ ফিরিয়ে নেয়, ওও মুখ ফিরিয়ে নেয়। আর যে ব্যক্তি প্রথমে সালাম দেয়, সে জান্নাতের দিকে এগিয়ে যায়।)
মুনকার (অস্বীকৃত/অগ্রহণযোগ্য) এই অতিরিক্ত অংশটির কারণে: (জান্নাতের দিকে এগিয়ে যায়)।

এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল আওসাত্ব’-এ (৮/ ৪২৫/ ৭৮৭০)। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মাহমূদ, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ওয়াহব, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন খালিদ, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) সূত্রে।

আমি (আল-আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর সকল বর্ণনাকারীই নির্ভরযোগ্য, মুসলিমের বর্ণনাকারী; তবে মাহমূদ ব্যতীত—তিনি হলেন: ইবনু মুহাম্মাদ আল-ওয়াসিত্বী—তিনি একজন বড় মুহাদ্দিস, যেমনটি যাহাবী ‘আত-তারীখ’-এ বলেছেন। শাইখ আল-আনসারীও তাঁর কিতাবে তাঁর জীবনী উল্লেখ করেছেন (পৃষ্ঠা ৩২৫)। তবে (আব্দুল্লাহ ইবনু উমার)—যিনি হলেন আল-উমারী আল-মুকাব্বার—তাঁর থেকে মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) শুধুমাত্র মুতাবা‘আত (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবে হাদীস বর্ণনা করেছেন; কারণ তাঁর স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা ছিল। আর এই হাদীসটি পূর্বে উল্লেখিত অতিরিক্ত অংশসহ তাঁর বর্ণনা তাঁর দুর্বলতাকে নিশ্চিত করে। কেননা, মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এবং তাঁর সূত্রে শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) ও অন্যান্যরা যুহরী থেকে এই অতিরিক্ত অংশটি ছাড়াই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।

এবং অন্যান্যরাও যুহরী থেকে অন্য সূত্রে অনুরূপভাবে এটি বর্ণনা করেছেন। বরং এই অতিরিক্ত অংশটি ছাড়াই বহু সংখ্যক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীসটি এসেছে। ‘আল-ইরওয়া’ (৭/ ৯২-৯৬)-এ আমার তাখরীজ অনুযায়ী আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি বাদে তাদের সংখ্যা আটজন। হাফিয ত্বাবারানী হাদীসটির শেষে তাঁর এই উক্তি দ্বারা এর মুনকার হওয়ার দিকে ইঙ্গিত করেছেন: ‘যারা যুহরী থেকে এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, তাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনু উমার ব্যতীত আর কেউই বলেননি: ‘আর যে ব্যক্তি প্রথমে সালাম দেয়, সে জান্নাতের দিকে এগিয়ে যায়’।’

আর শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) ও অন্যান্যদের নিকট আবূ আইয়ূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে যা সংরক্ষিত আছে, তা হলো: ‘আর তাদের মধ্যে উত্তম হলো সেই ব্যক্তি, যে প্রথমে সালাম দেয়।’ সুতরাং, বাহ্যত মনে হয় যে, (আল-উমারী) এটাই বলতে চেয়েছিলেন, কিন্তু তাঁর দুর্বল স্মৃতিশক্তি তাঁর উপর প্রভাব বিস্তার করেছে, ফলে তিনি এমন একটি অতিরিক্ত অংশ নিয়ে এসেছেন যার কোনো ভিত্তি নেই। তাই তিনজন হাফিযের (স্মৃতিশক্তির অধিকারী মুহাদ্দিসের) ব্যাপারে বিস্ময় জাগে:

প্রথমত: হাফিয আল-মুনযিরী। তিনি এটি ‘আত-তারগীব’ (৩/ ২৮০/ ১)-এ শাইখাইনের বর্ণনা দ্বারা উল্লেখ করেছেন, অতঃপর বলেছেন: ‘আর ত্বাবারানী এটি বর্ণনা করেছেন এবং এতে অতিরিক্ত যোগ করেছেন...’—অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন, কিন্তু এ বিষয়ে নীরব থেকেছেন!

দ্বিতীয়ত: হাফিয আল-হাইছামী। তিনি এটি ‘আল-মাজমা’ (৮/ ৬৭)-এ উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এতে এমন বর্ণনাকারী আছে যাদেরকে আমি চিনি না!’ অথচ এতে এমন কেউ নেই যাকে চেনা যায় না; যেমনটি আপনি জানতে পারলেন।

তৃতীয়ত: হাফিয আল-আসকালানী। তিনি ‘আল-ফাতহ’ (১০/ ৪৯৫)-এ বলেছেন: ‘ত্বাবারী যুহরী থেকে অন্য সূত্রে অতিরিক্ত যোগ করেছেন: সে জান্নাতের দিকে এগিয়ে যায়।’ আমি (আল-আলবানী) বলি: তিনিও এ বিষয়ে নীরব থেকেছেন। আর আমি মনে করি না যে, এটি আল-উমারীর সূত্র ছাড়া অন্য কোনো সূত্র থেকে এসেছে। আর ত্বাবারানীর বক্তব্য এ বিষয়ে সুস্পষ্ট। আল্লাহই ভালো জানেন।

আমার মতে, মুনকার হওয়ার দিক থেকে এই অতিরিক্ত অংশটির মতোই হলো যা আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল আযীয আল-লাইছী আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উল্লেখিত হাদীসে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ইবনু শিহাব থেকে, তিনি আত্বা ইবনু ইয়াযীদ আল-লাইছী থেকে, তিনি তাঁর (আবূ আইয়ূব) থেকে মারফূ’ সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি ‘আর তাদের মধ্যে উত্তম হলো...’ এই বাক্যটির স্থানে বলেছেন: ‘যদি তারা কথা বলে (সম্পর্ক স্থাপন করে), অন্যথায় আল্লাহ তা‘আলা তাদের উভয়ের দিক থেকে মুখ ফিরিয়ে নেন, যতক্ষণ না তারা কথা বলে।’

এটি ত্বাবারানী ‘আল-মু’জামুল কাবীর’-এ (৪/ ৭৩ ১/ ৩৯৫৭ ও ৩৯৭৪) বর্ণনা করেছেন।

আর আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল আযীয আল-লাইছী: হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’-এ বলেছেন: ‘যঈফ (দুর্বল), এবং শেষ বয়সে তিনি ইখতিলাত (স্মৃতিভ্রম) করেছিলেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: এটি—কোনো সন্দেহ বা সংশয় ছাড়াই—তাঁর ইখতিলাতের (স্মৃতিভ্রমের) অন্তর্ভুক্ত। কেননা, তিনি নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের জামা‘আতের বিরোধিতা করেছেন, যারা ইবনু শিহাব থেকে পূর্বোক্ত শব্দে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। আর ত্বাবারানী তাঁর থেকে বিভিন্ন সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6771)


(من حمى عِرض أخيه في الدنيا، بعث الله إليه ملكاً يوم القيامة يحميه من النار) .
ضعيف جداً.

أخرجه ابن أبي الدنيا في ` الصمت ` (135/ 240) ، و` الغيبة والنميمة ` (99/ 105) : حدثنا أبو بلال الأشعري: حدثنا أبو المنقذ القرشي عن شيخ من أهل البصرة عن أنس بن مالك مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد مظلم مسلسل بالعلل، والشيخ البصري متهم، فقد جاء مسمى، فقال الخرائطي في ` مكارم الأخلاق ` (2/ 1 84/ 931) : حدثنا أبو
جعفرأحمد بن يحيى بن مالك السوسي: نا أبو بلال الأشعري: نا أبو منقذ الأشعري، عن أبان بن أبي عياش عن أنس بن مالك به.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً، مسلسل بالعلل:
1 - أبو بلال الأشعري - اسمه: (مرداس بن محمد … ) - : ضعفه الدارقطني والحاكم، وأما ابن حبان فقال في ` الثقات ` (9/ 199) :
`غرب ويتفرد`.
2 - أبو المنقذ الأشعري: لم أعرفه، ولم يورده الذهبي في كتابه ` المقتنى في سرد الكنى ` الأمر الذي تشعر بأنه مجهول غير معروف. ثم رأيته في ` كنى الدولابي ` (2/ 130) وسماه (عبد الرحمن بن ثوب) ، عنه صفوان بن عمرو،
وكذا في ` التاريخ `، و ` الجرح `، و ` الثقات ` (7/ 71) .
3 - أبان بن أبي عياش: متفق على تركه، وروى ابن حبان في ` الضعفاء ` (1/ 92) عن شعبة أنه قال:
` لا يحل الكف عنه؛ فإنه يكذب على رسول الله `.
ولكن الظاهر من عموم ترجمته أنه لم يكن يتعمد الكذب، وإنما يقع ذلك منه؛ لأنه كان من العباد، فأصابته غفلة الصالحين.
وقال المنذري في ` الترغيب ` (3/ 303) :
` رواه ابن أبي الدنيا عن شيخ من أهل البصرة لم يسمه، وأظنه (أبان بن [أبي] عياش) ، وهو متروك، كذا جاء مسمى في رواية غيره `.
قلت: كأنه يشير إلى رواية الخرائطي.
وذكره قبيل هذا من حديث سهل بن معاذ مرفوعاً أتم منه، برواية أبي داود وابن أبي الدنيا، ولم يبين علته، وفيه إسماعيل بن يحيى المعافري - وهو - :
مجهول، وكذا قال الحافظ العراقي في ` تخريج الإحياء ` (2/ 206) بعدما عزاه لأبي داود:
`بسند ضعيف `.
وقد رواه جمع آخر، وهو مخرج في ` المشكاة ` (4986/ التحقيق الثاني) .
وإن من جهل المعلقين الثلاثة على ` الترغيب ` (3/ 133) أنهم أعلوه بقولهم:
` وفيه سهل بن معاذ الجهني؛ ضعيف `! وهو كما قال الحافظ:
` لا بأس به إلا في روايات زبان عنه `. وهذا ليس من رواية زبان، وإنما من رواية إسماعيل المذكور عنه، فهي العلة التي نقلوها منه - بجهل - إلى (سهل) !
والله المستعان.
وإن من تخاليطهم أنهم عزوا حديث الترجمة لمن لم يروه؛ فقالوا تعليقاً عليه (3/502) :
` رواه ابن أبي الدنيا في ` الصمت ` (رقم 242) ، وهو قطعة من حديث، وابن المبارك في ` الزهد ` (686) `!
فأقول: رقم أبن المبارك هذا هو لحديث سهل بن معاذ الذي أشرت إليه آنفاً،
وهو الذي يصدق فيه قولهم: ` هو قطعة من حديث ` دون حديث الترجمة، فهو كامل.
والرقم الذي نسبوه لـ ` الصمت ` خطأ أيضاً، وإنما لحديث آخر عنده (136/ 242) ولبالغ غفلتهم توهموه حديث الترجمة؛ لأنه من رواية شيخ من أهل البصرة - أيضاً - عن أنس مرفوعاً بلفظ: ` إذا وُقع في رجل وأنت في ملأ … ` الحديث.
وقد شاركهم - أو سبقهم - أحد المعلقين إلى بعض أوهامهم - أعني: المعلق على ` الغيبة ` - ؛ فإنه قال في تعليقه على حديث الترجمة:
`أخرجه أبو داود في ` سننه ` (4883) ، وابن المبارك في ` الزهد ` 239 و … و … و … و … والتبريزي في ` المشكاة ` 4986....!.
وهكذا سود عشرة أسطر كل سطر نصف سطر وأقل، كان يمكن طبعها بكل يسر في أربعة أسطر، والسبب واضح وهو (تكبير الصغير) ! على أنه لا فائدة تذكر منها، مع ما فيها من الخطأ إن لم أقل التشبع؛ فإن الأرقام المذكورة هي لحديث سهل، وليس لحديث الترجمة.
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(যে ব্যক্তি দুনিয়াতে তার ভাইয়ের সম্মান রক্ষা করবে, কিয়ামতের দিন আল্লাহ তার কাছে একজন ফেরেশতা পাঠাবেন, যে তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা করবে।)
যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল)।

ইবনু আবিদ দুনইয়া এটি বর্ণনা করেছেন ‘আস-সামত’ (১৩৫/ ২৪০) এবং ‘আল-গীবাহ ওয়ান-নামীমাহ’ (৯৯/ ১০৫)-এ: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ বিলা-ল আল-আশআরী: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আল-মুনকিয আল-কুরাশী, তিনি বসরাহবাসীদের একজন শাইখ থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি অন্ধকারাচ্ছন্ন এবং ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত (মুসালসাল বিল-ইলাল)। আর বসরাহবাসী শাইখটি অভিযুক্ত (মুত্তাহাম)। কেননা তার নাম উল্লেখ করা হয়েছে। আল-খারা-ইতী ‘মাকা-রিমুল আখলা-ক্ব’ (২/ ১৮৪/ ৯৩১)-এ বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ জা‘ফার আহমাদ ইবনু ইয়াহইয়া ইবনু মা-লিক আস-সূসী: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ বিলা-ল আল-আশআরী: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ মুনকিয আল-আশআরী, তিনি আবা-ন ইবনু আবী আইয়া-শ থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীসটি।

আমি বলি: এই সনদটি যঈফ জিদ্দান (খুবই দুর্বল), যা ধারাবাহিক ত্রুটিযুক্ত (মুসালসাল বিল-ইলাল):

১ - আবূ বিলা-ল আল-আশআরী – তার নাম: (মিরদা-স ইবনু মুহাম্মাদ...) – : তাকে দা-রাকুতনী ও আল-হা-কিম যঈফ বলেছেন। আর ইবনু হিব্বা-ন ‘আস-সিক্বাত’ (৯/ ১৯৯)-এ বলেছেন: ‘সে অদ্ভুত (গারীব) হাদীস বর্ণনা করে এবং এককভাবে বর্ণনা করে (ইয়াতাফাররাদ)।’

২ - আবূ আল-মুনকিয আল-আশআরী: আমি তাকে চিনতে পারিনি। আল-যাহাবী তাকে তার কিতাব ‘আল-মুক্বতানা ফী সারদিল কুনা’-তে উল্লেখ করেননি, যা ইঙ্গিত করে যে সে মাজহূল (অজ্ঞাত) ও অপরিচিত। অতঃপর আমি তাকে ‘কুনা আদ-দূলা-বী’ (২/ ১৩০)-তে দেখেছি এবং তিনি তার নাম দিয়েছেন (আব্দুর রহমান ইবনু সাওব), তার থেকে সাফওয়া-ন ইবনু আমর বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে ‘আত-তা-রীখ’, ‘আল-জারহ’ এবং ‘আস-সিক্বাত’ (৭/ ৭১)-এও রয়েছে।

৩ - আবা-ন ইবনু আবী আইয়া-শ: তাকে পরিত্যাগ করার ব্যাপারে ঐকমত্য রয়েছে (মুত্তাফাক্ব ‘আলা- তারকিহি)। ইবনু হিব্বা-ন ‘আদ-দু‘আফা’ (১/ ৯২)-এ শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বলেছেন: ‘তার থেকে বিরত থাকা বৈধ নয়; কারণ সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যা আরোপ করে।’ তবে তার সাধারণ জীবনী থেকে যা প্রতীয়মান হয়, তা হলো সে ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা বলত না, বরং এটি তার দ্বারা ঘটে যেত; কারণ সে ছিল ইবাদতকারী, ফলে নেককারদের অসতর্কতা তাকে পেয়ে বসেছিল।

আর আল-মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৩/ ৩০৩)-এ বলেছেন: ‘ইবনু আবিদ দুনইয়া এটি বসরাহবাসীদের একজন শাইখ থেকে বর্ণনা করেছেন, যার নাম তিনি উল্লেখ করেননি। আমার ধারণা, সে হলো (আবা-ন ইবনু [আবী] আইয়া-শ), আর সে মাতরূক (পরিত্যক্ত)। অনুরূপভাবে অন্যের বর্ণনায় তার নাম উল্লেখ করা হয়েছে।’ আমি বলি: সম্ভবত তিনি আল-খারা-ইতীর বর্ণনার দিকে ইঙ্গিত করছেন।

আর এর ঠিক পূর্বে তিনি সাহল ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে মারফূ‘ হিসেবে এর চেয়ে পূর্ণাঙ্গ একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন, যা আবূ দাঊদ ও ইবনু আবিদ দুনইয়ার বর্ণনায় রয়েছে। তিনি এর ত্রুটি (ইল্লাহ) স্পষ্ট করেননি। এতে ইসমাঈল ইবনু ইয়াহইয়া আল-মা‘আফিরী রয়েছে – আর সে হলো: মাজহূল (অজ্ঞাত)। অনুরূপভাবে আল-হা-ফিয আল-ইরাক্বী ‘তাখরীজুল ইহইয়া’ (২/ ২০৬)-এ আবূ দাঊদের দিকে এর সূত্র উল্লেখ করার পর বলেছেন: ‘দুর্বল সনদ সহকারে।’ এটি অন্য একটি দলও বর্ণনা করেছেন, আর এটি ‘আল-মিশকাত’ (৪৯৮৬/ দ্বিতীয় তাহক্বীক্ব)-এ তাখরীজ করা হয়েছে।

আর ‘আত-তারগীব’ (৩/ ১৩৩)-এর উপর মন্তব্যকারী তিনজনের অজ্ঞতার মধ্যে এটিও যে, তারা এই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত (আ‘আলূহু) বলেছেন এই বলে: ‘এতে সাহল ইবনু মু‘আয আল-জুহানী রয়েছে; সে যঈফ!’ অথচ আল-হা-ফিয যেমনটি বলেছেন: ‘তার দ্বারা কোনো সমস্যা নেই, তবে তার থেকে যাব্বা-নের বর্ণনাসমূহ ছাড়া।’ আর এটি যাব্বা-নের বর্ণনা নয়, বরং এটি তার থেকে উল্লিখিত ইসমাঈলের বর্ণনা। সুতরাং এটিই সেই ত্রুটি যা তারা – অজ্ঞতাবশত – তার থেকে (সাহল)-এর দিকে স্থানান্তরিত করেছে! আল্লাহই সাহায্যকারী।

আর তাদের ভুলগুলোর (তাখা-লীত) মধ্যে এটিও যে, তারা আলোচ্য হাদীসটিকে এমন ব্যক্তির দিকে সম্পর্কিত করেছেন যিনি তা বর্ণনা করেননি; ফলে তারা এর উপর মন্তব্য করতে গিয়ে (৩/ ৫০২)-এ বলেছেন: ‘ইবনু আবিদ দুনইয়া এটি ‘আস-সামত’ (নং ২৪২)-এ বর্ণনা করেছেন, আর এটি একটি হাদীসের অংশ, এবং ইবনুল মুবা-রাক ‘আয-যুহদ’ (৬৮৬)-এ বর্ণনা করেছেন!’

আমি বলি: ইবনুল মুবা-রাকের এই নম্বরটি হলো সাহল ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সেই হাদীসের জন্য যা আমি ইতোপূর্বে ইঙ্গিত করেছি, আর এটিই সেই হাদীস যার ক্ষেত্রে তাদের উক্তি: ‘এটি একটি হাদীসের অংশ’ সত্য, আলোচ্য হাদীসটির ক্ষেত্রে নয়, কারণ এটি পূর্ণাঙ্গ।

আর ‘আস-সামত’-এর দিকে তারা যে নম্বরটি সম্পর্কিত করেছেন, সেটিও ভুল। বরং সেটি তার কাছে থাকা অন্য একটি হাদীসের জন্য (১৩৬/ ২৪২)। আর তাদের চরম অসতর্কতার কারণে তারা এটিকে আলোচ্য হাদীস মনে করেছে; কারণ এটিও বসরাহবাসীদের একজন শাইখ থেকে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে মারফূ‘ হিসেবে এই শব্দে বর্ণিত: ‘যখন কোনো ব্যক্তির নিন্দা করা হয় আর তুমি একটি মজলিসে উপস্থিত থাকো...’ হাদীসটি।

আর তাদের ভুলগুলোর কিছু অংশে তাদের সাথে একজন মন্তব্যকারীও অংশ নিয়েছেন – অথবা তাদের চেয়ে এগিয়ে গেছেন – আমি ‘আল-গীবাহ’ কিতাবের মন্তব্যকারীর কথা বলছি – কেননা তিনি আলোচ্য হাদীসের উপর তার মন্তব্যে বলেছেন: ‘এটি আবূ দাঊদ তার ‘সুনান’ (৪৮৮৩)-এ, ইবনুল মুবা-রাক ‘আয-যুহদ’ ২৩৯-এ এবং... এবং... এবং... এবং... এবং আত-তাবরীযী ‘আল-মিশকাত’ ৪৯৮৬-এ বর্ণনা করেছেন...!’ এভাবে তিনি দশটি লাইন কালো করেছেন, যার প্রতিটি লাইন আধা লাইন বা তার চেয়ে কম ছিল, যা খুব সহজে চারটি লাইনে ছাপানো যেত। কারণ স্পষ্ট, আর তা হলো (ছোটকে বড় করা)! উপরন্তু, এতে উল্লেখযোগ্য কোনো উপকারিতা নেই, বরং এতে ভুল রয়েছে, যদি না আমি বলি যে এটি অতিরিক্ত (আশ-তাশাব্বু‘); কারণ উল্লিখিত নম্বরগুলো সাহল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের জন্য, আলোচ্য হাদীসের জন্য নয়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6772)


(يدخل عليكم رجل من أهل الجنة، فدخلَ سعد. قال ذلك في ثلاثة أيام، كل ذلك يدخلُ سعد) .
ضعيف.

أخرجه البزار في ` مسنده ` (2/ 1982 و 3/ 208/ 2582 - كشف الأستار) : حدثنا محمد بن المثنى: نا عبد الله بن قيس: ثنا أيوب عن نافع عن ابن عمرمرفوعاً.
وخولف البزار في لفظه؛ فقال ابن حبان في ` صحيحه ` (7/ 66/ 6952) :
أخبرنا الحسن بن سفيان: حدثنا محمد بن المثنى: حدثنا عبد الله بن عيسى
(كذا) الرقاشي: حدثنا أيوب بلفظه؛ الا أنه قال:
(قال: وليس منا أحد إلا وهو يتمنى أن يكون من أهل بيته، فإذا سعد بن أبي وقاص قد طلع `.
وهكذا رواه العقيلي في ` الضعفاء` قال: حدثنا محمد بن زكريا قال: حدثنا محمد بن المثنى به.
ذكره في ترجمة (عبد الله بن قيس الرقاشي) ، وقال:
` حديثه غير محفوظ، ولا يتابع عليه، ولا يعرف إلا به `.
ونقله الذهبي ثم العسقلاني عنه في ` الميزان ` و ` اللسان `، إلا أنهما أعلاه بقولهما:
` لكن فيه الغلابي `. يشيران إلى شيخ العقيلي (محمد بن زكريا) ، وخفي عليهما متابعة البزار والحسن بن سفيان إياه، وقال البزار:
` لا نعلم رواه عن أيوب إلا عبد الله بن قيس، ولم نسمعه إلا من أبي موسى عنه `.
قلت: أبو موسى - محمد بن المثنى - : ثقة من رجال الشيخين، وكذلك من فوقه؛ إلا (عبد الله بن قيس) ، فهو العلة - كما تقدم عن العقيلي والذهبي والعسقلاني - ، وأما ابن حبان فأورده في ` الثقات `، وقال (8/ 334) .
`عبد الله بن عيسى الرقاشي، من أهل البصرة، يروي عن أيوب السختياني، روى عنه محمد بن موسى الحرشي، والبصريون، يخطئ ويخالف `.
هكذا سمى أباه (عيسى) ، وكذلك وقع له في إسناد الحديث - كما مر - .
وقوله: `روى عنه محمد بن موسى الحرشي` أخشى أن يكون وهماً صوابه (محمد ابن المثنى العنزي) . والله أعلم.
(تنبيه) : حاول بعض المعلقين تقوية الحديث، فقال:
` وله شاهد من حديث أنس مطولاً عند أحمد (3/ 166) ، والبزار (1981) من طريقين عن الزهري عن أنس … `.
فأقول: الطريق الأولى رجالها ثقات رجال الشيخين؛ لكن ليس فيه تسمية سعد، بخلاف الطريق الأخرى وهي عند البزار فقط (2/ 409 - 410/ كشف الأستار) ؛ لكن فيها ابن لهيعة وهو سيئ الحفظ، وذكره سعداً فيها من تخاليطه، ومخالف لرواية غيره من الثقات، فإنه قال: ` رجل من الأنصار `. وسعد من المهاجرين - كما هو معلوم - .
ثم انه معلول بأن بين الزهري وأنس رجلاً لم يسم - كما حققته في` ضعيف الترغيب ` (23 - الأدب/ 21) - ، ولو صح؛ فشهادته قاصرة؛ على أن سعداً من أهل الجنة، وهذا صحيح، يشهد له حديث عبد الرحمن بن عوف في العشرة المبشرين بالجنة، وهو مخرج في ` تخريج الطحاوية ` (488 - 489) .
وأما قوله في الحديث:
`قال ذلك ثلاثة أيام … ` أو ` وليس منا أحد … ` إلخ، فلا شاهد له، فليعلم.
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"(তোমাদের নিকট জান্নাতী একজন লোক প্রবেশ করবে, অতঃপর সা'দ প্রবেশ করলেন। তিনি তিন দিন পর্যন্ত এই কথা বললেন, আর প্রতিবারই সা'দ প্রবেশ করলেন)।

যঈফ (দুর্বল)।

এটি বাযযার তাঁর ‘মুসনাদ’-এ (২/১৯৮২ ও ৩/২০৮/২৫৮২ - কাশফুল আসতার) বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আইয়ূব, তিনি নাফি’ হতে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে মারফূ’ সূত্রে।

আর বাযযারের বর্ণনার শব্দে ভিন্নতা রয়েছে; কেননা ইবনু হিব্বান তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে (৭/৬৬/৬৯৫২) বলেছেন:
আমাদের নিকট খবর দিয়েছেন আল-হাসান ইবনু সুফইয়ান: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ঈসা (এভাবেই) আর-রাক্বাশী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আইয়ূব, একই শব্দে; তবে তিনি বলেছেন:
"(তিনি বললেন: আমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই যে তার পরিবারের অন্তর্ভুক্ত হতে চায় না, অতঃপর সা’দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস আগমন করলেন)।"

আর এভাবেই এটি আল-উক্বাইলী তাঁর ‘আয-যু’আফা’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু যাকারিয়া, তিনি বলেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না, এই সূত্রে।
তিনি এটি (আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স আর-রাক্বাশী)-এর জীবনীতে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
"তার হাদীস সংরক্ষিত নয়, এবং এ বিষয়ে তার কোনো মুতাবা’আত (সমর্থন) নেই, আর তাকে কেবল এর মাধ্যমেই জানা যায়।"

আর আয-যাহাবী অতঃপর আল-আসক্বালানী এটি তাঁর থেকে ‘আল-মীযান’ ও ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে নকল করেছেন, তবে তারা উভয়েই এই বলে এর ত্রুটি বর্ণনা করেছেন:
"কিন্তু এতে আল-গাল্লাবী রয়েছে।" তারা উভয়েই আল-উক্বাইলীর শায়খ (মুহাম্মাদ ইবনু যাকারিয়া)-এর দিকে ইঙ্গিত করেছেন। আর বাযযার ও আল-হাসান ইবনু সুফইয়ানের মুতাবা’আত (সমর্থন) তাদের কাছে গোপন ছিল। আর বাযযার বলেছেন:
"আমরা জানি না যে আইয়ূব হতে আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেছেন, আর আমরা আবূ মূসা হতে তার সূত্রে ব্যতীত এটি শুনিনি।"

আমি (আলবানী) বলি: আবূ মূসা - মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না - শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর রাবীগণের অন্তর্ভুক্ত, তিনি সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য)। আর তার উপরের রাবীগণও অনুরূপ; তবে (আব্দুল্লাহ ইবনু ক্বায়স) ব্যতীত, তিনিই ত্রুটি - যেমনটি আল-উক্বাইলী, আয-যাহাবী ও আল-আসক্বালানী হতে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিক্বাত’ (নির্ভরযোগ্য রাবীগণ)-এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন (৮/৩৩৪):
"আব্দুল্লাহ ইবনু ঈসা আর-রাক্বাশী, তিনি বাসরাহ’র অধিবাসী, তিনি আইয়ূব আস-সাখতিয়ানী হতে বর্ণনা করেন। তার থেকে মুহাম্মাদ ইবনু মূসা আল-হারশী এবং বাসরার লোকেরা বর্ণনা করেছেন। তিনি ভুল করেন এবং বিরোধিতা করেন।"
এভাবেই তিনি তার পিতার নাম (ঈসা) উল্লেখ করেছেন, আর হাদীসের ইসনাদেও তার ক্ষেত্রে এভাবেই এসেছে - যেমনটি পূর্বে উল্লেখ হয়েছে।
আর তার উক্তি: "তার থেকে মুহাম্মাদ ইবনু মূসা আল-হারশী বর্ণনা করেছেন" - আমি আশঙ্কা করি যে এটি ভুল, এর সঠিক হলো (মুহাম্মাদ ইবনুল মুসান্না আল-আনাযী)। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

(সতর্কীকরণ): কিছু ভাষ্যকার হাদীসটিকে শক্তিশালী করার চেষ্টা করেছেন। তারা বলেছেন:
"আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দীর্ঘ হাদীস হতে এর একটি শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে, যা আহমাদ (৩/১৬৬) এবং বাযযার (১৯৮১) যুহরী হতে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে দু’টি সনদে বর্ণনা করেছেন..."।
অতঃপর আমি (আলবানী) বলি: প্রথম সনদের রাবীগণ শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর নির্ভরযোগ্য রাবীগণ; কিন্তু এতে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ নেই। এর বিপরীতে অন্য সনদটি কেবল বাযযারের নিকট রয়েছে (২/৪০৯-৪১০/ কাশফুল আসতার); কিন্তু এতে ইবনু লাহী’আহ রয়েছে, আর তিনি দুর্বল স্মৃতিশক্তির অধিকারী। আর এতে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করা তার ভুলগুলোর অন্তর্ভুক্ত। আর এটি অন্যান্য নির্ভরযোগ্য রাবীগণের বর্ণনার বিরোধী, কেননা তিনি বলেছেন: "আনসারদের একজন লোক"। অথচ সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুহাজিরদের অন্তর্ভুক্ত - যেমনটি সুবিদিত।

অতঃপর এটি ত্রুটিযুক্ত, কারণ যুহরী ও আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাঝে একজন রাবী রয়েছে যার নাম উল্লেখ করা হয়নি - যেমনটি আমি ‘যঈফুত তারগীব’ (২৩ - আল-আদাব/২১)-এ তাহক্বীক্ব করেছি। আর যদি এটি সহীহও হতো; তবে এর শাহেদ (সমর্থন) কেবল এইটুকুর উপর সীমাবদ্ধ যে, সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জান্নাতী। আর এটি সহীহ, যার পক্ষে ‘আশারাহ মুবাশশারাহ বিল-জান্নাহ’ (জান্নাতের সুসংবাদপ্রাপ্ত দশজন)-এর অন্তর্ভুক্ত আব্দুর রহমান ইবনু ‘আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সাক্ষ্য দেয়, যা ‘তাখরীজুত তাহাবিয়্যাহ’ (৪৮৮-৪৮৯)-এ সংকলিত হয়েছে।
আর হাদীসে তার উক্তি: "তিনি তিন দিন পর্যন্ত এই কথা বললেন..." অথবা "আমাদের মধ্যে এমন কেউ নেই..." ইত্যাদি অংশের কোনো শাহেদ নেই। এটি যেন জানা থাকে।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6773)


(من رد حديثاً بلغه عني؛ فأنا مخاصمه يوم القيامة، وإذا بلغكم عني حديث ولم تعرفوه؛ فقولوا: الله أعلم) .
منكر.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` (6/321/6163) : حدثنا بكر بن محمد القزاز البصري: ثنا اسحاق بن إبراهيم بن كالب السلمي: حدثني محمد بن عبد الرحمن بن عبد الله أبو بكر العبدي عن اسحاق بن يونس بن سعد عن هلال الوزان عن سعيد بن المسيب عن سلمان رضي الله عنه مرفوعاً:
` من كذب علي متعمدأ؛ فليتبوأ بيتاً في النار، ومن رد … ` الحديث.
وهذا الطرف الأول فقط، رواه الإسماعيلي في` معجم شيوخه ` (ق 73/ 1) بإسناد المصنف. ورواه هذا به في ` طرق حديث من كذب علي متعمداً` (160/ 167 - تحقيق الأخ علي الحلبي) مضيفاً إلى هذا الطرف الجملة الثانية بلفظ:
` ومن رد حديثاً بلغه عني، فليتبوأ بيتاً في النار `!
هكذا بتكرار قوله ` فليتبوأ … `، وأظنه خطأ من الطابع أو الناسخ؛ فإنه مخالف للسياق الذي نقلته من ` المعجم الكبير `، ولسياقه في ` الجامع الكبير ` للسيوطي معزواً لـ (طب) ، وكذا في `مجمع الزوائد` (1/ 147) ؛ إلا أنه ذكر بين يديه جملة التعمد فقط، وقال:
`رواه الطبراني في ` الكبير `، وإسناده من قبل هلال الوزان لم أجد من ذكرهم، وكذلك الحديث الآتي`. ثم ساقه بتمامه، وقال:
` رواه الطبراني في ` الكبير ` `. وجاء في التعليق عليه ما نصه:
` وفي إسناده هلال أيضاً. هامش `.
قلت: وفيما ذكر نظر.
أولاً: - لم يرو الطبراني جملة التعمد فقط عن سلمان الفارسي، لا بهذا الإسناد، ولا بغيره، وهي مع ذلك متواترة عنه صلى الله عليه وسلم.
ثانياً: وأنا أيضاً لم أعرف أحداً ممن دون (هلال الوزان) ، ومن جملتهم شيخ الطبراني (بكر بن محمد القزاز البصري) ، وقد روى له في ` المعجم الصغير ` حديثاً آخر، وكناه بـ (أبو عمر المعدل) ، (




(যে ব্যক্তি আমার পক্ষ থেকে পৌঁছানো কোনো হাদীস প্রত্যাখ্যান করবে; কিয়ামতের দিন আমি তার সাথে ঝগড়া করব। আর যখন তোমাদের কাছে আমার পক্ষ থেকে কোনো হাদীস পৌঁছাবে এবং তোমরা তা চিনতে পারবে না; তখন তোমরা বলবে: আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।)
মুনকার।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ গ্রন্থে (৬/৩২১/৬১৬৩) বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন বাকর ইবনু মুহাম্মাদ আল-কায্যায আল-বাসরী: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন ইসহাক ইবনু ইবরাহীম ইবনু কালিব আস-সুলামী: আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু আবদির রহমান ইবনু আব্দুল্লাহ আবূ বাকর আল-আবদী, তিনি ইসহাক ইবনু ইউনুস ইবনু সা'দ থেকে, তিনি হিলাল আল-ওয়ায্‌যান থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু আল-মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে:
‘যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করবে; সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়, আর যে ব্যক্তি প্রত্যাখ্যান করবে...’ (সম্পূর্ণ) হাদীসটি।

আর এটি শুধু প্রথম অংশ, যা আল-ইসমাঈলী তাঁর ‘মু'জামু শুয়ূখিহী’ গ্রন্থে (ক্বাফ ৭৩/১) মূল লেখকের (ত্ববারানীর) সনদেই বর্ণনা করেছেন। আর তিনি (ত্ববারানী) এটি তাঁর ‘তুরুকু হাদীসি মান কাযাবা ‘আলাইয়্যা মুতা‘আম্মিদান’ গ্রন্থে (১৬০/১৬৭ - ভাই আলী আল-হালাবীর তাহক্বীক্ব) এই অংশের সাথে দ্বিতীয় বাক্যটি যোগ করে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন:
‘আর যে ব্যক্তি আমার পক্ষ থেকে পৌঁছানো কোনো হাদীস প্রত্যাখ্যান করবে, সে যেন জাহান্নামে তার ঠিকানা বানিয়ে নেয়!’
এভাবে ‘ফালিয়াতাবাওওয়া...’ (সে যেন ঠিকানা বানিয়ে নেয়...) কথাটি পুনরাবৃত্তি সহকারে এসেছে। আমি মনে করি এটি মুদ্রক বা লিপিকারের ভুল; কারণ এটি ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ থেকে আমি যা উদ্ধৃত করেছি তার বর্ণনার সাথে সাংঘর্ষিক, এবং আস-সুয়ূত্বী তাঁর ‘আল-জামি'উল কাবীর’ গ্রন্থে (ত্ববারানীর দিকে সম্বন্ধযুক্ত করে) যে বর্ণনা দিয়েছেন তার সাথেও সাংঘর্ষিক। অনুরূপভাবে ‘মাজমা'উয যাওয়াইদ’ গ্রন্থেও (১/১৪৭);
তবে তিনি (আল-হায়সামী) এর আগে শুধু ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা বলার বাক্যটি উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন:
‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, আর এর সনদ হিলাল আল-ওয়ায্‌যানের দিক থেকে যাদের উল্লেখ করা হয়েছে, আমি তাদের কাউকে পাইনি। অনুরূপভাবে পরবর্তী হাদীসটিও।’
অতঃপর তিনি (আল-হায়সামী) এটি সম্পূর্ণ বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।’ আর এর উপর টীকায় যা এসেছে তা হলো: ‘এর সনদে হিলালও রয়েছে। (পাদটীকা)।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: যা উল্লেখ করা হয়েছে তাতে পর্যালোচনার অবকাশ রয়েছে।
প্রথমত: ত্ববারানী সালমান আল-ফারিসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শুধু ইচ্ছাকৃতভাবে মিথ্যা বলার বাক্যটি বর্ণনা করেননি, না এই সনদে, না অন্য কোনো সনদে। যদিও এই বাক্যটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে মুতাওয়াতির সূত্রে বর্ণিত।
দ্বিতীয়ত: আমিও (হিলাল আল-ওয়ায্‌যান)-এর নিচের স্তরের বর্ণনাকারীদের কাউকে চিনতে পারিনি, যাদের মধ্যে ত্ববারানীর শায়খ (বাকর ইবনু মুহাম্মাদ আল-কায্যায আল-বাসরী)-ও রয়েছেন। ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুস সাগীর’ গ্রন্থে তাঁর থেকে অন্য একটি হাদীস বর্ণনা করেছেন এবং তাঁকে (আবূ উমার আল-মু'আদ্দাল) কুনিয়াত দ্বারা উল্লেখ করেছেন। (")









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6774)


(من كذب عليّ متعمداً، أو رد شيئاً أمرت به؛ فليتبوأ بيتاً في جهنم) .
منكر جداً بذكر: (الرد) .

أخرجه أبو يعلى في ` المسند ` (1/ 74 - 75/ 73) ، و ` معجم شيوخه ` (ق 31/ 1) : حدثنا عمرو بن مالك: حدثنا جارية
ابن هرم الفقيمي قال: حدثني عبد الله بن دارم: حدثنا عبد الله بن بُسر الحبراني، قال: سمعت أبا كبشة الأنماري - وكان له صحبة - يحدث عن أبي بكر الصديق مرفوعاً.
وأخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (3/ 0 40/ 2859) ، وابن عدي في ` الكامل ` (2/ 175) من طرق عن عمرو بن مالك الراسبي به. وقال الطبراني:
` لا يروى إلا بهذا الإسناد، تفرد به عمرو بن مالك`.
قلت: وهو كذاب، كما قال البخاري، وأشار ابن عدي إلى أنه كان يسرق الحديث، فقال عقب الحديث في ترجمة (جارية بن هرم) :
` يقال: إنه حديث يحيى بن بسطام، وان الباقين الذين رووه عن جارية سرقوه منه`. وجارية هذا: قال الذهبي في ` المغني `:
` متروك واه، قال الدارقطني: ضعيف `.
وصدر ابن عدي ترجمته بما رواه عن علي بن المديني قال:
` كان رأساً في القدر، وكان ضعيفاً في الحديث، كتبنا عنه؛ ثم تركناه`.
وختمها بقوله:
` أحاديثه كلها مما لا يتابعه الثقات عليها `. ولذلك قال الذهبي في حديثه هذا، وتبعه العسقلاني:
` هذا حديث منكر `. وقال الهيثمي في ` المجمع ` (1/ 142) :
` رواه أبو يعلى والطبراني في ` الأوسط `، وفيه جارية بن الهرم الفقيمي، وهو متروك الحديث `.
قلت: وشيخه (عبد الله بن دارم) : لم أعرفه.
وعبد الله بن بسر الحبراني: قال الذهبي:
`ضعفوه `.
فهو إسناد مسلسل بالعلل.
(تنبيه) : من الحداثة في هذا العلم وقلة التحقيق فيه، قول المعلق على ` مسند أبي يعلى `؛ بعد أن صدر تخريجه للحديث بقوله: ` إسناده تالف `، وتكلم على رواته، وختمه بقول الهيثمي المذكور، استدرك قائلاً:
`ولكن معناه صحيح، فقد عده الإدريسي في ` نظم المتناثر في الحديث المتواتر ` ص 20 من الأحاديث المتواترة، وقد خرجناه في ` سير أعلام النبلاء ` (1/ 43 - 44) عن عدة من الصحابة`،!
فأقول: كل من يقف على هذا الاستدراك من عامة القراء لا يفهم منه إلا أن الحديث بتمامه هو المتواتر، وهذا ليس بصحيح بداهة؛ لذلك كان عليه أن يبين أن المتواتر إنما هو:
` من كذب علي متعمداً؛ فليتبوأ مقعده من النار `.
كما تقدم مني في الحديث الذي قبله، وفي غيره، مثل ` صحيح الجامع الصغير `، وما خرجت الحديث هنا إلا لبيان الفرق بينه وبين ما تواتر منه، خشية الاغترار بتخريج السيوطي إياه في ` مفتاح الجنة ` (ص 38) وسكوته عليه،
وتعليق المشار إليه آنفاً، و` الدين النصيحة `؛ كما قال صلى الله عليه واله وسلم.
ومثل هذا الحديث في النكارة، وأنه لا يجوز أن يعلق عليه بما تقدم من المشار إليه:
` من كذب علي متعمداً ليضل به الناس؛ فليتبوأ مقعده من النار`.
ولذلك كنت خرجته - فيما تقدم (1011) - وخرجته من عدة [طرق] وكشفت عن عللها، وأودعت فيه بعض الفوائد، منها أنني تتبعت أسماء الصحابة الذين رووا الحديث المتواتر، فبلغ عددهم في كتاب الطبراني فقط أربعة وخمسين صحابياً، مشيراً بجانب كل واحد منهم إلى عدد طرقه فيه. فليرجع إليه من كان طالباً للمزيد من الفائدة.
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(যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করল, অথবা আমি যা আদেশ করেছি তা প্রত্যাখ্যান করল; সে যেন জাহান্নামে তার জন্য একটি ঘর তৈরি করে নেয়।)

(প্রত্যাখ্যান) অংশটি উল্লেখ থাকার কারণে এটি খুবই মুনকার (Munkar Jiddan)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ ইয়া'লা তাঁর ‘আল-মুসনাদ’ গ্রন্থে (১/৭৪-৭৫/৭৩), এবং ‘মু'জামু শুয়ূখিহি’ গ্রন্থে (ক্বাফ ৩১/১): আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আমর ইবনু মালিক: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন জারিয়াহ ইবনু হারম আল-ফুকাইমী, তিনি বলেন: আমার নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু দারিম: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর আল-হিবরানী, তিনি বলেন: আমি আবূ কাবশাহ আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (যিনি সাহাবী ছিলেন) আবূ বাকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে বর্ণনা করতে শুনেছি।

এটি আরও বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল আওসাত্ব’ গ্রন্থে (৩/০৪০/২৮৫৯), এবং ইবনু আদী তাঁর ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (২/১৭৫) আমর ইবনু মালিক আর-রাসিবী থেকে বিভিন্ন সূত্রে। আর ত্বাবারানী বলেছেন:
‘এই ইসনাদ ছাড়া এটি বর্ণিত হয়নি, আমর ইবনু মালিক এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: আর সে (আমর ইবনু মালিক) হলো কাজ্জাব (মিথ্যাবাদী), যেমনটি ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন। আর ইবনু আদী ইঙ্গিত করেছেন যে সে হাদীস চুরি করত। তিনি (ইবনু আদী) জারিয়াহ ইবনু হারম-এর জীবনীতে এই হাদীসটির পরে বলেছেন:
‘বলা হয়, এটি ইয়াহইয়া ইবনু বিস্তাম-এর হাদীস, আর যারা জারিয়াহ থেকে এটি বর্ণনা করেছে, তারা তার থেকে এটি চুরি করেছে।’ আর এই জারিয়াহ সম্পর্কে যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন:
‘সে মাতরূক (পরিত্যক্ত) এবং ওয়াহী (দুর্বল)। দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: যঈফ (দুর্বল)।’

আর ইবনু আদী তার জীবনী শুরু করেছেন আলী ইবনুল মাদীনী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত কথা দিয়ে, তিনি বলেছেন:
‘সে ক্বাদারিয়া (ভাগ্য অস্বীকারকারী) মতবাদের নেতা ছিল, এবং হাদীসের ক্ষেত্রে দুর্বল ছিল। আমরা তার থেকে লিখেছিলাম; অতঃপর তাকে পরিত্যাগ করি।’

আর তিনি (ইবনু আদী) তার জীবনী শেষ করেছেন এই কথা বলে:
‘তার সমস্ত হাদীসই এমন, যার উপর নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীরা তার অনুসরণ করেন না।’ এই কারণে যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীস সম্পর্কে বলেছেন, এবং আসক্বালানী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর অনুসরণ করেছেন:
‘এই হাদীসটি মুনকার (অস্বীকৃত)।’

আর হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মাজমা’ গ্রন্থে (১/১৪২) বলেছেন:
‘এটি আবূ ইয়া'লা এবং ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, এতে জারিয়াহ ইবনু হারম আল-ফুকাইমী রয়েছে, আর সে মাতরূকুল হাদীস (হাদীস বর্ণনায় পরিত্যক্ত)।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: আর তার শায়খ (আব্দুল্লাহ ইবনু দারিম)-কে আমি চিনি না।
আর আব্দুল্লাহ ইবনু বুসর আল-হিবরানী সম্পর্কে যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন:
‘তারা তাকে দুর্বল বলেছেন।’
সুতরাং এটি এমন একটি ইসনাদ যা ত্রুটিসমূহের (ইল্লত) দ্বারা শৃঙ্খলিত।

(সতর্কীকরণ): এই ইলম (জ্ঞান) সম্পর্কে অনভিজ্ঞতা এবং এর তাহক্বীক্ব (গবেষণা) কম থাকার কারণে, ‘মুসনাদে আবূ ইয়া'লা’-এর টীকাকার এই হাদীসের তাখরীজ শুরু করার পর যখন বললেন: ‘এর ইসনাদ বাতিল (তালিফ)’, এবং এর বর্ণনাকারীদের সম্পর্কে আলোচনা করলেন, আর হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর উপরোক্ত কথা দিয়ে শেষ করলেন, তখন তিনি একটি সংশোধনী (ইস্তিদ্রাক) যোগ করে বললেন:
‘কিন্তু এর অর্থ সহীহ। কেননা ইদরীসী (রাহিমাহুল্লাহ) এটিকে ‘নাযমুল মুতানাসির ফিল হাদীসিল মুতাওয়াতির’ গ্রন্থে (পৃ. ২০) মুতাওয়াতির হাদীসসমূহের অন্তর্ভুক্ত করেছেন। আর আমরা এটিকে ‘সিয়ারু আ'লামিন নুবালা’ গ্রন্থে (১/৪৩-৪৪) একাধিক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাখরীজ করেছি।’!

আমি (আল-আলবানী) বলছি: সাধারণ পাঠকদের মধ্যে যারা এই সংশোধনীটি দেখবে, তারা এর থেকে কেবল এটাই বুঝবে যে, সম্পূর্ণ হাদীসটিই মুতাওয়াতির। কিন্তু এটি সুস্পষ্টভাবে সঠিক নয়। তাই তার উচিত ছিল এটি স্পষ্ট করে দেওয়া যে, মুতাওয়াতির অংশটি হলো:
‘যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করল; সে যেন জাহান্নামে তার আসন তৈরি করে নেয়।’

যেমনটি আমি এর পূর্বের হাদীসে এবং অন্যান্য স্থানে, যেমন ‘সহীহুল জামি' আস-সাগীর’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছি। আর আমি এখানে এই হাদীসটি তাখরীজ করিনি কেবল এর এবং এর মুতাওয়াতির অংশের মধ্যে পার্থক্য স্পষ্ট করার জন্য, যাতে সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘মিফতাহুল জান্নাহ’ গ্রন্থে (পৃ. ৩৮) এর তাখরীজ এবং তাঁর নীরবতা দেখে কেউ যেন বিভ্রান্ত না হয়, এবং পূর্বে উল্লেখিত টীকাকারের মন্তব্যের কারণেও। আর ‘দ্বীন হলো নসীহত (সৎ উপদেশ)’, যেমনটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন।

আর মুনকার হওয়ার দিক থেকে এই হাদীসটির মতোই হলো:
‘যে ব্যক্তি ইচ্ছাকৃতভাবে আমার উপর মিথ্যা আরোপ করল মানুষকে বিভ্রান্ত করার জন্য; সে যেন জাহান্নামে তার আসন তৈরি করে নেয়।’ আর এর উপরও পূর্বে উল্লেখিত টীকাকারের মতো মন্তব্য করা জায়েয নয়।

এই কারণে আমি এটিকে - পূর্বে (১০১১ নং হাদীসে) - তাখরীজ করেছিলাম এবং একাধিক [সূত্রে] তাখরীজ করে এর ত্রুটিসমূহ (ইল্লত) উন্মোচন করেছিলাম, এবং এতে কিছু ফায়দা (উপকারিতা) সন্নিবেশিত করেছিলাম। এর মধ্যে একটি হলো: আমি সেই সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-দের নাম অনুসন্ধান করেছিলাম যারা মুতাওয়াতির হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, যাদের সংখ্যা কেবল ত্বাবারানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর কিতাবেই চুয়ান্নজন (৫৪) সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এ পৌঁছেছিল, তাদের প্রত্যেকের পাশে তার বর্ণনার সংখ্যা উল্লেখ করে। সুতরাং যে ব্যক্তি আরও বেশি ফায়দা পেতে চায়, সে যেন সেখানে ফিরে যায়।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6775)


(أتدرون ما يقول الله تعالى في الشام؟ يقول: يا شام! [يدي عليكِ، يا شامُ] ، أنتي صفوتي من بلادي، أدخل فيك خيرتي من عبادي، إن الله تعالى قد تكفل لي بالشام وأهله) .
منكر بهذا السياق.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير ` ومن طريقه ابن عساكر في ` تاريخ دمشق ` (1/ 69، 119 - 120) ، وأبو الحسن الربعي في ` فضائل الشام ` (12/ 21) - والزيادة له، ورواية لابن عساكر - من طريق عبد الله ابن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر: حدثني صالح بن رستم مولى بني هاشم عن عبد الله بن حوالة الأزدي أنه قال:
يا رسول الله! خِر لي بلداً أكون فيه، فلو أعلم أنك تبقى؛ ما اخترت على قربك شيئاً. قال:
` عليك بالشام لما. فلما رأى كراهتي للشام؛ قال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف رجاله ثقات؛ غير (صالح بن رستم مولى بني هاشم) ، وكنيته (أبو عبد السلام) ، وثقه ابن حبان (6/ 457) ؛ لكن قال ابن أبي حاتم عن أبيه:
` مجهول `. وتبعه العسقلاني في ` التقريب `، وأشار الذهبي في ` المغني ` إلى أنه مجهول الحال، فقال:
` شامي مجهول. قلت: روى عنه ثقتان `.
قلت: أحدهما ابن جابر هذا، والآخر (سعيد بن أبي أيوب) .
وأشار أيضاً إلى تليين توثيق ابن حبان بقوله في ` الكاشف `:
`وُثق`.
وعلى مثل هذا التوثيق اللين يعتمد الهيثمي كثيراً. ومن ذلك قوله هنا (10/ 58 - 59) :
` رواه الطبراني من طريقين، ورجال أحدهما رجال ` الصحيح `؛ غير صالح ابن رستم، وهو ثقة `! ونحوه قول المنذري في ` الترغيب ` (4/ 61/ 3) :
` رواه الطبراني من طريقين؛ إحداهما جيدة `!
واغتر بقولهما المعلقون الثلاثة على ` الترغيب `، فقالوا (3/ 641) :
` حسن؛ قال الهيثمي … `!
ولا غرابة في ذلك؛ فإنهم ممن تواترت الأدلة على أنهم جهلة لا علم عندهم إلا التقليد، وحتى هذا لا يحسنونه!
وإن مما يؤكد نكارة هذا الحديث أنه قد جاء عن عبد الله بن حوالة من نحو تسعة طرق ليس فيها غير ` عليك بالشام `، وإلا الجملة الأخيرة منه:
` إن الله قد تكفل لي بالشام وأهله `.
فهي صحيحة؛ لثبوتها في بعضها، وقد أخرج خمسة منها الطبراني في ` مسند الشاميين `، وهذه أرقامها:
(292، 337، 570، 1054، 1172، 1975، 2540، 3515) . وسائرها عند ابن عساكر (1/ 68 - 81) .
وكذلك روي الحديث عن جمع آخر من الصحابة، ليس في أحاديثهم تلك النكارة، فانظرها إن شئت في` التاريخ ` (1/ 66 - 68) ، (81 - 99) .
(تنبيه) : عزا السيوطي حديث الترجمة في ` الدرر المنثور` (3/ 112) لأحمد وابن عساكر، وذكر أحمد فيه خطأ؛ فليس هو عنده لا متناً ولا سنداً، وقد أخرجه في ` مسنده ` من ثلاثة طرق (4/ 110 و 5/ 33، 288) إسناد الأول منها صحيح، وفيه قوله صلى الله عليه وسلم:
` عليك بالشام؛ فإنه خيرة الله من أرضه، يجتبي إليه خيرته من عباده، فإن أبيتم؛ فعليكم بيمنكم، واسقوا من غُدُرِكم كم، فإن الله قد توكل لي بالشام وأهله`.
وهكذا رواه أبو داود، وهو مخرج في ` صحيح أبي داود ` (2244) ، و ` تخريج فضائل الشام ` (الحديث الثاني) .
ثم إن المنذري (4/ 62/ 9) ، والهيثمي (10/58) ذكر الحديث بلفظ:
` رأيت ليلة أسري [بي] عموداً أبيض كأنه لؤلؤة تحمله الملائكة، قلت: ما تحملون؟ قالوا: عمود الكتاب أمرنا أن نضعه بالشام، وبينا أنا نائم رأيت عمود الكتاب اختلس من تحت وسادتي، فظننت أن الله عز وجل تخلى من أهل
الأرض، فأتبعته بصري، فإذا هو نور ساطع بين يدي حتى وضع بالشام … `.
وقال المنذري:
` رواه الطبراني، ورواته ثقات `!
وقال الهيثمي - كما قال في حديث الترجمة - :
`رواه الطبراني، ورجاله رجال الصحيح؛ غير صالح بن رستم، وهو ثقة`!
قلت: وقلدهما أيضاً الثلاثة المعلقون، وقد عرفت جهالة ابن رستم هذا، وفي حديثه هذا نكارة أيضاً؛ إذا ما قوبل بالأحاديث الصحيحة، كحديث عبد الله بن عمرو بن العاص، وأبيه، وأبي الدرداء؛ فإنهم رووا قصة العمود باختصار عن هذا، وهي في ` الترغيب ` قبيل هذا، وهي مخرجة في ` الفضائل ` فانظر الأحاديث (3، 10) وكلها ليس فيها ` ليلة الإسراء `، ولا جملة الظن.
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(তোমরা কি জানো, আল্লাহ তাআলা শাম (সিরিয়া) সম্পর্কে কী বলেন? তিনি বলেন: হে শাম! [আমার হাত তোমার উপর, হে শাম!] তুমি আমার দেশগুলোর মধ্যে আমার মনোনীত স্থান। আমি তোমার মধ্যে আমার বান্দাদের মধ্যে যারা উত্তম, তাদেরকে প্রবেশ করাবো। নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আমার জন্য শাম ও তার অধিবাসীদের দায়িত্ব নিয়েছেন।)
এই বিন্যাসে (সিয়াক্ব) এটি মুনকার।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’-এ এবং তাঁর সূত্রে ইবনু আসাকির ‘তারীখে দিমাশক্ব’ (১/৬৯, ১১৯-১২০)-এ এবং আবুল হাসান আর-রাবঈ ‘ফাযাইলুশ শাম’ (১২/২১)-এ বর্ণনা করেছেন – আর অতিরিক্ত অংশটি তাঁর (রাবঈ) এবং ইবনু আসাকিরের একটি বর্ণনার – আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু ইয়াযীদ ইবনু জাবির-এর সূত্রে: তিনি বলেন, আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন সালিহ ইবনু রুস্তম, বানী হাশিমের মাওলা, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু হাওয়ালাহ আল-আযদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যিনি বলেন:
হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার জন্য এমন একটি দেশ নির্বাচন করে দিন যেখানে আমি থাকব। যদি আমি জানতাম যে আপনি বেঁচে থাকবেন; তবে আপনার নৈকট্যের উপর অন্য কিছুকে আমি নির্বাচন করতাম না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:
‘তোমার জন্য শাম আবশ্যক, যখন...। যখন তিনি শামের প্রতি আমার অপছন্দ দেখলেন; তখন তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা (উপরের হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য; তবে (সালিহ ইবনু রুস্তম, বানী হাশিমের মাওলা) ছাড়া। তাঁর কুনিয়াত (উপনাম) হলো (আবু আব্দুস সালাম)। ইবনু হিব্বান (৬/৪৫৭) তাঁকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন; কিন্তু ইবনু আবী হাতিম তাঁর পিতা থেকে বলেন:
‘তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)’। আল-আসক্বালানী ‘আত-তাক্বরীব’-এ তাঁর অনুসরণ করেছেন। আর আয-যাহাবী ‘আল-মুগনী’-তে ইঙ্গিত করেছেন যে তিনি মাজহূলুল হাল (যার অবস্থা অজ্ঞাত), তিনি বলেছেন:
‘শামের অধিবাসী, মাজহূল। আমি বলি: তাঁর থেকে দু’জন নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী বর্ণনা করেছেন।’

আমি বলি: তাদের একজন হলেন এই ইবনু জাবির, আর অন্যজন হলেন (সাঈদ ইবনু আবী আইয়্যুব)। তিনি (যাহাবী) ইবনু হিব্বানের নির্ভরযোগ্যকরণের শিথিলতার দিকেও ইঙ্গিত করেছেন, যখন তিনি ‘আল-কাশেফ’-এ বলেছেন:
‘তাকে নির্ভরযোগ্য বলা হয়েছে।’
এই ধরনের শিথিল নির্ভরযোগ্যকরণের উপর হাইসামী (রাহিমাহুল্লাহ) প্রায়শই নির্ভর করেন। এর মধ্যে তাঁর এই উক্তিটিও রয়েছে (১০/৫৮-৫৯):
‘এটি ত্বাবারানী দু’টি সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যার একটির বর্ণনাকারীগণ ‘সহীহ’-এর বর্ণনাকারী; সালিহ ইবনু রুস্তম ছাড়া, আর তিনি নির্ভরযোগ্য!’ অনুরূপভাবে মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৪/৬১/৩)-এ বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী দু’টি সূত্রে বর্ণনা করেছেন; যার একটি উত্তম (জাইয়্যিদ)!’

আর ‘আত-তারগীব’-এর উপর মন্তব্যকারী তিনজন এই দুজনের কথায় প্রতারিত হয়েছেন, ফলে তারা বলেছেন (৩/৬৪১):
‘হাসান; হাইসামী বলেছেন...!’
এতে আশ্চর্যের কিছু নেই; কারণ তারা এমন লোক যাদের সম্পর্কে প্রমাণাদি সুপ্রতিষ্ঠিত যে তারা অজ্ঞ, তাদের কাছে তাক্বলীদ (অন্ধ অনুসরণ) ছাড়া কোনো জ্ঞান নেই, এমনকি তারা এটাও ভালোভাবে করতে পারে না!

আর এই হাদীসটির মুনকার হওয়ার বিষয়টি যা নিশ্চিত করে, তা হলো: এটি আব্দুল্লাহ ইবনু হাওয়ালাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে প্রায় নয়টি সূত্রে এসেছে, যার মধ্যে ‘তোমার জন্য শাম আবশ্যক’ ছাড়া আর কিছু নেই, অথবা এর শেষ বাক্যটি:
‘নিশ্চয়ই আল্লাহ আমার জন্য শাম ও তার অধিবাসীদের দায়িত্ব নিয়েছেন।’
এই শেষ বাক্যটি সহীহ; কারণ এটি কিছু বর্ণনায় প্রমাণিত। ত্বাবারানী এর মধ্যে পাঁচটি বর্ণনা করেছেন ‘মুসনাদুশ শামিয়্যীন’-এ, আর এই হলো সেগুলোর নম্বর:
(২৯২, ৩৩৭, ৫৭০, ১০৫৪, ১১৭২, ১৯৭৫, ২৫৪০, ৩৫১৫)। আর বাকিগুলো ইবনু আসাকিরের কাছে রয়েছে (১/৬৮-৮১)।

অনুরূপভাবে হাদীসটি সাহাবীগণের অন্য একটি দল থেকেও বর্ণিত হয়েছে, যাদের হাদীসগুলোতে সেই মুনকার অংশটি নেই। তুমি চাইলে ‘আত-তারীখ’ (১/৬৬-৬৮), (৮১-৯৯)-এ তা দেখতে পারো।

(সতর্কতা): সুয়ূতী (রাহিমাহুল্লাহ) আলোচ্য হাদীসটিকে ‘আদ-দুররুল মানসূর’ (৩/১১২)-এ আহমাদ ও ইবনু আসাকিরের দিকে সম্পর্কিত করেছেন। আর আহমাদ-এর উল্লেখটি ভুল; কারণ এটি তাঁর কাছে মতন (মূল পাঠ) বা সনদ (সূত্র) কোনোভাবেই নেই। তবে তিনি (আহমাদ) তাঁর ‘মুসনাদ’-এ এটি তিনটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন (৪/১১০ ও ৫/৩৩, ২৮৮), যার প্রথমটির সনদ সহীহ। তাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তিটি রয়েছে:
‘তোমার জন্য শাম আবশ্যক; কারণ এটি আল্লাহর জমিনের মধ্যে তাঁর মনোনীত স্থান। তিনি তাঁর বান্দাদের মধ্যে যারা উত্তম, তাদেরকে এর দিকে একত্রিত করেন। যদি তোমরা অস্বীকার করো; তবে তোমাদের ইয়ামানকে আবশ্যক করে নাও, এবং তোমাদের জলাধারগুলো থেকে পান করো। কেননা আল্লাহ আমার জন্য শাম ও তার অধিবাসীদের দায়িত্ব নিয়েছেন।’
অনুরূপভাবে এটি আবূ দাঊদও বর্ণনা করেছেন, এবং এটি ‘সহীহ আবী দাঊদ’ (২২৪৪) ও ‘তাখরীজু ফাযাইলিশ শাম’ (দ্বিতীয় হাদীস)-এ সংকলিত হয়েছে।

অতঃপর মুনযিরী (৪/৬২/৯) এবং হাইসামী (১০/৫৮) হাদীসটি এই শব্দে উল্লেখ করেছেন:
‘আমি মি’রাজের রাতে [আমাকে] একটি সাদা স্তম্ভ দেখলাম, যা মুক্তার মতো, ফিরিশতাগণ তা বহন করছিলেন। আমি বললাম: তোমরা কী বহন করছো? তারা বললেন: কিতাবের স্তম্ভ। আমাদেরকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে আমরা যেন তা শামে স্থাপন করি। আর আমি যখন ঘুমন্ত ছিলাম, তখন দেখলাম যে কিতাবের স্তম্ভটি আমার বালিশের নিচ থেকে ছিনিয়ে নেওয়া হলো। আমি ধারণা করলাম যে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা পৃথিবীর অধিবাসীদের থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছেন। অতঃপর আমি আমার দৃষ্টি দিয়ে সেটির অনুসরণ করলাম, হঠাৎ দেখি যে সেটি আমার সামনে একটি উজ্জ্বল আলো, অবশেষে তা শামে স্থাপন করা হলো...।’

আর মুনযিরী বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য!’
আর হাইসামী – যেমনটি তিনি আলোচ্য হাদীস সম্পর্কে বলেছেন – তেমনি বলেছেন:
‘এটি ত্বাবারানী বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী; সালিহ ইবনু রুস্তম ছাড়া, আর তিনি নির্ভরযোগ্য!’
আমি বলি: এই তিনজন মন্তব্যকারীও তাদের দু’জনের অন্ধ অনুসরণ করেছেন। অথচ তুমি এই ইবনু রুস্তমের অজ্ঞতা সম্পর্কে জেনেছো। আর এই হাদীসটিতেও মুনকার অংশ রয়েছে; যখন এটিকে সহীহ হাদীসগুলোর সাথে তুলনা করা হয়, যেমন আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), তাঁর পিতা (আমর ইবনুল আস), এবং আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস; কারণ তারা এই ঘটনাটি (স্তম্ভের ঘটনা) এর চেয়ে সংক্ষিপ্ত আকারে বর্ণনা করেছেন। আর তা ‘আত-তারগীব’-এ এর ঠিক আগে রয়েছে, এবং তা ‘আল-ফাযাইল’-এ সংকলিত হয়েছে। তুমি হাদীসগুলো (৩, ১০) দেখো। সেগুলোর কোনোটিতেই ‘মি’রাজের রাতে’ এবং ‘ধারণার বাক্যটি’ নেই।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6776)


(إذا وقعت الفتنة؛ فالأمن بالشام) .
منكر بلفظ:` الأمن `.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الأوسط ` (3/ 333/2710) ، ومن طريقه ابن عساكر في ` التاريخ ` (1/110) عن مؤمل بن إسماعيل قال: حدثنا محمد بن ثور عن معمر عن أيوب عن أبي قلابة عن عبد الله بن عمرو: أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
` رأيت في المنام: أنهم أخذوا عمود الكتاب، فعمدوا به إلى الشام، فإذا وقعت … ` الحديث. وقال الطبراني:
`تفرد به مؤمل `.
قلت: وهو ضعيف؛ لسوء حفظه، قال الذهبي في ` المغني `:
` صدوق مشهور وثق، وقال البخاري: منكر الحديث. وقال أبو زرعة: في حديثه خطأ كثير `.
قلت: ومن أخطائه قوله في هذا الحديث ` فالأمن `، والصحيح المحفوظ فيه عن ابن عمرو وغيره ` فالإيمان `، وقد استوعب طرقه وألفاظه الحافظ ابن عساكر (1/ 101 - 111) ، وخرجت بعضها في ` فضائل الشام `، فانظر الحديث الثالث والعاشر.
(تنبيه) : أورد المنذري (3/ 62) ، وتبعه الهيثمي (10/ 58) الحديث باللفظين؛ دون بيان نكارة المنكر منهما، وقلدهما في ذلك المعلقون على ` الترغيب ` (3/ 643) ، بل زادوا في الطين بلة؛ فقالوا:
` حسن، قال الهيثمي … `!
فوضعوا من قيمة الصحيح منهما، ورفعوا من شأن المنكر منهما! والله المستعان.
ثم إنه وقع في الكتابين ` الفتن `، وما أثبته هو الوارد في ` المعجم `، و ` التاريخ `. والله أعلم.
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(যদি ফিতনা সংঘটিত হয়, তবে নিরাপত্তা (আমন) থাকবে শামে।)
‘নিরাপত্তা’ (আল-আমন) শব্দটির কারণে এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জাম আল-আওসাত’ (৩/৩৩৩/২৭১০)-এ এবং তাঁর সূত্রে ইবনু আসাকির তাঁর ‘আত-তারীখ’ (১/১১০)-এ মুআম্মাল ইবনু ইসমাঈল থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ছাওর, তিনি মা'মার থেকে, তিনি আইয়্যুব থেকে, তিনি আবূ কিলাবাহ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
‘আমি স্বপ্নে দেখলাম যে, তারা কিতাবের স্তম্ভটি নিলেন এবং তা নিয়ে শামের দিকে গেলেন। যখন তা (ফিতনা) সংঘটিত হবে...’ হাদীসটি।
আর ত্বাবারানী বলেছেন: ‘মুআম্মাল এটি এককভাবে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আল-আলবানী) বলি: আর সে (মুআম্মাল) দুর্বল; তার দুর্বল মুখস্থশক্তির কারণে। যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মুগনী’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘সে সত্যবাদী, প্রসিদ্ধ এবং নির্ভরযোগ্য। আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীসের বর্ণনাকারী)। আর আবূ যুর'আহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তার হাদীসে অনেক ভুল রয়েছে।’

আমি বলি: আর তার ভুলগুলোর মধ্যে এই হাদীসে তার উক্তি হলো ‘তখন নিরাপত্তা (আল-আমন) থাকবে’। আর ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও অন্যান্যদের সূত্রে এর মধ্যে সংরক্ষিত সহীহ শব্দটি হলো ‘তখন ঈমান (আল-ঈমান) থাকবে’। হাফিয ইবনু আসাকির এর সকল সনদ ও শব্দাবলী বিস্তারিতভাবে উল্লেখ করেছেন (১/১০১-১১১)। আমি এর কিছু অংশ ‘ফাদ্বা-ইলুশ শা-ম’ গ্রন্থে সংকলন করেছি। সুতরাং হাদীস নং তিন ও দশ দেখুন।

(সতর্কতা): মুনযিরী (৩/৬২) এবং তাঁর অনুকরণে হাইছামী (১০/৫৮) উভয় শব্দে হাদীসটি উল্লেখ করেছেন; কিন্তু তাদের উভয়ের মধ্যে যে শব্দটি মুনকার (অস্বীকৃত), তার মুনকার হওয়ার বিষয়টি স্পষ্ট করেননি। আর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থের টীকাকারগণ (৩/৬৪৩) এই বিষয়ে তাঁদের (মুনযিরী ও হাইছামী) অন্ধ অনুকরণ করেছেন। বরং তারা পরিস্থিতিকে আরও খারাপ করেছেন; তারা বলেছেন: ‘হাসান, হাইছামী বলেছেন...!’ ফলে তারা উভয়ের মধ্যে সহীহটির মূল্য কমিয়ে দিয়েছেন এবং মুনকারটির মর্যাদা বাড়িয়ে দিয়েছেন! সাহায্য একমাত্র আল্লাহর কাছেই চাওয়া যায়।

অতঃপর, নিশ্চয়ই উভয় গ্রন্থে (মুনযিরী ও হাইছামীর) ‘আল-ফিতান’ শব্দটি এসেছে, কিন্তু আমি যা সাব্যস্ত করেছি, তা ‘আল-মু'জাম’ এবং ‘আত-তারীখ’ গ্রন্থে বর্ণিত হয়েছে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6777)


(طوبى للشام … إن الرحمن لباسطٌ رحمته عليه) .
باطل بهذا اللفظ.
رواه أحمد بن رشدين المصري: نا حرملة بن يحيى: نا ابن وهب: أخبرني عمرو بن الحارث عن يزيد بن أبي حبيب عن ابن شماسة أنه سمع زيد بن ثابت يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن عنده:
`طوبى للشام `.
فقلنا: ما باله يا رسول الله؟ قال:
` إن الرحمن … `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف؛ رجاله كلهم ثقات غير أحمد بن رشدين هذا، فهو ضعيف متهم، وقد كنت بينت هذا وحكمت على هذا اللفظ بالبطلان تحت الحديث (503/ الصحيحة) لمخالفته لما رواه غير ما واحد عن يزيد بن أبي حبيب بلفظ:
` … إن ملاثكة الرحمن باسطة أجنحتها عليه `.
ثم تنبهت لشيء آخر يؤكد الحكم السابق، وهو مخالفة (ابن رشدين) لمن رواه عن (حرملة) من الثقات، فأحببت تقييده هنا، فأقول:
قال ابن حبان في` صحيحه ` (




(শামের জন্য সুসংবাদ... নিশ্চয় দয়াময় (আল্লাহ) তার উপর তাঁর রহমত প্রসারিতকারী।)
এই শব্দে বাতিল (মিথ্যা)।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ ইবনু রুশদাইন আল-মিসরী: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন হারমালাহ ইবনু ইয়াহইয়া: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু ওয়াহব: আমাকে খবর দিয়েছেন আমর ইবনু আল-হারিস, ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব হতে, তিনি ইবনু শুমাসাহ হতে, যে তিনি যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন: আমরা তাঁর (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) নিকট থাকা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন:
`শামের জন্য সুসংবাদ।`
আমরা বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এর কী কারণ? তিনি বললেন:
`নিশ্চয় দয়াময় (আল্লাহ)...।`

আমি (আল-আলবানী) বলি: আর এই সনদটি যঈফ (দুর্বল); এর সকল বর্ণনাকারীই সিকাহ (নির্ভরযোগ্য), তবে এই আহমাদ ইবনু রুশদাইন ব্যতীত। সে হলো যঈফ (দুর্বল), মুত্তাহাম (অভিযুক্ত)। আমি ইতোপূর্বে এই বিষয়টি স্পষ্ট করেছি এবং এই শব্দটিকে বাতিল (মিথ্যা) বলে রায় দিয়েছি (সহীহাহ-এর) ৫০৩ নং হাদীসের অধীনে, কারণ এটি ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব হতে একাধিক বর্ণনাকারী কর্তৃক বর্ণিত শব্দের বিরোধী, যা হলো:
`...নিশ্চয় দয়াময়ের ফেরেশতাগণ তার উপর তাদের ডানা প্রসারিতকারী।`

অতঃপর আমি অন্য একটি বিষয়ের প্রতি মনোযোগী হলাম যা পূর্বের রায়কে আরও জোরালো করে, আর তা হলো (ইবনু রুশদাইন)-এর বিরোধিতা করা, যারা (হারমালাহ) হতে সিকাহ (নির্ভরযোগ্য) হিসেবে বর্ণনা করেছেন। তাই আমি এখানে তা লিপিবদ্ধ করতে পছন্দ করলাম। অতঃপর আমি বলি:
ইবনু হিব্বান তাঁর `সহীহ`-এ বলেছেন:









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6778)


(إن جبريل عليه السلام وعدني أن يأتيني، ولم يأتني منذ ثلاث. قال: فإذا كلبٌ، قال أسامة: فوضعتُ يدي على رأسي فصحتُ! فقال: ما لك يا أسامة؟! فقلتُ: كلبٌ! فأمر به النبي صلى الله عليه وسلم فقتل، ثم أتاة جبريل فقال: ما لك لم تأتني، وكنت إذا وعدتني؛ لم تخلفني؟! فقال: إنا لا ندخل بيتاً فيه كلب ولا تصاوير) .
ضعيف جداً بهذ االسياق، دون قول جبريل.

أخرجه الطبراني في ` المعجم
الكبير ` (1/ 125/ 387) من طريق خالد بن يزيد العمري: ثنا ابن أبي ذئب عن الحارث بن عبد الرحمن عن كريب عن أسامة قال: دخلت على النبي صلى الله عليه وسلم وعليه الكآبة، فقلت: ما لك يا رسول الله! فقال: … فذكره.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جداً؛ آفته (خالد بن يزيد العمري) - وهو: العدوي المكي - : قال الذهبي في ` الميزان `:
` كذبه أبو حاتم ويحيى، قال ابن حبان: يروي الموضوعات عن الأثبات `.
قلت: وقد تابعه جماعة على أصل الحديث عند الطحاوي في ` مشكل الآثار ` (1/ 377) وأحمد (5/203) ، وليس عندهم جملة صياح أسامة: ولا
مواجهة النبي صلى الله عليه وسلم لجبريل بقوله:
` ما لك لم تأتني … `.
وكذلك قد جاءت القصة عن جمع آخر من الصحابة، سقتها في ` آداب الزفاف ` (ص 190 - 197 - المكتبة الإسلامية) ، وليس فيها الزيادتان المذكورتان، وفيها الأمر بإخراج الجرو - الكلب - دون قتله، وليس فيها أيضاً ذكر (الثلاث) ، نعم؛ في حديث ميمونة:
`فلما أمسى؛ لقيه جبريل، فقال له: قد كنت وعدتني أن تلقاني البارحة، فقال: أجل، ولكنا لا ندخل بيتاً فيه كلب ولا صورة فأصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ؛ فأمر بقتل الكلاب، حتى إنه يأمر بقتل كلب الحائط الصغير، ويترك كلب الحائط الكبير `.
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(নিশ্চয়ই জিবরীল (আঃ) আমার কাছে আসার ওয়াদা করেছিলেন, কিন্তু তিন দিন ধরে তিনি আসেননি। বর্ণনাকারী বলেন: হঠাৎ একটি কুকুর দেখা গেল। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আমার মাথায় হাত রেখে চিৎকার করে উঠলাম! তিনি (নবী সাঃ) বললেন: হে উসামা! তোমার কী হয়েছে?! আমি বললাম: একটি কুকুর! অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেটিকে হত্যার নির্দেশ দিলেন, ফলে সেটিকে হত্যা করা হলো। এরপর জিবরীল (আঃ) তাঁর কাছে আসলেন এবং তিনি বললেন: তোমার কী হলো যে তুমি আমার কাছে আসোনি? তুমি তো যখন আমার সাথে ওয়াদা করো, তখন তা ভঙ্গ করো না?! জিবরীল (আঃ) বললেন: নিশ্চয়ই আমরা এমন ঘরে প্রবেশ করি না যেখানে কুকুর বা কোনো ছবি থাকে।)

এই বিন্যাসে (সিয়াক) হাদীসটি খুবই যঈফ (দুর্বল), জিবরীলের উক্তি ব্যতীত।

এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-মু'জামুল কাবীর’ (১/১২৫/৩৮৭) গ্রন্থে খালিদ ইবনু ইয়াযীদ আল-উমারী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদেরকে ইবনু আবী যি'ব হাদীস শুনিয়েছেন, তিনি আল-হারিস ইবনু আব্দুর রহমান থেকে, তিনি কুরাইব থেকে, তিনি উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে প্রবেশ করলাম, তখন তাঁর চেহারায় বিষণ্ণতা ছিল। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার কী হয়েছে? তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি খুবই যঈফ (দুর্বল); এর ত্রুটি হলো (খালিদ ইবনু ইয়াযীদ আল-উমারী) – আর তিনি হলেন: আল-আদাবী আল-মাক্কী। ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘আবূ হাতিম ও ইয়াহইয়া তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন। ইবনু হিব্বান বলেছেন: তিনি নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারীদের সূত্রে মাওদ্বূ (বানোয়াট) হাদীস বর্ণনা করেন।’

আমি বলি: ত্বাহাবী তাঁর ‘মুশকিলুল আ-ছার’ (১/৩৭৭) এবং আহমাদ (৫/২০৩) গ্রন্থে মূল হাদীসের উপর একদল বর্ণনাকারী তার (খালিদের) অনুসরণ করেছেন। তবে তাদের বর্ণনায় উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চিৎকার করার অংশটি নেই, আর না আছে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জিবরীলের (আঃ) সাথে এই বলে মুখোমুখি হওয়া যে: ‘তোমার কী হলো যে তুমি আমার কাছে আসোনি...’।

অনুরূপভাবে, এই ঘটনাটি অন্য একদল সাহাবী থেকেও বর্ণিত হয়েছে, যা আমি ‘আদাবুয যিফাফ’ (পৃ. ১৯০-১৯৭ – আল-মাকতাবাতুল ইসলামিয়্যাহ) গ্রন্থে উল্লেখ করেছি। সেগুলোতেও উল্লিখিত অতিরিক্ত অংশ দুটি নেই। সেগুলোতে কুকুরছানাটিকে (আল-জারু) বের করে দেওয়ার নির্দেশ রয়েছে, হত্যা করার নির্দেশ নেই। সেগুলোতে (তিন দিন)-এর উল্লেখও নেই। হ্যাঁ; মাইমূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে রয়েছে:

‘অতঃপর যখন সন্ধ্যা হলো, জিবরীল (আঃ) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করলেন। তিনি (নবী সাঃ) তাঁকে বললেন: আপনি তো আমাকে গত রাতে সাক্ষাৎ করার ওয়াদা করেছিলেন। জিবরীল (আঃ) বললেন: হ্যাঁ, কিন্তু আমরা এমন ঘরে প্রবেশ করি না যেখানে কুকুর বা কোনো ছবি থাকে। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেদিন সকালে উঠলেন এবং কুকুর হত্যার নির্দেশ দিলেন, এমনকি তিনি ছোট প্রাচীরের কুকুরকেও হত্যার নির্দেশ দিলেন এবং বড় প্রাচীরের কুকুরকে ছেড়ে দিলেন।’









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6779)


(الْتَقَى مُؤْمِنَانِ عَلَى بَابِ الْجَنَّةِ: مُؤْمِنٌ غَنِيٌّ وَمُؤْمِنٌ فَقِيرٌ، كَانَا فِي الدُّنْيَا فَأُدْخِلَ الْفَقِيرُ الْجَنَّةَ، وَحُبِسَ الْغَنِيُّ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ يُحْبَسَ، ثُمَّ أُدْخِلَ الْجَنَّة، َ فَلَقِيَهُ الْفَقِيرُ فََقُالُ: أَيْ أَخِي مَاذَا حَبَسَكَ؟ وَاللَّهِ لَقَدْ حُْبِسْتَ حَتَّى خِفْتُ عَلَيْكَ! فَيَقُولُ: أَيْ أَخِي! إِنِّي حُبِسْتُ بَعْدَكَ مَحْبِسًا فَظِيعًا كَرِيهًا، وَمَا وَصَلْتُ إِلَيْكَ حَتَّى سَالَ مِنِّي الْعَرَقُ مَا لَوْ وَرَدَهُ أَلْفُ بَعِيرٍ، كُلُّهَا آكِلَةُ حَمْضٍ، لَصَدَرَتْ عَنْهُ رِوَاءً) .
منكر.

أخرجه أحمد (1/ 304) : ثنا حسن: ثنا دويد عن سلم بن بشير عن عكرمة عن ابن عباس مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ضعيف، رجاله ثقات؛ غير (دويد) هذا، لم أر من
ترجمه، غير أن ابن ماكولا ذكره في ` الإكمال ` (3/ 386) برواية حسين (كذا) بن محمد المروزي عنه، وسمى أباه (سليمان) ، وقال:
` حدث عن سلم بن بشيربن جحل وعثمان بن عطاء`.
ولم يذكر فيه جرحاً ولا تعديلاً؛ فهو مجهول، وقال الهيثمي في ` مجمع الزوائد ` (10/ 263) :
` رواه أحمد، وفيه (دويد) غير منسوب، فإن كان هو الذي روى عنه سفيان؛ فقد ذكره العجلي في ` كتاب الثقات `، وإن كان غيره؛ فلم أعرفه، وبقية رجاله رجال ` الصحيح `؛ غير سلم بن بشير، وهو ثقة `.
قلت: ليس هو الذي روى عنه سفيان - وهو: الثوري - ؛ فإنه أدنى طبقة منه، هو من طبقة سفيان بن عيينة، وقد ترجم ابن أبي حاتم لثلاثة من طبقة واحدة، أحدهم: هذا الذي روى عنه الثوري، وقال فيه:
`شيخ ليّن `.
والثاني: (دويد الفلسطيني) عنه سعيد بن أبي أيوب، وسكت عنه، وذكره ابن حبان في ` الثقات ` (8/ 237) وذكر أنه روى عنه الثوري، فكأنه يرى أنه هو والذي قبله واحد، وليس ببعيد.
والثالث: دويد بن نافع مولى بني أمية، روى عنه الليث بن سعد وآخرون، وقال أبو حاتم:
`هو شيخ `. وقال ابن حبان (6/ 292) :
` مستقيم الحديث `.
ووثقه آخرون، وهو مترجم في ` التهذيب ` لابن حجر، وقال:
` ورأيت له رواية عن ابن عمر، فقيل: مرسلة`.
فهو متقدم جداً على (دويد) الراوي لهذا الحديث.
ومن الغرائب أن الحافظ لم يترجم له في ` تعجيل المنفعة `؛ مع أنه على شرطه! فإنه أورد فيه (ص 144/ 351) :
`أ - سالم بن بشير، عن عكرمة، وعنه دويد الخراساني، مجهول. قلت (الحافظ) : هذا غلط نشأ من تحريف، وإنما هو (سلْم) بسكون اللام بعدها ميم، وسأذكره على الصواب - إن شاء الله تعالى - `.
قلت: وهناك لم يصنع شيئاً سوى أنه ذكره على الصواب فقال (158/ 392) :
` سلم بن بشير. تقدم في (سالم) `!
والظاهر أنه لم تتيسر له ترجمته؛ فأحال على ما تقدم، وقد ترجمه ابن أبي حاتم (2/ 1/ 266) وروى عن ابن معين أنه - قال:
` ليس به بأس `.
وذكره ابن حبان في ` ثقات التابعين ` (4/ 334) ، وفي ` أتباعهم ` (6/420) ، ومع هذا كله قال الشيخ أحمد شاكر رحمه الله في تعليقه على هذا الحديث (4/ 273) :
` ولم أجد لـ (سلم) هذا ترجمة أصلاً `.
والمقصود: أن الحافظ رحمه الله لم يترجم لـ (دويد) هذا، مع أنه تنبه من
ترجمة الحسيني لـ (سالم بن بشير) ، أنه من رجال ` المسند `، وبخاصة أنه وصفه بـ (الخراساني) ، فهذا مما يذكره بإبرازه بالترجمة، ولكن صدق الله: {ولا يحيطون بشيء من علمه إلابما شاء} .
ومما تقدم يتبين خطأ تقوية الحديث بقوله في ` الترغيب ` (4/ 88/18) :
` رواه أحمد بإسناد جيد قوي `!
والظاهر أنه توهم أنه (دويد الفلسطيني) أو (الأ موي) اللذين وثقهما ابن حبان، وقد عرفت أنهما أعلى طبقة منه، وأنه لا دليل على أنه أحدهما؛ ولذلك جزم الأمير ابن ماكولا أنه غيرهم. والله أعلم.
ثم وقفت على ما يؤيد جهالته وهو قول الحافظ العراقي في ` المغني ` (4/226) : ` … وفيه (دويد) غير منسوب يحتاج إلى معرفته قال أحمد: حديثه مثله`.
وإن من جهل المعلقين الثلاتة على ` الترغيب `، وقَفوِهم ما لا علم لهم به:
أنهم صدروا تخريجهم لهذا الحديث بقولهم في التعليق عليه (4/ 40) بقولهم:
` حسن، … `.
ثم أتبعوه بكلام الهيثمي المتقدم، وهو لا يدل على تحسينهم بوجه من الوجوه؛ لأنه تردد بين أن يكون الذي وثقه العجلي أو غيره ممن لا يعرفه. فلا يجوز أن يؤخذ من كلامه، ويترك منه. ثم إنه لو فرض أنه جزم هو أو غيره بأنه الموثق؛ فهو مما لا ينبغي الجزم بأنه ثقة، لما هو معروف من تساهل العجلي في التوثيق كنحو ابن حبان، وبخاصة أنه قد عارضه هنا تضعيف ابن أبي حاتم إياه - كما تقدم - . فيا لله!
ما أجهلهم، وما أجرأهم على التكلم بغير علم! والله المستعان.
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(জান্নাতের দরজায় দুজন মুমিন একত্রিত হবে: একজন ধনী মুমিন এবং একজন দরিদ্র মুমিন। তারা দুনিয়াতে ছিল। অতঃপর দরিদ্র মুমিনকে জান্নাতে প্রবেশ করানো হবে এবং ধনীকে আল্লাহ্‌র ইচ্ছানুযায়ী আটকে রাখা হবে। এরপর তাকে জান্নাতে প্রবেশ করানো হবে। তখন দরিদ্র ব্যক্তি তার সাথে সাক্ষাৎ করে বলবে: হে আমার ভাই, কিসে তোমাকে আটকে রেখেছিল? আল্লাহর কসম! তোমাকে এত দীর্ঘ সময় আটকে রাখা হয়েছিল যে আমি তোমার জন্য ভয় পেয়েছিলাম! তখন সে বলবে: হে আমার ভাই! তোমার পরে আমাকে এক ভয়াবহ, অপ্রীতিকর স্থানে আটকে রাখা হয়েছিল। আমি তোমার কাছে পৌঁছাতে পারিনি যতক্ষণ না আমার শরীর থেকে এত পরিমাণ ঘাম ঝরেছে যে, যদি এক হাজার উট, যারা সবাই লোনা ঘাস খেত, সেই ঘামের কাছে আসত, তবে তারা তৃপ্ত হয়ে ফিরে যেত।)

মুনকার।

এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (১/৩০৪): আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন হাসান: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন দুওয়াইদ, তিনি সালম ইবনু বাশীর থেকে, তিনি ইকরিমা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি যঈফ (দুর্বল)। এর বর্ণনাকারীরা নির্ভরযোগ্য, তবে এই (দুওয়াইদ) ব্যতীত। আমি এমন কাউকে দেখিনি যিনি তার জীবনী লিখেছেন, তবে ইবনু মাকুলা তাকে ‘আল-ইকমাল’ (৩/৩৮৬)-এ হুসাইন (এভাবেই) ইবনু মুহাম্মাদ আল-মারওয়াযীর সূত্রে তার থেকে উল্লেখ করেছেন এবং তার পিতার নাম দিয়েছেন (সুলাইমান)। তিনি বলেছেন: ‘তিনি সালম ইবনু বাশীর ইবনু জাহল এবং উসমান ইবনু আতা থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন।’ তিনি তার সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা’দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি; সুতরাং সে মাজহুল (অজ্ঞাত)। হাইসামী ‘মাজমাউয যাওয়াইদ’ (১০/২৬৩)-এ বলেছেন: ‘এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন, আর এতে (দুওয়াইদ) রয়েছে, যার বংশ পরিচয় উল্লেখ করা হয়নি। যদি সে সেই ব্যক্তি হয় যার থেকে সুফিয়ান বর্ণনা করেছেন; তবে তাকে আল-ইজলী ‘কিতাবুস সিকাত’-এ উল্লেখ করেছেন। আর যদি সে অন্য কেউ হয়; তবে আমি তাকে চিনি না। আর সালম ইবনু বাশীর ব্যতীত এর অবশিষ্ট বর্ণনাকারীরা ‘সহীহ’ এর বর্ণনাকারী, আর সে (সালম ইবনু বাশীর) নির্ভরযোগ্য।’

আমি বলি: সে সেই ব্যক্তি নয় যার থেকে সুফিয়ান—অর্থাৎ সাওরী—বর্ণনা করেছেন; কারণ সে তার চেয়ে নিম্ন স্তরের। সে সুফিয়ান ইবনু উয়াইনাহর স্তরের। ইবনু আবী হাতিম একই স্তরের তিনজনের জীবনী লিখেছেন। তাদের একজন: এই ব্যক্তি যার থেকে সাওরী বর্ণনা করেছেন, এবং তার সম্পর্কে বলেছেন: ‘একজন দুর্বল শায়খ।’ দ্বিতীয়জন: (দুওয়াইদ আল-ফিলিস্তিনী), তার থেকে সাঈদ ইবনু আবী আইয়ূব বর্ণনা করেছেন, এবং তিনি (ইবনু আবী হাতিম) তার সম্পর্কে নীরব থেকেছেন। আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘আস-সিকাত’ (৮/২৩৭)-এ উল্লেখ করেছেন এবং উল্লেখ করেছেন যে, তার থেকে সাওরী বর্ণনা করেছেন। যেন তিনি মনে করেন যে, সে এবং তার পূর্বের জন একই ব্যক্তি, আর এটি অসম্ভব নয়। তৃতীয়জন: দুওয়াইদ ইবনু নাফি’, বনী উমাইয়্যার আযাদকৃত গোলাম, তার থেকে লাইস ইবনু সা’দ এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন। আবূ হাতিম বলেছেন: ‘সে একজন শায়খ।’ আর ইবনু হিব্বান (৬/২৯২) বলেছেন: ‘তার হাদীস সরল (মুস্তাকীমুল হাদীস)।’ অন্যরাও তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ‘আত-তাহযীব’-এ তার জীবনী রয়েছে, এবং তিনি বলেছেন: ‘আমি তার ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একটি বর্ণনা দেখেছি, তবে বলা হয়েছে যে এটি মুরসাল।’ সুতরাং সে এই হাদীসের বর্ণনাকারী (দুওয়াইদ)-এর চেয়ে অনেক পূর্বের।

আশ্চর্যের বিষয় হলো যে, হাফিয (ইবনু হাজার) ‘তা’জীলুল মানফা’আহ’-তে তার জীবনী লেখেননি; যদিও সে তার শর্তের অন্তর্ভুক্ত! কারণ তিনি এতে (পৃ. ১৪৪/৩৫১) উল্লেখ করেছেন: ‘আ- সালিম ইবনু বাশীর, ইকরিমা থেকে, আর তার থেকে দুওয়াইদ আল-খুরাসানী, মাজহুল (অজ্ঞাত)। আমি (হাফিয) বলি: এটি ভুল যা বিকৃতির কারণে হয়েছে। বরং এটি হলো (সালম), লাম-এ সুকুন এবং এরপর মীম। আমি ইনশাআল্লাহ তা’আলা এটিকে সঠিকরূপে উল্লেখ করব।’ আমি (আলবানী) বলি: সেখানে তিনি সঠিকরূপে উল্লেখ করা ছাড়া আর কিছুই করেননি, তিনি বলেছেন (১৫৮/৩৯২): ‘সালম ইবনু বাশীর। (সালিম)-এর অধীনে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে!’ স্পষ্টতই, তার জীবনী লেখা তার জন্য সহজ হয়নি; তাই তিনি পূর্বেরটির দিকে ইঙ্গিত করেছেন। অথচ ইবনু আবী হাতিম (২/১/২৬৬) তার জীবনী লিখেছেন এবং ইবনু মাঈন থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি বলেছেন: ‘তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’ আর ইবনু হিব্বান তাকে ‘সিকাতুত তাবেঈন’ (৪/৩৩৪) এবং ‘আতবাউহুম’ (৬/৪২০)-এ উল্লেখ করেছেন। এতদসত্ত্বেও শাইখ আহমাদ শাকির (রাহিমাহুল্লাহ) এই হাদীসের টীকায় (৪/২৭৩) বলেছেন: ‘আমি এই (সালম)-এর কোনো জীবনীই খুঁজে পাইনি।’

উদ্দেশ্য হলো: হাফিয (রাহিমাহুল্লাহ) এই (দুওয়াইদ)-এর জীবনী লেখেননি, যদিও তিনি আল-হুসাইনীর (সালিম ইবনু বাশীর)-এর জীবনী থেকে সতর্ক হয়েছিলেন যে, সে ‘আল-মুসনাদ’-এর বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত, বিশেষত যখন তিনি তাকে (আল-খুরাসানী) বলে আখ্যায়িত করেছেন। এটি এমন বিষয় যা তাকে জীবনী লেখার মাধ্যমে তুলে ধরতে স্মরণ করিয়ে দেয়। কিন্তু আল্লাহ সত্য বলেছেন: {আর তারা তাঁর জ্ঞানের কোনো কিছুই আয়ত্ত করতে পারে না, তবে তিনি যা চান তা ব্যতীত।}

উপরোক্ত আলোচনা থেকে প্রতীয়মান হয় যে, ‘আত-তারগীব’ (৪/৮৮/১৮)-এ এই হাদীসকে শক্তিশালী বলার দাবিটি ভুল: ‘এটি আহমাদ একটি উত্তম শক্তিশালী সনদ সহকারে বর্ণনা করেছেন!’ স্পষ্টতই, তিনি হয়তো ভুল করে ভেবেছিলেন যে সে (দুওয়াইদ আল-ফিলিস্তিনী) অথবা (আল-উমাভী), যাদেরকে ইবনু হিব্বান নির্ভরযোগ্য বলেছেন। অথচ আপনি জেনেছেন যে তারা তার চেয়ে উচ্চ স্তরের, এবং সে যে তাদের মধ্যে একজন, তার কোনো প্রমাণ নেই; এই কারণেই আমীর ইবনু মাকুলা নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে সে তাদের থেকে ভিন্ন। আর আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

এরপর আমি এমন একটি বক্তব্যের সন্ধান পেলাম যা তার অজ্ঞাত হওয়াকে সমর্থন করে, আর তা হলো হাফিয আল-ইরাকীর ‘আল-মুগনী’ (৪/২২৬)-এর উক্তি: ‘... আর এতে (দুওয়াইদ) রয়েছে, যার বংশ পরিচয় উল্লেখ করা হয়নি, তাকে জানা প্রয়োজন। আহমাদ বলেছেন: তার হাদীস তার মতোই।’

আর ‘আত-তারগীব’-এর তিনজন টীকাকারদের অজ্ঞতা এবং জ্ঞান না থাকা সত্ত্বেও তাদের অনুসরণ করার প্রমাণ হলো: তারা এই হাদীসের তাখরীজ শুরু করেছেন এর টীকায় (৪/৪০) তাদের এই উক্তি দ্বারা: ‘হাসান, ...’। এরপর তারা হাইসামী-এর পূর্বোক্ত বক্তব্যকে এর সাথে জুড়ে দিয়েছেন, অথচ তা কোনোভাবেই তাদের ‘হাসান’ বলার প্রমাণ দেয় না; কারণ তিনি (হাইসামী) দ্বিধায় ছিলেন যে সে কি সেই ব্যক্তি যাকে আল-ইজলী নির্ভরযোগ্য বলেছেন, নাকি অন্য কেউ যাকে তিনি চেনেন না। সুতরাং তার বক্তব্য থেকে কিছু অংশ গ্রহণ করা এবং কিছু অংশ ছেড়ে দেওয়া বৈধ নয়। এরপর যদি ধরেও নেওয়া হয় যে, তিনি বা অন্য কেউ নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে সে নির্ভরযোগ্য; তবুও তাকে নিশ্চিতভাবে নির্ভরযোগ্য বলা উচিত নয়, কারণ ইবনু হিব্বানের মতো আল-ইজলী-এর নির্ভরযোগ্যতা প্রদানে শিথিলতা সুপরিচিত। বিশেষত যখন এখানে ইবনু আবী হাতিম-এর দুর্বল করার বক্তব্য তার বিরোধিতা করছে—যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। হায় আল্লাহ! তারা কতই না অজ্ঞ, আর জ্ঞান ছাড়া কথা বলতে তারা কতই না দুঃসাহসী! আর আল্লাহই সাহায্যকারী।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6780)


(احتجموا باسم الله على الريق؛ فإنه يزيد الحافظ حفظاً، ولا تحتجموا يوم السبت؛ فإنه يوم يدخل الداء ويخرج الشفاء، واحتجموا يوم الأحد، فإنه يخرج الداء ويدخل الشفاء، ولا تحتجموا يوم الاثنين؛ فإنه يوم فجعتم فيه بنبيكم صلى الله عليه وسلم، واحتجموا يوم الثلاثاء؛ فإنه يوم دم، وفيه قتل ابن آدم أخاه، ولا تحتجموا يوم الأربعاء؛ فإنه يوم نحس، وفيه سال عيون الصبر (!) ، وفيه أنزلت سورة الحديد، واحتجموا يوم الخميس؛ فإنه يوم أنيس، وفيه رفع إدريس؛ وفيه لعن إبليس، وفيه رد الله على يعقوب بصره، ورد عليه يوسف، ولا تحتجموا يوم الجمعة؛ فإن فيها ساعة لو وافت أمة محمد؛ لماتوا جميعاً) .
باطل.

أخرجه أبو نعيم في ` الطب النبوي ` (ق 52/ 1 - 2) من طريق أبي يحيى الوقار: ثنا محمد بن إسماعيل المرادي عن أبيه عن نافع مولى ابن عمر: أن عبد الله بن عمر أرسل رسولاً فقال: ادع لي حجاماً، ولا تدعه شيخاً، ولا صبياً، وقال: … فذكره.
ورواه ابن أبي حاتم في ` العلل ` فقال (2/ 277/ 2330) : سمعت أبي وحدثنا زكريا بن يحيى الوقار (1) عن محمد بن إسماعيل المرادي به الا أنه لم يسقه بتمامه، ثم قال:
(1) الأصل هنا (الوقات) ، وفي الموضع الآخر الآتي (الوقاد) ! وهو من تحريفات الناسخ أو الطابع، والتصحيح من كتب الرجال: ومنها كتاب ابن أبي حاتم في ` الجرح ` (1/ 2/ 601) .
`فقال أبي: هذا حديث باطل، ومحمد هذا مجهول، وأبوه مجهول `.
وكذا قال في ترجمة (محمد بن إسماعيل المرادي) من ` الجرح والتعديل ` (3/ 2/ 189/ 1074) ، وأقره الذهبي في ` الميزان `، والحافظ في ` اللسان `.
وكذلك قال في موضع آخر من ` العلل ` (2/ 282/ 2346) وزاد:
` قال أبي: وروى هذا الحديث كاتب الليث عن عطاف عن نافع عن ابن عمر. وهو مما أدخل على أبي صالح. ورواه عبد الله بن هشام الدستوائي عن أبيه عن أيوب عن نافع عن ابن عمر. وعبد الله متروك الحديث `.
وأقره الحافظ في ` اللسان `.
ولي على ما تقدم ملاحظات، لابد من بيانها، فأقول:
الأولى: إن إعلال الحديث والحكم عليه بالبطلان بـ (زكريا بن يحيى الوقار) أولى من إعلاله بشيخه وأبيه المجهولين؛ وذلك؛ لأن زكريا هذا كذاب، ففي ` الميزان `:
` قال ابن عدي: يضع الحديث، قال صالح جزرة: حدثنا زكريا الوقار وكان من الكذابين الكبار`.
لكن الظاهرأن أبا حاتم لم يعرفه، فقد ذكر ابنه عنه أنه سمع منه بمصر في الرحلة الثانية، وروى عنه، فلو كان تبين له كذبه؛ ما روى عنه - إن شاء الله - ، ولأعله به.
الثانية: حديث الترجمة موقوف، وحديث كاتب الليث عن عطاف مرفوع، وقد أخرجه عنه كذلك جمع منهم الحاكم؛ كما تراه مخرجاً في ` الصحيحة ` تحت حديث ابن عمر هذا مختصراً برقم (766) .
الثالثة: قوله: ` وروى هذا الحديث كاتب الليث … ` إلخ؛ يوهم أنه رواه بتمامه، وليس كذلك، فإن الشطر الثاني منه، ابتداة من قوله: ` فإنه يوم نحس … ` إلخ، لا أصل له في حديثه. وكذلك يقال في حديث (عبد الله الدستوائي) ، بل هذا مختصر جداً، ليس فيه إلا الأمر بالحجامة في ثلاثة أيام، والنهي عن الحجامة يوم الأربعاء! وفيه نكارة بينتها هناك في ` الصحيحة `.
الرابعة: اقتصاره على ذكر متابعين للمرادي عن نافع، يوهم أنه لا يوجد غيرهما. والواقع خلافه أيضاً؛ فقد تابعهم سعيد بن ميمون عند ابن ماجه، ومحمد بن جحادة من ثلاث طرق عنه، عند ابن ماجه وغيره، وهي مخرجة هناك
في ` الصحيحة `، فاقتضى التنبيه. والله تعالى ولي التوفيق.
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(আল্লাহর নামে খালি পেটে রক্তমোক্ষণ (হিজামা) করো; কারণ তা স্মৃতিশক্তি সম্পন্ন ব্যক্তির স্মৃতিশক্তি বৃদ্ধি করে। আর শনিবার রক্তমোক্ষণ করো না; কারণ তা এমন দিন যেদিন রোগ প্রবেশ করে এবং আরোগ্য বের হয়ে যায়। আর রবিবার রক্তমোক্ষণ করো; কারণ তা এমন দিন যেদিন রোগ বের হয়ে যায় এবং আরোগ্য প্রবেশ করে। আর সোমবার রক্তমোক্ষণ করো না; কারণ তা এমন দিন যেদিন তোমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিয়ে তোমরা শোকাহত হয়েছিলে। আর মঙ্গলবার রক্তমোক্ষণ করো; কারণ তা রক্তের দিন, আর এই দিনেই আদম সন্তান তার ভাইকে হত্যা করেছিল। আর বুধবার রক্তমোক্ষণ করো না; কারণ তা অশুভ দিন, আর এই দিনেই ধৈর্যের ঝর্ণাধারা প্রবাহিত হয়েছিল (!) , আর এই দিনেই সূরাহ আল-হাদীদ নাযিল হয়েছিল। আর বৃহস্পতিবার রক্তমোক্ষণ করো; কারণ তা আনন্দের দিন, আর এই দিনেই ইদরীস (আঃ)-কে উপরে উঠিয়ে নেওয়া হয়েছিল; আর এই দিনেই ইবলীসকে অভিশাপ দেওয়া হয়েছিল, আর এই দিনেই আল্লাহ তাআলা ইয়াকুব (আঃ)-এর দৃষ্টিশক্তি ফিরিয়ে দিয়েছিলেন এবং তাঁর কাছে ইউসুফ (আঃ)-কে ফিরিয়ে দিয়েছিলেন। আর শুক্রবার রক্তমোক্ষণ করো না; কারণ এই দিনে এমন একটি মুহূর্ত আছে, যদি তা মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উম্মতের সাথে মিলে যায়, তবে তারা সবাই মারা যাবে।)

**বাতিল (জাল)।**

এটি আবূ নুআইম তাঁর ‘আত-তিব্বুন নাবাবী’ (৫২/১-২) গ্রন্থে আবূ ইয়াহইয়া আল-ওয়াক্কারের সূত্রে বর্ণনা করেছেন: তিনি বলেন, আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আল-মুরাদী তাঁর পিতা থেকে, তিনি নাফি‘ মাওলা ইবনু উমার থেকে, যে আবদুল্লাহ ইবনু উমার একজন দূতকে পাঠিয়ে বললেন: আমার জন্য একজন রক্তমোক্ষণকারীকে ডেকে আনো, তবে সে যেন বৃদ্ধ না হয় এবং শিশুও না হয়। আর তিনি বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।

আর ইবনু আবী হাতিম এটি ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন (২/২৭৭/২৩৩০): আমি আমার পিতাকে বলতে শুনেছি, আর আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন যাকারিয়া ইবনু ইয়াহইয়া আল-ওয়াক্কার (১) মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আল-মুরাদী থেকে, এই সূত্রে। তবে তিনি তা সম্পূর্ণ বর্ণনা করেননি। অতঃপর তিনি (ইবনু আবী হাতিম) বলেন:

(১) এখানে মূল কিতাবে রয়েছে (আল-ওয়াক্কাত), আর পরবর্তী অন্য স্থানে রয়েছে (আল-ওয়াক্কাদ)! এটি লিপিকার বা মুদ্রণকারীর বিকৃতি। আর শুদ্ধি করা হয়েছে রিজাল শাস্ত্রের কিতাবসমূহ থেকে: যার মধ্যে ইবনু আবী হাতিমের ‘আল-জারহ’ কিতাবটিও রয়েছে (১/২/৬০)।

`অতঃপর আমার পিতা বললেন: এই হাদীসটি বাতিল (জাল), আর এই মুহাম্মাদ মাজহূল (অজ্ঞাত), এবং তার পিতাও মাজহূল।`

অনুরূপভাবে তিনি (ইবনু আবী হাতিম) ‘আল-জারহ ওয়াত-তা‘দীল’ গ্রন্থে (মুহাম্মাদ ইবনু ইসমাঈল আল-মুরাদী)-এর জীবনীতে বলেছেন (৩/২/১৮৯/১০৭৪), আর ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে এবং হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তা সমর্থন করেছেন।

অনুরূপভাবে তিনি ‘আল-ইলাল’ গ্রন্থের অন্য এক স্থানে বলেছেন (২/২৮২/২৩৪৬) এবং অতিরিক্ত বলেছেন:

`আমার পিতা বললেন: এই হাদীসটি লাইসের লেখক ‘আত্তাফ থেকে, তিনি নাফি‘ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এটি সেই হাদীসগুলোর অন্তর্ভুক্ত যা আবূ সালিহের উপর ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। আর এটি বর্ণনা করেছেন আবদুল্লাহ ইবনু হিশাম আদ-দুসতুওয়ায়ী তাঁর পিতা থেকে, তিনি আইয়ূব থেকে, তিনি নাফি‘ থেকে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর আবদুল্লাহ মাতরূকুল হাদীস (পরিত্যক্ত রাবী)।`

আর হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-লিসান’ গ্রন্থে তা সমর্থন করেছেন।

আর পূর্বে যা উল্লেখ করা হয়েছে, সে বিষয়ে আমার কিছু পর্যবেক্ষণ রয়েছে, যা বর্ণনা করা অপরিহার্য। সুতরাং আমি বলছি:

**প্রথমত:** এই হাদীসকে (যাকারিয়া ইবনু ইয়াহইয়া আল-ওয়াক্কার)-এর কারণে ত্রুটিযুক্ত ঘোষণা করা এবং বাতিল বলে রায় দেওয়া তার মাজহূল (অজ্ঞাত) শায়খ ও পিতার কারণে ত্রুটিযুক্ত ঘোষণা করার চেয়ে অধিক উত্তম; কারণ এই যাকারিয়া একজন মিথ্যুক। ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে রয়েছে:

`ইবনু আদী বলেছেন: সে হাদীস জাল করত। সালিহ জাযারাহ বলেছেন: আমাদের কাছে যাকারিয়া আল-ওয়াক্কার হাদীস বর্ণনা করেছে, আর সে ছিল বড় মিথ্যুকদের একজন।`

কিন্তু বাহ্যত মনে হয় যে, আবূ হাতিম তাকে চিনতেন না। কারণ তার পুত্র তার সম্পর্কে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি দ্বিতীয় সফরে মিসরে তার কাছ থেকে শুনেছেন এবং তার থেকে বর্ণনা করেছেন। যদি তার কাছে তার মিথ্যাবাদী হওয়া স্পষ্ট হয়ে যেত, তবে তিনি তার থেকে বর্ণনা করতেন না—ইনশাআল্লাহ—এবং তার মাধ্যমেই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত ঘোষণা করতেন।

**দ্বিতীয়ত:** আলোচ্য হাদীসটি মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি), আর লাইসের লেখকের হাদীসটি ‘আত্তাফ থেকে মারফূ‘ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি)। আর এই সূত্রেই একদল রাবী তা বর্ণনা করেছেন, তাদের মধ্যে হাকিমও রয়েছেন; যেমনটি আপনি তা ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসের অধীনে সংক্ষিপ্তাকারে (৭৬৬) নম্বরে দেখতে পাবেন।

**তৃতীয়ত:** তার এই উক্তি: `আর এই হাদীসটি লাইসের লেখক বর্ণনা করেছেন...` ইত্যাদি; এই ধারণা দেয় যে, তিনি তা সম্পূর্ণ বর্ণনা করেছেন। কিন্তু বিষয়টি এমন নয়। কারণ এর দ্বিতীয় অংশ, যা তার এই উক্তি থেকে শুরু হয়েছে: `কারণ তা অশুভ দিন...` ইত্যাদি, তার হাদীসে এর কোনো ভিত্তি নেই। অনুরূপ কথা (আবদুল্লাহ আদ-দুসতুওয়ায়ী)-এর হাদীস সম্পর্কেও বলা যায়। বরং এটি খুবই সংক্ষিপ্ত, এতে কেবল তিনটি দিনে রক্তমোক্ষণের আদেশ এবং বুধবার রক্তমোক্ষণ করতে নিষেধ করা হয়েছে! আর এতে মুনকার (অস্বীকৃত) বিষয় রয়েছে, যা আমি সেখানে ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে স্পষ্ট করে দিয়েছি।

**চতুর্থত:** নাফি‘ থেকে আল-মুরাদীর জন্য কেবল দুজন মুতাবি‘ (সমর্থক রাবী)-এর উল্লেখ করা এই ধারণা দেয় যে, তাদের ছাড়া আর কেউ নেই। কিন্তু বাস্তবতা এর বিপরীত। কারণ সাঈদ ইবনু মাইমূন ইবনু মাজাহর কাছে তাদের অনুসরণ করেছেন, এবং মুহাম্মাদ ইবনু জুহাদাহ তার থেকে তিনটি সূত্রে ইবনু মাজাহ ও অন্যান্যদের কাছে অনুসরণ করেছেন। আর সেগুলো সেখানে ‘আস-সহীহাহ’ গ্রন্থে উল্লেখ করা হয়েছে। সুতরাং এ বিষয়ে সতর্ক করা আবশ্যক ছিল। আর আল্লাহ তাআলাই তাওফীকদাতা।









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6781)


(من غسل ميتاً فكتم عليه؛ غفرالله له أربعين كبيرة … ) .
شاذ بلفظ: ` كبيرة`.

أخرجه الطبراني في ` المعجم الكبير` (1/ 293 - 294/ 929) : حدثنا هارون بن ملول البصري: ثنا عبد الله بن يزيد المقرىء: ثنا سعيد بن أبي أيوب عن شرحبيل بن شريك عن علي بن رباح قال: سمعت أبا رافع يقول: … فذكره مرفوعاً.
قلت: وهذا إسناد ظاهره الصحة، وعليه جرى بعض الحفاظ، فقال المنذري في ` الترغيب ` (4/ 170/ 1) ، وتبعه الهيثمي في ` المجمع ` (3/ 21) : ` رواه الطبراني في ` الكبير `، ورواته محتج بهم في (الصحيح) `.
فأقول: هو كما قالا باستثثناء شيخ الطبراني، وهذه غالب عادتهم أنهم يغضون النظر عن شيوخ الطبراني إلا ما ندر؛ حتى ولو كان ممن تكلم فيه أو جُهل، أو غير ذلك؛ كالشذوذ أو المخالفة، وهذا هو العلة هنا، فقد رواه جماعة من الثقات بلفظ
` مرة` مكان `كبيرة `. فمنهم: عبد الصمد بن الفضل، وعبد الله بن أحمد بن أبي ميسرة، عند الحاكم (1/ 4 35، 362) ، ومن طريقه البيهقي في` الشعب ` (7/ 9/ 9265) ، وعباس بن عبد الله الترقفي عنده في ` السنن) ` (3/ 395) ، والمقدمي وأبو صالح سعيد بن عبد الله سيامرد - ولم أعرفه - كلهم قالوا: ` مرة `مخالفين (هارون بن ملول) في قوله: ` كبيرة `! وهذا من أوضح الأمثلة للحديث الشاذ وأقواها - كما لا يخفى على العارفين بهذا الفن الشريف - .
على أن (هارون) هذا لم أجد من وثقه من المتقدمين، مثل الدارقطني وأمثاله من أئمة الجرح والتعديل، وإنما وثقه ابن الجوزي فقال:
` كان من عقلاء الناس، ثقة في الحديث `.
كما نقله الشيخ الأنصاري في كتابه القيم ` بلغة القاصي والداني ` (ص 336) ، فإذا ثبتت ثقته؛ فيكون حديثه شاذاً، وإلا؛ كان منكراً. والله سبحانه وتعالى أعلم.
(تنبيه) : لقد اختلط على بعض الحفاظ المتأخرين وغيرهم؛ هذا اللفظ الشاذ باللفظ المحفوظ في تخريج الحديث، فعزوا الأول إلى من روى الآخر، وهاك البيان:
1 - الحافظ الزيلعي، فإنه ساق الحديث في ` نصب الراية ` (2/ 256) من رواية البيهقي في ` المعرفة ` عن شيخه الحاكم، بإسناده عن عبد الصمد بن الفضل عن عبد الله ين يزيد بإسناده المتقدم عن أبي رافع مرفوعاً بلفظ: ` كبيرة `. وقال:
`ورواه الطبراني في ` معجمه `: حدثنا هارون بن ملول المصري: ثنا عبد الله بن يزيد المقري به سنداً ومتناً. ورواه الحاكم في ` المستدرك `، وقال: على شرط مسلم `.
فأنت ترى أنه جعل لفظ الحاكم والبيهقي لفظاً واحداً هو: ` كبيرة `! وهذا خلاف ما تقدم: أن روايتهما من طريق عبد الصمد بن الفضل هي بلفظ الجماعة المحفوظ:
`مرة`.
وهكذا عزاه الإمام النووي في ` الجموع ` (5/ 186) للحاكم في ` المستدرك `، وأقره على التصحيح.
وما عزاه الزيلعي لـ ` معرفة البيهقي `، فهو وهم آخر، لا أدري هو منه أو من كاتب نسخته من ` المعرفة `، فقد تقدمت روايته في ` الشعب ` من طريق شيخه عن عبد الصمد بن الفضل بلفظ: ` مرة `. وكذلك وجدته فى نسخة مخطوطة عندي من ` المعرفة ` (2/ 139/ 2) ، مما يؤكد الوهم المذكور.
2 - الحافظ العسقلاني؛ فإنه ذكر في ` الدراية في تخريج أحاديث الهداية ` الطرف الأول من الحديث باللفظ الشاذ، وقال:
`إسناده قوي، أخرجه الحا كم والطبراني والبيهقي`.
ومن الواضح أنه تلخيص لتخريج الزيلعي، لم يرجع إلى الأصول الثلاثة التي ذكرها. ليتبين له الفرق بين اللفظين!
3 - المعلق أو المعلقون على` نصب الراية `؛ فإنهم شايعوا الأصل، بل ودعموه بنقل تقوية الحافظ لإسناده، دون أن ينتبهوا للفرق والشذوذ.
4 - الحافظ السيوطي، وابن عرّاق الكناني - كما يأتي قريباً - والمعلقان عليه.
5 - وأخيراً، المعلقون الثلاثة على ` الترغيب ` (4/ 232) ؛ فإنهم قالوا في تخريجهم
` حسن، قال الهيثمي … ` فذكروا قوله: ` رجاله رجال الصحيح، - كما تقدم - ، وتصحيح الحاكم والذهبي، دون أن يفرقوا أيضاً!! وأنى لهم العلم الذي يمكنهم من ذلك؟!
هذا، وفي مقابل هؤلاء أبو الفرج ابن الجوزي، فقد ساق في ` موضوعاته ` (2/ 85) حديثاً لأبي هريرة مرفوعاً بلفظ:
` من غسل ميتاً فستر عليه، وأدى الأمانة؛ غفر له أربعين مرة … ` الحديث.
وأعله بيوسف بن عطية، وقول ابن حبان:
` يقلب الأخبار، ويلزق المتون الموضوعة بالأسانيد الصحيحة`.
فكان عليه أن يشير إلى حديث أبي رافع هذا المحفوظ؛ حتى لا يتوهم القارئ أنه لا يوجد في الباب ما يغني عن حديت أبي هريرة هذا الواهي. ولذلك فقد أحسن السيوطي في ` اللآلي ` (2/ 8 - 9) في تعقبه إياه بحديث أبي رافع هذا، وتبعه ابن عراق في ` تنزيه الشريعة ` (2/ 69 - 70) برواية البيهقي المتقدمة من طريق الترقفي، ولكنهما لم يحسنا بسكوتهما عن بيان صحة إسناده، وأساءا بذكرمتنه بلفظ: ` كبيرة. `! مع لفظه في حديث أبي هريرة المشهود له بلفظ: ` مرة ` - كما نقلته آنفاً - ، ولكنه تحرف عندهما إلى ` كبيرة ` ا!
وأقر ذلك كله المعلقان الأزهريان (عبد الوهاب عبد اللطيف، وعبد الله محمد الصديق الغماري) الذي وصف نفسه تحت اسمه: ` من علماء الأزهر والقرويين، ومتخصص في علم الحديث والإسناد ` ا!
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"(যে ব্যক্তি কোনো মৃতকে গোসল করালো এবং তার দোষ গোপন রাখলো; আল্লাহ তাকে চল্লিশটি কবীরা গুনাহ ক্ষমা করে দেন...)।
এই শব্দে (`কবীরাহ`) এটি শা’য (Shadh/অপ্রচলিত)।

এটি ত্ববারানী তাঁর ‘আল-মু’জামুল কাবীর’ (১/২৯৩-২৯৪/৯২৯)-এ বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হারূন ইবনু মালূল আল-বাসরী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-মুকরী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন সাঈদ ইবনু আবী আইয়ূব, শুরাহবীল ইবনু শারীক থেকে, তিনি আলী ইবনু রাবাহ থেকে, তিনি বলেন: আমি আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি: ... অতঃপর তিনি হাদীসটি মারফূ’ (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) হিসেবে উল্লেখ করেছেন।
আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি বাহ্যত সহীহ (বিশুদ্ধ), আর কিছু হাফিয (হাদীস বিশেষজ্ঞ) এই মতের উপরই চলেছেন। যেমন মুনযিরী ‘আত-তারগীব’ (৪/১৭০/১)-এ বলেছেন, এবং তাঁর অনুসরণ করেছেন হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/২১)-এ: ‘এটি ত্ববারানী ‘আল-কাবীর’-এ বর্ণনা করেছেন, আর এর বর্ণনাকারীগণ (সহীহ) গ্রন্থে দলীল হিসেবে গৃহীত।’
আমি বলি: ত্ববারানীর শায়খ (শিক্ষক) ব্যতীত তারা যা বলেছেন তা-ই। আর তাদের (হাফিযদের) সাধারণ অভ্যাস হলো, তারা ত্ববারানীর শায়খদের ব্যাপারে চোখ বন্ধ রাখেন, খুব কম ক্ষেত্রেই ব্যতিক্রম হয়; এমনকি যদি সেই শায়খ এমনও হন যার ব্যাপারে সমালোচনা করা হয়েছে বা যিনি অজ্ঞাত, অথবা অন্য কোনো ত্রুটি থাকে; যেমন শা’য হওয়া বা (অন্যদের) বিরোধিতা করা। আর এখানে এটাই হলো ‘ইল্লত’ (ত্রুটি)। কারণ, একদল নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী এই হাদীসটি `কবীরাহ` শব্দের পরিবর্তে `মাররাহ` (বার) শব্দে বর্ণনা করেছেন। তাদের মধ্যে রয়েছেন: আব্দুল সামাদ ইবনুল ফাদল, এবং আব্দুল্লাহ ইবনু আহমাদ ইবনু আবী মাইসারাহ, যা হাকিমের নিকট (১/৩৩৫, ৩৬২)-এ রয়েছে, এবং এই সূত্রে বাইহাকী ‘আশ-শু’আব’ (৭/৯/৯২৬৫)-এ বর্ণনা করেছেন, এবং আব্বাস ইবনু আব্দুল্লাহ আত-তারকাফী তাঁর ‘আস-সুনান’ (৩/৩৯৫)-এ বর্ণনা করেছেন, এবং আল-মুক্বাদ্দামী ও আবূ সালিহ সাঈদ ইবনু আব্দুল্লাহ সিয়ামারদ – যাকে আমি চিনি না – তারা সকলেই `মাররাহ` (বার) শব্দটি বলেছেন, যা (হারূন ইবনু মালূল)-এর `কবীরাহ` শব্দের বিপরীত! আর এটি শা’য হাদীসের স্পষ্টতম ও শক্তিশালী উদাহরণগুলোর মধ্যে অন্যতম – যেমনটি এই সম্মানিত ফনের (হাদীস শাস্ত্রের) বিশেষজ্ঞদের নিকট গোপন নয়।
তা সত্ত্বেও, এই (হারূন)-কে আমি মুতাক্বাদ্দিমীন (পূর্ববর্তী) ইমামদের মধ্যে এমন কাউকে পাইনি যিনি তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন, যেমন দারাকুতনী এবং জারহ ওয়া তা’দীল (সমালোচনা ও নির্ভরযোগ্যতা যাচাই) শাস্ত্রের অন্যান্য ইমামগণ। বরং ইবনুল জাওযী তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন এবং বলেছেন: ‘তিনি ছিলেন মানুষের মধ্যে বুদ্ধিমানদের একজন, হাদীসে নির্ভরযোগ্য।’ যেমনটি শায়খ আল-আনসারী তাঁর মূল্যবান গ্রন্থ ‘বুলগাতুল ক্বাসি ওয়াদ দানী’ (পৃ. ৩৩৬)-এ উদ্ধৃত করেছেন। যদি তার নির্ভরযোগ্যতা প্রমাণিত হয়; তবে তার হাদীসটি শা’য হবে, অন্যথায় তা মুনকার (অস্বীকৃত) হবে। আর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা’আলা সর্বজ্ঞ।
(সতর্কতা): কিছু মুতাআখখিরীন (পরবর্তী) হাফিয এবং অন্যান্যদের নিকট হাদীসের তাখরীজ (সূত্র উল্লেখ)-এর ক্ষেত্রে এই শা’য শব্দটি সংরক্ষিত (মাহফূয) শব্দের সাথে মিশ্রিত হয়ে গেছে। ফলে তারা প্রথমটিকে (শা’য) এমন ব্যক্তির দিকে সম্পর্কিত করেছেন যিনি দ্বিতীয়টি (মাহফূয) বর্ণনা করেছেন। এই হলো তার ব্যাখ্যা:
১ - হাফিয যাইলা’ঈ, তিনি ‘নাসবুর রায়াহ’ (২/২৫৬)-এ হাদীসটি বাইহাকীর ‘আল-মা’রিফাহ’ গ্রন্থ থেকে তাঁর শায়খ হাকিমের সূত্রে, তাঁর সনদসহ আব্দুল সামাদ ইবনুল ফাদল থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ থেকে, তাঁর পূর্বোক্ত সনদসহ আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে `কবীরাহ` শব্দে উল্লেখ করেছেন। এবং তিনি বলেছেন: ‘আর ত্ববারানী তাঁর ‘মু’জাম’-এ বর্ণনা করেছেন: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন হারূন ইবনু মালূল আল-মিসরী: আমাদের নিকট হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু ইয়াযীদ আল-মুকরী, একই সনদ ও মাতন (মূল পাঠ) সহ। আর হাকিম ‘আল-মুস্তাদরাক’-এ বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী।’ আপনি দেখতে পাচ্ছেন যে, তিনি হাকিম ও বাইহাকীর শব্দকে একটিই শব্দ বানিয়েছেন, আর তা হলো: `কবীরাহ`! অথচ এটি পূর্বের বক্তব্যের বিপরীত: যে তাদের উভয়ের বর্ণনা আব্দুল সামাদ ইবনুল ফাদলের সূত্রে জামা’আতের সংরক্ষিত শব্দ `মাররাহ` (বার) দ্বারা বর্ণিত। একইভাবে ইমাম নববী ‘আল-মাজমূ’ (৫/১৮৬)-এ হাদীসটিকে হাকিমের ‘আল-মুস্তাদরাক’-এর দিকে সম্পর্কিত করেছেন এবং সহীহ বলার ক্ষেত্রে তাকে সমর্থন করেছেন। আর যাইলা’ঈ বাইহাকীর ‘মা’রিফাহ’-এর দিকে যা সম্পর্কিত করেছেন, তা আরেকটি ভুল। আমি জানি না এটি তাঁর নিজের ভুল নাকি ‘আল-মা’রিফাহ’-এর তাঁর কপির লেখকের ভুল। কারণ, তাঁর বর্ণনা ‘আশ-শু’আব’-এ তাঁর শায়খের সূত্রে আব্দুল সামাদ ইবনুল ফাদল থেকে `মাররাহ` শব্দে পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে। অনুরূপভাবে আমি আমার নিকট থাকা ‘আল-মা’রিফাহ’-এর একটি পাণ্ডুলিপিতেও (২/১৩৯/২) তা পেয়েছি, যা উল্লিখিত ভুলটিকে নিশ্চিত করে।
২ - হাফিয আল-আসক্বালানী; তিনি ‘আদ-দিরায়াহ ফী তাখরীজি আহাদীসিল হিদায়াহ’-এ হাদীসের প্রথম অংশটি শা’য শব্দে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘এর সনদ শক্তিশালী, এটি হাকিম, ত্ববারানী ও বাইহাকী বর্ণনা করেছেন।’ এটা স্পষ্ট যে, এটি যাইলা’ঈর তাখরীজের সংক্ষিপ্ত রূপ, তিনি উল্লিখিত তিনটি মূল উৎসের দিকে প্রত্যাবর্তন করেননি, যাতে তার নিকট দুটি শব্দের পার্থক্য স্পষ্ট হয়ে যায়!
৩ - ‘নাসবুর রায়াহ’-এর টীকাকার বা টীকাকারগণ; তারা মূলের (যাইলা’ঈর) অনুসরণ করেছেন, বরং হাফিযের (যাইলা’ঈর) সনদের শক্তিশালীকরণের উদ্ধৃতি দিয়ে তাকে সমর্থন করেছেন, অথচ পার্থক্য ও শা’য হওয়ার দিকে মনোযোগ দেননি।
৪ - হাফিয সুয়ূতী, এবং ইবনু আর্রাক আল-কিনানী – যেমনটি শীঘ্রই আসছে – এবং তার উপর টীকাকারদ্বয়।
৫ - এবং সবশেষে, ‘আত-তারগীব’ (৪/২৩২)-এর তিনজন টীকাকার; তারা তাদের তাখরীজে বলেছেন: ‘হাসান, হাইসামী বলেছেন...’ অতঃপর তারা তাঁর এই উক্তিটি উল্লেখ করেছেন: ‘এর বর্ণনাকারীগণ সহীহ-এর বর্ণনাকারী – যেমনটি পূর্বে উল্লেখ করা হয়েছে – এবং হাকিম ও যাহাবীর সহীহ বলাকে (উল্লেখ করেছেন), অথচ তারাও পার্থক্য করেননি!! আর এই জ্ঞান তাদের কাছে কীভাবে আসবে যা তাদের জন্য তা করা সম্ভব করে তোলে?!
এই হলো অবস্থা, আর এদের বিপরীতে রয়েছেন আবুল ফারাজ ইবনুল জাওযী, তিনি তাঁর ‘মাওদ্বূ’আত’ (২/৮৫)-এ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে এই শব্দে একটি হাদীস উল্লেখ করেছেন: ‘যে ব্যক্তি কোনো মৃতকে গোসল করালো এবং তার দোষ গোপন রাখলো, আর আমানত আদায় করলো; তাকে চল্লিশ বার ক্ষমা করা হয়...’ হাদীসটি। আর তিনি ইউসুফ ইবনু আতিয়্যার কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন, এবং ইবনু হিব্বানের এই উক্তি উল্লেখ করেছেন: ‘সে খবর উল্টে দেয় এবং মাওদ্বূ’ (জাল) মাতনগুলোকে সহীহ সনদের সাথে জুড়ে দেয়।’ সুতরাং তাঁর উচিত ছিল আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই সংরক্ষিত হাদীসটির দিকে ইঙ্গিত করা; যাতে পাঠক এই ধারণা না করে যে এই দুর্বল আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটির পরিবর্তে এই অধ্যায়ে আর কোনো হাদীস নেই যা যথেষ্ট হতে পারে। এই কারণে সুয়ূতী ‘আল-লাআলী’ (২/৮-৯)-এ আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটি দ্বারা তাঁর (ইবনুল জাওযীর) সমালোচনা করে উত্তম কাজ করেছেন, এবং ইবনু আর্রাক ‘তানযীহুশ শারী’আহ’ (২/৬৯-৭০)-এ তার অনুসরণ করেছেন, যা তারকাফীর সূত্রে বাইহাকীর পূর্বোক্ত বর্ণনা দ্বারা বর্ণিত। কিন্তু তারা উভয়েই এর সনদের বিশুদ্ধতা বর্ণনা না করে নীরব থাকার কারণে ভালো কাজ করেননি, এবং এর মাতন `কবীরাহ` শব্দে উল্লেখ করে খারাপ কাজ করেছেন! অথচ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে এর পক্ষে সাক্ষ্যদানকারী শব্দটি হলো `মাররাহ` (বার) – যেমনটি আমি পূর্বে উদ্ধৃত করেছি – কিন্তু তাদের উভয়ের নিকট তা বিকৃত হয়ে `কবীরাহ`-তে পরিণত হয়েছে! আর এই সবকিছুর সমর্থন করেছেন আযহারের দুই টীকাকার (আব্দুল ওয়াহহাব আব্দুল লতীফ, এবং আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ আস-সিদ্দীক আল-গুমারী) যিনি নিজের নামের নিচে নিজেকে এভাবে বর্ণনা করেছেন: ‘আযহার ও ক্বারাবিয়্যীনের আলেমদের একজন, এবং হাদীস ও ইসনাদ শাস্ত্রে বিশেষজ্ঞ’!









সিলসিলাতুল আহাদীসিদ দ্বাঈফাহ ওয়াল মাওদ্বুআহ (6782)


(لَوْ أَنَّ قَطْرَةً مِنْ الزَّقُّومِ قُطِرَتْ فِي دَارِ الدُّنْيَا لَأَفْسَدَتْ عَلَى أَهْلِ الدُّنْيَا مَعَايِشَهُمْ فَكَيْفَ بِمَنْ يَكُونُ طَعَامَهُ؟!) .
ضعيف () .

أخرجه الترمذي (2588) ، والنسائي في (الكبرى، (6/313/ 070 1 1) ، وابن ماجه (4325) ، وابن حبان (1 261 - الموارد) ، والحاكم (2/ 294 و 451) ، والطيالسي في ` مسنده ` (344/ 2643) ، وعنه البيهقي في ` البعث والنشور ` (289 - 0 29) ، وأحمد (1/ 1 0 3 و 338) ، والطبراني في معاجمه الثلاثة: ` الكبير ` (11/ 68/ 11068) ، و `الأوسط ` (8/ 259/ 7551) و ` الصغير ` (ص 118 - هند) من طرق عن شعبة عن الأعمش عن مجاهد عن ابن عباس:
أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ هذه الآية: {اتقوا الله حق تقاته ولا تموتن إلا وأنتم مسلمون} ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: … فذكره. والسياق للترمذي، وقال:
` حديث حسن صحيح `! وقال الحاكم:
` صحيح على شرط الشيخين `! ووافقه الذهبي! وقال الطبراني:
` لم يروه عن الأعمش إلا شعبة`.
قلت: بلى، قد رواه عنه اثنان أخران؛ وخالفاه سنداً ومتناً، وكشفا عن علته التي فاتت الذين صححوه.
أحدهما: فضيل بن عياض، فقال: عن سليمان - يعني: الأعمش - عن أبي
() هذا ما حكم به الشيخ رحمه الله أخيراً على هذا الحديث، وكان قد صححه - قديماً - في بعض كتبه كـ ` المشكاة ` (5683) و ` صحيح الجامع ` (5250) ، وانظر ` هداية الرواة ` (5611) . (الناشر) .
يحيى عن مجاهد عن ابن عباس قال:
` لو أن قطرة من الزقوم … ` فذكره.
رواه أحمد (1/ 388) : ثنا القواريري: ثنا فضيل بن عياض … قلت: وهذا إسناد صحيح إلى الأعمش، فضيل بن عياض: أشهر من أن يُعرف، والقواريري - هو: عبيد الله بن عمر بن ميسرة، وهو - ثقة ثبت.
والآخر: يحيى بن عيسى الرملي، فقال ابن أبي شيبة في ` المصنف ` (13/161/ 15991) : حدثنا يحيى بن عيسى عن الأعمش عن أبي يحيى به. وأخرجه البيهقي في ` البعث ` (290/ 597) من طريق أخرى عن يحيى ابن عيسى الرملي.
قلت: والرملي هذا: صدوق يخطئ من رجال مسلم، ومتابعة فضيل إياه دليل قوي على أنه قد حفظ، وذلك مما يدل على أن عنعنة الأعمش في رواية شعبة عنه غير مغتفرة، وأن بينه وبين مجاهد (أبا يحيى) ، واسمه: (عبد الرحمن بن دينار القتات) ، وقيل غير ذلك، والأول أشبه كما في ` الضعفاء ` لابن حبان، وقال (2/53) :
` فحش خطؤه، وكثر وهمه حتى سلك غير مسلك العدول في الروايات، وجانب قصد السبيل في أشياء `.
ونقله السمعاني في مادة (القتات) من ` الأنساب `، دون أن يعزوه إلى ابن حبان، - وكثيراً ما يفعل مثله - ومنه صححت اللفظة الأخيرة، وكانت في الأصل (أسبابها) ، وقد عزاه الحافظ في ` التهذيب ` إلى قوله: ` الروايات ` دون ما
بعدها، وفات ذلك على أصله ` تهذيب الكمال ` للحافظ المزي، ولم يستدركه المعلقون عليه!
وقد ضعفه آخرون منهم أحمد، فقال:
`روى عنه إسرائيل أحاديث مناكير جداً `. ولذلك قال الحافظ في ` التقريب `:
` ليّن الحديث `.
قلت: فهو علة الحديث، ببيان الثقتين المذكورين عن الأعمش عنه. واذا كان من القواعد العلمية المسلم بها؛ أن عبادة الثقة مقبولة، لا سيما؛ ومن زاد؛ أكثر، وبخاصة أن المزيد عليه - وهو (الأعمش) - معروف بالتدليس؛ إذا عرف ذلك، فمن الواضح جداً خطأ تصحيح الحديث، ولا سيما من بعض المتأخرين الذين وقفوا على هذه الزيادة: كالشيخ أحمد شاكر رحمه الله في تعليقه على ` المسند ` (4/ 259 و 5/ 53) ، وكالمعلق على ` الإحسان ` (16/ 511 - 512) ، والمعلق على ` موارد الظمآن ` (8/ 322 - 323 - طبعة دمشق) ، فإنهم تجاهلوا جميعاً القاعدة المذكورة، فلم يتعرضوا لذكرها، بل مروا على رواية الثقتين في تخريجهم للحديث، دون أن يقفوا عندها، وأن ينظروا إلى أثرها في الكشف عن علة الحديث وهي التدليس والوقف، والله ولي التوفيق.
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(যদি যাক্কুমের একটি ফোঁটা দুনিয়ার জগতে পতিত হতো, তবে তা দুনিয়াবাসীর জীবন-জীবিকাকে নষ্ট করে দিত। তাহলে যার খাদ্য হবে তা, তার অবস্থা কেমন হবে?!)।
যঈফ (দুর্বল) ()।

এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (২৫৮৮), নাসাঈ তাঁর ‘আল-কুবরা’তে (৬/৩১৩/১১ ০৭০), ইবনু মাজাহ (৪৩২৫), ইবনু হিব্বান (২৬১ ১ - আল-মাওয়ারিদ), হাকিম (২/২৯৪ ও ৪৫১), তায়ালিসী তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (৩৪৪/২৬৪৩), এবং তাঁর সূত্রে বাইহাকী ‘আল-বা’স ওয়া ন-নুশূর’ গ্রন্থে (২৮৯-২৯০), আহমাদ (১/৩০১ ও ৩৩৮), এবং ত্বাবারানী তাঁর তিনটি মু’জাম গ্রন্থে: ‘আল-কাবীর’ (১১/৬৮/১১০৬৮), ‘আল-আওসাত’ (৮/২৫৯/৭৫৫১) এবং ‘আস-সাগীর’ (পৃ. ১১৮ - হিন্দ) বিভিন্ন সূত্রে শু’বাহ হতে, তিনি আ’মাশ হতে, তিনি মুজাহিদ হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে:
যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই আয়াতটি পাঠ করলেন: {তোমরা আল্লাহকে ভয় করো যেমন ভয় করা উচিত এবং মুসলিম না হয়ে মৃত্যুবরণ করো না}। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: ... অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। বর্ণনাভঙ্গিটি তিরমিযীর। তিনি বলেন:
‘হাদীসটি হাসান সহীহ’! আর হাকিম বলেন:
‘শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ’! যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন! আর ত্বাবারানী বলেন:
‘আ’মাশ হতে শু’বাহ ব্যতীত আর কেউ এটি বর্ণনা করেননি।’
আমি (আল-আলবানী) বলি: অবশ্যই, তাঁর (আ’মাশের) নিকট হতে অন্য দুজন রাবীও এটি বর্ণনা করেছেন; এবং তারা সনদ ও মতন উভয় ক্ষেত্রেই তাঁর (শু’বাহর) বিরোধিতা করেছেন, এবং তারা এর সেই ত্রুটি (ইল্লাহ) উন্মোচন করেছেন যা সহীহ ঘোষণাকারীদের দৃষ্টি এড়িয়ে গিয়েছিল।
তাদের একজন হলেন: ফুযাইল ইবনু ইয়ায। তিনি বলেন: সুলাইমান হতে – অর্থাৎ: আ’মাশ হতে – তিনি আবূ ইয়াহইয়া হতে, তিনি মুজাহিদ হতে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বলেন:
‘যদি যাক্কুমের একটি ফোঁটা...’ অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
() এই হাদীসটির উপর শাইখ (রাহিমাহুল্লাহ) অবশেষে এই হুকুম (দুর্বল) দিয়েছেন। তিনি পূর্বে তাঁর কিছু কিতাবে, যেমন: ‘আল-মিশকাত’ (৫৬৮৩) এবং ‘সহীহুল জামি’ (৫২৫০)-এ এটিকে সহীহ বলেছিলেন। দেখুন: ‘হিদায়াতুর রুওয়াত’ (৫৬১১)। (প্রকাশক)।
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (১/৩৮৮): আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আল-কাওয়ারীরী: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ফুযাইল ইবনু ইয়ায... আমি বলি: আ’মাশ পর্যন্ত এই সনদটি সহীহ। ফুযাইল ইবনু ইয়ায এতই প্রসিদ্ধ যে তাঁর পরিচিতির প্রয়োজন নেই। আর আল-কাওয়ারীরী – তিনি হলেন: উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার ইবনু মাইসারাহ, এবং তিনি – নির্ভরযোগ্য (সিকাহ) ও সুদৃঢ় (সাবত)।
আর অন্যজন হলেন: ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা আর-রামলী। ইবনু আবী শাইবাহ তাঁর ‘আল-মুসান্নাফ’ গ্রন্থে (১৩/১৬১/১৫৯৯১) বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা, তিনি আ’মাশ হতে, তিনি আবূ ইয়াহইয়া হতে, এই একই সূত্রে। আর বাইহাকী ‘আল-বা’স’ গ্রন্থে (২৯০/৫৯৭) ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা আর-রামলী হতে অন্য সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
আমি বলি: এই রামলী হলেন: সত্যবাদী, তবে ভুল করেন (সাদ্দূক ইউখতিউ), তিনি মুসলিমের রাবীদের অন্তর্ভুক্ত। আর ফুযাইল কর্তৃক তাঁর অনুসরণ করা একটি শক্তিশালী প্রমাণ যে তিনি (রামলী) মুখস্থ রেখেছেন। আর এটি প্রমাণ করে যে, শু’বাহর বর্ণনায় আ’মাশের ‘আনআনা’ (আন শব্দ ব্যবহার করে বর্ণনা) গ্রহণযোগ্য নয়, এবং মুজাহিদ ও তাঁর (আ’মাশের) মাঝে (আবূ ইয়াহইয়া) রয়েছেন, যার নাম: (আব্দুর রহমান ইবনু দীনার আল-কাত্তাত), অন্য নামও বলা হয়েছে, তবে ইবনু হিব্বানের ‘আয-যু’আফা’ গ্রন্থে যেমনটি আছে, প্রথমটিই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ। তিনি (ইবনু হিব্বান) বলেন (২/৫৩):
‘তাঁর ভুল গুরুতর এবং তাঁর সন্দেহ বেশি, এমনকি তিনি বর্ণনার ক্ষেত্রে ন্যায়পরায়ণদের পথ থেকে সরে গেছেন এবং অনেক বিষয়ে সঠিক পথ পরিহার করেছেন।’
আর সাম’আনী ‘আল-আনসাব’ গ্রন্থের (আল-কাত্তাত) পরিচ্ছেদে এটি ইবনু হিব্বানের দিকে সম্বন্ধ না করেই উদ্ধৃত করেছেন – এবং তিনি প্রায়শই এমনটি করে থাকেন – আর এর থেকেই আমি শেষ শব্দটি সংশোধন করেছি, যা মূল পাণ্ডুলিপিতে ছিল (أسبابها - আসবাবাহা)। আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাহযীব’ গ্রন্থে এটিকে ‘আর-রিওয়ায়াত’ (الروايات) পর্যন্ত সম্বন্ধ করেছেন, এর পরের অংশটুকু বাদ দিয়ে। আর হাফিয আল-মিযযীর মূল গ্রন্থ ‘তাহযীবুল কামাল’-এ এটি বাদ পড়ে গেছে, এবং এর টীকাকারগণও তা সংশোধন করেননি!
আর অন্যরা তাকে দুর্বল বলেছেন, তাদের মধ্যে আহমাদও রয়েছেন। তিনি বলেন:
‘ইসরাঈল তার নিকট হতে অত্যন্ত মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস বর্ণনা করেছেন।’ এই কারণে হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেন:
‘তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে নরম (দুর্বল)।’
আমি বলি: তিনিই হাদীসটির ত্রুটি (ইল্লাহ), যা আ’মাশ হতে বর্ণিত উল্লিখিত দুজন নির্ভরযোগ্য রাবী কর্তৃক তাঁর (আবূ ইয়াহইয়ার) মাধ্যমে স্পষ্ট হয়েছে। আর যখন এটি স্বীকৃত বৈজ্ঞানিক নীতিমালার অন্তর্ভুক্ত যে, নির্ভরযোগ্য (সিকাহ) রাবীর ইবাদাহ (বর্ণনা) গ্রহণযোগ্য, বিশেষত যখন যে অতিরিক্ত বর্ণনা করে, তার বর্ণনা অধিকতর গ্রহণযোগ্য হয়। বিশেষ করে যখন যার উপর অতিরিক্ত বর্ণনা করা হয়েছে – অর্থাৎ (আ’মাশ) – তিনি তাদলীসকারী হিসেবে পরিচিত; যখন এটি জানা গেল, তখন হাদীসটিকে সহীহ বলা অত্যন্ত স্পষ্ট ভুল, বিশেষত কিছু পরবর্তী যুগের আলেমদের পক্ষ থেকে, যারা এই অতিরিক্ত অংশটির উপর অবগত ছিলেন: যেমন শাইখ আহমাদ শাকির (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আল-মুসনাদ’-এর টীকায় (৪/২৫৯ ও ৫/৫৩), এবং ‘আল-ইহসান’-এর টীকাকার (১৬/৫১১-৫১২), এবং ‘মাওয়ারিদুয যামআন’-এর টীকাকার (৮/৩২২-৩২৩ – দামেশক সংস্করণ)। কারণ তারা সকলেই উল্লিখিত নীতিটিকে উপেক্ষা করেছেন, তারা এর উল্লেখ করেননি, বরং হাদীসটির তাখরীজ করার সময় তারা দুজন নির্ভরযোগ্য রাবীর বর্ণনাকে এড়িয়ে গেছেন, সেখানে থামেননি এবং হাদীসের ত্রুটি (ইল্লাহ) উন্মোচনে এর প্রভাব দেখেননি, যা হলো তাদলীস এবং ওয়াকফ (মওকূফ হওয়া)। আর আল্লাহই তাওফীকদাতা।