সহীহ আত তারগীব ওয়াত তারহীব
3556 - (11) [صحيح] ورواه أحمد بإسناد صحيح من حديث أبي سعيدٍ الخدريِّ بنحو الرواية الأولى، وزاد في آخره:
فقال بعضُ القوْمِ: يا رسولَ الله! ما أحَدٌ يقومُ علَيْهِ ملَكٌ في يدِه مطْراقٌ إلا هيل(3). فقالَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
` {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ} `.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (পূর্ববর্তী বর্ণনার অনুরূপ বর্ণনায় তিনি) এর শেষে আরো বলেছেন: তখন কিছু লোক বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! এমন কেউ নেই যার ওপর হাতুড়িসহ ফেরেশতা এসে দাঁড়ায়, আর সে ভীতসন্ত্রস্ত (বা বিচলিত) না হয়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ` {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ} `।
3557 - (12) [صحيح] وعن عائشة رضي الله عنها قالَتْ:
جاءَتْ يهودِيَّة اسْتَطْعَمتْ على بابي فقالَتْ: أطْعِموني أعاذَكُم الله مِنْ فِتْنَةِ الدَّجَّالِ، ومِنْ فِتْنَةِ عذاب القبْرِ. قالَتْ: فلَمْ أَزَلْ أحْبِسُها حتّى جاءَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسوْلَ الله! ما تقولُ هذه اليَهودِيَّةُ؟ قال:
`وما تقولُ؟ `.
قلتُ: تقولُ: أعاذَكُم الله مِنْ فتْنَةِ الدَّجَّالِ، ومِنْ فتْنَةِ عذابِ القَبْرِ. قالت عائشة: فقامَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فرفَع يَديْه مدّاً، يَسْتَعيذُ بالله مِنْ فِتْنَةِ الدَّجَّالِ،
ومِنْ عذابِ القَبْرِ. ثُمَّ قال:
`أمّا فِتْنَةُ الدَّجَّال، فإنَّه لَمْ يكُنْ نَبِيٌّ إلا [قد] حَذَّر أُمَّتَهُ، وسأُحَدِّثُكُمُـ[ـوهُ] بحَديثٍ لَمْ يُحذِّرْهُ نبيٌّ أمِّتهُ: إنَّه أَعْوَرُ، وإنَّ الله ليْسَ بأَعْورَ، مكتوبٌ بيْنَ عَيْنَيْهِ كافِرُ، يَقْرَؤهُ كلُّ مؤْمِنٍ.
فأمَّا فِتْنَةُ القَبرِ، فبِي تُفْتَنون، وعَنِّي تُسْأَلون، فإذا كانَ الرجلُ الصالِح أُجِلسَ في قبره غيرَ فَزِعٍ ولا مشْعوفٍ، ثُمَّ يقال لهُ: فيمَ كنتَ؟ فيقول في الإسْلامِ. فيقالُ: ما هذا الرجلُ الذي كانَ فيكُم؟ فيقولُ: مُحمَّد رسولُ الله، جاءَنا بالبَيِّناتِ مِنْ عندِ الله فصدَّقْناه، فَيُفْرَجُ له فُرجَةٌ قِبَلَ النارِ، فيَنْظُر إليها يحَطِمُ بعضُها بعْضاً، فيقالُ له: انْظُرْ إلى ما وقَاك الله، ثُمَّ يُفْرَجُ له فُرْجَةٌ إلى الجنَّةِ، فيَنْظُرُ إلى زَهْرَتِها وما فيها، فيُقالُ له: هذا مَقْعدُكَ منها، ويُقالُ: على اليَقين كنتَ، وعليه مِتَّ، وعليه تُبْعَثُ إنْ شاءَ الله.
وإذا كانَ الرجلُ السوءُ، أُجلِسَ في قبرهِ فَزِعاً مشْعوفاً فيُقالُ له: فيمَ كنتَ؟ فيقولُ: سمعتُ الناسَ يقولون قولاً فقلتُ كما قالوا، فيُفْرَجُ له فُرجةٌ إلى الجنَّةِ، فيَنْظُر إلى زَهْرَتِها وما فيها، فيقالُ له: انْظُر إلى ما صرَف الله عنك، ثُمَّ يُفْرَجُ له فُرجَةٌ قِبَلَ النارِ، فينْظُر إليْها يَحطِمُ بعضُها بعْضاً، ويقالُ [له]: هذا مَقْعَدُك منها، على الشَّكُّ كنْتَ، وعليه مِتَّ، وعليه تُبْعَثُ إنْ شاءَ الله، ثُمَّ يُعَذَّبُ`.
رواه أحمد بإسناد صحيح.
قوله: `غير مشعوف` هو بشين معجمة بعدها عين مهملة وآخره فاء، قال أهل اللغة:
` (الشعف): هو الفزع حتى يذهب بالقلب`.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একজন ইয়াহুদী নারী আমার দরজায় এসে খাবার চাইল এবং বলল: আমাকে খাবার দিন। আল্লাহ্ আপনাদেরকে দাজ্জালের ফিতনাহ্ ও কবরের আযাবের ফিতনাহ্ থেকে রক্ষা করুন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি তাকে বসিয়ে রাখলাম যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আসলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এই ইয়াহুদী নারীটি কী বলছে? তিনি বললেন: সে কী বলছে? আমি বললাম: সে বলছে: আল্লাহ্ আপনাদেরকে দাজ্জালের ফিতনাহ্ ও কবরের আযাবের ফিতনাহ্ থেকে রক্ষা করুন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং লম্বা করে তাঁর দু'হাত তুলে দাজ্জালের ফিতনাহ্ ও কবরের আযাব থেকে আল্লাহর নিকট আশ্রয় প্রার্থনা করলেন।
অতঃপর তিনি বললেন: দাজ্জালের ফিতনাহ্ সম্পর্কে বলতে গেলে, এমন কোনো নবী নেই যিনি তাঁর উম্মাতকে এ বিষয়ে সতর্ক করেননি। আর আমি তোমাদেরকে এমন একটি বিষয়ে বলব, যা কোনো নবীই তাঁর উম্মাতকে সতর্ক করেননি: সে (দাজ্জাল) কানা (এক চোখ অন্ধ), আর আল্লাহ্ কানা নন। তার দু'চোখের মাঝখানে 'কাফির' লেখা থাকবে, যা প্রত্যেক মু'মিন পড়তে পারবে।
কিন্তু কবরের ফিতনার বিষয়ে বলতে গেলে, আমার মাধ্যমেই তোমাদেরকে পরীক্ষা করা হবে এবং আমার সম্পর্কে তোমাদেরকে জিজ্ঞেস করা হবে। যখন কোনো নেককার ব্যক্তিকে কবরে বসানো হয়, তখন সে ভীত বা হতবিহ্বল হয় না। অতঃপর তাকে জিজ্ঞেস করা হয়: তুমি কীসের ওপর ছিলে? সে বলে: ইসলামের ওপর। অতঃপর তাকে জিজ্ঞেস করা হয়: তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি ছিলেন, তিনি কে? সে বলে: তিনি হলেন মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আল্লাহর রাসূল; তিনি আল্লাহর নিকট থেকে সুস্পষ্ট প্রমাণাদি নিয়ে এসেছিলেন এবং আমরা তাঁকে সত্য বলে মেনেছিলাম। অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে তার দিকে তাকায়, যার একাংশ আরেক অংশকে গ্রাস করছে। তখন তাকে বলা হয়: আল্লাহ্ তোমাকে যা থেকে রক্ষা করেছেন, তার দিকে তাকাও। অতঃপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে তার শোভা ও তার মধ্যে যা আছে তা দেখতে পায়। তখন তাকে বলা হয়: এটি তোমার থাকার স্থান। এবং বলা হয়: তুমি দৃঢ় বিশ্বাসের ওপর ছিলে, এর ওপরই মৃত্যুবরণ করেছ এবং আল্লাহ্ চাইলে এরই ওপর তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।
আর যখন কোনো খারাপ ব্যক্তিকে কবরে বসানো হয়, তখন সে ভীত ও হতবিহ্বল অবস্থায় থাকে। তাকে জিজ্ঞেস করা হয়: তুমি কীসের ওপর ছিলে? সে বলে: আমি লোকদেরকে কিছু কথা বলতে শুনেছি, তাই আমিও তাদের মতো বলেছি। অতঃপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে তার শোভা ও তার মধ্যে যা আছে তা দেখতে পায়। তখন তাকে বলা হয়: আল্লাহ্ তোমার থেকে যা ফিরিয়ে নিয়েছেন, তার দিকে তাকাও। অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে তার দিকে তাকায়, যার একাংশ আরেক অংশকে গ্রাস করছে। তখন তাকে বলা হয়: এটি তোমার থাকার স্থান। তুমি সন্দেহের ওপর ছিলে, এর ওপরই মৃত্যুবরণ করেছ এবং আল্লাহ্ চাইলে এরই ওপর তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে। অতঃপর তাকে আযাব দেওয়া হবে।
3558 - (13) [صحيح] وعن البراء بن عازب رضي الله عنه قال:
خَرجْنا مع رسولِ الله صلى الله عليه وسلم في جَنازَةِ رجلٍ مِنَ الأنْصارِ، فانْتَهيْنا إلى القَبْرِ، ولمَّا يُلحَدْ بعدُ، فجلسَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وجلَسْنا حولَه كأنَّما على رؤوسِنا الطيرُ، وبيدهِ عودٌ ينْكُتُ به في الأرْضِ، فرفَع رأْسَهُ فقال:
`اسْتَعيذوا بالله مِنْ عذابِ القَبْر، (مرتين أو ثلاثاً) `.
[صحيح] زاد في رواية(1): وقال:
`وإنَّه لَيَسْمَعُ خفْقَ نعالِهم إذا وَلَّوا مُدْبِرينَ، حينَ يُقال له: يا هذا! مَنْ ربُّك؟ وما دينُك؟ ومَنْ نَبِيُّك؟ `.
[صحيح] وفي رواية(2):
`ويأتيهِ ملَكانِ فيُجْلِسانِه، فيقولانِ له: مَنْ ربُّكَ؟ فيقولُ: ربِّيَ الله.
فيقولانِ لَهُ: وما دينُكَ؟ فيقولُ: دينيَ الإسْلامُ، فيقولانِ له: ما هذا الرجلُ الَّذي بُعِثَ فيكُمْ؟ فيقولُ: هو رسولُ الله، فيقولان له: وما يُدْريكَ؟ فيقولُ: قرأتُ كِتابَ الله، وآمنتُ وصدَّقْتُ`.
[صحيح] زاد في رواية(3):
`فذلك قوله: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ}، فيُنادي مُنادٍ مِنَ السَّمَاءِ: أنْ صَدق عَبْدي، فأَفْرِشُوهُ مِنَ الجَنَّةِ وألْبِسوهُ مِنَ الجنَّةِ، وافْتَحوا لَهُ باباً إلى الجنَّةِ، فيأْتيه مِنْ رَوْحِها وطيبِها، ويُفْسَحُ له في قَبرِه مَدَّ بَصرِه.
وإنَّ الكافِرَ -فذكر موتَهُ قال:- فتُعادُ روحه في جَسَدِه، ويأتيهِ مَلكانِ فيُجْلِسانِه، فيقولانِ [له]: مَنْ ربُّك؟ فيقولُ: هاه، هاه(1)، لا أدْري.
فيقولان: ما دينُك؟ فيقولُ: هاه، هاه، لا أدْري. فيقولانِ له: ما هذا الرجلُ الذي بُعثَ فيكُمْ؟ فيقولُ: هاه، هاه، لا أدري. فينادي منادٍ مِنَ السماءِ: أنْ قد كذَبَ، فأفْرِشوهُ مِنَ النارِ، وألْبِسوهُ منَ النارِ، وافْتَحوا له باباً إلى النارِ.
فَيأْتيه مِنْ حَرِّها وسَمُومِها، ويُضَيَّقُ عليه قَبْرُه حتى تَخْتَلِفَ فيه أضْلاعُه، -زاد(2) في رواية:- ثُمَّ يُقَيَّضُ لَه أعْمى أبْكَمُ معَه مِرْزَبَةٌ(3) مِنْ حديدٍ، لو ضُرِبَ بها جبلٌ لصارَ تُراباً، فيضرِبُه بِها ضَربةً يسْمَعُها ما بينَ المشْرِقِ والمغْربِ إلا الثَّقَليْنِ، فيصيرُ تُراباً، ثُمَّ تعادُ فيه الروحُ`.
رواه أبو داود.
[صحيح] ورواه أحمد بإسناد رواته محتج بهم في `الصحيح` أطول من هذا، ولفظه قال:
خَرجْنا معَ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم، فذكَر مثلَهُ إلى أنْ قال: فرفَع رأْسَه فقالَ: `اسْتَعيذوا بالله من عَذابِ القَبْرِ. (مرتين أو ثلاثاً) `. ثُمَّ قال:
`إنَّ العبْدَ المؤمِنَ إذا كانَ في انْقِطاع مِنَ الدُّنيا وإقْبالٍ مِنَ الآخِرَةِ نَزل إليه مِلائكةٌ مِنَ السماء بِيضُ الوُجوهِ، كأنَّ وُجوهَهُم الشمسُ، معَهم كَفَنٌ مِنْ أكفانِ الجَنَّةِ، وحَنوطٌ مِنْ حَنوطِ الجنَّةِ، حتى يَجْلِسوا منه مَدَّ البَصِر، ثُمَّ يَجيءُ مَلَكُ الموْتِ عليه السلام؛ حتى يجْلِس عند رأْسِهِ فيقولُ: أيَّتُها النَّفْسُ
الطيِّبَةُ! اُخْرُجي إلى مَغْفرَةٍ مِنَ الله ورِضْوانٍ، (قال:) فَتَخْرجُ فتَسيلُ كما تسيلُ القَطْرَةُ منْ في السِّقاءِ، فيأخُذُها، فإذَا أخَذَها لَمْ يَدَعوها في يَدِه طَرْفَةَ عينٍ حتى يأْخُذوها فيَجْعَلوها في ذلك الكَفَنِ، وفي ذلك الحَنوطِ، ويَخْرجُ منها كأطيبِ نَفحةِ مِسكٍ وُجِدَتْ على وجْهِ الأرْضِ، (قال:) فيصْعَدون بها، فلا يَمُرُّونَ [يعني بها] على مَلأٍ مِنَ الملائكَةِ إلا قالوا: ما هذا الروحُ الطيِّب؟ فيقولون: فلانُ ابْنُ فلانٍ، بأحْسَنِ أسْمائه التي كانَ يسَمُّونَه بها في الدُّنيا، حتى يَنْتَهوا بِها إلى السماءِ الدُّنيا، فيَسْتَفْتِحونَ له، فيُفْتَح ل هـ[ـم]، فَيُشَيِّعهُ مِن كلِّ سماءٍ مُقَرِّبوها إلى السماءِ الَّتي تَليهِا، حتى يَنْتَهيَ بِها إلى السماءِ السابِعَةِ، فيقول الله عز وجل: اكْتُبوا كتاب عبْدي في عَلِّيِّينَ، وأَعيدوه إلى الأرْضِ [فإنِّي منها خلَقْتُهم، وفيها أعيدُهم، ومنها أُخْرِجُم تارَةً أُخْرى، فتُعادُ روحُه](1) في جَسده، فيَأْتيه مَلَكانِ فيُجْلِسانِه، فيقولانِ: مَنْ ربُّكَ؟ فيقولُ: ربِّيَ الله، فيقولانِ: ما دينُكَ؟ فيقولُ: دينيَ الإسْلامُ، فيقولانِ: ما هذا الرجلُ الذي بُعِثَ فيكُمْ؟ فيقولُ: هو رسولُ الله، فيقولان له. وما عَملك(2)؟ فيقولُ: قرأتُ كتابَ الله فآمَنْتُ به، وصدَّقْتُه. فينادي منادٍ مِنَ السَّماءِ: أنْ صَدق عَبْدي، فأفْرِشوهُ مِنَ الجنَّةِ، [وألبسوه من الجنة]، وافْتَحوا لَه باباً إلى الجنَّة، -قال:- فَيأْتيهِ مِنْ رَوْحِها وطيبها، وُيفْسَحُ له في قبرِه مَدَّ بصَرهِ، -قال:- ويأْتيهِ رجُلٌ حَسنُ الوَجْهِ، حَسنُ الثِّيابِ، طَيِّبُ الريحِ، فيقولُ: أبْشِرْ بالَّذي يَسرُّكَ، هذا يومُك الَّذي كنتَ تُوعَدُ. فيقولُ: مَنْ أنْتَ؟ فوجْهُك الوَجْهُ يَجيءُ بالْخَيْرِ، فيقولُ: أنا عَمَلُكَ الصالِحُ. فيقولُ: ربِّ أقِم الساعَةَ، حتَّى أرْجعَ إلى أهْلي ومالي.
وإنَّ العَبْد الكافِرَ إذا كان في انْقِطاعٍ مِنَ الدنيا، وإقْبال مِنَ الآخِرَة نَزل إليه [مِنَ السَماءِ] ملائكةٌ سُودُ الوجوهِ، معَهم المُسوحُ، فيَجْلِسونَ منه مَدَّ البَصرِ، ثُمَّ يَجيءُ مَلَك المَوْتِ حتى يَجْلِسَ عند رَأْسِه، فيقولُ: أيَّتُها النفْس الخَبيثَةُ! اخْرُجي إلى سخَطٍ مِنَ الله وغَضَب [قال:] فَتُفَرِّقُ في جَسَدِه، فيَنْتَزِعُها كما يُنْتَزَعُ السَّفودُ مِنَ الصوفِ المبْلولِ، فيأْخُذها، فإذا أخذَها لَمْ يَدعوها في يَدهِ طَرْفةَ عَيْنٍ حتى يَجْعَلوها في تِلْكَ المسُوح، وَيخرُج منها كأنْتَنِ جِيفَةٍ وُجِدَتْ على وَجْهِ الأرْضِ، فيَصْعَدون بِها فلا يَمُرُّونَ بها على ملأ مِنَ الملائِكةِ إلا قالوا: ما هذا الروحُ الخَبيثُ؟ فيقولون: فلانُ ابْن فلانٍ، بأقْبَحِ أسْمائِه التي كانَ يُسَمَّى بِها في الدنيا، حَتَّى يُنْتَهى به إلى السماء الدنيا، فيُسْتَفْتَحُ لَهُ، فلا يُفْتَحُ لَهُ، ثُمَّ قَرأَ رسول الله صلى الله عليه وسلم: {لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّى يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ}، فيقولُ الله عز وجل: اكتُبوا كتابَه في سجِّينٍ في الأَرْضِ السفْلى، فتُطْرَحُ روحُه طَرْحاً، ثُمَّ قرأ: {وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ}، فتُعادُ روحُه في جَسَده، ويَأْتيه مَلَكانِ فيُجْلِسانِه، فيَقولانِ لهُ: مَنْ رَبُّك؟ فيقولُ: هاه، هاه، لَا أدْري، قال: فيقولان له: ما دينُكَ؟ فيقول: هاه، هاه، لا أدْري، قالَ: فيقولانِ له: ما هذا الرجلُ الَّذي بُعثَ فيكم؟ فيقولُ: هاه، هاه، لا أدري، فينادي منادٍ مِنَ السماءِ: أنْ كَذَبَ، فأَفْرِشوهُ مِنَ النارِ، وافْتَحوا له باباً إلى النارِ، فيأتيه مِنْ حَرِّها وسَمومِها، ويُضَيَّقُ عليه قبرُه حتى تَخْتلِفَ فيه أضْلاعُه، ويأتيهِ رجل قبيحُ الوجْهِ، قبيحُ الثِيابِ، مُنْتِنُ الريح، فيقولُ له: أبشِرْ بالذي يَسُوؤكَ، هذا يومُكَ الذي كنتَ توعَدُ، فيقولَ: مَن أنْتَ؟ فوجْهُكَ الوجْة يجيءُ بالشَرِّ، فيقول: أنا عملُكَ الخَبيث. فيقولُ: ربِّ لا تُقمِ الساعَةَ`.
[صحيح] وفي رواية له بمعناه، وزاد:
`فيأتيهِ آتٍ قبيحُ الوجْه قبيحُ الثياب، منتنُ الريح، فيقولُ: أبشِرْ بهَوانٍ مِنَ الله وعذَاب مُقيمٍ، فيقول: [وأنت فـ] بَشَّركَ الله بالشرِّ مَنْ أنْتَ؟ فيقولُ: أنا عَملُكَ الخَبيثُ، كنتَ بَطيئاً عَنْ طاعَةِ الله سَريعاً في مَعصِيَتِه، فجزَاك الله شرّاً. ثُمَّ يُقَيَّضُ له أعْمى أصَمُّ في يديهِ مِرْزَبَةٌ لو ضُرِبَ بها جَبلٌ كان تُراباً، فيضرِبُه ضَرْبَةً فيصيرُ تُراباً، ثُمَّ يعُيدُه الله كما كان، فيضرِبُه ضرْبةً أُخْرى؛ فيصيحُ صَيْحةً يسْمَعُه كلُّ شيْءٍ إلا الثقلَيْنِ. -قال البراء-: ثمَّ يُفتَح له بابٌ مِنَ النارِ، ويُمَهَّدُ له مِنْ فُرشِ النارِ`.
(قال الحافظ): `هذا الحديث حديث حسن، رواته محتج بهم في `الصحيح` كما تقدم، وهو مشهور بالمنهال بن عمرو عن زاذان عن البراء. كذا قال أبو موسى الأصبهاني رحمه الله. والمنهال روى له البخاري حديثاً واحداً. وقال ابن معين: المنهال ثقة. وقال أحمد العِجلي: كوفي ثقة، وقال أحمد بن حنبل: تركه شعبة على عمد. قال عبد الرحمن بن أبي حاتم: لأنه سُمع من داره صوتُ قراءةٍ بالتطريب. وقال عبد الله بن أحمد بن حنبل: سمعت أبي يقول: أبو بشر أحب إليَّ من المنهال، وزاذان ثقة مشهور، ألانَهُ بعضهم، وروى له مسلم حديثين في (صحيحه).
قوله: (هاه هاه): هي كلمة تقال في الضحك، وفي الإيعاد، وقد تقال للتوجع، وهو أليق بمعنى الحديث. والله أعلم.
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:
আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সঙ্গে জনৈক আনসারী ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, তখনো কবর প্রস্তুত করা হয়নি। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বসলেন এবং আমরাও তাঁর চারপাশ ঘিরে বসলাম, যেন আমাদের মাথার ওপর পাখি বসে আছে (অর্থাৎ নিশ্চল ও নীরব)। তাঁর হাতে ছিল একটি কাঠি, যা দিয়ে তিনি মাটিতে খোঁচা দিচ্ছিলেন। এরপর তিনি মাথা তুলে বললেন:
"তোমরা আল্লাহর কাছে কবরের আযাব থেকে আশ্রয় প্রার্থনা করো।" (দুইবার বা তিনবার বললেন)।
অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সে তাদের জুতোর আওয়াজ শুনতে পায়, যখন তারা পিঠ ফিরিয়ে চলে যেতে থাকে। এই সময় তাকে প্রশ্ন করা হয়: হে এই ব্যক্তি! তোমার রব কে? তোমার দ্বীন কী? আর তোমার নবী কে?"
আহমাদ এর দীর্ঘ বর্ণনায় এসেছে: এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই মুমিন বান্দা যখন দুনিয়া থেকে বিদায় নিয়ে আখিরাতের দিকে মনোনিবেশ করে, তখন আসমান থেকে সাদা চেহারার ফিরিশতারা তার কাছে নেমে আসে, যেন তাদের চেহারা সূর্যের মতো উজ্জ্বল। তাদের সঙ্গে থাকে জান্নাতের কাফন ও জান্নাতের সুগন্ধি। তারা তার দৃষ্টির শেষ সীমা পর্যন্ত বসে থাকে। এরপর মৃত্যু ফিরিশতা (আলাইহিস সালাম) এসে তার মাথার কাছে বসেন এবং বলেন: 'হে পবিত্র আত্মা! আল্লাহর ক্ষমা ও সন্তুষ্টির দিকে বেরিয়ে এসো।' তখন রূহ এমনভাবে বেরিয়ে আসে, যেমন মশক থেকে পানির ফোঁটা গড়িয়ে পড়ে। তিনি (মালাকুল মাওত) তা গ্রহণ করেন। যখন তিনি তা গ্রহণ করেন, তখন ফিরিশতারা এক পলকের জন্যও তা তাঁর হাতে থাকতে দেন না; বরং সঙ্গে সঙ্গে তা গ্রহণ করে সেই জান্নাতী কাফন ও সুগন্ধির মধ্যে রেখে দেন। তা থেকে পৃথিবীর বুকে পাওয়া সবচেয়ে উৎকৃষ্ট মৃগনাভি (মিশকের) সুগন্ধির মতো সুঘ্রাণ বের হতে থাকে। তারা রূহটিকে নিয়ে আসমানের দিকে আরোহণ করেন। তারা ফিরিশতাদের যে কোনো দলের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় তারা জিজ্ঞেস করেন: 'এই পবিত্র রূহটি কার?' তখন তারা তার দুনিয়ার শ্রেষ্ঠ নাম ধরে বলেন: 'অমুক ইবনে অমুক।' এভাবে তারা তাকে নিয়ে সপ্তম আসমান পর্যন্ত পৌঁছান। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: 'আমার বান্দার আমলনামা 'ইল্লিয়্যীনে' লিপিবদ্ধ করো এবং তাকে পৃথিবীতে ফিরিয়ে দাও।'
তখন তার রূহ তার দেহে ফিরিয়ে দেওয়া হয়। তার কাছে দুজন ফিরিশতা এসে তাকে বসান এবং জিজ্ঞেস করেন: 'তোমার রব কে?' সে বলে: 'আমার রব আল্লাহ।' তারা জিজ্ঞেস করেন: 'তোমার দ্বীন কী?' সে বলে: 'আমার দ্বীন ইসলাম।' তারা জিজ্ঞেস করেন: 'এই ব্যক্তিটি কে, যাকে তোমাদের মাঝে পাঠানো হয়েছিল?' সে বলে: 'তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।' তারা তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'আর তোমার আমল কী ছিল?' সে বলে: 'আমি আল্লাহর কিতাব পাঠ করেছি, তার প্রতি ঈমান এনেছি এবং তাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছি।'
তখন আকাশ থেকে একজন আহ্বানকারী ঘোষণা দেন: "আমার বান্দা সত্য বলেছে। এ সম্পর্কেই আল্লাহ তাআলার বাণী: {আল্লাহ মুমিনদেরকে সুপ্রতিষ্ঠিত বাক্যের দ্বারা দুনিয়ার জীবনে ও আখিরাতে সুপ্রতিষ্ঠিত রাখেন}। অতএব তোমরা তার জন্য জান্নাতের বিছানা বিছিয়ে দাও, তাকে জান্নাতের পোশাক পরিয়ে দাও এবং তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দাও।" ফলে তার কাছে জান্নাতের বাতাস ও সুগন্ধি আসতে থাকে এবং তার কবরকে দৃষ্টির সীমা পর্যন্ত প্রশস্ত করে দেওয়া হয়। এরপর তার কাছে একজন সুদর্শন, সুন্দর পোশাক পরা এবং সুগন্ধিযুক্ত পুরুষ এসে বলেন: 'তোমাকে আনন্দদায়ক সুসংবাদ দিচ্ছি; এই সেই দিন যার প্রতিশ্রুতি তোমাকে দেওয়া হয়েছিল।' সে জিজ্ঞেস করে: 'আপনি কে? আপনার চেহারা তো কল্যাণ বয়ে আনা চেহারা।' সে বলে: 'আমি তোমার নেক আমল।' তখন সে বলে: 'হে আমার রব! কিয়ামত কায়েম করো, যাতে আমি আমার পরিবার ও সম্পদের কাছে ফিরে যেতে পারি।'
আর কাফির বান্দা যখন দুনিয়া থেকে বিদায় নিয়ে আখিরাতের দিকে মনোনিবেশ করে, তখন আসমান থেকে কালো চেহারার ফিরিশতারা তার কাছে নেমে আসে, তাদের সঙ্গে থাকে মোটা পশমের চট। তারা তার দৃষ্টির সীমা পর্যন্ত বসে থাকে। এরপর মৃত্যু ফিরিশতা এসে তার মাথার কাছে বসেন এবং বলেন: 'হে নোংরা আত্মা! আল্লাহর ক্রোধ ও অসন্তোষের দিকে বেরিয়ে এসো।' তখন আত্মা তার দেহের মধ্যে ছড়িয়ে যায়। তখন তিনি (মালাকুল মাওত) তাকে এমনভাবে টেনে বের করেন, যেমন ভিজা পশমের মধ্য থেকে কাঁটাযুক্ত শলাকা টেনে বের করা হয়। তারা তাকে নিয়ে প্রথম আসমানে পৌঁছান এবং তার জন্য দরজা খোলার অনুরোধ করেন, কিন্তু তার জন্য দরজা খোলা হয় না। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিলাওয়াত করলেন: {তাদের জন্য আকাশের দরজা খোলা হবে না এবং তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না সূঁচের ছিদ্রের মধ্য দিয়ে উট প্রবেশ করে।} (সূরা আ’রাফ: ৪০)। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: 'তার আমলনামা সবচেয়ে নিচের জমিনে 'সিজ্জীনে' লিপিবদ্ধ করো।' অতঃপর তার রূহকে সজোরে নিক্ষেপ করা হয়।
এরপর তার রূহ তার দেহে ফিরিয়ে দেওয়া হয়। তার কাছে দুজন ফিরিশতা এসে তাকে বসান এবং তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'তোমার রব কে?' সে বলে: 'হাহ, হাহ, আমি জানি না।' তারা তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'তোমার দ্বীন কী?' সে বলে: 'হাহ, হাহ, আমি জানি না।' তারা তাকে জিজ্ঞেস করেন: 'এই ব্যক্তিটি কে, যাকে তোমাদের মাঝে পাঠানো হয়েছিল?' সে বলে: 'হাহ, হাহ, আমি জানি না।' তখন আকাশ থেকে একজন আহ্বানকারী ঘোষণা দেন: "সে মিথ্যা বলেছে। অতএব তোমরা তার জন্য আগুনের বিছানা বিছিয়ে দাও, তাকে আগুনের পোশাক পরিয়ে দাও এবং তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দাও।" ফলে তার কাছে জাহান্নামের উত্তাপ ও বিষাক্ত বাতাস আসতে থাকে এবং তার কবরকে তার উপর এমনভাবে সংকুচিত করা হয় যে, তার পাঁজরগুলো পরস্পরের মধ্যে ঢুকে যায়।
এরপর তার কাছে একজন কদাকার চেহারা, খারাপ পোশাক পরা এবং দুর্গন্ধযুক্ত পুরুষ এসে বলে: 'যা তোমাকে খারাপ খবর দিচ্ছে, তার জন্য সুসংবাদ গ্রহণ করো। এই সেই দিন যার প্রতিশ্রুতি তোমাকে দেওয়া হয়েছিল।' সে জিজ্ঞেস করে: 'আপনি কে? আপনার চেহারা তো অকল্যাণ বয়ে আনা চেহারা।' সে বলে: 'আমি তোমার খারাপ আমল। তুমি আল্লাহর আনুগত্যের ব্যাপারে অলস ছিলে এবং তাঁর অবাধ্যতার দিকে দ্রুতগামী ছিলে। সুতরাং আল্লাহ তোমাকে অমঙ্গল প্রতিদান দিন।'
এরপর তার জন্য একজন অন্ধ ও বধির ফিরিশতাকে নিযুক্ত করা হয়, যার হাতে থাকে লোহার একটি হাতুড়ি। যদি তা দ্বারা কোনো পাহাড়ে আঘাত করা হয়, তবে তা ধুলায় পরিণত হয়ে যাবে। সে তাকে তা দ্বারা এমন জোরে আঘাত করে যে, জিন ও মানব ব্যতীত পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যবর্তী সব কিছুই তার সেই চিৎকার শুনতে পায়। ফলে সে (মার খেয়ে) মাটিতে মিশে যায়। অতঃপর আল্লাহ তাকে পূর্বের অবস্থায় ফিরিয়ে আনেন। তখন সে তাকে আরেকবার আঘাত করে। বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: "এরপর তার জন্য জাহান্নামের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তার জন্য জাহান্নামের বিছানা পাতা হয়।"
তখন সে বলে: 'হে আমার রব! কিয়ামত কায়েম করো না!'"
(আবূ দাঊদ ও আহমাদ বর্ণনা করেছেন)
3559 - (14) [صحيح] وعن أبي هريرة رضي الله عنه عنِ النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال:
`إنَّ المؤْمِنَ إذا قُبِضَ أتَتْه ملائكةُ الرحمَة بِحَريرَةٍ بيْضاءَ، فيقولونَ: اخْرجي إلى رَوْحِ الله، فتَخْرُج كأَطْيَبِ ريحِ المِسْكِ حتى إنَّه لَيُناوِلُه بَعْضُهم
بَعْضاً، فيَشُمُّونَهُ، حتى يأْتون به بابَ السماءِ، فيقولونَ: ما هذه الريحُ الطيِّبَةُ التي جاءَتْ مِنَ الأرْضِ؟ ولا يَأْتُونَ سماءً إلا قالوا مِثْلَ ذلك، حتى يأْتُونَ بِه أرْواحَ المُؤْمِنينَ، فلَهُم أشَدّ فَرحاً مِنْ أَهْلِ الغائِبِ بغائِبهمْ، فيقولون: ما فَعل فلانُ؟ فيقولونَ: دَعوهُ حتى يَسْتَريحَ؛ فإنَّه كانَ في غَمِّ الدنْيا، فيقولُ: قد ماتَ، أما أتاكُم؟ فيقولون: ذُهِبَ به إلى أُمِّه الهاوِيَةِ.
وأما الكافِرُ، فَتَأْتيهِ ملائكَةُ العَذابِ بمِسَحٍ، فيقولون: اخْرُجي إلى غَضَبِ الله، فتَخْرُج كأنْتَنِ ريحِ جيفَةٍ، فيذْهَبُ به إلى بابِ الأرْضِ`.
رواه ابن حبان في `صحيحه`، وهو عند ابن ماجه بنحوه بإسناد صحيح.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই যখন কোনো মু'মিন ব্যক্তিকে মৃত্যু দেওয়া হয়, তখন তার কাছে দয়াময় (আল্লাহর) ফেরেশতাগণ একটি সাদা রেশমী বস্ত্র নিয়ে আসেন। তারা বলেন: আল্লাহর আরাম ও শান্তিময় স্থান (জান্নাতের দিকে) বেরিয়ে আসো। তখন সে (রূহ) এমনভাবে বেরিয়ে আসে যেন তা মিশকের সবচেয়ে সুঘ্রাণযুক্ত। এমনকি তারা (ফেরেশতাগণ) একে অপরের কাছ থেকে তা গ্রহণ করেন এবং শুঁকে দেখেন। অতঃপর তারা তাকে নিয়ে আকাশের দরজায় আসেন। তখন (আকাশের ফেরেশতারা) বলেন: এ কোন্ পবিত্র সুগন্ধ, যা যমীন থেকে এসেছে? তারা যে আসমানেই যান, তারা একই কথা বলেন। অবশেষে তারা তাকে নিয়ে মু'মিনদের রূহসমূহের কাছে আসেন। তারা (মু'মিনদের রূহসমূহ) অনুপস্থিত ব্যক্তি ফিরে আসলে তার আত্মীয়-স্বজনরা যে পরিমাণ আনন্দিত হয়, তার চেয়েও বেশি আনন্দিত হন। তারা জিজ্ঞেস করে: অমুক ব্যক্তি কী করলো (তার কী হলো)? তখন তারা (আগন্তুক রূহ বহনকারী ফেরেশতা বা রূহসমূহ) বলেন: তাকে বিশ্রাম নিতে দাও; কারণ সে দুনিয়ার দুশ্চিন্তায় ছিল। (অন্য মু'মিন রূহরা নিজেদের মধ্যে আলোচনা করে) বলে: সে তো মারা গেছে, সে কি তোমাদের কাছে আসেনি? (আগমণকারী রূহের সঙ্গীগণ বা অন্য রূহরা) বলে: তাকে তার মা, গভীর খাদ (জাহান্নাম) -এর দিকে নিয়ে যাওয়া হয়েছে।
আর যখন কোনো কাফিরকে মৃত্যু দেওয়া হয়, তখন তার কাছে আযাবের ফেরেশতাগণ মোটা চটের বস্ত্র নিয়ে আসেন। তারা বলেন: আল্লাহর ক্রোধের দিকে বেরিয়ে আসো। তখন সে (রূহ) মৃতদেহের সবচেয়ে দুর্গন্ধের মতো হয়ে বেরিয়ে আসে। অতঃপর তাকে নিয়ে যমীনের দরজার (সর্বনিম্ন স্তরের) দিকে যাওয়া হয়।
(ইবনু হিব্বান তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে এবং ইবনু মাজাহ একই সনদে প্রায় অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।)
3560 - (15) [حسن] وعن أبي هريرة أيضاً؛ أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:
`إذا قُبرَ الميِّتُ -أو قالَ: أحدُكُم- أتاه ملَكان أسْوَدان أزْرَقان، يقالُ لأحَدِهما المُنْكَرُ، وللآخَرِ النَّكيرُ، فيقولان: ما كُنْتَ تقولُ في هذا الرجُلِ؟ فيقول ما كانَ يقولُ: هو عبدُ الله ورسولُه، أشْهَدُ أنْ لا إله إلا الله، وأنَّ محَمَّداً عبدُه ورسولُه. فيقولان: قد كنّا نعلَمُ أنَّك تقولُ هذا، ثُمَّ يُفْسَحُ له في قبْرهِ سبْعونَ ذراعاً في سبْعينَ، ثُمَّ يُنَوَّرُ له فيه، ثُمَّ يقالُ له: نَمْ، فيقولُ: أرْجعُ إلى أهْلي فأُخْبِرهُم؟ فيقولان: نَمْ كنَوْمَةِ العَروسِ الذي لا يوقِظُه إلا أحَبُّ أهْلِه إلَيْه، حتى يَبْعَثَهُ الله مِنْ مَضْجَعِه ذلك.
وإنْ كانَ منافِقاً قال: سمعتُ الناسَ يقولون قولاً فقُلْتُ مِثْلَهُ: لا أدري! فيقولان: قد كنَّا نعلَمُ أنَّك تقولُ ذلك، فيُقالُ للأَرْضِ: الْتَئِمي عليه، فتَلْتَئم عليه، فتَخْتَلِفُ أضْلاعُه، فلا يَزالُ فيها مُعَذباً حتى يَبْعَثَهُ الله مِنْ مضْجَعِه ذلك`.
رواه الترمذي وقال: `حديث حسن غريب`، وابن حبان في `صحيحه`.
(العروس): يطلق على الرجل وعلى المرأة، ما داما في أعراسهما.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন মৃত ব্যক্তিকে— অথবা তিনি বললেন: তোমাদের কাউকে— কবরে দাফন করা হয়, তখন তার কাছে কালো বর্ণের ও নীল চক্ষু বিশিষ্ট দু’জন ফেরেশতা আসে। তাদের একজনকে বলা হয় মুনকার এবং অন্যজনকে বলা হয় নাকীর। তারা উভয়ে জিজ্ঞেস করেন: তুমি এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে কী বলতে? তখন সে (মুমিন ব্যক্তি) যা বলত তাই বলে: তিনি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও তাঁর রাসূল। তখন তারা উভয়ে বলেন: আমরা জানতাম যে, তুমি এই কথাই বলবে। অতঃপর তার জন্য তার কবরে সত্তর হাত গুণ সত্তর হাত প্রশস্ত করে দেওয়া হয় এবং তা তার জন্য আলোকিত করে দেওয়া হয়। অতঃপর তাকে বলা হয়: তুমি ঘুমাও। তখন সে বলে: আমি কি আমার পরিবারের কাছে ফিরে গিয়ে তাদের খবর দেব না? তারা উভয়ে বলেন: তুমি এমন নতুন বরের মতো ঘুমাও, যাকে তার পরিবারের সবচেয়ে প্রিয়জন ছাড়া আর কেউ জাগাবে না, যে পর্যন্ত না আল্লাহ তাকে তার সেই শয়নস্থল থেকে পুনরুত্থিত করেন। আর যদি সে মুনাফিক হয়, তখন সে বলে: আমি মানুষকে কিছু বলতে শুনেছি, তাই আমিও তাদের মতো বলেছি। আমি জানি না! তখন তারা উভয়ে বলেন: আমরা জানতাম যে, তুমি এই কথাই বলবে। অতঃপর যমীনকে বলা হয়: ওর উপর সংকুচিত হও। ফলে যমীন তার উপর সংকুচিত হয়ে যায়, এতে তার পাঁজরের হাড়গুলো একটি আরেকটির মধ্যে ঢুকে যায়। আল্লাহ তাকে তার সেই শয়নস্থল থেকে পুনরুত্থিত না করা পর্যন্ত সে এর মধ্যে শাস্তি পেতে থাকবে।
3561 - (16) [حسن] وعن أبي هريرة أيضاً عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم قال:
`إنَّ الميِّتَ إذا وُضعَ في قبْرِه إنَّه يَسْمعُ خَفْقَ نِعالهم حينَ يُوَلُّون مدْبِرينَ، فإنْ كان مؤْمِناً كانتِ الصلاةُ عند رأْسِه، وكانَ الصيامُ عنْ يَمينِه، وكانَتِ الزكاةُ عَنْ شِمالَه، وكان فعلُ الخيرات منَ الصدقة والصلاةِ والمعْروفِ والإحْسانِ إلى الناسِ عند رجْلَيْهِ، فيُؤْتَى مِنْ قِبَلِ رأْسِه فتقولُ الصلاةُ: ما قِبلي مَدْخَلٌ، ثُمَّ يُؤْتى عَنْ يَمينِه فيقولُ الصيامُ: ما قِبَلي مَدْخَلٌ، ثُمَّ يُؤْتى عنْ يَسارِه فتقولُ الزكاةُ: ما قِبَلي مَدْخَلٌ، ثُمَّ يُؤْتَى مِنْ قِبَلِ رجْلَيْه فيقولُ فِعْلُ الخيْراتِ مِنَ الصدَقَةِ والصلاةِ والمعْروفِ والإحْسانِ إلى الناسِ: ما قِبَلي مَدْخَلٌ، فيقالُ لَهُ: اجلِسْ، فيَجْلِسُ قد مَثُلَتْ لَهُ الشمْسُ، وقد آذَنَتْ(1) للْغُروبِ، فيُقال له: أرأَيْتَكَ هذا الَّذي كانَ قِبَلَكُم؛ ما تقولُ فيه، وماذا تَشْهَدُ عليه؟ فيقولُ: دعوني حتّى أُصَلِّي، فيقولونَ: إنَّكَ سَتفْعَلُ، أخْبِرْنا عَمَّا نسْأَلُك عنه؛ أرأَيْتَك هذا الرجُلَ الَّذي كان قِبَلَكُمْ؛ ماذا تَقُولُ فيه، وماذا تَشْهَدُ عليه؟ قال: فيقولُ: محَمَّدٌ؛ أشْهَدُ أنَّه رسولُ الله، صلى الله عليه وسلم وأنَّه جاءَ بِالْحَقِّ مِنْ عندِ الله، فيُقالُ له: على ذلك حَيِيْتَ، وعلى ذلك مُتَّ، وعلى ذلك تُبْعَثُ إنْ شاءَ الله، ثُمَّ يُفْتَحُ له بابٌ مِنْ أبْوابِ الجَنَّةِ فيقُالُ له: هذا مَقْعَدُكَ مِنْها، وما أَعَدَّ الله لَك فيها، فَيزْدادُ غِبْطَةٌ وسروراً، ثُمَّ يُفْتَحٌ له بابٌ مِنْ أبْوابِ النارِ، فيُقالُ له: هذا مقْعَدُكَ وما أعدَّ الله لك فيها لَوْ عَصْيتَهُ، فيَزْدادُ غِبْطَةً وسُروراً،
ثُمَّ يُفْسَحُ له في قَبْرِه سَبْعون ذِراعاً، وُينَوَّرُ له فيه، ويُعادُ الجَسدُ لِما بُدِئَ مِنْهُ، فتُجْعَلُ نَسَمتُه في النَّسَم الطيِّبِ، وهي طيرٌ تَعْلُق(1) مِنْ شَجَر الجَنَّةِ، فذلك قوله: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ} ` الآية.
وإنَّ الكافِرَ إذا أُتِيَ مِنْ قِبَلِ رأْسِه لَمْ يوجَدْ شَيْءٌ، ثُمَّ أُتِيَ عَنْ يَمينِه فلا يُوجَدُ شَيْءٌ، ثُمَّ أُتِيَ عَنْ شِمالِه فلا يُوجَدُ شَيْءٌ، ثُمَّ أُتِيَ مِنْ قِبَلِ رِجْلَيْه فلا يَوجَدُ شَيْءٌ، فيُقالُ لَهُ: اجْلِسْ، فيَجْلِسُ مَرْعوباً خائفاً، فيقالُ: أرأَيْتَك هذا الرجلَ الّذي كانَ فيكُم؛ ماذا تقولُ فيه؟ وماذا تَشْهَدُ عليه؟ فيقولُ: أيُّ رجلٍ؟ ولا يَهْتَدي لاسْمِه، فيقالُ له: مُحَمَّدٌ، فيقول: لا أدْري، سمعتُ الناسَ قالوا قولاً، فقُلْتُ كما قالَ الناسُ! فيقُالُ لَهُ: على ذلك حَيِيْتَ، وعليه مِتَّ، وعليه تُبْعثُ إنْ شاءَ الله، ثُمَّ يُفْتَحُ له بابٌ مِنْ أبوابِ النار فيُقالُ له: هذا مَقْعَدُك مِنَ النار، وما أعَدَّ الله لك فيها، فيَزْدادُ حَسْرةً وثُبوراً، ثُمَّ يُفْتَح لَهُ بابٌ مِنْ أبوابِ الجنَّةِ، فَيُقالُ له: هذا مَقْعَدُك مِنْها، وما أَعَدَّ الله لَك فيها لوْ أطَعْتَهُ، فيَزْدادُ حَسْرةً وثُبوراً، ثُمَّ يُضَيَّق عليه قَبرُه حتى تَخْتَلِفَ فيه أضْلاعُه، فتلك المعيشَةُ الضنكة التي قالَ الله: {وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى} `.
رواه الطبراني في `الأوسط`، وابن حبان في `صحيحه`، واللفظ له، وزاد الطبراني: `قال أبو عمر يعني الضرير: قلت لحماد بن سلمة: كان هذا من أهل القبلة؟ قال:
نعم. قال أبو عمر: كان يشهد بهذه الشهادة على غير يقين يرجع إلى قلبه؛ كان يسمع الناس يقولون شيئاً فيقوله`.
[حسن] وفي رواية للطبراني:
`يُؤتَى الرجُلُ في قَبرِه، فإذا أُتِيَ مِنْ قِبلَ رأْسِه دفَعتْهُ تِلاوةُ القُرآنِ، وإذا أُتِيَ مِنْ قِبَلِ يديْهِ دفَعتْهُ الصدَقَةُ، وإذا أُتِيَ مِنْ قِبَلِ رجلَيْهِ دَفعهُ مشْيُه إلى المسَاجِدِ. . .` الحديث.
(النَّسَمة) بفتح النون والسين: هي الروح.
قوله (تعلُق) بضم اللام؛ أي: تأكل.
(قال الحافظ):
`وقد أملينا في `الترهيب من إصابة البول الثوب` وفي `النميمة` جملة من الأحاديث في أن عذاب القبر من البول والنميمة، لم نعد من تلك الأحاديث هنا شيئاً، والأحاديث في عذاب القبر وسؤال الملكين كثيرة، وفيما ذكرناه كفاية. والله الموفق، لا ربَّ غيره`.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:
নিশ্চয় মৃত ব্যক্তিকে যখন তার কবরে রাখা হয়, তখন সে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়, যখন তারা পেছন ফিরে চলে যেতে থাকে। যদি সে মুমিন হয়, তবে সালাত (নামাজ) তার মাথার কাছে থাকে, সাওম (রোজা) থাকে তার ডান পাশে, যাকাত থাকে তার বাম পাশে, আর নেক আমল, যেমন সাদকা, সালাত, মারুফ (সৎ কাজ) এবং মানুষের প্রতি ইহসান (দয়া) থাকে তার পায়ের কাছে।
অতঃপর তার মাথার দিক থেকে (ফেরেশতারা) আসে। তখন সালাত বলে: ‘আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই।’ তারপর তার ডান দিক থেকে আসা হয়। তখন সাওম বলে: ‘আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই।’ অতঃপর তার বাম দিক থেকে আসা হয়। তখন যাকাত বলে: ‘আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই।’ এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়। তখন সাদকা, সালাত, মারুফ ও মানুষের প্রতি ইহসানস্বরূপ নেক আমলসমূহ বলে: ‘আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই’।
তখন তাকে বলা হয়: ‘বসো!’ সে বসে পড়ে। ইতিমধ্যে সূর্য তার সামনে এমনভাবে প্রকাশ পায় যেন তা অস্ত যাওয়ার উপক্রম হয়েছে। তাকে বলা হয়: ‘তোমাদের কাছে যে লোকটি এসেছিলেন, তার সম্পর্কে তুমি কী বলতে এবং তার বিষয়ে কী সাক্ষ্য দিতে?’ সে বলে: ‘আমাকে ছেড়ে দাও, আমি সালাত আদায় করি।’ ফেরেশতারা বলেন: ‘তুমি তা করবেই। আমরা যা জিজ্ঞাসা করছি, তা বলো। তোমাদের কাছে যে লোকটি এসেছিলেন, তার সম্পর্কে তুমি কী বলতে এবং তার বিষয়ে কী সাক্ষ্য দিতে?’ তিনি বলেন: তখন সে বলে, ‘মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তিনি আল্লাহর পক্ষ থেকে সত্য নিয়ে এসেছেন।’
তখন তাকে বলা হয়: ‘এই বিশ্বাসের ওপরই তুমি জীবনযাপন করেছ, এর ওপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইন শা আল্লাহ এর ওপরই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।’ এরপর তার জন্য জান্নাতের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: ‘এটি জান্নাতের তোমার থাকার স্থান এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত করে রেখেছেন।’ এতে তার আনন্দ ও সন্তুষ্টি আরও বেড়ে যায়। এরপর তার জন্য জাহান্নামের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: ‘এটি তোমার থাকার স্থান, যদি তুমি তাঁর (আল্লাহর) নাফরমানি করতে তবে আল্লাহ তোমার জন্য এখানে যা প্রস্তুত করে রাখতেন।’ এতেও তার আনন্দ ও সন্তুষ্টি আরও বেড়ে যায়। এরপর তার কবর সত্তর হাত প্রশস্ত করা হয় এবং আলোকিত করা হয়। তার শরীরকে আদি রূপে ফিরিয়ে দেওয়া হয় এবং তার রূহকে পবিত্র রূহগুলোর সাথে স্থাপন করা হয়। আর তা হলো জান্নাতের গাছের সাথে লটকানো পাখি (যা ফল ভক্ষণ করে)। আর এ সম্পর্কেই আল্লাহর বাণী: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ} অর্থাৎ, ‘যারা ঈমান এনেছে, আল্লাহ তাদেরকে দুনিয়ার জীবনে ও আখিরাতে সুপ্রতিষ্ঠিত বাক্যের (কালেমার) মাধ্যমে দৃঢ় রাখেন।’ (সূরা ইব্রাহীম, আয়াত ২৭)।
আর যখন কাফিরের কাছে তার মাথার দিক থেকে আসা হয়, তখন কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার ডান দিক থেকে আসা হয়, তখনও কিছুই পাওয়া যায় না। অতঃপর তার বাম দিক থেকে আসা হয়, তখনও কিছুই পাওয়া যায় না। এরপর তার পায়ের দিক থেকে আসা হয়, তখনও কিছুই পাওয়া যায় না। তখন তাকে বলা হয়: ‘বসো!’ সে ভীত-সন্ত্রস্ত অবস্থায় বসে পড়ে। তাকে বলা হয়: ‘তোমাদের মধ্যে যে লোকটি এসেছিলেন, তার সম্পর্কে তুমি কী বলতে এবং তার বিষয়ে কী সাক্ষ্য দিতে?’ সে বলে: ‘কোন্ লোক?’ সে তার নাম বলতে পারে না। তাকে বলা হয়: ‘মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে?’ সে বলে: ‘আমি জানি না, আমি লোকদেরকে বলতে শুনেছি, আমিও তাই বলতাম, যা লোকেরা বলত।’ তখন তাকে বলা হয়: ‘এই অবস্থায়ই তুমি জীবনযাপন করেছ, এর ওপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইন শা আল্লাহ এর ওপরই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।’ এরপর তার জন্য জাহান্নামের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: ‘এটি জাহান্নামে তোমার স্থান এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত করে রেখেছেন।’ এতে তার আফসোস ও ধ্বংস কামনা আরও বেড়ে যায়। এরপর তার জন্য জান্নাতের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং তাকে বলা হয়: ‘এটি জান্নাতে তোমার স্থান এবং আল্লাহ তোমার জন্য সেখানে যা প্রস্তুত করে রাখতেন, যদি তুমি তাঁর আনুগত্য করতে।’ এতেও তার আফসোস ও ধ্বংস কামনা আরও বেড়ে যায়। এরপর তার কবরকে এমনভাবে সংকুচিত করা হয় যে, তার এক পাশের পাঁজর অপর পাশের পাঁজরের সাথে মিশে যায়। আর এটাই সেই ‘সংকীর্ণ জীবনযাপন’ যা সম্পর্কে আল্লাহ বলেছেন: {وَمَنْ أَعْرَضَ عَنْ ذِكْرِي فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا وَنَحْشُرُهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ أَعْمَى} অর্থাৎ, ‘আর যে আমার স্মরণ থেকে বিমুখ হবে, তার জন্য থাকবে এক সংকুচিত জীবন এবং আমি তাকে কিয়ামতের দিন অন্ধ করে উত্থিত করব।’ (সূরা ত্বাহা, আয়াত ১২৪)।
(এই বর্ণনাটি ইমাম ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থে এবং ইবনু হিব্বান তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। আর শব্দগুলো ইবনু হিব্বানের। ত্বাবারানী অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: আবূ উমার, অর্থাৎ যরীর (দৃষ্টিহীন রাবী) বলেন: আমি হাম্মাদ ইবনু সালামাহকে জিজ্ঞাসা করলাম: এই লোকটি কি কিবলার অনুসারীদের মধ্যে থেকে ছিল? তিনি বললেন: হ্যাঁ। আবূ উমার বলেন: সে এমন সাক্ষ্য দিত যা তার অন্তরের দৃঢ় বিশ্বাসের ওপর প্রতিষ্ঠিত ছিল না; সে লোকদেরকে কিছু বলতে শুনত, আর সেও তা বলত।)
ত্বাবারানীর অন্য এক বর্ণনায় আছে: মানুষকে তার কবরে আনা হয়। যখন তার মাথার দিক থেকে আসা হয়, তখন কুরআন তিলাওয়াত তাকে প্রতিহত করে। যখন তার দু' হাতের দিক থেকে আসা হয়, তখন সাদকা তাকে প্রতিহত করে। আর যখন তার দু' পায়ের দিক থেকে আসা হয়, তখন মসজিদে হেঁটে যাওয়া তাকে প্রতিহত করে। (সম্পূর্ণ হাদীস)।
3562 - (17) [حسن لغيره] وقد روي عن ابن عمروٍ(1) رضي الله عنهما عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:
`ما مِنْ مسْلمٍ يموتُ يومَ الجُمعَةِ أوْ ليلَةَ الجُمعَةِ إلا وقَاهُ الله فِتْنَة القَبْرِ`.
رواه الترمذي، وغيره، وقال الترمذي:
حديث غريب، وليس إسناده بمتصل(2).
22 - (الترهيب من الجلوس على القبر، وكسر عظم الميت).
ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মুসলিম জুম্মার দিন অথবা জুম্মার রাতে মারা যায়, আল্লাহ তাকে অবশ্যই কবরের ফিতনা থেকে রক্ষা করেন।"
3563 - (1) [صحيح] عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`لأَنْ يجلِسَ أحدُكم على جَمرةٍ فتَحْرِقَ ثيابَهُ فتَخْلُصَ إلى جِلْدِه؛ خَيرٌ له مِنْ أنْ يَجْلِسَ على قَبْرٍ`.
رواه مسلم وأبو داود والنسائي وابن ماجه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমাদের কেউ যদি জ্বলন্ত কয়লার উপর বসে, আর তা তার কাপড় পুড়িয়ে চামড়া পর্যন্ত পৌঁছায়, তবুও তা তার জন্য কবরের উপর বসার চেয়ে উত্তম।
3564 - (2) [صحيح] وعن عقبة بن عامرٍ رضي الله عنه قال: قالَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`لأَنْ أمْشي على جَمْرَةٍ أو سَيْفٍ، أو أخْصِفَ نَعْلي بِرجْلي؛ أحَبُّ إليَّ مِنْ أنْ أمْشِيَ على قَبْرٍ`.
رواه ابن ماجه بإسناد جيد.
উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমি যদি জ্বলন্ত কয়লা বা তরবারির উপর হেঁটে যাই, অথবা আমার পা দিয়ে আমার জুতা সেলাই করি, তবে আমার কাছে তা কবরের উপর দিয়ে হেঁটে যাওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয়।
3565 - (3) [صحيح لغيره] وعن عبد الله بن مسعودٍ رضي الله عنه قال:
`لأَنْ أطأَ على جَمْرَةٍ أحبُّ إليَّ مِنْ أنْ أطأ على قبْرِ مسْلمٍ`.
رواه الطبراني في `الكبير` بإسناد حسن، وليس في أصلي رفعُه.
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি যদি জ্বলন্ত অঙ্গারের ওপর পা রাখি, তা আমার কাছে একজন মুসলিমের কবরের ওপর পা রাখার চেয়ে অধিক প্রিয়।
3566 - (4) [صحيح لغيره] وعن عمارة بن حزم رضي الله عنه قال:
رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم: جالساً على قبرٍ فقال:
`يا صاحبَ القبرِ! انزلْ مِن على القبرِ، لا تؤذي(1) صاحبَ القبرِ، ولا يؤذيك`.
رواه الطبراني في `الكبير` من رواية ابن لهيعة(1).
উমারা ইবনে হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি কবরের উপর বসে থাকতে দেখে বললেন, ‘হে কবরের উপর উপবিষ্ট ব্যক্তি! কবর থেকে নেমে আসো। তুমি কবরের অধিবাসীকে কষ্ট দিও না, আর সেও যেন তোমাকে কষ্ট না দেয়।’ (ত্বাবরানী তাঁর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।)
3567 - (5) [صحيح] وروي عن عائشة رضي الله عنها قالَتْ: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`كَسْرُ عَظْمِ المِّيتِ ككَسْرِه حَيّاً`.
رواه أبو داود وابن ماجه، وابن حبان في `صحيحه`.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত ব্যক্তির অস্থি (ভাঙা) ঠিক তেমনি, যেমন জীবিত অবস্থায় তা ভাঙা।" (আবূ দাঊদ, ইবনু মাজাহ ও ইবনু হিব্বান তাঁর সহীহ গ্রন্থে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।)
3568 - (1) [صحيح] وعن عبد الله بن عمرو بن العاصي رضي الله عنهما قال:
جاءَ أعْرابيٌّ إلى النبيِّ صلى الله عليه وسلم فقال: ما الصُّورُ؟ قال:
`قَرْنٌ يُنْفَخُ فِيهِ`.
رواه أبو داود، والترمذي وحسنه، وابن حبان في `صحيحه`.
আবদুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে জিজ্ঞাসা করলো, ‘সূর’ (শিংগা) কী? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, এটি একটি শিং, যাতে ফুঁক দেওয়া হবে।
3569 - (2) [صحيح لغيره] وعن أبي سعيدٍ رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`كيفَ أنْعَمُ وقدِ التَقم صاحِبُ القْرنِ القَرنَ، وحنى جَبْهَتَهُ، وأصْغَى سَمْعَهُ؛ يَنْتَظرُ أنْ يُؤْمَر فَينْفُخَ؟! `.
فكأنَّ ذلك ثَقُلَ على أصْحابِه فقالوا: كيفَ نَفْعَلُ يا رسول الله! أوَ نَقولُ؟ قال:
`قولوا: حَسْبُنا الله، ونِعْمَ الوكيلُ، على الله توَكَّلْنا -وربَّما قالَ: توكَّلْنا
على الله-`.
رواه الترمذي، واللفظ له، وقال: `حديث حسن`، وابن حبان في `صحيحه`.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আমি কিভাবে আরামে থাকব (বা আনন্দ উপভোগ করব)? অথচ শিঙ্গা (সুর) ধারণকারী (ফেরেশতা) শিঙ্গা মুখে নিয়েছেন, কপাল ঝুঁকিয়েছেন এবং মনোযোগ দিয়ে কান পেতে রেখেছেন; তিনি কেবল আদিষ্ট হওয়ার অপেক্ষা করছেন, যাতে তিনি ফুঁক দিতে পারেন?!’ যখন এ কথাটি সাহাবিদের ওপর কঠিন মনে হলো, তখন তারা বললেন: ‘হে আল্লাহর রাসূল! আমরা কী করব? অথবা, আমরা কী বলব?’ তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তোমরা বলো: ‘আল্লাহই আমাদের জন্য যথেষ্ট, আর তিনি কতই না উত্তম কার্যনির্বাহী। আমরা আল্লাহর ওপর ভরসা করি।’—রাবী সম্ভবত এও বলেছেন: ‘আমরা আল্লাহর ওপর ভরসা করি।’
3570 - (3) [صحيح لغيره] ورواه أحمد، والطبراني من حديث زيد بن أرقم.
৩৫৭০ - (৩) [সহীহ লি-গাইরিহি]। এটি আহমাদ ও ত্বাবারানী যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।
3571 - (4) [صحيح لغيره] ومن حديث ابن عباس أيضاً.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। এছাড়াও ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকেও (এটি সংকলিত)।
3572 - (5) [صحيح لغيره] وعن عقبة بن عامر رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`. . . فوالذي نفسي بيده إن الرجلين ينشران الثوبَ فلا يطويانه، وإن الرجل لَيمْدُرُ حوضَه فلا يسقي منه شيئاً أبداً، والرجل يحلبُ ناقته فلا يشربه أبداً`.
رواه الطبراني بإسناد جيد رواته ثقات مشهورون.(1)
(مَدَر) الحوض، أي: طيَّنه لئلا يتسرب منه الماء.
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সেই সত্তার কসম, যার হাতে আমার প্রাণ, নিশ্চয়ই দু’জন লোক কাপড় বিস্তৃত করবে (অথবা বিছাবে) কিন্তু তারা তা ভাঁজ করতে পারবে না, আর নিশ্চয়ই একজন লোক তার পানির হাউজ মাটি দিয়ে লেপবে (বা মজবুত করবে), কিন্তু সে কখনোই তা থেকে সামান্যতমও পান করতে পারবে না, আর একজন লোক তার উটনী দোহন করবে, কিন্তু সে কখনোই তা পান করতে পারবে না।
3573 - (6) [صحيح] وعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:
`لتَقومُ الساعَةُ وثوبُهما بَيْنَهُما لا يَتبايَعانِه ولا يَطْويانِه، ولَتَقومُ الساعَةُ وقدِ انْصرَف بلَبنِ لَقْحَتِه لا يَطْعَمُه، ولَتقومُ الساعَةُ يلوط حَوْضَهُ لا يَسْقيه، ولَتقومُ الساعَةُ وقد رفَع لُقْمَتَهُ إلى فيه لا يَطْعَمُها`.
رواه أحمد، وابن حبان في `صحيحه`(2).
(لاطَه) بالطاء المهملة بمعنى: مَدَرَه(1).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কিয়ামত এমন অবস্থায় সংঘটিত হবে যে, (ক্রেতা-বিক্রেতার) উভয়ের মাঝে কাপড়টি প্রসারিত থাকবে, কিন্তু তারা তা বিক্রিও করতে পারবে না, ভাঁজও করতে পারবে না। কিয়ামত এমন অবস্থায় সংঘটিত হবে যে, লোকটি তার দুগ্ধবতী উটের দুধ নিয়ে ফিরে এসেছে, কিন্তু সে তা পান করার সুযোগ পাবে না। কিয়ামত এমন অবস্থায় সংঘটিত হবে যে, লোকটি তার হাউজ (পশুর পানপাত্র) মেরামত করছে, কিন্তু সে তাতে পানি দিতে (বা পশুদের পান করাতে) পারবে না। কিয়ামত এমন অবস্থায় সংঘটিত হবে যে, লোকটি তার মুখের কাছে লোকমা তুলেছে, কিন্তু সে তা খেতে পারবে না।
3574 - (7) [صحيح] وعن أبي هريرة رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:
`ما بينَ النَّفْخَتَيْنِ أربَعون`.
قيل: أربَعون يوماً؟ قال أبو هريرة: أبَيْتُ، قالوا: أربعونَ شَهْراً؟ قال: أبَيْتُ، قالوا: أربعون سنَةً؟ قال: أبَيْتُ.
ثُمَّ ينْزِلُ مِنَ السماءِ ماءٌ فيَنْبُتونَ كما يَنْبُت البَقْلُ، وليسَ مِنَ الإنْسانِ شيْءٌ إلا يَبْلَى إلاَّ عَظْمٌ واحِدٌ، وهو عَجْبُ الذَّنَبِ، منه يُرَكَّبُ الخَلْقُ يومَ القِيامَةِ.
رواه البخاري ومسلم. ولمسلم قال:
`إنَّ في الإنْسانِ عَظْماً لا تأْكُله الأرْضُ أبداً، فيه يُرَكَّبُ الخَلْقُ يومَ القِيامَةِ`.
قالوا: أيُّ عظْمٍ هو يا رسولَ الله؟ قال:
`عَجْبُ الذَّنَبِ`.
[صحيح] ورواه مالك وأبو داود، والنسائي باختصار وقال:
`كلُّ ابْنِ آدَم تأْكُله الأرْضُ إلا عَجْبُ الذَّنَبِ، منه خُلِقَ، وفيه يَركَّبُ`.
(عَجْب الذَّنب) بفتح العين وإسكان الجيم بعدها باء أو ميم، وهو العظم الحديد الذي يكون في أسفل الصلب، وأصل الذنب من ذوات الأربع.
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন:
"দুই শিঙ্গায় ফুঁকের মধ্যবর্তী সময় হচ্ছে চল্লিশ।"
জিজ্ঞাসা করা হলো: চল্লিশ দিন? আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি নিশ্চিত নই। তারা বলল: চল্লিশ মাস? তিনি বললেন: আমি নিশ্চিত নই। তারা বলল: চল্লিশ বছর? তিনি বললেন: আমি নিশ্চিত নই।
এরপর আকাশ থেকে পানি বর্ষিত হবে। ফলে তারা (মানুষ) উদ্ভিদের মতো উৎপন্ন হবে। মানুষের (দেহের) সবকিছুই পচে যাবে, কেবল একটি অস্থি ছাড়া। আর তা হলো আজবুয যুনুব (মেরুদণ্ডের সর্বনিম্ন অংশ)। কিয়ামতের দিন তা থেকেই সৃষ্টিকে পুনরায় তৈরি করা হবে।
হাদীসটি বুখারী ও মুসলিম বর্ণনা করেছেন।
মুসলিম (এর অন্য বর্ণনায়) বলেছেন: "নিশ্চয়ই মানুষের দেহে এমন একটি অস্থি আছে, যা ভূমি কখনোই খায় না। কিয়ামতের দিন তা থেকেই সৃষ্টিকে পুনরায় তৈরি করা হবে।" তারা (সাহাবীরা) জিজ্ঞাসা করলেন: হে আল্লাহর রাসূল! সেই অস্থিটি কী? তিনি বললেন: "আজবুয যুনুব।"
ইমাম মালিক, আবূ দাঊদ ও নাসাঈ সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: "আদমসন্তানের সবকিছুই মাটি খেয়ে ফেলে, কেবল আজবুয যুনুব ছাড়া। তা থেকেই তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে এবং তাতে (তাতেই) তাকে পুনরায় তৈরি করা হবে।"
3575 - (8) [صحيح] وعنه [يعني أبا سعيدٍ الخدريِّ رضي الله عنه]:
أنَّه لمّا حضَره الموتُ دَعا بثِيابٍ جُدُدٍ فلَبِسَها، ثُمَّ قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:
`الميِّتُ يُبْعَثُ في ثيابِه التي يَموتُ فيها`.
رواه أبو داود، وابن حبان في `صحيحه`، وفي إسناده يحيى بن أيوب، وهو الغافقي المصري، احتج به البخاري ومسلم وغيرهما، وله مناكير، وقال أبو حاتم: `لا يحتج به`.
وقال أحمد: `سيئ الحفظ`. وقال النسائي: `ليس بالقوي`.
وقد قال كل من وقفت على كلامه من أهل اللغة: إن المراد بقوله: `يبعث في ثيابه التي قبض فيها`؛ أي: في أعماله. قال الهروي:
`وهذا كحديثه الآخر: `يبُعث العبد على ما مات عليه`. قال: وليس قول من ذهب إلى الأكفان بشيء، لأن الميت إنما يكفن بعد الموت` انتهى.
(قال الحافظ):
وفِعل أبي سعيد راوي الحديث يدل على إجرائه على ظاهره، وأن الميت يبعث في ثيابه التي قبض فيها. وفي `الصحاح` وغيرها أن الناس يبعثون عراة؛ كما سيأتي في الفصل بعده إن شاء الله. فالله سبحانه أعلم(1).
2 - فصل في الحشر وغيره.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর যখন মৃত্যু উপস্থিত হলো, তখন তিনি নতুন কাপড় চাইলেন এবং পরিধান করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: `যে পোশাকে (বস্ত্রে) মানুষ মৃত্যুবরণ করে, সেই পোশাকেই তাকে পুনরুত্থিত করা হবে।`