হাদীস বিএন


ইরওয়াউল গালীল





ইরওয়াউল গালীল (1128)


*1128* - (عن ابن عمر مرفوعا: ` من حج فزار قبرى بعد
وفاتى فكأنما زارنى فى حياتى `. وفى رواية: ` من زار قبرى وجبت له شفاعتى `. رواه الدارقطنى بإسناد ضعيف (ص 268) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * منكر.
وله عن ابن عمر طريقان:
الأولى: عن حفص بن أبى داود عن ليث بن أبى سليم عن مجاهد عنه به بالرواية الأولى.
أخرجه الدارقطنى (279) وكذا البيهقى (5/246) وغيرهما.
وقال البيهقى: ` تفرد به حفص وهو ضعيف `.
قلت: وهذا إسناد ضعيف جدا من أجل ليث وحفص ، وقد ذكرت بعض أقوال الأئمة فيهما ، ومن أخرج حديثهما سوى من ذكرنا فى ` سلسلة الأحاديث الضعيفة ` (رقم 47) ، ونقلت فيه كلام شيخ الإسلام ابن تيمية على الحديث وحكمه عليه بالوضع من حيث معناه ، فراجعه فإنه مهم.
والأخرى: عن موسى بن هلال العبدى عن عبيد الله بن عمر عن نافع عنه بالرواية الأخرى.
أخرجه الدارقطنى (280) وعنه ابن النجار فى ` تاريخ المدينة ` (397) وكذا الخلعى فى ` الفوائد ` (ق 111/2) والعقيلى فى ` الضعفاء ` (410) من طريقين عن موسى به.
ورواه الدولابى فى ` الكنى ` (2/64) عن موسى بن هلال إلا أنه قال: حدثنا عبد الله بن عمر أبو عبد الرحمن أخو عبيد الله عن نافع به.
وكذا رواه ابن عدى فى ` الكامل ` (385/2) ، أخرجاه من طريقين أخريين عنه.
وقال ابن عدى بعد أن أشار إلى الرواية الأولى:
` وعبد الله أصح ، ولموسى غير هذا ، وأرجو أنه لا بأس به `.
ورواه البيهقى فى ` شعب الإيمان ` كما فى ` الصارم ` (12) من طريق ابن
عدى ثم قال: ` وقيل: عن موسى بن هلال العبدى عن عبيد الله بن عمر ، وسواء قال: عبيد الله أو عبد الله ، فهو منكر عن نافع عن ابن عمر ، لم يأت به غيره `.
قال ابن عبد الهادى: ` والصحيح أنه عبد الله المكبر كما ذكره ابن عدى ، وغيره `.
قلت: ورواية الدولابى صريحة فى ذلك ، قال الحافظ عقبها فى ` اللسان `:` فهذا قاطع للنزاع من أنه عن المكبر ، لا عن المصغر ، فإن المكبر هو الذى يكنى أبا عبد الرحمن ، وقد أخرج الدولابى هذا الحديث فى من يكنى أبا عبد الرحمن `.
قلت: وأنا أخشى أن يكون هذا الاختلاف من موسى بن هلال نفسه وليس من الرواة عنه ، لأن الطرق بالروايتين عنه متقابلة ، فمن الصعب والحالة هذه ترجيح وجه على الآخر من وجهى الاختلاف عليه ، فالاضطراب منه نفسه فإنه ليس بالمشهور ، فقد عرفت آنفا قول ابن عدى فيه ` أرجو أنه لا بأس به ` وخالفه الآخرون ، فقال أبو حاتم والدارقطنى: ` مجهول `.
وقال العقيلى عقب الحديث: ` لا يصح ، ولا يتابع عليه `.
وقال ابن القطان: ` الحق أنه لم تثبت عدالته `.
قلت: واضطرابه فى إسناد هذا الحديث مما يدل عندى على ضعفه. والله أعلم.
ثم رأيت ابن عبد الهادى قد مال أخيرا إلى هذا الذى ذكرناه من اضطراب موسى فيه فقال (18) مرجحا أن الصواب قوله ` عبد الله بن عمر `: ` وكان موسى بن هلال حدث به مرة عن عبيد الله فأخطأ ، لأنه ليس من أهل الحديث ، ولا من المشهورين بنقله ، وهو لم يدرك عبيد الله ، ولا لحقه ،
فإن بعض الرواة عنه لا يروى عن رجل عن عبيد الله ، وإنما يروى عن رجل عن آخر عن عبيد الله فإن عبيد الله متقدم الوفاة كما ذكرنا ذلك فيما تقدم بخلاف عبد الله ، فإنه عاش دهرا بعد أخيه عبد الله. وكأن موسى بن هلال لم يكن يميز بين عبد الله وعبيد الله ولا يعرف أنهما رجلان ، فإنه لم يكن من أهل العلم ولا ممن يعتمد عليه فى ضبط باب من أبوابه `.
وقد جزم الإمام ابن خزيمة بأن قول موسى فى بعض الروايات عنه ` عبيد الله بن عمر ` مصغرا خطأ منه فقال بعد أن ساق الحديث فى ` صحيحه `: ` إن ثبت الخبر ، فإن فى القلب منه `. ثم ساق إسناده به ثم قال: ` أنا أبرأ من عهدة هذا الخبر ، لأن عبيد الله بن عمر أجل وأحفظ من أن يروى مثل هذا المنكر ، فإن كان موسى بن هلال لم يغلط فيمن فوق أحد العمرين فيشبه أن يكون هذا من حديث عبد الله بن عمر ، فأما من حديث عبيد الله بن عمر فإنى لا أشك أنه ليس من حديثه `.
ذكره الحافظ فى ` اللسان ` وقد وقع فيه بعض الأخطاء صححناها بقدر الإمكان ، ثم قال: ` وعبد الله بن عمر العمرى بالتكبير ضعيف الحديث ، وأخوه عبيد الله بن عمر بالتصغير ثقة حافظ جليل ، ومع ما تقدم من عبارة ابن خزيمة وكشفه عن علة هذا الخبر لا يحسن أن يقال: أخرجه ابن خزيمة فى ` صحيحه ` إلا مع البيان `.
قلت: ولذلك فقد تأدب الحافظ السخاوى بتوجيه شيخه هذا فقال فى ` المقاصد الحسنة ` (1125) : ` وهو فى ` صحيح ابن خزيمة ` وأشار إلى تضعيفه ` (1) .
ومن أجل ذلك كله قال ابن القطان فى هذا الحديث: ` لا يصح ` وأنكر على عبد الحق سكوته عن تضعيفه ، وقال: أراه تسامح فيه لأنه من الحث والترغيب على عمل `.
وأنا أخالف ابن القطان فى هذا الذى ظنه من التسامح ، وأرى أن عبد الحق يذهب إلى أن الحديث ثابت عنده لأنه قال فى مقدمة كتابه ` الأحكام الكبرى `: ` وإن لم تكن فيه علة ، كان سكوتى عنه دليلا على صحته `!
وأيضا ، فقد أورد الحديث فى كتابه الآخر ` مختصر أحكام الشريعة ` المعروفة بـ (` الأحكام الكبرى `) [1] ، وأورد الحديث فيه وقد نص فى مقدمتها قال: ` فإنى جمعت فى هذا الكتاب متفرقا من حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم … وتخيرتها صحيحة الإسناد ، معروفة عند النقاد … ` (1) .
فهذا وذاك يدلان على أن الحديث صحيح عنده ، نقول هذا بيانا للحقيقة ودفعا لسوء الظن بعبد الحق أن يسكت عن الحديث الضعيف ، وهو يراه ضعيفاً ، وإلا فالصواب الذى لا يرتاب فيه من أمعن النظر فيما سبق من البيان أن الحديث ضعيف الإسناد لا تقوم به حجة.
ولا يقويه أنه روى من طريق أخرى فإنها شديدة الضعف جدا ، أخرجها البزار فى ` مسنده ` قال: حدثنا قتيبة حدثنا عبد الله بن إبراهيم: حدثنا عبد الرحمن بن زيد عن أبيه عن ابن عمر به.
قلت: وهذا إسناد هالك ، وفيه علتان:
` الأولى: عبد الرحمن بن زيد بن أسلم وهو ضعيف جدا ، وهو صاحب
حديث توسل آدم بالنبى صلى الله عليهما وسلم ، وهو حديث موضوع كما بينته فى ` سلسلة الأحاديث الضعيفة ` رقم (25) .
والأخرى: عبد الله بن إبراهيم وهو الغفارى ، أورده الذهبى فى ` الضعفاء ` وقال: ` متهم ، قال ابن عدى: ما يرويه لا يتابعه عليه الثقات `.
وقال الحافظ فى ` التقريب `: ` متروك ، ونسبه ابن حبان إلى الوضع `.
قلت: وبه أعله الهيثمى فقال فى ` المجمع ` (4/2) وتبعه الحافظ فى ` التلخيص `:
` رواه البزار وفيه عبد الله بن إبراهيم الغفارى وهو ضعيف `.
قلت: وفيه قصور لا يخفى.
وقال الإمام النووى فى ` المجموع شرح المهذب ` (8/272) .
` رواه البزار والدارقطنى بإسنادين ضعيفين ` (1) .
وقد روى من حديث أنس ، رواه ابن النجار فى ` تاريخه المدينة ` (ص 397) عن محمد بن مقاتل: حدثنا جعفر بن هارون ، حدثنا إسماعيل بن المهدى عن أنس مرفوعا به.
قلت: وهذا إسناد ساقط بمرة ، إسماعيل بن مهدى لم أعرفه ، وأظنه محرفا من ` سمعان بن مهدى ` ، فإن نسخة ` التاريخ ` المطبوعة سيئة جدا ، فقد جاء فى ` الميزان `: ` سمعان بن مهدى ، عن أنس بن مالك ، لا يكاد يعرف ، ألصقت به
نسخة مكذوبة ، رأيتها ، قبح الله من وضعها `.
قال الحافظ فى ` اللسان `: ` وهى من رواية محمد بن مقاتل الرازى عن جعفر بن هارون الواسطى عن سمعان ، فذكر النسخة ، وهى أكثر من ثلاثمائة حديث ، أكثر متونها موضوعة … وأورد الجوزجانى من هذه النسخة حديثا ، وقال: منكر ، وفى سنده غير واحد من المجهولين `.
قلت: ومن الظاهر أن هذا الحديث من هذه النسخة لأنه مروى بسندها.
وجعفر بن هارون ، قال الذهبى فى ترجمته: ` أتى بخير موضوع `.
قلت: فلعله هو الذى افتعل هذه النسخة.
ومحمد بن مقاتل (وكان فى النسخة: محمد بن محمد بن مقاتل) قال الذهبى: ` تكلم فيه ، ولم يترك `.
وقال الحافظ فى ` التقريب `: ` ضعيف.
وجملة القول: إن هذا الحديث ضعيف لا يحتج به ، وبعض طرقه أشد ضعفا من بعض.




*১১২৮* - (ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণিত: ‘যে ব্যক্তি হজ করল এবং আমার মৃত্যুর পর আমার কবর যিয়ারত করল, সে যেন আমার জীবদ্দশায়ই আমাকে যিয়ারত করল।’ অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: ‘যে ব্যক্তি আমার কবর যিয়ারত করল, তার জন্য আমার শাফাআত ওয়াজিব হয়ে গেল।’ এটি দারাকুতনী দুর্বল (যঈফ) সানাদে বর্ণনা করেছেন (পৃ. ২৬৮)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)।

ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর দুটি সূত্র (ত্বারীক্ব) রয়েছে:

প্রথমটি: হাফস ইবনু আবী দাঊদ সূত্রে, তিনি লায়স ইবনু আবী সুলাইম সূত্রে, তিনি মুজাহিদ সূত্রে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে প্রথম বর্ণনাটি (মারফূ' হিসেবে) বর্ণনা করেছেন। এটি দারাকুতনী (২৭৯), অনুরূপভাবে বাইহাক্বী (৫/২৪৬) এবং অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন।

বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘হাফস এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন এবং তিনি দুর্বল (যঈফ)।’ আমি (আলবানী) বলছি: লায়স ও হাফসের কারণে এই সনদটি অত্যন্ত দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)। আমি তাদের দুজনের ব্যাপারে ইমামগণের কিছু উক্তি এবং আমরা যাদের কথা উল্লেখ করেছি তারা ছাড়া আর কারা তাদের হাদীস বর্ণনা করেছেন, তা ‘সিলসিলাতুল আহাদীস আয-যঈফাহ’ (হাদীস নং ৪৭)-এ উল্লেখ করেছি। সেখানে আমি শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর হাদীসটি সম্পর্কে মন্তব্য এবং এর অর্থের দিক থেকে এটিকে মাওদ্বূ' (জাল) হিসেবে তাঁর রায়ও উদ্ধৃত করেছি। সুতরাং আপনি তা দেখে নিন, কারণ এটি গুরুত্বপূর্ণ।

দ্বিতীয়টি: মূসা ইবনু হিলাল আল-আবদী সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার সূত্রে, তিনি নাফি‘ সূত্রে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে অন্য বর্ণনাটি (মারফূ' হিসেবে) বর্ণনা করেছেন। এটি দারাকুতনী (২৮০), তাঁর সূত্রে ইবনু আন-নাজ্জার ‘তারীখুল মাদীনা’ (৩৯৭)-এ, অনুরূপভাবে আল-খিলাঈ ‘আল-ফাওয়াইদ’ (খ. ১১১/২)-এ এবং আল-উক্বাইলী ‘আয-যু‘আফা’ (৪১০)-এ মূসা থেকে দুটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

আর এটি আদ-দুলাবী ‘আল-কুনা’ (২/৬৪)-তে মূসা ইবনু হিলাল সূত্রে বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু উমার আবূ আব্দুর রহমান, যিনি উবাইদুল্লাহর ভাই, তিনি নাফি‘ সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। অনুরূপভাবে ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ (২/৩৮৫)-এ এটি বর্ণনা করেছেন। তারা দুজন মূসা থেকে আরও দুটি ভিন্ন সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।

ইবনু আদী প্রথম বর্ণনাটির দিকে ইঙ্গিত করার পর বলেছেন: ‘আব্দুল্লাহ (নামটি) অধিকতর সহীহ। মূসার এর বাইরেও বর্ণনা আছে, এবং আমি আশা করি যে, তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই (লা বা’স বিহী)।’

বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) এটি ‘শু‘আবুল ঈমান’-এ বর্ণনা করেছেন, যেমনটি ‘আস-সারিম’ (১২)-এ ইবনু আদী-এর সূত্রে রয়েছে। অতঃপর তিনি বলেছেন: ‘বলা হয়েছে: মূসা ইবনু হিলাল আল-আবদী সূত্রে, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার সূত্রে (বর্ণনা করেছেন)। তিনি উবাইদুল্লাহ বলুন বা আব্দুল্লাহ বলুন, উভয় ক্ষেত্রেই এটি নাফি‘ সূত্রে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মুনকার (অগ্রহণযোগ্য)। এটি তিনি ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেননি।’

ইবনু আব্দুল হাদী বলেছেন: ‘সহীহ হলো, তিনি আব্দুল্লাহ (বড় করে উচ্চারিত নাম), যেমনটি ইবনু আদী ও অন্যান্যরা উল্লেখ করেছেন।’ আমি (আলবানী) বলছি: আদ-দুলাবীর বর্ণনা এ ব্যাপারে স্পষ্ট। হাফিয (ইবনু হাজার) তাঁর ‘আল-লিসান’-এ এর পরে মন্তব্য করেছেন: ‘এটি এই বিতর্কের মীমাংসা করে দেয় যে, এটি বড় করে উচ্চারিত নাম (আব্দুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, ছোট করে উচ্চারিত নাম (উবাইদুল্লাহ) থেকে নয়। কারণ বড় করে উচ্চারিত নামধারী ব্যক্তিই আবূ আব্দুর রহমান কুনিয়াত ধারণ করতেন, আর আদ-দুলাবী এই হাদীসটি আবূ আব্দুর রহমান কুনিয়াতধারীদের অধ্যায়ে বর্ণনা করেছেন।’

আমি (আলবানী) বলছি: আমি আশঙ্কা করি যে, এই মতপার্থক্য মূসা ইবনু হিলাল নিজেই করেছেন, তাঁর থেকে বর্ণনাকারীরা নন। কারণ তাঁর থেকে উভয় বর্ণনার সূত্রগুলো পরস্পর বিপরীতমুখী। এই অবস্থায় তাঁর উপর আরোপিত দুটি মতপার্থক্যের মধ্যে একটিকে অন্যটির উপর প্রাধান্য দেওয়া কঠিন। সুতরাং এই ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা) তাঁর নিজের থেকেই এসেছে। কারণ তিনি মশহূর (সুপরিচিত) নন। আপনি ইতোপূর্বে ইবনু আদী-এর উক্তি জেনেছেন যে, ‘আমি আশা করি যে, তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।’ কিন্তু অন্যরা তাঁর বিরোধিতা করেছেন। আবূ হাতিম ও দারাকুতনী বলেছেন: ‘তিনি মাজহূল (অজ্ঞাত)।’ উক্বাইলী হাদীসটির পরে মন্তব্য করেছেন: ‘এটি সহীহ নয় এবং এর কোনো মুতাবা‘আত (সমর্থনকারী বর্ণনা) নেই।’ ইবনুল কাত্তান বলেছেন: ‘সত্য হলো, তার বিশ্বস্ততা প্রমাণিত হয়নি।’ আমি (আলবানী) বলছি: এই হাদীসের সানাদে তাঁর ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা) আমার কাছে তাঁর দুর্বলতার প্রমাণ বহন করে। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।

এরপর আমি দেখলাম যে, ইবনু আব্দুল হাদী অবশেষে মূসার এই ইযতিরাব (বিশৃঙ্খলা)-এর দিকে ঝুঁকেছেন, যা আমরা উল্লেখ করেছি। তিনি (পৃ. ১৮)-এ ‘আব্দুল্লাহ ইবনু উমার’ নামটি সঠিক বলে প্রাধান্য দিয়ে বলেছেন: ‘মূসা ইবনু হিলাল একবার এটি উবাইদুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেছিলেন এবং ভুল করেছিলেন। কারণ তিনি আহলুল হাদীসের অন্তর্ভুক্ত নন, না তিনি হাদীস বর্ণনায় সুপরিচিতদের মধ্যে গণ্য। আর তিনি উবাইদুল্লাহকে পাননি বা তাঁর সাথে সাক্ষাৎও হয়নি। কারণ তাঁর থেকে বর্ণনাকারীদের কেউ কেউ উবাইদুল্লাহ সূত্রে একজন লোকের মাধ্যমে বর্ণনা করেন না, বরং একজন লোকের মাধ্যমে অন্য আরেকজনের সূত্রে উবাইদুল্লাহ থেকে বর্ণনা করেন। কারণ উবাইদুল্লাহর মৃত্যু আগে হয়েছিল, যেমনটি আমরা পূর্বে উল্লেখ করেছি। পক্ষান্তরে আব্দুল্লাহর বিষয়টি ভিন্ন, কারণ তিনি তাঁর ভাই আব্দুল্লাহর (উবাইদুল্লাহর) মৃত্যুর পরেও দীর্ঘকাল বেঁচে ছিলেন। মনে হয় মূসা ইবনু হিলাল আব্দুল্লাহ ও উবাইদুল্লাহর মধ্যে পার্থক্য করতে পারতেন না এবং জানতেন না যে তারা দুজন ভিন্ন ব্যক্তি। কারণ তিনি ইলমের (জ্ঞানের) অধিকারী ছিলেন না এবং এমনও ছিলেন না যে, তাঁর কোনো একটি অধ্যায়ের নির্ভুলতার জন্য তাঁর উপর নির্ভর করা যায়।’

ইমাম ইবনু খুযাইমাহ (রাহিমাহুল্লাহ) নিশ্চিতভাবে বলেছেন যে, মূসা থেকে কিছু বর্ণনায় ‘উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার’ (ছোট করে উচ্চারিত নাম) বলাটা তাঁর ভুল। তিনি তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে হাদীসটি উল্লেখ করার পর বলেছেন: ‘যদি খবরটি প্রমাণিত হয়, তবে আমার মনে এ নিয়ে সন্দেহ আছে।’ অতঃপর তিনি এর সনদ উল্লেখ করে বলেছেন: ‘আমি এই খবরের দায়ভার থেকে মুক্ত। কারণ উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার (রাহিমাহুল্লাহ) এত মহান ও হাফিয (স্মৃতিশক্তিসম্পন্ন) ছিলেন যে, তিনি এমন মুনকার (অগ্রহণযোগ্য) হাদীস বর্ণনা করতে পারেন না। যদি মূসা ইবনু হিলাল দুই উমারীর (আব্দুল্লাহ ও উবাইদুল্লাহ) একজনের উপরের বর্ণনাকারীর ক্ষেত্রে ভুল না করে থাকেন, তবে সম্ভবত এটি আব্দুল্লাহ ইবনু উমারের হাদীস। কিন্তু উবাইদুল্লাহ ইবনু উমারের হাদীস হিসেবে আমি কোনো সন্দেহ করি না যে, এটি তাঁর হাদীস নয়।’ হাফিয (ইবনু হাজার) এটি ‘আল-লিসান’-এ উল্লেখ করেছেন। সেখানে কিছু ভুল ছিল, যা আমরা যথাসম্ভব সংশোধন করেছি। অতঃপর তিনি (হাফিয ইবনু হাজার) বলেছেন: ‘আর আব্দুল্লাহ ইবনু উমার আল-উমারী (বড় করে উচ্চারিত নাম) দুর্বলুল হাদীস (দুর্বল বর্ণনাকারী)। আর তাঁর ভাই উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার (ছোট করে উচ্চারিত নাম) সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য), হাফিয ও মহান ব্যক্তিত্ব। ইবনু খুযাইমাহর পূর্বোক্ত মন্তব্য এবং এই খবরের ‘ইল্লত (ত্রুটি) উন্মোচন করার পরেও, এটি বলা শোভনীয় নয় যে, ইবনু খুযাইমাহ এটি তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, যদি না ব্যাখ্যা দেওয়া হয়।’

আমি (আলবানী) বলছি: এই কারণে হাফিয আস-সাখাবী তাঁর শাইখের (ইবনু হাজার) এই নির্দেশনার প্রতি বিনয়ী হয়ে ‘আল-মাক্বাসিদ আল-হাসানাহ’ (১১২৫)-এ বলেছেন: ‘এটি ‘সহীহ ইবনু খুযাইমাহ’তে রয়েছে, তবে তিনি (ইবনু খুযাইমাহ) এটিকে দুর্বল করার দিকে ইঙ্গিত করেছেন।’ (১)

এই সবকিছুর কারণে ইবনুল কাত্তান এই হাদীস সম্পর্কে বলেছেন: ‘এটি সহীহ নয়।’ এবং তিনি আব্দুল হক্ব-এর উপর এর দুর্বলতা সম্পর্কে নীরব থাকার জন্য আপত্তি জানিয়েছেন। তিনি বলেছেন: ‘আমি মনে করি তিনি এতে শিথিলতা দেখিয়েছেন, কারণ এটি কোনো আমলের প্রতি উৎসাহ ও অনুপ্রেরণা সংক্রান্ত।’

আমি (আলবানী) ইবনুল কাত্তানের এই শিথিলতা সংক্রান্ত ধারণার সাথে দ্বিমত পোষণ করি। আমি মনে করি আব্দুল হক্ব মনে করতেন যে হাদীসটি তাঁর কাছে প্রমাণিত, কারণ তিনি তাঁর গ্রন্থ ‘আল-আহকাম আল-কুবরা’-এর ভূমিকায় বলেছেন: ‘যদি এতে কোনো ‘ইল্লত (ত্রুটি) না থাকে, তবে আমার নীরবতা এর সহীহ হওয়ার প্রমাণ।’

তাছাড়া, তিনি হাদীসটি তাঁর অন্য গ্রন্থ ‘মুখতাসার আহকাম আশ-শারী‘আহ’ (যা ‘আল-আহকাম আল-কুবরা’ নামে পরিচিত) [১]-এ উল্লেখ করেছেন। তিনি এর ভূমিকায় স্পষ্টভাবে বলেছেন: ‘আমি এই গ্রন্থে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর বিক্ষিপ্ত হাদীসসমূহ একত্রিত করেছি... এবং আমি সেগুলোকে বেছে নিয়েছি, যা সহীহুল ইসনাদ (নির্ভরযোগ্য সনদযুক্ত) এবং সমালোচকদের কাছে সুপরিচিত...’ (১)।

এই উভয় বিষয় প্রমাণ করে যে, হাদীসটি তাঁর (আব্দুল হক্ব-এর) কাছে সহীহ। আমরা এই কথাটি বললাম সত্যকে স্পষ্ট করার জন্য এবং আব্দুল হক্ব সম্পর্কে এই খারাপ ধারণা দূর করার জন্য যে, তিনি দুর্বল হাদীসকে দুর্বল জেনেও নীরব থাকবেন। অন্যথায়, যে ব্যক্তি পূর্বের ব্যাখ্যায় গভীরভাবে মনোযোগ দেবে, তার কাছে সন্দেহাতীতভাবে সঠিক হলো এই যে, হাদীসটি দুর্বলুল ইসনাদ (দুর্বল সনদযুক্ত) এবং এটি দ্বারা দলীল পেশ করা যায় না। এটি অন্য সূত্রে বর্ণিত হলেও শক্তিশালী হয় না, কারণ সেই সূত্রটি অত্যন্ত দুর্বল (শাদীদ আয-যু‘ফ জিদ্দান)। বাযযার এটি তাঁর ‘মুসনাদ’-এ বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন কুতাইবাহ, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ইবরাহীম সূত্রে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু যায়দ সূত্রে, তিনি তাঁর পিতা সূত্রে, তিনি ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলছি: এই সনদটি ‘হালিক’ (ধ্বংসাত্মক)। এতে দুটি ‘ইল্লত (ত্রুটি) রয়েছে: প্রথমটি: আব্দুর রহমান ইবনু যায়দ ইবনু আসলাম, যিনি অত্যন্ত দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)। তিনি সেই ব্যক্তি, যিনি আদম (আঃ)-এর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে তাওসসুলের হাদীস বর্ণনা করেছেন, যা মাওদ্বূ' (জাল) হাদীস, যেমনটি আমি ‘সিলসিলাতুল আহাদীস আয-যঈফাহ’ (হাদীস নং ২৫)-এ স্পষ্ট করেছি।

দ্বিতীয়টি: আব্দুল্লাহ ইবনু ইবরাহীম, যিনি আল-গিফারী। যাহাবী তাঁকে ‘আয-যু‘আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন: ‘তিনি মুত্তাহাম (অভিযুক্ত)। ইবনু আদী বলেছেন: তিনি যা বর্ণনা করেন, তাতে সিক্বাহ (নির্ভরযোগ্য) রাবীগণ তাঁর মুতাবা‘আত (সমর্থন) করেন না।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’-এ বলেছেন: ‘তিনি মাতরূক (পরিত্যক্ত), এবং ইবনু হিব্বান তাঁকে জাল করার সাথে সম্পর্কিত করেছেন।’ আমি (আলবানী) বলছি: এই কারণেই হাইসামী এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন। তিনি ‘আল-মাজমা’ (৪/২)-এ বলেছেন এবং হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তালখীস’-এ তাঁকে অনুসরণ করে বলেছেন: ‘এটি বাযযার বর্ণনা করেছেন এবং এতে আব্দুল্লাহ ইবনু ইবরাহীম আল-গিফারী রয়েছেন, যিনি দুর্বল (যঈফ)।’ আমি (আলবানী) বলছি: এতে যে ত্রুটি রয়েছে, তা গোপন নয়।

ইমাম নববী (রাহিমাহুল্লাহ) ‘আল-মাজমূ‘ শারহুল মুহাযযাব’ (৮/২৭২)-এ বলেছেন: ‘এটি বাযযার ও দারাকুতনী দুটি দুর্বল (যঈফ) সনদ সহকারে বর্ণনা করেছেন।’ (১)

এটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকেও বর্ণিত হয়েছে। ইবনু আন-নাজ্জার তাঁর ‘তারীখুল মাদীনা’ (পৃ. ৩৯৭)-এ মুহাম্মাদ ইবনু মুক্বাতিল সূত্রে বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন জা‘ফার ইবনু হারূন, তিনি ইসমাঈল ইবনুল মাহদী সূত্রে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' হিসেবে এটি বর্ণনা করেছেন। আমি (আলবানী) বলছি: এই সনদটি সম্পূর্ণরূপে বাতিল (সাক্বিত বি-মাররাহ)। ইসমাঈল ইবনুল মাহদী সম্পর্কে আমি অবগত নই। আমি মনে করি এটি ‘সাম‘আন ইবনুল মাহদী’ থেকে বিকৃত হয়েছে। কারণ ‘তারীখ’ গ্রন্থের মুদ্রিত কপিটি অত্যন্ত খারাপ। ‘আল-মীযান’-এ এসেছে: ‘সাম‘আন ইবনুল মাহদী, আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে—তিনি প্রায় অজ্ঞাত। তাঁর সাথে একটি মিথ্যা পান্ডুলিপি জুড়ে দেওয়া হয়েছে, যা আমি দেখেছি। যে এটি তৈরি করেছে, আল্লাহ তাকে ধ্বংস করুন।’

হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-লিসান’-এ বলেছেন: ‘এটি মুহাম্মাদ ইবনু মুক্বাতিল আর-রাযী সূত্রে, তিনি জা‘ফার ইবনু হারূন আল-ওয়াসিতী সূত্রে, তিনি সাম‘আন সূত্রে বর্ণিত। অতঃপর তিনি পান্ডুলিপিটির কথা উল্লেখ করেছেন, যা তিন শতাধিক হাদীসের বেশি এবং এর অধিকাংশ মতন (মূল পাঠ) মাওদ্বূ' (জাল)...। আর জাওযাজানী এই পান্ডুলিপি থেকে একটি হাদীস উল্লেখ করে বলেছেন: মুনকার (অগ্রহণযোগ্য), এবং এর সনদে একাধিক মাজহূল (অজ্ঞাত) রাবী রয়েছে।’ আমি (আলবানী) বলছি: স্পষ্টতই এই হাদীসটি সেই পান্ডুলিপি থেকেই এসেছে, কারণ এটি সেই সনদেই বর্ণিত। আর জা‘ফার ইবনু হারূন সম্পর্কে যাহাবী তাঁর জীবনীতে বলেছেন: ‘তিনি জাল (মাওদ্বূ') খবর নিয়ে এসেছেন।’ আমি (আলবানী) বলছি: সম্ভবত তিনিই এই পান্ডুলিপিটি তৈরি করেছেন। আর মুহাম্মাদ ইবনু মুক্বাতিল (পান্ডুলিপিতে ছিল: মুহাম্মাদ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু মুক্বাতিল) সম্পর্কে যাহাবী বলেছেন: ‘তাঁর সম্পর্কে কথা বলা হয়েছে, তবে তাঁকে একেবারে পরিত্যাগ করা হয়নি।’ হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’-এ বলেছেন: ‘দুর্বল (যঈফ)।’ সারকথা হলো: এই হাদীসটি দুর্বল (যঈফ), যা দ্বারা দলীল পেশ করা যায় না। এর কিছু সূত্র অন্যগুলোর চেয়েও অধিক দুর্বল।









ইরওয়াউল গালীল (1129)


*1129* - (حديث جابر أن النبى صلى الله عليه وسلم قال: ` صلاة فى مسجدى هذا أفضل من ألف صلاة فى سواه إلا المسجد الحرام ، فصلاة فى المسجد الحرام أفضل من مئة ألف صلاة [فيما سواه] `. رواه أحمد وابن ماجه بإسنادين صحيحين (ص 268) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أحمد (3/343 ، 397) وابن ماجه (1406) من طرق عن عبيد الله بن عمرو الرقى عن عبد الكريم عن عطاء عن جابر به.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين ، وعبد الكريم هو ابن مالك الجزرى.
وقال البوصيرى فى ` الزوائد ` (87/1) : ` هذا إسناد صحيح ، رجاله ثقات ، وأصله فى ` الصحيحين ` من حديث أبى هريرة وفى مسلم وغيره من حديث ابن عمر ، وفى ابن حبان والبيهقى من حيث عبد الله ابن الزبير `.
وأما قول المصنف: ` … بإسنادين صحيحين `.
فهو وهم تبع فيه المنذرى فى ` الترغيب ` (2/136) فقد عرفت أنهما أخرجاه بإسناد واحد صحيح.
والحديث صححه أيضا ابن عبد الهادى فى ` التنقيح ` (2/111/2 ـ 2111/1) ..




১১২৯ - (জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আমার এই মসজিদে এক সালাত আদায় করা অন্য যেকোনো মসজিদে এক হাজার সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম, তবে মাসজিদুল হারাম ব্যতীত। আর মাসজিদুল হারামে এক সালাত আদায় করা অন্য যেকোনো [মসজিদে] এক লক্ষ সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম।’ এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ ও ইবনু মাজাহ দুটি সহীহ সনদে (পৃ. ২৬৮)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ (৩/৩৪৩, ৩৯৭) এবং ইবনু মাজাহ (১৪০৬) একাধিক সূত্রে উবাইদুল্লাহ ইবনু আমর আর-রুক্কী থেকে, তিনি আব্দুল কারীম থেকে, তিনি আত্বা থেকে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে।

আমি (আলবানী) বলি: এই সনদটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ। আর আব্দুল কারীম হলেন ইবনু মালিক আল-জাযারী।

আর আল-বুসীরী ‘আয-যাওয়াইদ’ (৮৭/১)-এ বলেছেন: “এই সনদটি সহীহ, এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ)। এর মূল হাদীসটি ‘আস-সহীহাইন’ (বুখারী ও মুসলিম)-এ আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে, এবং মুসলিম ও অন্যান্য গ্রন্থে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে, আর ইবনু হিব্বান ও বায়হাক্বীতে আব্দুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে বর্ণিত হয়েছে।”

আর মুসান্নিফ (গ্রন্থকার)-এর এই উক্তি: ‘...দুটি সহীহ সনদে।’—এটি একটি ভুল (ওয়াহম)। তিনি এই ক্ষেত্রে আল-মুনযিরী-কে ‘আত-তারগীব’ (২/১৩৬)-এ অনুসরণ করেছেন। অথচ আপনি জানতে পারলেন যে, তারা (আহমাদ ও ইবনু মাজাহ) এটি একটি মাত্র সহীহ সনদে বর্ণনা করেছেন।

আর এই হাদীসটিকে ইবনু আব্দুল হাদীও ‘আত-তানক্বীহ’ (২/১১১/২ – ২১১১/১)-এ সহীহ বলেছেন।









ইরওয়াউল গালীল (1130)


*1130* - (عن أبى الدرداء مرفوعا: ` الصلاة فى المسجد الحرام بمائة ألف صلاة ، والصلاة فى مسجدى بألف صلاة ، والصلاة فى بيت المقدس بخمس مائة صلاة `. رواه الطبرانى فى الكبير وابن خزيمة فى صحيحه (ص 268) .
لم أقف على سنده ، لنرى رأينا فيه [1] ، وقد حسنه بعضهم.
وقد أورده المنذرى فى ` الترغيب ` (2/137) بهذا اللفظ ثم قال: ` رواه الطبرانى فى الكبير ، وابن خزيمة فى صحيحه ` ولفظه: ` صلاة فى المسجد الحرام أفضل من ألف صلاة فيما سواه ، وصلاة فى مسجد بيت المقدس أفضل مما سواه من المساجد بخمس مائة صلاة `. ورواه البزار ولفظه: ` فضل الصلاة فى المسجد الحرام على غيره بمائة ألف صلاة ، وفى مسجدى ألف صلاة ، وفى مسجد بيت المقدس خمس مائة صلاة `. وقال البزار: ` إسناده
حسن `. كذا قال `.
قلت: فقد أشار المنذرى إلى أن تحسين البزار لسنده ليس بالمرضى عنده ، وقد بين وجه ذلك الحافظ الناجى فى كتابه الذى وضعه على ` الترغيب ` فقال: (من 135/1) :
` وهو كما قال المصنف ، إذ فيه سعيد بن سالم القداح ، وقد ضعفوه ، ورواه عن سعيد بن بشير ، وله ترجمة فى آخر الكتاب فى الرواة المختلف فيهم `.
قلت: وهو ضعيف ، كما جزم به الحافظ فى ` التقريب ` ، وأما القداح ، فقال فيه: صدوق ، يهم `.
وقال الهيثمى فى اللفظ الأول (4/7) : ` رواه الطبرانى فى ` الكبير ` ورجاله ثقات ، وفى بعضهم كلام ، وهو حديث حسن`.
قلت: إن كان إسناده وكذا إسناد ابن خزيمة من الوجه الذى أخرجه البزار ، فقد علمت أنه ضعيف ، وإن كان من غيره ـ وهذا ما لا أظنه ـ فإنى لم أقف عليه. فمن كان عنده علم بذلك فليتحفنا به ، وجزاؤه عند ربه ، تبارك وتعالى.
ثم رأيت الحديث فى ` مشكل الآثار ` للطحاوى (1/248) من طريق سعيد بن سالم القداح عن سعيد بن بشير عن إسماعيل بن عبد الله عن أم الدرداء عن أبى الدرداء مرفوعا بلفظ البزار ، وقد عرفت ضعفه.
لكن له شاهد من حديث جابر مرفوعا نحوه.
رواه البيهقى فى ` شعب الإيمان ` كما فى ` الجامع الصغير ` للسيوطى ، لكنه قال فى ` الكبير ` (2/61/1) : ` والخطيب فى ` المتفق والمفترق ` ، وفيه إبراهيم بن أبى حية واهٍ `.
قلت: يعنى ضعيف جدا.
قال البخارى: منكر الحديث.
وقال الدارقطنى: متروك.
واتهمه ابن حبان بتعمد الوضع.
‌‌باب الفوات والإحصار




*১১৩০* - (আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণিত: ‘মসজিদুল হারামে এক সালাত এক লক্ষ সালাতের সমান, আমার মসজিদে (মসজিদে নববীতে) এক সালাত এক হাজার সালাতের সমান, আর বাইতুল মাকদিসে এক সালাত পাঁচশত সালাতের সমান।’ এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে এবং ইবনু খুযাইমাহ তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে (পৃ. ২৬৮)।

আমি এর সনদ (বর্ণনাসূত্র) খুঁজে পাইনি, যাতে আমরা এ বিষয়ে আমাদের মতামত দিতে পারি [১]। তবে কেউ কেউ এটিকে ‘হাসান’ (উত্তম) বলেছেন।

আল-মুনযিরী তাঁর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থে (২/১৩৭) এই শব্দে এটি উল্লেখ করেছেন। এরপর তিনি বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে এবং ইবনু খুযাইমাহ তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন।’ আর তাঁর (ইবনু খুযাইমাহর) শব্দগুলো হলো: ‘মসজিদুল হারামে এক সালাত অন্য যেকোনো স্থানের এক হাজার সালাতের চেয়ে উত্তম। আর বাইতুল মাকদিসের মসজিদে এক সালাত অন্য যেকোনো মসজিদের চেয়ে পাঁচশত সালাতের চেয়ে উত্তম।’

আর এটি বায্‌যারও বর্ণনা করেছেন। তাঁর শব্দগুলো হলো: ‘মসজিদুল হারামে সালাতের ফযীলত অন্য যেকোনো স্থানের সালাতের চেয়ে এক লক্ষ সালাতের সমান, আমার মসজিদে এক হাজার সালাত, আর বাইতুল মাকদিসের মসজিদে পাঁচশত সালাত।’ বায্‌যার বলেছেন: ‘এর সনদ হাসান (উত্তম)।’ তিনি এমনই বলেছেন।

আমি (আল-আলবানী) বলছি: আল-মুনযিরী ইঙ্গিত দিয়েছেন যে, বায্‌যারের পক্ষ থেকে এর সনদকে ‘হাসান’ বলা তাঁর (মুনযিরীর) কাছে সন্তোষজনক নয়। হাফিয আন-নাজী তাঁর ‘আত-তারগীব’ গ্রন্থের উপর রচিত কিতাবে এর কারণ ব্যাখ্যা করেছেন। তিনি বলেছেন (১/১৩৫ থেকে):

‘আর এটি তেমনই, যেমনটি গ্রন্থকার (মুনযিরী) বলেছেন। কারণ এর সনদে সাঈদ ইবনু সালিম আল-কাদ্দাহ রয়েছে, আর তারা (মুহাদ্দিসগণ) তাকে যঈফ (দুর্বল) বলেছেন। আর তিনি এটি সাঈদ ইবনু বাশীর থেকে বর্ণনা করেছেন, যার জীবনী কিতাবের শেষে ‘যেসব বর্ণনাকারী সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে’ অংশে উল্লেখ করা হয়েছে।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: তিনি (সাঈদ ইবনু বাশীর) যঈফ (দুর্বল), যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে নিশ্চিতভাবে বলেছেন। আর আল-কাদ্দাহ সম্পর্কে তিনি (হাফিয) বলেছেন: ‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন (صدوق، يهم)।’

আর হাইসামী প্রথম শব্দগুলো সম্পর্কে বলেছেন (৪/৭): ‘এটি ত্বাবারানী তাঁর ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য (ছিকাহ), তবে তাদের কারো কারো ব্যাপারে আলোচনা (সমালোচনা) রয়েছে। আর এটি একটি হাসান (উত্তম) হাদীস।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: যদি এর সনদ এবং অনুরূপভাবে ইবনু খুযাইমাহর সনদও সেই পথেই হয়, যে পথে বায্‌যার এটি বর্ণনা করেছেন, তবে তুমি জেনেছো যে এটি যঈফ (দুর্বল)। আর যদি তা অন্য কোনো পথে হয় – যা আমি মনে করি না – তবে আমি তা খুঁজে পাইনি। সুতরাং যার কাছে এ বিষয়ে জ্ঞান আছে, তিনি যেন আমাদের তা দিয়ে উপকৃত করেন। তার প্রতিদান তাঁর রবের কাছে, যিনি বরকতময় ও সুমহান।

এরপর আমি হাদীসটি ত্বাহাবী রচিত ‘মুশকিুল আছার’ গ্রন্থে (১/২৪৮) দেখেছি। এটি সাঈদ ইবনু সালিম আল-কাদ্দাহ সূত্রে, তিনি সাঈদ ইবনু বাশীর থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি উম্মুদ দারদা থেকে, তিনি আবুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বায্‌যারের শব্দে বর্ণিত। আর তুমি এর দুর্বলতা সম্পর্কে অবগত হয়েছো।

কিন্তু এর সমর্থনে জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে অনুরূপ একটি ‘শাহিদ’ (সমর্থক বর্ণনা) রয়েছে।

এটি বায়হাকী তাঁর ‘শু'আবুল ঈমান’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন, যেমনটি সুয়ূতী তাঁর ‘আল-জামি'উস সাগীর’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। তবে তিনি (সুয়ূতী) ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে (২/৬১/১) বলেছেন: ‘এবং খতীব তাঁর ‘আল-মুত্তাফাক ওয়াল মুফতারাক’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন। এর সনদে ইবরাহীম ইবনু আবী হাইয়্যাহ রয়েছে, যে ‘ওয়াহী’ (অত্যন্ত দুর্বল)।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: অর্থাৎ, সে অত্যন্ত দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।

বুখারী বলেছেন: সে ‘মুনকারুল হাদীস’ (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত)।

আর দারাকুতনী বলেছেন: সে ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।

আর ইবনু হিব্বান তাকে ইচ্ছাকৃতভাবে হাদীস জাল করার (তা'আম্মুদ আল-ওয়াদ্') অভিযোগে অভিযুক্ত করেছেন।

‌‌ফাওয়াত (সালাত ছুটে যাওয়া) ও ইহসার (বাধাগ্রস্ত হওয়া) অধ্যায়।









ইরওয়াউল গালীল (1131)


*1131* - (حديث جابر: ` لا يفوت الحج حتى يطلع الفجر من ليلة جمع ` 0 رواه الأثرم (ص 269) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: *لم أقف على سنده عند الأثرم
وأخرجه البيهقى ، وفى سنده مدلسان ، وقد مضى بيانه برقم (1065) .




১১৪১ - (জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস: ‘জুমু'আর (মুযদালিফার) রাতের ফজর উদিত না হওয়া পর্যন্ত হজ্জ ছুটে যায় না।’) এটি বর্ণনা করেছেন আল-আছরাম (পৃষ্ঠা ২৬৯)।

শেখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব:
আমি আল-আছরামের নিকট এর সনদের সন্ধান পাইনি।
আর এটি ইমাম বায়হাক্বীও বর্ণনা করেছেন, এবং এর সনদে দু'জন মুদাল্লিস (تدليسকারী) রয়েছেন, যার ব্যাখ্যা ইতিপূর্বে (১০৬৫) নং-এ অতিবাহিত হয়েছে।









ইরওয়াউল গালীল (1132)


*1132* - (عن عمر بن الخطاب: ` أنه أمر أبا أيوب صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم وهبار بن الأسود حين فاتهما الحج ، فأتيا يوم النحر أن يحلا بعمرة ثم يرجعا حلالا ثم يحجا عاما قابلا ويهديا ، فمن لم يجد فصيام ثلاثة أيام فى الحج وسبعة إذا رجع إلى أهله ` رواه مالك فى الموطأ والشافعى والأثرم بنحوه (ص 269) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه مالك (1/383/153) عن يحيى بن سعيد أنه قال: أخبرنى سليمان بن يسار أن أبا أيوب الأنصارى خرج حاجا ، حتى إذا كان بالنازية من طريق مكة أضل رواحله ، وأنه قدم على عمر بن الخطاب يوم النحر ، فذكر ذلك له ، فقال عمر: اصنع كما يصنع المعتمر ، ثم قد حللت ، فإذا أدركك الحج قابلا ، فاحجج ، واهد ما تيسر من الهدى`.
ومن طريق مالك أخرجه الشافعى (1104) والبيهقى (5/174) .
قلت: وهذا إسناد صحيح ، وأعله البيهقى بالانقطاع ، يعنى بين سليمان وأبى أيوب ، وفيه نظر ، فإنه أدركه وكان عمره حين وفاة أبى أيوب نحو ست عشر سنة.
ثم أخرجه مالك وعنه المذكوران من طريق نافع عن سليمان بن يسار أن هبار بن الأسود جاء يوم النحر ، وعمر بن الخطاب ينحر هديه … الحديث وتقدم بتمامه برقم (1068) .




*১১৩২* - (উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আবূ আইয়ূব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং হাব্বার ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নির্দেশ দিয়েছিলেন, যখন তাদের হজ্জ ছুটে গিয়েছিল, অতঃপর তারা কুরবানীর দিন (ইয়াওমুন নাহার) উপস্থিত হলেন, যে তারা যেন উমরার মাধ্যমে ইহরাম মুক্ত হন, অতঃপর হালাল অবস্থায় ফিরে যান, অতঃপর আগামী বছর হজ্জ করেন এবং কুরবানী দেন। আর যে ব্যক্তি কুরবানী দিতে সক্ষম না হবে, সে যেন হজ্জের মধ্যে তিন দিন এবং যখন সে তার পরিবারের কাছে ফিরে যাবে, তখন সাত দিন রোযা রাখে। এটি মালিক তাঁর 'মুওয়াত্তা' গ্রন্থে, শাফিঈ এবং আল-আছরাম অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন (পৃ. ২৬৯)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ (Sahih)।

এটি মালিক (১/৩৮৩/১৫৩) বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি বলেন: আমাকে সুলাইমান ইবনু ইয়াসার সংবাদ দিয়েছেন যে, আবূ আইয়ূব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ্জের উদ্দেশ্যে বের হলেন। এমনকি যখন তিনি মক্কার পথে 'আন-নাযিয়াহ' নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন তাঁর আরোহণের পশু হারিয়ে গেল। আর তিনি কুরবানীর দিন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উপস্থিত হলেন এবং তাঁকে বিষয়টি জানালেন। তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "যে ব্যক্তি উমরা করে, তুমিও তার মতো কাজ করো। অতঃপর তুমি হালাল হয়ে গেলে। যখন আগামী বছর তুমি হজ্জ পাবে, তখন হজ্জ করো এবং তোমার জন্য সহজলভ্য কুরবানী দাও।"

আর মালিকের সূত্রে এটি শাফিঈ (১১০৪) এবং বাইহাক্বী (৫/১৭৪) বর্ণনা করেছেন।

আমি (আলবানী) বলি: আর এই সনদটি সহীহ। তবে বাইহাক্বী এটিকে ইনকিতা' (সনদের বিচ্ছিন্নতা) দ্বারা ত্রুটিযুক্ত করেছেন—অর্থাৎ সুলাইমান এবং আবূ আইয়ূবের মাঝে (বিচ্ছিন্নতা)। কিন্তু এতে পর্যালোচনার সুযোগ আছে। কেননা তিনি (সুলাইমান) তাঁকে (আবূ আইয়ূবকে) পেয়েছেন, আর আবূ আইয়ূবের মৃত্যুর সময় তাঁর (সুলাইমানের) বয়স ছিল প্রায় ষোলো বছর।

অতঃপর মালিক এটি বর্ণনা করেছেন এবং তাঁর (মালিকের) সূত্রে পূর্বোক্ত দুজন (শাফিঈ ও বাইহাক্বী) বর্ণনা করেছেন নাফি' সূত্রে সুলাইমান ইবনু ইয়াসার থেকে যে, হাব্বার ইবনুল আসওয়াদ কুরবানীর দিন (ইয়াওমুন নাহার) এলেন, আর উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কুরবানী যবেহ করছিলেন... হাদীসটি। আর এটি সম্পূর্ণভাবে ১০৬৮ নং-এ পূর্বে অতিবাহিত হয়েছে।









ইরওয়াউল গালীল (1133)


*1133* - (` وللنجاد عن عطاء مرفوعا نحوه ` (ص 269) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * لم أقف على سنده عند النجاد واسمه أبو بكر الفقيه أحمد بن سليمان بن الحسن توفى سنة (348) . وتقدم برقم (1065) من رواية البيهقى بسند صحيح عن عطاء بن أبى رباح مرفوعا بلفظ: ` لا يفوت الحج حتى ينفجر الفجر من ليلة جمع `.
فهل هو اللفظ الذى رواه النجاد؟ ذلك ما لا أظنه.
ثم وقفت على لفظه ، ذكره ابن قدامة فى ` المغنى ` (3/527) : ` من فاته الحج فعليه دم ، وليجعلها عمرة ، وليحج من قابل `.
واعلم أنه كان فى الأصل: ` وللبخارى ` ، فرابنى ذلك لأن الحديث مرسل ، فكيف يرويه البخارى فى كتابه ` المسند الجامع الصحيح ` ، فقلت: لعل المصنف يعنى أنه رواه تعليقا ، فلا يشترط أن يكون حينئذ مسندا ، فأخذت أبحث عنه فى تعليقاته ، ولكن عبثا ، إلى أن رأيت ابن قدامة يقول: ` وروى النجاد بإسناده عن عطاء أن النبى صلى الله عليه وسلم قال … ` فذكره ، فعرفت منه أن ` النجاد ` تحرف على
ناسخ الكتاب أو الطابع ، فحمدت الله على توفيقه.




*১১৩৩* - (আর নাজ্জাদের নিকট থেকে আতা (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে মারফূ' হিসেবে অনুরূপ বর্ণনা রয়েছে। (পৃষ্ঠা ২৬৯)।)

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা):

আমি নাজ্জাদের নিকট এর সনদ (বর্ণনাসূত্র) খুঁজে পাইনি। তাঁর নাম হলো আবূ বাকর আল-ফাক্বীহ আহমাদ ইবনু সুলাইমান ইবনুল হাসান। তিনি (৩৪৮) হিজরীতে ইন্তিকাল করেন।

আর এটি পূর্বে ১০৬৫ নম্বর হাদীসে বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনা থেকে সহীহ সনদে আতা ইবনু আবী রাবাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সূত্রে মারফূ' হিসেবে এই শব্দে উল্লেখ করা হয়েছে: "হজ্জ ছুটে যায় না, যতক্ষণ না মুযদালিফার (জুমু'র) রাতের ফাজর উদিত হয়।"

তাহলে কি এটিই সেই শব্দ, যা নাজ্জাদ বর্ণনা করেছেন? আমি তা মনে করি না।

অতঃপর আমি এর শব্দ খুঁজে পেলাম। ইবনু কুদামাহ (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর *আল-মুগনী* গ্রন্থে (৩/৫২৭) তা উল্লেখ করেছেন: "যার হজ্জ ছুটে যায়, তার উপর দম (পশু কুরবানী) ওয়াজিব। আর সে যেন এটিকে উমরাহ বানিয়ে নেয় এবং আগামী বছর হজ্জ করে।"

জেনে রাখুন, মূল পাণ্ডুলিপিতে ছিল: 'আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট থেকে'। এটি আমাকে সন্দেহে ফেলে দেয়। কারণ হাদীসটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)। তাহলে বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) কীভাবে তাঁর *আল-মুসনাদ আল-জামি' আস-সহীহ* গ্রন্থে এটি বর্ণনা করতে পারেন? তাই আমি বললাম: সম্ভবত গ্রন্থকার (মনসুর ইবনু ইউনুস) বুঝাতে চেয়েছেন যে, তিনি (বুখারী) এটি তা'লীক্বান (সনদ উল্লেখ না করে) বর্ণনা করেছেন। সেক্ষেত্রে এটি মুসনাদ (পূর্ণ সনদযুক্ত) হওয়ার শর্ত থাকে না। অতঃপর আমি তাঁর (বুখারীর) তা'লীক্বাতসমূহে এটি খুঁজতে শুরু করলাম, কিন্তু বৃথা গেল। অবশেষে আমি ইবনু কুদামাহ (রাহিমাহুল্লাহ)-কে বলতে দেখলাম: "আর নাজ্জাদ তাঁর সনদসহ আতা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন..."— অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করলেন। তখন আমি বুঝতে পারলাম যে, কিতাবের লিপিকার (নাসিখ) অথবা মুদ্রক (ত্বাবি')-এর ভুলের কারণে 'নাজ্জাদ' শব্দটি বিকৃত হয়ে গিয়েছিল। অতঃপর আমি আল্লাহর তাওফীক্বের জন্য তাঁর প্রশংসা করলাম।









ইরওয়াউল গালীল (1134)


*1134* - (وللدارقطنى عن ابن عباس مرفوعا: ` من فاته عرفات فقد فاته الحج وليتحلل بعمرة ، وعليه الحج من قابل ` (ص 269) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
أخرجه الدارقطنى من طريق يحيى بن عيسى عن ابن أبى ليلى عن عطاء عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ` من أدرك عرفات فوقف بها ، والمزدلفة ، فقد تم حجه ، ومن فاته عرفات … ` الحديث.
قلت: وهذا إسناد ضعيف ، وله علتان:
الأولى: ابن أبى ليلى واسمه محمد بن عبد الرحمن وهو ضعيف لسوء حفظه ، وبه أعله ابن عبد الهادى فى ` التنقيح ` (2/130/1) . وقد اختلف عليه كما يأتى.
والأخرى: يحيى بن عيسى وهو التميمى الفاخورى ، وهو وإن كان أخرج له مسلم ففيه ضعف ، وبه أعله الزيلعى فى ` نصب الراية ` (3/145) وذكر بعض أقوال الأئمة فيه.
وأورده الذهبى فى ` الضعفاء ` فقال: ` صدوق يهم ، ضعفه ابن معين ، وقال النسائى: ليس بالقوى `.
قلت: وقد خالفه رحمة بن مصعب أبو هاشم الفراء الواسطى فقال: عن ابن أبى ليلى عن عطاء ونافع عن ابن عمر مرفوعا به.
رواه عنه داود بن جبير ، عند الدارقطنى وقال: ` رحمة بن مصعب ضعيف ، ولم يأت به غيره `.
قلت: لكن داود بن جبير مجهول الحال كما فى ` الميزان ` وقال ابن عبد الهادى: ` غير مشهور `. قال ` والأشبه فى هذين الحديثين الوقف ، وقد روى سعيد بن منصور حدثنا هشام أنبأ مغيرة عن إبراهيم عن الأسود بن يزيد أن رجلا فاته الحج ، فأمره عمر بن الخطاب أن يحل بعمرة ، وعليه الحج من قابل `.
قلت: وهذا أخرجه البيهقى (5/175) من طرق عن إبراهيم به.
وزاد فى بعض الطرق عنه: ` قال الأسود: مكثت عشرين سنة ثم سألت زيد بن ثابت عن ذلك؟ فقال: مثل قول عمر `.
قلت: وإسناده صحيح.




*১১৩৪* - (দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণনা করেছেন: ‘যে আরাফাতকে (উপস্থিত হতে) হারালো, সে যেন হজ্বকেই হারালো। সে যেন উমরার মাধ্যমে হালাল হয়ে যায়, এবং আগামী বছর তার উপর হজ্ব করা আবশ্যক।’ (পৃ. ২৬৯)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * যঈফ (দুর্বল)।

এটি দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ) বর্ণনা করেছেন ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা-এর সূত্রে, তিনি ইবনু আবী লায়লা থেকে, তিনি আত্বা থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘যে আরাফাতকে পেল এবং সেখানে অবস্থান করল, আর মুযদালিফাকেও পেল, তার হজ্ব পূর্ণ হলো। আর যে আরাফাতকে হারালো...’ (সম্পূর্ণ) হাদীসটি।

আমি (আলবানী) বলছি: এই ইসনাদটি (সনদ) যঈফ (দুর্বল), এবং এর দুটি 'ইল্লাত' (ত্রুটি) রয়েছে:

প্রথমটি: ইবনু আবী লায়লা, যার নাম মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুর রহমান। তিনি দুর্বল, কারণ তাঁর স্মৃতিশক্তি খারাপ ছিল (সু-উল হিফয)। এই কারণেই ইবনু আব্দুল হাদী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘আত-তানক্বীহ’ গ্রন্থে (২/১৩০/১) এই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্লাল) বলেছেন। যেমনটি পরে আসবে, তাঁর (ইবনু আবী লায়লা) উপর মতভেদ করা হয়েছে।

অন্যটি: ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা, যিনি হলেন আত-তামীমী আল-ফাখূরী। যদিও ইমাম মুসলিম (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন, তবুও তাঁর মধ্যে দুর্বলতা রয়েছে। এই কারণেই যাইলায়ী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘নাসবুর রায়াহ’ গ্রন্থে (৩/১৪৫) এই হাদীসটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন এবং তাঁর সম্পর্কে ইমামগণের কিছু উক্তি উল্লেখ করেছেন।

আর যাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে ‘আয-যু'আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন: ‘তিনি সত্যবাদী, তবে ভুল করেন (ইউহিম্মু)। ইবনু মাঈন (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে দুর্বল বলেছেন, আর নাসাঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি শক্তিশালী নন।’

আমি (আলবানী) বলছি: তাঁকে (ইয়াহইয়া ইবনু ঈসা) রহমাহ ইবনু মুস'আব আবূ হাশিম আল-ফাররা আল-ওয়াসিতী বিরোধিতা করেছেন। তিনি বলেছেন: ইবনু আবী লায়লা থেকে, তিনি আত্বা ও নাফি' থেকে, তাঁরা ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।

দারাকুতনী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট দাঊদ ইবনু জুবাইর তাঁর (রহমাহ ইবনু মুস'আব) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন এবং (দারাকুতনী) বলেছেন: ‘রহমাহ ইবনু মুস'আব দুর্বল, এবং তিনি ছাড়া অন্য কেউ এটি বর্ণনা করেননি।’

আমি (আলবানী) বলছি: কিন্তু দাঊদ ইবনু জুবাইর ‘আল-মীযান’ গ্রন্থে যেমন বলা হয়েছে, ‘মাজহূলুল হাল’ (যার অবস্থা অজ্ঞাত)। আর ইবনু আব্দুল হাদী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘তিনি মশহূর (বিখ্যাত) নন।’ তিনি (ইবনু আব্দুল হাদী) বলেন: ‘এই দুটি হাদীসের ক্ষেত্রে মাওকূফ (সাহাবীর উক্তি হিসেবে) হওয়াটাই অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ (আল-আশবাহ)। আর সাঈদ ইবনু মানসূর বর্ণনা করেছেন: আমাদের কাছে হিশাম হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি মুগীরাহ থেকে, তিনি ইবরাহীম থেকে, তিনি আল-আসওয়াদ ইবনু ইয়াযীদ থেকে। (আল-আসওয়াদ বলেন) যে, এক ব্যক্তি হজ্ব করতে পারেনি (আরাফাতকে হারিয়েছে), তখন উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে উমরার মাধ্যমে হালাল হয়ে যেতে নির্দেশ দিলেন এবং আগামী বছর তার উপর হজ্ব করা আবশ্যক করলেন।’

আমি (আলবানী) বলছি: এটি বাইহাক্বী (রাহিমাহুল্লাহ) (৫/১৭৫) ইবরাহীম থেকে বিভিন্ন সূত্রে অনুরূপভাবে বর্ণনা করেছেন।

তাঁর (ইবরাহীম) থেকে বর্ণিত কিছু সূত্রে অতিরিক্ত বলা হয়েছে: ‘আল-আসওয়াদ বলেন: আমি বিশ বছর অবস্থান করলাম, এরপর যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এ বিষয়ে জিজ্ঞেস করলাম? তখন তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথার মতোই বললেন।’

আমি (আলবানী) বলছি: আর এর ইসনাদ (সনদ) সহীহ (বিশুদ্ধ)।









ইরওয়াউল গালীল (1135)


*1135* - (حديث ابن عمر: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج معتمراً ،
فحالت كفار قريش بينه وبين البيت ، فنحر هديه وحلق رأسه بالحديبية ` (ص 270) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه البخارى (1/451) واللفظ له ، ومسلم (4/51) وأبو نعيم فى ` المستخرج ` (19/145/2) والبيهقى (5/216) من طريق نافع أن عبيد الله بن عبد الله وسالم بن عبد الله أخبراه أنهما كلما عبد الله بن عمر ليالى نزل الجيش بابن الزبير ، فقالا: لا يضرك أن لا تحج العام ، وإنا نخاف أن يحال بينك وبين البيت ، فقال: ` خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ، فحال كفار قريش دون البيت ، فنحر النبى صلى الله عليه وسلم هديه وحلق رأسه ، وأشهدكم أنى قد أوجبت عمرة إن شاء الله تعالى ، انطلق ، فإن خلى بينى وبين البيت طفت ، وإن حيل بينى وبينه ، فعلت كما فعل النبى صلى الله عليه وسلم وأنا معه ، فأهل بالعمرة من ذى الحليفة ، ثم سار ساعة ، ثم قال: إنما شأنهما واحد ، أشهدكم أنى قد أوجبت حجة مع عمرتى ، فلم يحل منهما حتى حل يوم النحر ، وأهدى ، وكان يقول: لا يحل حتى يطوف طوافا واحدا يوم يدخل مكة `.
وفى رواية من طريق فليح عن نافع عن ابن عمر: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج معتمرا ، فحال كفار قريش بينه وبين البيت فنحر هديه ، وحلق رأسه بالحديبية ، وقاضاهم على أن يعتمر العام المقبل ، ولا يحتمل سلاحا عليهم إلا سيوفا ، ولا يقيم بها إلا ما أحبوا ، فاعتمر من العام المقبل ، فدخلها كما كان صالحهم ، فلما أقام بها ثلاثاً أمروه أن يخرج فخرج `.
أخرجه البخارى (2/168) والبيهقى وأحمد (2/152) .




*১১৩৫* - (হাদীস ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ` যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমরাহ করার উদ্দেশ্যে বের হলেন। কিন্তু কুরাইশ কাফিররা তাঁর ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা সৃষ্টি করল। ফলে তিনি তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করলেন এবং হুদাইবিয়াহতে মাথা মুণ্ডন করলেন। ` (পৃ. ২৭০)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব: * সহীহ (Sahih)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (১/৪৫১) – শব্দগুলো তাঁরই, মুসলিম (৪/৫১), আবূ নু'আইম তাঁর 'আল-মুসতাখরাজ' গ্রন্থে (১৯/১৪৫/২) এবং বাইহাক্বী (৫/২১৬)। নাফি' সূত্রে বর্ণিত। নাফি'কে উবাইদুল্লাহ ইবনু আব্দুল্লাহ এবং সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ সংবাদ দিয়েছেন যে, ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরুদ্ধে যখন সেনাবাহিনী অবতরণ করেছিল, তখন তারা উভয়ে আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে কথা বলেছিলেন। তারা বললেন: এই বছর আপনি হজ্জ না করলে আপনার কোনো ক্ষতি হবে না। আমরা আশঙ্কা করছি যে, আপনার ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা সৃষ্টি করা হতে পারে। তখন তিনি (ইবনু উমার) বললেন: `আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে বের হয়েছিলাম। তখন কুরাইশ কাফিররা বাইতুল্লাহর পথে বাধা সৃষ্টি করেছিল। ফলে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করলেন এবং মাথা মুণ্ডন করলেন। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি আল্লাহর ইচ্ছায় উমরাহ ওয়াজিব করেছি। চলো, যদি আমার ও বাইতুল্লাহর মাঝে পথ ছেড়ে দেওয়া হয়, তবে আমি তাওয়াফ করব। আর যদি আমার ও এর মাঝে বাধা সৃষ্টি করা হয়, তবে আমি তাই করব যা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম করেছিলেন যখন আমি তাঁর সাথে ছিলাম।` অতঃপর তিনি যুল-হুলাইফা থেকে উমরার ইহরাম বাঁধলেন। এরপর কিছুক্ষণ চলার পর তিনি বললেন: `নিশ্চয়ই এই দুটির (হজ্জ ও উমরাহর) বিধান একই। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি আমার উমরার সাথে হজ্জও ওয়াজিব করেছি।` অতঃপর তিনি কুরবানীর দিন হালাল হওয়ার আগ পর্যন্ত এ দুটি থেকে হালাল হননি এবং কুরবানী করেছিলেন। তিনি বলতেন: `মাক্কায় প্রবেশের দিন একটি তাওয়াফ না করা পর্যন্ত হালাল হওয়া যাবে না।`

এবং ফালীহ সূত্রে নাফি' থেকে ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক বর্ণিত অন্য এক রিওয়ায়াতে এসেছে: ` যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমরাহ করার উদ্দেশ্যে বের হলেন। কিন্তু কুরাইশ কাফিররা তাঁর ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা সৃষ্টি করল। ফলে তিনি তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করলেন এবং হুদাইবিয়াহতে মাথা মুণ্ডন করলেন। তিনি তাদের সাথে এই মর্মে সন্ধি করলেন যে, তিনি আগামী বছর উমরাহ করবেন, এবং তাদের বিরুদ্ধে তরবারি ব্যতীত কোনো অস্ত্র বহন করবেন না, আর তারা যতক্ষণ চাইবে ততক্ষণ ব্যতীত তিনি সেখানে অবস্থান করবেন না। অতঃপর তিনি আগামী বছর উমরাহ করলেন এবং তাদের সাথে কৃত সন্ধি অনুযায়ী মাক্কায় প্রবেশ করলেন। যখন তিনি সেখানে তিন দিন অবস্থান করলেন, তখন তারা তাঁকে বের হয়ে যেতে আদেশ করল, ফলে তিনি বের হয়ে গেলেন।`

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (২/১৬৮), বাইহাক্বী এবং আহমাদ (২/১৫২)।









ইরওয়াউল গালীল (1136)


*1136* - (روى عن ابن عمر أنه قال: ` من حبس دون البيت بمرض فإنه لا يحل حتى يطوف بالبيت `. رواه مالك (ص 270) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح موقوفا.
أخرجه فى ` الموطأ ` (1/361/1) وعنه البيهقى (5/219) عن ابن شهاب عن سالم ابن عبد الله عن عبد الله بن عمر به وزاد: ` وبين الصفا والمروة `.
قلت: وهذا إسناد صحيح على شرط الشيخين ، فتصدير المؤلف إياه بقوله: ` روى ` بصيغة المبنى للمجهول ، المشعر بالضعف ليس بجيد.
وأخرجه البخارى (1/452) والنسائى (2/21) من طريق يونس عن الزهرى قال: أخبرنى سالم قال: كان ابن عمر يقول: ` أليس حسبكم سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم! إن حبس أحدكم عن الحج ، فطاف بالبيت وبالصفا والمروة ، ثم حل من كل شىء حتى يحج عاما قابلا ، فيهدى أو يصوم إن لم يجد `.

‌‌باب الأضحية




১১৪৬ - (ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বলেছেন: ‘যে ব্যক্তি অসুস্থতার কারণে বাইতুল্লাহর কাছে পৌঁছতে বাধাগ্রস্ত হয়, সে বাইতুল্লাহ তাওয়াফ না করা পর্যন্ত হালাল হতে পারবে না।’ এটি মালিক (পৃ. ২৭০) বর্ণনা করেছেন।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * সহীহ মাওকূফ।
এটি তিনি ‘আল-মুওয়াত্তা’ (১/৩৬১/১)-তে এবং তাঁর (মালিকের) সূত্রে বাইহাক্বী (৫/২১৯) ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এতে অতিরিক্ত রয়েছে: ‘এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে (সাঈ করবে)।’

আমি (আলবানী) বলছি: এই সনদটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুযায়ী সহীহ। সুতরাং গ্রন্থকার কর্তৃক এটিকে দুর্বলতার ইঙ্গিতবাহী মাজহুল (কর্তৃবিহীন) ক্রিয়াপদ ‘রুওয়িয়া’ (روى) দ্বারা শুরু করাটা সঠিক হয়নি।

আর এটি বুখারী (১/৪৫২) এবং নাসাঈ (২/২১) ইউনুস-এর সূত্রে যুহরী থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি (যুহরী) বলেন: আমাকে সালিম খবর দিয়েছেন, তিনি (সালিম) বলেন: ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: ‘তোমাদের জন্য কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত যথেষ্ট নয়? যদি তোমাদের কেউ হজ্জ থেকে বাধাগ্রস্ত হয়, তবে সে যেন বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করে এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝে সাঈ করে। অতঃপর সে যেন সবকিছু থেকে হালাল হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে পরবর্তী বছর হজ্জ করে। তখন সে কুরবানী করবে, অথবা যদি না পায় তবে সিয়াম পালন করবে।’

কুরবানী অধ্যায়









ইরওয়াউল গালীল (1137)


*1137* - (حديث أنس: ` ضحى النبى صلى الله عليه وسلم بكبشين أملحين أقرنين ذبحهما بيده وسمى وكبر ` متفق عليه (ص 271) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه البخارى (4/25 ، 451) ومسلم (6/77) وكذا أبو داود (2794) والنسائى (2/204 ـ 205 و208) والدارمى (2/75) وابن ماجه (3120 ، 3155) وابن الجارود (902 ، 909) والبيهقى (5/238) والطيالسى (1968) وأحمد (3/99 ، 115 ، 170 ، 183 ، 189 ، 214 ، 222 ، 255 ، 258 ، 272 ، 279) وأبو يعلى فى ` مسنده (157/2 و158/2) من طرق عن قتادة عن أنس به ، وصرح قتادة بالتحديث فى رواية للبخارى وأحمد.
ورواه أبو قلابة عن أنس: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم انكفأ إلى كبشين أقرنين أملحين فذبحهما بيده `.
أخرجه البخارى (4/23) وأبو داود (2793) .




১১৪৭ - (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস: ` নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি শিংবিশিষ্ট, সাদা-কালো মিশ্রিত রঙের দুম্বা কুরবানী করলেন। তিনি নিজ হাতে সে দুটি যবেহ করলেন এবং বিসমিল্লাহ বললেন ও তাকবীর দিলেন। ` মুত্তাফাকুন আলাইহি (পৃ. ২৭১)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (৪/২৫, ৪৫১), মুসলিম (৬/৭৭), অনুরূপভাবে আবূ দাঊদ (২৭৯৪), নাসাঈ (২/২০৪-২০৫ ও ২০৮), দারিমী (২/৭৫), ইবনু মাজাহ (৩১২০, ৩১৫৫), ইবনু জারূদ (৯০২, ৯০৯), বাইহাক্বী (৫/২৩৮), তায়ালিসী (১৯৬৮), আহমাদ (৩/৯৯, ১১৫, ১৭০, ১৮৩, ১৮৯, ২১৪, ২২২, ২৫৫, ২৫৮, ২৭২, ২৭৯) এবং আবূ ইয়া‘লা তাঁর ‘মুসনাদ’-এ (১৫৭/২ ও ১৫৮/২)। এই সকল বর্ণনাকারীগণ ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই হাদীসটি বিভিন্ন সূত্রে বর্ণনা করেছেন। বুখারী ও আহমাদ-এর একটি বর্ণনায় ক্বাতাদাহ (রাহিমাহুল্লাহ) সরাসরি (আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে) শোনার কথা (আত-তাহদীস) স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন।

আর আবূ ক্বিলাবাহ (রাহিমাহুল্লাহ) আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: ` রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুটি শিংবিশিষ্ট, সাদা-কালো মিশ্রিত রঙের দুম্বার দিকে মনোযোগ দিলেন এবং নিজ হাতে সে দুটি যবেহ করলেন। ` এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (৪/২৩) এবং আবূ দাঊদ (২৭৯৩)।









ইরওয়াউল গালীল (1138)


*1138* - (حديث: ` إن الرسول الله صلى الله عليه وسلم ضحى عمن لم يضح من أمته `. رواه أبو داود وأحمد والترمذى من حديث جابر (ص 271) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أبو داود (2810) والترمذى (1/287) وكذا الطحاوى (2/302) والدارقطنى (544 ـ 545) والحاكم (4/229) والبيهقى (9/264 ، 287) وأحمد (3/356 ، 362) عن عمرو بن أبى عمرو عن المطلب بن عبد الله (زاد الطحاوى وغيره: وعن رجل من بنى سلمة أنهما حدثاه) عن جابر بن عبد الله ، (وفى رواية الطحاوى: أن جابر بن عبد الله أخبرهما) قال: ` شهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الأضحى بالمصلى ، فلما قضى خطبته ، نزل من منبره ، وأتى بكبش ، فذبحه رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده ، وقال: بسم الله ، والله أكبر ، هذا عنى ، وعن من لم يضح من أمتى `. وقال الترمذى: ` حديث غريب من هذا الوجه `.
قلت: وقال الحاكم:
` صحيح الإسناد `. وأقره الذهبى.
قلت: وهو كما قالا ، فإن رجاله كلهم ثقات ، وإنما يخشى من تدليس المطلب وقد عنعنة فى رواية الترمذى وغيره ، فلعله استغربه من أجلها ، لكن قد صرح بالتحديث فى رواية الطحاوى والحاكم وغيرهما ، فزالت بذلك شبهة تدليسه ، ثم رأيت الترمذى قد بين وجه الاستغراب بعد سطرين مما سبق نقله عنه فقال: ` والمطلب بن عبد الله بن حنطب ثقال إنه لم يسمع من جابر `.
قلت: ورواية الطحاوى: ترد هذا القيل. وقد قال ابن أبى حاتم فى روايته عن جابر: ` يشبه أنه أدركه `. وهذا أصح مما رواه عنه ابنه فى ` المراسيل `: ` لم يسمع من جابر `.
على أنه لم ينفرد به ، فقد رواه محمد بن إسحاق عن يزيد بن أبى حبيب عن أبى عياش عن جابر بن عبد الله قال ` ضحى رسول الله صلى الله عليه وسلم بكبشين فى يوم العيد ، فقال: حين وجههما: (إنى وجهت وجهى للذى فطر السماوات والأرض) - إلى آخر الآية - اللهم إن هذا منك ولك (1) ، عن محمد وأمته ، ثم سمى الله ، وكبر ، وذبح `.
أخرجه أبو داود (2795) والدارمى (2/75 ـ 76) والطحاوى والبيهقى (9/285 ، 287) .
قلت: ورجاله ثقات غير أبى عياش هذا وهو المعافرى المصرى ، وهو مستور روى عنه ثلاثة من الثقات.
نعم رواه ابن ماجه (3121) بإسناده عن محمد بن إسحاق به إلا أنه قال: عن أبى عياش الزرقى `.
وأبو عياش الزرقى اثنان أحدهما صحابى ، والآخر تابعى اسمه زيد بن عياش ، وهو ثقة ، فالإسناد على هذا صحيح لولا عنعنة ابن إسحاق ، لكن
إسناد ابن ماجه إليه بأنه الزرقى ضعيف ، ويؤيد أنه غيره أنهم لم يذكروا فى الرواة عنه يزيد بن أبى حبيب ، وإنما ذكروه فى الرواة عن المعافرى.
وله طريق ثالثة عن جابر ، يرويه عبد الله بن محمد بن عقيل قال: أخبرنى عبد الرحمن بن جابر بن عبد الله قال: حدثنى أبى: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أتى بكبشين أملحين عظيمين أقرنين موجوئين ، فأضجع أحدهما ، وقال: بسم الله ، والله أكبر ، اللهم عن محمد وأمته ، من شهد لك بالتوحيد ، وشهد لى بالبلاغ `.
أخرجه الطحاوى ، وأبو يعلى فى ` مسنده ` (105/2) والبيهقى (9/268) .
قلت: وإسناده حسن ، رجاله ثقات رجال مسلم غير ابن عقيل وفيه كلام لا ينزل به حديثه عن رتبة الحسن ، وقد قال الهيثمى (4/22) : ` رواه أبو يعلى وإسناده حسن `.
نعم قد اختلف فيه على ابن عقيل ، فرواه حماد بن سلمة عنه هكذا.
ورواه زهير وعبيد الله بن عمر عن على بن الحسين عن أبى رافع به وزاد: ` ثم يؤتى بالآخر فيذبحه بنفسه ويقول: هذا عن محمد وآل محمد ، فيطعمهما جميعا المساكين ، ويأكل هو وأهله منهما ، فمكثنا سنين ليس رجل من بنى هاشم يضحى ، قد كفاه الله المؤنة برسول الله صلى الله عليه وسلم والغرم `.
أخرجها عنهما الإمام أحمد (6/391 ـ 392 ، 392) والطحاوى عن عبيد الله والبيهقى عن زهير.
ورواه سفيان الثورى عنه عن أبى سلمة عائشة وعن أبى هريرة: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا أراد أن يضحى اشترى كبشين عظيمين.... ` الحديث إلى قوله: ` وعن آل محمد `.
أخرجه ابن ماجه (3122) والطحاوى والحاكم (4/227 ـ 228) وأحمد (6/220 ، 225) والبيهقى.
وقال البوصيرى (ق 190/1) : ` هذا إسناد حسن ، عبد الله بن محمد مختلف فيه `.
قلت: والطرق إلى ابن عقيل بهذه الأسانيد كلها صحيحة ، فإما أن يكون ابن عقيل قد حفظها عن مشايخه الثلاثة: عن عبد الرحمن بن جابر وعلى بن الحسين وأبى سلمة ، وإما أن يكون اضطرب فيها ، ورجح الأول البيهقى ، ولكنه لم تقع له روايته عن أبى سلمة ، وإنما عن عبد الرحمن وعلى فقال عقب روايته عنهما: ` فكأنه سمعه منهما `.
قلت: ولعله يرجح ما ذكره البيهقى أن للحديث أصلا عن أبى رافع ، وعائشة وأبى هريرة من طرق أخرى عنهم.
أما حديث أبى رافع ، فرواه عمارة: حدثنى المعتمر بن أبى رافع عن أبيه مختصرا بلفظ: ` ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم كبشا ثم قال: هذا عنى وعن أمتى `.
أخرجه الطبرانى فى ` الأوسط ` (1/127/2) وقال: ` لم يروه إلا عمارة `.
قلت: وهو ابن غزية ، وهو ثقة ، لكن شيخه المعتمر ، ليس بالمشهور عندى لم أجد له ترجمة ، سوى أن ابن حبان أورده فى ` الثقات ` (1/218) وقال: ` يروى عن أبيه ، وعنه عمرو بن أبى عمرو … `.
وأما حديث عائشة فيرويه عروة بن الزبير عنها: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بكبش أقرن يطأ فى سواد ، ويبرك فى سواد وينظر فى سواد ، فأتى به ليضحى به ، فقال لها يا عائشة: هلمى المدية ، ثم
قال: اشحذيها بحجر ، ففعلت ، ثم أخذها ، وأخذ الكبش فأضجعه ، ثم ذبحه ، ثم قال: بسم الله ، اللهم تقبل من محمد ، وآل محمد ، ومن أمة محمد ، ثم ضحى به `.
أخرجه مسلم (6/78) وأبو داود (2792) والطحاوى والبيهقى.
وأما حديث أبى هريرة ، فيرويه ابن وهب: حدثنى عبد الله بن عياش بن عباس القتبانى عن عيسى بن عبد الرحمن أخبرنى ابن شهاب عن سعيد بن المسيب عنه مرفوعا بلفظ: ` ضحى رسول الله صلى الله عليه وسلم بكبشين أقرنين أملحين أحدهما عنه وعن أهل بيته ، والآخر عنه وعن من لم يضح من أمته `.
أخرجه الطبرانى فى ` الأوسط ` (217/2) وقال: ` تفرد به ابن وهب `.
قلت: وهو ثقة حافظ ، ومن فوقه ثقات إلا أن القتبانى فيه ضعف يسير ، وأخرج له مسلم فى الشواهد ، فالإسناد حسن.
وقال الهيثمى: ` رواه الطبرانى فى ` الأوسط ` و` الكبير ` وإسناده حسن `.
وفى الباب عن أبى سعيد الخدرى مختصرا نحو حديث المعتمر بن أبى رافع عن أبيه.
أخرجه الطحاوى والدارقطنى والحاكم (4/228) والبيهقى وأحمد (3/8) من طريق ربيح بن عبد الرحمن بن أبى سعيد عن أبيه عن جده.
وقال الحاكم: ` صحيح الإسناد `. ووافقه الذهبى.
قلت: كذا قالا ، وربيح لم يوثقه أحد بل قال البخارى: ` منكر الحديث ` ، وأورده الذهبى نفسه فى ` الضعفاء `! وقال الحافظ فى ` التقريب `: ` مقبول `.
وعن أنس بن مالك. وله عنه طريقان:
الأولى: عن الحجاج بن أرطاة عن قتادة عن أنس مرفوعا نحو حديث أبى هريرة عند ابن وهب.
أخرجه الطبرانى فى ` الأوسط ` (128/1) وقال: ` لم يروه إلا الحجاج `.
قلت: وهو مدلس وقد عنعنه. وفى الطريق إليه ضعيفان.
لكن أخرجه أبو يعلى فى ` مسنده ` (157/1) بسند صحيح عنه ، فانحصرت الشبهة فيه.
والأخرى: عن المبارك بن سحيم أخبرنا عبد العزيز بن صهيب عنه.
أخرجه الدارقطنى.
والمبارك بن سحيم متروك.
وفى الباب عن أبى طلحة وابن عباس وحذيفة بن أسيد ، فى أسانيدها كلام ، وقد خرجها الهيثمى فليراجعها من شاء فى كتابه ` مجمع الزوائد ` فإن فيما خرجناه كفاية.
(فائدة) : ما جاء فى هذه الأحاديث من تضحيته صلى الله عليه وسلم عن من لم يضح من أمته ، هو من خصائصه صلى الله عليه وسلم كما ذكره الحافظ فى ` الفتح ` (9/514) عن أهل العلم. وعليه فلا يجوز لأحد أن يقتدى به صلى الله عليه وسلم فى التضحية عن الأمة ، وبالأحرى أن لا يجوز له القياس عليها غيرها من العبادات كالصلاة والصيام والقراءة ونحوها من الطاعات لعدم ورود ذلك عنه
صلى الله عليه عليه وسلم ، فلا يصلى أحد عن أحد ولا يصوم أحد عن أحد ، ولا يقرأ أحد عن أحد ، وأصل ذلك كله قوله تعالى:
تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * (وأن ليس للإنسان إلا ما سعى) .
نعم هناك أمور استثنيت من هذا الأصل بنصوص وردت ، ولا مجال الآن لذكرها فلتطلب فى المطولات.




*১১৩৮* - (হাদীস: ‘নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উম্মতের মধ্যে যারা কুরবানী করতে পারেনি, তাদের পক্ষ থেকে কুরবানী করেছেন।’ এটি জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু দাউদ, আহমাদ ও তিরমিযী এটি বর্ণনা করেছেন। (পৃ. ২৭১)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।

এটি বর্ণনা করেছেন আবু দাউদ (২৮১০), তিরমিযী (১/২৮৭), অনুরূপভাবে ত্বাহাভীও (২/৩০২), দারাকুতনী (৫৪৫-৫৪৫), হাকিম (৪/২২৯), বাইহাক্বী (৯/২৬৪, ২৮৭) এবং আহমাদ (৩/৩৫৬, ৩৬২)। তাঁরা বর্ণনা করেছেন আমর ইবনু আবী আমর থেকে, তিনি মুত্তালিব ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে (ত্বাহাভী ও অন্যান্যরা যোগ করেছেন: এবং বানু সালামাহ গোত্রের এক ব্যক্তি থেকে, যে তারা দু’জন তাকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন) তিনি জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। (আর ত্বাহাভীর বর্ণনায় রয়েছে: জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের দু’জনকে সংবাদ দিয়েছেন)। তিনি (জাবের) বলেন: ‘আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ঈদগাহে ঈদুল আযহায় উপস্থিত ছিলাম। যখন তিনি তাঁর খুতবা শেষ করলেন, তখন তিনি তাঁর মিম্বর থেকে নামলেন। অতঃপর একটি মেষ আনা হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সেটি যবেহ করলেন এবং বললেন: “বিসমিল্লাহ, আল্লাহু আকবার। এটি আমার পক্ষ থেকে এবং আমার উম্মতের মধ্যে যারা কুরবানী করতে পারেনি, তাদের পক্ষ থেকে।”’ আর তিরমিযী বলেছেন: ‘এই সূত্রে হাদীসটি গারীব (অপরিচিত)।’

আমি (আলবানী) বলি: আর হাকিম বলেছেন: ‘এর সনদ সহীহ।’ যাহাবীও তা সমর্থন করেছেন।

আমি বলি: তাঁরা যা বলেছেন, তা-ই সঠিক। কেননা এর সকল বর্ণনাকারীই নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ)। তবে মুত্তালিবের ‘তাদ্লীস’ (বর্ণনা গোপন করার প্রবণতা) নিয়ে আশঙ্কা করা হয়, আর তিনি তিরমিযী ও অন্যদের বর্ণনায় ‘আনআনা’ (عن - ‘থেকে’ শব্দ ব্যবহার) করেছেন। সম্ভবত এই কারণেই তিরমিযী এটিকে গারীব বলেছেন। কিন্তু ত্বাহাভী ও হাকিমসহ অন্যদের বর্ণনায় তিনি সরাসরি হাদীস শোনার কথা (তাদহীস) স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন। ফলে তাঁর তাদ্লীসের সন্দেহ দূর হয়ে গেছে। অতঃপর আমি দেখলাম যে, তিরমিযী তাঁর পূর্বোক্ত উদ্ধৃতির দুই লাইন পরে গারীব হওয়ার কারণ ব্যাখ্যা করেছেন। তিনি বলেছেন: ‘মুত্তালিব ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু হানতাব সম্পর্কে বলা হয় যে, তিনি জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি।’

আমি বলি: ত্বাহাভীর বর্ণনা এই বক্তব্যকে খণ্ডন করে। আর ইবনু আবী হাতিম জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাঁর বর্ণনার ব্যাপারে বলেছেন: ‘মনে হয় তিনি তাঁর সাক্ষাৎ পেয়েছেন।’ এটি তাঁর পুত্র কর্তৃক ‘আল-মারাসীল’ গ্রন্থে বর্ণিত ‘তিনি জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শোনেননি’—এই বক্তব্যের চেয়ে অধিকতর সঠিক।

তাছাড়া, তিনি (মুত্তালিব) এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক এটি ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব থেকে, তিনি আবূ আইয়াশ থেকে, তিনি জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদের দিন দু’টি মেষ কুরবানী করলেন। যখন তিনি সে দু’টিকে কিবলামুখী করলেন, তখন বললেন: (إنى وجهت وجهى للذى فطر السماوات والأرض) – আয়াতের শেষ পর্যন্ত – “হে আল্লাহ! এটি তোমার পক্ষ থেকে এবং তোমারই জন্য (১), মুহাম্মাদ ও তাঁর উম্মতের পক্ষ থেকে।” অতঃপর তিনি আল্লাহর নাম নিলেন, তাকবীর বললেন এবং যবেহ করলেন।’ এটি বর্ণনা করেছেন আবু দাউদ (২৭৯৫), দারিমী (২/৭৫-৭৬), ত্বাহাভী এবং বাইহাক্বী (৯/২৮৫, ২৮৭)।

আমি বলি: এর বর্ণনাকারীরা নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ), তবে এই আবূ আইয়াশ ছাড়া। তিনি হলেন মিসরের মুআফিরী। তিনি ‘মাস্তূর’ (অজ্ঞাত পরিচয়)। তাঁর থেকে তিনজন নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী বর্ণনা করেছেন। হ্যাঁ, ইবনু মাজাহ (৩১২১) তাঁর সনদে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে এটি বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি বলেছেন: ‘আবূ আইয়াশ আয-যুরাক্বী থেকে।’ আবূ আইয়াশ আয-যুরাক্বী দু’জন: একজন সাহাবী এবং অন্যজন তাবেয়ী, যার নাম যায়দ ইবনু আইয়াশ, আর তিনি নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ)। সুতরাং, এই হিসাবে সনদটি সহীহ হতো, যদি ইবনু ইসহাকের ‘আনআনা’ না থাকত। কিন্তু ইবনু মাজাহর সনদ অনুযায়ী তাঁকে আয-যুরাক্বী বলা দুর্বল। আর এটি যে অন্য ব্যক্তি, তার সমর্থন হলো: তাঁর থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যে তারা ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীবের নাম উল্লেখ করেননি, বরং মুআফিরী থেকে বর্ণনাকারীদের মধ্যে তাঁর নাম উল্লেখ করেছেন।

জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এর তৃতীয় একটি সূত্র রয়েছে। এটি বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ ইবনু আক্বীল। তিনি বলেন: আমাকে সংবাদ দিয়েছেন আব্দুর রহমান ইবনু জাবের ইবনু আব্দুল্লাহ। তিনি বলেন: আমার পিতা আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দু’টি সাদা-কালো, বিশাল, শিংযুক্ত, খাসি করা মেষ আনা হলো। তিনি সে দু’টির একটিকে শুইয়ে দিলেন এবং বললেন: “বিসমিল্লাহ, আল্লাহু আকবার। হে আল্লাহ! এটি মুহাম্মাদ ও তাঁর উম্মতের পক্ষ থেকে, যারা তোমার জন্য তাওহীদের সাক্ষ্য দিয়েছে এবং আমার রিসালাত পৌঁছানোর সাক্ষ্য দিয়েছে।”’ এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাহাভী, আবূ ইয়া’লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (১০৫/২) এবং বাইহাক্বী (৯/২৬৮)।

আমি বলি: এর সনদ হাসান (Hasan)। এর বর্ণনাকারীরা মুসলিমের (সহীহ মুসলিমের) নির্ভরযোগ্য বর্ণনাকারী, তবে ইবনু আক্বীল ছাড়া। তাঁর ব্যাপারে কিছু আলোচনা (দুর্বলতা) রয়েছে, যা তাঁর হাদীসকে ‘হাসান’ স্তর থেকে নামিয়ে দেয় না। হাইসামী (৪/২২) বলেছেন: ‘এটি আবূ ইয়া’লা বর্ণনা করেছেন এবং এর সনদ হাসান।’ হ্যাঁ, ইবনু আক্বীলের ব্যাপারে মতভেদ রয়েছে। হাম্মাদ ইবনু সালামাহ তাঁর থেকে এভাবেই বর্ণনা করেছেন। আর যুহাইর ও উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার এটি আলী ইবনু হুসাইন থেকে, তিনি আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং অতিরিক্ত বলেছেন: ‘অতঃপর অন্য মেষটিকে আনা হলো এবং তিনি নিজ হাতে যবেহ করলেন এবং বললেন: “এটি মুহাম্মাদ ও মুহাম্মাদের পরিবারের পক্ষ থেকে।” অতঃপর তিনি সে দু’টির গোশতই মিসকীনদের খাওয়ালেন এবং তিনি ও তাঁর পরিবার তা থেকে খেলেন। এরপর আমরা বহু বছর এমন অবস্থায় ছিলাম যে, বানু হাশিমের কোনো ব্যক্তি কুরবানী করত না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাধ্যমে আল্লাহ তাদের কুরবানীর কষ্ট ও দায়ভার থেকে মুক্ত করে দিয়েছিলেন।’ এই বর্ণনাটি তাঁদের দু’জন থেকে ইমাম আহমাদ (৬/৩৯১-৩৯২, ৩৯২), ত্বাহাভী (উবাইদুল্লাহ থেকে) এবং বাইহাক্বী (যুহাইর থেকে) বর্ণনা করেছেন।

আর সুফিয়ান সাওরী এটি তাঁর (ইবনু আক্বীল) থেকে, তিনি আবূ সালামাহ থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এবং আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কুরবানী করতে চাইতেন, তখন দু’টি বিশাল মেষ ক্রয় করতেন...’ হাদীসের শেষ পর্যন্ত, যেখানে বলা হয়েছে: ‘এবং মুহাম্মাদের পরিবারের পক্ষ থেকে।’ এটি বর্ণনা করেছেন ইবনু মাজাহ (৩১২২), ত্বাহাভী, হাকিম (৪/২২৭-২২৮), আহমাদ (৬/২২০, ২২৫) এবং বাইহাক্বী। বুসীরী (ক্বাফ ১৯০/১) বলেছেন: ‘এই সনদটি হাসান। আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ সম্পর্কে মতভেদ রয়েছে।’

আমি বলি: ইবনু আক্বীল পর্যন্ত এই সনদগুলোর সকল সূত্রই সহীহ। হয় ইবনু আক্বীল তাঁর তিন শাইখ—আব্দুর রহমান ইবনু জাবের, আলী ইবনু হুসাইন এবং আবূ সালামাহ—থেকে এটি মুখস্থ রেখেছেন, অথবা তিনি এতে ‘ইযতিরাব’ (বিশৃঙ্খলা) করেছেন। বাইহাক্বী প্রথম মতটিকে প্রাধান্য দিয়েছেন, তবে আবূ সালামাহ থেকে তাঁর বর্ণনা বাইহাক্বীর কাছে পৌঁছেনি, বরং আব্দুর রহমান ও আলী থেকে পৌঁছেছে। তাই তিনি তাঁদের দু’জন থেকে বর্ণনা করার পর বলেছেন: ‘মনে হয় তিনি তাঁদের দু’জন থেকেই শুনেছেন।’ আমি বলি: সম্ভবত বাইহাক্বী যা উল্লেখ করেছেন, তা এই কারণে প্রাধান্য পায় যে, আবূ রাফি’, আয়িশা ও আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য সূত্রেও এই হাদীসের মূল ভিত্তি রয়েছে।

আবূ রাফি’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হলো: উমারাহ এটি বর্ণনা করেছেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন মু’তামির ইবনু আবী রাফি’ তাঁর পিতা থেকে সংক্ষিপ্ত আকারে এই শব্দে: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মেষ যবেহ করলেন, অতঃপর বললেন: “এটি আমার পক্ষ থেকে এবং আমার উম্মতের পক্ষ থেকে।”’ এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (১/১২৭/২) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি শুধু উমারাহই বর্ণনা করেছেন।’ আমি বলি: তিনি হলেন ইবনু গাযিয়্যাহ, আর তিনি নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ)। কিন্তু তাঁর শাইখ মু’তামির, আমার কাছে পরিচিত নন। আমি তাঁর জীবনী খুঁজে পাইনি, তবে ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আস-সিক্বাত’ (১/২১৮) গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন এবং বলেছেন: ‘তিনি তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন, আর তাঁর থেকে আমর ইবনু আবী আমর বর্ণনা করেন...।’

আর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হলো: উরওয়াহ ইবনু যুবাইর তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি শিংযুক্ত মেষ আনতে বললেন, যা কালোতে পা রাখে, কালোতে বসে এবং কালোতে দেখে। অতঃপর সেটি আনা হলো কুরবানী করার জন্য। তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: “হে আয়িশা! ছুরিটি নিয়ে এসো।” অতঃপর বললেন: “পাথরের সাথে ঘষে ধারালো করো।” তিনি তা করলেন। অতঃপর তিনি ছুরিটি নিলেন এবং মেষটিকে ধরে শুইয়ে দিলেন। অতঃপর যবেহ করলেন। অতঃপর বললেন: “বিসমিল্লাহ। হে আল্লাহ! মুহাম্মাদ, মুহাম্মাদের পরিবার এবং মুহাম্মাদের উম্মতের পক্ষ থেকে কবুল করো।” অতঃপর তিনি তা কুরবানী করলেন।’ এটি বর্ণনা করেছেন মুসলিম (৬/৭৮), আবু দাউদ (২৭৯২), ত্বাহাভী এবং বাইহাক্বী।

আর আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি হলো: ইবনু ওয়াহব এটি বর্ণনা করেছেন: আমাকে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনু আইয়াশ ইবনু আব্বাস আল-ক্বিত্ববানী, তিনি ঈসা ইবনু আব্দুর রহমান থেকে, তিনি আমাকে সংবাদ দিয়েছেন ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু মুসাইয়্যাব থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ (নবী পর্যন্ত উত্থাপিত) হিসেবে এই শব্দে: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু’টি শিংযুক্ত, সাদা-কালো মেষ কুরবানী করলেন। সে দু’টির একটি তাঁর পক্ষ থেকে এবং তাঁর পরিবারের পক্ষ থেকে, আর অন্যটি তাঁর পক্ষ থেকে এবং তাঁর উম্মতের মধ্যে যারা কুরবানী করতে পারেনি, তাদের পক্ষ থেকে।’ এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (২১৭/২) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘ইবনু ওয়াহব এককভাবে এটি বর্ণনা করেছেন।’ আমি বলি: তিনি নির্ভরযোগ্য (সিক্বাহ) হাফিয। আর তাঁর উপরের বর্ণনাকারীরাও নির্ভরযোগ্য, তবে আল-ক্বিত্ববানীর মধ্যে সামান্য দুর্বলতা রয়েছে। মুসলিম তাঁর জন্য ‘শাওয়াহিদ’ (সমর্থক বর্ণনা) হিসেবে হাদীস বর্ণনা করেছেন। সুতরাং, সনদটি হাসান। আর হাইসামী বলেছেন: ‘এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ ও ‘আল-কাবীর’ গ্রন্থে বর্ণনা করেছেন এবং এর সনদ হাসান।’

এই অধ্যায়ে আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও সংক্ষিপ্ত আকারে মু’তামির ইবনু আবী রাফি’ তাঁর পিতা থেকে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা রয়েছে। এটি বর্ণনা করেছেন ত্বাহাভী, দারাকুতনী, হাকিম (৪/২২৮), বাইহাক্বী এবং আহমাদ (৩/৮)। এটি রাবীহ ইবনু আব্দুর রহমান ইবনু আবী সাঈদ তাঁর পিতা থেকে, তিনি তাঁর দাদা থেকে বর্ণনা করেছেন। হাকিম বলেছেন: ‘এর সনদ সহীহ।’ যাহাবীও তাঁর সাথে একমত পোষণ করেছেন। আমি বলি: তাঁরা দু’জনই এমন বলেছেন, অথচ রাবীহকে কেউ নির্ভরযোগ্য বলেননি, বরং বুখারী বলেছেন: ‘মুনকারুল হাদীস’ (যার হাদীস প্রত্যাখ্যাত)। আর যাহাবী নিজেই তাঁকে ‘আয-যুআফা’ (দুর্বল বর্ণনাকারীদের তালিকা)-তে উল্লেখ করেছেন! আর হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আত-তাক্বরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: ‘মাক্ববূল’ (গ্রহণযোগ্য)।

আর আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত। তাঁর থেকে এর দু’টি সূত্র রয়েছে: প্রথমটি: হাজ্জাজ ইবনু আরত্বাতাহ থেকে, তিনি ক্বাতাদাহ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ’ হিসেবে ইবনু ওয়াহবের নিকট আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হাদীসের অনুরূপ। এটি ত্বাবারানী ‘আল-আওসাত্ব’ গ্রন্থে (১২৮/১) বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: ‘এটি শুধু হাজ্জাজই বর্ণনা করেছেন।’ আমি বলি: তিনি ‘মুদাল্লিস’ (তাদ্লীসকারী) এবং তিনি ‘আনআনা’ করেছেন। আর তাঁর পর্যন্ত পৌঁছানোর সূত্রে দু’জন দুর্বল বর্ণনাকারী রয়েছে। তবে আবূ ইয়া’লা তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (১৫৭/১) সহীহ সনদে তাঁর থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। ফলে সন্দেহ তাঁর (হাজ্জাজের) মধ্যেই সীমাবদ্ধ রইল। দ্বিতীয়টি: মুবারাক ইবনু সুহাইম থেকে, তিনি আমাদের সংবাদ দিয়েছেন আব্দুল আযীয ইবনু সুহাইব থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। এটি দারাকুতনী বর্ণনা করেছেন। আর মুবারাক ইবনু সুহাইম ‘মাতরূক’ (পরিত্যক্ত)।

এই অধ্যায়ে আবূ তালহা, ইবনু আব্বাস এবং হুযাইফাহ ইবনু উসাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণনা রয়েছে, তবে সেগুলোর সনদ সম্পর্কে আলোচনা রয়েছে। হাইসামী সেগুলো তাঁর ‘মাজমাউয যাওয়ায়েদ’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। যে কেউ চাইলে তা দেখে নিতে পারে। কেননা আমরা যা আলোচনা করেছি, তা-ই যথেষ্ট।

(ফায়দা/উপকারিতা): এই হাদীসগুলোতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উম্মতের মধ্যে যারা কুরবানী করতে পারেনি, তাদের পক্ষ থেকে কুরবানী করার যে বিষয়টি এসেছে, তা তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিশেষ বৈশিষ্ট্যসমূহের অন্তর্ভুক্ত, যেমনটি হাফিয (ইবনু হাজার) ‘আল-ফাতহ’ গ্রন্থে (৯/৫১৪) আহলে ইলম (জ্ঞানীদের) থেকে উল্লেখ করেছেন। এর ভিত্তিতে, উম্মতের পক্ষ থেকে কুরবানী করার ক্ষেত্রে অন্য কারো জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুসরণ করা জায়েয নয়। আর এর উপর ভিত্তি করে সালাত, সিয়াম, ক্বিরাআত এবং অনুরূপ অন্যান্য ইবাদতের ক্ষেত্রে ক্বিয়াস (তুলনা) করা তো আরও বেশি জায়েয নয়। কারণ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এগুলোর অনুমোদন আসেনি। সুতরাং, কেউ কারো পক্ষ থেকে সালাত আদায় করবে না, কেউ কারো পক্ষ থেকে সিয়াম পালন করবে না এবং কেউ কারো পক্ষ থেকে ক্বিরাআত করবে না। আর এই সবকিছুর মূল ভিত্তি হলো মহান আল্লাহর বাণী:

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * (আর মানুষ যা চেষ্টা করে, তা ছাড়া তার জন্য আর কিছুই নেই।) [সূরা নাজম: ৩৯]

হ্যাঁ, এমন কিছু বিষয় রয়েছে যা আগত নস (স্পষ্ট দলীল) দ্বারা এই মূলনীতি থেকে ব্যতিক্রম করা হয়েছে। তবে এখন সেগুলোর উল্লেখ করার সুযোগ নেই। সেগুলো বিস্তারিত গ্রন্থাবলীতে খুঁজে নিতে হবে।









ইরওয়াউল গালীল (1139)


*1139* - (روى عن أبى بكر وعمر: ` أنهما كانا لا يضحيان عن أهلهما مخافة أن يرى ذلك واجبا ` (ص 271) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه البيهقى (6/295) من طريق جماعة عن أبى سريحة الغفارى قال: ` ما أدركت أبا بكر ، أو رأيت أبا بكر وعمر رضى الله عنهما كانا لا يضحيان ـ فى بعض حديثهم ـ كراهية أن يقتدى بهما `.
وقال: ` أبو سريحة الغفارى هو حذيفة بن أسيد صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم `.
قلت: والسند إليه صحيح.
ثم روى عن أبى مسعود الأنصارى رضى الله عنه قال: ` إنى لأدع الأضحى ، وإنى لموسر ، مخافة أن يرى جيرانى أنه حتم على `.
قلت: وإسناده صحيح أيضا.




১১৪৯ - (আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: ‘তাঁরা উভয়ে তাঁদের পরিবারের পক্ষ থেকে কুরবানী করতেন না, এই ভয়ে যে, লোকেরা যেন এটিকে ওয়াজিব মনে না করে।’ (পৃ. ২৭১)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।

আল-বায়হাক্বী (৬/২৯৫) এটি বর্ণনা করেছেন একদল বর্ণনাকারীর সূত্রে আবূ সুরাইহা আল-গিফারী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে। তিনি বলেন: ‘আমি আবূ বকরকে পাইনি, অথবা আমি আবূ বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখেছি যে, তাঁরা উভয়ে কুরবানী করতেন না—তাঁদের (বর্ণনাকারীদের) কারো কারো হাদীসে এসেছে—এই অপছন্দ থেকে যে, লোকেরা যেন তাঁদের অনুসরণ না করে (এবং এটিকে ওয়াজিব মনে না করে)।’

তিনি (আল-বায়হাক্বী) বলেন: ‘আবূ সুরাইহা আল-গিফারী হলেন হুযাইফাহ ইবনু উসাইদ, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: তাঁর (আবূ সুরাইহা) পর্যন্ত সনদ সহীহ।

এরপর (আল-বায়হাক্বী) আবূ মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: ‘আমি কুরবানী করা ছেড়ে দেই, অথচ আমি সচ্ছল, এই ভয়ে যে, আমার প্রতিবেশীরা যেন এটিকে আমার উপর আবশ্যক (বাধ্যতামূলক) মনে না করে।’

আমি (আল-আলবানী) বলছি: এর সনদও সহীহ।









ইরওয়াউল গালীল (1140)


*1140* - (حديث: ` من نذر أن يطيع الله فليطعه ` (ص 271) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وقد مضى برقم (966) .




*১১৪০* - (হাদীস: ‘যে ব্যক্তি আল্লাহর আনুগত্য করার মানত (নযর) করে, সে যেন তাঁর আনুগত্য করে।’ (পৃ. ২৭১)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।
এটি ইতিপূর্বে ৯৬৬ নং-এ অতিবাহিত হয়েছে।









ইরওয়াউল গালীল (1141)


*1141* - (حديث أبى هريرة: ` من اغتسل يوم الجمعة غسل الجنابة ثم راح فى الساعة الأولى فكأنما قرب بدنة ، ومن راح فى الساعةالثانية فكأنما قرب بقرة ، ومن راح فى الساعة الثالثة فكأنما قرب كبشا أقرن ` متفق عيه (ص 271) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وقد تقدم.




১১৪১ - (আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস: ‘যে ব্যক্তি জুমুআর দিন জানাবাতের (বড় অপবিত্রতার) গোসলের ন্যায় গোসল করে, অতঃপর প্রথম প্রহরে (মসজিদে) যায়, সে যেন একটি উট কুরবানী করল। আর যে ব্যক্তি দ্বিতীয় প্রহরে যায়, সে যেন একটি গরু কুরবানী করল। আর যে ব্যক্তি তৃতীয় প্রহরে যায়, সে যেন একটি শিংওয়ালা দুম্বা কুরবানী করল।’ মুত্তাফাকুন আলাইহি (পৃষ্ঠা ২৭১)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহক্বীক্ব: * সহীহ।
এটি ইতিপূর্বে গত হয়েছে।









ইরওয়াউল গালীল (1142)


*1142* - (قول أبى أيوب: ` كان الرجل فى عهد النبى صلى الله عليه وسلم يضحى بالشاة عنه وعن أهل بيته ، فيأكلون ويطعمون ، حتى تباهى الناس فصار كما ترى `. رواه ابن ماجه والترمذى وصححه (ص 272) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه الترمذى (1/284) وابن ماجه (3147) وكذا مالك
(2/486/10) والبيهقى (9/268) من طريق عمارة بن عبد الله بن صياد عن عطاء بن يسار قال: ` سألت أبا أيوب الأنصارى: كيف كانت الضحايا فيكم على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال … ` فذكره. وقال الترمذى: ` حديث حسن صحيح `.
(تنبيه) : أخرجه مالك مختصرا0 وقال: ` عمارة بن يسار ` ولم أجد فى الرواة من اسمه عمارة ` بن يسار ، وقد ذكروا فى شيوخ مالك عمارة بن عبد الله بن صياد ، فالظاهر أنه هذا. والله أعلم هل الخطأ من الراوى أم الطابع؟.




*১১৪২* - (আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে একজন লোক তার পক্ষ থেকে এবং তার পরিবারের পক্ষ থেকে একটি বকরী কুরবানী করত। তারা নিজেরা খেত এবং অন্যদেরও খাওয়াত। অবশেষে লোকেরা গর্ব করতে শুরু করল, ফলে বিষয়টি এমন হয়ে দাঁড়াল যেমনটি তুমি দেখছ।" এটি ইবনু মাজাহ ও তিরমিযী বর্ণনা করেছেন এবং তিনি (তিরমিযী) এটিকে সহীহ বলেছেন। (পৃ. ২৭২)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।

এটি বর্ণনা করেছেন তিরমিযী (১/২৮৪), ইবনু মাজাহ (৩১৪৭), অনুরূপভাবে মালিকও (২/৪৮৬/১০) এবং বাইহাক্বীও (৯/২৬৮)। উমারা ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু সায়্যাদ সূত্রে আত্বা ইবনু ইয়াসার (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তোমাদের মধ্যে কুরবানী কেমন ছিল? তিনি বললেন..." অতঃপর তিনি তা (উপরের হাদীসটি) উল্লেখ করলেন।

আর তিরমিযী বলেছেন: "হাদীসটি হাসান সহীহ (Hasan Sahih)।"

(দৃষ্টি আকর্ষণ): মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এটি সংক্ষিপ্ত আকারে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি বলেছেন: 'উমারা ইবনু ইয়াসার'। কিন্তু বর্ণনাকারীদের মধ্যে 'উমারা ইবনু ইয়াসার' নামে কাউকে আমি পাইনি। অথচ মালিক (রাহিমাহুল্লাহ)-এর শাইখদের (শিক্ষকদের) মধ্যে উমারা ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু সায়্যাদ-এর কথা উল্লেখ করা হয়েছে। সুতরাং, বাহ্যত প্রতীয়মান হয় যে, ইনিই সেই ব্যক্তি। আল্লাহই ভালো জানেন, ভুলটি কি বর্ণনাকারীর পক্ষ থেকে হয়েছে, নাকি মুদ্রণকারীর পক্ষ থেকে?









ইরওয়াউল গালীল (1143)


*1143* - (قول أبى هريرة: ` سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: نعم ، أو: نعمت الأضحية الجذع من الضأن ` رواه أحمد والترمذى (ص 272) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
ولم يحسن المصنف بعدم ذكره لقول مخرجه الترمذى عقبه: ` حديث غريب `.
المشعر بضعفه ، وقد بينت علته ومن ضعفه من أهل العلم فى ` سلسلة الأحاديث الضعيفة ` (رقم 64) ، فأغنى عن الإعادة.




১১৪৩ - (আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: “আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: হ্যাঁ, অথবা: উত্তম কুরবানী হলো ভেড়ার জাযা’ (ছয় মাস বয়সী) বাচ্চা।” এটি বর্ণনা করেছেন আহমাদ এবং তিরমিযী (পৃষ্ঠা ২৭২)।)

**শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব:** *যঈফ (দুর্বল)।*

মুসান্নিফ (গ্রন্থকার) ভালো করেননি যে, তিনি এর বর্ণনাকারী তিরমিযীর এর পরপরই বলা উক্তিটি উল্লেখ করেননি: ‘হাদীসটি গারীব’ (অপরিচিত)। যা এর দুর্বলতার ইঙ্গিত দেয়। আমি এর ত্রুটি (ইল্লাত) এবং যে সকল বিশেষজ্ঞ আলেম এটিকে দুর্বল বলেছেন, তা ‘সিলসিলাতুল আহাদীস আয-যঈফাহ’ (৬৪ নং)-এর মধ্যে স্পষ্ট করে দিয়েছি। সুতরাং এখানে পুনরাবৃত্তি নিষ্প্রয়োজন।









ইরওয়াউল গালীল (1144)


*1144* - (وفى حديث عقبة بن عامر: ` فقلت يا رسول الله: أصابنى جذع ، قال: ضح به `. متفق عليه (ص 272) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
وله عنه طرق:
الأولى: عن بعجة بن عبد الله الجهنى عنه قال: ` قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم فينا ضحايا ، فأصابنى جذع ، فقلت: يا رسول الله … ` الحديث.
أخرجه البخارى (4/21) ومسلم (6/77) والنسائى (2/204) والترمذى (1/284) والبيهقى (9/269) وأحمد (4/144 ـ 145 و156) .
الثانية عن أبى الخير عنه: ` أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعطاه غنما يقسمها على أصحابه ضحايا ، فبقى عتود فذكره لرسول الله صلى الله عليه وسلم ، فقال: ضح به أنت `.
أخرجه البخارى (2/91 ، 113 ، 4/23) ومسلم والنسائى والترمذى وابن ماجه (3138) والبيهقى (9/270) وأحمد (4/149) .
وقال الترمذى: ` حديث حسن صحيح ، قال وكيع: الجذع من الضأن يكون ابن ستة أو سبعة أشهر `.
قلت: وزاد البيهقى فى آخره: ` ولا أرخصه لأحد فيها بعد `. وقال: ` فهذه الزيادة إذا كانت محفوظة ، كانت رخصة له كما رخص لأبى بردة ابن نيار `.
قلت: إسنادها صحيح ، وهو إن لم تكن محفوظة لفظا ، فلست أشك فى صحتها معنى لقوله ` ضح به أنت ` فإنه ظاهر الدلالة على الخصوصية ، ومما يؤيد ذلك قوله صلى الله عليه وسلم لأبى بردة: ` ولا تجزى جذعة عن أحد بعدك `.
وهو من حديث البراء وسيأتى تخريجه برقم (1154) .
الثالثة: عن عمرو بن الحارث عن بكير بن عبد الله عن معاذ بن عبد الله بن خبيب عن عقبة بن عامر قال: ` ضحينا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بجذع من الضأن `
أخرجه النسائى (2/204) وابن الجارود (905) والبيهقى.
قلت: وهذا إسناد جيد ، وقواه الحافظ وأعله ابن حزم بجهالة ابن خبيب ، وليس بشىء كما بينته فى ` سلسلة الأحاديث الضعيفة ` (رقم 65) .
وخالفه أسامة بن زيد فقال: عن معاذ بن عبد الله بن خبيب عن ابن المسيب عن عقبة بن عامر قال: ` سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الجذع؟ فقال: ضح به ، لا بأس به `.
أخرجه أحمد (4/152) .
وهذا إسناد حسن إن كان أسامة قد حفظه ، ففى حفظه ضعف ، وإلا فرواية بكير أصح ، وقد أخرجها ابن حبان فى ` صحيحه ` (1048) .




*১১৪৪* - (এবং উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে এসেছে: ‘আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার ভাগে একটি *জাযা'* (ছয়-সাত মাসের মেষশাবক) পড়েছে। তিনি বললেন: ‘তুমি সেটি কুরবানী করো।’) [মুত্তাফাকুন আলাইহি (পৃ. ২৭২)]

শাইখ নাসিরুদ্দিন আল-আলবানী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর তাহকীক: * সহীহ (Sahih)।

তাঁর (উকবাহ ইবনু আমির) থেকে এটি বিভিন্ন সূত্রে বর্ণিত হয়েছে:

প্রথম সূত্র: বা'জাহ ইবনু আব্দুল্লাহ আল-জুহানী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে কুরবানীর পশু বণ্টন করলেন। আমার ভাগে একটি *জাযা'* পড়ল। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)!...' (সম্পূর্ণ হাদীস)।

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (৪/২১), মুসলিম (৬/৭৭), নাসাঈ (২/২০৪), তিরমিযী (১/২৮৪), বাইহাকী (৯/২৬৯) এবং আহমাদ (৪/১৪৪-১৪৫ ও ১৫৬)।

দ্বিতীয় সূত্র: আবূল খায়ের (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন: ‘রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (উকবাহকে) কিছু বকরী দিলেন, যা তিনি তাঁর সাহাবীগণের মাঝে কুরবানীর জন্য বণ্টন করবেন। অতঃপর একটি *'আতূদ* (এক বছরের কম বয়সের ছাগল) অবশিষ্ট রইল। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তা উল্লেখ করলেন। তিনি বললেন: ‘তুমি সেটি কুরবানী করো।’

এটি বর্ণনা করেছেন বুখারী (২/৯১, ১১৩, ৪/২৩), মুসলিম, নাসাঈ, তিরমিযী, ইবনু মাজাহ (৩১৩৮), বাইহাকী (৯/২৭০) এবং আহমাদ (৪/১৪৯)।

আর তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘হাদীসটি *হাসান সহীহ* (Hasan Sahih)।’ ওয়াকী' (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: ‘*জাযা'* হলো মেষশাবক, যার বয়স ছয় বা সাত মাস হয়।’

আমি (আলবানী) বলছি: বাইহাকী (রাহিমাহুল্লাহ) এর শেষে অতিরিক্ত যোগ করেছেন: ‘আর এরপর আমি অন্য কারো জন্য এটি অনুমোদন করি না।’ এবং তিনি (বাইহাকী) বলেছেন: ‘যদি এই অতিরিক্ত অংশটি সংরক্ষিত (মাহফূয) হয়ে থাকে, তবে এটি তাঁর (উকবাহর) জন্য একটি বিশেষ অনুমোদন (রুখসাহ) ছিল, যেমনটি আবূ বুরদাহ ইবনু নিয়ার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য অনুমোদন দেওয়া হয়েছিল।’

আমি (আলবানী) বলছি: এর সনদ *সহীহ*। যদিও এটি শাব্দিকভাবে সংরক্ষিত না-ও হয়ে থাকে, তবুও এর অর্থের বিশুদ্ধতা নিয়ে আমার কোনো সন্দেহ নেই। কারণ, তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাণী: ‘তুমি সেটি কুরবানী করো’—এটি বিশেষত্বের (খুসূসিয়্যাহ) উপর সুস্পষ্ট প্রমাণ বহন করে। আর এই বিষয়টিকে সমর্থন করে আবূ বুরদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দেওয়া নির্দেশ: ‘তোমার পরে আর কারো পক্ষ থেকে *জাযা'* যথেষ্ট হবে না।’

এটি বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস থেকে এসেছে এবং এর তাখরীজ (১১৫৪) নম্বরে আসছে।

তৃতীয় সূত্র: আমর ইবনু হারিস (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি বুকাইর ইবনু আব্দুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি মু'আয ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু খুবাইব (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মেষশাবকের *জাযা'* দ্বারা কুরবানী করেছিলাম।’

এটি বর্ণনা করেছেন নাসাঈ (২/২০৪), ইবনু জারূদ (৯০৫) এবং বাইহাকী।

আমি (আলবানী) বলছি: এই সনদটি *জায়্যিদ* (Jaid/উত্তম)। হাফিয (ইবনু হাজার) এটিকে শক্তিশালী বলেছেন। তবে ইবনু হাযম (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু খুবাইবের অজ্ঞাততার (জাহালাত) কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত (মু'আল্ল) বলেছেন। কিন্তু এটি ধর্তব্য নয়, যেমনটি আমি আমার ‘সিলসিলাতুল আহাদীস আয-যঈফাহ’ (৬৫ নং)-এ স্পষ্ট করেছি।

আর উসামাহ ইবনু যায়দ (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর বিরোধিতা করেছেন। তিনি বর্ণনা করেছেন: মু'আয ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু খুবাইব (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি ইবনু মুসাইয়্যিব (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে, তিনি উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: ‘আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে *জাযা'* সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: ‘তুমি এটি কুরবানী করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।’

এটি আহমাদ (৪/১৫২) বর্ণনা করেছেন।

এই সনদটি *হাসান* (Hasan), যদি উসামাহ এটি মুখস্থ রাখতে পেরে থাকেন। কারণ, তাঁর স্মৃতিশক্তির দুর্বলতা রয়েছে। অন্যথায়, বুকাইর (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বর্ণনাটিই অধিকতর বিশুদ্ধ (*আসহাহ*)। আর ইবনু হিব্বান (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর ‘সহীহ’ (১০৪৮)-এ এটি সংকলন করেছেন।









ইরওয়াউল গালীল (1145)


*1145* - (حديث: ` لا تذبحوا إلا مسنة ، فإن عز عليكم ، فاذبحوا الجذع من الضأن `. رواه مسلم وغيره (ص 272) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * ضعيف.
فإنه عند مسلم (6/77) وأبى داود (2797) والنسائى (2/402) وابن ماجه (3141) وابن الجارود (904) والبيهقى (9/269) وأحمد (3/312 ، 327) وأبى يعلى الموصلى فى ` مسنده ` (ق 125/2) كلهم من طريق زهير قال: حدثنا أبو الزبير عن جابر مرفوعا بلفظ: ` … إلا أن يعسر عليكم ، فتذبحوا جذعة من الضأن `. والباقى مثله سواء.
ثم رواه أبو يعلى من طريق محمد بن عثمان القرشى حدثنا سليمان: حدثنا أبو الزبير بلفظ: ` إذا عز عليك المسان من الضأن ، أجزأ الجذع من الضأن `.
قلت: وسليمان هذا أظنه ابن مهران الأعمش.
ومحمد بن عثمان القرشى ، قال الدارقطنى: ` مجهول `. وأورده ابن أبى حاتم (4/1/24/104) ولم يذكروا فيه جرحا ولا تعديلا.
ومدار الطريقين على أبى الزبير ، وهو مدلس معروف بذلك خاصة عن أبى الزبير فيتقى حديثه عنه ما لم يصرح بالتحديث ، وكان معنعنا ، كما فعل فى هذا الحديث فى جميع المصادر المخرجة له ، وقد كنت اغتررت برهة من الزمن بهذا الحديث متوهما صحته ، لاخراج مسلم إياه فى ` صحيحه ` ، ثم تنبهت لعلته هذه ، فنبهت عليها فى ` سلسلة الأحاديث الضعيفة (ج1 ص 91 طبع المكتب الإسلامى فى دمشق) .
وقد صح عنه صلى الله عليه وسلم أنه قال: ` إن الجذع يوفى مما يوفى منه الثنية ` وهو مجاشع الآتى بعده ، فهو معارض لهذا ، إلا أن تحمل ` المسنة ` فيه ، على المسنة من المعز فإنها لا تجزىء كما يأتى فى حديث البراء المخرج عند الحديث (1145) ، وهو خلاف الظاهر من السياق ، ولفظ أبى يعلى الثانى ` … المسان من الضأن … ` يبطله. والله أعلم.




১১৪৫ - (হাদীস: ‘তোমরা ‘মুসান্নাহ’ (নির্দিষ্ট বয়সের পশু) ব্যতীত যবেহ করো না। যদি তোমাদের জন্য তা দুষ্প্রাপ্য হয়, তবে ভেড়ার ‘জাযা’ (ছয় মাস বয়সের পশু) যবেহ করো।’ এটি মুসলিম ও অন্যান্যরা বর্ণনা করেছেন (পৃ. ২৭২)।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব: * যঈফ (দুর্বল)।

কেননা এটি মুসলিম (৬/৭৭), আবূ দাঊদ (২৭৯৭), নাসাঈ (২/৪০২), ইবনু মাজাহ (৩১৪১), ইবনু জারূদ (৯০৪), বায়হাক্বী (৯/২৬৯), আহমাদ (৩/৩১২, ৩২৭) এবং আবূ ইয়া‘লা আল-মাওসিলী তাঁর ‘মুসনাদ’ গ্রন্থে (ক্বাফ ১২৫/২) যুহায়র-এর সূত্রে বর্ণিত হয়েছে। তিনি (যুহায়র) বলেন: আবূয যুবায়র আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ‘ হিসেবে এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: ‘...তবে যদি তোমাদের জন্য তা দুষ্কর হয়, তবে ভেড়ার ‘জাযা’ যবেহ করো।’ আর বাকি অংশ হুবহু একই রকম।

অতঃপর আবূ ইয়া‘লা এটি মুহাম্মাদ ইবনু উসমান আল-কুরাশী-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: সুলাইমান আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন: আবূয যুবায়র আমাদের নিকট এই শব্দে বর্ণনা করেছেন: ‘যখন ভেড়ার ‘মুসান্নাহ’ (নির্দিষ্ট বয়সের পশু) তোমাদের জন্য দুষ্প্রাপ্য হয়, তখন ভেড়ার ‘জাযা’ যথেষ্ট হবে।’

আমি (আলবানী) বলি: এই সুলাইমান সম্ভবত ইবনু মিহরান আল-আ‘মাশ।

আর মুহাম্মাদ ইবনু উসমান আল-কুরাশী সম্পর্কে দারাকুতনী বলেছেন: ‘মাজহূল’ (অজ্ঞাত)। ইবনু আবী হাতিম তাঁকে (৪/১/২৪/১০৪) উল্লেখ করেছেন, কিন্তু তাঁর সম্পর্কে কোনো জারহ (দোষারোপ) বা তা‘দীল (নির্ভরযোগ্যতা) উল্লেখ করেননি।

আর উভয় সূত্রের কেন্দ্রবিন্দু হলো আবূয যুবায়র। তিনি একজন মুদাল্লিস (বর্ণনা গোপনকারী) হিসেবে সুপরিচিত। বিশেষত আবূয যুবায়র থেকে বর্ণিত হাদীস থেকে সতর্ক থাকা হয়, যতক্ষণ না তিনি সরাসরি ‘তাহদীস’ (শ্রবণের কথা) স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেন। অথচ তিনি ‘আনআনা’ (আন/থেকে) ব্যবহার করেছেন, যেমনটি তিনি এই হাদীসের ক্ষেত্রে এর সকল উৎসগ্রন্থে করেছেন। আমি একসময় এই হাদীসটির সহীহ হওয়ার ধারণা করে বিভ্রান্ত হয়েছিলাম, কারণ মুসলিম এটিকে তাঁর ‘সহীহ’ গ্রন্থে সংকলন করেছেন। অতঃপর আমি এর এই ত্রুটি (ইল্লাত) সম্পর্কে অবগত হই এবং ‘সিলসিলাতুল আহাদীস আয-যঈফাহ’ (১ম খণ্ড, পৃ. ৯১, দামেস্কের আল-মাকতাব আল-ইসলামী কর্তৃক প্রকাশিত) গ্রন্থে তা উল্লেখ করি।

অথচ তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে সহীহ সূত্রে প্রমাণিত যে তিনি বলেছেন: ‘নিশ্চয়ই ‘জাযা’ (ছয় মাস বয়সের পশু) সেই (বয়সের) ‘ছানিয়্যা’ (এক বছর বয়সের পশু)-এর সমতুল্য, যা যথেষ্ট হয়।’ এটি হলো মুজাশে‘-এর হাদীস, যা এর পরেই আসছে। সুতরাং এটি এই হাদীসের বিরোধী। তবে যদি এই হাদীসে উল্লেখিত ‘মুসান্নাহ’ শব্দটিকে ছাগলের ‘মুসান্নাহ’ হিসেবে ব্যাখ্যা করা হয়, যা যথেষ্ট হয় না—যেমনটি আল-বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে আসছে, যা ১১৪৫ নং হাদীসের অধীনে তাহখরীজ করা হয়েছে—তাহলে ভিন্ন কথা। কিন্তু এটি বর্ণনার বাহ্যিক অর্থের পরিপন্থী। আর আবূ ইয়া‘লার দ্বিতীয় বর্ণনাটির শব্দ: ‘...ভেড়ার ‘মুসান্নাহ’...’ এটিকে বাতিল করে দেয়। আল্লাহই সর্বাধিক অবগত।









ইরওয়াউল গালীল (1146)


*1146* - (وعن مجاشع مرفوعا: ` إن الجذع يوفى مما يوفى منه الثنية `. رواه أبو داود وابن ماجه (ص) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أبو داود (2799) وابن ماجه (3140) والحاكم (4/226) والبيهقى (9/270) من طريق الثورى عن عاصم بن كليب عن أبيه قال: ` كنا مع رجل من أصحاب النبى صلى الله عليه وسلم يقال له مجاشع من بنى سليم ، ففرت [1] الغنم ، فأمر مناديا فنادى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول … ` فذكره.
قال أبو داود: ` وهو مجاشع بن مسعود `
وفى رواية للبيهقى: ` إن الجذع من الضأن ، يفى ما تفى منه الثنية ` زاد فى أخرى: ` أراه قال: من المعز. شك سفيان `.
وأخرجه النسائى (2/204) والحاكم والبيهقى وأحمد (5/368) من
طرق أخرى عن عاصم عن أبيه قال: ` كنا فى سفر فحضر الأضحى ، فجعل الرجل منا يشترى المسنة بالجذعتين والثلاثة ، فقال لنا رجل من مزينة: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فى سفر فحضر هذا اليوم ، فجعل الرجل يطلب المسنة بالجذعتين والثلاثة ، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم … ` فذكره.
وقال الحاكم: ` حديث صحيح `.
وقال ابن حزم فى المحلى ` (7/267) : ` إنه فى غاية الصحة `.
وهو كما قالا.




১১৪৬ - (মুজাশে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে মারফূ' সূত্রে বর্ণিত: "নিশ্চয়ই জাযা' (এক বছরের কম বয়সের পশু) যথেষ্ট হবে, যা দ্বারা ছানিয়্যা (দুই বছরের পশু) যথেষ্ট হয়।" এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ ও ইবনু মাজাহ।)

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ।

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাঊদ (২৭৯৯), ইবনু মাজাহ (৩১৪০), আল-হাকিম (৪/২২৬) এবং আল-বায়হাক্বী (৯/২৭০) আস-সাওরী-এর সূত্রে, তিনি আসিম ইবনু কুলাইব থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, যিনি বলেন: "আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে বানী সুলাইম গোত্রের মুজাশে' নামক এক ব্যক্তির সাথে ছিলাম। তখন কিছু ছাগল পালিয়ে গেল। তিনি একজন ঘোষণাকারীকে নির্দেশ দিলেন, সে ঘোষণা করল যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন..." অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন।

আবূ দাঊদ বলেন: "তিনি হলেন মুজাশে' ইবনু মাসঊদ।"

আর বায়হাক্বীর এক বর্ণনায় এসেছে: "নিশ্চয়ই ভেড়ার জাযা' (এক বছরের কম বয়সের পশু) যথেষ্ট হবে, যা দ্বারা ছানিয়্যা যথেষ্ট হয়।" অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: ছাগলের (জাযা')। সুফিয়ান সন্দেহ করেছেন।"

আর এটি বর্ণনা করেছেন নাসাঈ (২/২০৪), আল-হাকিম, আল-বায়হাক্বী এবং আহমাদ (৫/৩৬৮) আসিম থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, অন্য সনদে। তিনি (পিতা) বলেন: "আমরা এক সফরে ছিলাম, তখন কুরবানীর দিন উপস্থিত হলো। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ একটি মুসিন্নাহ (বয়স্ক পশু) কিনছিল দুটি বা তিনটি জাযা'র বিনিময়ে। তখন মুযাইনা গোত্রের এক ব্যক্তি আমাদের বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক সফরে ছিলাম, তখন এই দিনটি উপস্থিত হলো। তখন লোকেরা দুটি বা তিনটি জাযা'র বিনিময়ে মুসিন্নাহ খুঁজতে লাগল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন..." অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করলেন।

আর আল-হাকিম বলেছেন: "হাদীসটি সহীহ।"

আর ইবনু হাযম তাঁর 'আল-মুহাল্লা' (৭/২৬৭)-তে বলেছেন: "নিশ্চয়ই এটি বিশুদ্ধতার চরম পর্যায়ে রয়েছে।"

আর বিষয়টি তেমনই, যেমন তাঁরা উভয়ে বলেছেন।









ইরওয়াউল গালীল (1147)


*1147* - (عن أبى رافع قال: ` ضحى رسول الله صلى الله عليه وسلم بكبشين أملحين موجوءين خصيين ` رواه أحمد (ص 272) .

تحقيق الشيخ ناصر الدين الألباني: * صحيح.
أخرجه أحمد (6/8) من طريق شريك عن عبد الله بن محمد عن على بن حسين عن أبى رافع به وزاد: ` فقال: أحدهما عن من شهد بالتوحيد ، وله بالبلاغ ، والآخر عنه وعن أهل بيته ، قال: فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كفانا `.
قلت: وهذا إسناد حسن ، لولا أن شريكا وهو ابن عبد الله القاضى سىء الحفظ ، لكن قد تابعه جماعة من الثقات عن عبد الله بن محمد ، وهو ابن عقيل ، وتابع هذا آخرون كما سبق بيانه عند هذا الحديث من رواية جابر ، (رقم 1138) وذكرنا له هناك طرقا وشواهد فراجعها.
(تنبيه) فى ` المسند ` ` موجبين ` بدل ` موجوءين ` ، ووقع فى ` مجمع الزوائد ` (4/21) كما فى الكتاب ، فلا أدرى أهذا تصحيف ، أم ما فى ` المسند ` ، فإن كان الأول ، فلفظ المسند شاذ بل منكر لعدم وروده فى شىء من الطرق التى أشرنا إليها آنفا. [1]




১১৪৭ - (আবু রাফে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম দুটি সাদা-কালো, শিং-ভাঙা (মওজূ) এবং খাসি করা মেষ কুরবানি করেছিলেন।’ এটি আহমাদ (পৃ. ২৭২) বর্ণনা করেছেন।

শাইখ নাসিরুদ্দীন আল-আলবানী কর্তৃক তাহক্বীক্ব (পর্যালোচনা): * সহীহ (Sahih)।

এটি আহমাদ (৬/৮) বর্ণনা করেছেন শারীক-এর সূত্রে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ থেকে, তিনি আলী ইবনু হুসাইন থেকে, তিনি আবু রাফে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। এবং তিনি অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: ‘অতঃপর তিনি (নবী সাঃ) বললেন: এর মধ্যে একটি তাদের পক্ষ থেকে, যারা তাওহীদের সাক্ষ্য দিয়েছে এবং তাঁর (আল্লাহর) পক্ষ থেকে রিসালাত পৌঁছানোর সাক্ষ্য দিয়েছে। আর অন্যটি তাঁর নিজের পক্ষ থেকে এবং তাঁর পরিবারবর্গের পক্ষ থেকে।’ তিনি (আবু রাফে) বলেন: ‘রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের জন্য যথেষ্ট হয়ে গিয়েছিলেন।’

আমি বলছি: এই সনদটি হাসান (Hasan) হতো, যদি শারীক—যিনি ইবনু আব্দুল্লাহ আল-ক্বাদী—তাঁর স্মৃতিশক্তি দুর্বল না হতো। কিন্তু আব্দুল্লাহ ইবনু মুহাম্মাদ (যিনি ইবনু আক্বীল) থেকে বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীদের একটি দল তাঁর (শারীকের) অনুসরণ করেছেন। আর অন্যান্যরাও এর অনুসরণ করেছেন, যেমনটি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনা থেকে এই হাদীসের ব্যাখ্যায় (১১৮৮ নং) পূর্বে বর্ণনা করা হয়েছে। আমরা সেখানে এর বিভিন্ন সূত্র (ত্বরীক্ব) ও শাহেদ (সমর্থক বর্ণনা) উল্লেখ করেছি, সুতরাং তা দেখে নিন।

(দ্রষ্টব্য) ‘আল-মুসনাদ’ গ্রন্থে ‘موجوءين’ (মওজূঈন)-এর পরিবর্তে ‘موجبين’ (মুজিবীন) শব্দটি এসেছে। আর ‘মাজমাউয যাওয়ায়েদ’ (৪/২১) গ্রন্থে কিতাবের (অর্থাৎ, মূল ফিকহ গ্রন্থের) মতোই এসেছে। তাই আমি জানি না যে, এটি (অর্থাৎ, কিতাবের শব্দটি) কি ভুল লিপিকরণ (তাহসীফ), নাকি যা ‘আল-মুসনাদ’-এ আছে (তা ভুল)। যদি প্রথমটি (অর্থাৎ, কিতাবের শব্দটি ভুল) হয়, তবে মুসনাদের শব্দটি শায (Shadh) বরং মুনকার (Munkar) হবে, কারণ আমরা পূর্বে যে সূত্রগুলোর প্রতি ইঙ্গিত করেছি, সেগুলোর কোনোটিতেই এর উল্লেখ নেই। [১]