হাদীস বিএন


মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ





মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39775)


حدثنا هاشم بن القاسم قال: (حدثنا)(1) عكرمة بن عمار قال: حدثنا إياس بن سلمة قال: حدثني أبي قال: غزوت مع رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم هوازن فبينما نحن نتضحى، وعامتنا مشاة فينا ضعفة، إذ جاء رجل على جمل أحمر، فانتزع طلقا من (حقبه)(2) فقيد به جمله رجل شاب، ثم جاء يتغدى مع القوم، فلما رأى ضعفهم وقلة (ظهرهم)(3) خرج يعدو إلى جمله فأطلقه ثم أناخه فقعد عليه ثم خرج يركضه، واتبعه رجل من أسلم من صحابة النبي صلى الله عليه وسلم على ناقة ورقاء هي أمثل ظهر القوم، فقعد فاتبعه، فخرجت (أعدو)(4) فأدركته ورأس الناقة
عند ورك الجمل وكنت عند ورك الناقة، (ثم)(5) تقدمت حتى أخذت بخطام الجمل فأنخته، فلما وضع ركبتيه بالأرض اخترطت سيفي
فأضرب رأسه، فندر فجئت (براحلته)(6) وما عليها (أقوده)(7) فاستقبل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
مقبلا فقال: "من قتل الرجل؟ " فقالوا: ابن الأكوع، فنفله سلبه(8).




সালামা ইবনুল আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে হাওয়াজিন যুদ্ধে অংশ নিয়েছিলাম। আমরা যখন সকালের নাস্তা করছিলাম, আমাদের অধিকাংশ লোক ছিল পদাতিক এবং আমাদের মধ্যে দুর্বল লোকেরাও ছিল। এমন সময় এক ব্যক্তি একটি লাল উটের পিঠে চড়ে এলো। সে তার কোমরের পেটি থেকে একটি রশি বের করে এক যুবককে দিয়ে তার উটটিকে বাঁধলো। এরপর সে লোকদের সাথে বসে খাবার খেতে শুরু করল।

যখন সে তাদের দুর্বলতা এবং তাদের আরোহণের পশুর স্বল্পতা দেখল, তখন সে দৌড়ে তার উটের কাছে গেল, সেটিকে মুক্ত করল, বসাল এবং তার পিঠে চড়ে দ্রুত হাঁকিয়ে চলে গেল।

তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীদের মধ্য থেকে আসলাম গোত্রের একজন লোক তার পিছু নিল। লোকটি একটি ধূসর বর্ণের উটনীর পিঠে আরোহণ করেছিল যা ছিল দলের আরোহণের পশুর মধ্যে শ্রেষ্ঠ। (লোকটি) বসে পড়ল এবং তার পিছু ধাওয়া করল।

আমিও দৌড়ে বের হলাম এবং তাকে ধরে ফেললাম। (তখন) উটনীর মাথা উটের কোমরের কাছে ছিল এবং আমি ছিলাম উটনীর কোমরের কাছে। এরপর আমি আরও এগিয়ে গেলাম এবং উটের লাগাম ধরে তাকে বসালাম। যখন উটটি মাটিতে হাঁটু রাখল, আমি আমার তলোয়ার কোষমুক্ত করে তার (লোকটির) মাথায় আঘাত করলাম, ফলে তা বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল।

আমি তার আরোহণের পশু ও তার সাথে থাকা মালামালসহ সেটিকে টেনে নিয়ে এলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (ফিরতি পথে) সামনে আসলেন এবং জিজ্ঞেস করলেন: "লোকটিকে কে হত্যা করেছে?" সাহাবীরা বললেন: ইবনুল আকওয়া। তখন তিনি তার (নিহত ব্যক্তির) সওয়ারি ও মালামাল তাকে (সালামাকে) প্রদান করলেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع، ي]: (أخبرنا).
(2) في [أ، ب]: (جفنة).
(3) في [س]: (سهرهم).
(4) في [أ، ب]: (أغذو)، وفي [ع]: (أعذوا)، وفي [هـ]: (أعد).
(5) في [ق، هـ]: (وكنت).
(6) في [ع]: (براحلتها).
(7) في [ق]: (أقودها).
(8) صحيح؛ أخرجه مسلم (1754)، وأحمد (16523)، وأصله عند البخاري
(3051).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39776)


حدثنا عفان (حدثنا)(1) وهيب (حدثنا)(2) عمرو بن يحيى عن عباد بن تميم عن عبد اللَّه بن زيد قال: لما أفاء اللَّه
على رسوله يوم حنين ما أفاء قسم في

الناس في
المؤلفة قلوبهم، ولم يقسم ولم يعط الأنصار
شيئًا، فكأنهم وجدوا إذ لم يصيبهم ما أصاب الناس، فخطبهم فقال: "يا معشر الأنصار! ألم أجدكم ضلالا فهداكم اللَّه بي، وكنتم متفرقين فجمعكم اللَّه بي، وعالة فأغناكم اللَّه بي"، قال: كلما قال شيئا قالوا: اللَّه ورسوله أمنُّ، قال: "فما يمنعكم أن تجيبوا؟ " قالوا: اللَّه ورسوله أمنُّ، قال: "لو شئتم قلتم: جئتنا كذا وكذا، أما ترضون أن يذهب الناس بالشاة والبعير، وتذهبون برسول(3) اللَّه إلى رحالكم، (لولا)(4) الهجرة لكنت
امرأ من الأنصار، لو سلك الناس واديا أو شعبا لسلكت وادي الأنصار وشعبهم، الأنصار شعار والناس دثار، وإنكم ستلقون بعدي
أثرة فاصبروا حتى تلقوني على الحوض"(5).




আব্দুল্লাহ ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

যখন আল্লাহ তাআলা হুনাইনের দিন তাঁর রাসূলের উপর যা কিছু দান করলেন, তখন তিনি (রাসূলুল্লাহ সাঃ) সেগুলোকে মানুষের মাঝে—বিশেষত যাদের হৃদয় আকৃষ্ট করা প্রয়োজন (মুয়াল্লাফাতুল কুলুব)—তাদের মাঝে বণ্টন করলেন। তিনি আনসারদের কিছুই দিলেন না বা ভাগ করলেন না। এতে তারা যেন কিছুটা মনঃক্ষুণ্ণ হলেন, কারণ অন্যদের যা মিলেছে, তারা তা পাননি।

অতঃপর তিনি তাঁদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "হে আনসার সম্প্রদায়! আমি কি তোমাদের এমন অবস্থায় পাইনি যে, তোমরা ছিলে পথভ্রষ্ট, অতঃপর আল্লাহ আমার মাধ্যমে তোমাদেরকে হেদায়েত দিয়েছেন? আর তোমরা ছিলে বিচ্ছিন্ন, অতঃপর আল্লাহ আমার মাধ্যমে তোমাদেরকে একত্রিত করেছেন? আর তোমরা ছিলে অভাবগ্রস্ত, অতঃপর আল্লাহ আমার মাধ্যমে তোমাদেরকে সচ্ছল করেছেন?"

বর্ণনাকারী বলেন: যখনই তিনি কোনো কথা বলতেন, তারা (আনসারগণ) বলতেন, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সবচেয়ে বেশি অনুগ্রহশীল।" তিনি বললেন, "তবে তোমাদের উত্তর দিতে কিসে বাধা দিচ্ছে?" তারা বললেন, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই সবচেয়ে বেশি অনুগ্রহশীল।"

তিনি বললেন: "তোমরা চাইলে বলতে পারতে যে, আপনি আমাদের কাছে এমন এমন অবস্থায় এসেছিলেন। তোমরা কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, লোকেরা ভেড়া ও উট নিয়ে যাক, আর তোমরা আল্লাহ্‌র রাসূলকে নিয়ে তোমাদের ঘরে ফিরে যাও? যদি হিজরত না থাকত, তবে আমিও আনসারদের একজন হতাম। যদি লোকেরা কোনো উপত্যকা বা গিরিপথে চলে, তবে আমি আনসারদের উপত্যকা ও গিরিপথেই চলব। আনসারগণ হলো ভিতরের পোশাক (শعار) আর অন্য মানুষ হলো বাইরের পোশাক (দিসার)। আর নিশ্চয়ই তোমরা আমার পরে পক্ষপাতিত্ব (আছারা) বা বৈষম্য দেখতে পাবে। অতএব, তোমরা ধৈর্য ধারণ করো, যতক্ষণ না তোমরা হাউজে (কাউসারে) আমার সাথে মিলিত হও।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ي]: (أخبرنا).
(2) في [أ، ب]: (أخبرنا).
(3) في [جـ، ي]: زيادة ﷺ.
(4) في [أ]: (لولى).
(5) صحيح؛ أخرجه البخاري (4330)، ومسلم (1061).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39777)


(حدثنا أبو بكر قال)(1): (حدثنا)(2) هاشم بن القاسم (أبو)(3) (النضر)(4) قال: (حدثنا)(5) عكرمة بن عمار قال: حدثني إياس بن سلمة

عن أبيه قال: قدمت المدينة (من)(6) الحديبية مع
النبي صلى الله عليه وسلم، فخرجت أنا ورباح غلام (رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، بعثه رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم مع الإبل وخرجت معه بفرس طلحة)(7) (أبديه)(8) مع الإبل.
 
فلما كان
بغلس أغار عبد الرحمن بن عيينة على أبل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
فقتل (راعيها)(9) وخرج يطرد بها هو وأناس معه في خيل، فقلت: يا رباح، أقعد على هذا الفرس فألحقه بطلحة وأخبر
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قد أغير على سرحه، قال: فقمت على تل وجعلت وجهي من قبل المدينة ثم ناديت ثلاث مرات: يا صباحاه.
 
ثم اتبعت
القوم معي سيفي ونبلي فجعلت
أرميهم وأعقر بهم، وذاك حين يكثر (الشجر)(10)، قال: فإذا رجع إليَّ فارس جلست له في أصل شجرة ثم رميت فلا يقبل علي فارس إلا عقرت به، فجعلت أرميهم وأقول:
أنا ابن الأكوع … (واليوم)(11) يوم الرضع
(فألحق برجل فأرميه
وهو على رحله فيقع سهمي في الرجل، حتى انتظمت كتفه قلت: خذها)(12):
(أنا ابن الأكوع … واليوم يوم الرضع)(13)

فإذا كنت
في الشجرة أحرقتهم بالنبل، وإذا (تضايقت)(14) الثنايا علوت الجبل (فرديتهم)(15) بالحجارة.
 
فما زال ذلك شأني وشأنهم: أتبعهم وأرتجز حتى ما خلق اللَّه شيئا من ظهر النبي صلى الله عليه وسلم إلا خلفته وراء ظهري، واستنقذته من أيديهم، قال: ثم لم أزل أرميهم حتى ألقوا أكثر من ثلاثين رمحا وأكثر من ثلاثين بردة، يستخفون منها، ولا يلقون من ذلك شيئا إلا جعلت عليه(16) (الحجارة)(17) وجمعته على طريق رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
 
حتى إذا امتد الضحى أتاهم
عيينة بن بدر الفزاري ممدًا لهم وهم في ثنية ضيقة، ثم علوت الجبل فأنا فوقهم، قال عيينة: ما هذا الذي أرى؟ قالوا: لقينا من هذا البَرَح، ما (فارقنا)(18) (بسحر)(19) حتى الآن، وأخذ كل شيء في أيدينا وجعله وراء ظهره، فقال عيينة: لولا أن هذا يرى أن وراءه طلبا لقد ترككم، قال: ليقم إليه نفر منكم.
 
فقام إليَّ نفر منهم أربعة فصعدوا في الجبل، فلما أسمعتهم الصوت قلت لهم: أتعرفوني؟ قالوا: ومن أنت؟ قلت: أنا ابن الأكوع، والذي كرم وجه محمد(20) لا يطلبني رجل منكم فيدركني، ولا أطلبه فيفوتني، قال رجل منهم: أظن.

 
قال: فما برحت مقعدي ذاك حتى نظرت إلى فوارس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
يتخللون الشجر، وإذا أولهم الأخرم الأسدي، وعلى أثره أبو قتادة فارس رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وعلى أثر أبي قتادة: المقداد الكندي، قال: فولوا المشركين مدبرين، وأنزل من الجبل فأعرض للأخرم فآخذ عنان فرسه، قلت: يا أخرم! أنذر بالقوم
-يعني أحذرهم، فإني لا آمن أن يقطعوك، فاتئد حتى يلحق (رسول اللَّه)(21) صلى الله عليه وسلم(22) وأصحابه، قال: يا سلمة! إن كنت تؤمن باللَّه واليوم الآخر، وتعلم أن الجنة حق والنار حق فلا تحل بيني وبين الشهادة.
 
قال: فخليت عنان فرسه فيلحق بعبد الرحمن بن عيينة ويعطف عليه عبد الرحمن فاختلفا طعنتين فعقر الأخرم
بعبد الرحمن، وطعنه عبد الرحمن فقتله، وتحول عبد الرحمن على فرس الأخرم، (فيلحق)(23) أبو قتادة بعبد الرحمن واختلفا طعنتين فعقر
بأبي قتادة، وقتله أبو قتادة، وتحول أبو قتادة على فرس الأخرم.
 
ثم إني خرجت أعدو في أثر القوم حتى ما أرى من غبار صحابة النبي
صلى الله عليه وسلم شيئًا، ويعرضون قبل
غيبوبة الشمس إلى شعب فيه ماء يقال له: ذو قرد، فأرادوا أن يشربوا منه فأبصروني أعدو وراءهم، فعطفوا عنه وشدوا في الثنية ثنية ذي (ثبير)(24) وغربت الشمس فألحق
(بهم)(25) رجلًا فأرميه، فقلت: خذها:
وأنا ابن
الأكوع … (اليوم)(26) يوم الرضع

فقال: يا ثكلتني أمي أكوعي بكرة، قلت: نعم أي عدو نفسه، وكان الذي رميته بكرة فأتبعته بسهم آخر، فعلق فيه سهمان (وتخلفوا)(27) فرسين.
 
فجئت بهما أسوقهما إلى
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو على الماء الذي (خلأتهم)(28) عنه (ذي)(29) قرد، فإذا نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم في (خمسمائة)(30)، وإذا بلال قد نحر جزورا مما خلفت، فهو (يشوي)(31) لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
من كبدها وسنامها.
 
فأتيت رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
فقلت: يا رسول اللَّه
خلني، فأنتخب من أصحابك مائة رجل فآخذ على الكفار بالعشوة فلا يبقى منهم مخبر إلا قتلته، قال: "أكنت فاعلا ذاك يا سلمة؟ " قال: نعم، والذي أكرم وجهك، فضحك رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم حتى رأيت نواجذه في ضوء (النار)(32)، قال: ثم قال: "يقرون الآن بأرض غطفان"، فجاء رجل من غطفان قال: مروا على فلان الغطفاني، (فنحر)(33) لهم جزورًا، فلما أخذوا يكشطون جلدها رأوا غبرة فتركوها وخرجوا هرابا.
 
فلما أصبحنا قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: "خير فرساننا اليوم أبو قتادة، وخير رجالتنا سلمة"، فأعطاني رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم سهم الفارس والراجل جميعًا، ثم أردفني وراءه على العضباء
راجعين إلى المدينة، فلما كان بيننا وبينها قريب من ضحوة وفي القوم رجل من الأنصار، كان لا يسبق فجعل ينادي: (هل من مسابق)(34)، ألا رجل

يسابق إلى المدينة، فعل ذلك مرارا، وأنا وراء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم مردفًا، قلت له: (أما)(35) تكرم كريما ولا تهاب شريفًا، قال: لا، إلا رسول اللَّه(36)، قلت: يا رسول (اللَّه)(37) -بأبي أنت وأمي- خلني، (فلأسابق)(38) الرجل، قال: "إن شئت قلت: أذهب إليك"، (فطفر)(39) عن راحلته وثنيت رجلي فطفرت عن الناقة، (ثم)(40) إني ربطت (عليه)(41) شرفًا أو شرفين، يعني استبقيت نفسي، ثم إني (عدوت)(42) حتى ألحقه فأصك بين كتفيه بيدي، فقلت: سبقتك واللَّه أو كلمة نحوها، قال: فضحك (وقال: (إن)(43) أظن)(44) حتى قدمنا المدينة(45).




সালামাহ ইবনুল আকওয়া’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

আমি হুদাইবিয়া থেকে নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে মদীনায় এলাম। অতঃপর আমি ও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর গোলাম রাবাহ—যাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উটগুলির সাথে পাঠিয়েছিলেন—বের হলাম। আমি তালহার একটি ঘোড়া নিয়ে উটগুলির সাথে বের হলাম।

যখন ভোরের আলো সবেমাত্র ফুটতে শুরু করেছে, তখন আবদুর রহমান ইবনে উয়াইনা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর উটগুলির ওপর আক্রমণ করে বসলো এবং রাখালটিকে হত্যা করলো। সে ও তার সঙ্গী ঘোড়সওয়াররা উটগুলো তাড়িয়ে নিয়ে যাচ্ছিল। আমি বললাম: হে রাবাহ! এই ঘোড়াটির ওপর চড়ে তালহার কাছে যাও এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে খবর দাও যে তাঁর পশুসম্পদের ওপর আক্রমণ করা হয়েছে। তিনি (সালামাহ) বললেন: এরপর আমি একটি টিলার ওপর দাঁড়ালাম এবং আমার মুখ মদীনার দিকে ফিরিয়ে তিনবার উচ্চস্বরে ডাক দিলাম: ‘ইয়া সবাহাহ!’ (হায় সকালের বিপদ!)

এরপর আমি আমার তলোয়ার ও তীর নিয়ে ওই দলের পিছু ধাওয়া করলাম এবং তাদের ওপর তীর নিক্ষেপ করতে ও তাদের ঘোড়ার পা কেটে দিতে লাগলাম। এটা ছিল এমন সময়, যখন গাছপালা বেশি ছিল। যখন কোনো অশ্বারোহী আমার দিকে ফিরে আসত, আমি একটি গাছের গোড়ায় বসে পড়তাম এবং তীর ছুড়তাম। যে অশ্বারোহীই আমার দিকে আসত, আমি তার ঘোড়ার পা কেটে দিতাম। আমি তীর নিক্ষেপ করছিলাম আর বলছিলাম:

“আমি ইবনুল আকওয়া’...
আজ হলো দুধ খাওয়ানোর দিন।”

আমি এক ব্যক্তির কাছে পৌঁছালাম এবং সে তার হাওদার ওপর থাকা অবস্থায় তাকে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করলাম। আমার তীরটি তার কাঁধে গিয়ে বিদ্ধ হলো। তার কাঁধের জোড় পর্যন্ত তীরটি গেঁথে গেল। আমি বললাম: “এটা নাও! আমি ইবনুল আকওয়া’... আজ হলো দুধ খাওয়ানোর দিন।”

যখন আমি গাছের আড়ালে থাকতাম, তখন তীর মেরে তাদের জ্বলিয়ে দিতাম। আর যখন গিরিপথগুলো সরু হতো, আমি পাহাড়ের ওপর উঠে যেতাম এবং পাথর ছুঁড়ে তাদের হটিয়ে দিতাম।

এভাবে আমার ও তাদের অবস্থা চলতে থাকল: আমি তাদের ধাওয়া করতে লাগলাম এবং রাজায (যুদ্ধকবিতা) আবৃত্তি করতে লাগলাম, যতক্ষণ না আল্লাহ তাআলা যা সৃষ্টি করেছেন, তার মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সমস্ত উট (বা পশুসম্পদ) তাদের হাত থেকে উদ্ধার করে আমার পেছনে রেখে দিলাম। তিনি বললেন: এরপর আমি তাদের দিকে তীর মারতে লাগলাম, যতক্ষণ না তারা হালকা হওয়ার জন্য ত্রিশটিরও বেশি বর্শা এবং ত্রিশটিরও বেশি চাদর ফেলে দিল। যখনই তারা কিছু ফেলে দিত, আমি তার ওপর পাথর চাপা দিতাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর রাস্তার ওপর তা জমা করে রাখতাম।

এভাবে যখন দিনের বেলা অনেকটা গড়িয়ে গেল, তখন উয়াইনা ইবনে বদর আল-ফাযারি তাদের সাহায্যার্থে এলো। তারা তখন একটি সরু গিরিপথে ছিল। আমি পাহাড়ের ওপর উঠে গেলাম, ফলে আমি তাদের ওপরে ছিলাম। উয়াইনা জিজ্ঞেস করলো: ‘এ কী দেখছি?’ তারা বলল: ‘ভোর থেকে এই লোকটি আমাদের এমন দুর্দশায় ফেলেছে যে এখনও সে আমাদের ছাড়েনি। সে আমাদের হাতে থাকা সবকিছু নিয়ে নিজের পেছনে রেখে দিয়েছে।’ উয়াইনা বললো: ‘এই ব্যক্তি যদি না ভাবত যে তার পেছনে সাহায্য আসছে, তবে সে তোমাদের ছেড়ে যেত।’ সে বলল: ‘তোমাদের মধ্যে থেকে কয়েকজন তার দিকে যাও।’

এরপর তাদের মধ্যে থেকে চারজন লোক আমার দিকে এলো এবং পাহাড়ে উঠতে শুরু করল। যখন আমি তাদের কাছে শব্দ পৌঁছাতে পারলাম, তখন বললাম: ‘তোমরা কি আমাকে চেনো?’ তারা বলল: ‘তুমি কে?’ আমি বললাম: ‘আমি ইবনুল আকওয়া’। মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর চেহারার মর্যাদা দানকারীর শপথ! তোমাদের কোনো লোকই আমাকে ধাওয়া করে ধরতে পারবে না, আর আমি যাকে ধাওয়া করব সেও আমার হাত থেকে পালাতে পারবে না।’ তাদের একজন বলল: ‘আমি তাই মনে করি।’

আমি আমার সেই অবস্থান থেকে সরলাম না, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর অশ্বারোহীদের গাছের মধ্য দিয়ে আসতে দেখলাম। তাদের অগ্রভাগে ছিলেন আল-আখরাম আল-আসাদি, তাঁর পেছনে ছিলেন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর অশ্বারোহী আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), এবং আবু কাতাদার পেছনে ছিলেন আল-মিকদাদ আল-কিন্দি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি (সালামাহ) বললেন: তারা মুশরিকদের দিকে মুখ ফেরালেন। আমি পাহাড় থেকে নামলাম এবং আখরামের সামনে এসে তার ঘোড়ার লাগাম ধরলাম। আমি বললাম: ‘হে আখরাম! এদের বিষয়ে সতর্ক হোন—অর্থাৎ তাদের বিষয়ে সাবধান হোন—আমি নিরাপদ বোধ করছি না যে তারা আপনাকে ছিন্নভিন্ন করে দেবে। আপনি ধীরে চলুন, যাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও তাঁর সাহাবীগণ এসে পৌঁছাতে পারেন।’ তিনি বললেন: ‘হে সালামাহ! যদি আপনি আল্লাহ ও শেষ দিবসের ওপর ঈমান রাখেন, এবং জানেন যে জান্নাত সত্য ও জাহান্নাম সত্য, তবে আমার ও শাহাদাতের মাঝে বাধা সৃষ্টি করবেন না।’

আমি তার ঘোড়ার লাগাম ছেড়ে দিলাম। তিনি আবদুর রহমান ইবনে উয়াইনার কাছে পৌঁছালেন। আবদুর রহমান তার দিকে ফিরে এলো। দুজনের মধ্যে দুবার বর্শার আঘাত বিনিময় হলো। আখরাম আবদুর রহমানের ঘোড়ার পা কেটে দিলেন, আর আবদুর রহমান তাকে বর্শা মেরে হত্যা করলো। আবদুর রহমান আখরামের ঘোড়ায় সওয়ার হলো। এরপর আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবদুর রহমানের কাছে পৌঁছালেন। দুজনের মধ্যে দুবার আঘাত বিনিময় হলো। আবু কাতাদা আবদুর রহমানকে আহত করলো, আর আবু কাতাদা তাকে হত্যা করলো। আবু কাতাদা তখন আখরামের ঘোড়ায় সওয়ার হলো।

এরপর আমি তাদের পেছনে দৌড়াতে লাগলাম, এমনকি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাহাবীদের ধূলিও আর দেখতে পাচ্ছিলাম না। সূর্যাস্তের আগে তারা ‘যু কারাদ’ নামক একটি ঝর্ণার দিকে মোড় নিল। তারা সেখান থেকে পানি পান করতে চেয়েছিল। তারা আমাকে তাদের পেছনে দৌড়াতে দেখে, সেখান থেকে সরে এসে যু ছাবীর-এর গিরিপথে জোরে চলল এবং সূর্য ডুবে গেল। আমি তাদের মধ্যে থেকে একজনকে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করলাম। আমি বললাম:

“এটা নাও!
আমি ইবনুল আকওয়া’... আজ হলো দুধ খাওয়ানোর দিন।”

লোকটি বলল: ‘হায় আমার মা, আমাকে হারিয়েছে! তুমি কি সকালে ইবনুল আকওয়া ছিলে?’ আমি বললাম: ‘হ্যাঁ, হে নিজের শত্রুকে!’ যাকে আমি সকালে আঘাত করেছিলাম, সে ছিল সে-ই। এরপর আমি তার দিকে আরেকটি তীর নিক্ষেপ করলাম। তার গায়ে দুটি তীর বিদ্ধ হলো এবং তারা দুটি ঘোড়া ফেলে রেখে গেল। আমি ঘোড়া দুটি তাড়িয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে নিয়ে এলাম। তিনি তখন সেই পানির উৎসের কাছে ছিলেন, ‘যু কারাদ’, যেখান থেকে আমি তাদের হটিয়ে দিয়েছিলাম।

তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম পাঁচশত (সাহাবীর) সাথে ছিলেন। আর তখন বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই উটগুলির মধ্য থেকে একটি উট জবাই করলেন, যা আমি পিছনে ফেলে এসেছিলাম। তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর জন্য তার কলিজা ও চর্বিযুক্ত অংশ ভুনা (কাবাব) করছিলেন।

আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এসে বললাম: ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে অনুমতি দিন, আমি আপনার সাহাবীদের মধ্য থেকে একশত লোক নির্বাচন করে রাতের অন্ধকারে কাফিরদের ওপর আক্রমণ করব, ফলে তাদের মধ্যে আর কোনো খবর বহনকারীও জীবিত থাকবে না।’ তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তুমি কি তা করতে পারবে, হে সালামাহ?” আমি বললাম: ‘হ্যাঁ, আপনার চেহারার মর্যাদা দানকারীর শপথ!’ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হেসে উঠলেন, এমনকি আমি আগুনের আলোতে তাঁর মাড়ির দাঁত দেখতে পেলাম। তিনি বললেন: “তারা এখন গাতফান ভূমিতে গিয়ে আশ্রয় নেবে।”

এরপর গাতফান গোত্রের একজন লোক এসে বলল: ‘তারা অমুক গাতফানি লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। সে তাদের জন্য একটি উট জবাই করল। যখন তারা উটের চামড়া ছিলছিল, তখন ধুলো দেখতে পেয়ে তারা উটটি ছেড়ে দিয়ে পালিয়ে গেল।’

যখন সকাল হলো, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: “আজকের দিনে আমাদের সেরা অশ্বারোহী আবু কাতাদা, আর সেরা পদাতিক হলো সালামাহ।” এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে ঘোড়সওয়ার ও পদাতিক উভয়ের অংশই দিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে আল-আদ্ববা’ উষ্ট্রীতে তাঁর পেছনে বসিয়ে মদীনার দিকে ফিরলেন।

যখন আমরা মদীনার কাছাকাছি গেলাম—দিনের বেলা প্রায় মধ্যাহ্নের কাছাকাছি—তখন আনসারদের মধ্যে এক ব্যক্তি ছিল, যাকে কেউ দৌড়ে হারাতে পারত না। সে ডাক দিয়ে বলতে লাগল: ‘কেউ আছে কি, যে দৌড় প্রতিযোগিতায় অংশ নেবে? কেউ কি মদীনা পর্যন্ত দৌড়াতে ইচ্ছুক?’ সে বারবার এটা করল। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর পেছনে বসা ছিলাম। আমি তাকে বললাম: ‘আপনি কি কোনো সম্মানিত ব্যক্তিকে সম্মান করবেন না, আর কোনো সম্ভ্রান্ত ব্যক্তিকে ভয় করবেন না?’ সে বলল: ‘না, তবে রাসূলুল্লাহকে (সম্মান করি)।’ আমি বললাম: ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য উৎসর্গিত হোক, আমাকে অনুমতি দিন, আমি লোকটির সাথে প্রতিযোগিতা করব।’ তিনি বললেন: “যদি চাও।”

সে তার বাহন থেকে লাফিয়ে নামল। আমি আমার পা গুটিয়ে উষ্ট্রী থেকে লাফ দিলাম। এরপর আমি এক বা দুই ধাপ তার থেকে পেছনে থাকলাম (নিজেকে সামলে রাখলাম)। অতঃপর আমি দৌড়ে তার কাছে পৌঁছালাম এবং আমার হাত দিয়ে তার দুই কাঁধের মাঝখানে আঘাত করলাম। আমি বললাম: ‘আল্লাহর কসম! আমি আপনাকে হারিয়ে দিয়েছি’—কিংবা এ ধরনের কোনো কথা বললাম। তিনি (আনসারী লোকটি) হেসে দিলেন। এমনকি আমরা মদীনায় পৌঁছা পর্যন্ত তিনি হাসতে থাকলেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) سقط من: [جـ، ق،
ي].
(2) في [ع]: (أخبرنا).
(3) في [ب]: (ابن).
(4) في [أ، ب،
ق، ع، هـ]: (النصر).
(5) في [ع]: (أخبرنا).
(6) في [هـ]: (زمن).
(7) سقط من: [أ، ب،
جـ، ع، ي].
(8) أي: أخرج به للبادية، وفي [س، ع]: (أنديه)، وفي [ي]: (أبذيه).
(9) في [جـ]: (اعيها).
(10) في [أ، ب]: (السخر).
(11) هكذا في: [ق، هـ]، وفي بقية النسخ: (اليوم).
(12) سقط من: [ع].
(13) سقط من: [ع].
(14) سقط من: [أ، ب].
(15) في [جـ]: (فرداتهم).
(16) في [هـ]: زيادة (آرامًا من).
(17) سقط من: [أ، ب،
جـ، س، ي].
(18) في [أ، ب]: (فارقت).
(19) في [أ، ب]: (السجر)، وفي [جـ]: (بشجر).
(20) في [جـ]: زيادة ﷺ.
(21) في [ع]: (برسول اللَّه).
(22) سقط من: [ق، هـ].
(23) في [جـ، ع]: (فلحق).
(24) في [ط، ع]: (تبير)، وفي [هـ]: (بئر).
(25) في [ع]: (منهم).
(26) في [هـ]: (واليوم).
(27) في [ع]: (ويخلفوا).
(28) في [س، ق،
ع، ي]: (جلاتهم)، وفي [هـ]: (جلينهم).
(29) في [ع]: (ذو).
(30) في [س]: (خمس ماية).
(31) في [أ، ب]: (نشوي).
(32) في [ب، س]: (النيار)، وفي [هـ]: (النهار).
(33) في [جـ]: (نحر).
(34) في [أ، ب]: (هل يسابق).
(35) في [ع]: (الماء).
(36) في [أ، ب،
س، ي]: زيادة ﷺ.
(37) سقط من: [ط، ق،
هـ].
(38) في [ب]: (فلأسايق).
(39) في [ي]: (فظفر).
(40) سقط من: [ع].
(41) في [ق، هـ]: (عليها).
(42) في [أ، ب]: (غدوت).
(43) في [ع]: (أني).
(44) في [أ، ب،
جـ، ع، ي]: (إن أظن وقال).
(45) صحيح؛ أخرجه مسلم (1807)، وابن حبان (7175) من طريق المؤلف، وأخرجه أحمد 4/ 52 (16539).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39778)


حدثنا وكيع (حدثنا)(1) سفيان عن أبي بكر بن أبي الجهم بن (صخير)(2) العدوي عن عبيد اللَّه بن عبد اللَّه بن (عتبة)(3) عن ابن عباس قال:

صلى رسول
اللَّه صلى الله عليه وسلم صلاة الخوف بذي قرد أرض من (أرض)(4) بني سليم، فصف الناس خلفه صفين: صف خلفه، وصف (موازي)(5) العدو، فصلى بالصف الذي يليه ركعة، ثم نهض هؤلاء إلى مصاف هؤلاء، وهؤلاء إلى مصاف هؤلاء، فصلى بهم ركعة(6).




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:
রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বানু সুলাইম গোত্রের অধীনস্থ যূ-কারাদ নামক স্থানে সালাতুল খাওফ (ভয়ের সালাত) আদায় করলেন। তখন লোকেরা তাঁর পিছনে দুটি সারিতে কাতারবদ্ধ হলো: একটি কাতার তাঁর ঠিক পিছনে এবং অন্য একটি কাতার শত্রুর মুখোমুখি হয়ে দাঁড়ালো। অতঃপর তিনি তাঁর নিকটবর্তী সারির লোকেদেরকে নিয়ে এক রাক’আত সালাত আদায় করলেন। এরপর এই (প্রথম) কাতারটি উঠে গিয়ে ওই (দ্বিতীয়) কাতারটির স্থানে গেল এবং ওই (দ্বিতীয়) কাতারটি এসে এই (প্রথম) কাতারটির স্থানে দাঁড়াল। অতঃপর তিনি তাদেরকে (দ্বিতীয় কাতারকে) নিয়েও এক রাক’আত সালাত আদায় করলেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (أخبرنا).
(2) في [ع]: (صخيرة).
(3) في [ع]: (عبتة).
(4) في [ع]: (أرضًا).
(5) في [ع]: (يوازي).
(6) صحيح؛ أخرجه أحمد (2063)، وابن حبان (2871)، والحاكم 1/ 335، والنسائي 3/
169، وعبد الرزاق (4251)،
وابن خزيمة (1344)، والطحاوي 1/ 309، والطبري 5/
248، والبيهقي 3/
262.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39779)


حدثنا وكيع (حدثنا)(1) سفيان عن الركين (الفزاري)(2) عن القاسم بن حسان عن زيد بن ثابت أن رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم صلى صلاة الخوف -فذكر مثل حديث ابن عباس(3).




যায়িদ ইবনে সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সলাতুল খাওফ (ভয়ের সময়ের সালাত) আদায় করেছিলেন – এরপর (বর্ণনাকারী) ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (أخبرنا).
(2) في [ع]: (الفزازي).
(3) حسن؛ القاسم بن حسان صدوق، أخرجه أحمد (21593)، وابن خزيمة (1345)، وابن حبان (2870)، وعبد الرزاق
(4250)، والطحاوي 1/ 310، والطبراني (4919)، والبيهقي 3/
262.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39780)


حدثنا عبد اللَّه بن المبارك عن معمر عن الزهري عن عبد الرحمن بن كعب (بن مالك)(1) عن أبيه قال: كان رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم إذا أراد غزوة (ورّى)(2) بغيرها

حتى كان غزوة تبوك، سافر رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في حر شديد واستقبل سفرا بعيدا، فجلى للمسلمين عن
أمرهم وأخبرهم بذلك ليتأهبوا أهبة (عدوهم)(3) وأخبرهم بالوجه الذي
يريد(4).




কা’ব ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো যুদ্ধের (গাজওয়াহ) ইচ্ছা করতেন, তখন তিনি (প্রকৃত স্থান গোপন করে) ভিন্ন কিছুর ইংগিত দিতেন। কিন্তু তাবুক যুদ্ধের সময় বিষয়টি ভিন্ন ছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রচণ্ড গরমে এবং অনেক দীর্ঘ পথ পাড়ি দেওয়ার উদ্দেশ্যে সফর করেছিলেন। তাই তিনি মুসলিমদের কাছে তাদের ব্যাপারটি স্পষ্ট করে দিলেন এবং সে বিষয়ে তাদের জানিয়ে দিলেন, যেন তারা তাদের শত্রুর মোকাবিলার জন্য পুরোপুরি প্রস্তুত হতে পারে। আর তিনি তাদের সেই দিকটিও জানিয়ে দিলেন, যেদিকে তিনি যেতে চাচ্ছিলেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) سقط من: [أ، هـ].
(2) في [أ، ب]: (وسمى).
(3) في [ع]: (غدوهم).
(4) صحيح؛ أخرجه البخاري (2949)، ومسلم (2769).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39781)


حدثنا عفان (حدثنا)(1) وهيب (حدثنا)(2) عمرو بن يحيى عن العباس ابن سهل بن سعد الساعدي عن أبي حميد الساعدي قال: خرجنا مع رسول اللَّه صلى اللَّه عليه أوسلم عام تبوك حتى (جئنا)(3) وادي القرى، وإذا امرأة في حديقة لها، (فقال)(4) رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم(5): "اخرصوا"، (قال)(6): (فخرص)(7) القوم، (وخرص)(8) رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
عشرة أوسق، وقال للمرأة: "أحصي ما يخرج منها حتى أرجع إليك إن شاء اللَّه".
 
(قال)(9): فخرج رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم حتى قدم تبوك، فقال: "إنها ستهب عليكم الليلة ريح شديدة، فلا يقومن (رجل فيها)(10)، فمن كان له بعير فليوثق
عقاله"، قال: قال أبو حميد: فعقلناها، فلما كان من الليل هبت ريح شديدة، فقام

فيها رجل
فألقته في (جبلي)(11) طيء.
 
ثم جاء رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
إلى ملك أيلة، فأهدى إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بغلة بيضاء، فكساه رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بردا، (وكتب)(12) له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم(13) ببحرهم، قال: ثم أقبل وأقبلنا معه حتى جئنا وادي القرى، فقال (للمرأة)(14): "كم حديقتك؟ " قالت: عشرة أوسق، خرص رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
 
(قال)(15) (رسول اللَّه)(16) صلى الله عليه وسلم(17): "إني متعجل فمن أحب منكم أن يتعجل فليفعل"، قال: فخرج رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم وخرجنا معه، حتى إذا (أوفى)(18) على المدينة قال: "هذه طابة"، فلما رأى أحدا قال: "هذا جبل يحبنا ونحبه"(19).




আবু হুমাইদ আস-সাঈদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে তাবুক যুদ্ধের বছর বের হলাম, অবশেষে আমরা ওয়াদিল কুরা নামক স্থানে পৌঁছলাম। সেখানে আমরা একটি মহিলাকে তার বাগানে পেলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমরা এর (ফলের পরিমাণ) অনুমান করো।" তিনি বলেন: তখন লোকেরা অনুমান করলো এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম অনুমান করলেন দশ ওয়াসাক (পরিমাণ খেজুর)। তিনি মহিলাকে বললেন: "ইনশাআল্লাহ আমি তোমার কাছে ফিরে আসা পর্যন্ত এর থেকে যা উৎপন্ন হয়, তা হিসাব করে রাখবে।"

তিনি বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাবুকে পৌঁছা পর্যন্ত যাত্রা করলেন। সেখানে তিনি বললেন: "নিশ্চয় আজ রাতে তোমাদের উপর প্রচণ্ড বাতাস প্রবাহিত হবে। সুতরাং কেউ যেন এর মধ্যে দাঁড়িয়ে না থাকে। আর যার উট আছে, সে যেন তার রশি শক্ত করে বেঁধে রাখে।" আবু হুমাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা সেগুলোকে বেঁধে রাখলাম। যখন রাত হলো, প্রচণ্ড বাতাস প্রবাহিত হলো। তখন একজন লোক দাঁড়িয়েছিল, ফলে বাতাস তাকে তাঈ গোত্রের দুই পাহাড়ের মধ্যে নিক্ষেপ করলো।

এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আইলাহ্ (Ailah)-এর বাদশাহর কাছে এলেন। সে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে একটি সাদা খচ্চর উপহার দিলো। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে একটি চাদর পরিয়ে দিলেন এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার জন্য তাদের সমুদ্রের (শুল্ক/অধিকার) বিষয়ে লিখে দিলেন। তিনি বলেন: এরপর তিনি ফিরে এলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে ফিরে এলাম, যতক্ষণ না আমরা ওয়াদিল কুরাতে পৌঁছলাম। তিনি মহিলাটিকে বললেন: "তোমার বাগানে কত ফলন হয়েছে?" মহিলাটি বলল: দশ ওয়াসাক, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম অনুমান করেছিলেন।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "আমি দ্রুত মদীনার দিকে যেতে চাই। তোমাদের মধ্যে যে দ্রুত যেতে পছন্দ করে, সে যেন তা করে।" তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বেরিয়ে পড়লেন এবং আমরাও তাঁর সাথে বের হলাম। যখন তিনি মদীনার কাছাকাছি হলেন, তখন বললেন: "এটা হলো ত্বাবাহ (মদীনার নাম)।" যখন তিনি উহুদ পাহাড় দেখলেন, তখন বললেন: "এই পাহাড় আমাদের ভালোবাসে এবং আমরাও তাকে ভালোবাসি।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (أخبرنا).
(2) في [ع]: (أخبرنا).
(3) في [س]: (جاء)، وفي [ط]: (أتى).
(4) في [ب، جـ، ع،
ي]: (قال).
(5) سقط ما بين المعكوفين من: [أ].
(6) سقط من: [ع].
(7) في [أ]: (فحرض).
(8) في [أ، ب]: (وحرض).
(9) سقط من: [س].
(10) في [جـ، ع،
ي]: (فيها رجل).
(11) في [ق، هـ]: (جبل).
(12) في [ع]: (فكتب).
(13) سقط من: [ع].
(14) سقط من: [ع].
(15) في [ع]: (فقال).
(16) في [أ، ب]: (يا رسول اللَّه).
(17) سقط من: [ع].
(18) في [ع]: (وافا).
(19) صحيح؛ أخرجه البخاري (1481)، ومسلم (1392).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39782)


حدثنا خالد بن مخلد (حدثنا)(1) عبد الرحمن بن عبد العزيز الأنصاري قال: حدثني ابن شهاب قال: حدثني عبد الرحمن بن عبد اللَّه بن كعب بن مالك(2) عن أبيه كعب قال: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما همّ ببني الأصفر أن (يغزوهم)(3) (جلّى)(4)

للناس أمرهم؟ وكان قل ما أراد غزوة إلا ورّى عنها بغيرها، حتى كانت (تلك)(5) الغزوة، فاستقبل حرا شديدا وسفرا (بعيدًا)(6) وعدوا (حديدًا)(7)، فكشف للناس الوجه
الذي (خرج)(8) بهم إليه ليتأهبوا أهبة (عدوهم)(9).
 
فتجهز رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
وتجهز الناس معه، (وطفقت)(10) أغدو لأتجهز
فأرجع ولم أقض شيئًا؛ حتى فرغ الناس وقيل: إن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم غادٍ وخارج إلى وجهه، فقلت: (أتجهز)(11) بعده (بيوم)(12) أو (يومين)(13) ثم أدركهم، وعندي راحلتان، ما اجتمعت عندي
راحلتان (قط قبلهما)(14) فأنا قادر في نفسي، قوي بعدتي.
 
فما زلت أغدو بعده وأرجع ولم أقض شيئا حتى أمعن القوم وأسرعوا، وطفقت أغدو للحديث، (وشغلني)(15) (الرجال)(16)، فأجمعت القعود حتى سبقني القوم، وطفقت أغدو فلا أرى ((الأسي)(17)، لا أرى)(18) إلا رجلًا ممن عذر اللَّه أو رجلا مغموصًا عليه في النفاق، فيحزنني ذلك، فطفقت أعد العذر

لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم إذا (جاء)(19) وأهيئ الكلام.
 
وقدّر (برسول)(20) اللَّه صلى الله عليه وسلم
أن لا يذكرني حتى نزل تبوك، فقال في الناس بتبوك وهو جالس: "ما فعل كعب بن مالك؟ " فقام إليه رجل من قومي فقال: شغله برداه والنظر في عطفيه، (قال)(21): فتكلم رجل آخر فقال: واللَّه -يا رسول اللَّه- إن علمنا(22) إلا خيرًا، (فصمت)(23) رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم.
 
فلما قيل: إن رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم (قد أظل)(24) قادمًا (زاغ)(25) عني الباطل وما كنت أجمع من الكذب والعذر، وعرفت أنه لن ينجيني منه إلا الصدق، فأجمعت صدقه.
 
وصبح رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
المدينة فقدم، فغدوت إليه فإذا هو في الناس جالس في المسجد، وكان إذا قدم من سفر دخل المسجد [(فركع)(26) فيه ركعتين، ثم دخل على أهله فوجدته
جالسًا في المسجد](27)، فلما نظر إلي دعاني فقال: "هلمَ يا كعبَ ما خلفك عني؟ " وتبسم تبسم المغضب
قال: قلت: يا رسول اللَّه
لا عذر لي، ما كنت قط أقوى ولا أيسر مني حين تخلفت عنك، وقد (جاءه)(28) المتخلفون يحلفون فيقبل منهم ويستغفر لهم ويكل سرائرهم في ذلك إلى اللَّه ﷿، فلما صدقته قال: "أما هذا فقد صدق، فقم حتى يقضى اللَّه
فيك ما هو قاض".

 
فقمت فقام إليَّ رجال من بني سلمة فقالوا: واللَّه ما صنعت شيئًا، واللَّه(29) (إن)(30) كان (لكافيك)(31) من ذنبك الذي أذنبت استغفار رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
لك كما صنع(32) ذلك (لغيرك)(33)، (فقد)(34) قبل منهم عذرهم واستغفر لهم، فما زالوا يلومونني حتى هممت أن أرجع فأكذب نفسي، ثم قلت لهم: هل قال هذه المقالةَ (أحدٌ)(35) أو (اعتذر)(36) بمثل ما اعتذرت به؟ قالوا: نعم، قلت: من؟ قالوا: هلال بن أمية الواقفي، (وربيعة بن مرارة العمري)(37)، (وذكروا)(38) لي رجلين صالحين قد شهدا بدرا قد اعتذرا بمثل الذي اعتذرت
به، (وقيل)(39) لهما مثل الذي قيل لك.
 
قال: ونهى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم عن كلامنا فطفقنا نغدو في الناس، لا يكلمنا أحد ولا يسلم علينا أحد ولا يرد علينا سلامًا، حتى إذا (وفت)(40) أربعون ليلة
جاءنا

(رسول)(41) رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
أن اعتزلوا نساءكم، فأما هلال بن أمية فجاءت امرأته إلى رسول اللَّه فقالت له: إنه شيخ قد ضعف بصره فهل تكره أن أصنع له طعامه؟ قال: "لا، ولكن لا يقربنّك"، قالت: إنه واللَّه ما به حركة إلى شيء، واللَّه ما زال يبكي منذ كان من أمره ما كان إلى (يومه)(42) هذا.
 
قال: فقال لي بعض أهلي: لو استأذنتَ
رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في امرأتك كما استأذنت
امرأة هلال بن أمية فقد أذن لها أن تخدمه، قال: (فقلت)(43): (واللَّه)(44) لا أستأذنه فيها، وما أدري ما يقول(45) رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
إن استأذنته، وهو شيخ كبير وأنا رجل شاب، فقلت لامرأتي: الحقي بأهلك
حتى يقضي اللَّه ما هو قاض.
 
وطفقنا نمشي في الناس ولا يكلمنا أحد ولا يرد علينا سلامًا، قال: فأقبلت حتى تسورت جدارا لابن عم لي في حائطه، فسلمت فما حرك شفتيه يرد علي السلام، فقلت: أنشدك (باللَّه)(46) أتعلم أني أحب اللَّه ورسوله؟ فما كلمني كلمة، ثم (عدت)(47) فلم يكلمني حتى إذا كان في الثالثة أو الرابعة قال: اللَّه ورسوله أعلم، فخرجت.
 
فإني لأمشي في السوق إذا الناس يشيرون (إلي)(48) بأيديهم، وإذا نبطي من نبط الشام يسأل عني، فطفقوا يشيرون له إلي حتى جاءني فدفع إلي كتابا من بعض

قومي بالشام: أنه قد بلغنا ما صنع بك صاحبُك وجفوتُه عنك
فالحق بنا، فإن اللَّه لم يجعلك بدار هوان ولا دار مضيعة، (نواسك)(49) في أموالنا، قال: قلت: إنا للَّه(50)، قد طمع فيّ أهل الكفر، فيممت به تنورا فسجرته (به)(51).
 
فواللَّه (إني)(52) لعلى تلك الحال التي قد ذكر اللَّه، قد ضاقت علينا الأرض بما رحبت، وضاقت علينا أنفسنا، (صباحية)(53) خمسين ليلة (منذ)(54) نهي عن كلامنا، أنزلت التوبة على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، (ثم آذن رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم)(55) بتوبة اللَّه علينا حين صلى الفجر.
 
فذهب الناس يبشروننا، وركض رجل إليَّ فرسًا وسعى ساع من أسلم (فأوفى)(56) على الجبل، وكان الصوت أسرع من الفرس، فنادى: يا كعب بن مالك أبشر، فخررت ساجدا وعرفت
أن قد جاء الفرج، فلما جاءني الذي سمعت صوته (خففت)(57) له ثوبين ببشراه، واللَّه ما أملك يومئذ ثوبين غيرهما واستعرت ثوبين.
 
فخرجت قبل رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم (فلقيني)(58) الناس فوجا فوجا (يهنئونني)(59) بتوبة اللَّه علي حتى دخلت المسجد، فقام إليّ طلحة بن عبيد اللَّه يهرول حتى

(صافحني)(60) وهنأني، ما قام إلي من المهاجرين غيره، فكان كعب لا ينساها لطلحة.
 
ثم أقبلت
حتى وقفت على رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم كأن وجهه قطعة قمر، (و)(61) كان إذا سر (استنار)(62) وجهه كذلك، فناداني: "هلم يا كعب أبشر بخير يوم مر عليك منذ ولدتك أمك"، قال: (فقلت)(63): أمن عند اللَّه (أم)(64) من عندك؟ قال: "لا، بل من عند اللَّه، إنكم صدقتم اللَّه (فصدقكم)(65)(66) "، قال: (قلت)(67): إن من توبتي اليوم أن أخرج من مالي صدقة إلى اللَّه (وإلى رسوله)(68)، قال (رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم)(69): "أمسك عليك بعض مالك"، قلت: أمسك سهمي بخيبر، قال كعب: فواللَّه ما
أبلى اللَّه رجلا في صدق الحديث ما أبلاني(70).




কা’ব ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন:

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন রোমকদের (বনীল আসফার) বিরুদ্ধে যুদ্ধ করার সংকল্প করলেন, তখন তিনি লোকজনের কাছে বিষয়টি প্রকাশ করে দিলেন। এর আগে তিনি কোনো যুদ্ধের ইচ্ছা করলে সাধারণত এর মূল উদ্দেশ্য গোপন রাখতেন। কিন্তু এই বিশেষ যুদ্ধটিতে [তাবুক] তিনি তীব্র গরম, দীর্ঘ সফর এবং শক্তিশালী শত্রুর সম্মুখীন হলেন। তাই তিনি জনগণের সামনে স্পষ্ট করে দিলেন যে তিনি তাদেরকে কোন গন্তব্যের দিকে নিয়ে যাচ্ছেন, যাতে তারা তাদের শত্রুর মুকাবিলা করার জন্য প্রয়োজনীয় প্রস্তুতি নিতে পারে।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম প্রস্তুতি গ্রহণ করলেন এবং তাঁর সাথে লোকেরাও প্রস্তুত হলো। আমিও প্রস্তুতি গ্রহণের জন্য ভোরে বের হতাম, কিন্তু কোনো কাজ না সেরেই ফিরে আসতাম। একসময় লোকেরা সব প্রস্তুত হয়ে গেল এবং ঘোষণা করা হলো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সকালে বের হবেন এবং তাঁর গন্তব্যের দিকে যাবেন। তখন আমি মনে মনে বললাম: এক বা দুই দিন পর আমি প্রস্তুতি নিয়ে তাদের সাথে মিলিত হব। আমার কাছে তখন দুটি উটনী ছিল। এর আগে কখনো আমার কাছে একসাথে দুটি উটনী ছিল না। সুতরাং আমি মনে মনে নিজেকে সক্ষম ও প্রস্তুতিতে শক্তিশালী মনে করলাম। এরপরও আমি প্রতিদিন সকালে বের হতাম আর ফিরে আসতাম, কিন্তু কোনো কাজ সম্পন্ন করতে পারিনি। এভাবে কাফেলা অনেক দূর চলে গেল এবং দ্রুত এগিয়ে গেল। আমি তখন লোকজনের সাথে গল্পে মশগুল থাকতাম এবং মানুষেরা আমাকে ব্যস্ত করে রাখত। ফলে আমি স্থির করলাম যে আমি (বাড়িতেই) বসে থাকব, এভাবে লোকেরা আমার চেয়ে এগিয়ে গেল। আমি যখন বের হতাম, তখন কেবল এমন লোককেই দেখতাম যাদেরকে আল্লাহ তাআলা অক্ষমতার কারণে অব্যাহতি দিয়েছেন অথবা মুনাফিকির জন্য নিন্দিত লোক। এটা আমাকে চিন্তিত করে তুলত। তাই আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফিরে এলে তাঁকে কী অজুহাত দেব, সে বিষয়ে প্রস্তুতি নিতে এবং কথা সাজাতে লাগলাম।

রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাবুকে পৌঁছানোর আগ পর্যন্ত তিনি আমাকে স্মরণ করলেন না। তাবুকে তিনি লোকজনের মাঝে বসে জিজ্ঞাসা করলেন: "কা’ব ইবনে মালেক কী করল?" আমার গোত্রের একজন লোক উঠে বলল: তার চাদর দুটি এবং তার বাহু-সন্ধির দিকে তাকানোই তাকে ব্যস্ত রেখেছে (অর্থাৎ, সে অহংকার ও সাজসজ্জায় ব্যস্ত)। তখন অন্য একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ, আমরা কা’ব সম্পর্কে ভালো ছাড়া আর কিছু জানি না। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তখন নীরব থাকলেন।

যখন বলা হলো যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফিরছেন, তখন আমার মন থেকে মিথ্যা এবং যেসব অজুহাত আমি জড়ো করেছিলাম, তা দূর হয়ে গেল। আমি বুঝতে পারলাম যে সত্য ছাড়া আর কিছুই আমাকে মুক্তি দিতে পারবে না। তাই আমি সত্য বলার সিদ্ধান্ত নিলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সকালে মদিনায় পৌঁছালেন। আমি তাঁর কাছে গেলাম। তিনি তখন মসজিদে লোকজনের মাঝে বসেছিলেন। তিনি যখন সফর থেকে ফিরতেন, তখন মসজিদে প্রবেশ করে দু’রাকাত সালাত আদায় করতেন, তারপর বাড়িতে যেতেন। আমি তাঁকে মসজিদে বসা অবস্থায় পেলাম। যখন তিনি আমার দিকে তাকালেন, তখন আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: "কা’ব, এসো। কী কারণে তুমি আমার থেকে পিছিয়ে রইলে?" তিনি রাগান্বিত ব্যক্তির মতো মৃদু হাসলেন। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমার কোনো অজুহাত নেই। আমি যখন আপনার কাছ থেকে পেছনে রয়ে যাই, তখন আমি এর আগে কখনো এত শক্তিশালী ও সচ্ছল ছিলাম না। যারা পেছনে রয়ে গিয়েছিল, তারা এসে শপথ করে অজুহাত পেশ করল। তিনি তাদের থেকে তা কবুল করলেন এবং তাদের জন্য ক্ষমা চাইলেন, আর তাদের গোপন বিষয়গুলো মহান আল্লাহর ওপর ন্যস্ত করলেন। যখন আমি তাঁকে সত্য বললাম, তখন তিনি বললেন: "এই ব্যক্তি সত্য বলেছে। তুমি উঠে যাও, যতক্ষণ না আল্লাহ তোমার ব্যাপারে কোনো ফয়সালা দেন।"

আমি উঠে দাঁড়ালাম। তখন বনু সালামা গোত্রের কয়েকজন লোক আমার কাছে এসে বলল: আল্লাহর কসম, তুমি ভালো কিছু করোনি! আল্লাহর কসম, তোমার অপরাধের জন্য রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর ক্ষমা চাওয়াই যথেষ্ট ছিল, যেমনটা তিনি অন্যদের জন্য করেছেন। তিনি তাদের অজুহাত কবুল করেছেন এবং তাদের জন্য ইস্তিগফার করেছেন। তারা আমাকে এত বেশি তিরস্কার করতে লাগল যে আমি প্রায় নিজেকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করে ফিরে যাওয়ার সংকল্প করেছিলাম। এরপর আমি তাদের বললাম: "আমার মতো এমন কথা কি আর কেউ বলেছে, নাকি আমার মতো অজুহাত আর কেউ পেশ করেছে?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "কে?" তারা বলল: "হিলাল ইবনে উমাইয়াহ আল-ওয়াকিফী এবং রিব’ই ইবনে মুরাবাহ আল-আমরি।" তারা আমাকে আরও দুজন সালিহ ব্যক্তির কথা বলল যারা বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন এবং আমার মতোই অজুহাত পেশ করেছিলেন এবং তাদেরকেও তোমার মতো একই কথা বলা হয়েছিল।

কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের সাথে কথা বলতে নিষেধ করলেন। আমরা তখন লোকজনের মাঝে ঘোরাফেরা করতাম, কিন্তু কেউ আমাদের সাথে কথা বলত না, কেউ আমাদের সালাম দিত না, এমনকি আমাদের সালামের জবাবও দিত না। এভাবে যখন চল্লিশ রাত পূর্ণ হলো, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দূত এসে আমাদের কাছে এই নির্দেশ পৌঁছালেন যে আমরা যেন আমাদের স্ত্রীদের থেকে দূরে থাকি।

হিলাল ইবনে উমাইয়ার স্ত্রী রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে এসে বললেন: তিনি একজন বৃদ্ধ লোক, দৃষ্টিশক্তিও দুর্বল হয়ে গেছে। আমি যদি তার জন্য খাবার তৈরি করে দিই, তবে কি আপনি অপছন্দ করবেন? তিনি বললেন: "না, তবে সে যেন তোমার কাছে না আসে।" স্ত্রী বললেন: আল্লাহর কসম! তার কোনো কিছুর প্রতিই কোনো আগ্রহ নেই। আল্লাহর কসম, যখন থেকে এই ঘটনা ঘটেছে, সেদিন থেকে আজ পর্যন্ত তিনি কেঁদেই চলেছেন।

কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার পরিবারের কেউ কেউ আমাকে বলল: তুমি যদি তোমার স্ত্রীর ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে অনুমতি চাইতে, যেমন হিলাল ইবনে উমাইয়ার স্ত্রী অনুমতি চেয়েছেন, কারণ তাকে তো তার স্বামীর সেবা করার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। আমি বললাম: আল্লাহর কসম, আমি তার ব্যাপারে অনুমতি চাইব না। আমি যদি অনুমতি চাই, তবে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কী বলবেন, তা আমি জানি না, কারণ সে (হিলাল) একজন বৃদ্ধ আর আমি একজন যুবক। তাই আমি আমার স্ত্রীকে বললাম: তুমি তোমার পরিবারের কাছে চলে যাও, যতক্ষণ না আল্লাহ কোনো ফয়সালা দেন।

আমরা লোকজনের মাঝে হাঁটাহাঁটি করতাম, কিন্তু কেউ আমাদের সাথে কথা বলত না, আমাদের সালামের জবাবও দিত না। কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি আমার চাচাতো ভাইয়ের বাগানের প্রাচীর টপকে তার কাছে গেলাম এবং তাকে সালাম দিলাম, কিন্তু সে সালামের উত্তর দিতে ঠোঁটও নাড়াল না। আমি বললাম: আল্লাহর দোহাই দিয়ে জিজ্ঞাসা করছি, আপনি কি জানেন যে আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলকে ভালোবাসি? সে আমাকে কোনো উত্তর দিল না। আমি আবার বললাম, তবুও সে কথা বলল না। তৃতীয় বা চতুর্থবার বলার পর সে বলল: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তখন আমি সেখান থেকে বেরিয়ে আসলাম।

আমি বাজারে হাঁটছিলাম, তখন লোকেরা হাত দিয়ে আমাকে ইশারা করছিল। হঠাৎ সিরিয়ার নাবাতি গোত্রের একজন লোক আমার খোঁজ করল। লোকেরা তাকে আমার দিকে ইশারা করে দেখাল। সে আমার কাছে এসে সিরিয়াতে থাকা আমার কোনো এক গোত্রের পক্ষ থেকে একটি চিঠি দিল। তাতে লেখা ছিল: "আপনার সাথী আপনার সাথে যে আচরণ করেছেন এবং আপনাকে যে দূরে ঠেলে দিয়েছেন, তা আমাদের কাছে পৌঁছেছে। আপনি আমাদের সাথে এসে যোগ দিন। আল্লাহ আপনাকে এমন কোনো অপমান বা নষ্ট হয়ে যাওয়ার স্থানে রাখেননি। আমরা আপনাকে আমাদের সম্পদে অংশীদার করব।" আমি বললাম: ইন্না লিল্লাহ! কাফেররা আমার ব্যাপারে লোভ করছে। তখন আমি সেই চিঠিটি নিয়ে একটি চুল্লির দিকে গেলাম এবং তাতে আগুন ধরিয়ে দিলাম।

আল্লাহর কসম, আমি তখন সেই অবস্থায় ছিলাম, যার বর্ণনা আল্লাহ তাআলা দিয়েছেন: পৃথিবী প্রশস্ত হওয়া সত্ত্বেও আমাদের জন্য সংকীর্ণ হয়ে গিয়েছিল, এবং আমাদের নিজেদের জীবনও আমাদের জন্য দুর্বিষহ হয়ে উঠেছিল। যখন আমাদের সাথে কথা বলতে নিষেধ করা হয়েছিল, তখন পঞ্চাশ রাত পূর্ণ হওয়ার সকালে ফজরের সালাত আদায়ের সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাদের উপর আল্লাহর তাওবা নাযিল হওয়ার ঘোষণা দিলেন।

লোকেরা আমাদের সুসংবাদ দেওয়ার জন্য গেল। একজন লোক ঘোড়ায় চড়ে আমার দিকে দৌড়াল, আর আসলাম গোত্রের একজন দ্রুতগামী লোক পাহাড়ের ওপর উঠে গেল। শব্দটি ঘোড়ার চেয়ে দ্রুত পৌঁছাল। সে চিৎকার করে বলল: "হে কা’ব ইবনে মালেক! সুসংবাদ গ্রহণ করুন।" আমি তখনই সিজদায় লুটিয়ে পড়লাম এবং বুঝতে পারলাম যে মুক্তি এসে গেছে।

যখন সুসংবাদদাতা আমার কাছে পৌঁছাল, যার আওয়াজ আমি শুনেছিলাম, তখন আমি তাকে সুসংবাদের বিনিময়ে আমার গায়ের দুটি কাপড় খুলে দিলাম। আল্লাহর কসম, তখন আমার কাছে ঐ দুটি কাপড় ছাড়া আর কোনো কাপড় ছিল না। এরপর আমি দুটি কাপড় ধার করলাম। আমি দ্রুত রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর দিকে রওনা হলাম। দলে দলে লোকেরা আমার সাথে দেখা করে আল্লাহর পক্ষ থেকে আমার তাওবা কবুল হওয়ায় অভিনন্দন জানাতে লাগল। অবশেষে আমি মসজিদে প্রবেশ করলাম। তখন তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দ্রুত এসে আমার সাথে মুসাফাহা করলেন এবং আমাকে অভিনন্দন জানালেন। মুহাজিরদের মধ্যে তিনি ছাড়া আর কেউ আমার জন্য দাঁড়াননি। কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই কাজ কখনো ভুলতেন না।

এরপর আমি এগিয়ে গিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সামনে দাঁড়ালাম। তাঁর মুখমণ্ডল যেন এক টুকরো চাঁদের মতো লাগছিল, আর তিনি যখন খুশি হতেন, তখন তাঁর চেহারা এমন উজ্জ্বল হয়ে উঠত। তিনি আমাকে ডাক দিয়ে বললেন: "কা’ব, এসো! তোমার জীবনে তোমার মা তোমাকে জন্ম দেওয়ার পর থেকে আজকের দিনের চেয়ে উত্তম দিন তোমার উপর আর আসেনি, এর সুসংবাদ নাও।" আমি বললাম: এটা কি আল্লাহর পক্ষ থেকে, নাকি আপনার পক্ষ থেকে? তিনি বললেন: "না, বরং আল্লাহর পক্ষ থেকে। তোমরা আল্লাহকে সত্য বলেছ, তাই তিনি তোমাদেরকে সত্য বলে গ্রহণ করেছেন।" আমি বললাম: আমার তাওবার অংশ হিসেবে আমি আজ আমার সমুদয় সম্পদ আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের জন্য সাদাকা করে দিতে চাই। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমার কিছু সম্পদ নিজের জন্য রেখে দাও।" আমি বললাম: আমি খায়বার থেকে প্রাপ্ত আমার অংশটুকু রেখে দিলাম। কা’ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আল্লাহর কসম, সত্য কথা বলার ক্ষেত্রে আল্লাহ আমাকে যে ধরনের পরীক্ষা ও উত্তম পরিণতি দিয়েছেন, এমনটি আর কাউকে দিয়েছেন বলে আমার জানা নেই।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (أخبرنا).
(2) في [هـ]: زيادة (حدثني عبد اللَّه بن كعب بن مالك).
(3) في [أ، ب]: (يقروهم).
(4) في [ع]: (حكى).
(5) سقط من: [هـ].
(6) سقط من: [هـ].
(7) في [هـ]: (جديدًا).
(8) في [أ، ب]: (جرى)، وفي [ط، ق، هـ]: (يخرج).
(9) في [ع]: (غزوهم).
(10) في [س]: (وطننت).
(11) في [ع]: (تجهز).
(12) في [ع]: (يومًا).
(13) في [جـ]: (بيومين).
(14) في [ع]: (قلبهما قط).
(15) في [س، ي]: (ويشغلني)، وفي [ع]: (تشغلني).
(16) في [س، ط،
هـ]: (الرحال).
(17) في [جـ]: (شيء)، وفي [ق]: (شيئًا)، وفي [ي]: (الأسى).
(18) سقط من: [س].
(19) في [ع]: (جاه).
(20) في [ب، ط،
هـ]: (رسول).
(21) سقط من: [ع].
(22) في [ق، هـ]: زيادة (عليه).
(23) في [أ، ب]: (وصمت).
(24) سقط من: [ع].
(25) في [ق، هـ]: (زاح).
(26) في [ي]: (ركع).
(27) ما بين المعكوفين سقط من: [جـ، ق].
(28) في [جـ]: (جا).
(29) في [ق]: زيادة (قال).
(30) في [ع]: (لئن).
(31) في [ع]: (كافيك).
(32) في [أ، ب]: زيادة (لك).
(33) في [جـ]: (بغيرك).
(34) في [أ، ب]: (وقد).
(35) في [أ، ب،
جـ، ي]: (أحدًا).
(36) في [أ، جـ]: (واعتذر).
(37) في [أ، ب]: (ربيعة بن بدار العمري)، وفي [هـ]: (سرارة بن ربيعة العامري)، وفي [جـ]: (ربيعة بن مرارة اليعمري)، وفي [ق]: (مرارة بن الربيع العامري)، وفي [ع]: (ربعية بن مرار العمري)، والذي في البخاري: (مرارة بن الربيع العمري)، وعند مسلم: (العامري)، والمثبت موافق لما في المعجم الكبير 19/ (95).
(38) في [أ، ب]: (فذكروا).
(39) في [أ، ب]: (فقيل).
(40) في [ق، هـ]: (مضت).
(41) سقط من: [أ، ط،
هـ]، وفي [ق]: زيادة (أمر).
(42) في [هـ]: (يوم).
(43) في [ع]: (قلت).
(44) في [ع]: (فواللَّه).
(45) في [ي]: زيادة (فيها).
(46) في [ع]: (اللَّه).
(47) في [أ، ب،
ق]: (عددت).
(48) سقط من: [ع].
(49) في [ع]: (نواسيك).
(50) في [هـ]: زيادة (وإنا إليه راجعون).
(51) في [س، ع]: (بها).
(52) في [جـ]: (إنه).
(53) في [ق]: (صباح)، وفي [س]: (صباحته)، وفي [أ، هـ]: (صاحبته).
(54) في [أ، ب،
س، ي]: (مذ)، وفي [ق، هـ]: (من).
(55) سقط من: [ي].
(56) في [ع]: (فأوفى).
(57) في [ي]: (خفضت)، وفي [س]: (خصصت)، وفي [هـ]: (خصضت).
(58) في [ع]: (فلقاني).
(59) في [ع]: (يهنئوني).
(60) في [ع]: (صالحني).
(61) سقط من: [هـ].
(62) في [ع]: (استنات).
(63) في [ع]: (قلت).
(64) في [ع]: (أو).
(65) في [أ، ب]: (وصدقكم).
(66) في [ع]: زيادة (اللَّه).
(67) في [ق، هـ]: (فقلت).
(68) في [ع]: (ورسوله).
(69) سقط من: [ع].
(70) حسن؛ خالد بن مخلد صدوق، وعبد الرحمن
سمع من جده، والحديث أخرجه البخاري (4676)، ومسلم (2769).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39783)


حدثنا غندر عن شعبة عن الحكم عن مصعب بن سعد (عن سعد)(1) قال: لما خرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك خلف عليا في النساء والصبيان، فقال: يا رسول اللَّه تخلفني في النساء والصبيان، فقال: "أما ترضى أن

تكون مني
بمنزلة هارون من موسى، إلا أنه (لا)(2)(3) نبي بعدي"(4).




সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাবুক যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হলেন, তখন তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে নারী ও শিশুদের তত্ত্বাবধানে (মদীনায়) রেখে যান। (আলী রাঃ) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি কি আমাকে নারী ও শিশুদের মাঝে রেখে যাচ্ছেন? তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এতে সন্তুষ্ট নও যে, আমার নিকট তোমার মর্যাদা মূসা (আঃ)-এর নিকট হারুন (আঃ)-এর মর্যাদার মতো হবে? তবে (মনে রেখো,) আমার পরে কোনো নবী নেই।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) سقط من: [س].
(2) سقط من: [ع].
(3) في [أ، ب]: زيادة (منه).
(4) صحيح؛ أخرجه البخاري (4416)، ومسلم (2404).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39784)


حدثنا يزيد بن هارون (أخبرنا)(1) سعيد بن أبي عروبة عن موسى عن (الحسن)(2) (أن)(3) عثمان أتى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
بدنانير في غزوة تبوك، فجعل رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم (يقلبها)(4) في حجره (ويقول)(5): "ما على عثمان بن عفان ما (عمل)(6) بعد هذا"(7).




উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত: গাযওয়ায়ে তাবুকের সময় তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বেশ কিছু দীনার (স্বর্ণমুদ্রা) নিয়ে আসলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেগুলো নিজের কোলে রেখে উল্টে-পাল্টে দেখছিলেন এবং বলছিলেন, "আজকের এই (মহান কাজের) পর উসমান ইবনে আফফান যা কিছুই করবেন, তা তাঁর কোনো ক্ষতি করবে না।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ب،
ع]: (أنبأنا).
(2) كذا في النسخ، وفي فضائل الصحابة لأحمد: (يونس) هو ابن عبيد.
(3) في [أ، ب]: (عن).
(4) في [أ، ب،
ع]: (يقبلها).
(5) في [ب]: (يقول).
(6) سقط من: [أ، ب].
(7) مرسل؛ الحسن تابعي، أخرجه أحمد في فضائل الصحابة (787)، وابن عساكر 39/ 69، والخلال في السنة (417)، وأخرجه الطبراني في الأوسط (2013): عن سعيد بن أبي عروبة عن قتادة عن أنس.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39785)


حدثنا يزيد بن هارون (أخبرنا)(1) حميد عن أنس أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم لما رجع من غزوة تبوك ودنا من المدينة قال: "إن بالمدينة لأقواما ما سرتم مسيرا، ولا قطعتم من واد إلا كانوا معكم فيه" قالوا: يا رسول اللَّه
وهم بالمدينة؟ [قال: " (نعم)(2)](3) (وهم بالمدينة)(4) حبسهم العذر"(5).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন গাজওয়ায়ে তাবুক থেকে ফিরে এলেন এবং মদীনার কাছাকাছি হলেন, তখন তিনি বললেন: "মদীনায় এমন কিছু লোক রয়েছে, তোমরা যে পথই অতিক্রম করেছ এবং যে উপত্যকাই পেরিয়েছ, তারা তোমাদের সঙ্গেই ছিল।" সাহাবীগণ বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! তারা মদীনায় থাকা সত্ত্বেও? তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তারা মদীনাতেই ছিল। ওজর (বৈধ অপারগতা) তাদেরকে আটকে রেখেছিল।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ع]: (أنبأنا)، وفي [ي]: (حدثنا).
(2) سقط من: [س].
(3) سقط ما بين المعكوفين من: [أ، ب].
(4) سقط من: [أ، ب،
ط، هـ].
(5) صحيح؛ أخرجه البخاري (2838)، وأحمد (12028).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39786)


حدثنا (هشيم)(1) (أخبرنا)(2) داود بن (عمرو)(3) عن (بسر)(4) بن عبيد اللَّه
الحضرمي عن أبي إدريس الخولاني (حدثنا)(5) عوف بن مالك الأشجعي أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أمر بالمسح على الخفين في غزوة تبوك ثلاثة أيام ولياليهن للمسافر، ويوما وليلة
للمقيم(6).




আওফ ইবনে মালেক আল-আশজাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাবুক যুদ্ধের সময় মোজা (খুফ্ফাইন)-এর উপর মাসাহ করার নির্দেশ দিয়েছেন। এক্ষেত্রে মুসাফিরের (পথচারী) জন্য সময়সীমা তিন দিন তিন রাত এবং মুকীমের (আবাসিক) জন্য এক দিন এক রাত।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (هشام).
(2) في [أ، ب،
ع، ي]: (أنبأنا).
(3) في [ع]: (عمر).
(4) في [أ، ب،
ع، هـ]: (بشر).
(5) في [ع]: (أخبرنا).
(6) حسن؛ داود صدوق، أخرجه أحمد (23995)، والبزار (2757)، والطحاوي 1/
82، والطبراني 18/ (69)، والدارقطني 1/
197، والبيهقي 1/
275.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39787)


حدثنا جعفر بن عون (أخبرنا)(1) المسعودي عن
إسماعيل بن أوسط عن محمد بن أبي كبشة الأنماري عن أبيه قال: لما كان في غزوة تبوك سارع (ناس إلى)(2) أصحاب الحجر، فدخلوا عليهم، فبلغ ذلك رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم، فأمر فنودي: إن الصلاة جامعة، قال: فأتيته وهو ممسك ببعيره وهو يقول: "علام تدخلون على قوم غضب اللَّه عليهم؟ " (قال)(3): فناداه رجل تعجبا (منهم)(4): يا رسول اللَّه، فقال رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم: "أفلا أنبئكم بما هو أعجب من ذلك؟ رجل من أنفسكم يحدثكم بما كان قبلكم وبما يكون بعدكم، (استقيموا)(5) (و)(6) سددوا فإن اللَّه لا يعبأ بعذابكم

شيئا، وسيأتي اللَّه بقوم لا يدفعون عن أنفسهم (بشيء)(7) "(8).




আবু কাবশা আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা থেকে বর্ণিত:

যখন তাবুক যুদ্ধের সময় হলো, কিছু লোক দ্রুত অগ্রসর হয়ে আসহাবুল হিজর-এর (সামূদ জাতির বসতি) কাছে গেল এবং তাদের (ধ্বংসপ্রাপ্ত জনপদে) প্রবেশ করল। এ খবর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে পৌঁছল। তখন তিনি নির্দেশ দিলেন, ফলে ঘোষণা করা হলো: সালাতের জন্য জামাত অনুষ্ঠিত হবে।

তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: আমি তাঁর কাছে আসলাম যখন তিনি তাঁর উটের লাগাম ধরে ছিলেন এবং বলছিলেন: "তোমরা এমন এক জাতির (ধ্বংসপ্রাপ্ত জনপদে) কেন প্রবেশ করছো, যাদের উপর আল্লাহ তাআলা ক্রুদ্ধ হয়েছেন?"

তিনি বলেন: তখন তাদের (সাহস দেখে) বিস্ময় প্রকাশ করে এক ব্যক্তি তাঁকে ডেকে বলল: হে আল্লাহর রাসূল!

তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "আমি কি তোমাদের এর চাইতেও বিস্ময়কর কিছুর খবর দেব না? (তা হলো,) তোমাদের মধ্য থেকেই একজন লোক (আমি), যিনি তোমাদের পূর্বের ও তোমাদের পরের ঘটনা সম্পর্কে তোমাদেরকে সংবাদ দেন (অথচ তোমরা এতে বিস্ময় প্রকাশ করছ না)। তোমরা সরল পথে অবিচল থাকো এবং সঠিক পথে চলো। কারণ আল্লাহ তোমাদের শাস্তি দিয়ে সামান্যতমও পরোয়া করেন না। আর অচিরেই আল্লাহ এমন এক জাতি আনবেন যারা নিজেদের পক্ষ থেকে (কোনো প্রকারের) প্রতিরোধ করবে না।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ب،
ع، ي]: (أنبأنا).
(2) في [أ، ب]: (ناسل أفي).
(3) سقط من: [ع].
(4) في [أ، ب]: (منها).
(5) في [س]: (تميقوا).
(6) في [ي]: (أو).
(7) في [جـ]: (بشيء).
(8) مجهول؛ محمد بن أبي كبشة مجهول، أخرجه أحمد (18029)، والطبراني 22/ (852)، والدولابي في الكنى 1/ 50، والطحاوي في شرح المشكل (2741)، والبيهقي في دلائل النبوة 5/
235.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39788)


حدثنا أبو خالد الأحمر
عن (ابن)(1) إسحاق عن يزيد بن عبد اللَّه بن قسيط عن القعقاع بن عبد اللَّه بن أبي حدرد الأسلمي عن أبيه عبد اللَّه بن (أبي)(2) حدرد قال: بعثنا رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في سرية ((إلى)(3) إضم)(4) قال: فلقينا عامر بن الأضبط، قال: فحيا بتحية الإسلام، فنزعنا عنه، وحمل عليه محلّم بن جثّامة فقتله، فلما قتله سلبه بعيرا له (وأهبًا)(5)، (ومتيعا)(6) كان له، فلما قدمنا جئنا بشأنه إلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم
فأخبرناه بأمره فنزلت هذه الآية: ﴿يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا ضَرَبْتُمْ فِي سَبِيلِ
اللَّهِ فَتَبَيَّنُوا (وَلَا)(7) (تَقُولُوا)(8). . .﴾ [النساء: 94] الآية(9).




আব্দুল্লাহ ইবনে আবী হাদরাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে ইযম (Idm) অভিমুখে একটি সেনাদলে প্রেরণ করলেন। তিনি বলেন, আমরা আমির ইবনুল আজবাত-এর দেখা পেলাম। তিনি (আমির) ইসলামের সম্ভাষণ জানালেন। তখন আমরা তার থেকে সরে দাঁড়ালাম (আক্রমণ করা থেকে বিরত থাকলাম)। কিন্তু মুহাল্লিম ইবনু জাস্সামা তার উপর আক্রমণ করে তাকে হত্যা করে ফেলল।

যখন সে তাকে হত্যা করল, তখন তার সম্পদ— একটি উট, চামড়ার সরঞ্জামাদি (অথবা চামড়ার পাত্রসমূহ) এবং তার কাছে থাকা কিছু আসবাবপত্র ছিনিয়ে নিল।

যখন আমরা ফিরে আসলাম, তখন আমরা এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলাম এবং তাঁর কাছে পুরো ঘটনাটি জানালাম। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো:

﴿يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا ضَرَبْتُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَتَبَيَّنُوا وَلَا تَقُولُوا. . .﴾ (সূরা নিসা: ৯৪)। [আয়াতের শেষ পর্যন্ত]।
অর্থ: "হে মুমিনগণ! যখন তোমরা আল্লাহর পথে সফর করো (জিহাদের জন্য বের হও), তখন তোমরা যাচাই করে নিবে (সত্যতা নিশ্চিত করবে) এবং তোমরা বলবে না..."




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ب،
ع]: (أبي).
(2) هكذا في [ق، هـ]، وسقط من باقي النسخ.
(3) في [هـ]: (أن).
(4) في [ع]: (إلى أنعم)، وفي [س]: (إلى أختم).
(5) في [ع]: (واهب)، وسقط من: [أ، ب، ط، ق، هـ].
(6) في [ع]: (ومتبع).
(7) سقط من: [س].
(8) في [ع]: زيادة ﴿لِمَنْ أَلْقَى إِلَيْكُمُ السَّلَامَ﴾.
(9) مجهول؛ لجهالة القعقاع بن عبد اللَّه، أخرجه أحمد (23881)، وابن هشام 4/ 275، وابن الجارود (777)، وابن سعد 4/ 282، وابن جرير في التفسير 5/ 222، والبيهقي في دلائل النبوة 4/
305.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39789)


قال ابن إسحاق: فأخبرني محمد بن جعفر، عن زيد بن ضميرة، قال: حدثني أبي وعمي - (وكانا)(1) شهدا حنينا مع رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم، قالا: صلى رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم الظهر، ثم جلس تحت شجرة فقام (إليه)(2) (الأقرع)(3) بن حابس وهو سيد خندف، يرد (عن)(4) (دم)(5) محلم، وقام عيينة بن حصن يطلب بدم عامر بن الأضبط القيسي وكان
(أشجعيا)(6)، قال: فسمعت عيينة
بن حصن يقول: لأذيقن نساءه من الحزن مثل ما (ذاق)(7) نسائي(8)، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "تقبلون الدية؟ " فأبوا فقام رجل من بني ليث يقال له: (مكيتل)(9)(10): واللَّه يا رسول اللَّه(11) ما شبهت (هذا)(12) (القتيل)(13) في (غُرَّة)(14) الإسلام إلا (كغنم)(15) وردت فرميت فنفر

آخرها، (اسلل)(16) (اليوم)(17) (وغير)(18) غدا، قال: فقال النبي صلى الله عليه وسلم
بيديه: "لكم خمسون في سفرنا هذا، وخمسون إذا رجعنا"، قال: فقبلوا الدية، قال: فقالوا: ائتوا بصاحبكم يستغفر له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم(19) قال: فجيء به (فوصف)(20) حليته، وعليه (حلة)(21) قد تهيأ فيها للقتل حتى أجلس بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم فقال: "ما اسمك؟ " (قال)(22): محلم بن جثامة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم
(بيديه ووصف أنه رفعهما)(23): "اللهم لا تغفر لمحلم بن جثامة"، قال: فتحدثنا بيننا أنه إنما أظهر هذا وقد استغفر له في السر(24).




যায়িদ ইবন যামিরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিতা ও চাচা থেকে বর্ণিত—তাঁরা উভয়েই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হুনাইনের যুদ্ধে উপস্থিত ছিলেন। তাঁরা বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যোহরের সালাত আদায় করলেন, এরপর একটি গাছের নিচে বসলেন।

তখন তাঁর কাছে আকরা’ ইবন হাবিস (যিনি খানদাফ গোত্রের নেতা ছিলেন) দাঁড়ালেন। তিনি মুহাল্লামের (হত্যার) রক্তের দাবি খণ্ডন করতে এসেছিলেন। আর উয়াইনাহ ইবন হিসনও দাঁড়ালেন, যিনি কায়স গোত্রের ’আমির ইবনুল আযবাত-এর রক্তের প্রতিশোধ দাবি করছিলেন (এবং ’আমির আশজাঈ গোত্রের অন্তর্ভুক্ত ছিলেন)।

বর্ণনাকারী বলেন: আমি উয়াইনাহ ইবন হিসনকে বলতে শুনলাম: "আমার নারীরা যেমন দুঃখের স্বাদ ভোগ করেছে, আমিও তার নারীদেরকে তেমন দুঃখের স্বাদ ভোগ করাব।"

তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা কি রক্তমূল্য (দিয়াহ) গ্রহণ করবে?" তারা অস্বীকার করল। তখন বনু লাইস গোত্রের মাকীতিল নামক এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে বললেন: "আল্লাহর শপথ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইসলামের একেবারে প্রথম দিকে এই নিহত ব্যক্তির অবস্থা ভেড়ার পালের মতো মনে হচ্ছে, যা পানির ঘাটে এসেছিল, অতঃপর সেটিকে লক্ষ্য করে তীর নিক্ষেপ করা হলো, ফলে তার শেষ অংশটি (ভয়ে) পালাতে শুরু করল। আজকেই (এই সমস্যার) ফয়সালা করুন, কালকের জন্য ফেলে রাখবেন না।"

বর্ণনাকারী বলেন: তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দু’হাত দিয়ে ইশারা করে বললেন: "তোমাদের জন্য এই সফরে পঞ্চাশটি (উট/দীনার) এবং যখন আমরা ফিরে আসব, তখন আরও পঞ্চাশটি।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন তারা রক্তমূল্য গ্রহণ করল।

তারা বলল: "তোমাদের সাথীকে নিয়ে এসো, যেন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেন।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাকে নিয়ে আসা হলো। তার গায়ে এমন পোশাক ছিল, যা সে হত্যার জন্য প্রস্তুত হয়েছিল (বা পরিধান করেছিল), অবশেষে তাকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সামনে বসানো হলো।

তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার নাম কী?" সে বলল: "মুহাল্লাম ইবন জাছছামাহ।" তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দু’হাত তুলে (এবং বর্ণনাকারী বর্ণনা করেছেন যে তিনি হাত দু’টো ওপরে তুলেছিলেন) বললেন: "হে আল্লাহ! তুমি মুহাল্লাম ইবন জাছছামাহকে ক্ষমা করো না।"

বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আমরা নিজেদের মধ্যে বলাবলি করছিলাম যে, তিনি প্রকাশ্যে এই কথা বলেছেন, কিন্তু গোপনে তার জন্য ক্ষমা চেয়েছেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ب]: (وكانوا).
(2) في [ق]: (إليهم).
(3) في [س]: (الأفذع).
(4) في [أ، ب]: (على).
(5) في [ط، هـ]: (أم).
(6) في [ع]: (أشجعنا).
(7) في [ق، هـ]: (أذاق).
(8) في [ع]: زيادة (قال).
(9) في [أ، ب]: (مكيبل)، وفي [جـ، ق]: (مكتبل)، وفي [س]: (مكيتل).
(10) في [ق، هـ]: زيادة (فقال).
(11) في [ع]: زيادة (واللَّه).
(12) في [ع]: (بهذا).
(13) في [أ، ب]: (القيل).
(14) في [أ]: (عزره)، وفي [ب]: (غزوة)، وفي [ط، هـ]: (عزة).
(15) في [س]: (كغم)، وفي [ع]: (لغنم).
(16) في [أ، ب]: (أسي)، وفي [ق، هـ]: (أسير).
(17) في [أ، ب]: (القوم).
(18) في [جـ، س،
ع]: (وغد).
(19) سقط من: [ع].
(20) في [ق، هـ]: (فوصلت).
(21) في [أ، ب]: (جلت).
(22) في [س، ع]: (فقال).
(23) سقط من: [أ، ب].
(24) مجهول؛ لجهالة زيد بن ضميرة، أخرجه أحمد (23879)، وابنه (21081)، وأبو داود (4503)، وابن ماجه (2625)، وابن أبي عاصم في الآحاد (978)، وابن الجارود (777)، والبيهقي 9/ 116، والطبراني (5457).









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39790)


قال ابن إسحاق: فأخبرني عمرو بن عبيد عن الحسن قال: قال له رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: "أمنته باللَّه ثم قتلته، فواللَّه ما مكث إلا سبعا حتى مات محلم"، قال: فسمعت الحسن
(يحلف)(1) باللَّه: لدفن ثلاث مرات كل ذلك (تلفظه)(2)

الأرض، قال: فجعلوه بين (صدى)(3) جبل (وضموا)(4) عليه من الحجارة، فأكلته السباع فذكروا أمره لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم(5) فقال: "أما واللَّه إن الأرض (لتطبق)(6) على من هو (شر)(7) منه، ولكن اللَّه أراد
أن (يخبركم)(8) (بحرمتكم)(9) فيما بينكم"(10).




হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে (মুহাল্লামকে) বললেন: "তুমি আল্লাহর উপর নিরাপত্তা দিলে, এরপরও কি তাকে হত্যা করলে?"

আল্লাহর শপথ! সে (মুহাল্লাম) মাত্র সাত দিনের বেশি বাঁচল না, এর মধ্যেই সে মারা গেল।

তিনি (আল-হাসান) বলেন: আমি হাসানকে আল্লাহর কসম করে বলতে শুনেছি যে, তাকে (মুহাল্লামকে) তিনবার দাফন করা হয়েছিল। প্রতিবারই যমিন তাকে বাইরে নিক্ষেপ করে দিত। তখন তারা তাকে দুটি পাহাড়ের চূড়ার মধ্যখানে রেখে দিলো এবং তার উপর পাথর চাপা দিলো। এরপর বন্য পশুরা তাকে খেয়ে ফেলল।

যখন তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট তার এই ঘটনা উল্লেখ করল, তখন তিনি বললেন: "শোনো, আল্লাহর শপথ! যমিন এর চেয়েও খারাপ ব্যক্তির উপর বন্ধ হয়ে যায় (অর্থাৎ তাকে গ্রহণ করে নেয়), কিন্তু আল্লাহ তা’আলা তোমাদেরকে তোমাদের পারস্পরিক পবিত্রতা (মর্যাদা ও অঙ্গীকারের গুরুত্ব) সম্পর্কে জানাতে চাইলেন।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [س]: (يخلف).
(2) في [ي]: بياض.
(3) في: [ق، هـ]: (سدي).
(4) في [هـ]: (ورصوا)، وفي [ص]: (وهموا).
(5) سقط من: [ع].
(6) في [ب]: (ليطبق)، وفي [س]: (التطبين).
(7) في [ع]: (أشر).
(8) في [ع]: بياض.
(9) في [أ]: (لحرمتكم).
(10) مرسل؛ الحسن تابعي.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39791)


حدثنا جرير عن مغيرة عن الشعبي قال: لما أراد رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أن يلاعن أهل نجران قبلوا الجزية أن يعطوها، فقال رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم: "لقد أتاني البشير بهلكة أهل نجران لو تموا على الملاعنة حتى الطير على الشجر أو العصفور على الشجر"، ولما غدا إليهم رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم أخذ بيد حسن وحسين وكانت فاطمة تمشي خلفه(1).




শা’বী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত যে, যখন আল্লাহ্‌র রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নাজরানের অধিবাসীদের সাথে মুবাহালা (পারস্পরিক অভিশাপ) করতে চাইলেন, তখন তারা জিযিয়া (নির্ধারিত কর) দিতে সম্মত হলো। তখন আল্লাহ্‌র রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "আমার কাছে সুসংবাদ এসেছে যে নাজরানের অধিবাসীরা যদি মুবাহালার ওপর অটল থাকত, তবে তারা সম্পূর্ণরূপে ধ্বংস হয়ে যেত—এমনকি গাছের ওপরে থাকা পাখি বা চড়ুই পাখিও (তাদের ধ্বংস থেকে) রক্ষা পেত না।" আর যখন আল্লাহ্‌র রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাদের কাছে গেলেন, তখন তিনি হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাত ধরলেন এবং ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পেছন পেছন হাঁটছিলেন।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) مرسل؛ الشعبي تابعي، أخرجه سعيد بن منصور 2/
(500)، وابن جرير في التفسير 3/ 300.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39792)


حدثنا عفان (حدثنا)(1) عبد الواحد بن زياد (حدثنا)(2) (مجالد)(3) بن سعيد عن الشعبي قال: كتب رسول اللَّه
صلى الله عليه وسلم إلى أهل نجران وهم نصارى: "أن من (بايع)(4) منكم بالربا فلا ذمة له"(5).




শা’বী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজরানের অধিবাসী, যারা ছিল খ্রিস্টান, তাদের কাছে চিঠি লিখেছিলেন: "তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি সুদের (রিবার) ভিত্তিতে লেনদেন করবে, তার জন্য কোনো যিম্মা (নিরাপত্তা বা চুক্তি) থাকবে না।"




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [ع]: (أخبرنا).
(2) في [ع]: (أخبرنا).
(3) في [س]: (مجاهد).
(4) في [ع]: (باع).
(5) مرسل ضعيف؛ الشعبي تابعي، ومجالد ضعيف.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39793)


حدثنا أبو خالد الأحمر
عن يحيى بن سعيد أن عمر أجلى أهل نجران اليهود والنصارى، واشترى بياض أرضهم وكرومهم، فعامل عمر الناس إن هم جاءوا بالبقر والحديد من عندهم(1) فلهم الثلثان ولعمر الثلث، وإن جاء عمر بالبذر من عنده (فله الشطر)(2)، وعاملهم النخل على أن لهم الخمس ولعمر
أربعة أخماس، وعاملهم الكرم على أن لهم الثلث ولعمر
الثلثان(3).




ইয়াহইয়া ইবনু সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন যে, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নাজরাণের ইহুদি ও খ্রিস্টানদেরকে (সেখান থেকে) বের করে দেন এবং তিনি তাদের অনাবাদী জমি ও আঙ্গুরের বাগানগুলো কিনে নেন।

অতঃপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের সাথে এই মর্মে চুক্তি করেন যে, যদি তারা নিজেদের পক্ষ থেকে গরু ও (কৃষি) সরঞ্জামাদি নিয়ে আসে, তাহলে তারা পাবে (ফসলের) দুই-তৃতীয়াংশ এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পাবেন এক-তৃতীয়াংশ। আর যদি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজের পক্ষ থেকে বীজ সরবরাহ করেন, তবে তিনি পাবেন অর্ধেক (ফসলের)।

আর তিনি খেজুর গাছের বিষয়ে তাদের সাথে এই চুক্তি করেন যে, তাদের জন্য থাকবে এক-পঞ্চমাংশ এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য থাকবে চার-পঞ্চমাংশ। আর তিনি আঙ্গুরের বাগানের বিষয়ে এই চুক্তি করেন যে, তাদের জন্য থাকবে এক-তৃতীয়াংশ এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জন্য থাকবে দুই-তৃতীয়াংশ।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [أ، ب،
س]: زيادة (منهم).
(2) سقط من: [أ، ب].
(3) منقطع؛ يحيى بن سعيد لم يدرك عمر.









মুসান্নাফ ইবনে আবি শায়বাহ (39794)


حدثنا وكيع حدثنا الأعمش عن سالم قال: كان أهل نجران قد بلغوا أربعين ألفًا، قال: وكان عمر يخافهم أن يميلوا على المسلمين فتحاسدوا بينهم، قال: فأتوا عمر، فقالوا: إنا قد تحاسدنا بيننا فأَجْلنا، قال: وكان رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قد كتب لهم كتابا أن لا يجلوا، قال: فاغتنمها عمر فأجلاهم
فندموا فأتوه، فقالوا: أقلنا، فأبى أن يقيلهم، فلما قدم علي أتوه فقالوا: إنا نسألك بخط يمينك وشفاعتك عند نبيك(1) ألا أقلتنا، فأبى وقال: ويحكم، إن عمر كان رشيد الأمر، قال سالم:

فكانوا يرون أن عليًا لو كان طاعنا على عمر في شيء من أمره طعن عليه في أهل نجران(2).




সালিম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত:

তিনি বলেন, নাজরানের অধিবাসীর সংখ্যা চল্লিশ হাজারে পৌঁছে গিয়েছিল। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ভয় করতেন যে, তারা (সংখ্যাধিক্যের কারণে) মুসলমানদের উপর চড়াও হতে পারে। এরপর তারা নিজেরা একে অপরের প্রতি ঈর্ষান্বিত হয়ে পড়ল। তখন তারা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে বলল, আমরা নিজেদের মধ্যে হিংসা-দ্বেষে লিপ্ত হয়ে পড়েছি, সুতরাং আপনি আমাদের স্থানান্তরিত করুন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য একটি চুক্তি লিখে দিয়েছিলেন যে, তাদের স্থানান্তরিত করা হবে না। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই সুযোগটি কাজে লাগালেন এবং তাদের স্থানান্তরিত করলেন।

এরপর তারা অনুতপ্ত হলো এবং তাঁর (উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর) কাছে এসে বলল, আমাদের প্রত্যাবর্তন করিয়ে দিন। কিন্তু তিনি তাদের প্রত্যাবর্তন করাতে অস্বীকার করলেন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (খলীফা হয়ে) এলেন, তখন তারা তাঁর নিকট এসে বলল, আমরা আপনার নিকট আপনার হাতের শপথ এবং আপনার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট আপনার সুপারিশের (মর্যাদার) উসিলায় প্রার্থনা করছি যে, আপনি কি আমাদের প্রত্যাবর্তন করাবেন না? তিনি অস্বীকার করলেন এবং বললেন: তোমাদের ধ্বংস হোক! নিশ্চয় উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সঠিক সিদ্ধান্ত গ্রহণকারী ছিলেন।

সালিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, তারা দেখত যে, যদি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কোনো বিষয়ে আপত্তি করতেন, তবে তিনি নাজরানবাসীদের বিষয়েই আপত্তি করতেন (কিন্তু তিনি করেননি)।




تحقيق: الشيخ سعد بن ناصر الشثري

(1) في [جـ، ي]: زيادة ﷺ.
(2) منقطع؛ سالم بن أبي الجعد لم يدرك عمر، أخرجه مسدد كما في المطالب (3885)، وأبو عبيد في الأموال (273)، ومقاتل في التفسير 1/
212، والآجري في الشريعة (1235)، والبيهقي 10/ 120، وابن عساكر 44/ 364، والفاكهي في أخبار مكة (2919)، والبلاذري في فتوح البلدان ص 78.