হাদীস বিএন


শারহু মা’আনিল-আসার





শারহু মা’আনিল-আসার (4494)


حدثنا الحسن بن عبد الله بن منصور، قال: ثنا الهيثم بن جميل، قال: ثنا هشيم، عن يحيى بن سعيد، عن عبيد الله بن زحر، عن أبي سعيد اليحصبي، عن عبد الله بن مالك، عن عقبة بن عامر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم … مثله . قالوا: فتلك الثلاثة الأيام إنما كانت كفارة ليمينها التي كانت بها حالفة، لقولها: لله علي أن أحج ماشية. وقد دل على ذلك ما




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... তাঁরা বললেন, সেই তিন দিন কেবল তার কসমের (শপথের) কাফফারা ছিল, যা সে করেছিল তার এই উক্তির কারণে: ‘আল্লাহর জন্য আমার উপর কর্তব্য হলো আমি হেঁটে হজ্ব করব।’ আর এর প্রমাণ মেলে...




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (4495)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا سعيد بن سليمان، عن شريك، عن محمد بن عبد الرحمن مولى آل طلحة، عن كريب، عن ابن عباس قال: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله إن أختي نذرت أن تحج ماشية، فقال: إن الله لا يصنع بشقاء أختك شيئا، لتحج راكبة وتكفر عن يمينها . وخالف هؤلاء أيضا آخرون فقالوا: بل نأمر هذا الذي نذر أن يحج ماشيا أن يركب ويكفر عن يمينه إن كان أراد يمينا، ونأمره مع هذا بالهدي. وكان من الحجة لهم في ذلك




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমার বোন মানত করেছে যে সে হেঁটে হজ করবে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তোমার বোনের কষ্টের মাধ্যমে কিছুই চান না। সে যেন আরোহণ করে হজ করে এবং তার কসমের কাফফারা আদায় করে।

আর এই (মতামত দানকারী) লোকজনের সঙ্গে অন্যরাও ভিন্নমত পোষণ করেছেন এবং বলেছেন: বরং আমরা সেই ব্যক্তিকে, যে হেঁটে হজ করার মানত করেছে, তাকে আরোহণ করতে এবং যদি সে কসমের উদ্দেশ্য করে থাকে তবে তার কসমের কাফফারা দিতে নির্দেশ দেব। আর এর সাথে আমরা তাকে হাদী (কুরবানি) করতেও নির্দেশ দেব। এর স্বপক্ষে তাদের যুক্তি ছিল...




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن في المتابعات من أجل شريك بن عبد الله القاضي.









শারহু মা’আনিল-আসার (4496)


أن علي بن شيبة قد حدثنا، قال: ثنا يزيد بن هارون، قال: أخبرنا همام بن يحيى، عن قتادة، عن عكرمة، عن ابن عباس: أن عقبة بن عامر الجهني أتى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره أن أخته نذرت أن تمشي إلى الكعبة حافية ناشرة شعرها، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم: "مرها فلتركب ولتختمر ولتهد هديا" .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উকবাত ইবনু আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁকে জানালেন যে, তার বোন মানত করেছে যে সে খালি পায়ে, চুল খোলা অবস্থায় হেঁটে কা’বা শরীফ পর্যন্ত যাবে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তাকে আদেশ দাও যেন সে আরোহণ করে, ওড়না পরিধান করে (মাথা ঢেকে রাখে) এবং একটি কুরবানীর পশু (হাদিয়া হিসেবে) প্রেরণ করে।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (4497)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا عيسى بن إبراهيم، قال: ثنا عبد العزيز بن مسلم، قال: ثنا مطر الوراق، عن عكرمة، عن عقبة بن عامر الجهني، قال: نذرت أختي أن تمشي إلى الكعبة، فأتى عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما لهذه؟ فقالوا: نذرت أن تمشي إلى الكعبة، فقال: إن الله لغني عن مشيها، مرها فلتركب ولتهد بدنة . ففي هذا الحديث أن النبي صلى الله عليه وسلم أمرها بالهدي لمكان ركوبها. فتصحيح هذه الآثار كلها يوجب أن يكون حكم من نذر أن يحج ماشيا أن يركب إن أحب ذلك، ويهدي هديا لتركه المشي، ويكفر عن يمينه لحنثه فيها. وبهذا كان أبو حنيفة وأبو يوسف، ومحمد رحمهم الله، يقولون. وأما وجه وجه النظر في ذلك، فإن قوما قالوا: ليس المشي فيما يوجبه نذر، لأن فيه تعبا للأبدان، وليس الماشي في حال مشيه في حرمة إحرام، فلم يوجبوا عليه المشي ولا بدلا من المشي. فنظرنا في ذلك فرأينا الحج فيه الطواف بالبيت والوقوف بعرفة وبجمع. وكان الطواف منه ما يفعله الرجل في حال إحرامه وهو طواف الزيارة. ومنه ما يفعله الرجل بعد أن يحل من إحرامه، وهو طواف الصدر. وكان ذلك كله من أسباب الحج، قد أريد أن يفعله الرجل ماشيا، وكان من فعله راكبا مقصرا، وجعل عليه الدم، هذا إذا كان فعله لا من عذر، وإن كان فعله من علة، فإن الناس مختلفون في ذلك. فقال بعضهم: لا شيء عليه، وممن قال بذلك: أبو حنيفة وأبو يوسف ومحمد رحمهم الله تعالى وقال بعضهم: عليه دم وهذا هو النظر -عندنا- لأن العلل إنما تسقط الآثام في انتهاك الحرمات، ولا تسقط الكفارات. ألا ترى أن الله عز وجل قال: {وَلَا تَحْلِقُوا رُءُوسَكُمْ حَتَّى يَبْلُغَ الْهَدْيُ مَحِلَّهُ} فكان حلق الرأس حراما على المحرم في إحرامه إلا من عذر، فإن حلقه فعليه الإثم والكفارة، وإن اضطر إلى حلقه فعليه الكفارة ولا إثم عليه. فكان العذر يسقط به الآثام، ولا تسقط به الكفارات، فكان يجيء في النظر أن يكون كذلك حكم الطواف بالبيت إذا كان من طافه راكبا للزيارة لا من عذر فعليه دم إلا أن يكون من طافه من عذر راكبا كذلك أيضا. فهذا حكم النظر في هذا الباب وهو قياس قول زفر. ولكن أبا حنيفة وأبا يوسف ومحمدا لم يجعلوا على من طاف بالبيت طواف الزيارة راكبا من عذر شيئا. فلما ثبت بالنظر ما ذكرنا كان كذلك المشي لما رأيناه قد يجب بعد فراغ الإحرام إذ كان من أسبابه، كما يجب في الإحرام، كان كذلك المشي الذي قبل الإحرام من أسباب الإحرام حكمه حكم المشي الواجب في الإحرام. فلما كان على تارك المشي الواجب في الإحرام دم كان على تارك هذا المشي الواجب قبل الإحرام دم أيضا، وذلك واجب عليه في حال قوته على المشي، وفي حال عجزه عنه في قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد أيضا، وذلك دليل لنا صحيح على ما بيناه من حكم الطواف بالحمل في حال القوة عليه وفي حال العجز عنه. فإن قال قائل: فإذا وجب عليه المشي بإيجابه على نفسه أن يحج ماشيا، وكان ينبغي إذا ركب أن يكون في معنى من لم يأت بما أوجب على نفسه فيكون عليه أن يحج بعد ذلك ماشيا فيكون كمن قال: لله علي أن أصلي ركعتين قائما فصلاهما قاعدا. فمن الحجة عندنا على قائل هذا القول: أنا رأينا الصلوات المفروضات التي علينا أن نصليها قياما، ولو صليناها قعودا لا لعذر وجب علينا إعادتها، وكنا في حكم من لم يصلها. وكان من حج منا حجة الإسلام التي يجب علينا المشي في الطواف لها، فطاف ذلك الطواف راكبا، ثم رجع إلى أهله لم يجعل في حكم من لم يطف، ويؤمر بالعود بل قد جعل في حكم من طاف، وأجزأه طوافه ذلك إلا أنه جعل عليه دم لتقصيره. فكذلك الصلوات الواجبة بالنذر، والحج الواجب بالنذر، هما مقيسان على الصلاة والحج الواجبين بإيجاب الله عز وجل. فما كان من ذلك مما وجب بإيجاب الله يكون المقصر فيه في حكم تاركه، كان كذلك ما وجب عليه من ذلك الجنس بإيجابه إياه على نفسه فقصر فيه، يكون بتقصيره فيه في حكم تاركه فعليه إعادته. وما كان من ذلك مما وجب بإيجاب الله عليه فقصر فيه فلم يجب عليه إعادته، ولم يكن بذلك التقصير في حكم تاركه، كان كذلك ما وجب عليه من ذلك الجنس بإيجابه إياه على نفسه فقصر فيه، فلا يكون بذلك التقصير في حكم تاركه، فيجب عليه إعادته، ولكنه في حكم فاعله وعليه لتقصيره ما يجب عليه من التقصير في أشكاله الدماء. وهذا قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله تعالى.




উকবাহ ইবনে আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার বোন কা’বা শরীফ পর্যন্ত হেঁটে যাওয়ার মানত করেছিল। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার নিকট দিয়ে অতিক্রম করার সময় জিজ্ঞাসা করলেন: ’এর কী হয়েছে?’ লোকেরা বলল: ’সে কা’বা শরীফ পর্যন্ত হেঁটে যাওয়ার মানত করেছে।’ তিনি বললেন: ’নিশ্চয়ই আল্লাহ তার হেঁটে যাওয়ার প্রতি মুখাপেক্ষী নন। তাকে আদেশ করো যেন সে আরোহণ করে এবং একটি উট কুরবানী করে (হাদী দেয়)।’

এই হাদীসে প্রমাণিত হয় যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে আরোহণের কারণে হাদী (কুরবানী) দেওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন। এই সকল হাদীসের সমন্বয়ে সিদ্ধান্ত হয় যে, যে ব্যক্তি হেঁটে হজ্জ করার মানত করে, যদি সে চায় তবে সে আরোহণ করতে পারে, তবে হেঁটে না যাওয়ার কারণে তাকে একটি হাদী (পশু) কুরবানী দিতে হবে এবং মানত ভঙ্গ করার কারণে তাকে কসমের কাফফারা আদায় করতে হবে। আর এটাই ইমাম আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর অভিমত।

তবে এর বিপরীত একটি দলিলের প্রেক্ষাপট হলো এই যে, কিছু লোক বলেছেন: হেঁটে যাওয়া এমন কিছু নয় যা মানতের মাধ্যমে আবশ্যক হয়, কারণ এতে শরীরের উপর কষ্ট হয়, আর হেঁটে যাওয়া ব্যক্তি হাঁটার সময় ইহরামের পবিত্রতার অবস্থায় থাকে না। তাই তারা তার উপর হেঁটে যাওয়া বা হেঁটে যাওয়ার পরিবর্তে অন্য কিছু আবশ্যক করেননি।

আমরা বিষয়টি বিশ্লেষণ করে দেখেছি যে, হজ্জের মধ্যে রয়েছে কা’বা শরীফের তাওয়াফ, আরাফাতে অবস্থান এবং মুযদালিফায় অবস্থান। তাওয়াফের মধ্যে কিছু তাওয়াফ রয়েছে যা মানুষ ইহরামের অবস্থায় করে, যেমন ’তাওয়াফে যিয়ারত’। আবার কিছু তাওয়াফ রয়েছে যা মানুষ ইহরামমুক্ত হওয়ার পর করে, যেমন ’তাওয়াফে সদর’ (বিদায়ী তাওয়াফ)। আর এই সব কিছুই হজ্জের এমন কারণসমূহের অন্তর্ভুক্ত, যা ব্যক্তির জন্য হেঁটে সম্পন্ন করা বাঞ্ছনীয়। যদি কেউ আরোহণ করে তা সম্পন্ন করে, তবে সে ত্রুটিপূর্ণ কাজ করল এবং তার উপর দম (কুরবানী) আবশ্যক হয়—এটা তখন, যখন সে বিনা ওজরে তা করে। আর যদি সে কোনো অসুস্থতা বা ওজরের কারণে তা করে, তবে এ বিষয়ে আলেমগণ ভিন্নমত পোষণ করেছেন।

তাদের মধ্যে কেউ কেউ বলেছেন: তার উপর কিছুই আবশ্যক নয়। যারা এই মত দিয়েছেন, তাদের মধ্যে রয়েছেন ইমাম আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)। আবার কেউ কেউ বলেছেন: তার উপর দম (কুরবানী) আবশ্যক। এটি আমাদের মতে সঠিক বিশ্লেষণ, কারণ ওজরসমূহ কেবল হারাম কাজ করার গুনাহকে মাফ করে দেয়, কিন্তু কাফফারাকে মাফ করে না। আপনি কি দেখেন না যে, আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "তোমরা তোমাদের মাথা মুণ্ডন করবে না, যতক্ষণ না হাদী তার নির্দিষ্ট স্থানে পৌঁছে যায়।" (সূরা বাকারা: ১৯৬)। অতএব, ইহরামের মধ্যে মুহরিমের জন্য মাথা মুণ্ডন করা হারাম—যদি না কোনো ওজর থাকে। যদি সে মাথা মুণ্ডন করে, তবে তার উপর গুনাহ ও কাফফারা উভয়ই বর্তায়। আর যদি সে মাথা মুণ্ডন করতে বাধ্য হয়, তবে তার উপর কাফফারা বর্তায়, কিন্তু গুনাহ হয় না। সুতরাং, ওজর দ্বারা গুনাহ মাফ হয়, কিন্তু কাফফারা মাফ হয় না।

অতএব, বিশ্লেষণে এটাই আসে যে, তাওয়াফে যিয়ারত যদি কেউ বিনা ওজরে আরোহণ করে করে, তবে তার উপর দম আবশ্যক হবে, তবে যদি সে ওজরের কারণে আরোহণ করে তাওয়াফ করে, তাহলেও দম আবশ্যক হবে। এটিই এই অধ্যায়ে বিশ্লেষণের ভিত্তিতে যুক্তিযুক্ত সিদ্ধান্ত, যা ইমাম যুফার (রহিমাহুল্লাহ)-এর মতের অনুকূলে। কিন্তু আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ) ওজরের কারণে তাওয়াফে যিয়ারত আরোহণ করে সম্পাদনকারীর উপর কিছুই আবশ্যক করেননি।

যখন বিশ্লেষণের মাধ্যমে আমরা যা উল্লেখ করলাম তা প্রতিষ্ঠিত হলো, তখন হেঁটে যাওয়ার মানতের ক্ষেত্রেও একই হুকুম হবে। যেহেতু আমরা দেখেছি যে, (তাওয়াফ ইত্যাদির জন্য) হেঁটে যাওয়া ইহরাম সমাপ্ত হওয়ার পরেও আবশ্যক হতে পারে কারণ তা হজ্জের কারণসমূহের অন্তর্ভুক্ত, ঠিক যেমন ইহরামের মধ্যে হেঁটে যাওয়া আবশ্যক হয়, তেমনিভাবে ইহরামের পূর্বে আবশ্যক হেঁটে যাওয়াও ইহরামের কারণসমূহের অন্তর্ভুক্ত এবং তার হুকুমও ইহরামের মধ্যে আবশ্যক হেঁটে যাওয়ার হুকুমের মতোই।

সুতরাং, ইহরামের মধ্যে আবশ্যক হেঁটে যাওয়া বর্জনকারীর উপর যেমন দম আবশ্যক হয়, তেমনিভাবে ইহরামের পূর্বে আবশ্যক হেঁটে যাওয়া বর্জনকারীর উপরও দম আবশ্যক হবে। আর আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর মতে, হেঁটে যাওয়ার ক্ষমতা থাকা অবস্থায় বা অক্ষমতা থাকা অবস্থায় উভয় ক্ষেত্রেই এটি তার উপর আবশ্যক। এটিই তাওয়াফে যিয়ারতের ক্ষেত্রে সক্ষমতা ও অক্ষমতার অবস্থায় আরোহণের হুকুম সম্পর্কে আমাদের ব্যাখ্যার যথার্থ প্রমাণ।

যদি কেউ প্রশ্ন করে: যদি হেঁটে যাওয়ার মানত করার মাধ্যমে তার উপর হেঁটে যাওয়া আবশ্যক হয়ে থাকে, তবে আরোহণ করলে তাকে এমন ব্যক্তির মতো গণ্য করা উচিত যে নিজের উপর আবশ্যককৃত কাজটি সম্পাদন করেনি, ফলে তাকে পরবর্তীতে হেঁটে হজ্জ করতে হবে। যেমন কেউ বলল: ’আল্লাহর জন্য আমার উপর আছে দুই রাকআত সালাত দাঁড়িয়ে আদায় করা’, কিন্তু সে তা বসে আদায় করল।

আমাদের নিকট এই প্রশ্নকারীর বিরুদ্ধে যুক্তি হলো: আমরা দেখি যে, আমাদের উপর ফরয সালাতগুলো দাঁড়িয়ে আদায় করা আবশ্যক। যদি আমরা বিনা ওজরে বসে তা আদায় করি, তবে আমাদের তা আবার আদায় করা আবশ্যক হবে এবং আমরা এমন ব্যক্তির হুকুমে পড়ব, যে সালাত আদায় করেনি। আর আমাদের মধ্যে কেউ যদি হজ্জে ইসলাম আদায় করে, যার তাওয়াফে হেঁটে যাওয়া আবশ্যক, কিন্তু সে তাওয়াফ আরোহণ করে করে, অতঃপর সে তার পরিবারের নিকট ফিরে যায়, তবে তাকে এমন ব্যক্তির হুকুমে গণ্য করা হয় না যে তাওয়াফ করেনি, বা তাকে ফিরে আসতে আদেশ দেওয়া হয় না। বরং তাকে এমন ব্যক্তির হুকুমে গণ্য করা হয় যে তাওয়াফ করেছে এবং তার তাওয়াফ যথেষ্ট হয়েছে, তবে ত্রুটি করার কারণে তার উপর দম আবশ্যক হয়েছে।

সুতরাং, মানতের দ্বারা ওয়াজিব হওয়া সালাত এবং মানতের দ্বারা ওয়াজিব হওয়া হজ্জ, আল্লাহর পক্ষ থেকে আবশ্যক হওয়া সালাত ও হজ্জের উপর কিয়াস (তুলনা) করা হবে। সেইসব আমল, যা আল্লাহর পক্ষ থেকে আবশ্যক হয়েছে এবং তাতে ত্রুটি করা হয়েছে, যদি ত্রুটির কারণে তা বর্জনকারীর হুকুমে পড়ে, তবে তা অবশ্যই পুনরায় করতে হবে। আর সেইসব আমল, যা আল্লাহর পক্ষ থেকে আবশ্যক হয়েছে এবং তাতে ত্রুটি করার পরেও যদি তা পুনরায় করা আবশ্যক না হয় এবং ঐ ত্রুটির কারণে সে বর্জনকারীর হুকুমে না পড়ে, তবে মানতের মাধ্যমে নিজের উপর আবশ্যককৃত একই প্রকারের আমলের ক্ষেত্রে ত্রুটি করলে সে বর্জনকারীর হুকুমে পড়বে না এবং তা পুনরায় করাও আবশ্যক হবে না। বরং সে আমলকারীর হুকুমে পড়বে এবং ত্রুটির কারণে তার উপর এমন ক্ষতিপূরণ আবশ্যক হবে যা তার সমতুল্য ত্রুটির জন্য আবশ্যক হয়—অর্থাৎ দম। আর এটিই আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর অভিমত।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن في المتابعات من أجل مطر الوراق.









শারহু মা’আনিল-আসার (4498)


حدثنا يزيد بن سنان، قال: ثنا يحيى بن سعيد القطان، قال: ثنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر رضي الله عنهما، أن رجلا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله إني نذرت في الجاهلية أن أعتكف في المسجد الحرام، فقال: "ف بنذرك" .




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করল, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি জাহিলিয়্যাতের যুগে মানত করেছিলাম যে, আমি মাসজিদুল হারামে ইতিকাফ করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার মানত পূর্ণ করো।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4499)


حدثنا علي بن شيبة، قال: ثنا إسحاق بن إبراهيم الحنظلي، قال: ثنا حفص بن غياث، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع عن ابن عمر، أراه عن عمر رضي الله عنه قال: قلت: يا رسول الله إني نذرت في الجاهلية نذرا وقد جاء الله بالإسلام، فقال: "ف بنذرك" .




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি জাহিলী যুগে একটি মান্নত করেছিলাম, আর এখন আল্লাহ ইসলাম নিয়ে এসেছেন। তখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার মান্নত পূর্ণ করো।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4500)


حدثنا يونس، قال ثنا ابن وهب، قال: أخبرني جرير بن حازم أن أيوب حدثه، أن نافعا حدثه، أن عبد الله بن عمر حدثه، أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بالجعرانة، فقال: يا رسول الله إني نذرت في الجاهلية أن أعتكف يوما في المسجد الحرام، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: "اذهب فاعتكف يوما" . قال أبو جعفر رحمه الله: فذهب قوم إلى أن الرجل إذا أوجب على نفسه شيئا في حال شركه من اعتكاف أو صدقة أو شيء مما يوجبه المسلمون الله، ثم أسلم أن ذلك واجب عليه، واحتجوا في ذلك بهذه الآثار. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: لا يجب عليه من ذلك شيء، واحتجوا في ذلك بما روي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি জি’ররানা নামক স্থানে থাকাকালীন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি জাহিলিয়্যাতের যুগে মানত করেছিলাম যে, আমি একদিন মসজিদুল হারামে ইতিকাফ করব।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যাও, একদিন ইতিকাফ করে নাও।" আবূ জা’ফর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: একদল আলিম এই মত পোষণ করেন যে, কোনো ব্যক্তি যদি তার শিরকের (অবিশ্বাসের) অবস্থায় নিজের উপর আল্লাহর উদ্দেশ্যে ইতিকাফ, সাদাকা বা অন্য এমন কোনো কিছু যা মুসলমানরা নিজেদের উপর ওয়াজিব করে, তা ওয়াজিব করে নেয় এবং তারপর ইসলাম গ্রহণ করে, তবে তা তার উপর আবশ্যক হয়ে যায়। তারা এই মতের স্বপক্ষে এই হাদীসসমূহ দ্বারা প্রমাণ পেশ করেন। আর অন্য একদল আলিম এ ব্যাপারে তাদের বিরোধিতা করেছেন। তারা বলেন: এর কোনো কিছুই তার উপর ওয়াজিব হবে না। তাঁরা এ ব্যাপারে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত অন্যান্য রিওয়ায়াত দ্বারা প্রমাণ পেশ করেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4501)


حدثنا سليمان بن شعيب، قال: ثنا يحيى بن حسان، قال: ثنا مالك بن أنس، عن طلحة بن عبد الملك الأيلي، عن القاسم بن محمد، عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "من نذر أن يطيع الله فليطعه، ومن نذر أن يعصي الله فلا يعصه" .




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর আনুগত্য করার মানত করে, সে যেন তা পালন করে, আর যে ব্যক্তি আল্লাহর নাফরমানি করার মানত করে, সে যেন তা না করে।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4502)


حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا عثمان بن عمر، قال: ثنا مالك … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু মারযূক, তিনি বললেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন উসমান ইবনু উমর, তিনি বললেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন মালিক... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح، وهو مكرر سابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (4503)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا عبد الله بن إدريس، عن عبيد الله بن عمر، عن طلحة بن عبد الملك … فذكر بإسناده مثله .




মুহাম্মাদ ইবনু খুযাইমাহ আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইউসুফ ইবনু আদী আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবদুল্লাহ ইবনু ইদরীস আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, উবাইদুল্লাহ ইবনু উমার থেকে, তিনি তালহা ইবনুল মালিক থেকে (বর্ণনা করেন)।... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ হাদীস উল্লেখ করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4504)


حدثنا يونس، قال: أنا ابن وهب، قال: أخبرني مالك، عن طلحة … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের কাছে ইউনুস হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: ইবনু ওয়াহব আমাকে অবহিত করেছেন, তিনি বলেছেন: মালিক আমাকে খবর দিয়েছেন, তালহা থেকে... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4505)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا أبو سلمة المنقري، قال: ثنا أبان، قال: ثنا يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن أبان، عن القاسم، عن عائشة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقول: "من نذر أن يعصي الله فلا يعصه" .




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর অবাধ্যতা করার মানত করে, সে যেন তাঁর অবাধ্যতা না করে।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4506)


حدثنا أبو بكرة، قال: ثنا أبو داود، قال: ثنا حرب بن شداد، قال: ثنا يحيى … فذكر بإسناده مثله .




আবু বাকরাহ আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবু দাঊদ আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: হারব ইবনু শাদ্দাদ আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইয়াহইয়া আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন... এরপর তিনি এই সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা উল্লেখ করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح، وهو مكرر سابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (4507)


حدثنا ربيع الجيزي، قال: ثنا يعقوب بن كعب الحلبي، قال: ثنا حاتم بن إسماعيل، عن أبي حرملة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "إنما النذر ما ابتغي به وجه الله تعالى" . قالوا: فلما كانت النذور إنما تجب إذا كانت مما يتقرب بها إلى الله تعالى ولا تجب إذا كانت معاصي الله تعالى وكان الكافر إذا قال الله علي صيام، أو قال: لله علي اعتكاف، فهو لو فعل ذلك لم يكن به إلى الله متقربا، وهو في وقت ما أوجبه إنما قصد به إلى ربه الذي يعبده من دون الله عز وجل وذلك معصية. فدخل ذلك في قول رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا نذر في معصية الله". وقد يجوز أيضا أن يكون قول رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمر: "ف بنذرك"، ليس من طريق أن ذلك كان واجبا عليه، ولكن على أنه قد كان سمح في حال ما نذره أن يفعله فهو في معصية الله عز وجل، فأمره النبي صلى الله عليه وسلم أن يفعله الآن على أنه طاعة الله عز وجل. فكان ما أمره به خلاف ما كان أوجبه هو على نفسه، وهذا قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله تعالى. ‌‌11 - كتاب الحدود




আবদুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "মানত তো কেবল তাই, যা দ্বারা আল্লাহ তাআলার সন্তুষ্টি কামনা করা হয়।"

তারা (আইনশাস্ত্রবিদগণ) বলেন, যখন মানত কেবল তখনই ওয়াজিব হয় যখন তা আল্লাহ তাআলার নৈকট্য লাভের মাধ্যম হয় এবং আল্লাহ তাআলার নাফরমানির ক্ষেত্রে তা ওয়াজিব হয় না। আর কোনো কাফির যখন বলে, ’আল্লাহর জন্য আমার উপর সিয়াম ওয়াজিব হলো’ অথবা সে বলে, ’আল্লাহর জন্য আমার উপর ইতিকাফ ওয়াজিব হলো’, সে যদি তা করেও, তবে এর মাধ্যমে সে আল্লাহর নৈকট্য লাভ করতে পারে না। আর যখন সে তা ওয়াজিব করে, তখন সে আল্লাহ তাআলা ছাড়া অন্য কোনো রবের দিকেই মূলত উদ্দেশ্য করে যাকে সে উপাসনা করে। আর এটাই হলো নাফরমানি। ফলে এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের এই বাণীর অন্তর্ভুক্ত হয়েছে: "আল্লাহর নাফরমানির ক্ষেত্রে কোনো মানত নেই।"

আর এমনও হতে পারে যে, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের "তুমি তোমার মানত পূরণ করো" কথাটি এই কারণে নয় যে তা উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর (পূর্ব থেকেই) ওয়াজিব ছিল, বরং এই কারণে যে যখন তিনি মানত করেছিলেন তখন তিনি তা করার অনুমতি দিয়েছিলেন, আর সেটি ছিল আল্লাহ তাআলার নাফরমানি। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে নির্দেশ দিলেন যেন তিনি এখন আল্লাহর আনুগত্য হিসেবে তা সম্পাদন করেন। অতএব, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে যা করতে নির্দেশ দিলেন তা তার নিজের উপর ওয়াজিব করার চেয়ে ভিন্ন ছিল। এটিই হলো ইমাম আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর অভিমত।

১১ - কিতাবুল হুদূদ।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن.









শারহু মা’আনিল-আসার (4508)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا علي بن الجعد، قال أخبرنا شعبة، عن قتادة، عن الحسن، عن حطان بن عبد الله الرقاشي، عن عبادة بن الصامت، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خذوا عني فقد جعل الله لهن سبيلا، البكر بالبكر، والثيب بالثيب، البكر يجلد وينفى، والثيب يجلد ويرجم" .




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার কাছ থেকে গ্রহণ করো। আল্লাহ তাদের (ব্যভিচারিণীদের) জন্য পথ (বিধান) তৈরি করেছেন। অবিবাহিতের সাথে অবিবাহিত, আর বিবাহিতের সাথে বিবাহিত (এর বিধান)। অবিবাহিতকে বেত্রাঘাত করা হবে এবং নির্বাসিত করা হবে, আর বিবাহিতকে বেত্রাঘাত করা হবে এবং রজম (পাথর নিক্ষেপ) করা হবে।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4509)


حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا يحيى الحماني، قال: ثنا وكيع عن الفضل بن دلهم، عن الحسن، عن قبيصة بن حريث، عن سلمة بن المحبق قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "خذوا عني قد جعل الله لهن سبيلا، البكر بالبكر جلد مائة، ونفي سنة، والثيب بالثيب جلد مائة والرجم" .




সালামাহ ইবনুল মুহাব্বিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার থেকে (বিধান) গ্রহণ করো। নিশ্চয় আল্লাহ তাদের জন্য একটি পথ (বিধান) তৈরি করেছেন। অবিবাহিত পুরুষের সাথে অবিবাহিত নারীর (শাস্তি) হলো একশত দোররা এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন। আর বিবাহিত পুরুষের সাথে বিবাহিত নারীর (শাস্তি) হলো একশত দোররা ও রজম (পাথর নিক্ষেপ)।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف، لضعف الفضل بن دلهم الواسطي على خطأ في إسناده، قال ابن أبي حاتم في "العلل" 1/ 456: سألت أبي عن حديث رواه الفضل بن دلهم، عن الحسن، عن قبيصة بن حريث، عن سلمة بن المحبق، عن النبي صلى الله عليه وسلم: "خذوا عني قد جعل الله لهن سبيلا









শারহু মা’আনিল-আসার (4510)


حدثنا يونس، وعيسى بن إبراهيم الغافقي، قالا: ثنا سفيان، عن الزهري، عن عبيد الله بن عبد الله، عن أبي هريرة، وزيد بن خالد الجهني، وشبل، قالوا: كنا قعودا عند النبي صلى الله عليه وسلم فقام إليه رجل، فقال: أنشدك الله إلا قضيت بيننا بكتاب الله عز وجل، فقام خصمه وكان أفقه منه، فقال: صدق اقض بيننا بكتاب الله، وإيذن لي، قال: قل، قال: إن ابني كان عسيفا على هذا فزني بامرأته، فافتديت منه بمائة شاة وخادم، ثم سألت رجالا من أهل العلم فأخبروني أن على ابني جلد مائة وتغريب عام، وعلى امرأة هذا الرجم، فقال: "والذي نفسي بيده، لأقضين بينكما بكتاب الله المائة الشاة والخادم ردّ عليك، وعلى ابنك جلد مائة وتغريب عام، واغد يا أنيس إلى امرأة هذا، فإن اعترفت فارجمها"، فغدا عليها فاعترفت فرجمها .




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও শিবল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বললেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে উঠে এসে বলল: আমি আপনাকে আল্লাহর নামে শপথ দিচ্ছি যে, আপনি অবশ্যই আমাদের মধ্যে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করে দিন। তার প্রতিপক্ষ দাঁড়িয়ে গেল, আর সে ছিল তার চেয়ে অধিক জ্ঞানী। সে বলল: সে সত্য বলেছে। আমাদের মধ্যে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করে দিন। আর আমাকে কথা বলার অনুমতি দিন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: বল। সে বলল: আমার পুত্র তার কাছে মজুর (শ্রমিক) হিসেবে কাজ করত এবং সে তার স্ত্রীর সাথে ব্যভিচার করেছে। আমি এর বিনিময়ে একশ’ ছাগল ও একটি গোলাম দিয়ে মুক্তিপণ দিয়েছিলাম। এরপর আমি জ্ঞানীদের কাছে জিজ্ঞাসা করলে তারা আমাকে জানালেন যে, আমার পুত্রের উপর একশ’ চাবুক ও এক বছরের জন্য নির্বাসন (বা দেশান্তর) এবং এই ব্যক্তির স্ত্রীর উপর রজম (পাথর নিক্ষেপ করে মৃত্যুদণ্ড) কার্যকর হবে। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: যাঁর হাতে আমার প্রাণ, তাঁর শপথ! আমি অবশ্যই তোমাদের মধ্যে আল্লাহর কিতাব অনুযায়ী ফয়সালা করব। একশ’ ছাগল ও গোলাম তোমার নিকট ফেরতযোগ্য। আর তোমার পুত্রের উপর একশ’ চাবুক ও এক বছরের জন্য নির্বাসন কার্যকর হবে। আর হে উনায়স! তুমি আগামীকাল সকালে এই ব্যক্তির স্ত্রীর কাছে যাও, যদি সে স্বীকার করে, তবে তাকে রজম করো। অতঃপর তিনি (উনায়স) তার কাছে গেলেন এবং সে স্বীকার করল, ফলে তিনি তাকে রজম করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح، لكنه وهم فيه سفيان بن عيينة حيث ذكر شبلا وهو شبل بن حامد المزني ليس له صحبة.









শারহু মা’আনিল-আসার (4511)


حدثنا يونس، قال أخبرنا ابن وهب، قال: أخبرني يونس، ومالك، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي هريرة، وزيد بن خالد الجهني، قالا: كنا جلوسا عند النبي صلى الله عليه وسلم … ثم ذكر نحوه . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى أن البكر إذا زنى فعليه جلد مائة، وتغريب عام، واحتجوا في ذلك بهذه الآثار. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: حد البكر إذا زنى مائة جلدة ولا نفي عليه الجلد، إلا أن يرى الإمام أن ينفيه للدعارة التي كانت منه، فينفيه إلى حيث أحب، كما ينفى الدعار غير الزناة. واحتجوا في ذلك بما




আবু হুরায়রা ও যায়েদ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তারা উভয়ে বললেন: আমরা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট উপবিষ্ট ছিলাম... অতঃপর তিনি অনুরূপ বর্ণনা করলেন। আবু জাফর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: কিছু লোক এই মত পোষণ করেন যে, কোনো অবিবাহিত ব্যক্তি যদি যেনা করে, তবে তাকে একশ’ ঘা বেত্রাঘাত এবং এক বছরের জন্য নির্বাসন দিতে হবে। তারা এর পক্ষে এই হাদীসগুলো দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন।

অন্যেরা তাদের সাথে ভিন্নমত পোষণ করে বলেছেন: অবিবাহিত ব্যক্তির যেনার শাস্তি হলো একশ’ ঘা বেত্রাঘাত, এর সাথে নির্বাসন দেওয়া হবে না। তবে যদি ইমাম (শাসক) মনে করেন যে, তার কৃত অশ্লীলতা ও দুষ্কর্মের কারণে তাকে নির্বাসন দেওয়া প্রয়োজন, তবে তিনি তাকে তাঁর ইচ্ছানুযায়ী স্থানে নির্বাসন দিতে পারেন, যেভাবে অন্যান্য দুষ্কৃতিকারী—যারা যেনাকারী নয়—তাদেরও নির্বাসন দেওয়া হয়। আর তারা এর পক্ষে প্রমাণ পেশ করেছেন যে...।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (4512)


حدثنا يونس، قال أخبرنا ابن وهب، أن مالكا أخبره، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن أبي هريرة وزيد بن خالد الجهني، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن الأمة إذا زنت ولم تحصن، فقال: "إذا زنت فاجلدوها، ثم إن زنت فاجلدوها، ثم إن زنت فاجلدوها، ثم بيعوها ولو بضفير"، قال مالك: قال ابن شهاب: لا أدري أبعد الثالثة أو الرابعة .




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও যায়দ ইবনু খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে এমন দাসী সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল যে ব্যভিচার করেছে অথচ সে বিবাহিতা ছিল না (মুহসানাহ ছিল না)। তিনি বললেন: "সে ব্যভিচার করলে তাকে বেত্রাঘাত কর। অতঃপর সে আবার ব্যভিচার করলে তাকে বেত্রাঘাত কর। অতঃপর সে আবার ব্যভিচার করলে তাকে বেত্রাঘাত কর। অতঃপর তাকে বিক্রি করে দাও, যদিও তা সামান্য রশির বিনিময়ে হয়।" মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: আমি জানি না— (বিক্রির নির্দেশটি) তৃতীয়বারের পরে, নাকি চতুর্থবারের পরে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (4513)


حدثنا يونس، قال أخبرنا ابن وهب، قال: أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، أن شبل بن خالد أخبره، أن عبد الله بن مالك الأوسي أخبره، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "الوليدة إذا زنت … " مثله إلا أنه قال في الثالثة أو الرابعة: البيع . وأخبره زيد بن خالد صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم مثل ذلك، قال أبو جعفر: هذا خطأ شبل هذا ابن خليد المزني.




আব্দুল্লাহ ইবন মালিক আল-আওসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাসী যখন ব্যভিচার করে..." (পূর্বের বর্ণনার) অনুরূপ, তবে (বর্ণনাকারী) তৃতীয়বার অথবা চতুর্থবারে ’বিক্রি’ শব্দটি বলেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী যায়েদ ইবন খালিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও তাঁকে অনুরূপ হাদীস সম্পর্কে অবহিত করেছেন। আবূ জাফর বলেন: এটা ভুল। এই শিবল হলেন ইবন খুলীদ আল-মুযানী।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن رجاله ثقات رجال الشيخين، غير شبل بن حامد صوابه: شبل بن خليد روي عنه جمع وذكره ابن حبان في الثقات.