শারহু মা’আনিল-আসার
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا عبد الله بن المبارك، عن محمد بن إسحاق، قال: سألت أبا جعفر فقلت: رأيت علي بن أبي طالب رضي الله عنه حيث ولي العراق وما ولي من أمر الناس كيف صنع في سهم ذوي القربى؟ قال: سلك به والله سبيل أبي بكر وعمر رضي الله عنهما فقلت: وكيف وأنتم تقولون ما تقولون؟ قال: أم والله ما كان أهله يصدرون إلا عن رأيه، قلت: فما منعه؟ قال: كره والله أن يدعى عليه خلاف أبي بكر وعمر رضي الله عنهما . فهذا علي بن أبي طالب رضي الله عنه، قد أجراه على ما كان أبو بكر وعمر رضي الله عنهما أجرياه عليه؛ لأنَّه رأى ذلك عدلًا، ولو كان رأيه خلاف ذلك مع علمه ودينه وفضله إذًا لرده إلى ما رأى. واحتجوا في ذلك أيضًا بما
আবূ জাফর থেকে বর্ণিত, (মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: আমি জানতে চাই আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন ইরাকের শাসক হলেন এবং যখন তিনি মানুষের দায়িত্ব গ্রহণ করলেন, তখন তিনি ’যুওয়াল কুরবা’ (নিকটাত্মীয়দের) অংশের ব্যাপারে কী করেছিলেন?
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! তিনি এ ব্যাপারে আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পথ অনুসরণ করেছিলেন।
আমি বললাম: (তিনি কেন তা করলেন) অথচ আপনারা তো ভিন্ন মত পোষণ করেন?
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! তার পরিবারের লোকেরা কেবল তাঁর (আলীর) মতানুসারেই কাজ করত।
আমি বললাম: তবে কিসে তাকে (আলীকে) বাধা দিল?
তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! তিনি অপছন্দ করতেন যে, কেউ যেন আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সিদ্ধান্তের বিরোধিতা করার অভিযোগ তাঁর ওপর দেয়।
আর এই হলেন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি (নিকটাত্মীয়দের অংশকে) সেভাবেই জারি রেখেছিলেন যেভাবে আবূ বাকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জারি রেখেছিলেন। কারণ তিনি এটাকে ন্যায়সঙ্গত মনে করতেন। যদি তাঁর জ্ঞান, ধর্ম ও মর্যাদার সাথে এর বিপরীত কোনো মত থাকত, তবে তিনি অবশ্যই তা (তাদের নীতি) বাতিল করে নিজের মত প্রতিষ্ঠা করতেন। এবং তারা এ ব্যাপারে আরও যা দিয়ে যুক্তি দিয়েছেন...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده مرسل، قال عبد الرحمن بن أبي حاتم قال أبو زرعة: محمد بن علي بن الحسين عن علي مرسل، وقال: سمعت أبا زرعة يقول: محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب لم يدرك هو ولا أبوه علياء المراسيل (ص 185 - 186).
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا ابن المبارك، عن سفيان، عن قيس بن مسلم، قال: سألت الحسن بن محمد بن علي عن قول الله عز وجل {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ} [الأنفال: 41] فقال: أما قوله: "فأن الله خمسه" فهو مفتاح كلام الله الدنيا والآخرة، للرسول ولذي القربى واليتامى والمساكين . واختلف الناس بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال قائل منهم: سهم ذوي القربى لقرابة الخليفة. وقال قائل: سهم النبي صلى الله عليه وسلم للخليفة من بعده، ثم اجتمع رأيهم أن جعلوا هذين السهمين في الخيل والعدة في سبيل الله، عز وجل، فكان ذلك في إمارة أبي بكر وعمر رضي الله عنهما قال: أفلا ترى أن ذلك مما قد اجتمع أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه راجع إلى الكراع والسلاح الذي يكون عدةً للمسلمين لقتال عدوهم، ولو كان ذلك لذوي قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم لما منعوا منه، ولا صرف إلى غيرهم، ولا خفي ذلك على الحسن بن محمد مع علمه في أهله، وتقدمه فيهم، وقد قال ذلك أيضًا عبد الله بن عباس رضي الله عنهما في جوابه لنجدة لما كتب إليه يسأله عن سهم ذوي القربى. وذكروا في ذلك ما
কায়স ইবনে মুসলিম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হাসান ইবনে মুহাম্মাদ ইবনে আলীকে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল-এর বাণী: {তোমরা জেনে রেখো, তোমরা যা কিছু গণীমত রূপে অর্জন করো, তার এক-পঞ্চমাংশ আল্লাহর জন্য} [সূরা আনফাল: ৪১] সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম।
তিনি (আল-হাসান) বললেন: আল্লাহ তাআলার বাণী "ফালিল্লাহি খুমুসাহু" (তার এক-পঞ্চমাংশ আল্লাহর জন্য)—এটি দুনিয়া ও আখিরাতে আল্লাহ তাআলার বাণীর চাবিকাঠি। এটি (ভাগ করা হয়েছে) রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম এবং অভাবগ্রস্তদের জন্য। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ওফাতের পর লোকেরা মতভেদ করল। তাদের কেউ কেউ বললেন: নিকটাত্মীয়দের অংশ খলীফার আত্মীয়দের জন্য। আবার কেউ বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অংশ তাঁর পরবর্তী খলীফার জন্য। অতঃপর তাদের সম্মিলিত সিদ্ধান্ত হলো যে তারা এই দুটি অংশকে আল্লাহর রাস্তায় ঘোড়া ও যুদ্ধ সরঞ্জামের জন্য ব্যবহার করবেন। এটি আবূ বকর ও উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতকালে কার্যকর হয়েছিল।
তিনি বললেন: আপনি কি দেখতে পাচ্ছেন না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণ এ বিষয়ে ঐকমত্যে পৌঁছেছিলেন যে এটি (এই অংশ) যুদ্ধ সরঞ্জাম ও অস্ত্রের জন্য ফেরত যাবে, যা মুসলমানদেরকে তাদের শত্রুদের সাথে লড়াইয়ের জন্য প্রস্তুত করবে? যদি এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকটাত্মীয়দের জন্য নির্দিষ্ট থাকত, তবে তাদের থেকে এটি কখনোই ফিরিয়ে নেওয়া হতো না এবং অন্যদের দিকেও সরিয়ে দেওয়া হতো না। তাদের (নবীর পরিবারের) বিষয়ে জ্ঞানের গভীরতা এবং তাদের মধ্যে তাঁর অগ্রগণ্য অবস্থান থাকা সত্ত্বেও হাসান ইবনে মুহাম্মাদের কাছে এ বিষয়টি গোপন ছিল না।
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-ও নাজদাকে লেখা তার জবাবে এই একই কথা বলেছিলেন, যখন সে (নাজদা) নিকটাত্মীয়দের অংশ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করে তাঁকে চিঠি লিখেছিল। আর তারা এ বিষয়ে উল্লেখ করেছেন যে... (বাক্যটি এখানে অসম্পূর্ণ)।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا عبد الله بن محمد بن أسماء، قال حدثني عمي جويرية بن أسماء، عن مالك بن أنس، عن ابن شهاب أن يزيد بن هرمز حدثه، أن نجدة صاحب اليمامة كتب إلى ابن عباس يسأله عن سهم ذوي القربي، فكتب إليه ابن عباس: إنه لنا، وقد كان دعانا عمر بن الخطاب رضي الله عنه لننكح منه أيمنا، ونقضي منه عن غارمنا، فأبينا إلا أن يسلمه لنا كله، ورأينا أنه لنا .
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়ামামার অধিবাসী নাজদা তাঁর নিকট পত্র লিখে ধাবি’ল-কুরবা (নিকটাত্মীয়দের) অংশ সম্পর্কে জানতে চান। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জবাবে তাঁকে লিখলেন: "নিশ্চয়ই তা আমাদের প্রাপ্য। এর আগে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদেরকে ডেকেছিলেন, যেন আমরা এর থেকে আমাদের বিধবাদের বিবাহ দেই এবং আমাদের ঋণগ্রস্তদের ঋণ পরিশোধ করি। কিন্তু আমরা সম্পূর্ণ অংশ আমাদের কাছে হস্তান্তর করা ব্যতীত তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করেছিলাম এবং আমরা মনে করি এটি সম্পূর্ণই আমাদের প্রাপ্য।"
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا وهب بن جرير، قال: ثنا أبي، قال: سمعت قيسًا يحدث، عن يزيد بن هرمز، قال: كتب نجدة بن عامر إلى ابن عباس رضي الله عنهما يسأله عن سهم ذوي القربي الذي ذكر الله وفرض لهم، فكتب إليه وأنا شاهد: كنا نرى أنهم قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم فأبى ذلك علينا قومنا . فهذا ابن عباس رضي الله تعالى عنهما يخبر أن قومهم أبوا عليهم أن يكون لهم، ولم يظلم من أبى ذلك عليه. فدل أن ما أريد في ذلك بقرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم هو ما ذكرنا من الفقر والحاجة، فهذه حجج من ذهب إلى أن ذوي القربى لا سهم لهم من الخمس، وأن ذلك لم يكن لهم في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا من بعده. وقد خالفهم في ذلك آخرون ، فقالوا: قد كان لهم سهم على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو خمس الخمس، وكان لرسول الله صلى الله عليه وسلم أن يضعه فيمن شاء منهم. وذكروا في ذلك ما
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযিদ ইবনে হুরমুয বলেন: নাজদা ইবনে আমির (Najdah ibn Amir) ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখেছিলেন, আল্লাহ্ তা‘আলা যে আত্মীয়-স্বজনের অংশ (সাহম ধাওয়িল কুরবা) উল্লেখ করেছেন এবং তাদের জন্য ফরজ করেছেন, সে বিষয়ে জানতে চেয়ে। তখন তিনি (ইবনে আব্বাস) আমার উপস্থিতিতে তাকে লিখে পাঠান: আমরা মনে করতাম যে তারা হলেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়-স্বজন (নিকটাত্মীয়)। কিন্তু আমাদের লোকেরা তা মানতে অস্বীকার করেছিল। এই ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খবর দিচ্ছেন যে তাদের লোকেরা তাদের জন্য সেই অংশ থাকতে অস্বীকার করেছিল, এবং যারা তা অস্বীকার করেছে তারা যুলুম করেনি। এতে প্রমাণিত হয় যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আত্মীয়-স্বজন দ্বারা যা বোঝানো হয়েছে, তা হলো—আমরা যা উল্লেখ করেছি, অর্থাৎ দারিদ্র্য ও প্রয়োজন। এগুলি হলো তাদের যুক্তি, যারা এই মতে যান যে নিকটাত্মীয়দের (ধাওয়িল কুরবার) জন্য খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) থেকে কোনো অংশ নেই, এবং এটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে বা তাঁর পরেও তাদের জন্য ছিল না। কিন্তু অন্য অনেকে তাদের সাথে দ্বিমত পোষণ করেছেন এবং বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তাদের জন্য অংশ ছিল, আর তা হলো খুমুসের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুসের খুমুস)। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অধিকার ছিল যে তিনি তাদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা তা দেবেন। আর তারা এ বিষয়ে যা উল্লেখ করেছেন...।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن بحر بن مطر، وعلي بن شيبة البغداديان، قالا: ثنا يزيد بن هارون، قال أخبرنا محمد بن إسحاق، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن جبير بن مطعم قال: لما قسم رسول الله صلى الله عليه وسلم سهم ذوي القربي، أعطى بني هاشم وبني المطلب ولم يعط بني أمية شيئًا، فأتيت أنا وعثمان رضي الله عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلنا: يا رسول الله، هؤلاء بنو هاشم فضلهم الله بك، فما بالنا وبني المطلب؟ وإنما نحن وهم في النسب شيء واحد فقال: "إن بني المطلب لم يفارقوني في الجاهلية ولا في الإسلام" . قالوا: فلما أعطى رسول الله صلى الله عليه وسلم ذلك السهم بعض القرابة، وحرم من قرابته منه كقرابتهم، ثبت بذلك أن الله عز وجل لم يرد بما جعل لذوي القربى كل قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإنما أراد به خاصا منهم، وجعل الرأي في ذلك إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم يضعه فيمن شاء منهم، وإذا مات فانقطع رأيه انقطع ما جعل لهم من ذلك، كما قد جعل لرسول الله صلى الله عليه وسلم أن يصطفي من المغنم لنفسه سهم الصفي، فكان ذلك له ما كان حيا يختار لنفسه من المغنم ما شاء، فلما مات انقطع ذلك. وممن ذهب إلى هذا القول أبو حنيفة وأبو يوسف، ومحمد، رحمهم الله وخالفهم في ذلك آخرون ، فقالوا: بل ذوي القربى الذين جعل الله لهم من ذلك ما جعل هم: بنو هاشم، وبنو المطلب، فأعطاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أعطاهم من ذلك بجعل الله عز وجل ذلك لهم، ولم يكن له حينئذ أن يعطي غيرهم من بني أمية وبني نوفل؛ لأنهم لم يدخلوا في الآية، وإنما دخل فيها من قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم بنو هاشم، وبنو المطلب خاصةً. فلما اختلفوا في هذا الاختلاف، فذهب كل فريق إلى ما ذكرنا، واحتج لقوله بما وصفنا وجب أن نكشف كل فريق منها، وما ذكرنا من حجة قائله لنستخرج من هذه الأقاويل قولًا صحيحًا. فنظرنا في ذلك، فابتدأنا بقول الذين نفوا أن يكون لهم في الآية شيء بحق القرابة، وإنما جعل لهم منها ما جعل لحاجتهم وفقرهم كما جعل للمسكين واليتيم فيها ما جعل لحاجتهما وفقرهما، فإذا ارتفع الفقر عنهم جميعًا ارتفعت حقوقهم من ذلك، فوجدنا رسول الله صلى الله عليه وسلم، قد قسم سهم ذوي القربى حين قسمه فأعطى بني هاشم، وبني المطلب، وعمهم جميعًا، وقد كان فيهم الغني والفقير. فثبت بذلك أنه لو كان ما جعل لهم في ذلك، هو لعلة الفقر، لا لعلة القرابة، إذا لما دخل أغنياؤهم مع فقرائهم فيما جعل لهم من ذلك، ولقصد إلى الفقراء منهم دون الأغنياء، فأعطاهم كما فعل في اليتامى، فلما أدخل أغنياءهم وفقرائهم ثبت بذلك أنه قصد بذلك إلى أعيان القرابة لعلة قرابتهم، لا لعلة فقرهم. وأما ما ذكروا من حديث فاطمة رضي الله عنها حيث سألت رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يخدمها خادمًا من السبي الذي كان قدم عليه فلم يفعل، ووكلها إلى ذكر الله عز وجل، والتسبيح فهذا ليس فيه عندنا دليل لهم على ما ذكروا؛ لأن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يقل لها عندما سألته: لا حق لك فيه، ولو كان ذلك كذلك، لبين لها كما بينه للفضل بن العباس وربيعة ابن الحارث حين سألا أن يستعملها على الصدقة ليصيبا منها، فقال لهما: إنما هي أوساخ الناس، وأنها لا تحل لمحمد، ولا لأحد من أهل بيته. وقد يجوز أيضًا أن يكون لم يعطها الخادم حينئذ؛ لأنَّه لم يكن قسم، فلما قسم أعطاها حقها من ذلك، وأعطى غيرها أيضًا حقه، فيكون تركه إعطاءها إنما كان لأنَّه لم يقسم، ودلها على تسبيح الله، وتحميده وتهليله الذي يرجو لها به الفوز من الله تعالى، والزلفى عنده، وقد يجوز أن يكون قد منعها من ذلك بعدما قسم، ولا نعلم في الآثار ما يدفع شيئًا من ذلك. وقد يجوز أن يكون منعها لأنها ليست قرابةً، ولكنها أقرب من القرابة؛ لأن الولد لا يقال هو من قرابة أبيه، إنما يقال ذلك لمن غيره أقرب إليه منه، ألا ترى إلى قول الله عز وجل: {قُلْ مَا أَنفَقْتُم مِّنْ خَيْرٍ فَلِلْوَالِدَيْنِ وَالأَقْرَبِينَ}، فجعل الوالدين غير الأقربين؛ لأنهم أقرب من الأقربين، فكما كان الوالد يخرج من قرابة ولده فكذلك الولد يخرج من قرابة والده. وقد قال محمد بن الحسن رحمه الله، نحوا مما ذكرنا في رجل قال: قد أوصيت بثلث مالي لقرابة فلان أن والديه وولده لا يدخلون في ذلك؛ لأنهم أقرب من القرابة، وليسوا بقرابة، واعتل في ذلك بهذه الآية التي ذكرنا. فهذا وجه آخر، فارتفع بما ذكرنا أن يكون لهم أيضًا بحديث فاطمة رضي الله عنها هذا حجة في نفي سهم ذوي القربى، وأما ما احتجوا به من فعل أبي بكر وعمر رضي الله عنهما، وأن أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم لم ينكروا ذلك عليهما، فإن هذا مما يتبع فيه اجتهاد الرأي، فرأيا هما ذلك واجتهدا، فكان ما أداهما إليه اجتهادهما هو ما رأيا في ذلك فحكما به، وهو الذي كان عليهما، وهما في ذلك مثابان مأجوران. وأما قولهم: ولم ينكر ذلك عليهما أحد من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فكيف يجوز أن ينكر ذلك عليهما أحد، وهما إماما عدل، رأيا رأيًا فحكما به، وفعلا في ذلك الذي كلفا ولكن قد رأى في ذلك غيرهما من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم خلاف ما رأيا، فلم يعنفوهما فيما حكما به من ذلك، إذ كان الرأي في ذلك واسعًا، والاجتهاد للناس جميعًا، فأدى أبا بكر وعمر رضي الله عنهما رأيهما في ذلك إلى ما رأيا وحكما، وأدى غيرهما ممن خالفها اجتهاده في ذلك إلى ما رآه، وكل مشكور وكل مأجور في اجتهاده في ذلك، مثاب مؤد للفرض الذي عليه، ولم ينكر بعضهم على بعض قوله؛ لأن ما خالفه إليه هو الرأي، والذي قاله مخالفه هو رأي أيضًا، ولا توقيف مع واحد منهما لقوله، من كتاب، ولا سنة، ولا إجماع. والدليل على أن أبا بكر وعمر رضي الله عنهما، قد كانا خولفا فيما رأيا من ذلك قول ابن عباس رضي الله عنهما: قد كنا نرى أنا نحن هم قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأبى ذلك علينا قومنا، فأخبر أنهم رأوا في ذلك رأيًا، أباه عليهم قومهم، وأن عمر رضي الله عنه دعاهم إلى أن يزوج منه أيمهم ويكسو منه عاريهم، قال: فأبينا عليه إلا أن يسلمه لنا كله، فدل ذلك أنهم قد كانوا على هذا القول في خلافة عمر بعد أبي بكر رضي الله عنهما، وأنهم لم يكونوا نزعوا عما كانوا رأوا من ذلك لرأي أبي بكر، ولرأي عمر رضي الله تعالى عنهما فدل ما ذكرنا أن حكم ذلك كان عند أبي بكر وعمر رضي الله عنهما وعند سائر أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كحكم الأشياء التي يختلف فيها الذي يتسع فيها اجتهاد الرأي. وأما قولهم: ثم أفضي الأمر إلى علي بن أبي طالب رضي الله عنه، فلم يغير شيئًا من ذلك عما كان وضعه عليه أبو بكر وعمر رضي الله عنهما، قالوا: فذلك دليل على أنه قد كان رأى في ذلك أيضًا مثل الذي رأيا، فليس ذلك كما ذكروا؛ لأنَّه لم يكن بقي في يد علي رضي الله عنه ما كان وقع في يد أبي بكر وعمر رضي الله عنهما من ذلك شيء؛ لأنهما لما وقع في أيديهما أنفداه في وجوهه التي رأياها في ذلك الذي كان عليهما. ثم أفضي الأمر إلى علي رضي الله تعالى عنه، فلم يعلم أنه سبي أحدًا ولا ظهر على أحد من العدو، ولا غنم غنيمةً يجب فيها خمس الله عز وجل؛ لأنَّه إنما كان شغله في خلافته كلها بقتال من خالفه ممن لا يسبى ولا يغنم، وإنما يحتج بقول علي رضي الله عنه في ذلك لو سبى وغنم، ففعل في خمس ذلك مثل ما كان أبو بكر وعمر فعلا في الأخماس، فأما إذا لم يكن سبى ولا غنم، فلا حجة لأحد في تركه تغيير ما كان فعل قبله من ذلك، ولو كان بقي في يده من ذلك شيء، مما كان غنمه من كان قبله، فحرمه ذوي قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم لما كان في ذلك أيضًا حجة تدل على مذهبه في ذلك كيف كان؟ لأن ذلك إنما صار إليه بعدما نفذ فيه الحكم من الإمام الذي كان قبله، فلم يكن له إبطال ذلك الحكم، وإن كان هو يرى خلافه؛ لأن ذلك الحكم مما يختلف فيه العلماء، ولو كان علي رضي الله عنه رأى في ذلك ما كان أبو بكر وعمر رضي الله عنهما رأياه لكان في قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم من قد خالفه لقول ابن عباس رضي الله عنهما: كنا نرى أنا نحن هم، فأبى ذلك علينا قومنا. وهذه جوابات الحجج التي احتج بها الذين نفوا سهم ذوي القربى وذوي القرابة أن يكون واجبًا لهم بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا في حياته، وأنهم كانوا في ذلك كسائر الفقراء فبطل هذا المذهب، وثبت أحد المذاهب الآخر. فأردنا أن ننظر في قول من جعله لقرابة الخليفة من بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم، وجعل سهم رسول الله صلى الله عليه وسلم للخليفة من بعده هل لذلك وجه؟ فرأينا رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان فضل بسهم الصفي وبخمس الخمس، وجعل له مع ذلك في الغنيمة سهم كسهم رجل من المسلمين. ثم رأيناهم قد أجمعوا أن سهم الصفي ليس لأحد بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك، وأن حكم رسول الله في ذلك بخلاف حكم الإمام من بعده، فثبت بذلك أيضًا أن حكمه في خمس الخمس خلاف حكم الإمام من بعده، وإذا ثبت أن حكمه فيما وصفناه خلاف حكم الإمام من بعده، ثبت بذلك أن حكم قرابته خلاف حكم قرابة الإمام من بعده، فثبت أحد القولين من الآخرين. فنظرنا في ذلك فإذا الله عز وجل قد قال {وَاعْلَمُوا أَنَّمَا غَنِمْتُمْ مِنْ شَيْءٍ فَأَنَّ لِلَّهِ خُمُسَهُ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَى وَالْيَتَامَى وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ} [الأنفال: 41] فكان سهم الرسول جاريًا له ما كان حيا إلى أن مات، وانقطع بموته، وكان سهم اليتامى والمساكين وابن السبيل بعد وفاة النبي صلى الله عليه وسلم كما كان قبل ذلك. ثم اختلفوا في سهم ذوي القربى، فقال قوم: هو لهم بعد وفاة رسول الله صلى الله عليه وسلم، كما كان لهم في حياته. وقال قوم: قد انقطع عنهم بموته، وكان الله عز وجل قد جمع كل قرابة رسول الله صلى الله عليه وسلم في قوله: "ولذي القربى"، فلم يخص أحدا منهم دون أحد، ثم قسم ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، فأعطى منهم بني هاشم وبني المطلب خاصةً، وحرم بني أمية، وبني نوفل وقد كانوا محصورين معدودين، وفيمن أعطى الغني والفقير، وفيمن حرم كذلك. فثبت أن ذلك السهم كان للنبي صلى الله عليه وسلم، يجعله في أي قرابته شاء، فصار بذلك حكمه حكم سهمه الذي كان يصطفيه لنفسه فلما كان ذلك مرتفعًا بوفاته غير واجب لأحد من بعده، كان هذا أيضًا كذلك مرتفعًا بوفاته، غير واجب لأحد من بعده. وهذا قول أبي حنيفة وأبي يوسف، ومحمد، رحمهم الله. 8 - باب النفل بعد الفراغ من قتال العدو، وإحراز الغنيمة
জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আত্মীয়-স্বজনের অংশ (খুমুসের এক-পঞ্চমাংশ) বন্টন করলেন, তখন তিনি বনী হাশিম এবং বনী মুত্তালিবকে দিলেন, কিন্তু বনী উমাইয়াকে কিছুই দিলেন না। তখন আমি এবং উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট এসে বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! এই বনী হাশিমকে তো আল্লাহ আপনার মাধ্যমে সম্মানিত করেছেন। কিন্তু আমরা এবং বনী মুত্তালিবের কী দোষ? বংশের দিক থেকে আমরা এবং তারা একই।" জবাবে তিনি বললেন, "জাহিলিয়াত বা ইসলাম— কোনো যুগেই বনী মুত্তালিব আমাকে ত্যাগ করেনি।"
(ইমাম তাবারী রহ. বলেন) তারা (আলেমগণ) বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন নিকটাত্মীয়দের মধ্যে কিছু অংশ বন্টন করলেন এবং একই রকম নিকটাত্মীয়দের বঞ্চিত করলেন, তা থেকে প্রমাণিত হয় যে আল্লাহ তা‘আলা *‘যাবিল কুরবা’* (নিকটাত্মীয়)-এর জন্য যা নির্ধারণ করেছেন, তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সকল নিকটাত্মীয়দের জন্য নয়, বরং তাদের মধ্যে বিশেষ কিছু লোকের জন্য। আর এই বিষয়ে সিদ্ধান্ত গ্রহণের ক্ষমতা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের উপর অর্পণ করা হয়েছিল। তিনি যার মধ্যে ইচ্ছা তা রাখতে পারতেন। যখন তিনি ইন্তিকাল করলেন এবং তার সিদ্ধান্ত গ্রহণের ক্ষমতা রহিত হলো, তখন তাদের জন্য নির্ধারিত সেই অংশটিও রহিত হয়ে গেল। যেমন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের জন্য গনীমতের সম্পদ থেকে *‘সাহম আস-সাফী’* (বিশেষ অংশ) বেছে নেওয়ার অনুমতি ছিল। তিনি জীবিত থাকা পর্যন্ত নিজের জন্য গনীমতের সম্পদ থেকে যা ইচ্ছা বেছে নিতে পারতেন। কিন্তু তিনি যখন ইন্তিকাল করলেন, সেই অধিকারও রহিত হয়ে গেল। এই মত পোষণকারীদের মধ্যে আবু হানীফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের উপর রহম করুন) রয়েছেন।
অন্যান্যরা এ বিষয়ে তাদের সাথে ভিন্নমত পোষণ করে বলেন: আল্লাহ যাদের জন্য এই অংশ নির্ধারিত করেছেন, তারা হলো বনী হাশিম এবং বনী মুত্তালিব। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল্লাহর নির্ধারিত বিধান অনুযায়ীই তাদের তা দিয়েছেন। তখন বনী উমাইয়া ও বনী নওফেলকে দেওয়ার অধিকার তাঁর ছিল না; কারণ তারা এই আয়াতের অন্তর্ভুক্ত নয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকটাত্মীয়দের মধ্যে শুধুমাত্র বনী হাশিম ও বনী মুত্তালিবই এর অন্তর্ভুক্ত।
যখন এ বিষয়ে আলেমদের মধ্যে মতপার্থক্য দেখা দিলো এবং প্রতিটি দল তাদের নিজস্ব মতের সমর্থনে যুক্তি দিলো, তখন আমাদের জন্য আবশ্যক হলো প্রত্যেক দলের যুক্তি পরীক্ষা করা, যাতে আমরা এই মতগুলোর মধ্যে সঠিক মতটি বের করতে পারি।
আমরা তা পর্যবেক্ষণ করলাম এবং প্রথমে তাদের বক্তব্য নিয়ে আলোচনা শুরু করলাম যারা আত্মীয়তার অধিকার হিসেবে এই আয়াতে তাদের কোনো অংশ থাকার বিষয়টি অস্বীকার করেছেন। তাদের মতে, আত্মীয়-স্বজনদের জন্য যে অংশ রাখা হয়েছিল তা শুধুমাত্র তাদের প্রয়োজন ও দারিদ্র্যের কারণে, ঠিক যেমন মিসকিন ও ইয়াতীমের জন্য তাদের প্রয়োজন ও দারিদ্র্যের কারণে অংশ রাখা হয়েছিল। সুতরাং, যদি তাদের থেকে দারিদ্র্য দূর হয়ে যায়, তাহলে এই সম্পদ থেকে তাদের অধিকারও বাতিল হয়ে যাবে।
কিন্তু আমরা দেখতে পেলাম যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন নিকটাত্মীয়দের অংশ বন্টন করলেন, তখন তিনি বনী হাশিম ও বনী মুত্তালিব উভয়কে দিলেন, যদিও তাদের মধ্যে ধনী ও দরিদ্র উভয়ই ছিল। এর মাধ্যমে প্রমাণিত হলো যে এই অংশ যদি দারিদ্র্যের কারণে নির্ধারিত হতো, আত্মীয়তার কারণে না হতো, তবে দরিদ্রদের সাথে ধনীরাও এই অংশ পেত না, বরং তিনি ইয়াতীমদের মতো শুধুমাত্র দরিদ্রদেরই দিতেন, ধনীদের বাদ দিতেন। যখন তিনি ধনী ও দরিদ্র উভয়কেই শামিল করলেন, তখন প্রমাণিত হলো যে তিনি আত্মীয়তার সম্পর্কের কারণে এই নির্দিষ্ট গোত্রের দিকে মনোনিবেশ করেছেন, দারিদ্র্যের কারণে নয়।
আর ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস সম্পর্কে তারা যা উল্লেখ করেছেন, যখন তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসা বন্দীদের মধ্য থেকে একজন সেবককে চেয়েছিলেন, কিন্তু তিনি তা করেননি বরং তাঁকে আল্লাহর যিকির ও তাসবীহের দিকে মনোনিবেশ করতে বলেছিলেন, আমাদের মতে এটি তাদের দাবির স্বপক্ষে কোনো প্রমাণ বহন করে না। কারণ, যখন তিনি চাইলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে এমন কথা বলেননি যে, “এতে তোমার কোনো হক নেই।” যদি এমন হতো, তবে তিনি তার জন্য তা স্পষ্টভাবে বলে দিতেন, যেমনটি তিনি ফাদল ইবনে আব্বাস ও রাবী‘আহ ইবনুল হারিসের জন্য বলেছিলেন, যখন তারা সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের কাজে নিযুক্ত হওয়ার অনুমতি চেয়েছিলেন যেন তারা তা থেকে অংশ পেতে পারে। তিনি তখন তাদের বলেছিলেন: “এই সম্পদ মানুষের ময়লা (যাকাত), আর তা মুহাম্মাদ এবং তার আহলে বাইতের কারও জন্য হালাল নয়।”
এও সম্ভব যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তখন ফাতিমাকে সেবক দেননি কারণ বন্টন তখনও সম্পন্ন হয়নি। যখন বন্টন সম্পন্ন হলো, তখন তিনি তাকে এবং অন্যদের তাদের প্রাপ্য হক দিয়েছেন। সুতরাং, তার সেবককে না দেওয়াটা কেবল এই কারণেই হতে পারে যে বন্টন সম্পন্ন হয়নি, এবং তিনি তাকে আল্লাহর প্রশংসা, কৃতজ্ঞতা ও একত্ববাদ ঘোষণার দিকে পথ দেখিয়েছিলেন, যার মাধ্যমে তিনি আল্লাহর পক্ষ থেকে সফলতা ও নৈকট্য লাভের আশা করেছিলেন।
এও সম্ভব যে তিনি বন্টনের পরেও তাকে তা দিতে বারণ করেছেন। আমরা এমন কোনো বর্ণনা জানি না যা এর কোনো একটি বিষয়কে বাতিল করে।
এও সম্ভব যে তিনি তাকে এজন্য বারণ করেছেন যে তিনি নিকটাত্মীয়ের সংজ্ঞার মধ্যে পড়েন না, বরং নিকটাত্মীয়ের থেকেও ঘনিষ্ঠ। কারণ সন্তানকে পিতার নিকটাত্মীয় বলা হয় না; বরং এই পরিভাষাটি ব্যবহৃত হয় এমন ব্যক্তির জন্য যে তার থেকে অপেক্ষাকৃত দূরে। আপনি কি আল্লাহর বাণী লক্ষ্য করেন না: *“বলুন, তোমরা যে ধন-সম্পদই ব্যয় কর, তা পিতা-মাতা ও নিকটাত্মীয়দের জন্য...”* (সূরা বাকারা: ২১৫)। এখানে তিনি পিতা-মাতাকে নিকটাত্মীয়দের থেকে আলাদা করেছেন; কারণ তারা নিকটাত্মীয়দের চেয়েও অধিক ঘনিষ্ঠ। সুতরাং, যেমন পিতা তার সন্তানের নিকটাত্মীয়ের তালিকা থেকে বাদ পড়েন, তেমনি সন্তানও তার পিতার নিকটাত্মীয়ের তালিকা থেকে বাদ পড়ে।
মুহাম্মাদ ইবনুল হাসান (রাহিমাহুল্লাহ) প্রায় অনুরূপ মত পোষণ করেছেন। তিনি বলেছেন যে, কোনো ব্যক্তি যদি বলে, ‘আমি আমার সম্পত্তির এক তৃতীয়াংশ অমুকের নিকটাত্মীয়ের জন্য অসিয়ত করলাম,’ তবে তার পিতামাতা ও সন্তানরা এর অন্তর্ভুক্ত হবে না; কারণ তারা নিকটাত্মীয়দের চেয়েও অধিক নিকটবর্তী, তাই তারা নিকটাত্মীয় নয়। তিনি তার যুক্তিতে উপরোক্ত আয়াতটি পেশ করেছেন।
এটি আরেকটি ব্যাখ্যা। সুতরাং, আমাদের এই আলোচনার মাধ্যমে প্রমাণিত হলো যে ফাতিমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসও নিকটাত্মীয়দের অংশ বাতিল হওয়ার পক্ষে তাদের যুক্তি হতে পারে না।
আর তারা যে আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাজের ভিত্তিতে যুক্তি দিয়েছে এবং বলেছে যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ এ বিষয়ে তাঁদের উপর আপত্তি করেননি, এটি এমন একটি বিষয় যা ইজতিহাদ (স্বাধীন গবেষণা) নির্ভর। তাঁরা দু’জন তাঁদের ইজতিহাদ মোতাবেক এই সিদ্ধান্ত নিয়েছেন এবং রায় দিয়েছেন, যা তাঁদের ইজতিহাদ অনুযায়ী করণীয় ছিল। তাঁরা এই ইজতিহাদের জন্য প্রতিদান ও সওয়াব পাবেন।
আর তাদের এই বক্তব্য যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কোনো সাহাবীই তাদের উপর আপত্তি করেননি, তা কীভাবে সম্ভব যে কেউ তাঁদের উপর আপত্তি করবে? কারণ তাঁরা দু’জনই ন্যায়পরায়ণ ইমাম ছিলেন, যারা একটি সিদ্ধান্ত নিয়েছিলেন এবং সে অনুযায়ী কাজ করেছিলেন, যা তাঁদের উপর অর্পিত ছিল। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অন্য সাহাবীগণ এ বিষয়ে তাঁদের বিপরীত মত পোষণ করতেন, তবে তাঁরা তাঁদের সিদ্ধান্তের জন্য তাঁদের ভর্ৎসনা করেননি। কারণ এই বিষয়ে মতামতের অবকাশ ছিল এবং ইজতিহাদ সকলের জন্য উন্মুক্ত ছিল। আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁদের ইজতিহাদ যে সিদ্ধান্তের দিকে নিয়ে গেছে, তাঁরা সেটাই করেছেন। আর যারা তাঁদের বিরোধিতা করেছেন, তাঁদের ইজতিহাদ তাদের নিজস্ব মতের দিকে নিয়ে গেছে। প্রত্যেকেই প্রশংসার পাত্র এবং তাঁদের ইজতিহাদের জন্য প্রতিদানপ্রাপ্ত। তাঁরা তাঁদের উপর অর্পিত দায়িত্ব পালন করেছেন। তাঁরা একে অপরের মতকে অস্বীকার করেননি; কারণ তাঁদের বিরোধীরা যা বলেছে, তা-ও ইজতিহাদভিত্তিক, এবং তারা যা বলেছে তা-ও ইজতিহাদভিত্তিক। আর তাঁদের কারো মতের পক্ষেই কিতাব, সুন্নাহ বা ইজমা‘র সুস্পষ্ট দলিল ছিল না।
যে কারণে বোঝা যায় যে আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁদের এই সিদ্ধান্তের বিষয়ে বিরোধিতা পেয়েছিলেন, তা হলো ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "আমরা মনে করতাম যে আমরাই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকটাত্মীয়। কিন্তু আমাদের লোকেরা এতে আপত্তি জানাল।" এর মাধ্যমে তিনি জানালেন যে তাঁরা একটি মত পোষণ করতেন, কিন্তু তাঁদের লোকজন তাতে আপত্তি করেছিল। এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একবার তাঁদের আহ্বান জানিয়েছিলেন যে, সেই সম্পদ থেকে তাদের বিধবাদের বিয়ে দেবেন এবং তাদের বস্ত্রহীনদের কাপড় দেবেন। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: “আমরা তাতে আপত্তি জানালাম, বরং আমরা চাইলাম যে তিনি পুরোটা আমাদের কাছে দিয়ে দিন।” এর দ্বারা প্রমাণিত হয় যে, আবু বকরের পর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খেলাফতের সময়েও তারা এই মতের উপর অটল ছিলেন এবং আবু বকর বা উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতের কারণে তাঁরা তাঁদের পূর্বের অবস্থান থেকে সরে আসেননি। এর দ্বারা প্রমাণিত হয় যে, আবু বকর, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্য সাহাবীগণের নিকট এই বিধানটি ছিল এমন বিষয়ের মতো, যেগুলোতে ইজতিহাদের মাধ্যমে মতপার্থক্যের সুযোগ থাকে।
আর তাদের এই বক্তব্য যে, এরপর যখন নেতৃত্ব আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে এলো, তিনি আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা প্রতিষ্ঠা করেছিলেন, তার কোনো পরিবর্তন করেননি। তারা বলেছে, এটি প্রমাণ করে যে তিনিও তাঁদের মতো একই মত পোষণ করতেন।
কিন্তু বিষয়টি এমন নয় যেমন তারা বলেছে। কারণ আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে এমন কোনো সম্পদ অবশিষ্ট ছিল না যা আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাতে এসেছিল। কারণ তারা যখন তা হাতে পেয়েছিলেন, তখন তাঁরা তাঁদের মতে প্রয়োজনীয় খাতে তা খরচ করে দিয়েছিলেন। এরপর যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উপর দায়িত্ব অর্পিত হলো, তখন এমন জানা যায় না যে তিনি কাউকে বন্দি করেছিলেন, বা কোনো শত্রুর উপর জয়ী হয়েছিলেন, কিংবা এমন কোনো গনীমতের সম্পদ পেয়েছিলেন যার উপর আল্লাহর এক-পঞ্চমাংশ ওয়াজিব হবে। কারণ তাঁর খেলাফতের পুরো সময়টাই কেটেছে বিরোধিতাকারীদের সাথে যুদ্ধে, যাদের বন্দি করা যায় না বা যাদের কাছ থেকে গনীমত গ্রহণ করা হয় না।
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বক্তব্য তখনই দলীল হতে পারত, যখন তিনি বন্দি করতেন ও গনীমত পেতেন এবং সেগুলোর এক-পঞ্চমাংশের ক্ষেত্রে আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতো কাজ করতেন। কিন্তু তিনি যখন বন্দিও করেননি, গনীমতও পাননি, তখন তার পূর্ববর্তীদের সিদ্ধান্তের কোনো পরিবর্তন না করাটা কারো জন্য কোনো যুক্তি হতে পারে না। আর যদি তার পূর্ববর্তীরা গনীমত লাভ করার পর অবশিষ্ট কিছু সম্পদ তার হাতে রেখে যেতেন এবং তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকটাত্মীয়দের বঞ্চিত করতেন, তবে সেটাও তাঁর মতের পক্ষে দলীল হতে পারত না। কারণ সেই সম্পদ তাঁর হাতে এসেছে তাঁর পূর্ববর্তী ইমামের সিদ্ধান্ত কার্যকর হওয়ার পরে। এই বিধানটি যেহেতু আলেমদের মধ্যে মতপার্থক্যপূর্ণ, তাই তাঁর পক্ষে সেই সিদ্ধান্ত বাতিল করা সম্ভব ছিল না, যদিও তিনি বিপরীত মত পোষণ করতেন। আর যদি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবু বকর ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মতো একই মত পোষণ করতেন, তবুও রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকটাত্মীয়দের মধ্যে কিছু লোক তাঁর বিরোধী থাকত, যেমন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "আমরা মনে করতাম যে আমরাই তারা, কিন্তু আমাদের লোকেরা এতে আপত্তি জানাল।"
এই হলো সেই যুক্তিসমূহের জবাব, যা দিয়ে তারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মৃত্যুর পরে এবং এমনকি তাঁর জীবদ্দশাতেও নিকটাত্মীয়দের জন্য সেই অংশ ওয়াজিব হওয়াকে অস্বীকার করেছে, এবং বলেছে যে তারা সাধারণ দরিদ্রদের মতোই ছিল। অতএব, এই মত বাতিল হলো এবং অন্য মতগুলো প্রমাণিত হলো।
এরপর আমরা সেই মতটি পর্যালোচনা করতে চাইলাম যারা বলেছেন যে এটি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পরে খলীফার নিকটাত্মীয়দের জন্য প্রযোজ্য হবে, এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অংশ তার পরবর্তী খলীফার জন্য নির্ধারিত হবে। এর কি কোনো ভিত্তি আছে?
আমরা দেখলাম যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে *‘সাহম আস-সাফী’* (বিশেষ অংশ) এবং খুমুসের এক-পঞ্চমাংশ দ্বারা মর্যাদা দেওয়া হয়েছিল। তা সত্ত্বেও গনীমতের মধ্যে সাধারণ মুসলমানদের একজন ব্যক্তির সমান অংশও তাঁর জন্য ছিল। অতঃপর আমরা দেখতে পেলাম যে আলেমগণ এ বিষয়ে ঐক্যবদ্ধ যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পরে *‘সাহম আস-সাফী’* আর কারো জন্য প্রযোজ্য নয়, এবং এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বিধান তাঁর পরবর্তী ইমামের বিধান থেকে ভিন্ন। এর দ্বারা প্রমাণিত হলো যে খুমুসের এক-পঞ্চমাংশের ক্ষেত্রেও তাঁর বিধান পরবর্তী ইমামের বিধান থেকে ভিন্ন। আর যখন প্রমাণিত হলো যে আমরা যা বর্ণনা করলাম তাতে তাঁর বিধান পরবর্তী ইমামের বিধান থেকে ভিন্ন, তখন প্রমাণিত হলো যে তাঁর নিকটাত্মীয়দের বিধান পরবর্তী ইমামের নিকটাত্মীয়দের বিধান থেকে ভিন্ন। সুতরাং, দুটি মতের মধ্যে একটি মত প্রতিষ্ঠিত হলো।
আমরা বিষয়টি নিয়ে পর্যবেক্ষণ করলাম এবং দেখলাম যে আল্লাহ তা‘আলা বলেছেন: *“আর তোমরা জেনে রাখো যে, তোমরা যে গনীমতের সম্পদ লাভ করো, তার এক-পঞ্চমাংশ আল্লাহ, রাসূল, নিকটাত্মীয়, ইয়াতীম, মিসকিন এবং মুসাফিরের জন্য।”* [সূরা আল-আনফাল: ৪১]। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের অংশ তাঁর জীবিত থাকা পর্যন্ত তাঁর জন্য বহাল ছিল এবং তাঁর মৃত্যুর সাথে সাথে তা রহিত হয়ে গেল। আর ইয়াতীম, মিসকিন ও মুসাফিরের অংশ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মৃত্যুর পরেও তেমনই রইল যেমন পূর্বে ছিল।
এরপর তারা নিকটাত্মীয়দের অংশ নিয়ে মতপার্থক্য করল। একদল বলল: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মৃত্যুর পরেও তা তাদের জন্য থাকবে, যেমন তাঁর জীবদ্দশায় ছিল। আরেক দল বলল: তাঁর মৃত্যুর সাথে সাথে তা তাদের জন্য রহিত হয়ে গেছে।
আল্লাহ তা‘আলা তাঁর বাণী, *“নিকটাত্মীয়দের জন্য”*—এর মাধ্যমে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সকল নিকটাত্মীয়কে একত্রে শামিল করেছিলেন, তাদের কারো থেকে কাউকে নির্দিষ্ট করেননি। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা বন্টন করে তাদের মধ্যে থেকে বিশেষভাবে বনী হাশিম ও বনী মুত্তালিবকে দিলেন এবং বনী উমাইয়া ও বনী নওফেলকে বঞ্চিত করলেন, যদিও তারা সংখ্যায় সীমাবদ্ধ ও সুপরিচিত ছিল। যাদের তিনি দিয়েছেন, তাদের মধ্যে ধনী-দরিদ্র উভয়ই ছিল, এবং যাদের বঞ্চিত করেছেন তাদের ক্ষেত্রেও তাই।
এ থেকে প্রমাণিত হলো যে এই অংশটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য ছিল। তিনি তাঁর আত্মীয়-স্বজনের মধ্যে যাকে ইচ্ছা দিতে পারতেন। এর ফলে এর বিধান সেই অংশের মতোই হলো যা তিনি নিজের জন্য বেছে নিতে পারতেন। যেহেতু সেই অংশটি তাঁর মৃত্যুর পর রহিত হয়ে গেছে এবং অন্য কারো জন্য ওয়াজিব নয়, তাই এই অংশটিও তাঁর মৃত্যুর পর রহিত হয়ে গেল এবং অন্য কারো জন্য ওয়াজিব রইল না।
এই হলো আবু হানীফা, আবু ইউসুফ ও মুহাম্মাদ (আল্লাহ তাদের উপর রহম করুন)-এর অভিমত।
৮- পরিচ্ছেদ: শত্রুর সাথে যুদ্ধ শেষ হওয়া ও গনীমতের সম্পদ অর্জন করার পর (অতিরিক্ত) পুরষ্কার (নাফল)।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن، محمد بن إسحاق قد صرح بالتحديث عند الطبري والبيهقي.
حدثنا إبراهيم بن مرزوق، قال: ثنا أبو عاصم عن ثور بن يزيد، عن سليمان ابن موسى، عن زياد بن جارية، عن حبيب بن مسلمة: أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نفل في بدأته الربع، وفي رجعته الثلث . فذهب قوم إلى أن الإمام له أن ينفل من الغنيمة ما أحب بعد إحرازه إياها قبل أن يقسمها كما كان له قبل ذلك، واحتجوا في ذلك بهذا الحديث. وخالفهم في ذلك آخرون ، فقالوا: ليس للإمام أن ينفل بعد إحراز الغنيمة إلا من الخمس، فأما من غير الخمس فلا؛ لأن ذلك قد ملكته المقاتلة، فلا سبيل للإمام عليه وقالوا: قد يحتمل أن يكون ما كان النبي صلى الله عليه وسلم ينفله في الرجعة هو ثلث الخمس بعد الربع الذي كان نفله في البدأة، فلا يخرج مما قلنا. فقال لهم الآخرون: إن الحديث إنما جاء في أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينفل في البدأة الربع، وفي الرجعة الثلث، فلما كان الربع الذي كان ينفله في البدأة، إنما هو الربع قبل الخمس، فكذلك الثلث الذي كان ينفله في الرجعة، هو الثلث أيضًا قبل الخمس، وإلا لم يكن لذكر الثلث معنًى. قيل لهم بل له معنًى صحيح، وذلك أن المذكور من نفله في البدأة هو الربع، مما يجوز له النفل منه، فكذلك نفله في الرجعة هو الثلث مما يجوز له النفل منه وهو الخمس. فقال أهل المقالة الأولى: فقد روي حديث حبيب هذا بلفظ يدل على معنى ما قلنا. فذكروا ما.
হাবীব ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অভিযান শুরুর পূর্বে (লুণ্ঠিত সম্পদের) এক চতুর্থাংশ এবং ফেরার সময় এক তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত দান (নাফল) করতেন। অতঃপর একদল লোক এই মত পোষণ করলেন যে, ইমামের জন্য যুদ্ধের গনীমতের সম্পদ হস্তগত করার পর, তা বণ্টন করার পূর্বে, তার মধ্য থেকে যা ইচ্ছা নাফল (অতিরিক্ত পুরস্কার) দেওয়া বৈধ। যেমনটি এর আগেও তার জন্য (বণ্টনের পূর্বে) বৈধ ছিল। তারা এই হাদীস দ্বারা নিজেদের মতের পক্ষে যুক্তি দিলেন। আর অন্যেরা এর বিরোধিতা করে বললেন: গনীমতের সম্পদ হস্তগত হওয়ার পর ইমামের জন্য এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) ছাড়া অন্য কিছু থেকে নাফল দেওয়া বৈধ নয়। কেননা খুমুস ছাড়া বাকি অংশ মুজাহিদদের মালিকানাধীন হয়ে যায়। সুতরাং ইমামের তার উপর কোনো অধিকার থাকে না। তারা আরও বললেন: এটি সম্ভব যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফেরার সময় যা নাফল দিতেন, তা ছিল অভিযানের শুরুতে যা নাফল দেওয়া হয়েছিল (সেই এক চতুর্থাংশের) পরের এক পঞ্চমাংশের এক তৃতীয়াংশ। সুতরাং (এই ব্যাখ্যার কারণে) আমরা যা বলেছি, তা থেকে বেরিয়ে যায় না। তখন অন্য পক্ষ তাদের বলল: হাদীসটিতে তো এসেছে যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুরুতে এক চতুর্থাংশ এবং ফেরার সময় এক তৃতীয়াংশ নাফল দিতেন। যেহেতু শুরুতে যে এক চতুর্থাংশ নাফল দেওয়া হতো, তা ছিল খুমুসের (এক পঞ্চমাংশের) পূর্বেই এক চতুর্থাংশ, সুতরাং অনুরূপভাবে ফেরার সময় যে এক তৃতীয়াংশ নাফল দেওয়া হতো, তাও খুমুসের পূর্বেই এক তৃতীয়াংশ। অন্যথায় এক তৃতীয়াংশ উল্লেখের কোনো অর্থ থাকত না। তাদের (প্রথম পক্ষকে) বলা হলো: না, বরং এর একটি সঠিক অর্থ আছে। তা হলো, শুরুতে তার (নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর) নাফল হিসেবে যা উল্লেখ করা হয়েছে, তা হলো এক চতুর্থাংশ—যা থেকে নাফল দেওয়া তাঁর জন্য বৈধ। অনুরূপভাবে ফেরার সময় তাঁর নাফল হলো এক তৃতীয়াংশ—যা থেকে নাফল দেওয়া তাঁর জন্য বৈধ, আর তা হলো খুমুস (এক পঞ্চমাংশ)। তখন প্রথম মতের অনুসারীরা বলল: নিশ্চয়ই হাবীবের এই হাদীসটি এমন শব্দে বর্ণিত হয়েছে যা আমাদের মতের অর্থের প্রতি নির্দেশ করে। অতঃপর তারা তা বর্ণনা করলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده منقطع، رواية سليمان بن موسى عن زياد مرسلة، وجاء في حاشية المطبوع من تهذيب الكمال 9/ 440 في ترجمة زياد بن جارية ما نصه: جاء في حواشي النسخ من تعقبات المؤلف على صاحب الكمال، ذكر في الرواة عنه سليمان بن موسى وإنما يروي عن مكحول عنه وروايته عنه مرسلة.
حدثنا أبو أمية، قال: ثنا علي بن الجعد، قال: أخبرنا ابن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، عن زياد بن جارية، عن حبيب بن مسلمة رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينفل في البدأة الربع، وفي الرجعة الثلث بعد الخمس .
হাবিব ইবনে মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) খুমুস (রাষ্ট্রীয় অংশ) বাদ দেওয়ার পর, যখন অভিযান শুরু করতেন, তখন (গনীমতের) এক চতুর্থাংশ এবং যখন ফিরে আসতেন, তখন এক তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত পুরস্কার (নফল) হিসেবে দিতেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن من أجل عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان.
حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو عاصم، عن سفيان، عن يزيد بن جابر، عن مكحول، عن زياد بن جارية، عن حبيب بن مسلمة، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نفل الثلث بعد الخمس .
হাবীব ইবনে মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক-পঞ্চমাংশ (খুমস) বের করার পর (বাকি মালের মধ্য থেকে) এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত প্রদান করেছিলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
حدثنا فهد، وعلي بن عبد الرحمن، قالا: ثنا عبد الله بن صالح، قال: حدثني معاوية بن صالح، عن العلاء بن الحارث، عن مكحول، عن زياد بن جارية، عن حبيب بن مسلمة رضي الله عنهما أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان ينفل في الغزو الربع بعد الخمس، وينفل إذا قفل الثلث بعد الخمس . قالوا: فدل ما ذكرنا أن ذلك الثلث الذي كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينفل له في الرجعة، هو الثلث بعد الخمس. قيل لهم قد يحتمل هذا أيضًا ما ذكرنا. واحتجوا في ذلك أيضًا بما
হাবীব ইবনু মাসলামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যুদ্ধের সময় পঞ্চমাংশ (খুমুস)-এর পর অতিরিক্ত এক-চতুর্থাংশ (রুবু’) দান করতেন, আর যখন তিনি ফিরে আসতেন, তখন পঞ্চমাংশ-এর পর অতিরিক্ত এক-তৃতীয়াংশ (সুলুস) দান করতেন। তাঁরা (বর্ণনাকারীরা) বললেন: আমরা যা উল্লেখ করেছি, তা প্রমাণ করে যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রত্যাবর্তনের সময় যে এক-তৃতীয়াংশ অতিরিক্ত দান করতেন, তা ছিল পঞ্চমাংশ (খুমুস)-এর পর এক-তৃতীয়াংশ। তাঁদেরকে বলা হলো: এটিও আমরা যা উল্লেখ করেছি, সে সম্ভাবনা রাখে। তারা এ ব্যাপারে আরও দলিল পেশ করলেন...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن في المتابعات من أجل عبد الله بن صالح.
حدثنا ابن أبي داود، قال: ثنا ابن أبي مريم، قال: ثنا ابن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن سليمان بن موسى عن مكحول، عن أبي سلام، عن أبي أمامة الباهلي، عن عبادة بن الصامت رضي الله عنهما قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينفلهم إذا خرجوا بادين الربع، وينفلهم إذا قفلوا الثلث . قيل لهم: وهذا الحديث أيضًا فقد يحتمل ما احتمله حديث حبيب بن مسلمة رضي عنه الذي أرسله أكثر الناس عن رضي مكحول أنه كان ينفل في البدأة الربع، وفي الرجعة الثلث. وقد يجوز أيضًا أن يكون عبادة رضي الله عنه عني بقوله "وينفلهم إذا قفلوا الثلث"، فيكون ذلك على قفول من قتال إلى قتال، فإذا كان ذلك كذلك، وكان الثلث المنفل هو الثلث قبل الخمس فذلك جائز عندنا أيضًا. لأنَّه يتوخى بذلك صلاح القوم، وتحريضهم على قتال عدوهم، فأما إذا كان القتال قد ارتفع، فلا يجوز النفل؛ لأنَّه لا منفعة للمسلمين في ذلك. واحتج أهل المقالة الأولى لقولهم أيضًا بما
উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন তারা (যুদ্ধের উদ্দেশ্যে) বাইরে যেতেন, তখন তাদেরকে এক-চতুর্থাংশ নফল (অতিরিক্ত পুরস্কার) দিতেন, আর যখন তারা ফিরে আসতেন, তখন তাদেরকে এক-তৃতীয়াংশ নফল দিতেন। তাদের (ফিকহবিদদের) বলা হলো: এই হাদীসটিও সেই অর্থ বহন করে যা হাবীব ইবনু মাসলামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস বহন করে, যা মাকহূল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অধিকাংশ লোক বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুরুতে এক-চতুর্থাংশ এবং প্রত্যাবর্তনে এক-তৃতীয়াংশ নফল দিতেন। আরও বৈধ হতে পারে যে, উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর এই উক্তি দ্বারা "আর যখন তারা ফিরে আসতেন, তখন তাদেরকে এক-তৃতীয়াংশ নফল দিতেন" -- দ্বারা উদ্দেশ্য করেছেন যে, এই প্রত্যাবর্তন এক যুদ্ধ থেকে আরেক যুদ্ধের দিকে যাত্রা করার সময় হতো। যদি বিষয়টি এমন হয়, এবং ঐ অতিরিক্ত প্রদত্ত এক-তৃতীয়াংশটি যদি (সাধারণ গণীমতের) এক-পঞ্চমাংশের পূর্বেকার এক-তৃতীয়াংশ হয়, তবে সেটিও আমাদের নিকট বৈধ। কারণ এর দ্বারা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জনগণের কল্যাণ কামনা করতেন এবং তাদেরকে শত্রুর সাথে লড়াই করার জন্য উৎসাহিত করতেন। কিন্তু যদি লড়াই শেষ হয়ে যায়, তবে আর অতিরিক্ত পুরস্কার (নফল) দেওয়া বৈধ নয়; কারণ তাতে মুসলমানদের জন্য কোনো উপকার নেই। প্রথম মতের প্রবক্তারা তাঁদের মতের সমর্থনে আরও যা প্রমাণ হিসেবে পেশ করেছেন...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن في المتابعات من أجل ابن أبي الزناد.
حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا بشر بن عمر، وعبيد الله بن عبد المجيد الحنفي، قالا: ثنا عكرمة بن عمار، عن إياس بن سلمة بن الأكوع، عن أبيه قال: لما قربنا من المشركين أمرنا أبو بكر رضي الله عنه فشننا الغارة عليهم، فنفلني أبو بكر رضي الله عنه امرأةً من فزارة أتيت بها من الغارة، فقدمت بها المدينة فاستوهبها مني رسول الله صلى الله عليه وسلم، فوهبتها له، فبعث بها رسول الله صلى الله عليه وسلم ففادى بها أناسًا من المسلمين . وكان من الحجة للآخرين عليهم أنه لم يذكر في ذلك الحديث أن أبا بكر رضي الله عنه كان نفل سلمة قبل انقطاع الحرب أو بعد انقطاعها، فلا حجة في ذلك. واحتجوا لقولهم أيضًا بما
সালামা ইবনু আকওয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমরা মুশরিকদের কাছাকাছি গেলাম, তখন আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদেরকে নির্দেশ দিলেন। অতঃপর আমরা তাদের উপর আক্রমণ (গারা) পরিচালনা করলাম। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গনিমতের অংশ হিসেবে আমাকে ফাযারাহ গোত্রের একজন মহিলা দিলেন, যাকে আমি আক্রমণ থেকে লাভ করেছিলাম। অতঃপর আমি তাঁকে নিয়ে মদীনায় এলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে তাঁকে চেয়ে নিলেন (উপহার হিসেবে), তাই আমি তাঁকে সেটি উপহার দিলাম। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে পাঠিয়ে দিলেন এবং এর বিনিময়ে কিছু মুসলিম বন্দীকে মুক্ত করলেন (মুক্তিপণ হিসেবে ব্যবহার করলেন)। যারা এর বিপরীতে মত দেন, তাদের একটি যুক্তি ছিল এই যে, উক্ত হাদীসে এটি উল্লেখ করা হয়নি যে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যুদ্ধ শেষ হওয়ার আগে সালামাকে গনিমতের অংশ দিয়েছিলেন, নাকি যুদ্ধ শেষ হওয়ার পরে। সুতরাং, এ বিষয়ে কোনো সুনির্দিষ্ট প্রমাণ নেই। তারা তাদের মতের সমর্থনে আরও যা দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا ابن المبارك، عن عبيد الله بن عبد الله بن عمر، عن نافع عن ابن عمر رضي الله عنهما، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث سريةً فيها ابن عمر فغنموا غنائم كثيرةً، فكانت غنائمهم لكل إنسان اثني عشر بعيرًا، ونفل كل إنسان منهم بعيرًا بعيراً سوى ذلك . قالوا: فهذا ابن عمر رضي الله عنهما يخبر أنهم قد نفلوا بعد سهامهم بعيرًا بعيرًا، فلم ينكر ذلك النبي صلى الله عليه وسلم، وقيل لهم: ما لكم في هذا الحديث من حجة، ولهو إلى الحجة عليكم أقرب منه إلى الحجة لكم؛ لأنَّه فيه فبلغت سهامهم اثني عشر بعيرًا، ونفلوا بعيرًا بعيرًا. ففي ذلك دليل أن ما نفلوا منه ما نفلوا من ذلك، كان من غير ما كانت فيه سهمانهم وهو الخمس، فلا حجة لكم بهذا الحديث من النفل من غير الخمس، فلما لم يكن في شيء مما احتج به أهل المقالة الأولى لقولهم من الآثار ما يجب به ما قالوا أردنا أن ننظر فيما احتج به أهل المقالة الأخرى لقولهم من الآثار أيضًا، فنظرنا في ذلك
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি সেনাবাহিনী (সারিয়্যাহ) প্রেরণ করেছিলেন, যার মধ্যে ইবনু উমরও ছিলেন। তারা প্রচুর পরিমাণে গণীমাহ (যুদ্ধলব্ধ সম্পদ) লাভ করেন। তাদের গণীমাহ হিস্যা ছিল প্রত্যেক ব্যক্তির জন্য বারোটি করে উট, এবং এর অতিরিক্ত হিসেবে প্রত্যেক ব্যক্তিকে একটি করে অতিরিক্ত উট প্রদান করা হয়েছিল। তারা বলেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে অবহিত করেন যে, তাদের নির্ধারিত হিস্যা পাওয়ার পরেও তাদের প্রত্যেককে একটি করে অতিরিক্ত উট দেওয়া হয়েছিল এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাতে আপত্তি করেননি। তাদেরকে বলা হয়েছে: এই হাদীসের মধ্যে তোমাদের জন্য কোনো প্রমাণ নেই; বরং এটি তোমাদের বিপক্ষে প্রমাণ হওয়ার কাছাকাছি, তোমাদের পক্ষে প্রমাণ হওয়ার চেয়ে। কারণ এই হাদীসে আছে যে, তাদের হিস্যা বারোটি উটে পৌঁছেছিল এবং তাদের প্রত্যেককে একটি করে অতিরিক্ত উট দেওয়া হয়েছিল। এর থেকে প্রমাণ হয় যে, এই অতিরিক্ত পুরস্কার (নাফল) যা তাদের দেওয়া হয়েছিল, তা তাদের সাধারণ হিস্যার (যা ছিল খুমস—এক-পঞ্চমাংশ) অন্তর্ভুক্ত ছিল না। সুতরাং খুমসের (এক-পঞ্চমাংশের) বাইরে অতিরিক্ত পুরস্কার (নাফল) প্রদানের ক্ষেত্রে এই হাদীসটি তোমাদের জন্য কোনো প্রমাণ নয়। প্রথম মতের প্রবক্তারা তাদের বক্তব্যের সমর্থনে যে সকল আসারের দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন, তার মধ্যে যখন এমন কিছু পাওয়া গেল না যা তাদের বক্তব্যকে আবশ্যক করে, তখন আমরাও দ্বিতীয় মতের প্রবক্তারা তাদের বক্তব্যের সমর্থনে যে সকল আসারের দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন, তা বিবেচনা করতে চাইলাম এবং আমরা তা বিবেচনা করলাম।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null
فإذا ابن أبي داود قد حدثنا، قال: ثنا ابن أبي مريم، قال: ثنا ابن أبي الزناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، عن سليمان بن موسى عن مكحول، عن أبي سلام، عن أبي أمامة الباهلي، عن عبادة بن الصامت رضي الله عنهما، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أخذ يوم حنين وبرةً من جنب بعير، ثم قال: "يا أيها الناس، إنه لا يحل لي مما أفاء الله عليكم إلا الخمس، والخمس مردود فيكم، فأدوا الخيط والمخيط" قال: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يكره الأنفال، وقال: "ليرد قوي المؤمنين على ضعيفهم" . أفلا ترى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يحل لي مما أفاء الله عليكم إلا الخمس". فدل ذلك أن ما سوى الخمس من الغنائم للمقاتلة، لا حكم للإمام في ذلك، ثم كره رسول الله صلى الله عليه وسلم الأنفال، وقال: "ليرد قوي المؤمنين على ضعيفهم" أي: لا يفضل أحد من أقوياء المؤمنين مما أفاء الله عليهم لقوته على ضعيفهم لضعفه، ويستوون في ذلك. واستحال أيضًا أن يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم نفال من الأنفال ما كان يكره، فكان النفل الذي ليس بمكروه هو النفل الذي من الخمس، فثبت بذلك أن ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم نفله مما رواه عبادة عنه في هذا الحديث، هو من الخمس. وقد روي عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أيضًا ما يدل على صحة هذا المذهب.
উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হুনাইনের দিন একটি উটের পাশ থেকে (একটি) লোম নিলেন, অতঃপর বললেন: "হে লোক সকল! আল্লাহ তোমাদের উপর যে ফায় দিয়েছেন, তা থেকে আমার জন্য এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) ছাড়া আর কিছুই হালাল নয়। এই এক-পঞ্চমাংশও তোমাদের মাঝেই ফেরত দেওয়া হবে। সুতরাং তোমরা সুতা ও সুঁই পর্যন্ত (সবকিছু) পরিশোধ কর।" তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনফাল (অতিরিক্ত পুরস্কার বা বণ্টন) অপছন্দ করতেন এবং বলতেন: "যেন মু’মিনদের মধ্যে শক্তিশালীরা তাদের দুর্বলদের প্রতি তা ফিরিয়ে দেয়।" আপনি কি লক্ষ্য করেন না যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আল্লাহ তোমাদের উপর যে ফায় দিয়েছেন, তা থেকে আমার জন্য এক-পঞ্চমাংশ ছাড়া আর কিছুই হালাল নয়।" এ থেকে প্রমাণিত হয় যে, এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) ব্যতীত গনীমতের বাকি অংশ যোদ্ধাদের জন্য, এ বিষয়ে ইমামের কোনো অধিকার নেই। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আনফাল অপছন্দ করলেন এবং বললেন: "যেন মু’মিনদের মধ্যে শক্তিশালীরা তাদের দুর্বলদের প্রতি তা ফিরিয়ে দেয়।" অর্থাৎ, আল্লাহ তা’আলা তাদের প্রতি যা দান করেছেন, তার কারণে শক্তিশালী মু’মিনদের কেউ যেন তাদের শক্তির কারণে দুর্বলদের উপর তাদের দুর্বলতার জন্য শ্রেষ্ঠত্ব লাভ না করে এবং তারা (বণ্টনে) যেন সমান হয়। আর এটাও অসম্ভব যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই আনফাল প্রদান করবেন যা তিনি অপছন্দ করতেন। সুতরাং যে আনফাল অপছন্দনীয় নয়, তা হলো সেই আনফাল যা খুমুসের অংশ থেকে দেওয়া হয়। এর দ্বারা প্রমাণিত হয় যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই হাদীসে উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে যা আনফাল হিসেবে প্রদান করেছেন, তা ছিল খুমুসের অংশ থেকে। আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এমন বর্ণনাও রয়েছে যা এই মতবাদের সত্যতা প্রমাণ করে।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : وبرة بالفتحات، قال الجوهري: الوبر للبعير بالتحريك، والواحدة الوبرة.
حدثنا أحمد بن داود، قال: ثنا سهل بن بكار، قال: ثنا أبو عوانة، عن عاصم بن كليب، عن أبي الجويرية، عن معن بن يزيد السلمي رضي الله عنه قال: سمعت رسول الله يقول "لا نفل إلا بعد الخمس" . ومعنى قوله: إلا بعد الخمس -عندنا، والله أعلم- أي: حتى يقسم الخمس، فإذا قسم الخمس انفرد حق المقاتلة، وهو أربعة أخماس، فكان ذلك النفل الذي ينفله الإمام من بعد أن آثر به أن يفعل ذلك من الخمس، لا من أربعة الأخماس التي هي حق المقاتلة. أي: وقد دل على ذلك أيضًا ما
মা‘ন ইবনে ইয়াযীদ আস-সুলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “পাঁচ ভাগের এক ভাগ (খুমুস) ব্যতিরেকে কোনো নাফল (অতিরিক্ত পুরস্কার) নেই।” তাঁর এই কথার অর্থ—আমাদের নিকট, আল্লাহই সর্বাধিক অবগত—হলো: যতক্ষণ না খুমুস বণ্টন করা হয়। যখন খুমুস বণ্টন করা হয়ে যায়, তখন মুজাহিদদের (যোদ্ধাদের) অধিকার, যা হলো চার-পঞ্চমাংশ, তা আলাদা হয়ে যায়। অতঃপর ইমাম যে অতিরিক্ত পুরস্কার (নাফল) প্রদান করেন, তা তিনি খুমুস থেকে দিতে পারেন, চার-পঞ্চমাংশ থেকে নয়, যা মুজাহিদদের অধিকার। আর এ ব্যাপারেও প্রমাণ রয়েছে যে...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا ابن المبارك، عن معمر، عن أيوب، عن ابن سيرين: أن أنس بن مالك رضي الله عنه كان مع عبيد الله بن أبي بكرة في غزاة غزاها، فأصابوا سبيًا، فأراد عبيد الله أن يعطي أنسًا من السبي قبل أن يقسم، فقال أنس: لا، ولكن اقسم، ثم أعطني من الخمس قال: فقال عبيد الله: لا، إلا من جميع الغنائم، فأبى أنس أن يقبل منه، وأبي عبيد الله أن يعطيه من الخمس شيئا .
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উবাইদুল্লাহ ইবনে আবী বাকরার সাথে একটি যুদ্ধে ছিলেন এবং তারা কিছু যুদ্ধবন্দী লাভ করেছিল। উবাইদুল্লাহ চাইলেন যে বন্টনের আগেই সে আনাসকে সেই যুদ্ধবন্দীদের মধ্য থেকে কিছু দিয়ে দেবে। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: না, বরং আগে বন্টন করো, এরপর তুমি আমাকে এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস)-এর অংশ থেকে দাও। উবাইদুল্লাহ বললেন: না, (আমি তোমাকে দেবো) তবে তা অবশ্যই সকল গনীমতের অংশ থেকে। কিন্তু আনাস তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন এবং উবাইদুল্লাহও তাঁকে খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ)-এর অংশ থেকে কিছু দিতে অস্বীকার করলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو عاصم عن كهمس بن الحسن، عن محمد بن سيرين، عن أنس رضي الله عنه نحوه . فهذا أنس رضي الله تعالى عنه، لم يقبل النفل إلا من الخمس. وقد روي مثل ذلك أيضًا عن جبلة بن عمرو.
ইবনু মারযূক আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবূ আসিম কাহমাস ইবনুল হাসান থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সিরীন থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। সুতরাং এই হলেন আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি খুমস (এক-পঞ্চমাংশ) ব্যতীত নফল (অতিরিক্ত অংশ) গ্রহণ করতেন না। আর অনুরূপ বর্ণনা জাবালা ইবনু আমর থেকেও বর্ণিত হয়েছে।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا ابن المبارك، عن ابن لهيعة، عن بكير بن الأشج، عن سليمان بن يسار أنهم كانوا مع معاوية بن حديج في غزوة المغرب، فنفل الناس ومعنا أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلم يردوا ذلك غير جبلة بن عمرو .
সুলাইমান ইবন ইয়াসার থেকে বর্ণিত, তাঁরা মু’আবিয়া ইবন হুদাইজের সাথে মাগরিবের (পশ্চিমের) যুদ্ধে ছিলেন। তিনি (মু’আবিয়া) তখন লোকদেরকে অতিরিক্ত যুদ্ধলব্ধ সম্পদ (নাফল) দিলেন। তখন আমাদের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণও উপস্থিত ছিলেন, কিন্তু জাবালাহ ইবন আমর ব্যতীত আর কেউই সেই বিষয়ে আপত্তি করেননি।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن، رواية عبد الله بن المبارك عن ابن لهيعة كانت قبل احتراق كتبه.
حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف، قال: ثنا ابن المبارك، عن ابن لهيعة، عن خالد بن أبي عمران، قال: سألت سليمان بن يسار عن النفل في الغزو، فقال: لم أر أحدًا صنعه غير أن ابن حديج، نفلنا بإفريقية النصف بعد الخمس، ومعنا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم لا من المهاجرين الأولين أناس كثير، فأبى جبلة بن عمرو أن يأخذ منها شيئًا . فإن قال قائل: ففي هذا الحديث أن أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم سوى جبلة بن عمرو قد قبلوا. قيل له: قد صدقت، ونحن فلم ننكر أن الناس قد اختلفوا في ذلك، فمنهم من أجاز للإمام النفل قبل الخمس، ومنهم من لم يجزه، وأن أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كانوا في ذلك مختلفين، وإنما أردنا بما روينا عن أنس وجبلة رضي الله عنهما أن نخبر قولنا هذا قد تقدمنا فيه من ذكرنا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم. فإن قال قائل: فقد روي أيضًا عن سعد بن أبي وقاص في هذا، فذكر
খালিদ ইবন আবী ইমরান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সুলাইমান ইবন ইয়াসারকে গাযওয়ার (যুদ্ধাভিযানের) মধ্যে ’নাফল’ (অতিরিক্ত পুরস্কার বা অংশ) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: আমি কাউকে তা (নাফল) দিতে দেখিনি, তবে ইবন হুদাইজ (আফ্রিকা অভিযানে) খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) বের করার পর আমাদেরকে অর্ধেক নাফল দিয়েছিলেন। আমাদের সাথে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে যারা প্রথম যুগের মুহাজির নন, এমন অনেক লোক ছিলেন। কিন্তু জাবালা ইবন আমর তা থেকে কিছুই নিতে অস্বীকার করলেন। যদি কেউ বলে: এই হাদীসে (প্রমাণিত হয় যে) জাবালা ইবন আমর ব্যতীত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অন্যান্য সাহাবীগণ তা গ্রহণ করেছিলেন। তাকে বলা হবে: তুমি সত্য বলেছ। আমরা অস্বীকার করি না যে, এই বিষয়ে মানুষ ভিন্নমত পোষণ করেছেন। তাদের মধ্যে কেউ কেউ ইমামের জন্য খুমুসের (এক-পঞ্চমাংশের) পূর্বে ’নাফল’ (অতিরিক্ত অংশ) দেওয়াকে জায়েয বলেছেন এবং কেউ কেউ তা জায়েয বলেননি। আর নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণও এই বিষয়ে ভিন্নমত পোষণ করতেন। আমরা আনাস ও জাবালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণনা করেছি তার মাধ্যমে শুধু এটাই জানাতে চেয়েছি যে, আমাদের এই বক্তব্যের ব্যাপারে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যেসব সাহাবীর নাম উল্লেখ করেছি, তারা আমাদের পূর্বে এই মত পোষণ করতেন। যদি কেউ বলে: এই বিষয়ে সা’দ ইবন আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে, অতঃপর (তিনি) উল্লেখ করলেন।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن كسابقه.
ما حدثنا يونس، قال: أخبرنا سفيان، عن الأسود بن قيس عن رجل من قومه يقال له: شبر بن علقمة قال: بارزت رجلًا يوم القادسية فقتلته، فبلغ سلبه اثني عشر ألفًا، فنفلنيه سعد بن أبي وقاص رضي الله عنه . قيل له: قد يجوز أن يكون سعد نفله ذلك والقتال لم يرتفع، فإن كان كذلك، فهذا قولنا أيضًا، وإن كان إنما نفله بعد ارتفاع القتال، فقد يجوز أن يكون جعل ذلك من الخمس، فإن كان جعله من غير الخمس، فهذا فيه الذي ذكرنا من الاختلاف، فلم يكن في هذا الحديث لأحد الفريقين حجة إذ كان قد يحتمل ما قد صرفه إليه مخالفه ووجب بعد ذلك أن نكشف وجه هذا الباب لنعلم كيف حكمه من طريق النظر. فكان الأصل في ذلك أن الإمام إذا قال في حال القتال: من قتل قتيلًا فله سلبه، أن ذلك جائز، ولو قال من قتل قتيلًا فله كذا وكذا درهمًا، كان ذلك جائزا أيضًا، ولو قال: من قتل قتيلًا فله عشر ما أصبنا لم يجز ذلك؛ لأن هذا لو جاز جاز أن تكون الغنيمة كلها للمقاتلين، فيبطل حق الله تعالى فيها من الخمس، فكان النفل لا يكون قبل القتال إلا فيما أصابه المنفَّل بسيفه، ولا يجوز فيما أصاب غيره إلا أن يكون فيما حكمه حكم الإجارة، فيجوز ذلك كما تجوز الإجارة كقوله: من قتل قتيلًا فله عشرة دراهم، فذلك جائز. فلما كان ما ذكرنا كذلك، ولم يجز النفل إلا فيما أصاب المنفّل بسيفه، أو فيما جعل له بعمله، ولم يجز أن ينفل مما أصاب غيره، كان النظر على ذلك أيضا أن يكون بعد إحراز الغنيمة أحرى أن لا يجوز أن ينفل مما أصاب غيره. ففسد بذلك قول من أجاز النفل بعد إحراز الغنيمة، ورجعنا إلى حكم ما أصابه هو، فكان ذلك قبل أن ينفله الإمام إياه قد وجب حق الله تعالى في خمسه، وحق المقاتلة في أربعة أخماسه، فلو أجزنا النفل إذًا لكان حقهم قد بطل بعد وجوبه، وإنما يجوز النفل فيما يدخل في ملك المنفّل من ملك العدو، فأما ما قد زال عن ملك العدو وصار في ملك المسلمين، فلا نفل في ذلك؛ لأنَّه من مال المسلمين. فثبت بذلك أن لا نفل بعد إحراز الغنيمة على ما قد بينا وفصلنا في هذا الباب، وهذا قول أبي حنيفة، وأبي يوسف ومحمد، رحمهم الله.
শিবর ইবনে আলকামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ক্বাদিসিয়্যার যুদ্ধের দিন এক ব্যক্তির সাথে দ্বন্দ্বযুদ্ধ করলাম এবং তাকে হত্যা করলাম। তার কাছ থেকে প্রাপ্ত সালব (লুণ্ঠিত সম্পদ) বারো হাজার (মূল্যের) হয়েছিল। তখন সা’দ ইবনে আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে তা (পুরোপুরি) নাফল (বিশেষ পুরস্কার) হিসেবে দিয়ে দিলেন।
তাকে বলা হলো: এটি সম্ভব যে সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে নাফল দিয়েছিলেন যখন যুদ্ধ শেষ হয়নি। যদি তাই হয়, তবে এটি আমাদেরও অভিমত। আর যদি তিনি যুদ্ধ শেষ হওয়ার পর তাকে নাফল দিয়ে থাকেন, তাহলে সম্ভবত তিনি তা (গনীমতের) এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) থেকে দিয়েছিলেন। কিন্তু যদি তিনি তা খুমুস ছাড়া অন্য উৎস থেকে দিয়ে থাকেন, তবে এই বিষয়ে আমাদের মধ্যে যে মতভেদ রয়েছে, তা বিদ্যমান। সুতরাং এই হাদিসটি কোনো পক্ষের জন্যই নিশ্চিত প্রমাণ হিসেবে কাজ করে না, কারণ এর ব্যাখ্যা প্রতিদ্বন্দ্বী পক্ষ দ্বারাও নিজেদের অনুকূলে গ্রহণযোগ্য হতে পারে। এরপরে আমাদের উচিত, ফিকহী দৃষ্টিকোণ থেকে এর বিধান কী, তা জানার জন্য এই অধ্যায়ের দিকটি স্পষ্ট করা।
এই বিষয়ে মূলনীতি হলো, যদি ইমাম যুদ্ধের সময় ঘোষণা করেন যে, ’যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধাকে হত্যা করবে, তার সালব তার জন্য’, তবে তা বৈধ। আর যদি তিনি বলেন, ’যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধাকে হত্যা করবে, সে এত এত দিরহাম পাবে’, তবে তাও বৈধ। কিন্তু যদি তিনি বলেন, ’যে ব্যক্তি কোনো যোদ্ধাকে হত্যা করবে, সে আমাদের অর্জিত গনীমতের এক-দশমাংশ পাবে’, তবে তা বৈধ হবে না। কারণ এটি বৈধ হলে সমস্ত গনীমত শুধু যোদ্ধাদের জন্য বৈধ হয়ে যেত, ফলে তাতে আল্লাহ তাআলার এক-পঞ্চমাংশের (খুমুসের) অধিকার বাতিল হয়ে যেত। অতএব, যুদ্ধ শুরুর আগে নাফল কেবল সেই বস্তুর ক্ষেত্রেই প্রযোজ্য হবে, যা নাফলপ্রাপ্ত ব্যক্তি তার নিজ তরবারি দ্বারা অর্জন করেছে। অন্যের অর্জিত বস্তুতে নাফল প্রদান করা বৈধ নয়—তবে যদি তার বিধান ইজারার (ভাড়া বা মজুরি) বিধানের মতো হয়, যেমন কেউ বলল: ’যে ব্যক্তি কাউকে হত্যা করবে, সে দশ দিরহাম পাবে’, তবে তা বৈধ।
যেহেতু আমরা যা উল্লেখ করলাম তা এমনই, এবং নাফল কেবল সেই ক্ষেত্রেই বৈধ যা নাফলপ্রাপ্ত ব্যক্তি তার তরবারির মাধ্যমে অর্জন করেছে, অথবা কাজের বিনিময়ে তাকে যা দেওয়া হয়েছে; এবং অন্যের অর্জিত বস্তু থেকে নাফল দেওয়া বৈধ নয়, তাই গনীমত অর্জনের পর অন্য কারো প্রাপ্ত বস্তু থেকে নাফল দেওয়া যে আরও বেশি বৈধ নয়, তা ফিকহী দৃষ্টিকোণ থেকে প্রমাণিত হয়। এর দ্বারা তাদের মতবাদ বাতিল হয়ে যায় যারা গনীমত অর্জনের পর নাফল দেওয়ার অনুমতি দেয়। তখন আমরা (পুনরায়) সেই ব্যক্তির অর্জিত বস্তুর বিধানের দিকে ফিরে যাই। ইমাম তাকে নাফল দেওয়ার আগেই তার সেই বস্তুতে আল্লাহ তাআলার খুমুসের (এক-পঞ্চমাংশের) হক এবং অন্যান্য যোদ্ধাদের চার-পঞ্চমাংশের হক আবশ্যক হয়ে যায়। তাই যদি আমরা এই অবস্থায় নাফল দেওয়ার অনুমতি দিই, তাহলে তাদের হক আবশ্যক হওয়ার পরও বাতিল হয়ে যাবে। নাফল কেবল সেই বস্তুর ক্ষেত্রেই বৈধ যা শত্রুর সম্পদ থেকে নাফলপ্রাপ্ত ব্যক্তির মালিকানায় আসে। কিন্তু যা শত্রুর মালিকানা থেকে বেরিয়ে মুসলিমদের সম্পদে পরিণত হয়েছে, তাতে কোনো নাফল নেই; কারণ তা মুসলিমদের সম্পদ।
সুতরাং এর দ্বারা প্রমাণিত হলো যে, গনীমত অর্জন করে ফেলার পর আর কোনো নাফল নেই, যেমনটি আমরা এই অধ্যায়ে বিস্তারিতভাবে ব্যাখ্যা করলাম। এটি ইমাম আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ ও মুহাম্মদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর অভিমত।
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لجهالة شبر بن علقمة.
حدثنا يونس، قال: ثنا ابن وهب، قال أخبرنا إسماعيل بن عياش، عن محمد ابن الوليد الزبيدي، عن ابن شهاب الزهري، أن عنبسة بن سعيد أخبره أنه سمع أبا هريرة رضي الله عنه يحدث سعيد بن العاص رضي الله عنه، قال أبو هريرة: بعث النبي صلى الله عليه وسلم أبان بن سعيد على سرية من المدينة قبل نجد، فقدم أبان وأصحابه على النبي صلى الله عليه وسلم بخيبر بعدما فتحها، وأن حزم خيلهم الليف فقال أبان: اقسم لنا يا رسول الله، وقال أبو هريرة، فقلت: لا تقسم لهم شيئًا يا نبي الله قال أبان أنت بهذا يا وبر تحدر [علينا من رأس ضال] ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم: اجلس يا أبان فلم يقسم لهم شيئًا . قال أبو جعفر فذهب قوم إلى أنه لا يسهم من الغنيمة إلا لمن حضر الوقعة. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: يقسم لكل من حضر الوقعة، ولمن كان غائبًا عنها في شيء من أسبابها، فمن ذلك من خرج يريدها، فلم يلحق بالإمام حتى ذهب القتال، غير أنه لحق به في دار الحرب قبل خروجه منها قسم له. واحتجوا في ذلك بما
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আবান ইবনু সাঈদকে নাজদের দিকে মদীনা থেকে একটি ছোট বাহিনীর (সারিয়্যা) প্রধান করে প্রেরণ করলেন। আবান এবং তাঁর সঙ্গীরা খায়বার বিজয়ের পর সেখানে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করলেন। তাদের ঘোড়ার লাগাম ছিল খেজুরের ছাল (আঁশ) দিয়ে তৈরি। আবান বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাদের জন্য (গণীমতের) অংশ নির্ধারণ করুন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি বললাম, ইয়া আল্লাহ্র নবী! তাদের জন্য কিছুই ভাগ করবেন না। আবান বললেন, হে ওয়াবর (জলজ প্রাণী)! তুমি কি আমাদেরকে উঁচু পর্বত থেকে নিচে নামিয়ে দিতে চাচ্ছ? অতঃপর নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, হে আবান! বসো। অতঃপর তিনি তাদের জন্য কোনো অংশই ভাগ করলেন না। আবূ জাফর (তাহাবী) বলেন, একদল লোক এই মত পোষণ করেন যে, কেবল যুদ্ধক্ষেত্রে উপস্থিত লোকেরাই গণীমতের অংশ পাবে। অন্য আরেকদল লোক তাদের বিরোধিতা করেন এবং বলেন: যারা যুদ্ধক্ষেত্রে উপস্থিত ছিল এবং যারা কোনো কারণে উপস্থিত হতে পারেনি তাদের সবার মধ্যে গণীমত বন্টন করা হবে। এর উদাহরণ হলো, যে ব্যক্তি যুদ্ধের উদ্দেশ্যে বের হয়েছে কিন্তু যুদ্ধ শেষ হওয়া পর্যন্ত ইমামের (নেতার) সাথে যোগ দিতে পারেনি, তবে যুদ্ধ শেষ হওয়ার আগেই দারুল হারব (শত্রুভূমি) থেকে বের হওয়ার আগে সে যদি তার সাথে যোগ দেয়, তবে তাকে অংশ দেওয়া হবে। তারা এই ব্যাপারে দলীল হিসেবে যা পেশ করেন...
تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن من أجل إسماعيل بن عياش فهو صدوق في روايته عن أهل بلده وهذه منها.