হাদীস বিএন


শারহু মা’আনিল-আসার





শারহু মা’আনিল-আসার (5094)


حدثنا بحر بن نصر، عن شعيب بن الليث، عن أبيه، عن سعيد المقبري، عن أبي شريح الخزاعي رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم … بمثل معنى حديث فهد الذي قبل هذا الحديث .




আবু শুরাইহ আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এর পূর্বের ফাহদের হাদীসের অর্থের অনুরূপ বর্ণনা করেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5095)


حدثنا علي بن عبد الرحمن قال: ثنا ابن أبي مريم، قال أخبرنا الدراوردي، قال: ثنا محمد بن عمرو بن علقمة عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة رضي الله عنه قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على الحجون، ثم قال: "والله إنك لخير أرض الله، وأحب أرض الله إلى الله، لم تحل لأحد كان قبلي، ولا تحل لأحد بعدي، وما أحلت لي إلا ساعةً من النهار، وهي بعد ساعتها هذه حرام إلى يوم القيامة" .




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজূন নামক স্থানে দাঁড়ালেন, অতঃপর বললেন: আল্লাহর শপথ! নিশ্চয়ই তুমি আল্লাহর জমিনের মধ্যে শ্রেষ্ঠ এবং আল্লাহর নিকট আল্লাহর জমিনের মধ্যে সবচেয়ে প্রিয়। আমার পূর্বে কারো জন্য তোমাকে হালাল করা হয়নি এবং আমার পরেও কারো জন্য তোমাকে হালাল করা হবে না। আর দিনের একাংশ সময়ের জন্যই শুধু আমাকে তোমার জন্য হালাল করা হয়েছে, আর এই সময়ের পর থেকে তা কিয়ামত পর্যন্ত হারাম।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن من أجل محمد بن عمرو بن علقمة الليثي.









শারহু মা’আনিল-আসার (5096)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا حجاج بن المنهال، وأبو سلمة قالا: ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের কাছে মুহাম্মদ ইবন খুযাইমাহ বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন হাজ্জাজ ইবনুল মিনহাল এবং আবু সালামাহ, তারা দু’জন বলেছেন: আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন হাম্মাদ ইবন সালামাহ, তিনি মুহাম্মদ ইবন আমর থেকে (বর্ণনা করেছেন)... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5097)


حدثنا محمد بن عبد الله بن ميمون قال: ثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن يحيى، قال: حدثني أبو سلمة، قال: حدثني أبو هريرة رضي الله عنه قال: لما فتح الله عز وجل على رسوله مكة، قتلت هذيل رجلا من بني ليث بقتيل كان لهم في الجاهلية، قال: فقام النبي الله صلى الله عليه وسلم فقال: "إن الله عز وجل حبس عن أهل مكة الفيل، وسلط عليهم رسوله والمؤمنين، وإنها لم تحل لأحد قبلي، ولا تحل لأحد بعدي، وإنما أحلت لي ساعة من نهار، وإنها ساعتي هذه حرام، لا يُعضد شجرها، ولا يختلى شوكها، ولا يلتقط ساقطتها إلا لمنشدها"




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য মক্কা বিজয় উন্মুক্ত করে দিলেন, তখন হুযায়ল গোত্র জাহেলী যুগে তাদের এক হত্যার প্রতিশোধ হিসেবে বানূ লায়ছ গোত্রের এক ব্যক্তিকে হত্যা করে ফেলল। বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা মক্কাবাসীর উপর থেকে হস্তীকে নিবৃত্ত করেছিলেন, আর তাদের উপর তাঁর রাসূল ও মুমিনদেরকে কর্তৃত্ব দান করেছেন। নিশ্চয়ই এটি আমার পূর্বে কারো জন্য হালাল করা হয়নি, আর আমার পরেও কারো জন্য হালাল করা হবে না। আর দিনের কিছুক্ষণের জন্য কেবল আমার জন্যেই এটি হালাল করা হয়েছিল, আর আমার এই মুহূর্তে এটি হারাম। এখানকার কোনো গাছ কাটা যাবে না, এর কোনো কাঁটা তোলা যাবে না, আর এর পড়ে থাকা জিনিসও শুধুমাত্র ঘোষণাকারীর জন্য ছাড়া অন্য কেউ উঠাতে পারবে না।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5098)


حدثنا بكار بن قتيبة، قال: ثنا أبو داود، قال: ثنا حرب بن شداد، عن يحيى بن أبي كثير … فذكر بإسناده مثله غير أنه قال: إن الله عز وجل حبس عن أهل مكة الفيل" وقال: "لا يلتقط ضالتها إلا لمنشد" . أفلا ترى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد أخبر به في خطبته هذه أن الله تعالى أحل له مكة ساعة من النهار، ثم عادت حرامًا إلى يوم القيامة، فلو كان لا حاجة به إلى القتال في تلك الساعة إذًا لكانت في تلك الساعة، وفيما قبلها وفيما بعدها على معنى واحد، وكان حكمها في تلك الأوقات كلها حكمًا واحدًا. فإن قال قائل: إنما أبيح له إظهار السلاح بها لا غير. قيل له: وأي حاجة به إلى إظهار السلاح إذا كان لا يستطيع أن يقاتل به أحدًا فيها؟ هذا محال عندنا ولا يجوز إظهار السلاح بها إلا وهو مباح له القتال به، وقد بين الليث بن سعد في حديثه الذي روينا عنه في هذا الفصل عن سعيد المقبري هذا المعنى فقال فيه "وإن الله إنما أحل لي القتال فيها ساعة من نهار"، أفيجوز له أن يحل له قتال من هو في هدنة منه وأمان؟ هذا لا يجوز، ثم قد كان دخوله إياها دخول محارب لا دخول آمن لأنه دخلها وعلى رأسه المغفَر.




ইয়াহইয়া ইবনে আবি কাছীর থেকে বর্ণিত... (তিনি তাঁর সনদ সহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি বলেছেন): “নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা মক্কাবাসীর পক্ষ থেকে হাতিকে আটকে রেখেছিলেন।” এবং তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এর (মক্কার) হারানো বস্তু শুধু সেই ব্যক্তিই তুলবে, যে তা ঘোষণা করবে।” আপনি কি দেখেন না যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর এই খুতবায় জানিয়েছেন যে, আল্লাহ তাআলা দিনের কিছু সময়ের জন্য মক্কাকে তাঁর জন্য হালাল করেছিলেন, এরপর কিয়ামত পর্যন্ত তা আবার হারাম হয়ে গেছে? যদি সেই মুহূর্তে তাঁর যুদ্ধের প্রয়োজন না থাকত, তবে সেই মুহূর্ত, তার আগের মুহূর্ত এবং তার পরের মুহূর্ত—সব একই অর্থে থাকত এবং সে সমস্ত সময়ে তার হুকুমও একই থাকত। যদি কেউ বলে যে, তাঁর জন্য মক্কাতে কেবল অস্ত্র প্রদর্শনই বৈধ করা হয়েছিল, যুদ্ধ নয়। তাকে বলা হবে: যদি তিনি সেখানে কারো সাথে যুদ্ধ করার ক্ষমতা না রাখেন, তবে অস্ত্র প্রদর্শনের তাঁর কী প্রয়োজন? আমাদের মতে এটা অসম্ভব। যুদ্ধ করার অনুমতি না থাকলে সেখানে অস্ত্র প্রদর্শন করা বৈধ নয়। এই অধ্যায়ে সাঈদ আল-মাকবুরী থেকে আমাদের বর্ণিত হাদীসে লাইস ইবনে সা’দ এই অর্থ স্পষ্ট করেছেন। তিনি এতে বলেছেন: “আর নিশ্চয়ই আল্লাহ দিনের কিছু সময়ের জন্য আমাকে সেখানে যুদ্ধের অনুমতি দিয়েছিলেন।” তাহলে কি তাঁর জন্য এমন কারো সাথে যুদ্ধ করা বৈধ হবে, যার সাথে তাঁর সন্ধি ও নিরাপত্তা চুক্তি রয়েছে? এটা জায়েয নয়। তদুপরি, তাঁর মক্কায় প্রবেশ ছিল একজন যোদ্ধার প্রবেশ, কোনো নিরাপদ ব্যক্তির প্রবেশ ছিল না; কারণ তিনি মক্কায় প্রবেশ করেছিলেন তাঁর মাথায় শিরস্ত্রাণ (মাগফার) পরিহিত অবস্থায়।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5099)


حدثنا يونس بن عبد الأعلى، قال أخبرنا عبد الله بن وهب، أن مالكا أخبره، عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك رضي الله عنه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل مكة عام الفتح وعلى رأسه المغفر، فلما نزعه جاءه رجل فقال: يا رسول الله هذا ابن خَطَل متعلّق بأستار الكعبة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: اقتلوه، قال مالك: قال ابن شهاب: ولم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ محرمًا .




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর মক্কায় প্রবেশ করলেন, তখন তাঁর মাথায় শিরস্ত্রাণ (মাগফার) ছিল। যখন তিনি তা খুলে ফেললেন, তখন একজন লোক তাঁর কাছে এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! ইবনু খাতাল কাবাঘরের পর্দা ধরে আছে। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা তাকে হত্যা করো। মালেক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, ইবনু শিহাব (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: সেদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইহরাম অবস্থায় ছিলেন না।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح. وهو مكرر سابقه برقم (3883).









শারহু মা’আনিল-আসার (5100)


حدثنا إبراهيم بن مرزوق، قال: ثنا أبو الوليد قال: ثنا مالك بن أنس … فذكر بإسناده مثله. ولم يقل: "ولم يكن رسول الله صلى الله عليه وسلم يومئذ محرمًا" . وقيل: إنه دخلها وعليه عمامة سوداء.




মালেক ইবনে আনাস থেকে বর্ণিত, অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ (হাদীস) উল্লেখ করলেন। আর তিনি এই কথাটি বলেননি যে, “রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেদিন ইহরাম অবস্থায় ছিলেন না।” এবং বলা হয়েছে যে, তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখানে প্রবেশ করেছিলেন, যখন তাঁর মাথায় কালো পাগড়ি ছিল।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح. وهو مكرر سابقه برقم (3883).









শারহু মা’আনিল-আসার (5101)


حدثنا علي بن معبد، قال: ثنا معلى بن منصور قال: ثنا شريك، عن عمار الدهني، عن أبي الزبير عن جابر رضي الله عنه أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل يوم فتح مكة وعليه عمامة سوداء .




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের দিন মক্কায় প্রবেশ করেন, তখন তাঁর মাথায় কালো পাগড়ি ছিল।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : حديث صحيح، وإسناده ضعيف من أجل شريك بن عبد الله. وهو مكرر سابقه برقم (3881).









শারহু মা’আনিল-আসার (5102)


حدثنا فهد بن سليمان قال: ثنا محمد بن سعيد الأصبهاني، قال: ثنا شريك بن عبد الله، عن عمار الدهني، عن أبي الزبير عن جابر رضي الله عنه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم … مثله .




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে অনুরূপ বর্ণিত আছে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : حديث صحيح، وإسناده ضعيف من أجل شريك بن عبد الله. وهو مكرر سابقه برقم (3881).









শারহু মা’আনিল-আসার (5103)


حدثنا فهد، قال: ثنا أبو نعيم الفضل بن دُكين، قال: ثنا حماد بن سلمة، عن أبي الزبير، عن جابر رضي الله عنه قال: دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم وعليه عمامة سوداء .




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রবেশ করলেন এমন অবস্থায় যে তাঁর মাথায় একটি কালো পাগড়ি ছিল।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : رجاله ثقات إلا أن أبا الزبير لم يصرح بسماعه عن جابر. وهو مكرر سابقه برقم (3882).









শারহু মা’আনিল-আসার (5104)


حدثنا علي بن عبد الرحمن، قال: ثنا علي بن حكيم الأودي، قال: ثنا شريك، عن عمار الدهني، عن أبي الزبير عن جابر رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم … مثله . قال أبو جعفر: فلو كان رسول الله صلى الله عليه وسلم عند دخوله إياها غير محارب إذا لم يدخلها إلا حراما دخلها، وهذا عبد الله بن عباس رضي الله عنهما وهو أحد من روى عن رسول الله صلى الله عليه وسلم إحلال الله مكة له، كما قد روينا عنه في هذا الفصل قد منع الناس أن يدخلوا الحرم غير محرمين.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে... অনুরূপ। [ইমাম] আবু জা’ফর (রহ.) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যদি মক্কা প্রবেশের সময় যুদ্ধরত অবস্থায় না থাকতেন, তবে তিনি ইহরাম ছাড়া তাতে প্রবেশ করতেন না। আর এই হলেন আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে মক্কাকে আল্লাহ তাঁর জন্য হালাল করার বর্ণনা দিয়েছেন, যেমন আমরা এই অধ্যায়ে তাঁর থেকে বর্ণনা করেছি, তিনি মানুষকে ইহরাম ছাড়া হারামে প্রবেশ করতে নিষেধ করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5105)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا حجاج بن المنهال، قال: حماد، عن قيس، عن عطاء، عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: لا يدخل أحد مكة إلا محرمًا .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, ইহরাম ছাড়া কেউ মক্কায় প্রবেশ করবে না।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح. وهو مكرر سابقه برقم (3898).









শারহু মা’আনিল-আসার (5106)


حدثنا محمد قال: ثنا عثمان بن الهيثم بن الجهم قال: ثنا ابن جريج، قال: قال عطاء: قال ابن عباس رضي الله عنهما: لا عمرة على المكي إلا أن يخرج من الحرم، فلا يدخله إلا حراما، فقيل لابن عباس رضي الله عنهما: فإن خرج رجل من مكة قريبًا؟ قال: نعم يقضي حاجته ويجعل مع قضائها عمرة .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মক্কাবাসীর জন্য কোনো উমরাহ নেই, যদি না সে হারামের সীমানা থেকে বের হয়। অতঃপর সে ইহরাম ছাড়া হারামের সীমানায় প্রবেশ করবে না। অতঃপর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলো: যদি কোনো ব্যক্তি সামান্য দূরে মক্কা থেকে বের হয়? তিনি বললেন: হ্যাঁ, সে তার প্রয়োজন পূরণ করবে এবং সেই প্রয়োজন পূরণের সাথে উমরাহও করে নেবে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : رجاله ثقات.









শারহু মা’আনিল-আসার (5107)


حدثنا صالح بن عبد الرحمن الأنصاري، قال: ثنا سعيد بن منصور، قال: ثنا هشيم، قال أخبرنا عبد الملك، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس رضي الله عنهما أنه كان يقول: "لا يدخل مكة تاجر ولا طالب حاجة إلا وهو محرم" . فدل ما ذكرنا أن إحلال الله إياها لرسول الله صلى الله عليه وسلم إنما كان لحاجته إلى القتال منها لا لغير ذلك. فإن قال قائل: فقد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم آمن الناس جميعا إلا ستة نفر. وذكروا في ذلك ما




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: "কোনো ব্যবসায়ী বা প্রয়োজন অন্বেষণকারী মক্কায় প্রবেশ করতে পারবে না, তবে ইহরাম অবস্থায় থাকলে পারবে।" আমরা যা উল্লেখ করেছি, তা প্রমাণ করে যে, আল্লাহ তাআলা তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য মক্কাকে কেবল সেখানকার যুদ্ধের প্রয়োজনের জন্যই হালাল করেছিলেন, অন্য কোনো কারণে নয়। যদি কোনো প্রশ্নকারী বলে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছয়জন ব্যক্তি ব্যতীত সকলকেই নিরাপত্তা প্রদান করেছিলেন। আর এ বিষয়ে তারা উল্লেখ করেছেন যে...




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5108)


حدثنا فهد، قال: ثنا أبو بكر بن أبي شيبة، قال: ثنا أحمد بن المفضل، قال: ثنا أسباط بن نصر، قال: زعم السدي، عن مصعب بن سعد، عن أبيه، قال: لما كان يوم فتح مكة آمن رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إلا أربعة نفر وامرأتين، وقال: "اقتلوهم وإن وجدتموهم متعلقين بأستار الكعبة عكرمة بن أبي جهل وعبد الله بن خَطَل، ومقيس بن ضبابة، وعبد الله بن سعد بن أبي سرح فأما عبد الله بن خطل: فأتي وهو متعلق بأستار الكعبة فاستبق إليه سعيد بن حريث وعمار بن ياسر فسبق سعيد عمارًا وكان أشد الرجلين فقتله، وأما مقيس بن ضبابة، فأدركه الناس في السوق فقتلوه، وأما عكرمة بن أبي جهل، فركب البحر فأصابتهم ريح عاصف، فقال أصحاب السفينة لأهل السفينة: أخلصوا فإن آلهتكم لا تغني عنكم شيئًا هاهنا، فقال عكرمة: والله لئن لم ينجني في البحر إلا الإخلاص، لم ينجني في البر غيره، اللهم إن لك علي عهدًا إن أنت أنجيتني مما أنا فيه أن آتي محمدًا ثم أضع يدي في يده، فلأجدنه عفوا كريما فأسلم، قال: وأما عبد الله بن أبي سرح: اختبأ عند عثمان بن عفان رضي الله عنه فلما دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم الناس إلى البيعة جاء به حتى أوقفه على رسول الله صلى الله عليه وسلم: فقال: يا رسول الله! بايع عبد الله قال فرفع رأسه فنظر إليه ثلاثا، كل ذلك نائيًا فبايعه بعد ثلاث، ثم أقبل على أصحابه فقال: أما كان فيكم رجل يقوم إلى هذا حين رآني كففت يدي عن بيعته فيقتله؟، قالوا: ما درينا يا رسول الله! ما في نفسك، فهلا أومأت إلينا بعينك؟، فقال: "إنه لا ينبغي لنبي أن يكون له خائنة عين" .




সা’দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন মক্কা বিজয়ের দিন এলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারজন পুরুষ এবং দুইজন মহিলা ছাড়া বাকি সকল মানুষকে নিরাপত্তা দিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা তাদের হত্যা করবে, এমনকি যদি তোমরা তাদের কা’বার পর্দা ধরে ঝুলন্ত অবস্থায় পাও— তারা হলো ইকরিমা ইবনু আবী জাহল, আব্দুল্লাহ ইবনু খাতাল, মাক্বীস ইবনু দুবাবাহ এবং আব্দুল্লাহ ইবনু সা’দ ইবনু আবী সারহ। আব্দুল্লাহ ইবনু খাতাল-এর ক্ষেত্রে: তাকে এমন অবস্থায় আনা হলো যখন সে কা’বার পর্দা ধরে ঝুলে ছিল। সা’ঈদ ইবনু হুরিস এবং আম্মার ইবনু ইয়াসির তার দিকে দ্রুত এগিয়ে গেলেন। সা’ঈদ আম্মারকে ছাড়িয়ে গেলেন— কারণ সে ছিল দুজনের মধ্যে অধিক শক্তিশালী— এবং তাকে হত্যা করলেন। আর মাক্বীস ইবনু দুবাবাহ-এর ক্ষেত্রে: লোকেরা তাকে বাজারে পেয়ে গেল এবং তাকে হত্যা করল। আর ইকরিমা ইবনু আবী জাহল-এর ক্ষেত্রে: সে সমুদ্রে যাত্রা করল। তারা প্রচণ্ড ঘূর্ণিঝড়ের কবলে পড়ল। জাহাজের নাবিকেরা যাত্রীদের বলল: তোমরা একনিষ্ঠ হও (তাওহীদ গ্রহণ করো), কারণ তোমাদের দেব-দেবী এখানে তোমাদের কোনো উপকার করতে পারবে না। ইকরিমা বলল: আল্লাহর কসম! যদি সমুদ্রে আমাকে একনিষ্ঠতা (তাওহীদ) ছাড়া আর কেউ বাঁচাতে না পারে, তবে জমিনেও তা ছাড়া অন্য কেউ আমাকে বাঁচাতে পারবে না। হে আল্লাহ! তুমি যদি আমাকে এই বিপদ থেকে মুক্তি দাও, তবে তোমার কাছে আমার ওয়াদা— আমি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসব এবং তাঁর হাতে হাত রাখব (তাঁর বায়’আত গ্রহণ করব), আমি তাঁকে অবশ্যই ক্ষমাশীল ও দয়ালু হিসেবে পাব। অতঃপর সে ইসলাম গ্রহণ করল। তিনি বললেন: আর আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সারহ-এর ক্ষেত্রে: সে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লুকিয়ে ছিল। যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষকে বায়’আত গ্রহণের জন্য ডাকলেন, তখন তিনি তাকে নিয়ে এলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে দাঁড় করালেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আব্দুল্লাহকে বায়’আত করান। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুললেন এবং তিনবার তার দিকে তাকালেন, প্রতিবারই এড়িয়ে গেলেন। তিনবারের পর তিনি তাকে বায়’আত করালেন। অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীদের দিকে ফিরলেন এবং বললেন: "তোমাদের মধ্যে কি এমন কোনো লোক ছিল না, যে যখন দেখল আমি তার বায়’আত গ্রহণ থেকে হাত গুটিয়ে নিয়েছি, তখন সে উঠে গিয়ে তাকে হত্যা করত?" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার মনে কী আছে তা আমরা জানতাম না। আপনি যদি চোখ দিয়ে ইশারা করতেন? তিনি বললেন: "কোনো নবীর জন্য চোখ দিয়ে প্রতারণামূলক ইশারা করা উচিত নয়।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5109)


حدثنا أبو أمية قال: ثنا أحمد بن المفضل … فذكر بإسناده مثله . قيل له: هذا ما كان من رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد أن أظفره الله عليهم ألا يرى أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما كان صالح أولا قد كان دخل في صلحه ذلك هؤلاء الستة النفر، وإن دماءهم قد حلت بعد ذلك بأسباب حدثت منهم بعد الصلح، وكذلك أبو سفيان أيضًا كان في الصلح. ثم قال عمر بن الخطاب رضي الله عنه لرسول الله صلى الله عليه وسلم حين أتاه به العباس رضي الله عنه: يا رسول الله هذا أبو سفيان قد أمكن الله منه بغير عقد ولا عهد، فلم ينكر ذلك عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أجاره العباس بعد ذلك فحقن دمه لجواره، وكذلك هبيرة بن أبي وهب المخزومي وابن عمه اللذان كانا لحقا بعد دخول رسول الله صلى الله عليه وسلم مكة إلى أم هانئ بنت أبي طالب رضي الله عنها، فأراد علي بن أبي طالب رضي الله عنه أن يقتلهما، وقد كانا دخلا في الصلح الأول، ثم قد حلت دماؤهما بعد ذلك بالأسباب التي كانت منهما حتى أجارتهما أم هانئ رضي الله عنها، فحرمت بذلك دماؤهما، وكذلك من لم يدخل دار أبي سفيان يوم فتح مكة، ولا من لم يغلق عليه بابه قد كان دخل في الصلح الأول على غير إشراط عليه، فيه دخول دار أبي سفيان ولا بغلق باب نفسه عليه، ثم حل دمه بعد الصلح الأول بالأسباب التي كانت منه بعد ذلك. فدل بما




আহমদ ইবনুল মুফাদ্দাল থেকে বর্ণিত... তাঁকে (রাবীকে) বলা হলো: এটি এমন ঘটনা যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের পক্ষ থেকে সংঘটিত হয়েছিল যখন আল্লাহ তাঁকে তাদের (শত্রুদের) উপর বিজয়ী করলেন। আপনি কি দেখেন না যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন প্রথমে সন্ধি করেছিলেন, তখন এই ছয়জন ব্যক্তি সেই সন্ধির অন্তর্ভুক্ত ছিল? অথচ তাদের রক্ত হালাল হয়ে গিয়েছিল পরবর্তীকালে তাদের পক্ষ থেকে সন্ধির পর সৃষ্ট কিছু কারণে।

তেমনিভাবে, আবু সুফিয়ানও সন্ধিতে অন্তর্ভুক্ত ছিল। এরপর যখন আল-আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে এলেন, তখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! এই তো আবু সুফিয়ান! আল্লাহ তাকে চুক্তি বা অঙ্গীকার ছাড়াই আপনার আয়ত্তে এনে দিয়েছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এই বিষয়ে আপত্তি করেননি, যতক্ষণ না আল-আব্বাস পরে তাঁকে আশ্রয় দিলেন। ফলে তাঁর আশ্রয়ের কারণে তার রক্তপাত থেকে রক্ষা পেল।

অনুরূপভাবে, হুবাইরাহ ইবনু আবী ওয়াহব আল-মাখযুমী এবং তাঁর চাচাতো ভাই, যারা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মক্কায় প্রবেশের পর উম্মে হানী বিনতে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আশ্রয় নিয়েছিল, আর আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চেয়েছিলেন যে তিনি তাদের হত্যা করবেন, অথচ তারা প্রথম সন্ধিতে প্রবেশ করেছিল। কিন্তু তাদের রক্তও পরবর্তীকালে তাদের কৃতকর্মের কারণে হালাল হয়ে গিয়েছিল, যতক্ষণ না উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের আশ্রয় দিলেন। ফলস্বরূপ তাদের রক্তপাত নিষিদ্ধ হয়ে গেল।

অনুরূপভাবে, যারা মক্কা বিজয়ের দিন আবু সুফিয়ানের বাড়িতে প্রবেশ করেনি বা নিজের দরজা বন্ধ করেনি, তারাও প্রথম সন্ধিতে অন্তর্ভুক্ত ছিল, যদিও তাদের উপর আবু সুফিয়ানের বাড়িতে প্রবেশ করার বা নিজের দরজা বন্ধ করার কোনো শর্ত ছিল না। কিন্তু প্রথম সন্ধির পর তাদের কৃতকর্মের কারণে তাদের রক্তও হালাল হয়ে গিয়েছিল। এটি প্রমাণ করে যে... [মূল আরবি পাঠ এখানে অসমাপ্ত]।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (5110)


حدثنا إسحاق بن إبراهيم بن يونس البغدادي، قال: ثنا محمد بن منصور الطوسي، قال: ثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، قال: ثنا أبي، عن أبي إسحاق، قال: حدثني شعبة، عن عبد الله بن أبي السفر، عن الشعبي، عن عبد الله بن مطيع بن الأسود، عن أبيه، وكان اسمه العاص فسماه رسول الله صلى الله عليه وسلم مطيعا، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم، حين أمر بقتل هؤلاء الرهط بمكة، يقول: "لا تغزى مكة بعد اليوم أبدا، ولا يقتل رجل من قريش صبرًا بعد العام" . فهذا يدل على أنه كان غزوها في ذلك العام بخلافه فيما بعده من الأعوام، وفي ذلك ما قد دل على أنه كان لا أمان لأهلها في ذلك العام، لأنه لا يغزى من هو في أمان، وقوله: "لا يقتل رجل من قريش صبرًا بعد ذلك العام" لذلك. وفيما روينا وذكرنا من الآثار وكشفنا من الدلائل ما تقوم الحجة به في كشف ما اختلفنا فيه، وإيضاح فتح مكة أنه عنوة، وبالله التوفيق، ولقد روي في أمر مكة ما يمنع أن يكون صلحًا ما.




মুতি’ ইবনুল আসওয়াদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যার নাম পূর্বে আল-আস ছিল, অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তার নাম মুতি’ রেখেছিলেন। তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মক্কায় এই লোকদলকে হত্যার নির্দেশ দেওয়ার সময় বলতে শুনেছি: "আজকের পর আর কখনোই মক্কা আক্রান্ত হবে না। এবং এই বছরের (মক্কা বিজয়ের) পর কুরাইশের কোনো লোককে আর কখনোই বেঁধে রেখে (হত্যার জন্য) হত্যা করা হবে না।"

এটি প্রমাণ করে যে সেই বছরে মক্কা বিজয় হয়েছিল, যা পরবর্তী বছরগুলোর নিয়ম থেকে ভিন্ন ছিল। এই ঘটনা আরও প্রমাণ করে যে সেই বছর মক্কাবাসীর কোনো নিরাপত্তা ছিল না, কারণ যারা নিরাপত্তায় থাকে, তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা হয় না। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তি: "আজকের পর কুরাইশের কোনো লোককে বেঁধে রেখে হত্যা করা হবে না"— তা এই কারণেই। আমরা যেসব বর্ণনা ও নিদর্শনাবলী উল্লেখ করেছি এবং যেসব প্রমাণ উন্মোচন করেছি, তা আমরা যে বিষয়ে মতভেদ করেছি তা স্পষ্ট করার জন্য এবং মক্কা বিজয় যে যুদ্ধের মাধ্যমে (আনওয়াতান) হয়েছিল, তা প্রমাণ করার জন্য যথেষ্ট। আর আল্লাহর কাছেই সাহায্য কামনা করি। মক্কার বিষয়ে এমন বর্ণনাও এসেছে যা প্রমাণ করে যে এটি কোনো সন্ধির মাধ্যমে হয়নি।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده حسن فقد صرح ابن إسحاق بالتحديث هنا.









শারহু মা’আনিল-আসার (5111)


حدثنا يحيى بن عثمان بن صالح قال: ثنا عبد الله بن صالح، (ح) وحدثنا روح بن الفرج قال: ثنا يحيى بن عبد الله بن بكير قالا: ثنا عبد الله بن لهيعة قال: حدثني محمد بن عبد الرحمن، عن عروة، عن المسور بن مخرمة، عن أبيه قال: لقد أظهر نبي الله صلى الله عليه وسلم الإسلام فأسلم أهل مكة، كلهم، وذلك قبل أن تفرض الصلاة، حتى إن كان ليقرأ بالسجدة ويسجد فيسجدون فما يستطيع بعضهم أن يسجد من الزحام وضيق المكان لكثرة الناس حتى قدم رءوس قريش: الوليد بن المغيرة، وأبو جهل وغيره، فكانوا بالطائف في أرضيهم، فقال: أتدعون دين آبائكم؟ فكفروا . قال أبو جعفر رحمه الله: ففي هذا الحديث أن إسلام أهل مكة قد كان تقدم، وأنهم كفروا بعد ذلك. فكيف يجوز أن يؤمن رسول الله صلى الله عليه وسلم قوما مرتدين بعد قدرته عليهم هذا لا يجوز عليه صلى الله عليه وسلم. ولقد أجمع المسلمون جميعا أن المرتد يحال بينه وبين الطعام إلا ما يقوم بنفسه، وأنه يحال بينه وبين سعة العيش والتصرف في أرض الله حتى يراجع دين الله تعالى، أو يأبى ذلك فيمضي عليه حكم الله تعالى، وأنه لو سأل الإمام أن يؤمنه على أن يقيم مرتدا آمنا في دار الإسلام أن الإمام لا يجيبه إلى ذلك ولا يعطيه ما سأل. ففي ثبوت ما ذكرنا من إجماع المسلمين على ما وصفنا دليلٌ صحيحٌ وحجةٌ قاطعةٌ أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يؤمن أهل مكة بعد قدرته عليهم وظفره بهم، والله أعلم بالصواب. ‌‌16 - كتاب البيوع ‌‌1 - باب بيع الشعير بالحنطة متفاضلًا




মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইসলাম প্রকাশ করলেন, তখন মক্কার সমস্ত লোক ইসলাম গ্রহণ করেছিল। আর এটা ছিল সালাত (নামাজ) ফরয হওয়ার আগে। এমনকি তিনি যখন সিজদার আয়াত পড়তেন এবং সিজদা করতেন, তখন তারাও সিজদা করত। মানুষের ভিড় ও স্থানের সংকীর্ণতার কারণে তাদের কেউ কেউ সিজদা করতে সক্ষম হতো না। এরপর কুরাইশের নেতারা, যেমন ওয়ালীদ ইবনুল মুগীরাহ, আবু জাহল এবং অন্যান্যরা, যারা তাদের জমিজমা নিয়ে তায়েফে ছিল, তারা ফিরে এলো। তারা (ফিরে এসে) বললো: তোমরা কি তোমাদের পূর্বপুরুষদের ধর্ম ত্যাগ করছ? ফলে তারা (মক্কাবাসীরা) কুফরি করল।

আবু জা’ফর (রহ.) বলেন: এই হাদীসে প্রমাণ হয় যে, মক্কাবাসীদের ইসলাম গ্রহণ পূর্বেই হয়েছিল এবং এরপর তারা কুফরি করেছিল। তাহলে এটা কীভাবে জায়েজ হতে পারে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর ক্ষমতাবান হওয়ার পরেও তাদেরকে নিরাপত্তা দেবেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য এটা জায়েজ ছিল না। মুসলিমগণ সর্বসম্মতভাবে একমত যে, মুরতাদের (ধর্মত্যাগকারীর) সাথে খাবার ব্যতীত এমন সবকিছুর মাঝে বাধা সৃষ্টি করা হবে যা দ্বারা সে নিজে জীবনধারণ করতে পারে না; আর তাকে জীবনের স্বাচ্ছন্দ্য ও আল্লাহর জমিনে চলাফেরার সুযোগ থেকে বঞ্চিত করা হবে, যতক্ষণ না সে আল্লাহর দ্বীনের দিকে ফিরে আসে। অথবা যদি সে প্রত্যাখ্যান করে, তবে তার উপর আল্লাহর হুকুম কার্যকর করা হবে। আর যদি সে ইমামের (শাসকের) কাছে নিরাপত্তা চায় এই শর্তে যে, সে মুরতাদ অবস্থায় দারুল ইসলামে নিরাপদে থাকবে, তবে ইমাম তাকে সেই অনুমতি দেবেন না এবং তার চাওয়া পূরণ করবেন না। আমরা মুসলিমদের যে ইজমা’ (ঐক্যমত) উল্লেখ করলাম, তার প্রমাণ দ্বারা এটি একটি সহীহ দলীল এবং অকাট্য যুক্তি যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের (মক্কাবাসীদের) উপর ক্ষমতা লাভ ও বিজয় অর্জনের পর তাদেরকে নিরাপত্তা দেননি। আর আল্লাহই সবচেয়ে ভালো জানেন সঠিক কী। ১৬. অধ্যায়: বেচাকেনা (বাণিজ্য) ১. পরিচ্ছেদ: কমবেশি করে যবের বিনিময়ে গম বিক্রি করা।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف لسوء حفظ عبد الله بن لهيعة، وعبد الله بن صالح متابع.









শারহু মা’আনিল-আসার (5112)


حدثنا يونس بن عبد الأعلى، قال: ثنا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أن أبا النضر حدثه، أن بسر بن سعيد حدثه عن معمر بن عبد الله رضي الله عنه أنه أرسل غلاما له بصاع من قمح، فقال له بعه ثم اشتر بثمنه شعيرا، فذهب الغلام فأخذ صاعًا وزيادة بعض صاع، فلما جاء معمر أخبره، فقال له معمر: لم فعلت؟ انطلق، فرده، ولا تأخذ إلا مثلا، بمثل فإني كنت أسمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "الطعام بالطعام مثلا بمثل وكان طعامنا يومئذ، الشعير. قيل له: فإنه ليس مثله، قال: إني أخاف أن يضارعه . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى هذا الحديث فقلدوه، وقالوا: لا يجوز بيع الحنطة بالشعير إلا مثلا بمثل. وخالفهم في ذلك آخرون ، فقالوا: لا بأس ببيع الحنطة بالشعير متفاضلًا، مثلين بمثل أو أكثر من ذلك. وكان من الحجة لهم على أهل المقالة الأولى في الحديث الذي احتجوا به عليهم، أن معمرًا أخبر عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه كان سمعه يقول: "الطعام بالطعام مثلا بمثل" ثم قال معمر: وكان طعامنا يومئذ الشعير. فيجوز أن يكون النبي صلى الله عليه وسلم أراد بقوله الذي حكاه عنه معمر، الطعام الذي كان طعامهم يومئذ فيكون ذلك على الشعير بالشعير، فلا يكون في هذا الحديث شيء من ذكر بيع الحنطة بالشعير، مما ذكر فيه عن النبي صلى الله عليه وسلم وإنما هو مذكور عن معمر، من رأيه، ومن تأويله ما كان سمع من النبي صلى الله عليه وسلم. ألا ترى أنه قيل له: فإنه ليس مثله أي ليس من نوعه، فلم ينكر ذلك على من قاله، وكان من جوابه "إني أخشى أن يضارعه" كأنه خاف أن يكون قول النبي صلى الله عليه وسلم الذي سمعه يقوله، وهو ما ذكرنا في حديثه عن الأطعمة كلها، فتوقى ذلك وتنزه عنه للريب الذي وقع في قلبه منه. فلما انتفى أن يكون في هذا الحديث حجة لأحد الفريقين على صاحبه، نظرنا هل في غيره ما ينبئنا على حكم ذلك كيف هو؟ فاعتبرنا ذلك.




মা’মার ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর এক গোলামকে এক সা’ (পরিমাণ) গম দিয়ে পাঠালেন এবং তাকে বললেন, "এটি বিক্রি করে দাও এবং এর মূল্য দিয়ে যব কিনে আনো।" গোলামটি গিয়ে এক সা’ ও কিছুটা বেশি যব গ্রহণ করল। যখন সে মা’মারের কাছে ফিরে এসে তাকে জানাল, তখন মা’মার তাকে বললেন, "তুমি কেন এমনটি করলে? যাও, এটি ফিরিয়ে দাও এবং সমান সমান ছাড়া আর কিছু নিও না। কেননা আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: ’খাদ্যের বিনিময়ে খাদ্য অবশ্যই সমান সমান হতে হবে।’ আর সেদিন আমাদের খাদ্য ছিল যব।" তাঁকে (মা’মারকে) বলা হলো: "কিন্তু এটি তো তার মতো নয় (একই প্রকারের নয়)।" তিনি বললেন: "আমি আশঙ্কা করি যে এটি তার সদৃশ হয়ে যাবে (সমান সমান হওয়ার ক্ষেত্রে)।"

আবু জা’ফর বলেন: এরপর একদল লোক এই হাদীসের দিকে ঝুঁকে পড়ে এবং এটি অনুসরণ করে। তারা বলেন: গম ও যব আদান-প্রদান করা সমান সমান ছাড়া জায়েজ হবে না। অন্য একটি দল এ বিষয়ে তাদের বিরোধিতা করে এবং বলে: কম-বেশি পরিমাণে গম দিয়ে যব বিনিময় করতে কোনো অসুবিধা নেই, যেমন এক সা’র বিনিময়ে দুই সা’ বা এর চেয়ে বেশি।

প্রথম মত পোষণকারীদের বিরুদ্ধে তাদের (দ্বিতীয় দলের) যুক্তি হলো, তারা যে হাদীস দিয়ে দলিল পেশ করেছে, তাতে মা’মার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন যে তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খাদ্যের বিনিময়ে খাদ্য অবশ্যই সমান সমান হতে হবে।" এরপর মা’মার বলেন: "আর সেদিন আমাদের খাদ্য ছিল যব।" অতএব, এটা সম্ভব যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর যে কথাটি মা’মার বর্ণনা করেছেন, তার দ্বারা সেই খাদ্যকেই উদ্দেশ্য করেছেন যা সেদিন তাদের খাবার ছিল। ফলে এটি যবের বিনিময়ে যবের ক্ষেত্রে প্রযোজ্য হবে। অতএব, এই হাদীসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে গম দিয়ে যব বিক্রির কোনো উল্লেখ নেই। বরং এটি মা’মারের নিজস্ব অভিমত এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে যা শুনেছিলেন তার ব্যাখ্যা হিসেবে বর্ণিত হয়েছে।

আপনি কি দেখেন না, তাঁকে বলা হয়েছিল: ’এটি তো তার মতো নয়’ – অর্থাৎ একই প্রকারের নয়। যিনি এ কথা বলেছিলেন তিনি তা অস্বীকার করেননি। তাঁর (মা’মারের) জবাব ছিল: "আমি আশঙ্কা করি যে এটি তার সদৃশ হয়ে যাবে।" যেন তিনি আশঙ্কা করেছিলেন যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যে কথা তিনি শুনেছিলেন, তা হয়তো আমাদের উল্লেখিত সকল খাদ্যদ্রব্যের বিষয়ে প্রযোজ্য। ফলে তিনি মনের সন্দেহের কারণে তা এড়িয়ে গেছেন এবং নিজেকে পবিত্র রেখেছেন। যেহেতু এই হাদীসে কোনো পক্ষের জন্য অন্য পক্ষের বিরুদ্ধে স্পষ্ট প্রমাণ নেই, তাই আমরা অন্য কোনো হাদীসে এর বিধান কী আছে তা খুঁজে দেখলাম। আর আমরা সেই বিষয়টিকে বিবেচনায় নিলাম।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5113)


فإذا علي بن شيبة قد حدثنا، قال: ثنا يزيد بن هارون قال: أخبرنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن مسلم بن يسار عن أبي الأشعث، عن عبادة بن الصامت رضي الله عنه أنه قام فقال: يا أيها الناس! إنكم قد أحدثتم بيوعا لا أدري ما هي؟ وإن الذهب بالذهب وزنًا بوزن تبره وعينه ، والفضة بالفضة وزنًا بوزن تبرها وعينها، ولا بأس ببيع الذهب بالفضة و الفضة أكثرهما يدًا بيد، ولا يصلح نسيئًا، والبر بالبر مدا بمد، ويدا بيد، والشعير بالشعير مدا بمد يدا بيد، ولا بأس ببيع الشعير بالبر، والشعير أكثر هما يدا بيد، ولا يصلح نسيئةً، والتمر بالتمر حتى عد الملح مثلا بمثل، من زاد أو استزاد فقد أربى . فهذا عبادة بن الصامت رضوان الله عليه قد خالف معمر بن عبد الله فيما ذهب إليه، على ما ذكرنا عنه في الحديث الأول وقد روي عن عبادة بن الصامت رضي الله عنه هذا الكلام أيضا عن النبي صلى الله عليه وسلم.




উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (উবাদা) দাঁড়ালেন এবং বললেন: হে লোক সকল! তোমরা এমন কিছু বেচা-কেনা চালু করেছো, যা আমার জানা নেই সেটা কী? নিশ্চয়ই সোনা সোনার বিনিময়ে সমান ওজনের হতে হবে, তা হোক কাঁচা সোনা বা অলঙ্কার। এবং রূপা রূপার বিনিময়ে সমান ওজনের হতে হবে, তা হোক কাঁচা রূপা বা তৈরি অলঙ্কার। আর সোনা রূপার বিনিময়ে এবং রূপা (সোনার বিনিময়ে) বেচা-কেনা করতে দোষ নেই, তবে উভয়কেই হাতে হাতে আদান প্রদান করতে হবে এবং তা বাকি বা ধারে বিক্রি করা বৈধ নয়। গম গমের বিনিময়ে এক মুদ-এর বদলে এক মুদ হতে হবে এবং হাতে হাতে লেনদেন করতে হবে। যব যবের বিনিময়ে এক মুদ-এর বদলে এক মুদ হতে হবে এবং হাতে হাতে লেনদেন করতে হবে। আর যব গমের বিনিময়ে বেচা-কেনা করতে দোষ নেই, তবে উভয়কেই হাতে হাতে আদান প্রদান করতে হবে এবং তা বাকি বা ধারে বিক্রি করা বৈধ নয়। এবং খেজুর খেজুরের বিনিময়ে, এমনকি লবণ পর্যন্ত সমপরিমাণে বেচা-কেনা করতে হবে। যে ব্যক্তি বেশি দেবে বা বেশি চাইবে, সে সুদী কারবার করল। এই হাদীসে উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পূর্বোক্ত হাদীসে মা’মার ইবনু আবদিল্লাহ যা বলেছেন, তার বিরোধিতা করেছেন। উবাদা ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এই কথাটি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকেও বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : هي القطعة المأخوذة من المعدن. عين الذهب هو المصوغ منه. إسناده صحيح.