হাদীস বিএন


শারহু মা’আনিল-আসার





শারহু মা’আনিল-আসার (5474)


حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا أبو الوليد قال: ثنا الليث، عن ابن شهاب (ح) وحدثنا ربيع المؤذن، قال: ثنا أسد، قال: ثنا ليث، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن جابر بن عبد الله رضي الله عنهما قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: "من أعمر رجلًا عمرى له ولعقبه، فقد قطع قوله حقه فيها، وهي لمن أعمرها ولعقبه" .




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি কোনো পুরুষকে তার জীবন ও তার বংশধরদের জন্য ‘উমরা’ (আয়ুষ্কাল ভিত্তিক দান) প্রদান করে, তবে সেই বক্তব্যের মাধ্যমে সে ওই সম্পত্তিতে তার (নিজের) অধিকার ছিন্ন করে দিয়েছে, আর তা কেবল তাকেই (যাকে ‘উমরা’ দেওয়া হয়েছে) এবং তার বংশধরদের জন্য।"




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5475)


حدثنا ربيع المؤذن، قال: ثنا أسد، قال: ثنا ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن جابر بن عبد الله رضي الله عنهما قال: قضى رسول الله صلى الله عليه وسلم من أعمر عمرى فهي له ولعقبه بته، لا يجوز للمعطي فيها شرط ولا ثنيا . ففي هذه الآثار من أعمر عمرى له ولعقبه فهي للذي أعمرها، لا يرجع إلى المعطي شرط ولا ثنيا، لأنه أعطى عطاء، وقعت فيه المواريث. فقال الذين أجازوا الشرط في العمرى بهذا نقول: إذا وقعت العمرى على هذا لم ترجع إلى المعطي أبدا، وإذا لم يكن فيها ذكر العقب فهي راجعة إلى المعطي بعد زوال المعمر، قالوا: وهذا أولى مما روى عطاء، وأبو الزبير عن جابر بن عبد الله لأن هذا قد زاد عليهما قوله "ولعقبه" وليس هو بدونهما والزيادة أولى. وكان من حجتنا للآخرين في ذلك أنه لو لم يكن روي عن النبي صلى الله عليه وسلم في العمرى حديث غير حديث أبي سلمة هذا لكان فيه أكبر الحجة للذين يقولون: إن العمرى لا ترجع إلى المعمر أبدا، ولا يجوز شرطه. وذلك أن العمرى لا تخلو من أحد وجهين إما أن تكون داخلة في قول النبي صلى الله عليه وسلم "المسلمون عند شروطهم" فينفذ للمعمر فيها الشرط على ما شرطه، لا يبطل من ذلك شيء كما تنفذ الشروط من الموقف فيما يوقف أو تكون خارجة من ملك المعمر داخلةً في ملك المعمر فتصير بذلك في سائر ماله ويبطل ما شرط عليه فيها. فنظرنا في ذلك، فإذا العمرى إذا أوقعت على أنها للمعمر ولعقبه، فمات وله عقب، وزوجة أو أوصى بوصايا، أو كان عليه دين أن تلك الأشياء تنفذ فيها كما تنفذ في ماله، ولا يمنعها الشرط الذي كان من المعمر في جعله إياها له ولعقبه وزوجته ليست من عقبه، ولا غرماؤه ولا أهل وصاياه. وكذلك لو مات المعمر ولا عقب له لم يرجع شيء من ذلك إلى المعمر. فلما كان ما وصفنا كذلك كانت كذلك أبدًا تجوز على ما جعلها عليه المعمر ويبطل شرطه الذي اشترطه فيها فلا ينفذ منه قليل ولا كثير، وتخرج من قول النبي صلى الله عليه وسلم: "المسلمون عند شروطهم" فتكون شروطها ليست من الشروط التي عناها النبي صلى الله عليه وسلم. وهذا القول الذي صححناه هو قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله. وقد روي أيضًا عن ابن عمر رضي الله عنهما مثل ذلك.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রায় প্রদান করেছেন যে, যে ব্যক্তি ‘উমরা’ (আজীবন ভোগাধিকার) হিসেবে কিছু দান করে, তা তার (গ্রহীতার) এবং তার বংশধরদের জন্য সুনির্দিষ্টভাবে (চূড়ান্তভাবে) মালিকানা হয়ে যায়। প্রদানকারীর জন্য এতে কোনো শর্ত আরোপ করা বা ফিরিয়ে নেওয়ার অধিকার রাখা জায়েয হবে না।

সুতরাং এই বর্ণনাগুলো থেকে প্রমাণিত হয় যে, যে ব্যক্তি নিজের জন্য ও তার বংশধরদের জন্য ‘উমরা’ হিসেবে কোনো কিছু ভোগাধিকার দেয়, তা গ্রহীতারই হয়ে যায়। প্রদানকারীর কাছে তা শর্ত বা ফিরিয়ে নেওয়ার অধিকারের মাধ্যমে প্রত্যাবর্তন করে না। কারণ সে এমন দান করেছে, যার মধ্যে উত্তরাধিকার বর্তাবে।

এরপর যারা ‘উমরা’তে শর্ত আরোপের বৈধতা দেন, তারা বলেন: আমরা এই নীতি অনুসরণ করি। যদি ‘উমরা’ এই শর্তে সম্পন্ন হয়, তবে তা কখনো প্রদানকারীর কাছে ফিরে আসে না। আর যদি তাতে বংশধরদের কথা উল্লেখ না থাকে, তবে গ্রহীতার অবর্তমানে তা প্রদানকারীর কাছে ফিরে আসবে। তারা আরো বলেন: এই বর্ণনাটি আতা এবং আবু যুবাইর কর্তৃক জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত বর্ণনা অপেক্ষা অধিকতর উত্তম; কারণ এতে ‘এবং তার বংশধরদের জন্য’ (ولعقبه) কথাটির অতিরিক্ত উল্লেখ রয়েছে। এটি আগেরগুলোর চেয়ে নিকৃষ্ট নয়, বরং অতিরিক্ত বর্ণনা অধিক গ্রহণযোগ্য।

এই বিষয়ে অন্যদের পক্ষে আমাদের যুক্তি ছিল যে, যদি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে ‘উমরা’ সম্পর্কে আবূ সালামাহ বর্ণিত এই হাদীসটি ছাড়া অন্য কোনো হাদীস বর্ণিত না থাকত, তবে যারা বলেন যে ‘উমরা’ কখনো প্রদানকারীর কাছে ফিরে আসে না এবং তাতে শর্ত আরোপ করা জায়েয নয়, তাদের জন্য এতেই সবচেয়ে বড় প্রমাণ থাকত। কারণ ‘উমরা’ দু’টি দিকের কোনো একটি থেকে মুক্ত নয়: হয় এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর বাণী “মুসলমানগণ তাদের শর্তের উপর অটল থাকে” এর অন্তর্ভুক্ত হবে। সেক্ষেত্রে গ্রহীতার জন্য তাতে আরোপিত শর্ত সেই অনুযায়ী কার্যকর হবে এবং তার কিছুই বাতিল হবে না, যেমন ওয়াকফকৃত সম্পত্তিতে শর্তাবলী কার্যকর হয়। অথবা তা প্রদানকারীর মালিকানা থেকে বেরিয়ে গিয়ে গ্রহীতার মালিকানায় প্রবেশ করবে, ফলে তা তার (গ্রহীতার) অন্যান্য সম্পদের অন্তর্ভুক্ত হবে এবং তাতে আরোপিত শর্ত বাতিল হয়ে যাবে।

আমরা এই বিষয়ে চিন্তা করে দেখলাম, যখন ‘উমরা’ এই শর্তে দেওয়া হয় যে তা গ্রহীতা এবং তার বংশধরদের জন্য, আর যদি গ্রহীতা মারা যায় এবং তার বংশধর, স্ত্রী থাকে, অথবা সে কোনো ওয়াসিয়ত (অসিয়ত/উইল) করে যায়, অথবা তার উপর ঋণ থাকে, তাহলে ঐ বিষয়গুলো তাতে (সম্পত্তিতে) কার্যকর হবে যেভাবে তার অন্যান্য সম্পদে কার্যকর হয়। গ্রহীতাকে এবং তার বংশধরদের জন্য এটি নির্ধারণ করে দেওয়ার জন্য প্রদানকারীর যে শর্ত ছিল, তা এতে বাধা দিতে পারে না, অথচ তার স্ত্রী তার বংশধরদের অন্তর্ভুক্ত নয়, তেমনি তার ঋণদাতারাও নয়, এবং তার ওয়াসিয়তের হকদাররাও নয়।

একইভাবে, যদি গ্রহীতা মারা যায় এবং তার কোনো বংশধর না থাকে, তবুও সেগুলোর কিছুই প্রদানকারীর কাছে ফিরে আসে না। সুতরাং যখন আমরা যা বর্ণনা করলাম তা এমন (অর্থাৎ উত্তরাধিকার প্রযোজ্য), তখন তা সর্বদা এমন (স্থায়ী মালিকানা) হিসেবেই কার্যকর হবে, যেভাবে গ্রহীতা এটিকে তৈরি করেছিল এবং এর মধ্যে প্রদানকারীর আরোপিত শর্ত বাতিল বলে গণ্য হবে। ফলে সামান্য বা বেশি কোনো অংশই কার্যকর হবে না এবং এটি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর বাণী: “মুসলমানগণ তাদের শর্তের উপর অটল থাকে”-এর আওতা থেকে বেরিয়ে যাবে। সুতরাং এর শর্তগুলো নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যে শর্তগুলোর ইঙ্গিত করেছিলেন, তার অন্তর্ভুক্ত নয়।

আমরা যে মতটিকে সঠিক সাব্যস্ত করেছি, তা ইমাম আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ)-এর মত। আর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5476)


حدثنا ابن مرزوق، قال: ثنا بشر بن عمر قال: ثنا شعبة، عن حبيب بن أبي ثابت قال سمعت ابن عمر وسأله رجل عن رجل وهب لرجل ناقة حياته فنتجت فقال: هي له وأولادها، فسألته بعد ذلك، فقال: هي له حيا وميتا . ‌‌4 - باب الصدقات الموقوفات




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি তাঁকে এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলো যে অন্য এক ব্যক্তিকে তার জীবদ্দশার জন্য একটি উটনী দান করেছে। এরপর উটনীটি বাচ্চা প্রসব করলো। তখন তিনি (ইবনে উমর) বললেন: এটি এবং এর বাচ্চারা তার (ঐ ব্যক্তির)। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর আমি তাঁকে (ইবনে উমরকে) পুনরায় জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: এটি তার, সে জীবিত থাকুক বা মৃত। ৪- চিরতরে ওয়াক্ফকৃত সদকা সংক্রান্ত পরিচ্ছেদ।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5477)


حدثنا يزيد بن سنان، قال: ثنا أبو عاصم وسعيد بن سفيان الجحدري، قالا: ثنا ابن عون، قال: أخبرني نافع، عن ابن عمر رضي الله عنهما أن عمر رضي الله عنه أصاب أرضًا بخيبر، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم يستأمره، فقال: إني أصبت أرضًا بخيبر لم أصب مالا قط أحسن منها، فكيف تأمرني؟ قال: "إن شئت حبست أصلها، لا تباع ولا توهب" قال أبو عاصم! وأراه قال: ولا تورث". قال: فتصدق بها في الفقراء والقربى، والرقاب، وفي سبيل الله، وابن السبيل، والضعيف، لا جناح على من وليها أن يأكل منها غير متمول، قال: فذكرت ذلك لمحمد فقال: غير متأثل .




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খায়বারে একটি জমি লাভ করেন। অতঃপর তিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে তাঁর সাথে পরামর্শ চাইলেন। তিনি (উমর) বললেন: আমি খায়বারে এমন একটি জমি লাভ করেছি, যা এর চেয়ে উত্তম কোনো সম্পদ আমি কখনও লাভ করিনি। আপনি আমাকে কী নির্দেশ দেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যদি চাও তবে তার মূল সম্পত্তিকে আটক (ওয়াক্ফ) করে দাও, যেন তা বিক্রি করা না হয় এবং দান করাও না হয়।" আবূ আসিম বলেন! আমি মনে করি, তিনি (আরও) বলেছিলেন, "এবং ওয়ারিশও হওয়া না যায় (উত্তরাধিকার সূত্রে পাওয়া না যায়)।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: অতঃপর তিনি তা (জমির ফল) ফকীরদের, আত্মীয়-স্বজনদের, দাসমুক্তির কাজে, আল্লাহর পথে, মুসাফিরদের, এবং দুর্বলদের জন্য সদকা (ওয়াক্ফ) করে দিলেন। এর তত্ত্বাবধায়ক যদি সম্পদ সঞ্চয়ের উদ্দেশ্য না রেখে সেখান থেকে খায়, তবে তাতে তার কোনো গুনাহ হবে না। (রাবী) বলেন: আমি এ বিষয়টি মুহাম্মাদকে (ইবনু সীরীন) জানালে তিনি বললেন: (অর্থাৎ, তিনি ’غير متمول’-এর স্থলে) সম্পদ জমাকারী হিসেবে নয় (غير متأثل) শব্দটি ব্যবহার করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : أي غير جامع، يقال: مال مؤثل ومجد ماثل أي مجموع ذو أصل. إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5478)


حدثنا أحمد بن عبد الرحمن بن وهب قال: حدثني عمي، قال: حدثني إبراهيم بن سعد، عن عبد العزيز بن المطلب، عن يحيى بن سعيد، عن نافع مولى ابن عمر، عن ابن عمر، أن عمر رضي الله عنهما استشار رسول الله صلى الله عليه وسلم في أن يتصدق بماله بثمغ رسول الله صلى الله عليه وسلم: "تصدق به، يقسم تمره ويحبس أصله لا يباع ولا يوهب" . قال أبو جعفر: فذهب قوم إلى أن الرجل إذا أوقف داره على ولده وولد ولده، ثم من بعدهم في سبيل الله أن ذلك جائز، وأنها قد خرجت بذلك من ملكه إلى الله عز وجل، ولا سبيل له بعد ذلك إلى بيعها، واحتجوا في ذلك بهذه الآثار، وممن قال ذلك أبو يوسف ومحمد بن الحسن رحمهما الله، وهو قول أهل المدينة وأهل البصرة. وخالفهم في ذلك آخرون منهم: أبو حنيفة وزفر بن الهذيل رحمها الله فقالوا: هذا كله ميراث لا يخرج من ملك الذي أوقفه بهذا السبب. وكان من الحجة لهم في ذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لما شاوره عمر رضي الله عنه في ذلك قال له: حبّس أصلها وسبّل الثمرة. فقد يجوز أن يكون ما أمره به من ذلك يخرج به من ملكه، ويجوز أن يكون ذلك لا يخرجها من ملكه، ولكنها تكون جاريةً على ما أجراها عليه من ذلك ما تركها، ويكون له فسخ ذلك متى شاء. كرجل جعل الله عليه أن يتصدق بثمرة نخله ما عاش فيقال له: أنفذ ذلك ولا يجبر عليه، ولا يؤخذ به إن شاء وإن أبى، ولكن إن أنفذ ذلك فحسن، وإن منعه لم يجبر عليه، وكذلك ورثته من بعده إن أنفذوا ذلك على ما كان أبوهم أجراه ذلك فحسن، وإن منعوه ذلك كان ذلك لهم، وليس في بقاء حبس عمر رضي الله عنه إلى غايتنا هذه ما يدل على أنه لم يكن لأحد من أهله نقضه. وإنما الذي يدل على أنه ليس لهم نقضه لو كانوا خاصموا فيه بعد موته، فمنعوا من ذلك. فلو كان جاز ذلك لكان فيه لعمرى ما يدل على أن الأوقاف لا تباع، ولكن إنما جاءنا تركهم لوقف عمر رضي الله عنه يجري على ما كان عمر رضي الله عنه أجراه عليه في حياته ولم يبلغنا أن أحدا منهم عرض فيه بشيء. وقد روي عن عمر رضي الله عنه ما يدل على أنه قد كان له نقضه.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে পরামর্শ করলেন যে, তিনি কি যেন তাঁর ‘সামগ’ নামক সম্পদটি সাদাকা করে দেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তা সদকা করে দাও, এর ফল (খেজুর) বণ্টন করা হবে এবং এর মূল সম্পত্তি রেখে দেওয়া হবে, যা বিক্রি করা যাবে না এবং দানও করা যাবে না।”

আবূ জা’ফার (তাহাবী) বলেন: একদল আলিম এই মতে গিয়েছেন যে, যখন কোনো ব্যক্তি তার ঘর তার সন্তান-সন্ততি এবং তাদের পরবর্তী প্রজন্মের জন্য আল্লাহর পথে ওয়াকফ করে দেয়, তবে তা জায়েয। এবং এর মাধ্যমে সম্পত্তিটি তার মালিকানা থেকে মহান আল্লাহর মালিকানায় চলে যায়। এরপর সেই ব্যক্তির জন্য তা বিক্রি করার আর কোনো পথ থাকে না। তাঁরা এই মতের সমর্থনে উক্ত আছার (হাদীস) দ্বারা প্রমাণ পেশ করেন। যাঁরা এই মত পোষণ করেন, তাঁদের মধ্যে রয়েছেন আবূ ইউসুফ ও মুহাম্মাদ ইবনুল হাসান (রাহিমাহুল্লাহ)। এটি মদীনাবাসী ও বসরার অধিবাসীদেরও অভিমত।

কিন্তু অন্য আলিমগণ এ ব্যাপারে তাঁদের বিরোধিতা করেছেন। তাঁদের মধ্যে রয়েছেন আবূ হানীফা ও যুফার ইবনুল হুযাইল (রাহিমাহুল্লাহ)। তাঁরা বলেন: এই (ওয়াকফকৃত) সকল সম্পত্তিই মীরাস (উত্তরাধিকার), যা এই কারণে ওয়াকফকারীর মালিকানা থেকে বের হয়ে যায় না।

এই ব্যাপারে তাঁদের (আবূ হানীফা ও যুফার)-এর প্রমাণ ছিল এই যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ বিষয়ে তাঁর সঙ্গে পরামর্শ করলেন, তখন তিনি তাঁকে বললেন: “এর মূল সম্পত্তিকে রেখে দাও এবং ফলকে আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ করে দাও।” তিনি তাঁকে যা আদেশ করেছিলেন, তা দ্বারা সম্পদটি তাঁর মালিকানা থেকে বের হয়ে যাওয়া সম্ভব, আবার এটাও সম্ভব যে তা তাঁর মালিকানা থেকে বের হয়ে যাবে না; বরং যতক্ষণ তিনি তা চালু রাখবেন, ততক্ষণ তা সেভাবেই চলতে থাকবে যেভাবে তিনি তা চালু করেছিলেন। এবং যখনই তিনি চাইবেন, তা বাতিল করার অধিকার তাঁর থাকবে। যেমন, কোনো ব্যক্তি আল্লাহর কাছে মানত করল যে, যতদিন সে বেঁচে থাকবে, তার খেজুর গাছের ফল সদকা করবে। তাকে বলা হবে: তুমি তা কার্যকর করো, কিন্তু এর জন্য তাকে বাধ্য করা হবে না। সে ইচ্ছা করুক বা না করুক, এর জন্য তাকে ধরা হবে না। তবে যদি সে তা কার্যকর করে, তবে তা উত্তম হবে। আর যদি সে তা থেকে বিরত থাকে, তবে তাকে জোর করা হবে না। অনুরূপভাবে তার পরবর্তী ওয়ারিশরাও যদি তাদের পিতা যেভাবে তা চালু রেখেছিলেন, সেভাবে কার্যকর করে, তবে তা উত্তম। আর যদি তারা তা থেকে বিরত থাকে, তবে তা তাদেরই থাকবে। আমাদের কাল পর্যন্ত উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওয়াকফটি চালু থাকা এই প্রমাণ দেয় না যে, তাঁর পরিবারের কারও জন্য তা বাতিল করার সুযোগ ছিল না। বরং যা প্রমাণ করে যে, তা বাতিল করার অধিকার তাদের নেই, তা হলো—যদি তারা তাঁর মৃত্যুর পর এ বিষয়ে বিবাদ করত এবং তাদের তা করতে নিষেধ করা হতো (তবে প্রমাণিত হতো)। যদি তা জায়েয হতো, তবে আমার জীবনের কসম, তাতে এই প্রমাণ থাকত যে, ওয়াকফ বিক্রি করা যায় না। কিন্তু আমাদের কাছে এসেছে যে, তাঁরা (উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ওয়ারিশগণ) তাঁর ওয়াকফটিকে এভাবেই থাকতে দিয়েছেন যেভাবে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর জীবদ্দশায় তা চালু করেছিলেন। আর আমাদের কাছে পৌঁছায়নি যে, তাঁদের কেউ এ বিষয়ে কোনো হস্তক্ষেপ করেছেন। আর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এমনও বর্ণিত হয়েছে যা প্রমাণ করে যে, তিনি তা বাতিল করার অধিকার রাখতেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5479)


حدثنا يونس قال: أخبرنا ابن وهب أن مالكًا أخبره، عن زياد بن سعد، عن ابن شهاب، أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: لولا أني ذكرت صدقتي لرسول الله صلى الله عليه وسلم أو نحو هذا لرددتها . فلما قال عمر رضي الله عنه هذا دل أن نفس الإيقاف للأرض لم يكن يمنعه من الرجوع فيها، وأنه إنما منعه من الرجوع فيها أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمره فيها بشيء، وفارقه على الوفاء به، فكره أن يرجع عن ذلك كما كره عبد الله بن عمر أن يرجع بعد موت رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصوم الذي كان فارقه عليه أن يفعله وقد كان له أن لا يصوم. ثم هذا شريح وهو قاضي عمر وعثمان وعلي الخلفاء الراشدين المهديين رضي الله عنهم. قد روي عنه في ذلك أيضًا ما




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: "যদি না আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আমার সাদাকার (ওয়াকফ) কথা উল্লেখ করতাম—অথবা এই ধরনের কিছু—তবে আমি তা ফিরিয়ে নিতাম।" যখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কথা বললেন, তখন প্রমাণিত হলো যে, শুধু জমি ওয়াকফ করে দেওয়াই তাকে তা থেকে প্রত্যাবর্তন করা থেকে বারণ করেনি। বরং তা থেকে প্রত্যাবর্তন না করার কারণ হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে এ বিষয়ে কোনো কিছু করার নির্দেশ দিয়েছিলেন এবং তিনি (উমর) তা পূরণ করার অঙ্গীকার নিয়ে তাঁর থেকে বিচ্ছিন্ন হয়েছিলেন। তাই তিনি তা থেকে ফিরে আসা অপছন্দ করলেন। যেমন আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মৃত্যুর পরেও সেই সাওম (রোযা) থেকে ফিরে আসা অপছন্দ করেছিলেন, যা পালন করার শর্তে তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর থেকে বিচ্ছিন্ন হয়েছিলেন; যদিও তার জন্য রোযা না রাখার অনুমতি ছিল। অতঃপর এই শুরাইহ, যিনি উমর, উসমান ও আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অর্থাৎ হেদায়াতপ্রাপ্ত খুলাফায়ে রাশিদীনের কাজী ছিলেন, তাঁর থেকেও এই বিষয়ে অনুরূপ কিছু বর্ণিত আছে যা (বর্ণিত হবে)।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده مرسل الزهري لم يسمع من عمر بن الخطاب رضي الله عنه، ورجاله ثقات. =









শারহু মা’আনিল-আসার (5480)


حدثنا سليمان بن شعيب، عن أبيه، عن أبي يوسف، عن عطاء بن السائب، قال: سألت شريحا عن رجل جعل داره حبسًا على الآخر، فالآخر من ولده، فقال: إنما أقضي ولست أفتي قال فناشدته، فقال: لا حبس عن فرائض الله، وهذا لا يسع القضاة جهله، ولا يسع الأئمة تقليد من يجهل مثله، ثم لا ينكر ذلك عليه منكر من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا من تابعيهم رحمة الله عليهم . ثم قد روي عن ابن عباس رضي الله عنهما عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذلك أيضًا ما




আত্বা ইবনুস-সায়িব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি শুরাইহকে এমন এক ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম, যে তার বাড়ি অন্যজনের জন্য ওয়াকফ (হব্স) করে দিয়েছে, আর সেই অন্যজন হচ্ছে তার সন্তান। তখন তিনি (শুরাইহ) বললেন: আমি কেবল ফায়সালা দেই, ফতওয়া দেই না। (আত্বা) বললেন, এরপর আমি তাকে শপথ দিয়ে জানতে চাইলাম। তখন তিনি বললেন: আল্লাহর নির্ধারিত ফরয (অংশীদারদের প্রাপ্য) এর ওপর কোনো ওয়াকফ (হব্স) কার্যকর হয় না। এই বিষয়টি কাজিদের (বিচারকদের) জন্য না জানা সঙ্গত নয়, আর ইমামদের জন্য এই বিষয়ে অজ্ঞ ব্যক্তির অন্ধ অনুসরণ করা সঙ্গত নয়। অতঃপর, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মধ্যে কেউই এ ব্যাপারে কোনো আপত্তি করেননি এবং তাবেয়ীদের (রহিমাহুমুল্লাহ) মধ্যেও কেউ এ ব্যাপারে আপত্তি করেননি। উপরন্তু, এ বিষয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকেও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এমন কিছু বর্ণিত হয়েছে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : رجاله ثقات.









শারহু মা’আনিল-আসার (5481)


حدثنا الربيع المؤذن، قال: ثنا أسد، قال: ثنا ابن لهيعة، قال: ثنا أخي عيسى، عن عكرمة، عن ابن عباس رضي الله عنهما قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: بعدما أنزلت سورة النساء وأنزل فيها الفرائض نهى عن الحبس .




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: যখন সূরাহ আন-নিসা নাযিল হলো এবং তাতে ফারাইয (উত্তরাধিকারের আবশ্যিক বিধান) নাযিল হলো, তখন তিনি (সম্পদকে উত্তরাধিকার থেকে) আটক (حبس) করে রাখতে নিষেধ করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5482)


حدثنا روح بن الفرج، قال: أخبرنا يحيى بن عبد الله بن بكير، وعمرو بن خالد، قالا: ثنا عبد الله بن لهيعة … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন রূহ ইবনু আল-ফারাজ। তিনি বলেন: আমাদের নিকট খবর দিয়েছেন ইয়াহইয়া ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু বুকাইর এবং আমর ইবনু খালিদ। তারা উভয়ে বলেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আবদুল্লাহ ইবনু লাহী‘আ। অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (5483)


حدثنا عبد الرحمن بن الجارود، قال: ثنا ابن أبي، مريم، قال: حدثني ابن لهيعة … فذكر بإسناده مثله .




আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনুল জারূদ, তিনি বললেন: আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু আবী মারয়াম, তিনি বললেন: আমার নিকট বর্ণনা করেছেন ইবনু লাহী’আ ... অতঃপর তিনি তাঁর সনদসহ অনুরূপ হাদীসটি উল্লেখ করলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (5484)


حدثنا روح، ومحمد بن خزيمة، قالا: قال لنا أحمد بن صالح: هذا حديث صحيح وبه أقول. قال روح: قال لي أحمد بن صالح قد حدثنيه الدمشقي يعني: عبد الله بن يوسف عن ابن لهيعة . فأخبر ابن عباس رضي الله عنهما أن الإحباس منهي عنها غير جائزة، وأنها قد كانت قبل نزول الفرائض، بخلاف ما صارت عليه بعد نزول الفرائض، فهذا وجه هذا الباب من طريق الآثار. وأما وجهه من طريق النظر فإن أبا حنيفة وأبا يوسف ومحمدا وزفر رحمهم الله وجميع المخالفين لهم والموافقين قد اتفقوا على أن الرجل إذا وقف داره في مرضه على الفقراء والمساكين ثم توفي في مرضه ذلك أن ذلك جائز من ثلثه وأنها غير موروثة عنه. فاعتبرنا ذلك هل يدل على أحد القولين؟ وكان الرجل إذا جعل شيئًا من ماله من دنانير أو دراهم صدقةً، فلم ينفذ ذلك حتى مات أنه ميراث وسواء جعل ذلك في مرضه أو في صحته إلا أن يجعل ذلك وصيةً بعد موته، فينفذ ذلك بعد موته من ثلث ماله كما تنفذ الوصايا. فأما إذا جعله في مرضه، ولم ينفذه للمساكين بدفعه إياه لهم، فهو كما جعله في صحته، وكان جميع ما يفعله في صحته فينفذ من جميع ماله ولا يكون له عليه بعد ذلك ملك مثل العتاق والهبات والصدقات، هو الذي ينفذ إذا فعله في مرضه من ثلث ماله، وكان الواقف إذا وقف في مرضه داره أو أرضه، وجعل آخرها في سبيل الله كان ذلك جائزا باتفاقهم من ثلث ماله بعد وفاته لا سبيل لوارثه عليه. وليس ذلك بداخل في قول النبي صلى الله عليه وسلم: "لا حبس عن فرائض الله". وكان النظر على ذلك أن يكون كذلك سبيله إذا وقف في الصحة، فيكون نافذًا من جميع المال، ولا يكون له عليه سبيل بعد ذلك قياسًا ونظرًا على ما ذكرنا. وإلى هذا أذهب وبه أقول من طريق النظر، لا من طريق الآثار، لأن الآثار في ذلك قد تقدم وصفي لها، وبيان معانيها، وكشف وجوهها. فإن قال قائل: أفتخرج الأرض بالوقوف من ملك ربها بوقفه إياها لا إلى ملك مالك؟ قيل له: وما تنكر من هذا وقد اتفقت أنت وخصمك على الأرض يجعلها صاحبها مسجدًا للمسلمين، ويخلي بينهم وبينها أنها قد خرجت بذلك من ملكه لا إلى ملك مالك، ولكن إلى الله عز وجل. فالذي يلزم محالفك فيما احتججت عليه بما وصفنا يلزمك في هذا مثله. فإن قال قائل: فما معنى نهي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الحبس الذي رويته عنه في حديث ابن عباس رضي الله عنهما؟ قيل له: قد قال الناس في ذلك قولين: أحدهما: القول الأول الذي ذكرناه عند روايتنا إياه. والآخر أن ذلك أريد به ما كان أهل الجاهلية يفعلونه من البحيرة والسائبة والوصيلة والحام، فكانوا يحبسون ما يجعلونه كذلك فلا يورثونه أحدًا، فلما أنزلت سورة النساء وبين الله عز وجل فيها المواريث، وقسم الأموال عليها، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا حبس". ثم تكلم الذين أجازوا الصدقات الموقوفات فيها بعد تثبيتهم إياها على ما ذكرنا فقال بعضهم: هي جائزة، قبضت من المتصدق بها أو لم تقبض. وممن قال بذلك أبو يوسف رحمه الله. وقال بعضهم: لا تنفذ حتى يخرجها من يده ويقبضها منه غيره، وممن قال بهذا القول ابن أبي ليلى، ومالك بن أنس، ومحمد بن الحسن رحمهم الله. فاحتجنا أن ننظر في ذلك لنستخرج من القولين قولا صحيحا فرأينا أشياء يفعلها العباد على ضروب فمنها: العتاق ينفذ بالقول، لأن العبد إنما يزول ملك مولاه عنه إلى الله عز وجل. ومنها: الهبات والصدقات لا تنفذ بالقول حتى يكون معه القبض من الذي ملكها له. فأردنا أن ننظر حكم الأوقاف بأيها هي أشبه فنعطفه عليه. فرأينا الرجل إذا وقف أرضه أو داره، فإنها ملك الذي أوقفها عليه منافعها، ولم يملكه من رقبتها شيئًا إنما أخرجها من ملك نفسه إلى الله عز وجل، فثبت أن ذلك نظير ما أخرجه من ملكه إلى الله عز وجل، فلما كان ذلك لا يحتاج فيه إلى القبض مع القول كان كذلك الوقف لا يحتاج فيه إلى القبض مع القول. وحجة أخرى أن القبض لو أو جبناه فإنما كان القابض يقبض ما لم يملك بالوقف، فقبضه إياه وغير قبضه إياه سواء. فثبت بما ذكرنا ما ذهب إليه أبو يوسف رحمه الله. ‌‌19 - كتاب الرهن




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত,

রুহ ও মুহাম্মাদ ইবনে খুযাইমাহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তারা বলেন: আহমাদ ইবনে সালিহ আমাদের বলেছেন: এই হাদীসটি সহীহ এবং আমি এই মতের পক্ষে। রুহ বলেন: আহমাদ ইবনে সালিহ আমাকে বলেছেন: দিমাশকী—অর্থাৎ আব্দুল্লাহ ইবনে ইউসুফ, ইবনে লাহীআ থেকে এটি আমার কাছে বর্ণনা করেছেন।

অতঃপর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কে অবহিত করা হয় যে, ’ইহবাস’ (ওয়াকফ) নিষিদ্ধ ও অগ্রহণযোগ্য এবং তা ফরয বিধানাবলী নাযিল হওয়ার আগে প্রচলিত ছিল, যা ফরয বিধানাবলী নাযিল হওয়ার পরে (প্রচলিত অবস্থার) বিপরীত হয়ে গেছে। এই হলো বিভিন্ন আছার (পূর্ববর্তী বর্ণনা)-এর দৃষ্টিকোণ থেকে এই অধ্যায়ের একটি দিক।

আর ইজতিহাদ ও কিয়াস (বিবেচনা) দৃষ্টিকোণ থেকে এর দিকটি হলো: ইমাম আবূ হানীফা, আবূ ইউসুফ, মুহাম্মাদ, যুফার (আল্লাহ তাঁদের সকলের উপর রহমত বর্ষণ করুন) এবং তাঁদের সকল বিরোধী ও অনুসারীগণ একমত হয়েছেন যে, কোনো ব্যক্তি যদি তার রোগাবস্থায় তার বাড়ি-ঘর দরিদ্র ও মিসকিনদের জন্য ওয়াকফ (وقف) করে এবং অতঃপর সেই রোগেই মারা যায়, তবে তা তার সম্পদের এক-তৃতীয়াংশ থেকে কার্যকর হবে এবং এটি তার উত্তরাধিকারীদের মীরাস হবে না।

আমরা তা বিবেচনা করলাম যে এটি কি দুটি মতের কোনো একটিকে সমর্থন করে? যদি কোনো ব্যক্তি তার সম্পদের কিছু অংশ, যেমন দিনার বা দিরহাম, সদকা হিসেবে দেওয়ার সিদ্ধান্ত নেয়, কিন্তু তা কার্যকর করার আগেই মারা যায়, তবে তা মীরাস (উত্তরাধিকার) হিসেবে গণ্য হবে। এই হুকুম সমান, চাই সে তা সুস্থাবস্থায় করুক বা রোগাবস্থায়, যদি না সে তা তার মৃত্যুর পরের জন্য ওয়াসিয়ত করে। যদি তা মৃত্যুর পরের জন্য ওয়াসিয়ত করা হয়, তবে অন্যান্য ওয়াসিয়তের মতোই তা তার সম্পদের এক-তৃতীয়াংশ থেকে কার্যকর হবে।

কিন্তু যদি সে তা তার রোগাবস্থায় কার্যকর করার সিদ্ধান্ত নেয় এবং দরিদ্রদের হাতে তা হস্তান্তর করে কার্যকর না করে, তবে তা এমন হবে যেন সে তা সুস্থাবস্থায় করেছিল। সুস্থাবস্থায় সে যা কিছু করে এবং যা তার সকল সম্পদ থেকে কার্যকর হয় এবং যার উপর পরবর্তীতে তার আর কোনো মালিকানা অবশিষ্ট থাকে না—যেমন গোলাম আজাদ করা, দান করা (হিবা) এবং সাধারণ সদকা—সেগুলোই তার রোগাবস্থায় করলে তার সম্পদের এক-তৃতীয়াংশ থেকে কার্যকর হবে। ওয়াকফকারী যখন তার রোগাবস্থায় তার বাড়ি বা জমি ওয়াকফ করে এবং এর চূড়ান্ত গন্তব্য আল্লাহর পথে নির্ধারণ করে, তখন এটি তাদের সর্বসম্মত মতে তার মৃত্যুর পর তার সম্পদের এক-তৃতীয়াংশ থেকে কার্যকর হবে এবং এর উপর তার উত্তরাধিকারীর কোনো অধিকার থাকবে না।

আর এটা সেই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: "আল্লাহর ফরয (বিধানের) উপর কোনো ইহবাস (ওয়াকফ) নেই" এর অন্তর্ভুক্ত নয়। এই দৃষ্টিকোণ থেকে কিয়াস হলো এই যে, যদি সে সুস্থাবস্থায় ওয়াকফ করে, তবে তা অনুরূপভাবে তার সকল সম্পদ থেকে কার্যকর হবে এবং পরবর্তীতে তার উপর কোনো মালিকানা থাকবে না, যা আমরা পূর্বে উল্লেখ করেছি তার উপর ভিত্তি করে কিয়াস ও বিবেচনা করা হলো।

আমি এই দিকেই যাই এবং বিবেচনার (নজর) পথ ধরে এই মত দেই, আছার (বর্ণনা)-এর পথ ধরে নয়। কারণ আছার বিষয়ে আমার বর্ণনা, সেগুলোর অর্থ স্পষ্টীকরণ এবং সেগুলোর দিকগুলো উন্মোচন পূর্বেই করা হয়েছে।

যদি কেউ প্রশ্ন করে: ওয়াকফের মাধ্যমে জমি কি তার মালিকের মালিকানা থেকে বেরিয়ে যায়, অথচ তা অন্য কোনো মালিকের মালিকানায় যায় না? তাকে বলা হবে: আপনি এতে কী অস্বীকার করছেন? আপনি এবং আপনার প্রতিপক্ষ তো একমত যে, যখন কোনো ব্যক্তি তার জমিকে মুসলিমদের জন্য মসজিদ বানিয়ে দেয় এবং তাদের জন্য তা উন্মুক্ত করে দেয়, তখন সেই জমি তার মালিকানা থেকে বেরিয়ে যায়, কোনো মালিকের মালিকানায় নয়, বরং মহান আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লার দিকে স্থানান্তরিত হয়। অতএব, আপনার প্রতিপক্ষকে যা দিয়ে যুক্তি দেখিয়েছেন, এক্ষেত্রেও আপনার জন্য অনুরূপ যুক্তি প্রযোজ্য।

যদি কেউ প্রশ্ন করে: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর হাদীসে আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে ইহবাস (ওয়াকফ) নিষিদ্ধ করার যে বর্ণনা দিয়েছেন, তার অর্থ কী? তাকে বলা হবে: মানুষ এ বিষয়ে দুটি মত পোষণ করেছেন:
১. প্রথম মতটি হলো, যা আমরা এটি বর্ণনা করার সময় উল্লেখ করেছি।
২. দ্বিতীয় মতটি হলো, এর দ্বারা জাহেলিয়াতের যুগের লোকেরা যা করত—যেমন ’বাহীরা’, ’সায়িবা’, ’ওয়াসীলা’ এবং ’হাম’—তা উদ্দেশ্য ছিল। তারা যা এই রূপে উৎসর্গ করত, তা ওয়াকফ করে দিত এবং কাউকে মীরাস হিসেবে দিত না। যখন সূরা নিসা নাযিল হলো এবং আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্লা তাতে মীরাসের বিধান স্পষ্ট করলেন এবং সম্পদ বণ্টন করলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো ইহবাস (ওয়াকফ) নেই।"

অতঃপর যারা ওয়াকফকৃত সদকাকে বৈধ মনে করেন, তারা এটিকে নিশ্চিত করার পর আলোচনা করেছেন। কেউ কেউ বলেছেন: তা জায়েয, ওয়াকফকারী তা কব্জা করুক বা না করুক। যারা এই মত দিয়েছেন, তাদের মধ্যে অন্যতম হলেন আবূ ইউসুফ (রাহিমাহুল্লাহ)। আবার কেউ কেউ বলেছেন: তা কার্যকর হবে না, যতক্ষণ না ওয়াকফকারী তার হাত থেকে তা বের করে দেয় এবং অন্য কেউ তা কব্জা করে নেয়। যারা এই মত দিয়েছেন, তাদের মধ্যে আছেন ইবনু আবী লাইলা, মালিক ইবনু আনাস এবং মুহাম্মাদ ইবনুল হাসান (রাহিমাহুল্লাহ)।

তাই আমরা এই দুটি মতের মধ্যে একটি সঠিক মত বের করার জন্য বিষয়টি খতিয়ে দেখতে বাধ্য হলাম। আমরা দেখলাম যে, বান্দারা বিভিন্ন ধরনের কাজ করে। তার মধ্যে একটি হলো ’গোলাম আজাদ করা’ (আতাফ), যা শুধু কথার মাধ্যমেই কার্যকর হয়। কারণ গোলামের মালিকানা তার মনিব থেকে মহান আল্লাহর দিকে স্থানান্তরিত হয়। আর অন্যটি হলো ’দান’ (হিবা) ও ’সদকা’, যা শুধু কথার মাধ্যমে কার্যকর হয় না, বরং যার জন্য তা দান করা হয়েছে, তার পক্ষ থেকে তা কব্জা করা আবশ্যক।

আমরা ওয়াকফের হুকুম কিসের সঙ্গে অধিক সাদৃশ্যপূর্ণ, তা দেখতে চাইলাম, যাতে আমরা সেই অনুযায়ী সিদ্ধান্ত নিতে পারি। আমরা দেখলাম, যখন কোনো ব্যক্তি তার জমি বা বাড়ি ওয়াকফ করে, তখন ওয়াকফকারী কেবল তার (সম্পত্তির) উপকারিতাগুলো ওয়াকফকৃত ব্যক্তির মালিকানাধীন করে, কিন্তু সম্পত্তির মূল স্বত্বাধিকার তাকে দেয় না। বরং সে তা নিজের মালিকানা থেকে বের করে মহান আল্লাহর দিকে অর্পণ করে। সুতরাং প্রমাণিত হলো যে, এটি সেই জিনিসের অনুরূপ, যা সে তার মালিকানা থেকে বের করে আল্লাহর কাছে অর্পণ করেছে। যেহেতু এতে কথার (ঘোষণার) সাথে কব্জা করার (দখল নেওয়ার) প্রয়োজন হয় না, তেমনি ওয়াকফের ক্ষেত্রেও কথার সাথে কব্জা করার প্রয়োজন নেই।

আরেকটি যুক্তি হলো, যদি আমরা কব্জা করা আবশ্যক করি, তবে যিনি কব্জা করবেন তিনি ওয়াকফের মাধ্যমে এমন কিছু কব্জা করবেন যা তিনি মালিক হননি। সুতরাং তিনি কব্জা করুন বা না করুন, তা সমান। তাই আমরা যা উল্লেখ করেছি, তার দ্বারা আবূ ইউসুফ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মত প্রতিষ্ঠিত হলো।

১৯ - কিতাবুর রাহ্‌ন (বন্ধকী অধ্যায়)।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده ضعيف كسابقه.









শারহু মা’আনিল-আসার (5485)


حدثنا علي بن شيبة، قال: ثنا يزيد بن هارون، قال: أخبرنا زكريا بن أبي زائدة، عن الشعبي، عن أبي هريرة رضي الله عنه، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "الظهر يركب بنفقته إذا كان مرهونًا ، ولبن الدر يشرب بنفقته إذا كان مرهونا" . قال أبو جعفر فذهب قوم إلى أن للراهن أن يركب الرهن بحق نفقته عليه، ويشرب لبنه أيضًا بحق نفقته عليه، واحتجوا في ذلك بهذا الحديث. وخالفهم في ذلك آخرون فقالوا: ليس للراهن أن يركب الرهن، ولا يشرب لبنه، وهو رهن معه، وليس له أن ينتفع بشيء منه. وكان من الحجة لهم على أهل المقالة الأولى أن هذا الحديث الذي احتجوا به حديث مجمل لم يبين فيه من الذي يركب ويشرب اللبن فمن أين جاز لهم أن يجعلوه الراهن دون أن يجعلوه المرتهن هذا لا يكون لأحد إلا بدليل يدله على ذلك إما من كتاب، أو سنة، أو إجماع. ومع ذلك فقد روى هذا الحديث، هشيم فبين فيه ما لم يبين يزيد بن هارون.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি কোনো সওয়ারের জন্তু বন্ধক রাখা হয়, তবে তার ভরণপোষণের বিনিময়ে তাতে আরোহণ করা যাবে। আর যদি দুধেল প্রাণী বন্ধক রাখা হয়, তবে তার ভরণপোষণের বিনিময়ে তার দুধ পান করা যাবে।" আবূ জা’ফর (তাহাবী) বলেন, একদল বিদ্বান এই মত পোষণ করেন যে, বন্ধকদাতার (রাহিন) জন্য বন্ধকী বস্তুর ভরণপোষণের হক স্বরূপ তাতে আরোহণ করা এবং এর দুধ পান করা বৈধ। তারা এর সমর্থনে এই হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করেন। কিন্তু অন্যরা তাদের বিরোধিতা করে বলেন, বন্ধকদাতার জন্য বন্ধকী বস্তুতে আরোহণ করা কিংবা এর দুধ পান করা বৈধ নয়, যখন তা তার নিকট বন্ধকস্বরূপ থাকে। এর কোনো কিছু দ্বারাই তার উপকৃত হওয়া বৈধ নয়। প্রথমোক্ত মতবাদ পোষণকারীদের বিরুদ্ধে তাদের (বিরোধিতাকারীদের) যুক্তি হলো: তারা যে হাদীস দ্বারা প্রমাণ পেশ করেছেন, তা একটি মুজমাল (সংক্ষিপ্ত/অস্পষ্ট) হাদীস। এতে স্পষ্ট করে বলা হয়নি কে আরোহণ করবে এবং কে দুধ পান করবে। তাহলে কীসের ভিত্তিতে তাদের জন্য এই সিদ্ধান্ত নেওয়া বৈধ হলো যে, তা বন্ধকদাতা (রাহিন)-এর জন্য, বন্ধকগ্রহীতা (মুরতাহিন)-এর জন্য নয়? কোনো ব্যক্তি দলীল ব্যতীত—হোক তা কিতাব, সুন্নাহ কিংবা ইজমা (ঐকমত্য) থেকে—এমন সিদ্ধান্ত নিতে পারে না। এর সাথে সাথে, হুশাইম এই হাদীসটি বর্ণনা করেছেন এবং তাতে তিনি তা স্পষ্ট করেছেন যা ইয়াযীদ ইবনু হারূন স্পষ্ট করেননি।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : أي ذوات الدر، أي اللبن. إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5486)


حدثنا أحمد بن داود، قال: ثنا إسماعيل بن سالم الصائغ، قال: أنا هشيم عن زكريا، عن الشعبي، عن أبي هريرة رضي الله عنه، ذكر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: "إذا كانت الدابة مرهونةً فعلى المرتهن، علفها، ولبن الدر يشرب، وعلى الذي يشرب نفقتها ويركب" . فدل هذا الحديث أن المعني بالركوب وشرب اللبن في الحديث الأول: هو المرتهن لا الراهن، فجعل ذلك له، وجعلت النفقة عليه بدلا مما يتعوض منه مما ذكرنا. وكان هذا عندنا - والله أعلم، في وقت ما كان الربا مباحًا، ولم ينه حينئذ عن القرض الذي يجر منفعةً، ولا عن أخذ الشيء بالشيء، وإن كانا غير متساويين، ثم حرم الربا بعد ذلك، وحرم كل قرض جر منفعة، وأجمع أهل العلم أن نفقة الرهن على الراهن لا على المرتهن، وأنه ليس للمرتهن استعمال الرهن. فمما روي في نسخ الربا ما




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উল্লেখ করেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন কোনো চতুষ্পদ জন্তু বন্ধক রাখা হয়, তখন বন্ধকগ্রহীতার উপর তার খাদ্য (খোরাক) সরবরাহ করা কর্তব্য। আর তার দুধ পান করা যাবে। আর যে পান করবে তার উপরই তার ভরণ-পোষণ (খরচ) বর্তাবে এবং সে তার উপর আরোহণও করতে পারবে।”

এই হাদীসটি প্রমাণ করে যে, প্রথমোক্ত হাদীসে আরোহণ ও দুধ পান দ্বারা উদ্দেশ্য হলো বন্ধকগ্রহীতা, বন্ধকদাতা নয়। এটি তাকে দেওয়া হয়েছিল এবং আমরা যা উল্লেখ করেছি তার বিনিময়ে তার উপর খরচ চাপানো হয়েছিল। আর আমাদের মতে—আল্লাহই সর্বাধিক অবগত—এটি সেই সময়ের বিধান ছিল যখন রিবা (সুদ) বৈধ ছিল এবং তখন এমন কোনো ঋণ যা সুবিধা এনে দেয়, তা থেকে বা কোনো জিনিস অন্য কোনো জিনিসের বিনিময়ে গ্রহণ করা, যদিও তা অসমান হয়, তা থেকে নিষেধ করা হয়নি। এরপর রিবা হারাম করা হয় এবং যে কোনো লাভজনক ঋণকেও হারাম করা হয়। এবং আহলে ইলমগণ এ ব্যাপারে ঐকমত্য পোষণ করেন যে, বন্ধকী বস্তুর খরচ বন্ধকদাতার উপর, বন্ধকগ্রহীতার উপর নয়, এবং বন্ধকগ্রহীতার জন্য বন্ধকী বস্তু ব্যবহার করা জায়েয নয়। রিবা (সুদ) রহিত হওয়া সম্পর্কে যা কিছু বর্ণিত হয়েছে তা হলো...।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح على شرط مسلم وهشيم بن بشير صرح بالتحديث عند الدارقطني.









শারহু মা’আনিল-আসার (5487)


حدثنا سليمان بن شعيب قال: ثنا عبد الرحمن بن زياد قال: ثنا شعبة، عن منصور، والأعمش، عن أبي الضحى، عن مسروق، عن عائشة رضي الله عنها، قالت: لما نزلت الآيات التي في آخر سورة البقرة قام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقرأهن على الناس، ثم حرم التجارة في بيع الخمر .




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আয়িশা) বলেন, যখন সূরা বাকারার শেষের আয়াতসমূহ নাযিল হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং তা মানুষের কাছে পাঠ করে শোনালেন। অতঃপর তিনি মদ বিক্রির ব্যবসা হারাম করে দিলেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5488)


حدثنا أحمد بن داود، قال ثنا مسدد، قال: ثنا يحيى، عن شعبة، قال: حدثني منصور، عن مسلم، عن مسروق، عن عائشة رضي الله عنها … مثله . فلما حرم الربا حرمت أشكاله كلها، وردت الأشياء المأخوذة إلى أبدالها المساوية لها، وحرم بيع اللبن في الضروع، فدخل في ذلك النهي عن النفقة التي يملك بها المنفق لبنًا في الضرع، وتلك النفقة فغير موقوف على مقدارها واللبن كذلك أيضًا. فارتفع بنسخ الربا أن تجب النفقة على المرتهن بالمنافع التي تجب له عوضا منها وباللبن الذي يحتلبه فيشربه، ويقال لمن صرف ذلك إلى الراهن فجعل له استعمال الرهن أيجوز للراهن أن يرهن رجلا دابة هو راكبها فلا يجد بدا من أن يقول: لا. فيقال له: فإذا كان الرهن لا يجوز إلا أن يكون مخلى بينه وبين المرتهن فيقبضه ويصير في يده دون يد الراهن كما وصف الله عز وجل الرهن بقوله {فَرِهَانٌ مَقْبُوضَةٌ} [البقرة: 283] فيقول: نعم. فيقال له: فلما لم يجز أن يستعمل الرهن على ما الراهن راكبه، لم يجز ثبوته في يده بعد ذلك رهنا بحقه إلا كذلك أيضًا، لأن دوام القبض لا بد منه في الرهن إذا كان الرهن إنما هو احتباس المرتهن للشيء المرهون بالدين، وفي ذلك أيضًا ما يمنع المرتهن من استخدام الأمة الرهن، لأنها ترجع بذلك إلى حال لا يجوز عليها استعمال الرهن. وحجة أخرى أنهم قد أجمعوا أن الأمة الرهن ليس للراهن أن يطأها وللمرتهن منعه من ذلك. فلما كان المرتهن يمنع الراهن بحق الرهن من وطئها كان له أيضًا أن يمنعه بحق الرهن من استخدامها. وهذا قول أبي حنيفة وأبي يوسف ومحمد رحمهم الله.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত... অনুরূপ। যখন সুদ হারাম করা হলো, তখন এর সব ধরনের আকৃতি হারাম করা হলো। আর গ্রহণ করা জিনিসগুলোকে তার সমতুল্য বদলে ফিরিয়ে দেওয়া হলো। স্তনের মধ্যে থাকা দুধ বিক্রি করাও হারাম করা হলো। সুতরাং এর অন্তর্ভুক্ত হলো সেই ধরনের খরচ, যার মাধ্যমে খরচকারী স্তনে থাকা দুধের মালিক হয়। সেই খরচ তার পরিমাণের উপর নির্ভরশীল নয়, আর দুধও অনুরূপ।

সুতরাং, সুদের বিধান রহিত হওয়ার কারণে বন্ধক গ্রহণকারীর উপর ওই সকল সুবিধার জন্য খরচ করা জরুরি হওয়া উঠে যায়, যা সে এর বিনিময়ে পেত, এবং সেই দুধের জন্যও যা সে দোহন করে পান করত। আর যে ব্যক্তি এই অধিকার বন্ধক দাতার (রাহিন) দিকে সরিয়ে দেয় এবং তাকে বন্ধককৃত জিনিস (রাহন) ব্যবহারের অধিকার দেয়, তাকে বলা হয়: ’বন্ধক দাতা কি এমন একটি প্রাণী বন্ধক দিতে পারে যার উপর সে আরোহণ করছে?’ সে উত্তর দিতে বাধ্য হবে: ’না’।

তখন তাকে বলা হয়: ’যদি বন্ধক বৈধ না হয় যতক্ষণ না তা বন্ধক দাতার হাত থেকে মুক্ত করে বন্ধক গ্রহণকারীর হাতে দেওয়া হয় এবং সে তা কবজা করে নেয়, যেমন আল্লাহ তাআলা বন্ধককে তাঁর বাণী: {فَرِهَانٌ مَقْبُوضَةٌ} (অর্থাৎ: ’বন্ধক রাখা জিনিসগুলো যা দখলে নেওয়া হয়েছে’ [সূরা বাকারা: ২৮৩]) দ্বারা বর্ণনা করেছেন?’ সে বলবে: ’হ্যাঁ’।

তখন তাকে বলা হয়: ’যখন বন্ধক দাতার আরোহণ করা অবস্থায় বন্ধক ব্যবহার করা জায়েয নয়, তখন এরপরও তার হাতে বন্ধক হিসাবে তা রাখা তার অধিকার দ্বারা জায়েয হবে না। কারণ ঋণের বিনিময়ে বন্ধক গ্রহণকারীর হাতে বন্ধককৃত বস্তুর নিরবচ্ছিন্ন দখল বজায় রাখা অপরিহার্য। আর এর মধ্যেও এমন দিক রয়েছে যা বন্ধক গ্রহণকারীকে বন্ধককৃত দাসীকে ব্যবহার (সেবা গ্রহণ) করা থেকে বাধা দেয়, কারণ এটি এমন অবস্থায় ফিরে যায় যখন বন্ধক ব্যবহার করা জায়েয হয় না।

অন্য একটি যুক্তি হলো, তারা ঐকমত্য পোষণ করেছেন যে বন্ধককৃত দাসীকে বন্ধক দাতার জন্য সম্ভোগ করা জায়েয নয় এবং বন্ধক গ্রহণকারীর অধিকার আছে তাকে তা থেকে বাধা দেওয়ার। সুতরাং, বন্ধকের অধিকার বলে যখন বন্ধক গ্রহণকারী বন্ধক দাতাকে দাসী সম্ভোগ করা থেকে বিরত রাখে, তখন তার অধিকার রয়েছে বন্ধকের অধিকার বলেই তাকে (দাসীটির) সেবা গ্রহণ করা থেকেও বিরত রাখার। আর এটিই হলো আবু হানিফা, আবু ইউসুফ এবং মুহাম্মাদ (রহিমাহুমুল্লাহ) এর অভিমত।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5489)


وقد حدثنا فهد قال: ثنا أبو نعيم، قال: ثنا الحسن بن صالح، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن الشعبي قال: لا ينتفع من الرهن بشيء . فهذا الشعبي يقول هذا، وقد روي عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم ما ذكرنا. أفيجوز عليه أن يكون أبو هريرة رضي الله عنه يحدثه عن النبي صلى الله عليه وسلم بذلك ثم يقول هو بخلافه ولم يثبت النسخ عنده؟ فلئن كان ذلك كذلك فلقد صار متهمًا في رأيه، وإذا كان متهما في رأيه كان متهمًا في روايته، وإذا ثبتت له العدالة في روايته ثبتت له العدالة في ترك خلافها، وإن وجب سقوط أحد الأمرين وجب سقوط الآخر. والمحتج علينا بحديث أبي هريرة رضي الله عنه هذا يقول: من روى حديثًا عن النبي صلى الله عليه وسلم فهو أعلم بتأويله. فكان يجيء على أصله ويلزمه في قوله: أن يقول لم قال الشعبي على ما ذكرنا مما يخالف ما روي عن أبي هريرة رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم كان ذلك دليلا على نسخه. ‌‌2 - باب الرهن يهلك في يد المرتهن كيف حكمه؟




শা’বী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাহদ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবূ নু’আইম আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: হাসান ইবনে সালিহ আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, তিনি ইসমাঈল ইবনে আবী খালিদ-এর সূত্রে বর্ণনা করেন, তিনি বলেন: বন্ধকী বস্তু (রাহন) থেকে কোনো কিছুই দ্বারা উপকৃত হওয়া যাবে না। এই শা’বী এই কথা বলছেন, অথচ আমরা যা উল্লেখ করেছি, তা আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে বর্ণিত হয়েছে। এটা কি সম্ভব যে, আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এই বিষয়ে হাদীস বর্ণনা করবেন, তারপর তিনি নিজেই এর বিপরীত কথা বলবেন, অথচ তাঁর কাছে হাদীসের নসখ (রহিত হওয়া) প্রমাণিত হয়নি? যদি এমনটি হয়, তবে নিঃসন্দেহে তার রায় (মত) সন্দেহের বিষয় হয়ে দাঁড়াবে। আর যদি তার রায় সন্দেহের বিষয় হয়, তবে তার বর্ণনাও সন্দেহের বিষয় হয়ে দাঁড়াবে। আর যদি বর্ণনার ক্ষেত্রে তার বিশ্বস্ততা প্রমাণিত হয়, তবে এর বিপরীত মত পরিহার করার ক্ষেত্রেও তার বিশ্বস্ততা প্রমাণিত হয়। যদি এই দুইটির মধ্যে কোনো একটি বাতিল হওয়া আবশ্যক হয়, তবে অপরটিও বাতিল হওয়া আবশ্যক হবে। আর যারা আমাদের বিরুদ্ধে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর এই হাদীস দ্বারা যুক্তি দেখান, তারা বলেন: যে ব্যক্তি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে হাদীস বর্ণনা করেন, তিনি এর ব্যাখ্যা সম্পর্কে অধিক অবগত। সুতরাং তার মূলনীতি অনুসারে তার উপর এটিও আবশ্যক যে, তিনি যেন বলেন: শা’বী যা উল্লেখ করেছেন, তা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এর সূত্রে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তার বিপরীত হওয়ার কারণে তা হাদীসটির মানসুখ (রহিত হওয়ার) প্রমাণ ছিল।
২ - পরিচ্ছেদ: বন্ধকী বস্তু যদি বন্ধক গ্রহীতার হাতে ধ্বংস হয়ে যায়, তবে তার হুকুম কী?




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5490)


حدثنا يونس، قال: ثنا ابن وهب، أنه سمع مالكًا، ويونس، وابن أبي ذئب يحدثون عن ابن شهاب، عن ابن المسيب، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: "لا يغلق الرهن". قال يونس بن يزيد قال ابن شهاب وكان ابن المسيب يقول: الرهن ممن رهنه له غنمه وعليه غرمه .




ইবনুল মুসায়্যিব থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বন্ধকী সম্পদ (ঋণ পরিশোধের সময় পার হয়ে গেলে) আটক হয়ে যায় না (বা স্বয়ংক্রিয়ভাবে মালিকানা পরিবর্তিত হয় না)।" ইউনুস ইবনু ইয়াযীদ বলেন, ইবনু শিহাব বলেছেন, ইবনুল মুসায়্যিব বলতেন: বন্ধকদাতার নিকট বন্ধকী বস্তুর লাভ তার জন্য এবং এর ক্ষতিও তার উপর বর্তাবে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناد مرسل صحيح.









শারহু মা’আনিল-আসার (5491)


حدثنا محمد بن خزيمة، قال: ثنا يوسف بن عدي، قال: ثنا عبد الله بن إدريس، عن ابن جريج عن عطاء، وسليمان بن موسى قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يغلق الرهن" . قال أبو جعفر فقال قائل: لما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: "لا يغلق الرهن، لصاحبه غنمه"، وعليه غرمه ثبت بذلك أن الرهن لا يضيع بالدين، وأن لصاحبه غنمه، وهو سلامته وعليه غرمه وهو غرم الدين بعد ضياع الرهن. وهذا تأويل قد أنكره أهل العلم جميعًا باللغة، وزعموا أن لا وجه له عندهم. والذي حملنا على أن نأتي بهذا الحديث وإن كان منقطعًا احتجاج الذي يقول بالمسند به علينا، ودعواه أنا خالفناه. وقد كان يلزمه على أصله لو أنصف خصمه أن لا يحتج بمثل هذا إذا كان منقطعًا، وهو لا تقوم الحجة عنده بالمنقطع. فإن قال: إنما قبلته وإن كان منقطعًا، لأنه عن سعيد بن المسيب ومنقطع سعيد بن المسيب يقوم مقام المتصل. قيل له: ومن جعل لك أن تخص سعيدًا بهذا وتمنع منه مثله من أهل المدينة، مثل أبي سلمة، والقاسم، وسالم، وعروة، وسليمان بن يسار رحمة الله عليهم وأمثالهم من أهل المدينة، والشعبي وإبراهيم النخعي وأمثالهما رحمة الله عليهم من أهل الكوفة، والحسن وابن سيرين وأمثالهما رحمة الله عليهم من أهل البصرة، وكذلك من كان في عصر من ذكرنا من سائر فقهاء الأمصار رحمة الله عليهم، ومن كان فوقهم من الطبقة الأولى من التابعين، مثل علقمة، والأسود، وعمرو بن شرحبيل، وعبيدة، وشريح رحمهم الله؟ لئن كان هذا لك مطلقًا في سعيد بن المسيب، فإنه مطلق لغيرك فيمن ذكرنا. وإن كان غيرك ممنوعًا من ذلك، فإنك ممنوع من مثله، لأن هذا تحكم، وليس لأحد أن يحكم في دين الله بالتحكم. وقد قال أهل العلم في تأويل قول رسول الله صلى الله عليه وسلم غير ما ذكرت.




আতা ও সুলাইমান ইবনু মূসা থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বন্ধকী বস্তু বাজেয়াপ্ত হবে না (স্বয়ংক্রিয়ভাবে ঋণের বিনিময়ে হস্তগত হবে না)।"

আবু জা’ফর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, একজন বক্তা বলেছেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বন্ধকী বস্তু বাজেয়াপ্ত হবে না, এর লাভ এর মালিকের এবং এর ক্ষতিও তার," এর মাধ্যমে প্রমাণিত হলো যে বন্ধকী বস্তুটি ঋণের কারণে নষ্ট হয়ে যায় না, এবং এর মালিক এর লাভ পাবে, যা এর সুরক্ষা; আর এর উপর ক্ষতি রয়েছে, যা বন্ধকী বস্তুটি নষ্ট হওয়ার পর ঋণের ক্ষতি। ভাষার (আরবি) বিশেষজ্ঞ আলেমগণ এই ব্যাখ্যা সম্পূর্ণরূপে প্রত্যাখ্যান করেছেন এবং দাবি করেছেন যে তাদের কাছে এর কোনো ভিত্তি নেই।

আমরা এই হাদিসটি বর্ণনা করার কারণ, যদিও এটি মুনকাতি’ (বিচ্ছিন্ন সূত্রবিশিষ্ট), তা হলো যারা মুসনাদ হাদিসের প্রবক্তা, তারা এর মাধ্যমে আমাদের বিরুদ্ধে প্রমাণ উত্থাপন করেছেন এবং দাবি করেছেন যে আমরা তাদের বিরোধিতা করেছি। যদি সে তার প্রতিপক্ষের প্রতি ন্যায়বিচার করত, তবে তার নিজস্ব নীতি অনুযায়ী এমন হাদিস দিয়ে প্রমাণ পেশ করা উচিত ছিল না, যখন তা মুনকাতি’, কারণ তার কাছে মুনকাতি’ দ্বারা প্রমাণ প্রতিষ্ঠা হয় না।

যদি সে বলে: আমি এটি গ্রহণ করেছি যদিও এটি মুনকাতি’, কারণ এটি সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াব থেকে বর্ণিত, আর সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াবের মুনকাতি’ রেওয়ায়েত মুত্তাসিল (অবিচ্ছিন্ন) এর সমতুল্য। তাকে বলা হবে: কে আপনাকে অধিকার দিল যে আপনি কেবল সাঈদকে এই বিশেষত্ব দেবেন এবং তার মতো মদীনার অন্যান্যদের জন্য তা অস্বীকার করবেন? যেমন: আবূ সালামাহ, কাসিম, সালিম, উরওয়া, সুলাইমান ইবনু ইয়াসার (তাঁদের উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক) এবং তাদের মতো মদীনার অন্যান্যগণ; এবং শা’বী ও ইব্রাহীম নাখঈ (তাঁদের উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক) ও তাদের মতো কুফার অন্যান্যগণ; এবং হাসান ও ইবনু সীরীন (তাঁদের উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক) ও তাদের মতো বসরার অন্যান্যগণ; এবং আমাদের উল্লিখিতদের যুগে অন্যান্য ফকীহগণ (তাঁদের উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক), এবং তাদের উপরের প্রথম স্তরের তাবেয়ীগণ, যেমন: আলকামা, আসওয়াদ, আমর ইবনু শুরাহবীল, উবায়দাহ ও শুরাইহ (তাঁদের উপর আল্লাহর রহমত বর্ষিত হোক)?

যদি এটি আপনার জন্য সাঈদ ইবনুল মুসাইয়াবের ক্ষেত্রে শর্তহীনভাবে প্রযোজ্য হয়, তবে উল্লিখিত অন্যান্যদের ক্ষেত্রেও এটি অন্যদের জন্য শর্তহীনভাবে প্রযোজ্য হবে। আর যদি আপনার ব্যতীত অন্যকে তা থেকে বিরত রাখা হয়, তবে আপনিও অনুরূপ কিছু থেকে বিরত থাকবেন। কারণ এটি একগুঁয়েমী সিদ্ধান্ত, আর আল্লাহর দ্বীনের মধ্যে কারো খেয়াল-খুশি মতো সিদ্ধান্ত নেওয়ার অধিকার নেই। আর আলেমগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই বাণীর ব্যাখ্যায় আমি যা উল্লেখ করেছি তার থেকে ভিন্ন মত দিয়েছেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : معناه لا يذهب ويتلف باطلا. إسناده مرسل صحيح وسليمان بن موسى القرشي حسن الحديث متابع.









শারহু মা’আনিল-আসার (5492)


حدثنا علي بن عبد العزيز - فيما أعلم - فإن لم يكن فقد دخل فيما كان أجازه لي، قال: ثنا أبو عبيد، قال: ثنا جرير، عن مغيرة عن إبراهيم في رجل دفع إلى رجل رهنا وأخذ منه دراهم وقال: إن جئتك بحقك إلى كذا وكذا، وإلا فالرهن لك بحقك، فقال إبراهيم: لا يغلق الرهن، قال أبو عبيد: فجعله جوابًا لمسألته؟ . وقد روي عن طاوس نحو من هذا بلغني ذلك عن ابن عيينة، عن عمرو، عن طاوس، قال أبو عبيد: وأخبرني عبد الرحمن بن مهدي، عن مالك بن أنس، وسفيان بن سعيد أنهما كان يفسرانه على هذا التفسير.




ইবরাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত। এক ব্যক্তি অপর এক ব্যক্তির নিকট একটি বন্ধক রেখে তার থেকে কিছু দিরহাম গ্রহণ করল এবং বলল: “যদি আমি নির্দিষ্ট সেই সময়ের মধ্যে তোমার প্রাপ্য নিয়ে তোমার কাছে আসি, [তবে ভালো], অন্যথায় তোমার পাওনার বিনিময়ে এই বন্ধকটি তোমার হয়ে যাবে।” ইবরাহীম (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন: বন্ধক (এই শর্তে) চূড়ান্তভাবে বাজেয়াপ্ত (মালিকানাধীন) হবে না। আবু উবাইদ বললেন: তিনি কি তাঁর এই জবাবটিকে প্রশ্নটির সমাধান হিসেবে স্থির করেছেন? এর অনুরূপ একটি বর্ণনা তাউস (রাহিমাহুল্লাহ) থেকেও বর্ণিত হয়েছে। এটি আমার কাছে ইবনু উয়াইনাহ থেকে, তিনি আমর থেকে, তিনি তাউস (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে পৌঁছেছে। আবু উবাইদ আরও বলেন: আব্দুর রহমান ইবনু মাহদী আমাকে জানিয়েছেন যে, মালিক ইবনু আনাস এবং সুফিয়ান ইবনু সাঈদ (রাহিমাহুল্লাহ) উভয়েই এই ব্যাখ্যা অনুসারে এর তাফসীর করতেন।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : Null









শারহু মা’আনিল-আসার (5493)


حدثنا يونس بن عبد الأعلى، عن ابن وهب عن مالك بن أنس بذلك أيضًا .




আমাদের কাছে ইউনুস ইবনে আব্দুল আ’লা বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবনে ওয়াহাব থেকে, তিনি মালিক ইবনে আনাস থেকে, তা-ও একই রূপে।




تحقيق الشيخ لطيف الرحمن البهرائجي القاسمي : إسناده صحيح