হাদীস বিএন


হিলইয়াতুল আওলিয়া





হিলইয়াতুল আওলিয়া (5447)


• حدثنا أحمد بن إسحاق ثنا محمد بن العباس الأخرم ثنا حفص بن عمر الربالي ثنا أبو بحر البكراوي ثنا قرة بن خالد. قال سمعت عون بن عبد الله يقول: إذا أعطيت المسكين شيئا، فقال: بارك الله فيك! فقل أنت: بارك الله فيك! حتى تخلص لك صدقتك.




আওন ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন তুমি কোনো মিসকিনকে কিছু দাও আর সে বলে, ‘আল্লাহ আপনাকে বরকত দিন!’ (বারাকাল্লাহু ফিক), তখন তুমিও বলো, ‘আল্লাহ আপনাকে বরকত দিন!’ (বারাকাল্লাহু ফিক), যাতে তোমার দান (সদকা) তোমার জন্য সম্পূর্ণ/পরিশুদ্ধ হয়।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5448)


• حدثنا سليمان بن أحمد ثنا أبو زرعة الدمشقي ثنا أبو نعيم ثنا مالك بن مغول. قال سمعت عون بن عبد الله يقول: سألت أم الدرداء ما كان أفضل عمل أبي الدرداء؟ قالت: التفكر والاعتبار.




উম্মু দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, [আউন ইবনু আব্দুল্লাহ বলেন] আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম, আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সর্বোত্তম আমল কী ছিল? তিনি বললেন: তা হলো, গভীরভাবে চিন্তাভাবনা করা ও শিক্ষা গ্রহণ করা।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5449)


• حدثنا سليمان بن أحمد ثنا أبو مسلم الكشي ثنا عبد الله بن رجاء ثنا المسعودي عن عون. قال: لما أتت عبد الله - يعني ابن مسعود - وفاة عتبة - يعني أخاه - بكى، فقيل له أتبكي؟ قال: كان أخي في النسب، وصاحبي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، وما أحب مع ذلك أني كنت قبله أن يموت فأحتسبه، أحب إلي من أن أموت فيحتسبني.




আব্দুল্লাহ ইবন মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর ভাই উতবার মৃত্যুর সংবাদ এলো, তখন তিনি কেঁদে ফেললেন। তাঁকে বলা হলো: আপনি কাঁদছেন? তিনি বললেন: সে ছিল আমার বংশগত ভাই এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমার সাথী। এতদ্সত্ত্বেও, আমি এটা পছন্দ করি না যে আমি যেন তার আগে মৃত্যুবরণ করি এবং সে যেন আমার (মৃত্যুর) সওয়াব লাভ করে (অর্থাৎ ধৈর্য ধারণ করে)। বরং সে আমার আগে মৃত্যুবরণ করুক এবং আমি যেন তার (মৃত্যুর) সওয়াব লাভ করি—এটাই আমার কাছে অধিক প্রিয়।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5450)


• حدثنا سليمان ثنا أبو مسلم الكشي ثنا عبد الله بن رجاء ثنا المسعودي عن عون. أن ابن مسعود كان يقول: يا بادي لا بداء لك، يا دائم لا نفاد لك، يا حي تحيي الموتى، أنت القائم على كل نفس بما كسبت.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: হে সূচনাকারী, আপনার কোনো সূচনা নেই। হে চিরস্থায়ী, আপনার কোনো বিলুপ্তি নেই। হে চিরঞ্জীব, যিনি মৃতকে জীবন দান করেন। আপনিই প্রত্যেক আত্মার উপরে তাদের কৃতকর্মের হিসাব রক্ষক।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5451)


• حدثنا سليمان بن أحمد ثنا علي بن عبد العزيز ثنا أبو نعيم ثنا المسعودي ح. وحدثنا إبراهيم بن عبد الله ثنا محمد بن إسحاق ثنا قتيبة بن سعيد ثنا عبد العزيز بن أبي حازم قالا عن أبي حازم عن عون. أنه كان يقول: المؤمن موالف، ولا خير فيمن لا يألف ولا يؤلف.




আওন থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: মুমিন তো বন্ধুভাবাপন্ন (মিলনশীল)। আর তার মধ্যে কোনো কল্যাণ নেই, যে না অন্যদের সাথে মেশে আর না অন্যরা তার সাথে মিশতে পারে।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5452)


• حدثنا أحمد بن إسحاق ثنا أبو يحيى الرازي ثنا عبد الله بن عمران قال ثنا ابن إدريس قال سمعت هارون بن عنترة يقول عن عون بن عبد الله: قال قال عبد الله صل من كان أبوك يصله، فإن صلة الميت في قبره أن تصل من كان أبوك يواصل.




আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন, তোমার পিতা যার সাথে সুসম্পর্ক রাখতেন, তুমিও তার সাথে সম্পর্ক বজায় রাখো। কেননা, কবরে শায়িত মৃত ব্যক্তির সাথে সম্পর্ক বজায় রাখার অর্থ হলো, তোমার পিতা যার সাথে সম্পর্ক রক্ষা করতেন, তুমি তাদের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখবে।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5453)


• حدثنا أحمد بن جعفر بن حمدان ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل حدثني أبو موسى الأنصاري ثنا سفيان بن عيينة. قال قال عون بن عبد الله: الخير الذي لا شر فيه، الشكر مع العافية، فكم من منعم عليه غير شاكر، وكم من مبتلى غير صابر. وكان يقول: الحمد لله الذي إذا شئت أي ساعة من ليل أو نهار وضعت عنده سري بغير شفيع فيقضي لي حاجتي ربي عز وجل، والحمد لله الذي أدعوه فيجيبني، وإن كنت بطيئا حين يدعونى.




আওন ইবন আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, এমন কল্যাণ, যাতে কোনো অকল্যাণ নেই, তা হলো সুস্থতার সাথে কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করা। কেননা, কত নেয়ামতপ্রাপ্ত ব্যক্তি আছে, যে কৃতজ্ঞ নয়; আর কত বিপদগ্রস্ত ব্যক্তি আছে, যে ধৈর্যশীল নয়। আর তিনি (আওন) বলতেন: সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যাঁর কাছে আমি যখন চাই—দিন বা রাতের যেকোনো সময়ে—কোনো সুপারিশকারী ছাড়াই আমার গোপন কথা পেশ করতে পারি, আর পরাক্রমশালী আমার রব আমার প্রয়োজন পূরণ করে দেন। আর সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, আমি তাঁকে ডাকি আর তিনি আমার ডাকে সাড়া দেন, যদিও তিনি যখন আমাকে ডাকেন, তখন আমি সাড়া দিতে বিলম্ব করি।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5454)


• أخبرنا القاضي أبو أحمد محمد بن أحمد في كتابه ثنا الحسن بن علي قال ثنا سعيد بن سليمان الواسطي ثنا سماعة بن هلال. قال سمعت عون بن عبد الله يقول: يدخل فقراء المهاجرين [الجنة] قبل أغنيائهم بسبعين خريفا، مثله كمثل سفينتين في هذا البحر، مرت واحدة وليس فيها شيء. فقال صاحب البحر: خلوا سبيلها، ومرت الأخرى موقرة فحبست لينظر ما فيها.




আওন ইবনে আবদুল্লাহ থেকে বর্ণিত, দরিদ্র মুহাজিরগণ তাদের ধনীদের সত্তর বছর আগে জান্নাতে প্রবেশ করবে। এর উদাহরণ এমন, যেমন এই সাগরে দুটি জাহাজ রয়েছে। সেগুলোর মধ্যে একটি চলে গেল, যার মধ্যে কিছুই ছিল না। তখন সাগরের (বা বন্দরের) মালিক বলল: এর পথ ছেড়ে দাও। আর অন্যটি বোঝাই অবস্থায় এলো, ফলে সেটিকে থামানো হলো যেন দেখা যায় এর মধ্যে কী আছে।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5455)


• حدثنا أحمد بن جعفر بن حمدان ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل حدثني أبي ثنا هاشم بن القاسم ثنا الأشجعي ثنا موسى الجهني عن عون بن عبد الله ابن عتبة. أنه كان يقول: يا ويح نفسي! كيف أغفل ولا يغفل عني؟ أم كيف
تهنئنى معيشتي واليوم الثقيل ورائي؟ أم كيف يشتد عجبي بدار في غيرها قراري وخلدي.




আওন ইবন আব্দুল্লাহ ইবন উতবাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলতেন: হায় আমার দুর্ভাগ্য! আমি কীভাবে উদাসীন থাকতে পারি, অথচ আমাকে নিয়ে উদাসীন থাকা হয় না? অথবা সেই কঠিন দিন (কিয়ামত) যখন আমার পেছনে, তখন কীভাবে আমার জীবন আমাকে আনন্দ দিতে পারে? অথবা যে গৃহে আমার আসল বাস ও স্থায়িত্ব নয়, সেই গৃহের প্রতি আমার আসক্তি কীভাবে এত তীব্র হয়?









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5456)


• حدثنا عبد الله بن محمد ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم الدورقي حدثني يحيى بن معين ثنا الحجاج بن محمد أنبأنا عبد الرحمن المسعودى عن عون ابن عبد الله. أنه كان يقول في بكائه: وذكر خطيئته

ويحى! بأى شيء لم اعصى ربى. ويحى! إنما عصيته بنعمته عندى، ويحي! من خطيئة ذهبت شهوتها وبقيت تبعتها عندي في كتاب كتبه كتاب لم يغيبوا عنى، وا سوأتاه! لم استحيهم ولم اراقب ربى، ويحى! نسيت ما لم ينسوا منى، ويحى! غفلت ولم يغفلوا عنى، لم استحيهم ولم اراقب.

وا سوأتاه! ويحى! حفظوا ما ضيعت منى، ويحى! طاوعت نفسى وهى لا تطاوعنى.

ويحى! طاوعتها فيما يضرها ويضرنى. ويحها! ألا تطاوعني فيما ينفعها وينفعني أريد إصلاحها وتريد أن تفسدني. ويحها! إني لأنصفها وما تنصفنى، أدعوها لا رشدها وتدعونى لتغوينى، ويحها! انها لعدو لو أنزلتها تلك المنزلة منى، ويحها! تريد اليوم أن ترديني وغدا تخاصمني.

رب لا تسلطها على ذلك مني، رب إن نفسي لم ترحمني فارحمني، رب إني أعذرها ولا عذرتنى، إنه إن يك خيرا أخذلها وتخذلني، وإن يك شرا أحبها وتحبني، رب فعافني منها وعافها مني، حتى لا أظلمها ولا تظلمني، وأصلحني لها وأصلحها لي، فلا أهلكها ولا تهلكنى، ولا تكلنى اليها ولا تكلها الى.

ويحي! كيف أفر من الموت وقد وكل بى، ويحى! كيف انساه ولا ينسانى.

ويحى! أنه يقص أثري فإن فررت لقيني، وإن أقمت أدركنى. ويحي! هل عسى أن يكون قد أظلني فمسانى؟ وصبحنى! أو طرقنى فبغتنى؟(1).

ويحى! أزعم أن خطيئتي قد أقرحت قلبي، ولا يتجافى جنبي، ولا تدمع عينى ولا تسهر لى(2) ويحى! كيف أنام على مثلها ليلى، ويحى! هل ينام على مثلها مثلى، ويحي! لقد خشيت أن لا يكون هذا الصدق منى؟ بل ويلى!
إن لم يرحمني ربي. ويحي! كيف لا توهن قوتى ولا تعطش هامتى(1) بل ويلي! إن لم يرحمني ربي. ويحي! كيف لا أنشط فيما يطفئها عني؟ بل ويلي! إن لم يرحمني ربي.

ويحي! كيف لا يذهب ذكر خطيئتي كسلي، ولا يبعثني إلى ما يذهبها عني.

بل ويلي! إن لم يرحمني ربي. ويحي! كيف تنكا قرحتى ما تكسب يدى، ويح نفسى بل ويلى! ان لم يرحمنى ربى. ويحى! لا تنهاني الأولى من خطيئتي عن الآخرة، ولا تذكرني الآخرة من خطيئتي بسوء ما ركبت من الأولى، فويلى ثم ويلى! ان لم يتم عفو ربى. ويحي! لقد كان لي فيما استوعبت من لساني وسمعي وقلبي وبصري اشتغال، فويل لي ان لم يرحمنى ربى. ويحي! إن حجبت يوم القيامة عن ربي فلم يزكني ولم ينظر إلي ولم يكلمني، فأعوذ بنور وجه ربي من خطيئتي، وأعوذ به أن أعطى كتابى بشمالى أو وراء ظهري، فيسود به وجهي، وتزرق به مع العمى عينى. بل ويلى! ان لم يرحمنى ربى. ويحيى! بأي شيء أستقبل ربي؟ بلساني أم بيدي أم بسمعي أم بقلبي أم ببصري. ففي كل هذا له الحجة والطلبة عندى، فويل لي إن لم يرحمني ربي، كيف لا يشغلنى ذكر خطيئتى عما لا يعنينى؟ ويحك يا نفسى ما لك لا تنسين ما لا ينسى؟ وقد أتيت ما لا يؤتى، وكل ذلك عند ربك يحصى، فى كتاب لا يبيد ولا يبلى. ويحك! لا تخافين أن تجزى فيمن يجزى يوم تجزى كل نفس بما تسعى، وقد آثرت ما يفني على ما يبقى.

يا نفس ويحك! ألا تستفيقين مما أنت فيه؟ إن سقمت تندمين، وإن صححت تأثمين، مالك؟ إن افتقرت تحزنين، وإن استغنيت تفتنين. ما لك؟ إن نشطت تزهدين، فلم إن دعيت تكسلين؟ اراك ترغبين قبل أن تنصبى، فلم لا تنصبين فيما ترغبين.

يا نفس ويحك! لم تخالفين؟ تقولين في الدنيا قول الزاهدين وتعملين فيها عمل الراغبين. ويحك! لم تكرهين الموت؟ لم لا تذعنين وتحبين الحياة، لم لا تصنعين. يا نفس ويحك! أترجين أن ترضي ولا تراضين، وتجانبين وتعصين.
مالك؟ إن سألت تكثرين، فلم إن أنفقت تقترين؟ أتريدين الحياة؟ ولم تحذرين بتغير الزيادة، ولم تشكرين. تعظمين في الرهبة حين تسألين، وتقصرين في الرغبة حين تعملين، تريدين الآخرة بغير عمل، وتؤخرين التوبة لطول الأمل.

لا تكوني كمن يقال هو في القول مدل، ويستصعب عليه الفعل، بعض بني آدم إن سقم ندم، وإن صح أمن، وإن افتقر حزن، وإن استغنى فتن، وإن نشط زهد، وإن رغب كسل، يرغب قبل أن ينصب، ولا ينصب فيما يرغب. يقول قول الزاهد، ولا يعمل عمل الراغب، يكره الموت لما لا يدع، ويحب الحياة لما لا يصنع. إن سأل أكثر، وإن أنفق قتر، يرجو الحياة ولم يحذر، ويبغي الزيادة ولم يشكر، يبلغ فى الرغبة حين يسأل، ويقصر في الرغبة حين يعمل، يرجو الأجر بغير عمل.

ويح لنا ما أغرنا، ويح لنا ما أغفلنا، ويح لنا ما أجهلنا، ويح لنا لأي شيء خلقنا؟ للجنة أم للنار، ويح لنا أي خطر خطرنا، ويح لنا من أعمال قد أخطرتنا، ويح لنا مما يراد بنا، ويح لنا كأنما يعني غيرنا، ويح لنا إن ختم على أفواهنا، وتكلمت أيدينا، وشهدت أرجلنا. [ويح لنا حين تفتش سرائرنا، ويح لنا حين تشهد أجسادنا، ويح لنا مما قصرنا، لا براءة لنا، ولا عذر عندنا، ويح لنا ما أطول أملنا، ويح لنا حيث نمضى الى خالقا].(1) ويح لنا ولنا الويل الطويل! إن لم يرحمنا ربنا، فارحمنا يا ربنا.

رب ما أحكمك، وأمجدك، وأجودك، وأرأفك، وأرحمك، وأعلاك، وأقربك، وأقدرك، وأقهرك، وأوسعك، وأقضاك، وأبينك، وأنورك، وألطفك، وأخبرك، وأعلمك، وأشكرك، وأحلمك، وأحكمك، وأعطفك، وأكرمك.

رب ما أرفع حجتك، وأكثر مدحتك، رب ما أبين كتابك، وأشد عقابك، رب ما أكرم مآبك، وأحسن ثوابك، رب ما أجزل عطاؤك،
وأجل ثناؤك، رب ما أحسن بلاءك، وأسبغ نعماءك، رب ما أعلى مكانك، وأعظم سلطانك، رب ما أمتن كيدك، وأغلب مكرك، رب ما أعز ملكك، وأتم أمرك، رب ما أعظم عرشك، وأشد بطشك، رب ما أوسع كرسيك، وأهدى مهديك، رب ما أوسع رحمتك، وأعرض جنتك، رب ما أعز نصرك، وأقرب فتحك، رب ما أعمر بلادك، وأكثر عبادك، رب ما أوسع رزقك، وأزيد شكرك، رب ما أسرع فرجك، وأحكم صنعك، رب ما اللطف خيرك، وأقوى أمرك، رب ما أنور عفوك، وأجل ذكرك، رب ما اعدل حكمك، وأصدق قولك، رب ما أوفى عهدك، وأنجز وعدك، رب ما أحضر نفعك، وأتقن صنعك.

ويحي؟ كيف أغفل ولا يغفل عني، أم كيف تهنئنى معيشتي واليوم الثقيل ورائي، أم كيف لا يطول حزني ولا أدري ما يفعل بي؟ أم كيف تهنئنى الحياة ولا أدري ما أجلي؟ أم كيف تعظم فيها رغبتي والقليل فيها يكفيني، أم كيف آمن ولا يدوم فيها حالي؟ أم كيف يشتد حبي لدار ليست بداري؟ أم كيف أجمع لها وفي غيرها قراري؟ أم كيف يشتد عليها حرصي ولا ينفعني ما تركت فيها بعدي، أم كيف اوثرها وقد اضرت بمن آثرها قبلي، أم كيف لا أبادر بعملي قبل أن يغلق باب توبتي، أم كيف يشتد إعجابى بما يزايلني وينقطع عني، أم كيف أغفل عن أمر حسابي وقد أظلني واقترب مني، أم كيف أجعل شغلى فيما قد تكفل به لي، أم كيف أعاود ذنوبي وأنا معروض على عملي، أم كيف لا أعمل بطاعة ربي وفيها النجاة مما أحذر على نفسي، أم كيف لا يكثر بكائي ولا أدري ما يراد بي؟ أم كيف تقر عيني مع ذكر ما سلف مني، أم كيف أعرض نفسي لما لا يقوى له هوائي، أم كيف لا يشتد هولى مما يشتد منه جزعى، أم كيف تطيب نفسى مع ذكر ما هو أمامي، أم كيف يطول أملي والموت فى أثري، أم كيف لا أراقب ربي وقد أحسن طلبي.

ويحي! فهل ضرت غفلتي أحدا سوائي، أم هل يعمل لي غيري إن ضيعت حظي، أم هل يكون عملي إلا لنفسى، فلم أدخر عن نفسي ما يكون نفعه لي؟
ويحي! كأنه قد تصرم أجلي ثم أعاد ربي خلقي كما بدأني، ثم أوقفني وسألني وسأل عني وهو أعلم بي ثم أشهدت الأمر الذي أذهلني عن أحبابي وأهلي، وشغلت بنفسي عن غيري، وبدلت السموات والأرض وكانتا تطيعان وكنت أعصي؛ وسيرت الجبال وليس لها مثل خطيئتي، وجمع الشمس والقمر وليس عليهما مثل حسابي؛ وانكدرت النجوم وليست تطلب بما عندي، وحشرت الوحوش ولم تعمل بمثل عملي، وشاب الوليد وهو أقل ذنبا منى.

ويحي! ما أشد حالي وأعظم خطري، فاغفر لي واجعل طاعتك همي، وقو عليها جسدي، وسخ نفسى عن الدنيا واشغلنى فيما ينفعنى، وبارك لي في قواها حتى ينقضي مني حالي، وامنن علي وارحمني حين تعيد بعد اللقاء خلقي، ومن سوء الحساب فعافني يوم تبعثني فتحاسبني، ولا تعرض عني يوم تعرضني بما سلف من ظلمي وجرمي(1)، وآمني يوم الفزع الأكبر يوم لا تهمني إلا نفسي، وارزقني نفع عملي يوم لا ينفعني عمل غيري.

إلهي أنت الذي خلقتني، وفي الرحم صورتني، ومن أصلاب المشركين نقلتني، قرنا فقرنا حتى أخرجتني في الأمة المرحومة، إلهي فارحمني إلهي فكما مننت علي بالإسلام فامنن علي بطاعتك، وبترك معاصيك أبدا ما أبقيتني ولا تفضحني بسرائري، ولا تخذلني بكثرة فضائحي.

سبحانك خالقي أنا الذي لم أزل لك عاصيا فمن أجل خطيئتي لا تقر عيني، وهلكت إن لم تعف عني، سبحانك خالقي بأي وجه ألقاك؟ وبأي قدم أقف بين يديك؟ وبأي لسان أناطقك؟ وبأي عين أنظر إليك؟ وأنت قد علمت سرائر أمري، وكيف أعتذر إليك إذا ختمت على لساني، ونطقت جوارحي بكل الذي قد كان مني.

سبحانك خالقي فأنا تائب إليك متبصبص؛ فاقبل توبتي، واستجب دعائي وارحم شبابي، واقلنى عثرتى، وارحم طول عبرتي، ولا تفضحني بالذي قد كان مني.
سبحانك خالقى أنت غياث المستغيثين، وقرة أعين العابدين، وحبيب قلوب الزاهدين، فإليك مستغاثي ومنقطعي، فارحم شبابي، واقبل توبتي، واستجب دعوتي، ولا تخذلني بالمعاصي التي كانت مني. إلهي علمتني كتابك الذي أنزلته على رسولك محمد صلى الله عليه وسلم. ثم وقعت على معاصيك وأنت تراني، فمن أشقى مني إذا عصيتك وأنت تراني، وفي كتابك المنزل قد نهيتني، إلهي أنا إذا ذكرت ذنوبي ومعاصيى لم تقر عيني للذي كان مني، فأنا تائب إليك فاقبل ذلك مني، ولا تجعلني لنار جهنم وقودا بعد توحيدي، وإيماني بك. فاغفر لي ولوالدي ولجميع المسلمين برحمتك آمين رب العالمين.




আউন ইবন আবদুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি যখন ক্রন্দন করতেন এবং তাঁর পাপের কথা স্মরণ করতেন, তখন বলতেন:

হায় আফসোস! কীসের মাধ্যমে আমি আমার রবের অবাধ্যতা করব না? হায় কপাল! আমি তো তাঁরই দেওয়া নিয়ামতের সাহায্যে তাঁর অবাধ্যতা করেছি, যা আমার কাছে বিদ্যমান ছিল। হায় আফসোস! এমন পাপের জন্য, যার কামনা-বাসনা চলে গেছে, কিন্তু এর শাস্তি আমার কাছে এমন কিতাবে লিপিবদ্ধ আছে, যা লিপিবদ্ধকারীরা আমার কাছ থেকে অনুপস্থিত ছিল না! কতোই না লজ্জার বিষয়! আমি তাঁদের থেকে লজ্জা পাইনি এবং আমার রবের প্রতি খেয়াল রাখিনি। হায় আফসোস! তারা যা আমার সম্পর্কে ভুলে যাননি, আমি তা ভুলে গেছি। হায় আফসোস! আমি গাফেল হয়েছি, অথচ তাঁরা আমার প্রতি গাফেল ছিলেন না। আমি তাঁদের থেকে লজ্জা পাইনি এবং রবের প্রতি খেয়াল রাখিনি।

কতোই না লজ্জার বিষয়! হায় আফসোস! আমি যা নষ্ট করেছি, তারা তা সংরক্ষণ করেছেন। হায় আফসোস! আমি আমার নফসের আনুগত্য করেছি, অথচ সে আমার আনুগত্য করে না।

হায় আফসোস! আমি এমন বিষয়ে তার আনুগত্য করেছি, যা তার এবং আমার উভয়ের জন্য ক্ষতিকর। আফসোস তার উপর! কেন সে এমন বিষয়ে আমার আনুগত্য করে না, যা তার ও আমার উপকার করে? আমি চাই তাকে সংশোধন করতে, আর সে চায় আমাকে ধ্বংস করতে। আফসোস তার উপর! আমি তার প্রতি সুবিচার করি, কিন্তু সে আমার প্রতি সুবিচার করে না। আমি তাকে কল্যাণের দিকে ডাকি, আর সে আমাকে ডাকে পথভ্রষ্ট করার জন্য। আফসোস তার উপর! সে তো অবশ্যই শত্রু, যদি আমি তাকে সেই মর্যাদা দিতাম। আফসোস তার উপর! আজ সে আমাকে ধ্বংস করতে চায়, আর কাল সে আমার সাথে বিবাদ করবে।

হে রব! তুমি এই ক্ষেত্রে তাকে (নফসকে) আমার উপর প্রবল করে দিও না। হে রব! আমার নফস যখন আমাকে দয়া করলো না, তখন তুমি আমাকে দয়া করো। হে রব! আমি তাকে ক্ষমা করি, কিন্তু সে আমাকে ক্ষমা করে না। যদি কল্যাণ হয়, তবে আমি তাকে ত্যাগ করি এবং সে আমাকে ত্যাগ করে। আর যদি মন্দ হয়, তবে আমি তাকে ভালোবাসি এবং সেও আমাকে ভালোবাসে। হে রব! সুতরাং তুমি আমাকে তার থেকে এবং তাকে আমার থেকে রক্ষা করো, যেন আমি তার প্রতি জুলুম না করি এবং সেও যেন আমার প্রতি জুলুম না করে। তুমি আমার জন্য তাকে এবং তার জন্য আমাকে সংশোধন করে দাও, যেন আমি তাকে ধ্বংস না করি এবং সেও যেন আমাকে ধ্বংস না করে। তুমি আমাকে তার হাওলায় দিও না এবং তাকেও আমার হাওলায় দিও না।

হায় আফসোস! কিভাবে আমি মৃত্যু থেকে পালাবো, অথচ তা আমার প্রতি নিযুক্ত করা হয়েছে? হায় আফসোস! কিভাবে আমি তাকে ভুলতে পারি, অথচ সে আমাকে ভোলে না?

হায় আফসোস! সে তো আমার পদচিহ্ন অনুসরণ করছে। যদি পলায়ন করি, তবে সে আমার নাগাল পাবে, আর যদি স্থির থাকি, তবে সে আমাকে ধরে ফেলবে। হায় আফসোস! হতে পারে তা আমাকে ছায়া করে ফেলেছে এবং সন্ধ্যায় বা সকালে এসে পড়েছে! অথবা সে আমাকে অতর্কিতভাবে আঘাত করেছে!

হায় আফসোস! আমি দাবি করি যে আমার পাপ আমার হৃদয়কে ক্ষতবিক্ষত করেছে, অথচ আমার পাঁজর (ইবাদতে) বিছানা ত্যাগ করে না, আমার চোখ অশ্রু ঝরায় না এবং আমার জন্য রাত জাগে না। হায় আফসোস! কিভাবে আমি এমন অবস্থায় আমার রাত্রি যাপন করি? হায় আফসোস! আমার মতো কেউ কি এমন অবস্থায় ঘুমায়? হায় আফসোস! আমি তো ভয় করি যে এটা আমার পক্ষ থেকে আন্তরিকতা নয়! বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! কিভাবে আমার শক্তি দুর্বল হবে না এবং আমার মাথা পিপাসার্ত হবে না? বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! কিভাবে আমি এমন কাজে উদ্যমী হবো না, যা আমার থেকে সেই পাপের আগুন নিভিয়ে দেয়? বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন।

হায় আফসোস! আমার পাপের স্মৃতি কেন আমার অলসতা দূর করে না এবং আমাকে কেন এমন কাজের দিকে উৎসাহিত করে না, যা তা আমার থেকে দূর করে দেয়?

বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! আমার ক্ষত কেন আমার হাতের উপার্জন দ্বারা সেরে ওঠে না? হায় আমার নফস! বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! আমার প্রথম পাপটি আমাকে পরবর্তী পাপ থেকে নিবৃত করে না, আর আমার শেষ পাপটি আমার প্রথম পাপের মন্দ পরিণতি স্মরণ করিয়ে দেয় না। সুতরাং দুর্ভোগ আমার, তারপর দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রবের ক্ষমা পূর্ণ না হয়। হায় আফসোস! আমার জিহ্বা, আমার শ্রবণশক্তি, আমার হৃদয় ও আমার দৃষ্টিশক্তি যা কিছু গ্রহণ করেছে, তার মধ্যে আমার অনেক ব্যস্ততা ছিল। সুতরাং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! যদি কিয়ামতের দিন আমাকে আমার রব থেকে আড়াল করা হয়, তিনি আমাকে পবিত্র না করেন, আমার দিকে না তাকান এবং আমার সাথে কথা না বলেন—সুতরাং আমি আমার রবের চেহারার নূরের আশ্রয় চাই আমার পাপ থেকে, আর তাঁর কাছে আশ্রয় চাই, যেন আমার আমলনামা আমার বাম হাতে বা আমার পিঠের পেছন দিক দিয়ে দেওয়া না হয়, যার কারণে আমার চেহারা কালো হয়ে যাবে এবং অন্ধত্বের সাথে আমার চোখ নীল হয়ে যাবে। বরং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। হায় আফসোস! কীসের মাধ্যমে আমি আমার রবের মুখোমুখি হবো? আমার জিহ্বা দিয়ে? নাকি হাত দিয়ে? নাকি কান দিয়ে? নাকি হৃদয় দিয়ে? নাকি দৃষ্টিশক্তি দিয়ে? এগুলোর প্রত্যেকটির বিষয়েই তাঁর কাছে আমার ব্যাপারে যুক্তি ও দাবি রয়েছে। সুতরাং দুর্ভোগ আমার, যদি আমার রব আমাকে দয়া না করেন। কিভাবে আমার পাপের স্মরণ আমাকে অনর্থক বিষয় থেকে দূরে রাখে না? আফসোস তোমার জন্য হে আমার নফস! কী হলো তোমার? তুমি যা ভুলে যাওয়া উচিত নয়, তা কেন ভুলে যাও না? অথচ তুমি এমন কাজ করেছো, যা করা উচিত নয়। আর এ সব কিছুই তোমার রবের কাছে এমন কিতাবে গণনা করা হচ্ছে, যা বিনষ্ট হবে না এবং পুরাতন হবে না। আফসোস তোমার জন্য! তুমি কি ভয় পাও না যে, যেদিন প্রত্যেক নফস যা করেছে, তার প্রতিদান পাবে, সেদিন তোমাকে তাদের মধ্যে শামিল করা হবে, যারা প্রতিদান পাচ্ছে? অথচ তুমি যা নশ্বর, তাকে তার উপর প্রাধান্য দিয়েছো, যা চিরস্থায়ী।

হে নফস! আফসোস তোমার জন্য! তুমি যে অবস্থায় আছো, তা থেকে কি তোমার হুঁশ ফিরবে না? অসুস্থ হলে তুমি অনুতপ্ত হও, আর সুস্থ হলে পাপ করো। কী হলো তোমার? দরিদ্র হলে তুমি চিন্তিত হও, আর সম্পদশালী হলে ফিতনায় পড়ো। কী হলো তোমার? যখন কর্মঠ হও, তখন দুনিয়ার প্রতি অনাসক্ত হও, অথচ যখন তোমাকে ডাকা হয়, তখন অলসতা করো? আমি দেখি তুমি কষ্ট করার আগেই আকাঙ্ক্ষা করো, তাহলে কেন তুমি আকাঙ্ক্ষার বিষয়ে কষ্ট করো না?

হে নফস! আফসোস তোমার জন্য! কেন তুমি বিপরীত আচরণ করো? দুনিয়ার বিষয়ে তুমি সংসারবিরাগীদের মতো কথা বলো, কিন্তু তাতে আকাঙ্ক্ষাকারীদের মতো কাজ করো। আফসোস তোমার জন্য! কেন তুমি মৃত্যুকে অপছন্দ করো? কেন তুমি নতি স্বীকার করো না? আর জীবনকে কেন ভালোবাসো? কেন তুমি কাজ করো না? হে নফস! আফসোস তোমার জন্য! তুমি কি আশা করো যে, তুমি খুশি হবে, অথচ তুমি (আল্লাহকে) খুশি করো না? তুমি এড়িয়ে চলো এবং অবাধ্যতা করো?

কী হলো তোমার? যখন তুমি চাও, তখন বেশি করে চাও, অথচ যখন ব্যয় করো, তখন কম করো? তুমি কি জীবন চাও? তাহলে কেন তুমি অতিরিক্ত বৃদ্ধির কারণে সতর্ক হও না? এবং কেন শুকরিয়া আদায় করো না? যখন তুমি চাও, তখন ভয়ের সময় অনেক বড় করে চাও, আর যখন তুমি কাজ করো, তখন আকাঙ্ক্ষার ক্ষেত্রে কম করে কাজ করো। তুমি কাজ ছাড়া আখিরাত চাও, আর দীর্ঘ আশা পূরণের জন্য তওবা বিলম্ব করো।

এমন হয়ো না যার সম্পর্কে বলা হয়, সে কথায় বীর, কিন্তু কাজে তার জন্য কঠিন। কিছু আদম সন্তান এমন যে, অসুস্থ হলে অনুতপ্ত হয়, আর সুস্থ হলে নিশ্চিন্ত থাকে। দরিদ্র হলে চিন্তিত হয়, আর সম্পদশালী হলে ফিতনায় পড়ে। কর্মঠ হলে অনাসক্ত হয়, আর আকাঙ্ক্ষা করলে অলসতা করে। সে কষ্ট করার আগেই আকাঙ্ক্ষা করে, কিন্তু আকাঙ্ক্ষিত বিষয়ে কষ্ট করে না। সে সংসারবিরাগীর মতো কথা বলে, কিন্তু আকাঙ্ক্ষাকারীর মতো কাজ করে। সে মৃত্যুকে অপছন্দ করে এমন কিছুর জন্য, যা সে ছাড়ে না, এবং জীবনকে ভালোবাসে এমন কিছুর জন্য, যা সে করে না। চাইলে বেশি করে চায়, আর ব্যয় করলে কম করে। সে জীবনের আশা করে, অথচ সতর্ক হয় না। সে বাড়তি চায়, অথচ কৃতজ্ঞতা প্রকাশ করে না। যখন সে চায়, তখন আকাঙ্ক্ষায় সর্বোচ্চ চেষ্টা করে, আর যখন কাজ করে, তখন আকাঙ্ক্ষার ক্ষেত্রে কম করে। সে কাজ ছাড়া প্রতিদানের আশা করে।

দুর্ভোগ আমাদের! আমরা কতোই না প্রতারিত! দুর্ভোগ আমাদের! আমরা কতোই না উদাসীন! দুর্ভোগ আমাদের! আমরা কতোই না অজ্ঞ! দুর্ভোগ আমাদের! কীসের জন্য আমরা সৃষ্ট হয়েছি? জান্নাতের জন্য নাকি জাহান্নামের জন্য? দুর্ভোগ আমাদের! কতো গুরুতর বিপদের মুখোমুখি আমরা! দুর্ভোগ আমাদের! এমন সব কাজ থেকে, যা আমাদের বিপদে ফেলে দিয়েছে! দুর্ভোগ আমাদের! আমাদের সাথে যা ইচ্ছা করা হচ্ছে! দুর্ভোগ আমাদের! যেন এ কাজগুলো আমাদের ছাড়া অন্য কারও জন্য। দুর্ভোগ আমাদের! যখন আমাদের মুখ বন্ধ করে দেওয়া হবে, আর আমাদের হাত কথা বলবে এবং পা সাক্ষ্য দেবে। দুর্ভোগ আমাদের! যখন আমাদের গোপন বিষয়গুলো তল্লাশি করা হবে। দুর্ভোগ আমাদের! যখন আমাদের দেহ সাক্ষ্য দেবে। দুর্ভোগ আমাদের! আমরা যা কিছুতে ত্রুটি করেছি—আমাদের কোনো নির্দোষিতার প্রমাণ নেই, আমাদের কাছে কোনো অজুহাত নেই। দুর্ভোগ আমাদের! কতোই না দীর্ঘ আমাদের আশা! দুর্ভোগ আমাদের! যখন আমরা আমাদের সৃষ্টিকর্তার দিকে যাবো। দুর্ভোগ আমাদের! এবং আমাদের জন্য দীর্ঘস্থায়ী ধ্বংস, যদি আমাদের রব আমাদেরকে দয়া না করেন। সুতরাং হে আমাদের রব! তুমি আমাদের দয়া করো।

হে রব! তুমি কতোই না মহাবিচারক, কতোই না মহান, কতোই না দয়ালু, কতোই না স্নেহময়, কতোই না করুণাময়, কতোই না সুউচ্চ, কতোই না নিকটবর্তী, কতোই না ক্ষমতাবান, কতোই না পরাক্রমশালী, কতোই না প্রশস্ত, কতোই না চূড়ান্ত বিচারক, কতোই না সুস্পষ্ট, কতোই না আলোকোজ্জ্বল, কতোই না সূক্ষ্মদর্শী, কতোই না সর্বজ্ঞ, কতোই না জ্ঞানী, কতোই না কৃতজ্ঞতা গ্রহণকারী, কতোই না সহনশীল, কতোই না প্রজ্ঞাময়, কতোই না স্নেহশীল, কতোই না সম্মানিত।

হে রব! কতোই না সমুন্নত তোমার প্রমাণ, কতোই না বেশি তোমার প্রশংসা। হে রব! কতোই না সুস্পষ্ট তোমার কিতাব, কতোই না কঠোর তোমার শাস্তি। হে রব! কতোই না সম্মানিত তোমার প্রত্যাবর্তনস্থল, কতোই না উত্তম তোমার পুরস্কার। হে রব! কতোই না মহৎ তোমার দান, কতোই না মহান তোমার স্তুতি। হে রব! কতোই না সুন্দর তোমার পরীক্ষা, কতোই না পূর্ণ তোমার নিয়ামতরাজি। হে রব! কতোই না উচ্চ তোমার স্থান, কতোই না বিরাট তোমার সার্বভৌমত্ব। হে রব! কতোই না সুদৃঢ় তোমার কৌশল, কতোই না বিজয়ী তোমার চক্রান্ত। হে রব! কতোই না সম্মানিত তোমার রাজত্ব, কতোই না সুসম্পন্ন তোমার আদেশ। হে রব! কতোই না বিশাল তোমার আরশ, কতোই না কঠোর তোমার আঘাত। হে রব! কতোই না প্রশস্ত তোমার কুরসি, কতোই না হেদায়েতদানকারী তোমার পথপ্রদর্শক। হে রব! কতোই না প্রশস্ত তোমার রহমত, কতোই না প্রশস্ত তোমার জান্নাত। হে রব! কতোই না শক্তিশালী তোমার সাহায্য, কতোই না নিকটবর্তী তোমার বিজয়। হে রব! কতোই না আবাদ তোমার শহরগুলো, কতোই না বেশি তোমার বান্দা। হে রব! কতোই না প্রশস্ত তোমার রিযিক, কতোই না বেশি তোমার কৃতজ্ঞতা। হে রব! কতোই না দ্রুত তোমার মুক্তি, কতোই না নিখুঁত তোমার সৃষ্টি। হে রব! কতোই না দয়ালু তোমার কল্যাণ, কতোই না শক্তিশালী তোমার আদেশ। হে রব! কতোই না উজ্জ্বল তোমার ক্ষমা, কতোই না মহান তোমার স্মরণ। হে রব! কতোই না ন্যায়সঙ্গত তোমার হুকুম, কতোই না সত্য তোমার বাণী। হে রব! কতোই না পূর্ণ তোমার প্রতিশ্রুতি, কতোই না বাস্তবায়িত তোমার অঙ্গীকার। হে রব! কতোই না উপস্থিত তোমার উপকার, কতোই না সুনিপুণ তোমার নির্মাণ।

হায় আফসোস! কিভাবে আমি অমনোযোগী থাকি, অথচ আমার থেকে অমনোযোগী হওয়া হয় না? অথবা, কিভাবে আমার জীবনযাত্রা স্বস্তিদায়ক হবে, অথচ ভারী দিবস আমার পেছনে? অথবা, কিভাবে আমার দুশ্চিন্তা দীর্ঘ হবে না, অথচ আমার সাথে কী করা হবে, তা আমি জানি না? অথবা, কিভাবে আমার জীবন স্বস্তিদায়ক হবে, অথচ আমার মৃত্যু কখন, তা আমি জানি না? অথবা, কিভাবে আমার আকাঙ্ক্ষা তাতে তীব্র হবে, অথচ সামান্যই আমার জন্য যথেষ্ট? অথবা, কিভাবে আমি নিরাপদ থাকবো, অথচ তাতে আমার অবস্থা স্থায়ী নয়? অথবা, কিভাবে এমন ঘরের প্রতি আমার ভালোবাসা তীব্র হবে, যা আমার ঘর নয়? অথবা, কিভাবে আমি তার জন্য সম্পদ জমা করবো, অথচ আমার বিশ্রাম অন্য কোথাও? অথবা, কিভাবে তার প্রতি আমার লোভ তীব্র হবে, অথচ আমার পরে যা রেখে যাবো, তা আমার কোনো উপকারে আসবে না? অথবা, কিভাবে আমি তাকে প্রাধান্য দেবো, অথচ সে আমার পূর্বের প্রাধান্যদাতাদের ক্ষতি করেছে? অথবা, কিভাবে আমি তওবার দরজা বন্ধ হওয়ার আগে নেক কাজ শুরু করবো না? অথবা, কিভাবে আমি এমন বিষয়ে মুগ্ধ হবো, যা আমাকে ছেড়ে চলে যাবে এবং আমার থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যাবে? অথবা, কিভাবে আমি আমার হিসাবের বিষয়ে উদাসীন থাকবো, অথচ তা আমাকে ছায়া করে ফেলেছে এবং আমার নিকটে চলে এসেছে? অথবা, কিভাবে আমি আমার কাজ এমন কিছুর মধ্যে রাখবো, যার দায়িত্ব তিনি আমার জন্য নিয়েছেন? অথবা, কিভাবে আমি আমার পাপের পুনরাবৃত্তি করবো, অথচ আমার আমল আমার সামনে পেশ করা হচ্ছে? অথবা, কিভাবে আমি আমার রবের আনুগত্যের কাজ করবো না, অথচ তার মধ্যেই রয়েছে সেই বিপদ থেকে মুক্তি, যা থেকে আমি নিজেকে ভয় পাই? অথবা, কিভাবে আমার কান্না বেশি হবে না, অথচ আমার সাথে কী করা হবে, তা আমি জানি না? অথবা, কিভাবে আমার মন স্থির থাকবে, যখন আমার অতীত পাপের কথা মনে পড়ে? অথবা, কিভাবে আমি নিজেকে এমন কিছুর সামনে পেশ করবো, যা সহ্য করার শক্তি আমার নেই? অথবা, কিভাবে আমার আতঙ্ক তীব্র হবে না, যা থেকে আমার অস্থিরতা তীব্র হয়? অথবা, কিভাবে আমার মন ভালো থাকবে, যখন আমি আমার সামনের কথা স্মরণ করি? অথবা, কিভাবে আমার আশা দীর্ঘ হবে, অথচ মৃত্যু আমার পেছনে? অথবা, কিভাবে আমি আমার রবের প্রতি খেয়াল রাখবো না, অথচ তিনি আমাকে সুন্দরভাবে সন্ধান করছেন?

হায় আফসোস! আমার গাফলতি কি আমি ছাড়া অন্য কারও ক্ষতি করেছে? অথবা, আমি যদি আমার অংশ নষ্ট করি, তবে কি অন্য কেউ আমার জন্য কাজ করবে? অথবা, আমার কাজ কি আমার নফস ছাড়া অন্য কারও জন্য হবে? তবে কেন আমি আমার নফসের জন্য এমন কিছু সঞ্চয় করি না, যার উপকার আমার জন্য হবে?

হায় আফসোস! যেন আমার মেয়াদ শেষ হয়ে গেছে, তারপর আমার রব আমাকে পুনর্বার সৃষ্টি করেছেন, যেমন প্রথমবার শুরু করেছিলেন। তারপর তিনি আমাকে দাঁড় করিয়েছেন এবং প্রশ্ন করেছেন—এবং তিনি আমার সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি জানেন। তারপর সেই ঘটনাটি প্রত্যক্ষ করেছি, যা আমাকে আমার প্রিয়জন ও পরিবার থেকে ভুলিয়ে দিয়েছে। আমি অন্য সবকিছু ছেড়ে নিজের কাজে ব্যস্ত হয়ে পড়েছি। আকাশ ও পৃথিবী বদলে গেছে, অথচ তারা তাঁর আনুগত্য করত, আর আমি অবাধ্যতা করতাম; পর্বতগুলোকে চালিত করা হয়েছে, অথচ তাদের আমার পাপের মতো কোনো পাপ নেই; সূর্য ও চাঁদকে একত্রিত করা হয়েছে, অথচ তাদের উপর আমার হিসাবের মতো কোনো হিসাব নেই; নক্ষত্ররা খসে পড়েছে, অথচ তারা আমার কাছে যা আছে, তার দাবিদার ছিল না; বন্যপ্রাণীদের একত্রিত করা হয়েছে, অথচ তারা আমার মতো কাজ করেনি; আর নবজাতক শিশু বৃদ্ধ হয়ে গেছে, অথচ সে আমার চেয়ে কম পাপী।

হায় আফসোস! কতোই না কঠিন আমার অবস্থা এবং কতোই না বিরাট আমার বিপদ! সুতরাং তুমি আমাকে ক্ষমা করো এবং তোমার আনুগত্যকে আমার প্রধান উদ্দেশ্য বানিয়ে দাও। আর তার উপর আমার দেহকে শক্তি দাও। দুনিয়া থেকে আমার নফসকে অসন্তুষ্ট করে দাও এবং আমাকে সেই কাজে ব্যস্ত করো, যা আমার উপকারে আসে। আমার শক্তিতে তুমি বরকত দাও, যতক্ষণ না আমার বর্তমান অবস্থা শেষ হয়। আর সাক্ষাতের পর যখন তুমি আমাকে পুনর্বার সৃষ্টি করবে, তখন আমার প্রতি অনুগ্রহ করো এবং আমাকে দয়া করো। এবং হিসাবের দিনের মন্দ থেকে আমাকে রক্ষা করো, যেদিন তুমি আমাকে পুনরুত্থিত করবে এবং আমার হিসাব নেবে। সেদিন আমার অতীত জুলুম ও অপরাধের জন্য আমাকে তোমার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিও না। যেদিন মহাবিপর্যয় হবে, সেদিন আমাকে নিরাপত্তা দাও, যেদিন আমি শুধু নিজের জন্যই চিন্তিত হবো। আর সেদিন আমার আমলের উপকার আমাকে দান করো, যেদিন অন্য কারও আমল আমার কোনো উপকারে আসবে না।

হে আমার ইলাহ! তুমিই আমাকে সৃষ্টি করেছো, জরায়ুতে আমার আকৃতি দান করেছো, এবং মুশরিকদের পৃষ্ঠদেশ থেকে প্রজন্ম থেকে প্রজন্মান্তরে আমাকে এমন উম্মতের মধ্যে বের করেছো, যাদের প্রতি দয়া করা হয়েছে। হে আমার ইলাহ! সুতরাং তুমি আমাকে দয়া করো। হে আমার ইলাহ! তুমি যেমন ইসলামের মাধ্যমে আমার প্রতি অনুগ্রহ করেছো, তেমনি তুমি আমাকে তোমার আনুগত্যের মাধ্যমে অনুগ্রহ করো, এবং যতদিন তুমি আমাকে বাঁচিয়ে রাখো, ততদিন তোমার অবাধ্যতা ত্যাগ করার তাওফিক দাও। তুমি আমার গোপন বিষয়গুলো ফাঁস করে দিও না এবং আমার বহু অপকর্মের কারণে আমাকে ত্যাগ করো না।

তুমি পবিত্র হে আমার সৃষ্টিকর্তা! আমি সেই ব্যক্তি যে সর্বদা তোমার অবাধ্যতা করেছে, তাই আমার পাপের কারণে আমার চোখ স্থির হয় না। তুমি যদি আমাকে ক্ষমা না করো, তবে আমি ধ্বংস হয়ে যাবো। তুমি পবিত্র হে আমার সৃষ্টিকর্তা! কোন মুখ নিয়ে আমি তোমার সাথে সাক্ষাৎ করব? কোন পায়ে ভর করে তোমার সামনে দাঁড়াবো? কোন জিহ্বা দিয়ে তোমার সাথে কথা বলব? কোন চোখ দিয়ে তোমার দিকে তাকাবো? অথচ তুমি আমার সব গোপন বিষয় জানো। তুমি যখন আমার মুখে মোহর মেরে দেবে এবং আমার অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ আমার কৃতকর্মের সব কথা বলবে, তখন আমি কিভাবে তোমার কাছে ক্ষমা চাইব?

তুমি পবিত্র হে আমার সৃষ্টিকর্তা! আমি তোমার কাছে তওবাকারী ও প্রত্যাশী; সুতরাং আমার তওবা কবুল করো, আমার দুআ কবুল করো, আমার যৌবনের প্রতি দয়া করো, আমার পদস্খলন মাফ করো, আমার দীর্ঘ কান্নার প্রতি দয়া করো এবং আমার কৃতকর্মের কারণে আমাকে লাঞ্ছিত করো না।

তুমি পবিত্র হে আমার সৃষ্টিকর্তা! তুমিই বিপদগ্রস্তদের আশ্রয়স্থল, ইবাদতকারীদের চোখের শীতলতা এবং দুনিয়াত্যাগীদের হৃদয়ের প্রিয়জন। সুতরাং তোমার কাছেই আমার আশ্রয় ও শেষ ভরসা। তুমি আমার যৌবনের প্রতি দয়া করো, আমার তওবা কবুল করো, আমার দুআ মঞ্জুর করো এবং আমার কৃত অবাধ্যতার কারণে আমাকে বিফল করো না। হে আমার ইলাহ! তুমি তোমার রাসূল মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর যে কিতাব নাযিল করেছো, তা আমাকে শিক্ষা দিয়েছো। এরপরও আমি তোমার অবাধ্যতার মধ্যে পড়েছি, আর তুমি আমাকে দেখছো। তুমি আমাকে দেখতে পাচ্ছো, এই অবস্থায় আমি যদি তোমার অবাধ্যতা করি, তবে আমার চেয়ে হতভাগা আর কে আছে? আর তোমার নাযিল করা কিতাবে তুমি আমাকে নিষেধ করেছো। হে আমার ইলাহ! যখন আমি আমার পাপ ও অবাধ্যতার কথা স্মরণ করি, তখন আমার কৃতকর্মের জন্য আমার চোখ স্থির হয় না। সুতরাং আমি তোমার কাছে তওবাকারী, তুমি আমার এই তওবা কবুল করো। তোমার প্রতি আমার তাওহীদ ও ঈমানের পর তুমি আমাকে জাহান্নামের আগুনের জ্বালানী করো না। সুতরাং তোমার রহমতের মাধ্যমে আমাকে, আমার পিতামাতাকে এবং সকল মুসলিমকে ক্ষমা করো। আমীন, হে রাব্বুল আলামীন।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5457)


• حدثنا أبو أحمد محمد بن أحمد ثنا الحسن بن سفيان ثنا حيان بن موسى ثنا سهل بن علي. قال كتب عون بن عبد الله إلى ابنه: يا بني ح.

وحدثنا عبد الله بن محمد ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم عن يحيى بن معين ثنا حجاج أنبأنا المسعودي عن عون بن عبد الله. أنه قال لابنه: يا بني كن ممن نأيه عمن نأى عنه يقين ونزاهة، ودنوه ممن دنا منه لين ورحمة، ليس نأيه بكبر ولا بعظمة ولا دنوه خداع ولا خلابة، يقتدي بمن قبله فهو إمام لمن بعده، ولا يعزب(1) علمه، ولا يحضر جهله، ولا يعجل فيما رابه، ويعفو فيما يتبين له، يغمض في الذي له، ويزيد في الحق الذي عليه. والخير منه مأمول، والشر منه مأمون، إن كان مع الغافلين كتب من الذاكرين، وإن كان مع الذاكرين لم يكتب من الغافلين. لا يغره ثناء من جهله، ولا ينسى إحصاء ما قد علمه، إن زكي خاف ما يقولون واستغفر لما لا يعلمون، يقول أنا أعلم بي من غيري، وربي أعلم بي من نفسي، فهو يستبطئ نفسه في العمل، ويأتي ما يأتي من الأعمال الصالحة على وجل، يظل يذكر ويمسي وهمه أن يشكر، يبيت حذرا، ويصبح فرحا، حذرا لما حذر من الغفلة، وفرحا لما أصاب من الغنيمة والرحمة، إن عصته نفسه فيما يكره لم يطعها فيما أحبت، فرغبته فيما يخلد، وزهادته فيما ينفد، يمزج العلم بالحلم، ويصمت ليسلم، وينطق ليفهم، ويخلو
ليغنم، ويخالق ليعلم، لا ينصت لخير حين ينصت وهو يسهو، ولا يستمع له وهو يلغو، لا يحدث أمانته الأصدقاء، ولا يكتم شهادته الأعداء، ولا يعمل من الخير شيئا رياء، ولا يترك منه شيئا حياء، مجالس الذكر مع الفقراء أحب إليه من مجالس اللهو مع الأغنياء.

ولا تكن يا بني ممن يعجب باليقين من نفسه فيما ذهب، وينسى اليقين فيما رجا وطلب، يقول فيما ذهب لو قدر شيء لكان، ويقول فيما بقي ابتغ(1) أيها الإنسان، شاخصا غير مطمئن، ولا يثق من الرزق بما قد ضمن. لا تغلبه نفسه على ما يظن، ولا يغلبها على ما يستيقن، فهو من نفسه في شك، ومن ظنه إن لم يرحم في هلك، إن سقم ندم، وإن صح أمن، وإن افتقر حزن، وإن استغنى افتتن، وإن رغب كسل، وإن نشط زهد، يرغب قبل أن ينصب، ولا ينصب فيما يرغب، يقول لم أعمل فأتعنى، بل أجلس فأتمنى، يتمنى المغفرة ويعمل بالمعصية، كان أول عمره غفلة وغرة، ثم أبقي واقيل العثرة، فاذا فى آخره كسل وفترة، طال عليه الأمل فافتتن، وطال عليه الأمد فاغتر، واعذر اليه فيما عمر، وليس فيما أعمر بمعذر، عمر ما يتذكر فيه من تذكر، فهو من الذنب والنعمة موقر، أن اعطى من ليشكر(2)، أو ان منع قال لم يقدر، أساء العبد واستأثر، يرجو النجاة ولم يحذر، ويبتغى الزيادة ولم يشكر، حق أن يشكر وهو أحق أن لا يعذر، يتكلف ما لم يؤمر، ويضيع ما هو أكثر، إن يسأل أكثر، وإن أنفق قتر، يسأل الكثير، وينفق اليسير، قدر له خير من قدره لنفسه فوسع له رزقه، وخفف حسابه؛ فأعطي ما يكفيه ومنع ما يلهيه، فليس يرى شيئا يغنيه، دون غنى يطغيه، يعجز عن شكر ما أوتي، ويبتغي الزيادة فيما بقي، يستبطئ نفسه في شكر ما أوتي، وينسى ما عليه من الشكر فيما وفى، ينهى فلا ينتهي، ويأمر بما لا يأتي، يهلك فى بغضه ويقصر في حبه، غره من نفسه حبه ما ليس عنده، وبغضه على ما عنده مثله، يحب الصالحين فلا يعمل أعمالهم، ويبغض المسيئين وهو أحدهم، يرجو
الآخرة فى البغض على ظنه، ولا يخشى المقت في اليقين من نفسه، لا يقدر في الدنيا على ما يهوى، ولا يقبل من الآخرة ما يبقى، يبادر من الدنيا ما يفنى ويترك من الآخرة ما يبقى. إن عوفي حسب أنه قد تاب، وان ابتلي عاد.

يقول في الدنيا قول الزاهدين، ويعمل فيها عمل الراغبين، يكره الموت لا ساءته، ولا ينتهي عن الإساءة في حياته، يكره الموت لما لا يدع، ويحب الحياة لما لا يصنع، إن منع من الدنيا لم يقنع، وان اعطى منها لم يشبع، وإن عرضت الشهوة قال يكفيك العمل فواقع، وإن عرض له العمل كسل وقال يكفيك الورع. لا تذهب مخافته الكسل، ولا تبعثه رغبته على العمل. يرجو الأجر بغير عمل، ويؤخر التوبة لطول الأمل، ثم لا يسعى فيما له خلق، ورغبته فيما تكفل له من الرزق، وزهادته فيما أمر به من العمل، ويتفرغ لما فرغ له من الرزق، يخشى الخلق في ربه، ولا يخشى الرب في خلقه، يعوذ بالله ممن هو فوقه، ولا يعيذ بالله من هو تحته، يخشى الموت، ولا يرجو الفوت؛ يأمن ما يخشى وقد أيقن به؛ ولا ييأس مما يرجو وقد تيقن منه؛ يرجو نفع علم لا يعمل به، ويأمن ضر جهل قد أيقن به، يسخر بمن تحته من الخلق؛ وينسى ما عليه فيه من الحق، ينظر إلى من هو فوقه في الرزق، وينسى من تحته من الخلق، يخاف على غيره بأدنى من ذنبه، ويرجو لنفسه بأيسر من عمله، يبصر العورة من غيره ويغفلها من نفسه، إن ذكر اليقين قال ما هكذا من كان قبلكم، فإن قيل أفلا تعمل أنت عملهم؛ يقول: من يستطيع أن يكون مثلهم.

فهو للقول مدل، ويستصعب عليه العمل، يرى الأمانة ما عوفي وأرضى، والخيانة أن اسخط وأبتلى، يلين ليحسب عنده أمانة فهو يرصدها للخيانة، يتعلم للصداقة ما يرصد به للعداوة، يستعجل بالسيئة وهو في الحسنة بطيء، يخف عليه الشعر، ويثقل عليه الذكر، اللغو مع الأغنياء أحب إليه من الذكر مع الفقراء، يتعجل النوم ويؤخر الصوم، فلا يبيت قائما ولا يصبح صائما، ويصبح وهمه التصبح من النوم ولم يسهر، وبمشى وهمه العشاء وهو مفطر - زاد الحجاج عن المسعودي في روايته - إن صلى اعترض، وإن ركع ربض،
وإن سجد نقر، وإن سأل ألحف، وإن سئل سوف، وإن حدث حلف، وإن حلف حنث، وإن وعد أخلف، وإن وعظ كلح، وإن مدح فرح، طلبه شر، وتركه وزر، ليس له في نفسه عن عيب الناس شغل، وليس لها في الإحسان فضل، يميل لها ويحب لها. منهم العدل، أهل الخيانة له بطانة، وأهل الأمانة له عداوة، إن سلم لم يسمع، وإن سمع لم يرجع، ينظر نظر الحسدود، ويعرض إعراض الحقود، يسخر بالمقتر، ويأكل بالمدبر، ويرضي الشاهد بما ليس في نفسه، ويسخط الغائب بما لا يعلم فيه، جريء على الخيانة، برئ من الأمانة، من أحب كذب، ومن أبغض خلب، يضحك من غير العجب، ويمشي في غير الأدب، لا ينجو منه من جانب، ولا يسلم منه من صاحب، إن حدثته ملك، وإن حدثك غمك، وإن سؤته سرك، وإن سررته ضرك، وإن فارقته أكلك، وإن باطنته فجعك، وإن تابعته بهتك، وإن وافقته حسدك، وإن خالفته مقتك، يحسد أن يفضل، ويزهد أن يفضل، يحسد من فضله، ويزهد أن يعمل عمله، يعجز عن مكافأة من أحسن إليه، ويفرط فيمن بغى عليه، لا ينصت فيسلم، ويتكلم بما لا يعلم، يغلب لسانه قلبه، ولا يضبط قلبه قوله، يتعلم للمراء، وينفقه للرياء، ويظهر الكبرياء، فيظهر منه ما أخفى، ولا يخفي منه ما أبدى، يبادر ما يفنى، ويواكل ما يبقى، يبادر بالدنيا، ويواكل بالتقوى.




আওন ইবন আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পুত্রকে বললেন:

হে আমার পুত্র! তুমি এমন ব্যক্তিদের অন্তর্ভুক্ত হও, যার থেকে মানুষ দূরে সরে যায় সে যেন নিশ্চিত শুদ্ধতা ও পবিত্রতার কারণে দূরে থাকে, আর যে তার কাছে আসে, সে যেন নম্রতা ও দয়ার কারণে আসে। তার দূরে থাকা যেন অহংকার বা গর্বের কারণে না হয়, আর তার কাছে আসা যেন ধোঁকা বা প্রতারণার কারণে না হয়। সে তার পূর্ববর্তীদের অনুসরণ করে এবং সে তার পরবর্তী প্রজন্মের জন্য ইমাম (নেতা)। তার জ্ঞান যেন গোপন না থাকে এবং তার মূর্খতা যেন উপস্থিত না হয়। যে বিষয়ে সে সন্দেহ করে, তাতে সে তাড়াহুড়ো করে না, আর যে বিষয়ে সে স্পষ্ট প্রমাণ পায়, তাতে ক্ষমা করে দেয়। নিজের প্রাপ্য বিষয়ে সে শিথিলতা দেখায়, আর তার উপর যে হক রয়েছে, তাতে বাড়িয়ে দেয়। তার কাছ থেকে কল্যাণ আশা করা যায় এবং তার পক্ষ থেকে অকল্যাণ থেকে মানুষ নিরাপদ থাকে।

যদি সে গাফিলদের (অসতর্কদের) সাথে থাকে, তবে তাকে আল্লাহকে স্মরণকারীদের (যিকিরকারী) অন্তর্ভুক্ত করা হয়, আর যদি সে যিকিরকারীদের সাথে থাকে, তবে তাকে গাফিলদের অন্তর্ভুক্ত করা হয় না। যারা তাকে জানে না তাদের প্রশংসা তাকে প্রতারিত করে না, আর যে বিষয়ে সে জানে, তার হিসাব সে ভুলে যায় না। যদি তার প্রশংসা করা হয়, তবে সে তাদের কথাকে ভয় করে এবং (তাদের কাছে) যা অজানা তার জন্য ক্ষমা চায়। সে বলে: আমি অন্য কারো চেয়ে আমাকে বেশি জানি, আর আমার রব আমার নিজের চেয়েও আমাকে বেশি জানেন।

ফলে সে আমল করতে গিয়ে নিজেকে ধীর মনে করে এবং যে সৎকাজই করে তা ভীতির সাথে করে। সে দিনভর আল্লাহকে স্মরণ করে এবং সন্ধ্যা করে এই চিন্তায় যে সে যেন শুকরিয়া আদায় করতে পারে। সে সতর্ক অবস্থায় রাত কাটায় এবং প্রফুল্ল অবস্থায় সকাল করে; সতর্ক থাকে কারণ সে গাফিলতির বিষয়ে সতর্ক হয়েছে, আর আনন্দিত থাকে কারণ সে গনীমত (কল্যাণ) ও রহমত (দয়া) লাভ করেছে। যদি তার নফস (প্রবৃত্তি) অপছন্দনীয় বিষয়ে তার অবাধ্য হয়, তবে সে পছন্দের বিষয়েও তার অনুসরণ করে না। সে চিরস্থায়ী বিষয়ে আগ্রহী, আর যা ধ্বংসশীল তাতে নিরাসক্ত। সে জ্ঞানকে সহনশীলতার সাথে মিশিয়ে দেয়। সে নীরব থাকে যাতে নিরাপদ থাকতে পারে, কথা বলে যাতে অন্যেরা বুঝতে পারে, একাকী থাকে যাতে লাভবান হতে পারে, আর মানুষের সাথে মিশে যাতে শিখতে পারে। সে যখন নীরব থাকে, তখন অসতর্ক অবস্থায় কল্যাণের দিকে মনোযোগ দেয় না, আর যখন বাজে কথায় লিপ্ত থাকে তখনও কল্যাণ শোনে না। সে তার বিশ্বস্ততার কথা বন্ধুদের কাছেও প্রকাশ করে না, আর শত্রুদের সামনেও তার সাক্ষ্য গোপন করে না। সে লোক দেখানোর জন্য কোনো সৎকাজ করে না, আর লজ্জার কারণে কোনো সৎকাজ ত্যাগও করে না। ধনীদের সাথে আমোদ-প্রমোদের মজলিসের চেয়ে দরিদ্রদের সাথে যিকিরের মজলিস তার কাছে অধিক প্রিয়।

আর হে আমার পুত্র, তুমি এমন ব্যক্তিদের অন্তর্ভুক্ত হয়ো না, যে বিষয়ে চলে গেছে সে বিষয়ে নিজের ইমান (দৃঢ় বিশ্বাস) নিয়ে আত্মতৃপ্ত হয়, অথচ যে বিষয়ে আশা করে বা কামনা করে, তাতে ইমান (দৃঢ়তা) ভুলে যায়। যা ঘটে গেছে, সে সম্পর্কে সে বলে: যদি কোনো কিছু নির্ধারিত থাকত, তবে তা ঘটত। আর যা অবশিষ্ট আছে, সে সম্পর্কে সে বলে: হে মানুষ, খোঁজ করো! সে উদগ্রীব থাকে, সন্তুষ্ট থাকে না, এবং যে রিযিক (জীবিকা) নিশ্চিত করা হয়েছে, তাতেও সে ভরসা রাখে না। তার নফস যেন তাকে তার ধারণার উপর জয়ী না করে, আর সে যেন নিশ্চিত বিশ্বাসের উপর তার নফসকে জয়ী না করে। ফলে সে নিজের সম্পর্কে সন্দেহে থাকে, এবং আল্লাহ যদি দয়া না করেন, তবে তার ধারণা তাকে ধ্বংসের দিকে নিয়ে যায়। যদি সে অসুস্থ হয় তবে অনুতপ্ত হয়, আর যদি সুস্থ হয় তবে (পরকাল নিয়ে) নিশ্চিন্ত হয়ে যায়। যদি সে দরিদ্র হয় তবে দুঃখিত হয়, আর যদি ধনী হয় তবে ফিতনায় (পরীক্ষায়) জড়িয়ে পড়ে। যদি সে কোনো কিছুর প্রতি আগ্রহ দেখায় তবে অলসতা করে, আর যদি কর্মে চঞ্চল হয় তবে তাতে অনাসক্তি দেখায়। কষ্ট করার আগেই সে আগ্রহ প্রকাশ করে, কিন্তু যে বিষয়ে আগ্রহ দেখায় তাতে কষ্ট করে না। সে বলে: আমি আমল করিনি যে কষ্ট পাব, বরং আমি বসে শুধু আশা করি। সে মাগফিরাত (ক্ষমা) কামনা করে অথচ গুনাহের কাজ করে। তার জীবনের শুরু ছিল গাফিলতি ও উদাসীনতা দিয়ে। এরপর তাকে বাঁচিয়ে রাখা হলো এবং তার পদস্খলন ক্ষমা করা হলো। কিন্তু যখন জীবনের শেষ পর্যায়ে এলো, তখন দেখা গেল অলসতা ও দুর্বলতা। তার আশা দীর্ঘ হলো, ফলে সে ফিতনায় পড়ল। তার জীবনকাল দীর্ঘ হলো, ফলে সে প্রতারিত হলো। যে সময় সে বেঁচে ছিল তার জন্য তার কাছে ক্ষমা চাওয়া হলো, কিন্তু যে কারণে তাকে বাঁচিয়ে রাখা হলো তাতে তার কোনো অজুহাত গ্রহণযোগ্য নয়। তাকে এমন জীবনকাল দেওয়া হয়েছিল যেন সে স্মরণ করতে পারত। কিন্তু সে গুনাহ ও নেয়ামতকে ভারী করে তুলল। যদি তাকে দেওয়া হয়, সে শুকরিয়া আদায় করতে পারে না। আর যদি তাকে বঞ্চিত করা হয়, সে বলে: এটা আমার ভাগ্যে লেখা ছিল না। বান্দা খারাপ কাজ করে এবং নিজেকে শ্রেষ্ঠ মনে করে। সে নাজাত (মুক্তি) কামনা করে অথচ সতর্ক হয় না, এবং অধিক চায় কিন্তু শুকরিয়া করে না। তার উচিত ছিল শুকরিয়া করা, অথচ তার কোনো অজুহাতই গ্রহণযোগ্য নয়। তাকে যা আদেশ করা হয়নি, সে তা নিয়ে বাড়াবাড়ি করে, আর যা অধিক গুরুত্বপূর্ণ তা নষ্ট করে। যদি সে প্রশ্ন করে তবে বেশি করে, আর যদি সে খরচ করে তবে কৃপণতা করে। সে বেশি চায়, আর খরচ করে সামান্য।

তার জন্য যা নির্ধারিত হয়েছে, তা তার নিজের নির্ধারিত বিষয়ের চেয়ে উত্তম। তাই তার রিযিক প্রশস্ত করা হয়েছে এবং তার হিসাব হালকা করা হয়েছে। তাকে তা-ই দেওয়া হয়েছে যা তার জন্য যথেষ্ট, আর যা তাকে গাফিল করে তা থেকে তাকে বঞ্চিত করা হয়েছে। সে এমন কিছুকে যথেষ্ট মনে করে না যা তাকে ধনী করে, এমন প্রাচুর্য ছাড়া যা তাকে উদ্ধত করে তুলবে না। সে যা পেয়েছে তার শুকরিয়া আদায়ে অক্ষম হয়, অথচ যা অবশিষ্ট আছে তাতে আরও বাড়াতে চায়। সে যা পেয়েছে তার শুকরিয়া আদায়ে নিজেকে ধীর মনে করে, আর যে বিষয়ে সে দায়িত্বশীল তার শুকরিয়ার কথা ভুলে যায়। সে নিষেধ করে কিন্তু নিজে বিরত হয় না, এবং এমন কাজের আদেশ দেয় যা সে নিজে করে না। সে তার বিদ্বেষে ধ্বংস হয়, আর তার ভালোবাসায় ত্রুটি করে। নিজের কাছে যা নেই তা ভালোবাসার মাধ্যমে এবং নিজের কাছে যা আছে তার প্রতি বিদ্বেষ পোষণ করার মাধ্যমে সে প্রতারিত হয়। সে নেককারদের ভালোবাসে কিন্তু তাদের কাজ করে না, আর মন্দ কাজকারীদের ঘৃণা করে অথচ সে তাদেরই একজন। সে তার ধারণা অনুসারে বিদ্বেষ পোষণ করে আখিরাতের আশা করে, আর নিজের ব্যাপারে নিশ্চিত জ্ঞান থাকা সত্ত্বেও আল্লাহর অসন্তুষ্টিকে ভয় করে না। দুনিয়াতে যা কামনা করে তা সে অর্জন করতে পারে না, আর আখিরাতের যা অবশিষ্ট থাকবে তা গ্রহণ করতে চায় না। সে ক্ষণস্থায়ী দুনিয়াবি বিষয়ের দিকে দ্রুত ধাবিত হয় এবং চিরস্থায়ী আখিরাতের বিষয় ত্যাগ করে। যদি তাকে সুস্থতা দেওয়া হয়, সে মনে করে সে তওবা করেছে, আর যদি পরীক্ষায় ফেলা হয়, সে আবার আগের অবস্থায় ফিরে যায়।

সে দুনিয়াতে নিরাসক্তদের মতো কথা বলে, আর তাতে আগ্রহীদের মতো কাজ করে। সে মৃত্যুকে অপছন্দ করে খারাপ কাজের কারণে নয়, বরং জীবদ্দশায় মন্দ কাজ করা থেকে বিরত হয় না। সে মৃত্যুকে অপছন্দ করে এই কারণে যে সে কী ছেড়ে যাবে, আর জীবনকে ভালোবাসে এই কারণে যে সে কী করতে পারবে না। যদি তাকে দুনিয়া থেকে বঞ্চিত করা হয়, সে সন্তুষ্ট হয় না, আর যদি তাকে দেওয়া হয়, সে তৃপ্ত হয় না। যখন তার কাছে কামনা-বাসনা আসে, সে বলে: তোমাকে আমল (কাজ) যথেষ্ট, তাই তুমি প্রবৃত্ত হও। আর যখন তার কাছে কাজের সুযোগ আসে, সে অলসতা করে এবং বলে: তোমাকে তাকওয়া (পরহেজগারী) যথেষ্ট। তার ভয় তার অলসতাকে দূর করে না, আর তার আগ্রহ তাকে কাজে উদ্বুদ্ধ করে না। সে আমল ছাড়াই সওয়াবের আশা করে, আর দীর্ঘ আশার কারণে তওবাকে বিলম্বিত করে। এরপর সে সে বিষয়ে চেষ্টা করে না যার জন্য তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে, বরং যে রিযিকের দায়িত্ব নেওয়া হয়েছে তাতে তার আগ্রহ থাকে, আর যে কাজের আদেশ করা হয়েছে তাতে তার নিরাসক্তি থাকে। আর যে রিযিক তার জন্য নির্ধারিত হয়েছে, সে তার জন্য নিজেকে মুক্ত করে রাখে। সে তার রবের ব্যাপারে মানুষকে ভয় করে, কিন্তু মানুষের ব্যাপারে রবকে ভয় করে না। সে তার উপরের মানুষের ক্ষতি থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চায়, কিন্তু তার নিচের মানুষকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় দেয় না। সে মৃত্যুকে ভয় করে, কিন্তু মৃত্যু থেকে পালানোর আশা করে না। সে এমন বিষয়ে নিশ্চিত থাকা সত্ত্বেও তা থেকে নিরাপদ থাকতে চায় যাকে সে ভয় করে, আর এমন বিষয়ে নিশ্চিত হওয়া সত্ত্বেও নিরাশ হয় না যা সে আশা করে। সে এমন জ্ঞানের উপকারিতা আশা করে যা সে কাজে লাগায় না, আর এমন মূর্খতার ক্ষতি থেকে নিরাপদ থাকতে চায় যা সম্পর্কে সে নিশ্চিত। সে তার অধীনস্থ মানুষকে উপহাস করে, আর তাদের উপর তার যে হক রয়েছে তা ভুলে যায়। সে রিযিকের ক্ষেত্রে তার উপরের মানুষের দিকে তাকায়, কিন্তু তার নিচের মানুষকে ভুলে যায়। সে অন্যের সামান্যতম গুনাহের জন্য ভয় করে, আর নিজের সামান্য আমলের জন্য (নাজাতের) আশা করে। সে অন্যের ত্রুটি দেখতে পায়, কিন্তু নিজের ত্রুটি থেকে উদাসীন থাকে।

যদি তাকে দৃঢ় বিশ্বাস (ইমান) সম্পর্কে স্মরণ করানো হয়, সে বলে: তোমাদের পূর্ববর্তীরা এমন ছিল না। যদি তাকে বলা হয়, তবে তুমি কেন তাদের মতো আমল করছ না? সে বলে: কে তাদের মতো হতে পারে? ফলে সে কথায় অহংকার দেখায়, কিন্তু আমল করা তার জন্য কঠিন মনে হয়। সে আমানতদারী মনে করে যখন সে সুস্থ ও সন্তুষ্ট থাকে, আর খেয়ানত মনে করে যখন সে অসন্তুষ্ট বা পরীক্ষায় পড়ে। সে নরম হয় যাতে তার কাছে আমানত মনে করা হয়, কিন্তু সে তা খেয়ানতের জন্য প্রস্তুত রাখে। সে বন্ধুত্বের জন্য এমন কিছু শেখে যা দিয়ে সে শত্রুতার জন্য প্রস্তুত হয়। সে মন্দ কাজে দ্রুতগামী, আর সৎকাজে ধীর। কবিতা তার কাছে হালকা মনে হয়, আর আল্লাহর যিকির তার কাছে ভারী মনে হয়। দরিদ্রদের সাথে যিকির করার চেয়ে ধনীদের সাথে বাজে কথা তার কাছে বেশি প্রিয়। সে ঘুমাতে তাড়াহুড়ো করে এবং সাওম (রোজা)কে বিলম্বিত করে। ফলে সে রাতের বেলা নামাজরত অবস্থায় থাকে না এবং সকাল বেলা রোজাদার অবস্থায় থাকে না। সে সকালে ঘুম থেকে ওঠার চিন্তায় থাকে কিন্তু রাত জাগে না, আর সন্ধ্যায় আহারের চিন্তায় হাঁটে অথচ রোজা রাখে না।

হাজ্জাজ মাসউদী থেকে তার বর্ণনায় যোগ করেছেন: যদি সে সালাত (নামাজ) আদায় করে তবে সে আপত্তি জানায় (বা আলস্য করে), যদি সে রুকু করে তবে (উট বসার মতো) ঝুঁকে যায় (অর্থাৎ রুকু ঠিকমতো করে না), আর যদি সিজদা করে তবে ঠোকর মারে (তাড়াহুড়ো করে)। যদি সে কিছু চায় তবে জোর করে চায়, আর যদি তাকে কিছু চাওয়া হয় তবে সে কালক্ষেপণ করে। যদি সে কোনো কথা বলে তবে কসম করে, আর যদি কসম করে তবে তা ভঙ্গ করে। যদি সে ওয়াদা করে তবে খেলাফ করে। যদি সে উপদেশ দেয় তবে মুখ গোমড়া করে রাখে, আর যদি তার প্রশংসা করা হয় তবে আনন্দিত হয়। তার চাওয়া মন্দ, আর তার বর্জন গুনাহ। অন্যের দোষ নিয়ে ব্যস্ত থাকার কারণে সে নিজের ব্যাপারে কোনো কাজ করে না। সৎকাজের ক্ষেত্রে তার কোনো বাড়তি প্রচেষ্টা নেই। সে নিজের দিকে ঝুঁকে থাকে এবং নিজের জন্যেই ভালোবাসে। তাদের মধ্যে ন্যায়পরায়ণতা নেই। বিশ্বাসঘাতকরা হয় তার অন্তরঙ্গ সঙ্গী, আর আমানতদাররা হয় তার শত্রু। যদি তাকে সালাম দেওয়া হয়, সে শোনে না। আর যদি শোনে, তবে ফিরে যায় না। সে হিংসুকদের দৃষ্টিতে তাকায়, আর বিদ্বেষীদের মতো মুখ ফিরিয়ে নেয়। সে অভাবীকে নিয়ে উপহাস করে, আর যে ব্যক্তি পিছনে চলে যায় তার সম্পদ খায় (বা অপচয় করে)। সে সাক্ষীর বিষয়ে এমন কিছু দিয়ে তাকে খুশি করে যা তার অন্তরে নেই, আর অনুপস্থিত ব্যক্তিকে এমন কিছুতে অসন্তুষ্ট করে যা সম্পর্কে সে জানে না। সে খেয়ানত করতে সাহসী, আর আমানত থেকে মুক্ত। যাকে সে ভালোবাসে তার সাথে মিথ্যা বলে, আর যাকে ঘৃণা করে তার সাথে প্রতারণা করে। সে আশ্চর্য হওয়ার কারণ ছাড়াই হাসে, আর বেয়াদবি করে হাঁটে। যে তার থেকে দূরে থাকে, সেও তার থেকে রক্ষা পায় না, আর যে তার সঙ্গী হয়, সেও নিরাপদ থাকে না। যদি তুমি তার সাথে কথা বলো, সে বিরক্ত হয়। আর যদি সে তোমাকে কিছু বলে, সে তোমাকে চিন্তিত করে তোলে। যদি তুমি তাকে কষ্ট দাও, সে খুশি হয়। আর যদি তুমি তাকে খুশি করো, সে তোমার ক্ষতি করে। যদি তুমি তাকে ছেড়ে যাও, সে তোমার বদনাম করে। আর যদি তার ঘনিষ্ঠ হও, সে তোমাকে দুশ্চিন্তাগ্রস্ত করে। যদি তুমি তাকে অনুসরণ করো, সে তোমাকে লাঞ্ছিত করে। আর যদি তুমি তার সাথে একমত হও, সে তোমাকে হিংসা করে। আর যদি তুমি তার বিরোধিতা করো, সে তোমাকে ঘৃণা করে। সে অন্যের শ্রেষ্ঠত্ব দেখলে হিংসা করে, আর নিজে শ্রেষ্ঠ হতে নিরাসক্ত হয়। যে শ্রেষ্ঠত্ব অর্জন করেছে তাকে সে হিংসা করে, কিন্তু তার মতো আমল করতে সে নিরাসক্ত। যে তার সাথে ভালো ব্যবহার করেছে, তাকে প্রতিদান দিতে সে অক্ষম হয়, আর যে তার প্রতি বাড়াবাড়ি করেছে তার বিষয়ে সে উদাসীন থাকে। সে মনোযোগ দেয় না যে নিরাপদ থাকবে, আর যা জানে না তা নিয়ে কথা বলে। তার জিহ্বা তার অন্তরের উপর জয়ী হয়, কিন্তু তার অন্তর তার কথাকে নিয়ন্ত্রণ করে না। সে বিতর্কের জন্য জ্ঞান অর্জন করে, আর তা লোক দেখানোর জন্য ব্যয় করে। সে অহংকার প্রকাশ করে। ফলে তার গোপন করা বিষয় প্রকাশ পেয়ে যায়, কিন্তু যা সে প্রকাশ করেছে তা গোপন হয় না। সে ক্ষণস্থায়ী বিষয়ের জন্য তাড়াহুড়ো করে, আর চিরস্থায়ী বিষয়কে বিলম্বিত করে। সে দুনিয়ার জন্য দ্রুত ধাবিত হয়, আর তাকওয়া (আল্লাহভীতি) কে বিলম্বিত করে।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5458)


• حدثنا أبي وعبد الله بن محمد قالا ثنا إبراهيم بن محمد بن الحسن ثنا أبو عمار أحمد بن محمد بن الجراح ثنا إبراهيم بن بلخ البلخي قال سمعت سفيان بن عيينة يقول ثنا مسعر. قال قال عون بن عبد الله: ما كان الله لينقذنا من شيء ثم يعيدنا فيه {وكنتم على شفا حفرة من النار فأنقذكم منها}) وما كان الله ليجمع أهل قسمين في النار {وأقسموا بالله جهد أيمانهم لا يبعث الله من يموت}

ونحن نقسم بالله جهد أيماننا ليبعثن الله من يموت.




আওন বিন আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আল্লাহ এমন নন যে, তিনি আমাদের কোনো কিছু থেকে রক্ষা করবেন আর তারপর আবার আমাদের সেটার মধ্যে ফিরিয়ে দেবেন। (যেমন আল্লাহ বলেছেন) 'আর তোমরা তো জাহান্নামের গহ্বরের কিনারে ছিলে, অতঃপর তিনি তোমাদের সেখান থেকে রক্ষা করেছেন।' আর আল্লাহ এমন নন যে, তিনি দুই (পরস্পর বিপরীত) দলের লোকদেরকে জাহান্নামে একত্রিত করবেন। (যেমন কাফেররা বলে) 'তারা আল্লাহর নামে কঠিন শপথ করে বলে যে, যার মৃত্যু হয়, আল্লাহ তাকে পুনরুত্থিত করবেন না।' আর আমরাও আল্লাহর নামে কঠোর শপথ করে বলছি যে, যার মৃত্যু হয়, আল্লাহ তাকে অবশ্যই পুনরুত্থিত করবেন।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5459)


• حدثنا عبد الله بن محمد ثنا علي بن إسحاق ثنا الحسين بن الحسن المروزي ثنا عبد الله بن المبارك ثنا عبد الله بن الوليد بن عبد الله بن معقل ثنا عون
ابن عبد الله. أنه قال: أوصى رجل ابنه، فقال: يا بني عليك بتقوى الله، وإن استطعت أن تكون اليوم خيرا منك أمس، وغدا خير منك اليوم فافعل، وإذا صليت فصل صلاة مودع، وإياك وكثرة طلب الحاجات فإنها فقر حاضر، وإياك وما يعتذر منه.




আওন ইবনে আবদুল্লাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি তার ছেলেকে উপদেশ দিয়ে বললেন: হে আমার প্রিয় পুত্র! তুমি আল্লাহ্‌র তাক্বওয়া (ভীতি/সচেতনতা) অবলম্বন করো। আর যদি তুমি সক্ষম হও যে তোমার আজকের দিনটি তোমার গতকালের দিনের চেয়ে ভালো হবে এবং তোমার আগামী দিনটি তোমার আজকের দিনের চেয়ে ভালো হবে, তবে তুমি তা-ই করো। আর যখন তুমি সালাত আদায় করবে, তখন বিদায় গ্রহণকারীর সালাতের মতো আদায় করো (যেন এটাই তোমার শেষ সালাত)। আর মানুষের কাছে খুব বেশি প্রয়োজন/চাহিদা পেশ করা থেকে বিরত থাকো, কেননা তা হচ্ছে উপস্থিত দারিদ্রতা। এবং এমন কাজ করা থেকে সতর্ক থাকো, যার জন্য তোমাকে ক্ষমা চাইতে হয়।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5460)


• حدثنا عبد الله بن جعفر فيما قرئ عليه قال ثنا أسيد بن عاصم ثنا زيد بن عوف ثنا سعد بن زربي عن ثابت البناني. قال: كان لعون بن عبد الله جارية يقال لها بشرة، وكانت تقرأ القرآن بألحان. فقال لها يوما: يا بشرة اقرئي على إخواني، فكانت تقرأ بصوت فيه ترجيع حزين، فلقيتهم يلقون العمائم عن رءوسهم ويبكون. فقال لها يوما: يا بشرة قد أعطيت بك ألف دينار لحسن صوتك، اذهبي فلا يملكك علي أحد فأنت حرة لوجه الله. قال ثابت:

فهي هناك عجوز بالكوفة لولا أن أشق عليها لبعثت إليها حتى تقدم علينا فتكون عندنا حتى تموت.

أدرك عون بن عبد الله بن عتبة، جماعة من الصحابة. وسمع عبد الله بن عمر، وعبد الله بن عباس، وأبا هريرة، وأكثر روايته عن أبيه عن عبد الله بن مسعود، وأبوه عبد الله بن عتبة يعد في الصحابة.

وصحب عون: الشعبي، والأسود بن يزيد، وكبار التابعين وعلمائهم من أهل الكوفة وغيرها.

وروى عن عون من التابعين جماعة: منهم إسماعيل بن أبي خالد، وأبو إسحاق الشيباني، وأبو الزبير، وأبو سهيل نافع بن مالك، ومجالد. وروى عنه سعيد المقبري، ومالك بن مغول، ومسعر، وغيرهم من الأئمة والأعلام.




সাবেত আল-বুনানী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আউন ইবনে আব্দুল্লাহর একটি দাসী ছিল, যার নাম ছিল বুশরা। সে সুর করে কোরআন পড়ত। একদিন তিনি তাকে বললেন, হে বুশরা, আমার ভাইদের সামনে কোরআন পাঠ করো। সে যখন বিষাদমাখা কম্পমান সুরে পাঠ করছিল, তখন তিনি দেখলেন যে তারা (শ্রোতারা) তাদের পাগড়ি মাথা থেকে ফেলে দিচ্ছিল এবং কাঁদছিল। একদিন তিনি তাকে বললেন, হে বুশরা, তোমার সুমধুর কণ্ঠের কারণে তোমাকে এক হাজার দিনার দিয়ে দেওয়ার প্রস্তাব দেওয়া হয়েছে। তুমি চলে যাও, এখন থেকে কেউ তোমার মালিকানা দাবি করতে পারবে না, তুমি আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য মুক্ত। সাবেত (আল-বুনানী) বলেন: সে এখনো কুফায় একজন বৃদ্ধা হিসেবে আছেন। যদি তার জন্য কষ্টকর না হতো, তবে আমি তার কাছে (লোক) পাঠাতাম, যাতে সে আমাদের কাছে এসে মৃত্যু পর্যন্ত থাকতে পারে।

[বি.দ্র.: এই বর্ণনার শেষে আউন ইবনে আব্দুল্লাহর জীবনীমূলক যে অংশটুকু আছে, তা মূল হাদিস বা আসার নয়, বরং রাবীদের পরিচিতিমূলক টীকা।]









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5461)


• حدثنا أبو علي محمد بن أحمد بن الحسن قال ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل قال حدثني أبي قال ثنا إسماعيل بن إبراهيم قال ثنا الحجاج بن أبي عثمان عن أبي الزبير عن عون بن عبد الله بن عتبة عن ابن عمر. قال: «بينا نحن نصلي مع النبي صلى الله عليه وسلم إذ قال رجل من القوم: الله أكبر كبيرا والحمد لله كثيرا وسبحان الله بكرة وأصيلا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم
من القائل كذا وكذا؟ فقال رجل من القوم: أنا يا رسول الله فقال عجبت لها فتحت لها أبواب السماء. قال ابن عمر. فما تركتهن منذ سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك». غريب من حديث عون لم يروه عنه إلا أبو الزبير وهو محمد بن مسلم بن تدرس تابعي من أهل مكة تفرد به عنه الحجاج وهو الصواف البصري.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করছিলাম, তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি বললেন: "আল্লাহু আকবার কাবীরা, ওয়ালহামদু লিল্লাহি কাছীরা, ওয়া সুবহানাল্লাহি বুকরাতাঁও ওয়া আসীলা।" (আল্লাহ মহান, মহা মহান; আর আল্লাহর জন্য অনেক অনেক প্রশংসা; আর সকাল-সন্ধ্যায় আল্লাহর পবিত্রতা ঘোষণা করছি।) তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কে এই কথাগুলো বলেছে?" তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে সেই ব্যক্তি বললেন: "আমি, হে আল্লাহর রাসূল!" তিনি (নবী) বললেন: "আমি তাতে আশ্চর্য হলাম, এর জন্য আসমানের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়েছে।" ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন থেকে আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একথা বলতে শুনেছি, তখন থেকে আমি এগুলো (এই বাক্যগুলো) কখনো ছাড়িনি।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5462)


• حدثنا أبو عمرو محمد بن أحمد بن حمدان قال ثنا الحسن بن سفيان قال ثنا أبو موسى الأنصاري قال ثنا عاصم بن عبد العزيز المدني عن أبي سهيل عن عون بن عبد الله بن عتبة عن ابن عباس عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال:

«يكفيك قراءة الامام، خافت أو جهر». غريب من حديث عون لم يروه عنه إلا أبو سهيل وهو نافع بن(1) مالك عم مالك بن أنس يعد من تابعي أهل المدينة سمع من أنس بن مالك تفرد عنه عاصم بن عبد العزيز وهو الليثي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইমামের কিরাআতই তোমার জন্য যথেষ্ট, তিনি নীরবে পড়ুন বা সজোরে।"









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5463)


• حدثنا سليمان بن أحمد قال ثنا محمد بن يحيى(2) بن منده قال ثنا أبو بكر ابن أبي النضر قال ثنا أبو النضر قال ثنا أبو عقيل الثقفي قال ثنا مجالد قال ثنا عون بن عبد الله بن عتبة عن أبيه. قال: «ما مات النبي صلى الله عليه وسلم حتى قرأ وكتب». غريب من حديث عون عن أبيه وأبوه أدرك النبي صلى الله عليه وسلم وهو ابن ست سنين وبرك عليه ودعا له، لم يروه عنه إلا مجالد تفرد به أبو عقيل.




আব্দুল্লাহ ইবনে উতবাহ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ততক্ষণ পর্যন্ত ইন্তিকাল করেননি, যতক্ষণ না তিনি পাঠ করতে ও লিখতে শিখেছিলেন।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5464)


• حدثنا أبو بكر أحمد بن إبراهيم بن جعفر العطار قال ثنا محمد بن يونس ابن موسى قال ثنا أبو بكر الحنفي قال ثنا عبد الحميد - يعني ابن جعفر قال أخبرنا سعيد المقبري عن عون بن عبد الله بن عتبة عن أبيه عن ابن مسعود.

قال: «جاء رجل من بني سليم يقال له عمرو بن عبسة إلى المدينة ولم يكن رأى النبي صلى الله عليه وسلم إلا بمكة. فقال يا رسول الله: علمني ما أنت به عالم وما أنا به جاهل، علمني ما ينفعني ولا يضرني، أي صلاة الليل التطوع أفضل؟ قال: نصف الليل فإنها ساعة ينزل فيها الله تعالى إلى سماء الدنيا فيقول: لا اسأل
عن عبادي أحدا غيري. فيقول: هل من داع يدعوني فأستجيب له؟ هل من مستغفر فيستغفرنى فاغفر له؟ هل ما عان يدعونى فافك عانه(1) حتى ينفجر الفجر ثم يصعد الرحمن». غريب من حديث عون تفرد به عنه سعيد، ورواه الليث ابن سعد عن سعيد عن عون منقطعا ولم يقل عن أبيه.




ইবন মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু সুলাইম গোত্রের আমর ইবন আবাসা নামক এক ব্যক্তি মদীনায় এলেন। তিনি মক্কা ছাড়া আর কোথাও নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে দেখেননি। তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি যে বিষয়ে জ্ঞানী এবং আমি যে বিষয়ে অজ্ঞ, তা আমাকে শিক্ষা দিন। যা আমার জন্য উপকারী হবে, ক্ষতিকর হবে না, এমন বিষয় আমাকে শিক্ষা দিন। নফল তাহাজ্জুদ সালাতের মধ্যে কোনটি সর্বোত্তম? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: মধ্যরাত্রি (সর্বোত্তম)। কারণ এটি এমন একটি সময় যখন আল্লাহ তাআলা দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন এবং বলেন: আমি ছাড়া আমার বান্দাদের ব্যাপারে আমি অন্য কাউকে জিজ্ঞেস করব না। অতঃপর তিনি বলেন: এমন কোনো আহ্বানকারী কি আছে, যে আমাকে ডাকবে আর আমি তার ডাকে সাড়া দেব? এমন কোনো ক্ষমাপ্রার্থী কি আছে, যে আমার কাছে ক্ষমা প্রার্থনা করবে আর আমি তাকে ক্ষমা করে দেব? কোনো সাহায্যপ্রার্থী কি আছে, যে আমাকে ডাকবে আর আমি তার সাহায্য করব— এভাবে ফজর উদিত হওয়া পর্যন্ত (তিনি বলেন)। অতঃপর রহমান (আল্লাহ) আরোহণ করেন।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5465)


• حدثناه إبراهيم بن محمد بن يحيى في جماعة قالوا ثنا محمد بن إسحاق قال ثنا قتيبة بن سعيد قال ثنا الليث بن سعد عن سعيد المقبري عن عون بن عبد الله بن عتبة عن ابن مسعود.

قال: جاء رجل من بني سليم فذكر نحوه. واختلف على سعيد المقبري في هذا الحديث فروي عنه من رواية عون على ما ذكرنا من اختلافه، وروى عنه - يعنى سعيد عن أبي هريرة، وروى عنه عن أبيه عن أبي هريرة، وروى عنه عن عطاء مولى أم حبيبة عن أبي هريرة، وأسلم الروايات وأصحها عن أبيه عن أبي هريرة.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু সুলাইম গোত্রের একজন লোক আসলো এবং অনুরূপ কিছু বর্ণনা করলো।

এই হাদীস বর্ণনায় সাঈদ আল-মাকবুরী-এর উপর মতপার্থক্য দেখা যায়। এটি আউন-এর সূত্রে তার (সাঈদ আল-মাকবুরী) থেকে বর্ণিত হয়েছে, যেমনটি আমরা তার মতপার্থক্য সহ উল্লেখ করেছি। আর তা (হাদীস) তাঁর (সাঈদের) থেকে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রেও বর্ণিত হয়েছে, এবং তার থেকে তার পিতার সূত্রে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, আর তার থেকে আতা, উম্মে হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর আযাদকৃত গোলাম, এর সূত্রে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে। আর এর মধ্যে সবচেয়ে নিরাপদ এবং বিশুদ্ধতম বর্ণনা হলো তার পিতার সূত্রে আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত বর্ণনাটি।









হিলইয়াতুল আওলিয়া (5466)


• حدثنا محمد بن علي بن أحمد بن مخلد قال ثنا محمد بن يونس بن موسى قال ثنا أبو عامر العقدي قال ثنا محمد بن أبي حميد عن عون بن عبد الله بن عتبة عن أبيه عن عبد الله بن مسعود. قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: «من خرج من عينه دموع، وإن كانت مثل رأس الذباب من خشية الله تعالى حتى يصيب حر وجهه، حرم الله وجهه على النار». غريب من حديث عون تفرد به محمد بن أبي حميد وهو أبو إبراهيم الزرقي المدني ويعرف بحماد بن أبي حميد، ورواه إسماعيل بن أبي أويس عن أخيه عن حماد عن عون مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তির চোখ থেকে আল্লাহর ভয়ে অশ্রু নির্গত হয়—যদিও তা মাছির মাথার সমপরিমাণ হয়—আর তা যদি তার চেহারার উষ্ণতাকে স্পর্শ করে, তবে আল্লাহ তার চেহারাকে জাহান্নামের জন্য হারাম করে দেন।"