হিলইয়াতুল আওলিয়া
• حدثنا محمد بن إبراهيم ثنا أبو عروبة الحراني ثنا سليمان بن سيف ثنا أبو عاصم عن عثمان بن خالد بن دينار عن أبيه. قال: قال عمر لميمون بن مهران:
يا ميمون لا تدخل على هؤلاء الأمراء وإن قلت آمرهم بالمعروف، ولا تخلون بامرأة وإن قلت أقرئها القرآن، ولا تصلن عاقا فإنه لن يصلك وقد قطع أباه.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মায়মুন ইবনে মেহরানকে বললেন:
হে মায়মুন! তুমি এই শাসকদের কাছে প্রবেশ করো না, যদিও তুমি বলো যে তুমি তাদের সৎকাজের আদেশ দিতে যাচ্ছো। তুমি কোনো নারীর সাথে একাকী অবস্থান করো না, যদিও তুমি বলো যে তুমি তাকে কুরআন শিক্ষা দিতে যাচ্ছো। আর এমন অবাধ্য ব্যক্তির সাথে সম্পর্ক রেখো না যে (পিতা-মাতার সাথে) সম্পর্ক ছিন্ন করেছে, কারণ সে তোমার সাথে সম্পর্ক রাখবে না, যখন সে তার পিতাকেই ত্যাগ করেছে।
• حدثنا محمد بن إبراهيم بن علي ثنا أبو عروبة ثنا عمر بن عثمان قال ثنا أبي. قال: سمعت جدي قال: كتب عمر إلى عدي بن أرطأة؛ بلغني أنك تستن بسنة الحجاج، فلا تستن بسنته فإنه كان يصلي الصلاة لغير وقتها، ويأخذ الزكاة من غير حقها، وكان لما سوى ذلك أضيع.
উমর ইবনু উসমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার দাদাকে বলতে শুনেছি যে, উমর আদী ইবনু আরত্বা’আহর নিকট লিখলেন: "আমার নিকট সংবাদ পৌঁছেছে যে, তুমি হাজ্জাজের কর্মপদ্ধতি অনুসরণ করছো। অতএব, তুমি তার কর্মপদ্ধতি অনুসরণ করো না। কারণ সে সালাতকে তার নির্ধারিত সময় ব্যতিরেকে আদায় করতো, এবং সে অবৈধভাবে যাকাত গ্রহণ করতো। আর এসব ছাড়া অন্যান্য বিষয়ে সে ছিল আরো বেশি উদাসীন।"
• حدثنا محمد بن علي ثنا أبو العباس بن قتيبة ثنا إبراهيم بن هشام بن يحيى حدثني أبي عن جدي. قال: قال عمر: ما حسدت الحجاج عدو الله على شيء حسدي إياه على حبه القرآن وإعطائه أهله، وقوله حين حضرته الوفاة: اللهم اغفر لي فإن الناس يزعمون أنك لا تفعل.
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আল্লাহর শত্রু হাজ্জাজকে আমি কোনো কিছুর ওপর হিংসা (ঈর্ষা) করিনি, তবে কোরআনের প্রতি তার ভালোবাসা এবং কোরআনওয়ালাদের (কোরআনের জ্ঞানীদের) প্রতি তার দানশীলতার ওপর আমি ঈর্ষা করেছি। আর মৃত্যু যখন তার নিকটবর্তী হলো, তখন তার এই কথার ওপরও (আমি ঈর্ষা করেছি): "হে আল্লাহ! আমাকে ক্ষমা করে দিন, কারণ লোকেরা ধারণা করে যে আপনি তা করবেন না।"
• حدثنا محمد بن علي ثنا محمد بن الحسن بن قتيبة ثنا إبراهيم بن هشام بن يحيى الغساني حدثني أبي عن جدي. قال: كنت عند هشام بن عبد الملك جالسا، فأتاه رجل فقال يا أمير المؤمنين إن عبد الملك أقطع جدي قطيعة فأقرها الوليد وسليمان حتى إذا استخلف عمر رحمه الله نزعها، فقال له هشام أعد مقالتك فقال: يا أمير المؤمنين إن عبد الملك أقطع جدي قطيعة فأقرها الوليد وسليمان، حتى إذا استخلف عمر رحمه الله نزعها، فقال والله إن فيك لعجبا، إنك تذكر من أقطع جدك قطيعة ومن أقرها فلا تترحم عليهم وتذكر من نزعها فتترحم عليه، وإنا قد أمضينا ما صنع عمر رحمه الله.
(الرسالة)
ইব্রাহীম বিন হিশামের দাদা (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি হিশাম বিন আব্দুল মালিকের নিকট উপবিষ্ট ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর নিকট এসে বলল, হে আমীরুল মু'মিনীন, আব্দুল মালিক আমার দাদাকে একটি ভূমি দান করেছিলেন। এরপর ওয়ালীদ এবং সুলায়মানও তা বহাল রাখেন। কিন্তু যখন উমার (রহিমাহুল্লাহ) খলীফা হলেন, তিনি তা প্রত্যাহার করে নিলেন। তখন হিশাম তাকে বললেন, তোমার বক্তব্য পুনরাবৃত্তি করো। লোকটি পুনরায় বলল, হে আমীরুল মু'মিনীন, আব্দুল মালিক আমার দাদাকে একটি ভূমি দান করেছিলেন। এরপর ওয়ালীদ এবং সুলায়মানও তা বহাল রাখেন। কিন্তু যখন উমার (রহিমাহুল্লাহ) খলীফা হলেন, তিনি তা প্রত্যাহার করে নিলেন। (হিশাম) বললেন, আল্লাহর কসম! তোমার মধ্যে তো আশ্চর্যকর ব্যাপার রয়েছে। তুমি তাদের নাম উল্লেখ করছো, যারা তোমার দাদাকে ভূমি দান করেছিলেন এবং যারা তা বহাল রেখেছিলেন, কিন্তু তাদের জন্য তুমি রহমতের দু‘আ করছো না। আর তুমি তার নাম উল্লেখ করছো যিনি তা প্রত্যাহার করে নিলেন, আর তার জন্য রহমতের দু‘আ করছো! আর আমরা উমার (রহিমাহুল্লাহ) যা করেছেন, তা অনুমোদন করলাম।
• حدثنا أبو حامد بن جبلة ثنا محمد بن إسحاق السراج ثنا أبو الأشعث أحمد بن المقدام ثنا محمد بن بكر البرساني ثنا سليم بن نفيع(1) القرشي عن خلف أبي الفضل القرشي: عن كتاب عمر بن عبد العزيز إلى النفر الذين كتبوا إلي بما لم يكن لهم بحق في رد كتاب الله تعالى، وتكذيبهم بأقداره النافذة في علمه السابق الذي لا حد له إلا إليه، وليس لشيء منه مخرج، وطعنهم في دين الله وسنة رسوله القائمة في أمته.
[أما بعد: فإنكم كتبتم إلي بما كنتم تسترون(2) منه قبل اليوم في رد علم الله والخروج منه إلى ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يتخوف على أمته من التكذيب بالقدر. وقد علمتم أن أهل السنة كانوا يقولون: الاعتصام بالسنة نجاة، وسيقيض العلم قبضا سريعا(3). وقول عمر بن الخطاب - وهو يعظ الناس-: إنه لا عذر لأحد عند الله بعد البينة بضلالة ركبها حسبها هدى، ولا في هدى تركه حسبه ضلالة، قد تبينت الأمور وثبتت الحجة وانقطع العذر، فمن رغب عن أنباء النبوة وما جاء به الكتاب تقطعت من يديه أسباب الهدى، ولم يجد له عصمة ينجو بها من الردى، وإنكم ذكرتم أنه بلغكم أني أقول إن الله قد علم ما العباد عاملون، وإلى ما هم صائرون، فأنكرتم ذلك علي وقلتم إنه ليس يكون ذلك من الله في علم حتى يكون ذاك من الخلق عملا، فكيف ذلك كما قلتم؟! والله تعالى يقول {(إنا كاشفوا العذاب قليلا إنكم عائدون)} يعني عائدين في الكفر، وقال تعالى {(ولو ردوا لعادوا لما نهوا عنه وإنهم لكاذبون)}. فزعمتم بجهلكم في قول الله تعالى {(فمن شاء فليؤمن ومن شاء فليكفر)} أن المشيئة في أي ذلك أحببتم فعلتم من ضلالة أو هدى والله تعالى يقول {(وما تشاؤن إلا أن يشاء الله رب العالمين)} فبمشيئة الله لهم شاءوا ولو لم يشأ لم ينالوا بمشيئتهم من طاعته شيئا قولا ولا عملا، لأن الله تعالى لم
يملك العباد ما بيده، ولم يفوض إليهم ما يمنعه من رسله، فقد حرصت الرسل على هدى الناس جميعا، فما اهتدى منهم إلا من هداه الله، ولقد حرص إبليس على ضلالتهم جميعا فما ضل منهم إلا من كان في علم الله ضالا. وزعمتم بجهلكم أن علم الله تعالى ليس بالذي يضطر العباد إلى ما عملوا من معصيته، ولا بالذي صدهم عما تركوه من طاعته، ولكنه بزعمكم كما علم الله أنهم سيعملون بمعصيته، كذلك علم أنهم سيستطيعون تركها، فجعلتم علم الله لغوا، تقولون لو شاء العبد لعمل بطاعة الله وإن كان في علم الله أنه غير عامل بها، ولو شاء ترك معصيته، وإن كان في علم الله أنه غير تارك لها، فأنتم إذا شئتم أصبتموه وكان علما، وإذا شئتم رددتموه وكان جهلا، وإن شئتم أحدثتم من أنفسكم علما ليس في علم الله، وقطعتم به علم الله عنكم، وهذا ما كان ابن عباس يعده للتوحيد نقضا وكان يقول: إن الله لم يجعل فضله ورحمته هملا بغير قسم منه ولا اختيار، ولم يبعث رسله بإبطال ما كان في سابق علمه، فأنتم تقرون في العلم بأمر، وتنقضونه في آخر، والله تعالى يقول {(يعلم ما بين أيديهم وما خلفهم ولا يحيطون بشيء من علمه إلا بما شاء)} فالخلق صائرون إلى علم الله تعالى، ونازلون عليه، وليس بينه شيء هو كائن حجاب يحجبه عنه ولا يحول دونه إنه عليم حكيم.
وقلتم لو شاء الله لم يفرض بعمل بغير ما أخبر الله في كتابه عن قوم، ولهم أعمال من دون ذلك هم لها عاملون وأنه قال: {(سنمتعهم} قليلا {ثم يمسهم منا عذاب أليم)} فأخبر أنهم عاملون قبل أن يعملوا، وأخبر أنه معذبهم قبل أن يخلقوا. وتقولون أنتم: إنهم لو شاءوا خرجوا من علم الله في عذابه إلى ما لم يعلم من رحمته لهم، ومن زعم ذلك فقد عادى كتاب الله برد، ولقد سمى الله تعالى رجالا من الرسل بأسمائهم وأعمالهم في سابق علمه، فما استطاع آباؤهم لتلك الأسماء تغييرا، وما استطاع إبليس بما سبق لهم في علمه من الفضل تبديلا، فقال {(واذكر عبادنا إبراهيم وإسحاق ويعقوب} ذى {الأيدي والأبصار إنا أخلصناهم بخالصة ذكرى الدار)} فالله أعز في قدرته وأمنع من أن يملك أحدا إبطال علمه في شيء من ذلك، فهو مسمى لهم بوحيه الذي لا يأتيه الباطل من
بين يديه ولا من خلفه، أو أن يشرك في خلقه أحدا، أو يدخل في رحمته من قد أخرجه منها أو أن يخرج منها من قد أدخله فيها، ولقد أعظم بالله الجهل من زعم: أن العلم كان بعد الخلق، بل لم يزل الله وحده بكل شيء عليما، وعلى كل شيء شهيدا، قبل أن يخلق شيئا، وبعد ما خلق، لم ينقص علمه في بدئهم، ولم يزد بعد أعمالهم، ولا بحوائجه(1) التي قطع بها دابر ظلمهم، ولا يملك إبليس هدى نفسه، ولا ضلالة غيره، وقد أردتم بقذف مقالتكم إبطال علم الله في خلقه، وإهمال عبادته، وكتاب الله قائم بنقض بدعتكم، وإفراط قذفكم، ولقد علمتم أن الله بعث رسوله والناس يومئذ أهل شرك، فمن أراد الله له الهدى لم تحل ضلالته التي كان فيها دون إرادة الله له، ومن لم يرد الله له الهدى تركه في الكفر ضالا، فكانت ضلالته أولى به من هداه، فزعمتم أن الله أثبت في قلوبكم الطاعة والمعصية، فعملتم بقدرتكم بطاعته وتركتم بقدرتكم معصيته، وإن الله خلو من أن يكون يختص أحدا برحمته، أو يحجز أحدا عن معصيته، وزعمتم ن الشيء الذي بقدر إنما هو عندكم اليسر والرخاء والنعمة، وأخرجتم منه الأعمال، وأنكرتم أن يكون سبق لأحد من الله ضلالة أو هدى، وأنكم الذين هديتم أنفسكم من دون الله، وأنكم الذين حجزتموها عن المعصية بغير قوة من الله ولا إذن منه، فمن زعم ذلك فقد غلا في القول لأنه لو كان شيء لم يسبق في علم الله وقدره لكان لله في ملكه شريك ينفذ مشيئته في الخلق من دون الله، والله سبحانه وتعالى يقول {(حبب إليكم الإيمان وزينه في قلوبكم)} وهم له قبل ذلك كارهون {(وكره إليكم الكفر والفسوق والعصيان)} وهم له قبل ذلك محبون وما كانوا على شيء من ذلك لأنفسهم بقادرين. ثم أخبر بما سبق لمحمد صلى الله عليه وسلم من الصلاة عليه والمغفرة له ولأصحابه. فقال تعالى {(أشداء على الكفار رحماء بينهم)} وقال تعالى {(ليغفر لك الله ما تقدم من ذنبك وما تأخر)} فلولا علمه ما غفرها الله له قبل أن يعملها، وفضلا سبق لهم من الله قبل أن يخلقوا، ورضوانا عنهم قبل أن يؤمنوا. ثم أخبر بما هم عاملون آمنون قبل أن يعملوا وقال {(تراهم}
{ركعا سجدا يبتغون فضلا من الله ورضوانا)} فتقولون أنتم إنهم قد كانوا ملكوا رد ما أخبر الله عنهم أنهم عاملون، وأن إليهم أن يقيموا على كفرهم مع قوله فيكون الذي أرادوا لأنفسهم من الكفر مفعولا، ولا يكون لوحي الله فيما اختار تصديقا، بل لله الحجة البالغة. وفي قوله تعالى {(لولا كتاب من الله سبق لمسكم فيما أخذتم عذاب عظيم)} فسبق لهم العفو من الله فيما أخذوا قبل أن يؤذن لهم، وقلتم: لو شاءوا خرجوا من علم الله في عفوه عنهم إلى ما لم يعلم من تركهم لما أخذوا، فمن زعم ذلك فقد غلا وكذب. ولقد ذكر الله بشرا كثيرا وهم يومئذ في أصلاب الرجال، وأرحام النساء، فقال {(وآخرين منهم لما يلحقوا بهم)} وقال {(والذين جاؤ من بعدهم يقولون ربنا اغفر لنا ولإخواننا الذين سبقونا بالإيمان)} فسبقت لهم الرحمة من الله قبل أن يخلقوا والدعاء لهم بالمغفرة، ممن لم يسبقهم بالإيمان من قبل أن يدعوا لهم. ولقد علم العالمون بالله أن الله لا يشاء أمرا فتحول مشيئة غيره دون بلاغ ما شاء، ولقد شاء لقوم الهدى فلم يضلهم أحد، وشاء إبليس لقوم الضلالة فاهتدوا، وقال لموسى [وهارون] {(اذهبا إلى فرعون إنه طغى فقولا له قولا لينا لعله يتذكر أو يخشى)} [وموسى في سابق علمه أنه يكون لفرعون عدوا وحزنا، فقال تعالى {(ونري فرعون وهامان وجنودهما منهم ما كانوا يحذرون)}](1) فتقولون أنتم لو شاء فرعون كان لموسى وليا وناصرا، والله تعالى يقول {(ليكون لهم عدوا وحزنا)} وقلتم لو شاء فرعون لامتنع من الغرق، والله تعالى يقول {(إنهم جند مغرقون)} مثبت ذلك عنده في وحيه في ذكر الأولين.
كما قال في سابق علمه لآدم قبل أن يخلقه {(إني جاعل في الأرض خليفة)} فصار إلى ذلك بالمعصية التى ابتلي بها، وكما كان إبليس في سابق علمه أنه سيكون مذموما مدحورا، وصار إلى ذلك بما ابتلي به من السجود لآدم فأبى، فتلقى آدم التوبة فرحم، وتلقى إبليس اللعنة فغوى، ثم أهبط آدم إلى ما خلق له من الأرض مرحوما متوبا عليه، وأهبط إبليس بنظرته مدحورا مذموما مسخوطا
عليه. وقلتم أنتم: إن إبليس وأولياءه من الجن قد كانوا ملكوا رد علم الله والخروج من قسمه الذي أقسم به إذ قال {(فالحق والحق أقول، لأملأن جهنم منك وممن تبعك منهم أجمعين)} حتى لا ينفذ له علم إلا بعد مشيئتهم، فماذا تريدون بهلكة أنفسكم في رد علم الله؟ فإن الله عز وجل لم يشهدكم خلق أنفسكم فكيف يحيط جهلكم بعلمه، وعلم الله ليس بمقصر عن شيء هو كائن، ولا يسبق علمه في شيء فيقدر أحد على رده، فلو كنتم تنتقلون في كل ساعة من شيء إلى شيء هو كائن لكانت مواقعكم عنده، ولقد علمت الملائكة قبل خلق آدم ما هو كائن من العباد في الأرض من الفساد وسفك الدماء فيها، وما كان لهم في الغيب من علم، فكان في علم الله الفساد وسفك الدماء، وما قالوا تخرصا إلا بتعليم العليم الحكيم لهم، فظن ذلك منهم وقد أنطقهم به، فانكرتم أن الله أزاغ قوما قبل أن يزيغوا، وأضل قوما قبل أن يضلوا، وهذا مما لا يشك فيه المؤمنون بالله، إن الله قد عرف قبل أن يخلق العباد مؤمنهم من كافرهم، وبرهم من فاجرهم، وكيف يستطيع عبد هو عبد الله مؤمن أن يكون كافرا، أو هو عند الله كافر أن يكون مؤمنا؟ والله تعالى يقول {(أومن كان ميتا فأحييناه وجعلنا له نورا يمشي به في الناس كمن مثله في الظلمات ليس بخارج منها)} فهو في الضلالة ليس بخارج منها أبدا إلا بإذن الله، ثم آخرون اتخذوا من بعد الهدى عجلا جسدا فضلوا به فعفى عنهم لعلهم يشكرون، فصاروا من أمة قوم موسى أمة يهدون بالحق وبه يعدلون، وصاروا إلى ما سبق لهم، ثم ضلت ثمود بعد الهدى فلم يعف عنهم ولم يرحموا، فصاروا في علمه إلى صيحة واحدة فإذا هم خامدون فنفذوا إلى ما سبق لهم أن صالحا رسولهم، وأن الناقة فتنة لهم وأنه مميتهم كفارا فعقروها، وكان إبليس فيما كانت فيه الملائكة من التسبيح والعبادة ابتلي فعصى فلم يرحم، وابتلي آدم فعصى فرحم، وهم آدم بالخطيئة فنسى، وهم يوسف بالخطيئة فعصم، فأين كانت الاستطاعة عند ذلك؟ هل كانت تغني شيئا فيما كان من ذلك حتى لا يكون؟ أو تغني فيما لم يكن حتى يكون؟ فتعرف لكم بذلك حجة. بل الله أعز مما تصفون وأقدر.
وأنكرتم أن يكون سبق لأحد من الله ضلالة أو هدى، وإنما علمه بزعمكم حافظ وأن المشيئة في الأعمال إليكم إن شئتم أحببتم الإيمان فكنتم من أهل الجنة ثم جعلتم بجهلكم حديث رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي جاء به أهل السنة وهو مصدق للكتاب المنزل أنه من ذنب مضاه ذنبا خبيثا في قول النبي صلى الله عليه وسلم حين سأله عمر: أرأيت ما نعمل أشيء قد فرغ منه أم شيء نأتنفه؟ فقال صلى الله عليه وسلم: بل شيء قد فرغ منه، فطعنتم بالتكذيب له، وتعليم من الله في علمه إذ قلتم إن كنا لا نستطيع الخروج منه فهو الجبر والجبر عندكم الحيف، فسميتم نفاذ علم الله في الخلق حيفا! وقد جاء الخبر «إن الله خلق آدم فنثر ذريته في يده، فكتب أهل الجنة وما هم عاملون، وكتب أهل النار وما هم عاملون». وقال سهل بن حنيف يوم صفين: أيها الناس اتهموا آراءكم على دينكم فو الذى نفسي بيده لقد رأيتنا يوم أبي جندل ولو نستطيع رد أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم لرددناه، والله ما وضعنا سيوفنا على عواتقنا إلا أسهل بنا على أمر نعرفه قبل أمركم هذا.
ثم أنتم بجهلكم قد أظهرتم دعوة حق على تأويل باطل تدعون الناس إلى رد علم الله، فقلتم الحسنة من الله والسيئة من أنفسنا، وقال: أئمتكم وهم أهل السنة الحسنة من الله في علم قد سبق، والسيئة من أنفسنا في علم قد سبق، فقلتم لا يكون ذلك حتى يكون بدؤها من أنفسنا كما بدء السيئات من أنفسنا، وهذا رد للكتاب منكم، ونقض للدين. وقد قال ابن عباس حين نجم القول بالقدر:
هذا أول شرك هذه الأمة، والله ما ينتهي بهم سوء رأيهم حتى يخرجوا الله من أن يكون قدر خيرا، كما أخرجوه من أن يكون قد شرا، فأنتم تزعمون بجهلكم أن من كان في علم الله ضالا فاهتدى فهو بما ملك ذلك حتى كان في هداه ما لم يكن الله علمه فيه، وأن من شرح صدره للإسلام فهو بما فوض إليه قبل أن يشرحه الله له، وأنه إن كان مؤمنا فكفر فهو مما شاء لنفسه، وملك من ذلك لها، وكانت مشيئته في كفره أنفذ من مشيئة الله في إيمانه، بل أشهد أنه من عمل حسنة فبغير معونة كانت من نفسه عليها، وأن من عمل سيئة فبغير حجة كانت له فيها
وأن الفضل بيد الله يؤتيه من يشاء وأن لو أراد الله أن يهدي الناس جميعا لنفذ أمره فيمن ضل حتى يكون مهتديا، فقلتم بمشيئته شاء لكم تفويض الحسنات إليكم، وتفويض السيئات ألقى عنكم سابق علمه في أعمالكم، وجعل مشيئته تبعا لمشيئتكم، ويحكم فو الله ما أمضى لبنى إسرائيل مشيئتهم حين أبوا أن يأخذوا ما آتاهم بقوة حتى نتق الجبل فوقهم كأنه ظلة، فهل رأيتموه أمضى مشيئته لمن كان في ضلالته حين أراد هداه حتى صار إلى أن أدخله بالسيف إلى الإسلام كرها بموضع علمه بذلك فيه، أم هل أمضى لقوم يونس مشيئتهم حين أبوا أن يؤمنوا حتى أظلهم العذاب فآمنوا وقبل منهم، ورد على غيرهم الإيمان فلم يقبل منهم، وقال تعالى {(فلما رأوا بأسنا قالوا آمنا بالله وحده وكفرنا بما كنا به مشركين، فلم يك ينفعهم إيمانهم لما رأوا بأسنا سنت الله التي قد خلت في عباده)} أي علم الله الذي قد خلا في خلقه، {(وخسر هنالك الكافرون)}. وذلك كان موقعهم عنده أن يهلكوا بغير قبول منهم، بل الهدى والضلالة، والكفر والإيمان، والخير والشر، بيد الله يهدي من يشاء ويذر من يشاء في طغيانهم يعمهون. كذلك قال إبراهيم عليه السلام: {(واجنبني وبني أن نعبد الأصنام)}، وقال عليه السلام: {(ربنا واجعلنا مسلمين لك ومن ذريتنا أمة مسلمة لك)}. أي أن الإيمان والإسلام بيدك، وإن عبادة من عبد الأصنام بيدك، فأنكرتم ذلك وجعلتموه ملكا بأيديكم دون مشيئة الله عز وجل.
وقلتم في القتل أنه بغير أجل، وقد سماه الله لكم في كتابه فقال ليحيى {(وسلام عليه يوم ولد ويوم يموت ويوم يبعث حيا)} فلم يمت يحيى إلا بالقتل، وهو موت كما مات من قتل منهم شهيدا، أو قتل عمدا، أو قتل خطأ، كمن مات بمرض أو فجأة، كل ذلك موت بأجل توفاه، ورزق استكمله، وأثر بلغه، ومضجع برز إليه {(وما كان لنفس أن تموت إلا بإذن الله كتابا مؤجلا)} ولا تموت نفس ولها في الدنيا عمر ساعة إلا بلغته، ولا موضع قدم إلا وطأته، ولا مثقال حبة من رزق إلا استكملته، ولا مضجع بحيث كان إلا برزت إليه، يصدق ذلك قول الله عز وجل {(قل للذين كفروا ستغلبون وتحشرون}
{إلى جهنم)} فأخبر الله سبحانه بعذابهم بالقتل في الدنيا، والآخرة بالنار، وهم أحياء بمكة، وتقولون أنتم أنهم قد كانوا ملكوا رد علم الله في العذابين اللذين أخبر الله ورسوله أنهما نازلان بهم، وقال تعالى {(ثاني عطفه ليضل عن سبيل الله له في الدنيا خزي)} يعني القتل يوم بدر {(ونذيقه يوم القيامة عذاب الحريق)} فانظروا إلى ما أرداكم فيه رأيكم، وكتابا سبق في علمه بشقائكم إن لم يرحمكم ثم قول رسول الله صلى الله عليه وسلم: «بني الإسلام على ثلاثة أعمال؛ الجهاد ماض منذ يوم بعث الله رسوله إلى يوم القيامة فيه عصابة من المؤمنين يقاتلون الدجال لا ينقض ذلك جور جائر، ولا عدل من عدل، والثانية أهل التوحيد لا تكفروهم ولا تشهدوا عليهم بشرك، والثالثة المقادير كلها خيرها وشرها من قدر الله» فنقضتم من الإسلام جهاده، ونقضتم شهادتكم على أمتكم بالكفر، وبرئتم منهم ببدعتكم، وكذبتم بالمقادير كلها. والآجال والأعمال والأرزاق، فما بقيت فى أيديكم خصلة ينبني الإسلام عليها إلا نقضتموها وخرجتم منها.
আবু হামিদ ইবনু জাবালা আমাদের কাছে বর্ণনা করেছেন, মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক আস-সাররাজ বর্ণনা করেছেন, আবূল আশআছ আহমাদ ইবনুল মিকদাম বর্ণনা করেছেন, মুহাম্মাদ ইবনু বাকর আল-বারসানী বর্ণনা করেছেন, সুলাইম ইবনু নুফাই (১) আল-কুরাশী খালাফ আবুল ফাদল আল-কুরাশী থেকে [উমার ইবনু আব্দুল আযীযের একটি পত্র সম্পর্কে বর্ণনা করেছেন]। (এটি) উমার ইবনু আব্দুল আযীযের সেই চিঠির বিষয়ে, যা তিনি সেই দলের কাছে লিখেছিলেন যারা তাঁর কাছে এমন বিষয়ে লিখেছিল যা আল্লাহর কিতাব প্রত্যাখ্যান করার ক্ষেত্রে তাদের জন্য সঠিক ছিল না এবং তাঁর পূর্ববর্তী জ্ঞানে কার্যকর তাকদিরকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছিল, যে জ্ঞানের কোনো সীমা নেই আল্লাহ ছাড়া। আর এর কোনো কিছুই এর থেকে বাইরে নয়। আর তারা আল্লাহর দ্বীন ও তাঁর উম্মতের মধ্যে প্রতিষ্ঠিত তাঁর রাসূলের সুন্নাহর উপর আঘাত করেছিল।
অতঃপর: তোমরা আমার কাছে এমন বিষয়ে লিখেছো যা তোমরা এর আগে গোপন রাখতে। তা হলো আল্লাহর জ্ঞানকে প্রত্যাখ্যান করা এবং তা থেকে বেরিয়ে যাওয়া—যা সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উম্মতের জন্য কদরের প্রতি মিথ্যারোপের ভয় করতেন। তোমরা তো জানো যে, আহলুস সুন্নাহ (সুন্নাহর অনুসারীরা) বলতেন: সুন্নাহকে আঁকড়ে ধরা মুক্তি, আর জ্ঞান খুব দ্রুত তুলে নেওয়া হবে (৩)। আর উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জনগণকে উপদেশ দেওয়ার সময় বলেছিলেন: কোনো ব্যক্তির জন্য আল্লাহর কাছে কোনো অজুহাত নেই সুস্পষ্ট প্রমাণের পরে যে, সে এমন ভ্রষ্টতাকে আঁকড়ে ধরেছে যাকে সে হিদায়াত মনে করেছে, আর না এমন হিদায়াতের ক্ষেত্রে যা সে ত্যাগ করেছে এবং ভ্রষ্টতা মনে করেছে। সকল বিষয় সুস্পষ্ট হয়ে গেছে এবং প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয়েছে ও অজুহাত খণ্ডিত হয়েছে। সুতরাং যে ব্যক্তি নবুয়তের সংবাদ ও কিতাব নিয়ে যা এসেছে, তা থেকে মুখ ফিরিয়ে নেবে, তার হাত থেকে হিদায়াতের সমস্ত রশি ছিন্ন হয়ে যাবে এবং ধ্বংস থেকে মুক্তি পাওয়ার জন্য সে কোনো আশ্রয় পাবে না।
আর তোমরা উল্লেখ করেছো যে, তোমাদের কাছে পৌঁছেছে যে আমি বলি, আল্লাহ অবশ্যই জানেন বান্দারা কী করবে এবং তাদের পরিণতি কী হবে। তোমরা তা অস্বীকার করেছো এবং বলেছো: আল্লাহর জ্ঞানে ততক্ষণ পর্যন্ত তা হবে না, যতক্ষণ না তা সৃষ্টি থেকে কাজ হিসেবে প্রকাশ পায়। তোমাদের কথা অনুযায়ী তা কীভাবে হতে পারে? আল্লাহ তাআলা বলেন: (إنا كاشفوا العذاب قليلا إنكم عائدون) “আমি কিছুকালের জন্য তোমাদের থেকে আযাব তুলে নিচ্ছি, তোমরা আবার কুফরীর দিকে ফিরে যাবে।” (সূরা দুখান: ১৫) আল্লাহ তাআলা আরো বলেন: (ولو ردوا لعادوا لما نهوا عنه وإنهم لكاذبون) “যদি তাদেরকে ফিরিয়ে দেওয়া হয়, তবে তারা যা থেকে তাদেরকে নিষেধ করা হয়েছিল, আবার তাই করবে। তারা তো মিথ্যাবাদী।” (সূরা আন'আম: ২৮)
তোমরা তোমাদের মূর্খতার কারণে আল্লাহর বাণী: (فمن شاء فليؤمن ومن شاء فليكفر) “সুতরাং যার ইচ্ছা ঈমান আনুক এবং যার ইচ্ছা কুফরী করুক” (সূরা কাহফ: ২৯) সম্পর্কে ধারণা করেছো যে, এই ইচ্ছাশক্তি তোমাদের পছন্দের যেকোনো কিছু করার জন্য রয়েছে—তা ভ্রষ্টতাই হোক বা হিদায়াত। অথচ আল্লাহ তাআলা বলেন: (وما تشاؤن إلا أن يشاء الله رب العالمين) “তোমরা শুধু ততটুকুই চাও, যা জগৎসমূহের প্রতিপালক আল্লাহ চান।” (সূরা আত-তাকভীর: ২৯)
সুতরাং, আল্লাহর ইচ্ছার কারণে তারা ইচ্ছা করেছে। আর আল্লাহ যদি না চাইতেন, তবে তারা তাদের ইচ্ছার মাধ্যমে তাঁর আনুগত্যের কোনো কিছুই লাভ করতে পারত না—কথা বা কাজ কোনোভাবেই নয়। কারণ, আল্লাহ তাআলা বান্দাদেরকে তাঁর হাতে থাকা কিছুর মালিক বানাননি এবং তাঁর রাসূলদের থেকে যা তিনি বিরত রাখেন, তা তাদের কাছে সোপর্দও করেননি। অবশ্যই রাসূলগণ সমস্ত মানুষের হিদায়াতের জন্য সচেষ্ট ছিলেন, কিন্তু তাদের মধ্যে শুধু সেই ব্যক্তিই হিদায়াত লাভ করেছে যাকে আল্লাহ হিদায়াত দিয়েছেন। আর অবশ্যই ইবলীস তাদের সবাইকে পথভ্রষ্ট করার জন্য সচেষ্ট ছিল, কিন্তু তাদের মধ্যে শুধু সেই ব্যক্তিই পথভ্রষ্ট হয়েছে, যে আল্লাহর জ্ঞানে পথভ্রষ্ট ছিল।
তোমরা তোমাদের অজ্ঞতাবশত দাবি করেছো যে, আল্লাহর জ্ঞান এমন নয় যা বান্দাদেরকে তাঁর অবাধ্যতার কাজে বাধ্য করে, আর না তা এমন যে তাদেরকে তাঁর আনুগত্যের কাজ থেকে বিরত রাখে। বরং তোমাদের দাবি অনুযায়ী, আল্লাহ যেমন জানেন যে তারা তাঁর অবাধ্যতা করবে, তেমনি তিনি জানেন যে তারা তা ত্যাগ করতে সক্ষম হবে। ফলে তোমরা আল্লাহর জ্ঞানকে বাতিল বলে গণ্য করেছো। তোমরা বলো: বান্দা যদি চাইত, তবে সে আল্লাহর আনুগত্যের কাজ করত, যদিও আল্লাহর জ্ঞানে সে তা সম্পাদনকারী নয়। আর যদি চাইত, তবে সে তাঁর অবাধ্যতা ত্যাগ করত, যদিও আল্লাহর জ্ঞানে সে তা ত্যাগকারী নয়। সুতরাং, যখন তোমরা চাও, তখন তোমরা তা অর্জন করো এবং তা জ্ঞান হয়; আবার যখন তোমরা চাও, তখন তোমরা তা বাতিল করো এবং তা অজ্ঞতা হয়। আর যদি তোমরা চাও, তবে তোমরা তোমাদের নিজেদের থেকে এমন জ্ঞান সৃষ্টি করো যা আল্লাহর জ্ঞানে নেই এবং এর মাধ্যমে তোমরা আল্লাহর জ্ঞানকে তোমাদের থেকে বিচ্ছিন্ন করো। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটিকে তাওহীদের একটি ত্রুটি মনে করতেন এবং তিনি বলতেন: আল্লাহ তাঁর অনুগ্রহ ও দয়াকে তাঁর পক্ষ থেকে কোনো বণ্টন বা নির্বাচন ছাড়া ছেড়ে দেননি। তিনি তাঁর রাসূলদেরকে তাঁর পূর্ব জ্ঞানের বিষয়কে বাতিল করার জন্য পাঠাননি। তোমরা একদিকে জ্ঞানকে স্বীকার করো, আবার অন্যদিকে তা অস্বীকার করো। অথচ আল্লাহ তাআলা বলেন: (يعلم ما بين أيديهم وما خلفهم ولا يحيطون بشيء من علمه إلا بما شاء) “তিনি তাদের সম্মুখের ও পশ্চাতের সবকিছু জানেন, কিন্তু তারা তাঁর জ্ঞানের কোনো কিছুই আয়ত্ত করতে পারে না, তবে তিনি যতটুকু ইচ্ছা করেন (ততটুকু ছাড়া)।” (সূরা ত্বাহা: ১১০) সুতরাং, সৃষ্টি আল্লাহর জ্ঞানের দিকেই প্রত্যাবর্তনকারী এবং সেদিকেই তারা অবতরণকারী। এর মাঝে এমন কিছুই নেই যা ঘটবে অথচ তা আল্লাহ থেকে গোপন থাকবে বা তাঁকে আড়াল করবে। নিশ্চয়ই তিনি সর্বজ্ঞ, প্রজ্ঞাময়।
তোমরা বলেছো: আল্লাহ যদি চাইতেন, তবে তিনি তাঁর কিতাবে একদল মানুষ সম্পর্কে যা জানিয়েছেন, তার বিপরীত কাজের বাধ্যবাধকতা দিতেন না। আর তাদের জন্য এমন কাজ রয়েছে যা তারা করে এবং এ বিষয়ে তিনি বলেছেন: (سنمتعهم قليلا ثم يمسهم منا عذاب أليم) “আমি তাদের কিছুদিনের জন্য ভোগবিলাস করতে দেবো, অতঃপর আমার পক্ষ থেকে তাদের উপর কঠিন শাস্তি আসবে।” (সূরা লুকমান: ২৪) অতএব, তিনি তাদের কাজ করার পূর্বেই জানিয়েছেন যে তারা কাজ করবে, এবং তিনি তাদের সৃষ্টি করার পূর্বেই জানিয়েছেন যে তিনি তাদের শাস্তি দেবেন। তোমরা বলো: তারা যদি চাইত, তবে আল্লাহর শাস্তির জ্ঞান থেকে বেরিয়ে এসে তাঁর সেই রহমতের দিকে চলে যেত যা তিনি তাদের জন্য জানতেন না। যে ব্যক্তি এমন দাবি করে, সে প্রত্যাখ্যানের মাধ্যমে আল্লাহর কিতাবের সাথে শত্রুতা পোষণ করল।
আল্লাহ তাআলা তাঁর পূর্ব জ্ঞানের মাধ্যমে তাঁর রাসূলদের মধ্যে অনেক পুরুষের নাম ও কাজ উল্লেখ করেছেন। ফলে তাদের পিতারাও সেই নাম পরিবর্তন করতে পারেনি, আর ইবলীসও তাদের জন্য তাঁর জ্ঞানে পূর্ব নির্ধারিত অনুগ্রহ পরিবর্তন করতে পারেনি। তিনি বলেছেন: (واذكر عبادنا إبراهيم وإسحاق ويعقوب ذى الأيدي والأبصار إنا أخلصناهم بخالصة ذكرى الدار) “আর স্মরণ করো আমাদের বান্দা ইব্রাহীম, ইসহাক ও ইয়াকুবকে—যারা ছিল হাত ও দৃষ্টির অধিকারী। নিশ্চয়ই আমি তাদেরকে এক বিশেষ গুণের অধিকারী করেছিলাম—তা হলো আখিরাতের স্মরণ।” (সূরা সাদ: ৪৫-৪৬) আল্লাহ তাঁর ক্ষমতায় এর চেয়েও অধিক সম্মানিত এবং তিনি এর কোনো কিছুতে তাঁর জ্ঞান বাতিল করার ক্ষমতা কাউকে দেননি। তিনি তাঁর অহীর মাধ্যমে তাদের নাম দিয়েছেন, যার সম্মুখ বা পেছন থেকে বাতিল আসতে পারে না, অথবা তাঁর সৃষ্টিতে কাউকে অংশীদার করতে পারেন না, অথবা যাকে তিনি তাঁর রহমত থেকে বের করে দিয়েছেন, তাকে তাতে প্রবেশ করাতে পারেন না, অথবা যাকে তিনি তাতে প্রবেশ করিয়েছেন, তাকে বের করে দিতে পারেন না।
যে ব্যক্তি দাবি করে যে, জ্ঞান সৃষ্টির পরে এসেছে, সে অবশ্যই আল্লাহর ব্যাপারে জঘন্য মূর্খতা পোষণ করে। বরং আল্লাহ সৃষ্টি করার পূর্বেও সর্বদা একা সব বিষয়ে জ্ঞানী এবং সব কিছুর সাক্ষী ছিলেন। সৃষ্টি করার পরেও তাই। তাদের সৃষ্টির শুরুতে তাঁর জ্ঞান কমে যায়নি, আর তাদের কাজের পরেও তা বাড়েনি, আর না তাদের প্রয়োজনীয়তা দ্বারা, যার মাধ্যমে তিনি তাদের সীমালঙ্ঘনকারীদের শেকড় কেটে দিয়েছেন। ইবলীস তার নিজের জন্য হিদায়াত বা অন্য কারো জন্য পথভ্রষ্টতার মালিক নয়।
তোমরা তোমাদের দাবির মাধ্যমে আল্লাহর সৃষ্টিতে তাঁর জ্ঞানকে বাতিল করতে চেয়েছো এবং তাঁর ইবাদতকে অগ্রাহ্য করতে চেয়েছো। অথচ আল্লাহর কিতাব তোমাদের বিদআত ও তোমাদের অতিরিক্ত দাবিকে খণ্ডন করার জন্য বিদ্যমান। তোমরা তো জানো যে, আল্লাহ যখন তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরণ করেন, তখন লোকেরা ছিল মুশরিক। আল্লাহ যার জন্য হিদায়াত চেয়েছেন, তার পূর্বের ভ্রষ্টতা আল্লাহর ইচ্ছার পথে বাধা হয়নি। আর যার জন্য আল্লাহ হিদায়াত চাননি, তাকে তিনি কুফরীর মধ্যে পথভ্রষ্ট হিসেবে ছেড়ে দিয়েছেন। ফলে তার ভ্রষ্টতাই তার হিদায়াতের চেয়ে বেশি উপযুক্ত ছিল।
তোমরা দাবি করো যে, আল্লাহ তোমাদের হৃদয়ে আনুগত্য ও অবাধ্যতা স্থাপন করেছেন। এরপর তোমরা তোমাদের ক্ষমতা দিয়ে তাঁর আনুগত্যের কাজ করেছো এবং তোমাদের ক্ষমতা দিয়ে তাঁর অবাধ্যতাকে ত্যাগ করেছো। আর আল্লাহ তাআলা কারো জন্য তাঁর রহমতকে নির্দিষ্ট করা থেকে বা কাউকে তাঁর অবাধ্যতা থেকে বিরত রাখা থেকে মুক্ত। তোমরা দাবি করো যে, যা কদর অনুযায়ী ঘটে, তা তোমাদের মতে কেবল স্বাচ্ছন্দ্য, সচ্ছলতা ও নিয়ামত। আর তোমরা এর থেকে কাজগুলোকে বাদ দিয়েছো। তোমরা অস্বীকার করেছো যে, আল্লাহর পক্ষ থেকে কারো জন্য পূর্ব নির্ধারিত ভ্রষ্টতা বা হিদায়াত ছিল। তোমরা নিজেরাই তোমাদের নিজেদেরকে আল্লাহ ছাড়া হিদায়াত করেছো এবং তোমরা নিজেরাই আল্লাহর শক্তি বা অনুমতি ছাড়াই নিজেদেরকে অবাধ্যতা থেকে বিরত রেখেছো। যে ব্যক্তি এমন দাবি করে, সে অবশ্যই কথায় সীমালঙ্ঘন করেছে। কারণ, যদি এমন কিছু থাকত যা আল্লাহর জ্ঞান ও তাকদীরে পূর্বে ছিল না, তবে আল্লাহর রাজত্বে একজন অংশীদার থাকত যে আল্লাহ ছাড়া সৃষ্টিতে তার ইচ্ছাকে কার্যকর করত।
আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা বলেন: (حبب إليكم الإيمان وزينه في قلوبكم) “আল্লাহ তোমাদের কাছে ঈমানকে প্রিয় করেছেন এবং তাকে তোমাদের হৃদয়ে সুশোভিত করেছেন।” (সূরা হুজরাত: ৭) অথচ তারা এর আগে তা অপছন্দ করত। (وكره إليكم الكفر والفسوق والعصيان) “এবং তিনি তোমাদের কাছে কুফর, ফাসেকী ও অবাধ্যতাকে অপছন্দনীয় করেছেন।” (সূরা হুজরাত: ৭) অথচ তারা এর আগে তা ভালোবাসত। আর তারা নিজেদের জন্য এর কোনো কিছুর উপর সক্ষম ছিল না।
অতঃপর তিনি মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য সালাত এবং তাঁর ও তাঁর সাহাবীদের জন্য ক্ষমা সম্পর্কে যা পূর্বে নির্ধারিত ছিল, তা সম্পর্কে জানিয়েছেন। আল্লাহ তাআলা বলেন: (أشداء على الكفار رحماء بينهم) “তারা কাফেরদের প্রতি কঠোর এবং পরস্পরের প্রতি সহানুভূতিশীল।” (সূরা ফাতহ: ২৯) তিনি আরো বলেন: (ليغفر لك الله ما تقدم من ذنبك وما تأخر) “যাতে আল্লাহ আপনার অতীত ও ভবিষ্যতের সব পাপ ক্ষমা করে দেন।” (সূরা ফাতহ: ২) যদি তাঁর জ্ঞান না থাকত, তবে তিনি কাজ করার পূর্বেই আল্লাহ তাঁকে ক্ষমা করতেন না। আর এটা হলো আল্লাহ কর্তৃক তাদের জন্য পূর্ব নির্ধারিত অনুগ্রহ যা তিনি তাদের সৃষ্টি করার পূর্বেই নির্ধারণ করে রেখেছিলেন এবং তাদের ঈমান আনার পূর্বেই তাদের প্রতি সন্তুষ্ট ছিলেন।
অতঃপর তিনি তাদের কাজ করার পূর্বেই তারা কী করবে, সে বিষয়ে জানিয়েছেন। তিনি বলেন: (تراهم ركعا سجدا يبتغون فضلا من الله ورضوانا) “তুমি তাদেরকে দেখবে রুকুকারী ও সিজদাকারী অবস্থায়, তারা আল্লাহর অনুগ্রহ ও সন্তুষ্টি কামনা করে।” (সূরা ফাতহ: ২৯) কিন্তু তোমরা বলো: তারা তাদের কাজ সম্পর্কে আল্লাহর দেওয়া সংবাদকে প্রত্যাখ্যান করার ক্ষমতা রাখত, এবং তাদের কাছেই ক্ষমতা ছিল যেন তারা তাদের কুফরীর উপর টিকে থাকে, আর এর মাধ্যমে তাদের নিজেদের জন্য যা চেয়েছিল সেই কুফরীই বাস্তবে পরিণত হতো, এবং আল্লাহ তাঁর পছন্দের বিষয়ে যে অহী করেছেন তা সত্যায়িত হতো না। বরং আল্লাহরই চূড়ান্ত প্রমাণ রয়েছে।
আর আল্লাহ তাআলা তাঁর বাণীতে বলেছেন: (لولا كتاب من الله سبق لمسكم فيما أخذتم عذاب عظيم) “যদি আল্লাহর পূর্ব লিখিত বিধান না থাকত, তবে তোমরা যা গ্রহণ করেছিলে, তজ্জন্য তোমাদের উপর অবশ্যই কঠিন আযাব আসত।” (সূরা আনফাল: ৬৮) অতএব, তাদের অনুমতি দেওয়ার পূর্বেই আল্লাহ কর্তৃক তাদের গৃহীত বিষয়ে ক্ষমা পূর্ব নির্ধারিত ছিল। তোমরা বলো: তারা যদি চাইত, তবে তাদের সেই ক্ষমা সম্পর্কে আল্লাহর জ্ঞান থেকে বেরিয়ে আসত সেই জ্ঞানের দিকে যা তিনি জানতেন না, আর তা হলো তাদের গৃহীত বিষয় ত্যাগ করা। যে ব্যক্তি এমন দাবি করে, সে অবশ্যই সীমালঙ্ঘন ও মিথ্যাচার করল।
আল্লাহ তাআলা অনেক মানুষের কথা উল্লেখ করেছেন, যারা তখনো পুরুষদের মেরুদণ্ড ও নারীদের গর্ভে ছিল। তিনি বলেন: (وآخرين منهم لما يلحقوا بهم) “এবং তাদের মধ্যেকার অন্যান্যদের জন্যও যারা এখনো তাদের সাথে মিলিত হয়নি।” (সূরা জুমুআহ: ৩) তিনি আরো বলেন: (والذين جاؤ من بعدهم يقولون ربنا اغفر لنا ولإخواننا الذين سبقونا بالإيمان) “আর যারা তাদের পরে এসেছে, তারা বলে: হে আমাদের রব! আমাদেরকে ও আমাদের ভাইদেরকে ক্ষমা করুন, যারা ঈমানের সাথে আমাদের পূর্বে গত হয়েছেন।” (সূরা হাশর: ১০)
সুতরাং, তাদের সৃষ্টি করার পূর্বেই আল্লাহর পক্ষ থেকে তাদের জন্য রহমত এবং তাদের জন্য ক্ষমাপ্রার্থনা পূর্ব নির্ধারিত ছিল, তাদের কাছে যারা ঈমানের ক্ষেত্রে তাদের পূর্বে গত হয়নি, তাদের দ্বারা তারা দোয়া করার পূর্বেই। আল্লাহ সম্পর্কে জ্ঞানী ব্যক্তিরা জানেন যে, আল্লাহ কোনো কিছু ইচ্ছা করলে, অন্য কারো ইচ্ছা সেই ইচ্ছা কার্যকর হওয়া থেকে বাধা দিতে পারে না। তিনি একদল লোকের জন্য হিদায়াত চেয়েছিলেন, ফলে কেউই তাদের পথভ্রষ্ট করতে পারেনি। আর ইবলীস একদল লোকের জন্য পথভ্রষ্টতা চেয়েছিল, কিন্তু তারা হিদায়াতপ্রাপ্ত হয়েছে।
তিনি মূসা ও হারুনকে বললেন: (اذهبا إلى فرعون إنه طغى فقولا له قولا لينا لعله يتذكر أو يخشى) “তোমরা ফিরআউনের কাছে যাও, সে সীমালঙ্ঘন করেছে। তোমরা তার সঙ্গে নম্রভাবে কথা বলো, যাতে সে উপদেশ গ্রহণ করে অথবা ভয় করে।” (সূরা ত্বাহা: ৪৩-৪৪) [অথচ মূসা (আঃ) আল্লাহর পূর্ব জ্ঞানের মধ্যে ছিলেন যে, ফিরআউন তাদের জন্য শত্রু ও দুঃখের কারণ হবে। আল্লাহ তাআলা বলেন: (ونري فرعون وهامان وجنودهما منهم ما كانوا يحذرون) “আর আমরা ফিরআউন, হামান ও তাদের সেনাবাহিনীকে তাদের পক্ষ থেকে এমন কিছু দেখাব যা তারা ভয় করত।” (সূরা কাসাস: ৬) আর তিনি বলেন:] (ليكون لهم عدوا وحزنا) “যেন সে তাদের জন্য শত্রু ও দুঃখের কারণ হয়।” (সূরা কাসাস: ৮)
কিন্তু তোমরা বলো: ফিরআউন যদি চাইত, তবে সে মূসার বন্ধু ও সাহায্যকারী হতে পারত। অথচ আল্লাহ তাআলা বলেন: (إنهم جند مغرقون) “নিশ্চয়ই তারা ডুবে মরার জন্য বাহিনী।” (সূরা দুখান: ২৪) তাঁর অহী দ্বারা প্রথম যুগের লোকদের আলোচনায় এই বিষয়টি তাঁর কাছে প্রতিষ্ঠিত ছিল।
যেমন তিনি আদমকে সৃষ্টি করার পূর্বেই তাঁর পূর্ব জ্ঞানে বলেছিলেন: (إني جاعل في الأرض خليفة) “আমি পৃথিবীতে একজন খলীফা সৃষ্টি করতে যাচ্ছি।” (সূরা বাকারা: ৩০) ফলে আদম সেই অবাধ্যতার দিকেই প্রত্যাবর্তন করেছিলেন যা দ্বারা তিনি পরীক্ষিত হয়েছিলেন। আর যেমন ইবলীস সম্পর্কে তাঁর পূর্ব জ্ঞানে ছিল যে সে নিন্দিত ও বিতাড়িত হবে, আর সে তারই দিকে ফিরে গিয়েছিল যখন সে আদমকে সিজদা করতে অস্বীকার করেছিল। এরপর আদম তাওবা পেয়েছিলেন এবং ক্ষমা লাভ করেছিলেন, আর ইবলীস অভিশাপ পেয়েছিল এবং পথভ্রষ্ট হয়েছিল। এরপর আদমকে সেই জমিনে নামানো হয়েছিল যার জন্য তাঁকে সৃষ্টি করা হয়েছিল—ক্ষমা প্রাপ্ত ও তাওবা কবুল হওয়া অবস্থায়, আর ইবলীসকে তার অবকাশ নিয়ে নিন্দিত, বিতাড়িত ও অসন্তুষ্ট অবস্থায় নামানো হয়েছিল।
আর তোমরা বলো: ইবলীস ও তার জিন সঙ্গী সাথীরা আল্লাহর জ্ঞানকে প্রত্যাখ্যান করার ক্ষমতা রাখত এবং তাঁর সেই নির্ধারিত বণ্টন থেকে বের হয়ে যাওয়ার ক্ষমতা রাখত, যা তিনি শপথ করে বলেছিলেন: (فالحق والحق أقول، لأملأن جهنم منك وممن تبعك منهم أجمعين) “আমি সত্য বলছি এবং আমি সত্যই বলি, আমি অবশ্যই তোমার দ্বারা এবং তাদের মধ্যে যারা তোমার অনুসরণ করবে তাদের সবার দ্বারা জাহান্নাম পূর্ণ করব।” (সূরা সাদ: ৮৪-৮৫) —এমনকি তাদের ইচ্ছা ছাড়া যেন তাঁর কোনো জ্ঞান কার্যকর না হয়। তোমরা আল্লাহর জ্ঞান প্রত্যাখ্যান করে নিজেদের ধ্বংসের জন্য কী চাও?
নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা তোমাদেরকে তোমাদের নিজেদের সৃষ্টির সাক্ষী করেননি। তবে তোমাদের অজ্ঞতা কীভাবে তাঁর জ্ঞানকে পরিবেষ্টন করতে পারে? আল্লাহর জ্ঞান এমন কিছুর চেয়ে কম নয় যা অস্তিত্বশীল, আর না তাঁর জ্ঞানকে কেউ প্রত্যাখ্যান করতে পারে। তোমরা যদি প্রতি মুহূর্তে এক অবস্থা থেকে অন্য অস্তিত্বশীল অবস্থায় স্থানান্তরিত হও, তবুও তোমাদের অবস্থান তাঁর কাছেই থাকবে। আদম সৃষ্টির পূর্বে ফেরেশতারা জানত যে, পৃথিবীতে বান্দাদের দ্বারা কী ধরনের দুর্নীতি ও রক্তপাত ঘটবে। অথচ গায়েবের কোনো জ্ঞান তাদের ছিল না। আল্লাহর জ্ঞানে দুর্নীতি ও রক্তপাত ছিল, আর তারা শুধু অনুমান করে বলেনি, বরং সর্বজ্ঞ, প্রজ্ঞাময় আল্লাহই তাদেরকে এই কথা বলার শিক্ষা দিয়েছিলেন এবং এর মাধ্যমে তিনি তাদেরকে কথা বলিয়েছিলেন।
তোমরা অস্বীকার করো যে, আল্লাহ একদল মানুষকে পথভ্রষ্ট হওয়ার পূর্বেই পথভ্রষ্ট করেছেন এবং বিপথগামী হওয়ার পূর্বেই বিপথগামী করেছেন। অথচ মুমিনরা এই বিষয়ে কোনো সন্দেহ করে না যে, আল্লাহ বান্দাদের সৃষ্টি করার পূর্বেই তাদের মধ্যে মুমিনকে কাফের থেকে এবং নেককারকে পাপী থেকে আলাদা করে চিনেছেন। আল্লাহর বান্দা যে ব্যক্তি মুমিন, সে কীভাবে কাফের হতে পারে, অথবা যে আল্লাহর কাছে কাফের, সে কীভাবে মুমিন হতে পারে? আল্লাহ তাআলা বলেন: (أومن كان ميتا فأحييناه وجعلنا له نورا يمشي به في الناس كمن مثله في الظلمات ليس بخارج منها) “আর যে ব্যক্তি মৃত ছিল, এরপর আমি তাকে জীবন দান করেছি এবং তার জন্য আলোর ব্যবস্থা করেছি, যার সাহায্যে সে মানুষের মধ্যে চলাফেরা করে, সে কি ঐ ব্যক্তির মতো, যে অন্ধকারে আছে, যেখান থেকে সে বের হতে পারে না?” (সূরা আন'আম: ১২২) সুতরাং, সে বিভ্রান্তিতে আছে এবং আল্লাহর অনুমতি ছাড়া কখনোই তা থেকে বের হবে না।
এরপর অন্য একদল লোক হিদায়াত লাভের পরে একটি বাছুরকে উপাস্য হিসেবে গ্রহণ করেছিল, ফলে তারা পথভ্রষ্ট হয়েছিল। কিন্তু তাদের ক্ষমা করা হয়েছিল, সম্ভবত তারা কৃতজ্ঞ হবে। ফলে তারা মূসার জাতির অন্তর্ভুক্ত এমন এক জাতিতে পরিণত হয়েছিল যারা সত্যের মাধ্যমে হিদায়াত করত এবং সেই অনুযায়ী ন্যায়বিচার করত। তারা তাদের জন্য পূর্ব নির্ধারিত গন্তব্যে ফিরে গিয়েছিল।
এরপর সামূদ জাতি হিদায়াতের পরে পথভ্রষ্ট হয়েছিল, ফলে তাদেরকে ক্ষমা করা হয়নি এবং তাদের প্রতি দয়া করা হয়নি। সুতরাং, আল্লাহর জ্ঞানে তারা এক চিৎকারের মাধ্যমে নিথর হয়ে গিয়েছিল। তারা তাদের জন্য পূর্ব নির্ধারিত গন্তব্যের দিকেই গিয়েছিল—যে তাদের রাসূল সালিহ (আঃ) তাদের জন্য এসেছিলেন, যে উটনী তাদের জন্য পরীক্ষা ছিল, এবং যে তারা কাফের অবস্থায় তাকে জবাই করবে।
ফেরেশতারা যখন আল্লাহর প্রশংসা ও ইবাদত করছিল, তখন ইবলীস পরীক্ষিত হয়েছিল এবং অবাধ্য হয়েছিল, ফলে তাকে দয়া করা হয়নি। আর আদম পরীক্ষিত হয়েছিলেন এবং অবাধ্য হয়েছিলেন, ফলে তাঁকে দয়া করা হয়েছিল। আদম ভুল করার ইচ্ছা করেছিলেন, কিন্তু ভুলে গিয়েছিলেন, আর ইউসুফ ভুল করার ইচ্ছা করেছিলেন, কিন্তু তাঁকে রক্ষা করা হয়েছিল। তাহলে সেই পরিস্থিতিতে ক্ষমতা (ইস্তিত'আহ) কোথায় ছিল? যা ঘটেছিল, তা না হওয়ার জন্য কি তা কিছু সাহায্য করেছিল? নাকি যা হয়নি, তা হওয়ার জন্য কিছু সাহায্য করেছিল? যাতে এর দ্বারা তোমাদের জন্য কোনো প্রমাণ প্রতিষ্ঠিত হয়? বরং আল্লাহ তোমাদের বর্ণনার চেয়েও বেশি সম্মানিত এবং বেশি শক্তিশালী।
তোমরা অস্বীকার করেছো যে, আল্লাহর পক্ষ থেকে কারো জন্য পূর্ব নির্ধারিত ভ্রষ্টতা বা হিদায়াত ছিল। বরং তোমাদের দাবি অনুযায়ী, তাঁর জ্ঞান শুধু রক্ষাকারী এবং কাজ করার ইচ্ছা তোমাদের হাতে। তোমরা যদি চাও, তবে ঈমানকে ভালোবাসো এবং জান্নাতীদের অন্তর্ভুক্ত হও। এরপর তোমরা তোমাদের অজ্ঞতাবশত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই হাদীসকে, যা আহলুস সুন্নাহ নিয়ে এসেছে এবং যা নাযিলকৃত কিতাবের সত্যায়নকারী, খারাপ কাজে খারাপ কাজের সংযুক্তি বলে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন জিজ্ঞেস করেছিলেন: “আমরা যে কাজ করি, তা কি এমন বিষয় যা শেষ হয়ে গেছে, নাকি এমন বিষয় যা আমরা নতুন করে শুরু করি?” তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছিলেন: “বরং তা এমন বিষয় যা শেষ হয়ে গেছে।” তোমরা তাঁকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করে এবং আল্লাহর জ্ঞানকে অস্বীকার করে তাঁকে আঘাত করেছো। তোমরা বলেছো: যদি আমরা তা থেকে বের হতে না পারি, তবে তা হলো জবর (বাধ্যবাধকতা), আর জবর তোমাদের মতে হলো অবিচার। সুতরাং, তোমরা সৃষ্টিকুলের উপর আল্লাহর জ্ঞানের বাস্তবায়নকে অবিচার বলে আখ্যায়িত করেছো!
অথচ সংবাদ এসেছে: “আল্লাহ আদমকে সৃষ্টি করেছেন এবং তাঁর হাতে তাঁর বংশধরদের ছড়িয়ে দিয়েছেন। তিনি জান্নাতবাসীদের এবং তাদের কাজগুলো লিপিবদ্ধ করেছেন, আর জাহান্নামবাসীদের এবং তাদের কাজগুলো লিপিবদ্ধ করেছেন।”
সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সিফফীনের দিনে বলেছিলেন: হে লোক সকল! তোমাদের দ্বীনের বিষয়ে তোমাদের রায়কে সন্দেহের চোখে দেখো। আমার জীবন যার হাতে, তার কসম! আমরা আবূ জানদালের দিনে যা দেখেছি—যদি আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আদেশ প্রত্যাখ্যান করতে পারতাম, তবে অবশ্যই তা প্রত্যাখ্যান করতাম। আল্লাহর কসম, আমরা কেবল এমন কাজের জন্য আমাদের কাঁধে তলোয়ার রেখেছি, যা তোমাদের এই কাজের আগে আমরা জানতাম।
এরপর তোমরা তোমাদের অজ্ঞতার কারণে বাতিলের ব্যাখ্যা দিয়ে একটি সত্যের দাবি প্রকাশ করেছো। তোমরা মানুষকে আল্লাহর জ্ঞান প্রত্যাখ্যানের দিকে ডাকো। তোমরা বলো: নেকি আসে আল্লাহর পক্ষ থেকে, আর খারাপ আসে আমাদের নিজেদের থেকে। আর তোমাদের ইমামগণ, যারা আহলুস সুন্নাহ, তারা বলেন: নেকি আল্লাহর পক্ষ থেকে পূর্ব নির্ধারিত জ্ঞান অনুযায়ী আসে, এবং খারাপ আমাদের নিজেদের থেকে পূর্ব নির্ধারিত জ্ঞান অনুযায়ী আসে। তোমরা বলো: এটা ততক্ষণ পর্যন্ত হবে না, যতক্ষণ না তা আমাদের নিজেদের থেকে শুরু হয়, যেমন খারাপ কাজ আমাদের নিজেদের থেকে শুরু হয়। আর এটা হলো তোমাদের পক্ষ থেকে কিতাবকে প্রত্যাখ্যান করা এবং দ্বীনকে বাতিল করা।
যখন কদরের বিষয়ে কথা শুরু হলো, তখন ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছিলেন: এটা এই উম্মতের প্রথম শির্ক। আল্লাহর কসম! তাদের খারাপ মত তাদেরকে বিরত রাখবে না, যতক্ষণ না তারা আল্লাহকে ভালো নির্ধারণ করার ক্ষমতা থেকে বের করে দেয়, যেমন তারা তাঁকে খারাপ নির্ধারণ করার ক্ষমতা থেকে বের করে দিয়েছে।
তোমরা তোমাদের অজ্ঞতাবশত দাবি করো যে, যে ব্যক্তি আল্লাহর জ্ঞানে পথভ্রষ্ট ছিল এবং পরে হিদায়াত লাভ করেছে, সে তা অর্জন করেছে। ফলে তার হিদায়াতে এমন কিছু ছিল যা আল্লাহ জানতেন না। আর যে ব্যক্তির বক্ষ ইসলামের জন্য উন্মুক্ত হয়েছে, তা সে অর্জন করেছে আল্লাহর তা উন্মুক্ত করার পূর্বে তাঁকে সোপর্দ করার কারণে। আর যদি সে মুমিন হওয়ার পর কাফের হয়, তবে তা তার নিজের জন্য চাওয়া এবং তার জন্য অর্জন করার কারণে হয়েছে। আর তার কুফরীর ইচ্ছা আল্লাহর ঈমানের ইচ্ছার চেয়ে বেশি কার্যকর ছিল।
বরং আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, যে ব্যক্তি নেক কাজ করেছে, তা তার নিজের কোনো সাহায্য ছাড়াই করেছে, আর যে ব্যক্তি খারাপ কাজ করেছে, তাতে তার কোনো প্রমাণ ছিল না। আর অনুগ্রহ আল্লাহর হাতে, তিনি যাকে চান তাকে তা দেন। আর যদি আল্লাহ সমস্ত মানুষকে হিদায়াত দিতে চাইতেন, তবে তাঁর আদেশ অবশ্যই তাদের উপর কার্যকর হতো যারা পথভ্রষ্ট হয়েছে, যাতে তারা হিদায়াতপ্রাপ্ত হয়।
তোমরা বলছো যে, তাঁর ইচ্ছার মাধ্যমেই তিনি তোমাদের কাছে নেকি অর্পণ করেছেন এবং তোমাদের কাজ সম্পর্কে তাঁর পূর্ব জ্ঞানকে তোমাদের থেকে সরিয়ে খারাপ কাজগুলো তোমাদের উপর ন্যস্ত করেছেন, আর তাঁর ইচ্ছাকে তোমাদের ইচ্ছার অনুসারী করেছেন। তোমাদের জন্য আফসোস! আল্লাহর কসম, তিনি বনী ইসরাঈলের ইচ্ছা কার্যকর করেননি, যখন তারা তাঁকে যা দিয়েছিলেন, তা দৃঢ়তার সাথে নিতে অস্বীকার করেছিল, যতক্ষণ না তিনি পাহাড়কে তাদের উপরে তাঁবুর মতো করে তুলে ধরেছিলেন। তোমরা কি দেখেছো যে, তিনি তার ইচ্ছা এমন ব্যক্তির উপর কার্যকর করেছেন যে পথভ্রষ্ট অবস্থায় ছিল, যখন তিনি তাকে হিদায়াত দিতে চেয়েছিলেন, এমনকি তিনি তাঁর জ্ঞানের কারণে তলোয়ারের মাধ্যমে তাকে অনিচ্ছাসত্ত্বেও ইসলামের মধ্যে প্রবেশ করিয়েছেন? অথবা ইউনুসের জাতির উপর তাদের ইচ্ছা কার্যকর করেছেন, যখন তারা ঈমান আনতে অস্বীকার করেছিল, যতক্ষণ না শাস্তি তাদের উপর ছায়া ফেলেছিল, ফলে তারা ঈমান এনেছিল এবং তাদের ঈমান কবুল হয়েছিল? কিন্তু অন্যদের কাছ থেকে ঈমান প্রত্যাখ্যান করা হয়েছিল এবং তা কবুল করা হয়নি।
আল্লাহ তাআলা বলেন: (فلما رأوا بأسنا قالوا آمنا بالله وحده وكفرنا بما كنا به مشركين، فلم يك ينفعهم إيمانهم لما رأوا بأسنا سنت الله التي قد خلت في عباده) “অতঃপর যখন তারা আমার শাস্তি দেখল, তখন বলল: আমরা আল্লাহর প্রতি বিশ্বাস স্থাপন করলাম এবং আমরা যাদেরকে তাঁর সাথে শরীক করতাম, তাদেরকে অস্বীকার করলাম। কিন্তু যখন তারা আমার শাস্তি দেখল, তখন তাদের ঈমান কোনো উপকারে আসল না। এটা আল্লাহর রীতি, যা তাঁর বান্দাদের মধ্যে পূর্ব থেকে চলে আসছে।” (সূরা মুমিন: ৮৪-৮৫) অর্থাৎ, আল্লাহর জ্ঞান যা তাঁর সৃষ্টির মধ্যে পূর্বে ছিল। (وخسر هنالك الكافرون) “আর সেখানে কাফেররা ক্ষতিগ্রস্ত হলো।” (সূরা মুমিন: ৮৫) আর এটা ছিল আল্লাহর কাছে তাদের সেই অবস্থান, যে তারা তাদের কবুল করা ছাড়াই ধ্বংস হবে। বরং হিদায়াত ও পথভ্রষ্টতা, কুফরী ও ঈমান, ভালো ও মন্দ—সব আল্লাহর হাতে। তিনি যাকে ইচ্ছা হিদায়াত দেন এবং যাকে ইচ্ছা তার অবাধ্যতার মধ্যে ঘুরে বেড়াতে ছেড়ে দেন।
ইব্রাহীম (আঃ) এভাবেই বলেছিলেন: (واجنبني وبني أن نعبد الأصنام) “আমাকে ও আমার সন্তানদেরকে মূর্তিপূজা থেকে দূরে রাখুন।” (সূরা ইব্রাহীম: ৩৫) তিনি আরো বলেন: (ربنا واجعلنا مسلمين لك ومن ذريتنا أمة مسلمة لك) “হে আমাদের রব! আমাদেরকে আপনার অনুগত করুন এবং আমাদের বংশধরদের মধ্য থেকে আপনার এক অনুগত জাতি তৈরি করুন।” (সূরা বাকারা: ১২৮) অর্থাৎ, ঈমান ও ইসলাম আপনার হাতে, আর যে ব্যক্তি মূর্তি পূজা করে, তার ইবাদতও আপনার হাতে। কিন্তু তোমরা তা অস্বীকার করেছো এবং আল্লাহর ইচ্ছা ছাড়া তা তোমাদের নিজেদের হাতে মালিকানা বলে গণ্য করেছো।
আর তোমরা হত্যা সম্পর্কে বলেছো যে, তা বিনা সময়ে ঘটে। অথচ আল্লাহ তাআলা তাঁর কিতাবে তোমাদের জন্য তা নামকরণ করেছেন। তিনি ইয়াহইয়া (আঃ) সম্পর্কে বলেছেন: (وسلام عليه يوم ولد ويوم يموت ويوم يبعث حيا) “তার উপর শান্তি—যেদিন সে জন্মগ্রহণ করে, যেদিন সে মারা যায় এবং যেদিন সে জীবিত পুনরুত্থিত হবে।” (সূরা মারইয়াম: ১৫) ইয়াহইয়া (আঃ) কেবল হত্যার মাধ্যমেই মারা গিয়েছিলেন। আর এটা সেই মৃত্যুর মতোই, যেমন শহীদ অবস্থায় নিহত ব্যক্তি বা ইচ্ছাকৃতভাবে নিহত ব্যক্তি বা ভুলক্রমে নিহত ব্যক্তি মারা যায়, যেমন কেউ রোগে বা হঠাৎ মারা যায়। এই সবই নির্দিষ্ট সময়ে ঘটে যাওয়া মৃত্যু। সে তার রিযিক পূর্ণ করেছে, তার প্রভাব শেষ করেছে এবং সেই বিশ্রামের জায়গায় পৌঁছেছে। (وما كان لنفس أن تموت إلا بإذن الله كتابا مؤجلا) “আল্লাহর অনুমতি ছাড়া কারো মৃত্যু হতে পারে না—এ হলো লিখিত ও নির্দিষ্ট বিধান।” (সূরা আল ইমরান: ১৪৫) কোনো ব্যক্তি এক মুহূর্তের আয়ু থাকতেই মারা যায় না, যতক্ষণ না সে তা পূর্ণ করে। আর না এক কদম রাখার জায়গা না দেখে মারা যায়, আর না এক দানা পরিমাণ রিযিক পূর্ণ না করে মারা যায়, আর না যেখানে তার বিশ্রামের জায়গা আছে, সেখানে না পৌঁছে মারা যায়।
এই কথাটির সত্যতা প্রমাণ করে আল্লাহর এই বাণী: (قل للذين كفروا ستغلبون وتحشرون إلى جهنم) “কাফেরদেরকে বলুন: তোমরা শীঘ্রই পরাজিত হবে এবং তোমাদেরকে জাহান্নামের দিকে একত্রিত করা হবে।” (সূরা আল ইমরান: ১২) সুতরাং, আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তাআলা তাদের মক্কায় জীবিত থাকা অবস্থাতেই দুনিয়ায় হত্যার মাধ্যমে শাস্তি এবং আখিরাতে আগুনের মাধ্যমে শাস্তি সম্পর্কে জানিয়েছেন। তোমরা বলো: তারা আল্লাহর দেওয়া সেই উভয় শাস্তি সম্পর্কে জ্ঞানকে প্রত্যাখ্যান করার ক্ষমতা রাখত, যা আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন যে তা তাদের উপর আসবে। আল্লাহ তাআলা বলেন: (ثاني عطفه ليضل عن سبيل الله له في الدنيا خزي) “সে অহংকার করে মুখ ফিরিয়ে নেয় যাতে আল্লাহর পথ থেকে বিভ্রান্ত করতে পারে। তার জন্য দুনিয়ায় রয়েছে অপমান [অর্থাৎ, বদরের দিন হত্যা] (ونذيقه يوم القيامة عذاب الحريق) আর কিয়ামতের দিন আমি তাকে জ্বলন্ত আগুনের স্বাদ গ্রহণ করাব।” (সূরা হাজ্জ: ৯)
সুতরাং, তোমরা ভেবে দেখো তোমাদের এই মতামত তোমাদেরকে কিসের দিকে নিয়ে যাচ্ছে। আর তোমাদের দুর্ভাগ্য সম্পর্কে তাঁর জ্ঞানে একটি লিখিত বিধান ছিল, যদি না তিনি তোমাদের প্রতি দয়া করেন।
এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী: “ইসলাম তিনটি কাজের উপর নির্মিত হয়েছে: ১. আল্লাহ তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রেরণের দিন থেকে কিয়ামত পর্যন্ত জিহাদ চলমান থাকবে, তাতে মুমিনদের একটি দল দাজ্জালের সাথে যুদ্ধ করবে। কোনো অত্যাচারীর অত্যাচার বা কোনো ন্যায়পরায়ণের ন্যায় তা বাতিল করতে পারবে না। ২. তাওহীদের অনুসারীরা: তোমরা তাদের কাফের বলো না এবং তাদের উপর শির্কের সাক্ষ্য দিও না। ৩. সমস্ত তাকদীর—এর ভালো ও মন্দ আল্লাহর পক্ষ থেকে।”
কিন্তু তোমরা ইসলাম থেকে জিহাদকে বাতিল করেছো, আর তোমাদের উম্মতের উপর কুফরীর সাক্ষ্যকে বাতিল করেছো, এবং তোমাদের বিদআতের কারণে তাদের থেকে মুক্ত হয়েছো, আর তোমরা সমস্ত তাকদীরকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছো—আয়ু, কাজ ও রিযিক। অতএব, তোমাদের হাতে ইসলামের ভিত্তি স্থাপনের জন্য কোনো বৈশিষ্ট্যই আর অবশিষ্ট থাকেনি, যা তোমরা বাতিল করোনি এবং তা থেকে বেরিয়ে আসোনি।
• حدثنا أبو حامد بن جبلة ثنا محمد بن إسحاق ثنا الفضل بن سهل ثنا يزيد بن هارون أنبأنا عبد الله بن يونس الثقفي عن سيار أبي الحكم. قال: قال ابن لعمر بن عبد العزيز يقال له عبد الملك:- وكان يفضل على عمر - يا أبت أقم الحق ولو ساعة من نهار.
সায়্যার আবু হাকাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর ইবনে আব্দুল আযীযের এক পুত্র, যার নাম ছিল আব্দুল মালিক—এবং যাকে উমরের চেয়েও শ্রেষ্ঠ মনে করা হতো—তিনি বললেন: "হে আমার পিতা, দিনের এক মুহূর্তের জন্য হলেও সত্য (হক) প্রতিষ্ঠা করুন।"
• حدثنا عبد الله بن محمد بن جعفر ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم الدورقي ثنا يحيى بن يعلى المحاربي ثنا بعض مشيخة أهل الشام. قال:
كنا نرى أن عمر بن عبد العزيز إنما أدخله في العبادة ما رأى من ابنه عبد الملك.
শামবাসীদের কিছু মাশায়েখ (শিক্ষক) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন: আমরা মনে করতাম যে, উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) কেবল তাঁর পুত্র আব্দুল মালিকের [ধার্মিকতা] দেখেই ইবাদত-বন্দেগীতে মনোযোগী হয়েছেন।
• حدثنا أحمد بن إسحاق ثنا عبد الله بن أبي داود ثنا عباس بن الوليد ابن مزيد أخبرني أبي ثنا الأوزاعي حدثني سليمان بن حبيب المحاربي حدثني عبد الملك بن عمر بن عبد العزيز - قال: وأصابه الطاعون في خلافة أبيه فمات - قال: والله ما من أحد أعز علي من عمر، ولأن أكون سمعت بموته أحب إلي من أن أكون كما رأيته.
আব্দুল মালিক ইবনু উমর ইবনু আব্দুল আযীয থেকে বর্ণিত... তিনি (আব্দুল মালিক) তাঁর পিতার খেলাফতকালে প্লেগ রোগে আক্রান্ত হন এবং মারা যান। তিনি (তাঁর পিতা উমর ইবনু আব্দুল আযীয) বললেন: আল্লাহর শপথ! উমরের চেয়ে অধিক প্রিয় আমার কাছে আর কেউ ছিল না। আমি যেন তার মৃত্যুর সংবাদ শুনি, এটি আমার কাছে তাকে যেভাবে দেখেছি, তার চেয়েও অধিক প্রিয়।
• حدثنا أبو بكر بن مالك ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل ثنا هارون بن معروف ثنا ضمرة ثنا ابن شوذب قال: جاءت امرأة عبد الملك بن عمر إليه وقد ترجلت ولبست إزارا ورداء ونعلين، فلما رآها قال: اعتدى اعتدى.
ইবনু শওযাব থেকে বর্ণিত, আব্দুল মালিক ইবনু উমরের স্ত্রী তার নিকট আসলেন। আর তিনি চুল আঁচড়েছিলেন (বা সাজগোজ করেছিলেন), এবং তিনি লুঙ্গি (ইযার), চাদর (রিদা) ও জুতা পরিধান করেছিলেন। যখন তিনি তাকে দেখলেন, তিনি বললেন: "সংযত হও! সংযত হও!"
• حدثنا أبو بكر بن مالك ثنا عبد الله بن أحمد حدثنا أبي حدثني معمر ابن سليمان الرقي ثنا فرات بن سليمان عن ميمون بن مهران: أن عبد الملك بن عمر قال له: يا أبت ما منعك أن تمضى لما تريد من العدل، فو الله ما كنت أبالي لو غلت بي وبك القدور في ذلك، قال يا بني إنما أنا أروض الناس رياضة الصعب، إنى لأريد أن أحيا الأمر من العدل فأؤخر ذلك حتى أخرج معه طمعا من طمع الدنيا فينفروا من هذه ويسكنوا لهذه.
মায়মূন ইবন মিহরান থেকে বর্ণিত, আব্দুল মালিক ইবন উমর তাঁকে বললেন, হে আমার পিতা! আপনি যে ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠা করতে চেয়েছিলেন, তা পূর্ণরূপে কার্যকর করা থেকে আপনাকে কিসে বিরত রাখল? আল্লাহর শপথ! এ ব্যাপারে (ন্যায়বিচার প্রতিষ্ঠার ক্ষেত্রে) আপনার এবং আমার জন্য যদি কড়াইয়ের পানি টগবগ করত (অর্থাৎ জীবন বিপন্ন হতো), তবুও আমি পরোয়া করতাম না। তিনি বললেন, হে আমার বৎস! আমি তো মানুষকে কঠিন প্রাণীকে প্রশিক্ষণের মতো করে নিয়ন্ত্রণ করছি। আমি অবশ্যই ন্যায়ের একটি বিষয়কে পুনরুজ্জীবিত করতে চাই, কিন্তু আমি তা বিলম্বিত করি, যতক্ষণ না আমি এর সাথে দুনিয়ার লোভনীয় কোনো কিছু জুড়ে দিতে পারি। ফলে তারা যেন প্রথমটি (ন্যায়) থেকে দূরে সরে না যায় এবং দ্বিতীয়টির (দুনিয়ার লোভের) প্রতি স্থির থাকে।
• حدثنا الحسن بن محمد بن كيسان ثنا إسماعيل بن إسحاق القاضي ثنا محمد ابن أبي بكر ثنا محمد بن مروان ثنا هشام بن حسان. قال: قال عمر بن عبد العزيز لمولاه مزاحم: كم ترانا أصبنا من أموال المؤمنين؟ قال قلت يا أمير المؤمنين أتدري ما عيالك؟ قال نعم الله لهم، فخرجت من عنده فلقيت ابنه عبد الملك فقلت له هل تدري ما قال أمير المؤمنين؟ قال: وما قال؟ قلت قال هل تدري ما أصبنا من أموال المؤمنين، قال فما قلت له؟ قال قلت له هل تدري ما عيالك قال نعم الله لهم. قال: عبد الملك بئس الوزير أنت يا مزاحم، ثم جاء يستأذن على أبيه فقال للآذن استأذن لي عليه، فقال له الآذن إنما لأبيك من الليل والنهار هذه الساعة، قال: ما بد من لقائه، فسمع عمر مقالتهما قال من هذا؟ قال الآذن عبد الملك، قال ائذن له. قال: فدخل، فقال: ما جاء بك هذه
الساعة؟ قال شيء ذكره لي مزاحم، قال نعم فما رأيك؟ قال رأيي أن تمضيه قال فإني أروح إلى الصلاة فأصعد المنبر فأرده على رءوس الناس، قال ومن لك أن تعيش إلى الصلاة؟ قال فمه؟ قال الساعة، قال فخرج فنودي في الناس الصلاة جامعة فصعد المنبر فرده على رءوس الناس.
হিশাম ইবনে হাসসান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর ইবনে আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর মাওলা (মুক্ত দাস) মুযাহিমকে বললেন: আমরা কত পরিমাণ সম্পদ মুমিনদের (বাইতুল মাল) থেকে গ্রহণ করেছি বলে তোমার মনে হয়? তিনি (মুযাহিম) বললেন, আমি বললাম, হে আমীরুল মুমিনীন, আপনি কি জানেন আপনার পরিবার পরিজন কারা? তিনি বললেন, হ্যাঁ, আল্লাহ তাদের জন্য যথেষ্ট। অতঃপর আমি তাঁর নিকট থেকে বেরিয়ে এসে তাঁর পুত্র আব্দুল মালিকের সাথে দেখা করলাম এবং তাকে বললাম, আমীরুল মুমিনীন কী বলেছেন, তা কি তুমি জানো? তিনি বললেন, তিনি কী বলেছেন? আমি বললাম, তিনি জিজ্ঞেস করেছেন: মুমিনদের (বাইতুল মালের) সম্পদ থেকে আমরা কত পরিমাণ গ্রহণ করেছি বলে তোমার মনে হয়? তিনি (আব্দুল মালিক) বললেন, তুমি তাঁকে কী উত্তর দিলে? তিনি (মুযাহিম) বললেন, আমি তাঁকে বললাম: আপনি কি জানেন আপনার পরিবার পরিজন কারা? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আল্লাহ তাদের জন্য যথেষ্ট। আব্দুল মালিক বললেন, হে মুযাহিম, তুমি কত নিকৃষ্ট উযীর!
অতঃপর তিনি (আব্দুল মালিক) তাঁর পিতার সাথে দেখা করার অনুমতি নিতে এলেন এবং প্রহরীকে বললেন, আমার জন্য তাঁর কাছে অনুমতি নাও। তখন প্রহরী তাঁকে বলল, রাত-দিনের মধ্যে এই সময়টুকু আপনার পিতার জন্য নির্দিষ্ট। তিনি বললেন, তাঁর সাথে সাক্ষাত করতেই হবে। উমর (রাহিমাহুল্লাহ) তাদের কথাবার্তা শুনলেন এবং বললেন, ইনি কে? প্রহরী বলল, আব্দুল মালিক। তিনি বললেন, তাকে ভেতরে আসার অনুমতি দাও।
তিনি প্রবেশ করলেন। উমর (রাহিমাহুল্লাহ) জিজ্ঞেস করলেন, এই সময়ে তুমি কেন এসেছ? তিনি বললেন, মুযাহিম আমাকে যে বিষয়ে স্মরণ করিয়ে দিয়েছে (সে বিষয়ে)। তিনি বললেন, হ্যাঁ। এ ব্যাপারে তোমার কী মত? আব্দুল মালিক বললেন, আমার মত হলো, আপনি যেন তা (গ্রহণ করা সম্পদ) ফেরত দেন। উমর (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন, আমি (একটু পরে) যখন সালাতের জন্য যাব, তখন মিম্বরে আরোহণ করে জনগণের সামনে তা ফেরত দেব। আব্দুল মালিক বললেন, আপনি সালাতের সময় পর্যন্ত বেঁচে থাকবেন, তার নিশ্চয়তা আপনাকে কে দেবে? তিনি বললেন, তাহলে কী করব? আব্দুল মালিক বললেন, এখনই (তা ফেরত দিন)। উমর (রাহিমাহুল্লাহ) বাইরে এলেন এবং লোকদের মাঝে ঘোষণা করা হলো: ‘আস-সালাতু জামিআহ’ (সালাতের জন্য সমবেত হও)। অতঃপর তিনি মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং জনগণের উপস্থিতিতে তা (সম্পদ) ফেরত দিলেন।
• حدثنا الحسن ثنا إسماعيل ثنا محمد بن أبي بكر ح. وحدثنا أبو محمد بن حيان ثنا أحمد بن الحسين الحذاء ثنا أحمد الدروقى قالا: ثنا سعيد بن عامر عن جويرية بن أسماء عن إسماعيل بن أبي حكيم. قال: كنا عند عمر بن عبد العزيز، فلما تفرقنا نادى مناديه الصلاة جامعة، قال فجئت المسجد فإذا عمر على المنبر فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: أما بعد، فإن هؤلاء أعطونا عطايا ما كان ينبغي لنا أن نأخذها، وما كان ينبغي لهم أن يعطونها، وإني قد رأيت ذلك ليس علي فيه دون الله محاسب، وإني قد بدأت بنفسي وأهل بيتي، اقرأ يا مزاحم، فجعل مزاحم يقرأ كتابا كتابا، ثم يأخذه عمر وبيده الجلم فيقطعه حتى نودي بالظهر.
ইসমাঈল ইবনু আবী হাকীম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা উমার ইবনু আব্দুল আযীযের নিকট ছিলাম। যখন আমরা ছত্রভঙ্গ হলাম, তখন তাঁর ঘোষণাকারী ডাক দিলেন, 'আস-সালাতু জামি'আহ (সম্মিলিত সালাতের জন্য প্রস্তুতি নাও)'। তিনি বলেন, আমি মসজিদে গেলাম এবং দেখলাম উমার (খলীফা) মিম্বরে আছেন। তিনি আল্লাহর প্রশংসা করলেন ও গুণগান করলেন, অতঃপর বললেন: 'আম্মা বা'দ (যাহোক), এই লোকেরা আমাদেরকে এমন উপঢৌকন দিয়েছে যা আমাদের নেওয়া উচিত হয়নি এবং যা তাদের দেওয়াও উচিত হয়নি। আমি এই বিষয়ে সিদ্ধান্ত নিয়েছি, যাতে আল্লাহ ছাড়া অন্য কারো কাছে আমার হিসাব দিতে হবে না। আর আমি আমার নিজের এবং আমার পরিবারবর্গের থেকেই শুরু করেছি। হে মুযাহিম, পড়ো!' অতঃপর মুযাহিম একে একে (উপঢৌকন সংক্রান্ত) নথিগুলো পড়তে শুরু করলেন। এরপর উমার সেগুলো হাতে নিলেন এবং তাঁর হাতের কাঁচি দ্বারা টুকরো টুকরো করে কাটতে থাকলেন, যতক্ষণ না যুহরের সালাতের জন্য আযান দেওয়া হলো।
• حدثنا محمد بن إبراهيم ثنا أبو عروبة الحراني ثنا عمرو بن عثمان ثنا خالد ابن يزيد عن جعونة. قال: دخل عبد الملك على أبيه عمر، فقال يا أمير المؤمنين ماذا تقول لربك إذا أتيته وقد تركت حقا لم تحيه، وباطلا لم تمته؟ قال اقعد يا بنى ان آباءك وأجدادك خدعوا الناس عن الحق فانتهت الأمور إلي، وقد أقبل شرها وأدبر خيرها، ولكن أليس حسبي جميلا أن لا تطلع الشمس علي في يوم إلا أحييت فيه حقا، وأمت فيه باطلا حتى يأتيني الموت وأنا على ذلك.
জা'ঊনাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল মালিক তাঁর পিতা উমারের (খলিফা) নিকট প্রবেশ করলেন এবং বললেন, হে আমীরুল মু'মিনীন, আপনি যখন আপনার রবের কাছে যাবেন, তখন তাঁকে কী জবাব দেবেন, যখন আপনি এমন সত্য (হক) ছেড়ে দিয়েছেন যাকে আপনি জীবিত করেননি এবং এমন মিথ্যা (বাতিল) ছেড়ে দিয়েছেন যাকে আপনি দমন করেননি? তিনি (উমার) বললেন, বসো বৎস! তোমার পিতা ও পিতামহগণ মানুষকে হক (সত্য) থেকে প্রতারিত করেছে। ফলে এই সকল দায়িত্ব আমার কাছে এসে পৌঁছেছে। এখন এর অমঙ্গল দিকটি অগ্রসর হয়েছে এবং মঙ্গল দিকটি পশ্চাদপসরণ করেছে। তবে আমার জন্য কি এটি যথেষ্ট সুন্দর নয় যে, আমার উপর এমন কোনো দিন সূর্য উদিত হয় না, যেদিন আমি তাতে একটি হককে জীবিত করিনি এবং একটি বাতিলকে দমন করিনি? আর আমি সেই অবস্থার উপর থাকাবস্থায়ই যেন আমার মৃত্যু এসে পড়ে।
• حدثنا محمد ثنا أبو عروبة حدثني محمد بن يحيى بن كثير ثنا سعيد بن حفص ثنا أبو المليح عن ميمون - يعني ابن مهران-. قال: بعث إلي عمر بن عبد العزيز وإلى مكحول وإلى أبي قلابة، فقال: ما ترون في هذه الأموال التي أخذت من الناس ظلما؟ فقال مكحول يومئذ قولا ضعيفا كرهه، فقال أرى أن تستأنف فنظر إلي عمر كالمستغيث بي، قلت: يا أمير المؤمنين ابعث إلى عبد الملك فأحضره فإنه ليس بدون من رأيت، قال يا حارث ادع لي عبد الملك،
فلما دخل عليه عبد الملك قال يا عبد الملك ما ترى في هذه الأموال التي قد أخذت من الناس ظلما قد حضروا يطلبونها، وقد عرفنا مواضعها؟ قال أرى أن تردها، فإن لم تفعل كنت شريكا لمن أخذها.
মায়মুন ইবনে মেহরান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর ইবনে আব্দুল আযীয আমার কাছে, মাখহূলের কাছে এবং আবু কিলাবার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: তোমরা এই অর্থ-সম্পদ সম্পর্কে কী মনে করো যা মানুষের কাছ থেকে অন্যায়ভাবে (জুলুম করে) নেওয়া হয়েছে? তখন মাখহূল সেদিন এমন একটি দুর্বল মত দিলেন যা তিনি (উমর) অপছন্দ করলেন। তিনি বললেন: আমার মতে আপনি নতুন করে শুরু করুন (যা হয়েছে তা ভুলে যান)। তখন উমর আমার দিকে তাকালেন যেন তিনি আমার কাছে সাহায্য চাইছেন। আমি বললাম: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি আব্দুল মালিকের কাছে লোক পাঠান এবং তাকে নিয়ে আসুন। কারণ, তিনি আপনার দেখা অন্য কারো চেয়ে কম নন। তিনি বললেন: হে হারিস! আব্দুল মালিককে আমার কাছে ডেকে আনো। আব্দুল মালিক যখন তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি বললেন: হে আব্দুল মালিক! তুমি এই অর্থ-সম্পদ সম্পর্কে কী মনে করো যা মানুষের কাছ থেকে অন্যায়ভাবে নেওয়া হয়েছে, আর এখন তারা এসে তা ফেরত চাইছে এবং আমরা সেগুলোর অবস্থানও জানি? তিনি (আব্দুল মালিক) বললেন: আমার মতে আপনি তা ফেরত দিন। যদি আপনি তা না করেন, তবে যে তা গ্রহণ করেছে, আপনি তার অংশীদার হবেন।
• حدثنا عبد الله بن محمد ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم ثنا سعيد بن عامر عن جويرية بن أسماء عن إسماعيل بن أبي حكيم - وكان كاتب عمر بن عبد العزيز بالمدينة، ولم يزل معه بالشام - قال: دخل عبد الملك على أبيه عمر فقال أين وقع لك رأيك فيما ذكر لك مزاحم من رد المظالم؟ قال علي إنفاذه. فرفع عمر يديه ثم قال: الحمد لله الذي جعل لي من ذريتي من يعينني على أمر ديني، نعم يا بني أصلي الظهر إن شاء الله ثم أصعد المنبر فأردها على رءوس الناس، فقال عبد الملك: يا أمير المؤمنين من لك بالظهر ومن لك يا أمير المؤمنين إن بقيت أن تسلم لك نيتك للظهر؟ قال عمر: فقد تفرق الناس للقائلة، فقال عبد الملك: تأمر مناديك فينادي الصلاة جامعة حتى يجتمع الناس [فأمر مناديه فنادى، فاجتمع الناس وقد جيء بسفط أو جونة فيها تلك الكتب وفي يد عمر جلم يقصه حتى بودى بالظهر](1).
ইসমাঈল ইবনু আবী হাকীম—যিনি মাদীনায় উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ)-এর লেখক (সচিব) ছিলেন এবং যিনি তাঁর সাথে শামেও ছিলেন—তিনি বলেন: আব্দুল মালিক তাঁর পিতা উমার (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট প্রবেশ করে জিজ্ঞাসা করলেন, “মুযাহিম আপনাকে যে মজালিম (অবিচারমূলকভাবে দখলকৃত সম্পত্তি) ফিরিয়ে দেওয়া সম্পর্কে বলেছিলেন, সে বিষয়ে আপনার সিদ্ধান্ত কী দাঁড়াল?” তিনি বললেন, “আমার জন্য এটি কার্যকর করা অবশ্য কর্তব্য।” অতঃপর উমার (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁর দু’হাত উপরে তুলে বললেন, “সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য, যিনি আমার বংশধরদের মধ্যে এমন কাউকে সৃষ্টি করেছেন, যে আমাকে আমার দীনের বিষয়ে সাহায্য করে। হ্যাঁ, হে আমার পুত্র, ইনশাআল্লাহ আমি যোহরের সালাত আদায় করব, অতঃপর মিম্বরে আরোহণ করে সকলের সামনে তা ফিরিয়ে দেব।” তখন আব্দুল মালিক বললেন, “হে আমীরুল মুমিনীন! যোহর পর্যন্ত বেঁচে থাকার নিশ্চয়তা আপনার কে দিচ্ছে? আর হে আমীরুল মুমিনীন! যোহর পর্যন্ত বেঁচে থাকলেও আপনার নিয়ত অটুট থাকার নিশ্চয়তা কে দিচ্ছে?” উমার (রাহিমাহুল্লাহ) বললেন, “মানুষজন তো কাইলূলাহর (দুপুরের বিশ্রামের) জন্য ছড়িয়ে পড়েছে।” আব্দুল মালিক বললেন, “আপনি আপনার ঘোষণাকারীকে আদেশ করুন, সে যেন ঘোষণা দেয়: ‘আস-সালাতু জামিআহ (সালাতের জন্য সমবেত হও)’, যাতে মানুষজন একত্রিত হয়।” অতঃপর তিনি তাঁর ঘোষণাকারীকে আদেশ করলেন, সে ঘোষণা দিল এবং মানুষজন সমবেত হলো। সেখানে সেসব দলিলপত্র সমেত একটি ঝুড়ি অথবা বাক্স আনা হলো এবং উমারের হাতে একটি কাঁচি/ছুরি ছিল, তিনি যোহর পর্যন্ত তা কাটতে থামলেন না। (1)
• حدثنا أحمد بن جعفر بن حمدان ثنا عبد الله بن أحمد بن حنبل حدثني أبي ثنا معمر بن سليمان الرقي ثنا ميمون بن مهران. قال: ما رأيت ثلاثة في بيت أخير من عمر بن عبد العزيز، وابنه عبد الملك، ومولاه مزاحم.
মায়মূন ইবনে মিহরান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি কোনো গৃহে উমার ইবনে আব্দুল আযীয, তাঁর পুত্র আব্দুল মালিক এবং তাঁর মাওলা (মুক্ত গোলাম) মুযাহিমের চেয়ে উত্তম তিনজন দেখিনি।
• حدثنا أحمد ثنا عبد الله حدثني أبي ثنا إسماعيل بن إبراهيم حدثني زياد بن أبي حسان: أنه شهد عمر بن عبد العزيز حيث دفن ابنه عبد الملك قال: لما دفنه وسوى عليه قبره بالأرض وضعوا عنده خشبتين من زيتون، إحداهما عند رأسه والأخرى عند رجليه، ثم جعل قبره بينه وبين القبلة واستوى قائما، وأحاط به الناس. فقال: رحمك الله يا بني لقد كنت بارا بأبيك، والله ما زلت منذ [وهبك الله لي مسرورا بك، ولا والله ما كنت قط أشد بك مسرورا ولا أرجى بحظي من الله فيك منذ](2) وضعتك فى هذا المنزل الذى صيرك
الله إليه فرحمك الله وغفر لك ذنبك وجزاك بأحسن عملك، ورحم الله كل شافع يشفع لك بخير من شاهد أو غائب. رضينا بقضاء الله وسلمنا لأمر الله والحمد لله رب العالمين. ثم انصرف.
যিয়াদ ইবনে আবী হাসসান থেকে বর্ণিত, তিনি উমার ইবনে আব্দুল আযীযের নিকট উপস্থিত ছিলেন, যখন তিনি তাঁর পুত্র আব্দুল মালিককে দাফন করছিলেন। তিনি (উমার) বললেন: যখন তিনি তাকে দাফন করলেন এবং তার কবরের ভূমি সমান করলেন, তখন তারা তার পাশে দুটি জলপাই কাঠের টুকরা রাখল, একটি তার মাথার দিকে এবং অন্যটি তার পায়ের দিকে। অতঃপর তিনি কবরটিকে নিজের ও কিবলার মাঝখানে রাখলেন এবং সোজা হয়ে দাঁড়ালেন, আর লোকেরা তাকে ঘিরে ধরল। এরপর তিনি বললেন: আল্লাহ তোমার প্রতি রহম করুন, হে আমার পুত্র! তুমি তোমার পিতার প্রতি অত্যন্ত অনুগত ছিলে। আল্লাহর কসম, যেদিন থেকে আল্লাহ তোমাকে আমাকে দান করেছেন, আমি সর্বদা তোমার কারণে আনন্দিত ছিলাম। আল্লাহর কসম, এই বাড়িতে তোমাকে রাখার পর—যেখানে আল্লাহ তোমাকে প্রত্যাবর্তন করিয়েছেন—আমি তোমার প্রতি আর কখনও এত বেশি আনন্দিত ছিলাম না এবং তোমার মাধ্যমে আল্লাহর কাছে আমার হিস্যা (প্রতিদান) পাওয়ার আশা আর কখনও এত তীব্র ছিল না। আল্লাহ তোমার প্রতি রহম করুন, তোমার গুনাহ ক্ষমা করুন এবং তোমার উত্তম কাজের জন্য তোমাকে প্রতিদান দিন। এবং আল্লাহ সেই সব সুপারিশকারীর প্রতি রহম করুন, যারা তোমার জন্য কল্যাণকর সুপারিশ করবে, উপস্থিত থাকুক বা অনুপস্থিত। আমরা আল্লাহর ফয়সালায় সন্তুষ্ট এবং আল্লাহর নির্দেশের কাছে আত্মসমর্পণ করলাম, আর সকল প্রশংসা জগৎসমূহের প্রতিপালক আল্লাহর জন্য। অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন।
• حدثنا أحمد بن جعفر بن حمدان ثنا عبد الله ابن أحمد بن حنبل حدثني أبي ثنا عفان ثنا بشر بن المفضل حدثني أبي عن على ابن حصين. قال: شهدت عمر تتابعت عليه مصائب، مات أخ له، ثم مات مزاحم، ثم مات عبد الملك. فلما مات عبد الملك، تكلم فحمد الله وأثنى عليه ثم قال: لقد دفعته إلى النساء في الخرق، فما زلت أرى فيه السرور وقرة العين إلى يومي هذا، فما رأيته في أمر قط أقر لعيني من أمر رأيته فيه اليوم.
আলী ইবনে হুসাইন থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমারকে দেখেছি, তাঁর উপর একের পর এক বিপদ আসছিল—তাঁর এক ভাই মারা গেলেন, এরপর মুযাহিম মারা গেলেন, এরপর আব্দুল মালিক মারা গেলেন। যখন আব্দুল মালিক মারা গেলেন, তিনি কথা বললেন এবং আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি তাকে কাপড়-চোপড় দিয়ে মহিলাদের কাছে দিয়েছিলাম, আর আমি আজ পর্যন্ত তার মধ্যে আনন্দ এবং চক্ষু শীতলকারী বিষয় দেখতে পেয়েছি। আজ আমি তাকে যে অবস্থায় দেখলাম, এর চেয়ে চক্ষু শীতলকারী কোনো বিষয় তাকে নিয়ে আমি কখনও দেখিনি।
• حدثنا عبد الله بن محمد بن جعفر ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم حدثني العلاء بن عبد الجبار العطار ثنا حزم. قال: بلغنا أن عمر كتب إلى عبد الحميد بن عبد الرحمن في شأن ابنه عبد الملك حين توفي: أما بعد، فإن الله تبارك اسمه وتعالى ذكره كتب على خلقه حين خلقهم الموت وجعل مصيرهم إليه، فقال فيما أنزل من كتابه الصادق الذي حفظه بعلمه وأشهد ملائكته على حقه أنه يرث الأرض ومن عليها وإليه يرجعون. ثم قال لنبيه عليه السلام {(وما جعلنا لبشر من قبلك الخلد أفإن مت فهم الخالدون)} ثم قال {(منها خلقناكم وفيها نعيدكم ومنها نخرجكم تارة أخرى)} فالموت سبيل الناس في الدنيا، لم يكتب الله لمحسن ولا لمسئ فيها خلدا، ولم يرض ما أعجب أهلها ثوابا لأهل طاعته، ولم يرض ببلائها نقمة لأهل معصيته، فكل شيء منها أعجب أهلها أو كرهوا منه شيئا متروك لذلك خلقت حين خلقت، ولذلك سكنت منذ سكنت، ليبلو الله فيها عباده أيهم أحسن عملا، فمن قدم عند خروجه من الدنيا إلى أهل طاعته ورضوانه من أنبيائه وأئمة الهدى الذين أمر الله نبيه أن يقتدي بهداهم خالد في دار المقامة من فضله، لا يمسه فيها نصب ولا يمسه فيها لغوب، ومن كانت مفارقته الدنيا إلى غيرهم وغير منازلهم فقد قابل الشر الطويل وأقام على ما لا قبل له به، أسأل الله برحمته أن يبقينا ما أبقانا في الدنيا مطيعين لأمره، متبعين لكتابه، وجعلنا إذا خرجنا من الدنيا إلى نبينا ومن أمرنا
أن نقتدي بهداه من المصطفين الأخيار، وأسأله برحمته أن يقينا أعمال السوء في الدنيا، والسيئات يوم القيامة. ثم إن عبد الملك ابن أمير المؤمنين كان عبدا من عباد الله أحسن الله إليه في نفسه، وأحسن إلى أبيه فيه، أعاشه الله ما أحب أن يعيشه، ثم قبضه إليه حين أحب أن يقبضه، وهو فيما علمت بالموت مغتبط يرجو فيه من الله رجاء حسنا، فأعوذ بالله أن تكون لي محبة في شيء من الأمور تخالف محبة الله، فإن خلاف ذلك لا يصلح في بلائه عندي، وإحسانه إلى، ونممته علي. وقد قلت فيما كان من سبيله والحمد لله ما رجوت به ثواب الله وموعده الصادق من المغفرة؛ إنا لله وإنا إليه راجعون، ثم لم أجد والحمد لله بعده في نفسي إلا خيرا من رضي بقضاء الله، واحتساب لما كان من المصيبة فحمدا لله على ما مضى وعلى ما بقي، وعلى كل حال من أمر الدنيا والآخرة. أحببت أن أكتب إليك بذلك وأعلمكه من قضاء الله فلا أعلم ما نيح عليه في شيء من قبلك ولا اجتمع على ذلك أحد من الناس، ولا رخصت فيه لقريب من الناس ولا لبعيد، واكفني ذلك بكفاية الله، ولا ألومنك فيه إن شاء الله والسلام عليك.
হাযম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা জানতে পেরেছি যে, উমার (ইবনে আব্দুল আযীয) তাঁর পুত্র আব্দুল মালিকের মৃত্যুর ঘটনায় আব্দুল হামিদ ইবনে আব্দুর রহমানের কাছে লিখেছিলেন: "অতঃপর, আল্লাহ—যাঁর নাম বরকতময় এবং যাঁর স্মরণ সুমহান—তিনি যখন তাঁর সৃষ্টিকে সৃষ্টি করলেন, তখন তাদের উপর মৃত্যুকে বাধ্যতামূলক করে দিলেন এবং তাদের প্রত্যাবর্তন তাঁর দিকেই নির্ধারণ করলেন।
তিনি তাঁর সত্য কিতাবে যা নাযিল করেছেন, যা তিনি তাঁর জ্ঞান দ্বারা সংরক্ষণ করেছেন এবং যার সত্যতার উপর তিনি তাঁর ফেরেশতাদের সাক্ষী রেখেছেন, তাতে তিনি বলেছেন যে, তিনিই যমীন ও তার উপর যা আছে তার উত্তরাধিকারী হবেন এবং তাঁর দিকেই তাদের প্রত্যাবর্তন ঘটবে।
এরপর তিনি তাঁর নবীকে (আঃ) বললেন: {আর তোমার পূর্বেও আমরা কোনো মানুষকে অমরত্ব দান করিনি। অতএব, যদি তোমার মৃত্যু হয়, তবে কি তারা চিরঞ্জীব থাকবে?} এরপর তিনি বললেন: {তা (মাটি) থেকে আমি তোমাদের সৃষ্টি করেছি, তাতে তোমাদের ফিরিয়ে নেব এবং তা থেকে তোমাদেরকে পুনরায় বের করে আনব।}
সুতরাং, মৃত্যু এই দুনিয়ায় মানুষের সাধারণ পথ। আল্লাহ্ কোনো সৎকর্মশীল কিংবা কোনো পাপীর জন্য এতে অমরত্ব লেখেননি। আল্লাহ্ এই দুনিয়ার যে বস্তুকে এর বাসিন্দারা পছন্দ করে, তাকে তাঁর অনুগতদের জন্য পুরস্কার হিসেবে পছন্দ করেননি। আবার এর পরীক্ষামূলক বিপদকে তাঁর অবাধ্যদের জন্য শাস্তি হিসেবেও তিনি পছন্দ করেননি। এর সকল কিছুই—যা এর বাসিন্দারা পছন্দ করে অথবা অপছন্দ করে—তা পরিত্যজ্য। এই কারণেই যখন এটি সৃষ্টি হয়েছিল, তখন এভাবে সৃষ্টি করা হয়েছে, এবং যখন থেকে এতে বসবাস শুরু হয়েছে, তখন থেকে এই কারণেই বসবাস করেছে—যেন আল্লাহ্ তাঁর বান্দাদের পরীক্ষা করতে পারেন যে, তাদের মধ্যে কে কর্মে শ্রেষ্ঠ।
সুতরাং, যে ব্যক্তি দুনিয়া থেকে বেরিয়ে যাওয়ার সময় আল্লাহর অনুগত ও সন্তুষ্ট বান্দাদের—তাঁর নবীগণ এবং হিদায়েতের ইমামগণের দিকে অগ্রগামী হয়, যাদের হিদায়েতের অনুসরণ করতে আল্লাহ্ তাঁর নবীকে নির্দেশ দিয়েছেন—সে তাঁর অনুগ্রহে চিরস্থায়ী নিবাসে চিরস্থায়ী হবে। সেখানে তাকে কোনো ক্লান্তি স্পর্শ করবে না এবং কোনো অবসাদও তাকে ধরবে না। আর যে ব্যক্তি তাদেরকে এবং তাদের মঞ্জিলকে বাদ দিয়ে অন্য কিছুর দিকে দুনিয়া থেকে বিদায় নেয়, সে দীর্ঘস্থায়ী মন্দের সম্মুখীন হলো এবং এমন বিষয়ের ওপর প্রতিষ্ঠিত হলো যা সহ্য করার ক্ষমতা তার নেই।
আমি আল্লাহর রহমতের মাধ্যমে তাঁর কাছে প্রার্থনা করি যে, তিনি যতদিন আমাদেরকে দুনিয়ায় জীবিত রাখেন, ততদিন যেন আমাদেরকে তাঁর আজ্ঞাবহ রাখেন, তাঁর কিতাবের অনুসারী রাখেন এবং যখন আমরা দুনিয়া থেকে বেরিয়ে যাব, তখন যেন আমাদেরকে আমাদের নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং সেই মনোনীত নেককারগণের দিকে পরিচালিত করেন যাদের হিদায়েত অনুসরণ করার জন্য তিনি আমাদের নির্দেশ দিয়েছেন। আমি তাঁর রহমতের মাধ্যমে আরও প্রার্থনা করি যে, তিনি যেন আমাদেরকে দুনিয়ার মন্দ কাজ এবং কিয়ামতের দিনের পাপরাশি থেকে রক্ষা করেন।
এরপর (জানুন যে,) আমীরুল মুমিনীন-এর পুত্র আব্দুল মালিক ছিলেন আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে একজন বান্দা। আল্লাহ্ তার প্রতি অনুগ্রহ করেছেন তার নিজের ক্ষেত্রে এবং তার পিতার প্রতিও তার বিষয়ে অনুগ্রহ করেছেন। আল্লাহ্ তাকে ততদিন বাঁচিয়ে রেখেছিলেন যতদিন তিনি তাকে বাঁচিয়ে রাখতে পছন্দ করেছেন। এরপর যখন তিনি তাকে গ্রহণ করতে পছন্দ করলেন, তখন তাকে নিজের দিকে উঠিয়ে নিলেন। আমি যতটুকু জানি, সে ছিল মৃত্যুতে আনন্দিত, সে তাতে আল্লাহর কাছে উত্তম প্রতিদানের আশা করত।
অতএব, আমি আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাই যে, আমার কোনো বিষয়ে এমন ভালোবাসা থাকুক যা আল্লাহর ভালোবাসার বিপরীত। কারণ, এর বিপরীত কিছু আমার জন্য উপযুক্ত নয়, যখন আমি তাঁর পরীক্ষা, আমার প্রতি তাঁর অনুগ্রহ এবং আমার উপর তাঁর নিয়ামত লাভ করেছি।
আর তার (আব্দুল মালিকের) বিষয়ে আমি আল্লাহর কাছে পুরস্কার এবং তাঁর ক্ষমার সত্য ওয়াদার প্রত্যাশা নিয়ে যা বলার বলেছি—আলহামদুলিল্লাহ (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর)। ‘নিশ্চয়ই আমরা আল্লাহর জন্য এবং নিশ্চয়ই আমরা তাঁর কাছেই প্রত্যাবর্তনকারী।’ অতঃপর, আলহামদুলিল্লাহ, আমি তার মৃত্যুর পর আমার অন্তরে আল্লাহর ফয়সালায় সন্তুষ্টি ও বিপদে সওয়াবের আশা ব্যতীত আর কোনো খারাপ কিছু পাইনি। সুতরাং, যা অতিবাহিত হয়েছে তার জন্য এবং যা অবশিষ্ট রয়েছে তার জন্য এবং দুনিয়া ও আখেরাতের সকল অবস্থার জন্য আল্লাহর প্রশংসা।
আমি এই বিষয়ে আপনার কাছে লিখতে এবং আপনাকে আল্লাহর এই ফয়সালা সম্পর্কে জানাতে পছন্দ করলাম। অতএব, আমি যেন আপনার পক্ষ থেকে কোনো প্রকারের বিলাপ ধ্বনি (নিয়াহাহ্) শুনতে না পাই এবং এই কাজে যেন কোনো মানুষ সমবেত না হয়। আর আমি মানুষের কোনো নিকটাত্মীয় বা দূরবর্তী কারো জন্যেও এর অনুমতি দিইনি। আপনি আল্লাহর যথেষ্টতা দ্বারা এ থেকে বিরত থাকুন। ইন শা আল্লাহ, আমি এই বিষয়ে আপনাকে দোষারোপ করব না। আসসালামু আলাইকা (আপনার উপর শান্তি বর্ষিত হোক)।"
• حدثنا عبد الله بن محمد بن جعفر ثنا أحمد بن الحسين ثنا أحمد بن إبراهيم حدثني عفان بن مسلم حدثني جويرية بن أسماء حدثني إسماعيل بن أبي حكيم.
قال: غضب عمر بن عبد العزيز يوما فاشتد غضبه، وكان فيه حدة، وعبد الملك بن عمر بن عبد العزيز حاضر، فلما سكن غضبه قال: يا أمير المؤمنين أنت في قدر نعمة الله عليك، وموضعك الذي وضعك الله به، وما ولاك من أمر عباده يبلغ بك الغضب ما أرى؟ قال كيف قلت! قال فأعاد عليه كلامه فقال أما تغضب يا عبد الملك؟ فقال ما تغني سعة جوفي إن لم أردد فيها الغضب حتى لا يظهر منه شيء أكرهه، قال وكان له بطين.
ইসমাঈল ইবন আবী হাকীম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার ইবনে আব্দুল আযীয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) একদিন রাগান্বিত হলেন এবং তাঁর রাগ খুবই তীব্র আকার ধারণ করলো। তাঁর মেজাজে তীব্রতা ছিল। আব্দুল মালিক ইবন উমার ইবনে আব্দুল আযীয সেখানে উপস্থিত ছিলেন। যখন তাঁর রাগ শান্ত হলো, তখন (আব্দুল মালিক) বললেন: হে আমীরুল মু'মিনীন! আপনার উপর আল্লাহর যে নিয়ামতের পরিমাণ, আল্লাহ আপনাকে যে অবস্থানে রেখেছেন এবং আল্লাহর বান্দাদের যে দায়িত্বভার আপনার উপর ন্যস্ত করেছেন—এই সবকিছুর পরেও কি রাগ আপনাকে এতদূর নিয়ে যায়, যেমনটি আমি দেখলাম? তিনি (উমার ইবন আব্দুল আযীয) বললেন, তুমি কী বললে? তিনি (আব্দুল মালিক) তখন তাঁর কথাগুলো আবার বললেন। অতঃপর তিনি (উমার ইবন আব্দুল আযীয) বললেন, হে আব্দুল মালিক! তুমি কি রাগান্বিত হও না? তিনি (আব্দুল মালিক) উত্তর দিলেন, আমার অন্তরের প্রশস্ততা কী কাজে আসবে, যদি না আমি তার মধ্যে ক্রোধকে প্রতিহত করি, যাতে আমার অপছন্দনীয় কিছুই তা থেকে প্রকাশ না পায়? বর্ণনাকারী বলেন, আর তাঁর (আব্দুল মালিকের) সামান্য স্থূল পেট ছিল।
