আল-জামি` আল-কামিল
10008 - عن جبلة بن حارثة أخي زيد، قال: قدمت على رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: يا رسول الله، ابعث معي أخي زيدا، قال:"هو ذا، فإن انطلق معك لم أمنعه". قال زيد: يا رسول الله، والله لا أختار عليك أحدا، قال: فرأيت رأي أخي أفضل من رأيي.
صحيح: رواه الترمذي (3815)، وابن قانع في معجم الصحابة (1/ 161)، والطبراني في الكبير (2/ 322)، وصحّحه الحاكم (3/ 214) كلهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، عن أبي عمرو الشيباني (واسمه: سعد بن إياس)، أخبرني جبلة بن حارثة - أخو زيد بن حارثة - قال: فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب لا نعرفه إلا من حديث ابن الرومي، عن علي بن مسهر". يعني عن إسماعيل بن أبي خالد.
قلت: إسناده صحيح. وقول الترمذي يحمل على الطريق الذي ساقه.
واستشهد زيد بن حارثة في حياة رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم مؤتة سنة 8 هـ، وهو ابن خمس وخمسين عاما.
জাবালা ইবনু হারিসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ভাই, থেকে বর্ণিত: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম। তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমার ভাই যায়দকে আমার সাথে পাঠিয়ে দিন। তিনি বললেন, "এই তো সে (যায়দ)! সে যদি তোমার সাথে যেতে চায়, তবে আমি তাকে বারণ করব না।" যায়দ বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আল্লাহর শপথ, আপনার ওপর আমি অন্য কাউকে প্রাধান্য দেব না। তিনি (জাবালা) বললেন, তখন আমি আমার ভাইয়ের সিদ্ধান্তকে আমার নিজের সিদ্ধান্তের চেয়ে উত্তম মনে করলাম।
10009 - عن عائشة قالت: أبطأت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلة بعد العشاء، ثم جئت فقال:"أين كنت؟". قلت: كنت أستمع قراءة رجل من أصحابك لم أسمع مثل قراءته وصوته من أحد. قالت: فقام وقمت معه حتى استمع له، ثم التفت إليَّ فقال:"هذا سالم، مولى أبي حذيفة، الحمد لله الذي جعل في أمتي مثل هذا".
صحيح: رواه ابن ماجه (1338)، وأحمد (25320)، وصحّحه الحاكم (3/ 226) كلهم من طرق، عن حنظلة بن أبي سفيان أنه سمع عبد الرحمن بن سابط الجمحي يحدث عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: فذكرته.
وإسناده صحيح. وقد صحّحه البوصيري في مصباح الزجاجة.
ومن أخبار سالم مولى أبي حذيفة أنه كان أكثر الناس قرآنا:
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এক রাতে ইশার পর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যামানায় (বাড়িতে ফিরতে) দেরি করেছিলাম। এরপর যখন আমি আসলাম, তিনি বললেন: "তুমি কোথায় ছিলে?" আমি বললাম: আমি আপনার একজন সাহাবীর তিলাওয়াত শুনছিলাম। তাঁর তিলাওয়াত ও কণ্ঠের মতো সুন্দর আমি কারো কাছে শুনিনি। তিনি (আয়িশা) বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং আমিও তাঁর সাথে দাঁড়ালাম যতক্ষণ না তিনিও তা মনোযোগ দিয়ে শুনলেন। এরপর তিনি আমার দিকে ফিরে তাকালেন এবং বললেন: "ইনি হলেন আবূ হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালিম। সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি আমার উম্মতের মধ্যে এমন লোক সৃষ্টি করেছেন।"
10010 - عن ابن عمر قال: لما قدم المهاجرون الأولون العُصْبة - موضع بقباء - قبل مقدم رسول الله صلى الله عليه وسلم، كان يؤمهم سالم مولى أبي حذيفة، وكان أكثرهم قرآنا.
صحيح: رواه البخاري في الأذان (692) عن إبراهيم بن المنذر، حدثنا أنس بن عياض، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاري أيضا في الأحكام (7175) من طريق ابن جريج، عن نافع، عن ابن عمر أنه قال: كان سالم مولى أبي حذيفة يؤم المهاجرين الأولين وأصحاب النبي صلى الله عليه وسلم في مسجد قباء، فيهم أبو بكر وعمر وأبو سلمة وزيد وعامر بن ربيعة.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন প্রথম মুহাজিরগণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আগমনের পূর্বে কুবায় অবস্থিত 'আল-উসবাহ' নামক স্থানে এলেন, তখন আবূ হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালিম তাদের ইমামতি করতেন। আর তিনি ছিলেন তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি কুরআন মুখস্থকারী।
(অন্য বর্ণনায় উল্লেখ আছে,) আবূ হুযাইফার আযাদকৃত গোলাম সালিম প্রথম মুহাজিরগণ এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের কুবায় অবস্থিত মসজিদে ইমামতি করতেন, তাঁদের মধ্যে ছিলেন আবূ বকর, উমর, আবূ সালামাহ, যায়দ এবং আমির ইবনে রবী‘আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।
10011 - عن السائب بن يزيد قال: ذهبت بي خالتي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول الله، إن ابن أختي وجع، فمسح رأسي، ودعا لي بالبركة، وتوضأ فشربت من وضوئه، ثم قمت خلف ظهره، فنظرت إلى خاتم بين كتفيه مثل زر الحجلة.
متفق عليه: رواه البخاري في المناقب (3541)، ومسلم في الفضائل (2345 - 111) كلاهما من طريق حاتم (هو ابن إسماعيل)، عن الجعد بن عبد الرحمن قال: سمعت السائب بن يزيد يقول: فذكره.
وهو من صغار الصحابة، مات سنة 91 هـ، وهو آخر من مات منهم بالمدينة.
يُعشيهم. ومات سنة أربع عشر بحوران، قتله الجن عندما بال قائما في نفق فمات في حاله.
সা'ইব ইবনে ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার খালা আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে গেলেন এবং বললেন, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমার ভাগ্নে অসুস্থ।' তখন তিনি আমার মাথায় হাত বুলিয়ে দিলেন এবং আমার জন্য বরকতের দোয়া করলেন, আর তিনি উযূ করলেন, ফলে আমি তাঁর উযূর অবশিষ্ট পানি পান করলাম, অতঃপর আমি তাঁর পেছনে দাঁড়ালাম এবং তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুওয়াতের সীলমোহর (খাতাম) দেখলাম, যা ছিল যেন একটি তিতির পাখির বোতামের মতো।
10012 - عن المغيرة بن شعبة قال: قال سعد بن عبادة: لو رأيت رجلا مع امرأتي لضربته بالسيف غير مصفح، فبلغ ذلك النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"أتعجبون من غيرة سعد؟ لأنا أغير منه، والله أغير مني".
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6846)، ومسلم في اللعان (17: 1499) من طريق أبي عوانة، حدثنا عبد الملك بن عمير، عن وراد كاتب المغيرة، عن المغيره بن شعبة فذكره.
মুগীরা ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সা'দ ইবনে উবাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি যদি আমার স্ত্রীর সাথে কোনো লোককে দেখি, তবে তাকে সোজা তরবারি দ্বারা আঘাত করব, কোনোরূপ ছাড় দেব না। অতঃপর এ কথা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা কি সা'দ-এর আত্মমর্যাদাবোধ (غيرة) দেখে আশ্চর্যান্বিত হচ্ছো? আমি তার চেয়েও অধিক আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন, আর আল্লাহ্ আমার চেয়েও অধিক আত্মমর্যাদাবোধ সম্পন্ন।"
10013 - عن أبي هريرة قال: قال سعد بن عبادة: يا رسول الله، لو وجدت مع أهلي رجلا لم أمسه حتى آتي بأربعة لثمهداء؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم". قال: كلا، والذي بعثك بالحق إن كنت لأعاجله بالسيف قبل ذلك، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اسمعوا إلى ما يقول سيدكم، إنه لغيور، وأنا أغير منه، والله أغير مني".
صحيح: رواه مسلم في اللعان (1498: 16) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا خالد بن مخلد، عن سليمان بن بلال، حدثني سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা‘দ ইবনু ‘উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! যদি আমি আমার স্ত্রীর সাথে (কোনো পরপুরুষকে) দেখতে পাই, তবে কি আমি চারজন সাক্ষী না আনা পর্যন্ত তাকে স্পর্শ (বা হত্যা) করব না? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (সা'দ) বললেন: কক্ষনো নয়! সেই সত্তার শপথ, যিনি আপনাকে সত্য দিয়ে প্রেরণ করেছেন, আমি এর আগেই দ্রুত তরবারি দিয়ে তাকে আঘাত করতাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের নেতার কথা শোনো! সে তো আত্মমর্যাদাবোধসম্পন্ন (গীয়ূর)। আর আমি তার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবোধসম্পন্ন। আর আল্লাহ আমার চেয়েও বেশি আত্মমর্যাদাবোধসম্পন্ন।"
10014 - عن البراء يقول: أهديت للنبي صلى الله عليه وسلم حلة حرير، فجعل أصحابه يمسحونها ويعجبون من لينها، فقال:"أتعجبون من لين هذه؟ لمناديل سعد بن معاذ خير منها أو ألين".
متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3802)، ومسلم في فضائل الصحابة (2468) كلاهما عن محمد بن بشار، ثنا غندر، ثنا شعبة، عن أبي إسحاق قال: سمعت البراء يقول: فذكره. وهذا لفظ البخاري، ولفظ مسلم نحوه.
বারা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে একটি রেশমের পোশাক উপহার দেওয়া হয়েছিল। তখন তাঁর সাহাবীগণ সেটি স্পর্শ করে তার কোমলতায় আশ্চর্যবোধ করতে লাগলেন। তিনি বললেন: "তোমরা কি এর কোমলতা দেখে বিস্মিত হচ্ছো? সা‘দ ইবনু মু‘আযের রুমাল এর চেয়েও উত্তম অথবা নরম।"
10015 - عن أنس قال: أهدي للنبي صلى الله عليه وسلم جبة سندس، وكان ينهى عن الحرير، فعجب الناس منها، فقال:"والذي نفس محمد بيده، لمناديل سعد بن معاذ في الجنة أحسن من هذا".
متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2615)، ومسلم في فضائل الصحابة (2469) كلاهما من طريق يونس بن محمد، ثنا شيبان، عن قتادة، ثنا أنس قال: فذكره.
وفي لفظ:"إن أكيدر دومة الجندل أهدى لرسول الله صلى الله عليه وسلم حلة …" فذكر نحوه.
رواه مسلم في فضائل الصحابة (2469) من وجه آخر عن قتادة به.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে সিনদাসের (উত্তম রেশমী বস্ত্রের) একটি জুব্বা (পোশাক) হাদিয়া দেওয়া হলো। অথচ তিনি (পুরুষদের) রেশম (বস্ত্র পরিধান করতে) নিষেধ করতেন। তখন লোকেরা সেটি দেখে বিস্মিত হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ! জান্নাতে সা'দ ইবনু মু'আযের রুমালগুলো এর চেয়েও উত্তম।"
10016 - عن عطارد بن حاجب أنه أُهْدِي إلى النبي صلى الله عليه وسلم ثوب ديباج كساه إياه كسرى، فدخل أصحابه فقالوا: أنزلت عليك من السماء؟ قال:"وما تعجبون من ذا؟ المنديل
من مناديل سعد بن معاذ في الجنة خير من هذا" ثم قال:"يا غلام اذهب به إلى أبي جهم بن حذيفة، وقل له يبعث إلي بالخميصة".
حسن: رواه الطبراني في الكبير (18/ 15 - 16) عن علي بن عبد العزيز (هو البغوي)، حدثنا حجاج بن المنهال، ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن زياد، عن عبد الرحمن بن عمرو بن معاذ (هو عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ)، عن عطارد بن حاجب فذكره.
قال الهيثمي في المجمع (9/ 309 - 310):"رواه الطبراني ورجاله رجال الصحيح غير عبد الرحمن بن عمرو بن سعد بن معاذ وهو ثقة".
وإسناده حسن من أجل علي بن عبد العزيز بن المرزبان - شيخ الطبراني - فإنه حسن الحديث.
আতারিদ ইবনে হাজিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কিসরা (পারস্য সম্রাট) কর্তৃক পরিহিত একটি রেশমের পোশাক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপহার হিসেবে পাঠানো হলো। অতঃপর তাঁর সাহাবাগণ সেখানে প্রবেশ করে বললেন: এটি কি আপনার কাছে আসমান থেকে অবতরণ করা হয়েছে? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমরা এতে কী এমন অবাক হচ্ছো? জান্নাতে সা'দ ইবনে মু'আযের রুমালসমূহ এর চেয়েও উত্তম। অতঃপর তিনি বললেন: হে বালক, এটি নিয়ে আবু জাহম ইবনে হুযাইফার কাছে যাও এবং তাকে বলো যেন সে আমার কাছে (তার) আল-খামিসা (উল্লু পশমের চাদর) পাঠিয়ে দেয়।
10017 - عن أبي سعيد الخدري قال: نزل أهل قريظة على حكم سعد بن معاذ، فأرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى سعد، فأتاه على حمار، فلما دنا قريبا من المسجد، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم للأنصار:"قوموا إلى سيدكم - أو - خيركم" ثم قال:"إن هؤلاء نزلوا على حكمك" قال: تقتل مقاتلتهم، وتسبي ذريتهم. قال: فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قضيت بحكم الله" وربما قال:"قضيت بحكم الملك".
متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3804)، ومسلم في الجهاد (1768 - 64) كلاهما من طريق شعبة، عن سعد بن إبراهيم، عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، عن أبي سعيد الخدري فذكره.
وهذا لفظ مسلم، ولفظ البخاري نحوه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, বনূ কুরায়যার লোকেরা সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফায়সালার ওপর রাজি হয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট লোক পাঠালেন। তিনি গাধার পিঠে আরোহণ করে তাঁর নিকট এলেন। তিনি যখন মাসজিদের কাছাকাছি পৌঁছলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আনসারদের বললেন, "তোমাদের নেতার—অথবা তিনি বললেন—তোমাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠতম ব্যক্তির দিকে তোমরা দাঁড়াও (বা এগিয়ে যাও)।" এরপর তিনি (সাদকে) বললেন, "এরা তোমার ফায়সালার ওপর রাজি হয়েছে।" সা‘দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, (আমার ফায়সালা হলো) তাদের যোদ্ধাদেরকে হত্যা করা হবে এবং তাদের নারী-শিশুদেরকে বন্দী করা হবে। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন, "তুমি আল্লাহর বিধানের অনুরূপ ফায়সালা করেছো।" আর সম্ভবত (বর্ণনাকারী) বলেছেন: "তুমি রাজার (আল্লাহর) বিধানের অনুরূপ ফায়সালা করেছো।"
10018 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اهتزَّ عرش الرحمن لموت سعد بن معاذ".
متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3803)، ومسلم في فضائل الصحابة (2466 - 124) كلاهما من طريق الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول: فذكره.
وفي لفظ:"قال رسول الله صلى الله عليه وسلم وجنازة سعد بن معاذ بين أيديهم:"اهتزَّ لها عرش الرحمن"" رواه مسلم (2466 - 123) من وجه آخر عن أبي الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول: فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সা'দ ইবনু মু'আযের মৃত্যুতে দয়াময় রহমানের আরশ কেঁপে উঠেছিল।"
10019 - عن أنس بن مالك أن نبي الله صلى الله عليه وسلم قال - وجنازته موضوعة يعني سعدا -:"اهتزَّ لها عرش الرحمن".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2467 - 125) عن محمد بن عبد الله الرّزّي، ثنا عبد
الوهاب بن عطاء الخفاف، عن سعيد، عن قتادة، حدثنا أنس بن مالك فذكره.
وفي الباب أحاديث أخرى مذكورة في كتاب الإيمان، باب اهتزاز عرش الرحمن، فلينظر هناك.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তাঁর (অর্থাৎ সা'দ-এর) জানাযা রাখা হয়েছিল, তখন আল্লাহ্র নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাঁর (মৃত্যুর) কারণে দয়াময়ের আরশ কেঁপে উঠেছে।"
10020 - عن جابر قال: رُمِيَ سعد بن معاذ في أكحله، فحسمه النبي صلى الله عليه وسلم بيده بمشقص، ثم ورِمت، فحسمه الثانية.
صحيح: رواه مسلم في السلام (2208 - 75) من طرق، عن أبي خيثمة زهير بن حرب، حدثنا أبو الزبير، عن جابر فذكره.
وتفصيله في الحديث الآتي:
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, সা‘দ ইবনু মু‘আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাহুর প্রধান শিরায় (আকহালে) আঘাত লেগেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে একটি তীর ফলার মাধ্যমে তা দাহ করে (রক্তপাত বন্ধ করে) দিলেন। এরপর (আঘাতের স্থানটি) ফুলে গেল, তাই তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দ্বিতীয়বার তা দাহ করে দিলেন।
10021 - عن جابر أنه قال: رُمِيَ يوم الأحزاب سعد بن معاذ فقطعوا أكحله - أو أبجله - فحسمه رسول الله صلى الله عليه وسلم بالنار، فانتفخت يده، فتركه فنزفه الدم، فحسمه أخرى فانتفخت يده، فلما رأى ذلك قال: اللهم! لا تخرج نفسي حتى تقر عيني من بني قريظة. فاستمسك عرقه فما قطر قطرة حتى نزلوا على حكم سعد بن معاذ، فأرسل إليه، فحكم أن يقتل رجالهم وتستحيى نساؤهم، يستعين بهن المسلمون. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أصبت حكم الله فيهم"، وكانوا أربعمائة، فلما فرغ من قتلهم انفتق عرقه فمات.
صحيح: رواه الترمذي (1582)، وأحمد (14773)، وابن حبان (4784) كلهم من طرق عن الليث بن سعد، عن أبي الزبير، عن جابر قال: فذكره.
وإسناده صحيح، وقال الترمذي: حسن صحيح.
صحَّح إسناده أيضا الحافظ في الفتح (7/ 414).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের যুদ্ধের দিন সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আহত হয়েছিলেন। তাঁকে তীর নিক্ষেপ করা হয়েছিল এবং এতে তাঁর প্রধান শিরা ('আকহাল')—অথবা বলেছেন 'আবজাল' (ভেতরের শিরা)—কেটে গিয়েছিল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আগুন (গরম লোহা) দিয়ে সেটি সেঁকে দিলেন। ফলে তাঁর হাত ফুলে গেল। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছেড়ে দিলে আবার রক্ত ঝরতে শুরু করল। তিনি দ্বিতীয়বার সেটি সেঁকে দিলেন, ফলে তাঁর হাত আবার ফুলে গেল। যখন তিনি (সা'দ) তা দেখলেন, তখন বললেন: "হে আল্লাহ! বনু কুরায়যা সম্পর্কে আমার চোখ শীতল না হওয়া পর্যন্ত আমার রূহ কবয করো না।" ফলে তাঁর রক্তনালী থেমে গেল এবং এক ফোঁটা রক্তও ঝরল না, যতক্ষণ না তারা (বনু কুরায়যা) সা'দ ইবনু মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফয়সালার ওপর রাজি হয়ে আত্মসমর্পণ করল। তখন তাঁর কাছে লোক পাঠানো হলো। তিনি ফয়সালা দিলেন যে, তাদের পুরুষদের হত্যা করা হবে এবং তাদের নারীদের জীবন্ত রাখা হবে, যেন মুসলিমরা তাদের দ্বারা সাহায্য নিতে পারে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাদের বিষয়ে আল্লাহর হুকুম মোতাবেক ফয়সালা দিয়েছ।" তারা সংখ্যায় চারশো জন ছিল। যখন তাদের হত্যা শেষ হলো, তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর রক্তনালী আবার ফেটে গেল এবং তিনি মৃত্যুবরণ করলেন।
10022 - عن عائشة قالت: أصيب سعد يوم الخندق، رماه رجل من قريش يقال له: حبان بن العرقة، رماه في الأكحل، فضرب النبي صلى الله عليه وسلم خيمة في المسجد ليعوده من قريب، فلما رجع رسول الله صلى الله عليه وسلم من الخندق وضع السلاح واغتسل، فأتاه جبريل عليه السلام وهو ينفض رأسه من الغبار، فقال: وضعت السلاح، والله! ما وضعته، اخرج إليهم. قال النبي صلى الله عليه وسلم:"فأين؟" فأشار إلى بني قريظة، فأتاهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، فنزلوا على حكمه، فرد الحكم إلى سعد، قال: فإني أحكم فيهم: أن تقتل المقاتلة، وأن تسبى النساء والذرية، وأن تقسم أموالهم.
قال هشام: فأخبرني أبي، عن عائشة، أن سعدا قال: اللهم! إنك تعلم أنه ليس أحد أحب إليَّ أن أجاهدهم فيك من قوم كذبوا رسولك صلى الله عليه وسلم وأخرجوه، اللهم! فإني أظن أنك قد وضعت الحرب
بيننا وبينهم، فإن كان بقي من حرب قريش شيء فأبقني له حتى أجاهدهم فيك، وإن كنت وضعت الحرب فافجرها، واجعل موتتي فيها. فانفجرت من لبته، فلم يرعهم وفي المسجد خيمة من بني غفار إلا الدم يسيل إليهم. فقالوا: يا أهل الخيمة، ما هذا الذي يأتينا من قبلكم؟ فإذا سعد يغذو جرحه دما، فمات منها رضي الله عنه.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4122) ومسلم في الجهاد (1769 - 65) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حدثنا هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খন্দকের যুদ্ধের দিন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আহত হন। কুরাইশের এক ব্যক্তি, যার নাম ছিল হাব্বান ইবনুল আরিকাহ, তাকে তীর নিক্ষেপ করেছিল। সে তাঁর আকহল (রগের) স্থানে আঘাত করে। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সেবা-শুশ্রূষার জন্য নিকটেই মসজিদের মধ্যে একটি তাঁবু স্থাপন করলেন। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম খন্দক থেকে ফিরে এলেন, তখন তিনি অস্ত্র রেখে গোসল করলেন। এমতাবস্থায় জিবরীল (আঃ) তাঁর নিকট এলেন, তিনি তখন মাথা থেকে ধুলো ঝেড়ে ফেলছিলেন। জিবরীল (আঃ) বললেন: আপনি অস্ত্র রেখে দিলেন? আল্লাহর কসম! আমি তো রাখিনি। আপনি তাদের দিকে বের হোন। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "কোথায়?" তখন তিনি বনু কুরাইযার দিকে ইশারা করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের কাছে গেলেন। তারা তাঁর (রাসূলের) ফায়সালার উপর রাজি হলো। কিন্তু তিনি ফায়সালার ভার সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে ফিরিয়ে দিলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তাদের ব্যাপারে এই ফায়সালা করছি যে, তাদের যোদ্ধাদের হত্যা করা হবে, নারী ও শিশুদের বন্দী করা হবে এবং তাদের সম্পদ ভাগ করে দেওয়া হবে।
হিশাম বলেন: আমার পিতা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আমার নিকট বর্ণনা করেছেন যে, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দু'আ করলেন: হে আল্লাহ! আপনি জানেন, আপনার পথে জিহাদ করার জন্য ঐসব লোকের চেয়ে আমার কাছে অন্য কেউ বেশি প্রিয় নয়, যারা আপনার রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মিথ্যা প্রতিপন্ন করেছে এবং তাঁকে বের করে দিয়েছে। হে আল্লাহ! আমার মনে হচ্ছে আপনি আমাদের ও তাদের মধ্যে যুদ্ধ সমাপ্ত করে দিয়েছেন। যদি কুরাইশের সাথে যুদ্ধের কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে আমাকে তার জন্য বাঁচিয়ে রাখুন, যাতে আমি আপনার পথে তাদের বিরুদ্ধে জিহাদ করতে পারি। আর যদি আপনি যুদ্ধ শেষ করে থাকেন, তবে আমার আঘাত থেকে রক্তপাত শুরু করে দিন এবং আমার মৃত্যু এর মধ্যেই নির্ধারণ করুন। অতঃপর তাঁর আঘাতের স্থান ফেটে গেল (রক্ত বের হতে লাগল)। মসজিদে অবস্থিত বনু গিফারের তাঁবুতে যারা ছিল, তাদের কেউই সেদিকে লক্ষ্য করল না, কেবল দেখল তাদের দিকে রক্ত গড়িয়ে আসছে। তারা বলল: ওহে তাঁবুর লোকেরা! এ কী, যা তোমাদের দিক থেকে আমাদের কাছে আসছে? দেখা গেল, সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ক্ষতস্থান থেকে রক্ত ঝরছে এবং তিনি এর ফলেই ইনতিকাল করলেন, আল্লাহ তাঁর প্রতি সন্তুষ্ট হোন।
10023 - عن أبي هريرة قال: كنا جلوسا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ نزلت عليه سورة الجمعة، فلما قرأ: {وَآخَرِينَ مِنْهُمْ لَمَّا يَلْحَقُوا بِهِمْ} [الجمعة: 3] قال رجل: من هؤلاء يا رسول الله؟ فلم يراجعه النبي صلى الله عليه وسلم حتى سأله مرة أو مرتين أو ثلاثا. قال: وفينا سلمان الفارسي، قال: فوضع النبي صلى الله عليه وسلم يده على سلمان، ثم قال:"لو كان الإيمان عند الثريا لناله رجال من هؤلاء".
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4898)، ومسلم في فضائل الصحابة (2546 - 231) كلاهما من طريق عبد العزيز بن محمد، أخبرني ثور، عن أبي الغيث، عن أبي هريرة قال: فذكره.
واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট বসা ছিলাম। তখন তাঁর উপর সূরা জুমু'আ নাযিল হলো। যখন তিনি (সূরাটির অংশ): "আর তাদের মধ্যেকার অন্যদের জন্যেও, যারা এখনো তাদের সাথে এসে মিলিত হয়নি" (সূরা জুমু'আ: ৩) - এই আয়াতটি পাঠ করলেন, তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এরা কারা? নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে উত্তর দিলেন না, যতক্ষণ না সে একবার, দুইবার কিংবা তিনবার জিজ্ঞাসা করল। (আবূ হুরায়রা রাঃ) বলেন: আমাদের মধ্যে সালমান ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপস্থিত ছিলেন। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর হাত সালমানের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উপর রাখলেন, অতঃপর বললেন: "যদি ঈমান সুরাইয়া তারকার (Pleiades) নিকটও থাকত, তবুও তাদের (সালমানের) এই গোত্রের লোকেরা তা অর্জন করে নিত।"
10024 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كان الدين عند الثريا لذهب به رجل من فارس - أو قال: من أبناء فارس - حتى يتناوله".
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2546) من طرق، عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن جعفر الجزري، عن يزيد بن الأصم، عن أبي هريرة فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি দ্বীন 'সুরাইয়া' (নক্ষত্রপুঞ্জ)-এর কাছেও থাকত, অবশ্যই ফারিসের (পারস্যের) একজন লোক—অথবা তিনি বলেছেন: ফারিসের (পারস্যের) বংশধরদের মধ্য থেকে একজন লোক—সেখানে গিয়ে তা লাভ করত।"
10025 - عن قيس بن سعد بن عبادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لو كان الإيمان معلّقا بالثريا لنالَه رجال من أبناء فارس".
صحيح: رواه أبو يعلى (1438) - واللفظ له -، والبزار (3741)، والطبراني في الكبير (18/ 353) كلهم من طرق عن سفيان بن عيينة، عن ابن نجيح (واسمه: عبد الله المكي) عن أبيه، عن قيس بن سعد بن عبادة قال: فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في المجمع (10/ 64 - 65):"رواه أبو يعلى والبزار ورجالهما رجال الصحيح".
কায়েস ইবনে সা'দ ইবনে উবাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি ঈমান সুরাইয়া (নক্ষত্রপুঞ্জে) ঝুলে থাকত, তাহলেও পারস্যের সন্তানতুল্য কিছু মানুষ তা লাভ করত।"
10026 - عن عبد الله بن عباس قال: حدَّثني سلمان الفارسي حديثه من فيه، قال: كنت رجلا فارسيا من أهل أصبهان من أهل قرية منها يقال لها: جَيُّ، وكان أبي دهقان قريته، وكنت أحب خلق الله إليه، فلم يزل به حبه إياي حتى حبسني في بيته كما تحبس الجارية، واجتهدت في المجوسية حتى كنت قَطَنَ النار الذي يوقدها لا يتركها تخبو ساعة، قال: وكانت لأبي ضيعة عظيمة، قال: فشُغِلَ في بنيان له يوما، فقال لي: يا بني! إني قد شغلت في بنيانٍ هذا اليوم عن ضيعتي، فاذهب فاطلعها، وأمرني فيها ببعض ما يريد، فخرجت أريد ضيعته، فمررت بكنيسة من كنائس النصارى، فسمعت أصواتهم فيها وهم يصلون، وكنت لا أدري ما أمر الناس لحبس أبي إياي في بيته، فلما مررت بهم وسمعت أصواتهم دخلت عليهم انظر ما يصنعون. قال: فلما رأيتهم أعجبني صلاتهم، ورغبت في أمرهم، وقلت: هذا والله! خير من الدين الذي نحن عليه، فوالله ما تركتهم حتى غربت الشمس، وتركت ضيعة أبي، ولم آتها. فقلت لهم: أين أصل هذا الدين؟ قالوا: بالشام. قال: ثم رجعت إلى أبي، وقد بعث في طلبي، وشغلته عن عمله كله، قال: فلما جئته قال: أي بنيّ! أين كنت؟ ألم أكن عهدت إليك ما عهدت؟ قال: قلت: يا أبت مررت بناس يصلون في كنيسة لهم فأعجبني ما رأيت من دينهم، فوالله! ما زلت عندهم حتى غربت الشمس. قال: أي بنيّ! ليس في ذلك الدين خير، دينك ودين آبائك خير منه. قال: قلت: كلا والله! إنه خير من ديننا. قال: فخافني، فجعل في رجلي قيدا، ثم حبسني في بيته.
قال: وبعثت إلى النصارى، فقلت لهم: إذا قدم عليكم ركب من الشام تجار من
النصارى فأخبِروني بهم. قال: فقدم عليهم ركب من الشام تجار من النصارى، قال: فأخبَروني بهم. قال: فقلت لهم: إذا قضوا حوائجهم وأرادوا الرجعة إلى بلادهم فاذنوني بهم. قال: فلما أرادوا الرجعة إلى بلادهم أخبروني بهم، فألقيت الحديد من رجلي، ثم خرجت معهم حتى قدمت الشام، فلما قدمتها قلت: مَنْ أفضل أهل هذا الدين؟ قالوا: الأسقف في الكنيسة. قال: فجئته، فقلت: إني قد رغبت في هذا الدين، وأحببت ان أكون معك أخدمك في كنيستك، وأتعلم منك وأصلي معك. قال: فادخل. فدخلت معه، قال: فكان رجل سوء، يأمرهم بالصدقة، ويرغبهم فيها، فإذا جمعوا إليه منها أشياء، اكتنزه لنفسه، ولم يعطه المساكين، حتى جمع سبع قلال من ذهب وورق، قال: وأبغضته بغضا شديدا لما رأيته يصنع، ثم مات، فاجتمعت إليه النصارى ليدفنوه، فقلت لهم: إن هذا كان رجل سوء، يأمركم بالصدقة، ويرغبكم فيها، فإذا جئتموه بها اكتنزها لنفسه، ولم يعط المساكين منها شيئا. قالوا: وما علمك بذلك؟ قال: قلت: أنا أدلكم على كنزه. قالوا: فَدُلَّنا عليه. قال: فأريتهم موضعه. قال: فاستخرجوا منه سبع قلال مملوءة ذهبا وورقا، قال: فلما رأوها قالوا: والله لا ندفنه أبدا. فصلبوه، ثم رجموه بالحجارة.
ثم جاؤوا برجل آخر، فجعلوه بمكانه، قال: يقول سلمان: فما رأيت رجلا لا يصلي الخمس، أرى أنه أفضل منه، أزهد في الدنيا ولا أرغب في الآخرة ولا أدأب ليلا ونهارا منه، قال: فأحببته حبا لم أحبه من قبله، فأقمت معه زمانا، ثم حضرته الوفاة، فقلت له: يا فلان إني كنت معك وأحببتك حبا لم أحبه من قبلك، وقد حضرك ما ترى من أمر الله، فإلى من توصي بي، وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلم أحدا اليوم على ما كنت عليه، لقد هلك الناس وبدلوا وتركوا أكثر ما كانوا عليه، إلا رجلا بالموصل، وهو فلان، فهو على ما كنت عليه، فالحق به. قال: فلما مات وغُيِّبَ لحقت بصاحب الموصل، فقلت له: يا فلان، إن فلانا أوصاني عند موته أن ألحق بك، وأخبرني أنك على أمره. قال: فقال لي: أقم عندي. فأقمت عنده، فوجدته خير رجل على أمر صاحبه، فلم يلبث أن مات، فلما حضرته الوفاة، قلت له: يا فلان، إن فلانا أوصى بي إليك، وأمرني باللحوق بك، وقد حضرك من الله عز وجل ما ترى، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلم رجلا على مثل ما كنا عليه الا رجلا بنصيبين، وهو فلان، فالحق به. قال: فلما مات وغُيبَ
لحقت بصاحب نصيبين، فجئته فأخبرته بخبري وما أمرني به صاحبي. قال: فأقم عندي، فأقمت عنده، فوجدته على أمر صاحبيه، فأقمت مع خير رجل، فوالله ما لبث أن نزل به الموت. فلما حُضِرَ قلت له: يا فلان، إن فلانا كان أوصى بي إلى فلان، ثم أوصى بي فلان إليك، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما نعلم أحدا بقي على أمرنا آمرك أن تأتيه إلا رجلا بعمورية، فإنه على مثل ما نحن عليه، فإن أحببت فأته، قال: فإنه على أمرنا.
قال: فلما مات وغُيِّبَ لحقت بصاحب عمورية، وأخبرته خبري، فقال: أقم عندي، فأقمت مع رجل على هدي أصحابه وأمرهم، قال: واكتسبت حتى كان لي بقرات وغنيمة. قال: ثم نزل به أمر الله، فلما حُضِر قلت له: يا فلان إني كنت مع فلان، فأوصى بي فلان إلى فلان، وأوصى بي فلان إلى فلان، ثم أوصى بي فلان إليك، فإلى من توصي بي وما تأمرني؟ قال: أي بنيّ! والله، ما أعلمه أصبح على ما كنا عليه أحد من الناس امرك أن تأتيه ولكنه قد أظلك زمان نبي هو مبعوث بدين إبراهيم يخرج بأرض العرب، مهاجرا إلى أرض بين حرتين بينهما نخل، به علامات لا تخفى، يأكل الهدية، ولا يأكل الصدقة، بين كتفيه خاتم النبوة، فإن استطعت أن تلحق بتلك البلاد فافعل.
قال: ثم مات وغُيِّبَ، فمكثت بعمورية ما شاء الله أن أمكث، ثم مرَّ بي نفر من كلبٍ تجارا، فقلت لهم: تحملوني إلى أرض العرب، وأعطيكم بقراتي هذه وغنيمتي هذه؟ قالوا: نعم. فأعطيتهموها وحملوني، حتى إذا قدموا بي وادي القرى، ظلموني فباعوني من رجل من يهود عبدا، فكنت عنده، ورأيت النخل، ورجوت أن تكون البلد الذي وصف لي صاحبي، ولم يحق لي في نفسي، فبينما أنا عنده، قدم عليه ابن عم له من المدينة من بني قريظة، فابتاعني منه، فاحتملني إلى المدينة، فوالله، ما هو الا أن رأيتها، فعرفتها بصفة صاحبي، فأقمت بها وبعث الله رسوله، فأقام بمكة ما أقام، لا أسمع له بذكر مع ما أنا فيه من شغل الرق. ثم هاجر إلى المدينة، فوالله، إني لفي رأس عَذْقٍ لسيدي أعمل فيه بعض العمل، وسيدي جالس، إذ أقبل ابن عم له حتى وقف عليه، فقال: فلان، قاتل الله بني قيلة، والله، إنهم الآن لمجتمعون بقباء على رجل قدم عليهم من مكة اليوم، يزعمون أنه نبي. قال: فلما سمعتها أخذتني العرواء، حتى ظننت سأسقط على سيدي، قال: ونزلت عن النخلة، فجعلت أقول لابن عمه
ذلك: ماذا تقول؟ ماذا تقول؟ قال: فغضب سيدي فلكمني لكمة شديدة. ثم قال: ما لَك ولهذا! أقبل على عملك. قال: قلت: لا شيء، إنما أردت أن استثبته عما قال.
وقد كان عندي شيء قد جمعته، فلما أمسيت أخذته، ثم ذهبت به إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بقباء، فدخلت عليه، فقلت له: إنه قد بلغني أنك رجل صالح، ومعك أصحاب لك غرباء ذوو حاجة، وهذا شيء كان عندي للصدقة، فرأيتكم أحق به من غيركم. قال: فقرَّبْته إليه. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"كلوا" وأمسك يده فلم يأكل. قال: فقلت في نفسي: هذه واحدة ثم انصرفت عنه فجمعت شيئا، وتحول رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة، ثم جئته به فقلت: إني رأيتك لا تأكل الصدقة، وهذه هدية أكرمتك بها. قال: فأكل رسول الله صلى الله عليه وسلم منها، وأمر أصحابه، فأكلوا معه، قال: فقلت في نفسي: هاتان اثنتان، ثم جئت رسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو ببقيع الغرقد. قال: وقد تبع جنازة من أصحابه، عليه شملتان له، وهو جالس في أصحابه، فسلمت عليه، ثم استدرت أنظر إلى ظهره، هل أرى الخاتم الذي وصف لي صاحبي؟ فلما رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم استدبرته عرف أني استثبت في شيء وُصِفَ لي، قال: فألقى رداءه عن ظهره، فنظرت إلى الخاتم فعرفته، فانكببت عليه أقبِّله وأبكي، فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تحوَّل" فتحولت، فقصصت عليه حديثي كما حدثتك يا ابن عباس، قال: فأعجب رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يسمع ذلك أصحابه.
ثم شغَل سلمانَ الرِّقُّ حتى فاته مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بدر وأحد، قال: ثم قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كاتِبْ يا سلمان" فكاتبت صاحبي على ثلاثمائة نخلة أحييها له بالفَقِير وبأربعين أوقية. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لأصحابه:"أعينوا أخاكم" فأعانوني بالنخل: الرجل بثلاثين وَدِيَّةً، والرجل بعشرين، والرجل بخمس عشرة، والرجل بعشر - يعني: الرجل بقدر ما عنده - حتى اجتمعت لي ثلاثمائة ودية، فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اذهب يا سلمان، ففَقِّرْ لها، فإذا فرغت فائتني، أكون أنا أضعها بيدي" ففقَّرْتُ لها، وأعانني أصحابي، حتى إذا فرغت منها جئته، فأخبرته، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم معي إليها، فجعلنا نقرب له الودي ويضعه رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده، فوالذي نفس سلمان بيده، ما ماتت منها ودية واحدة، فأدَّيتُ النخل، وبقي عليَّ المال، فأُتِيَ رسول الله صلى الله عليه وسلم بمثل بيضة الدجاجة من ذهب من بعض المغازي، فقال:"ما فعل الفارسي المكاتب؟"
قال: فدُعِيْتُ له، فقال:"خذ هذه فأدِّ بها ما عليك يا سلمان" فقلت: وأين تقع هذه يا رسول الله مما عليَّ؟ ! قال:"خذها، فإن الله سيؤدي بها عنك" قال: فأخذتها، فوزنت لهم منها - والذي نفس سلمان بيده - أربعين أوقية، فأوفيتهم حقهم، وعتقت، فشهدت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم الخندق، ثم لم يفتني معه مشهد.
حسن: رواه أحمد (23737)، والبزار في مسنده (2499، 2500)، والطبراني في الكبير (6/ 276 - 272)، وابن سعد في الطبقات (4/ 75 - 80) كلهم من طرق، عن محمد بن إسحاق، حدثني عاصم بن عمر بن قتادة الأنصاري، عن محمود بن لبيد، عن عبد الله بن عباس فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.
ومن أخباره:
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সালমান ফারসি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিজ মুখে আমাকে তাঁর ঘটনা বর্ণনা করেছেন।
তিনি বলেছেন: আমি ছিলাম পারস্যের অধিবাসী, ইস্পাহান শহরের অন্তর্গত 'জি' নামক এক গ্রামের লোক। আমার পিতা ছিলেন সেই গ্রামের প্রধান (দেহকান)। আমি ছিলাম আল্লাহর সৃষ্টিজগতের মধ্যে তাঁর কাছে সবচেয়ে প্রিয়। তাঁর এই ভালোবাসা আমাকে ঘরের মধ্যে আবদ্ধ করে রাখল, যেমনভাবে দাসীকে আটকে রাখা হয়। আমি অগ্নিপূজায় (মাজুসিয়াত) এতটাই আগ্রহী ছিলাম যে আমি আগুনের তত্ত্বাবধায়ক (কতনুন নার) হয়ে গেলাম। আমি দেখতাম যেন আগুন এক মুহূর্তের জন্যও নিভে না যায়।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার পিতার একটি বিশাল জমিদারি ছিল। একদিন তিনি তাঁর একটি নির্মাণ কাজ নিয়ে ব্যস্ত ছিলেন। তিনি আমাকে বললেন, "হে পুত্র! আজ আমি আমার এই নির্মাণ কাজ নিয়ে ব্যস্ত থাকায় জমিদারি দেখতে যেতে পারছি না। তুমি যাও এবং তা দেখাশোনা করে এসো।" তিনি আমাকে সেখানে কিছু কাজ করার আদেশ দিলেন। আমি তাঁর জমিদারি অভিমুখে বের হলাম। পথে খ্রিস্টানদের একটি উপাসনালয় (কনিসা) দেখতে পেলাম। আমি তাদের সেখানে নামাযের (ইবাদতের) শব্দ শুনতে পেলাম। আমার পিতা আমাকে ঘরে আবদ্ধ করে রাখায় আমি লোকজনের ধর্ম সম্পর্কে কিছুই জানতাম না। যখন আমি তাদের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম এবং তাদের শব্দ শুনলাম, তখন আমি তাদের কার্যকলাপ দেখার জন্য ভেতরে প্রবেশ করলাম।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যখন আমি তাদের দেখলাম, তখন তাদের নামায আমার কাছে ভালো লাগল এবং আমি তাদের ধর্মের প্রতি আগ্রহী হলাম। আমি বললাম: "আল্লাহর কসম! আমাদের এই ধর্মের চেয়ে এটি উত্তম।" আল্লাহর কসম, সূর্য ডোবা পর্যন্ত আমি তাদের ছেড়ে যাইনি, আর আমার পিতার জমিদারিও যাইনি। আমি তাদের জিজ্ঞাসা করলাম, "এই ধর্মের উৎস কোথায়?" তারা বলল: "শামে (সিরিয়াতে)।"
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর আমি পিতার কাছে ফিরে গেলাম। তিনি ততক্ষণে আমাকে খোঁজার জন্য লোক পাঠিয়েছেন এবং তাঁর সকল কাজ ফেলে আমাকে নিয়ে ব্যস্ত ছিলেন। যখন আমি তাঁর কাছে পৌঁছলাম, তিনি বললেন, "হে পুত্র! তুমি কোথায় ছিলে? আমি কি তোমাকে যা দায়িত্ব দিয়েছিলাম, তা ভুলে গেলে?" আমি বললাম, "আব্বা, আমি কিছু লোকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, যারা তাদের উপাসনালয়ে নামায পড়ছিল। তাদের ধর্মীয় রীতিনীতি আমার খুব ভালো লেগেছে। আল্লাহর কসম! সূর্য ডোবা পর্যন্ত আমি তাদের কাছেই ছিলাম।" তিনি বললেন, "হে পুত্র! সেই ধর্মে কোনো কল্যাণ নেই। তোমার এবং তোমার পূর্বপুরুষদের ধর্ম তার চেয়ে উত্তম।" আমি বললাম: "কখনোই না! আল্লাহর কসম, এটি আমাদের ধর্মের চেয়ে উত্তম।" এতে তিনি ভয় পেয়ে গেলেন। তিনি আমার পায়ে শিকল পরিয়ে দিলেন এবং আমাকে ঘরের মধ্যে বন্দী করে রাখলেন।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি খ্রিস্টানদের কাছে লোক পাঠালাম এবং বললাম, "শাম থেকে খ্রিস্টান ব্যবসায়ীদের কোনো কাফেলা আসলে আমাকে খবর দেবে।" এরপর শাম থেকে খ্রিস্টান ব্যবসায়ীদের একটি কাফেলা এল। তারা আমাকে সে খবর দিল। আমি তাদের বললাম: "যখন তারা তাদের প্রয়োজন মিটিয়ে তাদের দেশে ফিরে যেতে চাইবে, তখন আমাকে জানাবে।" যখন তারা তাদের দেশে ফিরে যাওয়ার ইচ্ছা করল, তখন তারা আমাকে জানাল। আমি আমার পা থেকে লোহার শিকল খুলে ফেললাম এবং তাদের সাথে বের হলাম। এভাবে আমি শাম পৌঁছলাম। সেখানে পৌঁছে আমি জিজ্ঞাসা করলাম: "এই ধর্মের সর্বোত্তম লোক কে?" তারা বলল: "উপাসনালয়ের বিশপ (আসক্বফ)।" আমি তার কাছে গেলাম এবং বললাম, "আমি এই ধর্মের প্রতি আগ্রহী হয়েছি এবং আপনার সঙ্গে থাকতে, আপনার উপাসনালয়ে আপনার সেবা করতে, আপনার কাছ থেকে শিখতে এবং আপনার সাথে নামায পড়তে পছন্দ করি।" তিনি বললেন: "ভিতরে এসো।" আমি তাঁর সঙ্গে প্রবেশ করলাম।
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: লোকটি ছিল একজন খারাপ মানুষ। সে লোকদেরকে সাদাকা দিতে বলত এবং তাতে উৎসাহিত করত। কিন্তু যখন তারা কিছু জমা করত, সে তা নিজের জন্য মজুদ করে রাখত এবং অভাবীদের দিত না। এভাবে সে সোনা ও রুপার সাতটি কলস জমা করে ফেলল। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি যা দেখলাম, তাতে তাকে প্রচণ্ড ঘৃণা করতাম। এরপর সে মারা গেল। খ্রিস্টানরা তাকে দাফন করার জন্য একত্রিত হলো। আমি তাদের বললাম: "এ লোকটি খারাপ ছিল। সে তোমাদেরকে সাদাকা দিতে বলত এবং উৎসাহিত করত। কিন্তু যখন তোমরা তা নিয়ে আসতে, সে তা নিজের জন্য মজুদ করে রাখত এবং অভাবীদের কিছুই দিত না।" তারা বলল: "আপনি কীভাবে তা জানলেন?" আমি বললাম: "আমি তোমাদের তার গুপ্তধন দেখিয়ে দিতে পারি।" তারা বলল: "তাহলে আমাদের দেখান।" আমি তাদের সেই স্থানটি দেখিয়ে দিলাম। তারা সেখান থেকে সোনা ও রুপা ভর্তি সাতটি কলস বের করল। তারা যখন তা দেখল, তখন বলল: "আল্লাহর কসম! আমরা তাকে কখনোই দাফন করব না।" তারা তাকে শূলে চড়াল এবং পাথর মেরে হত্যা করল।
এরপর তারা অন্য একজনকে এনে তার জায়গায় বসাল। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেই দ্বিতীয় ব্যক্তির মতো আর কাউকে দেখিনি, যে পাঁচ ওয়াক্ত নামায পড়ত। আমি তাকেই সর্বোত্তম মনে করি—দুনিয়ার প্রতি সবচেয়ে বেশি অনাসক্ত, আখেরাতের প্রতি সবচেয়ে বেশি আগ্রহী এবং দিনরাত সবচেয়ে বেশি ইবাদতে মগ্ন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাকে এমন ভালোবাসতাম, যা এর আগে আর কাউকে বাসিনি। আমি তার সঙ্গে অনেক দিন থাকলাম। যখন তার মৃত্যুর সময় এল, আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! আমি আপনার সঙ্গে ছিলাম এবং আপনাকে এমন ভালোবেসেছি, যা আগে কাউকে বাসিনি। এখন আপনি আল্লাহর যে অবস্থা দেখছেন, তা আপনার সামনে উপস্থিত। আপনি আমাকে কার কাছে থাকার জন্য অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আজ আমি এমন কাউকে জানি না যে আমার পথের উপর আছে। লোকেরা ধ্বংস হয়ে গেছে এবং (দ্বীনকে) পরিবর্তন করে ফেলেছে। তারা তাদের অধিকাংশ বিষয় ছেড়ে দিয়েছে, তবে মসুলের অমুক ব্যক্তি ব্যতীত। সে আমার পথের উপরেই আছে। তুমি তার সঙ্গে মিলিত হও।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি মসুলের সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম। আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি তার মৃত্যুর সময় আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করে গেছেন এবং আমাকে জানিয়েছেন যে আপনি তাঁর পথের উপর আছেন।" তিনি আমাকে বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর কাছে থাকলাম। আমি তাকে তার পূর্বের সঙ্গীর মতোই উত্তম ব্যক্তি হিসেবে পেলাম। অল্প কিছুদিন পরেই তিনি মারা গেলেন। যখন তার মৃত্যুর সময় এল, আমি তাকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করে গেছেন এবং আপনার সঙ্গে মিলিত হওয়ার আদেশ দিয়েছেন। এখন আপনি মহান আল্লাহর পক্ষ থেকে যে অবস্থা দেখছেন, তা আপনার সামনে উপস্থিত। আপনি আমাকে কার কাছে থাকার জন্য অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমি এমন কাউকে জানি না, যে আমাদের মতো পথে আছে, তবে নাসিবিনের অমুক ব্যক্তি ব্যতীত। তুমি তার কাছে যাও।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি নাসিবিনের সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম। আমি তাঁর কাছে এসে আমার ঘটনা এবং আমার সঙ্গীর দেওয়া আদেশ জানালাম। তিনি বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর কাছে থাকলাম। আমি তাঁকে তাঁর দুই পূর্বের সঙ্গীর পথেই পেলাম। আমি এক উত্তম ব্যক্তির সঙ্গে থাকলাম। আল্লাহর কসম, অল্প কিছুদিন পরেই তাঁর মৃত্যু উপস্থিত হলো। যখন তাঁর মৃত্যুর সময় এল, আমি তাঁকে বললাম, "হে অমুক! অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেছিলেন, এরপর সেই অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করেছেন। আপনি আমাকে কার কাছে অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমরা এমন কাউকে জানি না, যিনি আমাদের পথের ওপর অবশিষ্ট আছেন এবং যার কাছে যেতে আমি তোমাকে নির্দেশ দিতে পারি, তবে আম্মুরিয়ার একজন লোক ব্যতীত। সে আমাদের মতোই পথের উপর আছে। যদি তুমি চাও, তবে তুমি তার কাছে যাও। সে আমাদের পথের উপরই আছে।"
যখন তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো, আমি আম্মুরিয়ার সেই ব্যক্তির কাছে গেলাম এবং তাঁকে আমার ঘটনা জানালাম। তিনি বললেন: "আমার কাছে থাকো।" আমি তাঁর সঙ্গীদের পথ ও নির্দেশের ওপর থাকা এক উত্তম ব্যক্তির সঙ্গে থাকলাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি সেখানে সম্পদ উপার্জন করলাম, এমনকি আমার কিছু গরু ও মেষও হলো। এরপর তাঁর ওপর আল্লাহর ফায়সালা এসে গেল। যখন তাঁর মৃত্যুর সময় এল, আমি তাঁকে বললাম, "হে অমুক! আমি অমুক ব্যক্তির সাথে ছিলাম, এরপর অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেন, এরপর অমুক ব্যক্তি আমার জন্য অমুক ব্যক্তির কাছে অসিয়ত করেন, এরপর সেই অমুক ব্যক্তি আমার জন্য আপনার কাছে অসিয়ত করেন। আপনি আমাকে কার কাছে অসিয়ত করবেন এবং কী আদেশ দেবেন?" তিনি বললেন, "হে পুত্র! আল্লাহর কসম! আমি এমন কাউকে জানি না, যে আমাদের পথের ওপর অবশিষ্ট আছে এবং যার কাছে যেতে আমি তোমাকে নির্দেশ দিতে পারি। তবে এখন তোমার উপর এমন এক নবীর সময় ঘনিয়ে এসেছে, যিনি ইব্রাহিমের (আঃ) ধর্মসহ প্রেরিত হবেন। তিনি আরবের ভূমি থেকে বেরিয়ে আসবেন এবং দুই 'হার্রা' (কালো পাথরের ভূমি) এর মধ্যবর্তী স্থানে, যেখানে খেজুরের গাছ আছে, সেখানে হিজরত করবেন। তাঁর এমন কিছু স্পষ্ট আলামত রয়েছে যা গোপন থাকবে না: তিনি হাদিয়া (উপহার) গ্রহণ করবেন কিন্তু সাদাকা (দান) খাবেন না। তাঁর দুই কাঁধের মাঝখানে নবুওয়তের মোহর থাকবে। যদি তুমি সেই দেশে পৌঁছতে পারো, তবে তা করো।"
এরপর তিনি মারা গেলেন এবং তাকে দাফন করা হলো। আমি আম্মুরিয়ায় আল্লাহর ইচ্ছানুসারে কিছুদিন থাকলাম। এরপর কালব গোত্রের কিছু ব্যবসায়ী আমার পাশ দিয়ে যাচ্ছিল। আমি তাদের বললাম: "তোমরা আমাকে আরবের ভূমিতে নিয়ে যাবে, আর এর বিনিময়ে আমি তোমাদেরকে আমার এই গরুগুলো ও মেষগুলো দেব?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" আমি তাদের তা দিয়ে দিলাম এবং তারা আমাকে নিয়ে চলল। যখন তারা আমাকে 'ওয়াদি আল-ক্বুরা' নামক স্থানে পৌঁছাল, তখন তারা আমার ওপর জুলুম করল এবং আমাকে এক ইহুদি ব্যক্তির কাছে গোলাম হিসেবে বিক্রি করে দিল। আমি তার কাছে থাকলাম এবং সেখানে খেজুর গাছ দেখলাম। আমি আশা করলাম, এই হয়তো সেই শহর, যার বর্ণনা আমার সঙ্গী দিয়েছিলেন। কিন্তু আমার মন তাতে নিশ্চিত হলো না। আমি তার কাছে ছিলাম। এমন সময় বনি কুরাইযা গোত্রের মদিনার এক চাচাতো ভাই তার কাছে এল এবং সে আমাকে কিনে নিল। সে আমাকে মদিনায় নিয়ে গেল। আল্লাহর কসম! আমি যেই মাত্র শহরটি দেখলাম, আমার সঙ্গীর দেওয়া বর্ণনার কারণে আমি তা চিনতে পারলাম। আমি সেখানে থাকলাম।
আল্লাহ তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাঠালেন। তিনি মক্কায় আল্লাহর ইচ্ছানুসারে অবস্থান করলেন। আমি দাসত্বের কাজে ব্যস্ত থাকার কারণে তাঁর কোনো খবর শুনতে পেলাম না। এরপর তিনি মদিনায় হিজরত করলেন। আল্লাহর কসম! আমি আমার মালিকের একটি খেজুর গাছের মাথায় কিছু কাজ করছিলাম, আর আমার মালিক নিচে বসা ছিল। এমন সময় তার এক চাচাতো ভাই এসে তার কাছে দাঁড়াল এবং বলল: "অমুক! ক্বায়লা গোত্রের ওপর আল্লাহ অভিশাপ দিন! আল্লাহর কসম, তারা এখন কুবায় এমন এক ব্যক্তির কাছে একত্রিত হয়েছে, যিনি আজ মক্কা থেকে এসেছেন এবং যিনি নিজেকে নবী বলে দাবি করছেন।"
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যখন আমি তা শুনলাম, তখন আমার শরীরে এমন কাঁপুনি শুরু হলো যে আমি প্রায় আমার মালিকের ওপর পড়ে যাচ্ছিলাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি খেজুর গাছ থেকে নেমে এলাম এবং তার চাচাতো ভাইকে বলতে লাগলাম: "তুমি কী বলছ? তুমি কী বলছ?" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার মালিক রেগে গেলেন এবং আমাকে জোরে ঘুষি মারলেন। এরপর বললেন: "এতে তোমার কী আসে যায়! তোমার কাজে মন দাও।" আমি বললাম: "কিছু না। আমি শুধু তিনি যা বলেছেন, তা নিশ্চিত হতে চেয়েছিলাম।"
আমার কাছে জমানো কিছু জিনিস ছিল। সন্ধ্যা হলে আমি তা নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে গেলাম, যখন তিনি কুবায় ছিলেন। আমি তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম এবং বললাম: "আমি জানতে পেরেছি যে আপনি একজন নেককার লোক, আর আপনার সঙ্গে যারা আছে তারা নিঃস্ব ও অভাবী অপরিচিত মানুষ। এটি কিছু সাদাকার জিনিস ছিল যা আমার কাছে ছিল। আমি দেখলাম যে অন্যদের চেয়ে আপনারাই এর বেশি হকদার।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তা তাঁর কাছে পেশ করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদের বললেন: "তোমরা খাও।" কিন্তু তিনি নিজের হাত টেনে নিলেন এবং খেলেন না। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মনে মনে বললাম: "এই তো প্রথম আলামত!"
এরপর আমি তাঁর কাছ থেকে চলে গেলাম এবং কিছু জিনিসপত্র জোগাড় করলাম। ইতিমধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদিনায় চলে এসেছেন। আমি তা নিয়ে তাঁর কাছে এসে বললাম: "আমি দেখলাম যে আপনি সাদাকা খান না। আর এটি একটি হাদিয়া, যা দিয়ে আমি আপনাকে সম্মান জানাচ্ছি।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তা থেকে খেলেন এবং তাঁর সাহাবীদেরও তাঁর সাথে খেতে আদেশ দিলেন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি মনে মনে বললাম: "এই তো দ্বিতীয় আলামত!"
এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এলাম। তিনি তখন বাকী' আল-গারক্বাদ নামক স্থানে তাঁর সাহাবীদের একজনের জানাযার পেছনে যাচ্ছিলেন। তাঁর গায়ে দু'টি চাদর ছিল এবং তিনি তাঁর সাহাবীদের মাঝে বসেছিলেন। আমি তাঁকে সালাম দিলাম। এরপর আমি তাঁর পিঠের দিকে ঘুরলাম, যেন আমার সঙ্গী যে মোহরের বর্ণনা দিয়েছিলেন, আমি তা দেখতে পাই। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দেখলেন যে আমি তাঁর পিঠের দিকে ঘুরছি, তখন তিনি বুঝতে পারলেন যে আমি বর্ণিত কোনো বিষয় নিয়ে নিশ্চিত হতে চাচ্ছি। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি তাঁর পিঠ থেকে চাদরটি সরিয়ে দিলেন। আমি নবুওয়তের মোহরটি দেখলাম এবং চিনতে পারলাম। আমি তাঁর ওপর ঝুঁকে পড়লাম, তাঁকে চুম্বন করতে লাগলাম এবং কাঁদতে লাগলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "এদিকে এসো।" আমি তাঁর দিকে ফিরলাম এবং হে ইবনে আব্বাস! যেভাবে তোমাকে বর্ণনা করলাম, সেভাবেই তাঁকে আমার পুরো ঘটনা খুলে বললাম। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহাবীরা এই ঘটনা শুনতে পাওয়ায় তিনি খুব খুশি হয়েছিলেন।
এরপর দাসত্বের কারণে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ব্যস্ত থাকলেন, ফলে তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে বদর ও উহুদ যুদ্ধে অংশগ্রহণ করতে পারেননি। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে সালমান! তুমি মুক্ত হওয়ার জন্য চুক্তি (মুকাতাব) করো।" আমি আমার মালিকের সাথে তিনশ খেজুর গাছের বিনিময়ে, যা আমি তার জন্য 'ফাকীর' (ছোট গর্ত) তৈরি করে জীবিত করে দেব, এবং চল্লিশ উকিয়া (স্বর্ণ/রৌপ্য)-এর বিনিময়ে চুক্তি করলাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীদের বললেন: "তোমরা তোমাদের ভাইকে সাহায্য করো।"
তারা খেজুর গাছ দিয়ে আমাকে সাহায্য করলেন—কেউ ত্রিশ চারা, কেউ বিশ, কেউ পনেরো, কেউ দশ—অর্থাৎ যার কাছে যা ছিল সেই পরিমাণে—এভাবে আমার জন্য তিনশ চারা একত্রিত হলো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে সালমান! যাও, এর জন্য গর্ত তৈরি করো। যখন কাজ শেষ হবে, আমার কাছে এসো। আমি নিজ হাতে তা রোপণ করব।" আমি গর্ত তৈরি করলাম এবং আমার সাহাবীরা আমাকে সাহায্য করলেন। কাজ শেষ হলে আমি তাঁর কাছে এসে তাঁকে জানালাম। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার সাথে সেখানে গেলেন। আমরা তাঁর কাছে চারাগুলো এগিয়ে দিচ্ছিলাম আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিজ হাতে তা রোপণ করছিলেন। সেই সত্তার কসম, যার হাতে সালমানের প্রাণ, সেই গাছগুলোর একটি চারাও মরেনি।
আমি খেজুর গাছ পরিশোধ করলাম, কিন্তু অর্থ বাকি রইল। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে কিছু গনীমতের মাল হিসেবে একটি মুরগির ডিমের মতো স্বর্ণখণ্ড এল। তিনি বললেন: "মুকাতাব (চুক্তিভুক্ত) ফারসির কী খবর?" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমাকে ডাকা হলো। তিনি বললেন: "হে সালমান! এটা নাও এবং এর দ্বারা তোমার দেনা পরিশোধ করো।" আমি বললাম: "হে আল্লাহর রাসূল! আমার এত বড় দেনার কাছে এই সামান্য জিনিস কী কাজে আসবে?!" তিনি বললেন: "এটা নাও। আল্লাহ অবশ্যই এর দ্বারা তোমার দেনা পরিশোধ করিয়ে দেবেন।" সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তা নিলাম। সেই সত্তার কসম, যার হাতে সালমানের প্রাণ, আমি সেই স্বর্ণখণ্ড থেকে তাদের জন্য চল্লিশ উকিয়া ওজন করে দিলাম। এভাবে আমি তাদের হক আদায় করলাম এবং মুক্ত হলাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে খন্দক যুদ্ধে অংশগ্রহণ করলাম। এরপর থেকে তাঁর সাথে আমার আর কোনো যুদ্ধে অংশগ্রহণ করা ফওত হয়নি।
10027 - عن أنس بن مالك قال: اشتكى سلمان فعاده سعد، فرآه يبكي، فقال له سعد: ما يبكيك يا أخي؟ أليس قد صحبت رسول الله صلى الله عليه وسلم، أليس؟ أليس؟ قال سلمان: ما أبكي واحدة من اثنتين، ما أبكي حبا للدنيا، ولا كراهية للآخرة، ولكن رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد إلي عهدا، فما أراني إلا قد تعديت، قال: وما عهد إليك؟ قال: عهد إلي:"أنه يكفي أحدكم مثل زاد الراكب، ولا أُراني إلا قد تعديتُ، وأما أنت يا سعد فاتق الله عند حُكْمك إذا حكمت، وعند قَسْمك إذا قسمت، وعند هَمِّك إذا هممتَ" قال ثابت:"فبلغني أنه ما ترك إلا بضعة وعشرين درهما، من نُفَيْقةٍ كانت عنده".
حسن: رواه ابن ماجه (4104)، والطبراني في الكبير (6/ 279)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 197) كلهم من طريق الحسن بن أبي الربيع، حدثنا عبد الرزاق، حدثنا جعفر بن سليمان، عن ثابت، عن أنس فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسن بن أبي الربيع - وهو الحسن بن يحيى بن الجعد العبدي الجرجاني -، وجعفر بن سليمان الضبعي فإنهما حسنا الحديث.
وتوفي سلمان سنة خمس وثلاثين، وقيل: سنة ست وثلاثين.
وأما عمره فقيل: إنه تجاوز المئتين وخمسين، وقيل: ثلاثمائة وخمسين، وهذه الأقوال ذكرت بدون مستند معتمد، ولم يذكره ابن قانع ولا ابن عبد البر، وإنما ذكره ابن مندة في"معرفة الصحابة" وأبو نعيم في"معرفة الصحابة" بدون مستند بل وقد قالا: إنه أدرك وصي عيسى عليه السلام، هذا كله بعيد، فإنه لو قُدِّر أنه عاش ثلاثمائة وخمسين فبينه وبين وصي عيسى عليه السلام ثلاثمائة. ولذا قال الذهبي: إنه ما زاد على الثمانين. ولو صح هذا القول لتواترت النقول من الصحابة والتابعين، وعد ذلك من خوارق العادات.
ولذا قال الذهبي بعد أن نقل عن البحراني أنه عاش ثلاثمائة وخمسين سنة:"وقد فتشت فما ظفرت في سنه بشيء سوى قول البحراني، وذلك منقطع لا إسناده له". ثم قال:"لعله عاش بضعا وسبعين سنة، وما أراه بلغ المائة". سير أعلام النبلاء (1/
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অসুস্থ হলেন। তখন সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে দেখতে এলেন। সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে কাঁদতে দেখলেন এবং বললেন: হে আমার ভাই, আপনি কাঁদছেন কেন? আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাহচর্য লাভ করেননি? আপনি কি... আপনি কি...?
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি দুটির মধ্যে কোনোটির জন্যই কাঁদছি না। আমি দুনিয়ার প্রতি ভালোবাসার জন্যও কাঁদছি না, আর আখিরাতের প্রতি বিতৃষ্ণার জন্যও কাঁদছি না। কিন্তু রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমার কাছে একটি অঙ্গীকার নিয়েছিলেন, আর আমি দেখছি আমি তা লঙ্ঘন করে ফেলেছি।
সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি আপনার কাছে কী অঙ্গীকার নিয়েছিলেন?
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তিনি আমার কাছে অঙ্গীকার নিয়েছিলেন যে, "তোমাদের কারো জন্য একজন আরোহীর পাথেয়র সমপরিমাণ যথেষ্ট, আর আমি দেখছি যে আমি তা অতিক্রম করে ফেলেছি।"
আর হে সা'দ, যখন তুমি বিচার করবে তখন তোমার বিচারে আল্লাহকে ভয় করবে, যখন তুমি বণ্টন করবে তখন তোমার বণ্টনে আল্লাহকে ভয় করবে এবং যখন তুমি কোনো বিষয়ে মনস্থ করবে তখন তোমার মনস্থ করার ক্ষেত্রে আল্লাহকে ভয় করবে।
সাবিত (রাহঃ) বলেন: আমার কাছে এই খবর পৌঁছেছে যে, তাঁর কাছে যে সামান্য খরচ ছিল তা থেকে তিনি বিশের অধিক কয়েকটি দিরহাম (মাত্র) রেখে গেছেন।